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SAMPADAKEEYAM

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ऋषभदे व शर्मा

जन्म - 4 जुलाई,1957, ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदे श। कार्यक्षेत्र – इं टेलीजेंस� ब्यूरो (1983-1990)। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिं दी प्रचार सभा (1990-2015)। प्रकाशन – 19 मौलिक और 43 संपादित पुस्तकें। संप्रति - स्वतंत्र लेखन।

अख़बार का दोहरा दायित्व होता है पाठक और जनतंत्र की ओर। ख़बरें लिखने वालों की जवाबदे ही उनके पाठकों की ओर होती है । वह संपादकीय ही है जो जनतंत्र का प्रहरी बन खड़ा होता है , डटा रहता है । वह पाठकों की ओर कम और सत्ता की, सरकार की तथा लोकतंत्र के बाकी लठधारियों की ओर अधिक उन्मुख होता है ।

सं पादकीयम्

संपादकीयम्

शायद यही कारण है कि रीडरशिप सर्वे बार-बार यह दिखाते हैं कि पाठक संपादकीयों को कम पढ़ते हैं । पर मुझे लगता है , यह बात ‘संपादकीयम्’ के लिए सच नहीं है । पाठकों की प्रतिक्रियाओं से यह साफ है कि वे इन्हें बहुत ग़ौर से पढ़ते हैं - उन्हें यह उम्मीद तो नहीं रहती कि लठधारी कुछ उत्तर भी देंग�े, पर वे इनमें उठाए प्र�नों के साथ खड़े हैं । ये उन्हीं के प्र�न हैं ।

- कुमार लव kummarluv@gmail.com

परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद

ISBN :978-93-84068-79-0

ऋषभदे व शर्मा

और जब इन प्र�नों में कुछ तंज उभर आता है , कोई व्यंग्य चोट करता है , चुभता है – तो वह उन्हें भी उतना ही चुभता है जितना सत्ता या लठधारियों को। क्योंक�ि जनतंत्र का सबसे बड़ा गुंडा तो ‘जन’ ही है । उस ही के वोटों ने इस बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल (बच्चों के खेलने की जगह) को सलामत रखा है ।


संपादकीयम्

ऋषभदे व शर्मा

परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद संपादकीयम्

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संपादकीयम्

(लेख/ पत्रकारिता) © ऋषभदे व शर्मा आईएसबीएन : 978-93-84068-79-0

SAMPADAKEEYAM

(Articles/ Journalism) By Rishabha Deo Sharma प्रकाशक ः परिलेख प्रकाशन वालिया मार्केट�, निकट साहू जैन कॉलेज कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद – 246763 मो : 09897742814, 09837120022 वितरक ः श्रीसाहिती प्रकाशन 304, मेधा टॉवर्स, राधाकृष्ण नगर अत्तापुर रिं ग रोड, है दराबाद – 500048 मो : 09849986346 आवरण : गुर्र मकोंड�ा िशरीष बाबु प्रथम संस्करण : 2019 मूल्य : 140/मुद्रक ः साई िलखिता िप्रंटर्स खैरताबाद, है दराबाद - 500 004. मो : 07207045979

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संपादकीयम्


आदरणीय मित्रवर डॉ. रामनिवास साहू को सप्रेम ...

संपादकीयम्

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संपादकीयम्


प्राक्कथन उनके शब्द बोलते हैं , चिल्लाते नहीं। अभिव्यक्ति चोट नहीं करती, बल्कि मरहम लगाती है । तल्ख़ी और तुर्शी कभी-कभार ही झलकती है । किंतु अधिक तीक्ष्ण होने से पहले ही सँभल जाती है । ऋषभ के लेखन में आक्रोश कम है । आसक्ति अधिक है । ‘संपादकीयम्’ इन्हीं सबका ‘कॉकटे ल’ है । हिं दी भाषा पर उनका असाधारण अधिकार है । चाहते तो विशुद्ध हिं दी में लिखकर भी पाठकों तक पहुँच सकते थे। किंतु आम बोलचाल की भाषा, जिसमें अन्य भाषाओं के भी शब्द होते हैं , उनके लेखन को ‘सर्वग्राह्य’ बना दे ती है । हाँ , कभी-कभी ठे ठ हिं दीदाँ होने का आभास मिलता है और कतिपय आं चलिकता भी झलकती है । लेकिन किसी उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के सर्वेस�र्वा रह चुकने वाले किसी शिक्षाविद् को ‘अखबारी’ दु निया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका आदि को नए सिरे से साधना पड़ता है । और इस मुहिम में वे सफल हुए हैं । ऋषभ के आलेखों की एक और विशेषता है । उनकी ‘पत्रकारिता’ में ‘पक्षकारिता’ फ़िलहाल तो नहीं मिलती। ऐसे में, जबकि पूरा मीडिया जगत ‘पक्षकारिता’ का शिकार है , ऋषभ अपने लेखन में किसी का पक्षकार होने से बचते हैं । हमारा मानना है कि ‘संपादकीयम्’ का यही रं ग होना चाहिए। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।‘ उन्होंन�े कभी यह नहीं कहा कि मोदी को लाओ या हटाओ। शेर-ओ-शायरी तथा कविताओं के अंश उद् धृत करके वे अपनी बात को, अपने निष्कर्ष को, धार दे ते हैं । विषय के चयन से स्प�ट हो जाता है कि वे रस्म-अदायगी के लिए नहीं, सोद्दे श्य लिखते हैं । चयनित विषय को, शैलीगत सौंद�र्य में लपेट कर वे आलेख को पठनीय बना दे ते हैं । चुटीलापन होता है , मगर वह चुभता नहीं। उनके लेखन में कर्क शता नहीं है , लावण्य है । संपादकीयम्

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व्यंग्य, उनके संपादकीय लेखों में कभी-कभार ही आटे में नमक जैसा रहता है । पता नहीं, लेख का ताना-बाना बनाने में वे क्या मशक़्क़त करते हैं , किंतु शैलीगत मर्मज्ञता बता दे ती है कि कच्ची कपास को धुन-धुनाकर वे विषय को कोमल फाहा और गाला बना लेते हैं । कभी-कभार ऐसे विषय भी उन्होंन�े चुने हैं , जिनपर कलम चलाते वक़्त शायद ग़ुस्सा, झुँझलाहट, झल्लाहट ज़रूर उभरी होगी। किंतु शब्द-संयम के सहारे उन्होंन�े उन तमाम विकारों को दू र रखा। और अंत में, अपनी बात। अनेक कारणों से हम ऋषभदे व जी को ‘मित्र’ कम, ‘हितैषी’ ज़्यादा मानते हैं । उन्हें ‘मिलाप’ से जोड़ने के पीछे भी ‘स्वहितसिद्धि’ का भाव प्रबल रहा है । ‘अख़बार’ में उनके लायक ‘स्पेस’ बनाने में हमें काफ़ी समय लगा। अन्यथा ‘संपादकीयम्’ का कलेवर बहुत बड़ा हो जाता। उनकी उत्तरोत्तर वृद्धि और समृद्धि की कामना के साथ, हमें यह स्वीकारने में संकोच नहीं है कि उन्होंन�े हमारी थकन को विश्राम दिया है । इसके लिए धन्यवाद। 26 जनवरी, 2019

- रवि श्रीवास्तव संयुक्त संपादक, डे ली हिं दी मिलाप है दराबाद

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संपादकीयम्


शुभाशंसा डाॅ . ऋषभदे व शर्मा के नाम से तो मैं कई वर्षों से परि​िचत हँू । परं तु मुलाकात दो वर्ष पहले हुई। केंद्रीय िहं दी संस्थान के मैसूर केंद्र द्वारा, कर्नाटक के हासपेट िजले के िहं दी अध्यापकों के िलए अायोिजत नवीकरण कार्यक्रम में। पहली ही मुलाकात में वे मुझे भा गए। कारण? एक तो अापादमस्तक वे मुझे िवनम्र व्यक्ति लगे। दू सरे पैंट� के ऊपर लंबा कुर्ता उन पर बहुत जँच रहा था। एे से कई कार्यक्रमों में बारह-बारह िदनों तक हम साथ-साथ रहे हैं । एक ही होटल में। पास-पास के कमरों में। शर्माजी बोलते हैं कम लेिकन सार्थक। परं तु उनके एक व्यवहार से मुझे असुविधा होती है । मैं उम्र में उनसे बड़ा हँू । इसका वे बहुत ज्यादा खयाल रखते हैं ; अाै र सम्मान दे ते हैं । इसलिए सदा मुझे यह ध्यान रखना पड़ता है िक उनको असुिवधा न हो। यही मेरी असुिवधा है । अब थोड़ी बात इस पुस्तक में संकलित शर्माजी के संपादकीय लेखों की। ज्यादा पढ़ने के मामले में मैं अयोग्य हूँ। अराजक एवं विशृंखल विचार एवं अटपटी भाषा मुझे बिलकुल पसंद नहीं। लेकिन शर्माजी के लिखे हुए को पढ़कर मुझे राहत मिलती है । एक तो उन्हें विषय-चयन में बड़ी कुशलता हासिल है । विवादास्पद विषय पर वे बहुत कम लिखते हैं । अगर कभी लिखते भी हैं , तो विवाद से परे उस विषय को एक अलग आयाम दे दे ते हैं । सबसे अधिक मैं उनकी भाषा-शैली को पसंद करता हूँ। साधारण विषय को भी वे लालित्यपूर्ण स्वरूप दे दे ते हैं । मैं भाषा का व्यक्ति हँू । स्वभावतः मेरा ध्यान शब्दों और उनके प्रयोगों पर टिक जाता है । इसके उदाहरण दे खिए। इस पुस्तक का नाम उन्होंन�े ‘संपादकीयम्' रखा हँू । ‘संपादकीय' नहीं। ‘संपादकीयम्' शब्द में एक प्रकार की गरिमा तथा लालित्य है , जो संपादकीय में नहीं है । एक वर्ण जोड़ दे ने से कितना फर्क पड़ गया है ! यह है शर्माजी के शब्द-चयन की सूझ! सपा-बसपा के गठबंधन पर लिखते हुए उन्होंन�े लिखा है - यह गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए तो अपना अस्तित्व ’जताने’ का माध्यम है । मैं समझता हूँ यह वाक्य कोई दू सरा लिखता, तो ‘जताने’ के स्थान पर ’बचाने' शब्द का प्रयोग करता। एक शब्द बदलने से पूरा आयाम ही बदल गया है । संपादकीयम्

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वैसे तो इस पुस्तक में संकलित लेख दै निक अखबार के संपादकीय लेख हैं । संपादकीय लेख सामान्यतः एक ही बार पढ़े जाते हैं । लेकिन शर्माजी के इन संपादकीयों में ऐसा कुछ है , जो इन्हें पठनीय बनाता है । वह है उनकी सर्जनात्मकता। इन लेखों में शर्माजी किसी का पक्ष नहीं लेते। सिर्फ विषय पर प्रकाश डालते हैं - अनेक कोणों से। आपको जो समझना हो, वह समझिए। आपको कोई खास बात समझाने का वे आग्रह नहीं रखते। जो कहना है , वह सधी हुई भाषा में बड़ी बेबाकी से कह जाते हैं । ये संपादकीय लेख विविध विषयों को लेकर लिखे गए हैं । वैि�वक से लेकर स्थानीय मुद्दे तक उनमें समाहित हैं । उनमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक सभी प्रकार के विषय आ जाते हैं । उनके लेखों के विषयों में कुछ भी नयापन नहीं होता। सारी बातें हम टीवी पर दे ख-सुन चुके होते हैं । नयापन होता है उनकी सटीक, संतुलित तथा सर्जनात्मक अभिव्यक्ति में। हर रोज की समसामयिक घटनाओं के घटाटोप में से अपने काम का विषय चुनना और उसे हर स्तर पर एक स्तरीय स्वरूप दे ना, अपने आपमें एक चुनौतीपूर्ण कार्य है । लेिकन शर्माजी यह कठिन कार्य पूरे मनोयोग से कर रहे हैं । एक बार मेरे पूछने पर उन्होंन�े कहा था िक कार्य कठिन तो है , परं तु अादत पड़ गई है । थोड़ी शारीरिक (साइनस) पीड़ा भी उन्हें रहती है । लेिकन वे अपने कार्य में उसे बाधक नहीं बनने दे ते। मैं परमात्मा से यही िवनती करता हँू िक वे शर्माजी का स्वास्थ्य अाै र उनकी कर्मनि�ठा सतेज बनाए रखें, तािक वे इसी तरह हम सबको अधिकािधक पठनीय सामग्री दे ते रहें । अस्तु । 29 जनवरी, 2019

- योगेंद्रनाथ िमश्र 40, साईंपार्क सोसाइटी बाकरोल अाणंद (गुजरात)

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संपादकीयम्


आभार

‘संपादकीयम्’ पिछले कुछ महीनों में समसामयिक विषयों

पर लिखी मेरी कुछ टिप्पणियों का संग्रह है । इन टिप्पणियों को है दराबाद के प्रति​ि�ठत और यशस्वी दै निक समाचार पत्र ‘डे ली हिं दी मिलाप’ ने अपने संपादकीय पृ�ठ पर स्थान दिया – इस हे तु संपादक महोदय सहित समस्त ‘मिलाप' परिवार के प्रति आभारी हूँ। साथ ही, इस दिशा में प्रेरित करने वाले रवि श्रीवास्तव जी के समक्ष शब्दहीन हूँ। िबखरी हुई सामग्री को पुस्तक का रूप प्रदान करने के िलए साै भाग्यवती डाॅ . गुर्र मकोंड�ा नीरजा को तो मेरा रोम-रोम असीसता है । 26 जनवरी, 2019

संपादकीयम्

- ऋषभ

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अनुक्रम खंड 1 ः �त्री संदर्भ नोबेल शां ति पुरस्कार : एक असाधारण वीरां गना को बोलने वाली औरतें बनाम पुरुष प्रधान समाज जबकि हर पुरुष स्वयं आयोग है विवाहे तर संबंध : निजता बनाम नैतिकता परं परा के नाम पर भेदभाव कब तक समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव सुपौल से बॉलीवुड तक पीड़ित बेटियाँ बेटियों के सामने शर्मिंदा एक महादे श सबसे खतरनाक जगह : घर? अमानुषिक है प्रथा के नाम पर औरत पर बर्बरता एक �त्री-विरोधी कुप्रथा से मुक्ति मुस्लिम �त्री के मानवाधिकार की खातिर

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खंड 2 ः लोकतंत्र अाैर राजनीित अल्पसंख्यों का स्वर्ग भारतीय संविधान के बावजूद अन्य संविधान क्यों? उपेक्षित लद्दाख का दर्द रिश्ता वोट का शराब से मतदाता की उदासीनता का अर्थ राजनीति की भाषा में बढ़ती अशि�टता जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र क्या बदल रहा है भाजपा का भी चरित्र सवर्ण आरक्षण : हल या छल? विरोध भी, समर्थन भी : खूबी लोकतंत्र की ज़ोर-आजमाइश से पहले शक्ति-प्रदर्शन चुनाव का मौसम और डां स बार संपादकीयम्

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खंड 3 ः जो उपजाता अ�न सबका अ�नदाता हड़ताल पर है !?

