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सुलभ 08

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वृंदावन में सामाजिक बदलाव की होली

मन की बात 17

नारी-शक्ति की असाधारण उपलब्धियां

ओशो 24

बिन बाती बिन तेल

पुस्तक अंश चुनाव अभियान के नए युग के प्रवर्तक

sulabhswachhbharat.com आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

एक दैवीय शक्ति श्री श्री रवि शंकर

दुनिया के विख्यात मानवतावादी और आध्यत्मिक गुरु

वर्ष-2 | अंक-12 | 05 - 11 मार्च 2018


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आवरण कथा

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एक दैवीय शक्ति

पू

डॉ. विन्देश्वर पाठक

ज्य श्री श्री रवि शंकर हमारे लिए एक दुर्लभ रत्न हैं। वे दुनिया और मानवता के लिए भगवान द्वारा प्रदत्त एक उपहार हैं। ऐसी आत्माएं कभी-कभी ही पृथ्वी की यात्रा करती हैं। लेकिन जब वे आती हैं तो अपने साथ दुर्लभ चमक लेकर आती हैं और इस चमक से वे हमारी दुनिया को रोशन करती हैं। रवि शंकर जी के विश्व सांस्कृतिक महोत्सव को देखकर मैं बहुत उत्साहित हूं और रोमांचित हूं। 8,500 कलाकारों को अपने वाद्ययंत्र एकसुर में बजाते हुए देखना, मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव था। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस महोत्सव को अपनी शुभकामनाएं दी। इस महोत्सव द्वारा दिखाए जाने वाले ऐसे उच्च-गुणवत्तापूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देखने का अवसर भारतीय लोगों को कभी-कभी ही मिलता है। रवि शंकर जी को मेरा विनम्र नमस्कार! मैं उन्हें एक लंबी और खुबसूरत जिंदगी की मुबारकबाद देता हूं। मैं आशा करता हूं कि न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया उनके आर्ट ऑफ लिविंग से एक सुखी और रचनात्मक जीवन की कला सीखेगी और हम सभी को श्री श्री का आशीष मिलेगा। सुलभ परिवार और इस देश के लोग दिल्ली में आयोजित किए जा रहे विश्व संस्कृति महोत्सव के लिए शुभकामनाएं देते हैं और हम इसकी सफलता की कामना करते हैं। चार वर्ष की आयु से भगवद् गीता का पाठ पढ़ने वाला बच्चा, आज अपनी गहरी आध्यात्मिकता के साथ, दुनिया भर में संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत पर जोर देने की बात करता है।

1. श्री श्री रवि शंकर को पुस्तक भेंट करते डॉ. विन्देश्वर पाठक

• रविशंकर ने, जब वह बच्चे थे तभी से अपने माता-पिता के साथ ध्यान करना शुरू कर दिया था

2. श्री श्री रवि शंकर के दौरे के अवसर पर आगंतुकों को संबोधित करते डॉ. विन्देश्वर पाठक

• उन्होंने अनूठी शांत चित्त करने वाली सुदर्शन क्रिया विकसित की

3. सुलभ ग्राम में श्री श्री रवि शंकर के साथ अमोला पाठक और डॉ. विन्देश्वर पाठक

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• उन्होंने युद्धरत समूहों को भी यह सिखाया और उनके बीच बातचीत शुरू करवाई

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आवरण कथा

वसुधैव कुटुंबकम्

श्री श्री की दृष्टि में दुनिया एक परिवार है और विभिन्न धर्म, संस्कृति, परंपराएं, प्रेम, करुणा, शांति और अहिंसा के समान मूल्यों में निहित हैं

खास बातें ध्यान और सुदर्शन क्रिया दैनिक जीवन में सीधे एकीकृत होती है दुनिया भर के 370 मिलियन से अधिक लोगों तक पहुंचती है श्री श्री की बातें भारत में 58,000 से अधिक बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है

जी उलगनाथन

(बेंगलुरु)

अयं बन्धुरयं नेतिगणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

होपनिषद् का यह श्लोक कहता है कि यह अपना बंधु है और यह अपना बंधु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदयवाले लोगों के लिए तो संपूर्ण धरती ही कुटुंब है,परिवार है। श्री श्री रवि शंकर का हृदय ऐसा ही उदार और विशाल है जिसमें पूरी दुनिया बसती है। इसीलिए बिहार के उग्र जातीय गुट हों या उत्तर पूर्व के विद्रोही, कश्मीर के अलगाववादी हों या फिर कोलंबिया के एफएआरसी गुरिल्ला, श्री श्री सबके पास सबकी तरह होते हैं और उन्हें अपना बना लेते हैं। वे विवाद नही, बात से हर समस्या का समाधान खोजते हैं और आखिरकार सफल होते हैं। दुनिया के हर कोने में शांति कायम रखने की जिम्मेदारी हम सभी की है। जब तक हमारे वैश्विक परिवार के प्रत्येक सदस्य शांतिपूर्ण नहीं हो जाते तब तक हमारी शांति अधूरी है। श्री श्री रवि शंकर ने कहते हैं कि उन्होंने दुनिया भर में शांति लाने के लिए कई पहलें की हैं। श्री श्री रविशंकर आज देश के सबसे व्यस्त व्यक्ति हैं। वह पूरे विश्व में शांति स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वे अयोध्या के मुद्दे को हल करने की दिशा में भी प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई शुरू होने के साथ ही,

लखनऊ के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस मुद्दे पर एक सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के लिए बेंगलुरु में श्री श्री से मुलाकात भी की। छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल- अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कार्यकारी सदस्य मौलाना सलमान हुसैन नदवी, यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारुकी, पूर्व आईएएस अधिकारी अनीस अंसारी, वकील इमरान अहमद, टीले वाली मस्जिद के मौलाना वासी हसन फैजी और उद्देश्य अनुसंधान और विकास के निदेशक अतर हुसैन की आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर के साथ तीन घंटे की बैठक हुई थी। अतर हुसैन ने कहा कि हमने विवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि हिंदु व मुस्लिमों के बीच एक आम सहमति कैसे बन सकती है। हालांकि मार्च में अयोध्या में एक और बैठक का आयोजन किया जाना है, जिसमें संतों और मौलवियों से इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी। यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारूकी ने कहा कि वक्फ बोर्ड सभी प्रकार की बातचीत के लिए तैयार है। बशर्ते दोनों तरफ से लोग उस समय मौजूद रहें। एओएल टीम के एक सदस्य ने कहा कि श्री

श्री रवि शंकर का मकसद इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाना है और इसे सौहार्दपूर्ण ढंग से पूरा करना है। अयोध्या में एक और बैठक का आयोजन किया जाएगा। हम उन लोगों के साथ समन्वय कर रहे हैं, जिन्हें चर्चा के लिए आमंत्रित किया जाना है। श्री श्री के अनुसार अयोध्या विवाद को लेकर अदालत के बाहर सभी से इस संबंध में बात करना ही सबसे अच्छा समाधान होगा। दोस्ती के माध्यम से जो भी प्राप्त किया जा सकता है वह संघर्षों से कभी भी नहीं किया जा सकता है। वे कहते हैं कि मैं सभी लोगों से बात कर रहा हूं। दोनों समुदायों को एक साथ आना चाहिए। न्यायालय के बाहर निपटारा इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान है। आपसी बातचीत की शक्ति में दृढ़ विश्वास दिखाते हुए, उन्होंने इराक, कोलंबिया, श्रीलंका, कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत और नक्सल समूहों के विपक्षी दलों को एक साथ, एक जगह लाने का कार्य किया है। इस आध्यात्मिक नेता की एक अद्वितीय प्रतिष्ठा है। वह नेताओं, पीड़ितों और विद्रोहियों के सभी पक्षों से जुड़ने में सक्षम हैं। मानवतावादी राजदूत श्री श्री कहते हैं कि मेरी इच्छा हिंसा से मुक्त, तनाव रहित दुनिया देखने की

80 के दशक के अंत में उन्होंने एक प्रभावी श्वास क्रिया की शुरुआत की, जिसे सुदर्शन-क्रिया कहा गया। ऐसा कहा जाता है कि नई श्वास तकनीक की प्रेरणा उन्हें कर्नाटक के शिमोगा में भद्रा नदी के किनारों पर ध्यान करते समय आई थी

है। वह जोखिम उठाने का कार्य नहीं करते, लेकिन शेरों को वश में करने के लिए खतरनाक जगहों पर जाने में संकोच नहीं करते हैं। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री श्री रविशंकर हैं। यह संगठन दुनिया की सबसे बड़ी मानवतावादी, गैर-सरकारी संगठनों में से एक है। वह दुनिया भर में अनगिनत 'आश्रम' और आर्ट ऑफ लिविंग के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रचार कर रहे हैं। रवि शंकर एक बहुआयामी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनकी मानवीय पहल में संघर्ष के समाधान, राहत और गरीबी उन्मूलन शामिल हैं। उन्हें लगता है कि ध्यान और सुदर्शन क्रिया दैनिक जीवन में सीधे एकीकृत होती है, जो मन में शां​ित, सकारात्मकता और उत्साह पैदा करती है। वह व्यक्तिगत शिक्षाओं, सामाजिक संबंधों, सार्वजनिक कार्यक्रमों और आर्ट ऑफ लिविंग कार्यशालाओं के माध्यम से दुनिया भर के 370 मिलियन से अधिक लोगों तक अपनी बातों को पहुंचाते हैं। तमिलनाडु के तंजावुर जिले में एक छोटा सा शहर पापनासम में माता विसालक्ष्मी रत्नम और पिता आरएस वेंकट रत्नम के यहां एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम पिता ने रवि शंकर रखा। चार साल की उम्र में ही वह बालक

वृक्षारोपण

• 36 देशों और 26 भारतीय राज्यों में 7 करोड़ 10 लाख पेड़ लगाए गए • भारत भर में 20 लाख से अधिक लक्ष्मीतरु पौधे लगाए गए • मिशन हरी धरती के तहत 90 लाख लक्ष्मीतरू पौधे लगाए गए


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जैविक खेती • सेमिनारों, प्रशिक्षण कार्यशालाओं, मॉडल फर्म्स, जागरूकता कार्यक्रमों और कृषि मेला (किसान बैठक) के माध्यम से प्राकृतिक खेती के बारे में लोगों को जागरुक कर रहे हैं। • श्री श्री नेचुरल फार्मिंग में 22 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया, बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती को हल करने के लिए एक स्थायी समाधान निकाला गया है। • प्राकृतिक खेती के जरिए 2 मिलियन एकड़ की खेती की जा रही है। • कार्यशालाओं के माध्यम से आत्महत्या कर रहे किसानों में से 115,000 किसानों को सशक्त बनाया है। • बीज किस्मों के संरक्षण के लिए देश भर में बीज बैंक स्थापित किया है।

उन्होंने 5000 से अधिक गुमराह युवाओं को भी प्रोत्साहित करने का काम किया है। श्री श्री ने युवा नेतृत्व ट्रेंनिंग प्रोग्राम के तहत हिंसा के रास्ते पर चल पड़े युवाओं को प्रोत्साहित कर समाज से जोड़ने का काम कर रहे हैं अपने माता-पिता के साथ ध्यान का अभ्यास करना शुरू कर चुके थे। इस छोटी सी उम्र में ही वह प्राचीन संस्कृत पाठ भगवद गीता के छंदों का पाठ करने में भी सक्षम थे। उन्होंने सुधाकर चतुर्वेदी के साथ वैदिक साहित्य का अध्ययन और साथ ही बेंगलुरु के एमईएस स्कूल में पढ़ाई की। 1973 में मात्र 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने भौतिकी और वैदिक साहित्य दोनों में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद उन्होंने महर्षि महेश योगी के साथ यात्रा की, जहां से उनके आयुर्वेद केंद्रों में वैदिक विज्ञान पर उपदेश देने की शुरुआत की। इस अवधि के दौरान वे महर्षि महेश योगी के सबसे करीबी दोस्त और विश्वासी बन गए। 1980 के दशक के दौरान उन्होंने दुनिया भर की यात्रा की और आध्यात्मिकता का प्रचार किया। उन्होंने 1982 में आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन की स्थापना की और 1983 में उन्होंने स्विट्जरलैंड में पहला आर्ट ऑफ लिविंग कोर्स आयोजित किया। 1986 में उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग कार्यशाला के लिए कैलिफोर्निया की यात्रा की और जल्द ही अमेरिका में लोकप्रिय हो गए। 80 के दशक के अंत में उन्होंने एक प्रभावी श्वास क्रिया की शुरुआत की, जिसे सुदर्शन क्रिया कहा गया। ऐसा कहा जाता है कि नई श्वास तकनीक की प्रेरणा उन्हें कर्नाटक के शिमोगा में भद्रा नदी के किनारे पर ध्यान करते समय आई थी। सुदर्शन क्रिया शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तौर पर कल्याणकारी सुविधा देती है।

प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों से स्वतंत्र चिकित्सा अनुसंधान ने कहा है कि इन तकनीकों से अवसाद के उन्मूलन, कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) को कम करने और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद मिलती है। 1997 में उन्होंने इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यू (आईएएचवी) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई विकास लाने, मानव मूल्यों और नैतिकता को फिर से जीवित करना है। भारत में उन्होंने 435 स्कूलों के 58,000 से अधिक बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की शुरुआत की है। श्री श्री को कोलंबिया, मंगोलिया और परागुए के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार समेत विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। असाधारण और प्रतिष्ठित सेवा के लिए उन्हें देश का दूसरे नंबर का सर्वोच्च नागरिकता पुरस्कार पद्मविभूषण प्रदान किया गया है। उन्हें विश्व स्तर पर 16 मानद डॉक्टरेट्स प्रदान किए गए हैं और वह एक साल में लगभग 40 देशों का सफर करते हैं। श्री श्री हमेशा एक संदेश देते रहे हैं कि दुनिया एक परिवार है और विभिन्न धर्म, संस्कृति, परंपराएं प्रेम, करुणा, शांति और अहिंसा के समान मूल्यों में निहित हैं। उन्होंने यमुना के तट पर 2016 में वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल का आयोजन किया था, जिसमें 155 देशों के 3.75 मिलियन लोगों ने हिस्सा लिया और इतना ही नहीं 7 एकड़ में बने स्टेज पर 36,602 नर्तकियों के साथ ही दुनिया भर के संगीतकारों ने अपने हुनर का प्रदर्शन किया।

जल संरक्षण, नदी संवर्द्धन

• महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में 35 नदियों और इसकी सहायक नदियों में जल संरक्षण और नदी का कायाकल्प चल रहा है। • यमुना सफाई अभियान 'मेरी दिल्ली मेरी यमुना' का आयोजन किया। • "स्वच्छ यमुना अभियान" के दौरान लगभग 512 टन कपड़े, प्लास्टिक, कचरा हटाया गया। • पंपा नदी सफाई अभियान के दौरान 600 टन कचरा हटाया गया। • इस परियोजना पर 68,800 स्वयंसेवकों ने घंटों समय बिताया। • श्री श्री रवि शंकर विद्यामंदिर विद्यालय के 377 बच्चों और कर्मचारियों ने इस पहल में हिस्सा लिया

कश्मीर में संवाद

श्री श्री साल 2004 के बाद से जम्मू और कश्मीर में समाज के सभी वर्गों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। वह लगातार अलगाववादी नेताओं, पत्थर फेंकने वाले, सूफी संतों और बुद्धिजीवियों से बातचीत कर रहे हैं। इसके साथ ही जम्मू और कश्मीर में सभी हितधारकों के साथ उनकी लगातार बातचीत चल रही है। साल 2007 में सैयद अली शाह गिलानी ने आर्ट ऑफ लिविंग इन द वैली द्वारा आयोजित शेर-एकश्मीर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में श्री श्री रवि शंकर

का स्वागत करते हुए कहा कि मैं घाटी में आने के लिए गुरुदेव का बहुत आभारी हूं। मैं उनसे अनुरोध करता हूं कि वह दुनिया और जम्मू-कश्मीर में शांति लाएं। हम यह जिम्मेदारी उन्हें सौंप रहे हैं, क्योंकि उनके पास हृदय है, जो मानता है और वास्तव में मानव मूल्यों को समझता है। उन्होंने हुर्रियत नेताओं समेत मीरवाइज उमर फारूक से घाटी में शांति स्थापित करने के लिए बातचीत की। इसके साथ ही अमरनाथ यात्रा की सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने और घाटी में शांति स्थापित करने के लिए प्रभावी ढंग से काम


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रोशन हुए घर

• अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर के आदिवासी क्षेत्रों में 'लाइट ए होम' परियोजना के तहत 18,500 परिवारों में सोलर लाइटें लगवाए गए, जिससे 65,000 से अधिक लोगों को लाभ हुआ। • 8 सौर माइक्रो ग्रिड भारत में स्थापित की ताकि एकीकृत सौर ऊर्जा को मॉडल गांवों तक पहुंचाया जा सके। • मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों के नौ स्कूलों में सौर ग्रिड्स प्रदान किए। • अक्षय ऊर्जा उत्पादों को स्थापित करने के लिए 1,033 युवाओं को अक्षय ऊर्जा तकनीशियनों के रूप में प्रशिक्षित किया गया।

उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के नेताओं को हिंसा से दूर रखने के लिए श्री श्री ने वहां पर बहुत समय व्यतीत किया। साल 2017 में मणिपुर के 68 आतंकवादियों ने घर वापसी की। इन आंतकियों के घर वापसी में उनकी रणनीति ने काफी मदद की हैं, जो बड़े काम करते है। हमें उम्मीद है कि वह हमें बातचीत के माध्यम से एक समाधान की ओर ले जाएंगे। एजाज अहमद मीर ने कहा कि हम बहुत आशा के साथ आए हैं। हमें उम्मीद नहीं थी कि हमें इस तरह की जगह पर आने का मौका मिलेगा। हमने बहुत कुछ खो दिया है अब हम राष्ट्र के प्रति प्यार का संदेश फैलाना चाहते हैं। एक पूर्व आतंकवादी गुलाम हुसैन ने कहा कि दोनों पक्षों के लोग मारे गए हैं चाहे वह सेना से रहे या दूसरी तरफ। इन सबकी वजह से हम रात को सो नहीं पाते, दिन में बाहर नहीं जा सकते। हम शांति चाहते हैं। हम शांति की आशा लेकर गुरुदेव के पास आए हैं।

पूर्वोत्तर में कठिनाइयों को तोड़ा

किया है। इतना ही नहीं उन्होंने 5000 से अधिक गुमराह युवाओं को भी प्रोत्साहित करने का काम किया है। श्री श्री ने युवा नेतृत्व ट्रेंनिंग प्रोग्राम के तहत हिंसा के रास्ते पर चल पड़े युवाओं को प्रोत्साहित कर समाज से जोड़ने का काम कर रहे हैं। साल 2017 में द आर्ट ऑफ लिविंग ने पैगामए-मोहब्बत का आयोजन किया। जिसके तहत मारे गए आतंकवादियों के 200 परिवार और सैनिकों के 40 परिवारों को एक साथ लाया गया, जिन्होंने

अपने जीवन का बलिदान किया। वे अहिंसा के रास्ते पर चलने के लिए कश्मीर के युवाओं को एक स्पष्टीकरण देने के लिए एक साथ आए थे। यह हर किसी के लिए दिल-छू लेने वाला पल था, जिसमें उन परिवारों के दर्द को साझा किया गया, जो आतंकवाद की वजह से अपनों को खो चुके थे। एक पूर्व आतंकवादी अब्दुल मजीद ने कहा कि युवाओं को अपनी बंदूकें छोड़नी चाहिए और शांति के मार्ग का पालन करना चाहिए। हम यहां आए हैं, क्योंकि गुरुदेव एक बड़ा व्यक्तित्व

उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के नेताओं को हिंसा से दूर रखने के लिए श्री श्री ने वहां पर बहुत समय व्यतीत किया। साल 2017 में मणिपुर के 68 आतंकवादियों ने घर वापसी की। इन आंतकियों के घर वापसी में उनकी रणनीति ने काफी मदद की। आर्ट ऑफ लिविंग ने इन कार्यकर्ताओं के दिलों और दिमाग को बदलने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। साल 2010 में भी मणिपुर में 128 उग्रवादियों ने अपने हथियार रखे और बाद में आर्ट ऑफ लिविंग ने उनका पुनर्वास किया। उग्रवादियों के पूरे समूह ने संगठन द्वारा आयोजित 90-दिवसीय गहन व्यवहार, आध्यात्मिक और व्यावसायिक पुनर्वास प्रशिक्षण लिया।

गुर्जर आंदोलन

श्री श्री ने जून 2008 में राजस्थान गए ताकि गुर्जर समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर फैलाए गए आंदोलन से उपजे हिंसा और तनाव को शांत किया जा सके। हालांकि उनकी सलाह पर

आंदोलनकारियों ने सरकार के साथ बातचीत करने पर सहमति व्यक्त की। वार्ता शुरू करने के कुछ ही दिनों के भीतर, आंदोलनकारियों और सरकार के बीच एक सौहार्दपूर्ण समाधान हो गया। गौरतलब है कि यह पहली बार था गुर्जर समुदाय के लोग किसी मध्यस्थ की बात सुनने के लिए तैयार थे। वहीं विरोध प्रदर्शन करने वाले गुर्जरों को सांत्वना देने के लिए श्री श्री रवि शंकर ने इस समुदाय के 50,000 सदस्यों से पिलुकापुरा के रेल पटरियों के पास मिले, जहां वे विरोध में बैठे थे और रेल यातायात को अवरुद्ध कर रहे थे। श्री श्री ने उन्हें अपने हिंसक विरोध को दूर करने और शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत करने का आग्रह किया।

सीपीआईएमएल और रणवीरसेना

21 वीं शताब्दी की शुरुआत में बिहार राज्य में उठे जाति संघर्ष का समाधान खोजना आर्ट ऑफ लिविंग के लिए शुरुआती मामलों में से एक था। ऊंची जाति समूह रणवीरसेना और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (सीपीआईएमएल) के बीच जाति संघर्ष ने 1990 के दशक के दौरान बिहार में सबसे खराब रूप ले लिया था। जिसमें बड़े पैमाने पर हत्या, जबरन और अन्य तरीकों के रूप में हिंसा ने अपने पैर फैलाने शुरू कर दिए थे। साल 2001 में श्री श्री ने एक संघर्ष-ग्रस्त मसौढ़ी क्षेत्र का दौरा किया और अहिंसा को अपनाने के लिए 50,000 लोगों से अपील की। बातचीत के माध्यम से समुदायों और समूहों को एकजुट करने में गुरुदेव को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जिसमें बिहार के युद्धरत गुट और भारत के अन्य नक्सली इलाकों के नेता शामिल थे। तब इन नेताओं को श्री श्री से मिलने के लिए ऋषिकेश में आर्ट ऑफ लिविंग सेंटर में अलग से आमंत्रित किया गया था।


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शुद्ध पेयजल

• कम लागत वाले जैव रेत वाटरफिल्टर के निर्माण के लिए 60 से अधिक ग्रामीण युवाओं को जलसेवक के रूप में प्रशिक्षित किया गया। • 267 गांवों के 45,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए चार सामुदायिक पानी फिल्टर लगाए गए और इसके साथ ही आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा राज्यों में 78 बोर के कुओं का निर्माण कराया। • कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में सात समुदायिक आरओ और जैव रेत फिल्टर की स्थापना की।

ऋषिकेश पहुंचने के बाद दोनों गुटों में एक बार फिर से संघर्ष शुरू हो गया। श्री श्री के हस्तक्षेप के बाद दोनों गुट कार्यक्रम में एक साथ बैठने को तैयार हुए, जहां उन्होंने श्वास और ध्यान तकनीकें सीखीं। इस कार्यक्रम के अंत तक उन्होंने स्वयं को अपने हथियार छोड़ने और सामुदायिक सेवा की दिशा में अपने प्रयासों के लिए स्वेच्छा से शपथ ली।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता

