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वर्ष-1 | अंक-50 | 27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

वां

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

अंक

sulabhswachhbharat.com

26 स्वच्छता के दूत

30 स्वच्छता के समूह

32 स्वच्छता के संदेश

स्वच्छता को बढ़ावा देने में सितारे भी पीछे नहीं

चार गांव को बच्चों ने खुले में शौच से मुक्त कराया

फिल्मकारों ने लघु फिल्मों के जरिए स्वच्छता का संदेश दिया

स्वच्छता के मोर्चे पर सितारे

‘वानर सेना’ की सीटी शार्ट फिल्म, बिग मैसेज

स्वच्छता के चैंपियन

भारत में स्वच्छता के ​परिदृश्य को बदलने वाले नायकों की दास्तां शौचालय, स्वच्छता और स्वास्थ्य। यह मुद्दा आजादी के पहले से अब तक सबसे जरूरी माना जाता रहा। महात्मा गांधी ने स्वच्छता को राष्ट्रीय आजादी, विकास और स्वास्थ्य से जोड़ा। उनके प्रयासों का असर भी उस दौर में दिखा, लेकिन आजादी मिलने की खुशी और उसके साथ उपजी दूसरी कई मुश्किलों और जरूरतों में देश कुछ ऐसे उलझा कि स्वच्छता का सवाल बहुत पीछे छूट गया, जिसका समाधान तभी और तत्काल किया जाना जरूरी था। लेकिन इतने बड़े और विविधवर्णी देश ने इस सवाल को भुलाया नहीं। करीब पांच दशक पहले प्रसिद्ध समाज सुधारक और गांधीवादी डॉ. विन्देश्वर पाठक को स्वच्छता के इसी सवाल ने बेचैन किया और वे निकल पड़े अकेले देश को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने की मुहिम पर। लोग साथ आते गए और स्वच्छता का कारवां बढ़ता गया। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के सामने भी स्वच्छता का सवाल उठ खड़ा हुआ क्योंकि बगैर स्वच्छता के स्वास्थ्य नहीं और जब स्वास्थ्य नहीं तो विकास का कोई फार्मूला परवान नहीं चढ़ सकता। उन्होंने इस बात को

शिद्दत से महसूस किया और महात्मा गांधी के जन्म दिवस, 2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की शुरूआत की। स्वच्छता अभियान को जन अभियान बनाए बिना इसके लक्ष्यों को पाना असंभव था। लेकिन उनके प्रयासों से स्वच्छता अभियान आजादी के बाद देश का पहला और सबसे बड़ा सकारात्मक जन अभियान बन गया। डॉ. विन्देश्वर पाठक का तो जैसे सपना ही साकार हो गया। दशकों से देश और दुनिया को स्वच्छ और स्वस्थ देखने का उनका सपना लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ चला। देश में गांधी जी और प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छता के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक स्वच्छता के चैंपियन। इस महाअभियान में पूरे देश का योगदान है। हर क्षेत्र, हर वर्ग, हर तबके के लोग अपने स्तर पर इसमें योगदान दे रहे हैं। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ का यह अंक स्वच्छता के उन्हीं प्रेरणास्रोतों, महानायकों, नायकों और दूतों को समर्पित है, जिनके सहयोग से स्वच्छता अभियान हर किसी नागरिक का अभियान बना है-


02 स्वच्छता के चैंपियन

वां

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

नरेंद्र मोदी

अंक

स्वच्छता को मिशन बनाने का साहस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहले दिन से कोशिश रही है कि स्वच्छता मिशन एक सरकारी कार्यक्रम बनकर न रह जाए। आज उनका यह मिशन राष्ट्रीय पुरुषार्थ का स्वरूप ले चुका है

प्र

एसएसबी ब्यूरो

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छता का राष्ट्रीय अभियान शुरू किया था तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि देखते-देखते यह आंदोलन स्वतंत्र भारत का अनूठा जनांदोलन बन जाएगा। आलम तो यह रहा कि शुरू में प्रधानमंत्री के इस मिशन को लोगों ने जहां एक तरफ सरकार के राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल एक प्रेरक पहल भर माना, वहीं कुछ मूल्यांकनों में इसे एक ऐसा कार्य बताया गया, जिसे भारतीय परिस्थितियों में करना खासा मुश्किल होगा। बीते दो अक्टूबर को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर इस अभियान की एक

बार फिर जब चारों तरफ चर्चा हुई और इससे जुड़ी रिपोर्ट मीडिया की सुर्खियां बनीं, तो पता चला कि राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान देश का अब तक का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन चुका है। एक ऐसा जनआंदोलन जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी स्वच्छता को लेकर देखा था। स्वच्छता को लेकर अपनी मुहिम की सफलता पर हर्ष जताते हुए पीएम ने कहा भी स्वच्छता को लेकर देश में आई जनजागृति के चलते महात्मा गांधी की 150वीं जयंती यानी 2019 तक इसे और अधिक सफलता मिलेगी। देशवासियों की मूल प्रकृति स्वच्छता को पसंद करने की है, लेकिन जब करने की बारी आती है तो प्रश्न उठ खड़ा होता है कि यह दायित्व किसका है? प्रधानमंत्री के ही शब्दों में, ‘अगर 1000 महात्मा

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह स्वच्छता के मुद्दे को उठाया है, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना हुई है, खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र ने इसे विश्व में स्वच्छता का सबसे बड़ा अभियान करार दिया है


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खास बातें गांधी जी की 150वीं जयंती यानी 2019 तक देश को स्वच्छ करने की मुहिम संयुक्त राष्ट्र ने भी राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की सराहना की है पीएम मोदी की प्रेरणा से छोटे बच्चे भी स्वच्छता के एंबेसडर बन रहे हैं गांधी आ जाएं, एक लाख मोदी मिल जाएं, सभी मुख्यमंत्री मिल जाएं, सभी सरकारें भी मिल जाएं तो भी स्वच्छता का सपना नहीं पूरा हो सकता। लेकिन अगर सवा सौ करोड़ देशवासी मिल जाएं तो स्वच्छता का सपना पूरा होकर रहेगा।’ प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह स्वच्छता के मुद्दे को उठाया है, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना हुई है, खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र ने इसे विश्व में स्वच्छता का सबसे बड़ा अभियान करार दिया है।

सबका सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहले दिन से कोशिश है कि स्वच्छता मिशन एक सरकारी कार्यक्रम भर बनकर न रह जाए। वे इस बात को आरंभ से समझते रहे हैं कि स्वच्छ भारत का संकल्प तभी पूरा होगा जब सरकार और समाज का साझा पुरुषार्थ प्रकट होगा। इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अगर समाज की शक्ति को स्वीकार करके चलें, जन-भागीदारी को साथ लेकर चलें, सरकार की भागीदारी को कम करके चलें, तो स्वच्छता का आंदोलन तमाम रुकावटों के बाद भी सफल होकर रहेगा।’ वैसे अब तक भारत स्वच्छता की दिशा में जितना आगे बढ़ चुका है, वह जहां अब तक की प्रगति को संतोषजनक मानने के लिए पर्याप्त है, वहीं अब तक की सफलता इस मिशन की सफलता का भरोसा जगाता है। इस बात को प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार करते हुए कहा है- ‘अब यह अभियान न बापू का है और न ही सरकारों का है। आज स्वच्छता अभियान देश के सामान्य मानव का अपना सपना बन चुका है। ... अब तक जो भी सिद्धि मिली है, वह सरकार की सिद्धि नहीं है। अगर सिद्धि मिली है तो यह स्वच्छाग्रही देशवासियों की सिद्धि है। उन्होंने कहा कि बापू के स्वराज का शस्त्र था सत्याग्रह। श्रेष्ठ भारत का शस्त्र है स्वच्छाग्रह। स्वराज के केंद्र में सत्याग्रही थे और स्वच्छाग्रह के केंद्र में स्वच्छाग्रही हैं।’

मिशन ने बदली सोच

स्वच्छता की रैंकिंग के चलते नेताओं एवं अफसरों पर समाज का सकारात्मक दबाव पड़ रहा है। आज घर-घर के छोटे बच्चे स्वच्छता के सबसे बड़े एंबेसडर बन गए हैं। वह घर में ही गंदगी देखने पर बड़ों को टोकने लगे हैं, जिससे लोगों के स्वभाव में परिवर्तन आने लगा है। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, ‘स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच में बड़ा बदलाव आया है। पहले स्कूलों में बच्चों से सफाई का काम देखकर

'अगर समाज की शक्ति को स्वीकार करके चलें, जन-भागीदारी को साथ लेकर चलें, सरकार की भागीदारी को कम करके चलें, तो स्वच्छता का आंदोलन तमाम रुकावटों के बाद भी सफल होकर रहेगा'- नरेंद्र मोदी लोग भड़क जाते थे। लेकिन आज बच्चे स्कूल में स्वच्छता से जुड़ते हैं तो टीवी की बड़ी खबर बन जाती है।’ उन्होंने स्वच्छता के प्रति जागरूता बढ़ाने के लिए मीडिया की भी जमकर सराहना की।

संतोषजनक आंकड़े

सरकारी आंकड़ो के अनुसार 85 प्रतिशत से अधिक लोग अब शौचालयों का उपयोग कर रहे हैं। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परमेश्वरम अय्यर के मुताबिक भारत सरकार स्वच्छ भारत अभियान को लेकर बेहद गंभीर है। सरकार किसी भी कीमत पर इस में सफलता हासिल करना चाहती है। सरकार के सभी मंत्रालयों को यह आदेश दिया गया है कि वह हर महीने में एक बार कार्यालय में सफाई अभियान के तहत साफ-सफाई करें। सरकार 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त करना चाहती है। थर्ड पार्टी सर्वेक्षण के हवाले से उन्होंने दावा किया कि 91 प्रतिशत लोग शौचालय का उपयोग कर रहे हैं। पानी की कमी को मानते हुए उन्होंने ओडीएफ गांव को पानी मुहैया कराने में प्राथमिकता देने की बात कही है।

‘स्वच्छ सभ्य स्थान’

प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर स्वच्छता कार्य योजना के अंतर्गत 76 मंत्रियों को 12000 करोड़ रूपए दिए गए हैं। 100 प्रसिद्ध स्थानों को साफ करने के लिए ‘स्वच्छ सभ्य स्थान’ का नाम दिया गया है। इसमें 20 स्थान ऐसे हैं, जिनकी दूरी बहुत अधिक है। नमामी गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा किनारे के 4500 गांवों को ओडीएफ किया जाना है। स्वच्छता पखवाड़े में सभी मंत्री और उनके विभाग स्वच्छता से जुड़े विभिन्न क्रिया-कलापों से जुड़े। जिला स्वच्छ भारत प्रेरक के रूप में 600 युवा पेशेवर निजी क्षेत्र के फंड की सहायता से जिले का विकास करेंगे। इस परियोजना को लागू करने के लिए स्वच्छ भारत कोष से 660 करोड़ रुपए दिए गए हैं। स्वच्छ भारत मिशन में शौचालय निर्माण के कुछ

विरोधाभासी आंकड़े और खबरें भी आई हैं। खासतौर पर शौचालय निर्माण और उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) ने ग्रामीण इलाकों में एक व्यापक सर्वेक्षण के जरिए देखना चाहा कि सेवा दायरे और गुणवत्ता के लिहाज से किए गए वादे से कितना मेल खाती है। क्यूसीआई प्रमाणन (एक्रीडिटेशन) की एक राष्ट्रीय संस्था है, जिसने साफ-सफाई का मूल्यांकन अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया है। क्यूसीआई के सर्वेक्षण का नाम है, स्वच्छ सर्वेक्षण (ग्रामीण)- 2017। इसके अंतर्गत 700 जिलों के 140,000 घरों का जायजा लिया गया है। सर्वेक्षण में शामिल हर घर की जियो-टैगिंग (भौगोलिक आधार पर नाम देना) हुई ताकि सर्वेक्षण को लेकर कोई संदेह न रह जाए। सर्वेक्षण में तकरीबन छह माह लगे और सर्वेक्षण 2017 के अगस्त महीने में पूरा हुआ, जिससे कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष निकले।

इस्तेमाल में हैं टॉयलेट

स्वच्छता मिशन की आलोचना करते हुए बताया गया कि बने हुए टॉयलेट में अनाज रखा जा रहा है लेकिन सर्वे का निष्कर्ष यह है कि टॉयलेट की तादाद और इस्तेमाल में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। योजना के तीन साल बाद कहा जा सकता है कि लोगों की टॉयलेट जाने की आदतों में स्पष्ट अंतर आया है, खासकर ग्रामीण भारत में। 2011 की जनगणना के मुताबिक 10 में से 5 घरों में टॉयलेट नहीं थे, यानी तकरीबन 50 फीसदी परिवारों के घर टॉयलेट विहीन थे। ग्रामीण इलाकों में 10 में से 7 घरों में टॉयलेट की सुविधा नहीं थी, जबकि शहरों में 10 में से 2 परिवारों के सदस्य खुले में टॉयलेट जाने पर मजबूर थे। किंतु सर्वेक्षण कहता है कि 10 में से 3 से भी कम घरों (26.75 फीसदी) अब टॉयलेट नहीं हैं। सबसे ज्यादा सुधार ग्रामीण इलाकों में आया है, जहां ऐसे घरों की तादाद घटकर 32.5 प्रतिशत रह गई है, जहां टॉयलेट नहीं है। जबकि, 2011 की जनगणना में ऐसे घरों की तादाद 69 प्रतिशत थी। यानी तीन वर्षों में वहां

स्वच्छता के चैंपियन

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टॉयलेट की संख्या दोगुनी बढ़ी है। शहरी इलाकों में टॉयलेट रहित घरों की संख्या 18 से घटकर 14.5 फीसदी रह गई है। जहां तक इस्तेमाल की बात है तो टॉयलेट सुविधा वाले 10 में से 9 घरों (91.29 प्रतिशत) में इसका इस्तेमाल हो रहा है। यही शहरी इलाकों में हुआ। स्वच्छ सर्वेक्षण 2016 में 73 शहरों को शामिल किया गया था। इसमें से 54 शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) के मामले में अपने अर्जित अंकों में इजाफा किया है। कोई कह सकता है कि खुले में टॉयलेट से मुक्त घोषित शहर में अब भी यह जारी है, लेकिन ऐसे मामले इक्का-दुक्का ही मिलेंगे। भले शत-प्रतिशत कामयाबी नहीं मिली है, लेकिन स्वच्छ भारत मिशन के विशाल आकार को देखते हुए क्या 90 प्रतिशत से ज्यादा का आंकड़ा उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है? मिशन के कारण शहरों और जिलों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हुई है। स्व-सहायता समूह, स्वयंसेवी संस्थाएं और इलाके के जाने-माने लोगों ने योगदान दिया है और नतीजे साफ दिखाई दे रहे हैं।

कारगर फार्मूला

बेशक, मिशन को सरकार का सहारा है, लेकिन यह सामाजिक परियोजना है और हम सब इसके भागीदार और संचालक हैं। इस योजना का एक पक्ष अगर स्थानीय निकायों को धन तथा संसाधन मुहैया कराना है तो दूसरा पक्ष जाति, लिंग और गरीबी का है, जो उतना ही महत्वपूर्ण है। योजना का मापन, उसके दर्जे का निर्धारण और साथ ही खुले में टॉयलेट के चलन पर अंगुली उठाना तथा ऐसा करने वालों को शर्मिंदा करना- ये तीन काम स्वच्छ भारत मिशन से जुड़े हैं, जो कारगर साबित हुए हैं। हमें इस फार्मूले का इस्तेमाल कामकाज के अन्य क्षेत्रों में भी करना चाहिए। रेलवे एंड पोर्ट (बंदरगाह) अथॉरिटी ने इससे मिलती-जुलती परियोजना पर काम शुरू कर दिया है।

बीमारियों पर रोक

ढांचागत सुविधाओं के साथ व्यवहार में आए बदलाव का भी आकलन जरूरी है। सफाई की समस्या को सिर्फ कंक्रीट के ढांचे खड़े करके दूर नहीं किया जा सकता। अगर इसे लेकर जन आंदोलन चले, साथ ही गति देने के लिए जमीनी तैयारी हो और किए गए काम के असर का आकलन किया जाए तो नतीजे ज्यादा तेजी से आएंगे। लेकिन, बड़ी सच्चाई यह भी है कि सैकड़ों भारतीय आज भी ऐसी बीमारियों के कारण जान गंवाते हैं, जिनसे आसानी से बचा जा सकता है। मानसून के बाद एन्सिफेलाइटिस और डायरिया फैलने की एक बड़ी वजह है भूमिगत पानी में मल आ जाना। डायरिया के कारण माताओं का वजन सामान्य से कम होता है। फिर ऐसी महिलाओं की संतान मानक से कम वजन और लंबाई की होती है। ऐसे बच्चे जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं। यह अंतहीन दुष्चक्र है। समाधान ज्यादा महंगा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट का उठ खड़ा होना कहीं ज्यादा महंगा साबित होता है। ठीक इसी कारण से स्वच्छ भारत मिशन जोर-शोर से जारी रहना चाहिए तथा प्रभावों के आकलन से जुड़े अध्ययन और उनसे हासिल सीख के सहारे इसे ज्यादा से ज्यादा कारगर बनाया जाना चाहिए।


04 स्वच्छता के चैंपियन

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डॉ. विन्देश्वर पाठक

स्वच्छता के चैंपियन

डॉ. विन्देश्वर पाठक ने दुनिया को स्वच्छता का नया समाजशास्त्र सिखाया है, जिसमें साफ-सफाई के सबक तो हैं ही, मानवीय प्रेम और करुणा को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है

खास बातें

डॉ. पाठक ने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की

एसएसबी ब्यूरो

ब्बे के दशक में भारत को 21वीं सदी में जाने की बात खूब होती थी। ये बातें जहां संसद के बाहर-भीतर राजनीतिक लाइन के साथ कही जाती थी, वहीं आर्थिक-सामाजिक स्तर पर भी भावी भारत से जुड़े सरोकारों और चुनौतियों को लेकर विमर्श चलता था। पर किसी ने कभी सोचा भी होगा कि 21वीं सदी के दूसरे दशक तक पहुंचकर स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन जाएगा। इस बदलाव के पीछे बड़ा संघर्ष है। आज देश में स्वच्छता को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक। दुनिया आज डॉ. पाठक को ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में जानती है। उन्होंने एक

तरफ जहां सिर पर मैला ढोने की मैली प्रथा को खत्म करने बीड़ा उठाया, वहीं देशभर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से उन्होंने आम लोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया। बड़ी बात यह है कि डॉ. पाठक द्वारा शुरू किया गया स्वच्छता का सुलभ अभियान अब भी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने के बाद डॉ. पाठक के मार्गदर्शन में सुलभ का स्वच्छता अभियान नई प्रेरणा और गति के साथ आगे बढ़ रहा है। शौचालय और स्वच्छता को पांच दशक से अपनी समझ और विचार की धुरी बनाकर चल रहे डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक तरह से दुनिया को स्वच्छता का नया समाजशास्त्र सिखाया है, जिसमें साफ-सफाई के सबक तो हैं ही, मानवीय प्रेम और करुणा को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है।

स्वच्छता के क्षेत्र में सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के अतुलनीय योगदान को देखते हुए कभी महात्मा गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने कहा था, ‘मैं महात्मा गांधी के पुत्र का पुत्र हूं, पर डॉ. विन्देश्वर पाठक गांधी जी के मानस पुत्र हैं’

आज पूरी दुनिया में डॉ. पाठक की ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में ख्याति है शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए सुलभ का दुनिया में नाम

सिर पर मैला ढोने की प्रथा

बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते गांधी विचार और कार्यक्रमों के करीब आए डॉ. पाठक ने तब से न सिर्फ पूरे देश में, बल्कि अखिल विश्व में स्वच्छता का अलख जगा रहे हैं। सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर सुलभ ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। सिर से मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने की सोच की ही देन है सुलभ द्वारा विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। आज यह तकनीक पूरी दुनिया में ‘सुलभ शौचालय’ के रूप में जानी जाती है। इस तकनीक में पहले गड्ढे में जमा शौच खाद में बदल जाता है। सुलभ ने शौचालय के जरिए गैस बनाने और उसे बिजली तक बनाने के कामयाब प्रयोग किए हैं। 1970 में सुलभ


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गांधी की राह पर...

मैंने टू-​िपट तकनीक से टॉयलेट बनाने की पद्धति विकसित की, जो की सुलभ की दुनिया को देन है। केंद्र सरकार ने भी हमारी तकनीक को 2008 में मान्यता दे दी

मैं

डॉ. विन्देश्वर पाठक

1968 में गांधी जी की जन्मशती मनाने के लिए बनाई गई एक कमेटी में शामिल हुआ। इसके तहत कई स्थानों पर जाने का मौका मिला और समाज में व्याप्त छूआ-छूत को भी करीब से देखा। इसी दौरान बिहार के मोतिहारी जिले के एक अछूत कॉलोनी में जाने का अवसर मिला। वहां घटी एक घटना ने मेरा जीवन बदल कर रख दिया। एक बच्चे को एक सांड ने मारकर बुरी तरह घायल कर दिया था, लेकिन किसी ने भी उसे नहीं उठाया, क्योंकि वो अछूत था। मुझे बड़ी तकलीफ हुई। मैंने उस लड़के को उठाया और लाकर अस्पताल में भर्ती करवाया, लेकिन वो बच नहीं सका। इसके बाद मैंने गांधी का नाम लेकर कसम खाई कि जब तक मैला ढोने की प्रथा को समाप्त नहीं करुंगा, इन अछूतों का उद्धार नहीं होगा तब तक मैं तब तक शांत नहीं बैठूंगा। बस वहीं से उस आइडिया की शुरुआत हुई जो आगे चलकर सुलभ इंटरनेशनल नामक संस्था के रुप में सामने आया। शौचालय क्रांति की दिशा में इस देश में अब तक महात्मा गांधी और मैंने ही काम किया है। इसके बाद मोदी जी पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतनी संजीदगी से इस मुद्दे को उठाया है। ऐसा नहीं कि बाकी लोगों ने इस मुद्दे को नहीं उठाया। लेकिन बड़े पैमाने पर हम ही लोगों ने इस मुद्दे को उठाया है। गांधी जी तो इस मसले को इतना अधिक महत्व देते थे कि उन्होंने कहा कि हमें आजादी से पहले इंटरनेशनल की स्थापना हुई और आज शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए इसकी दुनियाभर में पहचान है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक भी मानते हैं कि गांधी जी के बाद अगर इस देश में स्वच्छता के महत्व को किसी ने गहराई से समझा है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

राज्यसभा में सरकार का जवाब

हाथ से मैला ढोना (मैन्युअल स्कैवेंजिंग) भारत में प्रतिबंधित काम है। इसी साल मार्च में राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार में मंत्री थावरचंद गहलोत ने बताया था कि देश में 26 लाख ऐसे शौचालय हैं जहां पानी नहीं है। जाहिर है वहां हाथ से मैला ढोना पड़ता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने अपने सर्वे में बताया है कि 1993 से अब तक 1,370 सीवर वर्कर्स की मौत हो चुकी है। इस दिशा में स्कैवेंजर्स के पुनर्वास का सबसे बड़ा अभियान सुलभ संस्था ने ही छेड़ा है। डॉ. पाठक को इस बात का श्रेय जाता है कि जिस मैली प्रथा को लेकर कभी

देश की सफाई चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश इस तरफ बाद में किसी ने संजीदगी से ध्यान नहीं दिया। देश में अंग्रेजों के आने के पहले आमतौर पर खुले में ही शौच की परंपरा थी, वह आज भी है। लेकिन अगर शौच का इंतजाम था भी तो वह इंसानों के जरिए सफाई वाली व्यवस्था पर था। गांधी जी ने सबसे पहले उनकी मुक्ति की दिशा में काम किया गांधी जी ने अपने डरबन के आश्रम में सबसे पहले फैंस लैट्रिन यानी चारदीवारी के भीतर शौच का इंतजाम शुरू किया। उनकी व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपना शौचालय साफ करना होता था। आज भी पुराने गांधीवादियों में आप यह चलन देख सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उनका सुझाव था कि झाड़ी में जाइए और शौच कीजिए। शौच के बाद उस पर मिट्टी डालिए। दरअसल, शौचालय की सफाई के जरिए वे मैला साफ करनेवाले लोगों को समाज में बेहतर स्थान दिलाना चाहते थे। हमारे यहां परंपरा रही है कि घर के नजदीक शौच न करें। गांधी जी ने उसमें बदलाव का इंतजाम किया और चारदीवारी के भीतर शौच व्यवस्था की शुरूआत की। उनकी कोशिश इन लोगों को शौच सफाई के घिनौने काम से मुक्ति दिलानी थी। वे शौचालय को

सामाजिक बदलाव के औजार के तौर पर देखते थे। गांधी शताब्दी के दौरान 1969 में मुझे लगा कि इस दिशा में काम किया जाना चाहिए। इसीलिए मैंने सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की और इसकी तरफ काम शुरू किया। जो मौजूदा शौचालय व्यवस्था है, उसमें पानी की खपत ज्यादा होती है। इसके लिए हम चाहेंगे कि हमारी तकनीक से विकसित शौचालय व्यवस्था का प्रयोग बढ़े। हमने जो शौचालय डिजाइन किया है, उससे सिर्फ एक लीटर पानी में मल और मनुष्य दोनों की सफाई हो जाती है। करीब उतना ही पानी लगता है। जितना लोग खेत में जाते वक्त इस्तेमाल करते रहे हैं। इसीलिए मैं तो चाहूंगा कि इसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए, तभी सही मायने में स्वच्छता क्रांति आ पाएगी और पानी की कमी की समस्या से भी नहीं जूझना होगा। मैंने टू-​िपट तकनीक से टॉयलेट बनाने की पद्धति विकसित की, जो की सुलभ की दुनिया को देन है। केंद्र सरकार ने भी हमारी तकनीक को 2008 से मान्यता दी। राज्य सरकारों ने तो पहले से ही इस तकनीक को मान्यता दे दी थी। इस व्यवस्था में हाथ से मैला को साफ करने की जरुरत नहीं पड़ती। सुलभ

शौचालय क्रांति की दिशा में इस देश में अब तक महात्मा गांधी और मैंने ही काम किया है। इसके बाद मोदी जी पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतनी संजीदगी से इस मुद्दे को उठाया है महात्मा गांधी ने कहा था कि उनके सपनों के भारत में इसके लिए कोई जगह नहीं होगी, उस प्रेरणा को उन्होंने अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया। स्वच्छता के क्षेत्र में सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के अतुलनीय योगदान को देखते हुए कभी महात्मा गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने कहा था, ‘मैं महात्मा गांधी के पुत्र का पुत्र हूं, पर डॉ. विन्देश्वर पाठक गांधी जी के मानस पुत्र हैं।’ यह वाकई सही है कि जब कई लोग महज गांधी जी की जीवनशैली के अनुकरण की कोशिश करते हैं, डॉ. पाठक ने राष्ट्रपिता के विचार और दर्शन को न सिर्फ जीवन में बल्कि सरजमीं पर भी उतारा है। स्वच्छता को अपना मिशन मानव उत्थान को अपना लक्ष्य बताने वाले डॉ. पाठक कहते हैं, ‘स्वच्छता एक मिशन है। यह बिल्कुल उस तरह नहीं है जैसे पुल या सड़क का निर्माण। मैं इस मामले में खुशनसीब हूं कि अपने जीवनकाल में स्कैवेंजिंग को दूर करने और स्केवैंजर्स के जीवन को बेहतर बनाने के संकल्प को मैं पूरा कर पाया।’

राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की घोषणा की तो देश में स्वच्छता कार्यक्रम को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्राथमिकता मिली। अपने स्वच्छता कार्यक्रमों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान प्राप्त कर चुके डॉ. पाठक कहते भी हैं, ‘स्वच्छता को लेकर देश में गंभीरता की कमी रही। इसे महत्व नहीं दिया गया। इस क्षेत्र में निवेश का भी अभाव रहा, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे परिदृश्य को बदल कर रख दिया। वे ऐसे पहले राष्ट्रीय नेता रहे जिन्होंने न सिर्फ लाल किले के प्राचीर से शौचालयों की बात की, बल्कि इस बारे में विदेशी नेताओं तक से लगातार चर्चा करते रहे। उन्होंने देश को यह सोचने और मानने के लिए बाध्य किया कि अगर हम स्वच्छता के मामले में आगे नहीं बढ़े तो फिर एक विकसित राष्ट्र के रूप में हमारा उभरना मुश्किल है। लिहाजा यह समय है जब हम देश को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए एक साथ खड़े हों, ताकि सभ्य, सुसंस्कृत औऱ स्वच्छ देशों की कतार में हम भी फख्र

