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मेरी कहानी - 3

गरु मेल स हिं भमरा की आत्मकथा का ती रा भाग (एपि ोड 43 – 63)

िंग्रहकर्त्ाा एविं प्रस्तुतकर्त्ाा लीला ततवानी


मेरी कहानी – 43 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन July 16, 2015 रामगढ़िआ इिंस्टिट्यूि

के बारे में कुछ सलखना चाहूिंगा। स्ि महान शस्स यत ने यह ब टकूल कालि बनाये उ का नाम था रदार मोहन स हिं रामगढ़िया। रामगढ़िया एक तरखान

िात है । मैं भी ज़ात का तरखान ही हूूँ। इ तरखान िात का नाम रामगढ़िया कै े पड़ा, इ का एक इतहा है । पिंिाब के महाूँरािा रणिीत स हिं े पहले स खों की आठ समटलें या आठ ित्थे होते थे िो मुगलों के खखलाफ लड़ते थे। मुग़ल राि कमज़ोर हो रहा था। यह आठ समटलें इकठी हो कर मु लमानों के खखलाफ लड़ती थीिं लेककन िब शास्तत होती तो यह समटलें आप

में भी लड़ती रहती थीिं आप

में ही लड़ते झगड़ते इतहोने अपने छोिे छोिे राि

कायम कर सलए थे। इन आठ सम लों में एक थी रामगढ़िया सम ल स्ि िट ा स हिं । उ

का ित्थेदार था

ने एक ककला बनाया था स्ि का नाम था रामगि। िट ा स हिं एक

तरखान था लेककन रामगि ककला बनाने के कारण इ रामगढ़िया”. इ ी कारण

का नाम पड़ गगया था”िट ा स हिं

भी तरखान लोग अपने आप को रामगढ़िये कहलाते हैं और िट ा

स हिं को अपना बज़ग ु ग मानते हैं और उ का ढ़दन भी मनाते हैं, और इ ी सलए िट ा स हिं के नाम पर बहुत कुछ बनाया गगया है िै े िट ा स हिं रामगढ़िया हाल, िट ा स हिं रामगढ़िया टपोट्ग क्लब्ब इत्याढ़दक। बाद में रणिीत स हिं ने इन आठ सम लों को इकठा करके खाल ा राि कायम कर सलया था। मोहन स हिं रामगढ़िया हढ़दआबाद गाूँव का रहने वाला था िो फगवारे ही होगा। इ

े कोई दो ककलोमीिर

शस

की पिाई भी मामूली ही थी लेककन समहनती बहुत थे। कफर रोज़ी रोिी के सलए अ म चले गए और वहािं बहुत बड़े ठे केदार बन गए। इतना धन कमाया कक हढ़दआबाद के नज़दीक ज़मीन खरीदते चले गए। दरू दरू तक इन की िमीन थी। क्योंकक

तरखान िात एक पछड़ी हुई िात थी इ सलए मोहन स हिं के मन में इ िात को ऊिंचा उठाने की इच्छा थी। यह रहते अ म में थे लेककन मन हढ़दआबाद में था। १९२९ में इतहोने पहला प्राइमरी टकूल खोला िो बाद में समडल टकूल और १९३३ में हाई टकूल बन गगया। १९४६ में आट्ग

कालि बना और शायद १९५० में पॉसलिै स्क्नक कालि बनाया गगया। अब तो

इतना कुछ बन गगया है कक रर चग कालि भी बन गगया है । इन

ब के पीछे मोहन स हिं का

ही ढ़दमाग था। इन की लगन को दे ख कर और बड़े बड़े अमीर लोग भी

ाथ होते गए और

यह इिंटिीच ्उशिंज़ ढ़दन दग ु नी और रात चौगनी उनती की ओर िाने लगीिं। कफर मोहन स हिं के लड़के की शादी प्रस द्ध ठे केदार मेला स हिं भोगल के लड़के

े हो गई। मेला स हिं भी एक

मशहूर ठे केदार था। मेला स हिं भी बेछक इतना पड़ा सलखा नहीिं था लेककन इन के मन में भी यही बात थी िो मोहन स हिं के ढ़दमाग में थी। दोनों मधी नई नई इमारतें खड़ी कर रहे थे।


यह शायद १९६० की बात होगी िब मेला स हिं भोगल हमारे आट्ग

कालि के नज़दीक एक

बहुत बड़ीआ बबस््डिंग बना रहा था। हम अक् र मेला स हिं को दे खते रहते थे। हर वक्त कभी इधर कभी उधर चलता कफरता रहता था और कारीगरों को उन के काम में नुक् ननकालता रहता था। बहुत सत भ ु ाओ का था। कालि में इतिीननयररिंग की ीिों के बारे में िब लड़कों की इिंिरवीऊ होती थी तो मैनेिमें ि कमेिी के ाथ मेला स हिं भी बैठता था। मेला स हिं

भी कमेिी मैम्बर और प्प्रिं ीपल

ाहब भी डरते थे। हम लड़कों ने मेला स हिं की

एक िोक बनाई हुई थी। कक ी लड़के की इिंिरवीऊ के दौरान लड़के को तरह तरह के वाल पछ ू े िाते थे और बीच में मेला स हिं बोल उठता था,”ओए तू यह बता, ाइिं आधी पडी है या परू ी ?”. यह बात थी। यहािं आि आट्ग

च तो नहीिं थी लेककन मेला स हिं के

कालि है , उ

के बबलकुल

ामने

भ ु ाओ के कारण ही बनाई हुई ड़क की द ु री तरफ मोहन स हिं

की कोठी होती थी और मोहन स हिं के लड़के को अक् र हम अपनी ऐम्बैज़ेडर कार में िाते हुए दे खते रहते थे। मोहन स हिं कभी कभी ही आता था। हमारे टकूल का हाल बहुत बड़ीआ था। स फग एक दफा ही हम ने मोहन स हिं का लैक्चर ुना था स्ि के कुछ बोल मुझे अभी तक याद हैं। मोहन स हिं े भी ब डरते थे। अपने लैक्चर में उतहोंने करै क्िर के बारे में बोला था और सशवा िी की एक कहानी

ुनाई थी,” एक दफा

एक लड़ाई में सशवा िी की िीत हुई और कुछ स पाही दश्ु मन की एक ुतदर लड़की को पकड़ कर सशवा िी के पा ले आये। सशवा िी ने उ मु लमान लड़की े कुछ वाल पूछे

और अपने स पाढ़हओिं को हुकम ढ़दया की लड़की को बड़ी ढ़हफाज़त के ाथ इ के माूँ बाप के पा छोड़ आओ”. कफर कुछ दे र बाद मोहन स हिं बोले,” यह है करै क्िर, अब तुम में े ही कुछ लड़के लड़के हिं

ोच रहे होंगे कक अगर तुम सशवा िी होते तो तुम ककया करते।” हाल में

पड़े। कफर उतहोंने एक और कहानी

थी, एक लड़का उ

भी

ुनाई,”एक नवप्ववाहता खेतों की ओर िा रही

का पीछा कर रहा था और उ

ने उ

औरत ने शोर मचाया और वोह लड़का भाग गगया, उ

औरत को कलाई

े पकड़ सलया,

औरत ने घर आ कर अपनी कलाई

काि दी। लोग इकठे हो गए थे और डाक्िर को बुला कर कलाई पर पट्ढ़िआिं बाूँधी गईं। िब खाविंद घर आया और कलाई के बारे में पुछा तो औरत ने कहा,” मेरे स रताि ! इ नहीिं रही थी, इ

ब कुछ

ुनाया और यह भी

कलाई को एक लड़के ने पकड़ा था और अब यह आप के काम की

को कहते हैं करै क्िर”.

कफर कुछ दे र बाद मोहन स हिं थी कक कोई बि ू ा लाऊूँ स्ि

िंिीदा हो गए और बोले,” बचपन

े ही मेरे मन में एक बात

के फल बहुत लोग खाएिं। मैंने अ म में भी एक ेब का बक्ष ृ लगाया था िो अब बहुत बड़ा हो गगया है , उ को मीठे ेब लगते हैं, घर के भी दटय खाते हैं, उन को खाते दे ख मैं खश ु होता हूूँ, इ ी तरह मैंने रामगढ़िया टकूल का एक छोिा


ा पौदा लगाया था, अब यह पौदा इतना बड़ा हो गगया है कक इ

को दे ख दे ख कर प न ग

होता हूूँ”. मोहन स हिं चप ु हो गए, शायद भावुक हो गए थे, हाल तासलओिं े गूँि ू उठा और बहुत दे र तक तासलआिं बिती रहीिं। कफर मोहन स हिं बोला” इ रामगढ़िया बि ू े के ाथ ाथ और बूिे भी लगाओ, िमीन स्ितनी भी चाहो लेते िाओ, ब

समल िुल कर इ को आगे

बिाओ ताकक आने वाली पीडीआिं इन का भरपूर फायदा उठायें” मोहन स हिं ने एक ककताब भी सलखी थी”

च्चीआिं

च्चीआिं” िो पिंिाबी में थी। मैंने वोह ककताब पड़ी थी। उन में

च्ची

कहानीआिं सलखी हुई थी। कहािंननयािं तो अब मझ ु े याद नहीिं हैं, स फग एक कहानी का कुछ ढ़हट ा याद है , इ में नीची िात वालों के ऊपर ऊिंची िात वालों की बेइिं ाफी सलखी हुई थी और कफर नीची िात वाले इकठे हो गए और इतनी उनती की कक ऊिंची िात वाले उन के आगे अब बोलते नहीिं थे। उ नहीिं पता थे लेककन अब मैं उठाने की

वक्त िब मैंने ककताब पड़ी थी तो मझ ु े इ

के अथग बबलकुल

मझता हूूँ कक उन के ढ़दमाग में अपनी गरीब िमात को ऊिंचा ोच ही थी। आि मोहन स हिं स्ज़िंदा होते तो यह दे ख दे ख कर ककतने खश ु होते

कक अब यह नीची िात इतनी उतती कर चक् ु की है कक कक ी भी ऊिंची िात कहाने वाले

कम नहीिं है । इ

के बाद है ड माटिर अमर स हिं ने टपीच दी और बाद में अस टिैंि है डमाटिर आ ा स हिं

िी ने। कुछ दे र बाद

ब प्वद्याथी हाल के बाहर आने लगे। हमारे

बाहर आ गगया। करनैल भी हमारे ही ए

ेक्शन में था। हम

बेिे भी हो गए थे स्ि का हमें पता नहीिं था। िीत को कक ी बाहर आते ही िीत उ हिं

पड़ा और बोला” ब

ाथ करनैल भोगल भी

े कुछ बड़ा था और उ

के दो

े पता चल गगया था। हाल

को बोला,” ओए तू तो बापू है , तू टकूल में ककया करता है ”. करनैल

दो फ़ुिबाल िै े मुिंडे बना ढ़दए”. करनैल स हिं बहुत ही अच्छा लड़का था। बहुत अच्छे कपडे पहनता और उ के पा रै ली बाइस कल होता था। उ का डैडी भी अफ्रीका में रहता था। करनैल का गाूँव था मैढ़िक

े भी मुस्श्कल

े पा

िंगत पुर। करनैल पिने में कमज़ोर था और

हुआ था। टकूल छोड़ने के बाद करनैल ने बहुत काम ककये, कभी कक ी फैक्िरी में , कभी खद ु का कोई काम शुरू कर दे ता। िब हम कालि में थे तो

करनैल हमें फगवारे शहर में घूमता हुआ समल ही िाता था। कभी हम को बताता कक उ ने यह काम शुरू ककया, कभी वोह लेककन हम इन बातों े बेखबर ही थे। िब हम इिंग्लैण्ड आ गए थे तो कुछ वर्षों बाद करनैल हमें बसमिंघम में अचानक ही समल गगया। उ

ने भी पगड़ी

उतार कर बहुत अच्छा हेअर टिाइल बनाया हुआ। वोह कक ी फैक्िी में काम कर रहा था। हम एक कैफे में चले गए और बहुत बातें कीिं। उ ने कहा कक इिंग्लैण्ड उ को अच्छा नहीिं लगा और वाप

िाने की

ोच रहा था। बोला” यह कोई स्ज़िंदगी है ? खद ु ही खाना बनाओ,

खद ु ही कपडे धोओ, नहाने के सलए स फग हफ्ते में एक दफा चािं

समलता और वोह भी

पस्ब्लक बाथ में िा कर, हमारे तो घर में ही एक नौकर था और यहािं तो पशओ ु िं िै ा काम


है , भाई मैं तो नहीिं रहूूँगा।”. और इिंडडया चले गगया था। उ नहीिं थे।

के बाद बहुत वर्षों तक हम समले

यह शायद १९८० के बाद का ही वाककया होगा, िब हम इिंडडया गए हुए थे। मेरी पत्नी की गी बहन फगवारे के नज़दीक एक छोिे े गाूँव”निंगल खेड़ा” में रहती है । निंगल खेड़ा फगवारे े स फग एक मील दरू ही है । पत्नी की बहन को समलने के सलए हम ने फगवारे

ककया। ररक्शा िाउनहाल के नज़दीक वाली

ड़क पर िा रहा था कक पीछे

े ररक्शा

े आवाज़ आई,”ए

गरु मेल स घ िं अ अ”. मैंने पीछे गदग न घम ु ाई तो दे खा करनैल स हिं हमारी तरफ दे ख रहा था। मैंने ररक्शे वाले को खड़ा होने के सलए बोला और उतरकर करनैल स हिं

े हाथ समलाया। वोह

क्लीन शेव ही था और टमािग कपड़ों में खड़ा था और कुछ मज़दरू काम कर रहे थे। बातों

बातों में मैंने उन े पछ ु ा कक वोह ककया कर रहा था। उ ने बताया कक वोह कुछ दक ु ानें बना रहा था। यह उ

का बबज़ने

ही था कक वोह दक ु ाने बनाता और उन को आगे बेच दे ता या

ककराए पर दे दे ता था। कफर कहने लगा कक वोह कभी भी इिंग्लैण्ड नहीिं िाएगा क्योंकक इिंग्लैण्ड का मौ म ही उ े प िंद नहीिं था और इिंडडया आकर उ का बबज़ने और इिंग्लैण्ड

बड़ गगया था

े इिंडडया रहना कहीिं बेहतर था। करनैल हमें चाय पीने के सलए बोल रहा था

लेककन हम ने ररक्शे वाले को खड़ा ककया हुआ था। निंगल खेड़े े वाप आकर समलने का वादा करके हम चल पड़े। पत्नी की बहन े समल कर िब हम वाप आये तो मज़दरू ों ने बताया कक करनैल स हिं

िंगत पुर को चले गगया था और उ

आना था। हम अपने गाूँव को चल पड़े। इ

ने दो तीन घिंिे तक वाप

के बाद शायद हम २००० में िब गाूँव आये तो

मेरे छोिे भाई के बेिे ने मुझ े पुछा,”ताया िी, कोई आप का दोटत करनैल स हिं भी है िो आप के

ाथ रामगढ़िया टकूल में पड़ता था ?”. िब मैंने हाूँ कहा तो मेरा भतीिा बोला,”

ताया िी, करनैल स हिं फगवारे में प्रॉपिी डीलर है और उ रोड पर उ

का ऑकफ

है ”.

का काम बहुत बड़ीआ है , िीिी

एक ढ़दन मैं करनैल को समलने के सलए फगवारे गगया। काफी बड़ा उ

का ऑकफ

था

लेककन करनैल िालिंधर गगया हुआ था। उ े समलना हो नहीिं का। मैं भी अपने कामों में इतना वयटत रहा कक करनैल को समलना भूल ही गगया। आि करनैल की याद सलखने बैठा

हूूँ तो ोचता हूूँ, अब तो मेरा िाना अ भ िं व है लेककन करनैल वहीीँ है या कहीिं और मुझे पता नहीिं। यह स्ज़िंदगी भी एक अिीब दाटताूँ है । चलता…


मेरी कहानी – 44 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन July 20, 2015

अब हम शहर की स्ज़िंदगी में अच्छी तरह घुल समल गए थे। िो एक खझिक थी वोह कब की

दरू हो चक् ु की थी बस््क शहर के लड़कों पर हम भारी पड़ रहे थे। गाूँव के लड़के ज़्यादा तगड़े और झगड़ा करने में आगे होते थे, लेककन शहर के लड़के कुछ बात में आते नहीिं थे। इ

भ्य थे और कोई झगडे वाली

का यह मतलब भी नहीिं कक टकूल में कोई लड़ाई होती थी। ब

वातावरण ही ऐ ा था कक गाूँव वाले लड़कों का कुछ रोअब होता था। भु्ला राई गाूँव लड़के ज़्यादा आते थे और उन में शरारती लड़के भी ज़्यादा ही थे। राणी पुर ही थे और इन में मैं तो शरीफ ही था, भिन कॉसमडडयन िाइप था, इ था। िीचर भी क्ला

े तो हम तीन

भी लड़के डरते थे और िीत क्योंकक

सलए कोई गलत बोलता तो बातों

रूम में आते ही बोलते,”राणी परु ीये

गए?”. टकूल में हम बहुत खश ु रहने लगे थे।

े उ की बोलती बिंद कर दे ता

ब आ गए? भ् ु ला राइये

ब आ

कभी कभी मैं

ोचता हूूँ कक वोह उमर ककतनी अच्छी होती थी, न पै ा कमाने का कफ़क्र, ना घर का कोई कफ़क्र। घर े पै े समल िाते थे और टकूल िाइम के बाद फगवारे में घम ु ते रहते। फगवारे के हर दक ु ानदार को हम िानने लगे थे। बहादर का िेिे हाई टकूल फगवारे के

ि ैं र में ही था, हम अपने टकूल

े बहादर को समलने चले आते थे और इकिठे हो कर

मटती करने चल पड़ते थे। िवानी की उम्र भी क्या होती है , हम बाूँ ाूँ वाले तिंग बािार में घु

ाइकलों पर टवार हो कर

िाते, घिंिीआिं बिाते बिाते ररक्शों और इतने लोगों के बीच

आगे बिते िाते। िै े िै े आगे बिते िाते बािार और भी तिंग होता िाता िो तकरीबन छै फ़ीि चौड़ा ही रह िाता लेककन हम

ाइकलों पे डिे घिंिीआिं बिाते रहते। हमारी मिंस्ज़ल होती

थी हे म राि हलवाई की दक ू ान। दक ू ान की दीवार गिरे ले का आडगर दे ते और कभी कभी चिनी के पहनता था और उ

ाइकल खड़े करके हम चाय और

ाथ कचौरीआिं भी खाते। हे म राि धोती

की धोती और कमीज़ इतनी गिंदी होती थी िै े उ

के कपड़ों में तेल

लगा हो लेककन कौन िानता है , कक ने कहाूँ का पानी पीना है । यह हे म राि भी कुछ किंु दन लाल था उ राि किंु दन के

ालों बाद इिंग्लैण्ड आ गगया था। उ

का एक ररश्तेदार स्ि

ने उ े इिंग्लैण्ड की टपॉत रसशप भेि दी थी और इिंग्लैण्ड आ कर हे म

ाथ समल कर शाढ़दओिं में रोिी बनाने का काम करने लगा था। मुझे भी तब

पता चला िब यहािं बसमिंघम में मेरी पत्नी की दरू

े एक ररश्तेदारी

की शादी थी। इ ारी फैसमली

का नाम

े बुआ िी की लड़की

शादी में हम पनत पत्नी ने बहुत काम ककया था और यहीिं े बुआ की े इतनी मुहबत बिी, िो अभी तक उ ी तरह बरकरार है . आि तो बड़े बड़े

होिलों में बरात को रोिी खखलाई िाती है लेककन उ

मय रोिी का

ारा प्रोग्राम गुरदआ ु रे


में ही होता था। िब मैं गुरदआ ु रे की ककचन में गगया तो दे ख कर ही है रान हो गगया कक

हे मराि पकौड़े तल रहा था। हे म राि भी मुझे दे ख कर है रान हो गगया और मेरा हाथ पकड़ कर बोला,” ककदािं बोई (boy )”. मैं हिं लगा है ।” हे म राि हिं

पड़ा और बोला,” चाचा ! तू तो अब अिंग्रेिी बोलने

पड़ा और मुझे धीरे

े बोला,” काम बहुत ज़्यादा है ,मुझे प्वटकी का अगधआ (half bottle ) ला दे ”मैंने कहा चाचा, यह गुरदआ ु रा है , कहीिं कक ी को पता चल गगया तो लेने के दे ने पड़ िाएिंगे”. हे म राि बोला,”बोई, इ

बात का कफ़क्र ना कर, ब

मुझे

प्वटकी ला दे ”. मैंने बआ िी के लड़के को कहा तो वोह हिं ु

पड़ा और ि्दी ही एक दक ू ान

े प्वटकी ले आया और एक तरफ हो कर प्वटकी हे म राि को पकड़ा दी। हे म राि ने एक

तरफ हो कर एक ग्ला

में प्वटकी डाली और पी गगया। कफर बोला, अब काम का कोई कफ़क्र

ना करो, फट्िे चक्क दिं ग ू ा काम के। भआ का लड़का एक तरफ हो कर हिं ु

कर मझ ु े बोला,” भा िी,कहीिं

स्ब्ज़याूँ खराब ना कर

दे ”. मैंने कहा,” कफ़क्र ना कर ननिंदी, इतनी प्वटकी तो इ के सलए कुछ भी नहीिं है । दो विे बरात िो काडडगफ

े आई थी को खाना ढ़दया गगया। खाना इतना बड़ीआ था कक

भी बराती

खश ु थे. उ

मय बैरे नहीिं हुआ करते थे,घर वाले लड़के ही वग ककया करते थे। िब हमने बरात को खाना खखला ढ़दया तो बरात के िाने के बाद हम भी लड़के खाने को बैठ गए। खाना इतना बड़ीआ बना था कक

भी हे म राि की बातें कर रहे थे, ननिंदी मुझ

िी यह प्वटकी का कमाल ही लगता है ” इ एक दफा ही समला और उ

ने गमग

में , कहाूँ वोह गतदी धोती, कहाूँ बड़ीआ

पर

भी हिं ने लगे। इ

े बोला,” भा

के बाद हे म राि मुझे

ूि पहन रखा था, ककतनी तबदीली आ गई थी हे म राि ूि। लेककन उ के एक ररश्तेदार का लड़का िगदीश

मेरे दोटत बहादर का बहुत पक्का दोटत है । वै े तो उन ढ़दनों में मैं, बहादर और िगदीश तीनों इकठे घूमा करते थे और कफ़्में दे खने िाया करते थे लेककन अब कभी कभी ही हम समल पाते हैं ककओिंकक मैं अब कहीिं िा नहीिं

कता। इ

िगदीश को भी हे म राि ने खाना

बनाना स खा ढ़दया था और िगदीश भी शादीओिं में खाना बनाने लगा था. मेरी बड़ी लड़की प्पिंकी की शादी में िगदीश ने ही खाना बनाया था। इ

हे म राि की कहानी को छोड़ कर मैं

कफर फगवारे में आ िाता हूूँ। मैंने बहुत े लोगों के बारे में सलखा है कक वोह मुझे इिंग्लैण्ड में समले थे। इ की भी एक कहानी ही है , अगर सलखग ूिं ा तो ाफ़ ज़ाढ़हर हो िाएगा कक इिंग्लैण्ड में इतने लोग मझ ु े कै े

समल गए थे। अभी तो और लोगों के बारे में भी सलखना बाकी है । दरअ ल िब १९६२ में मैं इिंग्लैण्ड आया था तो उ पहल स्ि

शस

ाल पहले बहुत कम लोग इिंग्लैण्ड को आते थे। पहले ने भी इिंग्लैण्ड को आना होता था उ को भारत के बबदे मिंत्रालय को अिी

दे नी होती थी िो उ नहीिं ). यह इिंडडया की

े कुछ

वक्त कनॉि प्ले

ढ़दली के कुछ दरू ही होता था ( मझ ु े िगह याद

रकार ही पा पोिग दे ती थी लेककन पा पोिग लेने के सलए एिक ु े शन


और टपॉत रसशप की िरुरत होती थी। अगर पा पोिग समल गगया तो कफर

ीधे इिंग्लैण्ड चले

िाते थे कोई प्वज़े की िरुरत नहीिं होती थी। िो अनपि लोग थे उन को एिेंि पाककटतान ले िा कर और मु लमान नाम का िाली पा पोिग बना कर कराची

े िहाज़ पर चिा दे ते थे।

कफर इिंग्लैण्ड की पासलगमेंि में इसमग्रेशन ऐक्ि बनाने की बात शुरू हो गई। पिंिाब में एिेंिों ने शोर मचा ढ़दया था कक ि्दी नया कानून बनने वाला है और अब इिंग्लैण्ड को िाना बिंद हो िाएगा।

एक पैननक की स्टथनत पैदा हो गई थी क्योंकक बहुत लोग इिंग्लैंड को िाना चाहते थे। कफर इिंग्लैण्ड की पासलगयमें ि में कानन ू पा हो गगया कक पहली िल ु ाई १९६२ े इिंग्लैण्ड आने के सलए बिढ़िश हकूमत को एप्लाई करना पड़ेगा। ब

कफर ककया था, हर तरफ यही बातें होने

लगीिं कक इिंग्लैण्ड िाना बिंद हो िाएगा। कॉलिों टकूलों के लड़के इिंग्लैण्ड िाने के सलए फाइलें हाथ में सलए एिेंिों के दफ्तरों के चक्क्र लगाते। धड़ाधड़ १ िल ु ाई १९६२

े पहले पहले

इिंग्लैण्ड के सलए एिैंिों को पै े दे ने लगे। इन में मैं भी शासमल था और कानून बनने

स फग बारह ढ़दन पहले १९ िून को इिंग्लैण्ड आ गगया और मेरा दोटत बहादर २६ िून को

स फग पािंच ढ़दन पहले आया। िब हम यहािं आये तो हमारे टकूल कालि के लड़के हमें यहािं

समलने लगे। कई लड़के कई महीनों और वर्षों बाद हमें समले, कई लड़ककआिं शादी करा के यहािं आ गई थीिं। १ िुलाई १९६२ के बाद वाउचर स टिम लागू हो गगया स्ि के सलए बिढ़िश फ़ौरन ऑकफ

ढ़दली को एप्लाई करना पड़ता था। िो लोग १ िुलाई

े पहले आ नहीिं

के

वोह वाउचर ले कर आ गए। इ

ब में एक नई बात यह हुई कक यहािं पहले ज़्यादा अनपि लोग ही आते थे, अब पड़े सलखे टकूल कॉलिों के लड़के आने लगे। एक और बात यह हुई कक पहले अनपि लोग आठ आठ द द ाल यहािं रह कर ही इिंडडया को वाप िाते थे, अब टकूल कॉलिों के लड़के कुछ

ाल बाद इिंडडया आते और शादी करा कर अपनी पत्नी को भी

ाथ ले आते और कुछ

दे र बाद मकान भी खरीद लेते और यहाूँ ही बच्चे होने शुरू हो गए और यहीिं

ैिल हो गए।

यह मुक्त र कहानी मैंने इ ी सलए सलखी है कक पाठकों को पता चल िाए कक मैं इिंग्लैण्ड वाले इतने लोगों को कै े िानता हूूँ।

बहादर के दो दोटत होते थे िो िेिे हाई टकूल में उ एक घड़ी

के

ाथ पड़ते थे, एक था फूल िो

ाि कपूर स हिं का लड़का था और द ू रा था”किंडा”. किंडा उ

का गोत था, नाम

मुझे याद नहीिं। फूल के प्पता िी कपूर स हिं की फगवारे में घड़ीओिं की दक ू ान थी और घड़ीआिं ररपेअर ककया करते थे। हम कभी कभी दक ू ान पर चले िाते थे और कपरू स हिं करते थे। कपरू स हिं के ताउलक हमारे

े बातें ककया

ाथ दोटतों िै े थे। कपरू स हिं कफ्म दे खने के बहुत शौक़ीन थे और हम पैराडाइज़ में अक् र समलते रहते थे। एक दफा रात के मय िब मैं


बहादर और िीत कफ्म दे खने गए तो हमारी पा

की

क्योंकक

ीि पर कपूर स हिं कूँवल ओिे बैठे थे

दी बहुत थी। हम उ को दे ख कर भी हिं पड़े और बहादर कहने लगा,”बाऊ िी कोई कफ्म छोड़ भी ढ़दया करो”, कपूर स हिं को हम बाऊ िी कह कर बल ु ाया करते थे। कफ्म थी”नागगन”. कपूर स हिं बोले,” आि यह कफ्म मैं है रान हो गए। कफर यहािं धमग राि का

तारवीिं दफा दे ख रहा हूूँ। हम ब ीन आता है , कपूर स हिं बोला,” दे खो दे खो, यह धमग

राि स फग कागज़ों का बना हुआ है , दे खना थोह्ड़ी दे र बाद इ का हाथ ढ़हलेगा”. हम उ की बातों पर हिं रहे थे। फूल तो हमारा दोटत था ही, कपरू स हिं भी दोटत ही बन गगया था। िब मैं और बहादर यहािं

ैिल हो गए थे तो चार पािंच वर्षों बाद कपरू स हिं भी यहािं आ

गगया। कपरू स हिं बहादर के घर

े एक मील के फा ले पर ही अपने कक ी ररश्तेदार के घर

रहने लगा था। िब भी मैं बहादर को समलने आता तो कपरू स हिं

े भी समलता रहता। कुछ

दे र बाद कपरू स हिं ने अपनी पत्नी और दो बेिों को भी यहािं बल ु ा सलया। फूल की उम्र क्योंकक ज़्यादा थी, इ

सलए वोह आ नहीिं

का और अब भी फगवारे ही अपनी फैसमली के

ाथ रहता है । कभी कभी वोह अपने छोिे भाईओिं को समलने यहािं आता है तो उ

मुलाकात हो िाती है । फूल के दो छोिे भाई, इिंदर और बब्ला हमारी बहुत इज़त करते हैं। अब तो इतदर और बब्ले के बच्चों की भी शाढ़दयािं हो चक् ु की हैं। कपूर स हिं और उ की पत्नी कब के इ

दनु नआ

े रुख त हो चक् ु के हैं।

क्योंकक मैं अब कहीिं िा नहीिं एक छोिी दोटतों धीरे धीरे

कता, इ

सलए मेरे दोटत बहादर ने एक

ाल हुआ मेरे सलए ी पािी घर में ही रखी थी। बहादर का ही यह आईडीआ था कक मुझे भी पुराने

े समलने का अव र समल िाएगा। मेरे बच्चे और पत्नी मुझे बहादर के घर ले गए। भी पुराने दोटत और कुछ ररश्तेदार भी आ गए थे। इिंदर और बब्ले की पत्नीआिं

और बच्चे भी थे। खब ू महफल िम्मी, स्ि लड़के तो हर वक्त मेरे

तरह कुछ

ाल पहले िमती थी। कपूर स हिं के

ाथ बैठे रहे और छोिा बब्ला तो ग्लॉ ी में थोह्ड़ी

ी प्वटकी मुझे

ला दे ता और कहता,” भा िी, यह तो पीनी ही पड़ेगी, यह प्पयार की है , बहुत दे र के बाद समले हैं, आि कफर वोही ढ़दन आया है ”. मेरी पत्नी भी हिं पडी और बोली,” अब तो आप को यह पीनी ही पड़ेगी, मुिंडा इतने प्पयार

े ऑफर कर रहा है ”. और मैंने वोह ग्लॉ ी पी ली।

भी ने तासलआिं बिा दीिं। मेरे सलए यह बहुत ुहानी शाम थी। ब दनु नआ का मज़ा ले लो दनु नआ ुहानी है िी दनु नआ ुहानी है ”. चलता…

को ककया कहें ,”


मेरी कहानी – 45 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन July 23, 2015

टकूल में तो अब बहुत दोटत बन गए थे। टकूल े वाप्प गाूँव में आ कर भी कुछ घर का काम करते और कफर गाूँव में भी घुमते रहते। िीत का घर तो गाूँव की द ु री ओर था लेककन रात को वोह मेरे घर आ िाता था। हम इकठे पड़ते और वहीीँ

ो िाते।

ुबह उठते

ही वोह अपने घर चले िाता था। अभी बबिली आई नहीिं थी,िे बल लैम्प की रौशनी पड़ते थे। गसमगओिं के ढ़दनों में छत पर

े ही

ोते थे और पड़ने के सलए लैंिनग होती थी। गसमगओिं में

एक मु ीबत होती थी कक लैंिनग की लौ को पतिंगे बहुत आते थे। हमारी लैतिनग कुछ लीक करती थी और हम लैंिनग को एक थाली में रख दे ते थे। पतिंगे स्िन को हम भावकड़ कहते थे आते रहते और िल िल कर थाली में गगरते िाते। तकरीबन आधी होती थी। हर हिं ा करता था।

ब ु ह हम को

ब ु ह को थाली मरे हुए भवकड़ों े ाफ़ करनी पड़ती। इ बात पर भी िीत बहुत

अब गाूँव में बबिली आने की बातें होती रहती थीिं,समननटिर आते रहते थे। यह शायद १९५८ था कक एक ढ़दन हमें पिंचायत ने बता ढ़दया कक बबिली मिंिरू हो गई थी और स्ि कफढ़ििंग करानी हो करा ले। हमारे घर भी कुछ इलैक्िीसशयन आये। दादा िी के और बबिली की कफढ़ििंग का कॉतिै कि हो गगया। कफढ़ििंग के सलए िो िो इलैक्िीरीसशअन ने सलखा ढ़दया। एक ढ़दन दादा िी िालिंधर गए और

ारा

ने भी

ाथ बात हुई ामान चाढ़हए था ामान रे हड़े पर

लाद कर ले आये और बबिली की कफढ़ििंग का काम शुरू हो गगया। अब तो यह घर कब का हम बेच चक् ु के हैं और नया घर गाूँव के बाहर है लेककन यह वोह ही घर था िो कक ी पशुओिं की हवेली होती थी और बिवारे के मु लमान हमला न कर दें । दो हफ्ते में

मय

मय मोह्ले के लोग यहािं िमा हो िाते थे ताकक

ारी कफढ़ििंग हो गई। िगह िगह ब्व लग गए।

घर के बाहर दरवाज़े पर भी एक बड़ा ग्लोब लगा ढ़दया गगया। मीिर भी लग गगया। हम दे ख दे ख कर खश ु होते,टकीमें लगाते कक कहाूँ कहाूँ ककया ककया रखना था, रे डडओ कहाूँ रखना था। कफर एक ढ़दन प्पता िी अफ्रीका

े आ गए और कफढ़ििंग दे ख कर खुश हो गए। अब

इलैस्क्िक रे डडओ खरीदने की बात चल पड़ी। एक ढ़दन मैं और प्पता िी फगवारे गए और रे डडओ की दक ु ानों पर रे डडओ प िंद करने लगे। उ

मय फगवारे में तीन दक ु ाने थीिं रे डडओ

की और एक दक ू ान में एक रे डडओ हमें प िंद आ गगया। रे डडओ बहुत ुतदर था। रे डडओ होगा कोई चार पािंच ौ का,मुझे ठीक याद नहीिं। हम एक खादी का भारी कपडा ाथ ले गये थे। रे डडओ को खब ू अच्छी तरह कपडे गाूँव को रवाना हो गए।

े बाूँधा और

ाइकल की प्पछली

ीि पर बाूँध ढ़दया और


घर आ कर रे डडओ को िो मेरे कमरे में शै्फ थी उ

पर रखा गगया। रे डडओ के दोनों तरफ

फूलदानों को रख ढ़दया गगया स्िन में बहुत ुतदर कागज़ के फूल रखे हुए थे। रे डडओ को प्लग े ॉकेि में लगा ढ़दया। ब ,अब इिंतज़ार था तो स फग करिं ि का। और वोह ढ़दन भी आ गगया स्ि शायद हिं को बोलते

ढ़दन

प्वच ऑन होने का उदघािन होना था। कोई समननटिर आया हुआ था राि शमाग था। यह प्रोग्राम टकूल में था और घर बैठे हम लाऊड टपीकर में कक ी ुन रहे थे। कफर अचानक बबिली आ गई। हम ने घर के

ारे ब्व िगा

ढ़दए,रे डडओ ऑन कर ढ़दया,रे डडओ िालिंधर बोलने लगा। घर में एक शादी का माहौल

ा था।

इदग गगदग के लोग रे डडओ की आवाज़ ऊिंची करने को कह रहे थे। कमरे के बाहर दरवाज़े के ऊपर एक दरवाज़े के

ाइज़ की शै्फ होती थी स्ि

ने रे डडओ रख ढ़दया ताकक मोह्ले के

भी लोग

को छाएदान कहते थे,उ न ु

के ऊपर हम

कें। रे डडओ फुल वौसलयम पर बोल

रहा था। गसमगओिं के ढ़दन थे और औरतें बच्चे मदग गधयान

े रे डडओ

न ु रहे थे। कफर यह

रोज़ाना का स लस ला शुरू हो गगया। लोग अपने अपने घरों की छतों पर बैठ िाते। ढ़दहाती

प्रोग्राम बहुत शौक े ुना िाता था,स्ि में त िं राम और ठिं डू राम की आप में बातें होती थी और मीठी नोंक झोंक भी होती थी। इ में खेती बाड़ी का प्रोग्राम ही ज़्यादा होता था। कफर मिंडीओिं के भाओ बताते थे और मौ म का हाल भी बताया िाता था। यह प्रोग्राम िालिंधर

े प ागरत होता था और पिंिाब में घर घर

होते ही आकशवाणी ढ़दली

ुना िाने लगा था। यह प्रोग्राम खत्म

े ख़बरें नशर होने लगती थी। पहले एक औरत की आवाज़

आती,” यह औल इिंडडया रे डडओ है ,अब

माचार होंगे, पहले ढ़हिंदी में ,कफर पिंिाबी में और इ

के बाद अिंग्रेिी में ” ख़बरों के बाद कोई ड्रामा शुरू हो िाता स्ि

को पड़ो ी अपनी अपनी

चारपाईओिं पर लेिे हुए ुनते। इ के बाद अगर हमारा मन करता तो िो कश्मीर े प ागरत होता था ुन लेते िो उदग ू में ही होता था। िब े आये थे िीत अपने घर ही

दाए वतन प्रोग्राम े प्पता िी अफ्रीका

ोने लगा था। क्योंकक रौशनी की अब कोई ढ़दकत नहीिं थी,इ

सलए मैं ककताबें ले कर पड़ता भी रहता और रे डडओ भी

ुनता रहता। प्पता िी अब हमेशा के

सलए अफ्रीका छोड़ आये थे क्योंकक वोह ररिायर हो चक् ु के थे। उतहोंने एक पैिोल कम्पनी स्ि

का नाम कालिै क्

होता था उ

में पची

वर्षग काम ककया था। ररिायर होने पर उतहो

को

ोने का एक छोिा

ा मेडल ढ़दया गगया था और ग्रुप फोिो ली गई थी स्ि

में फ्रिंि रो

में कुस ओ ग िं पर कुछ गोरे अफ र बैठे हुए थे। प्पता िी के पा

क्योंकक बिढ़िश पा पोिग था( उ

सलए वोह िब मज़ी इिंग्लैण्ड आ

कते थे। कुछ ही महीनों के बाद उतहोंने इिंग्लैण्ड आने का

मन बना सलया। प्पता िी बेकार बैठ नहीिं कराई। वोह बाई

वक्त अफ्रीका में अिंग्रेज़ों का राि था ),इ

कते थे,इ

सलए उतहोंने सशप की

ीि बुक

ी िाना ही प िंद करते थे, इ ी सलए हमारे घर में उन की सशप में ली हुई फोिो बहुत होती थी,स्िन में ख़ा कर ए ु ि कैनाल की होती थीिं। राटते में छोिे छोिे आइलैंड िो आते थे,उन की फोिो ली गई थीिं। सशप के ीन बहुत होते थे। कफर वोह अपना


ामान पैक अप करने लगे। उन के पा

एक काफी बड़ा लकड़ी का बक्

होता था िो

उतहोंने खद ु अफ्रीका में बनाया था,उ

में बहुत े कापेंिरी के िूल रखे स्िन की उतहें आशा थी कक यह िूल इिंग्लैण्ड में उन के काम आएूँगे, हालािंकक यह िूल उन के कभी काम नहीिं आये और कुछ िूल अभी भी मेरी शैड में पड़े हैं स्िन में एक चाक़ू होता था स्ि

का हैंडल

बहुत खब ू ूरत होता था और इ को मेरा एक दोटत हिं कर कौड़ीआिं वाला चाक़ू कहा करता था और यह अभी भी मेरे िूल बॉक् में है । कफर उतहोंने हरी स हिं ऐिंड तज़ िै वल एिेंि िालिंधर

होता था। स्ि

ीि बक ु कराई। यह िै वल एिेंि का ऑकफ

पिंिाब नैशनल बैंक के नज़दीक

ढ़दन िाना था कक ी का छकड़ा ककराए पर सलया गगया।

यह लोग प्पता िी को फगवारे िे न में बबठा आये। प्पता िी की शरू ु कक वोह हर खत डडिे ल के मिंब ु ई कहते हैं,आया। इ

ाथ दो मज़दरू थे।

े ही एक आदत थी

ाथ सलखा करते थे। पहला खत उन का बौम्बे

े स्ि

को अब

में

फर की हर बात सलखी हुई थी। इ के बाद शायद तीन हफ्ते बाद ढ़िलिी डॉक याडग इिंग्लैण्ड े खत आया और इ के बाद हम ब भल ू गए और उन का खत सलखने का िो रूिीन होता था,उ

के ढ़ह ाब

े खत आने लगे स्िन में उ

वक्त के

हालात सलखे हुए होते थे कक इिंग्लैण्ड की स्ज़िंदगी बहुत कठोर थी। नहाने का घरों में कोई इिंतज़ाम नहीिं था और हफ्ते बाद पस्ब्लक बाथ में िा कर नहाना पड़ता था। इ के सलए दो सशसलिंग दे ने होते थे और वोह एक नया तौसलआ और रोज़ नहाने के आढ़द थे और इ

ाबुन की छोिी

ी ढ़िकी दे ते थे। वोह

को ले कर वोह बहुत परे शान रहते थे। एक एक घर में बहुत इिंडडयन रहते थे िो अपनी अपनी दालें स्ब्ज़याूँ रोिी पकाते थे और पतीले अपनी

अपनी चारपाईओिं के नीचे रखते थे क्योंकक र ोई में इतने पतीले रखने के सलए िगह नहीिं होती थी। अक् र वोह यह ही सलखते रहते थे कक ज़्यादा दे र इिंग्लैण्ड में नहीिं रहें गे। अपने कपडे भी खद ु धोने पड़ते थे। अफ्रीका में उतहोंने बहुत मज़े ककये थे और घर में अफ्रीकन नौकर आम समल िाते थे लेककन यहािं तो ब कुछ इलग्ग ही था। लेककन वक्त को कोई नहीिं िानता। १९५८ के आये वोह १९६४ में वाप

इिंडडया आये।

िीत अब कफर मेरे घर

ोने का एक कारण यह होता था कक मेरे

पा

ोने लगा था। मेरे घर

हारमोननयम होता था िो मैं तो बिाता ही था िीत भी बिा लेता था। मुझे बािं ुरी

बिाना भी आता था हालािंकक स फग कफ़्मी तज़ग ही बिा

कता था। पड़ते पड़ते िब बोर हो

िाते तो हमारी राग प्वद्या शुरू हो िाती। घर की र ोई ऊपर ही होती थी। माूँ दध ू गमग

करके आवाज़ें दे ती कक दध ू ले िाओ। हम अपनी राग प्वद्या में इतना मगन होते कक हमें आवाज़