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अ�नदाता से दिल्ली दू र क्यों?

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कर्ज़ माफ़ करने की राजनीति

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आत्महत्याओं का इलाज़ कर्ज़माफ़ी नहीं

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खंड 4 ः शहर में दावानल अब जिसे भी दे खिए, उस पर गुलेलें हैं

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लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़-न्याय

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अब किसके पिता की बारी है ?

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न्याय का शासन ़ े क न्यूज़ का चक्रव्यूह? कैसे टू टे गा फ

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ऊपरवाला दे ख रहा है

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खंड 5 ः व्यवस्था का सच इं तज़ाम की पोल खोलती पहली बारिश

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ये मौत की सड़कें...

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बिन पानी सब सून

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ये सेि�टक टैंक� साफ करने वाले...

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हिं सा के महिमामंडन का दु ष्परिणाम

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खंड 6 ः हमारी बेिड़याँ िहं सा अाै र हताशा

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आधुनिक गुलामी और हम

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क्यों होती हैं बुराड़ी जैसी भीषण घटनाएँ

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तो शब्दकोश में नहीं रहे गा – दलित?

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‘प्रणय’ की हत्या, प्रति�ठा के नाम पर!

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तुम्हारी जाति क्या है , डॉक्टर?

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मंदिर प्रवेश : समाज सुधार या राजनीति

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खंड 7 ः अस्तित्व के सवाल ये बच्चे भारत के नागरिक नहीं? सुरक्षित नहीं हैं हमारे बच्चे असहाय और असुरक्षित बुढ़ापा भुखमरी : सब पर अभिशाप! विकास बनाम भुखमरी धरती का बढ़ता बुखार ...तो क्या समुद्र में समा जाएँ गे तटीय शहर? जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना...

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खंड 8 ः वैि�वक संदर्भ दु र्गा पूजा में विदे शी रुचि का अर्थ लद गए वै�वीकरण के दिन? आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड हथियार चमका रहा ड्रैगन! संयुक्त रा�ट्र की बंधक स्थिति अंतरिक्ष पर कब्जे की खातिर युद्ध करना नहीं, शां ति लाना है बहादु री

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नोबेल शांति पुरस्कार : एक असाधारण वीरांगना को डे निस मुक्केगे और नादिया मुराद को दु निया भर में हर तरह के युद्ध और संघर्ष में हथियार के रूप में ‘यौन हिं सा’ के इस्तेमाल को खत्म करने के प्रयासों के लिए 2018 का नोबेल शां ति पुरस्कार दिया गया है । इन दोनों ही शख़्सियतों ने युद्ध-अपराधों की तरफ दु निया का ध्यान खींच�ने और उनसे टकराने का जो साहस दिखाया है , वह अद्वितीय और अभूतपूर्व है । इन्हें नोबेल दिए जाने से यह उम्मीद जगी है कि दु निया भर में हर प्रकार के यौन शोषण के खिलाफ़ एक सजग वातावरण का निर्माण होगा। कां गो के डे निस मुक्केगे एक ��ी-रोग विशेषज्ञ हैं और उन्होंन�े अपना जीवन कां गो में यौन हिं सा की शिकार औरतों की चिकित्सा के लिए समर्पित कर रखा है , जबकि नादिया मुराद स्वयं इस्लामी आतंकवादियों की यौन दासी (सेक्स स्लेव) के रूप में नारकीय यंत्रणा भोग चुकी हैं । नादिया मुराद की जीवन गाथा वास्तव में हड्डियों को कँपा दे ती है । इराक के एक गाँ व में जन्मी नादिया उस वक्त उ�नीस साल की थी जब 15 सितंबर, 2014 के मनहूस दिन इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने उनके छोटे से गाँ व को घेरकर उनकी नस्ल (यज़ीदी) को सामूहिक नरसंहार का निशाना बनाया। इस हत्याकां ड में 600 लोग मारे गए। नादिया ने अपनी आँ खों के आगे अपने छह भाइयों का क़त्ल होते दे खा। आतंकियों ने किशोरियों और युवतियों को नहीं मारा। औरतों को मारने के बजाय ‘भोगना’ अधिक पौरुषपूर्ण (!) होता है न। उस साल इराक में इस्लामिक स्टेट ने इस तरह 6700 औरतों को अपना गुलाम बनाया था। नादिया को मोसुल शहर में गुलाम बनाकर रखा गया। उन्हें बेरहमी से पीटा जाता था, जलती सिगरे टों से दागा जाता था और बलात्कार किया जाता था। यज़ीदी समुदाय दु निया का एक सबसे पुराना मजहब है और सु�नी समुदाय के आतंकवादी इससे आरं भ से ही घृणा करते रहे हैं । इस्लामिक स्टेट के संपादकीयम्

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आतंकियों ने इस समुदाय को समूल न�ट करने के उद्दे श्य से पुरुषों को तो सीधे मौत के घाट उतार दिया, लेकिन औरतों को ‘सेक्स दासी’ बनाकर रख लिया। पर इतने से ही उनकी हिं सावृत्ति को संतोष नहीं मिलता। वे इन औरतों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए आतंकित करते हैं और फिर मारकर सामूहिक कब्रों में दफना दे ते हैं । उनकी धारणा है कि हर यज़ीदी को इस्लाम कबूल करके मर जाना चाहिए! ऐसे दरिं दों के बीच नादिया ने ‘सेक्स स्लेव’ की ज़िंदगी गुजारी और एक बार नहीं छह-छह बार भागने की असफल कोशिश की। सातवीं कोशिश में किसी तरह पड़ोसी की सहायता से अंततः सफल हो सकीं और जर्मनी पहुँच गईं। मीडिया के सहारे उनकी गाथा दु निया के सामने आई और संयुक्त रा�ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष `मानव-तस्करी तथा युद्ध` जैसे विषय पर उन्होंन�े अपने विचार रखे। इसके बाद से युद्ध और संघर्ष में यौन हिं सा के खिलाफ जागरूकता अभियान ही उनका जीवन हो गया। 2017 में उनकी आपबीती एक किताब के रूप में दु निया के सामने आई। ‘आखिरी लड़की : दासता की मेरी कहानी और इस्लामिक स्टेट के खिलाफ मेरा संघर्ष’ (द लास्ट गर्ल : माइ स्टोरी ऑफ कैि�टविटी एं ड माइ फाइट अगेन्स्ट द इस्लामिक स्टेट) नाम की यह किताब मध्यपूर्व में इस्लामिक स्टेट द्वारा औरतों पर ढाए जाने वाले कहर की दिल हिला दे ने वाली दास्तान है । मजहबी-आतंकियों द्वारा यज़ीदी समुदाय और उनकी औरतों के साथ की गई दरिं दगी के बारे में दु निया ने नादिया की ज़ुबानी पहली बार जाना। उनका कहना है कि, “हर बार उन घटनाओं का जिक्र मुझे उसी भयावह माहौल की याद दिलाता है , मगर मैं यज़ीदी समाज की टीस को दु निया को बताना चाहती हूँ कि कैसे यौन हिं सा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है । उस अकल्पनीय खौफ़ को बयान करने का मकसद अभी भी कब्जे में फँसी हजारों औरतों को आजाद कराना है ।“ इस असाधारण वीरां गना को श्रद्धापूर्वक नमन! (डे ली हिं दी मिलाप, 23 अक्तूबर, 2018)

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संपादकीयम्


बोलने वाली औरतें बनाम पुरुष प्रधान समाज ‘मी टू ’ अभियान के तहत मनोरं जन उद्योग, मीडिया, राजनीति, शिक्षा जगत और अध्यात्म की दु निया तक से महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से आम लोग सहमे हुए हैं । शर्मिंदगी और गुस्से के भाव उन्हें बेचैन कर रहे हैं । यह बात अलग है कि कुछ लोगों को यह सब अतिरं जित और प्रायोजित भी प्रतीत हो रहा है - राजनीतिपूर्ण भी! दरअसल यह हमारे समाज का ऐसा सच है जिससे कोई भी जल्दी से आँ ख नहीं मिलाना चाहता। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन और समाज स्वस्थ और सुंदर बन सके तो इस सच्चाई को स्वीकार करके इसका निराकरण करना होगा कि घर-बाहर सर्वत्र अभी तक भी भारत में महिलाओं को बड़ी हद तक पुरुष के उपभोग की सामग्री के रूप में दे खा जाता है । अब तक महिलाएँ पारिवारिक, सामाजिक या आर्थिक कारणों से इस स्थिति को चुप रहकर सहती आईं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे इसके लिए राजी और सहमत थीं। बस वे बोलने जैसी स्थिति में नहीं थीं। सच तो यह है कि आज भी उन्हें अपने इस बोलने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है । लेकिन फिर भी अब वे साहस (या दु स्साहस?) पूर्वक बोलने लगी हैं और इससे बहुत से चमकीले चेहरों के आवरण उतरने के कारण कुछ न कुछ असहजता अवश्य महसूस की जा रही है । दू सरी ओर �त्री-दे ह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाली महिलाएँ भी समाज में सदा रही हैं । उनकी भी पहचान की जानी चाहिए और खुद को ‘लुभाने वाली वस्तु’ की तरह पेश करने की प्रवृत्ति की भी निंदा की जानी चाहिए। �त्री और पुरुष दोनों ही अगर एक दू सरे की किसी भी प्रकार की स्वाभाविक कमजोरी का शोषण करते हैं , तो इसे वां छनीय नहीं माना जा सकता। समाज में आज भी पुरुष ही प्रधान है । इसलिए उसे यह समझना होगा कि उसकी इस लाभकारी स्थिति के आधार पर उसे �त्री को अपनी वासना पूर्ति के संपादकीयम्

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लिए सदा सर्वत्र उपलब्ध और प्रस्तुत सामग्री मानने की छूट नहीं मिल जाती। उसे �त्री जाति का सम्मान करना सीखना होगा। साथ ही ि�त्रयाँ भी अपने आपको ‘मनुष्य’ समझें, ’वस्तु’ की तरह प्रस्तुत न हों, स्वयं का सम्मान करें ि�त्रयों को भी यह सीखने की जरूरत है । आज बड़ी संख्या में महिलाएँ घर के बाहर विभि�न कर्मक्षेत्रों में उपस्थित हैं । फिर भी अभी तक यह संख्या अनुपात की दृि�ट से संतोषजनक नहीं है । इसका बड़ा कारण यह भी है कि अपने �त्री होने मात्र के कारण वे असुरक्षा ही नहीं, बहुत बार असम्मान को बर्दाश्त करने के लिए अभिशप्त हैं । समय आ गया है कि वे इस अभिशाप से मुक्त हों क्योंक�ि यह उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए भी अभिशाप जैसी स्थिति है । इसके लिए यह जरूरी है कि समाज �त्री-उत्पीड़न के प्रति चुप रह जाने के अपने पुराने चरित्र के खोल से बाहर आए। �त्री-उत्पीड़न एक गंभीर अपराध है , इसमें लिप्त व्यक्तियों को उनके किए का दं ड कानून के हिसाब से मिलना ही चाहिए। जीवन के प्रत्येक कर्मक्षेत्र में ऐसे वातावरण का निर्माण करना बेहद जरूरी है कि ि�त्रयाँ सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सकें। अगर भारत जैसी अति प्राचीन और परं परागत रूप से खुलेपन में यकीन रखने वाली सभ्यता आज भी अपनी महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानित वातावरण नहीं दे पा रही है , तो इसे हमारी सामाजिक मनोविकृति ही कहा जा सकता है । जितनी जल्दी हो सके हमें इस सामूहिक विकार से स्वयं को मुक्त करना होगा वरना सारी प्रगति व्यर्थ चली जाएगी। वह ज़माना गया जब काम पर जाने वाली महिलाओं या आत्मनिर्भर महिलाओं को लोग सहज उपलब्ध सामग्री मानना अपना पुरुषोचित अधिकार समझते थे; और वे भी इसे झेलने के लिए विवश हुआ करती थीं! (डे ली हिं दी मिलाप, 13 अक्तूबर, 2018)