ने आगे चलकर पहाड़ी और मुश्किल इलाकों में भी स्थानीय संसाधनों से टू-​िपट टॉयलेट बनाने की तकनीक का इजाद किया है। 1974 में पहली बार पटना में सार्वजनिक शौचालय का निर्माण किया। पटना नगर निगम ने जमीन दी और कहा- पब्लिक से पैसा लीजिए और शौचालय चलाइए। डॉ. पाठक कहते हैं, उस समय शौचालय के लिए पैसा देने की बात कहने पर लोग मजाक उड़ाते थे। आज उसी सुलभ शौचालय के कांसेप्ट पर पूरी दुनिया में शौचालय बन रहे हैं। आज करीब 1.5 करोड़ लोग सुलभ शौचालय की सेवा ले रहे हैं। सुलभ इंटरनेशनल से मेरा लगाव इस हद तक है। मैं अपनी पत्नी, परिवार और बच्चों से भी ज्यादा प्यार सुलभ को करता हूं। मैं तो पत्नी को कह भी चुका हूं कि सुलभ सिर्फ मेरा काम या सपना नहीं है, मेरी प्रेमिका है। ठीक वैसे ही, जैसे भगवान कृष्ण की प्रेमिका राधा थी। सुलभ और स्वच्छता का साझा मेरी जिंदगी का अर्थ तो है ही, यही मेरी जिंदगी की यात्रा और उसकी सार्थकता है। हमारा मानना है कि देश में हर इलाके के पचास हजार युवाओं को सैनिटेशन और शौचालय क्रांति के लिए प्रशिक्षित करें। देशभर में करीब ढाई लाख पंचायतें हैं। हर युवा को पांच-पांच पंचायत में शौचालय बनवाने और लगवाने की ट्रेनिंग देकर हमें उतार देना चाहिए। इससे देश में पांच साल के अंदर पूरी स्वच्छता आ जाएगी और पचास हजार युवाओं को इस दिशा में रोजगार भी मिलेगा। से खड़े हो सकें।’ प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से डॉ. पाठक द्वारा पहले से किए जा रहे प्रयासों को जहां नए सिरे से महत्व मिला, वहीं वे इस बात से खासे प्रोत्साहित और प्रेरित भी हुए कि देश का प्रधानमंत्री इतने वर्षों के बाद गांधी जी के स्वच्छता कार्यक्रमों को न सिर्फ अपना रहा है, बल्कि उसे देश में एक जनांदोलन की शक्ल देने में लगा है। बात स्वच्छता की करें तो इसमें कहीं कोई दो मत नहीं कि इस काम को जिस लगन और विस्तार के साथ डॉ. पाठक ने अब तक किया है, वैसा उदाहरण भारत तो क्या दुनिया में दुलर्भ है। यही कारण है कि सुलभ प्रणेता देश-विदेश में अब तक 90 से ज्यादा विशिष्ट सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। इनमें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण (1991), इंटरनेशनल सैंट फ्रांसिस प्राइज, इटली (1992), यूएन हैबिटेट द्वारा ग्लोबल 500 स्क्रॉल ऑफ ऑनर (2003), स्टॉकहोम वाटर प्राइज (2009) और चीन में संपन्न वर्ल्ड टॉयलेट समिट में वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन द्वारा हॉल ऑफ फेम अवार्ड (2008) शामिल है।


06 स्वच्छता का गांव

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

फैला स्वच्छता का सुलभ प्रकाश विश्व शौचालय दिवस के अवसर पर हरियाणा के ट्रंप विलेज में दुनिया के सबसे बड़े शौचालय पॉट के मॉडल का अनावरण किया गया

अयोध्या प्रसाद सिंह

शौ

चालय ईंट गारे और लोगों की सहायता से तो बनाए जा सकते हैं, परंतु उन्हें स्वच्छ रखने का उत्तरदायित्व हम सभी का है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन बातों को चरितार्थ करते हुए सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए विश्व शौचालय दिवस के मौके पर हरियाणा के मेवात जिले के ट्रंप विलेज में दुनिया के सबसे बड़े शौचालय पॉट के मॉडल का अनावरण किया। इसके साथ ही शंख ध्वनि के बीच उन्होंने 6 नए शौचालयों और गांव के स्कूल के प्रांगण में नवनिर्मित वीवीआईपी शौचालय का भी अनावरण किया। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने कहा कि इस पॉट के मॉडल का अनावरण इस गांव में करने की वजह यह है कि यहां के लोग शौचालय के इस्तेमाल के प्रति जागरूक हों। सुलभ के अनुसार भारतीय शैली का यह शौचालय पॉट लोहे, फाइबर, लकड़ी व प्लास्टर ऑफ पेरिस का बना हुआ है। इसकी लंबाई 20 फुट व चौड़ाई 10 फुट है। दिल्ली से 150 किलोमीटर दूर स्थित 'ट्रंप गांव' के नाम से प्रसिद्ध मरोरा गांव है। स्वच्छता को एक आंदोलन का रूप देने वाले सुलभ ने मरोरा को वैश्विक पहचान देने और स्वच्छता का अलख जगाने के लिए इस गांव का नाम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नाम पर ‘ट्रंप विलेज’ रखा है। अब तक इस गांव के निवासियों केलिए सुलभ के द्वारा 95 घरेलू शौचालयों का निर्माण कराया जा चुका है। गांव की महिलाओं और लड़कियों को स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाने के लिए एक सिलाई केंद्र की स्थापना भी की गई है। इस केंद्र में 7 सिलाई मशीने हैं और करीब 15 लड़कियां अभी प्रशिक्षण ले रही रही हैं। गांव की कुछ बच्चों को रात में बिजली न आने की वजह से पढ़ने में दिक्कत होती थी। इस समस्या का समाधान करने केलिए सुलभ के द्वारा 165 परिवारों के बीच सोलर लैंप का वितरण किया गया है। इस अवसर पर गांव की लड़कियों ने मेहमानों के लिए स्वागत गीत, ‘आप आए तो ऐसा लगा की चलके बहार आ गई है...’ की प्रस्तुति की। सुलभ स्कूल, दिल्ली के बच्चों ने इस अवसर पर नृत्य और नाटक सहित कई सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। गार्गी कॉलेज, दिल्ली की क्षितिज स्ट्रीट प्ले सोसाइटी की छात्राओं ने स्वच्छता के प्रति जागरुकता फैलाने

वां

अंक

खास बातें

ट्रंप विलेज में सुलभ ने अब तक बनवाए 95 घरेलू शौचालय गांव के 165 परिवारों के बीच सोलर लैंप का वितरण महिलाओं को प्रशिक्षित करने लिए एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना

के लिए एक नाटक भी पेश किया।

सफलता की कहानियां कहती किताबें

डॉ. पाठक और मुख्य अथितियों ने इस मौके पर 'सुलभ मैजिक टॉयलेट' और 'डोनाल्ड ट्रंप विलेज' दो किताबों का भी लोकार्पण किया।'सुलभ मैजिक टॉयलेट' में जहां सुलभ शौचालयों की रोचक कहानी और उनकी यात्रा की चर्चा है तो वहीं 'डोनाल्ड ट्रंप विलेज' किताब में ट्रंप गांव के उन 95 परिवारों की कहानी है, जिनके यहां सुलभ ने शौचालय बनवाए हैं। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक ने बताया कि गांव

के एक सदस्य का कहना है कि उनका शौचालय ताजमहल जैसा सुंदर है। वहीं एक अन्य ग्रामीण ने बताया कि इतनी सुविधा उन्हें पहले कभी नहीं मिली थी। उन्होंने शौचालय के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि गांव की ही दो महिलाओं के मायके के लोगों ने कहा है कि आपके यहां शौचालय बन गए हैं। अब हमारे यहां की कुछ लड़कियों की शादी अपने गांव में करा दो।

ट्रंप विलेज की तरह हों और गांव

सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक ने इस मौके पर कहा कि

'हम इस गांव को ऐसा बनाएंगे कि सब कहेंगे ट्रंप के नाम पर और गांव भी होने चाहिए। ट्रंप गांव सिर्फ गांव नहीं तीर्थस्थल बनेगा' - डॉ. पाठक

इस बड़े पात्र की प्रतिकृति को दिल्ली के सुलभ टॉयलेट म्यूजियम में स्थानांतरित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पहली बार विश्व शौचालय दिवस गांव में मनाया जा रहा है। इससे पहले हमेशा ऐसे आयोजन शहरों तक ही सीमित थे। उन्होंने गांववासियों को भरोसा देते हुए कहा कि हम इस गांव को ऐसा बनाएंगे कि सब कहेंगे ट्रंप के नाम पर और गांव भी होने चाहिए। ट्रंप गांव सिर्फ गांव नहीं तीर्थस्थल बनेगा। उन्होंने बताया कि विश्व में 2 अरब 40 करोड़ लोगों के पास शौचालय नहीं है। इसीलिए धनी लोगों का काम है कि वे इनकी मदद कर एक खूबसूरत काम करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि गांधी के बाद सिर्फ नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने शौचालय और स्वच्छता को गले लगाया है। उन्होंने कई उदहारण देते हुए कहा कि पहले लोग शौचालय की बात करते समय खाते-पीते नहीं थे, लेकिन आज लोग विश्व शौचालय दिवस मना रहे हैं। डॉ. पाठक ने लोगों से आह्वान करते हुए कहा कि भारत में 650 के आस-पास जिले और करीब 6 लाख 35 हजार गांव हैं, इन सभी जगहों पर लोग आगे आएं और शौचालय बनवाएं, ताकि 2019 में गांधी की 150 वीं जन्मशती पर देश खुले में शौच से मुक्त घोषित हो सकें। उन्होंने कहा कि मैं 50 साल से लोगों की सेवा कर रहा हूं, मैंने सुलभ को समस्या का समाधान करने वाला बनाया है न की सवाल उठाने वाला। सुलभ ने पूरे देश में अब तक 2 करोड़ शौचालयों का निर्माण कराया है और उसकी तकनीक और डिजाईन पर आधारित 5 करोड़ 40 लाख शौचालय बनाए जा चुके हैं। साथ ही 8500 से अधिक सुलभ सार्वजनिक शौचालयों एवं स्नानघरों


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'सुलभ की टू पिट पोर फ्लश तकनीक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह तकनीक सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि सभी पूरी दुनिया में लगाई जानी चाहिए। क्योंकि यह जैविक है और बहुत आसानी से पूरे परिवार को सुरक्षा देती है' - पुनीत अहलूवालिया का निर्माण भी सुलभ ने कराया है।

मैला छोड़ यूएनओ पहुंची महिलाएं

कार्यक्रम के मुख्य अथिति और पटना, राजस्थान और जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. श्याम लाल ने डॉ. विन्देश्वर पाठक और उनके मिशन की तारीफ करते हुए कहा कि डॉ. पाठक ने शौचालय को लेकर लोगों के अंदर भरी घृणा और हीनभावना को दूर किया है। साथ ही समाज के उन अछूत लोगों को जो मैला ढोते थे, मुख्यधारा में लेकर आए हैं। पूरे राष्ट्र के सामने खुले में शौच की समस्या थी, लेकिन इसको दूर करने में सुलभ ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ही देश की बड़ी आबादी के सामने दो समस्याएं थीं- एक मल-मूत्र ढोने की समस्या और दूसरी खुले में शौच की समस्या। कई सरकारें आईं और उन्होंने काम किया, लेकिन डॉ. विन्देश्वर पाठक ने इस क्षेत्र में सबसे अधिक काम किया और बहुत हद तक इस समस्या को दूर किया है। उन्होंने कहा कि जो काम हुकूमतों को करना चाहिए वो काम डॉ. पाठक ने बहुत तेजी से किया है। उन्होंने बताया कि डॉ. पाठक ने राजस्थान के अलवर सहित अन्य कई जगहों की महिलाओं को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त कराकर जीवन-यापन के नए साधन दिए हैं। डॉ. पाठक की किताब ‘प्रिंसेसस ऑफ अलवर’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन महिलाओं की जिंदगी में ऐसा परिवर्तन सिर्फ डॉ. पाठक ही ला सकते हैं। साथ ही अलवर की ये महिलाएं संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची और अपनी बात कही। इसका पूरा श्रेय भी सुलभ को जाता है।

शौचालय सकारात्मकता का प्रतीक

इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट में विजिटिंग प्रोफेसर अमिताभ कुंडू ने इस मौके पर खुशी व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि स्वच्छता का यह सुलभ

प्रकाश देश के अन्य हिस्सों में भी जल्द पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि दुनिया में स्वच्छता के लिए काम कर रहे लोगों के लिए आज बहुत बड़ा दिन है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आज के दिन को विश्व शौचालय दिवस के रूप में मान्यता देना सामाजिक चेतना और मानवीय विकास के लिए बहुत ही अच्छा कदम है। उन्होंने अंग्रेजी के टॉयलेट और लात्रिने शब्द का मतलब प्रसाधन बताते हुए कहा कि इस शब्द को लोग खुद की सफाई, अपने चेहरे की सफाई और सुंदरता की तरह लेते थे। क्योंकि शौचालय को लेकर यूरोप सहित पूरी दुनिया में एक नकारात्मकता थी, इसीलिए ऐसे शब्द गढ़े गए जो सुनने में बुरे न लगें। लेकिन सुलभ ने समाज से ये नकारात्मकता दूर करके शौचालय शब्द को इज्जत और सकारात्मकता दी है। उन्होंने कहा कि अगर देश का प्रधानमंत्री शौचालय की ईंटों को अपने हाथों से रख रहा है तो आप इसके महत्व को समझ सकते हैं। उन्होंने स्वच्छता को लेकर बताया कि जहां भी स्वच्छता है वहां बच्चों और माओं की जान को खतरा बहुत ही कम है। साथ ही महिलाओं के सशक्तिकरण में भी सुलभ ने शौचालयों के निर्माण के साथ बहुत बड़ा योगदान दिया है। इस मौके पर अमेरिका से आए सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य पुनीत अहलूवालिया ने कहा कि इस तरह की पहल से जनता को सफाई की तरफ बड़े स्तर पर प्रेरित करने में मदद मिलेगी। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि अमेरिका में रह रहे भारतीयों से कहेंगे वे हिंदुस्तान में स्वच्छता के लिए काम करें और शौचालय बनवाएं। उन्होंने कहा भारत में जो अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं वो भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए अपना सीएसआर भारत में स्वच्छता के लिए दें, इसके लिए भी वह प्रयास करेंगे। ट्रंप विलेज को मॉडल विलेज बताते हुए उन्होंने कहा कि यह सुलभ के प्रयासों की वजह से ही संभव हो पाया है। अहलूवालिया ने कहा कि डॉ. पाठक

शौचालयों का निर्माण कराकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा कर रहे हैं। भारत और अमेरिका की दोस्ती का जिक्र करते हुए अहलूवालिया ने कहा कि गांव को ट्रंप का नाम देकर डॉ. पाठक ने जो सामाजिक और सांस्कृतिक पुल बनाया है मैं चाहता हूं कि वो ऐसे ही चलता रहे। सुलभ की टू पिट पोर फ्लश तकनीक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह तकनीक सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि सभी पूरी दुनिया में लगाई जानी चाहिए। क्योंकि यह जैविक है और बहुत आसानी से पूरे परिवार को सुरक्षा देती है। साथ ही उन्होंने बताया कि अमेरिका के पिछड़े इलाकों में भी इस तकनीक का इस्तेमाल होने जा रहा है।

शोषितों की आवाज डॉ. पाठक

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के सदस्य दिलीप के हाथिबेड ने विश्व शौचालय दिवस को पावन पर्व बताते हुए कहा आयोग की तरफ से डॉ. पाठक और सुलभ का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि डॉ. पाठक ने सरकार को भी दिखाया है कि अगर हम चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. पाठक गांधी को भी पूजते हैं और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी मानते हैं, ये वही व्यक्ति कर सकता है जो दूरदृष्टि रखता हो। डॉ. पाठक को शोषितों और वंचितों की आवाज बताते हुए कहा कि वह अपना जन्मदिन अब शौचालय दिवस के दिन ही मनाएंगे। साथ ही भरोसा दिलाया कि आयोग की तरफ से सरकार से कहेंगे कि सुलभ जैसे मिशन सरकारें भी चलाए। सुझाव देते हुए हथिबेड ने कहा कि शौचालय जैसे विषयों को पूरे हफ्ते या महीने मनाना चाहिए।

तीन स्वप्नदर्शियों की कहानी

दक्षिण अफ्रीका से आए सुलभ इंटरनेशनल सेंटर फॉर एक्शन सोशियोलॉजी के अध्यक्ष प्रगासेन राम्याह ने

कहा कि महात्मा गांधी ने सपना देखा था कि भारत को एक दिन खुले में शौच से मुक्ति मिलेगी। इस सपने को पूरा करने के लिए उनके शिष्य डॉ. पाठक ने सुलभ मैजिक टॉयलेट के रूप में एक तकनीक खोजी जिसकी मदद से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे देश को शौचालय के निर्माण के लिए प्रेरित कर रहे हैं और 2019 तक खुले में शौच से राष्ट्र को मुक्ति दिला सकते हैं। इसीलिए इन तीनों स्वप्नदर्शियों के महान सपने की वजह से देश स्वच्छता के रास्ते पर चल निकला है। उन्होंने बताया कि अभी भी भारत को खुले में शौच से मुक्ति के लिए 10 करोड़ शौचालयों की जरुरत है।

सबके जीवन में परिवर्तन और सम्मान

सुलभ के प्रयासों से इस गांव के हर शख्स के जीवन में परिवर्तन आया है, चाहे वे बच्चे हों या बड़े। पांचवी क्लास में पढने वाले अब्दुल और छाया बिना रुके अंग्रेजी बोलते हैं तो 12 वीं की छात्रा राबिया ने अग्रेजी में ही ट्रंप का परिचय दिया। साथ ही गांव की अन्य लड़कियों ने भी अपनी प्रस्तुतियां बिना डरे या शर्माए दी। मेवाती गायक नियामत ने गांव के लोगों की खुशियों को व्यक्त करते हुए डॉ. पाठक की शान में कई गीत गाए। गांव के लोगों ने भी एक बड़ी फूलों की माला डॉ. पाठक को पहनाकर उनका स्वागत किया। सुलभ ने गांव के विकास में लगातार मिल रहे लोगों के समर्थन को देखते हुए कार्यक्रम में विशिष्ट जनों को सम्मानित भी किया। इनमें हरियाणा सरकार के पूर्व गृह मंत्री चौ. हसन मोहम्मद, मेवात विकास समिति के सदस्य चौ. खुर्सीद राजा, एसएचओ अय्यूब, शिक्षाविद खलील अहमद, सरपंच शौकत अली और पूर्व सरपंच जमील अहमद, जान मोहम्मद, नुसरत और शकुंतला आदि सहित अन्य मेहमान शामिल थे।


08 स्वच्छता के चैंपियन

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

'चायवाले' ने बनवाया पब्लिक टॉयलेट

बिहार के समस्तीपुर जिले के एक चायवाले ने छह लाख खर्च कर सार्वजनिक शौचालय बनवाया

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हार के समस्तीपुर में एक चाय दुकानदार ने स्वच्छ भारत मिशन के लिए नजीर पेश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन से प्रभावित होकर इस चाय वाले ने ऐसा कारनामा कर दिया है जिसके कारण उसकी चारो ओर चर्चा हो रही है। चाय की छोटी सी दुकान चलाने वाले कृष्ण कुमार उर्फ किशन ने अपनी आमदनी से पैसे बचा कर सामुदायिक शौचालय और स्नान घर का निर्माण कराया। किशन को इस प्रयास को पूरा करने में अगर तीन साल का लंबा वक्त लगा तो लगभग 6 लाख रुपए भी खर्च हुए, लेकिन उसने स्वच्छता के प्रति अपने जुनून को कभी कम नहीं होने दिया। इलाके में उसी जगह पर शौचालय का निर्माण कराया जहां से गुजरते वक्त नाक पर रूमाल रखना लोगों की मजबूरी होती थी। किशन ने बताया कि मैं पीएम नरेंद्र मोदी से खासा प्रभावित हूं। उनसे

प्रभावित होने के दो कारण हैं, पहला कि वो समाज के लिए कुछ अच्छा के साथ-साथ इसे बदलने का भी प्रयास कर रहे हैं और दूसरा कि वो मेरी तरह ही चायवाले थे। साधारण सी चाय की दुकान चलाने वाले इस शख्स ने सार्वजनिक शौचालय में वो हर सुविधा देने का प्रयास किया है जो हर शौचालय में होना चाहिए।

पेंशन की कमाई से शौचालय की सूरत बदलवाई

छत्तीसगढ़ की बुजुर्ग आदिवासी महिला ने स्वच्छता के लिए अपनी पेंशन की रकम खर्च की

त्तीपसगढ़ में गरियाबंद जिले में एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान का संदेश फैला रही है। उसने ऐसा काम किया है कि जनपद पंचायत ने उसे सम्माननित किया। अनादि बाई नेताम नाम की यह बुजुर्ग महिला जिले के देवभोग विकासखंड के ग्राम सेनमुड़ा की रहने वाली हैं। अनादि बाई नेताम ने अपनी 6 महीने की पेंशन से पंचायत द्वारा बनाए गए शौचालय में टाइल्स लगाकर लोगों को स्वच्छता का एक नया संदेश दिया है। हालांकि ग्राम पंचायत ने स्वच्छता अभियान के तहत अनादि बाई के घर भी शौचालय बनाया है, मगर उसके बाद भी अनादि बाई ने शौचालय को और बेहतर बनाने और लोगों को इसके उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए इसमें टाइल्स लगाई है। साथ ही ग्राम पंचायत द्वारा बनाए गए सेप्टिक टैंक को तोड़कर उसकी जगह बड़ा टैंक बनवाया है। अनादि बाई ने इसके लिए अपनी 6

वां

महीने की वह पेंशन खर्च कर दी, जो उसके जीने का सहारा थी। अनादि बाई का मकसद गांव में स्वच्छता को बढ़ावा देना है। उनके इस अभियान का असर भी देखने को मिला है। उनके मोहल्ले के लगभग 100 परिवार अपने शौचालय में टाइल्स तो नहीं लगवा पाए, मगर ग्राम पंचायत द्वारा बनाए गए शौचालयों का इस्तेमाल करना जरूर शुरू कर दिया है। अनादि बाई की इस पहल के कारण गांव जल्द ही खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषि‍त हो गया। गांव की महिला सरपंच शकुंतला नायक अनादि बाई की तारीफ करती हैं।

मिसाल बनीं लखिया व इंदू

अंक

बिहार में बगहा की इन दोनों महिलाअों ने दो पंचायतों को खुले में शौच मुक्त करने में बड़ी भूमिका निभाई

भी-कभी वक्त और हालत व्यक्ति को वह पहचान दिला देते हैं जो उनके लिए अप्रत्याशित होता है। वे वास्तव में उस पहचान और सम्मान के हकदार होते भी हैं। कुछ इसी तरह का मिसाल पेश की है बिहार में बगहा जिले की दो महिलाअों लखिया और इंदू ने। अपनी इस पहल से वे न सिर्फ बिहार में, बल्कि देश में सम्मान की हकदार बन गई हैं। करीब एक वर्ष पूर्व लखिया और इंदू की अपनी कोई पहचान नहीं थी। वे पति या पुत्र के नाम से जानी जाती थीं। लेकिन समय ने करवट बदली और इन दोनों महिलाओं ने वक्त की नजाकत को समझते हुए सामाजिक बदलाव की दिशा में चल रहे प्रयास का हिस्सा बनकर खुद को साबित किया। आज ये दोनों महिलाएं पिपरासी प्रखंड में संपन्न हो चुके स्वच्छता अभियान का रोल मॉडल हैं। उन्हें इसके लिए सम्मानित भी किया जा चुका है। कुछ समय पूर्व बिहार सरकार ने पिपरासी प्रखंड को खुले में शौच से मुक्त करने का अभियान छेड़ा। इस अभियान के तहत घर-घर शौचालय बनने लगे। लेकिन कई ग्रामीण शौचालय से इत्तेफाक नहीं रखते

थे। ऐसे परिवारों को जागरूक करने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत थी जो शौचालय का महत्व उनके शब्दों में उन्हें बता सकें। फिर क्या था। लखिया और फिर इंदू दोनों अभियान का हिस्सा बन गईं। लखिया जहां पिपरासी में स्वच्छता अभियान मं जुटीं, वहीं एक अन्य पंचायत मुड़ाडीह में इंदू ने शौचालयों के निर्माण के लिए लोगों को जागरूक करना शुरू किया। उनकी पहल बेहद कारगर साबित हुई। पति की मौत के बाद परिवार के अन्य सदस्यों का पेट पाल रही इंदू ने राजमिस्त्री का काम शुरू किया था। इस बीच स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों का निर्माण शुरू हो गया। पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली इंदू की पहल रंग लाई और पंचायत में उनके प्रयास से कुल 120 शौचालयों का निर्माण हुआ। राजगीर मिस्त्री इंदू आज भी ईट-ईट जोड़कर लोगों का घर बनाती हैं। मजदूर से रोल मॉडल बनी इन महिलाओं के जज्बे को सलाम। आज पिपरासी प्रखंड खुले में शौच से मुक्त हो चुका है। प्रखंड के सभी सातों पंचायतों में घर-घर शौचालय है।

स्वच्छता की कोई उम्र नहीं

75 वर्षीय राम प्रसाद दसौंधी ने पिछले 18 वर्षों से स्वच्छता को अपना जूनून बना रखा है

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एसएसबी ब्यूरो

द्र सरकार ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत भले ही 2014 में की हो, लेकिन झारखंड में कतरास के भटमुड़ना में रहने वाले 75 वर्षीय राम प्रसाद दसौंधी पिछले 18 सालों से स्वच्छता को अपना जूनून बना रखा है। वह पहले घर की सफाई, फिर मुहल्ले तथा बाद में सड़क की सफाई करते हैं। इसके अलावा वे खुले में शौच के खिलाफ भी लगातार लोगों को जगारूक करते रहते हैं। यही उनकी दिनचर्या है। कई बार लोगों ने इन्हें हताश करने की भी कोशिश की, लेकिन इनके विचार के आगे सबको हार मानना पड़ा। आज लोग उन्हें आदर्श मानने लगे हैं। राम प्रसाद दसौंधी सुबह चार बजे सुबह उठ जाते हैं। नित्य-क्रिया के बाद अपने घर की पूरी सफाई करते हैं। इसके बाद वे मुहल्ले के सड़क से मुख्य सड़क तक आते-आते मुहल्ले के सड़क तथा शिवमंदिर प्रांगण की सफाई भी करते हैं। अंत में वह भटमूड़ना मोड़ की सड़क के किनारे-किनारे झाड़ू लगाते हैं। इसके अलावा अपने इलाके में चल रहे स्वच्छता अभियान में भी वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। उनकी प्रेरणा से कई परिवारों ने शौचालय बनवाए हैं। दसौंधी बस की एजेंटी का काम करते हैं। गुजरने

वाली बसों में सवारी बैठाना उनका मुख्य पेशा है। वे स्नातक हैं। उनकी नौकरी पहले बीसीसीएल में लगी थी, लेकिन उन्होने नौकरी नहीं की। उनका कहना है कि साफ-सफाई रहने से बीमारी नहीं होती। इस तरह का काम करने के कारण ही वह स्वस्थ हैं। वे बताते हैं कि कभी-कभी रिश्तेदारों के यहां जाते हैं, लेकिन शाम तक घर वापस आ जाते हैं ताकि सुबह साफसफाई कर सकें। सरकार के स्वच्छता अभियान पर वह कहते हैं कि यदि हमारे अंदर खुद ही सफाई की भावना आ जाए, तो नतीजे ज्यादा कारगर होंगे। वर्गीकृत विज्ञापन


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

सफाई को जीविका बनाने का जज्बा 12 साल की उम्र से हर दिन एशिया के सबसे बड़े वुलर झील की सफाई करने वाले बिलाल डार को ‘स्वच्छता ही सेवा’ के तहत ब्रांड एंबेसडर बनाया गया

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मन की बात' कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कश्मीरी युवक बिलाल डार का जिक्र करके सबको चौंका दिया। दरअसल बिलाल उस कश्मीर युवक का नाम है, जिनका पूरा नाम बिलाल डार है और वो श्रीनगर के बांदीपुरा का रहने वाला है। जब वो 12-13 साल के थे, तब एक दिन उन्हें स्कूल से फीस ना देने के कारण बाहर कर दिया गया था। निर्धन परिवार के बिलाल उस वक्त एकदम परेशान हो गया था, लेकिन तभी उनके दिमाग में एक विचार आया कि क्यों ना वह वुलर झील को साफ करे, जिसके चलते उसकी कुछ कमाई होगी और वो अपने स्कूल की फीस भर पाएगा, बस यहीं से वो झील की सफाई में जुट गया। आपको जानकर हैरत होगी कि आज गंदगी के कारण वुलर झील 72 वर्ग किलोमीटर तक सिमट गई है, जो कि कभी 272 वर्ग किलोमीटर में फैली थी। आज बिलाल झील की सफाई करके ही जीविका कमाता है। उसके पिता नहीं है, उसकी पढ़ाई छूट चुकी है, लेकिन आज भी वो झील को साफ कर रहा है। इसीलिए मोदी ने उसके जज्बे को सलाम किया है और उसे स्वच्छता मिशन का श्रीनगर में ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। बिलाल ने सालाना 12 हजार किलो से ज्यादा कूड़ा कचरा साफ किया। एशिया की सबसे बड़ी वुलर झील को 18 साल का बिलाल साफ करता है। उससे वो कुछ कमाई भी कर लेता है, क्योंकि उसके पिता की बहुत छोटी आयु में कैंसर से मौत हो गई थी। एक अनुमान है कि बिलाल ने सालाना 12 हजार किलो से ज्यादा कूड़ा कचरा साफ किया है।