ुनाई ना दे ती,कफर वोह िोर

ऊपर िा कर अपने ग्ला

े बोलती,” ओ रागीओ ! दध ू ले िाओ”. कफर हम दोनों

ले आते। नौवीिं कक्षा की परीक्षा को तीन महीने रह गए थे। एक

ढ़दन हम चारों दोटतों ने मशवरा ककया कक रोज़ रोज़ गाूँव न फगवारे ही रहा िाए, इ

े टकूल को िाने की बिाये क्यों

े इस्म्तहान की तैयारी करने में आ ानी हो िायेगी। बहादर के

चाचा िी का एक मकान बना हुआ था फगवारे

ि ैं ल िाऊन में िो िाऊन हाल के नज़दीक


ही था। इ

में तीन कमरे थे और पीछे एक छोिा

सलया और घर वालों को बता ढ़दया। घर वालों ने इ

ा आूँगन था। हम चारों ने फै ला कर में कोई आपप्ि नहीिं िताई। बहादर के

चाचा िी ने भी कुछ नहीिं कहा। एक ढ़दन हम ने अपने बबटतरे बाइस कल की प्पछली

ीि

पर बािंधे और चल ढ़दए। मकान आने पर बहादर ने बाहर के आूँगन को िाने वाले दरवाज़े का ताला खोला। कफर एक कमरे का ताला खोला स्ि

में हम ने

ामान रखना था।. अिंदर िा

कर हम ने बबटतरे नीचे फशग पर ही लगा ढ़दए क्योंकक चार चारपाईआिं नहीिं आ िो समडल वाला छोिा कमरा था,उ

कती थीिं।

में पहले ही एक कालि का प्वद्याथी रहता था िो

रामगढ़िया पॉसलिै स्क्नक में स प्वल इत्नीररिंग कर रहा था। उ

के कमरे का दरवाज़ा बाहर

को खल ु ता था. इ

प्वढ़दयाथी का नाम भगीरथ था। भगीरथ बहुत अच्छा लड़का था और अपनी रोिी खद ु ही बनाया करता था। धीरे धीरे हम ने

ारा

ामान,टिोव चाय बनाने के सलए और एक बबिली का रे डडओ बहादर

ले आया था। कुछ कप प्लेिें खिंड और चाय पिी भी रख ली। दो कुस य ग ािं भी रख लीिं और कपडे ककताबें

ब कुछ आ गगया और हमारा कमरा

ि गगया। रोिी का भी हम ने रे लवे रोड

पर प्रभात होिल में खाने का मन बना सलया और हर फ्राइडे को हम ने गाूँव आ िाय करना था और रप्ववार को वाप

आ िाय करना था। िब पहली रात हम अपने इ

तो हम बहुत खश ु थे। हमारे सलए यह एक आज़ादी ही थी स्ि नहीिं था। चलता…

कमरे में

में घर वालों का कोई डर

ोये


मेरी कहानी – 46 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन July 27, 2015 फगवारे आ कर हम कुछ आज़ाद कोई तकलीफ थी, ब

यों ही

े मह ू

करने लगे थे। ऐ ा तो नहीिं था कक हमें घर में

भी दोटत इकठे रहने के कारण मटती करने के सलए आज़ाद

थे। िब िी चाहता हम कफ्म दे खने के सलए चले िाते, िब िी चाहता शहर में घूमने ननकल िाते। बािार में ककतनी भी भीड़ क्यों न हो हम

ाइकलों पर बैठे रहते और घिंिीआिं

बिाते बिाते आगे बिते िाते। हम िवान हो रहे थे लेककन कक ी लड़की को कुछ कहना, आ बैल मुझे मार कहने िै ा ही होता था। आि िब मैं उ

वक्त और इ

वक्त का मुकाबला

करता हूूँ तो हम बहुत भ्य थे। लड़ककआिं भी ककताबें हाथ में सलए बहुत लीके े चलती थीिं। अच्छे आचरण की अगर मैं इिंतहा कहूूँ तो कोई अतकथनी नहीिं होगी। कक ी लड़की को बल ु ाना मु ीबत मोल लेना होता था। टकूल के बाद चार ाल कालि में भी बबताये लेककन कभी ऐ ी बात

चारों दोटतों में मैं लेककन

कक मैं

ब का

न ु ी ही नहीिं थी कक कक ी लड़की के ब

म्बतध कक ी लड़के के

ाथ हों। हम

े शरीफ होता था। िीत और भिन तो लड़ने में भी आगे होते थे

े तगड़ा होने के बाविद ू मैं लड़ने

े ढ़हचकचाता रहा था, हाूँ यह बात िरूर है

ाथ दे दे ता था लेककन आगे कभी नहीिं हुआ था। कोई शरारत करनी होती थी तो पहले भिन और िीत के ढ़दमाग े ही ननकलती थी। बहादर भी तकरीबन मेरे िै ा ही था। एक ढ़दन भिन और िीत ने प्रोग्राम बनाया कक रात के ि ैं ल िाऊन के कुछ ही दरू पर

चारों दोटत द

मय खेतों

े मूलीआिं उखाड़ी िाएूँ।

स्ब्ज़ओिं के खेत थे। टकूल का काम खत्म करने के बाद हम

गगआरा विे रात को खेतों की ओर चल पड़े। कुछ ही दरू ी पर खेत ही खेत

थे। यह खेती की ज़मीन शहर के नज़दीक होने के कारण कक ान की रौशनी ट्यूब लाइि की लौ िै ी लग रही थी। मूलीआिं ऊपर

स्ब्ज़याूँ ही बीिते थे. चाूँद

ब कुछ ढ़दखाई दे रहा था।

फ़ेद रिं ग की

े ही ढ़दखाई दे रही थी। बहुत दरू तक हम ने गौर े दे खा कक कोई दे ख ना रहा हो। िब हमें यकीिंन हो गगया कक कोई खतरा नहीिं था, तो िीत एक मूली उखाड़ कर बोला,” वाहे गुरु”. इ

भी हाथों और चाक़ू फूल गोभी के चाक़ू

पर

भी धीरे धीरे हिं ने लगे। गािरें उखाड़नी कुछ मुस्श्कल थीिं, कफर

े ज़मीन कुरे द कर थोह्ड़ी बहुत गािरें ननकाल ही लीिं। कुछ फूल हम ने े कािे और वाप चल पड़े। राटते भर में हम चारों ओर दे खते रहे

क्योंकक हम चोर थे और चोर को डर तो होता ही है । ि्दी ि्दी हम अपने कमरे की ओर िा रहे थे। कमरे में आ कर हम ने मूलीआिं और गािरें धोईं और नमक लगा कर मूलीआिं खाने लगे।


क्या मूखत ग ा थी हमारी ? गाूँव में

भी के खेत थे, बहादर की तो इतनी ज़मीन थी कक गाूँव

का एक ढ़हट ा ही उन का था, कफर भी यह मूलीआिं और गोभी की चोरी ! आि तक मुझे इ

बात का दुःु ख है । बुराई हमेशा बुराई ही होती है चाहे मज़ाक में ही ककयों न की हो। कुछ

हफ्ते बाद हम कफर खेतों में चले गए। अभी हम ने बैंगन और मूलीओिं को हाथ लगाया ही था कक कक ी तरफ

े एक कु्हाड़ी आ कर हमारे नज़दीक आ कर गगरी और

ाथ ही यह

शोर कक पकड़ लो !पकड़ लो! होने लगा। भिन चीख उठा, मर गए ओए काि दी िािंग। स्िधर मिंह ु आया हम भागने लगे। भागने में हम तेि थे और िाऊन हाल की तरफ भागने लगे। िाऊन हाल आ कर एक द ू रे को पछ ू ने लगे कक कक ी को चोि तो नहीिं लगी थी। भगवान का शक्र ु था कक आ कर

ख ु का

ही

ािं

लामत थे। हम ने दरू का चक्कर लगाया और कमरे में

सलया। मन ही मन में मैं तो डरा हुआ था और आि तक यह गन ु ाह मन में सलए बैठा हूूँ और च कहूूँ तो आि अपनी कहानी में पहली दफा यह सलख कर कुछ ह्का मह ू कर रहा हूूँ। इ के बाद हम ने यह काम छोड़ ढ़दया और अपनी टिडी में म रूफ हो गए।

एक दफा मैं ने एक कहानी में सलखा था की द वीिं के इस्म्तहान के पहले हमारे कमरे में चोरी हुई थी। अब मुझे याद आया कक दरअ ल यह चोरी इ ी कमरे में नौवीिं िमात के एग्िाम े पहले हुई थी। पिंिाबी में एक कहावत है ” चोरों पर पड़ गए मोर”. हम ने तो चोरी की थी

स्ब्ज़ओिं की लेककन एक ढ़दन हमारे ही कमरे में चोर आ कर हमारा

एक ढ़दन िब हम टकूल

ामान ले गए।

आये तो हमारे कमरे का ताला िूिा हुआ था। िब हम कमरे के भीतर गए तो दे खा कक चोर हमारा ामान लूि कर ले गए थे। हमारा रे डडओ, प्राइम

े वाप

का टिोव, एक बाइस कल, कुछ नए बूि, कुछ कपड़े और ििं कों

े पै े भी ननकाले

हुए थे। हमारे मुिंह े आवाज़ नहीिं ननकल रही रही थी क्योंकक हम को अभी तक मालूम ही नहीिं था कक चोरी ककया होती है । हम को कोई मझ नहीिं आ रही थी कक हम ककया करें , तभी

ामने के मकान मालक तारा स हिं भचू िी आ गए। हम ने उन को

तो वोह बोले कक हमें पोली पोली

का नाम

को ररपोिग करनी चाढ़हए।

ुन कर ही हमें किंपकिंपी

होता है । खैर हम पोसल

टिे शन स्ि

के बड़े गोल दरवाज़े स्ि

पर पोसल

और बड़ा दरवाज़ा और था, उ

के

ी आ गई क्योंकक पोसल

भ कुछ ढ़दखाया

का अक

ही कुछ ऐ ा

को थाना बोलते हैं में चले गए। डरते डरते हम थाने

टिे शन सलखा हुआ था के अिंदर चले गए। आगे एक ाथ ही एक छोिा ा कमरा था। एक पुसल मैन एक कु ी पर बैठा

ामने एक मेज़ था और मेज़ के ऊपर कुछ गिंदे रै स्िटिर रखे हुए थे स्िन की स्ि्द लाल कपड़े की थी। हम उ के पा आ कर खड़े हो गए। बड़े रूखे टवर में वोह बोला,” क्या बात है भई ?”. भिन बोला,”हमारे कमरे में चोरी हो गई है ”. पसु ल बोला,”तम ु को पता है कक

ने की है ?”. हम ने

मैन

ारी बात बताई और वोह सलखे िा रहा था


लेककन उ

का रवैया ऐ ा था िै े हम उ

का वक्त बबागद करने आये थे।

ारी ररपोिग

सलखने के बाद िीत ने या बहादर ने मुझे याद नहीिं दटतखत कर ढ़दए। वोह स पाही बोला,” अगर चोरी का

ामान समल गगया तो तुम को समलें गे”.

अक् र हम हर शुक्करवार को टकूल रप्ववार को वाप

े छुिी होने के बाद गाूँव आ िाया करते थे और

आ िाया करते थे और आते वक्त पराठे मक्की की रोिीआिं

ाग या कोई

ब्ज़ी ले आते थे। कुछ हफ्ते बाद ऐ े ही हम एक रप्ववार के ढ़दन घर

े बहुत कुछ खाने को ले कर चल पड़े। बहादर और भिन मीि के बहुत शौक़ीन थे। बहादर बोला,”यार आि तो मीि खाने को िी चाहता है ”. हम प्रभात होिल की तरफ चले गए और वहािं े हम ने मीि सलया। यहािं एक बात और भी मैं सलखना चाहूिंगा कक मैं मीि नहीिं खाता था, हालािंकक मेरे प्पता िी मीि के बहुत शौक़ीन थे। एक दफा उतहोंने मझ ु े एक कौली में गचकन डाल कर

ढ़दया था और मझ ु े रबड़ िै ा लगा था और मैंने उ ी वक्त खाना छोड़ ढ़दया था। शहर आ कर

भी मीि खाते थे लेककन मैं नहीिं खाता था। तीनों दोटत मुझे मीि खाने को कहते रहते

थे लेककन मैं रबड़ कह कर खाता नहीिं था। भिन मुझे बहुत छे ड़ता रहता था और मेरी सममक्री करता रहता था। एक ढ़दन मैं और बहादर अकेले प्रभात होिल गए और हम एक

कैबबन में बैठ गए। बहादर ने कीमें की प्लेि का आडगर ढ़दया। िब कीमें की प्लेि आई तो बहादर मुझे बोला,” गुरमेल ! ब

एक ग्राही खा के दे ख”. तिंदरू ी रोिी के एक िुकड़े को मैंने

प्लेि और मिंगवा ली और मैं उ

में

कीमे में सभगो कर खाया तो मुझे इतना टवाढ़दष्ि लगा कक मैं कीमा खाने लगा। हम ने एक खाना आरिं भ हुआ।

े भी बहुत कीमा खा गगया। ब

यहीिं

े मेरा मीि

मीि ले कर हम अपने कमरे में आ गए और टकूल का काम करने में म रूफ हो गए। अभी घिंिा भी नहीिं हुआ होगा कक दरवाज़े पर दटतक हुई। िब दरवाज़ा खोला तो बाहर दो पुसल मैन, एक थानेदार और दो आदमी स्िन के हाथों में हाथकडड़आिं लगी हुई थीिं खड़े थे। एक पुसल

मैन बोला,” आप ने चोरी की ररपोिग सलखवाई थी, आप की चोरी समल गई है और यह

दोनों चोर हैं स्ितहोंने आप के कमरे

ब कुछ चरु ाया था”. हम तो खश ु हो गए कक अब

हमारी चोरी हुई चीज़ें समल िाएिंगी। हम ने उन को अिंदर आने को कहा और वोह भी आ गए। अिंदर आ कर थानेदार ने दोनों चोरों को गतदी गासलआिं दे नी शुरू कर दीिं और गरि कर बोला,” बोलो हरामिादों कै े की थी चोरी”. एक बोला,”

ाहब हम दे खते रहते हैं और िब

प्वद्याथी टकूल को चले िाते हैं तो कमरे का ताला तोड़ लेते हैं, िब हम ने इन के कमरे चोरी की थी तो हम

ाइकल ले कर िीिी रोड पर चाचोकी की तरफ भाग रहे थे तो हमें

छक हुआ कक पसु ल हमारा पीछा कर रही है , इ सलए हम ने कुछ ामान आगे िा कर चाचोकी वाली नैहर में फैंक ढ़दया और िो बाकी बचा है वोह आप को दे ढ़दया है ”. कफर


थानेदार हम

े मुख़ातब हो कर बोला,” ऐ ा करना, कल को पुसल

ामान ले िाना”. और इ

टिे शन आ कर अपना

के बाद वोह उठ खड़े हुए और िाने के सलए तैयार हो गए।

िब वोह चले गए तो हम बहुत खश ु हो गए और रोिीआिं और मीि खाने के सलए तैयार हो गए। तभी दरवाज़े पर कफर दटतक हुई। िब दरवाज़ा खोला तो एक स पाही खड़ा था। वोह बोला,”

ाहब

ुबह के भूखे हैं, कुछ है आप के पा

खाने के सलए ?” शायद उन को मीि की

महक आ गई थी। हम ने उन को अिंदर बल ु ा सलया। कुछ ही समनिों में वोह हमारे गाूँव

लाये हुए पराठे , मक्की की रोिीआिं, ाग और प्रभात होिल का मीि खा गए और चले गए। हम को दब ु ारा प्रभात होिल को िाना पड़ा। द ु रे ढ़दन हम पसु ल

टिे शन गए और चोरी हुए ामान के बारे में पछ ु ा तो एक पसु ल मैन बोला,”आओ और अपना ामान शनाख ् कर लो”. िब हम पसु ल मैन के ाथ गए तो हम चारों दोटत एक द ू रे का मुिंह दे खने लगे क्योंकक हमारा कोई भी े पुराने बड़े बड़े इलैस्क्िक रे डडओ वहािं पड़े थे स्िन के पाट्ग

ामान वहािं नहीिं था। बहुत पीछे े ननकाले हुए थे। टिोव

थे स्िन के बनगर ननकाले हुए थे, पुराने िूते, पुराने कपडे पड़े थे लेककन हमारी एक भी चीज़ वहािं नहीिं थी। ननराश हुए हम कमरे े बाहर आ गए। पुसल मैन ने एक पहले े सलखा

हुआ पेपर ढ़दया और कहा कक इ पर हम ाइन कर दें लेककन हम े पड़ नहीिं हुआ क्योंकक हमारी अिंग्रेिी भी ऐ ी वै ी ही थी। बहादर ने कहा कक हम अभी आते हैं। बाहर आ बहादर कहने लगा कक इ कचहरी चलते हैं और वहािं कक ी

पर सलखा

मझ तो आता नहीिं, ऐ ा करते हैं कक हम

े पूछ लेते हैं। िब हम कचहरी गए तो एक वकील िो

बहादर को िानता था, आता ढ़दखाई ढ़दया। हम ने पेपर उन को पकड़ा ढ़दया और पुछा कक उ

पर ककया सलखा था। वकील ने पड़ कर

भी चीज़ें समल गई हैं और हम पुसल

ुनाया,” इ

में सलखा है कक हमारी चोरी की

के शुकगि ुग ार हैं”. हम ने

ारी बात उ

को बताई तो

वोह हिं ने लगा और कहा कक हम को ररपोिग सलखानी ही नहीिं चाढ़हए थी। हम वाप टिे शन आ गए और उ

पेपर पर दटतखत करके पुसल

मैन को पकड़ा ढ़दया। बाहर आ कर

िीत ऊिंची ऊिंची हिं ने लगा और कहने लगा,” वकील की बात

ही थी, अगर हम ररपोिग नहीिं

करते तो कमज़कम हमारे पराठे मक्की की रोिीआिं और मीि तो बच िाते”. िोर-िोर हिं

रहे थे और लोग हमारा मुिंह दे ख रहे थे।

चलता…

पुसल

े हम


मेरी कहानी – 47 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन July 30, 2015 यह चोरी की घिना

े हम कुछ डर गए थे क्योंकक उ

काि िाती तो ककया होता?

कर

े अगर कक ी की िािंग

ोच कर ही किंपकपी लग िाती। यों तो इ

करके हम हूँ ते रहते थे लेककन भीतर पुसल

कु्हाड़ी

घिना को याद

े हम

भी डरे हुए थे। अगर हम पकडे िाते और टिे शन िाना पड़ता तो क्या होता। अब मैं ोचता हूूँ, कोई भी कक ान कै े बदागश्त

कता है कक उनके खेतों

े अपनी औलाद की तरह रखी हुई फ ल को कोई इ तरह चरु ा के ले िाए ! कक ान अपनी मिी े कक ी को कुछ दे दे तो उ को दे ने में ख़श ु ी होती है लेककन इ

तरह कोई चोरी करके ले िाए तो गुट ा तो आएगा ही। आगे

कर ली कक कभी खेतों

े हमने तोबा

स्ब्ज़याूँ नहीिं तोड़ेंगे। हम अपनी पिाई में म रूफ हो गए।

ाथ के

छोिे कमरे में रहने वाला लड़का भगीरथ भी हमारे कमरे में आता रहता और हमारी मदद कर दे ता था। भगीरथ बहुत अच्छा लड़का था और कभी कभी िीरे और प्याज़ वाले पराठे बनाया करता था और हमें भी खखलाता रहता था। उ के िीरे वाले पराठों े तो इतनी ढ़दलचटपी हुई कक यहािं आकर भी अभी तक कभी कभी बनाते हैं। बहादर के िेिे हाई टकूल का है डमाटिर भी इ ी कालोनी में ही रहता था। बहादर ने उ

ियूशन लेनी शुरू कर दी थी। बहादर के चाचा गुरदयाल स हिं को यह है डमाटिर िानता था, शायद इ ी सलए बहादर को इ

टकूल में दाखल कराया गया था। है डमाटिर

ाहब बहादर

और अपने बेिे प्विय को इकठे ही पिाते थे। कुछ दे र बाद एक लड़की भी है डमाटिर ियूशन पड़ने लगी। इ

लड़की का नाम था कमलेश। बहादर मन ही मन में कमलेश को

बहुत चाहता था। कमलेश कक ी लड़ककयों के टकूल में पिती थी। कमलेश को हमने पहले भी बहुत दफा दे खा हुआ था। वोह त ु दर और भोली भाली लड़की थी। उ के चेहरे में एक अिीब

ी कसशश थी, िो दे खता वोह दे खता ही रह िाता था। बहादर भी बहुत गोरा और खब ू रू त होता था। बहादर में भी एक अिीब कसशश होती थी। बहादर कमलेश की बातें बहुत ककया करता था और कहा करता था कक कोई ऐ ा चमत्कार हो िाए कक कमलेश शादी हो िाए। हम उ

े उ की

की बात पर हूँ ते रहते थे। बहादर अक् र बताया करता था कक

कमलेश उ की तरफ दे ख कर मुटकराया करती थी लेककन इतनी िुरगत बहादर में भी नहीिं थी कक वोह कमलेश को बुला ले। अब भी कभी कभी बहादर कमलेश को याद करता रहता है और उ

की वाइफ कमल और उ

की बेिी ककरण हिं

पड़ते हैं। ककरण तो कोई बात हो कह

दे ती है , “डैडी आि कमलेश की याद तो नहीिं आती?”. कुछ भी हो यह िवानी की मीठी यादें ही हैं।


िै े िै े परीक्षा नज़दीक आ रही थी, शहर में घम ू ना हमने कम कर ढ़दया था। अपने कमरे में ककताबें लेकर बैठे रहते और कभी कभी एक छोिी रहते।

ामने वाले मकान में तारा स हिं भचू और उ

ी लड़की के गाने

ुन

ुनकर हूँ ते

की पत्नी रहते थे। वोह कोई पचपन

ाठ वर्षग के होंगे लेककन उन के कोई औलाद नहीिं थी। उतहोंने एक बारह तेरह वर्षीय लड़की को घर के कामकाि के सलए रखा हुआ था। यह लड़की बहुत ही मा म ू होती थी, ारा ढ़दन काम करती रहती और ाथ ाथ गाती भी रहती थी। िब भी गाती ऊिंचे टवर में गाती। अक् र वोह गाती, “आि हम े क्यों पदाग है “. आवाज़ इतनी मज़े

े गाती और हम हूँ ते रहते। तारा स हिं की पत्नी स्ि

को एक फोबबआ पानी का ग्ला

ा था। इतनी

रु ीली नहीिं थी लेककन वोह

का नाम मुझे पता नहीिं, उ

फाई घर में रखती थी कक अगर कक ी ने उ के नलके

ले सलया तो वोह नलके के हैंडल का लकड़ी वाला ढ़हट ा कपडे

ाफ़

करती रहती थी। कभी कभी हम उ के घर तारा स हिं को समलने िाया करते थे। तारा स हिं बहुत अच्छा और नेक आदमी था, बात बात पर हूँ ता रहता था। छोिा ा घर था उनका, बबलकुल ाधारण लेककन

फाई इतनी कक फशग कई िगह तो रगड़ रगड़ कर नघ ा हुआ था । बहादर के चाचा िी तारा स हिं की पत्नी को कुछ नफरत ी करते थे और बहुत कम उनके घर िाते थे क्योंकक उतहें यह ही डर रहता था कक उनके घर उ

के िूतों के ननशानों को रगड़ रगड़ कर

ककया? बच्चा कोई है नहीिं था, इ

े बाहर िाने के बाद तारा स हिं की पत्नी

ाफ़ करे गी। लेककन वोह प्वचारी करती भी

सलए अपने आपको म रूफ रखती थी। लेककन एक दफा

उ ने मेरी बहुत मदद की थी। मुझको डायररया हो गया था लेककन यहािं हम रहते थे बहादर के मकान में वहािं कोई शौचालय नहीिं था। भचू के मकान के ऊपर खल ु े में पुराने िाइप का

शौचालय था। भचू की पत्नी को मेरे बारे में पता चल गया था कक मैं ठीक नहीिं हूूँ और उ ने अपने पनत को भेिा कक मैं उनका शौचालय इटतेमाल कर लूँ ।ू ढ़दन में कई कई दफा मुझे िाना पड़ता था। कफर उ

ने मुझे पुदीना और बहुत चीज़ें डाल कर चाय बना कर दी। बार बार मुझे पूछती, “गुरमेल बेिा ठीक है तू?”. उ के बोल में एक ममता ी थी। परीक्षा शुरू हो चक् ु की थी। पहले ढ़दन ही ढ़ह ाब का परचा था। मुझे याद नहीिं, कै ा हुआ लेककन कक ी के भी चेहरे पे मुटकराहि नहीिं थी। रोज़ टकूल आते और परचा दे कर वाप

कमरे में आ िाते और पेपर के बारे में बातें करते और कफर द ू रे ढ़दन के पेपर की तैयारी शुरू हो िाती। धीरे धीरे करने लगे।

ारा

भी पेपर खत्म हो गए और हम गाूँव को वाप

िाने की तैयारी

ामान पैक अप हो गया और अपने अपने बाइस कलों पर बाूँध कर गाूँव

कुछ ले आये और कुछ हमने द ू रे ढ़दन रप्ववार को ले आना था। गाूँव आने

े पहले हमने

पैराडाइज़ स ननमे में कफ्म का टपेशल शो दे खने का मन बना सलया। कफ्म थी सशव भगत।


कफ्म तो याद नहीिं लेककन एक दो कमरे में आये और गाूँव में वाप मशीन

ारा

ीन अभी तक याद हैं। कफ्म दे ख कर हम वाप

अपने

ामान बाूँध सलया और शहर को अलप्वदा कह ढ़दया।

आकर कफर वोही स लस ला शुरू हो गया, खेतों

े चारा लाना और चारे को

े कुतरना और शाम को गयान की हट्िी में इकठे होना और गप्पें लगाना। एक ढ़दन

मैं चारा कुतर रहा था और ताऊ रतन स हिं की पोती स्ि को गुड्डी बोलते थे, नज़दीक ही खेल रही थी। गड् ु डी उ

वक्त पािंच वर्षग की होगी। मैं कक ी काम अिंदर कमरे में चले गया

और गड् ु डी मशीन के

ाथ खेलने लगी। वाप

धकेला और मशीन के वील को हाथ

आ कर मैंने चारे को मशीन के पीछे पॉशे में

े थोड़ा

ा घम ु ाया लेककन मझ ु े इ

था कक गड् ु डी ने अपना हाथ उ था। िब गड् ु डी ने िोर की दो उस्तग्लआिं हाथ

बात का पता नहीिं

िगह डाला हुआ था स्ि में े चारा कुतर कर ननकलता े चीख मारी तो मैं एक दम भागकर उ तरफ आया तो दे खा गड् ु डी

े काि कर लिक रही थीिं और खन ू बह रहा था। दे ख कर मैं तो

मूर्क्क्षगत होने को हो रहा था, कफर मैंने गुड्डी को उठाया और घर की ओर भागा। िब गुड्डी की माूँ यानी भाबी के पा

पहुिंचा तो वोह भी चीख उठी और उ के बोल मेरे तक रड़क रहे हैं, ” हाए नी मेररये ककटमते !”.

ीने में अभी

भाबी की छह बेिीआिं थीिं और बेिा कोई नहीिं था। हमारे दोनों घरों के ररश्तों में ककतनी भी दरारें क्यों ना पड़ी हों लेककन मेरा ररश्ता हमेशा

े ही खश ु गवार रहा था । इ

भाबी के

भी

काम मैं ककया करता था, यहािं तक कक भईआ गुरचरण स हिं इलाहबाद काम ककया करता था तो भाबी के कमरे में ही भाबी की भैं चीखें

ुन कर

ोया करता था। उ

के सलए चारा उन के खेतों भी इकठे हो गए। भाग्य

वक्त मैं आठ द

वर्षग का हूूँगा। अब भी मैं

े काि कर उन के घर रख दे ता था। गुड्डी की े उ

वक्त भैया गुरचरण स हिं भी गाूँव में ही था

और उ ी वक्त घर आ गया। गुड्डी को हम

ोहन लाल हकीम की

ऊपर लगाया और पट्िी कर दी लेककन उ

े ककया होना था क्योंकक उस्तग्लआिं तो कािी हुई

लाल कोई अच्छा डाक्िर तो नहीिं था, उ थीिं। मैं

ारी रात

ो ना

ने कुछ गचट्िा

िगरी में ले गए।

ोहन

ा पाउडर उिं गसलओिं को िोड़ कर

का और कभी कभी रोता भी रहा। मैं अपने आप को दोर्षी मान रहा

था। दादा िी ने भी आ कर मुझे बहुत बुरा भला कहा था, ” तू अूँधा था, तुझे ढ़दखाई नहीिं दे ता था कक गुड्डी वहािं थी “. िो मेरे मन की हालत थी उ को बबआिं करना बहुत मुस्श्कल है ।

च कहूूँ तो अभी तक िब कभी वोह याद आती है तो मुझे बहुत दुःु ख होता है और अपने आप को गन ु ाहगार मझता हूूँ। ब ु ह को भाई गरु चरन स हिं हमारे घर आया और मझ ु े बोला, “गरु मेल! चल हम गड् ु डी को ले कर शहर के स प्वल हटपताल चलते हैं, क्योंकक खन ू तो अभी भी बहुत ननकलता है ”. गड् ु डी को गोद में बबठा कर मैं भैया के बाइस कल की


प्पछली

ीि पर बैठ गया। यहाूँ मैं यह भी बता दूँ ू कक गुड्डी को मैंने इतना प्पयार ककया है

कक वोह ढ़दन अभी भी याद आते हैं। गुड्डी भैया की पहली

िंतान थी। घर में पहला बच्चा

तो यों भी बहुत प्पयारा लगता है । हर वक्त मेरे पीछे भागती रहती थी। कूल े आने पर मेरे ाइकल की घिंिी की आवाज़ न ु कर भागी आती थी, और मैं भी कुछ ना कुछ उ के

सलए लेकर आता था। बहुत दफा मेरे ाथ ही ो िाया करती थी। भैया के घर में द ु री बेिी बहुत वर्षों के बाद आई थी, इ के बाद िब द ु री बचीआिं आईं तो उन को मैंने इतना प्पयार नहीिं ढ़दया। ब

आती और मेरे के पा

गड् ु डी ही मेरी िान थी। िब भी मुझे दे खती, “चाचा अआअ ” बोल कर भागी ाइकल पर चड़ने लगती और मैं उ े

ाइकल के डिंडे पर बबठा दे ता िो हैंडल

होता है ।

िब हम हटपताल पह ु िं चे तो भैया को बहुत घिंिे लग गए डाक्िरों े बातें करते करते। कभी कक ी े बात करते कभी कक ी े। और आखर में डाक्िरों ने कुछ मेडी ीन और पट्िी आढ़दक लाने को सलख ढ़दया। अब तो हालत अछे होंगे लेककन उ याद करके ही अिीब

मय के हटपताल को

ी हालत होती है, िगह िगह गिंदगी, फ्लोर की इिंिें खटता हालत में

और मरीज़ नीचे ज़मीन पर ही बैठे थे। गाूँव के लोगों ने अपने घरों थे, मरीिों के ररश्तेदार भी पा

े ही बबटतरे लाये हुए ही नीचे िमीन पर बैठे थे। और नज़दीक ही पा के गाूँव

िगपालपुर के कुछ बदमाश बैठे थे स्िन को गोलीआिं लगी हुई थीिं क्योंकक कुछ ढ़दन हुए रात के मय िब उन के गाूँव में रा लीला हो रही थी तो दो ग्रुप िो शराब पी रहे थे उन की आप

में लड़ाई हो गई थी और गोलीआिं चल गई थीिं। यह िो आदमी हटपताल में बैठे हुए थे इन की िािंघ और कलाई पर पढ़िया बाूँधी हुई थीिं स्ि में े पीले रिं ग की दवाई बाहर ही दीख रही थी। इ

रा

लीला के अव र पर मैं भी वहािं था क्योंकक हम कुछ दोटत रा

लीला दे खने गए

हुए थे। स्ि िगह रा लीला हो रही थी वोह ऐ ी िगह थी िै े िसलआिं वाला बाग़ हो। बहुत े घरों के बीच एक खल ु ी िगह में रा लीला हो रही थी लेककन िाने आने के सलए एक छोिी

ी गली थी। इन बदमाशों को हम ने बहुत दफा दे खा हुआ था ककओिंकक राणी पुर और िगपाल पुर एक द ु रे गाूँव के नज़दीक ही हैं। िब लड़के िो लड़की के वेश में थे डािं करते करते गाते तो लोग रुपैये ढ़दखाते और वोह लेने िाते। इ

को वेल कहते थे। िब कोई

रुपैया दे ता तो लड़का रुपैये को ऊपर उठा कर बोलता, ” वेल, वेल, यह है एक रुपये की वेल, रामू वेल कराता, शाम के सलए वेल” . और इ होता, छलािंगें लगाता रा

के बाद वोह लड़का िो लड़की के वेश में

लीला की िगह में आकर नाचने लगता।

इ ी तरह यह स लस ला चल रहा था कक दो ग्रप ु ों में कक ी बात को ले कर झगडा शरू ु हो गया। झगडा इतना बड़ा कक गोलीआिं चलने लगीिं। डर के मारे

भी भागने लगे। गली तिंग

थी। अिीब स्टथनत थी। एक द ु रे को धक्के दे रहे थे। हमारा दम घि ु रहा था। हम

बके


िूते इ

भीड़ में कहीिं खो गए। िै े तै े करके हम बाहर आये और राणी पुर की तरफ

भागने लगे। द ु रे ढ़दन हमें पता चला कक कुछ लोगों को गोलीआिं लगी थी। इ

के इलावा

हमें कुछ पता नहीिं था लेककन इन बदमाशों को यहाूँ हटपताल में बैठे दे ख कर मुझे ढ़दल ही ढ़दल में उन े नफरत हुई क्योंकक उन की बड़ी बड़ी मूिंछों वाले चेहरे ही ऐ े थे कक बहुत बुरे लगते थे और वहािं बैठे भी एक द ु रे को गाली े ही बात कर रहे थे।

भैया दवाई बगैरा ले कर आ गए थे और कफर गड् ु डी को ले कर अतदर चले गए, मैं वरािंडे में बैठा रहा। कोई आधे घिंिे बाद गड् ु डी को ले कर भैया आये लेककन कुछ उदा उतहोंने बताया कक एक छोिी ऊूँगली कािनी पडी थी। ले आते तो वोह िाूँके लगा कर िोड़ गाूँव को वाप

थे। आते ही

िगन ने बताया कक अगर उ ी वक्त

कते थे। हकीम को इलाि नहीिं करना चाढ़हए था। हम

आ गए। धीरे धीरे िसम ठीक होने लगा लेककन िब भी मैं गड् ु डी के हाथ को

दे खता तो मझ ु े बहुत दुःु ख होता। आि भी मझ ु े वोह हाथ उ ी तरह दीखता है । गड् ु डी की शादी के वक्त मैं यहाूँ था। गुड्डी को एक दफा ही समल का लेककन कुछ दोनों घरों के

म्बतध ही ऐ े रहे कक गुड्डी को दब ु ारा समलने का कभी अव र नहीिं समला। भैया भाबी इ

दन ु ीआिं को छोड़ चक् ु के हैं ।

ुना था गुड्डी की दो बहने कहीिं ऑटिे सलया में रहती हैं और

गुड्डी भी अपने घर में खश ु है । अब तो भारत के बच्चे भी कहीिं ऑटिे सलया में रहते है , ब यादें छुपाये खड़ा है । चलता…

े नाता ही िूि गया है , छोिे भाई और उन

राणी पुर में एक घर है िो पता नहीिं ककतनी


मेरी कहानी – 48 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 03, 2015

नौवीिं की परीक्षा के बाद कुछ महीने गाूँव में गुज़ार कर हम कफर टकूल खल ु गए थे। हम

े टकूल िाने लगे क्योंकक

भी लड़के एक द ू रे के गाूँव को िाने लगे थे या यों कह

भी एक पररवार िै े हो गए थे। आधे

े ज़्यादा लड़के तो गाूँवों

फगवारे के दरू दरू तक एक यही शहर था स्ि

में

कते हैं कक

े ही आते थे क्योंकक

ब कुछ उपलब्ध था ख़ा

कर स ननमा।

पैराडाइज़ में हम समलते रहते थे। बहुत दफा कोई ऐ ी कफ्म होती स्ि की विह े बहुत भीड़ होती तो हमारे कुछ लड़के थे स्िनको पै े पकड़ा दे ते थे ढ़िकि लेने के सलए। मैंने स फग एक दफा ढ़िकि सलए थे, उ

के बाद कभी मेरा हौ ला नहीिं पड़ा था। हाूँ िब भीड़ ना होती

तो मझ ु े कोई ढ़हचकचाहि नहीिं होती थी। कफ्म थी मधम ु ती, स्ि में दलीप कुमार और बबयिंती माला थे। ढ़िकि लेने के सलए एक छोिी एक

मय एक ही आदमी उ

में चल

ी गली थी स्ि

कता था। मैं उ

की दीवार ऐ ी थी कक

ढ़दन नहा कर आया था यानी

के वाल धोये हुए थे, मेरे वाल बहुत लम्बे थे और ख ू ने में दे र लगती थी। इ ी सलए मैं र पर तौसलआ रखा हुआ था। रबड़ की कैंची चपल उ वक्त नई नई फैशन में आई थी और मैंने भी कैंची चपल ही पहनी हुई थी। िब ढ़िकिें समलनी शुरू हुई तो धकम धक्का शुरू हो गगया। ढ़िकि वाली छोिी ी खखड़की ढ़िकि ले कर िब लोग बाहर ननकलते तो कुछ लड़के आगे े आ िाते और घु िाते। ढ़िकि ले कर बाहर ननकलना भी मुस्श्कल हो िाता। अपना

ारा िोर लगा कर मैंने ढ़िकि

ले सलए और िै े तै े करके मैं बाहर भी ननकल आया लेककन मेरे कैंची चपल के टिै प

ोल

र के वाल बबखरे हुए, े उखड़े हुए, मैं अिीब ही हालत में था। िब ढ़िकि लेकर बाहर

आया तो दोटत मुझे दे ख कर हिं ोच

रहे थे। कफ्म तो हम ने दे ख ली लेककन आि तक मैं यह

ोच कर है रान हो िाता हूूँ कक हम भारती ऐ ा क्यों करते हैं ? कहीिं भी िाओ, ब

चिना हो, िे न में चिना हो हम द ू रे

यहाूँ तक कक एक दफा हमने अमत ृ र

े पहले होना चाहते हैं।

े इिंग्लैण्ड के सलए िहाज़ में चिना था। मेरे

ाहब हमें चिाने आये थे। िब चैक इन का वक्त आया तो

अपना

में

भी एक द ू रे

ुर

े आगे हो कर

ामान लाने लगे। यहािं मैं यह भी बता दूँ ू कक अब ऐ ा नहीिं है क्योंकक बाहर रहने

हमारे लोग बहुत बदल गए हैं। यह मय १९७४ था और हम ने एअर अफगान में फर करना था। चैक इन के वक्त ऐ ा हो गगया था कक”मैं पीछे ना रह िाऊिं”. लोग हम को ओवर िे क करके आगे िा रहे थे और अपना

ामान चैक इन काउिं िर पर रख रहे थे लेककन हम

दोनों समआिं बीवी और तीन बचे वहीीँ के वहीीँ खड़े थे। मेरे

ुर

ाहब दरू

े खड़े हम पर

गुट ा हो रहे थे और इशारे कर रहे थे कक हम भी आगे िाएूँ लेककन मैंने भी उन को इशारा


ककया कक वोह कफ़क्र ना करें क्योंकक

भी की

ीिें इ ी िहाज़ में बुक थीिं। चैक इन पर एक

स हिं िी थे, वोह भी हमें दे ख रहे थे। अचानक गुट े में आ कर उतहोंने कुछ लोगों का ामान उठाया और दरू फैंक ढ़दया और मुझे कहा,” रदार िी आप पहले आइये”.

दो समनि में ही हमारा काम हो गगया और स हिं िी का धतयवाद करके हम इसमग्रेशन की ओर चल ढ़दए। िब क्लीअर हो कर

भी िहाज़ में बैठ गए तो मैंने आगे

े पीछे तक दे खा,

िहाज़ भरा हुआ तो था लेककन अभी भी काफी ीिें खाली थीिं। मैं ोच रहा था कक क्यों इतनी पैननक थी िब कक िहाज़ में अभी भी इतनी ीिें खाली थीिं। अभी तक वोह ीन मझ ु े याद है और मैं

ोचता रहता हूूँ कक कहने को तो हम डीिंगें मारते रहते हैं कक हमारी भयता बहुत ऊिंची है लेककन यह ऊिंची भयता की ननशानीआिं हैं ? हर शाम को हम एक िीवी चैनल दे खते हैं स्ि पर कक ी िॉप्पक को लेकर बातें होती हैं, पािंच या छह समननटिर बातें करते हैं लेककन ऐ ा बोलते हैं िै े मग ु ों की लड़ाई हो रही हो, एक द ू रे को बात करने ही नहीिं दे ते। बहुत दफा तो हम कक ी नतीिे पर पौहिं च ही नहीिं पािी और कुछ और िेडीयू के लोग होते हैं लेककन मुझे

कते कक ककया हुआ, बीिेपी कािंग्रे आम भी बोल रहे होते हैं, स फग पतरकार ही

भ्य लगते हैं िो इिंतज़ार करते रहते हैं।

खैर, यह तो चलता ही रहे गा, अब आता हूूँ टकूल की ओर। पिाई खब ू हो रही थी। एक ढ़दन प्वद्या प्रकाश िी आते ही बोले,” लड़को ! आप के सलए एक लख पर

ाहनी

कफलहाल एक

ूचना है , वोह यह है कक गाूँव

े फगवारे तक

ड़क बनने वाली है । पक्की तो बहुत दे र बाद बनेगी, ीधा कच्चा राटता ही बनाया िाएगा स्ि पर तुम मट्िी डालोगे, फावड़े और

िोकरे तुम को ढ़दए िाएिंगे। यह २१ ढ़दन का कैम्प लगेगा और इ इ

ेवक कैम्प। और टकूलों

े भी लड़के आएिंगे। स्ि

का नाम है भारत

माि

स्ि ने िाना है , मुझे नाम सलखा दे ना”.

