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िवचारो की खेत ी जेम स एलेन कृ त, ‘एस द मैन िथके थ ’ का िहनदी अनुव ाद

दास कृ षण


िविचारो की खेती िवश पिसद, जेमस एलेन कृ त, ‘एस द मैन िथके थ’ का िहनदी अनुवाद पसार माधयम मे नैितक पितबनधता कापीराइट मुक। उतरदाियतव मुक। अलौिकक िवचारो के शबदावतार यह पसतुत गनथ, दान रप मे संसार को समिपत है। मौिलक पित इनटरनेट पर उपलबध है। लेखक को मूलय नही चािहए िकनतु मौिलकता की कित न होने पाए इस िलए इसकी अपिरवतरनीय िसथित और पूणरता को बनाये रख,

सदभाव मे, िकसी को भी इसके पकाशन और िवतरण हेतु

िकसी अनुमित की आवशयकता नही है। यह वकव ‘नैितक पितबनध’ मूल गंथ का एक भाग है। लेखक को उन शबदानुरागी पकाशको की सूचना अपेिकत तो है िकनतु आवशयक नही। इसके पकाशन, पचार, िशका और िवतरण कायर मे, वावसाियक कारणो से, मूलय का कोई भी िनणरय पकाशक ले सके गे। पकाशक इसका उपयोग िकसी वसतु या संगठन के िवजापन के िलए नही कर सके गे। ‘एस द मैन िथके थ’ िहनदी अनुवाद के लेखक दास कृ षण (कृ षण गोपाल िमश ) kg@kgmisra.com टे लीफोन : 093 124 01 302 [भारत मे] कृ षण धाम, 735, सेकटर 39, यूिनटेक साइबर पाकर के िनकट,

गुड़गाँव 122002, भारत


दास कृ षण का जेम स ऐलेन की उपासना के शबद

‘एस द मैन िथके थ’ नाम का यह गंथ जेमस एलेन दारा सौ वषर पूवर िलखा गया, और यह दुिनया भर मे लाखो विकयो का पेरणा-शोत बन, उनके आितमक िवकास को िवशेष रप से पभािवत करता रहा है। भगवत गीता के 13 वे खंड, केत और केतज अथारत खेत और खेितहर (जो खेती करता है) का िजतना सुद ं र और रोचक वाखया जेमस एलेन ने की है वह अदभुत है। इस गंथ को पढ़ने और उसे अपने शबदो मे पुनः िलखने के इस अवसर से, मुझे जेमस एलेन के वैभवशाली और िवशाल मन मे रहने, और उनके समीपता का अहसास िजसे उपासना कहते है, से मुझे अभूतपूवर पसनता हो रही है। यही गंथ वह दार है िजससे जीवन बदलते देर नही लगती। नामरन िवनसेट पेले, आलर नाइटेगल, डेिनस वेतले, और अनथोनी रािबनस जैसे ततकालीन लेखक और िवचारक उनमे शािमल है जो िक इस पुसतक से पेिरत है। आतमा सभी जीवो मे एक ही है। जबिक, हर एक जीव, इस जगत मे मन और शरीर, जो पाकृ ितक उपकरण है, को जानने की चेषा और उसका उपयोग वे िजन उदेशयो के िलये करते है, उनसे ही वे परसपर िभन िदखते है। अभौितक मन (सॉफटवेर) और भौितक शरीर (हाडरवेर) दोनो ही पाकृ ितक िसदानत से िनिमत ततव है और इन दोनो से िमल कर बने कमपुटर की कमता चाहे िकतनी भी कयो न हो, जब तक उसे चलाने का कोई िनणरय न ले, वह अपने आप नही चल सकता। िनणरय लेने वाला और िजसके उदेशय हो, वही आतमा है। जीव वही आतमायेँ है जो अपने-अपने मन और शारीिरक उपकरणो से होने वाले कमर से, इस समपूणर जगत को जीिवत बना और चला रही है। सभी कमर, िवचारो की खेती है। आतमा, मन के खेत मे िवचारो के बीज बोती है और उसी से फल, चाहे अचछे या बुरे, उसे िमलते है। पाकृ ितक िनयम सभी काल मे एक ही है और बदले नही जा सकते इसिलए वे अनयाय नही कर सकते। जीव का सुख-दुख और संबंध उसके अपने ही िनणरय, और मन मे बोये िवचारो के चुनाव पर ही िनभरर है और, उसका अपने िवषम पिरिसथितयो के िलये िकसी दूसरे को दोष देना िनरथरक है। वह अपने िवचारो को यिद ठीक कर दे तो वे पिरिसथितयाँ नही होगी। पाकृ ितक िनयम पर िसथत संसार (पिरवार के संबंध, वावसाियक-सामािजक ववसथा, वैजािनक जान, और आधयितमक अपनापन) को, इस तरह, जब जैसा चाहे बदला जा सकता है।

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िवचारो का शोत, परम-आतमा, आतमा की वह िसथित है जब मन शानत हो चुका है और जीव अलग अलग कमो के रहसय अथारत पाकृ ितक िकया-पितिकया को जान, तृप और सहज है। िवचारो की खेती ही जीवो का कमर है जो सावधानी से करना चािहए कयोिक िवचार ही सृिष के बीज है और जैसा हम बोयेगे वही हम काटते है। अपने ही िवचारो की खेती से जीव इस संसार मे हो रहे सृिष-पिरवतरन और समापन को समझता है और इचछाओ को समझ, उससे परे होने पर ही उसे मन की शांित या आतम-बोध की उपलिबध हो पाती है। उठह राम भंजह भव चापा, मेटह तात जनक पिरतापा॥ 3/253 बाल काणड ऋिष िवशािमत शी राम से कहते है की हे राम अपने शुभ िवचारो से तुम िशव िनिमत इस संसार रपी यनत को सही िसथित मे ला दो िजससे िवषम पिरिसथितयो को जो यहाँ उपिसथत है, और पकृ ित जो इनका जनक है उनकी िचता दूर हो। दास कृ षण गुर पूिणमा 22 जुलाई 2013

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ं े थ’ - जेम्स एलेन ‘एस द मैन िथक प्राथनर्थना िविचार और चिरत हमारे िविचार, बाहरी पिरिसथितयां िविचारो का स्विास्थ्य और शरीर पर प्रभावि िवचारो के खेती का उदेशयपूणर होना िवचार और बदलाव सवप दृषा, आदशर दृशय और साकार जगत पशानत मन

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प्राथर्थना [प्रथम शब्द] - जेम्स एलेन यह छोटी सी पसतुित जो मेरे धयान और अनुभव का फल है, िवचार की उन असीिमत शिकयो के वाखया के िलए नही है जो पिहले से ही बहत िलखा जा चुका है। यह एक सहायता भर है न िक जान के िवसतार का पयत। इसका लकय है िक लोगो को इस सतय की खोज और उसके अनुभव, िक वे सवयं ही अपने िनमारता है, के िलए पोतसािहत िकया जाय। अपने ही चुने हए िवचारो के पोतसाहन से, मन एक जुलाहे की तरह इन धागो से इस शरीर के िलए उसका चिरत, नाम का एक आंतिरक कपडा बुनता है और बाहर के िलए, पिरिसथितयो के नाम से एक अलग कपडा बुनता है। इन कपडो के होते हए भी, अजानता और ददर सहने वाले, इस सतय को जान, यिद चाहे, तो अपने िलए आहलाद और पसनता का चुनाव कर सकते है।

असाधारण राजा का चिरत भी असाधारण होता है, और इस असाधारण चिरत के कवच के कारण, उनहे कभी डर नही लग सकता।

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1: िविचार और चिरत "जैसा एक मनुषय का मन सोचता है, वही वह बन जाता जाता है" यह अंतजारन, विक के समूचे अिसततव को ही नही बिलक, इतना ... वापक है िक उससे हर एक मानिसक दशा ... और जीवन की सभी पिरिसथितयो को, समझा जा सकता है। मनुषय वसतुतः वही है जो उसे उसकी सोच बनाती है; और चिरत, उसके सभी िवचारो का एक जोड़ है। जैसे कोई भी पौधा जो िदखता है, िबना बीज के नही हो सकता इसी तरह मनुषय का हर एक पयत, िकसी न िकसी िवचार के छु पे हए बीज के िबना संभव नही है। यह दोनो अवसथा मे बराबर है चाहे अचानक या िबना सोचे हए हआ हो, या जान बूझ कर िकये गए हो। । कमर, िवचारो के बीज से बना एक पौध है, और पसनता या रोग उनके ही फल। इस िलए, मनुषय को पाप होने वाला मीठा या कडु आ फल, उसके अपने ही बाग की खेती से है। मन के िवचार हमे बनाते है। जो भी हम है, िवचारो दारा पकाए गए, और िनिमत। यिद िवचारो मे शैतानी है तो ददर तो होगा, जैसे पिहये आगे हो और बैल उस गाडी को पीछे से धके लता हो। जो िवचारो की शुदता के िलए पयतशील है, िनिशत है, िक आितमक आनंद, परछाई की तरह उसका पीछा नही छोड़ता । मनुषय के िवकास को िनधारिरत करने वाला, यह एक शाशत िसदांत है; कोई आकिसमक चमतकार नही ! कारण और उसके पभाव की परसपर िनभररता उतनी ही सतय और शाशत, मन के िवचारो मे होती है िजतना िक साधारण िदखने वाले घटनाओ या पदाथो मे। धयान रहे, एक शेष और ईशरीय चिरत को पाना िकसी भागय या कृ पा का फल नही होता; बिलक यह िनरं तर िकये गए सही सोच का एक अवशयमभावी पिरणाम, और ईशर के शुद िवचारो के साथ पेम पूवरक रहने का पभाव है। एक आदशर और शुद चिरत, िवचारो की इस खेती मे लगी िनरं तर एकागता और मेहनत का फल है। मनुषय ही है जो अपने को बनाता और िबगाड़ता है। अपने ही िवचारो से बने असो से वह आतम हतया करता है और उसके वही साधन है िजससे वह आनंद, सहनशीलता और शांित पदायक सवगीय लोको का िनमारण भी करता है। िवचारो के सही चुनाव और साितवक पयोग दारा ही उसे उतम दैवीय पद पाप होता है, और िवचारो के दुरपयोग और गलत पयोग से, वह शैतान जैसा िगर भी जाता है। इन दोनो िसरो के बीच सारे चिरत िसथत है, और हर-एक को बनाने वाला, और उनका मािलक, कोई न कोई मनुषय ही है। 7