आर्ट ऑफ लिविंग के अनूठे कार्यक्रमों में से एक है कैदियों का पुनर्वास, जो दुनिया भर में 7,00,000 से अधिक कैदियों तक अपनी पहुंच बना चुका है। उदाहरण के लिए बता दें कि उरुग्वे के आंतरिक मंत्रालय ने उन कैदियों की जेल की सजा को कम कर दिया, जिन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया। आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों ने मैक्सिको, हैती, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, नेपाल, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, जापान में पीड़ित लोगों के लिए मोबाइल फोन द्वारा आपदा राहत पहुंचाने की एक नई पहल शुरू की है।

कोलंबिया और एफएआरसी के बीच शांति समझौता

श्रीलंका में चले 52 वर्षीय गृहयुद्ध के बाद कोलंबिया सरकार और एफएआरसी गोरिल्ला के बीच शांति समझौता कराना श्री श्री के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि रही। कोलंबिया के राष्ट्रपति जुआन

मैनुएल सैंटोस, जिन्होंने श्री श्री को एफएआरसी तक पहुंचने में मदद की, उन्हें देश में शांति लाने के लिए किए गए प्रयासों के लिए 2016 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। श्री श्री को मिलने के बाद एफएआरसी के नेतााओं का हृदय परिवर्तित हो गया और उन्होंने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गांधी के अहिंसा सिद्धांत को अपनाने की कसम खाई। एफएआरसी के नेता ने अपने अपराधों के लिए माफी मांगी और उसके बाद एक नए राजनीतिक दल के रूप में स्थापित हुआ। शांति वार्ता में एफएआरसी कमांडर और मुख्य वार्ताकार इवान मारकेज कहते हैं कि एक स्थिर और लंबे समय तक शांति प्राप्त करने के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की शिक्षाएं आवश्यक हैं। हमें उम्मीद है कि कोलंबिया में शांति दुनिया के लिए एक प्रेरणा के रूप में कार्य करेगी।

इराक का पुनर्वास

आर्ट ऑफ लिविंग कुछ गैर-सरकारी एजेंसियों में से एक है जो अब भी बगदाद में काम कर रही है। आईएएचवी के सहयोग से संगठन ने समग्र चिकित्सा देखभाल कार्यक्रम और महिला सशक्तिकरण परियोजना के साथ-साथ ट्रामा राहत कार्यक्रमों द्वारा 50,000 से अधिक इराकी नागरिकों की देखभाल की है। श्री श्री ने तीन बार इस देश का दौरा किया है। आर्ट ऑफ लिविंग अब उत्तरी इराक में युद्ध में बचे लोगों पर विशेष ध्यान देने

आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों ने मैक्सिको, हैती, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, नेपाल, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, जापान में पीड़ित लोगों के लिए मोबाइल फोन द्वारा आपदा राहत पहुंचाने की एक नई पहल शुरू की है का काम कर रहे हैं। 6000 से अधिक महिलाओं को टेलरिंग और कंप्यूटर साक्षरता में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इराक के सुधारक घरों में कैदियों के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। इराक के 100 से अधिक नागरिक, ज्यादातर बगदाद, बसरा, सुलेमेनिया और करबला की महिलाएं आर्ट ऑफ लिविंग की शिक्षा ली और वह साथी इराकियों की पीड़ा को कम करने के लिए काम कर रही हैं। आर्ट ऑफ लिविंग और आईएएचवी भी आईएसआईएस द्वारा जारी मानवीय संकट के मद्देनजर इराक में 15 लाख आंतरिक विस्थापित पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को भौतिक और आध्यात्मिक राहत देने के लिए काम कर रहा है। इराली, दुहोक और खाजीर में 8,000 से अधिक परिवारों और अनाथ बच्चों को राहत सामग्री बांटी।

सीरिया, लेबनान, जॉर्डन में ट्रामा केयर

संगठन भी सक्रिय रूप से सीरियन शरणार्थियों और जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और इराक में युद्ध में बचे लोगों की मदद करने के लिए काम कर रहा है। इस क्षेत्र में चल रहे तनाव, आघात के उपचार के लिए द आर्ट ऑफ लिविंग की कार्यशालाओं के माध्यम से 20,000 से अधिक लोगों को लाभ प्रदान किया गया है। चूंकि इस संघर्ष में बच्चों के ज्यादा समूह

शामिल हैं, इसलिए आर्ट ऑफ लिविंग ने अपने कार्यक्रमों को विशेष रुप से बच्चों के लिए शुरू किया है, ताकि बच्चों को इन सबसे रोका जा सके और उन्हें शांति के रास्ते पर लाया जा सके। जातरी शिविर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि हम ऐसे वातावरण में काम कर रहे हैं जो मनोसामाजिक गतिविधियों के लिए बहुत जरूरी है। इस कार्यशाला में मैंने इस तरह के प्रभावी परिणाम कभी नहीं देखे हैं। इससे मेरे काम पर भारी असर पड़ा है और मुझे सीरियन शरणार्थियों के साथ काम करने का सचमुच लाभ हुआ है। आज आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन 152 से अधिक देशों में मौजूद है। दस लाख से अधिक इसके अनुयायी हैं। कई अन्य संस्थान और आश्रम जैसे 'वेदविज्ञान महाविद्यापीठ', 'श्री श्री आयुर्वेद', 'श्री श्री स्कूल फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स एंड फाइन आर्ट्स' और 'श्री श्री प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज' हैं, जो उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। श्री श्री रवि शंकर, श्री श्री विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय योग प्रमाणन समिति के गुणवत्ता नियंत्रण के अध्यक्ष भी हैं। वह अमरनाथ श्राइन बोर्ड (जम्मू और कश्मीर, भारत सरकार द्वारा नियुक्त) के सदस्य भी हैं। श्री श्री कर्नाटक सरकार द्वारा आयोजित गुरुदेव कृष्णादेवराय की 500 वीं वर्षगांठ समारोह के रिसेप्शन कमेटी के अध्यक्ष भी हैं।


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सुलभ

वृंदावन में सामाजिक बदलाव की होली

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वृंदावन के राधागोपीनाथ मंदिर में विधवा माताओं ने पूरे उल्लास के साथ होली खेली। फूलों और गुलाल से खेली गई इस अनूठी होली में वृंदावन की विधवा माताओं के साथ वाराणसी से आई पचास विधवा माताएं भी शामिल हुईं विधवा माताओं के लिए सुलभ का होली महोत्सव गोपीनाथ मंदिर में विधवा माताओं ने खेली फूल और गुलाल से होली डॉ. पाठक ने विधवा माताओं संग खेली फूल और गुलाल से होली

खास बातें

​प्रियंका तिवारी

मारे समाज में किसी महिला के विधवा होते ही उसके जीवन के सारे रंग बदरंग हो जाते हैं। इतना ही नहीं विधवाओं को सभी शुभ कार्यों से भी दूर रखा जाता है। सदियों से चली आ रही इस सामाजिक कुरीति को समाप्त कर विधवाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने की। डॉ. पाठक उन पुरातन मान्यताओं में विश्वास नहीं करते जिसके अनुसार पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी को समाज और परिवार की मुख्यधारा से काट कर अलग कर दिया जाए। इसी सामाजिक धारणा और मान्यता को बदलने के लिए सुलभ ने वृंदावन में अपने परिवार से परित्यक्त विधवाओं को होली खेलने का अनूठा अवसर प्रदान किया। इस वर्ष भी वृंदावन के राधागोपीनाथ मंदिर में विधवा माताओं ने पूरे उल्लास के साथ होली खेली। फूलों और गुलाल से खेली गई इस अनूठी होली में वृंदावन की अन्य विधवा माताओं के साथ वाराणसी आई पचास विधवा माताएं भी शामिल हुईं। वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन द्वारा आयोजित होली महोत्सव अपने आप में दुनिया का सबसे अनूठा और रंगीन उत्सव बन गया। क्योंकि इसमें सिर्फ होली के रंग

ही नहीं, सुगंधित फूलों की पंखुड़ियां ही नहीं, हरदम उदासी की सफेद चादर में लिपटी विधवा माताओं की खनकती हंसी ही नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के गुलाल भी उड़ाए गए। सकारात्मक सामाजिक बदलाव ऐसे ही होते हैं, बिना किसी को कुछ बताए, बिना किसी को रोके टोके। सामाजिक बदलाव की यह अनोखी समझ सुलभ प्रणेता की विशिष्टता है, जिन्होंने अपने प्रयासों से वृंदावन की विधवा माताओं के जीवन की पूरी तस्वीर ही बदल दी। वृंदावन की गलियों में सबकी नजरों से दूर गुमनाम जिंदगी जीने वाली इन विधवा माताओं को अब देश क्या पूरी दुनिया जान चुकी है। होली महोत्सव में पहले गुलाब, गेंदा और चमेली के फूलों के साथ होली खेली गई। इसके बाद गुलाल बरसा कर सभी ने होली का आनंद लिया। इस होली समारोह में कुल 15 क्विंटल फूल और गुलाल का इस्तेमाल किया गया। सुलभ द्वारा आयोजित रंगों के इस त्योहार में विधवा माताओं ने कृष्ण संगीत की धुनों पर भाव नृत्य किया।

इस अवसर पर सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक ने कहा कि विधवाओं की जिंदगी में नए रंग भरने का मौका लाकर सुलभ ने समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि विधवा माताएं भी समाज का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जितने दूसरे लोग हैं। उन्होंने बताया कि वृंदावन से पांच विधवा माताएं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गुलाल लेकर जाएंगी और उनको गुलाल देकर होली की शुभकामनाएं देंगी। इससे पहले डॉ. पाठक ने विधवा माताओं के साथ राधागोपीनाथ मंदिर में भगवान राधागोपीनाथ को गुलाल और पुष्प अर्पित कर पूजन किया। उसके बाद इन वृद्ध एवं विधवा माताओं के साथ फूल और गुलाल से होली खेली। इसके अलावा डॉ. पाठक ने इन माताओं के साथ गीत गाकर इन्हें होली की ढेर सारी शुभकामनाएं दी। बता दें कि इस समारोह में होली के गीतों का हिंदी और बांग्ला में गायन किया गया। मंदिर में प्रभु आराधना के बाद माताओं ने मंदिर के चौक में होली

विधवाओं की जिंदगी में नए रंग भरने का मौका लाकर सुलभ ने समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि विधवा माताएं भी समाज का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जितने दूसरे लोग हैं-डॉ. पाठक

खेली। इस समारोह में हिस्सा लेने वाली विधवा माता ललिता ने बताया कि उनकी शादी के तीन साल बाद ही उनके स्वामी की मृत्यु हो गई। उन्हें इतना भी पता नहीं था कि क्यों उन्हें लोग रंग और शुभ कार्यों से दूर रखने लगे थे। उन्हें जब तक ये बातें समझ आती तब तक वह वृंदावन चली आईं और प्रभु की भक्ति में लीन हो गईं। उन्होंने बताया कि सुलभ बाबा (डॉ. पाठक) के आने के बाद उन्होंने जाना कि रंग क्या होते हैं। त्योहार क्या होता है। उन्होंने डॉ. पाठक और सुलभ को ढेर सारी शुभकामनाएं दी। एक अन्य विधवा माता दीपाली गुहा ठाकुर दास ने बताया कि उनके पति की मौत के बाद उनसे लोग दूर दूर रहते थे। किसी भी शुभ कार्य और त्योहार में उन्हें शामिल नहीं किया जाता था। यह सब देख कर उन्हें बहुत दुख होता था, इसीलिए वह कोलकाता से वृंदावन आ गईं और यहीं राधारानी का भजन कीर्तन करने लगीं। यहां भी उन्हें शुरुआत में बहुत सी तकलीफों का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से वह यही सोचती थी कि भगवान उन्हें अपने पास जल्द से जल्द बुला लें। फिर एक दिन डॉ. पाठक उनकी जिंदगी मे मसीहा बन कर आए और उनके साथ साथ वृंदावन की सभी विधवा माताओं के जीवन में बदलाव आ गया। आज उन्हें भर पेट भोजन के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता है और न ही बीमार होने पर दवा के लिए किसी का आश्रय लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सुलभ और डॉ. पाठक ने उनके जैसी तमाम महिलाओं को जीवन जीने की एक नई उम्मीद दी है। यह सुलभ और डॉ. पाठक के अथक प्रयासों का ही परिणाम है जो आज ये विधवा माताएं होली ही नहीं दीवाली, रक्षाबंधन जैसे सभी त्योहार मनाती हैं। इन माताओं के चेहरे पर मुस्कान और सुकून देख कर लगता है मानो इन्हें एक नया जीवन मिल गया हो। आज ये सभी माताएं खुशी के गीत गाती हैं और डॉ. पाठक तथा सुलभ का आभार व्यक्त करते नहीं थकती।


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मन की बात

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

नारी-शक्ति की असाधारण उपलब्धियां

प्र

आज नारी, हर क्षेत्र में न सिर्फ आगे बढ़ रही है, बल्कि नेतृत्व कर रही हैं। आज कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सबसे पहले, हमारी नारी-शक्ति कुछ करके दिखा रही है। एक मिसाल कायम कर रही है नरेंद्र मोदी

(प्रधानमंत्री)

काश त्रिपाठी ने एक लंबी चिट्ठी लिखी है और मुझसे बहुत आग्रह किया है कि मैं उनके पत्र में लिखे गए विषयों को स्पर्श करूं। उन्होंने लिखा है, 1 फरवरी को अंतरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला की पुण्य तिथि है। कोलंबिया अंतरिक्षयान दुर्घटना में वो हमें छोड़ कर चली गईं, लेकिन दुनिया भर में लाखों युवाओं को प्रेरणा दे गईं। मैं प्रकाश जी का आभारी हूं कि उन्होंने अपनी लंबी चिट्ठी का आरंभ कल्पना चावला की विदाई से किया है। यह सबके लिए दुःख की बात है कि हमने कल्पना चावला को इतनी कम उम्र में खो दिया, लेकिन उन्होंने अपने जीवन से पूरे विश्व में, खासकर भारत की हजारों लड़कियों को, यह संदेश दिया कि नारी-शक्ति के लिए कोई सीमा नहीं है। इच्छा और दृढ़ संकल्प हो, कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। यह देखकर काफी खुशी होती है कि भारत में आज महिलाएं हर क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं। प्राचीन काल से हमारे देश में महिलाओं का सम्मान, उनका समाज में स्थान और उनका

योगदान, पूरी दुनिया को अचंभित करता आया है। भारतीय विदुषियों की लंबी परंपरा रही है। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी विदुषियों का भी योगदान रहा है। लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसे न जाने कितने ही नाम हैं। आज हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की बात करते हैं, लेकिन सदियों पहले स्कंद-पुराण में,कहा गया हैदशपुत्र, समाकन्या, दशपुत्रान प्रवर्धयन् । यत् फलं लभतेमर्त्य, तत् लभ्यं कन्यकैकया ।। अर्थात, एक बेटी दस बेटों के बराबर है। दस बेटों से जितना पुण्य मिलेगा एक बेटी से उतना ही पुण्य मिलेगा। यह हमारे समाज में नारी के महत्व को दर्शाता है और तभी तो, हमारे समाज में नारी को ‘शक्ति’ का दर्जा दिया गया है। यह नारी शक्ति पूरे देश को, सारे समाज को, परिवार को, एकता के सूत्र में बांधती है। चाहे वैदिक काल की विदुषियां

लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी की विद्वता हो या अक्का महादेवी और मीराबाई का ज्ञान और भक्ति, चाहे अहिल्याबाई होलकर की शासन व्यवस्था हो या रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, नारी शक्ति हमेशा हमें प्रेरित करती आई है। देश का मान-सम्मान बढ़ाती आई है। प्रकाश त्रिपाठी ने आगे कई सारे उदाहरण दिए हैं। उन्होंने लिखा है हमारी साहसिक रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण के लड़ाकू विमान ‘सुखोई 30’ में उड़ान भरना, उन्हें प्रेरणा दे देगा। उन्होंने वर्तिका जोशी के नेतृत्व में भारतीय नौसेना के महिला क्रू मेंबर्स आई एनएसवी तरिणी पर पूरे विश्व की परिक्रमा कर रही हैं, उसका जिक्र किया है। तीन बहादुर महिलाएं भावना कंठ, मोहना सिंह और अवनी चतुर्वेदी युद्धक विमान की पायलट बनी हैं और सुखोई-30 में प्रशिक्षण ले रही हैं। क्षमता वाजपेयी की अगुवाई वाली ऑल वूमन क्रू ने दिल्ली

प्राचीन काल से हमारे देश में महिलाओं का सम्मान, उनका समाज में स्थान और उनका योगदान, पूरी दुनिया को अचंभित करता आया है। भारतीय विदुषियों की लंबी परंपरा रही है। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी विदुषियों का भी योगदान रहा है

से अमेरिका के सेन फ्रांसिसको और वापस दिल्ली तक एअर इंडिया के बोईग जेट में उड़ान भरीं। आज नारी, हर क्षेत्र में न सिर्फ आगे बढ़ रही है, बल्कि नेतृत्व कर रही हैं। आज कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सबसे पहले, हमारी नारी-शक्ति कुछ करके दिखा रही हैं। एक मिसाल कायम कर रही हैं। पिछले दिनों राष्ट्रपति जी ने एक नई पहल की। राष्ट्रपति जी ने उन असाधारण महिलाओं के एक समूह से मुलाकात की जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में सबसे पहले कुछ करके दिखाया। देश की इन महिलाओं में मर्चेंट नेवी की पहली महिला कैप्टन, यात्री ट्रेन की पहली महिला ड्राइवर, पहली महिला फयर फाइटर, पहली महिला बस ड्राइवर, अंटार्कटिका पहुंचने वाली पहली महिला, एवरेस्ट पर पहुंचने वाली पहली महिला, इस तरह से हर क्षेत्र की ‘पहली महिला’ थीं - हमारी नारी-शक्तियों ने समाज की रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए असाधारण उपलब्धियां हासिल की, एक कीर्तिमान स्थापित किया। उन्होंने ये दिखाया कि कड़ी मेहनत, लगन और दृढसंकल्प के बल पर तमाम बाधाओं और रुकावटों को पार करते हुए एक नया मार्ग तैयार किया जा सकता है। एक ऐसा मार्ग जो सिर्फ अपने समकालीनों को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगा। उन्हें एक नये जोश और


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष उत्साह से भर देगा। इन पहली महिलाओं पर एक पुस्तक भी तैयार की गई है, ताकि पूरा देश इन नारी शक्तियों के बारे में जाने, उनके जीवन और उनके कार्यों से प्रेरणा ले सके। आज देश और समाज में हो रहे सकारात्मक बदलाव में देश की नारी-शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज जब हम महिला सशक्तीकरण पर चर्चा कर रहे हैं तो मैं एक रेलवे स्टेशन का जिक्र करना चाहूंगा। एक रेलवे स्टेशन और महिला सशक्तीकरण, आप सोच रहे होंगे कि इसके बीच में क्या संबंध है? मुंबई का माटुंगा स्टेशन भारत का ऐसा पहला स्टेशन है जहां सारी महिला कर्मचारी हैं। सभी विभागों में महिला स्टाफ - चाहे कमर्शियल डिपार्टमेंट हो, रेल पुलिस हो, टिकट चेकर हो, उदघोषक हो, पूरा 40 से भी अधिक महिलाओं का स्टाफ है। इस बार बहुत से लोगों ने गणतंत्र दिवस की परेड देखने के बाद ट्वीअर पर और दूसरे सोशल मीडिया पर लिखा कि परेड की एक मुख्य बात थी, बीएसएफ की महिला दस्ता। वे साहसपूर्ण प्रयोग कर रही थीं और ये दृश्य, विदेश से आए हुए मेहमानों को भी आश्चर्यचकित कर रहा था। सशक्तीकरण, आत्मनिर्भरता का ही एक रूप है। आज हमारी नारी-शक्ति नेतृत्व कर रही है। आत्मनिर्भर बन रही है। छत्तीसगढ़ की हमारी आदिवासी महिलाओं ने भी कमाल कर दिया है। उन्होंने एक नई मिसाल पेश की है। आदिवासी महिलाओं का जब जिक्र आता है तो सभी के मन में एक निश्चित तस्वीर उभर कर आती है। जिसमें जंगल होता है, पगडंडियां होती हैं, उन पर लकड़ियों का बोझ सिर पर उठाए चल रही महिलाएं। लेकिन छत्तीसगढ़ की हमारी आदिवासी नारी, हमारी इस नारी-शक्ति ने देश के सामने एक नई तस्वीर बनाई है। छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा इलाका, जो माओवाद-प्रभावित क्षेत्र है। ऐसे खतरनाक इलाके में आदिवासी महिलाएं, ई-रिक्शा चला कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। बहुत ही थोड़े कालखंड में कई सारी महिलाएं इससे जुड़ गई हैं। उन्हें इससे तीन लाभ हो रहे हैं, एक तरफ जहां स्वरोजगार ने उन्हें सशक्त बनाने का काम किया है वहीं इससे माओवाद-प्रभावित इलाके की

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मन की बात

छत्तीसगढ़ की हमारी आदिवासी नारियों ने देश के सामने एक नई तस्वीर बनाई है। छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा इलाका, जो माओवाद-प्रभावित क्षेत्र है। ऐसे खतरनाक इलाके में आदिवासी महिलाएं, ई-रिक्शा चला कर आत्मनिर्भर बन रही हैं तस्वीर भी बदल रही है और इन सबके साथ इससे पर्यावरण-संरक्षण के काम को भी बल मिल रहा है। यहां के जिला प्रशासन की भी सराहना करता हूं, अनुदान उपलब्ध कराने से ले कर प्रशिक्षण देने तक, जिला प्रशासन ने इन महिलाओं की सफलता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हम बार-बार सुनते आए हैं कि लोग कहते हैं – ‘कुछ बात है ऐसी कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’। वो बात क्या है, वो बात है, लचीलापन और निरंतर परिवर्तन। जो काल-बाह्य है, उसे छोड़ना, जो आवश्यक है उसका सुधार स्वीकार करना। हमारे समाज की विशेषता है – आत्मसुधार करने का निरंतर प्रयास, यह भारतीय परंपरा हमारी संस्कृतिक विरासत है। किसी भी जीवंत समाज की पहचान होती है उसका आत्म सुधार तंत्र।

09 की जनता, राज्य के मुख्यमंत्री, वहां के प्रशासन और मानव –श्रृंखला में शामिल हर व्यक्ति की सराहना करता हूं कि उन्होंने समाज कल्याण की दिशा में इतनी विशेष एवं व्यापक पहल की। केरल की आदिवासी महिला लक्ष्मीकुट्टी की कहानी सुनकर आप सुखद आश्चर्य से भर जायेंगे। लक्ष्मीकुट्टी, कल्लार में शिक्षिका हैं और अब भी घने जंगलों के बीच आदिवासी इलाके में ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहती हैं। उन्होंने अपनी स्मृति के आधार पर ही पांच सौ आयुर्वेदिक दवाएं बनाई हैं। सांप काटने के बाद उपयोग की जाने वाली दवाई बनाने में उन्हें महारत हासिल है। लक्ष्मी जी दवाओं की अपनी जानकारी से लगातार समाज की सेवा कर रही हैं। इस गुमनाम शख्शियत को पहचान कर समाज में इनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। मैं आज एक और नाम का भी जिक्र करने का मेरा मन करता है। पश्चिम बंगाल की 75 वर्षीय सुभासिनी मिस्त्री को भी। उन्हें पुरस्कार के लिए चुना गया। सुभासिनी मिस्त्री एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने अस्पताल बनाने के लिए दूसरों के घरों में बर्तन मांजे, सब्जी बेची। जब ये 23 वर्ष की थीं तो उपचार नहीं मिलने से इनके पति की मृत्यु हो गई थी और इसी घटना ने उन्हें गरीबों के लिए अस्पताल बनाने के लिए प्रेरित किया। आज इनकी कड़ी मेहनत से बनाए गए अस्पताल में हजारों गरीबों का नि:शुल्क इलाज किया जाता है। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी बहुरत्ना-वसुंधरा में ऐसे कई नर-रत्न हैं, कई नारी-रत्न हैं, जिनको न कोई जानता है, न कोई पहचानता है। ऐसे व्यक्तियों की पहचान न बनना, उससे समाज का भी घाटा हो जाता है। पद्म-पुरस्कार एक माध्यम है, लेकिन मैं देशवासियों को भी कहूंगा कि हमारे आस-पास समाज के लिए जीने वाले, समाज के लिए खपने वाले, किसी न किसी विशेषता को ले करके जीवन भर कार्य करने वाले लक्षावधि लोग हैं। कभी न कभी उनको समाज के बीच में लाना चाहिए। वो मान-सम्मान के लिए काम नहीं करते हैं, लेकिन उनके कार्य के कारण हमें प्रेरणा मिलती है।

सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों के खिलाफ सदियों से हमारे देश में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर लगातार प्रयास होते रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले बिहार ने एक रोचक पहल की। राज्य में सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने के लिए 13 हजार से अधिक किलोमीटर की विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला, बनाई गई। इस अभियान के द्वारा लोगों को बाल-विवाह और दहेज-प्रथा जैसी बुराइयों के खिलाफ जागरूक किया गया। दहेज और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों से पूरे राज्य ने लड़ने का संकल्प लिया। बच्चे, बुजुर्ग, जोश और उत्साह से भरे युवा, माताएं, बहनें हर कोई इस जंग में शामिल थे। समाज के सभी लोगों को सही मायने में विकास का लाभ मिले इसके लिए जरुरी है कि हमारा समाज इन कुरीतियों से मुक्त हो। मैं बिहार

(मन की बात, जनवरी, 2018, का संपादित अंश)

को काफी हैरानी हुई और उन्होंने पैड्स बांटने का फैसला किया। मीना लोगों से इस काम के लिए आगे आने की अपील करती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों

को समझना चाहिए कि पीरियड्स बहुत जरूरी होते हैं और उनके बारे में जागरूकता फैलनी चाहिए। (एजेंसी)

गुजरात का 'पैड कपल' हर महीने बांटता है 5000 सैनिटरी नैपकिन

सूरत के मीना और अतुल मेहता ने जरुरतमंद महिलाओं के बीच सैनिटरी पैड्स बांट कर सराहनीय काम किया है

मिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनाथम की कहानी तो आज हर कोई जान चुका है। लेकिन सूरत में रहने वाले मीना और अतुल मेहता के प्रयासों की जानकारी बहुत कम लोगों को है। पिछले लगभग 5 साल से ये दोनों हर महीने ऐसी महिलाओं को लगभग 5000 सैनिटरी नैपकिन बांटते हैं जो इसका खर्च खुद नहीं वहन कर सकतीं। मीना और अतुल ने हाल ही में सूरत की झुग्गी

झोपड़ियों में फिल्म पैडमैन की स्क्रीनिंग भी 125 महिलाओं के लिए आयोजित की। इसके जरिए वे लोगों को सैनिटरी नैपकिन की महत्ता बताना चाहते हैं। मीना ने बताया कि उन्होंने एक बार एक गरीब बच्ची को कूड़े के डिब्बे से पैड निकालते देखा। उन्होंने बताया कि बच्ची से उन्हें पता चला कि पैसे की कमी के चलते वह इन पैड्स को धोकर हर महीने इस्तेमाल करती है। यह सुनकर मीना


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मताधिकार

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

ऐसे मिला मताधिकार का अधिकार दुनिया के कई बड़े देशों ने महिलाओं को मतदान करने के अधिकार से बहुत वर्षों तक वंचित रखा लेकिन भारत ने आजादी के दिन से ही महिलाओं को इस अधिकार से लैस किया

अमेरिका ने 144 वर्षों के बाद दिया महिलाओं को मताधिकार ब्रिटेन की महिलाओं को एक सदी बाद मिला यह अधिकार

1947 में महिलाओं को मताधिकार देकर भारत ने बड़ा कदम उठाया

खास बातें

दु

निया के सबसे बड़े लोकतंत्र अमेरिका के मुकाबले दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत इस मायने में आगे है कि महिला अधिकारों के प्रति यह उनसे ज्यादा संवेदनशील और सजग रहा। अमेरिका में सब कुछ के बाद भी महिलाओं को मतधिकार से लैस करने के प्रति हिचकिचाहट थी। अमेरिका की यह हिचकिचाहट 144 वर्षों बाद खत्म हुई। अमेरिका ही नहीं, ब्रिटेन ने भी इस मामले में ज्यादा उदारता नहीं दिखाई। महिलाओं को मतधिकार देने में उसने लगभग एक सदी का वक्त खर्च किया। स्विट्जरलैंड के कुछ इलाकों में तो महिलाओं को वोट देने का अधिकार 1974 में मिला, लेकिन भारतीय महिलाओं को देश की आजादी के दिन से यह अधिकार दिया गया। 1947 में महिलाओं को मताधिकार के अधिकार देने का फैसला उस वक्त कितना बड़ा था, इसका अंदाजा लेखिका डॉक्टर ओर्निट शनि की इस विषय पर लिखी पुस्तक से लगाया जा सकता है। जिसमें वो लिखती हैं कि करीब 10 लाख लोगों की मौत और एक करोड़ 80 लाख लोगों के घरों की तबाही के लिए जिम्मेदार बंटवारे की आग में झुलस रहे एक देश में ये फैसला लिया जाना उस वक्त किसी भी औपनिवेशिक राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इस फैसले से आजाद भारत में वोटरों की संख्या पांच गुना तक बढ़कर करीब 17 करोड़ 30 लाख तक पहुंच गई और इसमें आधी अबादी महिलाओं

की थी। तब दुर्भग्य से करीब 28 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, क्योंकि उन्होंने अपना नाम ही नहीं बताया और करीब 85 प्रतिशत ऐसी महिलाएं थीं, जिन्होंने कभी वोट ही नहीं दिया था। अपनी पुस्तक 'हाउ इंडिया बिकेम डेमोक्रेटिक: सिटिजनशिप ऐट द मेकिंग ऑफ द यूनिवर्सल फ्रैंचाइजी' में डॉ. शनि ने औपनिवेशिक शासन के दौर में महिलाओं के मताधिकार के विरोध के बारे में विस्तार से लिख है। वे लिखती हैं कि ब्रिटिश अधिकारियों ने ये तर्क दिया था कि सार्वभौमिक मताधिकार भारत के लिए सही नहीं होगा। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में चुनाव सीमित तौर पर होते थे, जिसमें धार्मिक, सामुदायिक और व्यावसायिक धाराओं के तहत बांटी गई सीटों पर खड़े उम्मीदवारों के लिए कुछ वोटरों को ही मतदान करने का अधिकार था। इतिहासकार गेराल्डिन फोर्ब्स लिखती हैं कि भारतीय महिला संगठनों को महिलाओं को मतदान का अधिकार पाने के लिए एक मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ी थी। 1921 में बॉम्बे और मद्रास

पहले प्रांत बने जहां सीमित तौर पर महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिए गए। बाद में 1923 से 1930 के बीच सात अन्य प्रांतों में भी महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। डॉ फोर्ब्स अपनी किताब 'वूमेन इन मॉडर्न इंडिया' में लिखती हैं कि ब्रितानी हाउस ऑफ कॉमन्स ने महिलाओं के लिए वोटिंग के अधिकार की मांग करने वाले कई भारतीय और ब्रितानी महिला संगठनों की मांग को नजरअंदाज किया। महिलाओं से भेदभाव और उनका पर्दे में रहना, इस फैसले के पीछे उनकी आसान दलील थी। डॉ फोर्ब्स लिखती हैं, "साफ तौर पर ब्रितानी शासकों ने अल्पसंख्यकों के अधिकार के तौर पर केवल पुरुष अल्पसंख्यकों को ही अधिकार देने का वादा किया। महिलाओं के मामले में उन्होंने कुछ महिलाओं के अलग-थलग होने के बहाने, पूरी महिलाओं को उनका हक देने से इनकार कर दिया।" औपनिवेशिक प्रशासकों और विधायकों दोनों ने ही मताधिकार की सीमाओं को बढ़ाने का विरोध किया था। डॉ फोर्ब्स के अनुसार वोटिंग का विरोध

भारतीय महिला संगठनों को महिलाओं को मतदान का अधिकार पाने के लिए एक मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ी थी। 1921 में बॉम्बे और मद्रास पहले प्रांत बने जहां सीमित तौर पर महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिए गए

करने वाले महिलाओं को कमतर आंकते थे और सार्वजनिक मामलों में उन्हें अक्षम मानते थे। कुछ लोगों का कहना था कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार देने से पति और बच्चों की उपेक्षा होगी। एक सज्जन ने तो यहां तक तर्क दिया कि राजनीतिक काम करने से महिलाएं स्तनपान कराने में असमर्थ हो जाएंगी। महिला अधिकारों के लिए लड़नेवाली मृणालिनी सेन ने 1920 में लिखा था, "ब्रितानी सरकार के बनाए सभी कानून महिलाओं पर लागू होते थे" और अगर उनके पास संपत्ति है, तो उन्हें टैक्स भी देना होता था, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था। वो कहती हैं, "ये कुछ इस प्रकार था कि मानो ब्रितानी शासक महिलाओं से कह रहे हों कि न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की बजाय वो खुद ही स्थिति से निपटें।" भारत के आखिरी औपनिवेशिक कानून, भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत देश के 3 करोड़ लोगों को वोट देने का अधिकार दिया गया। यह देश की कुल वयस्क आबादी का पांचवां हिस्सा था। इसमें महिलाओं की संख्या कम थी। बिहार और उड़ीसा प्रांत (उस दौर में ये दो राज्यों एक ही प्रांत में आते थे) की सरकार ने मतदाताओं की संख्या कम करने और महिलाओं से मतदान का अधिकार छीनने की कोशिश की। डॉ. शनि लिखती हैं कि सरकार का मानना था, "अगर महिला तलाकशुदा या विधवा है या उसके पास संपत्ति नहीं है तो उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाना चाहिए।" लेकिन जब अधिकारी भारत के पूर्वोत्तर में बसे खासी पहाड़ियों में उन समुदायों के संपर्क में आए जहां मातृसत्ता को माना जाता है, तो उन्हें महिलाओं के मामले में एक अपवाद देखने को मिला। इस समुदाय में संपत्ति महिलाओं के नाम पर होती है।


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष अलग-अलग प्रांतों ने भी महिलाओं के नाम शामिल करने से संबधित अपने-अपने नियम बनाए। मद्रास में अगर कोई महिला पेंशनधारी विधवा थी, किसी अधिकारी या सैनिक की मां थी या उसके पति टैक्स देते थे या संपत्ति के मालिक थे तो उसे मतदान करने का अधिकार दिया गया। देखा जाए तो वोट देने की महिला की पात्रता पूरी तरह से उसकी पति की संपत्ति, योग्यता और सामाजिक स्थिति पर निर्भर थी। डॉ शनि बताती हैं, "महिलाओं को वोट देने का अधिकार देना और उन्हें सही मायनों में वोटर लिस्ट में लेकर आना औपनिवेशिक शासन में काम कर रहे नौकरशाहों की कल्पना से परे था।" इसका एक कारण उस वक्त की विदेशी सरकार का यहां की अशिक्षित जनता में भरोसे की कमी और गरीबों, ग्रामीण और अशिक्षितों को अधिकर देने के संबंध में उनकी नकारात्मक सोच का नतीजा थी।"

आजादी के बाद बदले हालात

लेकिन जब आजाद भारत ने ये तय किया कि वो देश के वयस्कों को वोट करने का यानी अपनी सरकार खुद चुनने का अधिकार देगी तो चीजें बदलने लगीं। डॉ. शनि लिखती हैं, "मतदाता सूची तैयार करने का काम नवंबर 1947 में शुरू हुआ। साल 1950 की जनवरी तक जब भारत को उसका अपना संविधान मिला तो उस वक्त तक सार्वभौमिक मताधिकार और चुनावी लोकतंत्र की सोच पुख्ता हो चुकी थी।" लेकिन साल 1948 में जब मसौदा मतदाता सूची की तैयारी की बारी आई तो उसमें अनेक समस्याएं थीं।

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का काम शुरू किया और महिलाओं को अपनी खुद की पहचान के साथ नाम लिखवाने के लिए उत्साहित किया। महिला संगठनों ने भी महिलाओं से अपील की कि वो अपने हितों की रक्षा करने के लिए खुद मतदाता बनें। देश की पहली संसद के लिए अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच में हुए चुनावों में मद्रास की एक सीट से चुनाव लड़ने वाले एक उम्मीदवार ने कहा, "मतदाता केंद्र के बाहर वोट देने को लिए महिला और पुरुष ग्रामीण धैर्य से घंटों इंतजार कर रहे थे। वो कहते हैं कि पर्दे में आई मुसलमान महिलाओं के लिए अलग वोटिंग बूथ की व्यवस्था की गई थी।"

ब्रितानी शासकों ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के तौर पर केवल पुरुष अल्पसंख्यकों को ही अधिकार देने का वादा किया। महिलाओं के मामले में उन्होंने कुछ महिलाओं के अलग-थलग होने के बहाने, पूरी महिलाओं को उनका हक देने से इनकार कर दिया कुछ प्रांतों के अधिकारियों ने महिलाओं के नामों को लिखने में काफी दिक्कतें पेश आने के बारे में बताया। कई महिलाओं ने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया और अपना नाम बताने की बजाय खुद को किसी की पत्नी, मां, बेटी या किसी की विधवा के रूप में पेश किया। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा

स्वच्छता की लक्ष्मी

तमिलनाडु में त्रिचि के सामूथिरम गांव में स्वच्छता अभियान चलाने वाली लक्ष्मी ने अपने अनुभवों को साझा किया है

लक्ष्मी पेरियास्वामी

पने काम के बारे में खुद जिक्र करने से कई लोग मुझे घमंडी समझते हैं, मगर उन्हें अंदाजा नहीं कि जिस बदलाव को होते हुए मैंने महसूस किया है, उससे मुझे किस स्तर की खुशी

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मताधिकार

मिली है। सबसे बड़ी बात यह कि मैं कोई सरकारी कर्मी नहीं, बल्कि मात्र एक स्वयंसेवक हूं, इसीलिए मेरे लिये कुछ खोने या पाने जैसी कोई स्थिति नहीं है। मेरा काम तो बस मेरी उस कल्पना का परिणाम है, जिसको जिद बनाकर मैंने किया है। मैं वह करती हूं, जो मेरे गांव के लिए अच्छा है। अगर कुछ

एक बड़ी जीत

सकती और महिलाओं का पंजीकरण उनके नाम से ही किया जाएगा। पूर्व की औपनिवेशिक नीतियों से हटकर भारत सरकार ने कहा कि महिला को किसी अन्य की संबंधी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मतदाता के रूप में पंजीकृत किया जाएगा। सरकार ने मीडिया का सहारा लेकर इस संबंध में प्रचार करने

बेशक, महिलाओं के हकों की लड़ाई आज भी जारी है। वर्ष 1966 से भारत की संसद के निचले सदन में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाला एक बिल कड़े विरोध के कारण अब तक अटका हुआ है। आज पहले से कहीं अधिक महिलाएं मतदान कर रही हैं और कभी-कभी पुरुषों से भी अधिक संख्या में वो मतदान कर रही हैं, लेकिन वो चुनाव में उम्मीदवार के रूप में वो कम ही नजर आती हैं। 2017 में जारी की गई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में महिलाओं की संख्या की सूची में 190 देशों में भारत का स्थान 148 है। 542 सदस्य वाले संसद के निचले सदन में सिर्फ 64 सीटों पर ही महिलाएं हैं।

भी गलत दिखता है, तो मैं उसे सुधारने का हर संभव प्रयास करती हूं। मैं तमिलनाडु के त्रिची स्थित सामूथिरम गांव में रहती हूं। आप मुझे उन लोगों में शामिल कर सकते हैं, जिनके लिए साफ-सफाई कुछ ज्यादा ही महत्व रखती है। मैं खुद तो सफाई पसंद हूं, साथ ही अपने आस-पास के लोगों को भी अपने जैसा रखने की कोशिश करती हूं। लोग अपनी आदत के मुताबिक, सड़कों पर चीजें फेंक देते हैं। बेपरवाही में मशगूल उन्हें यह भी अंदाजा नहीं होता कि वे अपनी ही जमीन गंदी कर रहे हैं, जिसे साफ रखने की जिम्मेदारी उनकी भी है। जब कभी मैं गांव में किसी को गंदगी फैलाते देखती, मुझे खराब लगता। मैं स्वयंसेवक के तौर पर खुद ही गांव की सड़कों पर उन्हें साफ करने के लिए उतर गई। मैंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से सड़कों के किनारे कूड़ेदान रखवाए। गांव में ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की कि लोग पुराना प्लास्टिक यहां-वहां फेंकने के बजाय एक जगह एकत्रित करें, जिससे उसे रीसाइकिल किया जा सके। हालांकि हर नई शुरुआत में मुझे लोगों के असहयोग का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे ही सही, पर बाद में मुझे सफलता मिलती गई। प्लास्टिक और कचरे के बाद मेरे गांव में सबसे बड़ी समस्या खुले में शौच की थी। यहां तक कि जिन घरों में शौचालय बने हुए थे, उन घरों के लोग भी शौच के लिए खेतों में ही जाते थे। यह स्थिति दो साल पहले की थी, लेकिन आज चीजें बदल गई हैं। इस सुखद बदलाव के लिये मैंने खूब मेहनत की

है। हालांकि मेरे दो पड़ोसियों समेत गांव में अब भी पंद्रह घर ऐसे बचे हैं, जहां शौचालय नहीं बना है। पर मैं कोशिश में हूं कि उन्हें भी समझाकर शीघ्र ही अपने गांव को खुले में शौच की शर्म से मुक्त करा दूं। अपने काम के बारे में खुद जिक्र करने से कई लोग मुझे घमंडी समझते हैं, मगर उन्हें अंदाजा नहीं कि जिस बदलाव को होते हुए मैंने महसूस किया है, उससे मुझे किस स्तर की खुशी मिली है। मुझे वह दिन भी याद है, जब मैं किसी के पास जाकर अपनी बात कहती थी, तो लोग दूर से ही हाथ जोड़कर मुझे भगा देते थे। इन बातों से विचलित न होने का परिणाम है कि आज जब मैं कुछ कहती हूं, तो लोग ध्यान से सुनते हैं। मैंने अपने कुछ दूसरे साथियों की मदद से लोगों को स्वच्छता के महत्व से परिचित कराया है। आज मेरी मुहिम में मेरा बेटा भी साथ जुड़ गया है। मुझे गर्व होता है कि मैंने अपने बेटे को सामाजिक जिम्मेदारी की जो शिक्षाएं दी थीं, उन्हें वह अमल में ला रहा है। मैं वह दिन कैसे भूल सकती हूं, जब मेरे पड़ोसी ने किसी बात पर जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी, लेकिन मेरे बेटे ने दौड़भागकर डॉक्टर की मदद से उसकी जान बचाई थी। मेरे कामों को देखते हुए मुझे ग्राम पंचायत विकास योजना की नेत्री बना दिया गया है। मेरी जिम्मेदारी अब और भी बड़ी हो गई है और मैं कोशिश करुंगी कि पिछले अनुभवों के आधार पर अपनी भूमिका बखूबी निभाऊं।


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शिक्षा

05 - 11 मार्च 2018

मेवात में शिक्षा की लहर

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

महिला-शिक्षा के क्षेत्र में देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक मेवात भी है। लेकिन करीब 36 प्रतिशत महिला शिक्षा के दर वाले इस जिले में परिवर्तन की एक नई लहर देखी जा रही है 2012-13 में सरकारी स्‍कूलों में 5वीं तक 1,60,057 छात्र ​​थे पांच प्रतिशत से ज्‍यादा लड़कियां उच्‍च कक्षाओं तक नहीं पहुंच पाती थीं आज शिक्षा को लेकर गंभीरता व स्कूलों में छात्राओं की संख्या बढ़ी

खास बातें

सरि‍ता बरारा

ब मैं देखती हूं कि आज भी मेरे गांव में बहुत-से अभिभावक अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने से मना करते हैं या बड़े-बूढ़े मेरी जैसी लड़कियों के लड़कों की तरह घर से बाहर खुले में खेलने पर एतराज जताते हैं तो मुझे बहुत दुःख होता है। यह कहना है 12 साल की छोटी-सी बच्ची नादिया का। हरियाणा के मेवात जिले में रहने वाले मुस्लिम समुदाय की नादिया नई नंगल गांव के स्कूल में सातवीं कक्षा की छात्रा है। सामुदायिक रेडियो 'रेडियो मेवात' के एक कार्यक्रम में एक महिला ने बतौर कॉलर बातचीत करते हुए सवाल पूछा कि जब हमारे समुदाय की एक लड़की रेडियो पर कार्यक्रम पेश कर सकती है तो हमें रेडियो पर संगीत कार्यक्रम का मजा लेने जैसी मामूली-सी बात के लिए भी क्यों रोका जाता है। रेडियो मेवात के लिए काम करने वाली वारीसा, समुदाय की उन कुछ गिनी-चुनी लड़कियों में से हैं, जो समुदाय के लोगों के तमाम सख्त विरोधों के बावजूद अपने पिता के सहयोग से अपनी शिक्षा को जारी रख पाई। सरकारी स्कूल से पढ़ी वारीसा बताती हैं कि आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते, उसके साथ की सभी लड़कियां स्कूल छोड़कर जा चुकी थीं।

हरियाणा का मेवात जिला महिला-शिक्षा के क्षेत्र में देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। वर्ष 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक महिला-शिक्षा की दर यहां 36 प्रतिशत से थोड़ी ही अधिक है, जबकि लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर काफी अधिक है। सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि जहां वर्ष 2012-13 में सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा से 5वीं कक्षा तक पढ़ने वालों छात्रों की संख्या 1,60,057 थी, तो वहीं कक्षा 6 से 8 में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या केवल 42,605। जहां तक लड़कियों का सवाल है, तो 5 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां उच्च कक्षाओं तक नहीं पहुंच पातीं। पर, इन निराशाजनक आंकड़ो के बावजूद यह बात उम्मीद की लौ जलाती है कि मेवात जैसे पिछड़े क्षेत्र के गांव की साधारण-सी नादिया जैसी लड़की आज लड़कियों के साथ हो रहे भेदभाव पर सवाल खड़े करने की हिम्मत करने लगी है। यह बात साबित करती है कि परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि मेवात जैसे शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाके के एक गांव में कुछ अभिभावकों ने अपनी लड़कियों को निजी क्षेत्र के सहशिक्षा (को-एड) स्कूलों में भेजना शुरू कर दिया है। नई नंगल का स्कूल इसका उदाहरण है। ऐसे स्कूलों में पढ़ाने के लिए अभिभावक अपनी जेब से पैसे खर्च करने में भी पीछे नहीं हैं। रेडियो मेवात के लिए काम करते हुए आज वारीसा लड़कियों की शिक्षा के महत्त्व और उनके साथ किए जाने वाले भेदभाव के खिलाफ प्रचार में जुटी हुई हैं। वारीसा कहती है कि रेडियो पर मनोरंजक कार्यक्रम प्रसारित करने के अलावा मैं रेडियो मेवात पर मियो समुदाय से संबंधित महिला अध्यापकों को रेडियो कार्यक्रमों में आमंत्रित करती हूं ताकि उनसे प्रेरणा पाकर अन्य अभिभावक भी अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें और माध्यमिक स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं में ही अपनी लड़कियों को पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर न करके उन्हें आगे और भी पढ़ने दें। वह कहती हैं कि खुशी की बात तो यह है कि आज