स्वच्छता का सफर

देश को स्वच्छ बनाने के लिए साइकिल से भारत भ्रमण पर निकले हुगली के जयदेव

देशबनाकरको विश्वस्वच्छमें

नई पहचान दिलाने के लिए गली-गली, कूचे-कूचे में साफसफाई को लेकर जागरुकता पैदा करने के मकसद से एक व्यक्ति साइकिल से भारत-भ्रमण मिशन पर निकला है। पश्चिम बंगाल के हुगली की चाम्पदानी जूट मिल में काम करने वाले 47 वर्षीय जयदेव राउत राव देश को साफ-सुथरा करने का मिशन लेकर 26 फरवरी को हुगली से रवाना हुए। तपती गर्मी में रात-दिन साइकिल का पैडल चलाते हुए अपनी यात्रा पूरी की। उनकी साइकिल में तिरंगे के साथ एक बैनर लगा रहता था, जिस पर लिखा था- ऑल इंडिया एक्सप्लोरेशन पैडल फोर स्वच्छ भारत। उनकी टी शर्ट पर भी स्वच्छ भारत मिशन लिखा था। राव ने बताया कि उनका एक ही मिशन है। वह साफ-सुथरे देश के रूप में भारत को विश्व में नयी पहचान दिलाना चाहते हैं। राव चाय की दुकान या ढाबे पर रुककर लोगों

से आग्रह करते थे कि वे अपने घर की तरह गलियों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों को भी साफ-सुथरा रखें। कूड़ा-कचरा कूड़ेदान में ही डालें, पान-गुटका थूककर गंदगी न करें तथा जहां -तहां मल-मूत्र न करें। स्वच्छता के इस सिपाही का कहना था कि यदि देश का हर नागरिक अपनी छोटी-छोटी आदतें सुधार लेगा तो हमारा देश भी पश्चिमी देशों की तरह चमचमाने लगेगा। राव ने बताया कि उनके इस अभियान का कोई प्रायोजक नहीं था। उनके मिशन से खुश होकर रास्ते में लोग उन्हें खाना खिला देते थें। रात वह धार्मिक स्थलों पर गुजार लेते थे। अगली सुबह वे फिर साइकिल से आगे की यात्रा पर निकल जाते थे। यात्रा में आने वाली कठिनाइयों पर राव ने कहा कि देश सेवा के इस महान यज्ञ में वह छोटी सी आहूति दे रहे हैं। यदि उनके इस अभियान से चंद लोग भी साफ-सफाई के लिए प्रेरित होते हैं तो वह अपना अभियान सफल मानेंगे।

स्वच्छता का सिपाही

उत्तर प्रदेश के मेरठ में जितेंद्र गुप्ता स्वच्छता के सिपाही के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने जिले में अब तक करीब डेढ़ हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है

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रत सरकार स्वच्छता मिशन को लेकर तमाम योजनाएं चला रही है। लेकिन मेरठ में सरकारी योजना से ज्यादा एक अकेले व्यक्ति ने कर दिखाया। मेरठ में इस मिशन को आगे बढ़ाने में उद्यमी जितेंद्र गुप्ता भी अपने बूते जुटे हैं। जितेंद्र पिछले दो साल में जनपद के नौ गांवों में 1500 से ज्यादा शौचालय बनवा चुके हैं। जितेंद्र केवल शौचालय ही नहीं बनवाते हैं, बल्कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरुकता लाने के प्रयास में भी जुटे हैं। साकेत निवासी जितेंद्र गुप्ता ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद स्वच्छ भारत मिशन की घोषणा की तो दिल में आया कि इस दिशा में काम किया जा सकता है। 2015 में उनके पिता स्व. शारदा प्रसाद की जन्मशताब्दी थी। ऐसे में उन्होंने अपने पिता और माता के नाम पर बनाए शारदा प्रसाद शकुंतला देवी मेमोरियल फाउंडेशन के

जरिए इस दिशा में काम करने की सोची। इस दौरान पता चला कि मवाना रोड स्थित ग्राम भूड़पुर में स्वच्छ शौचालय की आवश्यकता है। ग्राम भूड़पुर में 2015 में जितेंद्र कुमार गुप्ता ने 96 शौचालयों का निर्माण कराया। इसके बाद यह सफर लगातार जारी है। स्वच्छता अभियान मिशन में जुटे जितेंद्र गुप्ता के मन में एक टीस भी है। उनका कहना है कि सरकार चाहे कितना भी प्रयास कर ले, लेकिन जब तक जनता खुद नहीं चाहेगी, तब कि स्वच्छता मिशन पूरा नहीं हो सकता है। जितेंद्र गुप्ता कहते हैं कि उनके द्वारा अब तक करीब 1500 शौचालय बनवाए गए हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे लोगों के भी बने हैं, जो स्वयं इतना खर्च उठाकर शौचालय बना सकते थे। इसके साथ ही कई परिवार ऐसे भी सामने आये, जिनके यहां शौचालय बनने के बाद भी वह उनका प्रयोग नहीं कर रहे हैं, इससे दुख होता है।

स्वच्छता के चैंपियन

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‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’

की असली नायिका बैतूल की यह महिला ससुराल में शौचालय नहीं होने के कारण शादी के दूसरे दिन ही ससुराल छोड़कर मायके चली गई

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ल्म ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ बैतूल जिले की एक महिला पर आधारित फिल्म है। बैतूल की इस महिला ने ससुराल में शौचालय नहीं होने के कारण शादी के दूसरे दिन ही ससुराल छोड़कर मायके चली गई, बाद में शौचालय बनने के बाद वापस लौटी। प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को लेकर बनी अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ की प्रेरणास्त्रोत बनीं अनीता नर्रे ने बताया कि वह शादी के दूसरे दिन ही ससुराल छोड़कर मायके चले गई थी, इसके बाद फिर शौचालय बनने पर घर आई। दिलचस्प है कि इसके बाद उसे राष्ट्रपति और सुलभ संस्था द्वारा सम्मानित किया गया। फिल्म की रिलीज से पहले अभिनेत्री भूमि पेडनेकर और फिल्म निर्देशक नारायण सिंह बैतूल जिले के ग्राम झीटूढ़ाना पहुंचे। उन्होंने अनीता नर्रे से मुलाकात की और उनका आभार जताया। इस दौरान अनीता के घर बने शौचालय के साथ भूमि ने सेल्फी भी ली। अनीता ने अभिनेत्री भूमि को शौचालय नहीं होने पर ससुराल छोड़ने की पूरी कहानी बताई। नारायण सिंह ने फिल्म को अनीता की सच्ची घटना पर आधारित होना बताया है। सिंह ने इसके लिए अनीता को एक अनुबंध पत्र भी दिया है, जिस पर फिल्म के लिए उनकी सहमति मांगी है। भूमि ने कहा कि अनीता से मिलकर वह बेहद खुश है। अनीता के साहस का वह सम्मान करती हैं।


10 स्वच्छता के चैंपियन

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

स्वच्छता की मुंह दिखाई

नई नवेली दुल्हन को मुंह दिखाई में गहने जेवर और दूसरे उपहार तो मिलते ही हैं, लेकिन गोंडा में दुल्हन को मुंह दिखाई में शौचालय दिया गया

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च्छता सर्वे में उत्तर प्रदेश के गोंडा का नाम सबसे गंदे शहरों की सूची में भले ही दर्ज हो, लेकिन इस जिले के ग्रामीण स्वच्छता को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। गोंडा जिले के गडरियनपुरवा गांव के एक ग्रामीण ने शौचालय बनवाने के बाद अपनी बहू को बुलाया और उसे मुंह दिखाई में शौचालय का उपहार दिया। दुल्लापुर तरहर में रहने वाले बंशीलाल को शौचालय बनवाने के लिए जब सरकारी मदद नहीं मिली तो उसने खुद मजदूरी की। करीब 25 परिवार वाले इस गांव में सिर्फ यही एक घर है जिसमें शौचालय की सुविधा है। बहू सुष्मिता भी अनोखा उपहार पाकर गदगद हैं। सास-ससुर से बहू को मिला अनोखा उपहार लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है। परसपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत दुल्लापुर तरहर के गडरियनपुरवा में रहने वाले बंशीलाल दिल्ली में प्राइवेट नौकरी कर आजीविका चलाते हैं। खेती के रूप में सिर्फ तीन बीघा जमीन है। उन्होंने बीएसएसी फाइनल वर्ष की परीक्षा दे चुके अपने बेटे बलबीर की शादी तय की । बंशीलाल ने कहा कि तीन कमरा किसी तरह बनवा लिया था, लेकिन घर में शौचालय नहीं था। पत्नी उर्मिला ने एक दिन कहा कि बहू के मायके में शौचालय की सुविधा है। जबकि हमारे यहां नहीं है। पढ़ी लिखी बहू घर में लाएंगे तो वह

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खुले में शौच के लिए जाएगी। यह अच्छी बात नहीं है। यह सुनकर बंशीलाल ने कहा कि समय भी करीब है, शादी में खर्चा है। ऐसे में शौचालय कैसे बनवाया जाए। सरकारी पैसे के लिए उर्मिला ने प्रयास किया, लेकिन मदद नहीं मिली। इसके बाद भी परिवार ने अपना इरादा नहीं बदला। उधार सामग्री लाने के बाद एक राजगीर मिस्त्री रख लिया। लेबर का काम खुद बंशीलाल ने किया। बहू के आने से ठीक एक दिन पहले शौचालय बन गया। इसके बाद पानी के लिए एक छोटा हैंडपंप भी लगवाया गया। 22 मई को घर आई बहू सुष्मिता को मुंह दिखाई में तोहफा दिया गया तो वह खुशी से गदगद हो गई। सीडीओ दिव्या मित्तल ने बताया कि अपनी बहू को उपहार में शौचालय देने वाला परिवार बधाई का पात्र है।

ये दोस्ती कुछ खास है

शौचालय उपहार में देकर करवाई दोस्त की शादी

ल्मी से लेकर असल जिंदगी में दोस्ती की कई कहानियां आप सब जानते होंगे, लेकिन मध्यप्रदेश में जबलपुर के बिजौरा में रहने वाले महेश गौड़ और शेख मोहतसीन की दोस्ती की कहानी जब आप जानेंगे तो यह जरूर कहेंगे कि यह दोस्ती कुछ खास है। दोस्ती की इस कहानी में एक ने अपने दोस्त की गृहस्थी बसाने के लिए बेहद नायाब उपहार दिया। महेश और मोहतसीन बीए के छात्र हैं। जबलपुर में एक निजी कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही काम कर खर्चा निकालते हैं। मोहतसीन गांव में ही कम्प्यूटर ऑपरेटिंग का काम करता है। बिजौरा में रहने वाले महेश गौड़ के घर पर शौचालय न होने से उसकी शादी नहीं हो पा रही थी। जबलपुर, मंडला व आस-पास से शादी के 4 रिश्ते तो आए, लेकिन घर में शौचालय न होने से बात नहीं बन सकी। महेश की गृहस्थी बसने

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से पहले उजड़ते देख गांव में ही रहने वाले उसके दोस्त शेख मोहतसीन ने ठान लिया कि दोस्त की शादी में शौचालय का अड़ंगा दूर करके रहेगा। उसमें अपनी मेहनत की कमाई से स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय बनवाया और महेश को तोहफे में दे दिया। घर पर शौचालय बनने के बाद महेश के सिर 3 मई को सेहरा भी बंध गया। महेश की शादी नहीं होने से उसके परिजन भी परेशान थे। यह देख मोहतसीन ने दोस्त को शौचालय तोहफे में देने की ठानी। इसके लिए उसने पढ़ाई के साथ काम किया और 12 हजार रुपए खर्च कर स्वच्छ भारत मिशन योजना के तहत दोस्त महेश के घर शौचालय बनवाकर तोहफे में दे दिया। नतीजा ये हुआ कि महेश की शादी नारायणगंज से 30 किमी दूर चुटका पठरा में तय हो गई और 3 मई को उसने सात फेरे लिए।

स्वच्छता का साेभन

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पश्चिम बंगाल के 21 वर्षीय साेभन मुखर्जी ने किन्नरों के लिए ‘त्रिधारा’ नाम से शौचालय निर्माण की पहल की हैं

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एसएसबी ब्यूरो

न्नरों का जीवन हर लिहाज से काफी मुश्किलों भरा होता है। उन्हें हमेशा शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सेवाओं आदि जैसे क्षेत्रों में भेदभाव और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शौचालय की बुनियादी पहुंच किन्नर समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली कई समस्याओं में से एक है। किन्नरों के लिए अक्सर सार्वजनिक शौचालयों में प्रवेश करना मुश्किल होता है और अक्सर उन्हें इन शौचालयों में शौच करने से रोक दिया जाता है। हालांकि अप्रैल 2017 में इस समुदाय को केंद्र के एक निर्देश के साथ राहत मिली कि किन्नरों को अपनी पसंद के अनुसार पुरुषों या महिलाओं किसी का शौचालय उपयोग करने की अनुमति है। अब किन्नर समुदाय के लिए अलग शौचालय शुरू करने की एक नई और महान पहल की शुरुआत के लिए 21 वर्षीय एक युवा उनके साथ आया है। किन्नर समुदाय के प्रति समाज का यह रवैया वास्तव में उदासीन था, जिसने पश्चिम बंगाल के 21 वर्षीय सोभन मुखर्जी को किन्नरों के लिए कुछ सकारात्मक कार्य करने हेतु प्रेरित किया था। शौचालयों में प्रवेश न कर पाने के बारे में किन्नर समुदाय द्वारा सामना की जा रही समस्याओं के बारे में सोभन को पता चला, तो उसने एक पहल पर प्रकाश डाला और कहा कि किन्नर समुदाय के लिए स्वयं के शौचालय हों। सोभन ने स्थानीय नगरपालिका पार्षद अनीता कर से संपर्क किया, जिसमें ये विचार किया गया कि दक्षिण कोलकाता के बंसड्रोनी इलाके में स्थित चार पे एंड यूज शौचालयों में से दो को ‘अन्य’ (अदर) के लिए निर्धारित कर दिया जाए। उसने स्थानीय नगर पालिका पार्षद से इस

मामले में आगे आने और इन वॉशरूम (शौचालयों) के संचालन को आगे बढ़ाने को कहा था।

‘त्रिधारा’

सोभन ने किन्नरों के लिए टॉयलेट का नाम ‘त्रिधारा’ रखा है। सोभन ने महसूस किया कि किन्नर एक तीसरा समुदाय है, इसीलिए यह नाम सोभन के द्वारा चुना गया था। शौचालय वर्तमान में कोलकाता और पश्चिम बंगाल की राजधानी के शहर तक ही सीमित हैं। वार्ड 112 से शुरू करते हुए शौचालयों को अन्य वार्डों जैसे 97, 100, 111 और 114 में दोहराया जाएगा। अनीता कर इन वार्डों में उनके समकक्षों के साथ बात कर रही है ताकि सार्वजनिक शौचालयों में अलग-अलग किन्नर इकाइयां हों। इस बीच, सोभन का पश्चिम बंगाल के पूरे राज्य में इस अवधारणा का प्रसार करने का लक्ष्य है और इसके लिए उसने विभिन्न एजेंसियों से संपर्क किया है। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही यह संभव हुआ है, क्योंकि उनके द्वारा की गई पूछताछ में इनकी शुरूआत हुई है।

सोभन मुखर्जी की प्रशंसा

संभवतः देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किन्नरों को एक अलग शौचालय देने के प्रयास किए गए हैं। सोभन मुखर्जी, किन्नर समुदाय के लिए कुछ उल्लेखनीय करने के अपने प्रयासों के कारण प्रशंसा लूट रहे हैं। सोभन मुखर्जी ने एक ऐसे क्षेत्र में काम किया है, जहां अभी तक किसी ने कुछ भी नहीं किया, इस तरह के एक महान विचार के साथ आने के लिए, उन्हें स्थानीय नगरपालिका पार्षद अनीता कर से प्रशंसा मिली है। किन्नर समुदाय ने भी उनके इस कदम का स्वागत किया है और इस समुदाय के कुछ सदस्यों ने अपनी प्रशंसा जाहिर करने के लिए सोभन की कलाई पर राखी भी बांधी।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

शौचालय के लिए तोड़ा घर

छत्तीसगढ़ के एक लोहार पर प्रधानमंत्री की स्वच्छता को लेकर अपील का इतना असर हुआ कि उसने अपना पक्का घर तोड़कर शौचालय बनवाया

अभियान शुरू देशकरनेमें कामहजही नहींस्वच्छता , बल्कि उसे एक नए

जनांदोलन की शक्ल देने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है। प्रधानमंत्री बनते ही 2014 में उन्होंने देशवासियों से शौचालय बनवाने और साफ-सफाई पर ध्यान देने की अपील की थी। इसके बाद से प्रधानमंत्री मोदी न जाने कितनी बार अलग-अलग मंचों से लोगों को सफाई के लिए प्रेरित करते रहे हैं। उनकी इस अपील पर कई गरीब लोगों ने ऐसे काम किए जो किसी भी समाज के लिए मिसाल है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के एक गांव में रहने वाले लोहार पर स्वच्छता अपील का इतना असर हुआ कि उसने अपना पक्का घर तोड़कर शौचालय बनवाया है। फिलहाल वह झोपड़ी में रहने को मजबूर है, लेकिन उसे इस बात की खुशी है कि उसके घर में अब शौचालय है। लोहार के इस फैसले की स्थानीय मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर सराहना हो रही है। स्वच्छता को लेकर उनके इस जज्बे को लेकर लोग प्रेरक आदर्श के तौर पर देख रहे हैं।

प्रधानमंत्री की अपील से प्रभावित

धमतरी के नगरी ब्लॉक की ग्राम पंचायत सांकरा के आश्रित नवागांव में रामसुंदर लोहार रहते हैं। उनके परिवार का गुजारा गांव मजदूरी से चलता है। उसने

लोहरा ने शौचालय बनवाया है। जब वह घर की दीवारें तोड़ रहा था तो गांव के लोग उसका मजाक बना रहे थे। उसके फैसले को गलत बता रहे थे। घर टूटने के बाद रामसुंदर और उसका परिवार कच्ची झोपड़ी में रह रहा है। हालांकि उसे संतोष है कि अब उसके घर की बहू-बेटियां शौच के लिए घर के बाहर नहीं जाती हैं।

फैसले की हर तरफ तारीफ

जैसे-तैसे कई साल में पैसे जुटाकर पक्का मकान बनवाया था। कुछ महीने उन्होंने भारत सरकार के स्वच्छता अभियान के बारे में सुना। एक दिन उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र के अपील सुनी, जिसमें पीएम घर में शौचालय बनवाने की बात कह रहे थे। रामसुंदर लोहार के मन में यह बात बैठ गई। इस तरह कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने घर में शौचालय बनवाने की तैयारी शुरू कर दी।

पैसे कम पड़े तो तोड़ा घर

घर में शौचालय बन ही रहा था, तभी उसके सामने पैसों की किल्लत हो गई। घर में इतने पैसे नहीं थे कि वह ईंट खरीद सके। आखिरकार उसने अपना पक्के मकान की दीवारें तोड़ दी। उन्हीं ईंटों से रामसुंदर

रामसुंदर का शौचालय जब बनकर तैयार हो गया तो इलाके में इस बात की चर्चा होने लगी, लोगे उनके इस फैसले की तारीफ कर रहे हैं। स्वच्छता अभियान से जुडे़ सरकारी कर्मचारी भी रामसुंदर की तारीफ कर चुके हैं। इलाके के लोगों का कहना है कि भारत सरकार स्वच्छता अभियान के प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपए खर्च करती है। वहीं रामसुंदर भी इलाके के लोगों के सामने स्वच्छता अभियान की मिसाल बनकर उभरे हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो उन्हें लगता है कि सरकार को चाहिए कि वह रामसुंदर लोहार का घर दोबारा से पक्का बनवा दें। इस बारे में कई सार्वजिक अपील भी जारी की गई है। वैसे राम सुंदर लोहार अपने फैसले को लेकर तो खुश हैं ही, साथ ही इसके बदले उनकी और कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं है।

स्वच्छता के चैंपियन

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छात्रा ने बनाया टॉयलेट

में लोहिया स्वच्छता शिवहरअभियानजिलेकेकेतहतछाबोखड़ा प्रखंड की विभिन्न पंचायतों

को खुले में शौच से मुक्ति के लिए गांव-गांव में बनाये जा रहे शौचालयों का डीएम राजीव रौशन ने अधिकारियों की टीम के साथ जायजा लिया। इसी क्रम में डीएम बुधनगरा पहुंचे, जहां उन्हें जानकारी मिली कि अर्चना कुमारी नामक बीए की एक छात्रा ने अपने हाथों से शौचालय का निर्माण किया है। यह सुन कर आश्चर्यचकित डीएम उक्त शौचालय को देखने को उत्सुक हुए। डीएम की इच्छा जान कर मौजूद जनप्रतिनिधि उन्हें अर्चना के घर की ओर ले गए। अर्चना के द्वारा बनाए गए शौचालय को देख वे काफी खुश हुए। अर्चना काे आशीर्वाद देते हुए डीएम ने कहा कि वह एक दिन बिहार की रोल मॉडल बनेगी। डीएम ने शौचालय निर्माण से होने वाले फायदे की जानकारी देते हुए ग्रामीणों के आग्रह पर यथासंभव प्रयास करने का आश्वासन दिया।

शौचालय की टंकी में उतरे स्वच्छता सचिव

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जिस गंगादेवीपल्ली गांव में स्वच्छता सचिव मल की सफाई करने गड्ढे में उतरे, वह 2007 में ही खुले में शौच से मुक्त हो गया था

एसएसबी ब्यूरो

रानी कहावत है आप दूसरे से जैसे व्यवहार की उम्मीद करते हैं पहले खुद वैसा व्यवहार करें। इसी कहावत को चरितार्थ किया है केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वर अय्यर। ऐसा करनेवाले वो अकेले नहीं थे। उनके साथ साथ तकरीबन एक दर्जन वरिष्ठ नौकरशाह भी शामिल हैं। ये अधिकारी हैदराबाद से तेलंगाना के वारंगल पहुंचे। इन अधिकारियों ने गंगादेवीपल्ली गांव में 6 शौचालयों के गड्ढों की सफाई की। ऐसा करने का मकसद शौचालय सफाई से जुड़ी शर्मिंदगी को दूर करना था। परमेश्वर अय्यर ने बताया कि इस अभियान से जुड़े अधिकारी अपने साथ एक बोतल कंपोस्ट भी लेकर गए थे। ताकि वो गांववालों को

जैविक कंपोस्ट खाद के महत्व के बारे में बता सकें। अधिकारियों ने केवल शौचालय के गड्ढे की सफाई ही नहीं की बल्कि कंपोस्ट को हाथ में भी उठाया। उस कंपोस्ट का रंग कॉफी पाउडर जैसा था। अय्यर ने बताया दो गड्ढों वाले शौचालय को साफ करना सुरक्षित है इसका कोई नुकसान नहीं होता है। हम लोगों को समझाना चाहते थे कि किस तरह कम लागत में तैयार होनेवाले ट्विन पिट शौचालय ग्रामीण इलाकों के लिए सबसे बेहतर विकल्प हैं।

अय्यर ने बताया कि ये गड्ढे सालभर या 6 महीने बंद रहते हैं। उन्हें खोलकर उन्हें खाली करना और गड्ढे की सफाई करना लोग शर्मिंदगी का काम समझते हैं। लोग खाद में बदल चुके मल की सफाई करने में हिचकते हैं। हम लोगों को ये बताना चाहते थे कि मल की सफाई की ये प्रक्रिया न केवल बेहद आसान है बल्कि ऐसा करना दिनचर्या के कामों की ही तरह सामान्य भी है। गड्ढे भर जाने के बाद जब उसे कुछ महीनों के लिए बंद कर दिया जाता है तो उसके अंदर का मल पूरी तरह से कंपोस्ट में बदल जाता है। जिस गंगादेवीपल्ली गांव में स्वच्छता सचिव और अधिकारी मल की सफाई करने गड्ढे में उतरे थे, वो देश का ऐसा पहला गांव है जहां 2007 में ही खुले में शौच की आदत से पूरी तरह से मुक्ति पा ली गई थी।


12 स्वच्छता के चैंपियन

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27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

स्वच्छता की लाडली

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अंक

बहू की जिद से बनवाया शौचालय

पैसे की कमी और एक हाथ न होने के कारण शौचालय बनवाने में अरुचि दिखाने वाले बुजुर्ग ने अपनी पोती रिया के कहने पर कुछ ही दिनों में अपने घर शौचालय बनवा लिया एसएसबी ब्यूरो

स्वच्छ भारत अभियान में दिव्यांग भी बढ़-चढ़ कर सहयोग कर रहे हैं

च्छता सामाजिक बदलाव का एक नारा भर नहीं, बल्कि उसकी पूरी प्रक्रिया है। एक ऐसी प्रक्रिया, जिसमें जहां एक तरफ गांव-कस्बों में आई सामूहिक जागरुकता के कई उदाहरण मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ परिवार के भीतर भी स्वच्छता ने संबंधों के कई मार्मिक सुलेख लिखे। ऐसा ही एक वाकया मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के इछावर विकासखंड के मूंडलाकलां गांव में देखने को मिला। घटना करीब डेढ़ साल पहले की है, पर आज भी लोग स्वच्छता की इस सखी को भूले नहीं हैं। स्वच्छता की यह मिसाल एक छोटी बच्ची से जुड़ी है। पैसे की कमी और नि:शक्तता के कारण शौचालय बनाने में अरुचि दिखाने वाले बुजुर्ग विजय सिंह ने अपनी पोती रिया के कहने पर कुछ ही दिनों में शौचालय बनवा लिया।

स्वच्छता का बाल मनोविज्ञान

बात तब की है जब रिया गांव के स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। जब गांव में निर्मल भारत अभियान के तहत व्यक्तिगत शौचालय बनवाने की मुहिम चली और पंचायत एवं समुदाय स्तर पर इसके लिए प्रयास शुरू हुए तो रिया के मन पर इसका बहुत प्रेरक प्रभाव पड़ा। रिया की स्वच्छता को लेकर जागरुकता का पहला असर तो यही हुआ कि गांव के छोटे बच्चे भी स्वच्छता के बारे में बात करने लगे, इसकी उपयोगिता को समझने लगे। बच्चों की इस अनुकूलता को देखते हुए स्कूलों में भी स्वच्छता को लेकर बाल सभा एवं अन्य गतिविधियां शुरू की गईं। गांव में स्वच्छता पर बच्चों की रैली निकाली गई। बच्चे अपने घर पर शौचालय बनाने की मांग करने लगे। रिया ने बच्चों के बीच स्वच्छता को लेकर शुरू कई गतिविधियों में तो बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया साथ ही अपने घर में भी शौचालय बनाने की उसने जिद ठान ली।

हैं, वे शौचालय का उपयोग करें और जिनके घर में शौचालय नहीं हैं, जल्द से जल्द बनवा लें। ऐसा नहीं करने पर एक महीने बाद पंचायत बाहर शौच करने वालों पर जुर्माना करेगी।

रिया के मन में शौचालय बनाने को लेकर इस कदर जुनून पैदा होने के पीछे कई कारण रहे। स्कूल में लगातार गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को स्वच्छता के महत्त्व को बताने, गांव के चौकीदार प्रेम सिंह द्वारा सीटी बजाकर और डोंडी पीटकर घोषणा करने और क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था समर्थन द्वारा रात्रि चौपाल में स्वच्छता पर फिल्में दिखाने का रिया पर गहरा असर पड़ा। चौकीदार बार-बार यह ऐलान करता था कि जिनके घर में शौचालय

स्कूल की छुट्टियां होने पर रिया अपने मामा के घर जाने वाली थी। रिया ने उस दिन मासूमियत से दादा से सवाल किया, 'दादाजी अब हम शौचालय के लिए कहां जाएंगे? हमारे घर में शौचालय नहीं है और लोग शौच के लिए अब हमें बाहर नहीं जाने देंगे। शौच के लिए बाहर जाने पर जुर्माना लगेगा और पिटाई भी होगी।' रिया के इस डर को देखकर विजय सिंह ने उससे वादा किया कि वह मामाजी के घर जाकर खुशियां मनाए और जब वह वापस