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जबकि हर पुरुष स्वयं आयोग है भारतीय जनता पार्टी के दो माननीय सां सदों की यह माँ ग विचार की भी माँ ग करती है कि भारत जैसे दे श में रा�ट् रीय महिला आयोग की तर्ज़ पर एक रा�ट् रीय पुरुष आयोग भी होना चाहिए। वे एक ऐसे आयोग का गठन करवाना चाहते हैं जो कि कानूनों के दु रुपयोग के माध्यम से ´महिलाओं द्वारा पुरुषों की प्रताड़ना´ से जुड़ी शिकायतों पर सुनवाई कर सके। लोकतंत्र में ऐसी किसी माँ ग पर रोक तो है नहीं। इसलिए अगर किसी ने भी यह माँ ग उठाई है तो इससे हमारे समाज और कानून की इस अंदरूनी सच्चाई का पता चलता है कि प�नी पीड़ित पति संघ की तर्ज़ पर ऐसे किसी आयोग के गठन की ज़रूरत महिलाओं द्वारा प्रताड़ना की तुलना में कानून के दु रुपयोग के कारण अधिक महसूस की जा सकती है । अन्यथा किसे नहीं मालूम कि हमारा समाज आज भी घोर पुरुषवादी समाज है तथा अपने वर्चस्व के दर्प में फूला हुआ हर पुरुष स्वयं एक-एक आयोग है । अभिप्राय यह कि ऐसे किसी आयोग के गठन की माँ ग उठाने की तुलना में ग्रास रूट लेवल पर कानून के सही इस्तेमाल की जागरूकता पैदा करना आज ज़्यादा ज़रूरी है । विवाहित महिलाओं के उत्पीड़न और घरे लू हिं सा व शोषण का निवारण करने के उद्दे श्य से भारतीय दं ड संहिता की धारा 498-ए बहुत महत्वपूर्ण है जिसमें पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा अत्याचार की रोकथाम का प्रावधान है । इसका दु रुपयोग न हो सके, यह सुनि​ि�चत करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में ही पुलिस और मजिस्ट्रेट से लेकर परिवार कल्याण समिति तक के बारे में स्प�ट निर्देश� दे रखे हैं । रोचक यह भी है कि पुरुष आयोग के गठन की इस माँ ग को अब तक संसद और संसदीय समिति के सामने तो उठाया ही जा चुका है ; इसके लिए जनसमर्थन जुटाने के लिए आं दोलन की भी तैयारी है । इसमें संदेह नहीं कि इस प्रकार के आं दोलन महिला सशक्तीकरण के अभियान को कमजोर करते हैं और कहीं न कहीं मूलतः �त्री-द्वे षी मानसिकता से प्रेरित होते हैं । भारत जैसे संपादकीयम्

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समाज में पुरुष को लैंग�िक भेदभाव के आधार पर पीड़ित और प्रताड़ित इकाई के रूप में पेश करना, इस मूलभूत सच्चाई से आँ ख फेरने के समान है कि व्यापक स्तर पर आज भी इस दे श में �त्री के साथ मात्र इसलिए अन्याय किया जाता है कि उसने पुरुषों की दु निया में �त्री के रूप में जन्म लिया है । हमारी मूल लड़ाई उस मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जो �त्री को खाने-पीने, उठनेबैठने, हँ सने-बोलने और ओढ़ने-पहनने तो क्या, जीने तक की आज़ादी नहीं दे ती जिसके कारण यहाँ ि�त्रयाँ प्रतिपल डर-डर कर जीती हैं । इसीलिए उन्हें अपने लिए रा�ट् रीय महिला आयोग जैसे मंच की ज़रूरत है । पुरुष को ऐसे किसी सामाजिक उत्पीड़न का कोई भय नहीं है । वर्तमान उपलब्ध कानून उसकी रक्षा के लिए काफी हैं बशर्ते कि उनका ठीक-ठीक अनुपालन सुनि​ि�चत किया जाए। तर्क दिया जा रहा है कि बहुत से ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें पुरुष भी प�नीयों द्वारा प्रताड़ना के शिकार होते हैं । अदालतों में इस प्रकार के कई मामले विचारधीन हैं । ऐसे पुरुषों के हितों की रक्षा के लिए भी रा�ट् रीय आयोग होना चाहिए क्योंक�ि ि�त्रयाँ के हितों की रक्षा के लिए है ; यह तर्क निरर्थक है क्योंक�ि महिला आयोग के पीछे निहित मानवाधिकार के विचार को ही समझने में असफल है । अपनी दोयम सामाजिक स्थिति के कारण अभी कम से कम और सौ साल तक इस दे श की महिलाओं को विशेष व्यवहार की ज़रूरत रहे गी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पुरुष और ि�त्रयाँ दोनों ही प्रताड़ित हो सकते हैं । दोनों ही के पास न्यायालय की शरण में जाने का विकल्प मौजूद है । पर हमारा समाज कुछ ऐसा रहा है जहाँ ि�त्रयॉं को न्यायालय तक सहज और समान पहुँच आज भी नहीं मिल पाती। यही कारण है िक रा�ट् रीय महिला आयोग ि�त्रयॉं को इस प्रकार की पहुँच सुलभ कराने की दृि�ट से एक उपयोगी और आवश्यक मंच है । इसके विपरीत, रा�ट् रीय पुरुष आयोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है क्योंक�ि पुरुषों को न्यायालय तक सहज पहुँच हासिल है । (डे ली हिं दी मिलाप, 04 सितंबर, 2018)

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संपादकीयम्


विवाहे तर संबंध : निजता बनाम नैतिकता सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने एकमत से भारतीय दं ड संहिता की धारा-497 को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया है । इसका अर्थ है कि अब से विवाहे तर संबंध अथवा व्यभिचार ‘अपराध’ की श्रेणी में नहीं रहे गा। यह फैसला एक ओर तो सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उठा हुआ बड़ा क्रांतिकारी और अत्यंत महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होता है । लेकिन दू सरी ओर इससे परिवार और समाज के आपसी व्यवहार की नैतिकता से जुड़े हुए कई प्रकार के सवाल भी उठने स्वाभाविक हैं । दरअसल, न्याय की तुला कई बार विवश भी होती है । इस मामले में भी ऐसा ही प्रतीत होता है कि नैतिकता और निजता के टकराव में माननीय न्यायालय को निजता का अधिकार अधिक न्यायसंगत लगा; जबकि नैतिकता और उसका नियमन कानून का कम तथा सामाजिक संस्कारों का विषय अधिक प्रतीत हुआ। इसीलिए अपने निर्णय को पु�ठ करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने धारा-497 की असंगतियों को गिनाया है । व्यभिचार विषयक इस कानून की सबसे बड़ी असंगति यह थी कि इसमें �त्री को पुरुष की संपत्ति माना गया था, जबकि हमारा संविधान ऐसी किसी व्यवस्था की अनुमति नहीं दे ता। उसके अनुसार तो पति और प�नी दोनों बराबर हैं । इस धारा की व्यवस्थाओं का �त्री के जीने के अधिकार पर विपरीत असर पड़ता था। माननीय न्यायाधीशों ने ठीक ही इसे महिला की गरिमा के विपरीत माना और भेदभाव तथा असमानता पर आधारित होने के कारण संविधान की भावना अर्थात समानता, स्वतंत्रता और निजता के अधिकारों के विपरीत जानकर रद्द कर दिया। यह कानून �त्री की इच्छा-अनिच्छा का कोई सम्मान नहीं करता था। पति की अनुमति अधिक महत्वपूर्ण थी। यदि पति की अनुमति हो, तो प�नी से कोई भी परपुरुष दै हिक संबंध बनाने के लिए आजाद था। दू सरी ओर, अगर ऐसा संबंध पति की इच्छा के बिना बनाया जाता, तो ऐसा करने वाला पुरुष पाँ च साल संपादकीयम्

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के कारावास तक की सजा भुगतने का हकदार होता। भले ही उसने ऐसा उस �त्री की इच्छा और सहमति से ही किया हो। �त्री की सहमति-असहमति अर्थहीन होने से इस व्यभिचार-कर्म के लिए �त्री को न तो जिम्मेदार माना गया था और न ही दं डनीय। एक रास्ता यह भी हो सकता था कि व्यभिचार या जार-कर्म को अपराध ही माना जाता और दोनों ही पक्षों को अर्थात विवाहे तर संबंध में शामिल पुरुष और �त्री दोनों ही को समान दं ड का भागी घोषित किया जाता। लेकिन ऐसा करना बदलते हुए समाज की गति के विरुद्ध जाना होता। साथ ही, दै हिक संबंध के लिए अपना साथी चुनने की व्यक्ति की निजी आजादी का अतिक्रमण भी होता। शायद इसीलिए शीर्ष अदालत ने यह कहकर जिम्मेदारी समाज के ऊपर डाल दी कि विवाहे तर संबंध या व्यभिचार अनैतिक भले ही हो, गैर-कानूनी नहीं है । इसका अर्थ हुआ कि अनैतिक आचरण में संलिप्त �त्री-पुरुष कानून के समक्ष जवाबदे ह नहीं है ; समाज के समक्ष भले ही हों। पर यहाँ यह भी सवाल उठता है कि, नैतिकता और कानून क्या साथ-साथ नहीं चल सकते?

�त्री-पुरुष संबंध पूर्णत: ‘निजता’ का मामला है और किसी भी महिला को

समाज की इच्छा के अनुसार चलने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। इस नजरिए से यह नई व्यवस्था पहले की �त्रीविरोधी व्यवस्था के स्थान पर �त्री की पक्षधर है और उसकी इच्छा का सम्मान करती है । साथ ही यह भी स्प�ट कर दिया गया है कि भले ही विवाहे तर संबंध अपने आप में अपराध न हो लेकिन वह तलाक का आधार अवश्य हो सकता है तथा किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए जिम्मेदार भी।

इस सबके बावजूद इस खतरे से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अनैतिक संबंधों की इस वैधानिक स्वीकृति का परिणाम भारत की सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक भी हो सकता है । निजता के नाम पर खुलेआम विवाहे तर संबंधों को मिली वैधता से ऐसे संबंधों की बाढ़ आ सकती है और तलाकों की संख्या भी बढ़ सकती है । विवाह और विवाहे तर संबंधों के एक साथ चल सकने की अनुमति से विवाह संस्था की मर्यादा भी खंडित होगी। परित्यक्ता ि�त्रयों की पीड़ा तो दोगुनी हो ही जाएगी। बहुविवाह जैसी बुराई को भी प्रश्रय मिल सकता है । इसलिए भले ही न्यायपालिका ने व्यभिचार को वैधता प्रदान कर दी हो, किंतु उसे नैतिकता प्रदान करना उसके वश की बात नहीं!   (डे ली हिं दी मिलाप, 29 सितंबर, 2018)

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संपादकीयम्


परं परा के नाम पर भेदभाव कब तक शबरीमलै मंदिर में महिलाओं के प्रवेश-निषेध के औचित्य-अनौचित्य पर चर्चा के बहाने एक बार फिर परं परा और आधुनिकता की बहस छिड़ गई है । हमारा दे श एक साथ कई युगों में जीने वाला दे श है । यह इसकी ताकत भी है , और कमजोरी भी। परं परा का अर्थ जब संस्कृति के उदात्त और सार्वभौम मूल्यों के पीढ़ी दर पीढ़ी बहते आने से लगाया जाता है , तो उससे इस दे श की भीतरी ताकत के स्रोत का अंदाज़ा होता है । परं परा का अर्थ यदि एक पैर ज़मीन पर जमाकर दू सरे पैर को अगले कदम के रूप में ऊपर उठाने से लगाया जाता है , तो इस दे श की प्रगतिशीलता और बहुलता का रहस्य समझ में आता है । लेकिन जब परं परा का अर्थ जड़-रूढ़ियों के पालन तक सिमट जाता है , तो इस दे श की लंबी गुलामी के कारणों पर से पर्दा उठता है । प्रथाएँ अगर मनुष्य को मनुष्य न समझें और काल्पनिक अलौकिक शक्तियों को उसका मालिक बना दें , तो धीरे -धीरे वे ठहरे ताल की तरह सड़ाँ ध से भर उठती हैं । इसलिए किसी भी समाज के लिए यह ज़रूरी होता है कि वह दे शकाल के सापेक्ष अपनी प्रथाओं पर पुनर्विचार करता रहे और सड़ाँ ध मारते पानी को बदलता रहे । मनुष्यता के विपरीत प्रतीत होने वाली प्रथाओं को छोड़ने या बदलने का भारत में पुराना इतिहास मिलता है । वस्तुतः प्रथा या पुरातनता के नाम पर किसी अनुचित नियम को बनाए रखना भारत का स्वभाव नहीं है । इसलिए जब यह तर्क दिया जाता है कि सदियों से शबरीमलै मंदिर में 10 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं के प्रवेश-निषेध का नियम चला आ रहा है और इसीलिए आज भी उसे चलते रहना चाहिए, तो ऐसे तर्क शाि�त्रयों पर हँ सी भी आती है और तरस भी। मासिक-धर्म की सीमित तिथियों में महिलाओं का स्वेच्छा से किसी विशेष प्रकार के आचरण का निर्वाह तो खैर समझ में आ सकता है , लेकिन संतानोत्पत्ति में समर्थ महिला-मात्र को अपवित्र मानना या ब्रह्मचर्य के पालन में उन्हें असमर्थ मानना पुरुष-अहं के अलावा और कुछ नहीं संपादकीयम्

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है । ऐसी तमाम �त्री-विरोधी प्रथाएँ दे श और समाज को कलंकित करती हैं , अतः इनसे जितनी जल्दी मुक्त हुआ जाए उतना अच्छा। दरअसल, धर्म और भगवान को ऐसी प्रथाओं में बंदी बनाकर रखना ही स्वयं में अधार्मिक है । दे श भर में ऐसे अनेक संत और सुधारक हुए हैं , जिन्होंन�े लोगों को समय-समय पर चेताया है कि ई�वर के राज्य में प्रवेश के लिए किसी के साथ भी धर्म, जाति, वर्ण, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव संभव नहीं है । �त्री-पुरुष के भेदभाव का तो कोई प्र�न ही नहीं। ये भेदभावपूर्ण तथाकथित नियम अगर ि�त्रयों को अपने आराध्य के समक्ष आने से रोकते हैं , तो इसका अर्थ है कि वे उन ि�त्रयों की भक्ति और मुक्ति के सहज मानवीय और संवैधानिक अधिकार पर रोक लगाते हैं । यदि प्रभु के राज्य में भी यह असमानता-पूर्ण नियम लागू है , तो या तो वह राज्य प्रभु का नहीं (पुजारियों का है ), या फिर वह नियम प्रभु का नहीं (दरबानों का है )। ई�वर के समक्ष लैंग�िक भेदभाव बरतना आपराधिक है ; और अधार्मिक भी – ‘राम प्रताप विषमता खोई’। भक्त को भगवान के सम्मुख होने से रोकना द्वारपालों का दं भ भले हो, ई�वर को प्रिय नहीं हो सकता। ऐसे द्वारपालों को तो वैकुंठ तक से निष्काषित किया जाता रहा है । दरअसल, भक्तों पर प्रतिबंध लगाने वाली कोई भी प्रथा उनके आराध्य दे व को जड़-रूढ़ियों का बंदी बनाने के समान है । दे वता तो लोक का है , उसे लोक से दू र करना हर प्रकार से अनुचित है - लोकद्रोह है । यह प्र�न केवल �त्रीअधिकार का ही नहीं, ‘भक्त-अधिकार’ का भी है । इसलिए आज की आवश्यकता है कि धार्मिक संस्थाएँ मानव-विरोधी प्रथाओं का पोषण छोड़ें और मंदिर में प्रति​ि�ठत आराध्य दे वता को बंधनमुक्त करें , ताकि किसी �त्री के ‘भक्त-अधिकार’ का हनन न हो। (डे ली हिं दी मिलाप, 21 जुलाई, 2018)