के बाद उतहोंने पिाना शुरू कर ढ़दया। िब छुिी हुई तो भी लड़के आप में बातें करने लगे और एक द ू रे े पूछने लगे कक कक कक ने कैंप में िाना था। हमारे ेक्शन में स फग मैं और िीत ही तैयार हुए। भिन का ेक्शन और था लेककन उ ने िाने े इिंकार कर ढ़दया। कुछ अतय क्ला ों े लड़के तैयार हो गए लेककन हमारे टकूल े स फग आठ लड़के ही िाने को तैयार हुए।

यहािं मैं यह भी बता दूँ ू कक ऐ ा ही कैंप कुछ

ाल पहले हमारे गाूँव में भी लगा था स्ि

दे श में पाूँच वर्षीय योिनाएिं चल रही थीिं स्ि

के तहत गाूँवों को शहरों

कपूरथले के एक कालि

े लड़के आये थे। तब हमारे गाूँव

शरू ु हो गगया था। यहािं भी स्ि

को भारत

माि

े फगवारे को

में

ड़क बनी थी. े समलाने का काम

ड़क बननी होती वहािं टकूल के लड़कों का कैंप भी लगता था

ेवक कैंप कहा िाता था। नीयत ढ़दन

भी लड़के फगवारे ब

अड्डे

पर पौहिं च गए। हम यह दे ख कर है रान हो गए कक वहािं दो ब ें खड़ी थीिं और द ू रे टकूलों


और रामगढ़िआ आट्ग

कालि

े भी बहुत लड़के आये हुए थे। दोनों ब ें पूरी तरह भर गईं। आधे घिंिे में हम लख पुर पौहिं च गए। एक प्राइमरी टकूल िो बिंद कर ढ़दया गगया था, उ में हमें ठहरना था लेककन यह कमरा छोिा था, इ सलए बहुत े िैंि भी लगा ढ़दए गए थे। मैं और िीत ने िैंि में रहना प िंद ककया क्योंकक यह खल ु ी हवा में था। कैंप में आते ही हम

ब घुल समल गए। एक कमरे में हमें

ारा राशन दे ढ़दया गगया।

ारे

लड़कों का भोिन हमने ही बनाना था, स फग एक आदमी स्ि को र ोइया कहते थे हमें दे ढ़दया गगया था। यह आदमी हमें स फग इिंटिक्शन ही दे ता था लेककन बनाना हम ने ही था। हम

भी भख ू े थे, उ

वक्त तीन चार ब्िे होंगे। एक भट्िी पहले ही बनाई हुई थी। हम को कहा गगया कक एक व्िोह में पानी भर कर लाया िाए। व्िोह एक पीतल का बहुत बड़ा घड़े िै ा बतगन होता था। मैं और िीत व्िोह िो एक बड़े रट े

े एक बड़ी लकड़ी

े बाूँधा

हुआ था, लकड़ी के एक स रे को मैंने अपने किंधे पर रखा और द ू रे स रे को िीत ने अपने किंधे पर रखा और व्िोह ले कर कुएिं की तरफ चल ढ़दए िो नज़दीक ही था। कुएिं े बलिोह को पानी

े भर कर हम वाप

आ गए और व्िोह को भट्िी पर रख ढ़दया, इ

पानी

हमने चाय बनानी थी। िीत एक ऐ ा लड़का था िो हमेशा हर काम में आगे होता था। िीत ने व्िोह में खिंड और

चाय पिी डाल दी। एक बा्िी दध ू की नज़दीक रखी हुई थी। िब पानी खूब उबल चक् ु का तो िीत ने दध ू की बा्िी भी डाल दी। चाय तैयार हो चक् ु की थी। टिोर े हमें डबल रोिीआिं लाने को कहा गगया। कैंप के पीतल का ग्ला शुरू हो गईं और

ारे लड़के एक गोल दायरे में बैठ गए। हर एक को एक एक

ढ़दया गगया और दो दो छोिी छोिी डबल रोिीआिं स्िन को बिंद कहते थे दे नी ाथ ही पीछे पीछे दो लड़के ग्ला ों में चाय डालने लगे। ग्ला ों में चाय

डालते ही ग्ला

बहुत गरम हो गए, इ सलए भी ने ग्ला नीचे ज़मीन पर ही रख ढ़दए। भी ने डबल रोिीआिं खाई और रि रि के चाय पी क्योंकक चाय बहुत बन गई थी। इ के बाद भी ने अपने अपने ग्ला मट्िी े ाफ़ ककये। यहािं मैं यह भी सलखना चाहूिंगा कक उ मय

ारे बतगन पीतल

े बने ही होते थे, टिील का इटतेमाल तो बहुत दे र बाद शुरू हुआ, थासलआिं कािं ी की होती थीिं, छोिे े लेकर बड़े बड़े बतगन पीतल े बने ही होते थे। यह हमारा कैंप में पहला खाना था। िब हम ने चाय पी ली तो हम को

स्ब्िआिं और प्याज़ कािने को कहा गगया और

एक पीतल की प्रात िो बड़ी थाली िै ी होती थी, उ गगया। एक िोकरे में आलू थे और द ू रे में बैंगन।

ाथ ही

में गें हूूँ का आिा गूिंधने को कहा ब्िीआिं कािने के सलए बहुत े चाक़ू

पहले ही रखे हुए थे। कुछ लड़के ब्िीआिं और प्याज़ कािने लगे। मैं और िीत ने आिा गूँध ू ना शरू ु कर ढ़दया। आिा गिंध ू ते हुए हम हिं रहे थे। कफर र ोइये ने एक बड़ी कड़ाही में


प्याज़ और घी डाल कर कड़ाही को भट्िी पर रख ढ़दया और नीचे भट्िी में लकड़ीआिं डाल दीिं। कुछ ही दे र में भून गए थे।

ब्िीआिं काि ली गईं थी और िब तक प्याज़ अधरक और ल ुन बगैरा

ारे म ाले और

स्ब्ज़ओिं को समक्

ब्िीआिं कड़ाही में डाल दी गई थीिं। एक बहुत बड़े खरु पे े भी करने लगे। िब ब्ज़ी बन गई तो कड़ाही को भट्िी े उतार कर

एक बड़ी तवी रख दी गई और रोिीआिं बनाने लगे। रोिीआिं बनाते वकत थे क्योंकक रोिीआिं बन नहीिं रही थी। र ोइया

भी बहुत हिं रहे ब कुछ बता रहा था लेककन कभी पिंिाब का

नक्शा बन िाता, कभी इिंडडया का। कई रोिीआिं िल गई थीिं लेककन आखर में हमें कुछ कुछ आईडीआ होने लग गगया था।

एक िोकरा रोढ़िओिं का भर गगया था. अूँधेरा होने को था और दो गै क्योंकक वहािं भी अभी बबिली नहीिं आई थी। गए और रोिीआिं

ब्ज़ी

वग होने लगी।

कर रहे थे। रोिी के बाद कफर

भी लड़के कफर

लैतिनग िला ढ़दए गए

े गोल दायरा बना कर बैठ

भी लड़के रोिीआिं खा रहे थे, हिं

भी ने अपने अपने बतगन

रहे थे और बातें

ाफ़ ककये और हम को ९ बिे एक

बहुत बड़े शासमआने के नीचे इकिर होने को कहा गगया। भी लड़के अपने अपने िैंि में चले गए, अपना ामान दरुटत ककया और एक द ू रे े बातें करने लगे। ठीक ९ बिे हम

शासमआने के नीचे इकठे हो गए। वहािं एक टिे ि लगी हुई थी स्ि पर कुछ कु ीआिं रखी हुई थीिं और एक पोल के ाथ गै लैतिनग लिकाई हुई थी। कैंप के ऑकफ र दो थे, एक राकेश कुमार और द ू रा था िोशी (पूरा नाम मुझे याद नहीिं ). द ू रे ढ़दन चीफ कैंप ऑकफ र और बीडीओ

ाहब आये थे स्ितहोंने राकेश कुमार और िोशी िी को बहुत

ी इिंटिक्शिंज़ दी थीिं।

नीचे दरीआिं प्वछी हुई थीिं और हम दररओिं पर ुख आ न में बैठ गए। िोशी िी ने छोिा ा लैक्चर ढ़दया और वोह ब कुछ बताया िो हमारा रोज़ का काम होना था। इ के बाद कुछ लड़कों ने गाने गाये और एक घिंिे बाद

भी

ोने के सलए चल पड़े। इ ी तरह हम ने ९ बिे

हर शाम को यहािं आया करना था। बहुत रात तक हम बातें करते रहे और कफर ो गए। ुबह उठ कर भी ििंगल पानी के सलए खेतों को चले गए और कुएिं पर इटनान भी कर

आये। अब कफर हम ने खाने के सलए कुछ बनाना था। चाय के सलए पानी का व्िोह रख

ढ़दया गगया और पराठे बनाने को कहा गगया। दो लड़कों ने आिा गूँध ू ा। र ोइया िो बता रहा था हम उ ी तरह कर रहे थे। पराठों पर घी लगाने के सलए हमने एक नया आइडडआ ढूतढ सलया था, एक दो फ़ीि लिंबी

ोिी के स रे पर हम ने एक कपडा बाूँध कर िश

ा बना सलया

था स्ि

े पराठों को घी लगाना बहुत आ ान हो गगया था। पहले कुछ कठनाई के बाद हमारा काम चालू हो गगया। िब पराठों का िोकरा भर गगया तो भी लड़के आम के आचार और चाय के

ाथ पराठे खाने लगे। खा रहे थे और वाह वाह करके हिं

मज़ा था इन

ब बातों में , यह बताना मस्ु श्कल है ।

भी रहे थे। ककतना


ुबह का खाना खा कर हमें अपने अपने िोकरे और फावड़े उठाने को कहा गगया। यह

कर हम उ

ओर चल पड़े यहािं

ऑकफ र और बीड़ीओ

ब ले

ड़क बननी शुरू होनी थी। कुछ अफ र, चीफ कैंप

ाहब, गाूँव की पिंचायत और एक पिवारी पहले

े ही वहािं खड़े थे।

गाूँव के लोग भी अपने अपने फावड़े और िोकरे ले कर आये हुए थे। स्िन कक ानों की ज़मीन थी वोह भी खड़े थे, वोह झगड़ रहे थे लेककन हमें इ े कोई रोकार नहीिं था। पिवारी ने ननशान लगाए और पहले गाूँव वालों ने काम शुरू ककया। कफर हमें दो-दो को अपने अपने ढ़हट े का एररआ अलाि ककया गगया स्ि और िोकरे में डाल कर अपने

ाथी के

में

े हम ने फावडे

र पर रखनी थी और उ

ने

े मट्िी उखाड़ कर

ड़क पर डालनी थी।

अब यह काम शरू ु हो गगया। ज़्यादा तर गाूँव के लड़के ही थे और यह काम उन के सलए कोई नया नहीिं था. िै े िै े काम होता िाता, गमी भी बिती िाती और हम प ीने

े भीग

रहे थे। तकरीबन एक बिे हम को खत्म करने को कहा गगया और हम नहाने के सलए कुएिं पर चले गए। नहा कर हम वाप

कैंप में आ गए और ताश खेलने लगे, कोई पड़ने लगा,

भी म रूफ हो गए। कैम्प ऑकफ िग ने अब हमें िाइम िे बल बना कर ढ़दया, स्ि रोज़ पािंच लड़कों ने स फग खाना ही बनाना था और

ड़क पर काम नहीिं करना था। इ

बाद द ू रे ढ़दन द ू रे पािंच लड़कों ने खाना बनाना था। हर रोज़ बा्िीआिं ले कर गाूँव में िाया करना था और लोगों के घरों करना था। पहले ढ़दन हमें कुछ अिीब

के

ुबह को पािंच लड़कों ने

े दध ू और लट ी ले कर आया

ा लगा लेककन िब हम कक ी घर के दरवाज़े पर

खड़े होते तो इटत्रीआिं खद ु ही दध ू और लट ी के ग्ला इ

में हर

भर के हमारी बालिीओिं में डाल दे तीिं।

तरह हम घर घर िाते और बा्िीआिं भरा कर हम कैम्प में ले आते। स्िन पािंच लड़कों

की ड्यूिी खाना बनाने की होती थी वोह िी भर के भी खाते रहते। ककतना आनिंद था इ चलता…

ारा ढ़दन दध ू पीते रहते और बबटकुि

कैंप में , अभी तक भूला नहीिं।


मेरी कहानी – 49 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 06, 2015

कुछ ही ढ़दनों में कैंप में हम ऐ े रहने लगे थे िै े बहुत दे र े यहािं रह रहे हों। राकेश कुमार और िोशी िी कहीिं टकूल में अगधयापक ही थे और उन की ड्यूिी यहािं कैंप में लड़कों को ऑगेनाइि और उन की दे ख भाल करने के सलए ही थी और उन को इ समलने थे। आट्ग

भी लड़कों के नाम अब मुझे भूल गए हैं लेककन एक ही लड़का िो फगवारे के

कालि का था उ

रहता है , उ

का नाम भी इ ी सलए याद है क्योंकक वोह यहािं ही कुछ दरू ी पर

का नाम है हर बबला

थे। अब एक दोटत के िररए मुझे उ

और कुछ

ाल हुए हम रोज़ाना लाइिेरी में समलते रहते का पता चलता रहता है कक अब वोह भी इतना ठीक

नहीिं रहता,घि ु नों में ददग और ढ़दल की बीमारी उ बीडीओ

काम के पै े

को परे शान करती है । कक ी कक ी ढ़दन

ाहब और चीफ कैंप ऑकफ र भी आते रहते थे। बीडीओ

ाहब ऊिंचे लम्बे तगड़े

रदार िी थे लेककन वोह बात बात पे अिंग्रेिी बोलते रहते थे। चीफ कैंप ऑकफ र ककया करता था हमें मालम ू नहीिं लेककन बीडी ओ उ

को नीचे रखते थे और अपना रोअब झाड़ते

रहते थे,ककओिं ?यह हमें पता नहीिं और एक दफा तो बीडीओ ने उ और वोह प्वचारा झेंप

को गाली भी ननकाली थी

ा गगया था। हम बीडीओ को मन ही मन में नफरत करने लगे थे।

िोशी और राकेश कुमार दोटतों की तरह हमारे करता था। िीत और राकेश की आप राकेश ने हमें एक िोक

ुनाई थी िो कुछ इ

शौचालय एक ही था और उ शौचालय

ाथ रहते थे। राकेश तो बहुत िोक ुनाया में हिं ी की बातें बहुत हुआ करती थे। एक दफा

तरह थी,” एक मेले में बहुत लोग थे लेककन में िाने के सलए लम्बी लाइन लगी हुई थी लेककन िो भी

े बाहर ननकलता वोह हूँ ता हूँ ता ही बाहर आता था। आखर में मैं भी अिंदर

गगया तो

ामने दीवार पर सलखा हुआ था”तुम्हारी ककटमत का स तारा चमकने वाला है और यह िानने के सलए ारा पड़ो”, दीवार पर सलखा था कक एक लािरी का ढ़िकि खरीदो और कफर

ारी दीवार पर सलखा मैंने पड़ा िो काफी ढ़दलचटप था, आखर में सलखा था,कहाूँ

ढ़िकि खरीदना है यह अपनी दाईं ओर पड़ो। मैंने

ारा पड़ा और आखर में सलखा था, ककतने

का ढ़िकि खरीदना है यह िानने के सलए अपनी बाईं ओर सलखा हुआ पड़ो। मैंने बाईं ओर दीवार पर सलखा हुआ पड़ा। आखर में सलखा था,यह लािरी कब ननकलेगी,यह िानने के सलए

पीछे की ओर दे खो” यूिं ही मैंने पीछे की ओर दे खा,सलखा था,”कै े बेवकूफ हो तुम,बाहर इतने लोग इिंतज़ार कर रहे है और तुम यहािं पिाई कर रहे हो”. मैं भी हूँ ता हूँ ता बाहर आ

गगया। राकेश कुछ वर्षों बाद िब मैं कालि में था हमारे ही गाूँव के टकूल में िािं फर हो कर आ गगया। स्ि ही था।

कमरे में वोह ककराए पर रहता था वोह हमारे घर

े पािंच समनि की दरू ी पर


एक ढ़दन मैं राकेश को समलने चला गगया। पहले मेरी नज़र दीवार पर पड़ी,वहािं दो फ्रेम की हुई फोिो थी,एक में एक खब ू ूरत ाड़ी में राकेश की ही उम्र की एक इटत्री की फोिो थी स्ि के नीचे सलखा हुआ था,” तुम चले गए और मेरी दनु नआ में अिंधेर हो गगया” और द ु री में मेरी उम्र की ही एक लड़की की फोिो थी स्ि को दे ख कर मैं बहुत है रान हुआ क्योंकक वोह हमारे ही कालि में पड़ती थी और एक क्ला तो आगे थी ही लेककन इ

हम

े आगे थी। यह लड़की

भी लड़के डरा करते थे क्योंकक वोह कक ी

पोट्ग

में

े भी झगड़

पड़ती थी और इ ी सलए पीठ पीछे लड़कों ने इ वक्त टिोव पर

ब्ज़ी बना रहा था और पा

का नाम ढ़हिलर रखा हुआ था। राकेश उ ही उ का पािंच शै ाल का बेिा बैठा था।

राकेश मझ ु े दे ख कर बहुत खश ु हुआ और हम कैंप की बातें करने लगे। राकेश अपने बेिे े भी हिं हिं कर बात ककये िा रहा था और उ को हिं ा रहा था। बहुत दे र तक हम बातें करते रहे आखर में मैंने उन फोिो के बारे में पछ ू ही सलया। ढ़हिलर वाली फोिो मझ तो गगया ही था क्योंकक फोिो में लड़की की शकल राकेश

े तो मैं

े समलती थी। राकेश

बोला,”यह मेरी बहन है ,शायद तुम ने इ े कालि में दे खा ही होगा और यह मेरी बीवी थी िो अब इ

दनु नआ में नहीिं है ”। राकेश कुछ

नहीिं था कक उन

िंिीदा हो गगया था और मुझ में भी इतना हौ ला

े पूछूूँ कक ककया हुआ था। कुछ ही समनिों में राकेश ने अच्चानक बात बदल दी और कैंप की बातें करने लगा। कुछ दे र और वहािं बैठ कर मैं आ गगया लेककन वोह फोिो,उ

का बेिा, उन का छोिा

याद आ िाती है । इ

ा कमरा और टिोव पर

ब्ज़ी बनाते राकेश की कभी कभी

के बाद भी हम समलते रहे और राकेश की याद का मनका मेरी यादों

की माला में मौिूद है । एक ढ़दन मैं और िीत ििंगल पानी के सलए बाहर गतने के खेतों की ओर गए,कुछ मूड अच्छा था और हम गाने लगे। पीछे

े राकेश आ गगया और आते ही बोला,” यार तुम दोनों तो

बहुत अच्छा गाते हो, रात को दीवान में क्यों नहीिं गाते ?. ब उ ी शाम े हम ने ९ बिे के प्रोग्राम में गाना शुरू कर ढ़दया। हम ने हारमोननयम के सलए राकेश को कहा तो द ू रे ही ढ़दन गाूँव के गुरदआ ु रे

े हमारे सलया वािा और ढोलक भी आ गए। अब तो हर रात रौनक

बिने लगी। कैंप में दो गै कक ी

लैतिनग थे और एक ढ़दन दोनों खराब हो गए। अूँधेरा हो गगया।

े कुछ नहीिं बन पाया तो िीत कोसशश करने लगा। िीत शुरू

माइिंडड े रहा है । आधे घिंिे में िीत ने दोनों गै पड़ गगया िीत गै

वाला। अब रोज़ िीत ही गै

ठीक कर ढ़दए। उ

े ही मकैननकल

ढ़दन

े िीत का नाम

लैतिनग को िगाता और कुछ नुक्

हो तो

उ ी वक्त ठीक कर दे ता। िीत के प्पता िी पूरन स हिं बहुत ही धािंसमक प्वचारों के थे और हर िंक्रािंत को गुरदआ ु रे में कीतगन ककया करते थे और िीत ाथ में ढोलक बिाया करता था और गाता भी था। िीत को बहुत े धासमगक गीत आते थे। एक रात को िब हमारा प्रोग्राम शरू ु हुआ तो िीत ने बहुत े धासमगक गीत गाये। लड़के िमाईआिं लेने लगे,एक तो बोल ही उठा,” गै

वाले भाई ! यह कोई गरु दआ ु रा नहीिं है ,कोई म ालेदार गीत

न ु ा”. िीत ने कोई


गुट ा नहीिं ककया और एक और गीत गाने लगा िो मुझे याद तो नहीिं लेककन कुछ कुछ शुरू के बोल याद हैं िो इ

तरह पिंिाबी में थे,” आ नी कुड़ीए शहर दीए तैनू प्पिंड दी कुड़ी

ढ़दखावािं, ककताबािं चकदी दीआिं,तेरीआिं थक िािंण बाहाूँ,आ नी कुड़ीए शहर ढ़दए,तैनू प्पिंड दी कुड़ी ढ़दखावािं”. गाना खत्म होते ही इतनी तासलआिं और

ीिीआिं बिीिं कक

िोशी िी आ कर बोले,” बई िीत तुम तो छुपे रुटतम ननकले”. ड़क का काम तेज़ी

े आगे बड़ रहा था। तकरीबन १५ फ़ीि चौड़ी

दे ख हम भी खश ु होते। कुछ ही ढ़दनों में एक मील और अफ रों की बह

भी खश ु हो गए।

ड़क थी। अब तो दे ख

ड़क बन गई लेककन कभी कभी कक ानों

हो िाती लेककन हम अपने काम में म रूफ रहते। एक ढ़दन िब हम

ने काम खत्म ककया तो

भी प ीने

नज़दीक ही एक कूँु आ था।

े भीगे हुए थे क्योंकक उ ढ़दन गमी बहुत थी। भी ने नहाने का प्रोग्राम बना सलया। पहले तो हम ने धक्का

लगा कर किंू एिं को चलाया और उ

पानी

के बीच िा कर नहाने का प्रोग्राम बनाया,इ

भी नहाने लगे। कफर हम कुछ लड़कों ने कुएिं

में िोशी भी

ाथ था। पानी वाली ढ़ििंडों की चेन

को पकड़ कर हम किंू एिं में उिर गए और तैरने लगे। किंू एिं के बीच पानी में तैरना बहुत आ ान है ,स फग िाने का एक भय ही है । यूूँ तो किंू एिं का पानी द पिंद्ािं फ़ीि गहरा होता है लेककन यह पानी ऊपर को प्रैशर डालता है ,इ

सलए ज़्यादा िोर नहीिं लगाना पड़ता। हम ने

बहुत मज़े ककये। नहा कर हम वाप कैंप में आ गए और बहुत े लड़के दरसतों के नीचे चारपाईआिं रख कर लेि गए और कुछ ताश खेलने लगे। कभी कभी कोई डाक्िर भी कैंप में आता था और

स्ब्ज़ओिं के बारे में बता कर िाता था। डाक्िर ने हफ्ते में एक दफा करे ले की

ब्ज़ी बनाने को कह ढ़दया। ऐक ढ़दन करे ले का िोकरा आ गगया लेककन र ोइआ अब चले गगया था और हम ही खाना बनाने लगे थे। करे ले की थी। हम ने और

ब्ज़ी अभी तक कक ी ने नहीिं बनाई

स्ब्ज़ओिं की तरह ही करे लों को काि कर

इतनी कड़वी बनी कक कक ी

ब्ज़ी बना दी। िब बनी तो

े खा नहीिं हो रही थी। हम को चाय बनानी पडी और उ ी के

ाथ ही रोिी खाई। ड़क काफी दरू तक बन गई थी लेककन एक ढ़दन हम को कहा गगया कक आगे का ढ़हट ा

छोड़ कर हम को फगवारे की

ड़क

े शुरू करके लख पुर की ओर बनानी शुरू करनी होगी

क्योंकक यह ढ़हट ा कुछ ज़्यादा ही प्ववाढ़दक था। हम अपने फावड़े और िोकरे उठा कर

फगवारे की ओर चल पड़े। वहािं पौहिं चने के सलए हमें एक घिंिा लग गगया लेककन यहािं शुरू

करना था वहािं मक्की का खेत था। मक्की बहुत बड़ी हो चक् ु की थी। िब हमारे िोशी िी और राकेश ने हमें शुरू करने को कहा तो आगे े कक ान आ गए और गासलआिं दे ने लगे। झगड़ा शरू ु हो गगया। िोशी उन को कहने लगा,” हमें िो ऑडगर समले हैं हम ने तो करना ही है लेककन अगर तम ु ने हमारे कैम्परज़ को हाथ लगाया तो हमें पसु ल

बल ु ानी पड़ेगी”. इ

के

बाद कोई और ऊिंचा तगड़ा आदमी आया और बोला,” एक महीने में फ ल तैयार होने वाली है


और तुम यह कत्लेआम कर रहे हो,ककतनी बेइिं ाफी है यह”. िोशी और राकेश भी धीमें टवर में बोलने लगे,” रदार िी ! यह तो हमें भी मालूम है लेककन हम भी क्या करें ,हमें ऊपर आडगर हैं”. इ

के बाद

भी कक ान उदा

कर ढ़दया। पता ही नहीिं चला कक कब बी ढ़दन

चले गए और हम ने अपना काम शुरू

ढ़दन हो गए और द ू रे ढ़दन हमारा आख़री ढ़दन था और उ

ढ़दन हम ने कोई काम नहीिं करना था। बैठे। उ

हुए वाप

ब ु ह का नाटता करके

बी शासमआने के नीचे आ

भी अफ र आये हुए थे और लाऊड टपीकर भी रखा गगया था। लैक्चर तो मझ ु े याद नहीिं लेककन हम कुछ लड़कों को कुछ प्राइज़ ढ़दए गए। प्राइज़ छोिे छोिे थे और

मझ ु े भी स्ज़िंदगी में पहली दफा प्राइज़ समला लेककन यह एक हौ ला अफ़ज़ाई ही थी। बीडीओ ने हम

ब का धतयवाद ककया और एक एक करके

िीकफकेि ढ़दए गए और तासलआिं बिती रही। यह

भी कैम्परज़ को भारत

माि

ेवक

ढ़िग कफकेि अब भी मेरी फ़ाइल में है और

िब कभी इ े दे खता हूूँ तो पुरानी याद ताज़ा हो िाती है । आखर में हम

ब को पािंच पािंच

हम

े लख पुर तक का

लड्डू ढ़दए गए। कफर राकेश ने एक ब्लैक बोडग पर अिंग्रेिी में एक ऍस्प्लकेशन सलखी स्ि ब वाप

ब ने कापी करके के राकेश को पकड़ा दी। यह ऐस्प्लकेशन फगवारे

का ककराया था। इ

के बाद हम को िाने आने का ककराया दे ढ़दया गगया और हम

चल पड़े।

िब हम घर आये तो हमारा िी नहीिं लगता था,पता नहीिं ककया सम ढ़दन उदा चलता…

हो गगया था। बहुत रहे लेककन कब तक ? आखर तो हम ने अ सलयत में आना ही था।

को


मेरी कहानी – 50 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 10, 2015 कैंप

े वाप

आ कर हम ने कफर

अच्छा लगता था क्योंकक गाूँव

े टकूल िाना शुरू कर ढ़दया। फगवारे िाना हमें बहुत े आ कर हम एक दम एक नई दनु नआ में आ िाते थे। आि

बच्चों को तरह तरह के खाने समलते हैं लेककन कफर भी बताना चाहते हैं तो वोह हाूँ, यह बात तो उन की खाते थे। टकूल िाने

ुनना भी नहीिं चाहते और कह दे ते हैं,डैड”आप का ज़माना और था”. ही है लेककन मुझे तो सलखना ही चाढ़हए कक उ

े पहले हमारा िेकफाटि होता था दही के

ा माखन और एक बड़ा ग्ला

पे भी ढे र

और एक बड़ा

िंतुष्ि नहीिं होते,अगर हम उन को

ा माखन।

वक्त हम क्या

ाथ पराठे और

लट ी का, या कभी कभी मक्की की रोिीआिं और

ाथ ले िाने के सलए भी पराठे और

ा प्याज़। चारों दोटत घर

ाथ में ढे र ाग और

ाथ में आम का आचार

े इकठे चल पड़ते और इतनी बातें करते और

हूँ ते रहते कक याद करके ही मज़ा आता है । राणी परु

े चल कर िब बानग गाूँव आते तो

ड़क पर एक घर आता था िो कक ी अमरीका या कैनेडा के ऐन आर आई का था। इ

के आगे एक बड़ा खेत था स्ि

घर

े लदे हुए होते थे। िब वोह पक िाते थे तो उन का रिं ग पीला हो िाता था। बहुत दफा िब हम टकूल े वाप आते तो एक आदमी िो कुछ बज़ग े हम पपीता मािंग लेते िो वोह ु ग होता था उ ख़श ु ी

में पपीते के छोिे छोिे बक्ष ृ होते थे िो पपीतों

े दे दे ता। हम वहीीँ खेत में बैठे बैठे खाने लगते और उ

े बातें भी करते

रहते। कई

ाल हम यहािं

बी

वर्षग की बात होगी,मैं ताूँगे में बैठा फगवारे को िा रहा था,िब उ ी िगह आया

पची

े पपीते खाते रहे ।

बज़ुगग

यहािं पपीते के बक्ष ृ हुआ करते थे तो दे खा,अब उ िगह पर कुछ नहीिं था। मेरे मुिंह े ननकल गगया,कोई मय था,िब हम यहािं पपीते खाया करते थे। गहरा ािं ले कर तािंगे में बैठी एक बुड़ीआ बोली,”वे वीरा ! अब वोह लोग ही नहीिं रहे , बिंदों के है ,बिंदे अपने

ाथ ही रौनक ले गए”. वक्त कै े बदल िाता है ,अब इ

ाथ ही रौनक होती िगह छोिा

ा ब

अड्डा है और पपीतों की िगह पर बड़े बड़े मकान बन गए हैं। बानग के आगे आता था प्लाही, यहािं दो चार बहुत छोिी छोिी दक ु ानें होती थी और ाथ ही एक दाने भूनने वाली बुड़ीआ की भट्िी होती थी और उ के पीछे होता था एक बहुत बड़ा एक गतदा तालाब।

ाथ में ही एक

ाइकल वाले की दक ू ान होती थी स्ि

ाइकल ररपेअर कराने या पिंचर लगाने के सलए आते रहते थे,इ समिंदर स हिं था। इ

में लोग अक् र

दक ू ान के मालक का नाम

समिंदर स हिं पर हम बहुत हिं ा करते थे। यह शस पािंच फ़ीि दो या तीन इिंच था और हमेशा ही गुट े के मूड में होता था,कुछ ना कुछ बोलता रहता। दक ू ान के बाहर एक बड़ा

ाइकल में हवा भरने के सलए पिंप रखा होता था। लोग आते और अपने


अपने

ाइकल के िायर में हवा डालते। समिंदर स हिं अक् र बोलता रहता,” दे खो िी, अगर मैं

हवा भरने के पै े लूँ ू तो कफर इन लोगों को समचग लगेगी, िो आता है हवा भरके चला िाता है ,काम कोई करवाता नहीिं,पिंप की वाशर मुझे आये ढ़दन बदलनी पड़ती है ”. दक ू ान िा कर हम खब ू हूँ ते और समिंदर स हिं की सममक्री करते। समिंदर स हिं की दक ू ान के

ामने

े कुछ दरू

ड़क की द ु री ओर खेत होते थे। एक ढ़दन वहािं खेत में

कुछ इटत्रीआिं और लड़ककआिं बैठ कर कािी हुई मक्की के िाूँिों े छसलआिं तोड़ तोड़ कर ामने फैंक रही थी। उन के ामने छसलओिं का ढे र लगा हुआ था। पीली पीली ख ू ी हुई छलीआिं बहुत अच्छी लग रही थीिं। हमारा मन मक्की के भन ू े दाने चबने को हो आया लेककन उन इटत्रीओिं को कहें कै े, मािंगें कै े यह एक बड़ा

वाल था। बहुत दे र तक तू िाह,तू िाह एक द ू रे को कहते रहे लेककन हौ ला नहीिं पड़ता था। कफर िीत बोला,”ओए तम ब डरपोक ु हो,मैं िाता हूूँ”. खेत की तरफ िाते हुए िीत को हम दे ख रहे थे कक ककया करता है । िीत वहािं पौहिं चा और िाते ही हाथ िोड़ कर उ ने एक बुड़ीआ को त स री अकाल बोला और

कफर कहने लगा,माता िी, हमें भूख बहुत लगी है ,कुछ छसलआिं समल कती हैं ?। वोह बुड़ीआ बोली,बेिा स्ितनी चाढ़हए उतनी उठा लो। िीत ने पािंच छसलआिं उठाई और ले आया और आते ही हम को बोला,”तुम

ब तो डरपोक हो,दे खा मैं ले आया हूूँ”. हम ने छसलओिं

े दाने इलग्ग

ककये और दाने ले कर बुड़ीआ की भट्िी पर ले गए। हम

ब ने भूने हुए दाने अपने अपने ाइकल की िोकरीओिं में रख सलए और खाते खाते राणी पुर आ गए।

यह समिंदर स हिं की दक ू ान हमारा भी एक कक म का अड्डा ही होता था। समिंदर स हिं ने कुछ मठाई भी रखी हुई होती थी िो छोिी छोिी पीपीओिं में रखी होती थी स्िन के ामने वाला ढ़हट ा शीशे का होता था और इन में े मठाई ढ़दखती थी, स्ि को दे ख कर खाने को मन होने लगता था। एक ढ़दन िब हम टकूल

े आ रहे थे तो हुसशआर पुर रोड े उिर कर िब नहर के राटते पर आये तो बूिंदा बािंदी होने लगी। क्योंकक बारशों के ढ़दन यह राटता बहुत खराब हो िाता था और

ाइकल चलाना कढ़ठन हो िाता था,इ

चलाने लगे। दो लड़कीआिं अपने

सलए हम

ाइकल तेि तेि

रों पर शायद रोिीआिं होंगी ले कर द ु री ओर प्लाही

े आ

रही थीिं। यों ही नहर का राटता खत्म हुआ हम ने चैन की ािं ली। इतने में िोर े बबिली इतनी कड़की कक हम काूँप गए और ि्दी ि्दी समिंदर स हिं की दक ू ान में आ गए। मू लाधार बारश हो रही थी। कुछ और लोग भी बैठे थे कुछ ही दे र बाद वोह ही लड़ककआिं िोर िोर

े रोती हुई आ रही थीिं। समिंदर स हिं ने उन े रोने का कारण पुछा तो वो रो रो कर बताने लगीिं कक बबिली कड़कने े उन के दो भाई इ दनु नआ े चले गए। हम ुन कर है रान और

त ु न हो गए क्योंकक हम तो अभी अभी वहािं

े आये थे और हम ने कुछ लोगों

को खेतों में काम करते हुए दे खा था। वोह लड़ककआिं रोती हुईं अपने घर की तरफ चली गईं।


भी लोग बैठे उन लोगों की बातें कर रहे थे क्योंकक गाूँव में रहते हुए वोह उन को िानते थे। घबराए हुए हम भी िाने के सलए तैयार हो गए। एक बात और भी मैं सलखना चाहूिंगा कक समिंदर स हिं की दक ू ान पर दो लड़ककआिं भी कभी कभी आया करती थीिं िो कहीिं कक ी प्राइमरी टकूल में अगधआपका लगी हुई थी। िब उतहोंने अपने

ाइकलों में हवा भरणी होती तो कक ी ऐ े शस

अच्छा हो। इ

े मझ ु े एक बात याद आती है कक उ

को कहतीिं िो उन के खखयाल

ज़माने में गाूँव की लड़ककओिं को

ककतनी मस्ु श्कल पेश आती थी। आि तो लड़ककआिं बहुत आगे िा चक् मय ु की हैं लेककन उ तो कोई कोई लड़की ही िे बी का कोेे ग करके प्राइमरी टकूल में अगधआपका लगती थी। उ वक्त लड़ककओिं का अगधआपका होना अच्छा भी नहीिं

मझा िाता था। अभी कुछ वर्षग पहले

ही तो गाूँव की लड़ककआिं टकूल भी नहीिं िाती थीिं। पहली दफा हमारी क्ला

में ही चार

लड़ककआिं पड़ती थीिं। अक् र लोग उन अगधआपका लड़ककओिं पर लािंछन लगाते रहते थे कक इन लड़ककओिं का चालचलन ठीक नहीिं था। लेककन यह स फग खु र फु र ही होती थी और कक ी में हौ ला नहीिं होता था कक कक ी लड़की को कुछ कह

कें। लोग प्पछड़े हुए िरूर थे लेककन लड़ककआिं कहीिं भी िाएूँ महफूज़ थीिं। आि िो हो रहा है ,उ की बात करके ही शमग आती है कक इ

े तो उ

ज़माने के कम पिे लोग ही अच्छे थे।

आि प्लाही गाूँव बहुत त ु दर गाूँव है । यहािं समिंदर स हिं की दक ू ान होती थी वहािं अब बड़ी बड़ी दक ु ाने और बैंक बन गए हैं,भट्िी वाली बुड़ीआ के पीछे तो उ गिंदे तालाब को मट्िी े भर कर एक प्वशाल कालि बना हुआ है . समिंदर स हिं की यहािं दक ू ान होती थी वहािं ही ब है िो बहुत बबज़ी रहता है । चारों तरफ के गाूँवों े ब ें आती हैं। स्ि नहर के ाथ

अड्डा ाथ

हम िाया करते थे वहािं एक हाइवे बना हुआ है िो बहुत बबज़ी है और इ को क्रॉ करने के सलए बहुत दे र तक इिंतज़ार करना पड़ता है लेककन अब हुसशआर पुर रोड को िाने की कोई िरुरत नहीिं क्योंकक यह हाइवे क्रॉ

करके

ीधे ही दो ककलोमीिर पर फगवाड़ा आ िाता है ।

उन ढ़दनों में फगवाड़ा बहुत अच्छा होता था। बेशक आि बड़े बड़े रै टिोरैंि बन गए हैं,बड़े बड़े बैंक बन गए हैं लेककन उ मय िीिी के दोनों ओर बहुत खल ु ी िगह होती थी। शूगर समल स्ि

का नाम उ

वक्त िगतिीत शूगर समल होता था (इ

वक्त इ

का मालक कोई और

है ) के आगे िीिी रोड तक बबलकुल खल ु ा होता था और यहािं कुछ लोग मिमें लगाया करते थे और गतने

े लदे हुए छकड़े भी खड़े होते थे। कारें तो बहुत कम ढ़दखाई दे ती थी, स फग िक और ब ें ही ज़्यादा होती थी। आगे िा कर पैराडाइज़ स ननमा होता था स्ि में बहुत रौनक होती थी, अब यहािं दक ु ानें बनी हुई हैं और कुछ ाल पहले िब भी कभी मैं इन दक ु ानों को दे खता तो ऐ ा लगता था कक इन दक ु ानों ने उ शग ू र समल था और

े आगे िीिी रोड पर चौक होता था स्ि

पर उ

िंद ु रता को बबागद कर ढ़दया है । मय ब

अड्डा हुआ करता ड़क के एक तरफ ड्राइवरों के लेिने और आराम करने के सलए छै ात फ़ीि चौड़ा


और आठ नौ फ़ीि लम्बा मिंिा (चारपाई ) होता था स्ि पैराडाइज़ स नीमे के द ु री ओर अच्छा ब िीिी रोड को क्रॉ

पर ड्राइवर लेिे हुए होते थे (अब तो टिे शन बन गगया है ). इ परु ाने ब अड्डे े

करती हुई एक ड़क फगवारे िाऊन को िाती है स्ि पर बने प्रभात होिल में हम कभी कभी खाना खाया करते थे और यह ड़क द ू री ओर रे लवे टिे शन को िाती है स्ि

के बाईं ओर पर

ेंिल बैंक के बबलकुल

ेंिल बैंक होता था (हो

कता है अब भी हो ), और इ

ामने होता था लछू का ढाबा। यह

ब िो मैंने सलखा है उ

का

मक द स फग लछू के ढाबे के बारे में सलखना ही है । यिंू तो हम घर

े पराठे ले कर आते थे लेककन कभी कभी हम कक ी ढाबे पे भी खा सलया

करते थे और पराठे वाप

ले िाते थे। फगवारे में उ

वक्त कोई रै टिोरैंि नहीिं होता था स फग

ढाबे ही हुआ करते थे स्ि में प्रभात होिल ही अच्छा था लेककन आि के टिै ण्डडग े तो यह एक छोिा ा ढाबा ही था। शहर में एक होता था खराएती का ढाबा स्ि की एक िािंग किी हुई थी और एक लाठी के हारे चलता था, द ू रा था पहलवान का ढाबा िो बहुत तगड़ा भारी पहलवान था, ती रा था हढ़दयाबाद रोड पर फौिी का ढाबा और चौथा था रे लवे रोड पर लछू का ढाबा। िी हाूँ,इ पैंताली

वर्षग का शस

ढाबे था स्ि

े िुड़ी बहुत ी यादें हैं। लछू एक ािंवले रिं ग का चाली की पगड़ी बबलकुल ढीली ी, ाधारण कमीि और लुिंगी

पहनता था। ढाबे की िगह होगी कोई तकरीबन पिंद्ा

ोलह फ़ीि लम्बी और बारह तरह फ़ीि

चौड़ी लेककन खाने बनाने वाली भट्िी और तिंदरू ढाबे के आगे होता था। लछू की एक पेसशऐसलिी होती थी”उदग की काली दाल और उ

को लगाया तड़का” ब

यह उदग की दाल

ही हम खाने िाते थे और

ाथ में होती थीिं बहुत बड़ी बड़ी तिंदरू ी रोिीआिं। ऐक दो स्ब्ििीआिं भी होती थीिं लेककन हम स फग उदग की दाल े ही मज़ा लेते थे। यह उदग की दाल

मट्िी के एक बहुत बड़े घड़े में बनाई होती थी। एक दफा पूछने पर लछू ने हमें बताया था कक वोह हर रोि चार बिे उठ कर दाल का घड़ा भट्िी पर रख दे ता था िो हलकी आिंच पर पािंच शै घिंिे बनती रहती थी स्ि अधरक और ल ुन भी डाल दे ता था। दाल को तड़का लगाने का उ

में वोह प्याि

का एक अिीब ही ढिं ग

था। िरुरत के मुताबक दाल को वोह एक फ्राई पैन में अच्छी तरह गमग करके पलेि में डालता,कफर एक बड़ी लोहे की कौली में प्याज़ और घी डालता, कफर उ एक लम्बे प्ला

े पकड़ता,स्ि

को

हतनी बोलते थे,और भट्िी में डाल दे ता। िब प्याज़

भून िाता तो कौली को बाहर ननकाल कर उ वाली पलेि में डाल दे ता, स्ि थोह्ड़ा अिीब

कौली को लोहे के

में थोह्ड़ा

ा म ाला डाल कर एक दम दाल

े शूिं शूिं (sizling sound ) की आवाज़ आती। ऊपर

ा हरा धननया डाल दे ता। दाल के ऊपर तैरता हुआ घी म ाला और धननया एक ी खश ु बू छोड़ता स्ि को दे खकर ही मज़ा आ िाता। एक छोिा ा लड़का िो वहािं

काम ककया करता था,हमारे आगे थाली में दाल और दो दो बड़ी बड़ी तिंदरू ी रोिीआिं मेि के


ऊपर रख िाता। इ इ के कुछ

ादे भोिन को खाने का िो मज़ा होता था वोह अभी तक याद है ।

ालों बाद मेरे छोिे भाई भी वहािं िाने लगे थे।

मैढ़िक के इस्म्तहान में दो तीन महीने रह गए थे और यही बैठ कर हम ने फै ला ककया कक प्पछले था,इ

ाल की तरह हम शहर में रहने लगें । क्योंकक बहादर का मकान कराए पर उठ गगया सलए हम ने कमरा कहीिं और ढूिंढने का

ोच सलया। वहीीँ पर एक लड़का बैठा था िो

उ ी वक्त बोल उठा कक कमरा हमें चाना बबस््डिंग में समल वहीीँ बबिली के प्लग बनाता है और हम उ प्रोग्राम बना सलया। एक ढ़दन मैं और भिन इ

कता है और मकान मासलक भी

े पछ ू लें । द ू रे ढ़दन वहािं िाने का हमने

ढाबे में दोनों रोिी खा रहे थे कक अचानक

एक इटत्री ने शोर मचा ढ़दया,” वोह लड़के मेरा प ग ले कर दौड़ गए,उतहें पकड़ों,उ

में मेरा

पा पोिग और ढ़िकि हैं” मैं और भिन उ ी वक्त रे लवे रोड पर दौड़ पड़े और शोर भी मचाने लगे कक उन लड़कों को पकड़ो। कुछ और लड़के भी भागने लगे और उन लड़कों को रे लवे