सीटी और डोंडी

फिल्मों की मदद

जागरुकता के लिए फिल्मों की भी मदद ली जा रही थी। इन फिल्मों का रिया पर सबसे ज्यादा असर हुआ। ऐसी एक फिल्म में जब जुर्माना और लाठी लेकर खुले में शौच वाले स्थानों पर निगरानी करते दिखाया गया, तो रिया को लगा कि उसके गांव में भी ऐसा ही कुछ होगा। अपने इस अनुभव को लेकर रिया खुद बताती हैं, 'मैं फिल्म देखने के बाद डर गई थी कि शौच के लिए हम कहां जाएंगे? हमने दादा को बताया, तो उन्होंने शौचालय बनाने की मेरी मांग मान ली। स्वच्छता के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच एक दिन रिया घर पर बहुत डरी हुई थी।

मान गए दादाजी

चौकीदार द्वारा सीटी बजाकर घोषणा करने और क्षेत्र में कार्यरत संस्था 'समर्थन' द्वारा स्वच्छता पर फिल्में दिखाने का रिया पर गहरा असर पड़ा

लौटेगी, तब तक घर में शौचालय बन जाएगा।

एक हाथ से बड़ा काम

रिया के दादा विजय सिंह जल्द शौचालय नहीं बनवाना चाहते थे। ऐसा सोचने के पीछे एक तो उनकी अशक्तता थी, दूसरे उनकी माली हालत भी ठीक नहीं थी। वे अपनी पोती को बहुत प्यार करते थे। सो रिया की बातों ने उन पर गहरा असर किया। विजय सिंह ने पोती से घर में शौचालय बनाने का वादा तो कर लिया पर चिंतित रहने लगे कि वे अपने वादे को आखिर पूरा करेंगे कैसे। उनका दायां हाथ नहीं है। पंचायत के उप सरपंच कैलाश पटेल याद करते हैं, 'अपनी पोती के लिए नि:शक्तता को भूलकर विजय सिंह ने एक हाथ से ही दो गड्ढों की खुदाई कर दी। जब उन्हें शौचालय के लिए संस्था एवं पंचायत से मदद मिली, तो वे राजमिस्त्री के साथ काम में लगे रहे, ताकि रिया के आने पर उससे किया हुआ वादा पूरा हो जाए।'

पूरा हुआ वादा

रिया जब मामा के घर से वापस आई, तो घर में शौचालय देखकर बहुत खुश हुई। उसने यह बात स्कूल में सहेलियों को भी बताई। रिया बताती हैं, 'मेरे दादा मुझे बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने शौचालय बना दिया है, तो मुझे किसी से डर नहीं है। अब मैं कभी भी बाहर शौच के लिए नहीं जाती हूं।' साफ है कि स्वच्छता की अलख अब देश में इस तरह जल चुकी है कि उसने परिवार-समाज के भावनात्मक रिश्तों के बीच अपनी मौजूदगी दिखानी शुरू कर दी है। यह परिवर्तन इस बात का भरोसा देता है कि अगले कुछ सालों में देश में स्वच्छता का संकल्प एक प्रेरक सच्चाई का शक्ल ले लेगी।

त्तर प्रदेश के ऐटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन को लेकर लोगों में जागरुकता बढ़ने लगी है। घर में अगर शौचालय नहीं है तो महिलाएं भी शौचालय निर्माण की जिद करने लगी हैं। ऐसा ही मामला जिले के मारहरा ब्लाक के गांव रामई में सामने आया। घर में शौचालय नहीं था तो बहू ने शौचालय के लिए बाहर जाने से इंकार कर दिया। इस पर ससुर सुरेश ने बहू की बात को सही मानते हुए पैसे न होने के बाद बावजूद बकरियां बेचकर घर में ही शौचालय बनवा दिया। नेत्रहीन सुरेश की इस पहल को प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक कार्यक्रम के दौरान भी मंच से सराहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले को ओडीएफ करने की कवायद चल रही है। जहां एक ओर प्रशासन गांवगांव जाकर लोगों को जागरूक कर रहा है, वहीं दूसरी ओर खुले में शौच के प्रभावों को जानकर लोग खुद ही पहल कर रहे हैं। मारहरा ब्लॉक के गांव रामई निवासी नेत्रहीन बुजुर्ग 60 वर्षीय सुरेश के घर में शौचालय नहीं था। सुरेश के साथ सेवा के लिए उनका भतीजा रहता है। दोनों लोग खुले में ही शौच जाते थे। करीब एक साल पहले सुरेश के भतीजे की शादी गांव धुआई की शिवानी से हुई। शिवानी जब ससुराल आई, तो पहले उसने अपने पति से खुले में शौच जाने से मना किया। पति ने बात को अनसुना किया, तो उसने अपने नेत्रहीन ससुर सुरेश को पीड़ा बताई। पहले तो सुरेश ने भी आर्थिक समस्या होने के कारण मना कर दिया। मगर एक दिन सुरेश ने टीवी पर अमिताभ बच्चन का स्वच्छ भारत मिशन का दरवाजा बंद विज्ञापन सुना तो उनकी सोच बदली। उन्होंने अपनी दो बकरियों को बेचा और घर में शौचालय बनवाया। पिछले दिनों गांव में ट्रिगरिंग करने पहुंची स्वच्छ भारत मिशन की टीम को जब यह जानकारी हुई, तो उन्होंने सुरेश से बात की। सकीट ब्लॉक के गांव फफोतू निवासी दिव्यांग छोटेलाल ने कर्ज लेकर शौचालय बनवाया। घर की महिलाओं को खुले में शौच जाने में दिक्कत होती थी। पिछले दिनों टीम गांव पहुंची, तो समन्वयक बृजमोहन ने छोटेलाल को समझाया। इसके बाद उन्होंने गांव के लोगों से कर्ज लेकर शौचालय का निर्माण कराया। छोटेलाल का भी उप मुख्यमंत्री अभिनंदन किया एवं उन्हें प्रशस्ति पत्र भी दिया।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

बकरियां बेचकर बहू ने वृद्धा सास के लिए बनवाया शौचालय उत्तर प्रदेश की अस्सी साल की बहू ने एक सौ दो साल की सास के लिए शौचालय बनवाया

श्रवण शुक्ला / लखनऊ

इस अभियान के लिए देशभर में शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए सरकार नपुर के अनंतापुर गांव में सास-बहू भी मदद कर रही हैं, लेकिन कुछ लोग रिश्ते की अनोखी मिसाल देखने को स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर अपनी जरूरत मिली है। यहां एक 80 साल की बहू ने अपनी की चीजों को बेचकर भी शौचालय बनवा 102 साल की सास के लिए बकरियां बेच कर रहे हैं। बिना किसी सरकारी इमदाद और सहयोग टॉयलेट बनाया, ताकि उन्हें तकलीफ न हो। के पांच बकरियां बेचकर 110 साल की सास को शौचालय का तोहफा देने वाली 80 वर्षीय बहू इसके लिए उसे अपनी को जिला प्रशासन छह बकरियां बेचनी सम्मानित करेगा। पड़ीं। जिलाधिकारी सहित दरअसल, सास अन्य अफसर गांव को शौचालय जाने जाकर सास और में तकलीफ न हो, बहू को शौचालय इसीलिए बहू चंदना ने निर्माण की धनराशि परिवार की जीविका भी देंगे। बता दें कि के साधन को बेचकर मलासा विकासखंड टॉयलेट बनवाया। चं द ना ने बताया कि उसने सरकारी के अनन्तापुर निवासी चंदना ने बताया कि उसने सरकारी मदद मदद लिए बगैर टॉयलेट बनाने का 80 वर्षीय चंदाना देवी लिए बगैर टॉयलेट निर्णय लिया। जिसके लिए अपनी ने आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी 110 बनाने का निर्णय छह बकरियां बे च नी पड़ीं वर्षीय बेवा सास माया लिया। जिसके लिए देवी को शौचालय का अपनी छह बकरियां बेचनी पड़ीं। महिला के बेटे राम प्रकाश ने बताया कि उनकी दादी का तोहफा दिया था। इसके लिए चंदाना देवी को पांव टूट गया था, जिसकी वजह से वो चल फिर पांच बकरियां बेचनी पड़ी थी। जबकि वृद्ध सास नहीं सकती थीं। वहीं दादी की इस तकलीफों को को सुबह-शाम खुले में शौच न जाना पड़े चंदना देखकर उसकी मां ने टॉयलेट बनाने के फैसला देवी के इस प्रयास की हर किसी ने सराहना की किया, लेकिन पैसे नहीं होने की वजह से उसे थी। सीडीओ केके गुप्त ने बताया कि चंदना ने राजकीय अभियान में चार चांद लगाकर सराहनीय अपनी बकरियां बेचनी पड़ीं। केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के प्रयास किया है। इसपर जिलाधिकारी उक्त बहू तहत 2 अक्टूबर 2019 तक पूरे देश को खुले को शौचालय निर्माण के लिए मिलने वाली 12 में शौच से मुक्त कराने का फैसला किया है। हजार की धनराशि देकर सम्मानित करेंगे।

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स्वच्छता के चैंपियन

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एक पिता ने बेटी को दहेज में दिया

शौचालय

दहेज में गहने, बाइक, अलमारी और सोफासेट अब पुरानी बातें हो गईं। यूपी के लखीमपुर खीरी जिले में एक पिता ने अपनी बेटी को दहेज में शौचालय दिया

बस्सुम और शफीक के लिए ये मिलाद यूं मैं बेटी के लिए शौचालय बनवाऊंगा। तबस्सुम के ही नहीं पढ़ी जा रही, इस घर में खुशियां जो अब्बू इकबाल कहते हैं कि बेटियां बाहर सुरक्षित आई हैं। मौका ही बड़ा मुकद्दस है। शफीक और नहीं, आए दिन घटनाएं होती रहती हैं। बेटी की तबस्सुम की शादी हुई है और दहेज में शौचालय बात बड़ी लगी तो खुद ही शुरुआत करवा दी। बात हुई तो बात बन गई। ससुराल वाले भी राजी हो मिला है। तबस्सुम विदा होकर ससुराल आई है। जितनी गए। एक पढ़ी-लिखी बहू ने सबकी आंखें खोल खुशी उसको ससुराल आने की है, उससे ज्यादा दीं। दूल्हे के पिता लाल मोहम्मद कहते हैं कि ससुराल में अपने अब्बू से गिफ्ट में मिले शौचालय पढ़ी-लिखी बहू की बात लाख टके की थी। हमारी की है। दहेज में शौचालय मिलने की खबर पर हैसियत नहीं थी कि हम शौचालय बनवा सकते, आसपास वाले भी आए हैं और दुआ कर रहे हैं। सो बहू के मायके वालों की मदद से बनवा लिया। दुल्हन कह रही है मुझे दहेज से ज्यादा अहम लाल मोहम्मद कहते हैं अब बहू भी आ गई और शौचालय लगा और मेरे अब्बू ने मुराद पूरी की। अक्ल भी। अब वह लोगों को भी शौचालय के तबस्सुम कहती हैं कि उन्होंने पीएम मोदी को लिए प्रेरित करेंगे। शादी में अपने पिता से तोहफे में शौचालय अक्सर टीवी पर शौचालय बनवाने की जरूरत बताते सुना। जब पता चला ससुराल में शौचालय मांगने वाली तबस्सुम खीरी जिले में अब स्वच्छता आईकॉन बनेगी। बशीरगंज की इस पढ़ी-लिखी नहीं है तो घबराहट हुई। लड़की की शादी चंद दरअसल खीरी जिले के गोला इलाके के एक पढ़ी-लिखी बहू ने सबकी आंखें रोज पहले ही बिजुआ में हुई है। बेटी कि ख्वाहिश बशीरगंज गांव में तबस्सुम खोल दीं। बहू भी आ गई और पूरी करने को पिता ने का मायका है। मायके में अक्ल भी। अब लोगों को भी पहले उसके ससुराल में शौचालय है पर बिजुआ शौचालय के लिए प्रेरित करेंगे शौचालय बनवाया तब में जहां शादी तय हुई वहां बेटी विदा की। लड़की घर में शौचालय नहीं था। ब्लाक चार कदम पर है, लेकिन शौचालय घर में और उसके परिवार के इस कदम की सराहना नहीं था। तबस्सुम को जब ये बात पता चली तो करते हुए डीएम खीरी आकाशदीप ने तबस्सुम वो घबरा गई। ग्रेजुएट तबस्सुम ने अपनी अम्मी से को स्वच्छता आईकॉन बनाने को कहा है। साथ चुपके से दिल की बात कही। अम्मी ने भी उसका ही परिवार भी सम्मानित होगा। खीरी के डीएम दर्द समझा। बात छोटी थी पर ससुराल वाले कहीं आकाशदीप कहते हैं कि ऐसी बेटी को खीरी जिले इसे गलत ढंग से न लें लें, डर ये भी था। खैर में स्वच्छता आईकॉन बनाने की तैयारी है, जल्द तबस्सुम के अब्बू ने पहल की, उन्होंने ससुराल ही उस परिवार को सम्मानित किया जाएगा, जहां वालों से बात की। ससुराल वालों की माली हालत दहेज में शौचालय देने के रिवाज की शुरुआत हुई खराब थी। आखिरकार तबस्सुम के अब्बू ने कहा है।


14 स्वच्छता के चैंपियन

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27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

अंक

शौचालय के लिए उपवास

पिता ने नहीं बनवाया शौचालय तो उपवास पर बैठी बेटी

दो दृष्टिहीन बुजुर्ग बने ‘स्वच्छता दूत’

र्नाटक के गुलबर्गा जिले की सेदम बंद कर दिया। लगातार तीन दिनों तक उपवास तहसील की पंचायत रिब्बानापल्ली के करने के बाद उसके माता पिता शौचालय बनवाने गांव खंदेरयनपल्ली के निवासी मल्लेश की बिटिया को तैयार हो गए। माधवी की जीत की कहानी पूरे कुमारी माधवी कक्षा दसवीं गांव में फैल गई। देखते ही ‘एक घर भी ऐसा ना हो जहां की छात्रा है। माधवी में देखते माधवी गांव के बच्चों ऐसा खास कुछ नहीं है जो शौचालय के अभाव में लोग खुले का अादर्श बन गई। घर दूसरी छात्राओं में नहीं है। में शौच को जाएं, मैं हर घर में एक घर में माधवी की मिसाल लेकिन एक बात जो माधवी दी जाने लगी। बसावा केंद्र शौचालय देखना चाहती हूं’ को सबसे खास बनाती है, श्री मुरुगामठ के चित्रदुर्गा कु म ारी माधवी वह है स्वच्छता की जिद। स्वामी जी ने माधवी के माधवी ने जिद ठानी तो कार्यों से प्रभावित होकर उसके लिए कठिन परीक्षा देनी पड़ी तो भी देखी और उसे ‘शौर्य प्रशस्ति 2016’ से सम्मानित किया। जीत आखिरकार उसकी ही हुई। हुआ कुछ ऐसा माधवी भविष्य में अपने इस अभियान को लेकर कि माधवी के स्कूल में जिला पंचायत की तरफ से क्या कुछ नया करना चाहती हैं? इस सवाल के पूछे केंद्र सरकार के कार्यक्रम स्वच्छ भारत मिशन के जाने पर माधवी कहती हैं, ‘मेरी कोशिश है कि हमारे जनजागरण हेतु एक कार्यक्रम का आयोजन किया जिले की पंचायत में कोई एक घर भी ऐसा ना हो गया जिसमें स्कूली बच्चों ने बड़ी उत्सुकता से भाग जहां शौचालय के अभाव में लोग खुले में शौच को लिया। माधवी भी इस कार्यक्रम में प्रतिभागी रही। जाएं, मैं हर घर में एक शौचालय देखना चाहती अपने आस-पास की साफ सफाई, स्वच्छता हूं। हमारे चारों तरफ फैली गंदगी को दूर करना और पर्यावरण विषय के जागरुकता कार्यक्रम और अपने स्तर पर लोगों को पर्यावरण संरक्षण और और कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों द्वारा दी गयी स्वच्छता की जानकारी देना भी मेरा एक उद्देश्य है, जानकारी ने माधवी को बेहद प्रभावित किया। घर उम्मीद है मुझे इस कार्य में सफलता मिलेगी।’ पहुंचते ही माधवी में अपने घर में शौचालय निर्माण माधवी के स्कूल के हेड मास्टर, विद्यालय के की बात उठा दी, इस विषय पर उसने अपने माता- शिक्षकगण, ग्राम पंचायत के अध्यक्ष और कई अन्य पिता से खुलकर संवाद किया और उन तमाम संस्थाओं ने माधवी के कार्यों की खूब सराहना की। जानकारियों को भी साझा किया जो उसने स्कूल आज माधवी ने न सिर्फ अपने गांव खंदेरयनपल्ली में में उक्त कार्यक्रम के दौरान सीखी। माधवी के पिता अपनी पहचान बनाई है, बल्कि पूरी जिला पंचायत में मल्लेश और मां ने माधवी की बात नहीं मानी और वे माधवी की एक अलग पहचान बन चुकी है। स्कूलों घर में शौचालय बनवाने को तैयार नहीं हुए। माधवी में होने वाले अनौपचारिक कार्यक्रमों और संवादों का कई दिनों घर में शौचालय बनाने की बात को लेकर असर किस हद तक किसी एक व्यक्ति में बदलाव अपने माता-पिता से बहस करती रही। लेकिन नतीजा ला सकता है, माधवी के कार्यों को देखकर इसका कुछ नहीं निकला। आखिरकार माधवी ने खाना पीना अंदाजा लगाया जा सकता है। (एजेंसी)

घर की महिलाअों को होती परेशानी देख दोनों बुजुर्गों ने खुद ही शुरू कर दी शौचालय की खुदाई

स्व

च्छता आज देश में एक एेसे मिशन का शौचालय नहीं होने से पत्नी और बेटी को अंधेरे में नाम है, जिससे न सिर्फ सरकार जुड़ी है शौच के लिए काफी दूर जाना पड़ता था। इससे कई बल्कि लोग भी स्वत: प्रेरणा से इस मिशन में जुड़ बार खुद को भी शर्मिंदगी महसूस होती थी। उबड़रहे हैं। स्वच्छता को लेकर स्वत: प्रेरणा की एेसी खाबड़ रास्ते पर वे कई बार गिरकर घायल हो गई ही एक मिसाल कायम की है राजस्थान के उदयपुर थीं। इनकी परेशानियों और स्वच्छता को देखते हुए जिले के दो ग्रामीण बुजुर्गों ने। दयाराम (दयालू) 72 उन्होंने खुद मजदूरी कर 15 दिन में शौचालय का साल के हैं और भगवती उदयपुर से करीब 75 किमी दूर निर्माण करवाया। लाल 56 साल के। वहीं, 72 साल के ऋषभदे व की कल्याणपु र ग्राम दोनों दुनिया देख नहीं दयाराम अपनी 101 सकते, लेकिन लोगों पंचायत मेघवाल बस्ती निवासी दोनों वर्षीय मां रतन बाई के को वातावरण स्वच्छ दृष्टिहीनों को जिला प्रशासन ने साथ रहते हैं। इनका दिखे, बहू-बेटियों को बेटा भी अलग रहता है। हाल ही में ‘स्वच्छता दू त ’ के रूप में शर्मिंदगी महसूस न हो, दयाराम बताते हैं कि मां सम्मानित किया है इसीलिए पैसे नहीं होने को शौच के लिए जाने और देख नहीं पाने के में काफी परेशानी होती बावजूद खुद से गड्‌ढे खोदकर और मजदूरी कर घर थी। इसलिए फंड का इंतजार किए बगैर आंखों में शौचालय बना दिया। से नहीं देख पाने के बाद भी खुद से ही शौचालय गौरतलब है कि शौचालय नहीं होने से दोनों के बनाया। दोनों ने बताया कि देश में करोड़ों ऐसे घर घरों की बहू-बेटियों को सुबह होने से पहले अंधेरे हैं जहां शौचालय नहीं हैं, जिम्मेदारों को बहू-बेटियों में ही एक किमी दूर तक जाना पड़ता था। रास्ता की भावनाओं को समझते हुए शौचालय का निर्माण खराब होने से वे कई बार गिरकर घायल भी हो चुकी करना चाहिए। कल्याणपुर पंचायत ही नहीं, उदयपुर थीं। आखिर दयाराम और भगवती लाल से रहा नहीं जिले में दयाराम और भगवती लाल आज स्वच्छता गया और शौचालय के लिए खुद ही खुदाई शुरू मिशन में प्रेरणा-स्त्रोत बन गए हैं। ग्राम सभाओं में कर दी। शौचालय बनाने के लिए सरकार से फंड लोगों को शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करते हैं। मिलने की आस में बैठे लाखों लोगों के लिए दोनों ने गांव के सरपंच कन्हैयालाल अहारी और ग्राम सचिव स्वच्छता की अनूठी मिसाल पेश की है। उदयपुर से सुनील चारण भी शौचालय नहीं बनवाने वाले लोगों करीब 75 किमी दूर ऋषभदेव की कल्याणपुर ग्राम को इनके नाम की मिसाल देते हैं। पंचायत मेघवाल बस्ती निवासी दोनों दृष्टिहीनों को ऋषभदेव ब्लॉक विकास अधिकारी संजय जैन जिला प्रशासन ने हाल ही में ‘स्वच्छता दूत’ के रूप ने बताया कि गांवों में कुछ लोग शौचालय निर्माण में में सम्मानित किया है। ये दोनों बुजुर्ग डंडे के सहारे सहयोग नहीं करते। वे तुरंत मना कर देते हैं। समझाने ही चल-फिर पाते हैं और घर चलाने के लिए दस पर बहस की स्थिति बन जाती है। फिर भगवती और साल से मनरेगा में काम कर रहे हैं। भगवती लाल ने दयाराम की कहानी सुनाते ही लोग शौचालय बनाने बताया कि उनके बेटे उनसे अलग रहते हैं। घर पर के लिए तैयार हो जाते हैं।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

गुल्लक तोड़कर बनवाया शौचालय

स्वच्छता के चैंपियन

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टमाटर के साथ स्वच्छता का मंत्र कर्नाटक की शरणम्मा अपने गांव के साथ पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त बनाना चाहती हैं

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कुछ माह पहले राज्य स्वच्छता सम्मेलन के मंच पर छात्रा मोंद्रिता चटर्जी को सम्मानित किया है

एसएसबी ब्यूरो

अध्यापिका हैं। मोंद्रिता बताती हैं कि बचत करना उसका शौक था। वह अपने पिता से रुपए लेकर धानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत मिशन बचत करती थी। तब उसने यह सोचा भी नहीं था देश के कई गांव-शहरों में जहां एक आंदोलन कि एक दिन वह इन रुपयों से समाज के लिए की शक्ल ले चुका है, वहीं अब इसके साथ बच्चों शौचालय बनाएगी। का भी प्रेरक जुड़ाव देखने को मिल रहा है। ऐसी गुल्लक में रुपये एकत्र होते थे। कई गुल्लक ही एक 11 साल की छात्रा है जमशेदपुर (टेल्को) भर गई थीं, लेकिन कभी उन्हें खर्च नहीं किया। की मोंद्रिता चटर्जी। स्थानीय हिलटॉप स्कूल की फिर एक दिन अक्टूबर 2014 में जब प्रधानमंत्री छात्रा मोंद्रिता अपने गुल्लक से पैसे निकालकर नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन का ऐलान किया जमशेदपुर प्रखंड की छोटा गोविंदपुर पंचायत के तो उसने ठान लिया कि वह बचत के रुपयों से केंदाडीह गांव में सामुदायिक शौचालय बनवा रही ऐसे स्कूलों में शौचालय बनवाएगी, जहां छात्राओं है। इस शौचालय के निर्माण के लिए शौचालय नहीं है। पर 24 हजार रुपए खर्च होने प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत इसके बाद वह पिता से आए मिशन का ऐलान किया तो दिन रुपये लेने लगी। इस पर हैं। मुख्यमंत्री रघुवर दास उसने ठान लिया कि वह बचत पिता ने एक दिन उसे डांटा ने कुछ माह पहले राज्य के रुपए से वह ऐसे स्कूलों में भी कि वह इतने पैसे का क्या स्वच्छता सम्मेलन के मंच करती है। शौचालय बनवाएगी पर छात्रा मोंद्रिता चटर्जी को केंदाडीह में बनने वाले सम्मानित किया तो उसके माता-पिता के साथ सामुदायिक शौचालय में दो यूनिट हैं। इसमें एक ही जिले के लोग भी गौरवान्वित महसूस कर रहे स्नानागार भी बनाया जा रहा है। अमिताभ चटर्जी थे। मोंद्रिता चटर्जी को पूर्वी सिंहभूम का स्वच्छता बताते हैं कि जल्द ही उनकी बेटी हलुदबनी के चैंपियन चुना गया है और राज्य स्वच्छता सम्मेलन एक स्कूल में भी शौचालय बनवाएगी। इस स्कूल में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सम्मानित भी किया। में बच्चे नृत्य और गाना सीखते हैं। अमिताभ कहते मोंद्रिता टेल्को के रिवरव्यू इंक्लेव में रहने हैं कि उन्हें फख्र है कि उनकी बेटी समाज के वाले अमिताभ चटर्जी और स्वीटी चटर्जी की अच्छे कामों में सहयोग कर रही है। मुख्यमंत्री इकलौती बेटी है। अमिताभ चटर्जी आदित्यपुर रघुवर दास भी कह चुके हैं कि हम बड़ों को इस स्थित मेडिट्रिना अस्पताल के निदेशक हैं। मोंद्रिता छोटी बच्ची से सीख लेनी चाहिए, जिसने अपने की मां स्वीटी चिन्मया भारती टेल्को स्कूल में लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए सोचा।

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र्नाटक के कोप्पल जिले के दानापुर हैं जो उनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। शरणम्मा गांव की शरणम्मा बकर गांव में टमाटर बताती हैं, ‘कई ग्रामीण कहते हैं कि वे खुले में ही बेचने का काम करती हैं। शरणम्मा हर दिन लोगों के जाकर शौच करेंगे क्योंकि यही वो इतने सालों से घर जाती हैं, लेकिन टमाटर बेचने के इरादे से नहीं, कर रहे हैं। मैं उनके इस रवैये को बदलना चाहती लोगों को शौचालय के इस्तेमाल के प्रति जागरूक हूं, इसीलिए मैंने ऐसे घरों में जाना शुरू कर दिया है, करने के लिए। वजह बेहद दिलचस्प है। शरणम्मा जहां लोग शौचालय होने के बावजूद लोग उसका प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान की सबसे बड़ी इस्तेमाल नहीं करते।’ प्रशंसक हैं और चाहती हैं कि उनके गांव के साथ लोगों के दरवाजे पर शरणम्मा टमाटर बेचने के पूरा देश खुले में शैाच से मुक्त बने। लिए नहीं जातीं हैं, बल्कि लोगों को साफ-सफाई का यूं तो स्वच्छ भारत मंत्र देने जाती हैं। वे लोगों अभियान के तहत लोगों को से कहती हैं, ‘शौचालय शरणम्मा की दो महीने की खुले में शौच करने से रोकने कोशिशों का ही यह नतीजा है कि एक आवश्यकता है, के लिए तरह-तरह के जतन आपके पास होना चाहिए।’ किए जा रहे हैं। योजनाएं गांव में अब तक 300 परिवारों ने वे खुले में शौच जाने से होने चल रहीं, प्रचार-प्रसार किए अपने घरों में शौचालय बनवाए वाले खतरे के बारे में लोगों जा रहे हैं, लेकिन 45 साल को आगाह करती हैं। साथ की शरणम्मा का तरीका रोचक और सबसे अलग ही वह बताती हैं कि किस तरह वे इससे होने वाली है। शरणम्मा अपने ऐसे ग्राहकों को, जिनके घर जानलेवा बीमारियों से बच सकते हैं। में शौचालय बना हुआ है और वे उसका इस्तेमाल करते हैं, उन्हें बोनस देती हैं। जी हां, टमाटर का क्यों आया ऐसा विचार? बोनस। शरणम्मा अपने ऐसे ग्राहकों को एक किलो जब शरणम्मा को पता चला कि उनके गांव के टमाटर मुफ्त देती हैं। अपनी जिंदगी में कई उतार- लगभग 1,300 परिवार शौचालय से कोसों दूर चढ़ाव देखने के बावजूद शरणम्मा अपने लिए न हैं, इसके इस्तेमाल के लिए जागरूक नहीं हैं तो सोचकर दूसरों के बारे में सोचती हैं। टमाटर बेचना उन्होंने ये तरीका उपनाया। वे कहती हैं, ‘आज ही उनकी आमदनी का एकमात्र जरिया है, लेकिन मेरे पास साफ-सुथरा शौचालय है, लेकिन कुछ फिर भी वो अपना नुकसान झेल कर लोगों की मदद साल पहले जब ये नहीं था तो मैं खुले में शौच करने के लिए बाहर जाती थी। मुझे पता है, खुले करना चाहती हैं। शरणम्मा की दो महीने की कोशिशों का ही में शौच करना मुश्किल है। मैं इससे अनजान और यह नतीजा है कि गांव में अब तक 300 परिवारों अशिक्षित थी कि शौचालय होना कितना जरूरी है। ने सफाई की अहमियत समझी और अपने घरों में मैं कभी भी बाकी लोगों को भी इससे अनजान नहीं शौचालय बनवाए। इसके बावजूद कई ऐसे भी लोग रखना चाहती थी।’


