Skip to main content

KAIDI MAHILAON KE BACCHON KI SHAIKSHIK STHITI KA ADHYAYAN

Page 1

Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2016 = 6.17, www.srjis.com UGC Approved Sr. No.45269, SEPT-OCT 2017, VOL- 4/36 10.21922/srjis.v4i36.10023

कै दी महहलाओ ं के बच्चों की शैहिक हथिहि का अध्ययन उषा वामनराव चिकाटे 1 & गोपाल कृष्ण ठाकुर2 1 एम. फिल.- फिक्षािास्त्र, म. गा.ां अां.फह.ां फि. फि., िधा​ा-442001(महाराष्ट्र) 2सह आचाया – फिक्षा फिभाग, म. गा.ां अां.फह.ां फि. फि., िधा​ा-442001(महाराष्ट्र)

प्रस्तुत िोध पत्र भारतीय सांदभा में कै दी मफहलाओ ां की फस्थफत, फिफभन्न प्रकार के अपराधों में उनकी सांफलप्तता की फस्थफत एिां सांभाफित कारणों का फिश्लेषण करने की चेष्टा करता है. यह िोध पत्र बच्चों की फिक्षा एिां उनके व्यफित्ि के फिकास में उनकी माता की भफू मका को रे खाफां कत करते हुए उन बच्चों की ओर ध्यान आकृ ष्ट करने की चेष्टा करता है फजनकी माताएँ फिफभन्न अपराध में कै द में हैं. भारत में मफहलाओ ां की साक्षरता की फस्थफत का कालक्रमानसु ार उल्लेख करते हुए इस आलेख में फिक्षा एिां जीिनयापन की फिफभन्न फिधाओ ां में मफहलाकफमायों के फनरािाजनक प्रफतफनफधत्ि का तथ्यात्मक फि​िरण प्रस्तुत फकया गया है फजसके आधार पर सांकल्पनात्मक रूप से यह स्थाफपत करने का प्रयत्न फकया गया है फक भारतीय समाज अपने फिकास एिां उत्तरआधफु नकता के अकादफमक ि सैद्ा​ांफतक प्रभाि के बािजदू अभी भी मफहलाओ ां को बराबरी का दजा​ा नहीं पाया है. प्रस्तुत आलेख अफिक्षा एिां िोषण के पररणामस्िरूप उत्पन्न मफहलाओ ां की कांु ठा का आक्रामकता में रूपा​ांतररत होने की प्रफक्रया को मफहला अपराध के प्रमख ु कारण के रूप में देखते हुए उनके बच्चों की फिक्षा के प्रफत उनकी जागरूकता पर ध्यान देने की आिश्यकता को रे खाफां कत करता है. फिफभन्न िोध अध्ययनों एिां बाल सरां क्षण एिां फिकास हेतु सचां ाफलत फिफभन्न सरकारी ि गैर-सरकारी योजनाओ ां का उल्लेख करते हुए इस िोध पत्र के द्वारा यह फसद् करने का प्रयत्न फकया गया है फक यह एक महत्िपणू ा सामाफजक उत्तरदाफयत्ि है फक हाफिये पर पड़े हुए उन बच्चों की तरि ध्यान देते हुए, फजनकी माताएां फिफभन्न कारणों से कै द में हैं, उनकी फिक्षा के सबां ांध में तथ्यपरक जानकारी एकफत्रत की जाए. उनकी पररफस्थफतयों के यथाथा का व्यािहाररक आकलन करते हुए यथोफचत नीफतयाँ बनायी जाए फजससे फक उनके जीिन पर सकारात्मक प्रभाि डाला जा सके एिां उन बच्चों को उफचत फिक्षा प्रदान करने की व्यिस्था करते हुए उन्हें नयी फदिा दी जाए. जब हम कहते है फक सभी बच्चे हमारे देि का भफिष्ट्य हैं, तो हमारी यह फजम्मेदारी बनती है फक हम इन बच्चों को अच्छी फिक्षा दें और उन्हें देि तथा समाज में अपनी सकारात्मक भफू मका फनभाने के फलए तैयार करे . प्रमुख प्रत्यय/शब्दावली: कै दी मफहलाएां, कै दी मफहलाओ ां के बच्चों की फिक्षा, कै दी मफहलाएँ ि उनके बच्चों का सामांजस्य, मफहला अपराधी एिां उनकी िैफक्षक आका​ांक्षाएां, कै दी मफहलाओ ां की िैफक्षक जागरूकता Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com

प्रथिावना यह एक स्थापित तथ्य है पक भारतीय समाज मख्ु यतः एक िरु​ु ष प्रधान समाज है पजसमें कुछ ऄिवादों को छोड़कर मपहलाएँ प्रायः ऄधीनस्थ की भपू मका में रहती हैं. ईनसे यह ऄिेक्षा की जाती है पक वे ऄिने जीवन, िररवार एवं समाज से संबंपधत सभी मद्दु ों िर िरु​ु षों द्वारा पलए गए पनणणय से ऄिनी सहमपत व्यक्त करें एवं ईन पनणणयों को पबना पकसी तकण , सोच ऄथवा पचंतन के स्वीकार करें . एक स्वतंत्र ऄपस्तत्व के रूि में मपहला की पस्थपत ऄभी भी देश के व्यािक भ-ू भाग में प्रतीकात्मक मात्र ही है. यद्यपि वतणमान समय में ख़ास कर शहरी जन समदु ाय में, पवशेषतः महानगरों में, मपहलाओ ं की स्वतंत्र ऄपस्मता पवपभन्न माध्यमों से िररलपक्षत होती हैं और जीवन के पवपभन्न Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4743 (Pg. 6742-6753)

कायणक्षेत्रों में मपहलाओ ं ने ऄिने ईत्कृ ष्ट कायणशल ै ी से ऄिनी पवपशष्ट िहचान बनाइ है; तथापि यह संख्या देश की जनसँख्या के ऄनिु ात में ऄत्यंत कम है. व्यािक जन समदु ाय में ऄभी भी मपहलाओ ं के पवकास की पस्थपत िरु​ु षों की तल ु ना में कम है. यह ठीक है पक एक तरफ देश की स्वतंत्रता के बाद मपहलाओ ं की साक्षरता में सधु ार अया है; िरन्तु दसू रा तथ्य भी ईतना ही पवचारणीय है पक ऄभी भी िरु​ु षों की तल ु ना में मपहला साक्षरता की पस्थपत में सधु ार की अवश्यकता है. तापलका 1 में िरु​ु षों एवं मपहलाओ ं की साक्षरता दर का तल ु नात्मक पववरण पदया गया है: ताचिका-1: भारत में कािक्रमानुसार साक्षरता का चवकास क्र. वषष पुरुष सािरिा प्रहिशि महहला सािरिा प्रहिशि अंिर 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12