टिे शन के नज़दीक पकड़ सलया गगया। बहुत लोग इकठे हो गए थे और हम उन लड़कों को पकड़ कर ले आये। वोह इटत्री बहुत परे शान हो रही थी,िब हम ने उ को बताया कक अपना प ग चैक कर लो तो उ

ने दे खा

वोह हमें कुछ पै े दे ने लगी लेककन

ब कुछ

ही

लामत था। उ

की िान में िान आई।

ब ने मना कर ढ़दया। कुछ लोगों ने उन लड़कों को

बहुत पीिा और उन को पुसल टिे शन ले िाने लगे। हम तो नहीिं गए, पता नहीिं वोह लोग उन को ले गए थे या नहीिं हमें नहीिं पता। इ बात े मझ ु े एक सशक्षा समली। वोह यह कक

िब भी हम इिंडडया आते थे, पा पोिग और ढ़िकिों को बहुत िंभाल कर रखते थे क्योंकक गुम हुए पै े तो कफर भी समल िाएिंगे लेककन पा पोिग ढ़िकिें गुम होने े वाप िाना बहुत मुस्श्कल हो

कता है ।

यहािं आने पर पहले कुछ

ाल तो िब भी इिंडडया आते थे लछू के ढाबे पर एक दफा तो

िरूर रोिी खाते थे और उन कभी कभी छोिे भाई

े मुलाकात भी हो िाती लेककन धीरे धीरे हम भूल ही गए।

े िे लीफून पे बात होती थी तो वोह बताया करते थे कक लछू अब बहुत बूिा हो गगया है और ढाबे में ब बैठा रहता है और उ के लड़के ढाबे को चला रहे हैं। इ के बाद कुछ

ाल हुए मेरे छोिे भाई ने मुझे िे लीफून पे बताया था कक लछू अब यह दनु नआ छोड़ चक् ु का है लेककन ढाबा अब उ के लड़के चला रहे हैं िो अब बहुत बड़ीआ चला रहे हैं और पहले

े कहीिं बेहतर है और इ

वोह अब फलों चलता…

िगह बहुत भीड़ रहती है । लछू ने िो पेड़ लगाया था, े भर गगया है । लछू की याद भी मेरी माला का एक मणका है ।


मेरी कहानी – 51 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 13, 2015

लछू के ढाबे में बैठे एक लड़के ने बताया था कक ककराए का कमरा हमें चाना बबस््डिंग में समल

कता है । कुछ ढ़दन बाद हम चाना बबस््डिंग की ओर चल ढ़दए। वै े तो यह बबस््डिंग

हम बाहर

े दे खते ही रहते थे क्योंकक यह बबस््डिंग िीिी रोड पर शूगर समल के

थी लेककन नज़दीक िा कर कभी नहीिं दे खी थी। चाना बबस््डिंग के ऊपर आठ द और नीचे के

ामने ही

चब ु ारे थे

भी कमरों में कोई ना कोई काम चल रहा था। एक बड़े कमरे में बबिली के

टवीच और प्लग बन रहे थे। वहािं एक

रदार िी बहुत ही ाफ़ टमािग कपड़ों में िाली े बिंधी हुई दािी में एक कु ी पर बैठे थे। छोिे छोिे बच्चे कुछ मशीनों पर काम कर रहे थे। हम ने रदार िी को त स री अकाल बोला और अपने आने का मक द बताया कक हमें एक कमरा चाढ़हए था।

रदार िी ने बताया कक अभी तो

भी कमरे ककराए पर थे लेककन

कुछ हफ्ते बाद एक कमरा खाली होने वाला था। िब हम चलने लगे तो

रदार िी कहने

लगे कक रे लवे रोड पर उनके एक दोटत का मकान है , वहािं हमें पछ ू लेना चाढ़हए। उ ी वक्त हम अपने अपने द

ाइकलों पर

वार हो गए और रे लवे रोड की तरफ चल ढ़दए।

समनि में हम वहािं पहुिंच गए और यह मकान हमें रे लवे रोड पर पने र बबस््डिंग के नज़दीक ही समल गगया। यहािं े रे लवे टिे शन दो तीन समनि की दरू ी पर ही है । मकान मालक भी उ बस््क

वक्त वहीीँ था। उ

ने एक कमरा ढ़दखाया। कमरा तो इतना अच्छा नहीिं था

भी कमरे ऐ े ही थे। दीवारों पर बाहर और अिंदर कोई पलटतर नहीिं था। ककराया

बाराह रूपए महीना था और इ

में बबिली का बबल भी शासमल था। पािंच रूपए हम ने

डडपॉस्ज़ि ढ़दए और तीन ढ़दन बाद रप्ववार को आने का कह ढ़दया। इ ाथ नहीिं था। मैं िीत और भिन ने ही आना था। रप्ववार को हम ले आये। पहले हम

ब्ज़ी की दक ू ान पर गए, वहािं

ब्ज़ी बनाई और पराठे बनाये। घी की पीपीआिं घर भी लोग थे लेककन हमारी बात चीत स फग दो लोगों

दफा बहादर हमारे ारा

ामान दो फेरों में

े मिर खरीदे । कमरे में आ कर हम ने े

भी ले आये थे। इ

बबस््डिंग में और

े ही हो पाई, एक तो था एक

पॉसलिै स्क्नक कॉलेि का प्वद्याथी करनैल स हिं और द ू रा था एक बज़ुगग स्ि मुझे याद नहीिं लेककन इ

को फौिी

का नाम तो

ाहब बोलते थे। दािी को कलर करते थे और ढीली

पगड़ी बािंधते थे। यह बहुत ढ़दलचटप इिं ान थे, बात बात पे ऊिंची ऊिंची हूँ ते थे। टकूल हम िाने लगे और खब ू मेहनत करने लगे। फौिी

ाहब बताया करते थे कक कभी वोह

बबर अकाली लहर में शामल थे िो अिंग्रेज़ों के खखलाफ लड़ते थे। रात को थे और ढ़दन को

फर ककया करते

ोया करते थे। अिंग्रेज़ों के चमचों को मारना ही उन का काम होता था।

हमारे गाूँव के पुराने लोगों को वोह बहुत अच्छी तरह िानते थे। फौिी

ाहब कई दफा


भावुक हो िाया करते थे कक इ

बबर अकाली लहर में कई गद्दार भी पैदा हो गए थे

स्ितहोंने लालच वश अपने कई

ागथओिं को पकड़वा ढ़दया था। एक दफा फौिी

ाहब ने एक

कहानी

ुनाई कक पािी को पै े की बहुत िरुरत होती थी और इ के सलए वोह बड़े बड़े ेठों को लूिते थे। एक रात को िब उतहोंने कक ी ेठ के घर डाका डाला तो लूि के दौरान िब ब लोग लूि में मगन थे तो एक

इज़त लूि ली। डाका डाल कर िब बहन, मआ ु फ करना हमें पै ों की आप घबराइये नहीिं, हम

ाथी ने एक कमरे में घु

ब िाने लगे तो पािी का

रदार

ेठ की बहु की े की बहू को बोला,” ठ

सत िरुरत थी लेककन हम आप को कुछ नहीिं कहें गे,

े डरने की कोई िरुरत नहीिं”

सलए बहनों की इ्ित लि ू ते हैं तो यह बहन आप कर बहन की इ्ित”. िब ने उ ी वक्त उ

कर अिंदर बैठी

रदार को

ेठ की बहू बोली,” अगर आप दे श के ब के सलए हास्िर है , लो लि ू लो समल

ारी बात का पता चला कक क्या हुआ था तो आदमी को गोली मार दी।

रदार

कमरे में हम रहना नहीिं चाहते थे क्योंकक एक तो चारपाईओिं में खिमल बहुत होते थे और हम पम्प में फसलि डाल कर टप्रे करते ही रहते थे और कफर भी वोह मरते नहीिं थे और रात को हमें कािते रहते थे और टप्रे की टमैल भी बहुत आती रहती थी, द ू रे वै े भी यहािं गिंद ही गिंद था। चाना बबस््डिंग में हम िाते रहते थे और एक ढ़दन हमें खुशखबरी समल गई कक एक कमरे में िो पिवारी रहता था वोह िा रहा था। हम ने

रदार िी

े बात कर ली,

ककराया था १४ रूपए महीना। कुछ ही ढ़दनों बाद रे लवे रोड के कमरे का ढ़ह ाब करके हम चाना बबस््डिंग में आ गए। इ रहता था, पता चला की उ

दफा बहादर भी हमारे

ाथ आ गगया। स्ि

कमरे में पिवारी

को दमे सशकायत थी और खािं ता रहता था। कमरे में उ

ने

िगह िगह थक ू ा हुआ था। दे खते ही हमें नफरत ी हुई और चाना बबस््डिंग के एक बहुत बड़े आूँगन में बने हुए कुएिं े हम ने पानी की बा्िीआिं लानी शुरू कर दी और ईंिों े कमरे के फशग को रगड़ना शुरू कर ढ़दया। दीवारों को भी खब ू रगड़ा और एक पें ि का डडब्बा ला कर पें ि कर ढ़दया और

रदार को ढ़दखाया।

रदार खुश हो गगया और उ

ने पें ि के पै े दे ने

मान सलए। चारों दोटतों ने फशग पर ही अपने बबटतरे लगा सलए। इ

चाना बबस््डिंग की यादें बहुत हैं, यों तो एक ाल पहले हम बहादर के मकान में भी रहे थे लेककन स्ितने मज़े हम ने इ चाना बबस््डिंग में ककये वोह स्ििंदगी का एक ऐ ा ढ़हट ा है स्ि

को एक् प्लेन नहीिं ककया िा

ाथ और भी कमरे थे और तकरीबन

कता। इ

कमरे िो ऊपर द ू री मिंस्िल पर था के

ाथ

ारे प्वद्याथी थे स वाए एक पिवारी के और यह

पिवारी भी एक रिं गीला ही आदमी था। यह अपनी रोिी एक अिंगीठी पर बनाया करता था। इ

अिंगीठी के बारे में मझ ु े पता नहीिं कक अब भी यह कहीिं इटतेमाल होती है या नहीिं क्योंकक

अब तो गै और इ

ही इटतेमाल ककया िाता है । यह अिंगीठी भी उ

को बरू े वाली अिंगीठी कहते थे। इ

अिंगीठी की ख़ा

वक्त की एक नई इिाद थी

बात यह होती थी कक यह चार


चार पािंच पािंच ढ़दन बुझती नहीिं थी. इ

में ऊपर और

ाइड पर दो ढक्कन होते थे िो खाना

बनाने के बाद बिंद कर ढ़दए िाते थे और िब द ु रे ढ़दन खाना बनाना होता था तो यह ढकन खोल कर उ ी वक्त खाना बना थोडा

कते थे ककओिंकक यह िलती रहती थी। चार पािंच ढ़दन बाद

ा लकड़ी का बुरादा या बूरा (saw dust) इ

कािने की फैक्िी (saw mill ) े बहुत

में डालना पड़ता था। यह बूरा लकड़ीआिं

टते में समल िाता था।

यह पिवारी दो रोिीआिं बनाया करता था लेककन यह रोिीआिं इतनी मोिी होती थीिं कक कमज़क्म तीन रोढ़िओिं का आिा एक रोिी में होता था और िब रोिी बनती थी तो फूल कर फ़ुिबाल िै ी हो िाती थी। बहुत बड़ीआ रोिी होती थी और ब्ज़ी में घी तैरता हुआ होता था। मज़े े खाता और कफर पिवाररओिं के दफ्तर की ओर चले िाता। ब ु ह ब ु ह वोह अख़बार िरूर पिता िो उदग ू का होता था शायद प्रभात या समलाप होता था। उ भी एक अिीब ढिं ग होता था। परू ी खबर शायद ही उ उ

को दे ख

के पिने का

ने कभी पिी हो। िब भी पिता, हम

ुन कर हूँ ते रहते। वोह पिता” गोबबिंद ब्व पिंत कक ानों को समलने के सलए

कक ी गाूँव में गए और उन की गाये भैं ों के

ाथ चारा खाने लगे, नेहरू िी इस्िप्ि के

ना र को समले और ना र ने उतहें खब ू खिूरें खवाईं”. हम पिवारी को दे ख दे ख बहुत हूँ ते। कई दफा तो वोह आधी खबर पि के गाली ननकाल दे ता। स्ितनी दे र हम चाना बबस््डिंग में रहे यह पिवारी चाली

पैंताली

वर्षग का हो कर भी हमारे

अब हमारे कपड़ों में भी फकग आ गगया था। हम बढ़िया शिग स्ि

सलए अपनी पगड़ीआिं एक ललारी

रे लवे रोड के नज़दीक होता था, और उ टिाइल उ

े बढ़िया िाऊज़र पहनते, हाफ टलीव

को बुशिग कहते थे, पहनते और बूिों को पासलश और चमका के रखते। क्योँकक हम

भी स ख थे, इ िाती और

ाथ दोटत िै ा रहा।

े रिं गवाते िो पुराने ब

को मावा दे ने को कह दे ते स्ि

अड्डे के पा

े पगड़ी अकड़

र पर बहुत अच्छी बिंधती िो दे खने में खब ू ूरत लगती। पगड़ी का एक नया मय बहुत प्रस द्ध था िो बेशक आि बहुत बदल गगया है लेककन मैं अभी भी

वोही पुराना टिाइल इटतेमाल करता हूूँ। इ चाना बबस््डिंग के पीछे बहुत खल ु ी िगह थी स्ि में एक खह ू ी होती थी और एक तरफ बहुत बड़ी भट्िी थी स्ि में रदार िी बबिली के ताज़े बनाये प्लग्गों को पकाते थे स्ि े वोह एक दम सत और तैयार हो िाते थे।

रदार िी अच्छे कलाकार भी थे और छोिे छोिे बुि बनाते रहते और इन को भट्िी में पका

लेते। कई दफा वोह टिाइसलश कप बनाते िो बहुत ुतदर ढ़दखाई दे ते। लेककन यह बोलते ज़्यादा नहीिं थे, उन का टवभाव ही कुछ ऐ ा था। यह रदार िी शायद ती

रदार िी

पैंती

ाल पहले इिंग्लैण्ड में हमें बसमिंघम रोड पर कक ी ररश्तेदार के घर समले थे। दे खते ही हम

एक द ू रे को पहचान गए। परु ानी बातें हुईं और मैंने उ फैक्िी के बारे में पछ ु ा स्ि में वोह प्लग्ग बनाया करते थे। रदार िी हिं पड़े और बोले,” वोह कुछ नहीिं था, उ में घािा ही


पड़ता रहता था, इ

सलए बिंद करनी पडी”. इ

के बाद इ

रदार िी के कभी दशगन नहीिं

हुए। हर

ुबह हम अपने रामगढ़िया टकूल को िाते और बहादर अपने िेिे हाई टकूल को चले

िाता। शूगर समल की एक

ाइड िीिी रोड की तरफ थी और द ु री

ाइड हढ़दयाबाद रोड पर

थी और इ ी रोड पर हम टकूल को िाते थे। शूगर समल के आगे रे लवे लाइतज़ हैं और यहािं े रे लवे टिे शन २०० गज़ पर ही है , इन रे लवे लाइनों पर एक फािक है , यह फािक कोई

गाड़ी आने के वक्त बिंद हो िाता है । इ

फािक को पार करके हमारा टकूल कोई आधा

ककलोमीिर ही होगा। इन रे लवे लाइनों और फािक के बबलकुल नज़दीक मेरी मा ी का घर था। यह मा ी मेरी माूँ के चाचा िी की बेिी थी लेककन यह मझ ु े प्पयार करती थी। कभी कभी मैं इ े मस्ु श्कल

े पिंद्ह

गी मा ी की तरह ही

मा ी के घर चले िाता था। मा ी का घर रे लवे लाइन

ोलह फ़ीि दरू ही था और गाडडओिं का शोर इतना होता था कक कमरे में

बैठ कर बातें करना मुस्श्कल हो िाता था। अक् र मैं मा ी को पूछता रहता था कक वोह रात को

ोते कै े थे। वोह बोलती, बेिा उतहोंने तो कोई फरक ही नहीिं था। एक रात को मैं मा ी

के घर

ोया था लेककन मुझे

ारी रात नीिंद नहीिं आई थी क्योंकक कुछ समनि बाद िे न आ

िाती और ऐ े लगता िै े घर के भीतर आ गई हो और इ

के बाद मैं वहािं कभी नहीिं

ोया था। एक ढ़दन िब हम टकूल गए तो कुछ अिीब

ा लगा,

भी लड़के मेरी ओर आ रहे थे। मुझे

दे ख कर एक तरफ हो िाते, मैं उन को बुलाता लेककन वोह एक दो बातें करके एक तरफ को चले िाते। मुझे कुछ

मझ नहीिं आ रहा था। एक लड़का मेरी तरफ आया और मुझ

पूछा,” तू गुरमेल ही हैं?” मैंने कहा,” यार यह क्या बात हुई, मैं गुरमेल ही हूूँ, इ में ककया शक है ?” कफर उ ने बताया कक उ ुबह रे लवे लाइन पर दो लाशें समली थीिं, एक लड़के

की और एक लड़की की और अफवाह यह ही है कक वोह लड़का तू ही था और तेरी शकल उ े समलती है , इ ी सलए

भी यही

मझ रहे हैं कक वोह तू ही था। लड़के लड़की ने आप

में

रट ा बाूँधा हुआ था और अफवाह यह ही है कक तुम दोनों प्पयार करते थे। ुन कर मैं ुतन ही रह गगया। कफर भी इकठे हो गए और हिं ने भी लगे कक तुझ में इतना हौ ला हो ही नहीिं

कता था। इतनी दे र में मैंने अपनी मा ी को ररक्शे

ढ़दख रही थी। मैं उ ी वक्त

े उतरते हुए दे खा िो घबराई ड़क पर खड़े ररक्शे की ओर गगया और मा ी को त स री

अकाल बोला। मा ी ने मेरे किंधे पर हाथ रखा, कफर मेरे मुिंह पर हाथ फेरा और बोली,” गुरमेल बेिा ! तू ठीक ठाक है ?”. मैंने तरुिं त कहा,” मा ी ! मुझे

ब पता चल गगया है , वोह

कोई और होगा, भला मैं ऐ े क्यों करूूँगा”. मा ी ने मझ ु े अपनी बाहों में ले सलया और बोली,”बेिा, मैं तो राणी परु को िाने वाली थी”. मेरा क्ला

में िाने का वक्त हो गगया था।


मैं क्ला

को िाने को तैयार हो गगया और मा ी भी वाप

िंतोर्ष की झलक ढ़दखाई दे रही थी। चलता…

मुड़ने लगी, उ

के चेहरे पर एक


मेरी कहानी – 52 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 17, 2015 टकूल हम। रोिाना िाते थे और हमारा टिै

ारे िीचर िी िान

दरू कर दे ता था। कोई ना कोई िोक

माटिर िगदीश

े हम को पिा रहे थे। प्वद्या प्रकाश

ुनाता रहता और पिाता भी रहता।

े उन की खब ू पिती थी और दोनों िब भी समलते एक द ू रे पर प्वअिंग

कटते रहते स्ि को हम भी मज़े

ुनते। माटिर िगदीश स तार बहुत अच्छी बिाते थे और िब कभी टकूल के हाल में कोई प्रोग्राम होता तो माटिर िी स तार िरूर बिाते स्ि को

ुन कर मज़ा आ िाता। क्ला

िाता। माटिर मूल राि के पा िाया करते थे। इ

में िब होते तो ऐ ा पिाते कक हमें

मझ आ

तो मैं और िीत ने ियूशन रख ली थी और उ

के इलावा ककताबों की दक ु ानों पर प्पछले द

ालों के

के घर

वाल और उन के िवाब सलखे

हुए समलते थे। गैट पेपर समलते थे। एक द ु रे े बातें करते कक यह वाल आ कते हैं,वोह वाल आ कते हैं। चाहे कोई हुसशआर प्वद्याथी था या ऐवरे ि भी कुछ न कुछ खरीद रहे होते। कई गैट पेपर तो ौ फी दी की गरिं िी दे ते थे कक यह ही वाल इस्म्तहान में आएिंगे। ककताबें बेचने वालों की चािंदी हो रही थी। कुछ गैट ी्ड होते थे िै े वोह

ऐ ी टकूल

पेपर तो ऐ े समलते थे िो

वाल ही इस्म्तहान में आयेँगे. हमारी उम्र ही ऐ ी थी कक हम को

मझ ही नहीिं थी कक यह ककताबें बेचने वाले हम

े पै े बना रहे थे।

े वाप

आ कर हम मटती भी बहुत ककया करते थे और िीिी रोड पर हो रहे मिमें दे खने चले िाते थे, इनमें एक तो मेरा बचपन का दोटत प्विय ही ननकला था स्ि के बारे में मैं पहले सलख चक् ु का हूूँ। यह मिमे वाले लोग इतने हुसशआर होते थे कक बातों बातों में लोगों को बेवकूफ बना कर बहुत पै े कमा लेते थे। इनमें कुछ के बारे में सलखना चाहूिंगा। एक तो होता था प्रेम स हिं िो अपने आप को बाबा ाूँपों वाला कहलाता था. शूगर समल के

ामने बहुत खल ु ी िगह होती थी और लोग भी ि्दी इकठे हो िाते थे। बाबा प्रेम स हिं की दाहड़ी बहुत लम्बी होती थी और ारे कपडे गेरूए रिं ग के होते थे स्ि े वोह धासमगक ढ़दखाई दे ता था। नीचे िमीिंन पर उ

ने बहुत ी छोिी छोिी शीशीआिं रखी हुई होती थी स्िन में चार पािंच इिंच लम्बे छोिे छोिे मरे हुए ािंप रखे होते थे। वोह हर बीमारी की दवाई बेचता था और उ मिमा शुरू होने मलता, स्ि

में

की बातों में ऐ ा िाद ू था कक लोग दवाई खरीद लेते थे।

े पहले वोह हरे पिों स्िन को वोह पहले ही ला कर रखता था हाथों े र

ननकलता और उ

को वोह पानी के िग में डाल दे ता। इ के

बाद वोह अपना लैक्चर शुरू कर दे ता और लोगों को कहता,” दे खो िी ! मैं तो स फग गरीबों


के सलए ही दवाई बेचता हूूँ, आसमर लोग तो ोने चािंदी के कुश्ते भटमें खाते हैं लेककन मेरी दवाई तो िड़ी बूढ़िओिं े बनती है और ोने चािंदी के कुश्ते भटमों े कहीिं ज़्यादा अ रदार है ”. वोह तब तक बातें करता रहता िब तक वोह िग में पड़ा पानी पिों के र न बन िाता। इ

के बाद वोह उ

िैली को िग

े हरी िैली

े बाहर ननकालता और लोगों को ढ़दखाता।

लोग दे ख कर है रान हो िाते। कफर वोह लोगों को बहुत े पेपर और पैं लें दे ता और दवाई का नुटखा सलखाता। वोह नुटखा सलखाने के बाद उन को ककन ककन बक्ष ृ ों की िड़ों में ककतने महीने रखना था, सलखाता। इ तैयार, कफर उ यह

के बाद उन को

को खाने का तरीका बताना।

ुखाना, कफर मास्म्िटते में कूिना और दवाई

ारा कुछ कहने के बाद आधे लोग तो वै े ही कतफ्यज़् ू ड हो िाते। कफर आखखर में वोह

कहता कक

भी लोग इतनी समहनत नहीिं कर

कते, इ

सलए मैंने पहले

े ही दवाई तैयार

की हुई है . इ के बाद वोह बैग े बहुत े दवाई के लफाफे ननकालता और कीमत एक या दो रुपया बताता। बहुत लोग खरीद लेत।े ऐ े ही यह बाबा रोज़ लोगों को ठगता। एक ढ़दन हम

भी दोटत िाऊन हाल में घूम रहे थे कक मेरी नज़र िाऊन हाल की है ्ि ् के नज़दीक

एक पान के पिों की शकल वाली बड़ी बेल पर पडी। मैंने कहा,”यह तो वोही बेल लगती हैं िो बाबा

ाूँपों वाला इ

े िैली बनाता है ” िीत ने बहुत ी बेल तोड़ ली और हम अपने कमरे में ले आये। हमने उ का र ननकाला और पानी में डाल ढ़दया। आधे घिंिे में वोह िैली बन गई। इ

िैली को दे ख दे खकर हम है रान होते रहे ।

आगे िा कर होता था मदों की गुपत बबमाररओिं का माढ़हर। यह शस

इतना हुसशआर होता कक अच्छे अच्छे भले िवान लड़कों को ऐ ी ऐ ी बातें कहता था कक वोह अपने आप को बीमार

मझने लगते थे और डरने लगते थे कक वोह मदग कहलाने के काबबल नहीिं थे, और

डर के मारे उ

े दवाऐिं खरीद लेते थे। भिन और िीत उन े इतनी बातें करते थे कक वोह

शसमिंदा हो िाता था और समनतें करने लगता था कक हम उ

की रोज़ी रोिी को खराब ना

करें । ऐ े और भी बहुत लोग होते थे िो लोगों को ठगते थे। कभी कभी पुसल वाले आ कर उन को वहािं े िाने के सलए कह दे ते तो वोह चले िाते लेककन कुछ समनि बाद कफर आ िाते। पुसल

की भी यह ऐस्क्ििं ग ही होती थी क्योंकक पुसल

को यह पै े दे दे ते थे।

कभी कभी होता था अपने आप को कहलाने वाला एक हकीम। यह शलवार पहनता था, तुरे वाली पगड़ी के बीच में होता था पाककटतानी कु्ला िो ऊपर को कश्ती िै ा ढ़दखाई दे ता था। इ

के

ामने एक कपडे पर रखी होती थी पचा

ाठ िड़ी बूिीआिं। िब लोग इकठे

होने शरू ु हो िाते तो वोह एक अखबार में एक एक िड़ी बि ू ी डालता, उ उ

का नाम बताता,

के शरीर को होने वाले फायदे बताता और कफर द ु री िड़ी बि ू ी डालता, उ

और फायदे बताता। इ

तरह वोह

का नाम

ारी िड़ी बि ू ीआिं अखबार में डालता। अब इन बढ़ू िओिं


दवाई बनाने का ढिं ग बताता। आखखर में रै डी मेड दवाई के पैकेि ननकालता िो लोग खरीद लेते। इन लोगों को हम रोज़ाना दे खते ही रहते थे। अपने कमरे में आ कर हम टकूल का काम करने में वयटत हो िाते और रात को आठ नौ विे प्रभात होिल को खाना खाने के सलए चल पड़ते। होिल में हमने अपनी अपनी घर के

दे ी घी की पीपीआिं रखी हुई थीिं स्िन को ताला लगा कर रखते थे। यह पीपीआिं गोल गोल डालडा घी वाली होती थी स्िन पर एक खिरू के दरसत की फोिो होती थी। हम खद ु ही ताला खोल कर उन होिल वालों को घी दे दे ते थे और वोह तड़का लगा दे ते थे। होिल का

खाना बहुत टवाढ़दष्ि होता था। यह होिल दो भाईओिं का होता था िो बहुत हिं मख ु होते थे। खाना खा कर वाप अपने कमरे में आ िाते और दे र रात तक पड़ते रहते। पड़ते पड़ते हमारा मन कभी कभी गतने चप ू ने को हो आता और कमरे को ताला लगा कर बाहर ननकल पड़ते। िीिी रोड

ारी गतने के छकड़ों और िक्कों

थे। छकड़ों और िक्कों

े भरी होती थी िो शग ू र समल को िाते

े गतने हम खीिंच लेते और कमरे में ले आते और दे र रात तक चप ू ते

रहते और गप्पें हािंकते रहते। कई दफा तो गतने बहुत िमा हो िाते और रप्ववार को हम यह गतने र ननकालने वाले वेलने पर ( र ननकालने वाली बैलों े चलने वाली मशीन ) ले िाते और दो बा्िीआिं र

की भर के ले आते और

भी प्वद्यागथगओिं को प्पलाते।

इस्म्तहान के ढ़दन नज़दीक आ रहे थे। पैराडाइज़ में कफ्म लगी हुई थी”नया दौर”. कफलम दे खने को ब का मन कर रहा था लेककन इस्म्तहान की विह े इतना हौ ला भी नहीिं पड़ता था। रोज़ रोज़ हम कफ्म की बात करते लेककन िाने कहने लगा,” दे खो भई ! अगर तो कफ्म दे खनी है , िॉ फै ला हो िाएगा, झूठ नहीिं बोलना चाढ़हए,मन तो िीत ने िेब

े ढ़हचकचाते। एक रात को िीत

कर लो, िाने या ना िाने का

ब का कफ्म दे खने को करता है ”. कफर

े एक रूपया ननकाला और बोला,है ड िाना,िे ल नहीिं िाना। इ

के बाद उ

ने

रुपैया ऊपर को फेंका। िब रुपया ज़मीिं पे गगरा तो वोह आया िे ल यानी नहीिं िाना। मन में भी उदा

हो गए। िीत बोला,”नहीिं भई,एक दफा कफर फैंकते हैं”िीत ने कफर

कफर आ गगया िे ल।

भी चप ु कर गए। क्योंकक मन तो

े फैंका तो

भी का कफ्म दे खने को करता था

और गधयान भी कफ्म में ही था। िीत बोला,” भई ऐ ा करते हैं एक दफा कफर रुपैया फैंकते हैं,यह फाइनल होगा,इ

के बाद बात खत्म,िो होगा उ ी तरह करें गे।

उधर कफ्म का वक्त भी तकरीबन हो चक् ु का था और िाने के सलए भी द चाढ़हए था। िीत ने रुपैया फेंका तो वोह आया है ड। ब

कफर ककया था,उ ी वक्त कमरा बिंद

करके दौड़ पड़े। कुछ ही दरू गए होंगे कक िीत का पैर कफ ल गगया और पड़े कीचड़ में गगर गगया स्ि

े उ

समनि का वक्त ड़क के ककनारे

का पिामा खराब हो गगया। िीत ने पिामा

उतारा,इकठा करके हाथ में पकड़ा और स नीमे की ओर दौड़ पड़ा। हूँ ते हूँ ते हम भी दौड़


पड़े और स नेमा पौहिं च गए। ढ़िकि सलए और कफ्म दे ख ली। इ

बात को ले कर हम पता

नहीिं ककतनी दफा हिं ें होंगे। बहुत ाल पहले िब हम िीत को उन की कोठी में समलने गए थे तो इ ी बात को याद करके बहुत हूँ े थे। इस्म्तहान

े दो तीन हफ्ते पहले हम को टकूल

े छुिी हो गई और अब हमारे पा

वक्त ही

वक्त था। खब ू पड़ते। पता नहीिं ककतनी दफा ररवाइि ककया। एक ढ़दन हम ने कफर मटती करने का प्रोग्राम बनाया। प्रोग्राम था िालिंधर को िाना और तीन कफ्मे दे खना। तीन छै ,छै

े नौ,और नौ

े बारह के शो दे खना। िालिंधर में उ

िालिंधर को रवाना हो गए। िै ा िीत था,वै ा ही उ

वक्त बहुत स नीमे होते थे। हम का बाइस कल था। िगह िगह उ

का

ाइकल वे्ड ककया हुआ था,न तो उ के बाइस कल की िेक थी,ना ही फ्लाइवील काम करता था क्योंकक नया फ्लाइवील डालने के सलए पै े लगते थे,इ सलए उ ने फ्लाइवील को भी वे्ड करा सलया था स्ि को कोई चला नहीिं

े फ्लाइवील पीछे की ओर घम ू ता नहीिं था। िीत के स वा इ

कता था। क्योंकक हम ने िालिंधर िाना था और ररटकी था क्योंकक िीिी

रोड बहुत बबज़ी होती थी,इ सलए हम दो और िीत और द ू रे पर बहादर। भिन उ ओर। फगवारे कौन

े िलिंधर बी

ाइकलों पर ही

वार हो गए। एक

ाइकल पर मैं

ढ़दन आया नहीिं था। हम चल पड़े िालिंधर की

ककलोमीिर है ।

ी कफ़्में दे खीिं,यह मुझे याद नहीिं लेककन पहले हम

िंत गथएिर पुहिंचे और कफ्म

दे खी। छै विे बाहर ननकले और स्ियोती स नमें की ओर भाग खड़े हुए। पहले हम ने छोले कुलचे खाए और ढ़िकि ले कर स नीमे हाल में घु गए। कफ्म खत्म होने पर लक्ष्मी पैले

की ओर भाग खड़े हुए। कफ्म दे ख कर बाहर ननकले तो रात का एक बि चक् ु का था। बाहर आ कर हम ने कुछ खाया और फगवारे की ओर वाप चल पड़े। िब चहे रु के नज़दीक पुहिंचे तो बहादर के

ाइकल के िायर के नीचे कोई ईंि आ गई और िायर का पिाखा बोल गगया।

आधी रात का वक्त और इ

पर िीिी रोड पर िक्कों की भरमार, ामने

को अिंधी करती। यह हमारा भाग्य ही था कक मेरे

ाइकल के िायर हवा

े तेज़ लाइि आूँखों े िाइि थे। मेरे

आगे बहादर बैठा और पीछे िीत बैठ गगया और एक हाथ

ाथ ही िीत पिंचर हुए ाइकल के हैंडल को े पकड़ कर ले िाने लगा। पहले पहले कुछ तकलीफ हुई,कफर धीरे धीरे चलने

लगे। तीन बिे हम अपने कमरे में पुहिंचे और चैन की

ािं

ली और आते ही

ो गए।

आि मुझे कक ी भी कफ्म को दे खने का शौक नहीिं है चाहे ककतनी भी बड़ीआ ककयों ना हो. कै ी िवानी की उम्र थी वोह! िब भी कफ्म दे खने िाते,आते वक्त कफ्म की बातें करते आते,कभी गोप, भगवान दादा और िॉनी वाकर की बातों को याद करके हूँ ते आते,कभी धासमगक और िाद ू की कफ़्में दे ख कर उनकी बातें करते आते। कभी िीवन की बातें और कभी वी एम प्वआ

की बातें करते। कभी शकीला और निंदा की बातें तो कभी माला स तहा


और कामनी कौशल की बातें । माता प्पता के

र पे मज़े, ककतनी अच्छी स्ज़िंदगी दी थी हमारे

माता प्पता ने हमको, उनकी याद को झुक कर नमटकार करता हूूँ। चलता…


मेरी कहानी – 53 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 20, 2015 िालिंधर

े आ कर आते ही हम

ो गए और ग्यारह बारह बिे उठे । द ू रे कमरों के लड़के

अपने अपने कमरों के बाहर गैलरी में बैठे पिाई कर रहे थे। हम को कमरे के बाढ़हर आते ही वाल करने लगे कक कफ्म कै ी थी। हम ने िब बताया कक हम ने तीन कफ़्में दे खी थी तो है रान हो गए। िायर पिंचर की बात हम ने बताई तो और भी है रान हो गए। हम भी पहले खह ू ी पर गए और बा्िीआिं भर भर के खब ू टनान ककया। वाप चाय बनाई और डब्बल रोिी के हम भी और लड़कों के

कमरे में आ कर टिोव पे

ाथ चाय का मज़ा सलया और अपनी अपनी ककताबें ले कर

ाथ गैलरी में बैठ कर पिाई करने लगे। कुछ दे र बाद मैं और िीत

अपनी ककताबें ले कर नज़दीक के खेतों की और चले गए और वहािं िा कर पड़ने लगे। मैं और िीत अक् र अकेले ही खेतों की ओर िाते रहते थे। हमें कोई मालम ू ही नहीिं था कक भिन इ खेतों

बात को लेकर मन ही मन में हम

े वाप

और हम को

आये तो भिन हम

े नाराज़ था। एक ढ़दन िब िीत और मैं

े लड़ाई झगड़ा करने लगा कक” तम ु दोनों चले िाते हो

ाथ नहीिं ले िाते”. इतनी मामल ू ी

ी बात पर भिन हम

े झगड़ा करे गा,हमारे

मन में तो कभी आया ही नहीिं था। िीत भी कुछ गरम हो गगया। उन के बीच मैं आ गगया

और भिन को बोला,” भिन! अब िबकक इस्म्तहान में कुछ ही ढ़दन रह गए है ,तू अब झगड़ा करे गा ? यह ककया बात हुई कक हम तुम को ाथ नहीिं ले िाते, ले अब हम भी वाप चले िाते हैं और कल े भी इकठे चले िाया करें गे”. भिन कुछ ठिं डा हो गगया और कुछ दे र बाद

मातय हो गगया। दरअ ल भिन पिाई में बहुत कमज़ोर था। उ का ारा ध्यान हमेशा फुिबाल में ही रहता था,हम ने उ े कभी पड़ते हुए बहुत कम दे खा था. हो कता है उ को इस्म्तहान में पा न होने का डर हो क्योंकक अब इस्म्तहान र पे थे। शननवार को हम गाूँव आ गए। माूँ कहने लगी,” बेिा,तुम इतनी समहनत करते हो,घर आिा,दध ू और घी ले िाओ और शहर में बबटकुि बनाने वाली दक ू ान दोटतों

े मैंने बात की, आइडडआ

े बबटकुि बना लो”.