अब ग्रामीणों को यह महसूस होने लगा है कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्राप्त करने से युवाओं को अपने आस-पास के क्षेत्रों में ही आसानी से नौकरियां मिल सकती हैं। इसके लिए उन्हें दूरदराज के इलाकों में जाने की जरूरत नहीं

विवाहित महिलाएं भी भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने लगी हैं। वारीसा का कहना है कि कम से कम आज महिलाओं में इतना साहस तो आ ही गया है कि वे अपने खिलाफ होने वाले भेदभाव को लेकर सवाल खड़े करने लगी हैं। कुछ साल पहले तक यह सब संभव नहीं था। इस क्षेत्र में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार, गैर सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र द्वारा पिछले कई सालों से प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 1982 में हरियाणा सरकार ने झिरका और नूंह में सहशिक्षा (कोएड) वाले अंग्रेजी माध्यम के दो स्कूल शुरू किए थे ताकि मेवात क्षेत्र के इस परंपरागत संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने वाले इलाके के बच्चों को अच्छी‍गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जा सके। इसके दो साल बाद ही इन स्कूलों को सीबीएसई से संबंद्ध कर दिया गया। आज, ऐसे सात सहशिक्षा वाले स्कूल मेवात मॉडल स्कूल सोसाइटी (एमएमएसएस) द्वारा चलाए जा रहे हैं जिनमें लड़कियों से कोई ट्यूशन फीस नहीं ली जाती। इनमें से छह स्कूल उच्चतर माध्यमिक स्तर के और एक माध्यमिक स्तर का है। इन मॉडल स्कूलों में 40 प्रतिशत से अधिक संख्या लड़कियों की है, जिनमें से 57 प्रतिशत से अधिक लड़कियां मियो समुदाय की हैं। मेवात के इस इलाके में 6 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय भी चलाए जा रहे हैं जिनमें 1,400 लड़कियां पढ़ रही हैं। इनमें से 64 प्रतिशत मियो समुदाय की हैं।140 लड़कियों को नूंह के मेवात मॉडल स्कूल में पढ़ाई के अलावा मुफ्त रहने और खाने की सुविधा भी प्रदान की गई है। खास बात यह है कि शिक्षा ने नादिया जैसी लड़कियों को आत्मविश्वास, साहस और समाज में भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद करने का दृढ़निश्चय दिया है। नादिया एक संवेदनशील लड़की है जो समाज में फैले भेदभाव और अन्याय को लेकर


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष मेवात के कई गांव गुड़गांव से ज्यादा दूर नहीं है जहां बहुत से कॉल सेंटर, बीपीओ और अन्य कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं काफी चिंतित है। नादिया कहती है कि वो एक डॉक्टर बनना चाहती हैं क्योंकि अमीरों को तो अस्पतालों में अच्छी देखभाल और पूरा इलाज मि‍ल जाता है जबकि गरीबों को घंटों अस्पताल की लंबी लाइनों में इंतजार करना पड़ता है और उनके बावजूद भी डॉक्ट‍र का व्यवहार उनके प्रति उदासीन रहता है। एमएमएसएस और केजीबीवी के तहत चलने वाले स्कूलों के अलावा 'एडुकॉम सोल्यूशंस' नामक संगठन के तहत छह यूनिवर्सल एकेडमी स्कूल भी मेवात में चलाए जा रहे हैं। ये संगठन भारत और विदेशों में शिक्षा के क्षेत्र में डिजि‍टल क्रांति लाने वाला अग्रणी संगठन है। हालांकि, इस स्कूल में अब भी केवल 182 छात्र ही हैं जो संख्या के लिहाज से बेहद कम है लेकिन फिर भी, मियो समुदाय वाले मेवात के इस पिछडे़ क्षेत्र में जहां लड़कियों को शिक्षा दिलाना अंतिम प्राथमिकता है। वहां नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध न कराने वाले स्कूलों में भी अपने बच्चों का दाखिला कराने की पहल वाकई स्वागत योग्य है। ग्रामीण इलाकों में यूनिवर्सल एकेडमी के साथ भागीदारी में स्कूल चलाने वाली संस्था एडुकॉम की अकादमिक प्रमुख अनुराधा बताती हैं कि शुरुआत में उनका काफी विरोध हुआ था। गांवों में लोगों को मनाने के लिए उन्हें काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी कि वे अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें। उस वक्त ये आसान नहीं था पर आज हालात बदल रहें हैं। यूनिवर्सल एकेडमी स्कूलों में लड़कियां पढ़ने आ रही हैं। एक और बदलाव भी देखने में आया है कि अब ग्रामीणों को यह महसूस होने लगा है कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्राप्त करने से युवाओं को अपने आस-पास के क्षेत्रों में ही आसानी से नौकरियां मिल सकती हैं। इसके लिए उन्हें दूरदराज के इलाकों में जाने की जरूरत नहीं। मेवात के कई गांव गुड़गांव से ज्यादा दूर नहीं है जहां की बहुत से कॉल सेंटर, बीपीओ और अन्य कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं। चाहे मॉडल स्कूल हों, केजीबीवी या यूनिवर्सल एकेडमी स्कूल, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पिछड़े इलाके के लड़के-लड़कियों को आज ऐसे स्कू‍लों में पढ़ने का मौका मिल रहा है जहां अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा और सर्वांगीण विकास को प्रमुखता दी जाती है। सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ऐसी शिक्षा ने नादिया जैसी लड़कियों को इतना साहस और हौसला दिया है कि वे समाज के भेदभाव भरे रवैये पर सवाल उठा सकती हैं और एक ऐसे संसार का सपना देख सकती है जहां न्याय हो और उनकी आवाज सु‍नी भी जाए और उनका सम्मान भी हो सके।

05 - 11 मार्च 2018

स्वच्छता

महिला अस्मिता के सम्मान की अनूठी मिसाल

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आदिवासी युवतियों को अकेलेपन से डर नहीं लगता। बस्तर के सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में ऐसी कई युवतियां हैं, जिनके विख्यात परिवारों में अब जायदाद संभालने वाले नहीं रहे। पर वे वहां न केवल विरासत संभाल रही हैं, बल्कि उनके परिवार की छत्रछाया की दरकार रखने वाले आदिवासियों को आसरा भी दे रही हैं शहरी महिलाओं से ज्यादा सशक्त हैं बस्तर की महिलाएं घर से बाहर तक की पूरी व्यवस्था संभालती हैं ये आदिवासी महिलाएं

जीवन साथी चुनने और परखने का पूरा अधिकार इनके पास है

इरा झा

दिवासी समाज में महिला पुरुष की साथी है। वह उसकी सहकर्मी है। उसकी समाज और परिवार में बराबर की भागीदारी है। जी हां, बस्तर की आदिवासी महिलाएं हम शहरी महिलाओं की तरह अपने परिवार के पुरुष सदस्यों की मोहताज नहीं हैं। उन्हें बाजार से सब्जी-भाजी और सौदा मंगवाने से लेकर खेतों में हल चलाने तक के लिए अपने बेटे या पति का मुंह नहीं ताकना पड़ता है। वह हम शहरी महिलाओं से कई मायनों में बहुत ज्यादा समर्थ हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उनके जिक्र के बगैर पूरा नहीं हो सकता। ये न सिर्फ घर के सारे कामकाज करती हैं, बाल-बच्चे पालती हैं, बल्कि पूरे दिन खेतों में काम भी करती हैं। इनका पूरा साल खेतों में काम करते ही बीतता है। बस्तर की आदिवासी महिलाओं के अधिकार असीमित हैं। वह घर से बाहर तक की पूरी व्यवस्था संभालती हैं और हर कदम पर पति उसके साथ होता है। इनके कामकाज का दायरा खेत-खलिहान और हाट बाजार तक का है। खेत का पूरा जिम्मा भी यही उठाती हैं। बीज लाना, उन्हें मूसलाधार बारिश में रोपना और कड़ी धूप में चौकीदारी करने के बाद फसल काटना, यह सब उन्हीं के जिम्मे है। यहां

तक कि बाजार में इसे बेचने भी वही ले जाती हैं। ऐसी महिलाएं जो खेती नहीं करतीं, घर में बाड़ी में उगी सब्जियां और जंगली उत्पादों जैसे महुआ, टोरा, जलाऊ लकड़ी, लाख, आंवला, झाड़ू वगैरह को परिवार की आमदनी का जरिया बना लेती हैं। और इस पूरी कवायद में पति उसके साथ रहता है। जब महिला खेत में जूझ रही होती है तो पति घर में बच्चों की देखभाल में लगा रहता है। वह उनके लिए खाना पकाता है। बारिश से बचाव के लिए छत की मरम्मत जैसे छोटे-मोटे काम करता है। घर की बाड़ी में सब्जियों, फलों, लताओं की संभाल करता है और घर के बुजुर्गों की देखभाल करता है। हर कदम पर पारस्परिक सहयोग और महिला अस्मिता के सम्मान की अनूठी मिसाल बस्तर का आदिवासी समाज है। इस समाज में महिलाएं अपनी मर्जी की मालिक हैं। उसकी स्वायत्तत्ता, बल्कि अधिकारिता की बढ़िया मिसाल तो यही है कि वह न केवल अपना जीवनसाथी खुद चुन सकती है, बल्कि चाहे तो पहले उसे परख भी सकती है। इस परंपरा को लमसेना कहा जाता है। इसके तहत शादी के योग्य युवक को युवती के घर में रहकर काम-काज में मदद करके अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है। इस परीक्षा में फेल या पास करने का अधिकार पूरी तरह से युवती पर होता है। लमसेना बैठाने की यह परंपरा सरगुजा और मंडला के गोंड समाज में भी है।

परिवार और घरेलू कामकाज के प्रशिक्षण के‍लिए उन्हें घोटुल जाने की छूट है। यह आदिवासी नौजवानों के संस्कार गृह है। घर के कामकाज से निपटकर युवक-युवती रात में यहां जुटते हैं और किसी सयानी महिला की निगरानी में नाचते-गाते और कामकाज सीखते हैं

खास बातें यही नहीं, इससे पहले परिवार और घरेलू कामकाज के प्रशिक्षण के‍लिए उन्हें घोटुल जाने की छूट है। यह आदिवासी नौजवानों के संस्कार गृह हैं। घर के कामकाज से निपटकर युवक-युवती रात में यहां जुटते हैं और किसी सयानी महिला की निगरानी में नाचते-गाते और कामकाज सीखते हैं। मन मिल गया तो शादी के साथ युवा जोड़े की घोटुल से विदाई हो जाती है। वे फिर उधर का रुख नहीं कर सकते। घोटुल अब बस्तर के परिवेश से गायब हो चले हैं। शहरी खासतौर पर मीडिया की दखलंदाजी ने इस संस्था को लुप्त होने पर मजबूर कर दिया है। पर आदिवासी युवती की निरपेक्ष स्थिति की इससे बेहतर मिसाल और क्या हो सकती है? आदिवासी युवतियों को अकेलेपन से भी डर नहीं लगता। बस्तर के सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में ऐसी कई युवतियां हैं, जिनके विख्यात परिवारों में अब जायदाद संभालने वाले नहीं रहे। पर वे वहां न केवल विरासत संभाल रही हैं, बल्कि उनके परिवार की छत्रछाया की दरकार रखने वाले आदिवासियों को आसरा भी दे रही हैं। बड़े आदिवासी परिवारों की लड़कियां हैं, ये गांव छोड़कर दिल्ली से लंदन तक कहीं भी बस सकती थीं। उनका समर्पण देखिए, जज्बा देखिए अपने लोगों के प्रति स्नेह देखिए। यह स्थिति तब है जब घने जंगलों के बीच बसे गांवों में सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती, जंगली जानवरों का खतरा मंडराता रहता है और अस्पताल में दवाइयों का पता नहीं रहता और स्कूल बदहाल हैं। यदि इन्हें शहरी लोगों से मामूली या बराबर की सुविधाएं मिल जाएं तो इनकी हिम्मत, इनका जज्बा और ताकत बेजोड़ होगी यह तय मानिए।


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हा

स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण

05 - 11 मार्च 2018

स्वच्छ राह पर आधी दुनिया

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

देश में स्वच्छता के साथ महिला सशक्तिकरण को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह है सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक एसएसबी ब्यूरो

ल में बिहार की एक दलित महिला रुनकी देवी ने अपना मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनवाने की नजीर पेश की। यह घटना दो बातों की तरफ इशारा करती है। पहली बात तो यह कि तमाम सफाई अभियानों और शौचालय निर्माण की योजनाओं के बावजूद आज भी गांवों में शौचालय की समस्या बहुत बड़ी है। दूसरी बात यह कि स्वच्छता का मुद्दा सबसे ज्यादा महिलाओं से जुड़ा है। यही वजह है कि स्वच्छता आंदोलन को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ी और कारगर पहल के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ समय पहले ‘वाटरएड’ नामक एनजीओ की एक रिपोर्ट में तथ्य सामने आया कि भारत में 35 करोड़ 50 लाख महिलाओं और लड़कियों को शौचालय मयस्सर नहीं है। ‘द स्टेट ऑफ वर्ल्डस टायलेट 2017’ नामक इस रिपोर्ट में कहा गया था कि पूरी दुनिया में भारत में सबसे कम लोगों के पास शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध है। स्कूलों में शौचालय न होने के कारण, बहुत सारी लड़कियां आठवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़ने पर बाध्य हो जाती हैं। इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि गांवों में लगभग 28 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल ही नहीं जातीं। इसका प्रमुख कारण स्कूलों में शौचालय का न होना है। कुछ समय पहले ‘प्रथम’ नाम के एक एनजीओ की रिपोर्ट में कहा गया कि देश में चल रहे कुल स्कूलों में 74 प्रतिशत सरकारी हैं। इनमें से 47 प्रतिशत स्कूलों में आज तक लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। इसी तरह गांवों में भी महिलाएं घर में शौचालय न होने के कारण मुंह अंधेरे सुबह और मुंह अंधेरे शाम को ही खेतों में जा पाती हैं। दिन के किसी अन्य समय पर शौचालय जाने की जरूरत महसूस होना उन महिलाओं के लिए बड़ी समस्या है। बहुत सारे सरकारी या निजी स्कूलों में आज भी महिला अध्यापिकाओं के लिए अलग से शौचालयों की व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि बड़े शहरों में भी छोटे संस्थानों या दफ्तरों में काम करने वाली लड़कियोंमहिलाओं के लिए भी अक्सर ही कोई शौचालय नहीं होता। महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों पर इतने कम शौचालयों का होना समाज और सरकार दोनों की उनके प्रति असंवेदनशीलता की तरफ साफ इशारा करता है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे जरूरी व ठोस प्रयास, महिलाओं की बुनियादी जरूरतों को समझना और उन पर काम करना है। निजी और सार्वजनिक जगहों पर शौचालयों का निर्माण उनकी बुनियादी जरूरतों में से एक है। स्वतंत्र भारत में इस दरकार को अगर सबसे पहले किसी ने समझा तो वे हैं डॉ. विन्देश्वर

आज स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन चुका है टीसीएस 10,000 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय बनावा रहा है गांवों में 28 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल ही नहीं जाती हैं

खास बातें

डॉ. पाठक ने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढोने की मैली प्रथा को खत्म करने का बीड़ा उठाया, वहीं देश भर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से उन्होंने लोगों और खासतौर से महिलाओं की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया पाठक और उनकी संस्था सुलभ इंटरनेशनल। नब्बे के दशक में भारत को 21वीं सदी में जाने की बात खूब होती थी। ये बातें जहां संसद के बाहरभीतर राजनीतिक लाइन के साथ कही जाती थी, वहीं आर्थिक-सामाजिक स्तर पर भी भावी भारत से जुड़े सरोकारों और चुनौतियों को लेकर विमर्श चलता था। पर किसी ने कभी सोचा भी होगा कि 21वीं सदी के दूसरे दशक तक पहुंचकर स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन जाएगा। इस बदलाव के पीछे बड़ा संघर्ष है। आज देश में स्वच्छता के साथ महिला सशक्तिकरण को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक। पूरी दुनिया आज डॉ. पाठक को ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में जानती है। उन्होंने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढोने की मैली प्रथा को खत्म करने बीड़ा उठाया, वहीं देशभर में सुलभ शौचालय की

उपलब्धता से उन्होंने आम लोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया। बड़ी बात यह है कि डॉ. पाठक द्वारा शुरू किया गया स्वच्छता का सुलभ अभियान अब भी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने के बाद डॉ. पाठक के मार्गदर्शन में सुलभ का स्वच्छता अभियान नई प्रेरणा और गति के साथ आगे बढ़ रहा है। शौचालय और स्वच्छता को पांच दशक से अपनी समझ और विचार की धुरी बनाकर चल रहे डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक तरह से दुनिया को स्वच्छता का नया समाजशास्त्र सिखाया है, जिसमें साफ-सफाई के सबक तो हैं ही, मानवीय प्रेम और करुणा को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है।

सिर पर मैला ढोने की प्रथा

बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते गांधी विचार और कार्यक्रमों के करीब आए डॉ. पाठक ने तब से न सिर्फ पूरे देश में, बल्कि

विश्व में स्वच्छता का अलख जगा रहे हैं। सिर पर मैला ढोने की प्रथा को लेकर सुलभ ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। सिर से मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने की सोच की ही देन है सुलभ द्वारा विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। आज यह तकनीक पूरी दुनिया में ‘सुलभ शौचालय’ के रूप में जानी जाती है। इस तकनीक में पहले गड्ढे में जमा शौच खाद में बदल जाता है। सुलभ ने शौचालय के जरिए गैस बनाने और उसे बिजली तक बनाने के कामयाब प्रयोग किए हैं। 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना हुई और आज शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए इसकी दुनियाभर में पहचान है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक भी मानते हैं कि गांधी जी के बाद अगर इस देश में स्वच्छता के महत्व को किसी ने गहराई से समझा है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

सरकार का जवाब

सिर पर मैला ढोना भारत में प्रतिबंधित काम है। गत वर्ष राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार में मंत्री थावरचंद गहलोत ने बताया था कि देश में 26 लाख ऐसे शौचालय हैं, जहां पानी नहीं है। जाहिर है वहां हाथ से मैला साफ करना पड़ता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने अपने सर्वे में बताया है कि 1993 से अब तक 1,370 सीवर वर्कर्स की मौत हो चुकी है। इस दिशा में स्कैवेंजर्स के पुनर्वास का सबसे बड़ा अभियान सुलभ संस्था ने ही छेड़ा है। महिला स्कैवेंजर्स को सुलभ ने न सिर्फ इस प्रथा से आजादी दिलाई, बल्कि उनके पुनर्वास और जीवन यापन की भी चिंता की। सुलभ ने ऐसे कई केंद्र स्थापित किए जहां महिला स्कैवेंजर्स को वैकल्पिक रोजगार के गुर सिखाए जाते हैं। डॉ. पाठक को इस बात का श्रेय जाता है कि जिस मैली प्रथा को लेकर कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि उनके सपनों के भारत में इसके लिए कोई जगह


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

05 - 11 मार्च 2018

स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण

मैली प्रथा का अंत!

देश में लगभग 7 लाख स्कैवेंजरों में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। सुलभ स्कैवेंजिंग समाप्त करने, स्कैवेंजरों के मानवाधिकार लौटाने और स्वच्छता की एक नूतन व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में निरंतरर कार्यरत रहा है

हिला विकास और सभ्यता की प्रतीक होती है, यदि आप जानना चाहते हैं कि समाज कितना अच्छा है तो रास्ते में चलने वाली किसी महिला से बात करें और आपको बिना किसी अर्थशास्त्री की मदद के उत्तर मिल जाएगा। महिला विकास, सुंदरता, निर्मलता और उन सभी चीजों की प्रतीक होती है, जो जीवन को सार्थक बनाती है। ये बातें कुछ वर्ष पूर्व पद्मभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक ने उदयपुर में एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही थीं। सम्मेलन का आयोजन ‘महिला-सशक्तिकरणस्थिति और भूमिका पर उभरता हुआ परिदृश्य’ विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के समाजशास्त्र-विभाग ने किया था। इस कार्यक्रम में डॉ. पाठक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। डॉ. पाठक ने सम्मेलन में समकालीन परिदृश्य के बारे में बताया और कहा कि विकासशील देशों में महिलाओं की स्थिति असंतोषप्रद रही है। यूरोप और अमेरिका में भी उन्हें मतदान का अधिकार पिछली सदी के नहीं होगी, उस प्रेरणा को उन्होंने अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया।

राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की घोषणा की तो देश में स्वच्छता कार्यक्रम को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्राथमिकता मिली। अपने स्वच्छता क्रार्यक्रमों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान प्राप्त कर चुके डॉ. पाठक कहते भी हैं, ‘स्वच्छता को लेकर देश में गंभीरता की कमी रही। इसे महत्व नहीं दिया गया। इस क्षेत्र में निवेश का भी अभाव रहा, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे परिदृश्य को

पूर्वार्ध में मिला, शिक्षा के प्रचार और रसोईघर के उपकरणों से उन्हें मतदान के अधिकार से अधिक शक्ति मिली। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद स्थिति सुधरी। भारत और अन्य विकासशील देशों में उनकी दुर्दशा के कारण रहे हैं, गलत परंपराएं और सामाजिक कुरीतियां। डॉ. पाठक ने यह भी कहा कि भारत में स्कैवेंजिंग करने वाले लोग अस्पृश्य माने जाते हैं, वे गरीबी और जाति के सबसे निचले पायदान पर होते हैं। लगभग 7 लाख स्कैवेंजरों में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। सुलभ ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अपनी तरह से कदम उठाए हैं। कमाऊ शौचालय की जगह सुलभ शौचालय-तकनीक से स्कैवेंजर महिलाओं को उनके पेशे से मुक्त कराया गया है। विभिन्न व्यावसायों में प्रशिक्षण-द्वारा उन्हें जीविका अर्जित करने का प्रतिष्ठित रास्ता दिखलाया गया। राजस्थान के अलवर और टोंक के इस कार्यक्रम ने इन महिलाओं को नई राजकुमारियां बनाया है। सुलभ स्कैवेंजिंग समाप्त करने, स्कैवेंजर्स के मानवाधिकार लौटाने और स्वच्छता की एक नूतन व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में निरंतर कार्यरत रहा है। सुलभ ने स्वच्छता-कार्यक्रमों में बदल कर रख दिया। वे ऐसे पहले राष्ट्रीय नेता रहे जिन्होंने न सिर्फ लाल किले के प्राचीर से शौचालयों की बात की, बल्कि इस बारे में विदेशी नेताओं तक से लगातार चर्चा करते रहे। उन्होंने देश को यह सोचने और मानने के लिए बाध्य किया कि अगर हम स्वच्छता के मामले में आगे नहीं बढ़े तो फिर एक विकसित राष्ट्र के रूप में हमारा उभरना मुश्किल है। लिहाजा यह समय है जब हम देश को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए एक साथ खड़े हों, ताकि सभ्य, सुसंस्कृत और स्वच्छ देशों की कतार में हम भी फख्र से खड़े हो सकें।’ प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से डॉ. पाठक द्वारा पहले से किए जा रहे प्रयासों को जहां नए