अब तक संभाल-संभाल कर लाये गए आतमा के जान समबनधी उन सभी सुनदर सतयो मे, इससे आनंददायक और उपयोगी कु छ भी नही है िजतना यह, िक मनुषय सवयं ही अपने िवचारो, चिरत का सवरप, उसकी िविभन अवसथाओ, माहौल और गतव का रिचयता और मािलक है। बल, िववेक और पेम से बना, अपने ही बनाये िवचारो का वह बुनकर, न के वल िवपरीत पिरिसथितयो मे अपने आप को बचाये रखने मे समथर है बिलक वह सवयं की सता, अपने मे पिरवतरन और नवजीवन दारा जो भी चाहे कर सकता है। मनुषय, भले ही वह िकतने ही िनबरल या ितरसकृ त दशा मे हो, उसका वही िजममेदार है। िजस तरह पितत और लाचार िसथित मे एक गृहसवामी मूखत र ा वश अपने ही घर की वसतुओ को अवविसथत कर देता है; लेिकन जब वह उन िवपरीत िसथितयो को समझना पारं भ कर देता है, और उन िसदांतो िजस पर उसका अिसततव िनभरर है की खोज कर लेता है, तब वही गृहसवामी िववेकशील बन, एक िदशा मे अपनी सारी ऊजार को सहेज कर, अपने िवचारो को उपयोगी कायो मे पुनः लगा देता है। इस जागरक गृहसवामी जैसा ही, मनुषय जो कोई भी हो, अपनी िवचारो की ववसथा के िनयमो के खोज की िसथित का ही एक पिरचय है। यह खोज उसके अनुभव, आतम िचतन, और पयोग का ही फल है। सोना और हीरा बहत खोज और गहरी खुदाई करने पर ही िमलते है, इसी तरह विक के अिसततव से जुड़े हर एक सतय मनुषय को तभी िमल सकते है, जब वह अपने भीतर आतमा की गहराई तक जा सके गा। वही िबना िकसी संशय के यह िसद कर सकता है िक चिरत का सवरप, जीवन का िनमारण, और गंतव उसी के अपने हाथ है। यिद वह अपने िवचारो को देख, उसे िनयंितत करने और बदलने मे सफल हो जाय, तो वह उसके दारा हए पभाव चाहे वह सवयं पर, दूसरे पर या अनय पिरिसथितयो पर हो, ढू ंढ लेगा। इस तरह, कारण और उस से होने वाले पभाव को समझने मे, धैयर पूवरक अभयास दारा, सावधानी से जाँच करने, और छोटे-बड़े अनुभव के आधार से, उसे वह रासता िमल जाता है, जहाँ उसे अपने सवयं का जान हो सके । अंितम जान की के वल यही एक िदशा है, िजसका और कोई दूसरा रासता भी नही, जहाँ ... जो चाहा वही िमलता है, और िजस भी दार को खटखटाया वही खुल जाय। मनुषय, इस िदशा मे चलते हए धैयर, अभयास और िनरं तर उतसुकता से ही जान के मंिदर मे पवेश कर सकता है।

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2: हमारे िविचार, बाहरी परिरितिस्थितयां मनुषय का मन भी एक बाग ही कहा जा सकता है जो या तो िववेक और रिच पूवरक बनाया गया हो और या जंगल की तरह अपने आप ही उग आया हो। यिद उसमे उपयोगी बीज नही डाले गए तो, खर-पतवार के बीज उसे भर ही देगे। िकसी भी हाल मे, बाग वैसा ही िदखाई पड़ेगा जैसा िक उसके बनाने वाले की इचछा है। एक माली जैसे अपने खेत को तैयार करता है, उसे खर-पतवार से मुक कर, चुने हए फू ल और फल के बीज उगाता है, मनुषय की बुिद भी उसी खेत की तरह ही है िजस पर मन चाहा बाग वह उगा सकता है। अिनष, अनुपयोगी और अशुद िवचारो को िनकाल, वह मनुषय, सवोतम इचछा िलए, उन फू ल और फलो के िलए सही, उपयोगी और शुद िवचारो को रोपता है। इस कायर को करते हए, कभी न कभी उसे यह आभास हो जाता है िक वह सवयं ही अपनी आतमा का अके ला माली है, और उसके जीवन की िदशा उसी के इनही िवचारो पर िनभरर होगी। अपने अनदर उसे यह समझ आ जाती है िक िवचारो की ववसथा मे वह िकस तरह अिधक से अिधक सावधानी बरत रहा है, और िकस तरह उसके दारा रोपे गए िवचारो की शिक और बुिद के संसाधन, उसके सवभाव, माहौल और गंतव को एक नया रप दे देते है। जैसा िवचार मन मे उगता है, मनुषय का सवभाव भी वैसा ही होगा। चाहे िकतना भी पानी, खाद या प्रकाश की व्यविस्थना की जाय, विे पिरितिस्थनितयाँ कभी भी, नीबू के बीज से आम नहीं उगा सकतीं। विही नीबू का पौध उन पिरितिस्थनितयो को अपने गण ु ो से बदल दे गा। बाहरी पिरिसथितयो और ववसथा मे सवभाव नही बदलता, बिलक सवभाव का असर उन पिरिसथितयो और ववसथा पर पड़ता है और विे बदल जाती है। मनुषय के मन मे जो बीज है, कै सी भी पिरिसथितयां हो, पौध उसी का होगा, कयोिक बीज जो अंतर मे है, और पौध जो बाहर िदखता है, उनका अलग-अलग होना कभी संभव नही। इसका अथर यह भी नही है िक पौध की तातकािलक पिरिसथितयो और ववसथा मे जो िसथित है, वह उसके सारे जीवन चिरत का पिरचय के िलए पयारप होगी, बिलक वह दृशय उस पौध के िवकास की याता मे एक तातकािलक और आवशयक अवसथा है। विक का अिसततव, उसके िवचारो की ववसथा की तातकािलक िसथित है। उसका सवभाव िजन िवचारो से बना है उसके कारण ही वह जैसा है, बना है। यह कोई संयोग नही, एक अकाट ववसथा है िजसमे दोष की कोई समभावना नही। जो अपने चारो ओर के पिरिसथितयो से दुखी है या संतुष है, उन सब पर भी यह िनयम समान रप से लागू है, कयोिक िवचारो की खेती उनकी अपनी ही की हयी है। िवकास की गित िवचारो के बीज पर िनभरर होती है। विक अपने मे हए िवकास या बदलाव को जब तक वह बाहरी पिरिसथितयो से सीख ही पाता है, वे पिरिसथितयो

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सवयं ही बदल जाती है और उनका सथान तब तक एक नयी पिरिसथित ले चुकी होती है। मन, जब तक अपने को बाहरी पिरिसथितयो से िनिमत मानता है, वह िवचिलत रहता है; िकनतु जब वह यह जान जाता है िक वह सवयं मे ही सृिष के बीज और भूिम का िनयंतक है और वही उसका कारण है, िजससे कालांतर मे सारा संसार भौितक हो उठता है, तब अपने इस सवभाव को पुनः पाप कर, वह सवतंत होता है। िकसी भी विक ने अपने िवचारो पर िनयंतण, और अपने खेत को शुद करने मे चाहे िकतना भी समय लगाया होगा यह जरर जान गया होगा िक बाहरी पिरिसथितयो मे बदलाव उसके अपने मन की दशा मे बदलाव के ठीक बराबर के अनुपात मे ही होता है। यह तकर इतना सटीक है िक जब भी मनुषय लगन से अपने सवभाव मे िदखे अवगुण को ठीक करने की सोचता है, और उसमे सफलता िदखने लगती है, ठीक तभी वह उन िवपरीत पिरिथितयो से छु टकारा भी पाने लगता है। पिरिसथितयाँ एक माधयम है िजसमे से आतमा (या िवचारो के खेत) को वह चुनाव करना है जो उसे िपय है, या िजससे उसे भय लगता है। इस तरह ही, िवचारो से बने, मन की इचछाएं, अनुकूल पिरिसथितयो को माधयम बना कर ही पूरी होती है। मन मे िगरे हए या रोपे गए िवचारो के बीज के जड़ को जब फै लने िदया जाता है , तब वह बीज अपने आप ही पौधा बन, पिरिसथितयो और अवसर का लाभ लेकर फिलत होता है। इस तरह, अचछे िवचार, अचछे फल, और बुरे िवचार बुरे फल देते है। बाहरी दुिनया या पिरिसथित का अंतर मन पर पभाव चाहे वे अचछे लगे या बुरे, उसकी भलाई के िलए है। एक बाग के माली की तरह उसे लाभ और हािन दोनो से ही सीख िमलनी चािहए। अनाथालय या जेल मे जाने वाला विक िकसी दुभारगय का िशकार नही होता बिलक यह उसके मन मे पड़े िवचारो के बीज िक एक पिरणित है। यह भी नही हो सकता िक एक शुद मन का विक मानिसक तनाव या बाहरी दबाव मे एक अपराधी बन जाय। अपराध के िवचारो के बीज मन के िकसी गुप कोने मे पड़े होगे, जो समय आने पर और पिरिसथितयो का लाभ उठा कर मुखिरत हो गए। पिरिसथितयां मनुषय का िनमारण नही करती, उनका पभाव भी मनुषय पर नही पड़ता, वे िसफर उसका दपरण है, िजसमे अपनी परछाई ही उसे िदखती है। एसा कोई भी कारण नही, िक मनुषय बाहरी पिरिसथितयो के कारण पितत हो जाय, िकनतु वह के वल तभी होगा जब उसके िवचार िजससे उसका मन िनिमत है, अशुद हो। और यह भी कभी संभव नही, िक मनुषय आसथा की ऊंचाई पर पहँच जाय, और उसे िनमरल पसनता का अनुभव िबना उस पयत के हो जाय जो उसने पिवत िवचारो का चुनाव मे सावधानी बरतने मे की होगी। इसिलए, मनुषय सवयं ही अपने िवचारो का सवामी और िनयंतक है, जो अपने िनमारण सवयं करता है, और उसके चारो ओर का वातावरण उसका पिरचय है। आतमा जनम के समय उसके पास आती है और जीवन मे, पृथवी की इस तीथर-याता के हर कदम पर