1901 1911 1921 1931 1941 1951 1961 1971 1981 1991 2001 2011

9.8 10.6 12.2 15.6 24.9 21.16 40.40 45.96 56.38 64.13 75.26 82.14

0.6 1.0 1.8 2.9 7.3 8.86 15.35 21.97 29.76 39.29 53.67 65.46

9.2 9.6 10.4 12.7 17.6 12.3 25.05 23.98 26.62 24.84 21.59 16.68

स्रोि: जनगणना 2011 एवं सेलेक्टे ड एजुकेशनल थटे हटहथटक्स ऄभी भारत में मपहलाओ ं की ऄनमु ापनत संख्या लगभग 65.2 करोड़ है (indianonlinepages.com, 2017). ईियणक्त ु िाहलका-1 के ऄनसु ार देश में पशपक्षत मपहलाओ ं का प्रपतशत 65.46 है. ऄथाणत ऄभी भी देश में लगभग 22.53 करोड़ मपहलाएं ऄपशपक्षत हैं. िरु​ु ष साक्षरता की तल ु ना में मपहला साक्षरता ऄभी भी 16.68 प्रपतशत कम है. पशक्षा के सावणभौपमकीकरण समेत सभी प्रकार के सरकारी व गैर सरकारी ईिक्रमों के बावजदू मपहला साक्षरता की आस पस्थपत के िीछे एक प्रमख ु कारण है बापलका पशक्षा ऄथवा मपहला पशक्षा के प्रपत ईदासीनता ऄथवा दोयम दजे का भाव पजसकी शरु​ु अत घर से होकर समाज के व्यािक दायरे में पवस्ताररत होती है. मपहला प्रपतपनपधत्व का यही हाल प्रायः जीवन के ऄन्य क्षेत्रों में भी देखने को पमलता है. राष्ट्रीय सैंिल सवे अगेनाइजेशन के 2010 के अक ं ड़े के ऄनसु ार भारत में कायणक्षेत्र में मपहलाओ ं का प्रपतपनपधत्व पनम्नानसु ार है: ताचिका-2: भारत में चवचभन्न काययक्षेत्रों में मचहिाकचमययों का प्रचतशत कायय क्षेत्र

मचहिा कचमययों का प्रचतशत

कृचष

68.5%

तम्बाकू उत्पादन

2.6%

वस्त्र उद्योग

2.3%

Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4744 (Pg. 6742-6753)

पररधान/श्ृ​ृंगार आचद

5.9%

चनमायण कायय

5.1%

चवद्यािय

3.8%

चकराना स्टोर

2.1%

घरेिू सहायता कमी

1.6%

व्यचिगत सेवाएँ (सौंदयय उपिार, कपडा धोना, माचिश, शादी-चववाह कराना, आया, झाड़ू-पोछा, 1.5% बतयन धोना, आचद) स्वास्​्य सेवाएँ

1.1%

नौकरशाही

1%

स्रोत: NSSO, 2010

िाहलका 2 में पदए गए ईियणक्त ु अक ं ड़े आस बात को िष्टु करते हैं पक भारतीय समाज में ऄभी भी मपहलाओ ं के प्रपतपनपधत्व, ईनकी भागीदारी की पस्थपत क्या है. शारीररक श्रम से जड़ु े कायों जैसे मख्ु यतः कृ पष के क्षेत्र में तो मपहलाओ ं की भागीदारी ऄपधक है जहां ईन्हें िवू पण नधाणररत पनदेशों के ऄनसु ार काम करना होता है, िरन्तु ईन क्षेत्रों में जहाँ मपहलाओ ं को ऄिने बपु ि-पववेक के ऄनसु ार पनणणय लेना िड़े, वहां मपहलाओ ं का प्रपतपनपधत्व ऄत्यतं पनराशाजनक है. ईिरोक्त अक ं ड़े के ऄनसु ार नौकरशाही, जहाँ संबंपधत ऄपधकाररयों से यपु क्तसंगत एवं न्यायसम्मत पनणणय लेने की ऄिेक्षा रहती है, िीपड़तों को न्याय पदलाने हेतु यथोपचत व्यवस्था करने का ऄपधकार प्राप्त होता है, ईस क्षेत्र में मपहलाओ ं का प्रपतपनपधत्व मात्र 1 प्रपतशत है. यह पस्थपत िररवार की अपथणक, सामापजक एवं शैपक्षक पस्थपत के साथ साथ आस बात िर भी पनभणर करती है पक हमारे समाज में लड़पकयों एवं मपहलाओ ं को पकन भपू मकाओ ं को पनभाने हेतु प्रोत्सापहत पकया जाता है या पकन भपू नकाओ ं के पनवणहन हेतु ऄनक ु ू ल ऄवसर प्रदान पकये जाते हैं. समाज में महहलाओ ं की हथिहि, उनका शोषण एवं पररणाम ईियणक्त ु तापलका 1 एवं 2 द्वारा प्रस्ततु अक ु पनपहताथण यह है पक मपहलाओ ं की भपू मका जीवन ं ड़ों का एक प्रमख के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में ऄधीनस्थ की ही है जो पक एक कठोर यथाथण है. पवपभन्न कायणक्षेत्रों में मपहलाओ ं की ऄल्ि संख्या के चलते िरु​ु षों द्वारा मपहलाओ ं के साथ पकये जाने वाले दव्ु यणवहार एवं शोषण के बारे में अए पदन सनु ने को पमलता है. साथ ही एक और भी समानांतर यथाथण आन सबके साथ ही ऄिना स्थान बना रहा है – वह यह पक मपहलाओ ं का होने वाला शोषण और अधपु नक पशक्षा से हो रहे वैचाररक जागरण से मपहलाओ ं में िारंिररक व्यवस्था का पवरोध करने की क्षमता भी पवकपसत हो रही है. यह प्रपतरोध यपद सकारात्मक पदशा में होता है तो साथणक िररणाम पनकलते हैं, लेपकन मपहला शोषण का प्रपतरोध एवं ईससे ईत्िन्न ऄन्य प्रकार की नकारात्मकता Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4745 (Pg. 6742-6753)