महिलाओं की पूरी भागीदारी की वकालत की है। उनकी शिक्षा, स्लमों में स्वास्थ्य तथा सफाई के बारे में जागरूकता-अभियान से समुदाय तथा पर्यावरण में स्पष्ट सुधार परिलक्षित होता है। दिल्ली के स्लमों में सुलभ द्वारा हजारों महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। ये महिलाएं अब स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा सामाजिक परिवर्तन की दूत के रूप में कार्यशील रही हैं। इसका प्रभाव घरों के सभी सदस्यों पर स्वास्थ्यकर रूप से पड़ा है। स्वच्छ सुविधाओं के साथ स्वस्थ पर्यावरण प्रत्येक महिला और बच्चे का अधिकार है। सुलभ शौचालय तथा स्नान-परिसरों में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था रहती है। जून 1996 में इस्तांबुल में आयोजित सिटी समिट, हैबिटाट-II कॉन्फ्रेंस में स्वच्छता के क्षेत्र में सुलभ की उद्घोषणा ‘बेस्ट प्रैक्टिस’ के रूप में की गई। संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक तथा सामाजिक काउंसिल द्वारा सुलभ को स्पेशल कंसल्टेटिव स्टेटस प्रदान किया गया, बाद में जेनरल कंसल्टेटिव स्टेटस प्रदान किया गया है। सुलभ ने ‘नई दिशा’ नाम से अलवर तथा टोंक (राजस्थान) में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए हैं। जहां भूतपूर्व स्कैवेंजर महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाता है, अपना पुराना पेशा छोड़ने के बाद इस प्रकार उन्हें जीविकोपार्जन का प्रतिष्ठित तरीका उपलब्ध कराया जाता है। इस प्रशिक्षण के आयाम विविध प्रकार के हैं, जिनमें पढ़ना-लिखना, खाद्य-सामग्री बनाना, सिलाई-कढ़ाई, सौन्दर्य-प्रसाधन इत्यादि शामिल हैं। यहां इन लोगों का नियमित मेडिकल चेकअप भी होता है। इस प्रकार हुए सामाजिक रूपांतरण का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वही समाज, जो इन स्कैवेंजर्स को छूने से भी बचना चाहता था, अब इनके बनाए खाने के सामान खरीदने लगा है। इन महिलाओं ने स्वयं-सहायता दल बनाए हैं, ये अपने बैंक खाता रखती हैं और वहां से ऋण लेकर अपना कारोबार चलाती हैं। सिरे से महत्व मिला, वहीं वे इस बात से खासे प्रोत्साहित और प्रेरित भी हुए कि देश का प्रधानमंत्री इतने वर्षों के बाद गांधी जी के स्वच्छता कार्यक्रमों को न सिर्फ अपना रहा है, बल्कि उसे देश में एक जनांदोलन की शक्ल देने में लगा है। बात स्वच्छता की करें तो इसमें कहीं कोई दो मत नहीं कि इस काम को जिस लगन और विस्तार के साथ डॉ. पाठक ने अब तक किया है, वैसा उदाहरण भारत तो क्या दुनिया में दुलर्भ है। यही कारण है कि सुलभ प्रणेता देश-विदेश में अब तक सौ से ज्यादा विशिष्ट सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। इनमें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण (1991), इंटरनेशनल सैंट फ्रांसिस प्राइज, इटली (1992), यूएन हैबिटेट द्वारा ग्लोबल

15 स्वच्छता को लेकर शुरू हुआ सुलभ आंदोलन गांधी के बाद उनकी राह पर दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन है। इस आंदोलन ने महिलाओं के साथ सामाजिक स्तर पर चल रही एक बड़ी गैर-बराबरी और अन्याय को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है 500 स्क्रॉल ऑफ ऑनर (2003), स्टॉकहोम वाटर प्राइज (2009) और चीन में संपन्न वर्ल्ड टॉयलेट सम्मिट में वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन द्वारा हॉल ऑफ फेम अवार्ड (2008) आदि शामिल है।

दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन

स्वच्छता को लेकर शुरू हुआ सुलभ आंदोलन गांधी के बाद उनकी राह पर बढ़ा दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन है। इस आंदोलन ने महिलाओं के साथ सामाजिक स्तर पर चल रही एक बड़ी गैरबराबरी और अन्याय को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है। खुद डॉ. पाठक के शब्दों में, ‘गांधी जी ने अपने डरबन के आश्रम में सबसे पहले ट्रेंच लैट्रिन यानी चारदीवारी के भीतर शौच का इंतजाम शुरू किया। उनकी व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपना शौचालय साफ करना होता था। आज भी पुराने गांधीवादियों में आप यह चलन देख सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उनका सुझाव था कि ट्टी पर मिट्टी यानी गड्ढा खो​िदए। शौच के बाद उस पर मिट्टी डालिए। दरअसल, शौचालय की सफाई के जरिए वे मैला साफ करनेवाले लोगों को समाज में बेहतर स्थान दिलाना चाहते थे। हमारे यहां परंपरा रही है कि घर के नजदीक शौच न करें। गांधी जी ने उसमें बदलाव का इंतजाम किया और चारदीवारी के भीतर शौच व्यवस्था की शुरूआत की। उनकी कोशिश इन लोगों को शौच सफाई के घिनौने काम से मुक्ति दिलानी थी। वे शौचालय को सामाजिक बदलाव के औजार के तौर पर देखते थे। गांधी शताब्दी के दौरान 1969 में मुझे लगा कि इस दिशा में काम किया जाना चाहिए। इसीलिए मैंने सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की और इसकी तरफ काम शुरू किया।’

स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय

सुलभ की पहल आज स्वच्छता को लेकर एक राष्ट्रीय प्रेरणा और अभियान का नाम है। महिलाओं को लेकर सुलभ की प्रेरणा कैसे एक बड़े मिशन को पूरा कर रही है, उस बारे में डॉ. पाठक बताते हैं, ‘टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने 100 करोड़ रूपए से देश के दस हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय बनाने का ऐलान किया है। भारतीएयरटेल कंपनी ने भी 100 करोड़ से पंजाब के लुधियाना जिले में शौचालय बनाने का फैसला किया है। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स भी दो करोड़ की लागत से शौचालय बनाने जा रहा है। साफ है कि देश में सफाई की दिशा में मोदी जी की अपील के बाद बड़ी क्रांति की शुरुआत हो चुकी है।


16 खुला मंच

05 - 11 मार्च 2018

बिना महिलाओं की स्थिति में सुधार के इस संसार का कल्याण संभव नहीं है। जैसे किसी पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना असंभव है

- स्वामी विवेकानंद

प्रियंका तिवारी

अभिमत

लेखिका युवा पत्रकार हैं और देश-समाज से जुड़े मुद्दों पर प्रखरता से अपने विचार रखती हैं

महिला सशक्तिकरण का अहिंसक मॉडल महात्मा गांधी के एक कौल पर घर से बाहर निकलने वालों में पुरुषों के साथ महिलाओं की संख्या कम नहीं थी

बदलाव के रंग में रंगा ब्रज वर्षों से अपनों का तिरस्कार और समाज की बेरुखी झेल रहीं ब्रज की विधवा माताओं के जीवन में सुलभ ने घोला उत्साह और खुशी का रंग

ब्र

ज के लोक जीवन में ऐसे बहुत सारे किस्से हैं, जो यह बताते हैं कि भगवान कृष्ण की यह धरती सामाजिक समरसता की भूमि रही है। इसीलिए यहां की मिट्टी में ही अनूठापन है। परंपरा से लेकर जीवन शैली तक, त्योहार से लेकर उत्सव तक सब ब्रज की विशेषताओं में शुमार है। होली भले ही पूरे देश में खेली जाती है, लेकिन ब्रज की होली का अंदाज ही कुछ और है। इन्हीं विशेषताओं के कारण कृष्ण की इस लीला भूमि का चयन सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक बड़े सामाजिक बदलाव के लिए किया। उन्होंने ब्रज की परंपरागत होली में एक नया रंग डाला, जिसमें रंगकर वृंदावन में रहने वाली विधवा माताओं की जिंदगी का खोया उल्लास लौट आया। पति की मृत्यु और उसके बाद अपनों से दूरी के दुख का पहाड़ ढोने वाली इन विधवा माताओं के जीवन में सिर्फ कान्हा के भजन गाना और अपनी मृत्यु का इंतजार करना ही लिखा था। समाज की इस पुरातन कुरीति को समाप्त करने का लक्ष्य लेकर निकले डॉ. पाठक ने इनकी जिंदगी के अर्थ बदल डाले और अब ब्रज भूमि पर विधवा माताएं होली खेल रही है, फूलों और गुलाल की। इस होली उत्सव से बहुत कुछ बदला। सबसे बड़ी बात यह कि सदियों पुरानी सामाजिक रूढ़ि की वह दीवार टूटी, जो विधवाओं को त्योहार मनाने से रोकती है। संदेश यह कि इन विधवाओं को भी समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का पूरा अधिकार है, जो उन्हें मिलना चाहिए। इन बदलावों की साक्षी बनी यही ब्रज भूमि। वृंदावन के आश्रय सदनों में रहने वाली माताओं को अब इस बात का अहसास हुआ कि उनका भी जीवन है और उस जीवन में भी रंग हैं। यह भरोसा आज अगर उनके भीतर जगा, तो यह एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है, जिसकी शुरुआत सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने की। सुलभ और डॉ. पाठक के प्रयास से वर्षों से अपनों का तिरस्कार और समाज की बेरुखी झेल रही इन महिलाओं के जीवन के जख्मों को भले ही नहीं भर पाएं, लेकिन इतना जरूर है की इनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार तो अवश्य ही हुआ है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

हात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने पर तकरीबन एक साल के देश भ्रमण के बाद सक्रिय हुए तो उनकी इस सक्रियता ने अनजाने ही एक बड़ी क्रांति को आकार दिया। यह क्रांति फिरंगी दासता के खिलाफ अहिंसक संघर्ष के साथ महिला सशक्तिकरण से जुड़ा था। भारतीय परंपरा, मान्यता और अनुभव के लिहाज से यह बड़ी बात थी कि महात्मा गांधी के एक कौल पर घर से बाहर निकलने वालों में पुरुषों के साथ महिलाओं की संख्या कम नहीं थी। महिलाओं को लेकर गांधी जी ने चरखे से लेकर दूसरे रचनात्मक प्रयोगों के कई सुलेख लिखे। उनके साथ अच्छी बात यह थी कि वे महिला स्वावलंबन को अलग से मुद्दा बनाने के बजाए, महिलाओं के सहयोग को अपने अहिंसक रचनात्मक प्रयोग के लिए जरूरी मानते थे। उन्हें महिलाओं की धीरता और समन्वयी गुण की समझ थी। यह पूरी दुनिया में महिला सशक्तिकरण का अपने तरह का अनुपम उदाहरण है, जिसमें महिलाएं किसी पुरुषवादी होड़ से भिड़ने के बजाय खुद से अपने लिए जगह बनाती हैं, राष्ट्र और समाज की सेवा में अपना योगदान करती हैं। पत्नी कस्तूरबा के बारे में तो गांधी जी ने स्वीकार भी किया है कि उनकी दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। तारीखी अनुभव के तौर पर भी देखें तो बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की आजीवन संगिनी रहीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति

का साथ दिया बल्कि यह कि कई बार स्वतंत्र रूप से और गांधी जी के मना करने के बावजूद उन्होंने जेल जाने और संघर्ष में शिरकत का फैसला किया। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधी जी की प्रेरणा भी। उन्होंने नई तालीम को लेकर गांधी जी के प्रयोग को सबसे पहले अमल में लाया। इसी तरह चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी जी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं बल्कि कस्तूरबा ही थीं। इसको लेकर कई प्रसंग की चर्चा खुद गांधी जी ने भी की है। कहना हो तो कह सकते हैं कि शिक्षा, अनुशासन और स्वास्थ्य से जुड़े गांधी जी के कई बुनियादी सबक के साथ स्वाधीनता संघर्ष तक कस्तूरबा का जीवन रचनात्मक दृढ़ता की बड़ी मिसाल है। इसी तरह की एक महिला हैं दुर्गा बाई देशमुख। दुर्गा बाई महात्मा गांधी जी के विचारों से बेहद प्रभावित थीं। शायद यही कारण था कि उन्होंने गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और देश की आज़ादी में एक वकील, सामाजिक कार्यकर्ता व राजनेता के तौर पर सक्रिय भूमिका निभाई। दुर्गा बाई लोकसभा की सदस्य होने के साथ योजना आयोग की भी सदस्य थीं। इस तरह हम देखें तो गांधी जी के बाद उनकी विचारधारा को शिक्षा, महिलाओं, बच्चों और वंचित लोगों के पुनर्वास के क्षेत्र में उनका अमूल्य योगदान है। गौरतलब है कि ‘केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड’ की नींव रखने में दुर्गाभाई की नियामक भूमिका थी। गांधीवादी नजरिए से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले अक्सर ग्रामीण महिलाओं का जिक्र ज्यादा करते हैं, जबिक एसा नहीं है। एक पढ़ी-लिखी और सशक्त महिला भी परिवार-समाज और उससे आगे राष्ट्र निर्माण में महती भूमिका निभा सकती है, सरोजिनी नायडू इसकी बड़ी मिसाल हैं। शुरुआत में गांधी जी के अहिंसक मूल्यों और भारतीय

चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी जी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं बल्कि कस्तूरबा ही थीं


05 - 11 मार्च 2018 समाज को लेकर गांधी जी की मान्यताओं को लेकर सरोजिनी को जरूर कुछ झिझक रही, पर जल्द ही वह खुद गांधी जी के विचारों की बड़ी प्रवक्ता बनकर पूरी दुनिया में छा गईं। इस कड़ी में सुचेता कृपलानी का स्मरण भी जरूरी है। सुचेता ने विभाजन के दंगों के दौरान महात्मा गांधी जी के साथ रहकर सेवा का बड़ा कार्य किया था। उन्हें भारतीय संविधान के निर्माण के लिए गठित संविधान सभा की ड्राफ्टिंग समिति के एक सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया था। आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया। सुचेता के बारे में यह अहम है कि उनके जीवन पर गांधी जी का असर तो खासा पड़ा ही, खुद गांधी जी ने भी उनसे बहुत कुछ ग्रहण किया। गौरतलब है कि आचार्य कृपलानी और सुचेता बहुत अच्छे मित्र थे। वे शादी करना चाहते थे। गांधी जी किन्हीं कारणों से इस विवाह के खिलाफ थे। उन्हें लगता था कि इससे दोनों के जीवन का रास्ता राष्ट्रसेवा के बजाय कुछ दूसरा हो जाएगा। पर उनकी यह समझ सही नहीं थी, सुचेता ने आगे बढ़कर गांधी जी के सामने की। माना जाता है कि महिला जीवन और उसके उन्नयन के मुद्दे पर इससे गांधी जी के अपने विचारों की कई दुविधा खत्म हुई। कह सकते हैं कि गांधी जी और उनके मूल्य महज दूसरों के लिए नहीं थे बल्कि यह हर समय आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रेरित करने वाली जीवनदृष्टि है, जिसमें सत्य के शोधन का विकल्प और अवकाश हमेशा खुला है। जो लोग 1974 के दौर में जयप्रकाश नारायण से पटना स्थित उनके आवास महिला चर्खा समिति में उनसे मिलने गए होंगे, उन्होंने वहां देखा होगा कि कैसे वहां महिलाएं शिक्षा से लेकर कुटीर उद्योग तक का काम संभालती थीं। दिलचस्प है कि पटना में जयप्रकाश जी का अपना कोई आवास नहीं था, वे वहां पत्नी प्रभावती देवी (1906- 15 अप्रैल, 1973) द्वारा स्थापित संस्था में रहते थे। पति-पत्नी का ऐसा संबंध शायद ही कहीं और देखने को मिले। गौरतलब है कि जयप्रकाश जी जब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे थे तब प्रभावती जी गांधी जी के आश्रम में रह रही थीं। उस दौरान गांधी जी एक तरफ प्रभावती के सेवाभाव से खासे प्रभावित हुए, तो वहीं प्रभावती पर भी गांधी जी का खासा प्रभाव पड़ा। प्रभावती ने खुद पहल करके ब्रह्मचर्य व्रत लेने की बात गांधी जी से की, जिसे उन्हें स्वीकार करना पड़ा। जेपी अमेरिका से नवंबर 1929 में वापस आए तो प्रभावती उनसे पटना में मिलीं। प्रभावती से उन्हें मालूम हुआ कि उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है तो जेपी को थोड़ा अचरज जरूर हुआ पर बाद में उन्होंने भी पत्नी के इस व्रत को पूरा करने का संकल्प लिया। बाद में जेपी समाजवादी आंदोलन और विनोबा के भूदान आंदोलन में शरीक हुए। इस दौरान प्रभावती ने स्वत: प्रेरणा से महिलाअाें के बीच खासतौर पर चरखे के जरिए स्वावलंबन का काम किया। उनकी इस भूमिका इस रूप में भी अहम रही कि वे घर में जेपी की एक तरह से शिक्षिका थीं। जेपी के अस्तव्यस्त जीवन में संयम और अनुशासन की कड़ी का नाम प्रभावती थी, जिनकी प्रेरणा से बिहार में न जाने कितनी महिलाओं ने सर्वोदय आंदलोन की लीक पकड़ी।

खुला मंच

ओशो

ल​ीक से परे

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महान दार्शनिक और विचारक

बिन बाती बिन तेल

एक दिन वह अहोभाग्य का क्षण निश्चित आता है, जब तुम रोशन हो जाते हो। ऐसी रोशनी जो फिर कभी बुझती नहीं। वह रोशनी किसी तेल पर निर्भर नहीं— ‘बिन बाती बिन तेल’

जी

वन क्या है, इसका उत्तर तभी हो सकता है, जब जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी हो। जीवन ही है, उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं है। हम उत्तर किसी और के संदर्भ में दे सकते थे, लेकिन कोई और है नहीं, जीवन ही जीवन है। तो न तो कुछ लक्ष्य हो सकता है जीवन का, न कोई कारण हो सकता जीवन का। कारण भी जीवन है और लक्ष्य भी जीवन है। ऐसा समझो, तुमसे कोई पूछे -किस चीज पर ठहरे हो? तुम कहो,छत पर। और छत किस पर ठहरी है? तो तुम कहो- दीवारों पर। और दीवारें किस पर ठहरी हैं? तो तुम कहो, पृथ्वी पर। और पृथ्वी किसी पर ठहरी है? तो तुम कहो गुरुत्वाकर्षण पर। और ऐसा कोई पूछता चले, गुरुत्वाकर्षण किस पर ठहरा है? तो चांद-सूरज पर। चांद-सूरज तारों पर। अंतत: पूछे कि यह सब किस पर ठहरा है? तो प्रश्न तो ठीक लगता है, भाषा में ठीक जंचता है, लेकिन सब किसी पर कैसे ठहर सकेगा, सब में तो वह भी आ गया है, जिस पर ठहरा है। सब में तो सब आ गया। बाहर कुछ बचा नहीं। इसको ज्ञानियों ने अति प्रश्न कहा है। सब किसी पर नहीं ठहर सकता। इसीलिए परमात्मा को स्वयंभू कहा है। अपने पर ही ठहरा है, इसका अर्थ होता है, किसी पर नहीं ठहरा है। मेरे लिए जीवन परमात्मा का पर्यायवाची है। इस जीवन का प्रयोजन है– उस जीवन को पाना। यह अवसर है। मगर तब जीवन को बांटना पड़ेगा। यह विभाजन कृत्रिम है, फिर भी काम है। अपने भीतर भी तुम इन दो धाराओं को थोड़ा पृथक करके

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पंपोर के केसर से महामस्तकाभिरेक

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सवच्छ्ता 25

देश की सबसे कामयाब

मभहला फुटबॉलर सवच्छ्ता का क्ा’ पूरी करेगा रोबोट सवभ््षम द्ीप देश भशक्ा की ‘आकां

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वर्ष-2 | अंक-11 | 26

आरएनआई नंबर-DELHIN

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फरवरी - 04 मार्ष 2018

बदल गया इभ्तहास

एक समय असपपृशय कही

जाने वाली दो बहनों की

-बाजा-बारा्त के सा् िवय

राजस्ान के टोंक में बैंड

शादी हुई

देख सकते हो। थोड़ी दूर तक सहारा मिलेगा। एक तो वह है, जो तुम्हें दिखाई पड़ता है और एक वह है जो देखता है। दृश्य और द्रष्टा। ज्ञाता और ज्ञेय। जाननेवाला और जाना जानेवाला। उसमें ही जीवन को खोजना जो जाननेवाला है। अधिक लोग उसमें खोजते हैं, जो दृश्य है। धन में खोजते, पद में खोजते हैं। पद और धन दृश्य हैं। बाहर जो भी है सब दृश्य है। उसमें खोजना जो द्रष्टा है, साक्षी है, तो तुम्हें परम जीवन की स्फुरणा मिलेगी। उसी स्फुरणा में उत्तर है, मैं उत्तर नहीं दे सकूंगा। कोई उत्तर कभी नहीं दिया है। जिन्होंने उत्तर सच में देने की चेष्टा की है, उन्होंने

गांधी जी का ‘सुलभ’ पाठ

गांधी जी और स्वच्छता की चर्चा अक्सर की जाती है। पर स्वच्छता किस तरह सामाजिक बदलाव का जरिया और रास्ता दोनों है, इस बारे में लोग गहराई से नहीं समझ पाते हैं। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने यह बात गांधी जी के बाद सबसे ज्यादा गहराई से समझी। मैं ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ का पुराना पाठक हूं। मैंने कई बार पढ़ा कि कैसे सुलभ अलवर-टोंक, ट्रंप विलेज से लेकर वृंदावन तक सामाजिक बदलाव का नया अध्याय लिखने में जुटा है। कहीं मैला ढोने की मैली प्रथा के अंत की अखंड शपथ है, कहीं स्वच्छता और स्वावलंबन का प्रेरक मॉडल

सिर्फ इशारे बताए हैं कि तुम अपना उत्तर कैसे खोज लो। उत्तर नहीं दिया, संकेत किए हैं, ऐसे चलो, तो उत्तर मिल जाएगा। उत्तर बाहर नहीं है। उत्तर तुम्हारे भीतर है। उत्तर है इस रूपांतरण में कि मेरी आखें बाहर न देखें, भीतर देखें। मेरी आखें दृश्य को न देखें, द्रष्टा को देखें। मैं अपने अंतरतम में खड़ा हो जाऊं, जहां कोई तरंग नहीं उठती, वहीं उत्तर है, क्योंकि वहीं जीवन अपनी पूरी विभा में प्रकट होता है। वहीं जीवन के सारे फूल खिलते हैं। वहीं जीवन का नाद है– ओंकार है। बाहर का जीवन भटकाता , भरमाता है । उत्तर के आश्वासन देगा और उत्तर कभी आएगा नहीं। भीतर का जीवन ही उत्तर है। शास्त्र कहते हैं, जैसे कछुवा अपने को समेट लेता है भीतर, ऐसे तुम अपने को भीतर समेटो। तुम्हारी आंख भीतर खुले और तुम्हारे कान भीतर सुनें। तुम्हारे नासापुट भीतर सूंघें, तुम्हारी जीभ भीतर स्वाद ले और तुम्हारे हाथ भीतर टटोलें। तुम्हारी पांचों इंद्रियां अंतर्मुखी हो जाएं। जब तुम्हारी पांचों इंद्रियां भीतर की तरफ चलती हैं, केंद्र की तरफ चलती हैं, तो एक दिन वह अहोभाग्य का क्षण निश्चित आता है, जब तुम रोशन हो जाते हो। जब तुम्हारे भीतर रोशनी ही रोशनी होती है। ऐसी रोशनी जो फिर कभी बुझती नहीं। ऐसी रोशनी जो बुझ ही नहीं सकती। क्योंकि वह रोशनी किसी तेल पर निर्भर नहीं— ‘बिन बाती बिन तेल’। वही जीवन का सार है, वही जीवन का ‘क्या’ है। उत्तरों में नहीं मिलेगा समाधान। समाधि में समाधान है। है, तो कहीं विधवा माताओं के जीवन में फिर से उत्साह और भरोसे की बहाली की मानवीय प्रेरणा। ये सब वही कार्य हैं, जिसे कभी गांधी जी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया था। दरअसल, गांधी जी हमारे देश के लिए कहने भर के लिए राष्ट्रपिता नहीं हैं, बल्कि वाकई वे आज भी देश के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने अपने जीवन को सत्य के साथ प्रयोग भले कहा हो, पर यह प्रयोग कई ऐतिहासिक सिद्धियों से भरा है। गांधी जी का जीवन और उनका अहिंसक प्रयोग आज भारत सहित दुनिया के लिए पर्यावरण से लेकर विकास की सबसे बड़ी साखी है। संजय दीक्षित, जगत नारायण रोड, पटना