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पिरिसथितयो के माधयम से एक दपरण की तरह, िवचारो की शुदता या दोष और, उसके बल या िनबरलता को िदखाती रहती है। मनुषय कभी उस से आकिषत नही होता िजसकी उसे आवशयकता है, बिलक उससे, जो उसके अनदर ही भरी हयी है। अहंकार, िलपसा और महतवाकांका इसिलए ही हर कदम से साथ बढती ही जाती है। मूलतः, आकषरण का कारण, अपने ही िवचारो और इचछाओ की भूख है, भले ही वे पिवत हो या अपिवत। देवतव जो जीवन का लकय है, यह अपने ही हाथ है। मनुषय अपना िनमारता सवयं है। िवचार और कायर हमारे दुभारगय के जेल के मािलक है और यिद ये अचछे हए तो ये ही हमारी सवतंतता और देवतव के साधन। पािप, पाथरना और अपेका से नही, बिलक िवचारो के सही चुनाव और उसकी कायर मे पिरणित से कमाई जाती है। िवचारो और कायर के समरसता से ही पाथरना और अपेकाएं सफल और गौरवािनवत होती है। इस सतय के पकाश मे, आिखर 'पिरिसथितयो से लड़ने' का कया अथर है? मनुषय िनरं तर उन पिरिसथितयो से िवदोह करता है जो दपरण मे उसकी ही परछाई है या; उस पभाव को रोकना चाहता है, िजसके कारण को वह अपने मन मे सहेज कर, उसका पोषण कर रहा होता है। मन मे िसथत इन कारणो का बाहरी पभाव या तो तीव ईषार और या पिरिसथित को न जान पाने की दुबरलता, इन दोनो मे कु छ भी हो सकता है। िकनतु चाहे वह जो भी हो, मनुषय उनसे िजद मे लड़कर अपनी ही शिक को छीण कर जोर-जोर से, सहायता की मांग करता है। मनुषय अपनी पिरिसथितयो को बेहतर बनाने के िलए सदैव ही लालाियत रहता है िकनतु अपने मे बदलाव की उसे इचछा नही होती। यही बंधन या मोह है। वह मनुषय जो सूली पर चढ़ाए जाने से घबराता नही, उस से कोई भी कायर जो उसके मन ने ठान ली, होने से नही रोका जा सकता। यह सतय सांसािरक और दैवीय दोनो के िलए एक समान है। यहाँ तक िक िजस विक का अंितम लकय धन कमाना है, उसे भी अपने विकगत जीवन मे तयाग के िलए तैयार रहना चािहए, के वल तभी उसे उस लकय की पािप होगी। वही जाने, िकतना अिधक तयाग उसे चािहए होगा, एक समृदशाली और शिकपूणर जीवन का अनुभव के िलए ? एक मनुषय जो कं गाल है लेिकन उसकी अदमय इचछा है िक उसके आस पास और, घर मे आराम की बेहतर सुिवधा हो। िफर भी वह काम से मुंह चुराता है और सोचता है िक उसे मािलक को यह धोखा देना बनता है कयोिक उसका मािलक उसे कम वेतन देता है। वह विक उन सरलतम िसदांतो जो समृिद पािप के आधार है, नही समझता। वह न के वल इस कं गाली से िनकल पाने के अयोगय है बिलक वह कं गाली के गतर मे इन कारणो से लगातार िगरता ही जायगा और झूठ, धोखा, िजद और अनय अमानुषीय िवचार उसे इससे कभी िनकलने नही दे सकते। एक समृिदशाली विक जो कषकारी और असाधय पेट के रोग से गिसत है और वह उस रोग से मुिक के िलए मुंह मांगी कीमत देने के िलए ततपर है, िकनतु उसके िलए अपनी पेटू इचछाओ को छोड़ना संभव नही। वह मुंह से सवाद के िलए मन चाहे पकवान खाते रहना चाहता है, और उसे सवासथय भी चािहए। वह विक सवसथ रहने के िलए

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िबलकु ल योगय नही है कयोिक उसने सवसथ रहने के िसदांतो को अब तक नही जाना। कारखाने का एक मािलक जो लाभ कमाने के िलए अपने कारीगरो के उिचत वेतन को काटता है, और कानून से बचने के िलए चालाकी का सहारा लेता है, वह कभी भी धनवान और सफल कारोबारी हो ही नही सकता। जब उसका िदवाला िनकलेगा और उसका धन और सममान नही होगा ; तब वह उन पिरिसथितयो को याद कर-कर, उनहे दोष देगा, िबना यह समझे, िक वह सवयं ही उनका लेखक है। मैने उपरोक तीन घटनाओ का उललेख यह सतय िदखाने के िलए िकया है िक मनुषय अपने पिरिसथितयो के िनमारण का सवयं ही कारण है, यदिप यह लगभग हमेशा अनजाने मे ही होता है। उदेशय िकतना भी अचछा हो िकनतु वह उसे लगातार िछन िभन करता रहता है कयोिक उसकी इचछाएं और िवचार उसके बस मे नही होती और वे िवपरीत कायर कर, उस उदेशय को कभी पूरा नही करने देती। धटनाएं, िकतनी भी उललेख की जाएँ, उनका अथर िसफर एक यही है। हर एक सोचने वाले इस अथर को जान कर, िनशय ही, कायर का वह सूत, जो िवचारो के िसदांत से बुिद और जीवन को पभािवत करता है, सवतः पाप करे गे। िफर, बाहरी धटनाओ और दृषानत से इस तकर को समझने से कया लाभ? पिरिसथितयाँ बाहर से चाहे िकतनी भी उलझी हयी कयो न िदखे, िवचारो की गहराईयाँ इतनी अिधक होती है िक हर विक अपनी पसनता की खोज कर ही लेता है। पिरिसथितयो को देख कोई एक विक, िकसी दूसरे विक के पित धारणा नही बना सकता कयोिक आतमा की िसथित सवतंत है जो हर एक विक सवयं ही जानता है, और जीवन की बाहरी पिरिसथित, उसका अपना ही चुनाव है। पकृ ित के िनयम जो कभी बदले नही जा सकते उनके दारा अनयाय का होना कभी संभव ही नही। जो कु छ भी संसार मे होता है िबना कारण नही होता, इसिलए िकसी को िकसी से िशकायत की धारणा, का कया औिचतय है? िवषम पिरिसथितयो का भी कोई कारण होता है और जब वे कारण नही रह जाते तो, पिरिसथितयाँ भी वैसी नही रह सकती। एक विक ईमानदारी पर चलता है और गरीबी को सहन करता है। दूसरा विक बेईमानी के रासते चलते हये अमीर बन जाता है। िकनतु इससे यह िनषकषर जो पायः िनकाला जाता है िक विक ईमानदार होने से गरीब और जो विक बेईमान है उसकी बेईमानी उसके अमीरी का कारण है, गलत है। इस िनषकषर की मानयता यह है िक बेईमान विक िबलकु ल भष है और ईमानदार विक, पिवत। गंभीर िचतन और अनुभव यह बताते है, िक बेईमान विक मे कु छ वैसे भी गुण है जो पशंसनीय है और जो ईमानदार विक मे नही है। ईमानदार विक के अवगुण ही उसकी गरीबी का कारण है। विक को ईमानदारी के कारण अचछे लाभ होगे और उसके अवगुणो के कारण वह िनधरन भी है। इसी तरह बेईमान विक को अपने उस बेईमानी के कारण िवपित भी आयेगी और उसके गुण िजसके कारण वह धनवान है, उसे पसनता देगे। 12