ब को प िंद आया और हम घी,आिा, खिंड,दध ू और कुछ

अिंडे ले गए। बबटकुि बनाने वाली दक ू ान में और भी बहुत लोग थे िो बबटकुि बनाने आये हुए थे। हम ने भी अपना राशन दक ु ान वालों को दे ढ़दया। िब बबटकुि बन गए तो हम है रान हो गए कक बबटकुिों

े एक बड़ा पीपा ऊपर तक भर गगया। दक ू ान में ही हम ने

बबटकुि खा के दे खे तो खा कर मज़ा ही आ गगया। बबटकुि वाली बात तो बहुत मामूली है लेककन आि मैं ोचता हूूँ कक वाकई माूँ बहुत महान होती है ,बच्चों का इतना खखयाल !. हम पड़ते थे लेककन माूँ का खखयाल कक हम खाने का गधयान रखें ,उ

के ढ़दमाग में यही होता

था। हालािंकक हम प्रभात होिल में अच्छा खाना खाते थे लेककन माूँ का ढ़दल ! माूँ तुझे लाम, ही तो कहते हैं।


शायद दो तीन ढ़दन ही रह गए थे इस्म्तहान शुरू होने में ,एक रात को िब हम अपने कमरे में अपनी अपनी ककताबे सलए बैठे थे तो अचानक लाइि ब्व फ्यूज़ हो गगया। कमरे में अूँधेरा हो गगया। द ू रे लड़कों के कमरे में िा कर पूछा कक अगर उन के पा ब्व हो तो नाह में ही िवाब समला। नौ द होने का कोई

कोई

पेअर

बिे का वक़्त था और कक ी दक ू ान के खल ु े

वाल ही पैदा नहीिं होता था। हम

ब में

े िीत ही एक लड़का था स्ि

का

ढ़दमाग मस्ु श्कल की घड़ी में ज़्यादा काम करता था। बोला, बई एक बात मैं तम ु को बताता हूूँ,गधयान े ा बोडग लगा

न ु ो।” गरु ु नानक इिंिीननयर वक् ग फैक्िी की प्पछली ओर उन की ऐड का बड़ा

हुआ है ,स्ि पर सलखा हुआ है ” गरु ु नानक इत्नीररिंग वक् ”ग और उ बोडग की दोनों तरफ दो बड़े बड़े ब्व लगे हुए हैं,हम चलते हैं,और एक ब्व उतार लेते हैं,इ वक्त फैक्िी बिंद है और वहािं कोई नहीिं है ”. आईडीआ तो

ब को प द िं आ गगया लेककन

वाल यह पैदा होता था कक वोह ब्व बहुत ऊिंचे लगे हुए थे। कुछ दे र के बाद हम चारों दोटत चोरी करने ननकल पड़े क्योंकक इ वक्त मिबूरी थी। इदग गगदग

भी तरफ झािंकते हुए हम फैक्िी की ओर चल पड़े। भी के मन में एक भय भी था। धीरे धीरे हम फैक्िी के पीछे िा पुहिंच।े फैक्िी े कोई ौ गज़ की दरू ी पर रे लवे लाइन थी स्ि

पर रे ल गाडड़यािं आती िाती ही रहती थीिं, शायद रे ल गाडड़ओिं में बैठे

याबत्रओिं के दे खने के सलए ही यह बोडग लगाया गगया होगा। ब्व काफी ऊिंचे थे। िीत के

आइडडये के अनु ार मैं नीचे खड़ा हो गगया और िीत धीरे धीरे मेरे कतधों पर चि गगया, भिन और बहादर दोनों ओर खड़े हो गए ताकक िीत गगर िाए तो वोह धीरे धीरे ब्व उतार सलया। ि्दी ि्दी हम वाप क्योंकक ब्व पािंच

िंभाल

कें। िीत ने

ब ने ब्व दे खा और है रान हो गए कक ब्व बहुत बड़ा था।

कमरे में आ गए और ब्व लगाया। कमरे में िै े धप ु हो गई हो

ौ वाि का था। हम इतने खश ु हुए कक बता नहीिं कता। कफर िीत कहने लगा,यार ! ब्व पर मट्िी बहुत िमी हुई है ,अगर ाफ़ ककया िाए तो इ की रौशनी और भी बड़ िायेगी। िीत ने ब्व उतार सलया और पानी

े खब ू धोया,कपडे

ाफ़ ककया और

कफर लगा ढ़दया। रौशनी भी ज़्यादा बि गई। हम पड़ने लग गए। कुछ समनि ही हुए थे कक ब्व कफर फ्यूज़ हो गगया। हम उदा हो गए। िीत झि े बोला,”चलो उ बोडग े द ू रा ब्व भी ले आते हैं”. हम कफर कमरे तरफ चल ढ़दए। िा कर झि

े बाहर हुए और गुरु नानक इत्नीररिंग वक् ग की े द ू रा ब्व भी ले आये। अब की बार हम ने ब्व को धोया

नहीिं ताकक कफर फ्यूज़ ना हो िाए। यह ब्व कभी खराब नहीिं हुआ और इस्म्तहान के बाद हम ने िीत को ही अपने घर ले िाने के सलए कह ढ़दया।


इस्म्तहान शुरू हो गए। पहले ढ़दन ढ़ह ाब का पेपर था। टकूल के हाल में दाखल होते ही हमें कुछ घबराहि लगी और इ

ी हुई। अपनी अपनी ीिों पर हम प्वरािमान हो गए। प्लेन शीि बािंिी िाने के बाद ढ़ह ाब के पचे बािंिे गए। दो दफा परचा मैंने पड़ा और कोई मुस्श्कल

नहीिं लगा। प्पछले द

ाल के इस्म्तहानों में आये पेपर बहुत दफा रीवाइज़ ककये हुए थे,आधे वाल तो वोह ही आ गए। द ू रे भी इतने मुस्श्कल नहीिं लगे। पेपर दे कर हाल के बाहर आ

गए और

भी लड़के एक द ू रे

े बातें करने लगे,यह कै े ककया वोह कै े ककया और इ

बाद हम अपने कमरे में आ गए। बहादर भी िेिे टकूल

के

े आ गगया और खश ु था। गैलरी

पर बैठ कर बातों में म रूफ हो गए। काफी दे र तक बैठे रहे ,अचानक मैंने पछ ु ा,”िीत कहाूँ है ?”. भी इधर उधर दे खने लगे। गैलरी

े नीचे की ओर झाूँका लेककन िीत कहीिं ढ़दखाई नहीिं

ढ़दया। है रान हुए द ू रे कमरों की ओर चले गए और उन में रहते लड़कों अ फल। वै े ही मेरे मन में कुछ आया और वहािं रो रहा था। िब मैंने उ की आवाज़

े पछ ु ा लेककन

ीड़ीआिं चि कर चब ु ारे के ऊपर चले गगया,दे खा िीत बैठा

को बुलाया तो िीत फुि फुिक कर ऊिंची ऊिंची रोने लगा। रोने

ुन कर बहादर और भिन भी ऊपर आ गए। ककया हुआ,ककया हुआ भी पूछने लगे। रो रो कर िीत कहने लगा कक उ का ढ़ह ाब का पेपर ठीक नहीिं हुआ था और बोल रहा था कक उ

के बापू िी पर ककया बीतेगी िब उन को पता चलेगा, मैंने उ

कै े पेपर ककया था,तो िो उ था,यह स फग उ िवाब

ुन कर मैंने कहा कक पेपर कोई बुरा नहीिं हुआ के मन का वहम ही था. िब मैंने िीत े ब पुछा तो ५०% उ के

ही थे। मेरे

मझाने

अच्छा नहीिं था लेककन मैंने उ े

ने बताया

े पुछा कक

े िीत के मन

े बोझ उिर गगया। भिन का पेपर इतना

को भी खश ु कर ढ़दया,बहादर का तो ठीक ही था। बातें करने

ब के मन का बोझ कम हो गगया।

धीरे धीरे एक के बाद एक पेपर होने लगे। ड्राइिंग का पेपर िो टके्ज़ बगैरा थीिं वोह तो

भी

के अच्छे हो गए थे क्योंकक ड्राइिंग में हम तीनों अच्छे थे। िब आख़री परचा भी हो गया तो अब स फग

ाइिं

का प्रैक्िीकल ही रहता था िो कुछ ढ़दन बाद होना था। तकरीबन हम फ्री

हो गए थे। स्ितने ढ़दन खाली बचे थे,उ

में हम या तो शहर में घुमते रहते या कोई कफ्म

दे ख लेते। भु्ला राई के हमारे कुछ दोटत हमारे कमरे में आते ही रहते थे। इन में एक था

परगि स हिं िो बहुत अच्छा गाता था। एक ढ़दन वोह अपना हारमोननयम ले आया। हमारे कमरे में और लड़के भी आ िाते और समल कर बहुत मटती करते। कफर एक ढ़दन प्रैस्क्िकल का भी हो गगया और हम ारा ामान बाूँध कर गाूँव वाप िाने की तैयारी करने लगे। दो फेरों में

ारा

ामान गाूँव ले आये और कमरे और होिल का ढ़ह ाब ककताब करके टकूल को

अलप्वदा कह ढ़दया। परगि स हिं भी अपना हारमोननयम ले गगया और उ

की पिाई हमेशा


के सलए खत्म हो गई और कहीिं काम करने लगा। हमारे सलए अब ररज़्ि का इिंतज़ार ही रह गगया। इस्म्तहान खत्म होने के बाद मािं भी अफ्रीका को चले गई, अब घर कुछ

ूना

ूना

ा लगने

लगा। अब या तो दादा िी की मदद कर दे ता या राणी पर के बाज़ार में घुमते रहते और रात को गगयान की दक ू ान में बैठे रहते। कभी कभी ढ़दन के वक्त नरिं िन स हिं की दक ू ान पर िाते और उ

के प्पता िी के धासमगक पवगचन

ुनते रहते।

कुछ हफ़्तों बाद पता चला कक मैढ़िक के ररज़्ि आ गए थे। बहादर ने िेिे हाई टकूल िाना था और हम ने रामगढ़िया टकूल िाना था. िब हम तीनों टकूल आये तो है ड क्लकग के दफ्तर में अपने अपने रोल निंबर बता कर हमें ररज़्ि समल गए। नवग नै पता चला कक मेरी फटिग डवीिन थी,िीत की मैं तो था ही और िीत भी खश ु था,भिन हम

खत्म हो गई िब

क ैं ड और भिन की थडग। हम तीनों प न ग थे। े भी ज़्यादा खश ु था क्योंकक उ

को तो पा

होने की उम्मीद ही नहीिं थी। कुछ दे र बहादर भी वहािं ही आ गगया,वोह भी खश ु था। बहादर तो वाप

चले गगया क्योंकक उ

ने अपने चाचा िी

े बािार में समलना था। हम

ोच रहे

थे कक ककया करें ,प्पक्चर दे खे या कुछ और। कफर बात तय हुई त्हन गुरदआ ु रे िाने की। मेरी माूँ ने मानता मानी हुई थी कक अगर वोह अफ्रीका चली िाए तो वोह पािंच रूपए त्हन चिाएगी। इ

े मेरा काम भी हो िाएगा। यह

ोच कर हम त्हन की तरफ रवाना हो

गए। त्हन पौहिं च कर िो हुआ मैं पहले सलख चक् ु का हूूँ। अब टकूल की पिाई ख़त्म हो गई और कुछ ढ़दन बाद टकूल िा कर हम अपने अपने

िीकफकेि ले आये और अपनी अपनी फाइलों में रख सलए। घर में कक ी िगह रखे हुए है लेककन बहुत वर्षों े इन को दे खने का कभी इतफ़ाक नहीिं हुआ। बहुत ाल पहले िब हम भारत आये तो मन टकूल दे खने को हो आया। मैं और मेरे छोिे भाई का लड़का मोिर ाइकल पर

वार हो कर टकूल आये। मेरे पा

मूवी लेने के सलए कैमरा था और कफ्म

लेने के सलए इिाित लेने के सलए एक िीचर को पुछा तो उ कर ढ़दया। िब मैंने है डमाटिर

को कहा कक १९५८ में मैंने यहािं

े पुछा तो वोह कुछ अिीब

ने है डमाटिर की तरफ इशारा

ा बोला। मैंने इिंस्ग्लश में उ

े मैढ़िक की थी और पुरानी यादों को ताज़ा करने के सलए

कुछ कफ्म लेना चाहता हूूँ। कफर वोह कुछ खश ा हो गगया और मैंने उ ए ैक्शन वाले ु कमरे की थोह्ड़ी ी मूवी ली िो बबलकुल उ ी तरह ही था िै ा मेरे मय में होता था।

मेला स हिं का बुि बना हुआ था,उ की भी मूवी ली। हा हा, अब तो वोह मूवी भी पता नहीिं कहाूँ पड़ी है । ब इ गज़ ु रे ज़माने की याद ही है िो कभी कभी मरण हो आती है । चलता…


मेरी कहानी – 54 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 24, 2015

मैढ़िक के ररज़्ि के बाद अब हम ने फै ला करना था कालि िाने का। िीत बहादर ने तो फै ला कर सलया था कक उतहोंने रामगढ़िया आट्ग लाम कर ढ़दया और अपने प्पता के

कालि िाना था। भिन ने पिाई को

ाथ गाूँव में ही काम करने लगा। उनके प्पता िी की

आिा पी ने की चक्की थी। इ

के इलावा उतहोंने धान और रूई की मछीिंन भी लगाईं हुई थी। भिन के चाचा िी और उनके बच्चे और दो बज़ुगग भी किंू एिं का ारा ामान भी खद ु बनाते थे, स्ि

े उन को काफी अच्छी आमदनी हो िाया करती थी। इन मछीनों वाली

िगह पर काफी रौनक होती थी। गाूँव में एक और भी चक्की होती थी लेककन भिन का काम बहुत बड़ा होता था। भिन की तो गाई भी हो गई भ् ु ला राई गाूँव की एक लड़की े। मैढ़िक के बाद भिन े मेरा िंपकग तो बहुत कम हो गगया लेककन िीत क्योंकक उ ी मह ु ्ले का रहने वाला था, उ मैंने

का

िंपकग बना रहा।

ोच रखा था कक मैं पॉसलिै स्क्नक कालि िाऊूँगा। इ

ाल पहले मेरे मामा िी का लड़का

था। क्योंकक बड़े भाई

के नज़दीक है फगवारे

का भी एक कारण था। बहुत िं ोख स हिं फगवारे पॉसलिै स्क्नक कालि में पड़ा करता त

िंतोख स हिं का गाूँव यानी मेरे नननहाल डीिंगरीआिं गाूँव िो आदम परु

े बहुत दरू है ,इ सलए वोह हमारे गाूँव ही रहा करता था और यहािं े ही फगवारे को पड़ने के सलए िाया करता था. इ का एक कारण और भी था कक िंतोख का प्पयार मेरी माूँ

े बहुत होता था क्योंकक मेरी माूँ त िं ोख की बुआ ही लगती थी। मैं तो उ वक्त बहुत छोिा था लेककन िब तक िंतोख पिाई खत्म करके भाखड़ा डैम निंगल में ड्राफ्ट्

मैन लग गगया था। बहुत वर्षों बाद िब मैं भी मैढ़िक में पड़ने लग गगया था तो िंतोख िब भी हमारे गाूँव आता,मुझे यही कहता कक मैं आट्ग कालि नहीिं िाऊिं बस््क पॉसलिै स्क्नक कालि िॉएन करूूँ और इलैस्क्िकल या मकैननकल इत्नीररिंग का को ग लूँ ।ू इ ी सलए मेरा आट्ग

कालि िाने को मन नहीिं माना और पॉसलिै स्क्नक कालि िॉएन करने की ठान ली।

यहािं मैं यह भी बता दूँ ू कक

िंतोख स हिं अब बहुत दे र का ररिायर हो चक् ु का है और उ की उम्र ८० के करीब होगी। दोनों समआिं बीवी हुसशआर पर रहते हैं लेककन उन के कोई बच्चा नहीिं हुआ, इ सलए िंतोख ने अपनी बहन की लड़की अडॉप्ि कर ली थी। लेककन दुःु ख की बात यह है कक िंतोख को एलज़ाइमर हो चक् ु का है और याददाश्त ख़त्म हो चक् ु की है । मैंने

ारे फ़ामग भरके और अपना

कूल का

ढ़िग कफकेि और

ाथ ही करै क्िर

ढ़िग कफकेि

फ़ाइल करके पालीिे स्क्नक कालि ले गगया। प्प्रिं ीपल तरफ

े मेरी इततप्वगऊ हुई और प्प्रिं ीपल की े एक कक म कक हरी झिंडी समल गई। ककओिंकक इलेक्िीकल और मकैननकल

इत्नीररिंग कक स फग ती

ती

ीिें ही थीिं और स वल इत्नीररिंग कक

ाठ

ीिें थीिं,इ


सलए इलेक्िीकल और मकैननकल की

ीिों के सलए कुछ कम्पीिीशन

उम्मीद थी कक मुझे मेरी मुराद के मुताबक

ीि समल िायेगी। स्ि

ा था। मुझे पूरी

ढ़दन मेरी इिंिरवीऊ

थी,उ

े एक ढ़दन पहले बहुत बारर्ष हो गई थी और िो ड़क हमारे गाूँव े ीधी बानग प्लाही के राटते फगवारे को िाती थी वोह बहुत खराब हो गई थी और कैल (छोिी ी नदी ) के ऊपर पुल के दोनों ओर बड़े बड़े गड़े पड़ चक् ु के थे, इ राटते पर िा

कते थे। यह राटता माधो पुर और चहे रु

िा कर ही फगवारे िाया िा

कता था। इ

सलए फगवारे िाने के सलए द ू रे

े हो कर और कफर िीिी रोड पर

राटते पर आधा घिंिा और लग िाता था लेककन

कोई मस्ु श्कल नहीिं थी,स फग वक्त ज़्यादा ही लगता था। ननयत ढ़दन मैं अपने बाइस कल पर इिंिरवीऊ के सलए चल पड़ा। धप ु ननकली हुई थी, ढ़दन अच्छा था और उमीद थी कक वक्त े बहुत पहले ही पौहिं च िाऊूँगा। माधो परु े कुछ ही आगे गगया तो आ मान पे बादल ढ़दखने लगे। मैंने तेि तेि

ाइकल चलाना शरू ु कर ढ़दया।

यों ही चहे रु के नज़दीक पौहिं चा तो बादल गरिने लगे और बारश शुरू हो गई। मैं भाग कर एक पशुओिं वाले मकान में िा घु ा यहािं एक दो आदमी पहले

े ही बैठे हुए थे। मू लाधार बारर्ष होने लगी। बारर्ष भी इतनी कक कुछ ही समनिों में पानी ही पानी ढ़दखाई दे ने लगा।

काफी दे र बारर्ष होती रही, पानी ही पानी ढ़दखने लगा। मेरा इिंिरवीऊ का वक्त नज़दीक आने लगा और मैं कफकरमिंद हो गगया। बारश कुछ कम हुई तो मैं ाइकल को दौड़ाने लगा। िीिी रोड चहे रु के नज़दीक ही है । िब िीिी रोड पर आया तो तेि तेि ाइकल चलाने लगा। लेककन मेरा इिंिरवीऊ का वक्त ननकल गगया। एक पैननक की स्टथनत में मैंने

ारा िोर लगा

ढ़दया। यों यों फगवाड़ा नज़दीक आ रहा था, ऐ ा लगता था कक आगे बारर्ष इतनी नहीिं हुई थी। फगवारे पौहिं चा तो वहािं बारर्ष का नामो ननशाूँ ही नहीिं था। कालि पौहिं चा तो इिंिरवीऊ हो चक् ु की थी। मेरे कपडे अभी भी गीले थे और िो लड़के इिंिरवीऊ के सलए आये हुए थे वोह कोई मानने के सलए तैयार ही नहीिं था कक कहीिं बारर्ष हुई थी। मैं प्प्रिं ीपल के ऑकफ की और गगया और वहािं खड़े चपड़ा ी को अपनी

मटय बताई कक मुझे प्प्रिं ीपल

े समलना

िरूरी था। चपड़ा ी प्प्रिं ीपल के दफ्तर के अिंदर गगया और कुछ दे र बाद मुझे प्प्रिं ीपल समलने की इिाित समल गई। मैंने लेि होने की अपनी ारी फ़ाइल को बड़े गधयान मेरा चािं

पक्का था लेककन इ

ारी

मटय बताई। प्प्रिं ीपल ने मेरी

े दे खा और कहा कक अगर मैं इिंिरवीऊ के वक्त पौहिं च िाता तो वक्त

भी

ीिें भर चक ु ी थीिं। प्प्रिं ीपल ने मुझे यह भी कहा

कक स वल इत्नीररिंग की बहुत ीिें अभी खाली थीिं,इ सलए मैं वोह ले लूँ ।ू मेरा कोई अपना ख़ा तज़ुबाग तो था नहीिं लेककन एक तो मेरे िंतोख भाई ने बताया हुआ था कक मैं स फग इलैक्िीकल या मकैननकल ही लूँ ू और द ू रे एक बात भी परचलत थी कक स वल का कोई फायदा नहीिं था लेककन यह मेरी भल ू ही थी क्योंकक बाद में मझ ु े मैह ू मैं ज़्यादा कामयाब हो आ गगया और वाप

कता था। मैंने स वल लेने

गाूँव आ गगया।

हुआ कक स वल में े इिंकार कर ढ़दया और दफ्तर े बाहर


अब मुझे एक बात और

ताने लगी कक आट्ग

मुझे वहािं ऐडसमशन समलेगी या नहीिं,इ

कालि की पिाई कब की शुरू हो चक् ु की थी,

े भी गचिंता होने लगी। मेरे प्पतािी भी अफ्रीका

आये हुए थे। उनको ाथ ले के मैं आट्ग कालि आ गगया। आट्ग कालि के प्प्रिं ीपल अमर स हिं िी े उन के दफ्तर में समले और प्पतािी ने ारी मटया बताई। प्प्रिं ीपल अमर स हिं िी एक भले और धासमगक इिं ान थे और कहने लगे,कक मैं है ड क्लकग के दफ्तर में िाकर फ़ामग भर दूँ ू और िो

ब्िैक्ि लेने हों मैं फ़ामग में भर दूँ ।ू प्प्रिं ीपल के दफ्तर

मैं है ड क्लकग के दफ्तर में चले गगया। है ड क्लकग ने और कालि की फी कफस्िक्

और मैथ्

ब्िैक्ि के बारे में

भी बता दी िो शायद अठारह या बी

े बाहर आकर

ारी िानकारी दी

रूपए महीना थी। मैंने कैसमटिी

सलया। इिंस्ग्लश तो कम्पल री ही थी और दो औप्श्नल

ब्िैक्ि मैंने

पिंिाबी और इतहा

ले सलया क्योंकक पिंिाबी में मझ ु े बहुत ढ़दलचटपी थी और इतहा में भी काफी ढ़दलचटपी थी। िाइम िे बल का मझ ु े ब कुछ बता ढ़दया गगया और द ू रे ढ़दन े मैंने कालि आना शरू ु कर दे ना था। बहादर और िीत तो पहले वोह ही ाइिं

े ही आया करते थे। िीत ने भी

ब्िैक्ि सलए थे िो मैंने सलए थे लेककन बहादर ने ऐक्नॉस्ेसमक्

ली थी और ऐन

और पॉसलढ़िकल

ी भी िॉइन कर ली थी। द ू रे ढ़दन मैं भी दोनों दोटतों के

कालि आ गगया और ऐफ ए में दाखल हो गगया स्ि

ाथ

को इिंिरमीडडएि भी कहते थे। पहला

ही पीररयड था इिंस्ग्लश का और वोह था प्रोफे र प्पयारा स हिं की क्ला

में ।

टकूल

े आ कर कालि मुझे बहुत अिीब लगा। पहले तो स्ज़िंदगी में पहली दफा क्ला की ीिें ऐ ी दे खने को समलीिं िै े हम स ननमा हाल में आ गए हों। स डड़ओिं की तरह ीिें नीचे े ऊपर को िाती थीिं। फ्रिंि की

ीिों पर स फग लड़ककआिं ही बैठी थीिं और पीछे

लड़के बैठे थे। लड़ककओिं को दे ख कर कुछ अिीब पहली दफा क्ला

में लड़ककआिं दे खख थीिं और

भी

ीिों पर

ा लगा क्योंकक समडल टकूल के बाद

भी िवान थीिं िो बहुत त ु दर ुतदर कपड़ों में ढ़दखाई दे रही थीिं। पहले ढ़दन िब प्पयारा स हिं का अिंग्रेिी में लैक्चर ुना तो मुझे कुछ भी

मझ में नहीिं आया। मुझे बहुत अिीब लगा क्योंकक कभी कोई शस इिंस्ग्लश में बोलता ुना ही नहीिं था। प्पयारा स हिं का इिंस्ग्लश का उच्चारण मैंने स्ज़िंदगी भर कक ी का नहीिं ुना। लेककन प्पयारा स हिं इिंस्ग्लश डडपािग मेंि का है ड था और उ

की बहुत ी ककताबे छप चक् ु की थीिं और एक ककताब कालि में भी लगी हुई थी। प्पयारा स हिं बहुत बड़ीआ पगड़ी बािंधते थे और हमेशा ऐचकन और तिंग पिामे में होते थे िै े िवाहर लाल नेहरू की ड्रै होती थी। उ

के इिंस्ग्लश के उच्चारण की कुछ लड़के सममक्री ककया करते थे और बहुत हिं ा करते थे। एक दफा कालि के एक फिंक्शन के वक्त एक लड़के ने प्पयारा स हिं की सममक्री कर दी, स्ि लेककन

े प्पयारा स हिं गुट े में आ गगया और टिे ि पर आ कर गुट े में बोलने लगे

भी लड़के लड़ककआिं डरने के बिाये ऊिंची ऊिंची हिं ने लगे। इ

के बाद प्पयारा स हिं

टिे ि छोड़ कर बाहर चले गगया। यहािं आ कर मैंने बहुत दे शों के लोगों का इिंस्ग्लश उच्चारण न ु ा लेककन प्पयारा स हिं िै ा कभी नहीिं न ु ा। अक् र कुछ लड़के कहा करते थे कक प्पयारा


स हिं का ऐक् ेंि स आलकोढ़िआ था यानी प्पयारा स हिं पहले टयालकोि में रहा करते थे। मुझे पता नहीिं यह टयालकोि एक् ेंि ककया था लेककन मेरी प्पयारा स हिं की याद स फग उ के ऐक् ेंि की विह मैथ्

े ही है ।

का कौन प्रोफे र था,याद नहीिं लेककन एक ही थे िो अररथमैढ़िक कै्कुल

ढ़िग्नोमैिी

ऐ्िेिा बगैरा पिाते थे। कैसमटिी हरचरन स हिं पिाते थे। हरचरन स हिं की बड़ी बड़ी मूिंछें थीिं और बहुत रोअब वाले थे, कभी हूँ ते नहीिं दे खे थे। कफस्िक् अिीत स हिं पिाते थे और कफस्िक् के प्रैस्क्िकल ओम प्रकाश धीर िी करवाते थे। अस्ित स हिं और ओम प्रकाश दोनों िवान थे और अभी दोनों की शादी भी नहीिं हुई थी। ओम प्रकाश कुड़ता पिामा पैहनते थे और काफी टमािग थे। अिीत स हिं भी बहुत टमािग बन कर रहते थे, नैकिाई लगाते और

पगड़ी बहुत खब ू रू त बािंधते थे। इतहा प्रोफे र ििं डन पिाते थे, कुछ मोिे ,गोरे पचा के करीब थे। इतहा बहुत मज़े े पिाते थे और हूँ ते भी रहते थे। पिंिाबी पहले गरु नाम स हिं

पिाते थे, और कुछ दे र बाद अतर स हिं आ गए। वै े तो गुरनाम स हिं भी बहुत अच्छे थे लेककन प्रोफे र अतर स हिं कुछ ज़्यादा ही अच्छे थे स्ितहें भी प्वढ़दयाथी चाहते थे। इिंस्ग्लश के प्रोफे र प्पयारा स हिं ि्दी ही कहीिं चले गए और नए प्रोफे र रिं िीत स हिं आ गए िो बहुत ही अच्छे और क्ला थे।

शुरू करने

े पहले कोई शेर

ुनाते थे और

ब को खश ु कर दे ते

कालि का वातावरण बहुत अच्छा लगने लगा था। लेककन मुझे कैसमटिी कुछ मुस्श्कल लग रही थी और यही बात िीत के ाथ भी हो रही थी। एक ढ़दन मैं और िीत ने मशवरा ककया कक कैसमटिी छोड़ दें और कोई और

ब्िैक्ि ले लें । हम ने कैसमटिी के प्रोफे र हरचरण स हिं

के नाम ऐस्प्लकेशन सलखीिं कक हमें उनका पीररयड छोड़ने की इिाित दी िाए। पहले िीत गगया और ि्दी ही बाहर आ गगया। उ

को इिाित समल गई थी। िब मैं गगया तो

हरचरण स हिं मुझे बोला कक वोह मुझे

ब कुछ

मझा दें गे क्योंकक उनके ढ़ह ाब

े मैं

कैसमटिी में इतना बुरा नहीिं था। अपनी ऐस्प्लकेशन ले के मैं हरचरण स हिं के कमरे आ गगया और िीत को

े बाहर

ब कुछ बताया। िीत कुछ नाराज़ होने लगा कक हम दोनों ने इकठे

मशवरा ककया था, अब वोह अकेला हो िायेगा। उ

का मुिंह रोने िै ा था। उ

को इ

तरह

दे ख कर मैं कफर हरचरण स हिं के कमरे में गगया और कैसमटिी छोड़ने की इिाित मािंगी। हरचरण स हिं ने िै े मिबूर हो गगया हो, मेरी ऐस्प्लकेशन पर

ाइन कर ढ़दए और मैं बाहर

आ गगया और िीत को बताया। िीत खश ु हो गगया और हम नया दे र बाद हम ने एकनॉसमक्

लेने का फै ला कर सलया और एकनॉसमक्

के कमरे में चले गए और एकनॉसमक् कुमार

ाहब

े एकनॉसमक्

ब्िैक्ि

ोचने लगे। कुछ

के प्रोफे र कुमार

लेने की दरखआ त की िो उतहोंने मान ली और हम ु

पड़ने लगे।


अब कालेि की पिाई अच्छी तरह शुरू हो गई और हम कालि के वातावरण में अच्छी तरह घुल समल गए। चलता…


मेरी कहानी – 55 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 27, 2015 कॉलेि में मैंने चार

च कहूूँ तो यह चार ाल वक्त ही पा ककया क्योंकक ना तो कोई ननशान था कक पि कर ककया करना था और ना ही मैं इतना होसशयार था स्ितना पहले ब

ाल पिाई की और

ालों में था, यह कहना उगचत होगा कक मैं एक ऐवरे ि प्वद्याथी ही था।

कॉलेि िाते और आ िाते। इन चार

ालों में ना ही हम ने फगवारे कोई कमरा सलया।

हम बयबड़े हो चक ु े थे और वोह शरारतें करने के ढ़दन अब रहे नहीिं थे। पॉसलिै स्क्नक कालि ककटमत में था नहीिं स्ि

े मुझे बहुत कुछ हास ल हो कता था और यह को ग भी तीन ाल का ही था लेककन यह ब रीव ग भी नहीिं हो कता था। अब अच्छे अच्छे कपडे पहनने

का शौक हो गया था। कभी िाऊज़र नीचे

े खल ु ा हो िाता,कभी िाइि हो िाता। िै े हम

दरिी को कहते वै े ही वोह बना दे ते। रै डी मेड कपड़ों का ररवाज़ उ शट्ग

के नए नए फैशन आते और हम उ

वक्त होता नहीिं था।

की ही कॉपी करते और दरिी को उ ी तरह

बनाने के सलए कह दे ते। फगवारे में कपडे की एक दक ू ान होती थी”गरु ु नानक” क्लाथ हाऊ िो िेिे हाई टकूल के

ामने ही थी, स्ि

में रै गल ु र हम िाते रहते थे यहािं

े अच्छे

अच्छा कपडा खरीद लाते थे और दरिी होता था लिंदन िे लररिंग िो गो शाळा रोड पर होता था िो बरात घर के

ाथ ही था। यह नए नए फैशन ननकालते थे।

लेककन एक बात थी कक धोबी इन को प्रै रख कर प्रै

े कपडे हम बहुत कम धल ु वाते थे और खद ु ही धोते थे और भी खद ु ही करते थे और िाऊज़र को क्रीज़ दे ने के सलए हम गीला कपडा ऊपर करते थे,स्ि

े िाऊज़र की क्रीज़ें ऐ ी हो िाती थीिं िै े छुरी की तीखी धार

हो। इन क्रीज़ों का हम बहुत खखयाल रखते थे क्योंकक इन क्रीज़ों की विह े ही बात बनती थी। िो प्रै होती थी,वोह कोयले े गमग होती थी, प्रै काफी भारी होती थी और इ में कोयले डाल कर और एक दो छोिी छोिी लकड़ीआिं डाल कर आग लगाते और पिंखे दे ते थे,स्ि और

े प्रै

े हवा

े प्रै

में पड़े कोयले आग

े लाल हो िाते थे,स्ि

गमग हो िाती थी

ारे कपडे प्रै

कर लेते थे। यह प्रै

अभी भी घर में कहीिं पडी है और छोिे भाई ने

िंभाल कर रखी हुई है । रे लवे रोड और िीिी रोड के चौंक पर उ

वकत बहुत रौनक होती थी। एक तरफ छोिा ा ब अड्डा होता था स्ि पर एक बहुत बड़े मिंिे ( बड़ी चारपाई ) पर कुछ ब ड्राइवर लेिे हुए होते थे और िीिी रोड की द ू री तरफ बहुत ी दक ु ानें होती थीिं। इन दक ु ानों के ामने दो बोहड़ के दरसत होते थे, स्ि के नीचे ररक्शों वाले, अख़बार बेचने वाले और अतय मज़दरू बैठे होते थे। इन दरसतों के नज़दीक एक लळारी की दक ू ान होती थी। यह लळारी खद ु कपड़ों और ख़ा

कर पगड़ीओिं को रिं ग और मावा दे ता था। कुछ छोिे छोिे लड़के उ

के पा

काम


करते थे और यह लड़के पगड़ीओिं को दोनों ओर

े पकड़ और ढ़हला ढ़हला कर

लळारी

ुखाते थे। इ

े हम बातें बहुत ककया करते थे। यह शस दे खने को तो इतना बूिा नहीिं लगता था लेककन कहा करता था कक िब मसलका प्वक्िोररआ मरी थी तो उ वक्त वोह िवान था और उ को हर बात का पता था,पता नहीिं क्या

च था क्या झूठ था,हम तो बातें ही

थे। िीत इ

शस

को िब अपनी पगड़ी दे ता था तो

पगड़ी को मावा इतना लगाना कक एक तरफ वोह हिं

ाथ ही कहा करता था,” चाचा ! मेरी

े पगड़ी हाथ

े पकडूूँ तो

ीधी खड़ी हो िाए”.

पड़ता था। आि तो मावे का ररवाज़ ही खत्म हो गगया है लेककन उ

बगैर पगड़ी कोई बािंधता ही नहीिं था। इ थी,स्ि

ी अिंगीठी पर चनों की बड़ी

ी प्रात

में चने रखे होते थे. िब हम लभ ु ाये को चने कुलचे का आडगर दे ते तो उ

चनों को प्लेि में डालने का एक अिीब चमचे

मय मावे के

के नज़दीक ही लभ ु ाया राम की आलू चनों की रे हड़ी

पर हम चने कुलचे का मज़ा लेते थे। छोिी

होती थी स्ि

ुना करते

ा अिंदाज़ होता था। पहले वोह प्रात में

का

े एक बड़े

े प्लेि में चने डालता,कफर कुछ बतगनों में

े बहुत ककटमों की थोड़ी थोड़ी तरी डालता, एक चिनी डालता,कफर कुछ किे हुए प्याज़ के छोिे छोिे िुकड़े डालता,कुछ उबले हुए आलुओिं के िुकड़े डालता िो ह्दी े रूँ गे हुए होते थे, चनों को चमचे े समक् करता और ाथ ही एक हरी समचग इ

अिंदाज़

ाथ रख दे ता। ब

े चनों के

यह उ

का अिंदाज़ भूख को चमका दे ता था और उ

ाथ कुलचे बहुत टवाढ़दष्ि लगते थे।

लुभाया राम की रे हड़ी और उ

के

ाधारण कपड़ों

के

े लगता था कक लुभाया एक गरीब और

ाधारण

े मकान में रहता होगा लेककन बहुत वर्षों बाद िब मैं भारत आया हुआ था तो लुभाया राम को समलने चला गगया। लुभाया अभी भी वहीीँ था और मुझे दे ख कर बहुत खश ु हुआ। बातें करने लगे तो लुभाया राम ने बताया कक उ ने मॉडल िाऊन में नई कोठी बनवाई थी और उ के दो बेिे अमरीका या कैनेडा (पूरा याद नहीिं ) चले गए थे। मॉडल िाऊन, िाऊन हाल के और एक दफा इ

ाथ का इलाका था िो कक ी

मय दरू दरू तक बेकार पड़ा हुआ था िगह िवाहर लाल नेहरू िी यहािं आये थे। लाखों की तादाद में इ िगह

पर लोग एकत्र हुए हुए थे,बहुत बड़ी ऊिंची टिे ि लगी हुई थी और कुछ लोग भार्षण दे रहे थे। शायद इलेक्शन का वक्त था और एक नेता िोर े नाहरा लगाता” गूिंिे धरती दे श पताल” ामने बैठे

ारे लोग िोर शोर

े बोलते,” दे श का नेता िवाहर लाल”। नेहरू िी आये और

तकरीबन पिंदरा समनि भार्षण ढ़दया और चले गए थे। उ

वक्त मैं बहुत छोिा ा था और इ ी िगह पर बहुत अच्छी नए ज़माने की कोढ़ठयाूँ बननी शुरू हो गई थीिं। िब यह कोढ़ठयाूँ बननी शरू ु हुई तो शायद उ वक्त १९५५- ५६ होगा,परू ा याद नहीिं। और इ ी मॉडल िाऊन में ही कहीिं लभ ु ाया राम ने कोठी बनाई होगी। लभ ु ाया राम े कोठी की बात न ु कर मैं है रान हो गगया था कक इ

आलू छोले की रे हड़ी

े इतनी आमदनी होती होगी ?


लुभाया राम की रे हड़ी के नज़दीक एक अखबार बेचने वाला होता था। इ

की कलाई पर

अखबारों का एक बण्डल रखा होता था,नाम तो पता नहीिं लेककन वोह हर कुछ समनि बाद बोलता रहता था,अिीत,प्रभात, समलाप,ढ़हतद ही स गरे ि होती थी और उ

माचार ले लो िी। इ

की उूँ गसलयाूँ स गरे ि के धए ु िं

पान और तिंबाखू

शस

के हाथ में हमेशा

े पीली हो गई थीिं, उ

के दािंत

े लाल लाल रिं गे होते थे िो दे खने में बहुत बुरे लगते थे। एक दब ु ला ा ाधू होता था िो ारा ढ़दन फगवारे में मािंगता रहता था और कफर इ बोहड़ के नीचे बैठ

िाता था। इ

ाधू

े हम बहुत नफरत ककया करते थे। यह छोिा ा लिंगोि पहने हुए होता था,गले में ननम्बओ ू िं की माला होती थी,एक दो छोिी छोिी दे वी दे वताओिं की फोिो गले में लिकाई होती थी, माथे और शरीर पर भवत ू ी मली हुई होती थी और माथे पर ही होती थी लाल रिं ग की लकीरें । दे खने में भत ू िै ा ढ़दखाई दे ता था। िब मािंगता तो बोलता नहीिं था, हाथ के इशारे

े ऐ े मािंगता िै े कहता हो”ननकाल पै े !”. उ

की इ ी अदा पे हम को

बहुत नफरत आती थी और हम उ को खझड़क दे ते थे लेककन वोह इतना ढीठ होता था कक कफर भी हम े मािंगने े कतराता नहीिं था। पा

ही एक छोिा

ा ढाबा होता था स्ि

पर छोिे छोिे लड़के काम करते थे। ररक्शे वाले

भी यहाूँ आ कर गप्पें हािंकते रहते थे। यह िगह बहुत ही रमणीक होती थी,बहुत रौनक होती थी। यह ब सलखने को मुझ े रहा नहीिं गगया क्योंकक यह बोहड़ वाली िगह एक इनतहा ही बन कर रह गई है और इ

िगह अब बहुत कुछ बन गगया है । इ िगह के द ू री और ही लच्छू का ढाबा होता था स्ि का स्ज़कर मैं कर चक् ु का हूूँ।

ड़क की

फगवारे की एक एक चीज़ उ ी तरह मेरे ज़हन में है िै े अब भी मैं वहािं ही हूूँ और कॉलेि में पि रहा हूूँ। कॉलेि में हमारे इिंस्ग्लश के प्रोफे र प्पयारा स हिं पता नहीिं कहाूँ चले गए थे

और उन की िगह नए प्रोफे र रणिीत स हिं आ गए थे। यह मॉडल िाऊन की एक कोठी में ककराए पर रहते थे। यह बहुत अच्छे इिं ान थे। अब हम भी कुछ कुछ अिंग्रेिी मझने लग गए थे। रणिीत िब भी क्ला में आते,पहले एक शेर बोलते या कोई छोिी ी कहानी बोलते और कफर लैक्चर शुरू करते। एक ढ़दन आये, आते ही बोले,” रात का

मय,

कबिटतान, आिंधी चल रही,बूिा कबरटतान में धीरे धीरे घूम रहा,तभी एक कबर आदमी ननकला, बूिे ने उ

की तरफ दे खा, कबर

े ननकला शस

ुन ान

े एक

बोला, िानना चाहते हो ?

यह शहर ख़मोशािं है , मर मर के ब ाया है ”, पूरा शेर मुझे याद नहीिं लेककन यह बहुत ही िबरदटत शेर था। इ के बाद रणिीत ने अपना लैक्चर शुरू ककया। एक बात और थी कक रणिीत स हिं की अिंग्रेिी हमें बहुत अच्छी तरह मझ आती थी और हम गधयान े उ का पूरा लैक्चर न ु ते थे। एक ककताब होती थी स्ि का नाम शायद


अनापूरना था या कुछ और याद नहीिं लेककन यह होती थी एक फ्रेंच माऊिंिे ननयज़ग की िीम की अनापूरना पहाड़ की चोिी पर पौहिं चने की दाटताूँ। यह एक

च्ची कहानी थी और इ

में

पहाड़ पर चिने के दौरान उन की तकलीफें बहुत अच्छे ढिं ग े वणगन की गई थीिं। एक थी शेक् प्पअर की”THE TEMPEST”. यह शेक् प्पअर का सलखा ड्रामा था िो पुरानी इिंस्ग्लश में सलखा हुआ था िो उ मय प्रचसलत थी। रणिीत स हिं हमें उन पुराने लफ़्ज़ों को मझाते और हमें मझ आता और बहुत अच्छा लगता। यह िै म्पेटि की कहानी होती थी, एक रािा की,स्ि

कश्ती में

के भाई ने उ

े गद्दी छीन कर उ

को और उ

मत ु दर के पानी में धकेल ढ़दया था। इ

काफी ढ़दलचटप थी स्ि बारे में अक् र क्ला

की बेिी को एक छोिी

बेिी का नाम था”MIRANDA”. कहानी

में कुछ िाद ू भी है और एक टत्री िो नीचे

े मछली थी उ

में हिं ी हो िाती थी। एक ककताब होती थी कप्वताओिं की,स्ि

के में

वड्गज़वथग,सम्िन, अलेग्ज़ाूँडर पोप, एडगर एलन पो और अतय कप्वओिं की कप्वतायेँ होती थी। एक थी शौिग टिोरीज़ की स्ि

में एक कहानी होती थी” दी अगली डस्क्लिंग” और एक और

थी” दी फ्लाई”. स्ि

ढ़दन रणिीत के घर बेिा पैदा हुआ था उ ढ़दन भी प्वद्याथी बहुत हिं ी मज़ाक के मूड में थे। रणिीत स हिं के क्ला में आने े पहले ही मैंने ब्लैक बोडग पर पिंिाबी में सलख

ढ़दया,” प्रोफे र िी वधाईआिं बेबी !”. िब रणिीत स हिं आये तो आते ही ब्लैक बोडग पर नज़र डाली और मुटकरा ढ़दए।

भी लड़के और लड़ककयाूँ हिं

व ुदा और बीना। यह दोनों भी िोर िोर िेनरल पोटि ऑकफ

े हिं

पड़े। क्ला

पड़ीिं। उन के

के पोटि माटिर की लड़की स्ि

में दो बहने होती थीिं,

ाथ ही बैठी थी फगवारे के

का नाम तो याद नहीिं लेककन उ

का रोल निंबर होता था ९८। यह लड़की पिने में बहुत होसशयार थी और खब ू ूरत भी बहुत थी। ारे लड़के उ को ९८ ही कहते थे। क्ला का वातावरण बहुत ही अच्छा होता था। बहुत वर्षों बाद िब मैं भारत आया तो एक ढ़दन फगवारे में अपने बाइस कल पर घूम रहा था कक ामने े रिं िीत स हिं आता हुआ ढ़दखाई ढ़दया। रिं िीत स हिं ने घिंिी बिाई और हम ाइकलों

े उिर पड़े। रणिीत ने खश ु हो कर मुझ

े हाथ समलाया और चाय की ऑफर की

िो मैं इिंकार नहीिं कर पूछे स्ि

का। बहुत ी बातें हुईं, उ ने मुझ े इिंग्लैण्ड के बारे में बहुत वाल का िवाब मैंने ढ़दया कक िो हम यहािं मझते थे वोह है नहीिं था और स्ज़िंदगी

बहुत कढ़ठन थी। मैंने च्ची च्ची बातें बताईं स्ि को ुन कर रणिीत स हिं बहुत है रान हुआ। कफर कहने लगा कक मझ ु े कालि की कौन ी याद ज़्यादा आती थी तो मैंने मज़ाक में िवाब ढ़दया था”९८” स्ि

को

ुन कर रणिीत स हिं हिं

पड़ा। उ

निंबर बताया और मझ ु े वहािं आने की दावत दी लेककन मैं िा नहीिं शादी के चक्कर में ही व्यटत था और चलता…

ने मुझे अपनी कोठी का

का क्योंकक मैं तो अपनी

ारा ध्यान पत्नी की ओर ही था।


मेरी कहानी – 56 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन August 31, 2015 रिं िीत स हिं के बाद कफस्िक्

के प्रोफे र अिीत स हिं थे िो काफी टमािग होते थे और हर

रोज़ नई नेकिाई लगाते थे। पिाने में बहुत अच्छे थे। कुछ शो अप्प भी ज़्यादा करते थे,हो भी क्यों ना,िवानी की उम्र और आगे बैठी होती थी खब ू ूरत लड़ककआिं। पीठ पीछे अिीत स हिं और कुछ लड़ककओिं की बातें होती रहती थीिं,कहाूँ तक यह नहीिं। इन लड़ककओिं के बीच एक लड़की होती थी स्ि और

भी लड़के पीठ पीछे उ

गई। पता नहीिं क्या कारण था।

के

च और झूठ था मुझे पता

र के बाल बबलकुल

को बुडड़आ कहते थे। एक ढ़दन वोह क्ला भी लड़ककओिं ने उ े

कालि का चपड़ा ी होता था गरु नाम स हिं िो

िंभाला और उ

फ़ेद होते थे

रूम में मूर्क्क्षगत हो

को कहीिं ले गईं।

ारा ढ़दन क्ला ों में िा कर प्रोफे रों को एक

रै स्िटिर पकड़ा दे ता था और प्रोफे र उ

पर कुछ सलखा हुआ पड़ कर ाइन कर दे ते थे। एक ढ़दन गरु नाम स हिं अिीत स हिं की क्ला में आया और एक पा ल ग पकड़ा ढ़दया। अिीत स हिं ने पा ल ग खोला और उ स हिं बताने लगा कक उ

में

े एक

िीकफकेि और एक नैकिाई ननकाली। कफर अिीत

ने लिंदन के एक कालि

े कॉरटपॉतडें

िीकफकेि और यह नैकिाई कालि वालों ने भेिी थी।

वधाई दी। लेककन क्ला नैकिाई अपने आकफ

को ग ककया था,स्ि

का

भी प्वद्यागथगओिं ने अिीत स हिं को

के बाद बाहर िा कर कुछ लड़के हिं ने लगे कक अिीत स हिं यह

में भी मिंगवा

कता था,स फग उ

ने लड़ककओिं को ही ढ़दखाना था।

कुछ भी हो ऐ ी बातें तो कॉलिों में होती ही रहती हैं लेककन मैं तो स फग उन ढ़दनों को याद

ही कर रहा हूूँ। अिीत स हिं बहुत अच्छे थे,इ े मैं तो मुनकर नहीिं हो कता,मेरे सलए तो वोह बहुत अच्छे इिं ान थे। ५५ ५६ ाल के बाद पिाई की भी बातों का याद आना तो बहुत अ िंभव है लेककन कुछ बातें हैं िो याद हैं। कफस्िक्

के तीन भाग होते थे,HEAT,LIGHT

AND SOUND. हीि की एक बात याद है CALORIE िो यूननि ऑफ हीि कहते थे, को िब पड़ते थे तो एक ट्यूननिंग फोकग होता था स्ि े िोर शीशे की ट्यूब के ऊपर कर दे ते थे,स्ि

में

े एक लाऊड

े कक ी चीज़

ाउिं ड

े िकरा कर एक

ाउिं ड आने लगती थी। कै े उ

ाऊिंड को मैअर करते थे,याद नहीिं। लाइि में एक शीशे का प्प्रज़्म होता था स्ि

को एक

प्लेन शीि पर रख कर प्प्रज़्म की लाइि को दे ख कर पेपर शीि पर प्पतज़ लगाते थे और बाद में उ

शीि पर लाइनें खीिंच दे ते थे। लाइि में

सलए एक छोिी था। इ

ी फ्रेज़ बनी होती थी िो

ात रिं ग होते हैं स्िन को याद रखने के

भी रिं गों को याद रखने का आ ान तरीका होता

को कहते थे,बैनी आह पीना ला यानी रिं ग िो इ

थे,बैंगनी,आ मानी,हरा,पीला,नीला, न वारी और लाल।

पकागर होते


कफस्िक्

के प्रैस्क्िकल प्रोफै र ओम परकाश धीर िी कराते थे। धीर िी हमारी प्रैस्क्िकल की

काप्पओिं पर िो

ाइन ककया करते थे, एक बहुत ही अिीब ढिं ग े ककया करते थे और मैंने उन के स ग्नेचर की इतनी प्रैकट् की कक पैह्चातना मुस्श्कल था. एक ढ़दन धीर क्ला रूम में आया नहीिं था। मैंने धीर के दटतखत करके

ब लड़कों को ढ़दखाए और

भी है रान हो

गए। एक लड़का आया और मुझे बोला कक उ

की कापी में बहुत ढ़दनों े धीर ने दटतखत नहीिं ककये और उन पर दटतखत मैं कर दूँ ।ू मैं दटतखत करने लगा तो िीत ने उ ी वक्त मेरा हाथ पकड़ सलया और बोला,” कालि गगया तो कालि

े छुिी कराने का इरादा है ? अगर पता चल

े ननकाल ढ़दए िाओगे”. मैंने भी अपनी गलती मान ली और इ

बच गगया। एक ढ़दन मैं कक ी काम के सलए प्रोफै र अिीत स हिं के ऑकफ एक और प्रोफै र भी था। अिीत स हिं अभी अभी हमारी क्ला

गन ु ाह

में गगया। वहािं

ले कर आया था। िब मैं

दफ्तर के अतदर गगया तो अिीत स हिं ने अपनी पगड़ी उतारी हुई थी और दोनों हाथों े को पकडे हुए था और ाथी प्रोफै र को बोल रहा था कक उ का र फिा िा रहा था। अिीत स हिं ने मेरी तरफ दे खा और लाल लाल आूँखों ?”.