समाज में एक भीषण पस्थपत को जन्म दे रही है और मपहलाएँ अक्रामक होकर ऄिराध की तरफ भी ईन्मख ु हो रहीं हैं. यह एक भयावह पस्थपत है. पजस नारी से समाज ममता, करुणा, प्रेम, स्नेह एवं वात्सल्य जैसी भावनाओ ं की अशा करता है, वह यपद आन मानवीय मल्ू यों के पविरीत मल्ू यों को ऄिनाती है तो यह एक पचंतनीय पस्थपत का द्योतक है. कालान्तर में देश में मपहला ऄिरापधयों की संख्या में हुइ वृपि आस गभं ीर पचंतनीय पस्थपत की ओर आशारा करती है. तापलका 3 में देश में भारतीय ऄिराध संपहता के ऄतं गणत वषण 2001 एवं 2011 में पगरफ्तार ऄिरापधयों का पववरण है पजसमें मपहला ऄिरापधयों के बढ़ते प्रपतशत को स्िष्ट रूि से देखा जा सकता है. िाहलका-3: भारि में IPC अपराध के िहि हगरफ्िार व्यहियों की संख्या – 2001 - 2011 (अपराध थवरूप एवं हलंग के अनुसार) वषण 2001 2011 क्र. अपराध का पुरुष महह कुल कुल प्रहिशि पुरुष महह कुल कुल प्रहिशि थवरूप ला ला ि.ु म. ि.ु म. 1 हत्या 718 34 753 95.4 4.6 661 44 705 93.7 6.3 88 34 22 50 43 93 2 हत्या करने का 758 19 778 97.4 2.6 728 31 760 95.8 4.2 प्रयास 44 95 39 95 79 74 3 अिरापधक 647 12 659 98.1 1.9 692 16 708 97.7 2.3 ह्तत्या 2 3 5 8 0 8 4 बलात्कार 199 49 204 97.6 2.4 288 76 288 97.3 2.7 51 5 46 112 6 78 5 ऄिहरण एवं 293 15 308 95.1 4.9 549 25 574 95.6 4.4 फुसलाकर 79 06 65 56 27 83 भगाना 6 डकै ती 243 17 245 99.6 0.4 167 25 170 99.5 1.5 96 0 03 58 0 08 7 डकै ती की 740 28 743 99.6 0.4 113 19 113 99.8 0.2 तैयारी एवं 2 0 60 79 जमघट 8 लटू -िाट 293 12 295 99.6 0.4 352 29 355 99.2 0.8 95 8 23 52 4 46 9 चोरी-ईठाइगीरी 658 10 668 98.4 1.6 668 15 683 97.7 2.3 57 39 96 19 49 68 10 चोरी 137 42 162 97.4 2.6 197 68 204 96.7 3.3 964 50 214 401 05 207 11 दगं े 377 20 398 94.8 5.2 334 19 353 94.5 5.5 540 82 366 525 46 985 Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4746 (Pg. 6742-6753)

12

6 152 42 29 2 413 14 03 84 193 41 9 134 26 65 9 458 30 080 50 6 159 44 08 73 417 51 33 1 122 14 99 0 835 25 46 92 1 206 14

13

अिरापधक पवश्वासघात धोखाधड़ी

14

जालसाजी

15

अगजनी

16

चोट

17

दहेज हत्या

17

छे ड –छाड़

18

यौनईत्िीड़न

19

िपत एवं ररश्तेदारों द्वारा क्रूरता पवदेश से लड़पकयों का अयात लािरवाही से 522 42 मृत्यु 80 6 ऄन्य IPC ऄिराध 924 46 856 47 0 IPC के तहत कुल 252 14 संज्ञये 693 46 2 08

20

22 23

24

156 51 427 87 198 0 137 34 488 586

97.3 2.7

203 81 422 44 124 39 109 467

78.1 21.9

96.5 3.5 97.9 2.1 98.0 2.0 93.8 6.2

98.8 1.2 98.9 1.1 76.3 23.7

220 93.6 6.4

527 99.2 0.8 06 971 95.2 4.8 326 267 94.6 5.4 154 0

1 232 76 84 0 881 47 47 17 206 67 3 120 30 77 3 479 36 835 06 3 198 47 14 64 520 16 69 98 968 19 7 3 135 41 403 29 8 203 18

900 46 114 450 6 295 229 0

26 7 63 95 3 19 35 55

240 44 928 64 213 0 123 80 515 898

96.8 3.2

245 78 537 67 988 0 180 701

80.6 19.4

94.9 5.1 96.9 3.1 97.6 2.4 93.0 7.0

98.8 3.2 98.0 2.0 77.1 22.9

221 91.9 8.1

903 99.7 0.3 13 120 94.7 5.3 845 9 314 93.8 6.2 584 5

ईियणक्त ु तापलका के ऄनसु ार हत्या, अिरापधक हत्या एवं ह्तत्या के प्रयास के अरोि में पगरफ्तार मपहलाओ ं की संख्या जहां वषण 2001 में 5552 थी, वहीं यह संख्या वषण 2011 में 7782 हो गयी थी. ऄथाणत हत्या, अिरापधक Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4747 (Pg. 6742-6753)