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संपादकीयम्


समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव केरल के शबरीमलै स्थित अय्यप्पा मंदिर में रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दे ने से जुड़े मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया है । जैसी कि उम्मीद थी, यह फैसला प्रतिबंध को हटाने और सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दे ने के पक्ष में आया है । संविधान और मानव-अधिकार की वि�वव्यापी धारणाओं को ध्यान में रखते हुए इस फैसले का आधार यह है कि ि�त्रयों को उनके ‘�त्री‘ के आराध्यदे व के मंदिर में प्रवेश करने से रोकना लैंग�िक आधार पर भेदभावपूर्ण है । यह परिपाटी हिं दू महिलाओं के आराधना करने के अधिकार का उल्लंघन करती है । यह भी ध्यान रखना होगा कि भक्ति का मूल आधार ‘भक्तिभाव’ है ; उसमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय की दृि�ट में धर्म मूलतः जीवन-शैली है , जिसका उद्दे श्य जीवन को ई�वर से मिलाना है , न कि मनुष्य और ई�वर के बीच कोई दीवार खड़ी करना। न्याय का आधार समानता है और यदि कोई धार्मिक परिपाटी इस मूलभूत मानवीय समानता के खिलाफ है , तो उसे वैधानिक कैसे माना जा सकता है ? इसीलिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह ध्यान दिलाया है कि पितृसत्तात्मक धारणा को आस्था में समानता के साथ खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती। यह कहना उचित ही है कि रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध केवल एक परिपाटी भर है इसे आवश्यक धार्मिक परं परा नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे पलटना दे श के कानून के अधिकार क्षेत्र के भीतर आता है । वैसे भी इस प्रकार का भेदभाव बरतना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के खिलाफ पड़ता है और जब शा�त्रीय मान्यताओं और संवैधानिक मान्यताओं के बीच टकराव हो तो यह उम्मीद की जाती है कि संविधान का सम्मान किया जाए। इसीलिए ि�त्रयों को मंदिर में आने से रोकने के लिए धर्म का ढाल की तरह इस्तेमाल करना न तो वां छनीय है और और न ही स्वीकार्य। संपादकीयम्

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न्याय की लोकतां त्रिक प्रक्रिया में मतभेद की भी पूरी गुंजाइश है । यह थोड़ा विचित्र लग सकता है लेकिन सच है कि ि�त्रयों के अधिकार से संबंधित इस मामले की सुनवाई कर रही चार सदस्यों वाली संविधान-पीठ की एकमात्र महिला सदस्य न्यायमूर्ति इं दु मल्होत्रा इस विषय में न्यायालय के हस्तक्षेप से सहमत नहीं हैं , क्योंक�ि दे श में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाए रखने के लिए गहराई तक धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों के साथ छे ड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। उनका मत है कि यह मसला ‘सती-प्रथा’ जैसे मसले से अलग मिजाज वाला है । ‘सती-प्रथा’ मूलतः ‘सामाजिक कुरीति’ थी जबकि मंदिर-प्रवेश की अनुमति का संबंध धार्मिक परं परा से है । इसलिए उनका यह मत विचारणीय लगता है कि इस संबंध में निर्णय दे ना अदालत का काम नहीं। यह ऐसा टे ढ़ा मामला है जिसमें ि�त्रयों के समानता के अधिकार और किसी धार्मिक संप्रदाय के अपनी पूजा-पद्धति तय करने के अधिकार में टकराव हो रहा है । इससे जुड़े किसी भी निर्णय का अन्य पूजास्थलों पर भी दू रगामी प्रभाव होगा ही। इसलिए उचित तो यही होता कि मंदिर-प्रशासन महिला श्रद्धालुओं की भावना को ध्यान में रखते हुए स्वयं इस प्रतिबंध को हटा दे ता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह विषय न्यायालय के समक्ष पहुँचा, तो न्यायालय की दृि�ट में यह प्रतिबंध धर्म का अनिवार्य हिस्सा न होने के कारण इसे बहुमत से समाप्त करने का फैसला स्वागत-योग्य है । बहुत सी धार्मिक परिपाटियाँ वर्तमान समय में अप्रासंगिक हो गई हैं । जब कभी रजस्वला ि�त्रयों के मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए गए होंग�े, तब की सामाजिक से लेकर स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियाँ तक भि�न रही होंग�ी। आज की स्थितियाँ एकदम भि�न हैं और अब यह मानना कि ‘रजस्वला �त्री अपवित्र होती है ’, किसी भी प्रकार प्रासंगिक और संगत नहीं है । इसलिए इस फैसले को जड़ हो चुकी परिपाटियों से मुक्ति की दिशा में भी नई पहल के रूप में दे खा जाना चाहिए। (डे ली हिं दी मिलाप, 01 अक्तूबर, 2018)

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सुपौल से बॉलीवुड तक पीड़ित बेटियाँ बिहार के सुपौल जिले के कस्तूरबा गां धी बालिका आवासीय विद्यालय में 30 छात्राओं की पिटाई करने के आरोप में गिरफ्तार लोगों में 3 महिलाओं के भी होने की खबर काफी विचलित करने वाली है । इस शर्मनाक घटना से एक बार फिर हमारे पितृसत्तात्मक समाज की बदबू भरी सच्चाई उजागर हुई है । दु ख इस बात का है कि ि�त्रयाँ भी यहाँ मर्दवादी रं ग में रं गी नजर आ रही हैं । एक तरफ तो यह समाज रात दिन बेटियों को बचाने, पढ़ाने और बढ़ाने के नारे लगाता नहीं थकता और दू सरी तरफ उन्हीं बेटियों पर हर तरह के शारीरिक और मानसिक जुल्म ढाने से भी बाज नहीं आता। यह संयोग ही है कि जिस वक्त ‘मी टू कैंप�ेन’ के तहत बॉलीवुड की नामी गिरामी हस्तियों के �त्री शोषक चरित्र की कलंक कथाएँ सामने आ रही हैं , उसी वक्त सुपौल में केवल इसलिए छात्राओं के पीटने की यह वारदात हो रही है कि उन्होंन�े लड़कों की अश्लील हरकतों के खिलाफ आवाज उठाई। चाहे किसी अभिनेत्री पर हमले की घटना हो, चाहे किन्हीं छात्राओं पर गाँ व भर के टू ट पड़ने की वारदात; सब कहीं पुरुष की पशुता का विरोध करने की कीमत बेटियों को और भी उत्पीड़ित तथा अपमानित होकर चुकानी पड़ रही है । जिनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस तरह के तमाम घटनाक्रम पर कम से कम दो शब्द तो कह दें , उन्हें लगता है कि इस सबसे उनका कुछ लेना दे ना नहीं है । क्योंक�ि न तो वे उत्पीड़ित हैं और न उत्पीड़क। यह बीमार मानसिकता तब तक प्रतीक्षा करती रहे गी जब तक इस तरह छे ड़ी और पीटी जाने वाली लड़कियों में उनके अपने परिवार की लड़कियाँ शामिल नहीं होंग�ी! समाज के ज्यादा बड़े हिस्से की इस चुप्पी से �त्री-पीड़क पुरुषों को शह मिलती है इसलिए उसे भी अपराधी माना जाना चाहिए। इस ‘शरीफ’ वर्ग को दु ष्यंत कुमार के इन शब्दों में श्रद्धांजलि ही दी जा सकती है कि, “लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो/शरीफ लोग उठे , दू र जाके बैठ गए!”

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वैसे इस बहाने एक ओर जहाँ बॉलीवुड की हस्तियों की अपनी-अपनी गोलबंदियाँ सामने आ रही है और लोग चटखारे ले लेकर ‘कैट वार’ की खबरें सुन सुनकर मनोरं जन कर रहे हैं , वहीं सुपौल में उद्दं ड लड़कों और उनके अभिभावकों द्वारा स्कू ल में घुसकर छात्राओं की पिटाई का समाचार कहीं हाशिए पर पड़ा सिसक और कराह रहा है । इन लड़कियों का ‘अपराध’ इतना भर था कि कस्तूरबा विद्यालय के छात्रावास में रहकर कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई करने वाली ये बच्चियाँ छात्रावास की दीवारों पर लड़कों की लिखी अश्लील बातों को बार-बार मिटा दे ती थीं और उनका प्रतिवाद कर बैठी थीं। उन्होंन�े अपने विद्यालय के अधिकारियों से जब लड़कों की अभद्र हरकतों की शिकायत की तो उल्टे उन्हें ही चुप रहने का उपदे श मिला। लड़कों का दु स्साहस बढ़ गया। वे और भी अश्लील हरकतों पर उतारू हो गए। बच्चियों ने विरोध किया तो उस समय तो वे लोग चले गए; लेकिन बाद में करीब 20 लोगों की भीड़ ने छात्रावास पर हमला बोल दिया और वहाँ रहने वाली सभी बालिकाओं की निर्ममता पूर्वक पिटाई की। यह जघन्य कृत्य हमारे समाज के घोर मर्दवादी और �त्री-विरोधी कुरूप चेहरे को तो दिखाता ही है , पुरुषों की इस तरह की आपराधिक गतिविधियों में ि�त्रयों की संलिप्तता के बहाने यह भी दर्शाता है कि �त्री जाति के बारे में जड़रूढ़ सामंती सोच समाज की नसों में इस हद तक समा चुका है कि उसमें भयंकर वायरस पनपने लगा है । �त्री का सम्मान न करने वाले ऐसे समाज को शिक्षित और सभ्य भला कैसे कहा जा सकता है ? (डे ली हिं दी मिलाप, 10 अक्तूबर, 2018)

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बेटियों के सामने शर्मिंदा एक महादे श ग्लोबल एक्सपोर्ट के दु निया भर में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े सर्वे के नतीजे चौंक�ाने वाले कम और भारत जैसे ि�त्रयों की पूजा करने और उन्हें जातीय मर्यादा – आन बान शान – का प्रतीक मानने वाले महान दे श के लिए सामूहिक शर्मिंदगी का अहसास कराने वाले ज़्यादा हैं । यह बात अलग है कि कोई इस सर्वे के तौर-तरीके पर सवाल उठाते हुए इसे सिरे से खारिज कर रहा है , तो कोई इसमें राजनीति की संभावनाएँ सूँघकर बेशर्मी से हर्षित हो रहा है । लेकिन क्या आप इस बात से इनकार करने की स्थिति में हैं कि �त्री के मामले में यह दे श अभी तक बड़ी हद तक मध्यकालीन भोगवादी बीमार मानसिकता से ग्रसित है ? पिछले डे ढ़ सौ साल में बहुत कुछ बदलने और सुधरने के बावजूद हमारी बेटियाँ और माताएँ अब भी घर-बाहर सर्वत्र असुरक्षा और भय से ऐसे घिरी हैं जैसे उन्हें मनुष्यों के नहीं, आदमखोर दरिं दों के समाज में रहना-जीना पड़ रहा हो। अगर सर्वे में यह पाया गया है कि भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक दे श है , यौन हिं सा और महिलाओं से गुलामों जैसा व्यवहार करने वालों में यह दे श नंबर वन है तथा �त्री-अधिकारों की हत्या करने में इसने अफगानिस्तान व सीरिया जैसे युद्धग्रस्त दे शों को भी पीछे छोड़ दिया है , तो इन नतीजों में कुछ सीमा तक अतिरं जना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। परं तु इतना तो हम अपने दै निक अनुभव से भी जानते ही हैं कि तमाम शिक्षा और विकास के बावजूद �त्री-रक्षा की दृि�ट से भारत में सब कुछ ठीकठाक नहीं है । पिछले कुछ समय से यह दे खने में आ रहा है कि हम �त्रीविरोधी कट्टर समाज में बदलते जा रहे हैं । कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि अपने बूते अपनी ज़िंदगी जीने का दम भरने वाली आधुनिक �त्री से कट्टर पुरुषों का समाज खु�नस खाए हुए है और इसीलिए अपनी सर्वोपरिता दिखने के लिए मौके-बेमौके �त्री की सुरक्षा को तार-तार करने पर उतारू रहने लगा है । हमारे संपादकीयम्

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ऐसा कहने का आधार यह है कि �त्री जाति मात्र के लिए घर की चारदीवारी और लक्ष्मणरे खाओं से निर्मित परं परागत संहिताओं को लागू करने के लिए लालायित आधुनिक काल की महाविभूतियों में तमाम तरह के पढ़े -लिखे भले मानुस शामिल दिखाई दे ते हैं । औरत की हदें तय करने की यह मर्दाना िज़द �त्रीद्वे षी सोच का परिणाम है , इसमें दो राय नहीं। वैसे दो राय इसमें भी नहीं कि संविधान और दं ड संहिता के लिहाज से हमने ि�त्रयों की सुरक्षा और मर्यादा के बड़े पुख्ता इं तजाम किए हुए हैं । समाज और राजनीति के तमाम उपदे शक इस बारे में तमाम तरह की अच्छी-अच्छी बातें करते दे खे जा सकते हैं । फिर भी कहीं तो कुछ गड़बड़ है कि हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं । हम नहीं कहते कि रा�ट् रीय महिला आयोग की अध्यक्ष का यह कथन कहीं से भी गलत है कि भारतीय महिलाएँ बहुत जागरूक हैं और यह संभव नहीं कि उनकी दशा युद्धग्रस्त दे शों की महिलाओं से भी बदतर हो; क्योंक�ि वैसी दशा में तो सारे अधिकार निरस्त हो जाते हैं और महिलाएँ ही किसी भी युद्ध में सबसे ज़्यादा सताई जाती हैं । लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि हमारे समाज में किसी न किसी स्तर पर महिलाओं के खिलाफ सचमुच युद्ध जैसा वातावरण बनता जा रहा है ? यह बेहद खतरनाक संकेत है ; क्योंक�ि आए दिन खबरें यही बताती हैं कि हमारी ि�त्रयों की आज़ादी कहीं किसी खाप पंचायत के पास गिरवी धरी है , तो कहीं किसी क्रूर बलात्कारी के पैरों पर गिड़गिड़ा रही है । उठने-बैठने, हँ सनेबोलने, ओढ़ने-पहनने तक पर पहरे हैं , तो आजीविका से लेकर साथी चुनने तक का दु स्साहस करने वाली ि�त्रयाँ भला निर्द्वंद्व और सुरक्षित कैसे रह सकती हैं ? वे पल-पल दबाव और तनाव में जीती हैं कि जाने कब-कहाँ इस चोट खाए पुरुष समाज का कौन विकृत प्रतिनिधि किस बात पर उनके बागी होने का दं ड दे ने पर उतारू हो जाए! इसलिए जब तक हमारे समाज में औरतों को ‘वस्तु’ समझा जाता रहे गा, तब तक हम यों ही शर्मिंदा होते रहेंग�े। ज़रूरत है हर स्तर पर व्याप्त �त्रीद्वे षी कट्टर मानसिकता से मुक्त होने की। (डे ली हिं दी मिलाप, 29 जून, 2018)