16 खुला मंच

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

‘हम मंगल ग्रह पर पहुंच गए। कोई प्रधानमंत्री या मंत्री नहीं गया। यह लोगों ने किया। ये हमारे वैज्ञानिक थे जिन्होंने ये किया। ...तो क्या हम एक स्वच्छ भारत का निर्माण नहीं कर सकते’ -नरेंद्र मोदी

अभिमत

डॉ. सुधीरेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता और शिक्षाविद हैं

स्वच्छता का अहिंसक मार्ग

महात्मा गांधी ने आजादी हासिल करने के अपने अहिंसक आंदोलन की समूची अवधि के दौरान स्वच्छता के अपने संदेश को जीवंत बनाए रखा

ऐतिहासिक संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देशवासियों के साथ 2022 तक देश को ‘न्यू इंडिया’ बनाने का संकल्प

कै

लेंडर के वे दिन जो हमें इतिहास की किसी बड़ी घटना की याद दिलते हैं, वे हमारे लिए सबक और प्रेरणा के नए अवसर की तरह होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को न सिर्फ अच्छी तरह समझते हैं, बल्कि इस अनुकूलता को वे राष्ट्र निर्माण से जुड़ने के नए अवसर की तरह देखते हैं। अगस्त क्रांति की 75वीं जयंती को उन्होंने जहां ‘संकल्प पर्व’ के रूप में मनाने की अपील की, वहीं देशवासियों को इससे जुड़ा एक कार्यक्रम भी दिया। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे अगले पांच साल तक संकल्प सिद्धि में लग जाएं। ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि 1942 के आंदोलन से आजादी मिलने तक पांच साल के समय को स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की संकल्प सिद्धि का निर्णायक काल बना दिया गया था। उसी तरह अब से 2022 तक के समय को हम ‘न्यू इंडिया’ की संकल्प सिद्धि के लिए निर्णायक कालखंड बना दें। इस तरह जब 2022 में देश की आजादी के 75 साल पूरे होंगे, तब हम ‘न्यू इंडिया’ के अपने संकल्प की सिद्धि करने में सफल रहेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि राष्ट्र के सामने आज सबसे बड़ा संकल्प स्वच्छता है। स्वच्छता को लेकर प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता तो असंदिग्ध है ही, उनके कारण राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान आजाद भारत का एक अनूठा जनांदोलन बन चुका है। स्वच्छता के बहाने प्रधानमंत्री देश को जहां एक तरफ नागरिकों को सभ्य आचरण की प्रेरणा दे रहे हैं, वहीं वे नए दौर की चुनौतियों के बीच राष्ट्रपिता गांधी को नए प्रासंगिक सरोकारों के साथ पेश कर रहे हैं। इस प्रयास से स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार एक ऐसा पन्ना जुड़ने जा रहा है, जिसमें देश का मुखिया प्रधान सेवक की तरह देश को शील और सभ्यता का मार्ग पर आगे ले ले जाने के लिए बाट बुहार रहा है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

हात्मा गांधी के घुमंतू जीवन में ऐसे अनगिनत अवसर आए जिनसे स्वच्छता और सेवा का संबंध स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है और तब गांधी जी अपने आप को ‘हर एक को खुद का सफाईकर्मी होना चाहिए’ के आदर्श के जीते-जागते उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। इस बात के बारे में आश्वस्त हो जाने पर कि वह ‘किसी को भी गंदे पांव अपने मस्तिष्क से होकर गुजरने नहीं देंगे’, गांधी जी ने झाड़ू को जीवन भर मजबूती से अपने हाथों में थामे रखा और ‘सफाईकर्मी की तरह’ अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने का कोई अवसर नहीं गंवाया। अफ्रीका में फीनिक्स से भारत में सेवाग्राम तक गांधी जी के आश्रम इस बात का जीता-जागता उदाहरण रहा कि स्वच्छता के लिए सेवा करने का क्या मतलब है। साफसफाई उनके लिए दिखावे के लिए की जाने वाली कोई गतिविधि न होकर सेवा का एक महान कार्य था जिसमें सभी आश्रमवासी रोजाना हिस्सा लेते थे। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रपति के लिए स्वच्छता का कार्य एक ऐसा सामाजिक हथियार था, जिसका उपयोग वह साफ-सफाई में बाधा डालने वाली जाति और वर्ग की बाधाओं को दूर करने में करते थे और यह आज तक प्रासंगिक बना हुआ है। दिलचस्प है कि महात्मा गांधी ने आजादी हासिल करने के अपने अहिंसक आंदोलन की पूरी अवधि के दौरान किस तरह स्वच्छता के अपने संदेश को जीवंत बनाए रखा। नोआखाली नरसंहार के बाद अहिंसा के अपने विचार और व्यवहार की अग्निपरीक्षा की घड़ी में गांधी जी ने अपने इस संदेश को जन-

जन तक पहुंचाने का कोई अवसर नहीं गंवाया कि स्वच्छता और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक दिन नोआखाली के गड़बड़ी वाले इलाकों में अपने शांति अभियान के दौरान उन्होंने पाया कि कच्ची सड़क पर कूड़ा और गंदगी इसीलिए फैला दी गई है, ताकि वे हिंसाग्रस्त इलाके के लोगों तक शांति का संदेश न पहुंचा पाएं। गांधी जी इससे जरा भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने इसे उस कार्य करने का एक सुनहरा अवसर माना जो सिर्फ वही कर सकते थे। आस-पास की झाड़ियों की टहनियों से झाड़ू बनाकर शांति और अहिंसा के इस दूत ने अपने विरोधियों की गली की सफाई की और हिंसा को और भड़कने से रोका। उनके लिए ‘स्वस्थ तन, स्वस्थ मन’ की कहावत में कोई मूर्त अभिव्यक्ति अंतर्निहित नहीं थी, बल्कि इसमें एक गहरा दार्शनिक संदेश छिपा हुआ था। क्या कोई ऐसा व्यक्ति अपने मन में अहिंसक विचारों को प्रश्रय दे सकता है जिसके कृत्य दूसरे प्राणियों या प्रकृति के प्रति हिंसक होंॽ वह स्वच्छता को स्वतंत्रता के अपने राजनीतिक आंदोलन का अभिन्न अंग मानते थे और नि:संदेह वह स्वच्छता की कमी को हिंसक कृत्य के समान मानते थे। सचमुच, स्वच्छता की कमी से देश में आज भी लाखों बच्चे मौत की नींद सो जाते हैं और यह भी एक तरह की हिंसा ही है। कोई आश्चर्य नहीं कि स्वच्छता की कमी एक अदृश्य हत्यारे की तरह है। गांधी जी को गंदगी में हिंसा का सबसे घृणित रूप छिपा हुआ दिखता था। इसीलिए वह सामाजिकराजनीतिक, दोनों ही तरह की स्वतंत्रता के मार्ग में स्वच्छता

साफ-सफाई गांधी जी के लिए दिखावे के लिए की जाने वाली कोई गतिविधि न होकर सेवा का एक महान कार्य था, जिसमें सभी आश्रमवासी रोजाना हिस्सा लेते थे


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017 और अहिंसा को सहयात्री की तरह मानते थे। गांधी जी पश्चिम में स्वच्छता के सुचिंतित नियमों को देख चुके थे, इसीलिए वे इन्हेंं अपने और अपने करोड़ों अनुयायियों के जीवन में अपनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हालांकि इसके लिए उन्होंने जो कार्य शुरू किया उसमें से ज़्यादातर अब भी अधूरे ही हैं। ‘वर्षों पहले मैंने जाना कि शौचालय भी उतना ही साफ-सुथरा होना चाहिए जितना कि ड्राइंग रूम’, गांधी जी का यह कथन स्वच्छता अभियान के दौरान बार-बार उद्धृत किया जाता है। अपनी जानकारी को ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए गांधी जी ने अपने शौचालय को (वर्धा में सेवाग्राम के अपने आश्रम में) शब्द श: पूजास्थल की तरह बनाया, क्योंकि उनके लिए स्वच्छता दिव्यता के समान थी। शौचालय को इतना महत्व देकर ही जनता को इसके महत्व के बारे में समझाया जा सकता है। इस पर अमल के लिए हमें गंदगी में रहने के बारे में अपनी उस धारणा में बदलाव लाना होगा जिसके तहत हम स्वच्छता को आम बात न मानकर एक अपवाद अधिक मानते हैं। देश को 2 अक्तूबर 2019 तक खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का महत्त्वाकांक्षा लक्ष्य उसी दिशा में उठाया गया पहला कदम है। देश भर में 5 करोड़ से ज्यादा घरों में से हर एक में शौचालय का निर्माण करने का वादा एक चुनौती भरा लक्ष्य है, लेकिन ‘शौचालय आंदोलन’ को ऐसे ‘सामाजिक आंदोलन’ में बदलना, जिसमें शौचालयों का उपयोग आम बात बन जाए, तभी संभव है जब हम गांधी जी के जीवन से सबक लें। अन्य बातों के अलावा हमें शौचालयों की सफाई करने और सीवेज के गड्ढों को खाली करने के बारे में गांव के लोगों की अनिच्छा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक वर्जना को दूर करना होगा। कोई भी इस समस्या की गंभीरता का अनुमान उस तरह से नहीं लगा सकता जिस तरह गांधी जी ने खुद इसका आकलन किया था। एक बार जब कस्तूरबा गांधी ने शौचालय साफ करने और गंदगी का डब्बा उठाने में घृणा महसूस की तो गांधी जी ने उन्हें झिड़की दी थी कि अगर वह सफाईकर्मी का कार्य नहीं करना चाहती तो उन्हेंं गृह-त्याग कर देना चाहिए। कई तरह से स्वच्छता उनके लिए अहिंसा की तरह या शायद इससे भी ऊँची चीज थी। गांधी जी के जीवन के इस छोटे-से मगर महत्त्वपूर्ण प्रकरण में एक बहुमूल्य संदेश निहित है। अपने बाकी जीवन में इस पर अमल करते हुए कस्तूरबा ने अनजाने में ही ‘स्वच्छता ही व्यवहार है’ का परिचय दे दिया। देश में चल रहे स्वच्छता अभियान के लिए यह प्रेरक संदेश हो सकता है। आखिर यही तो वह व्यवहार-परिवर्तन है, जिसके संदेश को स्वच्छ भारत मिशन के जरिए करोड़ों लोगों के मन में बैठाने का प्रयास किया जा रहा है। गंदगी और बीमारी के खिलाफ भारत के निर्णायक युद्ध को ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान से जोरदार बढ़ावा मिला, जो स्वच्छता की साझा जिम्मेदारी के बारे में हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। देश में पहले से चलाए जा रहे ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को और असरदार बनाने की इस मुहिम में जनता का आह्वान किया गया है कि वे साफ-सफाई को उन ‘दूसरे’ लोगों की जिम्मेेदारी न समझें जो ‘हमारे’ इस दायित्व को ऐतिहासिक रूप से खुद निभाते आए हैं।

ल​ीक से परे

प्रियंका तिवारी

खुला मंच

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लेखिका युवा पत्रकार हैं और देश-समाज से जुड़े मुद्दों पर प्रखरता से अपने विचार रखती हैं

एक वन बेटियों को समर्पित

हि

बेटियों को समर्पित इस वन को संरक्षित वन की श्रेणी में लाने का प्रदेश सरकार से आग्रह किया गया है ताकि 'बेटी बचाओ- पेड़ लगाओ’ के संदेश का और विस्तार हो सके

माचल प्रदेश के उना जिले में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक बड़ी और अनूठी पहल हुई है। कमाल की बात है कि इस कार्य को ग्रामीणों ने अपनी सूझ और बूते से किया है। अलबत्ता इस कार्य में जिला प्रशासन ने भी पर्याप्त सहयोग किया है। दरअसल हम बात कर रहे हैं उना के टकारला गांव की, जहां के लोगों ने अपनी बेटियों के नाम वन लगाया है। उना जिला प्रशासन ने बीते वर्ष जनसाधारण को नारा दिया है- 'बेटी बचाओ, पेड़ लगाओ’। इसके पीछे उनकी सोच यही है कि बेटियों के प्रति समाज का नजरिया और विकसित हो और पौधारोपण के लिए लोग आगे आएं व पर्यावरण सरंक्षण में उनकी सहभागिता बढ़े। एक वन बेटियों को समर्पित करने की उनकी इस पहल ने उना जिला के टकारला गांव को भी एक नया गौरव प्रदान किया है। मेहतपुर-अंब राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ लगती 20 कनाल जमीन में बरसात के सीजन में जिला के सभी विभागों के अफसरों व स्थानीय जनता की सहभागिता से विभिन्न प्रजातियों के 200 ऐसे पौधे रोपे गए, जो तेजी से आकार लेते हैं। तीन साल की उम्र के 6 से 8 फुट ऊंचे इन पेड़ों की पौध को प्रदेश में पहली बार उना जिला में वन विभाग की नर्सरियों में मनरेगा लेबर द्वारा तैयार किया गया है। बीते साल ये पौधे ग्रामीणों को दिए गए हैं यानी अगले एक वर्ष के भीतर ये वन का रूप ले लेंगे। इस समय इस वन के साथ लोगों का भावनात्मक लगाव भी रहे और समाज के बीच बेटियों के प्रति एक सकारात्मक सोच भी उत्पन्न हो, इसके लिए उना जिला प्रशासन ने यह पूरा वन बेटियों को समर्पित कर दिया है। लहराते इन पेड़ों को देखकर अब अपार खुशी होती है। यहां कई होर्डिंग लगाए गए हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग से अपने वाहनों में गुजरने वाले लोगों से यह अपील की गई है कि वे कुछ क्षण यहां रूकें और अपनी बोतलों में बचे पानी को इन पेड़ों में भी डालकर पर्यावरण सरंक्षण में अपना योगदान दें। बेटियों को समर्पित इस वन में रोपे गए पौधों को पशु नुकसान न पहुंचा पाएं, इसके लिए सीमेंट के 80 खंभे लगाकर पूरे वन क्षेत्र की तारबंदी की गई है और लोगों के भीतर जाने के लिए एक रोटेशन

वाला गेट लगाया गया है। इन पेड़ों की पौध को चूंकि मनरेगा के तहत वन विभाग की नर्सरियों में तैयार किया गया है, इसलिए इस वन क्षेत्र को विकसित करने में स्थानीय पंचायत के साथ मनरेगा के तहत काम कर रहे लोगों की पूरी सहभागिता भी सुनिश्चित की जा रही है। वन विभाग ने इस वन की देखभाल के लिए कर्मचारियों की तैनाती भी इस क्षेत्र में कर दी है और लोगों से अपील की गई है कि वे स्वेच्छा से इसमें सहयोग करें। यह वन तैयार करने के लिए पौधारोपण की विधिवत तकनीक वन विभाग के अधिकारियों द्वारा उपस्थित लोगों को सिखाई गई ताकि नर्सरी में तैयार किए गए इन पौधों को जमीन में रोपे जाते समय कोई नुकसान न पहुंचे और ये नई जमीन में अपनी जड़ें सहजता से पकड़ सकें। इन पौधों को लगाने के लिए खोदे गए गडढों में पहले अच्छी किस्म की मिट्टी की भराई की गई है। इस वन में आम, आंवला, जामुन, शहतूत जैसे फलदार पेड़ों के अलावा पीपल, अर्जुन, हरड़, बेहड़ा, शीशम, बांस , सिल्वर ओक के पेड़ एक साथ लहलहाएंगे। वन विभाग के अधिकारियों तथा उना जिला प्रशासन नें बेटियों को समर्पित इस वन को संरक्षित वन की श्रेणी में लाने का प्रदेश सरकार से आग्रह किया है ताकि इस वन का भविष्य सुरक्षित रहे और 'बेटी बचाओ- पेड़ लगाओ’ का संदेश हमेशा प्रेरणादायक बना रहे। टकारला गांव में तैयार किए जाने वाले इस वन के साथ ही प्रसिद्ध देवालय भी है। लिहाजा इससे इस देवालय में शीष नवाने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को यहां छाया भी उपलब्ध होगी और इस स्थल के प्राकृतिक सौंदर्य में भी

पौधों को पशु नुकसान न पहुंचाएं, इसके लिए सीमेंट के 80 खंभे लगाकर पूरे वन क्षेत्र की तारबंदी की गई है और एक रोटेशन वाला गेट लगाया गया है

इजाफा होगा। हिमाचल प्रदेश भले ही पर्वतों व वनों से आच्छादित प्रदेश है लेकिन इस प्रदेश के बार्डर क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम पेड़ हैं और यहां पौधारोपण के अभियान को गति देकर पर्यावरण संतुलन बरकरार रखा जाना वक्त की दरकार है। उना जिला प्रशासन नें सभी पंचायत पदाधिकारियों से अपील की है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में इसी तरह बेटी बचाओ मुहिम को पेड़ लगाने से जोड़ें और जिले को नया गौरव प्रदान करें। प्रशासन ने कहा कि विभिन्न पंचायतों में वन भूमि चिन्हित करके उन्हें वनों में तबदील किया जाएगा। उना में चलाई गई ‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ और पेड़ लगाओ’ विशेष मुहिम की शुरूआत टकारला गांव से की गई और इस मुहिम में जनसाधारण की भी पूरी सहभागिता सुनिश्चित की गई। भविष्य में उना जिला बेहतर लिंगानुपात के लिए भी आदर्श जिला बनकर सामने आएगा। अपने हाथों लगाए वन को बेटियों को समर्पित करके उना जिला प्रशासन ने पूरे देश को एक नया संदेश व नई सोच दी है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रधानमंत्री के ‘बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाअो’ संदेश को जन-जन तक पहुंचाया जाए। आज लोगों की सोच में अंतर तो आया है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि सरकार द्वारा पंचायत और जिला प्रशासन स्तर पर इस तरह के कार्यक्रम और योजनाएं बनाई जाएं, जिससे बेटियों को पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जाए। पर्यावरण संतुलन और भावी पीढि़यों के लिए स्वच्छ हवा तथा स्वच्छ वातावरण के लिए वृक्षा रोपण वक्त की मांग है। इस दिशा में हम सभी को जहां तक संभव हो सके, एक-एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए और उसकी देखभाल भी करनी चाहिए। केंद्र सरकार ने विद्यालय स्तर पर भी यह कार्यक्रम चलाया है। देश के हर विद्यालय में विद्यार्थियों को बचपन से ही वृक्षों की हिफाजत करना और अपने लगाए पौधों को पनपते हुए देखने का सुअवसर दिया जाना चाहिए, ताकि हमारी भावी पीढि़यां पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक हो सके। आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के साथ वन लगाओ भी आवश्यक हो गया है। प्रत्येक देशवासी को इस कार्य में अपना सहयोग प्रदान करना चाहिए और लोगों को इस विषय पर जानकारी मुहैया करानी चाहिए। उना से शुरू हुई पहल अगर एक राष्ट्रीय पहल की शक्ल लेती है, तो यह बड़ी बात होने के साथ देश में पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से बड़ी उपलब्धि भी होगी।


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27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

ट्रंप विलेज में वर्ल्ड टॉयलेट डे

हरियाणा के ट्रंप विलेज में पहली बार वर्ल्ड टॉयलेट डे मनाया गया । इस कार्यक्रम का आयोजन सुलभ इंटरनेशनल की तरफ से किया गया फोटो ःजयराम

ट्रंप विलेज के बच्चों को हाथ में प्लेकार्ड्स

प्रो. श्याम लाल और पुनीत अहलूवालिया ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया

इस अवसर पर दिल्ली के गार्गी कॉलेज की छात्राओं की रंग प्रस्तुति

मुख्य अतिथि और अन्य गण्यमान्य लोगों के साथ डॉ. विन्देश्वर पाठक

ट्रंप विलेज की महिलाएं कार्यक्रम में गायन करती हुईं


वां

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

अंक

स्मृति चिन्ह ग्रहण करते प्रो. श्याम लाल

पुनीत अहलूवालिया का स्वागत

कार्यक्रम में प्रगासेन राम्याह का स्वागत

स्मृति चिन्ह ग्रहण करते दिलीप के हाथिबेड

‘सुलभ मैजिक टॉयलेट’ और ‘ट्रंप विलेज’ पुस्तक का लाकार्पण करते डॉ. पाठक एवं अन्य अतिथिगण

सुलभ स्कूल की छात्राएं घूमर नृत्य प्रस्तुत करती हुईं

सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करती हुईं सुलभ स्कूल की छात्राएं

फोटो फीचर

स्मृति चिन्ह ग्रहण करते अमिताभ कुंडू

मुख्य अति​िथ प्रो.श्याम लाल का संबोधन

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20 स्वच्छता के चैंपियन

वां

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

स्वच्छता की बेमिसाल प्रतिभा नरसिंहपुर को खुले में शौच से मुक्त कराने का मुख्य श्रेय जाता है जिला पंचायत की सीईओ प्रतिभा पाल को

अंक

प्लास्टिक की बोतलों से शौचालय

जमशेदपुर में प्लास्टिक की बोतलों से शौचालय बनाने की तैयारी है

एसएसबी ब्यूरो

ध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले महीने गाडरवारा में आयोजित मुख्यमंत्री स्वच्छता सम्मान समारोह में नरसिंहपुर जिले को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया। नरसिंहपुर अब प्रदेश का प्रथम संपूर्ण (ग्रामीण एवं शहरी) ओडीएफ (ओपन डेफेकेशन फ्री) जिला बन गया है। मुख्यमंत्री ने सम्मान समारोह में जिले को खुले में शौच से मुक्त बनाने में योगदान देने वाले तथा मेहनत और लगन से कार्य करने वाले जन-प्रतिनिधियों के साथ अधिकारियों- कर्मचारियों की प्रशंसा की। उन्होंने जिले के खुले में शौच से मुक्त होने पर जिलावासियों को बधाई दी। मुख्यमंत्री ने साथ ही यह भी कहा कि अब आगे भी सावधानी रखने की जरूरत है, ताकि परिश्रम बेकार न जाए। जिले में आगे भी कोई खुले में शौच के लिए न जाए और शौचालय का उपयोग करना लोगों की आदत में शुमार हो। दिलचस्प है कि नरसिंहपुर रातोंरात खुले में शौच से मुक्त नहीं हुआ। इसके लिए सरकार के कुछ अधिकारियों ने खासतौर पर काफी परिश्रम और

लगन से काम किया है। ऐसी ही एक अधिकारी हैं, जिला पंचायत की सीईओ प्रतिभा पाल। पाल ने जिले को खुले में शौच से मुक्त कराने को लेकर खासे जुनून के साथ काम किया। हालांकि वे इस बारे में किसी तरह का श्रेय लेने से बचती हैं। वे साफ कहती हैं, ‘कृपया याद रखिए कि यह काम उनके अकेले का नहीं है। सबने जिलाधिकारी के नेतृत्व में इसके लिए काफी समर्पण से काम किया। दरअसल, इस ओर तब मैं पहली बार गंभीरता से उन्मुख हुई, जब नरसिंहपुर का चांवरपाठा प्रखंड खुले में शौच से मुक्त हुआ। मुझे लगा कि ऐसा अगर यहां हो सकता है तो फिर पूरे जिले में क्यों नहीं हो सकता है।’ प्रतिभा का स्वच्छता को लेकर समर्पण कितना पक्का है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने जिस दिन नरसिंहपुर को ओडीएफ फ्री घोषित किया, वह उस दिन भी गांवों के औचक निरीक्षण के लिए निकलीं, ताकि कहीं कोई खुले में शौच करता न दिखे। प्रतिभा स्वच्छता मिशन को लेकर कैसे काम करती हैं, वाकई यह काफी प्रेरक है। नरसिंहपुर को ओडीएफ घोषित होने पर ऐसे ही एक दौरे पर प्रतिभा जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव मुर्गाखेड़ा

मुख्यमंत्री ने जिस दिन नरसिंहपुर को ओडीएफ फ्री घोषित किया, वह उस दिन भी गांवों के औचक निरीक्षण के लिए निकलीं, ताकि कहीं कोई खुले में शौच करता न मिले

पहुंचीं। वहां पहुंचकर प्रतिभा ने बच्चों के एक समूह के साथ पहले दोस्ताना तरीके से बातचीत शुरू की। जैसे ही उन्हें लगा कि बच्चों को अब वे आसानी से अपनी बातें कह सकती हैं, तो खुले में शौच के बारे में वो बच्चों को बताने लगीं। प्रतिभा ने बच्चों से पूछा, ‘क्या तुम लोगों में से कोई खुले में शौच के लिए जाता है? ’बच्चों ने ना कहते हुए तेजी के साथ अपना सिर हिलाया। इसी बीच नौ साल की सीता उठ खड़ी होती है और कहती है, ‘खुले में शौच जाने से हम बीमार पड़ सकते हैं।’ इसी तरह एक दूसरा बच्चा आशीष, जिसकी उम्र करीब दस साल होगी, कहने लगता है, ‘खुले में शौच पर मंडराने वाली मक्खियां घर में भी पहुंचती हैं और खाने-पीने की चीजों पर बैठती हैं।’ इसी क्रम में सारे बच्चे फख्र के साथ बताते हैं कि उनके घरों में और स्कूल में भी शौचालय है और वे इनका इस्तेमाल करते हैं। देखते-देखते माहौल खुशनुमा हो जाता है और बच्चों के साथ प्रतिभा भी ताली बजाने लगती हैं। दरअसल, प्रतिभा जिस अनौपचारिकता के साथ ग्रामीणों के साथ घुलती-मिलती हैं, वह काफी प्रभावशाली है। वो देखते ही देखते ग्रामीणों के साथ आत्मीय संबंध बना लेती हैं और फिर उन्हें अपनी बात समझाती हैं। आज अगर मध्यप्रदेश का यह जिला खुले में शौच से मुक्त घोषित हुआ है, तो उसमें प्रतिभा पाल जैसी काबिल और समर्पित अधिकारी की बड़ी भूमिका है।

मशेदपुर के टेल्को स्थित मानव विकास स्कूल में प्लास्टिक की अनुपयोगी खाली पानी की बोतलों की मदद से शौचालय निर्माण की योजना बनाई गई है। पांच जून तक निर्माण पूरा करने की योजना है। इस स्कूल को क्षेत्र के कई सेवानिवृत्त बुजुर्ग संचालित करते हैं। इस स्कूल में सिर्फ एक टॉयलेट है, जबकि बच्चे अधिक हैं। इस योजना को मूर्त रूप देने में जो वित्तीय भार पड़ेगा उसे हिलटॉप स्कूल की छात्रा मौन्द्रिता चटर्जी एवं परिजनों ने खर्च करने की पहल की है। उल्लेखनीय है कि कक्षा सात की मौन्द्रिता पहले भी अपने खर्च पर कुछ शौचालय बनवा चुकी हैं, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। सीएम कैंप कार्यालय के उपसमाहर्ता संजय कुमार की पहल पर इस योजना की शुरुआत की गई है। संजय कुमार ने गरुड़बासा पहुंचकर स्कूल के शिक्षकों के अलावा मौन्द्रिता चटर्जी एवं परिजनों से इस पर्यावरणीय पहल को मूर्त रूप देने के लिए आगे आने को कहा। प्रस्ताव को सभी ने स्वीकार किया। संजय कुमार ने कहा जमशेदपुर में प्लास्टिक बोतलों की भरमार है। इनका उपयोग होने से शहर की स्वच्छता बढ़ेगी। ईंट के विकल्प के रूप में इन बोतलों का प्रयोग करना भी पर्यावरणीय हित में है। उन्होंने कहा कि यह शौचालय सिर्फ प्रायोगिक दृष्टिकोण से बनाया जा रहा है, अगर परिणाम अच्छा रहा तो इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। शौचालय बनाने में लगभग तीन हजार खाली बोतलों की जरूरत होगी। इनमें से कुछ बोतलें समीप स्थित रिवर व्यू कॉलोनी के घरों से इकट्ठा की जाएंगी, जबकि बड़ी मात्रा में अनुपयोगी खाली बोतलें स्कूल के छात्र एवं अभिभावक अपने घरों से जमा करेंगे। प्लास्टिक की एक लीटर मिनरल वाटर वाली खाली बोतल में बालू या लौह अयस्क का अवशिष्ट राख (स्टील प्लांट से निकला स्लज जिसे फेंक दिया जाता है) को भरकर ईंटों के विकल्प के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा। पायलट योजना में खुद को शामिल करने पर 13 वर्षीय छात्रा मौन्द्रिता उत्साहित थी। उसने कहा कि नई पहल में शामिल होकर वह गौरव महसूस कर रही है।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