हत्या एवं ह्तत्या के प्रयास के अरोि में पगरफ्तार मपहला ऄिरापधयों की संख्या में 2001 से 2011 अते अते 40.16 प्रपतशत की बढ़ोतरी हुइ. आसी प्रकार डकै ती, डकै ती की तैयारी एवं जमघट , लटू िाट, चोरी, ईठाइपगरी अपद के अरोिों में पगरफ्तार मपहलाओ ं की संख्या जहां वषण 2001 में 5615 थी, वहीं यह संख्या वषण 2011 में 8917 हो गयी थी. ऄथाणत डकै ती, डकै ती की तैयारी एवं जमघट , लटू िाट, चोरी, ईठाइपगरी अपद के अरोिों में पगरफ्तार मपहलाओ ं की संख्या में 2001 से 2011 अते अते 58.80 प्रपतशत की बढ़ोतरी हुइ. यह पस्थपत गभं ीर पचंता ईत्िन्न करती है. यद्यपि ईियणक्त ु तापलका से मात्र यह स्िष्ट होता है पक ईपल्लपखत वषों में पकन अरोिों में मपहलाओ ं को पगरफ्तार पकया गया था एवं िरु​ु षों की तल ु ना में अरोिी मपहलाओ ं का ऄनिु ात क्या है. यह पववरण दोष पसिता का प्रमाण प्रस्ततु नहीं करता है. साथ ही आससे यह भी स्िष्ट नहीं होता पक पकन कारणों से महोलाएं ईियणक्त ु ऄिराध की घटना में अरोिी बनाइ गयीं या ईन्होंने ईक्त ऄिराध पकया. प्रामापणक रूि से पवपभन्न िररपस्थपतयों एवं मपहला ऄिरापधयों की सहभापगता के मध्य सबं धं स्थापित करने हेतु गहन शोध की अवश्यकता है. िरन्तु एक अम समझ आस बात की ओर स्िष्ट रूि से आपं गत करती है पक पकन संभापवत िररपस्थपतयों में मपहलाएं ऄिराध की ओर ईन्मख ु हो सकतीं हैं. कै दी महहलाएं एवं उनके बच्चों की हशिा सावणभौपमक एवं सावणकापलक रूि से समाज में यह मान्यता रही है पक माता ऄिने बच्चों की प्रथम पशपक्षका होती है. बच्चे के जन्म से लेकर जीवन के प्रारंपभक वषों में बच्चों का सवाणपधक समय ऄिनी माता के सापन्नध्य में व्यतीत होता है. यह ऄवस्था बालक के व्यपक्तत्व पनमाणण की महत्विणू ण ऄवस्था होती है. आसमें बालक की अदतों, ईसके मल्ू यों एवं अदशों का पवकास होता है. ईसके अतरं रक ससं ार का पनमाणण होता है. ईसकी प्रवृपियों, रुपचयों, ऄपभरुपचयों, ऄपभवृपियों अपद का पवकास होता है. माता का संरक्षण ईसे पकशोरावस्था के पदनों के पनरंतर बदलाव के पदनों में होने वाले संवगे ात्मक िररवतणन एवं पवकास की ऄवपध में मजबतू संबल प्रदान करता है. यह िररपस्थपत एक सामान्य िररवार में िल-बढ़ रहे बच्चे की होती है. िरन्तु ईन बच्चों के पलए, पजनकी माता पकसी ऄिराध के अरोि में जेल में बंद होती हैं, जीवन कपठन हो जाता है. ईिरोक्त वपणणत पस्थपत और माता का संरक्षण तो दरू की बात है, ईन बच्चों को दैपनक जीवन यािन के पलए भी संघषण करना िड़ता है. ऐसे में ईनकी पशक्षा की बात सोच िाना यथाथण से िरे की पस्थपत होती है. बालकों के व्यपक्तत्व को समाज के पलए ईियोगी बनाने वाली माँ ही होती हैं. िरंतु ऄगर वही माँ ऄिराधी के रूि में कै द होगी तो वह ऄिने बालक के पवकास में ऄिना सम्िणू ण योगदान देने में ऄसमथण होगी. ऐसे बालकों का जीवन यािन एवं ईनकी पशक्षा सपहत ऄन्य िक्षों के समपु चत पवकास का ईिरदापयत्व पकसी का भी नहीं रह जाता है. यद्यपि कुछ स्वयंसेवी सस्थाएं समाज में सपक्रय हैं जो ऐसे कुछ बच्चों को पचपित कर ईनके पलए यथासंभव कुछ सहायता करने का प्रयत्न करती हैं, िरन्तु यह संभवतः ियाणप्त नहीं है. ऐसे में ईन बेसहारा बच्चों की पशक्षा एवं जीवन यािन के पलए सरकार एवं स्थानीय प्रशासन की भपू मका ऄत्यंत ही महत्विणू ण होती है. प्रशासन एवं ऄन्य स्वयंसेवी संस्थाएं यपद ऄिनी पिम्मेदारी ऄगर ठीक से पनभा भी दे और ईन बच्चों को पशक्षा की मख्ु यधारा से जोड़ भी पदया जाए तो भी पजन सस्ं थाओ ं में बालक की पशक्षा व्यवस्था का प्रबंध पकया जाता है वहाँ ईसके पशक्षक एवं सहिाठ, ईसकी िृष्ठभपू म जानकर Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4748 (Pg. 6742-6753)