18 विधवा माताओं के जीवन में उल्लास के रंग फोटो फीचर

05 - 11 मार्च 2018

वृंदावन के प्राचीन गोपीनाथ मंदिर में जब सैकड़ों विधवा माताएं होली खेलती हैं, तो वह कहीं न कहीं उस पुरानी सामाजिक बेड़ियां भी तोड़ रही होती हैं, जिससे उनके जीवन के उजास पर पहरा लगा था फोटोः जयराम


05 - 11 मार्च 2018

सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक की प्रेरणा से भगवान श्रीकृष्ण की ये दासियां पूरे उल्लास और उत्साह के साथ रंगों के इस उत्सव में अपने जीवन को भी रंगीन बनाती हैं। वृंदावन की विधवा माताओं के जीवन का रंग कब का उड़ चुका था। अपने परिवार से परित्यक्त कान्हा के चरणों में बैठ कर उम्र के बचे हुए दिन गुजार रही इन महिलाओं के जीवन में रंगों का यह उत्सव सुलभ के प्रयासों से संभव हुआ

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

05 - 11 मार्च 2018

श्रम बल से अपनी पहचान बनातीं कृषक महिलाएं कृषक महिलाओं के सशक्तिकरण को वर्तमान सरकार ने गंभीरता से लिया है और माना है कि कृषि विकास की हर योजना में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए

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डॉ. जगदीप सक्सेना

नव सभ्यता के विकास के दौरान जब पुरुष शिकार करने बाहर जाते थे तो महिलाओं ने बस्ती के आसपास फसलों के बीज बोकर कृषि की कला और विज्ञान का विकास किया। वह दिन है और आज का दिन, महिलाएं लगातार अपने हुनर के साथ कृषि और संबंधित उद्यमों की धुरी बनी हुईं हैं। पशुपालन, मछली पालन और मुर्गी पालन जैसे सहायक उद्यमों के साथ महिलाओं ने बागवानी, सब्जी उत्पादन, उपज की बिक्री और प्रसंस्करण जैसे कामों को भी बखूबी संभाला हुआ है। गाँवों में महिलाएं किसान भी हैं, खेतिहर मजदूर भी और साथ ही कुशल गृहिणी भी। लेकिन सामाजिक-आर्थिक रूप से और सरकारी आंकड़ो में भी महिलाओं की बहुमुखी भूमिका को बहुत दिनों तक यथोचित मान-सम्मान तथा मान्यता नहीं मिल पाई है। अपने ही खेत-खलिहानों में काम करने वाली महिलाओं की कहीं गिनती नहीं की जाती। फिर भी सन 2011 की जनगणना के अनुसार जो आंकड़े उपलब्ध हैं, वो बताते हैं कि भारत में कुल महिला कामगारों में से लगभग 65 प्रतिशत कृषि के क्षेत्र में कार्य करती हैं। देश के कुल किसानों (118.7 करोड़) में 30.3 प्रतिशत महिलाएं हैं। महिला कृषि श्रमिकों की भागीदारी 55.21 प्रतिशत आंकी गई है, जबकि देश की व्यापक कृषि अनुसंधान प्रणाली में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 17.40 प्रतिशत दर्ज किया गया है।

सन 2011 में हुए एक व्यापक अध्ययन में कृषि के विभिन्न उपक्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कुछ इस तरह देखी गई - खेत की निराई-गुड़ाई में 48 प्रतिशत, फसलों की कटाई में 45.33 प्रतिशत, कृषि उपज के भंडारण में 42.67 प्रतिशत, कृषि उपज की बिक्री में 42.00 प्रतिशत, पशुपालन और डेरी में 38.67 प्रतिशत और वित्तीय प्रबंधन में 36 प्रतिशत। एक अनुसंधान रिपोर्ट यह भी बताती है कि डेयरी के क्षेत्र में 7.5 करोड़ महिलाएं योगदान कर रहीं हैं, जबकि पुरुषों की संख्या 1.5 करोड़ है, इसी तरह पशुपालन में 15 करोड़ पुरुषों के मुकाबले 2 करोड़ महिलाएं संलग्न हैं। गांव की महिलाओं को कई बार इसके साथ ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठा करने और पीने के लिए पानी लाने का काम भी करना पड़ता है। पशुपालन में पशुओं को दूध दुहने और दूध से घी वगैरह बनाने का काम आमतौर पर महिलाएं ही करती हैं। यह भी अनुभव किया गया है कि जिन परिवारों में महिलाएं पशुपालन का काम करती हैं, वहां अधिक उत्पादन और आमदनी हासिल होती है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के महिला एवं जनसंख्या विभाग ने बताया कि भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाएं

लगभग 70 प्रतिशत कृषि श्रम प्रदान करती हैं, जबकि घरेलू खाद्य उत्पादन में 60 से 80 प्रतिशत, खाद्य भंडारण में 80 प्रतिशत और खाद्य वस्तुओं के प्रसंस्करण में महिला श्रम की हिस्सेदारी पूरे 100 प्रतिशत है। अधिकांश विकासशील देशों में महिलाएं 60 से 80 प्रतिशत खाद्य उत्पादन की जिम्मेदारी निभा रही हैं और संपूर्ण विश्व का लगभग आधा खाद्य उत्पादन इन्हीं के मजबूत हाथों से हो रहा है। इस तरह महिलाएं दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा को सतत आधार दे रही हैं। यह मजबूत दशा तब है, जबकि महिलाएं आमतौर पर भूमि के अधिकार और निर्णय लेने के अधिकार से वंचित हैं और अनेक सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को भी झेल रही हैं।

बढ़ते कदम

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारने और उन्हें तकनीकी रूप से अधिक सक्षम तथा कुशल बनाने के लिये भारत सरकार के दो मंत्रालय विशिष्ट रूप से कार्य कर रहे हैंकृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय। ग्रामीण विकास मंत्रालय में

अधिकांश विकासशील देशों में महिलाएं 60 से 80 प्रतिशत खाद्य उत्पादन की जिम्मेदारी निभा रही हैं और संपूर्ण विश्व का लगभग आधा खाद्य उत्पादन इन्हीं के मजबूत हाथों से हो रहा है

देश में महिला कृषि श्रमिकों की भागीदारी 55.21 प्रतिशत है डेयरी के क्षेत्र में 1.5 करोड़ पुरुषों के मुकाबले 7.5 करोड़ महिलाएं हैं खेत की निराई-गुड़ाई में महिला श्रमिकों की सर्वाधिक 48 प्रतिशत भागीदारी

खास बातें ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम और योजनाएं चलाई जा रही हैं, परंतु कृषक महिलाओं के लिए ‘महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना’ नाम से एक विशिष्ट योजना जारी है, जिसका उद्देश्य किसान महिलाओं के तकनीकी सशक्तिकरण द्वारा उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। पहले इस योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अन्तर्गत लागू किया जा रहा था, परंतु अब यह दीनदयाल अंत्योदय योजना का हिस्सा है। इसका उद्देश्य किसान महिलाओं को सतत आजीविका उपलब्ध कराना और उन्हें सामाजिक विकास का एक सक्रिय भागीदार बनाना है। इसमें


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को लक्ष्य बनाया गया है ताकि उनका और उनके परिवार का आर्थिक उद्धार हो सके। महिलाओं को कृषि संबंधी तकनीकों का प्रशिक्षण देकर तकनीकी रूप से सक्षम बनाया जा रहा है और सरकार की वित्तीय तथा बैंकिंग प्रणाली से भी जोड़ा जा रहा है। इसके सकारात्मक नतीजे पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय अपेक्षाकृत अधिक व्यापक और समग्र रूप से कृषक महिलाओं के कल्याण, विकास, सामाजिक-आर्थिक उद्धार और तकनीकी शक्तिकरण के लिये तत्परता से कार्य कर रहा है। देश में ‘जेंडर नॉलेज सिस्टम पोर्टल’ का विकास किया गया है, जो कृषक महिलाओं से संबंधित उपयोगी सूचनाओं की एकल खिड़की की तरह काम करता है। यहां महिलाओं के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकियों, सूचनाओं, प्रकाशनों और योजनाओं की जानकारी दी गई है, जो कृषक महिलाओं के साथ नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों और प्रसार कार्यकर्ताओं के लिये भी उपयोगी हैं। कृषक महिलाओं की पोषण और आजीविका सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए महिलाओं को केंद्र में रखकर समेकित कृषि के मॉडल तैयार किए गए हैं, जिन्हें खेतों में आमदनी बढ़ाने वाला और उपयोगी पाया गया है। कृषक महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा मोटे अनाजों से उत्पाद तैयार करने के लिए प्रसंस्करण इकाइयां लगाई गई हैं। इस संबंध में यह जानना भी आवश्यक है कि भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए विशिष्ट स्वयं सहायता समूह गठित किए जाते हैं, जिनमें कौशल विकास, दस्तकारी, हथकरघा उद्योग जैसे अनेक आमदनी बढ़ाने वाले व्यवसायों के लिये सहायता दी जाती है। इन समूहों में कृषक महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल होकर आर्थिक प्रगति की राह पर आगे बढ़ रही हैं। खेत-खलिहानों में महिलाओं की मशक्कत कम करने के लिए अनेक कृषि उपकरणों का विकास किया गया है, जिनसे उनकी कार्य कुशलता भी बढ़ी

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है। बीजों की बुआई के लिये आसान ‘सीड ड्रिल’, उर्वरक देने के लिए अधिक कुशल ‘फर्टिलाइजर ब्रॉडकास्टर’, आराम से बैठकर मूँगफली छीलने वाला यंत्र, भुट्टे से तेजी से दाने निकालने वाला यंत्र, धान की सीधी बुवाई का यंत्र, खरपतवार निकालने वाला यंत्र और सुधरा हंसिया विशेष रूप से महिलाओं के लिये ही तैयार किए गए हैं। इस संदर्भ में संभवतः सबसे उल्लेखनीय योगदान है ‘हेड लोड मैनेजर’ नामक एक विशेष उपकरण का जो महिलाओं को अधिक कुशलता और कम मेहनत से बोझा ढोने की सुविधा देता है। दरअसल कृषक महिलाओं को खेती के काम के दौरान चारा, ईंधन, खाद, बीज, फसल, सब्जियां जैसे अनेक सामानों या बोझ को इधर-उधर ले जाना पड़ता है। महिलाएं इसे सिर पर रखकर ढोती हैं, जिससे उन्हें अक्सर सेहत संबंधी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए वैज्ञानिकों ने एक विशेष युक्ति का विकास किया, जिसे कंधों के सहारे सिर पर पहना जाता है। इससे सारा बोझ केवल सिर पर नहीं पड़ता, बल्कि कंधों पर भी बंट जाता है। उपयोग में आसानी और हल्का होने के कारण इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। इसी तरह यह भी देखा गया कि धान की बुआई, फसलों की गहाई, फलों और सब्जियों की तुड़ाई या चुनाई के दौरान महिलाओं को संक्रमण, चोट, खुजली आदि का खतरा होता है, क्योंकि वे सुरक्षात्मक कपड़े नहीं पहनतीं। इस जरूरत को देखते हुए वैज्ञानिकों ने महिलाओं के लिए विशेष कपड़े तैयार किए हैं, जो उनकी सुरक्षा करते हैं। इससे खेतिहर श्रमिक महिलाओं को विशेष रूप से राहत मिली है। डेयरी में काम करने वाली महिलाओं के लिए आरामदेह और सुविधाजनक टूल तैयार किए गए हैं, जिनके इस्तेमाल से महिलाओं को दूध दुहने में सहूलियत मिली है। महिलाओं ने पशुओं के चारे और पोषण का अच्छी तरह से प्रबंध किया और दूर-दराज के गांवों में भी पशुओं के स्वास्थ्य की अच्छी देखभाल भी की। इसी क्रम में बकरी पालन और मुर्गी पालन के

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वर्ष 2016-17 में 5.04 करोड़ ग्रामीण परिवारों को 138.64 लाख कार्य परियोजनाओं में काम दिया गया, जिसमें 56 प्रतिशत महिलाएं थीं। यह ‘मनरेगा’ में महिलाओं की हिस्सेदारी का कीर्तिमान है क्षेत्र में भी महिलाओं ने खासी कामयाबी हासिल की है। महिला उपयोगी उपकरणों/यंत्रों/तकनीकों को लोकप्रिय बनाने के लिये देश भर में फैले कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से कृषक महिलाओं को प्रशिक्षित तथा जागरूक बनाया जा रहा है। महिला प्रसार कार्यकर्ता इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं।

हर कदम, कृषक महिलाओं के संग

कृषक महिलाओं के सशक्तिकरण को वर्तमान सरकार ने गंभीरता से लिया है और माना है कि कृषि विकास की हर योजना में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इसके लिए योजनाओं में आवश्यक प्रावधान भी किए गए हैं। भारत सरकार के महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में आवंटित बजट की 30 प्रतिशत राशि कृषक महिलाओं के लिए निर्धारित की गई है। इसका लाभ कृषक महिलाओं को उन्नत कृषि प्रणालियों का प्रशिक्षण देने में भी मिल रहा है। देश के 28 राज्यों में इस मिशन को राज्य सरकारों के सहयोग से भारत सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार लागू किया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत महिलाओं को स्वयंसहायता समूहों के रूप में संगठित करके उन्हें कृषि के लिए आवश्यक सामान, तकनीकी और प्रसार सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इससे महिलाएं तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। कृषि यंत्रीकरण के उप मिशन के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषक महिलाओं के लिए विकसित मशक्कत कम करने वाली मशीनों के प्रसार का कार्य तेजी से किया जा रहा है। इसके अंतर्गत कृषक महिलाओं को प्रशिक्षण, प्रदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके

अलावा कृषक महिलाओं को विभिन्न कृषि मशीनें और उपकरण खरीदने के लिए 10 प्रतिशत की अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी दी जाती है। फार्म मशीनरी प्रशिक्षण एवं परीक्षण संस्थानों द्वारा कृषक महिलाओं के तकनीकी सशक्तिकरण के लिए विशेष कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं। बीज और रोपण सामग्री उप-मिशन के अन्तर्गत कृषक महिलाओं को बीज-गांव कार्यक्रम और गुणवत्ता नियंत्रण कार्यक्रम में भागीदारी का समान रूप से अवसर दिया जा रहा है। राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया है कि वे इसमें कृषक महिलाओं की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करें और इसके लिए पर्याप्त धन भी उपलब्ध कराएं। इसी तरह राज्य सरकारों को कृषि प्रसार कार्यक्रमों में कृषक महिलाओं और कृषि प्रसार महिला कर्मियों को शामिल करने के लिये आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत कम-से-कम 30 प्रतिशत साधनों को महिलाओं के सशक्तिकरण पर खर्च करने का निर्देश दिया गया है। कृषि संबंधी योजना बनाने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में कृषक महिलाओं की भागीदारी ब्लॉक, जिला और राज्य-स्तर पर सुनिश्चित की गई है। अब कृषक महिलाओं को कृषक सलाहकार समिति में अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है। विशिष्ट रूप से कृषक महिलाओं के लिए विकसित तकनीकों को खेत में ले जाने से पहले कृषक महिलाओं द्वारा जांचने-परखने का प्रावधान भी किया गया है।

देश भर में सशक्तिकरण की लहर

एक विशेष और अभिनव सोच के अन्तर्गत गांव की किशोरियों का कौशल द्वारा सशक्तिकरण करने


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ग्रामीण परिवार को वर्ष में कम-से-कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है। इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक तीन कामगारों में से एक महिला कामगार होगी की पहल की गई, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी होकर सामाजिक रूप से मजबूत बन सकें। इनमें उन किशोरियों को विशेष रूप से शामिल किया गया, जो स्कूल की पढ़ाई छोड़कर घरेलू या कृषि संबंधी कार्यों में हाथ बंटा रही थीं। कृषि तकनीकों में प्रशिक्षण प्राप्त करने से इनकी आजीविका सुरक्षित हुई और कृषि विकास को भी बल मिला। परियोजना के अंतर्गत कृषक महिलाओं को घरेलू-स्तर पर ‘पोषण बाग’ लगाने की जानकारी और प्रशिक्षण दिया गया, जिससे परिवार के पोषण स्तर में सुधार देखा गया। महिलाओं और किशोरियों में सूक्ष्म पोषण तत्वों की व्यापक कमी को देखते हुए स्थानीय खाद्य स्रोतों से पौष्टिक आहार बनाने की कला सिखाई गई। इसी तरह ग्रामीण महिलाओं में खून की कमी को देखते हुए स्थानीय हरी सब्जियों से पौष्टिक व्यंजन बनाने की विधियां विकसित करके महिलाओं की रसोई तक पहुंचाई गईं। परियोजना के अन्तर्गत चुने हुए गांवों में - ‘खेत संसाधन केंद्र’ खोलने की पहल की गई, जहां कृषक महिलाओं को उपयोगी साधन मुहैया कराकर उनका तकनीकी और सामाजिक सशक्तिकरण किया गया।

मनरेगा ने दी आर्थिक आजादी

सन 2006 में लागू ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में कम-से-कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है। इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक तीन कामगारों में से एक महिला कामगार होगी। परंतु शुरुआती दौर में कई वर्षों तक खेतिहर महिलाओं को उनका यह अधिकार मिलने में मुश्किलें पेश आती रहीं। लेकिन नई सरकार द्वारा दिए गए विशेष प्रोत्साहन के कारण अब महिलाओं

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की हिस्सेदारी या तो पुरुषों के बराबर है या उससे आगे निकल गई हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 में 5.04 करोड़ ग्रामीण परिवारों को 138.64 लाख कार्य परियोजनाओं में काम दिया गया, जिसमें 56 प्रतिशत महिलाएं थीं। यह ‘मनरेगा’ में महिलाओं की हिस्सेदारी का कीर्तिमान है। इससे पूर्व वर्ष 2015-16 मं0 महिलाओं की भागीदारी लगभग 51 प्रतिशत और वर्ष 2014-15 में लगभग 50 प्रतिशत दर्ज की गई थी। दूसरी ओर कृषक महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार ना बनाने की शिकायत भी है। परंतु सच्चाई यह भी है कि ‘मनरेगा’ ने खेतिहर महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाया है और उन्हें आर्थिक आजादी की ओर अग्रसर किया है। ‘मनरेगा’ से नकद आमदनी प्राप्त करने वाली बहुत-सी महिलाएं बताती हैं कि जीवन में पहली बार उनके हाथ में उनकी कमाई के पैसे आ रहे हैं, जिससे उनका मनोबल बढ़ा है। अनेक गांवों में संभवतः यह पहली बार है, जब महिलाओं को साहूकारों और जमींदारों की जगह सीधे ‘सरकार’ से काम मिल रहा है और मजदूरी भी पुरुषों के बराबर मिल रही है। कृषक महिलाओं के लिये ‘मनरेगा’ केवल रोजगार का अवसर नहीं है, इससे उनकी सामाजिकआर्थिक दशा को एक सुखद और स्वाभिमानी मोड़ दिया है। झारखंड के खूंटी जिला के पकड़टोली गांव की रोशनी गुकिया इस बदलाव का जीती-जागती उदाहरण हैं। पहले वह अपने पति और बच्चों के साथ मुम्बई में रोजी-रोटी के लिये कड़ा संघर्ष कर रहीं थीं। लेकिन सन 2014 में जब ‘मनरेगा’ में काम करने की सहूलियत हो गई तो यह पूरा परिवार गांव लौट आया। रोशनी को गांव में तालाब बनाने, खेत

को समतल करने और पानी का संचय करने के लिए खेत-बांध बनाने जैसे काम मिल गए। यह काम भी पसंद का था और भुगतान भी समय पर मिलता था। निश्चित आमदनी के कारण उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया और उनके भोजन का स्तर भी सुधरा। अब परिवार में सुख, शांति और खुशहाली है।

कृषक महिलाएं बनी मिसाल

कृषक महिला सशक्तिकरण की योजनाओं और कार्यक्रमों ने देश भर में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है और उन्हें स्वाभिमान से जीने की राह दिखाई है। अनेक महिलाएं अपने गांव-कस्बे में कामयाबी की मिसाल बन गई हैं। ऐसी ही एक महिला हैं ओड़िशा के खोदड़ा जिले के हरिदामादा गांव की पुष्पालता पतालासिंह। क्षमता विकास कार्यक्रम के अंतर्गत उन्हें मुर्गीपालन के लिए प्रशिक्षित किया गया। शुरुआत में उन्हें एक दिन के चूजे दिए गए, जिन्हें उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से पाल-पोस कर एक महीने बाद अन्य महिलाओं को बेच दिया ताकि वे स्वस्थ चूजों से मुर्गीपालन व्यवसाय की शुरुआत कर सकें। इससे इन्हें अच्छी आमदनी मिली। प्रोत्साहित होकर उन्होंने 6000 रुपए का निवेश करके 200 चूजे खरीदे और पाल-पोसकर अलग-अलग आयु में महिलाओं को बेचा। इससे इन्हें लगभग 41,000 रुपए का मुनाफा हुआ और अनुसूचित वर्ग की 25 कृषक महिलाएं मुर्गीपालन के व्यवसाय से जुड़ गईं। इस तरह अब गांव में महिलाओं के एक पूरे समूह ने मुर्गीपालन द्वारा आर्थिक प्रगति हासिल की है। तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के ईडुलापल्ली रजिया बी आज अपने खेत की मालकिन हैं और कृषि तथा पशुपालन से परिवार का सम्मानजनक भरण-पोषण कर रही हैं। कुछ वर्ष पहले तक वह मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचती थीं, जिससे होने वाली बेहद कम आमदनी ने उनके परिवार के जीवनयापन को बेहद कठिन और संघर्षमय बना दिया था। इस बीच उन्हें ग्रामीण महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का अवसर मिला, जहां उन्होंने कृषि कार्यों को सीखा।

समूह और एनजीओ की मदद से रजिया बी ने तीन एकड़ जमीन खरीदकर खेती करना शुरू कर दिया। वह मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा, तूअर की दाल और सब्जियों की वैज्ञानिक ढंग से खेती करतीं हैं और खेत का प्रबंध भी नई सोच, नए तौर-तरीकों से करती हैं। लंबे संघर्ष के बाद अब उनका जीवन खुशहाल है। तेलंगाना के बिदक्कने गांव की बोभिनी लहम्मा के जीवन में भूचाल आ गया, जब लगभग 15 साल पहले उनके पति की अचानक मृत्यु हो गई। उनके पास दो एकड़ जमीन थी, लेकिन वो बंजर पड़ी थी, उस पर अनेक वर्षों से खेती नहीं हो रही थी। इस मोड़ पर उन्हें कृषक महिलाओं के तकनीकी सशक्तिकरण के एक कार्यक्रम का सहारा मिला। उन्होंने खेती के बारे में काफी कुछ सीखा, जाना और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी हासिल किया। आज वह अपने छोटे से खेत में आंवला, आम, नींबू, चीकू जैसे अनेक फलों को वैज्ञानिक तौरतरीकों से उगाकर अपने परिवार का पालन-पोषण सिर उठाकर कर रही हैं। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ, लगन और मेहनत से एक बंजर खेत को हरा-भरा और उपजाऊ बना दिया है। लक्ष्मीबाई शेल्के की सफलता की कहानी बताती है कि कृषक महिलाएं खेती की नई तकनीकों को अपनाने में भी पीछे नहीं हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के भिदनौरा गांव में वह 10 एकड़ पर गन्ने की खेती पारंपरिक तौर-तरीकों से करती थीं, लेकिन उपज में लगातार गिरावट चिंता का गहरा सबब बन गई थी। थोड़ी-सी कोशिश की तो उन्हें गन्ने की नई खेती का पता चला और उन्होंने बुवाई, सिंचाई के नए तौर-तरीकों को अपना लिया। इससे गन्ने की उपज 35-40 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 60 टन प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई और पानी का खर्च भी घटकर आधा रह गया। जल्दी ही गांव में लक्ष्मीबाई गन्ने की खेती करने वाली अग्रणी किसान और एक मिसाल बन गईं। आज बड़ी संख्या में कृषक महिलाएं उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। (लेखक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में प्रधान संपादक (हिंदी प्रकाशन) रह चुके हैं)