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सबसे खतरनाक जगह : घर? संयुक्त रा�ट्र के एक ताजा अध्ययन से यह बात एक बार फिर उभर कर आई है कि दु निया भर में औरतें कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं । इस अध्ययन से पता चला है कि दु निया भर में पिछले साल हत्या का शिकार हुई महिलाओं में आधे से अधिक मामलों में पति या परिवारी जन ने इस प्रकार की वारदातों को अंजाम दिया। अफ्रीका और अमेरिका उन दे शों में अग्रणी हैं जहाँ औरतों को अपने अंतरं ग साथी, पति या परिवार के सदस्यों के हाथों मारे जाने का सबसे ज्यादा खतरा है । अगर भारत की बात करें तो कहना होगा कि दहे ज-हत्या की वारदातें यहाँ अब भी �त्री-विरोधी अपराधों में सबसे ऊपर हैं । भारत के रा�ट् रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार ि�त्रयों की हत्या के कुल मामलों में से 40 से 50 प्रतिशत तक दहे ज-हत्या के होते हैं । वैसे तो दे श में 1961 से दहे ज प्रथा को कानून बनाकर अवैध और प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया है ; लेकिन आज भी यह प्रथा अपने क्रूरतम रूप में विद्यमान है और प्रतिवर्ष अनेक ि�त्रयों की जान दहे ज की बलिवेदी पर कुर्बान हो जाती है । इस अध्ययन का निचोड़ यह बताया गया है कि आज की तारीख में औरतों के जीवन के लिए सबसे खतरनाक जगह ‘घर’ है । अर्थात जिस स्थान को �त्री के लिए सबसे अधिक सुरक्षित होना चाहिए था, वही उसके लिए सबसे असुरक्षित और खतरनाक बन गया है । भारत में तो यह माना जाता रहा है कि �त्री की सुरक्षा पिता, पति और पुत्र के रूप में उसके परिवारी जन का प्राथमिक कर्तव्य है और इसलिए �त्री को अपनी सुरक्षा की चिंता ही नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसी मान्यता के कारण समाज में यह प्रथा भी प्रचलित हो गई कि �त्री को किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता का अधिकार नहीं है और जिस प्रकार घर की अन्य वस्तुओं की दे खभाल और सुरक्षा की जाती है , �त्री भी उसी प्रकार की दे खभाल और सुरक्षा का पात्र होने के कारण केवल एक वस्तु है । �त्री के इस वस्तूकरण का दु खद परिणाम उसके अधिकारों के स्थगन के रूप में सामने आया और उसकी इच्छा-अनिच्छा का, रुचि-अरुचि का प्र�न ही निरर्थक माना जाने लगा। ऐसी स्थिति में किसी प्रकार के निर्णय का अधिकार तो उसे हो ही नहीं सकता। संपादकीयम्

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परिस्थितियाँ अन्य दे शों में भले ही भि�न रही हों, लेकिन �त्री के अधिकारों पर डाका डालने की प्रवृत्ति सभी जगह एक जैसी रही है । यही कारण है कि संयुक्त रा�ट्र का यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर भी पहँु चता है कि घर-वालों द्वारा ि�त्रयों की हत्या का एक बड़ा कारण परिवार में अधिकारों का समान बँटवारा न होना है । लैंग�िक असमानता, �त्री और पुरुष के बीच भेदभाव और ऐसी नकारात्मक परं पराएँ जो �त्री को पुरुष से कमतर मानती हैं पुरुष को �त्री पर शासन करने के लिए प्रेरित करती हैं । जब पुरुष अपने शासन में कोई बाधा अनुभव करता है , तो �त्री को रास्ते से हटा दे ता है । इसमें संदेह नहीं कि पिछले कुछ दशकों में दु निया भर में �त्री-अधिकार और �त्री-विमर्श का दौर दौरा है और ि�त्रयों के विरुद्ध हिं सा को रोकने के लिए अनेक कानून और योजनाएँ सामने आई हैं । लेकिन खेद की बात यह है कि इनका कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं मिला है ; कुछ भी कुछ भी तो नहीं बदला है । ऐसे में �त्री के विरुद्ध अपराधों की प्रभावी रोकथाम के लिए कानूनी के साथ-साथ सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कदम भी उठाए जाने की जरूरत है । न्याय-प्रक्रिया को तो तेज करना ही होगा। खास बात यह है कि समस्या के समाधान की प्रक्रिया में पुरुषों को भी शामिल करना होगा। सबसे ज़रूरी है कि पुरुषों को आरं भ से ही ि�त्रयों के सम्मान की शिक्षा दी जाए क्योंक�ि आज भी अधिकां श पुरुष ि�त्रयों को मनोरं जन की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझते। (डे ली हिं दी मिलाप, 29 नवंबर, 2018)

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अमानुषिक है प्रथा के नाम पर औरत पर बर्बरता बहुत बार सामाजिक परिवर्तन की राह न्यायपालिका से होकर गुजरती है । तब तो और भी जब बात किसी ऐसी प्रथा पर अटकी हो जिसे धर्म के नाम पर कोई समुदाय सदियों से ढो रहा हो। `�त्री जननां ग` कर्तन, यानी `महिला-खतना` भी ऐसी ही प्रथा है । यह प्रथा साफ तौर पर �त्री-विरोधी है , मानवाधिकार हनन है और अमानुषिक है । इस पर भी कई मुस्लिम समुदायों में आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी अबाध रूप से चल रही है । भारत में दाऊदी बोहरा मुस्लिमों में तो इसकी उपस्थिति और भी चिंताजनक है क्योंक�ि यह समुदाय दू सरे बहुत से मामलों में प्रगतिशील समझा जाता है । महिला खतना की इस अतार्कि क प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, तो तरह-तरह के सवाल उठ खड़े हुए। न्यायालय ने भी पूछ लिया कि, आखिर �त्री के किसी अंग पर किसी और का अधिकार या नियंत्रण स्वीकार्य कैसे हो सकता है ? �त्री जननां ग को एक बर्बर प्रथा के नाम पर काट डालना �त्री-शरीर की अखंडता को भंग करना है , अतः अस्वीकार्य है । दरअसल, संयुक्त रा�ट्र द्वारा प्रतिबंधित होने के बावजूद भारत में दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में लड़कियों की खतना की अमानुषिक प्रथा अभी तक मौजूद है । वे यह मानते हैं कि �त्री के जननां ग का एक खास हिस्सा उन्हें परपुरुष से संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है । इसीलिए उसे `हराम की बोटी` कहा जाता है । औरतें अपने मर्दों के प्रति वफादार बनी रहें , भटकें नहीं; इस खातिर `हराम की बोटी` को काट दे ना उचित बताया जाता है । यानी �त्री के उस अंग को ही न�ट कर दो, जो उसे काम-संबंध में `आनंद` का अनुभव करा सकता हो; ताकि वह पुरुषों के भोग-विलास की वस्तु मात्र बन कर रह जाए! यह साफ-साफ दिकयानूसी पुरुष वर्चस्ववादी सोच का परिणाम है और �त्री के वस्तूकरण की क्रूर प्रक्रिया का प्रतीक भी। यही कारण है कि इसे कानूनी तौर पर प्रतिबंधित करने की ज़रूरत आन पड़ी है । ऐसी दर्दनाक और संपादकीयम्

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शर्मनाक प्रथा की मौजूदगी किसी भी सुसंस्कृ त समाज के लिए कलंक नहीं तो और क्या है ? �त्री जाति के इस प्रकार के मानवाधिकार हनन को यदि कोई धर्म अथवा परं परा के नाम पर बनाए रखने की हिमायत करे तो ऐसा करना सामान्य समझ तक के खिलाफ है । हो सकता है कि कई मुल्कों में यह मूर्खतापूर्ण प्रथा विद्यमान हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि भारत में भी यह जंगलीपन जारी रहना चाहिए। ऐसा करना संबंधित समुदाय को तमाम प्रगति और विकास के बावजूद जहालत की अँधेरी गुफा में पड़ा रहने दे ने की साजिश के समान है । बर्बरता को बनाए रखने के हामियों को बताना चाहिए कि अमेरिका, आस्ट्रे लिया, ब्रिटे न और अफ्रीका में महिला-खतना को कानूनन रोका जा सकता है तो भारत में क्यों नहीं! माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल खुद अपना जवाब भी है कि, अगर ि�त्रयाँ किसी प्रथा को स्वीकार न करें तो क्या उन पर उसे थोपा जाना चाहिए? कदापि नहीं। बल्कि अगर अज्ञानवश वे स्वीकार भी करें , तब भी नहीं। क्योंक�ि यह प्रथा मूलतः मनुष्यता के खिलाफ है , अवैज्ञानिक है , अनावश्यक है , भेदभावपूर्ण है , �त्री शरीर का घोर अपमान है । वास्तव में, �त्री-खतना की पूरी प्रक्रिया धार्मिक प्रथा के नाम पर �त्री को घोर शारीरिक और मानसिक यातना दे ने वाली प्रक्रिया है । यह औरत को अपने ‘औरत होने’ के लिए शर्मिंदा करने वाली घृणित प्रथा है । यह एक ऐसी सज़ा है जो उन औरतों को केवल इसलिए भुगतनी पड़ती है कि उन्होंन�े एक ऐसे अंग के साथ जन्म लिया जो उन्हें ‘औरत’ बनाता है । भोगप्रिय मर्दों की दु निया में केवल भोग्य ‘वस्तुओं’ की जगह होती है । संवेदनशील औरत से उन्हें डर लगता है । वे तो ऐसी प्रथा को बनाए रखना चाहेंग�े ही जो औरत को ‘मनुष्य’ से ‘चीज़’ में तब्दील कर दे । इसलिए कुल मिलाकर यह प्रथा �त्री को उसके ‘मनुष्य’ होने तक के अधिकार से वंचित करती है । सभ्य समाज में ऐसी किसी प्रथा के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। (डे ली हिं दी मिलाप, 14 जुलाई, 2018)

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एक �त्री-विरोधी कुप्रथा से मुक्ति सरकार ने अध्यादे श जारी करके अब ‘एकसाथ तीन तलाक’ को दं डनीय अपराध घोषित कर दिया है । जरा जरा सी बात पर तीन तलाक की लगातार बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए यह कठोर कदम उठाना ज़रूरी भी था। इसके राजनैतिक अर्थ कुछ भी लगाए जाएँ ; सामाजिक दृि�ट से इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम महिलाओं को इस अध्यादे श/ कानून से बड़ी राहत मिलेगी। तीन साल की सजा का प्रावधान होने के कारण यह समझा जा सकता है कि अविवेकपूर्वक या आवेश में ऐसा करने वालों को कुछ तो कानून का खौफ रहे गा। वरना सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कुप्रथा पर प्रतिबंध के बावजूद जिस तरह तीन तलाक की घटनाएँ एक के बाद एक सामने आ रही थीं, उनसे तो यही लगता था कि ऐसा करने वालों के मन में उसके प्रति कोई सम्मान शेष नहीं। अब उस प्रतिबंध को कानूनी रूप मिल गया है तो ‘एक झटके में तीन तलाक’ कहकर प�नी को छोड़ दे ने की घटनाओं पर रोक लगने की उम्मीद बँधी है । भारत की मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकार बहाल करने की दृि�ट से यह एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन सिद्ध होगा। अध्यादे श में इस संभावना को भी ध्यान में रखा गया है कि अगर कभी आवेश या जल्दबाज़ी में दिए गए तीन तलाक के बाद भी पति पहले की तरह प�नी के साथ रहने को तैयार हो तो प�नी के चाहने पर ही दोनों के बीच ऐसा समझौता हो सकता है । ऐसी दशा में उस पुरुष के साथ रहने या न रहने का ‘निर्णय करने का अधिकार’ यह कानून �त्री को प्रदान करता है । �त्री सशक्तीकरण के नजरिए से यह बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान है क्योंक�ि �त्री की इच्छा-अनिच्छा की तनिक भी परवाह न करने वाली तीन तलाक प्रथा पूरी तरह पुरुष-तानाशाही की पोषक प्रथा है । मुस्लिम समाज में विद्यमान परिवर्तन-विरोधी ताकतें तो इस कुप्रथा को धर्म से जोड़कर इस कानून को धर्म-विरोधी बताएँ गी ही। हर सामाजिक परिवर्तन संपादकीयम्