ाथी प्रोफै र स्ि

आना”मैं भी

े मेरी तरफ दे ख कर बोला,” ककया है

का नाम मुझे पता नहीिं बोला,” बेिा इ

े बाहर आ गगया। लेककन बहुत दफा मुझे इ छोिी ोचता हूूँ कक िरुर अिीत स हिं का ब्लड प्रैशर हाई होगा।

में अिीत स हिं ककतने टमािग थे और इ

होती है ।

वक्त ककया थे,कभी कभी

पिंिाबी के प्रोफै र गुरनाम स हिं ऊिंचे लम्बे और तगड़े शस थे। कुछ

अतर स हिं

वक्त िाओ,कफर कभी

मझ गगया और कमरे

घिना की याद आती है और क्ला

ोच कर है रानी

थे और हमेशा मुटकराते रहते

मय पिंिाबी हमें गुरढ़दत स हिं प्रेमी ने भी पड़ाई थी लेककन कई

ाल हम प्रोफै र

े ही पड़े। यह प्रोफै र अतर स हिं बहुत ही टमािग ,गोरे , दाह्ड़ी बहुत नीि और कफक् ो लगा कर रखते थे,उम्र के होंगे ती पैंती ाल, हाथों की उिं गसलया बहुत नाज़ुक लड़ककओिं िै ी, और एक अिीब निाकत

े बोलते थे। बु्ले शाह,कबीर,फरीद, शाह हु ैन और शाह मुहम्द बहुत ही अच्छी तरह पडाते थे। िब बाबा फरीद के श्लोक पडाते तो बहुत मज़े े पडाते थे। एक श्लोक था,”अि ना ुिी किंत स ओिं,अिंग मुड़ मुड़ िाए,िाओ पूछो दहु ाग्नी तुम ककयों रै ण वहाए”. इ इ

के

रहे हैं, उ

शलोक पर लड़के बहुत कुछ बोलते और हूँ ते थे ककओिंकक ीधे अथग तो होते थे कक” आि मैं अपने पती के ाथ ोई नहीिं,इ सलए अिंग िूि प्वधवा

े पूछो कक तुम ककयों रो रही हो”. द ु रे अथग भगवान ् की और इशारा

करते थे कक” आि मैंने भगवान ् का नाम नहीिं सलया,इ पूछो िो कभी भगवान ् का नाम नहीिं लेते”. एक ककताब होती थी”मेरे चोनवें इकािंगी”इ

सलए अिंग िूि रहे हैं,उन लोगों

ककताब में वन एक्ि प्ले होते थे। मेरे डैटक पर

एक और लड़का होता था िो बहुत शरारती होता था। इ

वन एक्ि प्ले वाली ककताब पे एक


औरत के करै क्िर का नाम गलत प्प्रिंि हुआ हुआ था। करै क्िर का नाम तो था,”कमों” लेककन वहािं सलखा हुआ था,”करड़ो”. और तो कक ी ने इ बात का कोई नोढ़ि नहीिं सलया लेककन यह लड़का बनाना उ

ब को ढ़दखा कर हिं ा रहा था। इ

छोिी

ी बात को ले कर बात का बतिंगड़

की एक खब ू ूरती ही थी। यह लड़का ऐ ा था कक इ

िाती थी,खल ु कर नहीिं हूँ ता था,हीिं हीिं कर के समतना

को दे ख कर ही हिं ी आ

ा हूँ ता और

प्रोफै र प्रेमी ने एक बार कहा था कक कॉमेडडयन वोह है िो छोिी छोिी को हिं ाये और यही िै लेंि इ

ब को हिं ा दे ता था। ी बातों

लड़के में थी लेककन यह लड़का कुछ दे र बाद कालि छोड़

गगया था और कफर कभी नहीिं दे खा। एक ककताब होती थी कहाननओिं की स्ि

में एक कहानी

होती थी लाल स हिं कमला अकाली की सलखी िो बहुत रुमािंढ़िक थी और फ्रोफै र मज़े े पडाते थे। इ प्रोफै र अतर स हिं े मझ ु े बहुत कुछ समला। प्रोफै र ििं डन इनतहा

े लोगों

पढाते थे। इतहा

ाहब बहुत

की ककताब हमारे कालि के ही प्रोफै र गरु बक्श

स हिं छाबरा की सलखी हुई थी और एक और ककताब थी िो रामगढ़िया कालि के कुछ मय पहले रहे प्प्रिं ीपल ककरपाल स हिं नारिं ग की सलखी हुई थी िो बाद में पिंिाब यूननव ि ग ी के वाइ

चािं लर बन गए थे। ििं डन

ाहब बहुत अच्छा पडाते थे और शेर शाह ूरी के चैप्िर े पिाते थे। ििं डन की पड़ाई कुछ बातें अभी तक याद हैं। शेर शाह ूरी

को बहुत ही प्वटतार की बनाई िीिी रोड को बहुत ीरीअ ली और डीिे ल े पडाते थे और ख़ा कर उ के इत ाफ की बातें भी बताया करते थे। एक दफा शेर शाह के एक स पा लार ने िो घोड़े पर वार था और एक गाूँव में िा रहा था,ने एक नहा रही औरत को दे खा। ककओिंकक औरत अपने घर में छोिी

ी दीवार के पीछे नहा रही थी और स पाटलार घोड़े पर था,इ

सलए उ

ने औरत को दे ख सलया। औरत को िब मालूम हुआ तो भाग कर भीतर चली गई और अपने खाविंद को बताया। खाविंद ने शेर शाह ूरी के दरबार में हाज़र हो कर उ स पाटलार की सशकाएत की। शेर शाह ने उ ी तरह स पालार की बीवी को नहाने का हुकम ढ़दया और शकाएत करने वाले शस को घोड़े पर बबठा कर उ ी तरह स पा लार की बीवी के ाथ कराया। एक और बात िो औरिं गिेब के मुतलक थी। औरिं गिेब ने हुकम दे ढ़दया था कक उ के राि में कक ी को समऊस्िक बिाने की इिाित नहीिं होगी,ककओिंकक वोह कट्िर त ु नी था और ुस्तनओिं को समऊस्िक वस्िगत था। रािधानी के

उन लोगों ने एक अथी बनाई,उ

पर गाने वाले

भी गवैयों ने इकठे हो कर िलू

ननकाला।

ाज़ रख ढ़दए और रो रो कर लाल ककले के

बाहर चलने लगे। औरिं गिेब ककले की दीवार पर आया और बोला,” कौन मर गगया है ?” ास्ििंदों ने िवाब ढ़दया,” िी राग मर गगया है ”. औरिं गिेब ने पछ ु ा,” इन

िा रहे हो”,

ािों को कहाूँ ले

ास्ििंदों ने िवाब ढ़दया,” िी इतहें दफनाने ले िा रहे हैं”. औरिं गिेब बोला,” इन


को ज़रा गेहराई तक नीचा गाड़ना ताकक कफर बाहर ना ननकल आये”. इ प्वटतार

े बताता था। उन की बताई ढ़हटिरी अभी तक याद है ।

ऐक्नौसमक्

के प्रोफै र होते थे समटिर कुमार। यह कोई ६० ६२ के होंगे। यह अक् र हूँ ाते

रहते थे। िब कोई कुिे शन दे नी होती तो इिंस्ग्लश में बात करते थे वरना में दे ते थे,इ

बात को ििं डन बहुत

सलए हर बात आ ानी

हमें बैनहै म की इकनॉसमक्

ारा लैक्चर पिंिाबी

मझ आ िाती थी। अक् र हमें कहते रहते थे कक

पड़नी चाढ़हए क्योंकक को ग में तो एक और ही ककताब होती थी।

एक और ककताब िो कुमार

ाहब ने ररकमें ड की हुई थी हम ने ला रखी थी िो वाकई बहुत अच्छी थी। यह ककताब डीिे ल में सलखी हुई नहीिं थी स फग उतनी थी िो आ ानी े मझ आ िाती थी। याददाटत को ताज़ा करने के सलए सलखना चाहूिंगा कक एकनॉसमक् में एक होता था पापल ु ेशन गथउरी स्ि में दन ु ीआिं की आबादी के बारे में बताया हुआ था कक अगर दन ु ीआिं की आबादी बि िाए तो ककया होगा और आबादी को किंिोल में कै े रखा िा है , कुदरत कै े आबादी को किंिोल में रखती है । कुमार

कता

ाहब कहते थे कक अगर आबादी

ज़्यादा बड़ िाए तो आकाल

े आबादी बहुत कम हो िायेगी, आिंधीआिं तूफ़ान और बाि े भी आबादी कम हो िायेगी। उन का बैनहै म की ककताब े एक कुिे शन होता था िो मैं कभी नहीिं भूला और इ

को मैंने बहुत िगह सलखा है ,( this table of nature is for limited number of guests and those who come un invited will starve”. एक चैप्िर होता था डडमािंड और िाती हैं,इ ी तरह अगर

प्लाई का। अगर डडमािंड

प्लाई

े बड़ िाए तो कीमतें बड़

प्लाई डडमािंड

े बड़ िाए तो कीमतें नीचे आ िाती हैं। बहुत दफा िब प्रोड्यू र एक ही हो तो मनॉपली की स्टथनत हो िाती है और कतज़्यूमर को चीज़ लेनी ही पड़ती है चाहे यह मैहूँघी ही क्यों न हो,इ

को कहते हैं,( consumer is a milch cow

in the hands of a producer ).इ ी तरह इम्पोिग एक् पोिग का चैप्िर होता था स्ि कुमार

में

ाहब हिं ाया करते थे कक फ़ज़ग करो इिंडडया पाककटतान को X कमोडडिी भेिता है और

पाककटतान इिंडडया को Y भेिता है । अब इिंडडया को Y की बहुत िरुरत है लेककन पाककटतान वाईआिं भेि नहीिं रहा। अब इिंडडया बार बार पाककटतान को सलख रहा है कक वाईआिं भेिो वाईआिं भेिो,मैं वाइओिं के बगैर मरा िा रहा हूूँ। ब यही बात कुमार ाहब ऐ े बताते थे कक भी िोर िोर े हूँ ते थे। एक चैप्िर होता था बैंकरप्ट् ी यानी दीवालापन का,इ में कुमार ाहब खब ू हूँ ाते थे।

इन प्रोफे रों के इलावा कुछ और प्रोफे र भी आये स्िन में एक थे दिा

ाहब और एक और

थे स्िन की नेकिाई नीचे की ओर बहुत लम्बी होती थी और लड़कों ने उन का नाम िाया ाहब रखा हुआ था। एक और थे िो िवान थे और दिा ाहब े उन की दश्ु मनी थी और एक दफा उ

ने दिा

ाहब को चाक़ू ढ़दखा ढ़दया था स्ि

की विह

े लड़कों ने दिा

ाहब


के हक्क में

ारे शहर में मुिाहरे ककये थे और बैनर उठाये हुए थे स्ि पर एक ककया हुआ था और नीचे की तरफ खन ू बहता ढ़दखाया हुआ था और नीचे सलखा था,छुरे बािी नहीिं चलेगी,नहीिं चलेगी और कफर यह मुिाहरे का मिमा फगवारे के टिे शन ररपोिग करने गगया था। ब है स्िन में चक् ु के हैं। चलता…

े बहुत शायद इ

चाक़ू पें ि

हुआ पुसल

यह कालि की यादें स फग उन प्रोफे रों को मेरी शधािंिसल

दनु नआ में नहीिं होंगे क्योंकक इन घिनाओिं को अब ५५

ाल हो


मेरी कहानी – 57 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 03, 2015

हमारे इिंिरमीडडएि के एग्िाम हो चक् ु के थे और अच्छे निंबरों पर मैं, िीत और बहादर तीनों पा

हो गए थे। अब हम बी ए में दाखल हो गए थे। बी ए में आते ही हमारा

ोचने का ढिं घ

भी बदल गया था। वोह ही लड़के, वोह ही लड़ककआिं रोज़ दे खने को समलते थे और एक पररवार िै ा हो गया था। कालि में कोई प्रोफे र ना आता या छुिी पर होता तो हम कालि के लान में बैठे रहते और यह

मय होता था गप्पें हािंकने का। लड़ककओिं की बातें करते,

प्रोफे रों की बातें करते और कभी कभी

ाथी लड़कों का मखौल उड़ाते। एक लड़का होता था

िो र अक्षर को ग बोलता था। यह लड़का यों तो बहुत शरीफ होता था लेककन मैं इ की सममक्री हमेशा ही ककया करता था। एक ढ़दन बहुत े लड़के बैठे बातें कर रहे थे और लड़के ने कुछ बोला तो मैंने उ

की सममक्री कर दी और वोह उदा

हो गया और कुछ झेंप

गया। एक लड़का मझ ु को बोला,”गरु मेल ! यार क्यों इन को तिंग करता है?”. मैंने महौल को खश ु गवार रखते हुए बोला,”यारो ! मैं इ की शादी होगी तो इनकी इ कमज़ोरी

को बार बार इ ी सलए कहता हूूँ कक िब कल इ े इ की द् ु हन कहीिं इ े छोड़ ना िाए कक उ का

पनत तो अच्छी तरह बोलता भी नहीिं। कल यह मझ ु े बािार में समला तो मुझे कहने लगा, है

तेगे की गग ु मेल स आिंह, आ गईआिं शैहग दीआिं पग् नैलेिीआिं ( है तेरे की गरु मेल स आिंह आ गईआिं शैहर दीआिं प न ग ैलेिीआिं )”. स आिंह तुम्हारी बात तो इ

के बाद इ

अब आि मैं इ

भी िोर शोर

ही है ।

े हिं ने लगे और कहने लगे बाई गुरमेल

लड़के को मैंने बातें करके खब ू हिं ाया स्ि बात को

ोच रहा हूूँ कक कभी एक छोिी

सममक्री की थी और आि मैं खद ु ही बोलने था। यहािं मैं यह भी बता दूँ ू कक िीत के थे। बात बात पर

ाथ

े उ

ी बात पर मैंने इ

े बेज़ार हूूँ लेककन उ

ागथओिं को हूँ ाते रहते स्ि

की रिं िश दरू हो गई।

लड़के की

वक्त तो यह िोक ही

े मैं और बहादर भी कॉमेडडयन िै े हो गए की विह

े हम दोटतों में हरमन प्पयारे हो

गए थे. िो भी लड़का हम को समलता बहुत खश ु हो कर बोलता। हमारे ाथ एक और लड़का था स्ि की बहन भी इ ी कालि में पड़ती थी। दोनों बहन भाई रिं ग के बहुत गोरे थे। मुझे इ बात का पहले पता नहीिं था कक यह दोनों बहन भाई थे। एक ढ़दन लाइिेरी की गैलरी में हम दो दो त बैठे थे और यह गोरा लड़का भी नज़दीक ही बैठा था। कुछ ही दरू ी पर इ लड़के की बहन िा रही थी। इ मेरे दोटत ने ि्दी

लड़के की बहन के बारे में मैं कुछ बोलने ही लगा था कक

े मेरा हाथ पकड़ कर घूिंि ढ़दया और मैं चप ु हो गया। कुछ दे र बाद िब

यह गोरा लड़का चले गया तो मेरा दोटत बोला,”यह इ कुछ बोला नहीिं वरना मु ीबत खड़ी हो िाती।”.

वाल बच गया था वरना पता नहीिं ककया होता। इ

लड़के की बहन थी अच्छा हुआ तू ने ुन कर मैं ुतन हो गया कक मैं तो वाल घिना

े मैंने बहुत

ीखा कक पहले तो


कक ी की बात ना करो, अगर करनी पड़ ही िाए तो

ोच

मझ कर बात करो ताकक बाद में

पछताना न पड़े। यह लाइिेरी कालि के हाल की द ु री मिंस्ज़ल पर थी। कालि का हाल बहुत ही बड़ीआ होता था िो बहुत बड़ा था। स्ज़िंदगी में मैंने अभी तक कोई अखबार नहीिं पड़ा था। इ कालि की

लाइिेरी में ही मुझे अखबार पड़ने की आदत पड़ी। लाइिेरी में बहुत बड़ी बड़ी अ्मारीआिं थी स्िन को खोलने वाले पैनल शीशे के थे स्िन में े बड़ी बड़ी ककताबें ढ़दखाई दे ती थीिं। स्ज़िंदगी में पहली लाइिेरी मैंने अपने गाूँव में ही दे खख थी िो बहादर की कोठी के एक कमरे में होती थी। इ मस्ु श्कल

में पिंिाबी की छोिी छोिी कहाननओिं, कप्वताओिं और नावलों की ककताबें होती थीिं। े

ौ ककताबें होंगी। स फग दो ककताबें घर ले िाने की इिाित होती थी। यह कालि

की लाएिेरी तो बहुत बड़ी थी और ककताबें भी बढ़हुत मोिी मोिी होती थी। कभी कभी अलमारी े कोई ककताब ननकालते और पड़ने की कोसशश करते लेककन हमारी ढ़दलचटपी कोई ख़ा

नहीिं होती थी। हाूँ, अखबार पड़ने की आदत पड़ने लगी। पहले पहले तो कुछ

ना आता, धीरे धीरे ढ़दलचटपी बिने लगी ख़ा होती। मैगज़ीन भी दे खते, स्ि

कर िब अखबार में कोई ढ़दलचटप बात

में कहानीआिं और लेख होते थे।

पिंिाबी के नावलकार नानक स हिं िी एक मास क मैगज़ीन छापते थे स्ि हत”और इ ी तरह एक मैगज़ीन होता था”प्रीत लड़ी”िो गुरबक्

गुरबक्

स हिं प्रीतलड़ी के नाम

मझ में

े ही िाने िाते थे। यह गुरबक्

का नाम था”लोक

स हिं ननकालते थे और वोह

स हिं पहले अमरीका में एक

इत्नीअर थे लेककन भारत आ कर इतहोने यह प्रीत लड़ी मैगज़ीन छापना शुरू ककया और बाद में इतहोने प्रीत नगर भी ब ाया था स्ि स हिं के बाद उन के

की कहानी भी बहुत ढ़दलचटप थी। गुरबक् पुतर नवतेि स हिं िी इ प्रीत लड़ी के िंपादक थे, अब नवतेि िी

भी नहीिं रहे , आगे शायद उन के लड़के चला रहे हैं। इ ी तरह एक और मैगज़ीन होता था”आर ी”. इ

का एडडिर कौन होता था मुझे याद नहीिं। इन पतकागओिं की आदत ऐ ी पड़ी

की प्रीतलड़ी मैं यहािं भी मिंगवाता रहा िो बाई

ी आता था और मेरे पा

पौहिं चने में एक

महीना लग िाता था। अक् र

ोचता हूूँ कक िब हम बिुगग हो िाते हैं तो िवान बच्चों पर बहुत नज़र रखते हैं ताकक वोह कहीिं भिक ना िाएूँ और यह है भी ही है ककओिंकक उ िवानी के वक्त एक िोश होता है िो कभी कभी गलती करने को मिबूर कर दे ता है । इ ी का नतीिा ही तो

आि के युवा बच्चे बहुत गलत काम कर रहे हैं और इन पर इिंिरनैि ने बलती पे तेल का काम ककया है । उ मय भी गाूँव में लड़के लड़ककओिं के प्रेम की बहुत कहानीआिं न ु ने को समलती थीिं. हम

भी दो त भी लड़ककओिं की बातें अक् र करते ही रहते थे। मझ ु े

हारमोननयम और बािं रु ी बिाने का बहुत शौक होता था। हमारे घर का फ्रिंि रूम स्ि

को


बैठक बोलते थे, वहािं मैं अक् र हारमोननयम और बािं री बिाता रहता था लेककन मैं दरवािा बिंद कर लेता था क्योंकक बैठक के आगे गली का राटता था और लोग अक् र आते िाते रहते थे। कफर भी आवाज़ तो बाहर िाती ही थी। कभी कभी िब मैं घर के बाहर िाता तो एक लड़की स्ि

का नाम नहीिं लूिंगा मेरी तरफ दे खती रहती थी लेककन मैंने कभी उन को कुछ

नहीिं कहा या उ उ

की तरफ दे ख कर मुटकराया था लेककन ढ़दल में िरूर एक कसशश

ी थी।

लड़की का घर और हमारा घर कुछ ही दरू ी पर थे और मकानो की छतों पर चि कर यह

फा ला कोई पची

ती

गज़ का ही होता था। एक ढ़दन िब मैं अपने मकान की छत पर

गया तो वोह लड़की भी आ गई और उ

ने मेरी तरफ दे ख कर मट ु करा ढ़दया। मैं कुछ डर

ा गया क्योंकक गाूँव में ऐ ी बातें होना खतरे

े खाली नहीिं था क्योंकक ऐ ी बातों

हो िाते थे। लड़की को बल ु ाना भी मौत को बल ु ाना होता था क्योंकक इ

े खन ू

े लड़की की बदनामी

हो िाती थी। आि िब मैं यह बातें सलख रहा हूूँ तो मझ ु े बहुत हिं ी आती है कक परु ाना ज़माना भी कै ा ज़माना था। मैं कुछ दे र बाद कफर मकान की छत पर आया और वोह लड़की भी एक दम ऊपर आ गई

िै े मेरी ही इिंतज़ार कर रही हो। दरू दरू तक मैं दे खने लगा कक कोई मुझे दे ख ना रहा हो। उ

लड़की में बहुत हौ ला था लेककन मैं डर रहा था। उ लड़की ने मेरी तरफ दे ख कर मुटकराया और अपने माथे पर हाथ रख कर मुझे ैसलउि मारा। डरते डरते मैंने भी ैसलउि मार ढ़दया लेककन मैं ढ़दल में काूँप

ा गया और छत

े नीचे आ गया। मेरे मन को चैन नहीिं

आ रहा था। कुछ दे र बाद मैं कफर छत पर आ गया और वोह भी आ गई। अब मैंने पहले ैसलउि मार ढ़दया और इ

कक बात बन गई थी।

का िवाब उ

ारा ढ़दन उ

ने तुरिंत दे ढ़दया। ब

के बारे में ही

अब तो मैंने िान सलया था

ोचता रहा। कफर एक रात को वोह गली

में आ गई। मैं भी आ गया। काफी अूँधेरा था लेककन िवानी की उम्र में तो अूँधेरे में भी रौशनी ढ़दखने लगती है । उ तभी कुछ खिाक समलने लगे।

ने मेरा हाथ पकड़ सलया और मैं भी उ

के नज़दीक आ गया।

ा हुआ और वोह एक दम भाग गई। ऐ े ही हम रोज़ छुप छुप कर

एक ढ़दन माूँ कहीिं गई हुई थी और वोह लड़की घर ही आ गई। हम बैठक में आ कर बैठ गए और वोह बोलने लगी कक उ को मेरी बािं ुरी बहुत अच्छी लगती थी। मझ ु े है रानी होती है कक उ

वक्त ऐ ी

ोच होती है कक कोई नहीिं दे ख रहा लेककन बहुत नज़रें दे ख रही होती हैं। आि तो वोह वक्त ही नहीिं रहा। इ ी तरह हम अक् र समलते रहे थे लेककन हम ने ीमा नहीिं पार की स्ि ढ़दन उ

ने मझ ु े अपने पा

मैंने इन बातों कालि

े हमें पछताना पड़े। इ बबठाया और

बात का पता पहले मेरी माूँ को लग गया। एक मझाया कक मैं इ

राटते पर ना िाऊिं लेककन

े इिंकार कर ढ़दया कक मैं कोई हरकत कर रहा था। कफर मैं एक ढ़दन िब

े घर आया तो मेरी दो बाूँ रीआिं दादा िी ने फोड़ डालीिं थी। एक ढ़दन तो दादा िी


मुझ पर बर

पड़े और बोले,”दे ख ! उ

लड़की के भाई तेरा खन ू कर दें गे, तू हि िा और

यह काम छोड़ दे ”. मैंने दादा िी को कोई िवाब नहीिं ढ़दया। यह कहानी ज़्यादा दे र नहीिं चली क्योंकक उ

लड़की की शादी होने की ख़बरें आने लगीिं। उ

का घर के बाहर आना बहुत कम हो गया था। आि मुझे इ बात की मझ आती है कक वोह हमारे घर की और दे खती रहती थी कक कब कोई घर में ना हो। शादी के कुछ ढ़दन पहले वोह मझ ु े समलने आई और मझ ु े एक रुमाल ढ़दया और चले गई। यह हमारी आखरी समलनी थी। इ

कहानी को यहीिं प्वराम लग गया। हम ने कोई गलत काम नहीिं ककया लेककन

ोचता हूूँ कक लड़के लड़ककओिं में आकर्षगण तो शरू े ही होता रहा है लेककन वोह ु प्पयार करने वालों के सलए बहुत खतरनाक होता था। इ ी सलए ही तो हीर रािंझा, की कहानीआिं आि भी हम रहते हैं। यह छोिी

न ु ते हैं। आि तो

टपे

ट ी पन ु ु

ट ी पन ु ु मोबाइल और टकाइप पर ही लगे

ी घिना को न सलखता तो कुछ सम

हो िाता।

मैं सलख चक् ु का हूूँ कक अखबार पड़ने की आदत मुझे कालि की लाइिेरी खबर

मय

े ही पड़ी और

े ढ़दलचटपी हमेशा के सलए हो गई। वोह था रसशयन ऑटिोनॉि यूरी गागाररन का

में िाना, यह शायद १९६१ था िब टपे

फ्रिंि पेि पर फोिो थी स्ि

े यूरी गागाररन की फोिो आईं। अखबार के

में यूरी गागाररन अपने टपे

कुछ समनि ही गागाररन बाहर रहा था लेककन उ बड़े ध्यान

कैप्टयूल

े बाहर आया हुआ था। रच ढ़दया था। मैंने ारी खबर

ने इतहा

े पड़ी। गागाररन १९६८ में िहाज़ क्रैश होने

े मर गया था। एक और खबर उ

वक्त बहुत आती थी बेस््ियम कौंगो की यहािं स प्वल वॉर चल रही थी स्ि में गोरे लोगों को भी बहुत मारा गया था। आइिनहावर चाहता था कक यह दे श अमरीका के धड़े में शामल हों क्योंकक उ

वक्त को्ड वार शुरू हो गई थी। उ

वहािं यू ऐन ओ ने अपनी फौिें भेिी थीिं स्ि इ

वक्त कािंगो में बहुत बुरे हालात थे और में भारत े भी बहुत फौिी गए थे।

लाएिेरी में एक ढ़दन एक लड़के ने एक खबर

ुनाई। एक लड़के की शादी थी और वोह

लड़का बगैर दान दहे ज़ के शादी करवाना चाहता था, ना तो उ बात को मानते थे ना ही लड़की वाले मानते थे क्योंकक इ मझते थे। दोनों तरफ थी उ ने अपने

ढ़दन लड़का

े शादी की तैयाररयािं िोरो शोरों

के अपने घर के लोग इ

े लड़की वाले अपनी हतक े चल रही थी। स्ि

ुबह ही अपना बाइस कल ले कर अपने

ु राल चले गया। िाते ही उ

ुर को बोला कक वोह बगैर दान दहे ज़ के शादी करना चाहता है । इ

वक्त धासमगक र म परू ी करके उ

की वाइफ को उ

के

ढ़दन शादी सलए उ ी

ाथ चलने के सलए कह दें वरना

वोह घर नहीिं िाएगा और शादी भी नहीिं करायेगा। लड़की वाले मु ीबत में फिं

गए कक ककया

करें । उतहोंने लड़के को बहुत मझाया लेककन वोह माना नहीिं। लड़की वालों का कोई ररश्तेदार आदमी प्रोफे र था। उ के कहने पर लड़की वालों ने गरु दआ ु रे में िा कर उन दोनों की शादी


कर दी। लड़के ने अपनी वाइफ को अपने बाइस कल के पीछे बबठाया और अपनी वाइफ को घर ले आया। इधर लड़के के घर वाले उ आया। इ

को ढूतढ रहे थे और इधर यह अपनी वाइफ को ले

बात को लेकर हम बातें करने लगे कक िब हमारा वक्त आया तो हम भी वै ा ही करें गे।

कुछ महीने बाद एक लड़का स्ि धम ू धाम

की शादी हो रही थी कुछ नहीिं कर

का और उ

की शादी

े हुई। एक ने बहुत ही ादा शादी कराई और मेरा वक्त तो बहुत दे र बाद १९६७ में आया और मैंने बगैर दान दहे ज़ और द िानतओिं के ाथ शादी कराई। घर वालों को कुछ रिं स्िश थी लेककन मेरे प्पता िी ने मेरा

ाथ ढ़दया और हमारी शादी हो गई। वोह िवानी के

ढ़दन ही थे, िो चाहा कर सलया और अब मैं

मझता हूूँ यह मेरी ोच ही थी क्योंकक उ मय कुछ िैंड ा हुआ था की शाढ़दयािं पे खचग कम हो लेककन अब तो ज़माना बहुत आगे ननकल गया है । अब तो शाढ़दओिं पे ककतना खचग करते हैं कोई ढ़ह ाब ही नहीिं बलकक कुछ

लड़के वाले तो इ ी आशा में रहते हैं कक उन को बहुत कुछ समले। इन बातों को यही कहते हुए मापत करता हूूँ कक हमारा भी ज़माना था। चलता…


मेरी कहानी – 58 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 07, 2015

मेरा दोटत िीत एक ढ़दन मेरे घर आया और बोला," गुरमेल,मैंने कालि छोड़ दे ना है क्योंकक मैं बापू िी की मदद करना चाहता हूूँ”. िीत ने और भी बहुत ी बातें बताईं। िीत के बड़े भाई की शादी हो गई थी और भाबी के आने े घर का माहौल कुछ बदल गगया था। आगे उ

के

की दो छोिी बहनें भी बड़ी हो रही थीिं स्िन की शादी की स्ज़मेदारी भी िीत के बापू िी र पर थी। िीत के बापू िी और उ

के चाचा िी िालिंधर को रोज़ाना काम करने िाया

करते थे और वहािं एक फनीचर की वकगशॉप में कारपें िर लगे हुए थे। िीत की बातें ुन कर मुझे झिका ा लगा। बचपन े चला आया ाथ अब खत्म होने चला था। कफर िीत ने बताया कक उ े फगवारे एक टक्रू और नेल बनाने वाली फैक्िी में काम समल गगया था। रोिी

का वक्त हो गगया था और माूँ ने हम दोनों के आगे रोिी की थासलआिं रख दीिं। िीत माूँ को बोला,” चाची िी ! दो बड़ी बड़ी लाल अचारी समचें मझ ु े ला दें ”. माूँ ने हमें अचारी समचें ला दीिं। उ

ढ़दन हम ने बहुत बातें कीिं,परु ानी बातों को याद करके बहुत हूँ े। िीत उ ढ़दन ऐ े बातें कर रहा था िै े िे प ररकाडगर लगी हो। वोह परु ानी बातें करने लगा,िब हम शायद आठवीिं कक्षा में पड़ते थे। एक ढ़दन हम दोनों ने फगवारे कफ्म दे खने का प्रोग्राम बनाया

था,वोह भी पैदल चल कर फ़गवॉड ॓े िाना था। हम ने कफ्म दे खी पैराडाइज़ में और स नीमे े बाहर ननकल कर एक ढाबे पे रोिी खाई। उ

के बाद

ारी रात हम ने रे लवे टिे शन के

वेढ़ििंग रूम में गुज़ारनी थी। िब हम रे लवे टिे शन पर पुहिंचे तो वेढ़ििंग हाल के

भी बैंचों पर

लोग अपना अपना को कुछ मह ू

का खेत था स्ि की

ामान रख कर बैठे हुए थे। िीत मुझे बोला कक उ े ििंगल पानी िाने हो रहा था। रे लवे टिे शन की लाइन के कुछ दरू खेत ही खेत थे। एक कपा में कपा

के ऊिंचे ऊिंचे बूिे हो गए थे और इ

में बैठ िाने की प्राइवे ी

हूलत थी। कपा के इन बूिों को पिंिाब में नरमा भी कहते हैं। िब हम दोनों बैठ गए तो हमें यह मालूम नहीिं था कक वहािं कुछ लड़ककआिं भी बैठी हुई थीिं क्योंकक कपा इतनी ऊिंची थी कक हमें ढ़दखाई ही नहीिं ढ़दया। वोह लड़ककआिं हमें गासलआिं दे ने लगीिं। हम मु ीबत

में थे क्योंकक हमारा काम शुरू हुआ ही था और उठ िाने की स्टथनत में नहीिं थे। िीत ने उन को कुछ बोल ढ़दया। वोह लड़ककआिं ऊिंची ऊिंची बोल उठीिं," ए बापू ! यह नरमा खाणे यहािं आ बैठे हैं और उठते नहीिं !" हम उ ी तरह पिामे के नाले पकड़े भाग खड़े हुए कक कहीिं नछतर परे ड ना हो िाए। कुछ दरू ही गए होंगे कक वोह लड़ककआिं खखल खखला कर हिं ने लगीिं। दरू

िा कर हम ने कुएिं पर अपने आप को धोया और रे लवे टिे शन के मु ाफर खाने में आ गए। वहािं अभी भी बहुत लोग थे। हम रे लवे रोड पर घम ू ने लगे लेककन वक्त कािना मुस्श्कल हो रहा था। हम वाप आ गए। िब तक कुछ बैंच खाली हो गए थे। हम दीवार के ाथ वाले बैंचों पर लेि गए। ऊपर छत थी और यह लोहे के िीन की थी,स्ि पिीओिं पर बहुत

की

पोिग की लोहे की

े कबूतर बैठे थे और गुिकूँू गुिकूँू कर रहे थे। हमें नीिंद आ गई लेककन


ोये

ोये कभी कभी हम को मेह ू

होता िै े हम पर कोई चीज़ गगर रही हो। रात को

कोई बारह विे मुझे िाग आ गई और अचानक मेरा हाथ अपनी कमीज़ पर गगया और कुछ अिीब

ा मह ू

हुआ। मैं बैंच पर े उठा। यूिं ही मैंने अपनी कमीज़ की ओर दे खा,यह ारी की ारी कबूतर की बीठों े भरी हुई थी। मैंने िीत को भी उठाया और उ का भी यही हाल था। घबराये और शमागते हुए हम मु ाफरखाने े बाहर आ गए। एक दरसत े हम ने िै हखणआिं तोड़ीिं और कमीज़ पर

कुछ दरू िा कर रे लवे का एक बड़ा

े बीठों को

ाफ़ करने लगे। हमारी हालत बहुत बुरी थी। ा नल था। हम ने अपनी कमीज़ें उतारीिं और पानी े

ाफ़ करने लगे। ककटमत अच्छी थी क्योंकक गसमगओिं के ढ़दन थे। लौ होने

गाूँव को वाप

चल पड़े। कमीिें हम ने

था,कमीिें भी

ख ू गई थीिं। कुछ दे र बाद हम गाूँव वाप

े पहले पहले हम

रों पर रख ली थीिं, प्लाही आ कर ढ़दन चि आया आ गए थे। कुछ दे र बाद िीत ने

एक और बात दहु राई िो पहले भी बता चक ू ा था। िीत के प्पता िी गाूँव के गरु दआ ु रे में हर िंक्रात को कीतगन ककया करते थे और िीत

ाथ में ढोलक विाया करता था। एक ढ़दन िीत

िब टकूल आया तो मुझे बताने लगा," यार गुरमेल कल तो बहुत बुरा हुआ” िब मैंने पुछा कक ककया हुआ था तो बताने लगा," कई ढ़दनों े मुझे बहुत कबि थी और मेरे नीचे े बदबूदार गै

ननकल रही थी और पाद भी आ िाता स्ि

मैं बापू िी के

की आवाज़ ऊिंची होती, कल िब

ाथ गुरदआ ु रे में ढोलक विा रहा था तो िब भी मेरे नीचे

े गै

ननकलती

मेरी ढोलक की ताल बबगड़ िाती और बापू िी िे िी नज़र

े मेरी ओर दे खते और ताल ठीक

ढोलक पे डाओ डाऊ विा ढ़दया, बापू िी लाल लाल आूँखों

े मेरी तरफ दे खने लगे,िब घर

करने का इशारा करते। एक दफा तो ऐ ा हुआ कक मुझे लगा कक इ दफा बहुत ऊिंची आवाज़ े पाद की आवाज़ आएगी,इ सलए मैंने पाद ननकलते वक्त िोर िोर े दो दफा

आये तो बापू िी ने मुझे बहुत डािंिा कक आि तुम्हें ककया हो गगया था िो हर दम गलत ताल दे रहा था। अब मैं ककया बताता कक मुझे ककया हुआ था।" िीत की ई बात े हम

बहुत हूँ े थे और आि िीत कफर वोह ही बात दहु रा रहा था। आि िीत ने बातें बहुत की,पता नहीिं उ का मन अिंदर े उदा होगा और खश ु होने का नािक कर रहा था। कफर एक ढ़दन िीत ने मुझे उ

की फैक्िी दे खने को कहा और मैं भी उ

के

ाथ फैक्िी दे खने

चला गगया। फैक्िी तो बहुत बड़ी नहीिं थी लेककन मैंने भी मछीनें पहली दफा दे खीिं। यह फैक्िी हमारे एक दोटत के भैया की थी, और यह दोटत भी उ वक्त वहीीँ था। िीत ने एक तार को मछीिंन में डाला,मछीिंन को ऑन ककया और

क्रीऊ बन कर ननकलने लगे। दे ख कर मैं

बहुत है रान हुआ था। यह िीत की शुरुआत थी। िब मैं आि े पिंद्ा ाल पहले िीत को समलने मुम्बई गगया था तो उ वक्त िीत एक कामयाब बबज़ने मैन बन गगया था। उ का घर काफी बड़ा था और उ

के बापू िी भी वहीीँ थे िो अब बहुत बूिे हो गए थे। हम ने बातें की थीिं और िीत की प्वडडओ ली थी। हमारी बातें अब भी वोही थीिं िो

बहुत हिं हिं कालि के ज़माने में होती थी लेककन अब िीत का बेिा भी काम में उ था और िीत की पािंच

ाल की पोती मझ ु े अपना छोिा

का हाथ बिंिा रहा

ा कीबोडग बिा कर ढ़दखाने लगी


थी। इ

के कुछ

िालिंधर उ

ाल बाद िीत कफर मुझे गाूँव में ही समला था,तब मैं भी उ

की कोठी में गगया था िो उ

कॉतिै क्ि खत्म हो गगया। न तो मुझे उ

ने नई नई बनाई थी। ब

को समलने

के बाद हमारा

का िे लीफून पता है और ना ही उ

का एड्रे

लेककन िीत की वोह यादें ढ़दल में हमेशा रहें गी। िीत के कालि छोड़ने की बातों

े यह यादें

ताज़ा हो आईं. िीत का

ाथ छूि चक् ु का था। एक ढ़दन प्रोफे र ििं डन िब क्ला

कक कालि की तरफ

े एक िूर का प्रोग्राम बन रहा है ,इ

में आये तो हम को बोले

सलए अगर कक ी ने िाना हो तो

उतहें अपने नाम सलखवा दें । कफर उतहोंने प्रोग्राम बताया कक यह प्रोग्राम एक इतहा क िूर होगा स्ि

में इतहा क िगहें ढ़दखाई िाएिंगी,यह बी

चािग ककये िाएिंगे। कुछ ग्रािंि कालि की ओर

ढ़दन का िूर होगा,इ

के १५० रुपय

े समलने वाली थी। तीन प्रोफे र

ाथ

िाएिंगे।

बहुत ढ़दन हो गए थे लेककन िूर पर िाने के सलए लड़के आगे आ नहीिं रहे थे। उ मय १५० रुपय खचग करना भ के ब की बात नहीिं थी। प्रोफे र धीर भी ाथ िा रहे थे और एक और

िंटकृत के प्रोफे र थे स्िन का नाम मुझे याद नहीिं है । मैंने तो अपना नाम पहले

ही दे ढ़दया था। बहादर भी िा नहीिं रहा था। िीत तो कालि ही छोड़ गगया था और बड़ी मुस्श्कल

े २१ लड़के तैयार हुए। स्ि ढ़दन िाना था,उ शाम को फगवारे रे लवे टिे शन ढ़दली के सलए िनता मेल में वार होना था। नीयत रात को हम अपने कपड़ों के ूिके और एक छोिा

ा बबटतर ले कर फगवारे रे लवे टिे शन पर इकठे हो गए। प्प्रिं ीपल अमर

स हिं और कुछ अतय प्रोफे र हमें प्वदा करने के सलए आये हुए थे और एक फोिोग्राफर भी आया हुआ था,स्ि ने हमारी ग्रुप फोिो खीिंची िो एक ाल बाद हमारे कालि के मैगज़ीन में छाया की गई थी। रात के आठ विे िनता मेल चल पडी िो हर छोिे बड़े टिे शन पर खड़ी होती थी,इ ी सलए ही यह िे न हम

ुबह को आठ विे ढ़दली पौहिं चती थी। एक ही डडब्बे में

ब को िगह समल गई और हम शोर मचाने लगे और गाने लगे। प्रोफे र ििं डन और

प्रोफे र ओम प्रकाश धीर भी मटती करने लगे लेककन थे। एक टिे शन

िंटकृत के प्रोफे र ज़्यादा नहीिं बोलते

े बहुत े लोग िोकरे ले कर चि गए और कुछ के हाथों में दध ू के बड़े बड़े ड्रम थे। िब इन े पुछा कक िोकरों में ककया था तो उतहोंने बताया कक िोकरों में दध े ू बना मावा था िो वोह अम्बाले ले िा रहे थे िो उतहोंने हलवाइओिं की दक ु ानों को करना था और यह रोज़ इ ी तरह दध ू और मावा