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कही-अनकही

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‘प्रगति के लिए दबाव’

हली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 1909 में मनाया गया था और इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 से मनाना शुरू किया। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्यार प्रकट करते हुए इस दिन को महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। यह दिन यह भी याद दिलाता है कि कैसे महिलाओं

ने कई सामाजिक व अन्य बाधाओं को पार करते हुए मुकाम हासिल किए और लगातार कर रही हैं। आज की तारीख में हर क्षेत्र में महिलाएं आगे हैं, लेकिन अतीत में ऐसा नहीं था। जिस प्रकार की आजादी आज हम महिलाओं को प्राप्त हुए देखते हैं, वे पहले नहीं थीं। न वे पढ़ पाती हैं न नौकरी कर पाती थीं और न ही उन्हें मत देने का अधिकार था।

1909:

28 फरवरी को पहली बार अमेरिका में यह दिन सेलिब्रेट किया गया। सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने न्यूयॉर्क में 1908 में गारमेंट वर्कर्स की हड़ताल को सम्मान देने के लिए इस दिन का चयन किया ताकि इस दिन महिलाएं काम के कम घंटे और बेहतर वेतनमान के लिए अपना विरोध और मांग दर्ज करवा सकें।

1913-14:

महिला दिवस युद्ध का विरोध करने का प्रतीक बन कर उभरा। रुसी महिलाओं ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस फरवरी माह के आखिरी दिन र मनाया और पहले विश्व युद्ध का विरोध दर्ज किया। यूरोप में महिलाओं ने 8 मार्च को पीस ऐक्टिविस्ट्स को सपोर्ट करने के लिए रैलियां कीं।

1975:

यूनाइटेड नेशन्स ने 8 मार्च का दिन सेलिब्रेट करना शुरू किया। 1975 वह पहला साल था जब अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।

2011:

अमेरिका के पूर्व प्रेजिडेंट बराक ओबामा ने मार्च को महिलाओं के इतिहास का महीना कहकर पुकारा। उन्होंने यह महीना पूरी तरह से महिलाओं की मेहनत, उनके सम्मान और देश के इतिहास को महत्वपूर्ण आकार प्रकार देने के लिए उनके प्रति समर्पित किया। वैसे बता दें कि इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम है 'बी बोल्ड फॉर चेंज' यानी कि बदलाव के लिए सशक्त बनें। यह कैंपेन लोगों का आह्वान करता है कि वह बेहतर दुनिया के लिए कार्यरत हों जिसमें लिंगभेद से इतर सबको शामिल किया जाए।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम 1975 1996 1997 1998 1999 2000 2001 2002 2003 2004 2005

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी ‘भूतकाल का जश्न, भविष्य की योजना’ ‘महिला और शांति की मेज’ ‘महिला और मानव अधिकार’ ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मुक्त विश्व’ ‘शांति के लिए महिला सशक्ति’ ‘महिला और शांति: विरोध का प्रबंधन करती महिला’ ‘आज की अफगानी महिला: वास्तविकता और मौके’ ‘लैंगिक समानता और शताब्दी विकास लक्ष्य’ ‘महिला और एचआईवी/एड्स’ ‘2005 के बाद लैंगिक समानता; एक ज्यादा सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर रहा है’ 2006 ‘निर्णय निर्माण में महिला’ 2007 का अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उत्सव का थीम था ‘लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए दंडाभाव का अंत’ 2008 ‘महिलाओं और लड़कियों में निवेश’ 2009 ‘महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने के लिए महिला और पुरुष का एकजुट होना’ 2010 ‘बराबर का अधिकार, बराबर के मौके: सभी के लिए प्रगति’ 2011 ‘शिक्षा, प्रशिक्षण और विज्ञान और तकनीक तक बराबरी की पहुंच: महिलाओं के लिए अच्छे काम के लिए रास्ता’ 2012 ‘ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण, गरीबी और भुखमरी का अंत’ 2013 ‘वादा, वादा होता है: महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म करने का अंत आ गया है’ 2014 ‘वादा, वादा होता है: महिलाओं के समानता सभी के लिए प्रगति है’ 2015 ‘महिला सशक्तिकरण- सशक्तिकरण इंसानियत: इसकी तस्वीर बनाओ! (यूएन के द्वारा),महिला सशक्तिकरण पर पुनर्विचार और 2015 में लैंगिक समानता और उससे आगे (यूनेस्को के द्वारा) और तोड़ने के द्वारा (मैनचेस्टर शहर परिषद के द्वार)’ 2016 ‘इसे करना ही होगा’


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पुस्तक अंश

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चुनाव अभियान के नए युग के प्रवर्तक

2 मार्च, 2014: लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर मैदान में विजय शंखनाद रैली को संबोधित करते हुए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी।


05 - 11 मार्च 2018

रेंद्र मोदी ने भाजपा संसदीय दल और चुनाव समिति के प्रभारी का पद संभालने में थोड़ा भी समय नहीं गंवाया। संसदीय दल में 12 शीर्ष नेता शामिल थे। मोदी ने 2014 के आम चुनाव के प्रचार की रणनीति और योजना अपनी सावधानीपूर्वक चुनी गई टीम की सहायता से बनाई। भाजपा के लिए यह पहला उदाहरण था जब कोई प्रचार अभियान पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम पर था। कुछ ही समय में पूरा प्रचार अभियान भाजपा के साथ-साथ विपक्ष के लिए भी, नरेंद्र मोदी के आसपास ही सिमट गया। पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां दी गईं, लेकिन अभियान का चेहरा नरेंद्र मोदी ही रहे। पार्टी के चुनावी नारे भाजपा चुनाव समिति द्वारा दिए गए जिनमें से अधिकतर स्वयं नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए थे। संसदीय चुनावों में बहुमत हासिल करने के मामले में सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश के प्रबंधन की जिम्मेदारी गुजरात के गृह मंत्री और लंबे समय तक मोदी के विश्वासपात्र रहे, अमित शाह को सौंपी गई। शाह सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों की वजह से ही मोदी के करीबी नहीं थे, बल्कि अपनी राजनीतिक दक्षता और संगठनात्मक क्षमता के कारण भी वह मोदी के प्रिय थे। इसीलिए जब उत्तर प्रदेश में भाजपा ने एकतरफा बड़ी जीत हासिल की तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। नरेंद्र मोदी एक राष्ट्रवादी स्तर के तौर पर पेश किया, जिसके लिए देश पहले और सबसे महत्वपूर्ण था। उन्होंने देश को इस स्तर तक विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया कि दुनिया में देश की सम्मानजनक छवि बने और इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए उन्होंने खुद को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में पेश किया। उन्होंने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में अपने तीनों कार्यकाल के दौरान हासिल की गई सफलता के बारे में बताकर अपना दावा और मजबूत किया। भारत में यह पहली बार था कि जब एक प्रचार अभियान अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य तकनीकी सहायता के इस्तेमाल पर आधारित था। स्थानीय मुद्दों को सभी रैलियों में

पुस्तक अंश 27 अक्टूबर, 2013: पटना की हुंकार रैली में राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और राज्य के अन्य नेताओं के साथ नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी ने देश भर में प्रचार करते हुए करीब तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय की। उन्होंने 437 रैलियों, 5827 सार्वजनिक मीटिंग, 1350 3डी रैलियां और 4000 चाय पर

चर्चा कार्यक्रम को संबोधित किया। मोदी के प्रचार अभियान को चुनाव प्रचार के इतिहास में सबसे बड़े पैमाने पर लोगों को जुटाने की कवायद के रूप में वर्णित करना अतिशयोक्ति नहीं

30 सितंबर, 2013: मुंबई के छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी

25 होगी। अभियान का पैमाना और तेजी तब और बड़ी हो जाती है, जब कोई भारत की बड़ी आबादी और इसके भौगोलिक प्रसार को समझता हो। हर जगह जहां वह गए, मोदी ने एक ऐसा विजन पेश किया जिससे उस क्षेत्र के लोग जुड़ सकें। इस दृष्टिकोण ने लोगों को नरेंद्र मोदी से जोड़ा और उनको आश्वस्त किया कि उनके बीच एक ऐसा नेता है, जो बेहतर प्रशासन और विकास कर सकता है।


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उठाया गया। इसके साथ ही सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव पड़ा। अर्थपूर्ण नारे और रंगीन विशेषणों को लोगों का ध्यान आकर्षित करने और उनकी कल्पनाओं को उड़ान देने के लिए इस्तेमाल किया गया। रैलियों में प्रवेश के लिए पांच रूपए शुल्क जैसे नए विचारों को पेश किया गया। इन कदमों से सामूहिक उत्साह पैदा हुआ जो निरंतर चलता रहा।

अभियान के स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दे

अभियान का केंद्र विदेश नीति या वैश्विक मुद्दों पर न होकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर था। सहयोगी दलों के गठबंधन इकाई के रूप में एनडीए के लगातार बढ़ते रहने के बाद भी, भाजपा कैडर को शुरुआत में ही यह बता दिया गया था कि पार्टी का स्पष्ट उद्देश्य पूर्ण बहुमत हासिल करना है। नियमित अंतराल पर यह बात उन्हें याद

4 मई, 2014: इलाहाबाद में नरेंद्र मोदी के समर्थकों को पीछे खींचते हुए पुलिस भी दिलाई जा रही थी। अधिकतम सहयोगियों की जगह अधिकतम वोट प्राप्त करना भाजपा का नया मंत्र बन चुका था। यह विचार केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि बड़ी जीत हासिल करने के लिए था।

प्रौद्योगिकी का बेहतर उपयोग और प्रभाव ‘मोदी लहर सिर्फ यूपी में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में व्याप्त है। लेकिन यूपी में इसका असर सपा और बसपा के वर्षांें के बुरे शासन की वजह से ज्यादा है।’ अमित शाह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रभारी और अब भाजपा के अध्यक्ष

नरेंद्र मोदी ने नए युग के उपकरणों का सर्वश्रेष्ठ तरीके से बेहतरीन उपयोग किया। इसमें सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरणों जैसे -मोबाइल, एसएमएस, फोटो, ट्विटर, फेसबुक और वेबसाइट सार्वजनिक पहुंच के मामले में बेहद लुभावने और अप्रत्याशित थे। ऐसा लग रहा था कि यह चुनाव भारत में नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित किए जा रहे हैं। प्रौद्योगिकी के उपयोग ने देश के युवाओं को नरेंद्र मोदी की ओर आकर्षित किया। पहले युवाओं ने उन्हें सुना और फिर समूह में उनके लिए मतदान किया।

गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग में काफी अनुभव हासिल किया था। उन चुनावों के दौरान,उन्होंने पारंपरिक तरीकों को अलग नहीं किया। लेकिन साथ ही, उन्होंने अपने आसपास ऊर्जावान और तकनीकी-समझ वाले युवाओं की एक टीम तैयार की और उन निर्वाचन क्षेत्रों और मतदाओं तक पहुंचे जहां परंपरागत अभियान से नहीं पहुंचा जा सकता था। गुजरात में विकसित राज्य के गूढ़ चुनावी मॉडल को न केवल राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया गया, बल्कि बड़ी ऊंचाइयों पर ले जाया गया। उनके फेसबुक और ट्विटर अकाउंट्स पर लोगों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी। साथ ही गूगल प्लस हैंगआउट पर भी बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़े। 3 डी तकनीक के उपयोग ने मोदी अभियान की विशिष्ट पहचान बना दी। उन्होंने लगभग 1400 3डी रैलियों को संबोधित किया, जिसमें होलोग्राम

(त्रिविमीय फोटोग्राफ) की मदद से उनकी पहुंच लगभग 1 करोड़ 50 लाख (15 मिलियन) मतदाताओं तक हो गई। यह अभियान एक उच्च-ऊर्जा से भरा था। नरेंद्र मोदी के पास उनकी यात्रा के लिए दो हेलीकॉप्टर थे, ताकि वे एक-दूसरे की सहायता से अगले गंतव्य तक आसानी से पहुंच सकें। वह यात्रा करते हुए अगले कार्यक्रम के लिए दिए गए नोट्स को आसमान में हेलीकॉप्टर में ही पढ़ लेते थे। प्रचार अभियान के चरम पर, मोदी एक दिन में चार से पांच बड़ी रैलियों को संबोधित कर रहे थे। इसके बाद वह 3 डी इंटरैक्शन या एक निर्धारित साक्षात्कार के माध्यम से लोगों को संबोधित करते थे। गुजरात की तरह ही, उच्च-स्तरीय प्रौद्योगिकी अभियान के साथ-साथ, पारंपरिक तरीके से भी प्रचार अभियान किया जा रहा था। जिसमें बड़ी मात्रा में झंडे, पोस्टर और सूचना पत्र प्रकाशित कर वितरित किए गए। संघ से बड़े


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समर्थन के साथ भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर प्रचार किया गया। ऐसा प्रचार अभियान पहले कभी नहीं देखा गया था। ये मोदी भक्त, अभियान के गुमनाम नायक थे। “हां हम कर सकते हैं! हां हम इसे करेंगे!” भाजपा के लिए 2014 के आम चुनाव के लिए प्रचार औपचारिक रूप से 11 अगस्त, 2013 को आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में शुरू हुआ, जब नरेंद्र मोदी ने 45 मिनट के अपने भाषण में एक सार्वजनिक रैली को ओबामा की तरह संबोधित करते हुए कहा "हां हम कर सकते हैं, हां हम ऐसा करेंगे (यस वी कैन, यस वी विल डू इट)। " हैदराबाद स्थित लाल बहादुर स्टेडियम में मोदी के संबोधन ने लोगों से एक "कांग्रेस मुक्त भारत" के लिए प्रयास करने का आह्वान किया। यहां भारतीय राजनीति में पहली बार लोगों ने किसी राजनीतिक रैली के लिए पांच रुपए का प्रवेश शुल्क दिया। नरेंद्र मोदी ने भाषण के अधिकतर हिस्सों में यह समझाया कि कैसे विभिन्न मुद्दों पर यूपीए सरकार की निष्क्रियता से लोगों के साथ विश्वास में भारी कमी आई है। उन्होंने उसी साल जनवरी में पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सैनिकों की क्रूर हत्या के बारे में कहा और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बिरयानी खिलाकर स्वागत करने के संबंध में यूपीए सरकार से सवाल किए। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने लद्दाख में घुसपैठ के संबंध में कार्रवाई न करके, चीन के साथ समझौता किया है। कश्मीर में चल रही अस्थिरता और लगातार हो रही हिंसक घटनाओं को भी उठाया गया। यह कहा गया कि हिंसा की ऐसी घटना के बाद ही भाजपा

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22 अप्रैल, 2014: हैदराबाद में एक चुनावी रैली के दौरान पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथों में और मोदी के चेहरे का मुखौटा पहने हुए नरेंद्र मोदी के समर्थक नेता अरुण जेटली को उस क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा करने के लिए किश्तवाड़ में जाने की अनुमति नहीं दी गई। मोदी ने बांग्लादेश के आप्रवासियों के वोट बैंक की राजनीति में शामिल होने के लिए भी केंद्र की आलोचना की। यह पूछने

हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर आंध्र प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किशन रेड्डी, नरेंद्र मोदी की अगुवाई करते हुए।

पर कि क्या यूपीए सरकार देश के भविष्य के बारे में चिंतित है, उन्होंने कांग्रेस के 'समावेशी विकास' के मुख्य मुद्दे का मजाक उड़ाया। उन्होंने लाल कृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा को याद करते हुए कहा कि विदेशी बैंक खातों में जमा काला धन वापस लाने की जरूरत को उस समय भी प्रमुख रूप से उठाया गया था। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश ने साल 2004 से पहले ही वाजपेयी शासन के दौरान खाद्य सुरक्षा हासिल कर ली थी। साथ ही, उन्होंने याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार द्वारा कार्यान्वित किए गए संशोधित सार्वजनिक वितरण प्रणाली से सीखने के लिए यूपीए सरकार को बुलाया गया था, जिसकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सराहना की गई थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बच्चियों के लिए लाडली लक्ष्मी योजना का भी उन्होंने जिक्र किया। इसी भाषण में उन्होंने रुपए के गिरते मूल्य और विवादित तेलंगाना राज्य के मुद्दे के खराब प्रबंधन पर लोगों का ध्यान खींचा। कांग्रेस ने इस मुद्दे को जिस तरह संभाला, मोदी ने उसकी

आलोचना की। उन्होंने इस अवसर पर तेलुगु देशम पार्टी को लुभाने के लिए स्वर्गीय मुख्यमंत्री एनटी रामाराव का जिक्र किया जिन्होंने सबसे पहले गैर-कांग्रेस मोर्चा बनाने के लिए पहल की थी। नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण को यह कहते हुए खत्म किया कि सरकार का एकमात्र धर्म - भारत पहले; सरकार की सिर्फ एक निष्ठा - भारत की ओर; सिर्फ एक एक ही वचन - भारत का संविधान; एक शक्ति - लोगों की शक्ति और केवल एक भक्ति - भारत के प्रति समर्पण होनी चाहिए। उन्होंने सबका साथ, सबका विकास नारा दिया और राष्ट्रपति बराक ओबामा के स्लोगन "हां हम कर सकते हैं" की जगह "हां हम करेंगे" का उपयोग किया। उनके भाषण से भावविभोर जनसमूह द्वारा बोले गए उनके नारों से पूरा स्टेडियम गुंजायमान हो उठा। रैली ने केंद्र की उस सरकार को हराने के लिए एक माहौल बना दिया जिसे मोदी, नेहरू-गांधी परिवार की दिल्ली सल्तनत के रूप में बार-बार संदर्भित करते रहे हैं।


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एक भाषण की विशेषता: हैदराबाद रैली में नरेंद्र मोदी द्वारा यूपीए सरकार के कार्यान्वयन में हुई गलतियों पर उठाये गए सवाल गांधी-नेहरू परिवार के राजनीतिक गढ़ों में से एक अमेठी में, नरेंद्र मोदी ने क्षेत्र के निराशाजनक विकास सूचकांक पर प्रकाश डाला और इसे कांग्रेस पार्टी के तथाकथित पहले परिवार द्वारा सार्वजनिक विश्वास के साथ धोखा कहा।

29 सितंबर, 2013: दिल्ली के जापानी पार्क में नरेंद्र मोदी की विकास रैली के दौरान भाजपा समर्थक

चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए मुद्दे हरियाणा के रेवाड़ी में, नरेंद्र मोदी ने एक पूर्व सैनिकों की रैली को संबोधित करते हुए भारतीय सैनिक को श्रद्धांजलि अर्पित की। मंच पर जनरल (सेवानिवृत्त) वी के सिंह भी मौजूद थे, जो बाद में भाजपा में शामिल हुए और गाजियाबाद से बहुत बड़े जनादेश के साथ जीते। नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान से शांति के रास्ते को गले लगाकर, बमों का रास्ता छोड़ने का आग्रह किया।

पटना में हुंकार रैली के दौरान, नरेंद्र मोदी ने गरीबी से लड़ने के लिए देश को एक होकर एकजुट होने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उत्तर प्रदेश के रोहनिया में एक रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने काशी की आध्यात्मिक भूमि की सेवा के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई और वहीं से वह चुनाव लड़ें। उन्होंने बेहतर

बांग्लादेश से आप्रवासियों पर वोटबैंक की राजनीति रूपए की गिरती कीमत को रोकने की आवश्यकता

विवादित तेलंगाना राज्य के मुद्दे का खराब प्रबंधन असम में महा जागरण रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के समग्र विकास के लिए अपना दृष्टिकोण साझा किया और कांग्रेस पार्टी को केंद्र से उखाड़ फेंकने के लिए कहा।

वह उन ताकतों के खिलाफ जमकर बरसे जो जाति और पंथ की तर्ज पर राष्ट्र को विभाजित करते हैं। उन्होंने कहा, "एक गरीब हिंदू और एक गरीब मुस्लिम एक दूसरे से कभी नहीं लड़ना चाहते, वे अपनी गरीबी से लड़ना चाहते हैं।" बेंगलुरु में ऐतिहासिक भारथा गेलसी को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने भारत के विकास यात्रा में आईटी क्षेत्र के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने यूपीए सरकार की नीतियों पर सीधा हमला बोला जिसकी वजह से इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में मंदी आई।

पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सेना के सैनिकों की क्रूर हत्या के बावजूद पाकिस्तान के साथ वार्ता लद्दाख के बावजूद चीन के साथ समझौता

कश्मीर में हिंसा की लगातार घटनाओं को रोकने के लिए कोई पहल नहीं विदेशी बैंक खातों में जमा काला धन वापस लाने के लिए कोई कदम नहीं 15 सितंबर, 2013: हरियाणा के रेवाड़ी में रैली के दौरान तलवार उठाए हुए नरेंद्र मोदी

जगरांव की फतेह रैली में, नरेंद्र मोदी ने पंजाब के लोगों का देश के विकास की कहानी में योगदान का जिक्र किया। खासकर उनके कृषि और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में योगदान को बताया।

इटालियन मरीन को जमानत देते हुए जिन्होंने केरल के मछुआरों को गोली मार दी थी

वाजपेयी शासन के दौरान प्राप्त खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता

15 सितंबर, 2013: हरियाणा के रेवाड़ी में चुनावी रैली के दौरान भारी भीड़। 2014 के आम चुनावों के लिए बीजेपी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने के बाद मोदी की यह पहली रैली थी। केंद्रीय नीतियों के माध्यम से जिले के विकास का वादा किया। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में उन्होंने एक रैली को संबोधित करते हुए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की विभाजनकारी नीतियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने लोगों की जरूरतों के प्रति उदासीन बना रही है। उन्होंने तमिलनाडु में मछुआरों की दिक्कत का उदाहरण दिया। इस रैली में, उन्होंने कई राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों को संबोधित किया।

मुंबई में बड़े पैमाने पर महा गर्जना रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से भारत को वोट देने का आह्वान किया। राजधानी दिल्ली में विकास रैली को संबोधित करते हुए, नरेंद्र मोदी ने भारत के लोगों के लिए आशा की एक नई किरण दिखाई। 2022 में देश की स्वतंत्रता के 75 साल पूरे होने पर, उन्होंने एक बेहतर और अधिक जीवंत भारत को देखने के विजन की बात कही। (अगले अंक में जारी...)