शौचालय खासतौर से महिलाओं के लिए कितनी बड़ी जरूरत है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई महिलाओं ने इसके लिए अपने मंगलसूत्र तक बेच दिए

गो

रखपुर में भटहट क्षेत्र के बूढ़ाडीह गांव की सविता देवी आम लोगों के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। उन्होंने उन लोगों को स्वच्छता की राह दिखाई है, जो पैसे की कमी का हवाला देकर शौचालय का निर्माण नहीं करवाते हैं। सविता देवी ने शौचालय बनाने के लिए अपना मंगलसूत्र बेचकर एक मिसाल पेश की है। बिहार के पटना जिले की सविता देवी की शादी बूढ़ाडीह निवासी दिव्यांग वीरेंद्र मौर्या से हुई। शादी के बाद गांव आने पर शौचालय का नहीं होना उन्हें अखरता था। आखिरकार उन्होंने मंगलसूत्र बेचकर शौचालय बनाने का फैसला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरणा लेकर शौचालय बनाने वाली सविता देवी पहली महिला नहीं हैं। ऐसी कई महिलाएं और भी हैं जिन्होंने शौचालय के लिए अपने गहने बेचे हैं । इन महिलाओं के लिए गहने शौचालय से ज्यादा जरूरी नहीं है ।

कानपुर की लता देवी

उत्तर प्रदेश के कानपुर की लता देवी दिवाकर ने भी घर में शौचालय बनवाने के लिए अपना मंगलसूत्र बेच दिया। शौचालय नहीं होने की वजह से परिवार को काफी दिक्कतें होती थीं। इस महिला ने अपने सुहाग की निशानी मंगलसूत्र और अन्य जेवर बेचकर घर में शौचालय बनवाया। मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनाने की बात पूरे इलाके में फैल गई। गांव के लोगों ने लता की सोच और हौसले को सलाम किया। लता की सोच से सबक लेते हुए गांव के कई परिवारों ने घर में शौचालय का निर्माण शुरू करा दिया है।

बरेली की सुमन गंगवार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान और घर-घर में शौचालय बनवाने के अभियान का आम लोगों पर गहरा असर होता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के ही बरेली की रहने वाली सुमन गंगवार ने अपने घर में शौचालय बनवाने के लिए अपने गहने तक गिरवी रख दिए। गुलरिया भवानी गांव की रहने वाली 31 साल की सुमन का कहना है कि हर सुबह हमें शौच के लिए अलग-अलग जगह की खोज करनी

रोहतास की फूल कुमारी

बिहार के रोहतास जिले की फूल कुमारी ने भी में शौचालय निर्माण के लिए अपने मंगलसूत्र को गिरवी रखकर एक उदाहरण पेश किया है। संझौली प्रखंड के बरहखाना गांव की फूल कुमारी ने अपने पति के घर में शौचालय नहीं होने पर उसके निर्माण के लिए अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया। फूल कुमारी के पति खेतिहर मजदूर होने के कारण वे अपने घर में शौचालय नहीं बना पा रहे थे। ऐसे में फूल कुमारी ने मंगलसूत्र को गिरवी रखकर शौचालय बनवाया। जिला प्रशासन ने अब अन्य लोगों को प्रेरित करने के लिए फूल कुमारी को संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम का ब्रांड एंबेस्डर बनाया है।

विदर्भ की संगीता अवहले

महाराष्ट्र के विदर्भ जिले में वाशिम के सिक्खड़ गांव की संगीता अवहले ने मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनवाकर एक अनोखी मिसाल पेश की है। संगीता ने घर में शौचालय बनवाने के लिए मंगलसूत्र बेच दिया। यह खबर गांव से लेकर पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। संगीता के इस कदम की प्रशंसा करते हुए महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे ने कहा कि राज्य में हम ज्यादा से ज्यादा संख्या में शौचालय बनवाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को आगे बढ़ाने के लिए मुंडे ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसे एक नया मंगलसूत्र भेंट किया, जिसे उसने अपने पति के हाथों गले में पहना। केंद्र सरकार की ओर से 2019 तक ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रो में सभी घरों में शौचालय उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान सरकार ने इसके लिए प्रोत्साहन राशि 9,000 हजार से बढ़ाकर 12,000 रुपए कर दी है। महज दो साल के भीतर ही दो करोड़ शौचालयों का निर्माण हो चुका है। इसके साथ तकरीबन 2.75 लाख स्कूलों में विशेषतौर पर लड़कियों के लिए करीब 4.25 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है। सबसे खास ये है कि प्रधानमंत्री स्वयं हर बुधवार को होने वाली बैठकों में स्थिति का जायजा लेते हैं।

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'टॉयलेट' एक विवाह कथा

शौचालय के लिए बेच दिया मंगलसूत्र पड़ती थी। खेतों में अक्सर पानी भरा रहता है और जंगली जानवरों का खतरा भी रहता है। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं अपने घर में शौचालय बनवाउंगी फिर चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। पहले मैंने अपना मंगलसूत्र गिरवी रखा जिससे मुझे 6 हजार रुपए मिले, लेकिन फिर एक हजार रुपए के लिए मुझे अपनी कान की बालियां भी गिरवी रखनी पड़ीं।

स्वच्छता के चैंपियन

बुलंदशहर की युवती ससुराल में शौचालय बनने के बाद ही शादी के लिए तैयार हुई

त्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गांव वेदरामपुर की एक युवती ने अपने होने वाले पति के सामने शौचालय बनवाने की शर्त रख दी। युवती ने साफ कह दिया कि शौचालय नहीं तो शादी नहीं। लड़के के पिता की गुहार पर ग्राम प्रधान ने शौचालय बनवा दिया, जिसके बाद लड़की शादी के लिए तैयार हुई। 19 जून को दोनों की शादी हो गई। स्वच्छ भारत अभियान में अब ग्रामीण बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। एक जून को पहासू क्षेत्र के गांव वेदरामपुर निवासी दिनेश पाल के बेटे का रिश्ता अतरौली क्षेत्र के एक गांव की युवती के साथ तय हो गया था। इस दौरान शादी 19 जून को होनी तय हुई थी। शादी से एक सप्ताह पूर्व लड़की को पता चला

कि उसकी ससुराल में शौचालय नहीं है। इस पर लड़की ने लड़के के सामने घर में शौचालय होने पर ही शादी करने की शर्त रख दी। कह दिया कि अगर शौचालय नहीं बना तो वह शादी नहीं करेगी। यह बात लड़के ने अपने पिता को बताई। आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होने के कारण लड़के के पिता ने ग्राम प्रधान से शौचालय बनवाने की गुहार लगाई। इसके बाद ग्राम प्रधान मनु प्रताप ने प्रस्ताव पारित कराकर दिनेशपाल के घर शौचालय बनवाने की स्वीकृति दे दी और शादी की नियत तिथि से पांच दिन पहले ही शौचालय बनवा गया। जब लड़के ने शौचालय बनने की बात लड़की को बताई तो वह शादी के लिए तैयार हो गई। यह बात क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। याद रखें कि इसी विषय पर अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म टायलेट एक प्रेम कथा जल्दी ही रिलीज होने वाली है।

ससुराल नहीं जाऊंगी, शौचालय बना दो ससुराल में शौचालय नहीं होने पर पत्नी ने साथ जाने से मना किया

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कारो के बालीडीह में रहने वाली पारसमणि ने ससुराल जाने से सिर्फ इसीलिए मना कर दिया क्योंकि वहां शौचालय नहीं है। उसने साफ कहा कि जब तक ससुराल में शौचालय की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक वह ससुराल नहीं जाएगी। धनबाद निवासी दिनेश बालीडीह निवासी पारसमणि मुर्मू के मामले में पत्नी ने कहा कि ससुराल में शौचालय ही नहीं है ऐसे में वह कैसे रहेगी। इस पर उसके पति दिनेश ने कहा कि जब तक उसके गांव में शौचालय नहीं बन जाता है, तब तक वह किराए के

मकान में ही उसे रखेगा। पत्नी ने तर्क दिया कि उसके पति ने 2016 में ही छह महीने में शौचालय बनाकर ससुराल ले जाने का आश्वासन दिया था। शौचालय के लिए ससुराल नहीं जाने की जिद ठान बैठी पारसमणि का मामला पारिवारिक विवादों के निपटारे के दौरान सामने आया। सुनवाई की अध्यक्षता सेंटर के अध्यक्ष शशिभूषण कर रहे थे। इसमें मुख्य रूप से सिटी डीएसपी अजय कुमार और महिला थाना प्रभारी संगीता कुमारी शामिल थीं। इसमें नए, पुराने कुल सात मामले के निष्पादन किए गए।


22 स्वच्छता के चैंपियन

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

स्वच्छता के इन नायकों ने पीएम का भी ध्यान खींचा

स्वच्छता मिशन की घोषणा के बाद बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता के कुछ नायकों से देश को रूबरू कराने का फैसला किया

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एसएसबी ब्यूरो

च्छ भारत मिशन के जरिए 2014 में देश में स्वच्छता की अलख जगाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र के सामने स्वच्छ भारत अभियान के रीयल नायकों से देश से रूबरू कराने का निर्णय लिया। मिलिंडा गेट्स और बिल गेट्स ने भी पीएम मोदी से मुलाकात में स्वच्छ भारत मिशन से जुड़कर काम करने की इच्छा जताई। आइए मिलते हैं ऐसे ही कुछ नायकों से जिन्होंने स्वच्छता को लेकर अपनी प्रतिबद्धता से न सिर्फ प्रधानमंत्री का, बल्कि पूरे देश का ध्यान खींचा-

तभी मनी ईद जब गांव हुआ ओडीएफ

देश के सामने चमकने वाले स्वच्छ भारत मिशन के रीयल नायकों में शुमार छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव की केसला ग्राम पंचायत सचिव रशीदा रवानी ने प्रण लिया था कि जब तक उनका गांव खुले में शौच की समस्या से मुक्त नहीं होगा। उन्होंने अपने केसला गांव को खुले में शौच मुक्त बनाने का बीड़ा अप्रैल 2015 में उठाया। 18 जुलाई को ईद थी। मगर गांव खुले में शौच मुक्त 20 जुलाई को बन पाया। इसीलिए गांव के सभी लोगों ने धर्म के भेदभाव से उपर उठकर 20 जुलाई को ईद मनाई। सबके घरों में सेवइयां बनीं। केसला गांव पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त हो गया है। रशीदा ने गांव वालों को प्रेरित कर 220 शौचालय बनवाए हैं।

दिव्यांगता भी आड़े नहीं आई

छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव जिले के दूसरे नायक मिथिलेश हैं। विकलांगता से ग्रसित मिथलेश बोल नहीं सकते हैं। लेकिन घर-घर में शौचालय बनवाने की उनकी कोशिश ने लोगों को दांत तले उंगली

वां

दबाने पर विवश कर दिया है। मिथिलेश के साथ जुड़े बारनबेरी के पंचायत सचिव मोतीराम खोबरागड़े ने कहा कि विकलांगता के प्रभाव के कारण मिथिलेश बोलते नहीं है। मगर शौचालय को लेकर उन्होंने गांव, पंचायत और जिले को जगा दिया है। सबसे पहले उन्होंने अपने घर में शौचालय बनवाया। उसके बाद गांव वालों से हाथ जोड़ा। उनके लगन को देखते हुए ग्राम पंचायत ने उन्हें ट्राई-साइकिल भेंट की। उस पर शौचालय का मॉडल और माइक लगाया गया। वे गांव-गांव जाकर माता-बहनों से इशारों में हाथ जोड़कर घर में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका प्रयास रंग लाया है। गांव में 224 शौचालय बन गए हैं। गांव खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो गया है। अब वे अन्य गावों को प्रेरित कर रहे हैं।

पहले शौचालय फिर आशीर्वाद

ऐसे ही नायकों में भोपाल की किन्नर संजना हैं। एक सामाजिक संस्था से प्रेरित होकर संजना ने लोगों को घर में शौचालय बनाने की प्रेरणा देने का नायाब तरीका अपनाया है। अमूमन किन्नर घर में बच्चा पैदा होने या शादी ब्याह के शुभ मौके पर आशीर्वाद देने आते हैं। लेकिन संजना अपने साथियों के साथ उन्हीं घरों में आशीर्वाद देने जाती हैं, जिनमें शौचालय बने हों। बकायदा ये उन घरों पर हरी बिंदी लगाती हैं, जिनमें शौचालय बने और चालू हैं। वरना उस घर पर लाल बिंदी चस्पा कर देते हैं।

मूंछ का सवाल

राजस्थान के अजमेर में मदन नाथ कालबेलिया ने अपने गांव में अपनी मूंछ का हवाला देकर गांववालों को शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया है। 15 दिनों में उनकी प्रेरणा से 60 लोगों ने शौचालय बनवाए हैं।

महिलाएं किचेन तोड़ बनवा रहीं शौचालय

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बिहार के सीतामढ़ी में महिलाओं ने रसोईघर और कमरे तुड़वा कर शौचालय बनवाने की मिसाल पेश की है

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हार में शौचालय निर्माण को लेकर महिलाओं ने अनूठी पहल की है। सीतामढ़ी जिले की एक पंचायत में महिलाएं घरों में शौचालय निर्माण को लेकर जागरुकता की मिसाल बन गई हैं। आलम यह है कि बिहार के इस जिले में महिलाएं शौचालय निर्माण को लेकर इतनी प्रतिबद्ध हैं कि उन्होंने कई मामलों में घर की रसोई तक को तोड़कर शौचालय निर्माण की पहल की है। गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय में एक है, सभी के लिए शौचालय निर्माण। इसके तहत चलाए जा रहे जागरुकता अभियान का असर ही तैयार फूस की झोपड़ी तोड़ने का गम उसे भी था, है कि सीतामढ़ी के चोरौत उत्तरी पंचायत में कई क्योंकि उसके ही एक कोने में रसोई का काम होता महिलाओं ने रसोईघर और था। आखिरकार झोपड़ी विधवा पेंशन से गुजर-बसर को तोड़कर शौचालय कमरे तुड़वा कर शौचालय बनवाने की पहल की है। बनाने का काम शुरू हो करने वाली शीला देवी ने उन्होंने शौचालय बगैर घरों गया है। पिछले महीने दो कमरे के में रहने से इनकार कर ऐसे कई उदाहरण हैं। खपरैल घर को तुड़वाकर दिया है। बिहार की इन चोरौत पूर्वी पंचायत के शौचालय बनवाया महिलाओं की पहल की वार्ड आठ में विधवा पेंशन हर तरफ सराहना हो रही से गुजर-बसर करने वाली है। चरौत के वार्ड सात में हरि मंडल का दो कमरे शीला देवी ने पिछले महीने दो कमरे के खपरैल घर का घर और रसोईघर था। ईंट से निर्मित 15 इंच को तुड़वाकर शौचालय बनवाया। दीपलाल दास मोटी दीवार के ऊपर खपरैल थी। शौचालय की की बहु नीलम देवी ने मिट्टी एवं खपरैल के घर को कमी खल रही थी। पत्नी रेखा देवी को जानकारी तोड़कर शौचालय को प्राथमिकता दी। मिली कि अभी शौचालय निर्माण कराने पर सरकार चोरौत उत्तरी पंचायत की मुखिया सीमा देवी की ओर से 12 हजार रुपए की सहायता मिल रही कहती हैं कि इन महिलाओं की पहल से उन है। उन्होंने शौचालय निर्माण के लिए जिद ठान ली। लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए, जो अब भी शौच पति ने जगह की कमी का रोना रोया तो वह रसोई के लिए खुले में जाते हैं। चोरौत के प्रखंड विकास तोड़ शौचालय के लिए जगह निकालने पर अडिग पदाधिकारी नीलकमल कहते हैं कि जब पूरा हो गईं। अब रसोईघर के एक हिस्से में शौचालय प्रखंड खुले में शौच मुक्त घोषित हो जाएगा तो इन का निर्माण किया जा रहा है। महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा। पड़ोसी देश इसी तरह वार्ड आठ में सोनी देवी ने घर में नेपाल में बगैर शौचालय वाले परिवार के बच्चे का शौचालय पर जोर दिया तो पति सुरेंद्र मंडल ने नामांकन सरकारी विद्यालयों में नहीं होता है। हो जमीन कम होने की बात कह पल्ला झाड़ना चाहा, सकता है कि भविष्य में अपने यहां भी सरकार ऐसा लेकिन सोनी नहीं मानी। हालांकि मिट्टी लेपकर नियम लागू कर दे।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

शौचालय के लिए गिरवी रखे जेवर

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के एक ग्राम प्रधान ने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख कर127 शौचालयों का निर्माण करवाया

क ओर गांवों में शौचालय बनवाने के लिए कुछ लोगों से मान-मनौव्वल करना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर गोरखपुर जिले की दो महिलाओं और एक प्रधान ने प्रेरक मिसाल पेश की है। सरदारनगर और भटहट की दो महिलाओं में एक ने शौचालय बनवाने के लिए अपने जेवर गिरवी रख दिए, तो दूसरी ने अपना मंगलसूत्र बेच दिया। कौड़ीराम के टीकर गांव के एक प्रधान ने अपने गांव में घर-घर शौचालय बनवाने के लिए अपनी पत्नी के सारे जेवर ही गिरवी रख दिए। कुछ व्यापारियों के सहयोग से उन्होंने 127 शौचालय बनवाए और बजट मिलने के बाद पत्नी के जेवर छुड़ाने के साथ ही 100 और शौचालयों का निर्माण कराया। खुले में शौचमुक्त अभियान को आगे बढ़ाने के लिए इन तीनों का अतुलनीय सहयोग प्रशासन को इतना पसंद आया कि अब इन्हें नजीर बना कर पेश किया जा रहा है, ताकि दूसरे लोग इनसे सीख ले सकें। सरदारनगर के अयोध्याचक की रहने वाली नजमा ने घर में बहुओं के आने पर शौचालय बनवाने की ठान ली। घर में शौचालय बनवाने के लिए उन्होंने गांव के प्रधान से संपर्क किया तो उन्होंने बजट न होने की बात कही। बात यहीं खत्म नहीं हुई। शौचालय की जिद पर अड़ी नजमा ने अपने गहने 20 हजार रुपए में गिरवी रख दिए और घर में शौचालय का निर्माण कराया। नजमा अब गांव की दूसरी महिलाओं को भी शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। भटहट के बूढाडीह में रहने वाली सविता की घर शौचालय नहीं था। उसने अपने पति वीरेन्द्र मौर्या से शौचालय बनवाने के लिए कहा, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वीरेन्द्र उनकी बात को टालता रहा। इसी बीच वीरेन्द्र शिमला काम करने चला गया और वादा कर किया वहां से आने के बाद शौचालय बनवा देगा। कोई व्यवस्था न होते देख सविता ने अपना मंगलसूत्र बेच दिया। मंगलसूत्र के बदले मिले 15 हजार रुपए से उसने शौचालय बनवा लिया।

मंत्री जी ने की नाली की सफाई श

स्वच्छता का संदेश देने के लिए उत्तर प्रदेश के पर्यावरण राज्यमंत्री ने खुद की नाली की सफाई

पथ ग्रहण के बाद पहली बार दफ्तर पहुंचे प्रदेश के राज्यमंत्री उपेंद्र तिवारी ने हाथों में झाड़ू लेकर सफाई की थी। यह घटना तो बीते दिनों की बात है। अब वही मंत्री महोदय कांशीराम आवासीय कालोनी में सफाई अभियान की शुरूआत करते हुए खुद नाली की सफाई में जुट गए। स्वच्छता के प्रति उत्तर प्रदेश के पर्यावरण राज्य मंत्री उपेंद्र तिवारी का जज्बा वाकई सबके लिए एक मिसाल की तरह है। उपेंद्र तिवारी ने सफाई के इस अभियान में अधिक से अधिक संख्या में लोगों से जुड़ने का आह्वान किया था। उन्होंने सफाई कार्य हेतु सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि शहर की मलिन बस्तियों में सफाई के लिए अधिकारी, जनप्रतिनिधियों और जागरूक समाजसेवी संगठनों द्वारा मिलजुल कर प्रभावी ढंग से अभियान चलाया जाए। हाथ में फावड़ा लिए मंत्री और डीएम द्वारा सफाई करते देख देख बड़ी तादाद में लोग सफाई कार्य में हाथ बंटाने के लिये आगे आए। मंत्री और डीएम देख अनेक जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने फावड़ा, लकड़ी-लोहे की डंडियां हाथ में लेकर नालियों और सड़कों से गंदगी साफ की। उपेंद्र तिवारी ने क्षेत्रीय लोगों की समस्याओं की सुनवाई करने के बाद लोगों को स्वच्छता हेतु जागरूक करते हुए कहा कि वे अपने घर के बाहर सड़क पर कूड़ा-करकट न फेंके, अपने घर के अलावा घर

के बाहर और सार्वजनिक स्थलों को साफ-सुथरा रखें। उन्होंने कांशीराम कालोनी सहित शहर की अन्य मलिन बस्तियों में नियमित रूप से सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। करीब दो घंटे से अधिक चले सफाई के इस अभियान को जारी रखने के लिए जिलाधिकारी अमित कुमार सिंह ने अधीनस्थ अधिकारियों को समुचित निर्देश दिए और कहा कि वे स्वच्छ भारत मिशन की कामयाबी के लिए समूचे जिले में प्रभावी ढंग से सफाई अभियान को संचालित कर नियमित रूप में समीक्षा करें और पाई गयी कमियों को दुरूस्त करें। मंत्री और बड़ी संख्या में उच्चाधिकारियों के एकाएक कालोनी आगमन पर क्षेत्रीय लोग अचंभित हो गए। सफाई अभियान के दौरान मंत्री, सांसद, एमएलए और आला अधिकारियों को अपने बीच में देखकर बुजुर्गो, महिलाओं और बच्चों ने प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि कमजोर, गरीब लोगों के इस क्षेत्र को साफ-सुथरा रखने की यह अच्छी शुरूआत की गई है।

फेसबुक ग्रुप बना स्वच्छता की मिसाल दिल्ली के नौकरीपेशा लोगों ने स्वच्छता को लेकर फेसबुक पर बनाया ग्रुप

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शल मीडिया लोगों को आपस में जोड़ता ही नहीं है, बल्कि यह कई अच्छी पहल को भी आगे बढ़ाने का माध्यम बनकर उभरा है। स्वच्छता को लेकर ऐसी ही एक पहल का नाम है- ‘माय देल्ही- कीप इट क्लीन’। दरअसल यह नाम है फेसबुक पर सक्रिय एक अनूठे समूह का। दिल्ली के कुछ उत्साही लोगों द्वारा शुरू किए गए इस फेसबुक ग्रुप ने स्वच्छता की एक बड़ी मिसाल कायम की है। ग्रुप से अभी तक 14 हजार से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं। इस समूह का लक्ष्य है दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में जाकर वहां कि गंदगी को दूर करना। अच्छी बात यह भी है कि इस ग्रुप का ताल्लुक किसी भी पार्टी या एनजीओ से नहीं है। यह अनूठे तरह का सामाजिक समूह है, जिसमें दिल्ली के आम लोग एक मंच पर आकर स्वच्छता को लेकर अपना

कर्तव्य और शपथ को पूरा कर रहे हैं। खास बात यह कि इस ग्रुप के सभी मेंबर नौकरीपेशा लोग हैं, लेकिन हर रविवार यानी छुट्टी के दिन ये लोग फेसबुक पर पर इस बात को लेकर जानकारी साझा करते हैं कि आज किस इलाके को स्वच्छ करना है। इस तरह देखते ही देखते वो इलाका स्वच्छ हो जाता है।

स्वच्छता के चैंपियन

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स्वच्छता का आठवां फेरा

बिहार के मधेपुरा जिले में होने वाली एक शादी में दूल्हा-दुल्हन ने अग्नि के सामने स्वच्छता के लिए आठवां फेरा लिया

के अनुसार शादी के दौरान हिंदूदूल्हा-रीति-रिवाज दुल्हन अग्नि को साक्षी मानकर सात

फेरे लेते हैं। इन फेरों के जरिए वे एक-दूसरे का जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाते हैं। लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले में होने वाली एक शादी में दूल्हा-दुल्हन ने अग्नि के आठवां फेरा लिया। यह आठवां फेरा स्वच्छता का फेरा था। दूल्हा-दुल्हन दोनों का कहना है कि उन्होंने अग्नि के समक्ष आठवां फेरा स्वच्छता का लिया, जिसमें दोनों ने खुले में शौच के खिलाफ साफ सफाई की कसमें खाई। बिहार के पूर्णिया जिले के बनवारी नगर इलाके के रहने वाले रविरंजन की शादी मधेपुरा जिले की गुड़िया से हुई है। शादी तय होने के बाद रवि रंजन में लड़की वालों के सामने एक शर्त रखी जिसमें शादी के समय सात फेरे के बजाए आठ फेरा लिया जाएगा और यह आठवां फेरा स्वच्छता का होगा। यह बात सुनने के बाद लड़की और उसके परिवार वाले दोनों राजी हो गए। फिर धूमधाम से शादी की तैयारी की जाने लगी । दूल्हा रविरंजन दिल्ली के एक होटल में सीनियर मैनेजर है, तो दुल्हन गुड़िया गुड़गांव के एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। जब इस शादी के बारे में दूल्हा रवि रंजन से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हमेशा से ही यह सोच थी कि शादी में कुछ अलग हो इसीलिए हमने शादी में स्वच्छता को महत्वपूर्ण बनाया और शादी के निमंत्रण पत्र पर 'एक कदम स्वच्छता की ओर' और 'शौचालय बिन दुल्हन का सिंगार अधूरा है' जैसे नारे भी लिखवाए। इस तरह के ख्याल मन में आने को लेकर जब रवि रंजन से पूछा तो उन्होंने बताया कि गुजरात में काम करने के दौरान उनके मन में यह प्रेरणा आई। गुजरात में उनके एक मित्र की शादी हो रही थी जहां शादी में स्वच्छता की शपथ ली गई तभी हम ने भी अपनी शादी में स्वच्छता स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान देने की कसम खाई थी। हमारे इस फैसले से हमारे परिवार वाले के साथ साथ लड़की के परिवार वाले भी काफी खुश हैं।


24 स्वच्छता के चैंपियन

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27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

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शौचालय के लिए मंगलसूत्र बेच शौचालय के लिए छात्रा ने त्यागा अन्न बीना जिले की छठी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा तारा ने शौचालय बदली गांव की तस्वीर बनवाने के लिए चार दिनों तक खाना पीना छोड़ दिया औ

उत्तर प्रदेश के गाेरखपुर की सविता देवी ने शौचालय के लिए अपना मंगल सूत्र बेच दिया

रत अगर देवी है तो चंडी उसका दूसरा रूप माना जाता है। वहीं औरत अगर कुछ करने की ठान लेती है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता। ये बात गोरखपुर की सविता ने साबित की है। जिसने अपनी सुहाग की निशानी बेचकर पीएम मोदी के सपने को पूरा किया है। उल्लेखनीय है कि स्वच्छ भारत अभियान पीएम मोदी का सपना होने के साथ-साथ बीजेपी का लक्ष्य भी है। वहीं शौच मुक्त अभियान को सविता ने अपने मंगलसूत्र की कुर्बानी देकर पूरा किया है। दरअसल गोरखपुर के बूढ़ाडीह गांव की रहने वाली सविता की वीरेन्द्र मौर्य से शादी हुई, तो वह सविता को लेकर शिमला रहने के लिए चला गया। जब 8 माह बाद सविता अपने ससुराल बूढ़ाडीह पहुंची, तो उन्हें यह जानकर हैरत हुई कि उसे यहां खुले में शौच जाना होगा। उसके बाद तो घर में तूफान आ गया। सविता ने पति से खुले में शौच जाने से साफ इंकार कर दिया। उसे पता चला कि सुसराल में शौचालय नहीं है और लोग यहां पर खुले में शौच जाते हैं तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने पति को घर में शौचालय बनवाने के लिए कहा। जब पति ने 6 माह का समय मांगा, तो सविता ने अपने गहने और मंगलसूत्र बेच दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में 'स्वच्छ भारत' का सपना देखा। लेकिन, यूपी के गोरखपुर की सविता ने यह सपना 2011 में ही देख लिया था। यही वजह है कि आज सविता पूरे गांव के लिए रोल मॉडल हैं। उसने न सिर्फ अपने घर में शौचालय का

बनवाया, बल्कि पूरे गांव को खुले में शौच से मुक्त कर दिया। सविता बताती हैं कि शुरू में उसे गांव के पुरुष और महिलाओं के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वह हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठी। वह और उनकी टोली डंडा और सीटी लेकर सुबह और शाम खेत और सड़क की ओर शौच जाने वाले लोगों को समझाती हैं और खुले में शौच करने से होने वाले नुकसान के बारे में भी बताती हैं। इतना ही नहीं सविता और गांव की महिलाएं अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन का हिस्सा भी हैं। ग्रामीण दुर्गा बताती है कि अब गांव में इसका असर दिखने लगा है। अब तक गांव में 160 घरों में शौचालय बन गए हैं और 300 घरों में और शौचालय बन रहे हैं। इसमें गांव के प्रधान राम भुआल का भी काफी सहयोग रहा है। उन्हों ने सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता राशि उपलब्ध कराकर मदद की है। उनका कहना है कि वह दिन दूर नहीं, जब गांव खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा।

