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"सम्प्प्रदाय को धर्म न ीिं क ते“ '

साम्प्रदानयकता एक ऎसा भयंकर कीटाणु है जो आज भारत को आगे र्ढ़ने नह ं दे रहा है । जर्तक हम इसे नष्ट्ट नह ं करते तर्तक यह भारत को कभी भी एक शक्ततशाल राष्ट्र के रूप में पनपने नह ं दे गा । अर् तो र्ात-र्ात में जहााँ-तहााँ तनाव पैदा हो जाता है और साम्प्रदानयक दं गा नछड़ जाता है । यग ु परु ु िोिम परम ् प्रेममय श्रीश्रीठाकुर अनक ु ूल चन्द्र जी ने आज से १०८ विम पव ू म उनके ह श्रीहस्त सलणखत ग्रन्थ 'सत्यानस ु रण' में भारतवाससयों को सावधान करते हुए कहा था " भारत की अवननत (Degeneration) तभी से आरम्भ हुई जर् से भारतवाससयों के सलये अमि ू म भगवान असीम हो उठे - ऋवियों को छोड़ कर ऋविवाद की उपासना आरम्भ हुई । भारत ! यहद भववष्ट्यत ् कल्याण का आह्वान करना चाहते हो ,तो संप्रदायगत ववरोध को भल ू कर जगत के पव ू -म पव ू म गरु ु ओं के प्रनत श्रद्धासम्पन्न रहो - और अपने मि ू म एवं जीवन्त गरु या भगवान में आसतत ु (attached ) हो जाओ -एवं उन्हें ह स्वीकार करो - जो उनसे प्रेम करते हैं । कारण, पव म िी ू व को अचधकार करके ह परविी का आववभामव होता है । (सत्यानस ु ण ) हमें एक महामानव की आवश्यकता है क्जनमें हम ववगत सभी महमानवों का अनभ ु व कर सकें । साम्प्रदानयक भावनाओं से उध्वम में होगा प्रनत-प्रत्येक का समलन-केंद्र । आज हमलोग दे ख रहे हैं - परम प्रेममय श्रीश्रीठाकुर अनक ु ू ल चन्द्र जी की सतद क्षा लेकर हर एक मस ु लमान ने अपने हज़रत रसल ू का , हर एक ईसाई ने अपने प्रभु ईसामसीह का प्रेमस्पशम पाया है । भारत की एकता को र्नाये रखने के सलए श्रीश्रीठाकुर जी ने कहा -" एक दस ू रे के

-श्री राजेंद्र पुहाण, नई हदल्ल

सलए हम क्जतना करते हैं उतनी ह एकता र्ढ़ती है । हर सम्प्रदाय एक दस ू रे के सलए करे । ऐसी व्यवस्था करनी है क्जससे कोई ककसी को पराया न समझे । मैं वेद को मानता हूाँ , इसीसलये मैं कुरान , र्ाइबर्ल को भी मानता हूाँ । मैं तो चाहता हूाँ कक हहन्द ू केवल अपने शास्त्र की चचाम न करें र्क्ल्क अन्यान्य सम्प्रदाय अनस् ु यत ू शास्त्र की भी चचाम करें । इसतरह से सभी क्जतना ह परस्पर परस्पर की मूल र्ातों को समझेंगे उतना ह ववरोध कमता जायगा , सम्प्रीनत र्ढ़े गी । अज्ञानता ह मतभेद का कारण है । कुछ लोग ऐसे हैं जो ववरोध को कायम रखना चाहते हैं और र्ढ़ाना चाहत हैं । कानन ू के द्वारा उनके इन शैतानी-कायो को र्न्द करना होगा ।“ (आलोचना - प्रसंग , अष्ट्टम भाग ) श्रीश्रीठाकुर जी ने सत्यानस ु रण ग्रन्थ में वाणी द है – "क्जस पर सर् कुछ आधाररत है वह है धमम , और वे ह हैं परम परु ु ि। धमम कभी अनेक नह ं होता , धमम एक है और उसका कोई प्रकार नह ं । मत अनेक हो सकते हैं , यहााँ तक कक क्जतने मनष्ट्ु य हैं उतने मत हो सकते हैं , ककन्तु इससे धमम अनेक नह ं हो सकता । मेरे ववचार से हहन्द ू धमम ,मस ु लमान धमम ,ईसाई धमम ,र्ौद्ध धमम इत्याहद र्ातें भल ू हैं र्क्ल्क वे सभी मत हैं । ककसी भी मत के साथ ककसी मत का प्रकृत रूप में कोई ववरोध नह ं , भाव की ववसभन्नता , प्रकार -भेद है -एक का ह नाना प्रकार से एक ह तरह का अनभ ु व है । सभी मत ह हैं साधना ववस्तार के सलए , पर वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं और क्जतने ववस्तार में जो होता है वह है अनभ ु नू त , ज्ञान । इसीसलए धमम है अनभ न त पर ।" ु ू (सत्यानस रण ) ु

Page 49 MARCH 2018 BLISS

Bliss march 2018  

The March issue of Bliss is live! This issue will focus upon the certain basic and yet very important aspects of our lives. Are we happy eno...

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