यह अितिवशास ही होगा की विक के दुख का कारण उसकी अपनी मासूिमयत और पिवतता है। लेिकन जब वही विक अपने मन मे न छू टने वाले मोह, कटु ता और दूिषत िवचारो को िनकाल देगा और उसकी आतमा के हर दाग धुल जाएँगे के वल तभी, वह यह जान पाने की िसथित मे होगा िक वह यह कह सके िक दुख के कारण दरअसल थे कया? और जब वह अपनी आतमा की पिवतता के उदोग को कर रहा होता है तब, मन और जीवन शैली के ऊपर कायर करते हये वह यह पाता है िक वह सब एक ऐसे अदभुत िनयम से समपन होता है िजसमे यह संभावना कभी नही हो सकती िक अचछे का फल बुरा, और बुरे का फल अचछा हो। इस जान को पा, वह पीछे मुड़ कर अपने को ही देखता है िक िकस तरह उसका अपना ही अजान और असावधािनयां ही उन िवषम पिरिसथितयो के कारण थे। उसे तब यह िवशास होता है की जीवन के िनयम सदैव ही िनषपक रहते है और उसके पुराने अनुभव, अचछे या बुरे, उसके अपने कारण है, जो आतमा की पूणरता की पािप के पिहले, उसके िवकिसत होने का कम है। िकनतु होती िजसके कारण उसके साथ बुरा हआ उसे जान पाता है। कलयाणकारी िवचार और कमर कभी कोई अिनष नही कर सकते। और अिनषकारी िवचार और कमर कभी कोई कलयाण नही कर सकते। कौन नही जानता िक मके से मका और मूग ँ फली से मूँगफली ही पैदा हो सकती है। सभी मनुषय इस अदभुत पाकृ ितक िनयम को समझते भी है, उसका पयोग भी करते है िकनतु इस िसदानत का बौिदक और नैितक िवश मे उसी तरह समझ पाना कु छ ही मनुषयो के बस का है। यह िसदानत चाहे वह िजस भी केत मे हो, उतना ही सरल और अकाट है। जो इसे नही समझते वे उसका अथर अलग ही िनकाल लेते है और इस िसदानत का वे कोई लाभ नही उठा पाते। कष हमेशा िकसी न िकसी अिनषकारी िवचारो का ही फल होता है। यह वह संदश े देने के िलए है िक विक का संयम अपनी सवाभािवक िसथित मे नही है िजसने उसके अिसततव की रचना की है। कष की महानतम आवशयकता यही है िक वह जो भी अनुपयोगी या अशुद है उसे जला डाले, और आतमा पिवत हो। कयोिक उसके िलए कष होगा ही नही, जो पिवत हो चुका है। सोने को िपघलाने का तब कोई उदेशय ही नही रह जाता जबिक उसकी अशुिद पिहले ही िनकाली जा चुकी हो। उस शुद और पकाशवान के िलए कोई कष हो ही नही सकता। पिरिसथितयाँ जो विक से टकराती है और उसे लाचार बना देती है वे उस विक का अपने सवभाव मे िसथर न होने के का ही नतीजा है। जो पिरिसथितयाँ विक को आशीवारद या सदभावना से िमलती है न िक धन दौलत से , वे सुिवचारो की पिरणित है। घृणासपद पिरिसथितयाँ, धन दौलत की कमी के कारण नही, बिलक कटु िवचारो की ही पिरणित है। 13


एक मनुषय घिणत और धन दौलत वाला भी हो सकता है, और एक सबका पयारा होगा भले ही वह गरीब ही कयो न हो। सबका िपय और धन दौलत दोनो का िमलना तभी होगा जब धन का सही उपयोग हआ हो। और, वह गरीब और भी गहरे नकर मे जा सकता है जब वह िमलने वाले पयार और भरोसे को वह अनावशयक बोझ समझने लगेगा। भूख और आसिक दोनो, मानिसक अवसाद के दो छोर है। दोनो ही िसथितयो मे अपाकृ ितक और मानिसक असंतुलन की बराबर माता है। मनुषय की िसथित तब तक सही नही मानी जा सकती जब तक वह पसन, सवसथ और समृिदशाली न हो। और यह पसनता, सवासथय और समृिद, मनुषय का अपने मन के अंदर और बाहर के संसार मे बने सुंदर संतुलन का ही फल है। मनुषय का मनुषय बनना तभी आरं भ होता है जब वह िशकायत करना और बेकार पलाप बंद कर, उस छु पे हये नयाय िसदानत की खोज करने मे लग जाय िजससे उसका जीवन िनयंितत होता है। और इससे उसका मन उस िसदानत के अनुकूल हो, उसे अपना लेता है। ततपशात, वह अपने िवषम पिरिसथितयो के िलए दूसरो को दोष देना बंद कर, अपने िलए सबल और उच िवचारो का िनमारण करता है। वह उन पिरिसथितयो से हतोतसािहत होने के बजाय उससे सीख ले कर, उन शिकयो और संभावनाएं जो उसमे ही िछपी है उसका उपयोग अपनी िनरं तर उनित के िलए करता है। जगत का महतवपूणर आधार िसदानत (िजससे पूवारनुमान िकया जा सके और जो अभी िदख नही रहा उस पर िवशास हो), न िक अिनिशतता। आतमा और जीवन का मूलय नयाय है, न िक अनयाय। आधयितमक पणाली जो जगत को चलाने का बल है, और वही उसे िदशा भी देता है। वह सतय िनषा है, न िक अिवशास। यही कारण है िक मनुषय जब सवयं सही होता है वह समसत जगत को सही देख पाता है, और वह यह भी जान लेता है िक जैसे जैसे उसके िवचार दूसरो वसतुओ या विकयो के बारे मे बदलने शुर होते है, उन घटनाओ की उसकी समझ, और वह विक सवयं भी बदलने लगता है। इस सतय का पमाण हर एक पाणी मे है िजसे एक बार भी सहज हो कर धयान से जाँच लेने और सवाधयाय करने से, िकसी भी पाणी का उस सतय पर समपरण हो ही जाएगा। यह करके देखे िक िकस तरह मनुषय का अपने िवचारो मे कांितकारी बदलाव लाने से, उसके अपने जीवन मे होने वाले सांसिरक उपलिबध उसे आशयर चिकत कर देगे। 14


मनुषय कभी कभी यह सोचता है िक उसके िवचार गुप रखे जा सकते है िकनतु यह हो ही नही सकता। िवचार अपने आप दुत गित से ववहार मे िदखाई देने लगते है , और वे ही सवभाव बन जाते है। उदाहरण के िलये, जो िवचार, ववहार मे आ मौज मसती की आदत बनते है, वे ही आगे जा लाचारी और रोग की पिरिसथित बन सामने आ जाते है। दूिषत िवचार चाहे कै से भी हो ठोस बन मनुषय की शिक को कीण कर उसके िनणरय करने की शिक का हरण कर लेते है जो आगे जा उसे िविकप या िदशा हीन बना देगा िजससे वह िवपरीत पिरिसथितयो का िशकार बन जाएगा। भय, शंका, और िनणरय से बचने वाले िवचार, मनुषय को कमजोर, नपुंसक और िबन पेदी का लोटा जैसा मूलयहीन विक बना देता है िजससे उसकी पिरिसथितयाँ उसे असफलता, आसिक और गुलामी पर िनभरर कर देगी। आलसी िवचारो का फल अशुिचता (या गंदगी/ बदबू) और बेईमानी है जो अपराध और दुिभक की पिरिसथितयाँ बन, उसको लपेट लेती है। घृणा और दूसरो की आलोचना करने वाले िवचार ही मनुषयो मे िशकायती और िहसक सवभाव मे पिरवितत होते है िजनके कारण दुघरटना और दंड की पिरिसथितयाँ उसकी पतीका करने लगती है। सवाथी िवचार से लालच की आदत बनती है िजससे िचता और िवषाद की पिरिसथितयाँ होगी ही। दूसरी तरफ, सुद ं र िवचार मनुषय मे कोमलता और दयालुता के सवभाव नगीने की तरह चमकते है िजनसे बनी पिरिसथितयाँ पसनता से दमकती है। पिवत िवचारो से बने सिहषणु और अनुशािसत सवभाव से सौहाद और शांित की पिरिसथितयाँ िनिमत होती है। साहस, आतम-िनभररता और िनणरय मे सकम सवभाव उन पिरिसथितयो का िनमारण करती है िजसमे सफलता, समृिद और सवतनतता की पिरिसथितयाँ अपने आप बनती है। तेजसवी िवचारो से सवचछता और उदोिगक सवभाव बन जाता है िजससे लाभकारी की पिरिसथितयाँ, अवसर बन आती है। नम और कमा करने वाले िवचारो से नम सवभाव बनता है िजसके िलये सुरिकत और दीघर जीवी पिरिसथित अपने आप बनती है। पेम और िनसवाथर िवचारो से अहंकार मुक सवभाव बनता है िजससे िनिशतता, अनंत समृिद और सची पितषा की पिरिसथितयाँ उसकी पतीका करती है।

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सपष िवचार की कोई भी तरं ग िजसने बहना आरं भ कर िदया हो, चाहे वह अचछी हो या बुरी, उनसे यह कभी नही हो सकता िक वे चिरत और पिरिसथितयो को बदलने मे असफल हयी हो। एक मनुषय सीधा सीधा अपने मन मािफक पिरिसथित का चुनाव नही कर सकता िकनतु वह अपने िवचारो का चुनाव करने मे सदैव सवतंत है और उन िवचारो के चुनाव से अपने आप उन पिरिसथितयो के िनमारण की रप रे खा पीछे के दार से अपने आप बनने लगती है, और िनिशत रप से वह बन कर ही रहेगा। पकृ ित हर एक मनुषय को उनके िवचारो, िजनहे वह उतसािहत करता है, को उगाने मे मदद करती है और अवसर देती है िक वे बीज जलदी ही उग कर जमीन से ऊपर िदखाई पड़ने लगे और पिरिसथितयाँ, अचछी या बुरी जैसे भी िवचारो के बीज डाले गये होगे, िदखाई पड़े। मनुषय अपने पापी िवचारो को छोड़ कर देखे तो सही िक िकस तरह सारा संसार उसके पित सहानुभूित से भर जाएगा और उसकी सहायता के िलये तैयार खड़ा होगा। अपने कमजोर और मोह वाले िचप-िचपे िवचारो को छोड़ते ही वह खुशी से उछल पड़ेगा िक िकस तरह उसके संकलप को पूरा करने के िलये अवसरो की अब कोई कमी ही नही है। अपने मन मे अचछे िवचारो को उतसाह देते रहने से वह दुभारगय जो उसे धृणा और शिमदगी के गडे मे िगरा सकती थी कु छ भी करने मे असमथर है। उसका रासता रोक नही सकती । संसार एक रं गीन दपरण के टुकड़ो से जोड़ कर बने बकसे की तरह है िजसके घुमाने से पकाश की तरं गे रं गो की धार बन सुद ं र िदखती है जो ठीक उसी तरह होती है जैसे िवचारो के बदलाव को संसार की पिरिसथितयाँ बदली जा सकती है। तुम वही बनोगे जो तुम बनने का िनशय कर चुके हो। असफलताओ को, अपने असफल हये िवचारो की खोज कर लेने दो। पिरिसथितयाँ बेचारी है कयोिक आतमा, िजसे िवचार चुनने की सवतनतता है उनहे जब जैसा चाहेगी, बना सके गी। वह आतमा, िजसके अनुसार काल या पिरिसथितयो का पिरवतरन होता है, और िजसने संसार जीत िलया । उसके काबू मे होगी वे चालबाजी, अकसमात होने वाली वथा और किठन पिरिसथितयाँ जो िसफर महतवहीन दास है।