ईसके साथ पकस प्रकार का व्यवहार करें गे – यह पचंता का पवषय है. प्रायः बच्चों के पलए ईनकी माँ का ऄिराधी होना एवं पगरफ्तार होकर कै द में बंद होना एक त्रासपदक ऄनभु व होता है और यह ईनके पवकास में बाधा ईत्िन्न करता हैं. आसपलए आस पस्थपत को बदलने व बेहतर बनाने के पलए आन बालकों के पलए पवशेष व्यवस्था की जरूरत है. कै दी महहलाएं एवं उनके बच्चों की हथिहि – एक हवहगं ावलोकन अज लगभग सारे पवश्व में मपहला ऄिराध की दर में वृपि हो रही है। यह प्रवृपि मपहला ओ ं के ऄिेपक्षत स्वभाव से मेल नहीं खाती. मपहलाएं सृपष्ट पनमाणण के अरम्भ से करुणा, क्षमा, सहनशीलता, त्याग अपद गणु ों से यक्त ु रही हैं. आन गणु ों के कारण ही िाररवाररक, सामापजक और मानवीय मल्ू यों का संवधणन, संरक्षण और हस्तांतरण होता अया है और मानव समाज में सभ्यता तथा संस्कृ पत का पवकास हुअ है. ईसकी बपु नयाद गहरी हुइ है. िरन्तु कालान्तर में पवपभन्न प्रकार की िाररवाररक एवं सामापजक पवसगं पतयों से यक्त ु िररपस्थपत एवं िररवेश में मपहलाओ ं द्वारा पकये जाने वाले अिरापधक कृ त्य में भी वृपि हुइ है. भारत में बढते हुए मपहला ऄिराध का स्तर एवं संख्या गभं ीर पचंता का पवषय है . ईियणक्त ु खडं में दी गयी तापलका 3 के ऄपतररक्त वषण 2015 मे भारतीय दडं पवधान के ऄतं गणत 3,14,575 मपहलाओ ं को पवपभन्न ऄिरा धों में पगरफ्तार पकया गया था . स्थानीय एवम पवशेष काननू के तहत िरू े देश में 12,819 मपहलाए पहरासत में ली गइ . पिछले 5 वषों में ये अक ं डे कइ गनु ा बढे हैं. भारतीय संस्कृ पत में िररवार की नींव पजस मपहला के संस्कारो िर पनभणर है , ईसी मपहला के कदम ऄगर ऄिराध की ओर बढने लगे तो हमारे भपवष्ट्य िर सवापलया पनशान लग जाते हैं. ऄब यह मात्र अलोचना का नही बपल्क पचंता का पवषय है . देश के ऄन्य राज्यों की तल ु ना में महाराष्ट्र सवाणपधक मपहला ऄिरा पधयों वाले राज्यों में से एक है. नेशनल क्राआम ररकॉडण ब्यरू ो (एनसीअरबी) के 2010 से 2012 तक के अक ं ड़ो िर गौर करें तो आस राज्य की सवाणपधक 90,884 मपहला ओ ं को पवपभन्न ऄिरा धों के तहत िपु लस ने पगरफ्तार पकया था. देश में 2010 से 2012 तक 93 लाख ऄिरापध यों की पगरफ्तारी हुइ थी पजन में मपहलाये 6 फीसदी थीं. यद्यपि नेशनल क्राआम ररकॉडण ब्यरू ो के ऄनसु ार भारतीयों जेलों में 4827 मपहला कै पदयों के रखने की व्यवस्था है,िरंतु आस समय आनकी संख्या 18,188 हैं पजनमे 5345 मपहलाओ ं की सजा तय कर दी गइ हैं . 12,688 मपहलाए ऄडं ररायल या पवचाराधीन हैं तो व हीं 98 मपहलाओ ं को पडटेन यापन स्था नीय काननू ों के तहत पहरासत में रखा गया हैं . अक ं ड़ों के ऄनसु ार 1603 मपहलाए ऄिने बच्चों के साथ जेलों में हैं. आन बच्चों की संख्या 1933 है. महहला अपराधी एवं प्रमुख कारण अिरापधक मामलों में मपहलाओ ं की संपलप्तता का एक बड़ा कारण ऄपशक्षा भी है . जापमया पमपलया आस्लापमया पवश्वपवद्यालय, नइ पदल्ली के ‘सरोपजनी नायडू सेंटर फॉर वमु न स्टडीज ’ की काननू पवशेषज्ञ तरन्नमू पसद्दीकी के ऄनसु ार – ‘मपहलाओ ं में पशक्षा की कमी ईनके जेल जाने पक सबसे बड़ी वजह है ’. समाज में ऄभी भी बहुत बड़ा तबका लड़पकयों को िराया धन समझने के कारण ईन्हे िढाने की जरूरत नहीं समझता. ऄपशक्षा के कारण िैदा हुइ ऄधं श्रिा, भोलािन, सचू नाओ ं की कमी , ऄिने ऄपधकार के प्रपत सकारात्मक जागरूकता का ऄभाव, सही मागणदशणन तथा सहायता का ना पमलना एवं ऄिने शोषण के पवरुि ऄसहायताभाव से अक्रामकता की तरफ Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4749 (Pg. 6742-6753)

ईन्मख ु होना मपहलाओ ं को ऄिराध की ओर धके लता है. एक तरफ ऄपशक्षा को ऄिराध की वजह के रूि मे हम देखते हैं तो दसू री तरफ पशपक्षत , हाइ- प्रोफ़ाआल मपह लाएँ भी अिरापधक मामलो मे कम नहीं हैं . ऄनिढ़ और गरीब घर की लड़पकयाँ तो ऄिराध की दपु नया मे पववशता एवं पवकल्िहीनता की पस्थपत में अती हैं , िरंतु कइ ऄमीर घरो की लड़पकयाँ भी भौपतकता एवं बाजारवाद के दबाव, पबखड़े व टूटे हुए िररवार, िररवार की अपथणक पस्थपत, घर मे ऄनैपतक वातावरण की व्यापप्त, माँ-बाि के ऄिने-ऄिने क्षेत्र मे व्यस्त रह ने के कारण, सौतेली होने के कारण दव्ु यणवहार का पशकार होने एवं सही िरामशण के ऄभाव जैसे कारणों से ऄिराध में संपलप्त हो जाती हैं. दास, एस (2013) , ने ऄिने ऄध्ययन वुमन हप्रज़नर इन ओड़ीसा : ए सोहशयों कल्चर थटडी में पनष्ट्कषण के रूि में िाया पक यहां िर ज्यादातर मपहलाएँ आसपलए कै द है क्योंपक ईनके िास िैसा नहीं है साथ ही साथ आन लोगों के घरवाले आनकी तरफ ध्यान भी नहीं देते हैं . यहाँ की मपहलाएँ ज्यादातर ऄनिढ़ होने की वजह से ईन्हें काननू का ज्ञान नहीं है आसपलए भी यह य हां िर कै द हैं . थवगाषइरी (2012) , ने अपने अध्ययन द फ़ीमेल ऑफ़ें डसष अँड देयर इटं रपसषनल ररलेशन्स इन द फॅ हमली में पनष्ट्कषण के रूि में यह िाया गया पक मपहलाओ ं का ऄिराध की ओर बढ़ने का कारण ईनका वैवापहक जीवन मे समायोजन न होना , िररवार का वातावरण दोषिणू ण होना , िपत–ित्नी में ऄलगाव , मपहलाओ ं का हठी स्वभाव का होना हैं | हमारे देश मे लड़पकयों को घर में दबाकर रखा जाता है साथ ही ईनका लैंपगक शोषण भी एक ऄिराधी बनने का कारण रूि में िाया गया. कै दी महहला अपराधी एवं उनके बच्चों की शैहिक हथिहि भारत के जेलों में ऄिराधपसि और पवचारधीन मपहलाए जेलों में ऄके ली नहीं हैं . ईनके साथ ईनके बच्चे भी आस यातना के बीच िल-बढ़ रहे होते हैं. माताओ ं के साथ आन बच्चों के रहने , खाने - िीने , पशक्षा और स्वास्थ्य का आतं जाम जेल प्रशासन को ही करना िड़ता है . लेपकन कै पदयों की तरह आन बालकों िर कोइ िाबंदी नहीं होती है . कभी यह बच्चे जेल ऄ धीक्षक के कमरे में या पफर जेल के ही ऄदं र मगर खु ली जगह या बरा मादे में खेलते रहते हैं. यह व्यवस्था जेल प्रशासन के ऄपधकारी की मानपसकता िर पनभणर करती है. माँ के साथ जो छोटे बच्चे होते हैं ऄगर ईनकी संख्या ज्यादा होती है तो जेल में प्रशासन की ओर से क्रेच, िालनाघर अपद की व्यवस्था की जाती है. ऄगर जेल ऄपधकारी की सोच एवं ईनका दृपष्टकोण ठीक होता है तो वे आन बच्चों के पलए िो षक अहार की व्यवस्था करते हैं . साथ ही ईनके पलए प्राथपमक पशक्षा के पलए भी कुछ प्रबधं पकया जाता है. ऄगर जेल प्रशासन के िास आस व्यवस्था के पलये िैसे की व्यवस्था नहीं होती है तो जेल ऄपधकारी प्रयास करके पकसी स्वयंसेवी संस्थाओ ं को अमपं त्रत करके ईनसे आन बच्चों के पलए खेल के साधन, पशक्षण सामग्री और साथ ही ईनका समय या सहायता भी लेने का प्रयत्न करते हैं. पजन बच्चों की ईम्र 6 साल से उिर हो जाती है ईन बच्चों को प्रशासन की ओर से सरकारी िाठशाला में दापखला कराके ईनको सरकारी छात्रावासों में रखने की व्यवस्था की जाती हैं . िरंतु बढ़ती ईम्र के साथ बच्चों, पजनकी ईम्र 10 साल या ईससे ऄपधक हो जाती है , के समझ में अने लगता है पक ईनकी माँ को जेल मे क्यों रखा गया है . तब ईनकी मानपसक पस्थपत िर ब हुत बरु ा ऄसर होने लगता है और पफर ईनका पकसी भी कायण में मन नहीं लगता है और आस पस्थपत का ऄसर ईन की पशक्षा िर भी िड़ता है. ऐसे में ऄगर ईन्हे सही तरह से मागणदशणन नहीं पमलता है तो ऐसे ईनके रास्ता भटकने की सभं ावना ज्यादा होती है . हकंगी Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4750 (Pg. 6742-6753)