प्लाई

प्लाई करते थे। पहली दफा हम ने दध ू

े बना इतना मावा दे खा। यह लोग भी गाने लगे। इन लोगों के

ाथ हम ने बहुत शुगल ककया। अम्बाले िा कर यह लोग उिर गए। यों यों रात बीत रही थी कुछ लड़कों को नीिंद के झोंकें आ रहे थे। प्रोफे र ििं डन ने हमें पहले ही बताया हुआ था कक िब भी नीिंद आये कमज़क्म दो लड़के िागते रहे ताकक ामान चोरी ना हो िाए। बहुत लड़के खरागिे मारने लगे


लेककन इ

तरह िे न में मैं कभी भी

ो नहीिं

कता था और िागता रहा। इ

मैंने बहुत दफा फर ककया था लेककन कभी भी ो नहीिं घिंिे की होती थी लेककन िे न या एरोप्लेन में मैं कभी भी िै े लड़के थे िो गाड़ी

िनता मेल में

का था। यों तो मेरी नीिंद आठ नौ ो नहीिं पाया था। कुछ और भी मेरे

ुटत तो बैठे थे लेककन िाग रहे थे। प्रभात की लौ शुरू होने लगी और रे ल

ुटत रफ़्तार

े चलने लगी,गाड़ी में भी ढ़हलिुल होने लगी और बोलने लगे कक ढ़दली

आ गई थी। गाड़ी बहुत ही टलो हो गई और हमारे सलए एक अिीब बात दे खने को समली िो बहुत नघरनत लगी। रे लवे लाइन के दोनों तरफ बहुत लोग डडब्बे ले कर हाित के सलए बैठे

हुए थे। आि तो घर घर शौचालय है और गाूँवों में भी बहुत लोगों के घर में शौचालय बने हुए हैं लेककन उ मय िो दे खा था शायद बहुत कम ढ़दली वालों को पता होगा। हमारे भी लड़के िाग रहे थे और बहुत लड़कों ने अपने मिंह ु पर रुमाल रखे हुए थे। इ को ब यह ही सलखग िंू ा कक स्ितना गिंद इ रे लवे लाइन के दोनों तरफ दे खा था इतना गाूँवों में बबलकुल नहीिं था क्योंकक गाूँव में लोग खेतों में दरू दरू चले िाते थे,इ रे लवे टिे शन आ गगया और हम ने अपना अपना चल पड़े। रे लवे टिे शन

े बाहर आ गए। ििं डन

सलए इतना गिंद नहीिं था।

ामान उठाया और प्रोफे रों के पीछे पीछे ाहब ने एक होिल में कमरों का इिंतज़ाम

पहले ही ककया हुआ था। िै क् ीओिं का इिंतज़ाम ककया गगया और हम होिल की ओर चल पड़े। होिल में आ कर अपना ामान कमरों में रखा और हमारे खाने का इिंतज़ाम ककया गगया। िब खाना खा चुके तो ििं डन लाल ककला दे खने िाएिंगे। स्ि

का इिंतज़ाम ििं डन

ाहब बोले कक कुछ घिंिे

भी लड़कों ने िी भर कर

भी आराम कर लें और दप ु हर को

ोया। शायद दो विे ब

आई होगी

ककले िा पुहिंच।े ििं डन

ाहब ने ककया हुआ था। भी लड़के कोच में वार हो कर लाल ाहब ने ग्रुप ढ़िकि सलया। हम लाल ककले की दीवार को दे ख दे ख कर

और अब हम इ

ामने खड़े थे। िब लाल ककले पर आये तो गेि दे ख कर ही है रान हो

है रान हो रहे थे। अब तक तो इतहा गए। ििं डन

के

में ही पड़ा था कक लाल ककला शाहिहाूँ ने बनाया था

ाहब ककले की दीवार के ऊपर छोिे छोिे झरोखों को ढ़दखा कर हमें बोले कक िब

दश्ु मन ककले पर हमला करता था तो इन झरोखों में

े ककले के स पाही दश्ु मन पर बिंदक ू ों

गोसलओिं की बुछार करते थे और िलता िलता तेल भी डाला करते थे। दश्ु मन लकड़ी की

ीडीआिं लगा कर ऊपर चिने की कोसशश करता था लेककन ककले के स पाही इन झरोखों में े दश्ु मन को पछाड़ते थे। कफर ििं डन ने हमें ककले के इदग गगदग की खाई ढ़दखाई िो पहली

डडफें

लाइन होती थी। यह पानी

स हिं राठौर ने ककले

े भरी रहती थी। कफर एक िगह ढ़दखाई स्ि

े अपने घोड़े के

ाथ छलािंग लगाईं थी। ककले के दरवाज़े

पर अमर

े हम अिंदर

दाखल हुए और इदग गगदग बहुत ी दक े भस्तदत ककताबे और ु ाने थीिं स्ि में इतहा ामान था। िै े िै े हम चलते गए हमारी है रानी बिती िा रही थी क्योंकक यह ब अभी तक ककताबों में ही पड़ा था। दीवाने आम और दीवाने ख़ा वोह तखत स्ि

की शान दे ख कर भी है रान हुए। पर शाहिहाूँ बैठा करता था,दे खा। अभी तक तो यह कफ्मों में ही दे खा था।


समऊस्ज़यम भी दे खा स्ि का

में बहादर शाह के कपडे थे और कुछ अिंग्रेज़ों के ज़माने का लड़ाई

ामान रखा हुआ था। अिंग्रेज़ों की फ़ौि के स पाईओिं के कपडे और स ख फौस्िओिं की पगड़ीआिं रखी हुई थीिं। कफर वोह कमरा भी ढ़दखाया स्ि में १८५७ की लड़ाई के बाद बहादर शाह को रखा गगया था। गरम हमाम ढ़दखाया स्ि

में बादशाह राननओिं के

करता था िो बादशाहो की ऐयाशी को िाहर करता था,इ करके हूँ ते थे। मैंने अपने कैमरे

पर

ाथ टनान ककया

भी लड़के और प्रोफे र बातें

े कुछ फोिो लीिं िो अभी भी मेरी ए्बम में हैं,िब कभी

उन को दे खता हूूँ तो िूर की याद आ िाती है । और भी बहुत कुछ दे खा िै े ककले की दीवारें िो इतनी चौड़ी थीिं की उन पर घोड़े दौड़ कते थे। कुछ घिंिे बाद हम बाहर आ गए और अपनी कोच में बैठ कर शीश गिंि गरु दआ ु रे में आ गए और ख़ा

कर वोह खह ू ी स्ि

में गरु ु तेग बहादर िी ने शहीदी

ारा गरु दआ ु रा गधयान

े दे खा

े पहले टनान ककया था।

गरु दआ ु रे में ही हम ने लिंगर का मज़ा सलया और होिल में आ गए। होिल में टनान ककया और गप्पें हािंकने लगे,कुछ ताश खेलने लगे। ििं डन और

े पहले िवाहर लाल नेहरू िी

ही हम ने ढ़दली की चलता…

ैर करनी थी।

ाहब ने

ब ु ह का प्रोग्राम बना सलया था

े समलने की अपॉइिंिमें ि ले ली गई थी,उ

के बाद


मेरी कहानी – 59 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 10, 2015

ुबह उठ कर होिल में नहा धो कर नाश्ता ककया। हमारी कोच आ गई थी। एक

रदार िी

ड्राइवर थे िो काफी हिं मुख थे।

भी कोच में बैठ गए और हम नेहरू िी को समलने चल

हमें समलने के सलए आया। ििं डन

ाहब ने उ

पड़े। िब हम नेहरू िी के ननवा

अटथान पर पुहिंचे तो द

इिाित समल गई। हम एक गाडगन में गए स्ि के फूल थे। मुझे सलखना पड़ेगा कक यह कौन

विे का वक्त था। एक आदमी

े बातें कीिं और हम को अिंदर आने की

में फूलों की ककआरीआिं थीिं और तरह तरह

ी िगह थी मुझे याद नहीिं लेककन बहुत ुतदर िगह थी और लान में कुछ गोरे और अतय बबदे शी घूम रहे थे। हम भ एक िगह खड़े हो गए थे। ज़्यादा

े ज़्यादा हमें पिंद्ा समनि इिंतज़ार करना पड़ा और नेहरू िी बाहर आ गए,

वोह तिंग पिामे और शेरवानी िै ी ड्रै

में थे और िेब के ऊपर ताज़ा लाल गल ु ाब का फूल

उन की शोभा बड़ा रहा था। नेहरू िी बबलकुल गोरे हमारी तरफ आये तो एक आदमी िो नेहरू िी के

सलम और अिंग्रेज़ों िै े लग रहे थे। िब

ाथ था बोला," यह लड़के पिंिाब

हैं”नेहरू िी ने हाथ िोड़ कर हम को नमटते बोला और ऐ ा ही हम ििं डन बोला," पिंडडत िी,यह लड़के पिंिाब के रामगढ़िया कालि

ब ने बोला। प्रोफे र

े आये हैं”. नेहरू िी ने हम

को पछ ु ा कक कालि में हम ककया पड़ रहे थे। हम ने अपने अपने ढिं ग़ नेहरू िी बोलने लगे कक हमें उतहोंने कम हमें ऐ े मेह ू

े आये

े िवाब ढ़दए। कफर

ाइिं

पड़नी चाढ़हए,दे श को िै क्नॉलोिी की बहुत िरुरत थी। मय में बहुत बातें बोलीिं िो ारी तो मुझे याद नहीिं लेककन कुछ ही समनिों में

होने लगा था िै े हम नेहरू िी को बहुत दे र े िानते थे क्योंकक बातें करने में वोह बहुत ाधारण े लग रहे थे। कफर कैमरा मैंन हमारी ग्रुप फोिो लेने लगा। नेहरू िी हमारे बीच खड़े हो गए और हमें बोले," िरा नज़दीक हो िाइए,फोिो अच्छी आएगी”. फोिो के बाद वोह और मेहमानों हमें नमटकार कर ढ़दया। हम भी वाप

े बातें करने के सलए द ु री तरफ चल ढ़दए और

आ कर अपनी कोच में बैठ गए। यह फोिो मेरी

ए्बम में है और िब कभी दे खता हूूँ तो पुराने ज़माने की याद ताज़ा हो िाती है । िब १९६२ की चीन की लड़ाई हुई थी मैं यहािं इिंग्लैण्ड में ही था और िब नेहरू िी इ दनु नआ को अचानक छोड़ गए तो मुझे उन के चले िाने का दुःु ख तो बहुत हुआ ही लेककन वोह ीन आूँखों के ामने आ रहा था िब हम नेहरू िी के ाथ ग्रुप फोिो खखचवा रहे थे। महान होते हुए भी वोह ककतने

ाधहरण थे।

कोच में हम बैठ गए थे और उ

ढ़दन

पहला तज़ुबाग था। ककताबों में पड़ा इतहा

ारा ढ़दन हम ने ढ़दली ही दे खनी थी। यह हमारा आूँखों

े दे खने चले थे।

े पहले हम ििंतर

मिंतर पे आ गए। िाइऐिंगल और ज़मीिं पर गोल चक्क्र दे ख कर पहले तो हमें कुछ आया। िूर गाइड हमारे

ाथ ले सलया गगया था स्ि

ने

ारा ढ़दन हमारे

मझ नहीिं

ाथ ही रहना था।


ने हमें बहुत कुछ बताया िो पूरा तो याद नहीिं लेककन िो उ ने िाइम कैलकुलेि ककया वोह हमारे सलए है रानी िनक था। उ गाइड ने हमें अपनी अपनी घडडओिं में वक्त दे खने को बोला,कफर उ

ने बड़ी िाइऐिंगल की परशाई दे ख कर िाइम कैलकुलेि ककया। हम है रान हो

गए कक स फग दो समनि का ही फरक था। उन ढ़दनों ही एक कफ्म आई थी”परदे ी” स्ि एक रसशयन हीरो था और नगगग

हीरोइन थी। इ

में

कफ्म में रसशयन हीरो यह ििंतर मिंतर

दे ख कर है रान हुआ था। काफी दे र हम यहािं घुमते रहे और हमें बताया था कक िय पर में िो ििंतर मिंत्र था,इ े भी बढ़िया था,इ बात की हमें उत् क ु ता थी क्योंकक हम ने िय पर भी िाना था। ििंतर मिंत्र

ीधे हम बबरला मिंढ़दर दे खने गए,कोई ख़ा

बात तो इ

मिंढ़दर

की याद नहीिं लेककन बाहर एक बड़ी

ी गफ ु ा बनी हुई थी स्ि की बाहर े शकल शेर िै े थी और शेर का मिंह ु बहुत बड़ा बना हुआ था। अब इ िगह पर कोई नई तब्दीली की होगी तो मझ ु े पता नहीिं। बबरला मिंढ़दर में हम स फग तकरीबन आधा घिंिा ही रहे होंगे। कफर हम एक आिग गैलरी दे खने गए,यह भी मझ ु े याद नहीिं कक कहाूँ थी लेककन यह मझ ु े बहुत अच्छी लगी। इ में पेस्तििं ग्ज़ बढ़िया े बड़ीआ थीिं। इ े पहले हम कक ी ने भी कोई पें ढ़ििंग नहीिं

दे खख थी। एक बहुत बड़ा कमरा था िो बहुत ही ठिं ढा था स्ि में कुछ पेस्तििं ग्ज़ तो दे ख कर ही मज़ा आ गगया। एक पें ढ़ििंग तो ऐ ी थी िो नज़दीक े ऐ े थी िै े िश े बहुत े रिं गों के छीिंिे पड़े हुए हों और इ में कुछ ढ़दखाई नहीिं दे ता था लेककन िरा दरू द बाराह फ़ीि पर एक ििंगल का

ीन ढ़दखता था स्ि

में बड़े ऊिंचे ऊिंचे बक्ष ृ ों के बीच में एक राटता बना

हुआ था स्ि पर एक समआिं बीवी एक कुिे के ाथ िाती हुई ढ़दखाई दे ती थी। यह तटवीर ही मुझे इ आिग गैलरी की याद ढ़दलाती है , वरना और भ कुछ भूल गगया है । आिग गैलरी

े बाहर आये तो कफर कोच में बैठ गए और ड्राइवर हमें कुतब मीनार ले आया।

अब तक तो कुतब मीनार की तटवीर स फग ककताबों में ही दे खते आये थे और आि इ ामने खड़े थे। अब तो पता चला है कक इ

हम

भ इ

के ऊपर िाने

के ऊपर चिे थे। मीनार के इदग गगदग

े मनाही है लेककन उ

के

वक्त

ीडीआिं घूम घूम कर ऊपर की ओर चली

िा रही थी,काफी अूँधेरा था,कुछ दे र बाद एक झरोखा आ िाता स्ि ऊपर िाते िाते अूँधेरा होने लगता और अचानक कफर झरोखे

े रौशनी हो िाती,कफर

े रौशनी आने लगती। इ ी

तरह घूम कर चिते हुए हम ऊपर आ गए और रौशनी हो गई, यहािं लोहे की बड़ी िाली लगी हुई थी ताकक ऊपर े कोई छलािंग न लगा के, ििं डन ाहब बता रहे थे कक यहािं े बहुत लोगों ने आतम हत्याएिं की थी। अभी दो मिंज़लेँ और ऊपर थीिं लेककन वोह बिंद की हुई थीिं, ऊपर िा नहीिं

के, हम ने दरू दरू तक नीचे नज़र दौड़ाई,लोग छोिे छोिे ढ़दख रहे थे और डर

ा भी लग रहा था। हम नीचे उतरने लगे और नीचे आ कर ऊपर को दे खा तो लगा िै े मीनार हमारे ऊपर झल ू रही है । कफर हम आयरन प्प्लर को दे खने लगे,स्ि ििं डन

थी कक

ाहब ने प्वटतार ोला

त्रा

े हमें बताया स्ि

ाल

े खड़े इ

में उ

के बारे में

मय की मैिलौरोिी इतनी कमाल की

प्प्लर को ििंगााल नहीिं लगा था। इ

के बाद हम


गया ुद्दीन बलबन का मक़बरा दे खने गए,स्ि

में गया ुद्दीन की कबर थी और बाउली बनी

हुई थी,नीचे िाने के सलए ीडीआिं थीिं और इ बाउली में पानी था और कुछ लड़के इ में छलाूँगें लगा रहे थे। मेहरौली में खण्डरात ही खण्डरात थे और अ्तमश का मक़बरा भी था स्ि

में अ्तमश की कबर भी थी. ििं डन

ाहब बता रहे थे कक स्ितना भी पत्थर इ

िगह

इटतेमाल हुआ वोह ढ़हतद ू मिंढ़दरों को तोड़ कर इटतेमाल ककया गगया था। कफर हम राि घाि गए। महात्मा गािंधी िी की मागध दे खख िो काले पत्थर े बनी हुई थी और उ पर हे राम सलखा हुआ था। बहुत े बबदे शी भी वहािं घम ू रहे थे और फोिो ग्राफी कर रहे थे। उ वक्त तो यह िगह बहुत छोिी और ाधाहरण ही थी लेककन बाराह तेराह ाल पहले तो बहुत अच्छी बन गई थी और अब तो बताते हैं यह िगह उ हम

ब थक्क गए थे और कोच होिल में वाप

े भी बहुत ही त ु दर है । आ गई। खाना खा कर ताश खेलने लगे।

ििं डन और धीर की यह स फत थी कक उतहोंने हमें बोर नहीिं होने ढ़दया था। कुछ अूँधेरा हुआ तो वोह हमें कनॉि प्ले ले गए। बड़ी बड़ी दक ु ानें दे खीिं िो पहले कभी दे खने को नहीिं समली थीिं और

े बड़ी बात एक दक ू ान में पहली दफा िै लीप्वयन दे खा स्ि

का बॉक्

लकड़ी

का बना हुआ था और टक्रीन मुस्श्कल े त्रा अठरा इिंच होगी। ििं डन ाहब ने बताया कक िीवी स फग ढ़दली में ही दे खा िा कता था। दक ू ान के बाहर खड़े हम यह िै लीप्वयन बहुत है रानी

े दे ख रहे थे। टक्रीन पर रास्ििंदर पर ाद िी बोल रहे थे लेककन हमें कुछ भी

ुनाई

नहीिं दे ता था। बहुत रात तक हम कनॉि प्ले की ैर करते रहे ,और कफर हम वाप होिल में आ गए। ुबह उठ कर खाना खाया और हमारी कोच आ गई। हम चल पड़े परु ाना ककला दे खने। पुराने ककले की बहुत ी यादें तो भूल गई हैं लेककन ििं डन ाहब ने िो बताया कुछ कुछ याद है कक इ ककले की िगह महभारत के मय पािंडवों की रािधानी इिंदरप्रटत हुआ करती थी और ककले की खद ु ाई के मय इ के कुछ प्रमाण भी समले थे। टतारवीिं दी में शेर शाह

ूरी ने इ

इिंदरप्रटत वाली िगह पर ककले को बनाया था। शेर शाह

ूरी ने हमायूिं

को हरा कर अपना राि कायम ककया था लेककन बाद में हमायूिं ने भी शेर शाह को हरा कर अपना राि वाप

ले सलया था। शेर शाह की कोई बनाई बबस््डिंग थी स्ि

याद नहीिं लेककन हमायूिं ने इ ीिीओिं

इतहा

िगह में अपनी लाइिेरी बना ली थी और इ

े गगर कर हमायूिं की मौत हो गई थी,हम ने वोह

का नाम मुझे

लाइिेरी की

ीड़ीआिं खद ु दे खीिं िो स फग

की ककताब में पड़ा करते थे। कुछ दे र के बाद हम ढ़दली का गचडड़आ घर दे खने चल

पड़े। गचडड़आ घर भी हम ने स्ज़िंदगी में पहली दफा दे खा, ुना तो बहुत था। स्ितने भी िानवर थे ब पहली दफा ही दे खे,यह भी एक नया तज़ुबाग था। कुछ घिंिे घूम कर हम हमायूिं का मक़बरा दे खने गए,ज़्यादा कुछ याद नहीिं लेककन एक बात याद है िो ििं डन

ाहब ने

बताया कक १८५७ की आज़ादी की ििंग के आख़री ढ़दनों में बहादर शाह ज़फर लाल ककले भाग कर इ को यहािं

हमायिंू के मकबरे में आ छुपा था और अूँगरे ज़ करनल हुड न ने बहादर शाह े पकड़ा था।


आखर में हम िामाूँ मस्टिद को दे खने चल पड़े। यों तो िामाूँ मस्टिद लाल ककले के नज़दीक ही थी,पता नहीिं ििं डन

ाहब आि ही हमें ले गए थे। ििं डन

ाहब ने बताया था कक

लाल ककले की तरह िामाूँ मस्टिद भी शाहिहाूँ ने ही बनाई थी और इ ात

ाल लगे थे और पािंच हज़ार लोग इ

कुछ याद नहीिं लेककन वाप

प्रोग्राम हमें बता ढ़दया था स्ि इिंतज़ार में हम चलता…

ो गए।

को बनाने में छै

पर काम करते थे। ढ़दली में और ककया दे खा

होिल में आ कर ििं डन

ाहब ने द ु री

ुबह आगरे िाने का

के सलए हम ने िे न लेनी थी। खाना खा कर

ुबह की


मेरी कहानी – 60 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 14, 2015

ुबह उठे , खाना खाया और कोच की इिंतज़ार करने लगे। कुछ दे र बाद िब कोच आ गई तो

हम ने अपना

ारा

ामान कोच में रखा और िे न टिे शन की ओर चल पड़े। ढ़दली िे न

टिे शन के बाहर तब इतनी भीड़ भाड़ नहीिं होती थी और टिे शन के आगे बहुत खल ु ी िगह होती थी। धीर और ििं डन ाहब ने ढ़िकि सलए और प्लेिफामग पर खड़ी गाड़ी में बैठ गए। ककतने विे यह गाड़ी चली याद नहीिं लेककन हम शेयरो शायरी शुरू हो गई थी और िोक्

भी

ब ताि महल दे खने के सलए उत् क थे।

ुनाने लगे थे। एक लड़का था अमर स हिं िो

बहुत शरारती और ननडर होता था। इ के बारे में िब मैं इिंग्लैण्ड आ गगया था तो बहुत कुछ न ु ने को समला था। यह लड़का वकालत करने लगा था और कुछ दे र बाद अपने गाूँव का

रपिंच भी बन गगया था। याद नहीिं ककतने घिंिे लगे होंगे लेककन पहले हम मथरु ा आये

थे। कहते थे मथरु ा के पेड़े बहुत प्रस द्ध थे। ििं डन ाहब ने एक डडब्बा पेड़े सलए थे और हम ब को खखलाये। शाम को हम आगरा पौहिं च गए। रहने के सलए कक ी ने एक धमग शाळा के बारे में बताया था तो हम वहािं पौहिं च गए। इ ककतने कमरे हम को समले लेककन यहािं ऊपर चब ु ारे थे,समडल में छोिा बाहर एक छोिा

धमग शाळा में काफी कमरे थे। याद नहीिं

फाई बबलकुल नहीिं थी, चारों ओर कमरे और उन के

ा आूँगन था और नहाने के सलए एक नल था। धमगशाला के

ा िी टिाल था। यह िगह कहाूँ थी,अब है या नहीिं मुझे पता नहीिं लेककन

यह हमें मुफ्त में समल गई थी और हमारे पै े बच गए थे।

कुछ दे र आराम करके हम आगरा शहर को दे खने चल पड़े. हम बहुत घूमे लेककन आगरा हमें फगवारे िै ा ही लगा,कोई ख़ा बात नहीिं ढ़दखी. एक बहुत तिंग बाज़ार था. हलवाइओिं की दक ु ाने काफी थीिं और इन दक ु ानों के ऊपर द ु री मिंस्ज़ल पर औरतें खड़ी थीिं िो आते िाते ग्राहकों को दे ख कर इशारे करती थीिं। ििं डन

ाहब ने हम को वाननिंग दी कक ऊपर को औरतों

की तरफ हम दे खें नहीिं और ना ही कोई इशारा करें क्यों कक वोह वेप्र्षाएूँ थी। हम ने तो स फग ककताबो में ही वेसशाओिं के बारे में पड़ा था और आि यह भी दे ख सलया था और हमें बहुत नघरनत लगा। ि्दी ि्दी ििं डन ाहब हम को वहािं े बाहर ले आये. इ के बारे में कोई नहीिं बोला। कुछ दरू िा कर एक

ाफ़ हलवाई की दक ू ान में प्रोफे र

ाहब हम को ले गए

और हमें पेठा खखलाया गगया िो बहुत टवाढ़दष्ि लगा। यहािं ही बैठ कर ब ु ह को ताि महल दे खने का प्रोग्राम बनाया गगया। दे र रात तक हम शहर में घुमते रहे और वाप धमग शाळा में आ गए।

ुबह उठ कर नहाया और और एक छोिे

दे खने चल पड़े िो बहुत दरू नहीिं था। कोई

े होिल में खाना खाया और पैदल ही ताि महल फाई नहीिं थी और लगता ही नहीिं था कक हम


ताि महल के नज़दीक आ गए हैं। तब ही पता चला िब हम ताि महल में िाने के सलए बड़े

े दरवाज़े में ढ़िकि लेने के सलए खड़े हो गए। यह बहुत बड़ी बबस््डिंग थी िो लाल पत्थर े बनी हुई थी। मुझे इ का नाम नहीिं मालूम लेककन िै े ही हम इ की द ु री ओर गए तो

ामने ताि महल ढ़दखाई ढ़दया। िो ताि महल की तटवीर ककताबों में दे खते आये

थे,अब हमारे

ामने था। धीरे धीरे हम आगे बड़ने लगे और ििं डन

चािंदनी रात को िब ताि का अक

ाहब बताये िा रहे थे कक

पानी में दीखता था तो बहुत ुतदर नज़ारा नज़र आता था। िब हम नज़दीक पौहिं च गए तो पहले अपने ित ू े उतारे और छोिी ी ीडीआिं चि कर ऊपर गए तो माबगल का फशग दे ख कर ही है रान हो गए। अब हम आगे िाते गए और इ

की

उतहोंने

िंद ु रता दे ख कर दिं ग रह गए। कफर ििं डन

ाहब एक एक चीज़ को

मझा रहे थे।

मझाया कक स्ितने भी रिं ग बरिं गे फूल ढ़दख रहे हैं वोह पें ढ़ििंग नहीिं है बस््क िीक

पत्थरों को काि काि के इ

में भरा गगया था,यही इ

उन की पिीओिं को हम गधयान

े दे खने लगे। इ

की ख ीअत थी। एक एक फूल और

के भीतर गए,छत की तरफ दे खा,दीवारों

को दे खा,कैलीग्राफी को दे खा तो बहुत है रानी हुई। नीचे गए और शाहिहाूँ और मुमताज़ की किें दे खीिं िो उ वक्त ही कबर ढ़दखाते थे,अब तो न ु ा है उन किों का रै पसलका ही है िानी अ ली किों को नहीिं ढ़दखाते। उ था। ज़्यादा

वक्त यह किें स्ि

िगह थी,उ

िगह बहुत अूँधेरा े ज़्यादा पािंच समनि हम वहािं रहे होंगे और हम बाहर ऊपर आ गए। बाहर आ

कर

भी प्रोफे र बातें करने लगे कक स्ितना पै ा ताज़ महल को बनाने में खचग हुआ वोह गरीबों का खन ू ही तो था,पता नहीिं इ को बनाते बनाते ककतने लोग मर गए होंगे। िंटकृत के प्रोफे र हिं

पड़े और बोले," स्ितना पै ा खचग हुआ,अब वाप इतने लोग इ े दे खने आते हैं और ढ़िकि ले कर इ े दे खते हैं ”. एक घिंिे बाद हम वाप

चलने लगे। बाहर आये तो आगे का प्रोग्राम ढ़दयाल बाग़ दे खने का

था। वहािं कै े पुहिंचे याद नहीिं लेककन उ पत्थर बबखरे पड़े थे। गाइड ने उ ताज़ महल यह

वक्त ढ़दयाल बाग़ अभी बन रहा था। िगह िगह

वक्त हमें बताया था कक िब यह मुक़्क़मल हों िाएगा तो

े भी अच्छा बनेगा। कफर उ

खब ू ी होगी कक इ

भी तो आ रहा है ,क्योंकक

ने एक बात बताई थी कक इ

में िो भी फूल बनेगा उ

बबस््डिंग की यह

को दब ु ारा कहीिं नहीिं बनाया िाएगा,कहाूँ तक

च्च था हमें मालूम नहीिं क्योंकक हम दब ु ारा वहािं गए ही नहीिं। यह िगह राधा

धमग के छठे गुरु िी ने बनानी शुरू की थी और आम लोगों ने इ

ुआमी

को बनाने में अपना

योगदान बहुत ढ़दया था। मेरे छोिे भाई और उ की धमग पत्नी ने राधा ुआमी गुरु िी े नाम सलया हुआ है और वोह बबआ तो िाते ही रहते हैं लेककन वोह आगरे ढ़दयाल बाग़ भी

गए थे और बताते थे कक अब तो वहािं बहुत ही प्वशाल बबस््डिंग बन गई है और इन के नाम े बहुत इिंटिीच ्उशिंज़ चल रही हैं और हटपताल भी है स्ि में लोगों का मुफ्त इलाि ककया िाता है । उ

मय तो हम ज़्यादा दे र नहीिं रुके क्योंकक स्ितना बन गगया था वोह तो बहुत त ु दर ढ़दखाई दे ता था लेककन िगह िगह किे हुए पत्थरों के ढे र लगे हुए थे। इ के बाद


ही हम आगरा फोिग दे खने चल पड़े। आगरा फोिग में हमें कई घिंिे लग गए,दीवाने आम दीवाने ख़ा

दे खा और िहािंगीर का महल भी दे खा और ख़ा

ढ़दलचटपी इ ी बुिग

कर वोह मु मतबुिग को बहुत में औरिं गज़ेब ने अपने बाप शाहिहाूँ को कैद कर के रखा था और

े दे खा स्ि

े ताि महल को दे खते दे खते उ

ढ़दखाई दे ता है और गाइड ने हमें एक छोिा मुस्श्कल अक

े एक इिंच

ुकेअर होगा। इ

की मौत हुई थी। इ झरोखे े ताि महल ा शीशा दीवार में लगा हुआ ढ़दखाया था िो

की एक तरफ खड़े हों तो इ

में ताि महल का

ढ़दखाई दे ता है । बताते थे कक यह ककला पहले ईंिों

े बना हुआ होता था िो कक ी रािपत ू रािे का था। मेहमद ू ग़ज़नवी ने रािे को हरा कर इ पर कब्ज़ा ककया था। बाबर हमाूँयू शेर शाह

रू ी भी यहािं रहे और अकबर ने तो इ े रािधानी बना सलया था। इ

में हम बहुत घम ु ते रहे और द ू रे ढ़दन हमारा प्रोग्राम था फतेहपरु द ू रे ढ़दन हम फ़तेह पर

ीकरी दे खने चल पड़े िो आगरे

गचश्ती की दरगाह थी। इ

के भीतर िा कर हम ने दे खा यहािं

ककले

ीकरी दे खने का।

े तकरीबन चाली

ककलोमीिर

दरू है । िब हम वहािं पुहिंचे तो पहले बुलिंद दरवाज़े की ओर आये िो बहुत ऊिंचा है । ीडीआिं चि कर हम इ दरवाज़े के भीतर गए। एक तरफ एक मस्टिद थी और यहािं ही लीम लीम गचश्ती की दरगाह पर

चादरें चिाई हुई थीिं और लोग िाली के ाथ धागे बाूँध रहे थे ख़ा कर इटत्रीआिं। कहते थे कक अकबर लीम गचश्ती े दआ मािंगने के सलए लीम गचश्ती को समलने आया था और ु उ

की बस्सशश

े ही अकबर को बेिे की दात प्रापत हुई थी िो बाद में िहािंगीर बना। इ िगह और किें थीिं। यहािं े ननकल कर हम ने अकबर के महल दे खे स्ि में पिंच महल की कुछ फोिो लीिं। गाइड ने हमें कुछ कफ्मों के नाम भी बताये स्ि

की शूढ़ििंग इ

पिंच महल

पर हुई थी। एक िगह थी स्ि में ककले की दीवार पर े कुछ लड़के पै े ले कर नीचे पानी में छलािंग लगाते थे। बीरबल का महल दे खा और एक था ऐसलफेति िावर,यहािं भी हम ने फोिो ली। योद्धा बाई का महल और मिंदर भी दे खा।

ारा ढ़दन हम यहािं रहे । बहुत कुछ यहािं दे खा था लेककन इतना याद नहीिं। एक बात याद है कक यहािं भूने हुए चने िगह िगह लोग बैठे बेच रहे थे। ििं डन वाप

ाहब ने बताया कक यह फ़तेह पर

ीकरी अकबर ने १५

ाल बाद ही छोड़ दी थी और

आगरे के ककले में आ गगया था शायद यहािं पानी की कमी हो गई थी। ििं डन

एक बात और भी बताई थी कक इ था और इ राणा

का नाम भी

ीकरी

ीकरी की िगह पर ही बाबर ने राणा े बदल कर फ़तेह पुर

ाहब ने

ािंगा को हराया

ीकरी रख ढ़दया था क्योंकक उ

ने

ािंगा पर फ़तेह पाई थी। कुछ भी हो हम ने अगर में बहुत कुछ दे खा था और इतने ालों बाद ब कुछ तो याद नहीिं लेककन िो दे खा उ को याद करके मज़ा आ िाता है और

कभी कभी इ वाप

परु ानी ए्बम में फोिो दे ख कर बीते कालि के ढ़दन याद आ िाते हैं। हम

आगरे आ गए और एक होिल

े खाना खा कर धमगशाला में आ गए। द ू रे ढ़दन हम


ने िय पुर को िाने का प्रोग्राम बनाया हुआ था। ो गए। चलता…

ारे ढ़दन के िूर की बातें करते करते हम


मेरी कहानी – 61 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 17, 2015 आगरे का िूर खत्म हो गगया था और

ुबह उठते ही हम िय पुर के सलए िे न में बैठ गए।

ककतने घिंिे में हम वहािं पुहिंचे याद नहीिं लेककन िय पुर हमें अच्छा लगा। महल ही दे खा। बाहर

े ही दे खने में अच्छा लगा और इ

रहे थे कक यह हवा महल

े पहले हवा

के भीतर गए तो ििं डन

वाई परताप स हिं ने बनाया था और इन के झरोखों में

की इटत्रीआिं हागथओिं को दे खती थीिं स्िन पर महारािा की

ाहब बता े महल

वारी और घोड़ों पर महारािा के

अहलकार होते थे,यह बहुत ही शानो शौकत वाला नज़ारा होता था स्ि में शहर की ारी प्रिा शामल होती थी। िय परु में बहुत दे खने लाइक िगह थीिं,ककले ही काफी थे। एक था अम्बर फोिग और महल िो बहुत ऊिंचाई पर था,और शायद एक था िय गि फोिग स्ि में एक बहुत ही बड़ी तोप थी िो कहते थे कक उ वक्त की दनु नआ में ब े बड़ी तोप थी और कभी इ

का इटतेमाल भी नहीिं ककया गगया था। एक था शीश महल स्ि

में शीशे का

बहुत इटतेमाल ककया गगया था। एक कोई मिंढ़दर था स्ि का नाम तो मुझे पता नहीिं लेककन उ पर बिंदर बहुत थे और हम ने बिंदरों को चने खखलाये थे िो रे हड़ी वालों े समल िाते थे। ब

े ज़्यादा अच्छा हमें ििंतर मिंत्र लगा,ढ़दली वाला ििंतर मिंत्र तो इ

था। गाइड ने हमें

मझाया था कक उ

लेते थे और वक्त तो समनिों तक की

मय कै े

ही होता था। इ

के आगे कुछ भी नहीिं

य ू ग ग्रैह्ण और चतद् ग्रहण का पता लगा िगह काफी फोिो हम ने लीिं। िय पुर

ैर हम ने खब ू की और उ ी शाम उदय पुर को रवाना हो गए।

उदय पुर भी बहुत कुछ दे खा लेककन ज़्यादा अब याद नहीिं,स फग यह याद है कक एक पुराना महल झील के बीच में था और हम भ एक कश्ती में वार हो कर वहािं गए थे और वहािं मैंने इ

पुराने महल में एक मोर की फोिो ली थी और यह फोिो उ

है ,एक िगह थी स्ि

को भूल भुलईआिं कहते थे स्ि

महल की याद ढ़दलाती

में राणीआिं खेला करती थी। उदय पुर

े हम अिमेर चले गए। अिमेर में सवाज़ा मुईनदीन गचश्ती की दरगाह पर गए। वहािं

क्वासलओिं की आवाज़ें आ रही थीिं। िब हम दरगाह के नज़दीक आये तो एक इमाम आये और हम को बोले,”बेिा िी,यहाूँ कुछ िेब कतरे हैं उन कीमती हम नें

ाहब

े बच कर रहना और अपना

ामान

िंभाल के रखना”. यह तो बहुत अच्छा हुआ क्योंकक कोई आधे घिंिे बाद ही ुना,कक ी का बिुआ चोरी हो गगया था। मैंने इ दरगाह की फोिो ली और एक

मिंढ़दर को दे खने चले गए। इ

मिंढ़दर का नाम ककया था,पता नहीिं लेककन यहािं भी बिंदर बहुत थे। कुछ दे र बाद हम झािं ी की ओर चले गए। झािं ी की रानी लक्ष्मी बाई के बुि के पा हम ने फोिो खखचवाई। यह बुि एक ऊिंचे प्लैिफॉमग पर बना हुआ था। रानी के हाथ में तलवार थी और पीठ पीछे अपना बेिा बाूँध रखा था। प्लैिफॉमग पर रानी का उ मय का इतहा

सलखा हुआ था िब वोह अिंग्रेज़ों के

ाथ लड़ाई लड़ रही थी। हम

भ ने श्रद्धा


रानी की तरफ अपने शीश झुका ढ़दए। इ

के बाद हम ककले की तरफ चल ढ़दए और वोह

ीन याद करने लगे िब वोह अिंग्रेज़ों के

भी बनी थी। इ उ े एक

ाथ लड़ रही थी,उ

कफ्म में िसमी हालत में रानी िब अिंतम

ाधू की कुढ़िया पर ले आया था, उ

में रख कर कुिीआ को आग लगा दी थी। इ को गधयान

े दे खा और ििं डन

आया यहािं

े लक्ष्मी बाई ने घोड़े के

आता है िब कोई उ

ाहब इतहा

ाूँ ों पर थी तो उ

के बाद हम ककला दे खने चल पड़े। भी बता रहे थे। कफर गाइड हमें उ

में वाप

िगह

े तोपों के गोले दागे थे। मझ ु े उन के

गाइड ने बहुत कुछ बताया था।

े पहले ही एक

ाहब ने होिल वालों को खाने का आडगर दे ढ़दया कक हम दो घिंिे

आएिंगे,िब तक खाना तैयार रखना। ककले की चिाई हम चिने लगे,बहुत ऊिंचा है

यह ककला। चिते चिते हमारी िॅं डन

िगह ले

ामने रख दे । गाइड हमें उन दो मु लमान

कुछ दे र बाद हम ग्वासलयर के ककले को दे खने चल पड़े। ककले को िाने ा होिल था। ििं डन

ारे ककले

ाथ छलािंग लगाईं थी। इत्हा क िूर का मज़ा तब ही

िरनैलों के बारे में बता रहा था स्ितहोंने उ

छोिा

का घोडा

ाधू ने उन दोनों माूँ बेिे को अपनी कुिीआ

मय का नक्शा हमारे

नाम तो याद नहीिं लेककन उ

वक्त झािं ी की रानी कफ्म

भ की

ािं

फूल रही थी। ककले में दाखल होने

ाहब ने हम को बताया और ढ़दखाया स्ि

े पहले ही

िगह अिंग्रेज़ों के तोपों के गोलों के ननशाूँ

लगे हुए थे क्योंकक यहािं भी अिंग्रेज़ों के ाथ लड़ाई हुई थी। ककले के ऊपर िा कर हम बहुत घूमें। ककला बहुत बड़ा था लेककन एक िगह में हम भ की ढ़दलचटपी हुई,वोह थी स्ि िगह स खों के छठे गुरु हरगोबबतद को िहािंगीर ने बारह ाल कैद कर के रखा था। बहुत छोिी

ी िगह थी और तब तो स फग दीवारें ही खड़ी थीिं. अब तो कहते हैं इ

िगह

गुरदआ ु रा बना हुआ है । दो घिंिे हम घुमते रहे और नीचे आ गए। हमें बहुत भूख लगी हुई थी,िब तक होिल वालों ने खाना तैयार कर रखा था,स फग रोिीआिं ही बनानी थी। फिा फि हमारे आगे थासलआिं आने लगीिं। तूर की दाल और ककड़ी की

ब्ज़ी थी, ऐ ा लग रहा था

िै े हम िनम िनम के भूखे हों। होिल वालों ने दब ु ारा आिा गूँध ू ा और हमें खश ु कर ढ़दया। एक रूपए थाली की कीमत थी और शायद हम ने ज़्यादा खा सलया था,इ और पै े मािंगने लगे। ििं डन

ाहब ने पािंच रूपए और दे ढ़दए स्ि

रात ग्वासलयर में ही कािी और

सलए होिल वाले

े वोह खश ु हो गए।

ुबह को दौलताबाद की तरफ चल ढ़दए। शहर में कुछ घूमा

और ककले को दे खने चल पड़े। यह वोह ही ककला था िो महम्मद तुगलक बेवकूफ बादशाह के पा

था। अपनी ढ़दली की प्रिा को मुहमद तुगलक ने यहािं दे वगगरर में आ िाने का हुकम दे ढ़दया था और बाद में कफर वाप िाने का आडगर कर ढ़दया था,स्ि े उ की आधी प्रिा या तो मर गई थी या बबमारी की हालत में दुःु ख झेल रही थी। ककला बहुत ऊिंचा था। कहते थे उ के छै ौ टिै प थे। मैं और हमारे िंटकृत के प्रोफे र ब े आगे थे और पीछे पीछे भी आ रहे थे। ििं डन

ाहब कुछ भारी शरीर के थे,इ

सलए कुछ ऊपर चि कर बैठ गए।


सशखर पर तुगलक की एक तोप थी। कुछ दे र रुक कर वाप

आने लगे। ककले की हालत तो

बहुत खटता थी लेककन स्ि मय अपनी अच्छी हालत में होगा बहुत ही कमाल का होगा। नीचे आ कर हम औरिं गाबाद की ओर चल पड़े। औरिं गाबाद पौहिं च कर पहले हम ने एक रदार िी के छोिे

े ढाबे में रोिी खाई। इ

रदार िी के वोह लफ़ज़ मुझे अभी तक याद

हैं," भाग्वाने ! उठ ि्दी रोिी पका, हमारे भाई पिंिाब े दाल

ब्ज़ी के

बीवी ही इ

छोिे

े आये हैं”. हम बैठ गए और भीतर

ाथ छोिे छोिे तवे पर पकाये फु्के आने लगे। लगता था कक दोनों समआिं े ढाबे को चलाते थे। िी भर कर हम ने खाया। इ

औरिं गज़ेब की वाइफ का मक़बरा दे खने चल पड़े स्ि

को बीबी का मक़बरा कहते हैं । यह

मक़बरा औरिं गज़ेब के बेिे ने अपनी माूँ के सलए बनाया था। इ महल िै ी है । औरिं गज़ेब की कबर भी दे खख स्ि