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मनुषय का वह शुभ संकलप, वह कभी न देखा गया बल, उस आतमा जो जनम-मृतयु से परे है, के पुत है। वज की िशलाएँ उसके रासते मे िकतनी भी बाधा कयो न खड़ी कर दे वह िकसी भी लकय को पा ही लेगा । देरी से न घबराना, इंतजार करना कयोिक यह समझ लेना िक जब आतमा उठ कर आदेश देती है, उसके पालन के िलये देवता पिहले से ही तैयार बैठे है।

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3. िविचारो का स्विास्थ्य और शरीर परर प्रभावि शरीर, मन का दास है। वह मन के हर आदेश का पालन करे गा है चाहे वे जान बूझ कर िदये गये हो या अनजाने मे भूल से। असैदांितक िवचार की पालना मे वह जलदी बीमार पड़ मर जाता है या िफर, पसन और सुंदर िवचारो से वही शरीर, यौवन और सुंदरता से िखल उठता है। बीमारी और अचछा सवासथय, वे सांसिरक पिरिसथितयाँ ही है िजनकी जड़े िवचारो मे है। पिरिसथितयो का जनम सवभाव से, और सवभाव का जनम, मन मे उगे और पनपे िवचारो से होता है। मोह से गिसत िवचार ही, रोगी शरीर मे िदखते है। िवचार िजनसे भय पैदा होता है वे िकसी अके ले मनुषय को बंदक ू की गोली से भी तेज गित से मार डालते है। उस भय का पभाव हजारो लोगो तक तेजी फै लता है और वे भी उसी तरह मारे जाते है भले ही उनके मारे जाने की गित उतनी तेज न हो। जो बीमारी से डरते है उनहे बीमारी हो जाती है। डर से हयी बेचैनी पूरे शरीर को िशिथल कर देती है िजससे बीमारी के अंदर आने का मागर खुल जाता है और बीमारी आने से कोई उसे रोक नही सकता। इसी तरह, कोई भी अशुद िवचार जो भले ही बीमारी के बारे मे न भी हो, मनुषय के चेतना के तंत को तहस नहस कर देते है। दृढ़, पिवत और पसन िवचार शरीर को ऊजार और नमता से भर देते है। हर एक शरीर, लचीला और पलािसटक की तरह का एक उपकरण है जो िवचारो के दबाव से बदलता रहता है। िवचारो से बने सवभाव, उसके ऊपर अपनी छाप छोड़ेगे ही चाहे वे अचछे हो या बुरे। मनुषय का रक िनरं तर अशुद और िवषैला होता ही रहेगा जब तक उसके दूिषत िवचार फै लते रहेगे। शुद मन से ही शुद जीवन और शुद शरीर बनता है। मन के दुगुरण ही िनकृ ष जीवन और भष शरीर है। िवचार ही कमर के फ़ौहारे है िजनसे जीवन की पसतुित है। िवचार शुद होगे तो कमर और जीवन दोनो ही अपने आप शुद हो जाएंगे। खान पान मे बदलाव से मनुषय को कभी कोई लाभ नही होता िजसने अपने िवचारो को नही बदला। और जब मनुषय के िवचार शुद हो जाते है तब उसे अशुद खाने की इचछा ही नही होती। अशुद न खाने से कया कभी बीमारी होना संभव है? अथारत, अचछे और शुद भोजन का कारण मन के िवचार है और, उसी से जीवन पोिषत है। यिद तुमहे अचछा शरीर चािहए तो अपने मन की रका करो। यिद तुम अपने िलए नया शरीर चाहते हो, मन को नया बनाओ। िशकायत, ईषार, अवसाद और हताशा के 18


िवचार शरीर को सवासथय और नमता के मामले मे कं गाल बना कर ही छोड़ते है। बुझा हआ चेहरा, कोई आकिसमक नही होता, वह िकसी िनराश िवचारो का ही रप है। चेहरे पर पड़ी धािरयाँ अपने आप नही िखची होती बिलक वे िकसी न िकसी गवर, आसिक और असफलता को िछपा रही है। मै एक छानबे (96) साल की मिहला को जानता हँ िजसका चेहरा चमकता हआ, और मासूम छोटी बची की तरह है। मै एक नव जवान पुरष को भी जानता हँ िजसका चेहरा आड़े ितरछी लाइनो से भरा है। पिहले वाले चेहरे के पीछे मृद ु और पकाशवान उतसाह से भरे िवचार है जब की दूसरे के पीछे मोह और अभाव की कहानी है। तुम अपने घर को तभी पकािशत और सुद ं र बना देख सकोगे जब तुम उसमे हवा और सूयर के पकाश को सवतंत रप से आने-जाने दोगे। उसी तरह दृढ़ और सवसथ शरीर मे पसनता, शांित और िनरं तर बहने वाली सदभावना का माहौल के वल तभी देखा जा सकता है जब मन मे सुद ं र, सदभाव और शांित के िवचारो को आने िदया जाय। एक वृद विक के चेहरे पर झुिरयाँ होती है जो उसके दयालुता और संवेदनशील मन के कारण है। दूसरे विक का चेहरा शुद िवचारो से पूणर और शांत पवरत की तरह दृढ़ है। एक और विक का चेहरा, मोह और िचता से बुझा हआ है। इन चेहरो को कौन नही पिहचान सकता है? िजसने भी अपने जीवन को सतय के मागर पर डाल िदया है उनके शरीर का रप, समय बदलने पर भी शांत, िनभरय और नम बना रहेगा जैसे संधया काल मे सूयर का सुखद पकाश। मैने कु छ समय पिहले एक दाशरिनक को मृतयु शैयया पर देखा। समय की िगनती यिद न की गयी होती तो वे वृद नही थे। देहानत के समय उनकी पसनता और शांित उतनी ही थी िजतना तब था जब वे जीिवत थे। उतसाहजनक िवचार से बड़ा कोई िचिकतसक हो ही नही सकता जो शरीर के रोगो को पी ले। सदभावना जो भय और दुख को समाप करने मे सकम हो, उससे बड़ा नसर या शरीर का धयान रखने वाला भी कोई नही हो सकता। अवसाद, आलोचना, शंका और ईषार के िवचारो के साथ रहने वाला अपने शरीर के िलए, बंदीगह खुद ही बना लेता है। िकनतु सबके िलए अचछा सोचना, सब के साथ खुश रहना और धैयरपूवरक रह सभी के िलए अचछा करना, वे िवचार है जो सवगर के दार है। और वही शांत िवचार उन सभी जीवो, जो भी गहण करना चाहे, के मन को शांित से भर देता है।

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4। िविचारो के खेती का उद्देश्यपरण ू र्थ होना जब तक िवचार, उदेशय या िदशा से जुड़े नही रहते कोई भी सकारातमक उपलिबध नही हो सकती। जीवन वह समुद है िजसमे िवचारो का, पेड़ के पपड़े या िछलके की तरह अपने आप ही िगर जाना सवाभािवक है। िदशा हीनता एक दुगुरण है और िवचारो का रासता भटक जाना तुरंत बंद करना होगा यिद उसे दुघरटनाओ और िवनाश से बचना हो। िजसके जीवन का कोई के दीय लकय न हो वह आसानी से घबराहट, भय, िचता और अवसाद का िशकार हो जाता है। ये सभी कमजोरी की िनशानी है जो िनिशत ही जान बूझ कर िकए गये पाप (भले ही अनदेखे ही) है, और िजनसे असफलता, शोक और हािन होगी। कमजोरी की इस शिक से िनिमत िवश मे कोई सथान नही है। िवचार आतमा के हाथ है और जब वे के िनदत या िमल कर काम करते है तभी आतमा काम कर सकती है। आतमा सवेचछा से िजस कलयाणकारी उदेशय को धारण कर लेती है उसे पूरा करने मे उनके िवचारो की जीवन याता का आरं भ तुरंत हो जाता है। आतमा को, उस उदेशय को अपने िवचारो का के द बना देना चािहये चाहे वे आधयाितमक उपलिबधयां हो या तातकािलक या समयानुसार सांसिरक सफलताये। िवचारो की शिकयो को उसी एक िदशा मे िनरं तर के िनदत रखे रहना चािहये। उस उदेशय या िदशा को ही महान लकय बना, देखते रहना चािहये। और अपने को, के वल इस काम मे िवचारो को पूरी तरह लगा देना चािहये िक वह उस लकय तक कै से पहंचे, और अपने िवचारो को इधर-उधर भागने का मौका न दे िजससे वे िदखावे, अपेका या कलपनाओ मे फं स जाएँ। यही अपने लकय की ओर जाता हआ राज-मागर है िजस पर अनुशासन और िवचारो को के िनदत करने से सबसे अिधक आवशयकता होती है। यिद वह बार बार िगरता भी है तो यह उसी उदेशय के िलए तैयारी परीका है (िजससे उसकी कमजोिरयाँ दूर होगी) िजसका फल, सवभाव की दृढ़ता ही सचे सफलता का एक लकण है। हर कदम, उसके िलए एक नया आरं भ है जो उसकी नयी शिक और िवजय का अनुभव है। जो डर के मारे अपने लकय का चुनाव करने मे िहचिकचाते है उनको चािहये िक वे िकसी भी कायर चाहे वे िकतने भी मामूली कयो न लगे, अपने िवचारो को के िनदत कर उसी कायर को उतकृ ष बनाने मे लगा दे। इस तरह उनहे यह समझ आ जाएगा िक िकस तरह िवचारो को एकितत कर, उसे लकय पर के िनदत करने से, कायर मे उनके मन मे अिधक सपषता और उसकी तुिटहीन सृिष की ऊजार उतपन होती है , और ऊजार पािप की इस िविध से वह कोई लकय नही है जो उपलबध न हो। 20