(2000), ने अपने अध्ययन द हचल्रेन ऑफ़ वुमेन इन हप्रज़न : ए न्यूज़ीलैंड थटडी में पनष्ट्कषण के रूि में िाया पक पजन बच्चों की माँ को सजा हो जाती हैं ईन बच्चों को ईनके पकसी ररश्तेदार के यहाँ रहने का स्थान नहीं पमलता है तो वह बच्चे अगे जाकर ऄिराध के रास्ते िर पनकाल जाते हैं . आसपलए ऐसे समय में आन बच्चों को सकारात्मक मागणदशणन की बहुत अवश्यकता होती है. और यह काम पसफण पशक्षा द्वारा ही पकया जा सकता है आसपलए आन बच्चों के पलए ईपचत पशक्षा का प्रबंध पकया जाना बहुत अवश्यक है. कै दी महहलाएँ व उनके बच्चों का सामंजथय क़ै दी मपहलाओ ं के बच्चों को पवद्यालय के वातावरण के साथ सामजं स्य स्थापित करने में सामान्यतः बहुत कपठनाइ होती है. क्योंपक पवद्यालय का वातावरण ईनके पलए बहुत ऄलग होता है . प्रायः पवद्यालय के िररवेश में पशक्षकों और सहिापठयों का ईन बच्चों की तरफ देखने का नजररया ऄलग होता है . आस बात की संभावना बढ़ जाती है पक ईन बच्चों की िृष्ठभपू म, ईनकी माता का अिरापधक आपतहास ईन बच्चों के प्रपत दसू रों के दृपष्टकोण को प्रभापवत कर दे. आस तरह के िवू ाणग्रह से यक्त ु वातावरण में आन बच्चों के पलए पशक्षा की ईपचत व्यवस्था करना तथा एक स्वस्थ एवं िक्षिात रपहत वातावरण का पनमाणण करना बहुत बड़ी चनु ौती है. अम तौर िर क़ै दी मपहलाओ ं के बच्चों के पलए ऄिने सहिापठयों के साथ सामजं स्य स्थापित करना चनु ौतीिणू ण कायण होता है. क्योंपक ये बच्चे पजस िाररवाररक-सामापजक-शैपक्षक वातावरण से अते हैं, ऄन्य बच्चों की तल ु ना में वह वातावरण पभन्न होता है. आन बच्चों के साथ सामान्य बच्चे के दोस्ती करने की संभावना कम हो सकती है. कइ ऄध्ययनों में यह िाया गया है पक सामान्य िररवार के बच्चे ऐसे बच्चों के साथ दोस्ती नहीं करते हैं, और ऄगर दोस्ती हो भी जाती है तो आन सामान्य बच्चों के घरवाले आन बच्चों के साथ रहने के पलए मना करते हैं क्योंपक आन ऄपभभावकों को लगता है आन बच्चों के साथ रहने से ईनके बच्चे पब गड़ जायेंगे . आस पस्थपत में यह देखना ऄत्यंत महत्विणू ण होगा पक कै दी मपहलाओ ं के बच्चे ऎसी िररपस्थपत में ऄिना सांवपे गक संतल ु न बना िाने में पकस हद तक सफल हो िाते हैं एवं ईनकी पशक्षा िर आसका क्या प्रभाव िड़ता है? कै दी महहलाएं एवं बच्चों के हलए उनकी शैहिक जागरूकिा सामान्यतः कोइ भी माता यह नहीं चाहती पक ईसके बच्चे जीवन में गलत पदशा की ओर जाए.ं यह बात ईन मपहलाओ ं िर भी लागू होती है जो कै द में हैं. क़ै दी मपहलाएँ भी अम तौर िर ऄिने बच्चों के पशक्षा के प्रपत जागरूक पदखाइ देती हैं. वे चाहती हैं पक ईनके बच्चे भी िढ़ पलखकर देश के ऄच्छे नागररक बने . िरन्तु आस बात का ऄध्ययन करना ईपचत होगा पक कै दी मपहलाओ ं में ईन मपहलाओ ं का प्रपतशत पकतना है जो ऄिने बच्चों की पशक्षा के पलए जागरूक हैं एवं ऄिने बच्चों की पशक्षा के पलए वे पकस प्रकार का प्रयत्न करती हैं? सामान्यतः ईक्त मपहलाओ ं की जानकारी या तो सीपमत होती है या ईन्हें ऄिने आदण पगदण की ईलझनों के बीच आतना समय नहीं पमल िाता पक वे ऄिने बच्चों की पशक्षा के बारे में कुछ ठोस पनणणय ले सकें . प्रायः वे ऄिने बच्चों को पशक्षा पदलाना चाहती है िरंतु ईन्हें आस बात की जानकारी नहीं होती है पक वे ऄिने बच्चों को पकस प्रकार से पशक्षा पदलाएँ और ईन बच्चों को पशपक्षत बनाए. अम तौर िर ईन्हें सरकार की और से बच्चों की पशक्षा के पलए पकये

Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4751 (Pg. 6742-6753)

जाने वाले प्रावधानों की जानकारी भी नहीं होती हैं. ऄतः आस बात की िड़ताल करना अवश्यक प्रतीत होता है पक कै दी मपहलाओ ं का ऄिने बच्चों की पशक्षा के पलए जागरूकता का स्तर क्या है? कै दी महहलाओ ं व उनके बच्चों की हशिा एवं सरकारी व गैर-सरकारी प्रयत्न क़ै दी मपहलाओ ं के बच्चों की पशक्षा के पलए राज्य और कें द्र सरकार द्वारा संचापलत पवपभन्न योजनाओ ं – जैसे बाल पवकास योजना, बाल संरक्षण एवं पवकास योजना तथा मपहला सशपक्तकरण योजना अपद, के ऄतं गणत पनयपमत रूि से अपथणक सहायता प्रदान की जाती है. आसके ऄपतररक्त सरकार गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाओ ं को भी आस हेतु अपथणक ऄनदु ान देती है. महाराष्ट्र राज्य के पवशेष सदं भण में राज्य सरकार द्वारा वषण 2013 से ‘बाल संगोिन योजना’ चलाइ जा रही है पजसमें ऄन्य बच्चों के कल्याण के ऄपतररक्त कै दी मपहलाओ ं के बच्चों की पशक्षा के प्रावधान का पवशेष रूि से ईल्लेख पकया गया है. ऄगर आन बच्चों को कोइ संभालने वाला नहीं होता है तो आन्हें पबना शल्ु क अश्रमशालाओ ं में रहने और िढ़ने की सपु वधा दी जाती हैं . तथापि पवपभन्न ऄध्ययनों से प्राप्त िररणाम यह बताते हैं पक कुछ ऄिवादों को छोड़कर आन बच्चों की शैपक्षक ईिलपब्ध बहुत ऄच्छी नहीं हो िाती. भण्डारी (2015), ने ऄिने ऄध्ययन सोपशयो –लीगल स्टेटस ऑफ वमु न पप्रजनसण एडं देयर डीिेंडेंट पचल्रेन : ए स्टडी ऑफ सेंरल जेल ऑफ राजस्थान में पनष्ट्कषण के रूि में िाया पक मपहला ऄिरापधयों और ईनके बच्चों की समस्याओ ं कों देखते हुए ईनको िररवार का दौरा , काननू ी सहायता, व्यावसापयक प्रपशक्षण, जैसी कुछ शतो कों पवशेष रूि मे ध्यान मे रख कर जेल मैनऄ ु ल में अवश्यक सधु ार करते हुए आन्हें भी महत्विणू ण स्थान देना चापहए साथ ही साथ मपहलाओ ं और बच्चों के पलए कुछ पवशेष क़ाननू ों का भी प्रावधान करना चापहए. शोधकताण नें कै दी मपहलाओ ं के बच्चों के शैपक्षक पस्थपत को सधु ारने के पलए पनम्न सझु ाव पदये: 1. जेल में कै दी मपहलाओ ं के पलए पशक्षा का प्रबंध करना चापहए तापक वह पशक्षा के प्रपत जागरूक हो सके और साथ ही ऄिने बच्चों के पशक्षा के प्रपत जागरूक हो सके . 2. सरकार द्वारा कै दी मपहलाओ ं के बच्चों के पलए छात्रावास बनाने चापहए, पजसमें वह िढ़ें और पनवास कर सकें . 3. मपहलाओ ं को जब जेल में भेजा जाता है तो ईसी समय आन बच्चों की पजम्मेवारी लेने वाला ऄगर कोइ ररश्तेदार न हो तो सरकार को ईसी वक़्त आन बच्चों के रहने और िढ़ाइ का प्रबधं तरु ं त हो ऐसा काननू बनाना चापहए. 4. कै दी मपहलाओ ं के साथ रह रहे बच्चों के पलए पवशेष िौपष्टक अहार का प्रबंध हो ऐसा काननू होना चापहए तापक ईन बच्चों का पवकास ऄच्छी तरह हो. 5. आन बच्चों के जेल में ही क्रेच या िालनघर होने चापहए और ईनकी तरफ ध्यान देने के पलए एक अया भी पनयक्त ु की जानी चापहए तापक आन बच्चों के साथ कोइ हादसा न हो और आन्हे खेल-खेल में प्राथपमक पशक्षा भी प्राप्त हो सके . 6. पवद्यालयों में पशक्षकों को आन बच्चों की तरफ थोड़ा ज्यादा ध्यान देना चापहए क्योंपक आन बच्चों की मानपसक पस्थपत ऄच्छी नहीं होती है. आसपलए आन्हे ज्यादा प्यार और अदर देना चापहए. Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4752 (Pg. 6742-6753)