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के साथ ऐसी ताकतें यही रुख अख्तियार किया करती हैं । जरूरी है कि सरकार राजनैतिक हानि-लाभ से ऊपर उठकर समाज के परिवर्तन चाहने वाले तत्वों को साथ लेकर मुस्लिम समुदाय के जागरण के लिए व्यापक प्रयास करे । जो लोग इस कुप्रथा की रक्षा करना चाहते हैं और सरकार को कोस रहे हैं , उन्हें भी यह समझना चाहिए कि यह मूलतः मानव-अधिकार विरोधी और �त्री-विरोधी प्रथा है । अतः उन्हें पुरुषवादी सामंती मानसिकता को त्यागकर मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए आगे आना चाहिए और सामाजिक जागरण की जो लहर इस अध्यादे श के बहाने जाग उठी है , उसे अपना सहयोग और समर्थन दे ना चाहिए। बेशक कई राज्यों में विधानसभा और उसके बाद पूरे दे श में लोकसभा चुनावों की दृि�ट से इस अध्यादे श का समय रणनैतिक महत्व रखता है । लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय से दलगत राजनीति के कारण इससे जुड़े बिल को लटकाए जाने का यही परिणाम होना था। आगे दे खना यह होगा कि अध्यादे श की वैधता की अवधि अर्थात 6 महीने बीतने के बाद इस दे श की दलगत राजनीति इसे स्थायित्व प्रदान करने का मार्ग दे गी अथवा उसे अवरुद्ध कर सामाजिक-परिवर्तन-विरोधी चरित्र के साथ खड़ी होगी। सरकार को भी यह पता है ; इसीलिए उसने अभी से यह प्र�न करना आरं भ कर दिया है कि विपक्षी दल इस विषय पर अपना-अपना रुख जनता के समक्ष साफ शब्दों में रखें। यह असमंजस समाप्त होना चाहिए कि आप मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए लाए जा रहे इस कानून के साथ हैं या नहीं। इसे कां ग्रेस की चालाकी कहा जाए या राजनीतिक मजबूरी कि वह सार्वजनिक चर्चाओं में तो इसका समर्थन करती दिखाई दे ती है , लेकिन संसद में हर बार कोई न कोई अड़ंगा अड़ा दे ती है । अड़ं गा अड़ाने को तरह-तरह के तर्क आज भी विद्यमान हैं , लेकिन महिलाओं की गुलामी का प्रतीक बन चुकी एक कुप्रथा से मुक्ति सबसे बड़ा जवाबी तर्क है ! (डे ली हिं दी मिलाप, 22 सितंबर, 2018)

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मुस्लिम �त्री के मानवाधिकार की खातिर लोकसभा ने ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण (तीन तलाक) विधेयक-2018’ को एक बार फिर पारित कर दिया है । राज्यसभा में इस बार इसका भाग्य क्या होगा, यह बाद की बात है । फिलहाल तो यह महत्वपूर्ण है कि इस विधेयक पर चर्चा के दौरान एक बार फिर यह बात उभर कर आई कि समाज और राजनीति में शामिल यथास्थितिवादी लोग मुस्लिम महिलाओं के मुक्ति के न्यायसंगत मानवाधिकार को धर्म का बहाना लेकर एक बार फिर निरस्त करने की कोशिश (साजिश!) में हैं । विपक्ष द्वारा इस विधेयक का विरोध और वोटिं ग के समय वाकआउट साफ-साफ सियासत है और कुछ नहीं। अल्पसंख्यक कार्य मंत्री का यह कहना दु स्साहस पूर्ण लग सकता है लेकिन गलत नहीं है कि - ‘जो लोग दे श में फतवे की दु कान खोल कर बैठे हैं उनकी इस प्रवृत्ति को अब बंद होना चाहिए। दे श कानूनों से चलता है , फतवों से नहीं।‘ चर्चा से यह बात भी उभर कर आई कि जब भी युगों से चली आ रही किसी गलत प्रथा के विरोध में कानून लाने की बात होती है , तो यथास्थितिवादी विचार के लोग उसका विरोध करते ही हैं । सती प्रथा, बाल विवाह और दहे ज प्रथा हिं दू समाज के ऐसे ही सामाजिक कलंक थे और पुरुष सत्ता के समर्थक इन्हें समाप्त किए जाने के कट्टर विरोधी थे। उस समय यह भय दिखाया गया था कि सती और बाल विवाह जैसी प्रथाएँ समाप्त हुईं तो समाज में व्यभिचार फैल जाएगा। लेकिन इन कुप्रथाओं को अंतत: विदा किया ही गया कर ही दिया गया। तीन तलाक को भी सदा के लिए विदा करने का समय आ गया है । गौरतलब है कि दु निया के अनेक मुस्लिम दे शों ने तीन तलाक की प्रथा को बंद कर रखा है । ऐसे 20 दे शों में पाकिस्तान भी शामिल है । लेकिन भारत में मुस्लिम ि�त्रयों को अभी तक इस कुप्रथा के क्रॉस पर चढ़ाया जाना जारी है । इसलिए यह कहना ठीक लगता है कि यह विधेयक मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाला सिद्ध होगा। मुस्लिम समाज के अपने नेताओं को चाहिए था कि वे वक्त रहते इस कुप्रथा के �त्री विरोधी चरित्र को पहचानते और इस पर प्रभावशाली प्रतिबंध लगाते। लेकिन जब उन्होंन�े ऐसा नहीं किया संपादकीयम्

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तो मजबूरन न्यायालय और संसद को इसमें कूदना पड़ा। किसी लोकतां त्रिक समाज में समाज के किसी वर्ग को अनंत काल तक किसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को ढोने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने वाले इस विधेयक को बार-बार प्रवर समिति को भेजे जाने की माँ ग करने वाले दरअसल इसे अनंत काल तक लटका कर रखना चाहते हैं । उनके पास सबसे प्रमुख तर्क इसके विरोध में यही है कि ऐसा कानून बनाना मुस्लिम समाज की धार्मिक आस्थाओं के साथ छे ड़छाड़ करना है । यह तर्क एकदम खोखला और निराधार है , क्योंक�ि इस्लाम की दृि�ट में यदि ‘कुरान ही कानून है ’ तो पहले भी सिद्ध हो चुका है कि तीन तलाक की व्यवस्था किसी भी प्रकार कुरान-सम्मत व्यवस्था नहीं है । अतः यदि कानून के द्वारा इसे प्रतिबंधित किया जाता है तो यह किसी धार्मिक प्रथा का विरोध नहीं, बल्कि प्रकारां तर से कुरान की ही व्यवस्था को रक्षा प्रदान करने के समान है । विरोध करने वालों को डर था कि कहीं इस कानून का इस्तेमाल पुरुषों को सताने के लिए न किया जाए, तो इस पर विचार करते हुए यह संशोधन कर लिया गया है कि केवल पीड़िता अथवा उसके निकट संबंधी ही केस दायर कर सकेंग�े और आपसी समझौता होने की स्थिति में केस को वापस भी लिया जा सकेगा। तीन तलाक को दं डनीय आपराधिक कृत्य बनाने के पीछे की सच्चाई यह है कि जिस कानून के तोड़ने पर सजा का प्रावधान न हो, उस कानून को किसी भी प्रकार की शक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। इसकी तुलना हिं दू विवाह अधिनियम से करना भी नितां त अनुचित और अप्रासंगिक है । (डे ली हिं दी मिलाप, 29 दिसंबर, 2018)

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अल्पसंख्यकों का स्वर्ग दु निया के कोने-कोने से आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं कि अमुकअमुक समाज में अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की दया पर जीना पड़ता है । आस्था, शिक्षा, संस्कृति और न्याय तो बाद की बात है , उन्हें जीने तक का अधिकार प्राप्त नहीं है । बहुसंख्यकों के पूजास्थलों की बाढ़ होना तो खैर ठीक है , मगर यह कहाँ का न्याय है कि अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी पूजाअर्चना की सब गतिविधि अपने कमरे के भीतर तक ही सीमित रखनी पड़ें ? सबको मालूम है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को कई दे शों से सामूहिक पलायन करना पड़ा क्योंक�ि वहाँ रहना जीवन को खतरे में डालना होता। लेकिन भारत की कहानी इससे एकदम उलटी है । यहाँ तो अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता दी जाती है । भारतीय लोकतंत्र के इसी भि�न चरित्र को अमेरिका की एक संस्था ‘हिं दू अमेरिकन फाउं डेशन’ – एचएएफ – की ताज़ा रिपोर्ट ने एक बार फिर उजागर किया है । ‘भारत : विविधता में लोकतंत्र’ नाम से पेश अपने नीतिगत दस्तावेज़ में एचएएफ ने सुविधाओं और अधिकारों की दृि�ट से भारत को अल्पसंख्यकों का स्वर्ग माना है । हाल ही में यह दस्तावेज़ अमेरिकी संसद की ऐतिहासिक इमारत में जारी किया गया। इस रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि भारत सरकार धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी को ‘अभूतपूर्व’ सुविधाएँ दे ती है । कहने को भले ही भारत की ‘धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी’ में सिख, ईसाई, फारसी, बौद्ध और जैन मतों के अनुयायी भी शामिल हैं , लेकिन मुख्य स्थान इसमें मुस्लिम समुदाय को प्राप्त है , इसमें कोई शक नहीं। इसलिए यह रिपोर्ट आज की तारीख में तब और भी अधिक मानीखेज हो जाती है जब बौद्धिक और राजनैतिक गलियारों में किसी संगठन विशेष की अलोकतां त्रिक गतिविधि के आधार पर पूरे दे श पर तालिबानीकरण के आरोप लगाए जा रहे हों, हिं दू पाकिस्तान की बातें उछाली जा रही हों।

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इसे भारत के समन्वयवादी मानवीय मूल्यों की विजय माना जाना चाहिए कि समाज में आपसी भाईचारे को खंडित करने का वातावरण बनाने वाली बहुत सी घटनाओं के बावजूद विविध समुदायों को परस्पर जोड़कर रखने वाला सामाजिकता और रा�ट् रीयता का धागा अभी तक अखंडित है । एचएएफ का मानना है कि अल्पसंख्यकों के कल्याण की निरं तर चिंता और वैसी योजनाओं के द्वारा इस क्षेत्र में ‘स्थिरता’ को बल मिलता है । इसका अर्थ यह है कि यदि अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित और आशंकित रहे गा तो उसके ऐसी ताकतों से जुड़ जाने या उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने की संभावनाएँ बढ़ जाएँ गी जो भारत और उसके आसपास के इलाके को अशां त और अस्थिर करना चाहती हैं । रिपोर्ट में यह कहा गया है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुविधाएँ प्रदान करना भारतीय लोकतंत्र को शक्ति प्रदान करना है । इस पूरे इलाके में कट्टरपंथी इस्लामी तथा कम्युनिस्ट/ माओवादी आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए ऐसा करना बेहद ज़रूरी है । इसीलिए अमेरिका भी लगातार भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने में रुचि ले रहा है । विविधता की स्वीकृति से लोकतंत्र को ताकत मिलती है । इसे भारतीय परं परा के रूप में पहचानते हुए रिपोर्ट में ठीक ही कहा गया है कि भारत सदियों से बहुधर्मी और बहुजातीय दे श रहा है तथा रा�ट्र -राज्य के रूप में भी इसका महत्व सर्वविदित है । साथ ही इस तथ्य पर ज़ोर दिया गया है कि भारत दु निया के चार प्रमुख धर्मों की जन्मस्थली है और कई दू सरे धर्मों व जातियों के लिए शरणस्थली भी। धर्म, भाषा, जाति और विचार की इस भि�नता को अक्षत रखने के विचार से ही भारतीय संविधान में (अल्पसंख्यक की परिभाषा अलग से दिए बिना) इस बात के पुख्ता इं तजाम किए गए हैं कि किसी भी प्रकार के किसी अल्पसंख्यक समुदाय को कभी अपने आपको विकसित करने के मार्ग में भारतीय लोकतंत्र में कोई व्यवधान न आए। (डे ली हिं दी मिलाप, 31 जुलाई, 2018)

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भारतीय संविधान के बावजूद अन्य संविधान क्यों? रा�ट् रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने जम्मू और कश्मीर के बारे में यह `निजी` राय व्यक्त की है कि जम्मू और कश्मीर के लिए अलग संविधान की व्यवस्था `शायद` एक गलती थी। इस विचार को लेकर जमीन-आसमान एक करने पर उतारू राजनीतिबाजों को इस व्यक्तिगत राय में निहित `संदेह` की तरफ भी ध्यान दे ना चाहिए। यह कोई राजनीतिक निष्कर्ष नहीं है बल्कि रा�ट् रीय सुरक्षा सलाहकार के विश्लेषक मन की `आशंका` भर है । वैसे अगर यह कहा जाए कि आजादी से आज तक इस दे श के साधारण नागरिक के मन में भी यह आशंका और संदेह है कि, ’भला क्यों जम्मू और कश्मीर के लिए अलग संविधान होना चाहिए, जबकि उस राज्य का भारत में विलय अंतिम और परिपूर्ण है ?` प्र�न यह भी उठता है कि अगर किन्हीं तात्कालिक दबावों के तहत यह विशेष स्थान एक राज्य को दिया गया था, तो अनंत काल तक सारा दे श इस ’संभावित’ गलती का बोझा क्यों ढोए? शायद इसे ही लम्हों की गलती की सजा सदियों के द्वारा भुगता जाना कहते हों! 1947–‘50 की राजनैतिक पीढ़ी जम्मू और कश्मीर के बारे में भले ही भावुक होकर सोचती रही हो। कूटनीति के वर्तमान दिग्गजों को तो भारत, भारतीय संविधान और भारत की संप्रभुता के अवलोकन बिंदु से ही इतिहास और वर्तमान को दे खना चाहिए। यही कारण है कि रा�ट् रीय सुरक्षा सलाहकार की टिप्पणी भावुकताविहीन और यथार्थपरक प्रतीत होती है । दे श के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटे ल पर लिखी एक पुस्तक के लोकार्पण के मौके पर जहाँ रा�ट् रीय सुरक्षा सलाहकार ने यह दोहराया कि दे श की मजबूत आधारशिला रखने में पटे ल ने अविस्मरणीय भूमिका निभाई थी, वहीं यह भी कहा कि भारत की संप्रभुता को न तो हल्का किया जाना चाहिए और न ही गलत तरीके से परिभाषित। उन्होंन�े स्प�ट किया कि संप्रभुता से कभी समझौता नहीं किया जा सकता। अब अगर जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय पूर्ण है - जो है भी - तो अगर उसके लिए भारत से पृथक संविधान की व्यवस्था है , संपादकीयम्