पर एक छोिा

गाइड ने बताया था कक औरिं गज़ेब ने बताया था कक उ बबलकुल

ाधाहरण मट्िी

े बनाई िाइ और उ

के बाद हम

की शकल बबलकुल ताि

ा पौदा लगा हुआ था। के मरने के बाद उ की कबर

का मिंह ु निंगा रहने दें ।

औरिं गाबाद

े हम एलोरा केवज़ दे खने चल पड़े। यह एक ििंगल में नघरी हुई गुफाएिं हैं स्िन में बुध िैन और ढ़हतद ू इतहा छुपा हुआ है । यह हमारे सलए एक नया तज़ुबाग था स्ि में

इतनी मूनतगआिं हम ने दे खख। इन को बताना ही बहुत मुस्श्कल है ,इतना बड़ीआ आिग ! एक ही पत्थर के पहाड़ को काि कर भी मिंढ़दर और उन में मूनतगआिं बनी हुई हैं. पर ीज़न इतना कक कोई नुक

ननकाल ही नहीिं

कता। याद नहीिं ककतनी गुफाएिं थीिं लेककन हमें दो घिंिे लग

गए। ऊपर नीचे िाना पड़ता था लेककन हम िवान थे। गए और वहािं एक छोिा

भी गुफाएिं दे ख कर हम बाहर आ

ा होिल था और वहािं सलखा हुआ था," स फग एक रूपए की थाली”. हम ने िी भर के खाया और िब ििं डन ाहब पै े दे ने लगे तो वोह बहुत पै े मािंगने लगे। ििं डन

ाहब होिल वाले

े बह

लगे कक एक रूपए की थाली के ढ़ह ाब

थे तो वोह कहने लगे कक थाली में स फग दो रोिीआिं थीिं और इ एक्टिा लगते थे लेककन यह कहीिं भी नहीिं सलखा था। इ आ गए और होिल वाले को मानना पड़ा। वहािं केव्ज़ दे खने चल पड़े। यह हमें अलोरा केव्ज़ मय के प्रभाव

े स्ज़आदा खानी हो तो े और लोग भी हमारे हक़ में

े ननकल कर हम ने कोई िे न पकड़ी िो

अििंता केव्ज़ को िाती थी। यह केव्ज़ काफी दरू थीिं। िो कुछ कुछ

बात

े इतने रूपए बनते

ुबह को हम वहािं पुहिंचे और अििंता

े भी अच्छी लगीिं। इन में पेस्तििं ग्ज़ बहुत थीिं े डैमेि हो चक् ु की थीिं। हम ने ऐडविागइज़में ि तो बहुत दे खख

थी िै े अििंता पैन,अििंता होिल, अििंता क्लाथ हाऊ

अनतआढ़दक स्िन पर एक मुकि

पहने इटत्री की फोिो होती थी लेककन यहािं आ कर पता चला कक यह फोिो अििंता केव्ज़ की इन पें ढ़ििंग की कापी थीिं। इन गुफाओिं में हम ने फ़्लैश लगा कर फोिो खखिंचवाईं। एक केव में

महात्मा बध ु का एक बहुत बड़ा बि ु था,स्ि के ाथ खड़े हो कर मैंने फोिो खखचवाई िो अभी भी मेरे पा है लेककन अूँधेरे में हमें यह पता नहीिं चला था कक यहािं धल ू मट्िी बहुत थी। बाहर आये तो मेरे ारे कपडे खराब हो गए थे। खैर हम ने बहुत मज़ा ककया और अपने


को खश ु ककटमत

मझते थे कक हमें यह केवज़ दे खने को समलीिं। हमारा अगला

फर था

निंदेड़ हज़ूर

ाहब िाने का। हम मनमाड रे लवे टिे शन पर उतरे । वहािं बहुत ी बैल गाडड़यािं थीिं स्िन के बैलों के ीिंग ऊपर की तरफ थे िब कक पिंिाब में ीिंग दोनों तरफ िाते थे,यह हमारे सलए नई बात थी। गाडड़ओिं वाले ज़्यादा लोग स हिं ही थे लेककन

भी ढ़हिंदी बोलते थे

िो हमारे दे खने को भी एक नई बात ही थी। हम गाडडओिं में बैठ गए और ि्दी ही गुरदआ ु रे पौहिं च गए। पहले हम ने माथा िे का और कफर लिंगर में खाना खाया। यहािं यह भी बता दूँ ू कक उ

मय गरु दआ ु रे की िगह इतनी बड़ी नहीिं होती थी लेककन आि तो बहुत कुछ बन गगया है । एक स हिं िी हमारे ाथ रहे वोह हमें भी इत्हास क िगहें और उन का इतहा

बता रहे थे। गद ु ावरी के ककनारे एक छोिा

िाता है । इ

ा गरु दआ ु रा था स्ि

को बिंदा घाि कहा

िगह की महानता बहुत है । यहािं ही एक ाधू माधो दा रहा करता था स्िन े चेले थे और उन े डरते थे क्योंकक कहा िाता था कक उन के वर्ष मे बहुत

के बहुत शक्तीआिं थीिं। िब स खों के द वें गरु ु गोबबिंद स हिं पिंिाब आये थे। माधो दा

े यहािं आये तो इ ी टथान पर

वक्त कहीिं बाहर गगया हुआ था। गुरु गोबबिंद स हिं िी ने उ के इ टथान पर कुछ बकरे काि ढ़दए। िब इ बात का पता माधो दा को चला तो वोह आते ही दे ख कर आग बबूला हो गगया और उ उ

मय उ

ने गुरु गोबबिंद स हिं िी को बहुत बुरा भला कहा िो की ही एक चारपाई पर बैठे थे. माधो दा ने अपने िाद ू मतत्रों े गुरु िी

को नुक् ान पौहिं चाना चाहा लेककन वोह बैठे रहे । माधो दा

क्रोगधत हो कर बोला," तुम ने

यह िीव हत्या वोह भी मेरे धमग अटथान में क्यों की ?" गुरु गोबबिंद स हिं िी बोले," ओ पाखिंडी,तुझे इ

बकरे की तो बहुत कफ़क्र है लेककन िो हमारे दे श में मुग़ल ढ़हतदओ ु िं को मार रहे हैं,उन की बहु बेढ़िओिं को गुलाम बना कर गज़नी में बेचा िा रहा है ,उ की कफ़क्र कोई नहीिं ?" यह

न ु कर माधो दा

गुरु िी की यह बातें

आ गगरा। गुरु िी बोले,"तुम कौन हो” माधो दा आि के बाद तुम बतदा स हिं हो”. इ नाम बिंदा स हिं रख ढ़दया।

ुन कर माधो दा

उन के चरणों में

बोला,"मैं एक बतदा हूूँ”तब गुरु िी बोले.,"तो

के बाद गुरु िी ने उ

को अमत ृ छकाया और उ

का

िब अचानक दो मु लमानों ने गुरु िी को चाकू मार कर घाएल कर ढ़दया तो गुरु िी ने उन दोनों को अपनी तलवार

े मार ढ़दया लेककन गुरु िी के खन ू बहुत ननकल रहा था तो एक हकीम ने आ कर िसम को ी ढ़दया। गुरु िी ठीक होने लगे लेककन कुछ ढ़दनों बाद िब उतहोंने एक तीर को कमान

े िोर लगा कर खखिंचा तो मािं

फि गगया। अिंतम

मय

नज़दीक आता दे ख गुरु िी ने बतदा स हिं को खाल े का िथेदार मुकरग कर ढ़दया। गुरु िी के िं ार को छोड़ने के बाद इ

बिंदा स हिं ने पिंिाब आ कर

को इकठे ककया और पहला हमला

रहिं द के

भी ििंगलों में बबखरे हुए स खों ब ू ेदार पर ककया स्ि ने गुरु िी के दो छोिे

बेिों को स्ििंदा दीवार में गाड़ ढ़दया था। बतदा स हिं ने बतदा स हिं ने िो काम ककया वोह स ख इतहा

रहिं द की ईंि

े ईंि बिा दी। इ

में कभी भी भल ू ा नहीिं िाएगा। इ

ने पिंिाब


में स खों के नाम का पहला स क्का चलाया लेककन उ

पर अपना नाम नहीिं सलखाया बस््क

गुरु नानक दे व िी का नाम सलखवाया। स हिं िी हमें यह इतहा

ुना कर हम को गुदावरी के ककनारे ले गए और गुरु िी के

म्बतध में और भी बातें बताईं,कफर उतहोंने हमें और भी बहुत कुछ बताया और यह भी बताया कक रात को गुरु िी के शटत्र ढ़दखाए िायेंगे। कुछ पै े दे कर हम ने स हिं िी को

प्वदा ककया और अपने कमरों में हम चले गए िो स हिं ने हमें पहले ही ले ढ़दए थे। कुछ दे र आराम करके हम गरु दआ ु रे में कीतगन

न ु ने चले गए और वहािं

ारी

िंगत को गरु ु गोबबिंद

स हिं िी के हगथआर ढ़दखाए गए। इन हगथआरों को दे ख कर हम है रान हो गए कक यह बहुत भारी थे। इ के बाद लिंगर छका और अपने कमरों में आ गए। ब ु ह उठ कर टनान आदी े फ़ागग हो कर लिंगर में खाना खाया और रे लवे टिे शन की ओर चल पड़े यहाूँ मम् ु बई का शरू ु होना था। स्ििंदगी में पहली दफा मिंस्िल को मन में चलता…

मेिे हम िे न में बैठ गए।

े हमारा

भी ने मब ु ई दे खनी थी। एक अध्भि ु

फ़र


मेरी कहानी – 62 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 21, 2015 निंदेड़ हज़ूर

ाहब दे खने के बाद हम मुिंबई के सलए िे न में बैठ गए।

फर लम्बा था। मुिंबई

पहुिंच कर हम ने दादर में एक कमरा सलया। अपना ामान रखा और खाना खाने के सलए एक होिल में गए स्ि का नाम शायद पिंिाब होिल था। बबलकुल पिंिाबी तिंदरू ी रोिीआिं और दाल

ब्ज़ी भी बहुत बढ़िया थी,िी भर कर खाना खाया। होिल े बाहर ननकले ही थे कक हमारे गाूँव का एक लड़का मेरी तरफ आता ढ़दखाई ढ़दया। उ को दे ख कर मुझे बहुत ख़श ु ी हुई। इ का नाम तो मझ ु े याद नहीिं लेककन यह मेरे दोटत िीत के मुह्ले में ही रहता था और इ

के बाप का नाम था गें दा स हिं लुहार,यह लोग बहुत गरीब थे। यह लड़का गाूँव में बहुत शरारती हुआ करता था और मझ ु े मलम ू है यह मिंब ु ई में भी बरु ी हरकतें ही करता होगा क्योंकक उ की शकल े ही ऐ ा लगता था। ारा ढ़दन हम पहले दादर और कफर दरू दरू तक घम ू ते रहे । मिंब ु ई का हम को कोई ज्ञान तो

था नहीिं,घम ू घम ू कर हम कफर दादर आ गए और यहािं एक दक ू ान

े मैंने एक रे न कोि

खरीदा िो बहुत बढ़िया था। एक नई बात हम ने यह दे खी कक बहुत लोग हमारे पीछे पीछे आने लगे और वोह हम को घड़ीआिं ढ़दखा रहे थे कक यह घड़ीआिं इम्पोिे ड थीिं,कुछ लोग अिंगूठीआिं हमें ढ़दखाते लेककन हम डरते उन

े कोई चीज़ खरीदते नहीिं थे क्योंकक हमें बताया

गया था कक मुिंबई में ठग बहुत हैं। कफर अचानक मुझे अपना ािंढू किंु दन स हिं आता ढ़दखाई ढ़दया. मेरी पत्नी की बड़ी बहन की गाई इ किंु दन स हिं के ाथ ही हुई थी। हमारी गाई एक ही ढ़दन में हुई थी। मेरी पत्नी के दादा िी पहले हमारे गाूँव मुझे शगन ु दे ने आये थे और इ

के बाद निंगल गाूँव किंु दन स हिं को शगुन दे ने गए थे,यह निंगल चहे ड़ू के नज़दीक है ।

यों तो किंु दन स हिं रामगढ़िया टकूल में ही पिता था लेककन हम ने एक द ू रे के कोई ख़ा

बात नहीिं की थी,पता नहीिं क्यों हम एक द ू रे

े कुछ शमागते थे। हमारे ग्रुप में

एक लड़का था िो किंु दन स हिं के गाूँव का था,शायद किंु दन स हिं उ आया था। कफर मेरे यह बी

ाथ कभी

को ही समलने के सलए

ाथ भी हाथ समलाया और हमें बताया कक यह िो लोग बेच रहे हैं,अगर

रूपए मािंगे तो इन को २ रूपए दे ने को बोलो,कफर यह चार पािंच रूपए की बेच

दें गे,यह लोग बहुत चालाक थे। ििं डन बी

ाहब ने एक घडी खरीदी स्ि

के उ

ने पचा

रूपए में बेच दी। मैंने एक अिंगूठी खरीदी स्ि

रूपए मािंगे थे लेककन बाद में उ के वोह द

चार रूपए की मुझे दे दी। यह अिंगूठी दे खने में बबलकुल दूँ ू कक मुिंबई

े िब हम वाप

ने

रूपए मािंगता था,आखखर में

ोने की लगती थी यहािं यह भी बता

पिंिाब को िा रहे थे तो ििं डन

ाहब की घड़ी खड़ी हो गई थी

और मेरी अिंगूठी के ऊपर िो छोिे छोिे रिं ग बरिं गे नग लगे हुए थे

ारे ही एक एक करके


राटते में ही गगर गए और अिंगूठी के ऊपर का रिं ग भी फीका पड़ गया था। एक बात यह भी सलख दूँ ू कक किंु दन स हिं ने मुिंबई में ही ड्राफ्ट्

मैंन का को ग कर सलया था और बाद में मुिंबई

में ही इमारतों के नक़्शे बनाया करता था। अब कब का ररिायर हो चक ु ा है और मुिंबई में ही उ

का घर है लेककन कभी कभी

ोचता हूूँ कक भाग्य क्या क्या ढ़दखाता है , किंु दन स हिं के तीन बेिे थे,तीनों की शाढ़दयािं कीिं,तीनों के बच्चे हुए लेककन दो छोिे बेिे अब इ दनु नया में नहीिं रहे । किंु दन स हिं और उन की धमग पत्नी बीमार रहते हैं। मेरी पत्नी हर हफ्ते उन को

फोन करती है लेककन वोह बहुत उदा रहते हैं। किंु दन स हिं एक टपोट्ग मैन रहा था लेककन अचानक प्विे मन डी की कमी े एक ढ़दन राटते में ही गगर गगया और ढ़हप फ्रैक्चर हो गई। पत्नी प्वचारी डायबैढ़िक है और डडप्रेशन लेककन ककटमत !

े भी पीड़त है । दोनों बहुत हिं मख ु हुआ करते थे

द ू रे ढ़दन हम मेरीन ड्राइव पर चले गए और अच्छा लगा और धीर

ाहब कालि की ड्रामा

मत ु दर का नज़ारा सलया। यहािं हमें बहुत ाहब ने बताया कक कफ्मों की बहुत ी शूढ़ििंग यहािं होती है । धीर

ो ाइिी के ऑगेनाइिर थे और बहुत दफा वोह नािकों में बहुत अच्छा रोल अदा करते थे,इ सलए उन को कफ्मों में बहुत ढ़दलचटपी थी, इ ी सलए वोह

हमें आर के टिूडडओ ले गए। तभी हम ने अशोक कुमार िी को एक बड़ी कार में िाते हुए दे खा। भी बोलने लगे,” दे खो,वोह अशोक कुमार !” य़ह गाडी बहुत ुतदर थी िो मुझे

इिंग्लैण्ड में आ कर पता चला कक वो ज़ैफ़र ४ थी। टिूडडओ के बाहर कुछ लड़ककआिं िो नाचने वाली लगती थी,शायद शूढ़ििंग की इिंतज़ार में थीिं। वोह टिूडडओ के बाहर घूम रही थीिं और धीर

ाहब उन

े बातें करने लगे और वोह लड़ककआिं भी धीर

गईं थीिं क्योंकक धीर

ाहब की ओर आकप्र्षगत हो

ाहब उन को अपने बारे में बता रहे थे। उन लड़ककओिं ने हलके हलके

लहिं गे पहने हुए थे िो बबलकुल ही ाधारण थे और उन का कोई डािं होना था। हम है रान हुए कक िो डािंस ग िं ग्ज़ग के कपडे कफ्म में इतने ुतदर लगते हैं,वाटतव में वोह बबलकुल टते और

ादा लगते थे और वोह लड़ककआिं भी दे खने में कोई अच्छी नहीिं लगती थीिं। दरू

े हम को कमाल अमरोही का टिूडडओ भी ढ़दखाया गगया स्ि और कहाूँ हम गए मुझे याद नहीिं लेककन इ

का नाम मुझे याद नहीिं।

के द ू रे ढ़दन बाद हम गेि वे ऑफ इिंडडया आ

गए। पहले हम को ताि होिल ढ़दखाया िो हम बाहर

े बबस््डिंग ही दे ख

बड़ी थी,भीतर िाना तो कक ी की है स यत में भी नहीिं था। इ

कते थे िो बहुत के बाद हमें समऊस्ज़यम ले

िाया गगया स्ि

में बहुत पुरारत्व वटतुएिं ढ़दखाई गईं। तकरीबन एक घिंिा हम यहािं रहे । बाहर आ कर ििं डन ाहब बोले कक अब हम को एलीफेंिा केव्ज़ दे खने िाना था। गेि ऑफ इिंडडया

े हम मोिर बोि में बैठ गए। यह भी हमारे सलए एक नई बात थी कक िब हम बोि

में बैठे तो

मत ु दर का पानी दे ख कर कुछ घबराहि

क्योंकक बोि में और भी काफी लोग थे,इ

ी हुई एक खौफ ा लगने लगा। सलए ि्दी ही मातय हो गए। बोि में बैठे बैठे


दरू का नज़ारा हम दे खते रहे िो बहुत अच्छा लग रहा था। बहुत दे र बाद हम एसलफेंिा के ककनारे आ लगे,बोि े उिर कर हम पैदल चलने लगे। यह एक ड़क थी स्ि के बीच में रे लवे लाइन थी और कुछ दरू िा कर एक छोिा

को अब बहुत रटि लगा हुआ था। कोई बात कर रहा था कक अिंग्रेज़ों के वक्त यह एक िूररयटि टपॉि हुआ करता था और इ इिंिन के पीछे बैठने के सलए ीिें हुआ करती थीिं स्िन पर लोग बैठा करते थे और बोि

े उिर कर यहािं तक इ

िे न में बैठ कर आते थे लेककन अब तो यह

ब खत्म था और लोग पैदल ही चलते थे। इ

पर चि कर

ारे आइलैंड की

ा इिंिन खड़ा था स्ि

न ु ा है अब कफर

े यह िे न चलती है और लोग

ीढ़ढयाूँ चिने लगे,इन

ीिीओिं के इदग गगदग दक ु ाने

ैर करते हैं।

कुछ दरू िा कर हम ऊपर िाने के सलए थीिं स्िन पर दक ु ानदार पोटि काडग और

मत ु दर

े ननकली अिीब अिीब चीज़ें बेच रहे थे।

यह केव्ज़ बहुत ही ऊिंचाई पर थी और िो लोग ऊपर िा नहीिं कते थे उन को कुछ लोग पालकी में ले िा रहे थे। ऊपर िा कर हम ने दे खा िगह िगह बोडग लगे हुए थे स्ि पर इन केव्ज़ का इनतहा

सलखा हुआ था। हमें पता चला कक इन केव्ज़ को एसलफेंिा नाम पुतग ग ेज़ों ने ही ढ़दया था क्योंकक उनहोने यहािं आ कर एक बहुत बड़ा हाथी का बुि दे खा था और

ाथ में और भी ऐ े बुि थे। क्योंकक हम अििंता एलोरा दे ख कर आये थे,इ

कोई अिीब बात नहीिं लगी लेककन आि मैं

सलए हमें

ोच कर है रान हो िाता हूूँ कक द ु री ती री

शताब्दी में िब यह केव्ज़ बनाई गई थी तो तब कै े वोह लोग कस्ष्तओिं में िा कर यहािं काम करने आते थे। अब तो बहुत ी मूनतगयािं िूिी हुई हैं लेककन उ वक्त यह ककतनी मय खाने के सलए छोिे छोिे होिल बने हुए थे यहािं खाना कोई इतना ुतदर होंगी। उ

महिं गा नहीिं था,अब तो बताते हैं वहािं अच्छे अच्छे रै टिोरैंि बन गए हैं और ििंगल में मिंगल हो गगया है । हम थक गए थे और वाप

िाने के सलए ि्दी में थे क्योंकक हमें बताया गगया

था कक आख़री बोि पािंच विे चलती थी और हम पहले ही चल पड़े और आधे घिंिे में गेि वे ऑफ इिंडडया पर पहुिंच गए। हमारे सलए एक बात और है रानी िनक थी और वोह थी िाम िो ड़क के बीच रे लवे लाइन पर चलती थी। यह बहुत धीरे धीरे चलती थी,इ का हॉनग ऐ ा

था िै े कक ी टकूल की घिंिी डडिंग डडिंग वि रही हो। कहते थे यह िामें अब खत्म होने वाली थीिं,कब खत्म हुईं,इ

का मुझे कोई पता नहीिं।

द ू रे ढ़दन हम ने कुछ और िगह दे खीिं िै े मुिंबई का पोटि ऑकफ

और एक रे लवे टिे शन

पर बहुत बड़ा क्लॉक था। हम ने कुछ शॉप्पिंग की और उ ी शाम को हम पिंिाब के सलए िे न में बैठ गए। कौन ा रुि था यह मझ ु े याद नहीिं लेककन इतना ही याद है कक िब हम

फगवाड़े पह ु िं चे तो हम बहुत खश ु थे. अपना ामान ले कर मैं अपनी मा ी के घर पौहिं चा यहािं मैंने अपना बाइस कल रखा हुआ था। अूँधेरा हो गगया था। मा ी ने बहुत िोर लगाया कक मैं वहािं ही ो िाऊिं लेककन मैं तो घर िाने के सलए बहुत उत् क था और आधे घिंिे में घर आ


गगया। माूँ भी खश ु हो गई। भूख लगी हुई थी और मैंने िी भर कर खाना खाया और ि्दी ही ो गया। पता नहीिं ककतने घिंिे ोया हूूँगा,िब उठा तो य ू ग दे वता अपने पूरे िलाल पर था। अब मैं घर

े बाहर को चलने लगा तो ऐ ा लगता था िै े मेरा कुछ गुम हो गगया हो,

कुछ भी करने को मन नहीिं मानता था। दो ढ़दन मैं कॉलेि नहीिं गया,ब उदा

था। आखखर तो िाना ही था, ो एक ढ़दन मैं

मन उदा

ुबह बहादर के घर अपना

ही

ाइकल ले

कर चले गया और कॉलेि को चल पड़े। कॉलेि पहुिंच कर ब कुछ नॉमगल हो गया। लड़के हम े ढ़िप के बारे में पूछ रहे थे और हम बता रहे थे। ब कुछ back to normal हो गगया।

चलता…


मेरी कहानी – 63 गुरमेल स हिं भमरा लिंदन September 24, 2015

कोई वक्त था िब बबदे ों में लोग बहुत कम िाया करते थे। मेरे प्राइमरी और समडल टकूल के ज़माने में शायद कुछ आदमी ही परदे गए हुए थे। बबदे िाने वाले पहले शस एक तो थे मेरे प्पता िी और एक थे द ू रे मोह्ले में रहने वाले चरण स हिं िो अफ्रीका गए थे। चार आदमी गए थे स घ िं ा पुर को और कुछ यह थे

ाल स घ िं ा पुर काम करके यह इिंग्लैण्ड आ गए थे,

ुच्चा स हिं अमर स हिं कमग स हिं और प्पयारा स हिं । मेरे प्पता िी और चरण स हिं तो

शायद छोिी उम्र में ही अफ्रीका गए थे लेककन स घ िं ा पुर िाने वाले यह चार लोग शायद १९५४ ५५ में गए थे। इ

के बाद एक थे बहादर के चाचा िी और यह भी शायद ५४ ५५ में

ही गए थे। यह चारों लोग राणी परु में हमारे मोह्ले के ही थे स फग बहादर के चाचा िी कुछ दरू रहते थे। यह चारों लोग िब अभी गाूँव गाूँव में

े गए नहीिं थे तो बहादर के चाचा िी तो

े आसमर थे लेककन द ू रे चारों के कपडे फ़िे हुए होते थे और कच्चे होते थे और इन के घर गरीबी े कूि कूि कर भरे हुए थे। यह चारों स हिं थे और े गाूँव आये तो यह

और

र पर पगड़ी बािंधते थे लेककन िब यह लोग कुछ

भी के मकान

ाल बाद इिंग्लैण्ड

ब क्लीन शेव थे और बहुत अच्छे गमग ि ू पहने हुए थे। ोने के कड़े ोने की अिंगूठीआिं पहनते थे। उ वक्त नाइलोन की कमीज़ें स फग बाहर े ही लोग

पहन कर आते थे,भारत मे नाइलोन होती नहीिं थी। इन की नाइलोन की कमीज़ों को दे ख दे ख कर हम तर ते रहते थे कक काश हमारे पा होते थे कक यह लोग कुछ

भी ऐ ी कमीज़ें हों। इ

बात

े भी हम है रान

ाल पहले ही फ़िे कपड़ों में होते थे,अब यह अचानक गमग

कै े पहनने लग पड़े। एक बात और भी थी और यह थी उन के बिुओिं में बड़े बड़े नोि।

ूि

लोगों पर एक ही प्रभाव होता था कक इिंग्लैण्ड में पै े बहुत थे,वहािं शीशे की ड़कें थीिं और बागों े फ्रूि तोड़ कर ही बहुत पै े समल िाते थे। एक दो आदमी नज़दीक गाूँव िगपाल पर े भी गए हुए थे।

एक तो इन लोगों के कपडे बहुत अच्छे होते थे और द ू रे इन का रिं ग भी कुछ बदला हुआ लगता था और लोग ि्दी ही इतहें पहचान िाते थे कक यह आदमी बाहर े आया हुआ था लेककन एक ख़ा

बात यह थी कक यह लोग गाूँव में आ करके अिंग्रेिी के लफ़ज़ बोला करते

थे और हम बहुत हिं ा करते थे क्योंकक िो अिंग्रेिी यह बोलते थे बहुत अिीब होती थी। अक् र एक लफ़ज़ यह बहुत बोलते थे और वोह था ऑलरै ि ( alright ). और भी बहुत लफ़ज़ थे स्िन के कारण हम हिं पड़ते थे और िब भी कोई नया शस इिंग्लैण्ड े आता तो हम कहते,” लो एक और ऑलरै ि आ गगया ).


िब मेरे प्पता िी हमेशा के सलए अफ्रीका छोड़ आये थे तो उन का इरादा अब गाूँव में रहने का ही था लेककन िब मैं आट्ग

कालि में दाखल हो गगया तो कुछ ही महीनों बाद प्पता िी

का इरादा इिंग्लैण्ड िाने का हो गगया। क्योंकक उ

वक्त प्पता िी के पा

(बाद में कैननया ) बिढ़िश पा पोिग था और उ

मय बिढ़िश पा पोिग का मतलब यह ही

होता था कक वोह

कता थे,कक ी वीज़े की िरुरत नहीिं होती

ीधे िब भी चाहे इिंग्लैण्ड िा

ई ि अफ्रीकन

थी क्योंकक कैननया अभी आज़ाद नहीिं हुआ था,भारत की तरह कैननया पे भी अिंग्रेज़ों का ही राि था। िब मेरे प्पता िी भी इिंग्लैण्ड आ गए तो वोह बहुत अप ेि थे और िब भी उन का खत आता तो यह ही सलखा होता था कक इिंग्लैण्ड में ठिं ड बहुत है । दरअ ल प्पता िी ने अफ्रीका में बहुत अच्छे ढ़दन गज़ ु ारे थे क्योंकक वहािं ब इिंडडयन लोगो ने अपने अपने घरों में अफ्रीकन नौकर रखे हुए थे स्िन को बोई कहते थे और खद ु बहुत ऐश की स्ज़िंदगी गज़ ु ारते थे। पािंच ढ़दन काम करते और वीकैंड पर पािीआिं करते, ििंगलों में फारी की ैर करते और मैहलाएिं मज़े करतीिं, इकठी हो कर िाऊन की

ैर करतीिं क्योंकक घर का

अफ्रीकन ज़्यादा लोग अनपि और गरीब होते थे,इ भी रखी हुई थीिं और उन के बच्चे भी होते थे.

ारा काम बोई ही करते थे।

सलए बहुत लोगों ने तो अफ्रीकन औरतें

इतनी ऐश भरी स्ज़िंदगी बबताने के बाद यह कुदरती ही था कक प्पता िी को अब बहुत सत काम करना पड़ रहा था और ब े तकलीफ वाली बात यह थी कक खद ु ही शॉप्पिंग,खद ु ही खाना बना कर काम पर िाना और कपडे भी खद ु ही धोने पड़ते, इ थी कक नहाने के सलए हफ्ते में एक दफा ही

में और भी बुरी बात

ि ैं ल बाथ्

िो िाऊन की कौं ल ने बनाये हुए थे,में िा कर नहाना, घरों में बाथ बहुत कम होते थे, गोरे लोगों के भी बहुत घर बाथ रूम के बगैर ही होते थे और वोह भी

ि ैं ल बाथ में िा कर नहाते या टवीसमिंग करते थे। वहािं बहुत े बाथ बने हुए होते थे और दो सशसलिंग दे कर एक तौसलआ और एक छोिी ी ाबुन की ढ़िककआ समलती थी। ब लोग कुस ओ ग िं पर बैठे रहते थे और िब कोई बाथ खाली होता तो घिंिी वि िाती और स्ि

की वारी होती वोह उठ कर बाथ में घु

लोगों को अब नहाने के सलए एक ही ढ़दन समलता था,और इ थे। हर गचठ्ठी में प्पता िी यह ही सलखते थे कक वोह कुछ िाएिंगे और कफर कभी वाप

िाता। रोज़ नहाने वाले

बात पर प्पता िी बहुत दख ु ी ाल काम करके इिंडडया आ

इिंग्लैण्ड को नहीिं आएिंगे। हमारे मोह्ले के चार लोग और मेरे

प्पता िी तो एक ही िाऊन में रहते थे लेककन बहादर के चाचा िी बी थे। एक बात थी कक उ चाचा िी ब

ककलोमीिर दरू रहते

मय लोगों में मुहब्ब्त बहुत होती थी। कक ी रप्ववार को बहादर के पकड़ कर अपने भी गाूँव वास ओिं को समलने आ िाते,कभी यह लोग बहादर

के चाचा िी को समलने चले िाते। इन लोगों का लत ु फ एक बात में ही होता था और वोह था पब्ब में िा कर बीअर पीना और कफर आते वक्त प्वटकी की बोतल ले आना। अपने


मेहमान के सलए मीि बना कर रखा होता था और घर आ कर छोिी छोिी ग्लास ओिं में प्वटकी पीना और मीि खाना बातें करना। इ और अपने अपने घरों के दुःु ख

ुख

े उन की हफ्ते भर की थकावि दरू हो िाती

ािंझे कर लेते।

िब हम फगवािे मैढ़िक में दाखल हो गए थे तो एक लड़का िोगगतदर िो पा िगपाल पुर का रहने वाला था, उ

को उ

के प्पता िी अपने

के गाूँव

ाथ इिंग्लैण्ड ले गए। हम में

े यह पहला लड़का था िो इिंग्लैण्ड गगया था और यह भी बता दूँ ू कक यह लड़का मझ ु े आि े १५

ाल पहले मेरे छोिे भैया की

िगरी में समला था और अफ़ ो

बात का भी है

कक मैंने इ े पैहचाना नहीिं था क्योंकक अब इ

ने पगड़ी बाूँधी हुई थी और लम्बी दाहड़ी थी। मेरे भैया ने मझ ु े बताया कक,” भैया ! यह िोगगतदर स हिं है और आप के ाथ पड़ता था और अब यहािं कुछ दे र के सलए आया हुआ है ”. मैंने ढ़दमाग पर बहुत िोर ढ़दया कक यह िोगगतदर स हिं कौन हो कता था लेककन मझ ु े कुछ मझ नहीिं आया। इ के दो तीन महीने बाद िब मैं यहािं था तो अच्चानक मुझे िोगगतदर स हिं याद आ गगया और मुझे इ अफ़ ो

बात का बहुत हुआ कक हम तो बहुत दो त हुआ करते थे और मैं उतहें पेहचान नहीिं का था।

िब हम मैढ़िक में पड़ते थे तो कुछ और लड़के इिंग्लैण्ड चले गए थे स्िन में एक और िोगगतदर स हिं था िो मुझे वैटि पाकग में मुझे १५

ाल पहले अच्चानक ही समला था। िब

कालि में थे तो और लड़के चले गए,कोई इिंग्लैण्ड और कोई अमरीका कैनेडा। १९६०

े पहले स्ितने भी लोग इिंग्लैण्ड गए उन में ज़्यादा तर अनपि कक ान लोग ही होते

थे,पड़े सलखे बहुत कम थे लेककन १९६० के बाद टकूलों के लड़के िाने लगे थे। एिेंिों की दक ु ानों पर लोगों को िाते हुए हम दे खते रहते थे लेककन हमें इ में कोई ढ़दलचटपी नहीिं

होती थी। १९६१ के आखखर में इिंग्लैण्ड िाने की बातें आम होने लग गई थीिं। यह बातें आम होने लगी थी कक इिंग्लैण्ड में एक नया कानून बनने िा रहा था,स्ि दरवाज़े बिंद कर ढ़दए िाएिंगे और कोई िा नहीिं िा यह कानून क्या होगा, इ

के बाद इिंग्लैण्ड के

केगा। कक ी को कोई पता नहीिं था कक

की धाराएिं ककया होंगी,कौन िा

केगा कौन नहीिं,ब

एक ही बात

हो रहीिं थी कक इिंग्लैण्ड बिंद हो िाएगा। िब हमारा िूर खत्म हो गगया था तो मैं और बहादर रोज़ाना कालि िाने लगे थे। एक ढ़दन िब हम कालि आये तो बहादर ने अपने कोि की िेब ढ़दखाने के सलए मेरी ओर बिाया और

े एक पेपर ननकाला और मुझे

ाथ ही बोला,” गुरमेल मैंने भी इिंग्लैण्ड िाने की

तैयारी कर ली है और यह राहदारी (टपॉत रसशप) मेरे चाचा िी ने मुझे वहािं बुलाने के सलए भेिी है ”. मैंने

ारा

पॉत सशगप फ़ामग पड़ा स्ि

पर बहादर और उ

के चाचा िी का नाम

सलखा हुआ था और नीचे लाल रिं ग के एक बड़े टिार िै ा ट्ढ़िक्कर लगा हुआ था स्ि पर एक मोहर लगी हुई थी और कक ी अूँगरे ज़ वकील के ाइन ककये हुए थे। मैंने पड़ कर फ़ामग


बहादर को दे ढ़दया और उ

को वधाई दी लेककन भीतर

े मैं ढ़हल

ा गगया। मुझे ऐ ा लगा

कक मैं दनु नआ में अकेला हो गगया हूूँ। एक के बाद एक भी दोटत बबछुड़ गए थे और बहादर अब आख़री दोटत भी मुझ े बबछुड़ िाएगा। बाहर े तो मैं बहादर के ाथ पैहले िै ा था लेककन अिंदर

े एक खलबली

ी मची हुई थी और मुझे मझ नहीिं आ रहा था कक मैं क्या करूूँ। मेरे प्पता िी भी इिंग्लैण्ड ही रहते थे लेककन मेरे अिंदर इतना हौ ला नहीिं था कक मैं उन को मेरे सलए टपॉत रसशप भेिने को सलख।ूिं

बहुत पहले मैं सलख चक् ु का हूूँ कक बचपन में प्पता िी मझ ु े पीिा करते थे और मझ ु में एक ऐ ा डर ा पैदा हो गगया था कक प्पता िी के ाथ मेरी नज़दीकी कभी बन नहीिं की थी,िब मैं िवान भी हो गगया तो भी वोह बात नहीिं बन मेरे प्पता िी थे। दो तीन चारपाई पर ही

की थी। ब

ाल इिंग्लैण्ड में ही हम नज़दीक हो

मैं बेिा था और वोह

के और हम रोज़ एक

ोते थे क्योंकक िगह की तिंगी थी। िो मह ु बत एक बेिे और बाप में होनी

चाढ़हए वोह कभी नहीिं बन पाई। इ ी सलए मैंने शादी िब मेरे बच्चे होंगे तो यह इतहा

े बहुत पहले ही ोच सलया था कक दब ु ारा रीपीि नहीिं होने दिं ग ू ा और मझ ु े फखर है कक मेरे

भी बच्चे और पोते और एक दोहती हम के बहुत करीब हैं और दोटतों की तरह बातें करते हैं स्िन में कक ी कक म की खझिक के सलए कोई िगह नहीिं है । प्पता िी को मैंने कोई खत नहीिं डाला कक वोह मुझे इिंग्लैण्ड बुला लें लेककन मैं उन लड़कों बातें करने लगा िो इिंग्लैण्ड िाने के सलए पा पोिग बनवा रहे थे लेककन कक ी नहीिं हो रहा था। कुछ ही ढ़दनों बाद एक खबर

े कुछ हा ल

ारे अखबारों के फ्रिंि पेि पर आ गई,”

इिंग्लैण्ड में इसमग्रेशन ऐक्ि”. कुछ कुछ तो हमें पता चल चक् ु का था कक इिंग्लैण्ड की पासलगमेंि में एक बबल पेश हो चक् ु का था िो बाहर यह बबल पा के मुताबक िाया िा इ

हो गगया था स्ि

े आने वालों की

िंसय पर रोक लगाना था। अब

के मुताबक १ िुलाई १९६२

ीधे िाना अ िंभव हो िाना था और इ

े नया ऐक्ि बन गगया स्ि

के बाद वाउचर ले कर ही इिंग्लैण्ड

कता था।

वाउचर स टिम की क्या शतें थीिं हम को कुछ पता नहीिं था, ब

यकीिंन हो गगया था कक १ िुलाई के बाद िाया नहीिं िा बताता लेककन द ू रे लड़कों

हम को तो यह ही

केगा। बहादर को मैं कुछ ना

े पूछता रहता िो हाथ में फाइलें सलए कभी पुसल

िाते कभी कचहरी में त ीलदार

टिे शन को

े समलते। हर कोई लड़का एक बात ही बताता कक बाहर

िाने के सलए टपॉत रसशप की िरुरत थी। अिीब पैननक की स्टथनत में था मैं। मेरे हाथ कुछ न लगता। बहादर अक् र बताता रहता कक उ

के पेपर अब कपरू थले चले गए थे क्योंकक

हमारे गाूँव को कपरू थला डडस्टिक्ि लगता था। कभी कहता उ पोटि पर थे और वोह उ

के एक चाचा एक बहुत बड़ी के कागज़ क्लीअर करवा दें गे और पा पोिग ि्दी बन िाएगा


और १ िुलाई

े पहले पहले इिंग्लैण्ड पौहिं च िाएगा। मुझे बहादर की कोई बात अच्छी ना

लगती। कहने को तो मैं उ

की बातों का िवाब दे ता रहता लेककन मेरा गधयान तो कहीिं और

होता था। एक ढ़दन मैं फगवाड़े बिंगा रोड पर िोगगतदर ककताबों वाले की दक ू ान था। ककताब ले कर बाहर ननकला तो इ का ऑकफ

था स्ि

दक ू ान

के दरवाज़े के ऊपर एक बड़ा

े कोई ककताब ले रहा

े दो तीन दक ु ानें छोड़ कर एक िै वल एिेंि

ा बोडग लगा हुआ था स्ि के ऊपर एक बड़े े एरोप्लेन की तटवीर थी और सलखा हुआ था,” यहाूँ े टती हवाई ढ़िकिें समलती हैं”. और भी बहुत कुछ सलखा हुआ था िो याद नहीिं। यों तो यह िै वल एिेंि का ऑकफ कई ालों े दे खता आ रहा था लेककन मैंने कभी गधयान ही नहीिं ढ़दया था क्योंकक कभी िरुरत ही नहीिं पडी थी। क्योंकक अब अच्चानक

र पे इिंग्लैण्ड का भत ू

तक कुछ हाथ भी नहीिं आया था,मैं एक समनि

ोच कर उ

वार हो गगया था और अभी

ऑकफ

काउिं िर पर एक िवान

के अिंदर चले गगया।

रदार िी टमािग कपड़ों में बैठे हुए थे और उन के पर एक बहुत बड़ी िाइप राइिर रखी हुई थी। मैंने िाते ही रदार िी को बोला और

रदार िी ने भी मुझे

लगा। मैंने कु ी पर बैठते ही राटता बताइये”.

ामने ही काउिं िर त स री अकाल

त स री अकाल में िवाब ढ़दया और मेरी तरफ दे खने

ीधा

वाल ककया,”

रदार िी ! इिंग्लैण्ड िाने के वाटते कोई

रदार िी ने मेरे हाथ में ककताबें दे ख कर कहा,” ऐ ा कीस्िये,इिंग्लैण्ड के

कक ी कालि में दाखला ले लीस्िये। अगर आप को ऐडसमशन समल िाए तो उ के सलए एप्लाई कर दीस्िये,पा पोिग समल गगया तो हम मैंने भी फि िवाब ढ़दया,” चलो तो मेरी तरफ रदार िी बोले,” पोटि ऑकफ पोटि ऑकफ आया।

पची

ती

पर पा पोिग

े ढ़िकि ले कर इिंग्लैण्ड चले िाइए”

े कक ी कालि को ऐस्प्लकेशन िाइप कर दो”

े एक एअर मेल लैिर ले आइये”.

गज़ की दरू ी पर ही था और द

रदार िी बोले,” लो मैं लिंडन में ”फैरा डे हाऊ

समनि में मैं एअरमेल लैिर ले

इत्नीररिंग कालि” को ऐडसमशन के

सलए लैिर िाइप कर दे ता हूूँ” और रदार िी एक पुरानी बहुत बड़ी िाइपराइिर े िाइप करने लगे स्ि के ऊपर दोनों तरफ इिंक की िे प की रीलें थीिं और हर लाइन खत्म होने के बाद िाइप राइिर के एक हैंडल को पुश करना पड़ता और तब नई लाइन शुरू हो िाती और मशीन

े एक घिंिी िै ी आवाज़ आती। कुछ ही समनिों में खत सलख हो गगया और

िी ने मुझे नीचे मुझे कहा कक इ

ाइन करने को कहा।

ाइन करने के बाद उतहोंने लैिर बिंद कर ढ़दया और

को मैं पोटि कर दूँ ।ू

रदार िी ने मुझे यह भी कहा कक िब इ

का िवाब आ िाए तो मैं उन के पा इ

रदार

ले आऊिं और वोह

भी फ़ामग भर दें गे।

काम के पािंच रुपय मािंगे िो मैंने दे ढ़दए और ऑकफ

े बाहर आ गगया।

लैिर

रदार िी ने


लैिर ले कर मैं हलवाई की दक ू ान

ीधा पोटि ऑकफ

में खत डाल ढ़दया। हे म राि

े मैंने आधा ककलो लडू सलए और एक आशा की ककरण सलए मैं गाूँव की

ओर बाइस कल दौड़ाने लगा। चलता…

गगया और लैिर बॉक्

मेरी कहानी - गुरमेल सिंह भमरा - भाग 3  
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