सबसे शिकहीन आतमा जब वह अपने उस कमी को जान लेती है, और िजसे शिक के पाने की िविध (िवचारो के के िनदत करना), उसकी चेषा और अभयास मे िवशास है, वह चेषा मे चेषा, धैयर मे धैयर और शिक मे शिक को िनरं तर जोड़ते हये आगे बढ़ना कभी छोड़ नही सकती, और अंत मे वह अलौिकक शिक समपन बनती है। िजस तरह शरीर से कमजोर मनुषय, धयान और धैयर से अभयास करते हये, शिकमान बनता है, उसी तरह कमजोर िवचार के मनुषय भी सही तरह से सोचने का अभयास कर बुिदशाली बन जाते है। िदशाहीनता और कमजोरी को छोड़, उदेशय पर धयान रख सोचने से मनुषय उन महातमाओ की शेणी मे आता है जहां असफलताओ की िगनती उन सीिढ़यो की तरह होती है जो उपलिबधयो के रासते है और िजनको उनहे पार करना ही है। वहाँ वे , पिरिसथितयो को अपना दास बना, दृढ़ता से िवचारो को के िनदत कर िकसी भी लकय को सहजता से पाप कर लेते है। उदेशय को मन मे धारण कर मनुषय को उसकी पािप के िलये एक सीधा मागर ही चुनना चािहये िजससे उसे बाये-दािहने देखने की कोई जररत न हो। शंका और भय उसमे िबलकु ल न हो कयोिक ये वह िवनाशकरी ततव है जो सीधे रासते को तोड़ सकते है और उसे भष, पभावहीन और बेकार बना देगे। शंका और भय के िवचार कभी कु छ हािसल नही कर सकते। उनसे सदैव असफलता ही िमलती है। उदेशय, ऊजार, करने की कमता, और सभी सवसथ िवचार अपने आप ही मर जाते है जब कोई शंका या भय उनमे आ जाता है। यह उसी तरह है जैसे एक िवशाल भवन मे जहां महान योदा हो, उस भवन मे एक िबचछू के घुस आने से, उनका धयान भटक जाता है। जान से, ‘कु छ करने का संकलप’ जनम लेता है और यह लगने लगता है िक ‘हम कर सकते है’। शंका और भय उस जान के महान शतु है और जो उनहे शह देगा और जो उनहे समूल नष नही करता, उसने अपने पैरो पर कु लहाड़ी मार ली है। िजसने शंकाओ और भय पर जय कर ली हो, उसे असफलताओ से कया डरना? उसके सभी िवचार शिक से भरे होते है जो िकसी भी किठनाई का डट कर सामना करते है , और बुिदमता से उस से हयी िवपदा को संभाल लेते है। वे उन उदेशयो को सही समय और वातावरण मे लगाते है तािक वे सही समय पर फू ले और फले िजससे उनके फल असामियक या कचे न िगर जाएँ। कला िकसे कहते है और कोई भी कायर कला कै से बनती है, केविल इसको जान लेने से सभी कायर कला बन सकते है। िवचार जब िनभरय हो उदेशय की ओर चलते है तब वे 21


उस िकया को कलातमक बना देते है। जो यह जान लेता है वही ऊंचे से ऊंचे लकय पर जाने के िलये सहषर तैयार होगा न िक उनकी तरह जो बेमन, िवचारो का ताना बना बुनता हआ काम मे लगा हो। वही है वह जो चैतनय और बुिदमान है , और अपने मानिसक शिकयो का सवामी है।

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5: िविचार और बदलावि जो भी मनुषय हािसल कर रहा है और वह सब िजसे पाप करने मे वह असफल रहा है उसके अपने िवचारो के चुनाव का फल है। पकृ ित के िनयम नयाय के गंथ की तरह है िजससे अनयाय संभव नही और संसार को वविसथत करने मे वे िनयम इस तरह जुटे है िक लोग अपने िनणरय के उतरदायी वे सवयं हो। विक के शुभ और अशुभ फल आतमा के िवचारो से ही है जबिक पकृ ित के िनयम, उनही के तुिटरिहत कायारनवयन के िलये है। िकसी विक की कमजोरी और बल, शुदता और अशुदता, उसके अपने ही िनणरय है न िक िकसी दूसरे के । उसके सुख और दुख उसने सवयं ही अपने ही अंदर िनिमत िकया है। जैसा वह सोचता है वैसा ही वह है। जैसा वह सोचता रहेगा, वैसा वह रहेगा भी। एक बलशाली मनुषय एक कमजोर की सहायता तब तक नही कर सकता जब तक वह कमजोर विक की इचछा न हो िक उसे बलशाली विक के सहायता की आवशयकता है। यिद उसकी इचछा होगी तो वह कमजोर विक, बलशाली अपने आप भी बन सकता है। वह अपने पयतो से उस शिक का सवयं िवकास कर लेगा िजसकी वह दूसरे विक मे पशंसा करता है। कोई दूसरा नही, के वल वही अपने पिरिसथितयो को बदल सकता है। लोगो मे यह सोच पायः होती है और लोग कहते भी है िक गुलामी का कारण कोई वह है जो उनहे गुलाम बनाता है, इसिलए उस शासक से धृणा करे । अब इसी िनणरय को उलट कर शासक के दृिष से देखे। वह यही कहेगा िक गुलाम जो सवयं अपनी रका नही कर सकते और आपस मे ही लड़ते हो, तब उनके िलये कोई शासक न हो तो कया हो? कसाई (शासक) और पशु (गुलाम) दोनो िवपरीत सोच रखते हये भी साथ साथ रहते है। सच यह है िक कसाई और पशु दोनो ही अजानता मे एक दूसरे का साथ दे रहे है। वे एक दूसरे से घृणा करते िदखते अवशय है िकनतु वासतव मे वे दोनो अपनी ही हािन कर रहे है। यह जान, पकृ ित के िनषपक िनयमो का ही फल है िक कमजोर या पशु या गुलाम को िजस कमजोरी से दुख और भय िमलता है उसी शिकयो के शासक या कसाई के हाथ मे आने से वह उसका दुरपयोग कर, उन पशुओ के घृणा का पात बनता है। िनषपक पेम, दोनो मे (गुलाम के दुखो और शासक के पित घृणा) मे कोई अनयाय नही देखता। आधयाितमक दयालुता उन दोनो, कसाई और पशु को, पेम से गले लगा लेगा।

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िजसने अपने िवचारो की कमजोरी को जीत िलया है और िजसने अपने सवाथी िवचारो को अपने से अलग कर िदया, वह न तो गुलाम या पशु, और न ही शासक या कसाई ही होगा। वह मनुषय िजसने अपने िवचारो का सममान और सदुपयोग िकया होगा वह के वल आगे ही बढ़ेगा, जीतेगा और लकय को पाप अवशय करे गा। िजसने अपने िवचारो को नीचे िगरा िदया है, उसके िलये के वल मजबूरी, गरीबी और लाचारी का ही रासता बचा है। मनुषय की उपलिबध चाहे वे सांसिरक ही कयो न हो िबना िवचारो के सफलता के नही होती और उनहे गुलामी और पाशिवक मोह के ऊपर उठना ही होता है। इस सफलता के िलये यह आवशयक नही िक सारी पाशिवकता और सवाथर छोड़ दी जाएँ िकनतु कु छ तो जरर ही छोडना होगा। यह इसिलये िक िजसका जानवरो जैसा मोह हो, वह न तो सपष सोच सकता है और न ही उसकी योजना ठीक होगी। न तो वह िछपी पितभा को ढू ंढ सकता है और न उनका िवकास ही कर सकता है िजससे वह कभी भी असफल हो सकता है। िजसने िवचारो को िनयंितत करने मे सफलता नही पायी वह कायर को समपन करने और िजममेवारी लेने की िसथित मे नही हो सकता। वह मनुषय के वल अपने ही िवचारो की सफलता से सीिमत रहेगा और अनय लोगो के िवचारो को सवतंत हो संचािलत नही कर सकता। िवकास और सफलताएँ िबना तयाग के संभव नही। सांसिरक सफलता उसी अनुपात मे ही िमलेगी िजतना उसने िदशाभिमत पाशिवक िवचारो का तयाग िकया है और िजतना अपने िवचारो को उसने योजना बनाने, अपनी सोच की सपषा और आतमिनभररता मे लगाई होगी। उसके िवचार िजतने ऊंचे, सीधे और सही होगे, उतनी ही ऊंची होगी उसकी सफलता, उसको पाप होने वाला आशीष, और उसकी दीघरजीवी उपलिबधयां । संसार ... कभी लालची, बेईमान और िवषैले िवचारो को पोतसािहत नही करता हालांिक ऊपर से देखने पार कभी कभी ऐसा लगता है। जबिक सतय यह भी है िक ईमानदार, दयालु और पिवत को कभी हािन नही पहँचती। महान िशकक हर काल मे यही बताते और िसद करते रहे है िक हर एक मनुषय को अपने िवचारो की पिवतता पार सदैव धयान देना चािहये। बौिदक सफलताएँ जबिक जान की खोज तक ही सीिमत होती है जो जीवन और पकृ ित के रहसयो को सपष करती है। हो सकता है िक इनमे कु छ को उसका अिभमान हो जाय िकनतु वह अिभमान किणक होगा कयोिक वे वैजािनक शोध के िवचारो का फल नही है । िजतने मेहनत और दीघरकाल से वे िवचार उगाये गये है, उतनी ही िनसवाथर और शुद, वे होगे।