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तो यह भारत के संविधान की संप्रभुता को हल्का करना और उससे समझौता करना नहीं तो और क्या है ? अतः यह प्रतीत होना स्वाभाविक है कि `संभवत:` इस व्यवस्था में सब कुछ ठीकठाक नहीं है । दरअसल, यह आशंका व्यक्त करने का यह बहुत उपयुक्त समय है क्योंक�ि संयोगवश इस समय माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे ने वाली याचिकाएँ विचाराधीन हैं । सच्चाई से और कब तक मुँह चुराया जाता रहे गा? दे श के नागरिकों को भी यह तो समझाया जाना चाहिए ही कि अनुच्छेद 35-ए के तहत जम्मू और कश्मीर के स्थायी निवासियों को खास तरह के अधिकार आखिर आज की ग्लोबल दु निया में भी क्यों जारी रखे जाने चाहिए! इस संदर्भ में यह विचार भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो `संभवत:` वे भारत को एक मजबूत संप्रभु दे श के रूप में छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। इस दृि�ट से विचार करें तो प्रतीत होगा ही कि एक संप्रभु दे श के भीतर किसी राज्य का अपना एक अन्य संविधान भी मौजूद होना `शायद` एक गलती या भूल ही है ! इसमें संदेह नहीं कि भारत-संघ का निर्माण भि�न-भि�न राज्यों रूपी इकाइयों के एक साथ आने से हुआ है और भारत का संविधान अपने सभी सदस्य राज्यों को अपनी-अपनी सां स्कृतिक परं परा, भाषा संपदा और क्षेत्रीय अस्मिता को बचा कर रखने की पूरी स्वतंत्रता दे ता है । अतः किसी भी राज्य को निजी पहचान के नाम पर दे श की संप्रभुता के अतिक्रमण की छूट नहीं मिलनी चाहिए। यदि किसी को मिल रही है तो इस गलती को यथाशीघ्र सुधारा जाना चाहिए। यह झूठा भ्रम ही है कि विशेष अधिकार न रहने पर कश्मीर की सां स्कृतिक अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। यदि ऐसा होता तो आज भी दे श में राजस्थानी, गुजराती, मराठी, बां ग्ला, तमिल और मणिपुरी आदि अस्मिताएँ इस तरह न फल-फूल रही होतीं! (डे ली हिं दी मिलाप, 07 सितंबर, 2018)

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उपेक्षित लद्दाख का दर्द जम्मू और कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र को स्वतंत्र केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिए जाने की माँ ग के साथ सक्रिय लद्दाख बौद्ध संघ के नेताओं ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भेंट� कर 1947 से ही चली आ रही इस माँ ग को एक बार फिर दोहराया है । लद्दाख की जनता को यह लगता रहा है कि कश्मीर केंद्रित नीतियों के कारण उनका इलाका हमेशा हाशिए पर धकेल दिया जाता है और ऐसा ही अब भी हो रहा है । इसलिए उन्होंन�े अपनी माँ ग के पक्ष में जन आं दोलन चलाने की बात कही है । जन आं दोलन की स्थितियाँ 5 साल पहले भी थीं जब 2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने यह आ�वासन दिया था कि अगर उसकी सरकार बनती है तो लद्दाख को केंद्र शासित राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा; और आं दोलन थम गया था। अब 5 वर्ष पूरे होने को हैं लेकिन इस दिशा में कुछ भी किया नहीं गया। इसलिए लद्दाखियों का धैर्य छूटना स्वाभाविक है । यह चिंता का विषय होना चाहिए कि लद्दाखियों के जन आं दोलन के राज्य सरकार द्वारा क्रूरतापूर्वक दमन के इतिहास को याद रखते हुए लद्दाख बौद्ध संघ अब सीधे-सीधे इस क्षेत्र को कश्मीर के कथित उपनिवेशवाद से मुक्त कराने के लिए हिं सक और उग्र आं दोलन पर उतारू है । जम्मू और कश्मीर राज्य अपनी अनेक विचित्रताओं के साथ इस मामले में भी विचित्र है कि उसमें शामिल जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख तीनों इलाके अपने इतिहास और संस्कृति की दृि�ट से अलग-अलग चरित्र वाले हैं । फिर भी उन्हें एक राज्य के रूप में बाँ धकर रखा गया है । राज्य की राजधानी जम्मू और श्रीनगर में 6-6 महीने रहती है । लेकिन लद्दाखवासी आरं भ से ही यह महसूस करते रहे हैं कि इन दोनों ही जगहों से लद्दाख का प्रशासन अच्छी तरह नहीं चलाया जा सकता। इसलिए प्रशासन की दृि�ट से जम्मू और लद्दाख दोनों ही के नेता यह माँ ग करते रहे हैं कि राज्य के तीन हिस्से कर दिए जाने चाहिए जिसके तहत जम्मू के लिए पृथक राज्य और लद्दाख के लिए पृथक केंद्र शासित राज्य की माँ ग स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय से ही की जाती रही है । संपादकीयम्

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स्मरणीय है कि जुलाई 1989 में लेह में मुस्लिम और बौद्ध लोगों की भिड़ं त के बाद से इन दोनों समुदायों में आज तक भी परस्पर वि�वास पैदा नहीं हो सका है । जानकारों का तो यह भी कहना है कि कश्मीर घाटी की राजनीतिक शक्तियों ने ही सां प्रदायिक ध्रुवीकरण करके अपने हित साधने के लिए लद्दाख के समरस समाज में सां प्रदायिकता का जहर फैलाया। हालाँ कि लंबे संघर्ष के बाद 7 नवंबर, 1989 को लद्दाख की 8 जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया था, लेकिन लद्दाख क्षेत्र के लिए स्वायत्त पहाड़ी परिषद का अधिनियम 9 मई, 1995 को पारित हो सका। चुनावों के माध्यम से विधिवत परिषद का तो गठन हुआ; परं तु केंद्र शासित राज्य की माँ ग आज भी बनी हुई है क्योंक�ि कश्मीर केंद्रित प्रशासन आज तक लद्दाख के लोगों का वि�वास नहीं जीत पाया है । सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण लद्दाख की अवहे लना को वास्तव में रा�ट् रीय हितों को नुकसान पहँु चाने वाला कार्य समझा जाना चाहिए और कश्मीर घाटी की राजनीतिक शक्तियाँ इसकी दोषी हैं । लद्दाखियों के घाव बहुत पुराने और बड़े गहरे हैं । कहा जाता है कि इस इलाके के धर्मांतरण की साजिश के तहत बौद्ध मठों की भूमि को हड़पने तक का प्रयास किया गया था। शेख अब्दु ल्ला की सरकार ने भोटी भाषा को विधानसभा की आधिकारिक भाषा मानने से इनकार कर दिया था तथा जम्मू और कश्मीर राज्य के प्रथम बजट में लद्दाख का उल्लेख तक नहीं था। अभी तक वहाँ एक वि�वविद्यालय तक नहीं है । इसीलिए भोटी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने से लेकर इस क्षेत्र को स्वतंत्र विधायिका युक्त केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिए जाने की तक की माँ गें आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं । (डे ली हिं दी मिलाप, 04 दिसंबर, 2018)

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संपादकीयम्


रिश्ता वोट का शराब से छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के मौके पर जारी घोषणापत्र में कां ग्रेस ने यह वादा किया है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आएगी तो राज्य में शराबबंदी लागू करे गी। पहली नज़र में भले ही यह बात साधारण सी लग सकती हो लेकिन इसका निशाना छत्तीसगढ़ का महिला वोटर है क्योंक�ि पुरुषों की शराब पीने की लत के कारण वहाँ की लाखों महिलाएँ नारकीय जीवन जी रही हैं और उससे किसी भी प्रकार मुक्त होना चाहती हैं । वर्तमान भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री भी छत्तीसगढ़ की महिलाओं की इस समस्या से परिचित रहे हैं , लेकिन उनकी कथनी और करनी के बीच बड़ी फाँ क दिखाई दे ती है । कां ग्रेस इस स्थिति का फायदा उठाना चाहती है । दरअसल शराबबंदी की माँ ग को दे खते हुए पिछले वर्ष मुख्यमंत्री ने महिलाओं को वचन दिया था कि उनकी सरकार शराब पर धीरे धीरे प्रतिबंध लगाएगी। लेकिन संभवत: वित्तीय कारणों से सरकार ऐसा नहीं कर सकी क्योंक�ि वर्तमान सरकार के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शराब की बिक्री से आता है । वैसे भी पिछले साल से सरकार ने शराब की बिक्री की जिम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले रखी है और एक सरकारी निगम के माध्यम से यह कार्य संप�न किया जाता है । रोचक बात यह भी है कि इस साल शराब की बिक्री से होने वाली कमाई का लक्ष्य पिछले वर्षों की तुलना में और भी बढ़ा दिया गया है । 2018-19 में सरकार ने 3700 करोड रुपए का लक्ष्य रखा है । जानकारों का कहना है कि 2.6 करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के लिए यह आँ कड़ा अपने से 4 गुना बड़े राज्य बिहार की अप्रैल 2016 की शराब बिक्री से होने वाली आय के बराबर है (उसके बाद से वहाँ शराबबंदी लागू है )। इसलिए अगर भाजपा को यह लगता है कि चुनाव में शराब कोई मुद्दा ही नहीं है तो ऐसा सोचना उनकी मजबूरी है । यह भी तर्क दिया जाता है कि शराबबंदी करना कोई आसान काम नहीं है । इसके अलावा, शराबबंदी से जो वित्तीय हानि होगी, उसकी भरपाई कहाँ से की जाएगी; यह भी एक अनुत्तरित यक्ष प्र�न है । संपादकीयम्

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वैसे इसमें कोई दो राय नहीं कि शराब की खपत छत्तीसगढ़ में बेहद खतरनाक स्थिति तक पहँु ची हुई है । कहा जाता है कि शाम होते ही शराब की दु कानों के आगे ग्राहक मधुमक्खियों की तरह आकर जमा हो जाते हैं । हर मोहल्ले में शराब की दु कानें हैं जो राजस्व बटोरने की खातिर अपने नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ कर रही हैं । कहना ही होगा कि इसकी सबसे बड़ी मार महिलाओं के ऊपर पड़ती है । पुरुष तो शराब पीते हैं और पड़े रहते हैं । महिलाएँ दिन रात मेहनत मजदू री करके जो कुछ कमाई करती हैं , मारपीट करके या धोखाधड़ी करके नशाखोर पुरुष उसे भी हथिया लेते हैं , लूट लेते हैं । बहुत से घरों में तो पुरुषों और महिलाओं के एक साथ बैठकर शराब पीने का भी चलन है । इन सब कारणों से राज्य में शराबबंदी लागू किए जाने की माँ ग लंबे समय से चली आ रही है । स्मरणीय है कि वर्तमान सरकार ने शराब पर प्रतिबंध लगाने के अपने आ�वासन को पूरा भले न किया हो, लेकिन लोगों को शराब के बारे में जागरूक करने का अभियान जरूर चलाया। यह भी नियम लागू किया गया कि एक बार में लोग एक नि​ि�चत मात्रा से अधिक शराब नहीं खरीद सकते। परं तु ऐसे सुधारात्मक प्रयासों का कोई प्रभावी परिणाम सामने आया नहीं। इसलिए इस चुनाव में शराबबंदी के एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन कर उभरने की उम्मीद है । ऐसा हुआ और इस मुद्दे पर कां ग्रेस महिलाओं के वोट को प्रभावित कर सकी, तो शराब रमन सिंह के राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है ! (डे ली हिं दी मिलाप, 15 नवंबर, 2018)

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संपादकीयम्


मतदाता की उदासीनता का अर्थ छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के ताज़ा आँ कड़ों से यह पता चला है कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत काफी कम रहा है । इसका यह भी अर्थ निकाला जा रहा है कि पढ़े लिखे मतदाता की तुलना में अनपढ़ या कम पढ़े लिखे मतदाता वोट दे ने में अधिक रुचि रखते हैं जबकि शिक्षित और शहरी मतदाता मतदान के प्रति वैसी रुचि नहीं दर्शाते। जब भी मतदान के प्रति उदासीनता की चर्चा होती है , तबतब यह सुझाव भी आता है कि मतदान को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वोट न डालने को वोटर की उदासीनता मान लेना या उसे सोया हुआ मान लेना उचित नहीं है । दरअसल वोट न डालना बड़ी हद तक इस बात का भी प्रतीक है कि उस मतदाता को कोई उचित उम्मीदवार ही नहीं दिखाई दे रहा। इसलिए वोट न डालना भी एक प्रकार से ‘नोटा’ (नन ऑफ द अबव) विकल्प के समान ही है । इसमें दो राय नहीं कि चुनाव अपने आप में एक बाजार की तरह है जहाँ वोटर खरीदार है , उम्मीदवार उत्पाद तथा पार्टियाँ विक्रे ता। किसी भी बाजार की तरह ही इस बाजार में भी उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार तभी होगा जब खरीदार यह संकेत दें कि उन्हें ‘कुछ और’ चाहिए। अब अगर बाजार में बिकने वाला कोई भी उत्पाद आपको पसंद नहीं तो आपके सामने दो विकल्प होते हैं - एक यह कि ‘सबसे कम बुरी’ वस्तु खरीद ली जाए और दू सरा यह कि ‘कुछ भी न’ खरीदें । अगर आप सबसे कम बुरी वस्तु खरीदते हैं तो एक ऐसी दौड़ शुरू हो जाती है जो स्तरहीन माल को बाजार में उतारती है क्योंक�ि विक्रे ता को पता चल चुका होता है कि आप खोटा माल भी खरीद लेंग�े। इसके विपरीत, अगर आप कुछ नहीं खरीदते हैं तो विक्रे ता को यह संकेत जाता है कि ये सब वे लोग हैं जिनके पास आवश्यकता है पर वह आवश्यकता इस समय उपलब्ध वस्तु से पूरी नहीं हो रही। ऐसे में नए विक्रे ता बेहतर विकल्प लेकर बाजार में उतरते हैं । उदाहरण के लिए, अरविंद केजरीवाल ने यही किया और दिल्ली के संपादकीयम्