ध्यप्रदेश के बीना जिले की छात्रा तारा ने 4 दिनों तक सिर्फ इसीलिए खाना नहीं खाया, क्योंकि उसके घर में शौचालय नहीं था। उसे शौच के लिए बाहर जाना पड़ता था। परिवार गरीब है, इसीलिए पहले तो शौचालय निर्माण में खर्च से डरकर पिता महेश बंसल उसकी बात की अनदेखी करते रहे, लेकिन जब बेटी ने शौचालय बनने पर ही खाना खाने की जिद की तो परिवार ने आनन फानन में शौचालय का निर्माण शुरू करा दिया। तारा के बड़े भाई रामकुमार बंसल ने बताया कि तीन भाइयों के बीच तारा उनकी इकलौती बहन है। उसकी जिद को पूरा करने के लिए शौचालय निर्माण कार्य शुरू करा दिया है। तारा का कहना है कि घर में शौचालय नहीं है। बाहर खेतों में जाओ तो सुबह शाम लड़कों की घूरती हुई नजरें। एक सप्ताह पहले स्कूल में आए तरुण संस्कार केंद्र वालों ने बताया कि खुले में शौच जाने से ही बीमारियां होती हैं। इसके बाद मैंने ठान लिया कि अब पापा से कहूंगी कि घर में भी शौचालय

ससुराल छोड़ने वाली सम्मानित

शौचालय नहीं होने पर ससुराल छोड़ने वाली सुमन को संतकबीर नगर के डीएम ने प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया

स्वच्छता की राह पर बढ़ीं 13 महिलाएं

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महिलाओं के इस समूह ने स्वच्छता की जो मुहिम छेड़ी है, उसका व्यापक असर दिखने लगा है

हार के मधुबनी जिले में स्वच्छता की राह में अब कोई बाधा नहीं, क्योंकि महिलाएं इस बात का प्रण ले चुकी हैं ले चुकी हैं कि घर-घर में शौचालय बनेगा। इसका असर यह हुआ कि 60 घरों में शौचालय का निर्माण हो गया। कुछ और घर इस राह पर हैं। जी हां, स्वच्छ भारत के सपने को साकार कर स्वस्थ समाज के निर्माण में में जुटीं हैं भारत माता स्वयं सहायता समूह की महिलाएं। खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में रहिका प्रखंड के भौआड़ा व राजनगर के मंगरौनी सहित आसपास के गांवों में समूह की महिलाओं के प्रयास का व्यापक असर दिख रहा है। 13 महिलाओं वाले इस समूह की सहेली रेणुका देवी के नेतृत्व में चलाए जा रहे जागरुकता अभियान

से प्रेरित करीब 60 लोगों ने अपने घरों में शौचालय का निर्माण कराकर एक मिसाल कायम की है। समूह की महिलाएं स्वावलंबन के क्षेत्र में भी महिलाओं को नई राह दिखा रहीं हैं। सिलाई-कढ़ाई सहित स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी ये महिलाएं अपनी अलग पहचान कायम कर रही हैं। राजनगर व रहिका प्रखंडस्तरीय जीविका समूह से जुड़ी कुल 13 महिलाएं पवित्री देवी, उषा देवी, विमला देवी, लीला देवी, नीलम देवी, सीता देवी, अठूला देवी, लीला देवी, किरण देवी, विमला देवी दो वर्षों से प्रतिदिन करीब दो घंटे रांटी, भौआड़ा पंचायत के गांवों में घूम-घूमकर महिलाओं को शौचालय की अहमियत बताते हुए खुले में शौच से परहेज करने की सलाह दे रही हैं।

बनवा दो। जब उन्होंने मेरी बात नहीं मानी तो मैंने खाना पीना छोड़ दिया। 4 दिन तक कुछ नहीं खाया। मम्मी पापा तो शादी में बाहर गए थे, लेकिन तीनों भाइयों ने मेरी पीड़ा को समझा और पापा के आने से पहले ही शौचालय के गड्ढे का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। पापा-मम्मी भी शौचालय निर्माण कराने के लिए मान गए हैं। अब मैं अपनी सहेलियों को भी घर में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करूंगी।

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च्छता अभियान के तहत घर-घर शौचालय जरूरी होने के नारे को उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर की सुमन ने पूरी तरह अपनाया। शौचालय न होने पर वे ससुराल छोड़कर मायके चलीं गईं। ससुराल वालों को यह बात खटकी तो सास उर्मिला ने पूरे मामले की जानकारी देते हुए तहसील में प्रार्थना पत्र दे दिया। डीएम अतरी नानकार गांव पहुंचे और उर्मिला के घर शौचालय की नींव रखी गई। इतना ही नहीं डीएम ने उर्मिला की बहू सुमन को सम्मानित भी किया।

सांथा के अतरी नानकार निवासी उर्मिला ने 18 जुलाई को शौचालय न होने का प्रार्थना पत्र तहसील में दिया। इसमें उर्मिला ने बताया कि शौचालय न होने के कारण उनकी बहू सुमन अपने मायके चली गई है। इसे डीएम मार्कंडेय शाही ने गंभीरता से लिया और शौचालय निर्माण कराने का निर्देश जारी किया। यही नहीं डीएम ने स्वयं अतरी नानकार जाकर शौचालय की नींव रखने का निर्णय लिया। इसके बाद गांव में जगह - जगह सफाई होने लगी। डीएम उर्मिला के घर पहुंचे और शौचालय की नींव रखी। इस दौरान उन्होंने उर्मिला और उसकी बहू सुमन को प्रशंसा पत्र भी दिया। डीएम ने ग्राम प्रधान से गांव में जिनके पास शौचालय नहीं है, उसकी सूची बीडीओ सांथा को देने को कहा। साथ ही गांव में शत प्रतिशत शौचालय निर्माण का निर्देश भी दिया।


स्वच्छता की उड़ान को पंख लगे

स्वच्छ भारत मिशन से प्रेरित होकर आंध्र प्रदेश की शम्शुन शौचालय के प्रति जागरुकता फैला रही हैं

शौ

एसएसबी ब्यूरो

चालय की सुविधा ना तो मायके में थी और ना ही ससुराल में। विडंबना यह कि खुले में शौच करना एक आदत-सी बन गई थी, लेकिन मैं यह कतई नहीं चाहती थी कि मेरी बहू को भी ये दिन देखने पड़ें। इसीलिए मैंने अपने घर में शौचालय बनवाया। साथ ही उसकी मां से भी कहा की वह भी अपने यहां शौचालय जरूर बनवाए। ऐसा कहना है आंध्र प्रदेश में गुंटूर जिले के बोल्लावरम में रहने वाली शम्शुन का। शम्शुन को इस तरह का कदम उठाने की प्रेरणा स्वच्छ भारत मिशन से मिली। देश के कई राज्यों में ऐसे अनगिनत मिसालें हैं, जिन्होंने खुले में शौच को रोकने के लिए अपने प्रयासों से तमगे पाए हैं। लेकिन ऐसा कर पाना आसान नहीं होता। इसके लिए सबसे बड़ी समस्या होती है- स्तर और प्रेरणा को बनाए रखना। आंध्रप्रदेश में गुंटूर जिले के मुप्पाला मंडल के बोल्लावरम को ही लीजिए। वहां के ग्रामीण और पंचायत की टीम एक बार हासिल सफलता को बनाए रखने के लिए बाद के दुष्परिणामों को लेकर भी सतर्क रही। इसीलिए उन्होंने ऐसा तंत्र विकसित कर लिया, जिसमें जागरुकता के साथ-साथ एकदूसरे पर नजर भी रखी जा सके। इतना ही नहीं, इस गांव में अगर कोई खुले में शौच करता पाया जाता था तो पंचायत परिषद या तो उसे इस आदत को त्याग कर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती थी या फिर उस पर सजा के तौर पर कुछ न कुछ जुर्माना लगाती थी। गौरतलब

है कि 353 परिवारों वाली इस बोल्लावरम पंचायत की कुल आबादी 1433 है। उल्लेखनीय है कि 2015 में बोल्लावरम को खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) पंचायत घोषित किया जा चुका है। सवाल उठता है कि यह सब हुआ कैसे? दरअसल स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरपंच और पंचायत सचिवों के साथ मंडल अधिकारी स्वछता की आवश्यकता पर चर्चा किया करते थे। समाज को पूर्ण स्वच्छता की दिशा में जागरूक बनाने के तौर-तरीकों पर तो खास तौर पर चर्चा की जाती थी। इतना ही नहीं, पूर्ण स्वच्छता की आवश्यकता और इसकी अपरिहार्यता समझाने के लिए पंचायत सचिव, सरपंच, आशा कर्मी और आंगनबाड़ी के कर्मियों वाली ग्राम पंचायत की टीम ने घर-घर जाकर लोगों से मिलने की अनोखी पहल की। पहला कदम था शौचालय बनाना। दिक्कतें आईं। कुछ लोगों ने अपने घरो में शौचालय बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऐसे में ग्राम पंचायत की टीम ने समझाया कि शौचालय बनाना कैसे महिलाओं की मान-मर्यादा से लेकर स्वास्थ्य, बल्कि हर तरह की खुशहाली से जुड़ा है। कहा जाता है कि 1937 में एक बार गांधीजी को एक पत्र मिला। पत्र भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल के बीरभूम में रहने वाले एक ग्रामीण ने लिखा था। उसने गांधीजी से पूछा था कि वह एक ‘आदर्श गांव’ किसे मानते हैं और

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017 भारतीय गांव किस तरह की समस्याओं से ग्रसित हैं। उनका जवाब 1937 में ‘हरिजन’ में प्रकाशित हुआ, जो एक साप्ताहिक था। इसका संपादन गांधी जी ने 1930 के आरंभ के दिनों में शुरू किया था। उन्होंने लिखा था, ‘आदर्श गांव वह होगा जहां की धरती पर पूर्ण स्वच्छता हो...वहां के लोगों को सबसे पहले स्वच्छता की समस्या से पार पाना होगा।’ कहना ना होगा कि यूनिसेफ जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर भारत सरकार देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने की चुनौती के प्रति काफी गंभीर हैI सरकार ने 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के जरिए इस लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य में यूनिसेफ प्रमुख सहयोगी है। बोल्लावरम की ही एक अन्य महिला ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा, ‘जब भी कोई रिश्तेदार या पारिवारिक मित्र हमसे मिलने शहर से आते थे तो वह 12 घंटे से ज्यादा नहीं रहते थे। सिर्फ इस डर से कि शौच के लिए खुले में जाना पड़ेगा। एक करीबी रिश्तेदार जब विदेश से भारत आया तो उसने हमारे घर आने से इसीलिए मना कर दिया कि हमारे घर में शौचालय नहीं है।’ उसने आगे बताया, ‘जैसे ही मैंने खुद और बच्चों के लिए घर में शौचालय के होने के महत्व को समझा, मैंने सरकार की मदद आने से पहले ही खुद अपने पैसे को इसमें लगा दिया।’ शौचालय बनाने में जो सबसे बड़ी दिक्कत आती थी, वह थी वित्तीय कमी। कई परिवारों ने तो इस डर से ही आगे बढ़ने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि एक बार बन जाने के बाद शायद सरकारी पैसा मिले ही ना। दूसरी समस्या जगह की थी, जहां घर वाले शौचालय बनाना चाहते थे। बहरहाल, ग्राम पंचायत की टीम ने ग्रामीणों से बात की और समझाया कि योजना के समाप्त होने से पहले हर घर में शौचालय अवश्य बन कर रहेगा। ग्राम पंचायत की टीम ने इस निर्णय लेने में भी हस्तक्षेप किया कि घर में शौचालय कहां बनवाया जाए ताकि उसे तोड़ना या दुबारा बनाने की जरूरत ना पड़े। कुल मिला कर तमाम प्रेरणाओं के बावजूद सरपंच को भी कुछ पैसों का योगदान करना पड़ा। इसके अलावा आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों से आर्थिक बोझ कम करने की खातिर कच्चे माल और सामानों पर कुछ छूट भी देनी पड़ी। बहरहाल, ग्रामीणों के लिए शौचालयों का निर्माण ही राम बाण नहीं था। अगली चुनौती थी उन्हें शौचालय की आदत लगाना और यह भ्रम तोड़ना था कि शौचालय का प्रयोग तभी करना चाहिए जब खुले में शौच के लिए कहीं जगह ना मिले। यह बहुत सराहनीय बात है कि ग्रामीण पंचायत की टीम अब तक ग्रामीणों को इस बात के प्रेरित करने में लगी हुई है कि शौच के लिए खुले में जाने के बजाय घर में मौजूद शौचालय का ही इस्तेमाल किया करें। अच्छी बात यह है कि घर में शौचालय होना अब लोगों के लिए गर्व का प्रतीक बन चुका है।

‘अगर भारत के लोग कम पैसों में मंगल ग्रह पर पहुंच सकते हैं तो वे अपने मोहल्लों और गलियों को साफ क्यों नहीं रख सकते।’ - नरेंद्र मोदी

स्वच्छता के चैंपियन

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खास बातें सफलता की ओर कदम बढ़ाता स्वच्छ भारत मिशन अब तक 1,80,000 से अधिक गांव हुए खुले में शौच से मुक्त 130 जिले और तीन राज्य हुए खुले में शौच से मुक्त ऐसे शिक्षाप्रद और संदेश देने वाले नुक्कड़ नाटकों, कठपुतलियों के खेल और चर्चाओं में बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिनमें समाज में स्वस्छता के प्रति संवेदनशीलता की बात होती है। यकीनन, स्वच्छ भारत मिशन ने महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती यानी 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त कर देने के लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के लिए देश के स्वच्छता क्षेत्र को बड़े पैमाने पर लामबंद कर दिया है। इस दिशा में सबसे स्थायी दृष्टिकोण तो यही होगा कि समाज खुद पूर्ण स्वच्छता को बढ़ावा दे। तब समाज के लोग खुद अपने-अपने तरीके से भागीदारी करते हैं और स्वच्छता की अच्छी आदतें अपनाने के लिए जागरूक माहौल बनाने में सहयोग करने लगते हैं। इस लिहाज से हाल में कराए गए स्वच्छ सर्वेक्षण नामक राष्ट्रीय सर्वे के निष्कर्ष अहम हैं। इसमें स्वच्छता के कई मानकों के आधार पर 434 शहरों को रैंकिंग दी गई। मानकों में इस तरह की बातें शामिल थीं, जैसे कि कूड़ा उठाना, खुले में शौच की स्थिति आदि पर लोगों की राय और अनुभव। इस सर्वे का लक्ष्य स्वच्छ भारत मिशन की प्रगति को जानना था। सबसे स्वच्छ शहरों की सूची में मध्य प्रदेश का इंदौर अव्वल रहा। इंदौर नगर निगम ने दावा किया है कि उसने सभी वार्डों के हर घर से कूड़ा उठाने से लेकर उसके निस्तारण तक की व्यवस्था कर ली है। यह बात और सराहनीय है कि इंदौर शहर में जो प्लास्टिक निकलता है, उसका इस्तेमाल सड़क बनाने और मरम्मत में कर लिया जाता है। सर्वे के अनुसार,मध्य प्रदेश का दूसरा शहर और राज्य की राजधानी भोपाल इन स्वच्छ शहरों की सूची में दूसरे नंबर पर रहा। विश्व बैंक के एक अध्ययन में अनुमान लगाया है कि स्वच्छता के अभाव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 6.4 प्रतिशत का नुकसान होता है। स्वच्छ भारत मिशन के शुरू के ढाई साल में स्थिति यह है कि 1,80,000 से अधिक गांव, 130 जिले और तीन राज्यों को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा सका है। अर्थात स्वच्छता अब एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और अधिक से अधिक राज्य खुले में शौच से मुक्त राज्य का तमगा हासिल करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शब्दों में, ‘अगर भारत के लोग कम पैसों में मंगल ग्रह पर पहुंच सकते हैं तो वे अपने मोहल्लों और गलियों को साफ क्यों नहीं रख सकते।’


26 स्वच्छता के दूत

वां

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

स्वच्छता के मोर्चे पर सितारे

अंक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने के लिए कमर कस ली है। मोदी जब से सत्ता में आए हैं उनका लक्ष्य है किसी तरह भारत को स्वच्छ बनाना और बापू के सपने को साकार करना। इसके लिए पीएम मोदी सरकार स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कर चुके लोगों को इसका ब्रांड एंबेसडर बनाया है। चलिये हम जानते हैं कि कौन-कौन ऐसे शख्स हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत का ब्रांड एंबेसडर बनाया है-

अमिताभ बच्चन

पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर अमिताभ बच्चन हैं। कई विज्ञापनों और अभियानों के जरिए वो स्वच्छता का संदेश दे चुके हैं

अनुष्का शर्मा

इसी वर्ष मई में अनुष्का शर्मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान की ब्रांड एंबेसडर बनीं। इस घोषणा के बाद अनुष्का ने ट्विटर पर कहा था- ‘स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनना सम्मान की बात है’

सलमान खान

बॉलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा को भी स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया

शिल्पा शेट्टी पीएम फरवरी 2017 में नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एंबेसडर बनीं थीं

पुलेला गोपीचंद

वीवीएस लक्ष्मण

2015 में ही राष्ट्रीय बैडमिंटन के मुख्य कोच पुलेला गोपीचंद स्वच्छ भारत अभियान के ब्रांड एंबेसडर बने

जनवरी 2015 में क्रिकेटर वीवीएस लक्ष्मण को स्वच्छ भारत का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया

पीएम नरेंद्र मोदी ने अभिनेता सलमान खान को वर्ष 2014 में ‘स्वच्छ भारत’ का ब्रांड एंबेसडर बनाया

प्रियंका चोपड़ा

शिल्पा शेट्टी

सचिन तेंदुलकर

2016 में क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया

दीपिका पादुकोण

दीपिका को भारत सरकार ने स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर शहरी विकास मंत्रालय ने बनाया

कंगना रनौत

भारत सरकार ने एक अक्टूबर 2017 को कंगना को स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया है


अक्षय कुमार

अभिनेता अक्षय कुमार को यूपी सरकार ने अपना स्वच्छता एंबेसडर नियुक्त किया है। वे उत्तराखंड के भी स्वच्छता एंबेसडर हैं। उनकी फिल्म ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ पूरे देश में सराही गई

रितिक रोशन

बॉलीवुड अभिनेता रितिक रोशन भी स्वच्छता मुहिम से जुड़े हैं। उन्होंने सुभाष घई के मीडिया इंस्टीट्यूट व्हिस्लिंग वुड्स में झाड़ू लगाकर सफाई अभियान में योगदान देकर खासतौर पर स्वच्छता का संदेश दिया

सानिया मिर्जा

टेनिस स्टार सानिया मिर्जा भारत को स्वच्छ बनाने में अपना योगदान लगातार दे रही हैं

आमिर खान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आमिर खान को शुरुआती लोगों में नामित किया था। आमिर सामाजिक कार्यों में वैसे भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं

अजिंक्य रहाणे

पीएम मोदी द्वारा टीम इंडिया के स्टार बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे को स्वच्छता मिशन से जुड़ने की अपील को रहाणे ने फख्र जताते हुए स्वीकार किया

विवेक ओबेरॉय

के अवसर पर एक झील के पास झाड़ू लगाकर साफ सफाई की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान में अपना हाथ बंटाया

विद्या बालन

फिल्म अभिनेत्री और मथुरा से भाजपा सांसद हेमा मालिनी स्वच्छ भारत अभियान में खूब हाथ बंटा रही हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शिरकत करने वाले विवेक ओबेरॉय स्वच्छ भारत अभियान में जी-जान से जुटे हैं

कमल हासन मशहूर अभिनेता कमल हासन ने अपने 60वें जन्मदिन

‘जहां सोच वहां शौचालय अभियान’ के जरिए बॉलीवुड अभिनेत्री विद्या बालन ने महिलाअों के बीच स्वच्छता का अलख जगाने में बड़ी भूमिका निभाई है

हेमा मालिनी

काजोल विभिन्न सामाजिक मंचों से बॉलीवुड अभिनेत्री लगातार स्वच्छता का संदेश दे रही हैं

राकेश ओम प्रकाश मेहरा

राकेश की नई फिल्म का नाम है 'मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर' और ये पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान पर आधारित है

राजू श्रीवास्तव

स्टैंड अप कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव अपने कार्यक्रमों में स्वच्छता का संदेश देना नहीं भूलते हैं। हाल में वे दिल्ली स्थित सुलभ ग्राम के दौरे पर भी आए

कपिल शर्मा

हास्य अभिनेता कपिल शर्मा अपने टीवी शो और स्टेज कार्यक्रमों में स्वच्छता का संदेश देना कभी नहीं भूलते हैं


28 स्वच्छता के दूत

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

हास्य अभिनेता बने स्वच्छ भारत के ब्रांड एंबेसडर अभिनेता राकेश बेदी को चंडीगढ़ नगर निगम ने स्वच्छता एंबेसडर बनाने का फैसला किया है

चंडीगढ़ आएंगे, वे खुद लोगों को जागरूक करेंगे।

वां

अंक

स्वच्छता का संदेश देने वाला ऑटोचालक सचिन अपने ऑटो के पीछे डस्टबिन रखते हैं और सवारियों से अनुरोध करते है कि वे कचरा इसी में फेंके

शार्ट फिल्म और स्वच्छता एप्प

एसएसबी ब्यूरो

भाभी जी घर पर हैं’ सीरियल में डैडू का किरदार निभाने वाले वरिष्ठ हास्य अभिनेता डॉ. राकेश बेदी भी अब स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर बन गए हैं। अभिनेता राकेश बेदी को चंडीगढ़ नगर निगम कमिश्नर जितेंद्र यादव ने एंबेसडर बनाने का प्रमाण पत्र सौंपा है। इससे पहले नगर निगम स्वर्गीय हास्य कलाकार जसपाल भट्टी की पत्नी सविता भट्टी को भी ब्रांड एंबेसडर बना चुका है। डॉ. राकेश बेदी का ऑडियो भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत जागरूक करने के लिए रिकार्ड किया गया है। बेदी ने शहरवासियों से सड़क, पार्क और बाजार को साफ रखने की अपील की है। बेदी ने कमिश्नर को आश्वासन दिया है कि जब भी वे

कर चुके हैं।

स्वच्छ भारत मिशन पर चंडीगढ़ नगर निगम एक शार्ट फिल्म तैयार कर रहा है, जिसे सिनेमा हॉल में फिल्म देखने आए लोगों को दिखाया जाएगा। इस समय निगम स्वच्छता एप्प डाउनलोड करवाने के लिए भी अभियान चला रहा है। चंडीगढ़ में अभी तक साढ़े 13 हजार लोग अब तक डाउनलोड

चंडीगढ़ का 8वां स्थान

इस एप के डाउनलोड में चंडीगढ़ का 8वां स्थान है। स्वच्छ सर्वेक्षण में एप्प डाउनलोडिंग और लोगों की फीडबैक का अहम रोल है पिछली बार नगर निगम चंडीगढ़ इसीलिए दूसरे स्थान से गिरकर 11 पायदान पर पहुंच गया था। इस समय नगर निगम ने शहर के पब्लिक टॉयलेट्स को साफ करने का भी अभियान चलाया हुआ है। चंडीगढ़ नगर निगम के अतिरिक्त कमिश्नर सौरभ मिश्रा के मुताबिक, ‘प्रतिदिन 100 से 150 लोगों की शिकायतें स्वच्छता एप्प पर आ रही हैं। चंद घंटों में ही लोगों की दिक्कतें दूर हो रही हैं। यह एप्प शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए काफी मददगार साबित हो रहा है।

एसएसबी ब्यूरो

मिशन की लहर काफी तेजी से देशफैलमेंा हैस्वच्छता । ऐसे में कई नागरिक ऐसे हैं, जो अपने

छोटे-छोटे कदमों से देश को स्वच्छ बनाने की मुहीम में जुट गए हैं। इनमें से एक नोएडा के ऑटो चालक सचिन शर्मा भी है। सचिन ने देश को स्वच्छ बनाने का संदेश लोगों तक पहुंचाने का एक अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला है। नए साल की शुरुआत उन्होंने अपने यात्रियों को रात 12 बजे और सुबह 4 बजे के बीच मुफ्त में उनकी मंजिल तक पहुंचा कर की। पर शर्त ये थी कि यात्रियों को उनसे ये वादा करना था कि वे देश को स्वच्छ बनाने में अपना योगदान देंगे। देश में महिलाओं के प्रति बढती हिंसा की घटनाओं को देखते हुए सचिन अपने यात्रियों से महिलाओं से इज्जत से पेश आने का भी वादा मांगते हैं। सचिन अपने ऑटो के पीछे डस्टबिन रखते हैं और सवारियों से अनुरोध करते है कि वे कचरा इसी में फेंके। मूलरूप से फर्रुखाबाद के पट्टीखुर्द गांव के

रहने वाले सचिन शर्मा ग्रेटर नोएडा के तिगरी गांव में किराए के घर में रहते हैं। एक साल से सचिन एनसीआर में ऑटो चला रहे हैं। इससे पहले वे बाकी ऑटो चालकों की तरह ही ऑटो चलाते थे। पर एक जनवरी से वे ऑटो में डस्टबिन रखकर चलाने लगा। सचिन का कहना है कि स्वच्छता हमारे जीवन में सकारात्मक संदेश देकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसके अलावा सचिन का मानना है कि संगीत का भी हमारे जीवन में काफी महत्व है। इसी वजह से उन्होंने अपने ऑटो में अब म्यूजिक सिस्टम लगवा लिया है और वह सवारी की पसंद के हिसाब से गाने या भजन भी सुनाते हैं। ऑटो पर एक तरफ महिलाओं व माता-पिता के सम्मान से जुड़े स्लोगन भी लिखे हुए हैं। सचिन का कहना है कि अगर रात 12 से सुबह 4 बजे तक उसके घर पर आकर कोई मुसीबत में कहीं चलने को कहता है तो वे मना नहीं करते हैं। रात के समय सफर कर रहे शख्स से वे पैसे भी नहीं लेते हैं। स्टैंड पर खड़ा करने से विवाद के कारण सचिन ऑटो लेकर घूमते रहते हैं और जो भी सवारी मिल जाए उसको अपना नंबर दे देते हैं। ऐसे में सचिन के ऑटो की अधिकतर बुकिंग फोन से हो जाती है। सचिन ने अपने ऑटो से घर बैठे बुक कराने वाले जुगनू एप से अनुबंध करा रखा है। सचिन के इस बेहतरीन पहल के बारे में सुनके अधिकारियों ने उन्हें सम्मानित भी किया है।

तीसरी कक्षा की छात्रा कानपुर की ब्रांड एंबेसडर जो लोग छतों से कूड़ा सीधे सड़क पर फेंक देते हैं उनके लिए नौ साल की पावनी ने स्वच्छता की नजीर पेश की है

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एसएसबी ब्यूरो

सरी कक्षा की छात्रा पावनी कानपुर में स्वच्छता की ब्रांड एंबेसडर बन गई। नगर आयुक्त अविनाश सिंह ने उसे इसका प्रमाण पत्र सौंपा। पावनी की मां सीता सिंह ने कहा, ‘यह हमारे लिए गौरव की बात। कभी सोचा भी नहीं था कि बच्ची की सफाई के प्रति समझ और रोजाना की आदत उसे ब्रांड एंबेसडर बना देगी।’ जो लोग छतों से कूड़ा सीधे सड़क पर फेंक देते हैं उनके लिए पनकी गंगागंज की नौ साल की पावनी

ने स्वच्छता की नजीर पेश की है। दो नवंबर को नगर निगम की टीम ने पावनी को टैंकर में ले जाकर कूड़ा डालते हुए देखा था। उसी दिन नगर आयुक्त ने ऐलान कर दिया था कि इस बच्ची को ही ब्रांड एंबेसडर बनाया जाएगा। कुछ औपचारिकताएं जरूरी थीं और परिवार के बारे में भी जानकारी एकत्र करनी थी। अंतत: पावनी को उसके पिता जितेंद्र सिंह, मां सीता सिंह के साथ नगर आयुक्त के कैंप कार्यालय बुलाया गया और पावनी को कानपुर में स्वच्छता के ब्रांड एंबेसडर का प्रमाण पत्र सौंपा गया।