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आधयाितमक उपलिबधयां, आकांकाओ की पिवतता का चरम िबनदु है। वह जो महान और उदात िवचारो की अवधारणा मे लगातार रहता है और िजसका शुद और िनसवाथर िचतन िनिशत ही वह सूयर है जो अपने चरम पर, और वह चाँदनी रात का चंद है। वे पूण,र बुिदमान और चिरत मे महान हो जाते है िजससे उनका पभाव और यश बढ़ता है। िजस भी तरह की सफलता हो, िवचार का ही वह मुकुट है। आतम - िनयंतण की सहायता से, संकलप, शुदता, धमर, और अचछी तरह से िनदेिशत िवचार ही मनुषय को आगे बढ़ाते है। पशुता की सहायता, आलस, अशुदता, भषाचार, और भम के िवचारो से मनुषय का पतन ही होगा। सही िवचार से पाप जीत ही एहितयात से रखा जा सकता है. सफलता का िवशास होने पर भी जब तक एहितयात न रखा जाय वह सफलता तेजी से िवफलता मे वापस आ जाती है। एक मनुषय िकतना भी ऊंचा कयो न उठ जाय और आधयितमक ऊंचाइयो को ही कयो न छू ले, जैसे ही उसने िजद, सवाथर, और पितत आचरण के िवचारो को मन मे घुसने िदया, वह कमजोरी और असहाय िसथित मे वापस आ जायगा । सभी उपलिबधयां चाहे वह, वापार, बौिदक, या आधयाितमक दुिनया से हो एक ही कानून से संचािलत है का पिरणाम है और उनकी िविध भी एक है, फकर िसफर इतना है िक पािप का लकय कया हो। िजसने छोटी सफलता पाप की है उसका तयाग भी छोटा है। िजसे जयादा हािसल होता है उसे बहत तयाग करना होगा। िजसे अतयिधक पाप करने की इचछा है उन्हे बहत अिधक तयाग करना होगा।

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6: स्विप्न दृष्टा, आदशर्थ दृश्य और साकार जगत संसार का िपता विह स्विप्न दशी है जो उसे दे खता है जो औरो को नहीं िदखता। िदखने विाला संसार उस अनदे खे संसार पर िटका है ितिजसका विह पुत है । मनुष्यो के पाप, पीड़ा और घावि को भरने के िलए िविश्राम इस िलए चािहए िक

एकांत और

विह उन दृश्यो को दे ख सके ितिजसकी उसे

अविश्यकता है । मनुष्यता कभी स्विप्न दृष्टाओं को नहीं भूल सकती क्योिक उनके मागर्थ दशर्थक, जो विे है। विह उनके िविचारो और आदशों को कभी धिू मल या मरने नहीं दे सकती। स्विप्न दृष्टा उनके मन मे जीिवित रहता है । स्विप्न दृष्टा तात्कािलक संसार मे रहते हुये भी यह जानता है िक विह क्या दे ख सकता है और उसे दे खेगा भी। संगीतज, िशल्पकार, कलाकार, िविचारक और सन्त उस संसार का िनमार्थण करते है जो अभी बनना बाकी है और उसी स्विगर्थ के विे विास्तक ु ार है। तात्कािलक संसार सुंदर इसिलए लगता है िक विे जो

संसार को िनरं तर

बदलते है, हमारे साथन है। और िबना उनके, संसार मे मनुष्यता के िलए िविषम ितिस्थनित पैदा हो सकती है ितिजससे संसार भी न रहे गा। ितिजसे सुंदर दृश्य के कल्पना की चाहत है विह उसे एक िदन अविश्य दे खेगा। कोलंबस ने नयी दिु नया का स्विप्न दे खा और अमेिरका की खोज हुयी। कपरिनकस के स्विप्न ने पथ् ृ विी से परे ग्रहो की खोज कर उसे सािबत कर िदखाया। बुद्ध ने संसार के दख ु ो के कारण के खोज मे उस सत्य के स्विप्न को दे खा ...

जहाँ दख ु ही न हो और जहाँ अनंत शांित

हो, और विे उसमे ही ितिस्थनत हो गए। अपने स्विप्न मे िविश्विास करना सीखो। अपने आदशों को कभी न भूलने दो। तुम विही, एक िदन, बनोगे। विह संगीत जो तुम्हारे हृदय मे बजता है , विह सुंदरता ितिजसने तुम्हारा मन हर िलया, विह प्रेम ितिजसने तुम्हारे िविचारो को लपेट िलया है , उनसे विे पिरितिस्थनितयाँ प्रकािशत होगी जो तुम्हे 26


पिहले से ही जानी पिहचानी लगे गी और विह संसार बन कर तुम्हारे सामने आ जाएगा। इच्छा करो, तभी विह िमलेगा। समिपर्थत हो संघषर्थ करो, तभी विह हािसल होगा। क्या कभी यह हो सकता है िक उसे विह िमल जाय ितिजसकी उसने कामना न की हो, या समपर्थण इस िलए व्यथनर्थ हो जाय िक उसके िलए सुिविधाएं नहीं है? यह प्रकृित का िनयम नहीं! यह पिरितिस्थनितयाँ कभी नहीं हो सकतीं? ‘मांगो और िमलेगा”। स्विप्न दे खो और उन पर मन लगाओ, और जैसे जैसे तुम अपने उन स्विप्नो को दे खोगे, विही स्वियं बनते जाओगे।

तम् ु हारे सपने तम् ु हारे

िविश्विास ही है जो तुम्हे एक िदन बनना है । तुम्हारे आदशर्थ विह िचत है जो तुम बन कर िदखोगे। स्विप्न दे खने का समय होता है । जीविन की पहली सफलता विही है । बीज, सोता हुआ, स्विप्न मे सेमल के उस िविशाल विक्ष ृ

को दे खता है , जो विह

बन जाता है । पक्षी अंडे मे रह अपने स्विप्न के जागत ृ होने की प्रतीक्षा करता है । आत्मा, स्विप्न मे जो भी दे खता है प्रकृित के दे विता उसे करने को बाध्य है। स्विप्न ही विास्तिविक संसार के बीज है। तुम्हारे चारो ओर िकतनी भी िविषम ितिस्थनितयाँ क्यो न हो, िकन्तु विे अिधक समय तक नहीं रहे गी यिद तुम्हे विह आदशर्थ िमल जाय ितिजसके िलए तुम्हारा मन लालाियत हो और उसकी प्राितिप्त के चेष्टा मे तुम्हारे िविचार लग जाएँ। संसार मे तुम न आगे जा सकते हो न पीछे । चारो तरफ कुछ न कुछ हो ही रहा है , समय अपने आप बह रहा है ितिजस पर तुम्हारा कोई िनयंतण नहीं। तम् ु हे बचाने विाला विही केविल तम् ु हारा स्विप्न है जो तम् ु हारे ही िविचारो से ही तुम्हारे ही िलये नयी पिरितिस्थनितयो के िनमार्थण मे समथनर्थ है । क्या तुम यह प्रयोग करना नहीं चाहोगे? एक नवियुविक जो गरीबी और मेहनत मे िपस रहा है और उसे गंदे और अिशित क्षत माहौल मे लंबे समय नौकरी करने को िविविश है । िकन्तु विह 27


अपने िलये बने सुंदर स्विप्न मे परू ा समिपर्थत है । उसकी सोच मे िविविेक, बारीकी, नम्रता और कला है । उसके मन मे एक आदशर्थ तिु टरिहत जीविन है । उसके स्विप्न मे विह िदखता है ितिजसे दे खते ही विह उन कायों के िलये अधीर हो उठता है , और अपने छोटे मोटे बचाए गये समय और सुिविधाओं से अपने स्विप्न मे िदखे आदशर्थ की ओर दौड़ता है । शीघ्र ही उसका मन इतना बदल जाता है िक विह नौकरी उसको संभाल नहीं सकती। यह विैसा ही है जैसे शरीर के बढ़ने से कपड़े छोटे हो जाते है। उसके मन मे हुये इस बदलावि से, उसकी दृितिष्ट बढ़ जाती है और विह उन अविसरो को दे ख लेता है और उसका आत्मबल इतना बढ़ जाता है िक परु ानी पिरितिस्थनित को विह सदै वि के िलये छोड़ दे ता है । विषों बाद, हम उस नवियुविक को एक प्रौढ़ पुरुष मे दे खते है। अब विह मन की शितिक्तयो का स्विामी बन सारे िविश्वि मे िविख्यात है और उसके बराबर कोई नहीं है । उसके हाथन मे, भारी ितिजम्मेविारी है । जब विह बोलता है तब उसका क्या कहना!

ितिजंदिगयाँ बदल जाती है! मिहला और पुरुष उसके

शब्दो को पकड़ अपने जीविन और चिरत को नयी तरह से संभालने मे जट ु जाते है। सय ू र्थ की तरह ितिस्थनर विह अपने चारो तरफ प्रकाशविान व्यितिक्तत्विो को घम ू ते हुये दे खता है । उसने अपने उस स्विप्न को दे ख िलया जो उसने तब बनाया थना जब विह नवियुविक थना। अपने उसी आदशों को अब विह जी रहा है । तुम नवियुविक, जो इन िविचारो को पढ़ रहे हो अपने उस स्विप्न को दे खना आरं भ करो जो तम् ु हे बनना है । यह, िविचारो के खयाली पल ु ावि बनाना नहीं है । इसको अपने जीविन का आधार बना दो और जब भी तुम िहलोगे विही तुम्हे सहारा दे गा। आिखर तुम विही करोगे ितिजसे तुम करना चाहते हो। तम् ु हारे िविचार के फल ही तम् ु हे स्विप्न बन िदखेगे। तम् ु हे विही िमलेगा जो तुमने मांगा और हािसल िकया, न कम, और न अिधक। तुम्हारी तात्कािलक पिरितिस्थनितयाँ चाहे जैसी भी हो, तुम िगरोगे, विहीं बने रहोगे, या उठोगे यह तम् ु हारे अपने िविचार तय करते है विही जो तम् ु हारी 28