7. सरकार द्वारा आन बच्चों की पशक्षा िर पवशेष ध्यान देना चापहए और आन्हे ज्यादा से ज्यादा अपथणक मदद की जानी चापहए. 8. आन बच्चों को गणु विािणू ण पशक्षा पमले, साथ ही आनका सम्िणू ण पवकास हो आसके पलए कायण करना चापहए. 9. आन बच्चों को पशक्षा देने के पलए सरकार द्वारा जो अपथणक मदद दी जाती है वह ईन तक िहुच रही है या नहीं आस तरफ भी ध्यान देना चापहए. 10. आन बच्चों के पलए पजला स्तर िर एक सपमपत तो होती है िरंतु आस सपमपत के सदस्य प्रपतपष्ठत लोग होते हैं, पजन्हे आन बच्चों से कोइ सरोकार नहीं होता है और प्रायः ये सदस्य पजम्मेदारी से काम नहीं करते हैं. आसपलए आस सपमपत में वही सदस्य होने चापहए जो सचमचु आन लोगों के पलए समाजकायण कर रहे हैं. हनष्कषष स्वातत्र्ं योिर भारत ऄिने नागररकों के पहत में, ऄिनी भावी िीढ़ी के सवा​ांगीण पवकास के पलए ऄनेकानेक प्रयत्न कर रहा है. समाज के पवपभन्न तबके के समपु चत पवकास की पवपवध शैपक्षक अपथणक योजनाओ ं के साथ बहुलतायक्त ु समाज की पवपशष्टताओ ं को ध्यान में रखते हुए वतणमान समय में समावेशी पशक्षा की तरफ गभं ीरता से ध्यान पदया जा रहा है. ऐसे में यह एक महत्विणू ण सामापजक ईिरदापयत्व है पक हापशये िर िड़े हुए ईन बच्चों की तरफ ध्यान देते हुए, पजनकी माताएं पवपभन्न कारणों से कै द में हैं, ईनकी पशक्षा के संबंध में तथ्यिरक जानकारी एकपत्रत की जाए. ईनकी िररपस्थपतयों के यथाथण का व्यावहाररक अकलन करते हुए यथोपचत नीपतयाँ बनायी जाए पजससे पक ईनके जीवन िर सकारात्मक प्रभाव डाला जा सके एवं ईन बच्चों को ईपचत पशक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करते हुए ईन्हें नयी पदशा दी जाए. जब हम कहते है पक सभी बच्चे हमारे देश का भपवष्ट्य हैं , तो हमारी यह पजम्मेदारी बनती है पक हम आन बच्चों को ऄच्छी पशक्षा दें और ईन्हें देश तथा समाज में ऄिनी सकारात्मक भपू मका पनभाने के पलए तैयार करे . संदभष ग्रन्ि सूची अब्बास और मांजरू ( 2015), सोफियो-इकोनोफमक िे क्टर ऑफ़ िमु ेन्स इन्िोंिेमेंट इन क्राइम इन पांजाब, पाफकस्तान . एके डफमक रे सचा इन्टरनेिनल ,6 (2), 442 आहूजा ,राम.(2015). सामाफजक सामस्याए . (फद्वतीय सांस्करण).जयपरु : राित पफब्लके िन्स भण्डारी (2015), सोफियों–लीगल स्टेटस ऑि िमु न फप्रजनसा एांड देयर डीपेंडेंट फचल्रेन : ए स्टडी ऑि सेंरल जेल ऑि राजस्थान. सोफियोलॉजी अँड फक्रफमनोलॉांजी-ओपेन एक्सैस फसांह ,अरुण कुमार .(2015). मनोफिज्ञान, समाजिास्त्र तथा फिक्षा में िोध फिफधयाँ.(बारहिाँ सांस्करण). फदल्ली : मोतीलाल बनारसीदास पफब्लके िन ठाकुर, गोपाल कृ ष्ट्ण. (2014). डायमेंिन ऑि जेंडर इनइक्िफलटी इन इफां डया एांड एजक ु े िन एज़ एन इस्ां रूमेंट िॉर िीमेन एम्पािरमेंट. एफियन जनाल ऑि मल्टीडीफस्सफललनरी स्टडीज़ (ISSN: 2321-8819), 2(10), 153-157 कुरी (2013). नें िमु न इन फप्रज़न : ए िोगोटन पापल ु ेिन. इटां रनेट जनाल ऑि फक्रफमनोलॉांजी, 1-30 दास, एस. (2013). िमु न फप्रज़नसा इन ओड़ीसा : ए सोफिओ-कल्चरल स्टडी ( डोकटोरल डेजटेिन, नेिनल इस्ां टीट्यटू ऑि टेच्नोलॉांजी राउरके ला) स्िगा​ाइरी (2012), द फ़ीमेल ऑफ़ें डसा अँड देयर इटां रपसानल ररलेिन्स इन द िॅ फमली फिललि .(2012). भारत में मफहला मानिाफधकार .(प्रथम सांस्करण). मेरठ: राहुल पाफब्लके िन िफिष्ठ, सररता .(2010).मफहला और काननू .(प्रथम सांस्करण). फदल्ली: कल्पना प्रकािन Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Usha Vamanrao Chikate & Gopal Krushna Thakur 4753 (Pg. 6742-6753)

फसह, फनिान्त.(2008).भारत मे अपराध.(प्रथम सांस्करण).फदल्ली : ओमेगा पफब्लके िन्स पाण्डेय , गणेि .(2008).अपराध िास्त्र .(प्रथम सस्ां करण). फदल्ली : राधा पफब्लके िन्स फकांगी (2000). द फचल्रेन ऑफ़ िमु ेन इन फप्रज़न : ए न्यज़ू ीलैंड स्टडी. इन िमु ेन इन करे क्िन्स, स्टाि अँड क्लाएटां ् स कोन्फ़रांस (िॉल्यमू . 31) बेदी , फकरण .(1999). यह सभां ि है .(प्रथम सस्ां करण). फदल्ली : िाणी ओरकिन कोफिगां टन, एस. एस. (1998). फिमेन्स इन फप्रज़न : अलप्रोचेस इन द रीटमेंट ऑि अिर मोस्ट इफन्िफजबल पापल ु ेिन. फिमेन अँड थेरपी, 21(1), 141-155 बचु , सी. (1990), फिमेन्स राइट्स एज़ ह्यूमन राइट्स : टुिड्ास ए री-फिजन ऑि ह्यूमन राइट्स. ह्यूमन राइट्स कौरटरली, 12(4), 486-498 http://www.indiaonlinepages.com/population/india-current-population.html (फदना​ांक 29.10.17 को प्राप्त आांकड़े)

Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Turn static files into dynamic content formats.

Create a flipbook
KAIDI MAHILAON KE BACCHON KI SHAIKSHIK STHITI KA ADHYAYAN by Scholarly Research Journal"s - Issuu