मिसाल हैं ऐसे बच्चे

कानपुर के नगर आयुक्त अविनाश सिंह ने पावनी को उपहार भी भेंट किया और कहा कि ऐसे बच्चे ही देश को स्वच्छ बनाएंगे। पावनी को देखकर लगा कि अब बच्चे भी स्वच्छता को लेकर जागरूक हुए हैं। यही बच्चे अभिभावकों को बताएंगे कि कूड़ा सड़क पर नहीं फेंकना चाहिए। पावनी की फोटो अब नगर निगम की हर होर्डिंग में लगेगी। मां सीता सिंह कानपुर देहातद के सरवनखेड़ा के मॉडल स्कूल में अध्यापिका हैं। उनका कहना है कि पावनी घर में सफाई को लेकर तो जागरूक रहती ही है, घर में

एक बूंद भी बर्बाद नहीं होने देती। कहती है कि पानी बचाने पर ही भविष्य में पानी मिलेगा। पिता जितेंद्र सिंह एलआईसी के एजेंट हैं। वे कहते हैं कि नहीं पता था कि पावनी की यह आदत से ब्रांड एंबेसडर बना सकती है।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

'स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय' के पोस्टर पर दिखने वाली रश्मि दिल्ली में किराए के घर में रहती है

70 वर्षीय महिला हेल्गा संधु घर से दो किलोमीटर दूर तक रोज सड़क से कूड़ा-कचरा उठाती हैं

है। रश्मि डिफेंस कॉलोनी के प्रतिभा निगम स्कूल में पांचवीं की छात्रा है।

ऐसे बनी पोस्टर गर्ल

रा

जधानी दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में पीले रंग की शानदार कोठी में मालिक और नौकर के संबध को नई ऊंचाई मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी मिशन 'स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय' की ब्रांड एंबेसेडर यहीं रहती है। कोठी के अंदर दाखिल होते हुए जब किचन के रास्ते गोल घूमती सीढ़ियां से हम दूसरे तले पर पहुंचे, तो पता चला की रश्मि नायक अपने दो भाई के साथ इसी छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में रहती है।

पांचवीं की छात्रा

उसके पिता दिवाकर नायक 20 साल पहले ओडिशा से दिल्ली आए और तब से इसी कोठी में काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि कोठी की मालकिन सोनिया पांढी ने ही उन्हें परिवार लाने और बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। साफ-सुथरे रहने की कोशिश का नतीजा है कि रश्मि को ब्रांड एंबेसेडर बनाया गया

क छोटा सा हादसा भी इंसान को तोड़कर रख देता है, लेकिन आगरा के पावस नगरिया गांव की एक बेटी का साहस सबको सीख देने वाला है। मुश्किल समय में खुद को संभालते हुए कल्पना ने जो कर दिखाया है वो हर किसी के बस की बात नहीं है। खुद की ही शादी के दौरान हुए सड़क हादसे में भाई समेत 15 परिजन की मौत हर किसी को हिला कर रख देती है, लेकिन उसने साहस दिखाते हुए ससुराल पंहुचते ही शौचालय बनवाकर इतिहास रच दिया और बन गई ब्रांड एंबेसडर। हुआ ऐसा कि 5 मई को कल्पना की लगुन लेकर उसके परिवार वाले एटा के नगला लाल सिंह गांव गए थे। जब उसके परिवार वाले वहां से वापस लौट रहे थे

डॉक्टर बनने की चाह

भले ही रश्मि को इस ब्रांड एंबेसेडर बनने के बाद कोई आर्थिक फायदा न हुआ हो, लेकिन गरीब की इस बेटी का मनोबल आसमान पर है, जिसके दम पर वह मुस्कुराते हुए हमसे डॉक्टर बनने की बात कहती है।

दुल्हन ने दिखाया जज्बा बन गई ब्रांड एंबस े डर

तो सड़क हादसे में भाई समेत 15 परिजनो की मौत हो गई। 9 मई को गमगीन माहौल में उसकी शादी हुई और कल्पना अपने ससुराल नगला लाल सिंह आई। इतनी बड़ी घटना के बाद खुद को सभांलते हुए जो उसने कर दिखाया वो तारीफ के काबिल है। वहां आकर उसने देखा कि उसके ससुराल में शौचालय नहीं है तो वो इस बात से उदास हो गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। शादी के अगले दिन डीएम अमित किशोर ने हाल चाल पूछने के लिए उसे फोन किया तो उसने ससुराल में शौचालय ना होने की बात बताई। उसके बाद डीएम अमित किशोर नगला लाल सिंह पहुंचे और शोचालय बनवाने में उसकी मदद की। डीएम कल्पना की ससुराल में शौचालय निर्माण की इस शुरुआत को देखकर बहुत खुश हुए। उसके बाद उन्होंने शौचालय बनवाने में उसकी मदद की। कल्पना के इस साहस को देखकर डीएम द्वारा उसे 'स्वच्छ भारत मिशन' का ब्रांड एंबेसडर भी घोषित कर दिया।

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70 वर्षीय पर्वतारोही दे रही स्वच्छता का संदेश

नौकर की बेटी बनी ब्रांड एंबेसेडर

'स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय' के पोस्टर के लिए एक अदद चेहरे की तलाश शुरू हुई। निगम के बहुत सारे स्कूलों में सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर से फोटो ली गई, लेकिन इनमें रश्मि नायक के फोटो को चुना गया। रश्मि की फोटो जब बड़े पोस्टर और बैनर में छपनी शुरू हुई, तो निगम ने इस लड़की की तलाश शुरू की। फिर पता चला कि डिफेंस कॉलोनी के निगम स्कूल में रश्मि पढ़ती है। इसके बाद दक्षिणी दिल्ली नगर निगम ने रश्मि को 'स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय' का ब्रांड एंबेसेडर बनाया। रश्मि ने भी ब्रांड एंबेसेडर बनने के बाद बिना फोटो वालों को बुलाए कोठी के पीछे की सड़क को अपने पिता की मदद से साफ कर डाला। वह कहती है कि अपने भाइयों के साथ साफ-सुथरे तरीके से स्कूल जाना उसकी आदत में शुमार है। अब वह दूसरे बच्चों को साफ रहने और स्कूल को स्वच्छ रखने की कोशिश करेगी।

स्वच्छता के दूत

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एसएसबी ब्यूरो

धानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान चलाने के बाद स्वच्छता का कार्य और संदेश देने वालों में लोकप्रिय और बड़े नाम तो शामिल हैं ही, कई लोग इस कार्य को निजी लगन के साथ खामोसी के साथ भी कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में सोलन जिले के सुबाथू की 70 वर्षीय महिला हेल्गा संधु और छावनी परिषद की अधिशासी अधिकारी तनु जैन रोजाना इस अभियान को सफल बनाने में जुटी हैं। सुबह की सैर के दौरान वे घर से दो किलोमीटर दूर तक सड़क से कूड़ा-कचरा उठाती हैं।

हेल्गा संधु तो 30 वर्षों से छावनी को स्वच्छ बनाने में जुटी हैं। हेल्गा संधु मूल रूप से जर्मन की पर्वतारोही हैं। उन्होंने पर्वतारोही कर्नल बीएस संधु से विवाह किया। इसके बाद से वे सुबाथू के मशहूर बेंबो लॉज में ही रहती हैं। उनके पति कर्नल बीएस संधु अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हो चुके हैं। कुछ वर्ष पहले सड़क दुघर्टना में हेल्गा पति कर्नल बीएस संधु को खो चुकी हैं। इसके बावजूद उनका पर्यावरण से प्रेम जारी है। वे रोजाना सुबह सड़क पर पड़ा कूड़ा कचरा एक बोरी में एकत्रित कर घर के आंगन में गड्ढे में नष्ट करती हैं। स्वच्छ भारत का सपना ईमानदारी से पूरा करने में लगी हेल्गा संधु पर्यावरण के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य कर रही हैं। छावनी अधिशासी अधिकारी तनु जैन का कहना है कि संधु स्वच्छता अभियान के प्रति अहम भूमिका निभा रही हैं। जैन ने बताया कि उनका एक बेटा भी इसी काम में जुटा है। वह गंगा प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। कर्नल संधु परिवार का स्वच्छ भारत का प्रयास काबिल-ए-तारीफ है। जल्द ही मिसेज संधु को सुबाथू छावनी स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर का दर्जा देगी।

चार वर्षीय लक्ष्मी उत्तराखंड में स्वच्छता की ब्रांड एंबेसडर

स्वच्छता के प्रति चार वर्षीय बच्ची की प्रतिबद्धता ने सबको किया प्रभावित

लिन कही जाने वाली ढोलक बस्ती निवासी नन्हीं लक्ष्मी हल्द्वानी नगर निगम की स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर बनी है। इस वर्ष सरदार पटेल की जयंती पर चार वर्ष की लक्ष्मी ने जो मिसाल कायम की, उसके बल पर उसे यह पहचान मिली। रामलीला मैदान में चल रहे पटेल जयंती के कार्यक्रम में राष्ट्रगान हो रहा था। सभी को खड़े देख लक्ष्मी भी कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई। बाद में लक्ष्मी ने केला खाया और छिलका डस्टबिन में डाल दिया, जबकि आयोजन में एकत्र कई बड़े लोगों ने केले के छिलके और पानी की खाली बोतलें यहां-वहां फेंक दी।

लक्ष्मी की गतिविधि को देख रहे एडीएम और नगर आयुक्त हरबीर सिंह बाद में संबोधन के लिए मंच पर पहुंचे तो लक्ष्मी से सीखने की अपील की। तभी लोगों ने अपने खाए केले के छिलके उठाकर डस्टबिन में डाले। नगर आयुक्त ने सिंह ने लक्ष्मी के लिए नए कपड़े, चप्पल मंगाए और घोषणा की कि वह नगर निगम की स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर होगी। लक्ष्मी को दो हजार रुपए नकद पुरस्कार देकर वाहन से घर तक छोड़ा गया। सिंह ने कहा, ‘मुझे उम्मीद है इससे शहर के लोग सीख लेंगे और हल्द्वानी को साफ और स्वच्छ बनाने में सहयोग करेंगे।’


30 स्वच्छता के समूह

वां

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

अंक

आधी दुनिया, पूरी जिद स्त्री-पुरूष अनुपात में पिछड़े जिलों में शुमार ग्वालियर में महिलाअों ने स्वच्छता की नई इबारत लिखी है शौच से मुक्त कर दिया

‘वानर सेना’ की सीटी इंदौर के चार गांव को बच्चों की वानर सेना ने खुले में शौच से मुक्त कर दिया

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एसएसबी ब्यूरो

धानमंत्री नरेंद्र ने जो स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया है उसको देशवासी अलग-अलग तरीके से अमल में ला रहे हैं और दूसरों को स्वच्छ रहने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। हर किसी को स्वच्छ रहना है और हर किसी को अपने आस पास में इसके लिए जागरूकता फैलानी है। जाहिर है यह एक मिशन है इसीलिए उम्र आड़े नहीं आती। ‘रामायण’ में वानर सेना के कारनामे खूब मशहूर हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में करीब 10,000 बच्चों की वानर सेना के मायने अलग हैं और इन नौनिहालों ने गांवों में खुले में शौच की प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाने के मुहिम में अनोखी भूमिका निभाई है। इंदौर के जिलाधिकारी पी. नरहरि ने देपालपुर क्षेत्र में खुले में शौच से मुक्त हुए चार गांवों के निरीक्षण के बाद बताया, ‘खुले में शौच से मुक्ति के अभियान में पांच से लेकर 12 वर्ष की उम्र के करीब 10,000 बच्चों की टोलियों का अहम योगदान रहा है। हमने इन टोलियों में शामिल बच्चों की नटखट हरकतों के चलते इन्हें 'वानर सेना' का नाम दिया है।’ स्वच्छता के प्रति समर्पित इन बच्चों ने जिले के हर गांव में 20 से 30 बच्चों की टोलियां बनाकर इन्हें ‘वानर सेना’ से जोड़ा। फिर गांवों में उन स्थानों की पहचान की, जहां लोग खुले में शौच के लिए जाते

थे। इन स्थानों की ओर जाने वाले रास्तों पर बच्चों की टोलियों को तैनात हो गईं। जब इन बच्चों ने खुले में शौच के लिए जा रहे लोगों के सामने बार-बार सीटी बजाई, तो इन लोगों ने शर्मिंदगी महसूस की और पक्के शौचालयों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। जिलाधिकारी पी. नरहरि ने बताया, ‘वानर सेना में शामिल कुछ नटखट बच्चे ऐसे भी थे, जो खुले में शौच के लिए जा रहे लोगों के हाथ से मग या डिब्बे छीनकर इनका पानी नीचे गिरा देते थे। इससे इन लोगों को उल्टे पैर घर लौटना पड़ता था।’ उन्होंने बताया कि जिले की 312 ग्राम पंचायतों के 610 गांवों के लगभग सभी घरों में पक्के शौचालयों का इस्तेमाल शुरू हो चुका है। पहले तो खुले में शौच करने वाले लोगों को वानर सेना की हरकतें अजीब लगती थीं। लेकिन जब उन्हें समझ में आया कि दरअसल ये बच्चे लोगों के स्वास्थ्य के लिए ही ऐसा कर रहे हैं, तब उन्हें समझ में आने लगा कि ऐसा करना गलत है। धीरे-धीरे खुले में शौच करने वाले लोगों ने इसे चलन में लाना शुरू किया। और आज आलम यह है कि जल्द ही पूरे इंदौर को खुले में शौच की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने लगा है। खुले में शौच के लिए जब लोगों को वानर सेना ने सीटी बजाकर रोकने का काम किया तो लोगों ने इनसे एक सवाल किया कि आखिर वो शौच के लिए कहां जाएं? घर में शौचालय तो है नहीं। इस मौके पर ज़िला प्रशासन सामने आता और उन परिवारों को अनुदान देने का काम करता। लोगों को अनुदान मिलने लगा और ज़िला प्रशासन के साथ मिलकर चलाए जा रहे वानर सेना की मुहिम रंग लाने लगी। देखते ही देखते पिछले चार महीने में जिले में 25000 से अधिक शौचालय बनवाए गए हैं, जबकि 15000 शौचालय अन्य संसाधनों से बनवाए गए हैं। पुरानी कहावत है कि देर-सबेर लोगों को बात समझ में आती है पर उसके लिए जरूरी है उन्हें उनके हिसाब से समझाना, रोकना और उसके साथ ही एक विकल्प भी देना। इंदौर में वानर सेना की सीटी जब खुले में शौच करने वालों को रोक सकती है तो तय मानिए देश में भी स्वच्छता अभियान के लिए उठाए जा रहे कदम कारगर साबित होंगे। इंदौर में वानर सेना बनाकर बच्चों का स्वच्छता मुहिम से जुड़ने की मिसाल इस मायने में भी बड़ी है कि इससे यह जाहिर होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर शुरू हुए राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के साथ न सिर्फ देश के तमाम हिस्सों की महिलाएं और पुरुष ही जुड़े हैं, बल्कि इस मुहिम में बच्चे भी शामिल हो रहे हैं और अपनी तरह से कारगर भूमिका निभा रहे हैं।

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एसएसबी ब्यूरो

वन की आखिरी दहलीज पर खड़ी जेबो बाई ने शौचालय बनवाने के लिये बकरियां बेच दीं तो विधवा महिला पांचो बाई ने अपनी भैंस। गीता बघेल की शौचालय बनाने की जिद जब पिता ने पूरी नहीं की तो वह खुद फावड़ा लेकर गड्डा खोदने जुट गई और पिता को शौचालय बनवाने के लिये विवश होना पड़ा। इन सभी से और आगे सपना परिहार की पहल है, जिन्होंने न केवल खुद की ग्राम पंचायत बल्कि समीपवर्ती आधा दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतों को खुले में शौच मुक्त कराया है। ग्वालियर जिले की ऐसी ही अन्य महिलाओं ने स्वच्छता प्रेरक बनकर सम्पूर्ण जिले को खुले में शौचमुक्त जिला बनाने में अहम भूमिका निभाई है। ग्वालियर जिले की जनपद पंचायत भितरवार के ग्राम किशोरगढ़ निवासी श्रीमती जेबो बाई जीवन के लगभग 100 बसंत देख चुकीं हैं। उन्होंने गांव में सबसे पहले स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय का निर्माण कराया। शौचालय का काम शुरू करने के लिये उन्होंने अपनी बकरियां तक बेच दीं। इस मिशन में उनके पति बच्चू सिंह का भी उन्हें पूरा सहयोग मिला। इसी तरह बागवाला गांव में जब शौचालय बनवाने पर चर्चा चल रही थी, तब गांव की एक विधवा महिला श्रीमती पांचो बाई खड़ी हो गईं और बोली आप सब बहस करो, हम अपनी भैंस बेचकर शौचालय बनवायेंगे। उन्होंने ऐसा किया भी। इन दोनों महिलाओं के प्रोत्साहन से उनके गांव के हर घर में शौचालय बन गए हैं। ग्राम देवगढ़ की कुमारी गीता बघेल ने भी शौचालय बनवाने की जिद पकड़ ली। मगर उसके पिता इस ओर ध्यान नहीं दे रहे थे। गीता यहीं नहीं रूकीं, उसने स्वयं फावड़ा उठाया और शौचालय के लिये धीरे-धीरे गड्डा खोद डाला और पिता को पक्का शौचालय बनवाने के मजबूर होना पड़ा। ग्राम ररूआ निवासी सपना परिहार की कहानी सबसे अधिक प्रेरणादायक है। गांव की इस बालिका ने ‘स्वच्छता समग्र जागृति’ नाम से एक प्रेरक दल बनाया और हर घर में शौचालय की सफल कहानी लिख दी। सपना ने पहले अपनी ग्राम पंचायत को शौच मुक्त किया। फिर उसके बाद समीपवर्ती चीनौर, किशोरगढ़, पुरी व ररूआ सहित लगभग एक दर्जन ग्राम पंचायतों को खुले में शौच मुक्त करा दिया। शौचालयों का उपयोग भी हो, इसके लिये सपना समय-समय पर तड़के 4 बजे से अपनी सहेलियों के साथ फॉलोअप के लिए भी निकलती हैं। इन जागरूक महिलाओं के चर्चे ग्वालियर जिले के ग्रामीण अंचल की चौपालों में प्रमुखता से छाए रहते हैं। ऐसे प्रेरकों के समर्पण और अथक मेहनत की बदौलत ही ग्रामीण स्वच्छता में ग्वालियर जिला देश के अव्वल जिलों में चयनित हुआ है। स्त्री-पुरूष अनुपात में पिछड़े जिलों में शुमार ग्वालियर जिले में इन महिला प्रेरकों ने महिला सशक्तिकरण की नई इबारत लिखी है। प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छता का संदेश दिए जाने के बाद ग्वालियर जिले के गांव-गांव की चौपाल पर भी शौचालय बनवाने की चर्चा आम थी। कोई कहता फसल बिके तब घर में शौचालय बनवाऊँ तो किसी का कहना था कि सरकार की आर्थिक मदद आए तब शौचालय का निर्माण शुरू करूँ। घर में शौचालय न होने से सबसे ज्यादा कष्ट जाहिर तौर पर महिलाओं को उठाना पड़ता है। जब हर घर में शौचालय की बातें गांव की महिलाओं ने सुनीं तो उनके मन में उम्मीद की किरण जागी। गांव के पुरूष अभी इसी उधेड़बुन में थे कि शौचालय का निर्माण कैसे शुरू करूँ, तभी गांव की कुछ महिलाओं ने ऐसी मिसाल कायम कर दी कि एक घर में क्या गांव के सभी घरों में शौचालय बन गए और ग्वालियर जिला अब खुले में शौचमुक्त जिला है।


27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

बचपन का संदेश

स्वच्छता की कहानी

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स्वच्छता पर संदेश देने में देश का बचपन भी किसी से पीछे नहीं है। यहां प्रस्तुत है बच्चों द्वारा स्वच्छता पर लिखी गई चार कहानियां, जिससे बच्चों की रचनात्मकता का तो पता चलता ही है, इससे स्वच्छता अभियान को लेकर उनकी भावनाएं भी प्रकट होती हैं

लड़की का मैजिक

दीक्षा क गांव में एक लड़की थी। वह सोचती थी, ‘काश मेरे पास मैजिक होता, तो मैं मेरे गांव में जितने भी गरीब लोग हैं, उन्हें भी संपन्न आदमियों की तरह बना देती।’ यह बात वह हमेशा अपने मन में लिए रहती। एक दिन उसे एक आइडिया मिला और उसमें उसने अपने मन की पूरी बात लिखने को सोचा और उसने पेन लिया और कागज लिया और उस पर उसने अपने मन की बात लिखी। तभी उसकी सहेली ने पूछा, ‘तुम क्या लिख रही हो।’ उसने कहा, ‘कुछ नही।’ ...और वह चली गई। वह लड़की अपनी लिखी बात को अच्छे से समझकर सरपंच के पास गई। फिर उसे सरपंच से कहा, ‘हमारे गांव में जो भी गरीब लोग हैं, उनके राशन फ्री कर दें, तो आपको वो हर बार वोट देते रहेंगे। फिर आप ऐसे ही हर बार कुछ करवाते रहेंगे, तो आप बहुत महान सरपंच बन जाएंगे और आपकी इज्जत बनी रहेगी।’ लड़की की बात सरपंच को पसंद आई। लड़की के कहने से सरपंच ने वैसा ही किया और गांव के जो गरीब लोग थे, उनके पक्के घर बन गए और उनके घर शौचालय भी बन गए और सड़क भी बन गई। उस लड़की के पास मैजिक न होने के बावजूद भी उसने अपने गांव को अपनी समझदारी से खुशहाल बना दिया।

रानी क गांव में एक लड़की रहती थी। उसके गांव के स्कूल में खेलने का ग्राउंड नहीं था। एक दिन जब वह घर आई, तो बहुत उदास हो गई। मम्मी-पापा ने पूछा - बेटी क्या हुआ? लड़की ने कहा - पापा हमारे स्कूल में खेल के लिए ग्राउंड नहीं है, हम कहां खेलें? एक दिन उसे एक बात याद आई। उसके गांव में बाल सूचना पटल लगा हुआ था, जिस पर बच्चों को अपनी समस्याएं लिखनी होती है। उसे पढ़कर सरपंच काम करा सकते हैं। ...और लड़की ने पापा से कहा - पापा अगर हम अपनी बात गांव के सूचना पटल पर लिख दें, तो ग्राउंड बन सकता है। पापा कहने लगे - बेटा ऐसे कुछ नहीं होता है, अगर ऐसा हो तो हम अपने गांव की हर समस्या का सुधार निकाल सकते हैं। लड़की ने कहा - पापा ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ, पर मैं अब अपने गांव में सुधार लाउंगी। अगले दिन सुबह वह अपने साथियों के पास गई और कहा - हम अपने गांव की समस्या सूचना पटल पर लिखें। उसने साथियों के साथ जाकर सूचना पटल पर अपनी समस्या लिखी, तो कुछ बच्चों ने मिटा दिया। पर उन्होंने उसी समस्या को दोबारा लिखा और तब तक लिखा, जब तक समस्या हल नही हो गई। सूचना पटल पर गांव के बच्चों की हर समस्या लिखी गई और रोड बनवाया, नाली बनवाई, नाली को ढककर रखा गया, स्कूल में ग्राउंड बनवाया, स्कूल में शौचालय बनवाया, पानी के लिए हैंडपंप लगवाया। इस प्रकार लड़की अपने काम में सफल रही।

गांव के बच्चे

सूचना पटल का कमाल

अरविंद क गांव था। उस गांव में बहुत गंदगी थी। गांव के रास्ते में कीचड़ था। खेल का मैदान भी बहुत गंदा था। वहां कचरा पड़ा हुआ था। उस गांव के बच्चों ने एक दिन योजना बनाई कि हम अपने गांव को साफ-सुथरा बनाएंगे। उन्होंने तय किया कि अगले दिन जल्दी उठकर अपने गांव को साफ-सुथरा बनाएंगे। अगले दिन सभी बच्चे गेती व फावड़े लेकर गली में पहुंच गए। बच्चों ने काम करना शुरू कर दिया। जहां रूका हुआ पानी था, वहां नालियां बना दी। खेल के मैदान में जो गढ्ढे थे, उनमें मिट्टी डाल दी। गांव के लोगों ने बच्चों को काम करते हुए देखा, तो वे भी काम करने लग गए। गांव की पूरी सफाई हो गई, अब उनका गांव साफ व सुंदर बन गया।

जब गिरे, तब अक्ल आई

अरशद क बार की बात है। बच्चे मैदान में खेल रहे थे। कीचड़ होने के कारण किसी बच्चे का पैर फिसल गया और उसके पैर में चोट लग गई। बच्चों ने इस घटना के बारे में सरपंच को बताने का निर्णय किया। उन्होंने सरपंच को सारी बात बताई किंतु सरपंच ने कोई मदद नहीं की। एक दिन सरपंच उसी रास्ते से गुजर रहा था। उसका पैर फिसल गया और उसे भी चोट आई। बच्चों ने कहा कि सरपंच साहब यदि उस दिन आपने हमारी बात मान ली होती, तो आज यह नौबत नहीं आती। फिर सरपंच ने गांव की सारी गलियों एवं मैदान से कचरा एवं कीचड़ को साफ करवा दिया।


32 स्वच्छता का संदेश

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

27 नवंबर- 03 दिसंबर 2017

शार्ट फिल्म, बिग मैसेज

स्वच्छता को एक देशव्यापी मुहिम बनाने में उन फिल्मकारों ने भी बड़ा रोल निभाया है, जिनकी इस विषय पर बनाई गई शार्ट फिल्में सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों पर काफी सराही गई हैं

इरा टाक

इरा टाक द्वार ा जिसमें एक छोट लिखित व निर्देशित शार्ट फि भारत अभियान ा बच्चा अपने चाचा को सफ ल्म 'इवन द चाइल्ड नोज' ाई ह सेकंड की इस पर आधारित यह फिल्म यू ट् का सबक सिखाता है। स्व ै, च फिल्म की इस ्छ यूब पर उपलब्ध फि से सर्टिफिकेट ऑफ एक्सील ल्म को सूचना और प्रसारण है। दो मिनट 23 ेंस से नवाजा ग विभाग की तर या है फ

राखी रॉय ा को ाईं हैं। स्वच्छत हती न ब ी भ ें ्म ल ीक ॉर्ट फि रॉय ने कई श वे पुरस्कृत हो चुकी हैं। राख मोदी के ी ाख र ी क ा े लिए पीएम कोलकात शार्ट फिल्म क े लिए मुहिम शुरू की। मुझे छोटी छोटी क ए ी न प अ क ी ही लेकर ने स्वच्छ भारत त के लिए ऐस ैंह, ‘पीएम मोदी ी प्रेरणा मिली। स्वच्छ भार से ह इस अभियान रत है।’ रू कोशिशों की ज

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सत्येंद्र त्रिपा

्ट ारत पर शॉर भ ्छ च ्व स न ान फर के दौर के स्वच्छ भारत मिश स ें म ल ोक ी ो मुंबई ल पीएम मोद ़ी फिल्में बनाते रहे हैं। क द्र ें ी ाठ त्य प स त्रि ा। आय की े जुड सत्येंद्र े का विचार सामाजिक मुद्दों स त हो चुकी है। सत्येंद्र ान न ब ्म ल द्र ें ्कृ फि त हैं। सत्य ्ट फिल्म पुरस से भी प्रभाविलेकर उनकी एक शार ा सबक देती है ो स्वच्छता क ें एक बच्ची स्वच्छता क म इस फिल्म

महेश ठुम्मर सूरत के रह ने वाले मह करते हैं। म ेश ठुम्मर स ह ोश काम करने ेश पीएम मोदी की स्व ल मीडिया के लिए व फिल्म काफ ाली सेविका तारा मौस च्छ भारत मुहिम के स फिल्म का निर्माण म ी जो काम ब सराही गई। ठुम्मर क ी के किरदार को लेकर र्थक हैं। स्कूल में हत चपन में सीख ब ते हैं उस क े हैं, 'मेरी फिल्म के केंद्र नाई उनकी शार्ट ाम को बड़े होने तक अ में बच्चे हैं। बच्चे पनाते हैं।'

कौशिक परमार

कौशिक परमार सूरत क हैं। वे पर्यावरण, स्वास्थ े रहने वाले हैं और इंजीनियरिंग कंपनी स ेज ्य और सुरक्षा के मुद् दों पर काम करते हैं। स्व ुड़े भारत के लिए बनाए गए च्छ खासतौर पर स्कूली ब उनके कैलेंडर और फिल्में काफी सराही गई च्चों पर स्वच्छता को ल हैं ेकर उनकी एनिमेटेड फि । काफी पसंद की गई ल्म

यकवाड

गा गिरीश कांत

क सरोकार ाजि ाम स े स ालों रिश रीश दस स काम कर रहे हैं। गि ल्म गि े ाल व े न े रह ्ट फि ों पर के सागर क क और शॉर्ट फिल्म उन्हें इस मुद्दे पर शॉर भिनय श े द प्र ्य ध े म थियेटर, नाट ीरियल में अ ता मिशन स के मुद्दे पर पीएम मोदी के स्वच्छ फिल्मों और टीवी स ई कहते हैं कि रणा मिली। गिरिश क प्रे बनाने की े हैं भी कर चुक

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 50

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 50)  
सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 50)  
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