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जीएलएफ ग्रीन एंबेसडर शिखर सम्मेलन

देश को नेतृत्वकर्ताओं की आवश्यकता है -डॉ. पाठक ग्लोबल लीडर फाउंडेशन ने ग्लोबल ग्रीन एंबेसडर समिट में सम्मानित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को मनोनीत किया

खास बातें

‘डॉ. पाठक को वैश्विक स्तर पर सम्मानित करने की आवश्यकता है’ ‘हमें सम्मान के साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना चाहिए’

ग्लो

उरुज फातिमा

बल लीडर्स फाउंडेशन (जीएलएफ) द्वारा नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के डिप्टी स्पीकर हॉल में "जीएलएफ ग्रीन एंबेसडर शिखर सम्मेलन और राष्ट्रीय उत्कृष्टता पुरस्कार 2017" का आयोजन किया गया। इस अवसर पर, जीएलएफ ने "व्यक्तिगत उपलब्धियों के माध्यम से राष्ट्रीय विकास" पर एक शिखर सम्मेलन का भी आयोजन किया। इस समारोह में सिक्किम के पूर्व गवर्नर माननीय बाल्मीकि प्रसाद सिंह, मुख्य अतिथि के रूप में और सुलभ इंटरनेशनल फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक, विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थे। अन्य गणमान्य व्यक्तियों में पूर्व दिल्ली नगर निगम (ईडीएमसी) की महापौर नीना भगत और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति एसपी सिंह शामिल थे। ग्लोबल लीडर फाउंडेशन ने ग्लोबल ग्रीन एंबेसडर समिट में सम्मानित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को मनोनीत किया। वहीं ग्रीन एक्टिविटीज में उत्कृष्ट कार्यों के लिए पेशेवरों/ संगठनों को प्रमाण पत्र और "राष्ट्रीय उत्कृष्टता पुरस्कार" विजेताओं को ट्रॉफी दी गई। भारतीय शिक्षा, अर्थव्यवस्था और समाज की प्रगति और विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए अंतरराष्ट्रीय पदाधिकारियों, नेताओं और अन्य प्रमुख व्यक्तित्वों को इन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 'डा. पाठक कर्म में विश्वास रखते हैं' बाल्मीकि प्रसाद बाल्मीकि प्रसाद ने डा. पाठक द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए कहा, "वह एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने न केवल स्वच्छता अभियान

'सुलभ स्वच्छालय आंदोलन’ का संचालन किया, बल्कि वह एक कर्ता भी है क्योंकि वह उन मूल्यों का खुद अभ्यास करते हैं। ऐसे लोग हैं जो सिर्फ सोचते हैं, कुछ लोग हैं जो कार्य करते हैं और फिर वे लोग आते हैं, जिनके पास एक सपना है और वे खुद को उस सपने के लिए समर्पित करने का निर्णय लेते हैं। डॉ. पाठक ने अस्पृश्य समझे जाने वाले और उस तरह के अन्य लोगों की भलाई के लिए काम किया है। सुलभ आंदोलन का विचार जो उन्होंने शुरू किया, आज विश्व स्तर पर जाना जाता है।" उन्होंने आगे कहा कि डॉ. पाठक को वैश्विक स्तर पर सम्मानित करने की जरूरत है, क्योंकि दुनिया में उनकी क्षमता वाला दूसरा व्यक्तित्व नहीं है। उन्होंने खुद को स्वच्छता और स्वच्छता आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया है।" प्रसाद ने कहा, "आशावाद जरूरी है। हमें बिना उम्मीद खोए देश और समाज के विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। विकास के लिए हर जगह जुनून दिखना चाहिए और जब तक हम शिक्षा और पर्यावरण संबंधी संस्थाओं और व्यक्तियों को बढ़ावा और सम्मान नहीं देंगे, तब तक हम सफल नहीं हो सकते।" अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सलाह दी कि हमें आदर के साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना चाहिए क्योंकि यही भारतीयता है..... भारतीयता धर्म, जाति या समुदाय नहीं है, बल्कि यह दूसरों के विचार और दृष्टिकोण को सुनना और उसे सम्मान देना है।

डा. पाठक द्वारा तकनीकी क्षेत्र में बड़ी छलांग डॉ. पाठक ने अपनी 'सुलभ आंदोलन' की यात्रा पर प्रकाश डाला और बताया कि किस तरह उन्होंने देश की दो सबसे बड़ी समस्याओं, खुले में शौच और मैला ढोने की प्रथा, का समाधान करने की कोशिश की। डॉ. पाठक ने अवसर पर कहा, “गांधी ने कहा था कि अभ्यास का एक छोटा सा हिस्सा भी उपदेश देने से बेहतर है। वहीं जॉन एफ कैनेडी ने कहा था कि यह न पूछें कि आपका देश आपके लिए क्या कर सकता है, बल्कि यह सोचो कि आप अपने देश के लिए क्या कर सकते हैं। 1968 में ग्रामीण इलाकों में किसी भी घर में शौचालय नहीं था, हर किसी को शौच के लिए बाहर जाना पड़ता था और इससे महिलाओं को सबसे ज्यादा कष्ट होता था। शहरी इलाकों में, 85 प्रतिशत घरों में बाल्टी (बकेट) शौचालय थे, जिन्हें अछूत समझे जाने वाले लोग साफ किया करते थे।” पौराणिक काल में यह सुझाव दिया जाता था कि लोगों की रहने की जगह के आस-पास शौच के लिए नहीं जाना चाहिए। इसीलिए लोग घरों से दूर शौचालय के लिए जाते थे और एक गड्ढा खोदते थे, घास रखते थे, शौच के बाद घास रखकर उसे ढंक देते थे। भारतीय लोग शौचालय के लिए बाहर जाते थे, लेकिन गड्ढा खोदना भूल गए। यह पद्धति उस पूरी अवधि में दूसरी प्रणाली के विकसित होने के बाद भी जारी रही। 1870 में कलकत्ता में अंग्रेजों ने सीवेज प्रणाली का इस्तेमाल किया लेकिन यह तकनीक बहुत महंगी थी और इसमें रखरखाव की आवश्यकता होती थी। परिणामस्वरुप, आज 7965 शहरों कस्बों में से केवल 732 शहरों में सीवेज सिस्टम है, वह भी आंशिक रूप से। उन शहरों में मानव कचरे का निस्तारण सिर्फ 32 प्रतिशत है। वहीं भारत की राजधानी में मानव कचरे का निस्तारण सिर्फ 69

डॉ. पाठक ने अस्पृश्य समझे जाने वाले और उस तरह के अन्य लोगों की भलाई के लिए काम किया है। सुलभ आंदोलन का विचार जो उन्होंने शुरू किया, आज विश्व स्तर पर जाना जाता है

टू पिट तकनीक की वजह से मैला ढोने की प्रथा समाप्त हुई फीसदी ही है और बाकी बचा कचरा गंगा में फेंक दिया जाता है। "इसीलिए जब मैंने यह सब देखा, पढ़ाई की, अनुसंधान किया और फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इस तकनीक के साथ भारत को ये दो बड़ी समस्याएं हल करना असंभव है। इसीलिए मैंने मानव अपशिष्ट के केंद्रीकृत निस्तारण व्यवस्था से मानव कचरे के निस्तारण की विकेंद्रीकृत व्यवस्था के तकनीकी क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगा दी। डा. पाठक ने आगे कहा, “मैंने 1969 में 'दोगड्ढे' (टू पिट) शौचालय तकनीक का आविष्कार किया था। अगर मैंने इस तकनीक का आविष्कार नहीं किया होता तो आज भी खुले में शौच और मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने की कोई संभावना नहीं थी। यह स्वदेशी, उपयुक्त और सस्ती तकनीक है। एक वैज्ञानिक को ऐसी प्रौद्योगिकी विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो उपयुक्त और सस्ती हो, ताकि वह हर व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सके।” उन्होंने बताया कि इस तकनीक के साथ, मैला ढोने की प्रथा में गिरावट आई और और अस्पृश्यों के सामने बेहतर जीवन जीने के अवसर खुले। मैंने दलितों से अपनी पसंद के किसी भी जाति के उपनाम का चुनाव करने के लिए कहा और उन्हें सम्मान के साथ जीने के लिए बोला। यदि कोई हिंदू लड़का, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध बन सकता है, तो वह खुद को अपने ही धर्म में जाति को अपने हिसाब से चुनकर क्यों नहीं जी सकता है?” यह ग्लोबल लीडर्स फोरम, नेतृत्व लाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही यह हमारे ग्रह की कुछ समस्याओं को भी हल करने की कोशिश कर रहा है। अगर हम स्थायी विकास पर ध्यान देते हैं तो इससे अधिक मदद मिलेगी। हमारे देश के समुचित विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में नेतृत्वकर्ताओं को विकसित करना बहुत जरूरी है।


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सा​िहत्य

कहानी

स्कूल की मैगजीन छप रही है, मिल गया मुझे समाचार। सोचा मैंने लिख डालूं आर्टिकल दो-चार। कविता लिखूं, कहानी लिखूं या फिर कोई लेख। इसी सोच में दिया सिर घुटनों पर टेक पूछा मम्मी विषय बताओ या फिर कोई प्रसंग जिसे पढ़े मजे से सब और न हो कोई तंग सोचा बहुतए पर लिखने की कोई चीज न जब मिली इसी सोच में बैठे-बैठे सुबह शाम में बदली इन्हीं विचार में खोकर एक तुक्का मार डाला टूटे-फूटे शब्दों में इस कविता को लिख डाला।

कविता

अब्दुल कलाम

ईश्वर का साथ

कविता

क्या लिखूं

05 - 11 मार्च 2018

क व्यक्ति था। वह किसी काम से अपने गांव से शहर की ओर जा रहा था। गांव से शहर के रास्ते में एक जंगल पड़ता था। जब वह उस जंगल में से गुजर रहा था तो उसे प्यास लगी और वह पास ही बहने वाली नदी की तरफ गया। उसने पानी पिया और पानी पीने के बाद वापस लौटने लगा तो उसने देखा नदी के किनारे एक गीदड़ बैठा थाए जो शायद चल-फिर सकने के काबिल नहीं था। यह देखकर उसे बड़ा अचरज हुआ कि यह चल नहीं सकता तो फिर यह जीवित कैसे हैए तभी अचानक उसे एक शेर की जोरदार दहाड़ सुनाई दी। वह व्यक्ति एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और इंतजार करने लगा। तभी वहां शेर आया जिसने एक ताजा शिकार मुंह में दबोचा हुआ था। शेर शायद अपना पेट भर चुका थाए इसीलिए उसने उस शिकार को उस गीदड़ के सामने डाल दिया और चला गया। वह व्यक्ति ये सब ध्यान से देख रहा था। उसने सोचा कि परमात्मा की लीला अपरम्पार हैए वह सबके लिए व्यवस्था करता है। तभी उसके मन में विचार आया कि जब भगवान इस लाचार गीदड़ की मदद कर सकते हैंए तो मेरी भी करेंगे। भगवान में गहरी आस्था थीए इसीलिए वह वहीं नदी के किनारे एक ऊंची चट्टान पर

कहानी

दुनिया से चले गए, दुनिया से चले गए पर दिल से नहीं जाएंगे कलाम ऐसे भारत रत्न को हर भारतीय का है सलाम आदर्श की मिसाल थे, मिसाइल मैन कलाम थे सकारात्मक सोच लेकर रखते सोच विशाल थे अपने अविष्कारों का कभी नहीं गुमान किया छोटा बड़ा अमीर और गरीब सबका बड़ा सम्मान किया सादा जीवन और मुस्कान बनती थी उनकी पहचान भारत माता के सच्चे सेवक अपने कामों से बने महान परिकल्पनाओं को साकार किया अपने देश से प्यार किया अंतिम क्षण तक कर्म किया आलस्य ना कभी स्वीकार किया।

बैठ गया और भगवान की भक्ति करने लगा। एक दिन बीताए फिर दो दिन बीतेए लेकिन कोई नहीं आया। उसकी हालत अब कमजोर होने लगीए फिर भी उसने यह हठ ठान लिया कि भगवान मेरी मदद अवश्य करेंगे। समय बीता और वह व्यक्ति मर गया। मरने के बाद सीधे भगवान के पास पहुंचा और भगवान से कहने लगाए "भगवानए मैंने अपनी आंखों से देखा था जब आपने एक लाचार गीदड़ की सहायता की थी। मैंने आपकी जीवन भर सेवा की लेकिन आपने मेरी मदद नहीं की।" तब भगवान मुस्कुराए और कहने लगेए "तुम्हें क्या लगता है जब तुम जंगल में से जा रहे थे तब अपनी मर्जी से नदी पार गए थे और ये सब कुछ देखा था। नहींए तुझे प्यास भी मैंने लगाई थी और तुझे नदी पर भी मैंने ही भेजा थाए लेकिन अफसोस इस बात का कि मैंने तुझे शेर बनने के लिए जंगल में भेजा थाए लेकिन तू गीदड़ बनकर आ गया। गीदड़ तो कमजोर था वह घायल था और तुम घायल नहीं थे फिर भी मुफ्त में पाने के लिए बैठ गए। अरे तुमने शेर की तरह किसी की मदद करने की तो नहीं सोची! शिक्षा परोपकारी ईश्वर का प्रिय होता है ईश्वर उसी का साथ देते हैं । बिना कर्म किए कुछ नही मिलता !

परम पिता परमात्मा

क आदमी की शादी हुई थी वह अपनी पत्नी को लेकर गांव से आ रहा था। एक बड़ी सी नदी को नाव से पार कर रहा था। अचानक तूफान आ गया। उसकी पत्नी डरने लगी, पर उसके पति के चेहरे पर कोई भी शिकन नहीं थी। उसकी पत्नी बोली, क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा। यह हमारी जिंदगी का आखरी क्षण हो सकता है। पति ने अपने म्यान से तलवार निकाली और पत्नी के गले पर रख दी। उसके पति ने बोला-क्या, अब तुम्हें डर लग रहा है? उसकी पत्नी बोली-नहीं। क्योंकि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो, तुम

इस तलवार से मेरा कुछ नहीं करोगे। उसके पति ने तलवार म्यान में वापिस रख ली और बोला मेरा ईश्वर मेरे साथ हैए मुझे कुछ नहीं होगा, यह तूफान भी वो लाया है। अगर मर गए तो भी अच्छाए बच गए तो भी अच्छा एक दम से ही तूफान टल जाता है और वे दोनों सुरक्षित अपने घर पहुंच जाते है। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें परमपिता परमात्मा पर हमेशा भरोसा रखना चाहिए। क्योंकि एक वो ही हैए जो हमारा जीवन बदल सकता है।


05 - 11 मार्च 2018

आओ हंसें

जीवन मंत्र

चश्मा नहीं लाठी

आंखों के डॉक्टर ने जांच करने के बाद मरीज से कहा, 'अब देखना है कि आपकी नजर कितनी कमजोर है। सामने देखिए और सबसे ऊपर की लाइन पढ़िए।' मरीज- कौन-सी लाइन? डॉक्टर- वह जो चार्ट पर है? मरीज- कौन-सा चार्ट? डॉक्टर- वो जो दीवार पर लगा है। मरीज- कौन -सी दीवार? डॉक्टर- आपको चश्मे की नहीं, लाठी की जरूरत है।

घर की सफाई

सु

डोकू -12

हमेशा उनके करीब मत रहिए जो आपको खुश रखते हैं कभी उनके करीब भी जाइए जो आपके बिना खुश नहीं रह सकते हैं

रंग भरो

सुडोकू का हल इस मेल आईडी पर भेजेंssbweekly@gmail.com या 9868807712 पर व्हॉट्सएप करें। एक लकी व‌िजेता को 500 रुपए का नगद पुरस्कार द‌िया जाएगा। सुडोकू के हल के ल‌िए सुलभ स्वच्छ भारत का अगला अंक देख।ें

घर बेहद गंदा पड़ा हुआ था। सास झाड़ू लगाने लगी। बेटे से देखा नहीं गया, तो वह बोला, ‘मां, तुम रहने दो, झाड़ू मैं लगा देता हूं।’ मां ने मौका सही जानकर ऊंची आवाज में बहू को सुनाते हुए जवाब दिया, ‘अरे, रहने दे बेटे... मैं लगा तो रही हूं।’ बहू ने लिपस्टिक लगाते हुए तपाक से कहा, ‘अरे, आप दोनों झगड़ो मत। काम बांट लो ना...। एक दिन बेटा झाड़ू लगा देगा और एक दिन मां लगा देगी।’

बाएं से दाएं

सुडोकू-11 का हल

1. बसाना (4) 2. कँटीला पौधा, कैक्टस (4) 3. जमीन (2) 4. माननीय (5) 5. बड़प्पन (3) 6. खाली होना (3) 10. अयोध्या (3) 11. पढ़ना (3) 12. पत्थर, पाषाण (3) 13. विपत्ति का समय (5) 15. मदारी, मुसलिम संत (4) 16. भिखारी (4) 17.नाचने वाला (3) 18.काव्य रचना, पद्य (3) 21. हवा (2)

वर्ग पहेली - 12

वर्ग पहेली-11 का हल

1. एक तीर्थंकर (4) 4. शराब का व्यवसाय (4) 7. सदा साथ लगा रहने वाला (5) 8. सोने चाँदी का व्यापारी (3) 9. रईसों जैसा (4) 11. वाचा, बोली (2) 13. इकट्ठा करना (3) 14. कान का संक्षिप्त, कर्ण (2) 17. बेंत का पौधा, सरकंडा (4) 19. लंबी पूँछवाला बंदर (3) 20. डार्विन का एक सिद्धांत (5) 22. एक तालवाद्य (4) 23. तीर रखने का पात्र (4)

ऊपर से नीचे

31

इंद्रधनुष

कार्टून ः धीर


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न्यूजमेकर

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

05 - 11 मार्च 2018

अनाम हीरो

अरुणा रेड्डी

करतब से रचा इतिहास

अरुणा जिमनास्टिक विश्व कप में एकल पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई है

भा

रत की जिमनास्ट अरुणा रेड्डी इतिहास रच दिया है। वह जिमनास्टिक विश्व कप में एकल पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई है। मेलबर्न में हुए विश्व कप में रेड्डी ने कांस्य पदक अपने नाम किया। महिलाओं की वॉल्ट में 22 वर्षीय अरुणा 13. 649 अंक के साथ तीसरे पायदान पर रहीं। अरुणा कराटे में पूर्व ब्लैक बैल्ट और ट्रेनर भी रह चुकी हैं। 2005 में अरुणा ने अपना पहला राष्ट्रीय पदक जीता था। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में वॉल्ट इवेंट के क्वालिफिकेशन राउंड में 14वें स्थान पर रहीं थी, वहीं एशियन गेम्स में वह नौवें स्थान पर रही। अरुणा ने धीरे धीरे अपने प्रदर्शन में सुधार किया और 2017 एशियन चैंपियनशिप में वॉल्ट में छठे स्थान पर रहीं।

अपनी कामयाबी पर अरुणा काफी खुश है। उसने कहा कि यह उनके जीवन का बेहद खास लम्हा है और इससे उनके हौसले बुलंद हुए हैं। उसने भावुक होते हुए कहा कि खसकर वे अपने पिता को धन्यवाद देना चाहती हैं। उसने कोच नंदी का भी शुक्रिया अदा किया। उसने कहा, ‘मैंने उज्बेकिस्तान में जो ट्रेनिंग की, उसका बहुत फायदा हुआ। बाहर जाकर ट्रेनिंग लेने में इसमें भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी मेरी बड़ी मदद की।’ कोच नंदी अरुणा की कामयाबी को अहम बताते हुए कहते हैं, ‘बेटा, तुम्हें हार्दिक बधाई हो। तुमने एक नई परंपरा कायम की है। तुम आगे जाकर और भी वर्ल्ड कप, कॉमनवेल्थ खेल और एशियन गेम्स में मेडल जीतो।’

अवनी चतुर्वेदी

निर्भीक हौसले की उड़ान

अवनी चतुर्वेदी अकेले लड़ाकू विमान उड़ाने वाली पहली फ्लाइंग ऑफिसर

भा

रतीय वायु सेना की फ्लाइंग ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी ने अकेले मिग-21 बाइसन लड़ाकू विमान उड़ाकर इतिहास रच दिया है। अवनी ने गुजरात के जामनगर एयरबेस से उड़ान भरकर अपना मिशन पूरा किया। अकेले लड़ाकू विमान उड़ाने वाली वह भारत की पहली महिला बन गई हैं। यह पूर्णरूप से फाइटर पायलट बनने की दिशा में पहला कदम है। एयर कमोडोर प्रशांत दीक्षित ने कहा, 'यह भारतीय वायुसेना और पूरे देश के लिए एक विशेष उपलब्धि है।' दुनिया के चुनिंदा देशों जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, इजरायल और पाकिस्तान में ही महिलाएं फाइटर पायलट बन सकी हैं। अकेले लड़ाकू विमान उड़ाने से पहले अवनी के प्रशिक्षक ने मिग-21 की जांच की और उड़ान के दौरान अनुभवी पायलट और प्रशिक्षक एयर ट्रैफिक कंट्रोल और रन-वे पर निगरानी के लिए मौजूद रहे। इससे पहले, महिला फाइटर पायलट बनने के लिए 2016 में

पहली बार तीन महिला पायलटों अवनी चतुर्वेदी, मोहना सिंह और भावना को वायु सेना में कमिशन दिया गया था। गौतरलब है कि केंद्र सरकार ने साल 2015 में महिलाओं को फाइटर पायलट में शामिल करने का फैसला किया था। अवनी मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा की रहने वाली हैं। उसके पिता एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं। उसके भाई और चाचा सहित परिवार के कई सदस्य आर्मी के जरिए देशसेवा में जुटे हैं। अवनी ने कल्पना चावला को अपनी प्रेरणा मानते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाया है। इंडियन एयरफोर्स में शामिल होने के बाद अवनी ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहा था, ‘हर कोई बचपन में आसमां की तरफ देखता है और चाहता है कि पक्षी कि तरह उड़े। अब एयरफोर्स में उन्हें मिलिट्री लाइफ के साथ उड़ने का मौका भी मिल रहा है।’

एच. महनकली

न्न- त्या अ ए लि े क ा स्वच्छत

13 साल की महनकली ने अपने घर में शौचालय बनवाने की जिद के चलते खाना-पीना छोड़ दिया

स्व च्छता जीवन

कैसे की शपथ की तरह है, इसकी नई मिसाल कर्नाटक में बेल्लारी की आठवीं कक्षा की एक छात्रा ने पेश की है। उसने अपने घर में शौचालय बनवाने की जिद के चलते खाना-पीना छोड़ तक दिया। नतीजा ग्राम पंचायत और सरकारी अधिकारियों ने दो दिन बाद ही उसके घर के सामने शौचालय बनवा दिया। मामला बेल्लारी जिले के तलूर गांव का है, जिसके बाद यह छात्रा पूरे गांव की आदर्श बन चुकी है। 13 साल की एच. महनकली ने ग्राम पंचायत के जागरुकता अभियान में शौचालय के महत्व के बारे में सुना था, तबसे उसने अपने घर में शौचालय निर्माण कराने की ठान ली। छात्रा गांव में ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ती है। उसके परिवार को 2015-16 में शौचालय देने की बात कही गई थी, लेकिन बनाया नहीं गया। फरवरी के पहले हफ्ते में जागरुकता कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद महनकली अपने घर गई और शौचालय का निर्माण होने तक खाना-पीना छोड़ने की बात कही। उसके मांपिता के काफी समझाने पर भी वह नहीं मानी और दो दिन तक अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। मामला ग्राम पंचायत कार्यालय और स्थानीय अधिकारियों तक पहुंचा। इसके सदस्यों ने लड़की को बुलाकर अनशन तोड़ने को कहा, लेकिन उसने मना कर दिया। छात्रा को मनाने में असमर्थ होने के बाद अथॉरिटी से खुद उसके घर के बाहर शौचालय का निर्माण शुरू कराया। लड़की के पिता एच. मल्लेश ने बताया, ‘शौचालय निर्माण फरवरी के दूसरे हफ्ते में पूरा हो गया। हमारे पास ढंग का घर तक नहीं है। जब मेरी बेटी ने खाना-पीना छोड़ दिया तो मुझे शर्म महसूस हो रही थी।’ उन्होंने बताया कि अब लोग मेरी बेटी के दृढ़ निश्चय की बात करते हैं तो मुझे गर्व महसूस होता है। रातोंरात वह गांव के लिए आदर्श बन गई है। पंचायत अध्यक्ष राजगोपाल रेड्डी ने कहा, 'जब मैंने महनकली की मांग के बारे में सुना तो मैंने सेक्रटरी को बुलाया और मामले पर विचार किया। हमने बिना देरी किए शौचालय निर्माण शुरू कराया।'

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 2, अंक - 12

सुलभ स्वच्छ भारत - वर्ष-2 - (अंक 12)  
सुलभ स्वच्छ भारत - वर्ष-2 - (अंक 12)  
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