दृितिष्ट है और तुम्हारा अपना दशर्थन। तुम अपनी इच्छाओं से ही छोटे और अपनी ही इच्छाओं से महान बनोगे। स्टं टन िकरखम दवि के सुंदर शब्दो मे “तुम व्याविसाियक खचे का िहसाब िकताब करने विाले मन ु ीम हो और तम् ु हे ख्याल आता है िक तम ु एक राजनेता हो ितिजसके िविचारो को सुनने भारी भीड़ जमा है । तुम यह दे खते हो िक तुम विही हो क्योिक कान के पीछे पेन फंसा है और तुम्हारे उँ गिलयो मे पेन की स्याही लगी है । यही है चाहत ितिजससे इच्छाओं का सैलाब उमड़ता है । तुम भेड़ चराते हो और तुम्हारी ितिस्थनित संसार मे अच्छी न भी हो िकन्तु तुम्हे लगता है िक तुम्हारी आत्मा का संदेश है जो यह कहता है िक मै तुम्हे कुछ नहीं िसखा सकता। और, अब तुम इस संसार के स्विामी हो। अब तुम अपनी रोज के काम को छोड़, नये संसार को बनाने मे लग जाओ।” भगविान विह सब कुछ करता है जो तुम चाहते हो, इसिलये शुभ-अशुभ फल की सारी ितिजम्मेविारी केविल तुम पर ही है । तुम्हे अपना लक्ष्य चन ु ने की स्वितन्तता है । भगविान, ितिजसे प्रकृित भी कहते है उस तरह का कतार्थपुरुष है जो कमर्थ फल से मुक्त है । भगविान को दोष दे ना या प्रकृित को अन्याय पण ू र्थ समझना सही नहीं है । मूखर्थ, अजानी और ितिजद्दी केविल विही दे खता है जो उसे िदखाया जाय, विह स्वियं कुछ नहीं दे खता, उसकी बाते भाग्य, संयोग और अकस्मात होने विाली संभाविनाओं पर िनभर्थर है । विह िकसी मनष्ु य को सम्पन्न दे ख, आहे भरता है और कहता है िक विाह िकतना भाग्यविान विह है ! िकसी बुिद्धमान को दे ख, विह यह कहे गा िक िकतने लोगो की कृपा से विह यह बन सका! और िकसी सन्त परु ु ष ितिजसका प्रभावि िविश्विव्यापी हो उसके विाक्य होगे िक िकस तरह संयोग हर कदम पर उसका साथन दे रहा है ! विे यह नहीं दे खते िक ितिजन प्रयासो और िबफलता और संघषों को इन मनुष्यो ने अपनी इच्छा से चन ु ा और सहा, विह अनुभवि िबना हो ही नहीं सकता थना। उनको, इसका पता ही नहीं है िक िकतने त्याग और बिलदान उन्होने िकये है, और अपने हृदय मे जन्मे स्विप्न के िलये, उन्हे 29


िकतनी किठनायी को पार करना पड़ा। उन्हे िसरददर्थ और अंधकार नहीं िदखाई पड़ता बितिल्क जो उन्हे िदखता है विह प्रसन्नता और प्रकाश है ितिजसे विह ‘भाग्य’ कहता है । लंबे और किठन जीविन की याताओं को विह नहीं दे खता बितिल्क विह सफलताओं को ही दे ख उसे ‘आकितिस्मक लाभ’ कहता है । विह िवििध पूविक र्थ िकये गये कायर्थ को समझ भी नहीं सकता िकन्तु उससे प्राप्त सफलता को ‘संयोग’ कहता है मनष्ु यो के सभी कायों मे दो ही बाते है एक, प्रयत्न और दस ू रा उसका पिरणाम। ितिजतना ही प्रयत्न होगा, पिरणाम भी उतना ही होगा। भाग्य नहीं। इनाम या सफलता, चाहे विह शितिक्त, समिृ द्ध, बुिद्ध, या आितित्मक उपलितिब्धयां हो, ये सभी प्रयत्न के ही फल है। ये िविचारो की पूणत र्थ ा है, लक्ष्य पर पहुँचना और स्विप्न का प्रत्यक्ष हो जाना। स्विप्न जो मन मे िदखता है , आदशर्थ या तिु टरिहत िविश्विास जो तुम्हारी आत्मा चाहती है – विही

जीविन बन जायेगा और तम ु विही बन जाओगे।

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7: प्रशान्त मन मन की शािनत, आतम-बोध का एक दुलभ र पसाद है। यह उस आतम-िचतन का फल है जो लंबे काल तक और धैयर पूवरक िकये गए पयतो से ही पाप िकया जा सका है। यह लकण है अनुभवो की पूणरता और िवचारो के कमर और उनके िसदांतो के असाधारण जान का। मनुषय के मन का शानत होना इस मायने मे खास है की वह अब यह समझ गया है िक उसका जीवन उसके अपने िवचारो की ही खेती है, और खेती का यह जान, हर-एक जो भी िवचारो से बने है, को समझने के िलए आवशयक है। जैसे जैसे उसे इस बात की सही समझ होने लगती है , वह हर एक घटना को उसके उन कारणो को ... अपने अंदर ही जान लेता है िक वे पभाव कयो है, िजससे न तो वह कभी गुमराह होता है, न ही उसे िकसी पर कोध या शोक ही होता है, और उसका मन सदैव िनसपह, धैयर वान और पशानत बना रहता है। वह मनुषय िजसका मन शानत है और िजसने अपने आप को अपने िवचारो की खेती से समृिद करना सीख िलया है, जानता है िक िकस तरह वह अपने को िकसी भी दूसरे , जो भी उसी की तरह बने है, के अनुकूल बनाये। दुिनया के लोग, इसके बदले, उसके उस वैचािरक आधयाितमक बल की मन से वनदना करते है और यह आशा करते है वे भी इसे सीख ले और इस पर िवशास करे । िजतना ही शानत मनुषय का मन होता है उतना ही अिधक उसकी सफलता, उसका पताप या यश, और उसकी कलयाणकारी पितभा होगी। यहाँ तक िक एक साधारण वापारी भी यह पायेगा िक जैसे जैसे वह आतम-िवशास और िनषपकता का िवकास करे गा उसकी वापािरक सफलता और समृिद बढ़ेगी कयोिक लोग उसी से वापार करना पसंद करते है िजसे वे अपना समझे, और िजसका सवभाव सरल और दृढ़ हो। एक विक िजसका मन शानत और दृढ़ हो उसे सभी पयार करते है, और उसका मन से सममान होता है। उस विक का सवभाव लोगो को उसी तरह लगता है जैसे तपती गमी मे वृक की शीतल छांव या भीषण तूफान मे िकसी पवरत मे सुरिकत गुफा का िमलना। िकसे पयार नही होता िनशछल हदय, मृद ु ववहार और संयमी जीवन से? िजसे यह महा पसाद िमल गया उसे कोई फकर नही पड़ता िक बरसात हो रही है या कड़ी धूप, कयोिक उसके मन का फै लाव सदैव मृद ु, बहता हआ और शानत है।

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सवभाव का वह अलौिकक दशरन िजसे हम पशानत मन कहते है, पितिकया रिहत वह कमर है िजसका जीवन पुषप है और आतमा, फल। यही मूलयवान धरोहर िजसे िवदा या िववेक (उिचत-अनुिचत िनणरय की शिक) भी कहते है सोने से भी बहत कीमती है। धन कमाना उसके िलए िकतना अथरहीन होगा िजसका जीवन िनमरल और मन शानत हो गया हो। और उसकी आतमा सतय के अदभुत समुद (जहां भी देखे सतय ही िदखे) के बीच मे िसथत है जो उन तरं गो के नीचे हो रहे कोलाहल और पितिकयातमक कमर से परे है, और यही है अनंत शािनत। िकतनो को हम जानते है जो अपने जीवन की मृद ु और अदभुत सुंदरता से अपिरिचत है और उस जीवन को कटुता से भर िलया है, और वे अपने भयावह ववहार से अपने सवभाव को नष कर ले रहे है और कही भी वे शािनत नही चाहते। यह पश अब हमारे सामने आ खड़ा है िक कै से अथाह मनुषयो को यह समझाया जा सके गा िक वे अपने जीवन को नष न करे और अपने आतम बोध की इस कमी के चलते, पसनता के अवसर को और न खोएँ। िकतने कम लोग बाकी बचे है िजनहोने जीवन मे संयम बचा कर रखा है और उनके पास अलौिकक शािनत है जो उनके सवोतम सवभाव का लकण है।

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दास कृ षण (कृ षण गोपाल िमश) 1958 मे भारत मे जनमे, और अब ववसाय, उदोग और समाज-िनमारण मे मनुषयता या मैनेजमेट के पयोग, के सवतंत िशकक है। मनुषय-धमर की इस खोज मे, इनके कायर का िवसतार, संसार के िविवध देशो मे है। हैपपीनेस इंजीनीयिरग (अपनापन के िसदानत) के दाशरिनक। कृ षण गोपाल िमश kg@kgmisra.com

"िवचारो की खेती" [जेमस एलेन कृ त, ‘एस द मैन िथके थ’] से िलए गए शबद ....

"मन, जब तक अपने को बाहरी पिरिसथितयो से िनिमत मानता है, वह िवचिलत रहता है; िकनतु जब वह यह जान जाता है िक वह सवयं मे ही सृिष के बीज और भूिम का िनयंतक है और वही उसका कारण है, िजससे कालांतर मे सारा संसार भौितक हो उठता है, तब अपने इस सवभाव को पुनः पाप कर, वह सवतंत होता है।

मन मे िगरे हए या रोपे गए िवचारो के बीज के जड़ को जब फै लने िदया जाता है , तब वह बीज अपने आप ही पौधा बन, पिरिसथितयो और अवसर का लाभ लेकर फिलत होता है। इस तरह, अचछे िवचार, अचछे फल, और बुरे िवचार बुरे फल देते है।"

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विचारों की खेती  

विश्व प्रसिद्ध, जेम्स एलेन कृत, ‘एस द मैन थिंकेथ’ का हिन्दी अनुवाद

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