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मुख्यमंत्री बन गए। अगर यह कहा जाए कि वोट न दे ने से यह संदेश जाता है कि वोटर उदासीन है तथा उसकी लोकतंत्र में कोई रुचि ही नहीं है तो यह गलत होगा। इसके उलट यह ज़रूरी नहीं है कि तथाकथित अशिक्षित वोटर लोकतंत्र में नि�ठा के कारण ही वोट दे ने बड़ी संख्या में पहुँचता हो। चुनावी राजनीति में धर्म, भाषा, जाति, लोभ और भय की भूमिका किसी से छिपी नहीं है । इसलिए बहुत संभव है कि ईमानदार विकल्प उपलब्ध न होने के कारण तथाकथित शहरी और शिक्षित मतदाता चुनाव से दू र रहता हो। इसलिए मौजूदा हालात में वोट न डालने और ‘नोटा’ चुनने में कोई फर्क नहीं है । वोटर को कोई भी उपलब्ध वस्तु पसंद नहीं इसलिए वह उदासीन है ; पर सही वस्तु मिले तो वह बाजार में लौट आएगा। आज किसी को भी वोट न दे ना, उसे अधिक सुरक्षित विकल्प लगता है - फायदे मंद भी। अंततः इतना ही कि वोट डालने न जाने वालों को सोता हुआ मान लेना और उन्हें कोसना उचित नहीं है । चुनाव या मतदान में उनकी अरुचि के लिए चुनाव-मैदान रूपी बाजार में उनकी माँ ग के अनुरूप सही माल अर्थात सही प्रत्याशी की अनुपलब्धता जिम्मेदार है । वैसे अनिवार्य वोटिं ग की तुलना में एक बेहतर विकल्प यह भी हो सकता है कि जैसे कुछ दे शों में ‘जूरी ड्यूटी’ होती है तथा सब नागरिकों को कभी न कभी ‘जूरी’ पर होना ही होता है , वैसे ही विधायक और सां सद भी नियुक्त होने चाहिए। इससे राजनीति को व्यवसाय बनाने वाले हतोत्साहित होंग�े। (डे ली हिं दी मिलाप, 23 नवंबर, 2018)

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संपादकीयम्


राजनीति की भाषा में बढ़ती अशि�टता जैसे-जैसे चुनावी बुखार चढ़ता जाता है , वैसे-वैसे नेताओं की भाषा शि�टाचार की सीमाएँ तोड़कर प्रलाप में बदलती जाती हैं । राजनीति की भाषा में नैतिकता और सभ्यता के ग्राफ का इस तरह लगातार गिरना लोकतंत्र की सेहत के लिए बिलकुल भी वां छनीय नहीं है । दिन-प्रतिदिन इसके शर्मनाक उदाहरण बढ़ते ही जा रहे हैं । सबसे ताजा उदाहरण इं दौर का है जहाँ विपक्ष के एक स्वनामधन्य अभिनेता (नेता) ने अपनी चुनावी रै ली में प्रधानमंत्री की माताजी का बाकायदा नाम लेकर उनकी उम्र की तुलना रुपये की मौजूदा स्थिति से कर डाली और प्रधानमंत्री को मनहूस घोषित कर दिया। हद तो यह कि इस बयान पर आपत्ति उठने पर उनकी पार्टी यह कहते हुए उन्हें बचाने भी आ गई कि प्रधानमंत्री भी इसी तरह से गां धी-नेहरु परिवार का जिक्र करके राजनीतिक हमले करते रहे हैं तथा अपने भाषणों में खुद ही तेल की गिरती कीमतों को लेकर खुद को `किस्मतवाला` कह चुके हैं , तो फिर अगर तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर उन्हें `मनहूस` कह दिया गया तो क्या गलत किया! अफसोस की बात यह भी है कि भाषायी िश�टाचार को न�ट करने का यह कृत्य किसी एक नेता या किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं । कोई भी दल गाली-गलौज से परहे ज करता नहीं दिखाई दे ता। अंतर बस गालियों के चुनाव और उनके इस्तेमाल की इं टस�िट ें ी का है । जो भाषा के जादू गर हैं , वे व्यंग्य और कटाक्ष का सहारा लेकर गाली दे ते हैं ; और जो बाज़ार की भाषा के माहिर हैं , वे सीधे-सीधे गाली दे ते हैं । जनता पर भी शायद सत्ता और प्रतिपक्ष के इस तरह के गाली-युद्धों का अब असर होना बंद हो गया है । फिर भी स्तरहीन भाषा उसके मन में इन राजनीतिबाज़ों के प्रति गुस्सा तो जगाती ही है । इसीलिए कां ग्रेस अध्यक्ष को अपने एक अन्य स्वनामधन्य नेता के उस ‘जोश’ भरे बयान पर बगलें झाँ कनी पड़ गईं जिसमें उन्होंन�े श्रीनाथद्वारा में दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री समेत कई सारे नेताओं से उनकी जाति पूछ डाली थी। इस पर पार्टी अध्यक्ष को सफाई में यहाँ तक कहना पड़ा कि यह बयान पार्टी के आदर्शों के संपादकीयम्

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खिलाफ है । उन्होंन�े यह नसीहत भी दी कि पार्टी के नेता ऐसा कोई बयान न दें जिससे समाज के किसी भी वर्ग को दु ख पहुँचे और उम्मीद जताई कि पार्टी के सिद्धांतों और कार्यकर्ताओं की भावना का आदर करते हुए उन स्वनामधन्य नेता को अपने बयान पर अफसोस प्रकट करना चाहिए। यहाँ प्र�न उठता है कि, जिन आदर्शों की बात की जा रही है , वे क्या कहीं बचे हुए हैं या चुनावी वोट-भूख की बलि चढ़ गए? राजनीति में आदर्श और नैतिकता बची होती तो चुनावी भाषणों में अशि�ट शब्दों की बौछार न होती। जनता के वास्तविक सुख-दु ख पर बात होती, उपलब्धियों और चूकों पर सार्थक बहस होती। धर्म और जाति के नाम पर आक्रामक जुमलेबाजी न होती। आदर्शों की दु हाई भी तब पाखंड सिद्ध हो जाती है जब अत्यंत वरि�ठ पके हुए नेता भी मध्य प्रदे श जैसे राज्य में नब्बे प्रतिशत मुसलमानों के वोटों की जरूरत की चर्चा करते पाए जाते हैं । जैसा कि पहले कहा गया, अशोभनीय प्रलाप की यह बीमारी किसी एक पार्टी या नेता तक सीमित नहीं है । अगर बात-बात पर हर विरोधी को दे शद्रोही और पाकिस्तान चले जाने को कहकर हड़काने वाले थोक में उपलब्ध हैं , तो अपने राजनैतिक विरोधियों को अलंकृत करने के लिए अपनी ज़बान के अगले हिस्से से साँ प, बिच्छू, नीच और जोकर जैसी उपाधियाँ टपकाते फिरने वालों की भी कमी नहीं है । अभिप्राय यह है कि समसामयिक चुनावी राजनीति का पूरा परिवेश चूँकि बेहद ज़हरीला हो चुका है , इसलिए उसकी भाषा भी सभ्यता और संस्कृति की मर्यादाएँ लाँ घ रही है । राजनीति में नैतिकता आए, तो भाषा भी संयत और शि�ट हो जाएगी। अफसोस कि फिलहाल यह होता नज़र नहीं आता! (डे ली हिं दी मिलाप, 26 नवंबर, 2018)

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जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र सत्तर साल के होने जा रहे भारत के लोकतंत्र को अब तक काफी वयस्क हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा लग रहा है कि वह असमय सठिया गया है । समसामयिक चुनावी परिदृश्य पर नजर डालने से ऐसा लगता है कि तमाम स्थानीय और रा�ट् रीय प्र�नों पर धर्म, जाति और गोत्र के प्र�न भारी पड़ रहे हैं । रा�ट्र के नवनिर्माण के प्र�नों के ऊपर राम, हनुमान और गाय के प्र�न हावी हो रहे हैं । इसका अर्थ है कि हमारे चुनावी लोकतंत्र की छवि लगातार विकृत होती जा रही है जिसके लिए किसी भी स्वतंत्र चेतना वाले समाज को चिंतित होना चाहिए। लोकतंत्र के मूलभूत प्र�नों का हाशिये पर जाना सामाजिक प्रगति के मार्ग में अवरोध खड़ा करता है और यथास्थिति को बल दे ता है । ऐसा नहीं है कि किसी समाज या दे श के जीवन में धर्म, जाति, गोत्र, दे वता, मंदिर और आस्था के अन्य तमाम प्र�न कोई स्थान न रखते हों। रखते हैं । लेकिन यदि ये ही प्र�न क्षेत्रीय से लेकर रा�ट् रीय राजनीति तक के केंद्रीय प्र�न बनने लगें तो एक ऐसे षड्यंत्र की गंध आती है जिसमें जानबूझकर जनता को उन प्र�नों के उत्तर दे ने से राजनीतिक शक्तियाँ बचना चाहती हैं जो उनके लिए असुविधाजनक और असहज हैं । इसलिए यह खतरा महसूस होने लगा है कि लोकतां त्रिक व्यवस्था के बावजूद आज की राजनीतिक शक्तियाँ जानबूझकर भारत को नवजागरण के पहले के उस मध्यकाल में लौटा ले जाना चाहती हैं जहाँ ‘इहलोक’ के प्र�नों से अधिक महत्वपूर्ण प्र�न ‘परलोक’ के हुआ करते थे। यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिए भी उचित नहीं है । समाज के लिए तो उचित है ही नहीं। अफसोस की बात है कि पक्ष-प्रतिपक्ष के सारे दल गरीबी, अशिक्षा, नागरिक सुविधाओं के अभाव, ढाँ चागत क्षेत्रों में गतिहीनता जैसे प्र�नों से हटकर चुनाव को धर्म, जाति और गोत्र के लिए लड़े जाने वाले गृहयुद्ध की शक्ल दे ने में व्यस्त हैं । एक खास तरह की तर्क हीनता और जड़ता सारे राजनीतिक परिवेश पर तारी है ।

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गई हुई सत्ता को पुनः प्राप्त करने के लिए कां ग्रेस के नीतिकारों ने भ्रमवश यह मान्यता बना ली है कि भारतीय जनता पार्टी के सत्तासीन होने में उसके कट्टर हिं दूवादी होने का सबसे बड़ा हाथ है । इसीलिए कां ग्रेस ने तय कर लिया कि वह भी हिं दूवादी बनकर दिखाएगी। हिं दू तो कां ग्रेस बहुत पहले से थी। गां धी के समय से थी। मंदिरों, बाबाओं, दरगाहों और मौलानाओं के आशीर्वाद प्राप्त करने की परं परा भी वहाँ पहले से थी। लेकिन अब उसने ‘हिं दू’ से आगे बढ़कर यह जो ‘हिं दूवादी’ अवतार धारण किया है , इससे उस पर आक्रमण करने का भाजपा को सहज अवसर मिल गया। पार्टी के वाचाल वक्ताओं ने कां ग्रेस और उसके अध्यक्ष को धर्म, जाति और गोत्र के नाम पर इतना उकसाया, इतना उकसाया, कि वे दू सरे सारे केंद्रीय प्र�नों को छोड़कर इन हाशिए के और सर्वथा बेमानी प्र�नों पर सफाई दे ने में जुट गए। कमाल तो यह हुआ कि जिन ग्रंथों और स्मृतियों को गाली दे ते आधुनिक विमर्शकार थकते नहीं हैं , उन्हीं का उल्लेख करके अनावश्यक तर्क गढ़े जा रहे हैं । ऐसे में मतदाता के मन में एक सहज प्र�न उभरता है कि, ‘भारत का लोकतंत्र मनुस्मृति से चलेगा या भारतीय संविधान से?’ इस तमाम अनावश्यक और अप्रासंगिक वाद-विवाद को हवा दे ने में सोशल मीडिया सहित तमाम खबरिया चैनल दिन-रात जुटे हैं । उनकी यह भूमिका सर्वथा एं टी-सोशल है क्योंक�ि ऐसा करके वे भारतीय लोकतंत्र को एक नकारात्मक दिशा में धकेल रहे हैं जो निंदनीय है । आशा की जानी चाहिए कि मध्यकालीन सामंतवादी रूढ़ियों की वेदी पर बलि होते लोकतंत्र को बचाने के लिए भारत की जनता राजनैतिक वयस्कता का परिचय अवश्य दे गी। तब तक इतना ही कि-

मानचित्र को चीरती, मजहब की शमशीर। या तो इसको तोड़ दो, या टू टे तस्वीर ॥ मुहर-महोत्सव हो रहा, पाँ च वर्ष के बाद ; जाति पूछकर बँट रही, लोकतंत्र की खीर॥ (डे ली हिं दी मिलाप, 05 दिसंबर, 2018)

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क्या बदल रहा है भाजपा का भी चरित्र विभि�न राज्यों में विधानसभा चुनावों के मद्दे नजर प्रत्याशियों के चयन और टिकट बँटवारे को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर जिस प्रकार की गलाकाट खींच�तान और महत्वाकां क्षी नेता-पुत्रों की बढ़ती फौज की खबरें प्राप्त हो रही हैं , उनसे यह संदेश जाना स्वाभाविक है कि जो पार्टी नीयत और नीति के नएपन के दावे के साथ राजनीति में उतरी थी, धीरे धीरे अब उसी रं ग में रँ ग गई है जिसके लिए अपने जन्म से ही वह कां ग्रेस की आलोचना करती रही। इसमें संदेह नहीं कि सभी राजनीतिक दल आरं भ तो किसी ने किसी आदर्श अथवा महान विचारधारा को लेकर होते हैं , लेकिन उस आदर्श या विचारधारा पर कायम रहना आसान नहीं होता। जब तक पार्टी ने सत्ता का स्वाद न चखा हो तब तक कड़वा आदर्श भी स्वादि�ट लगता है , लेकिन एक बार सत्ता के काजल की कोठरी में घुसने पर कालिख में भी आनंद आने लगता है । जिस प्रकार की लाबिंग बड़े नेताओं के परिवार के सदस्यों की खातिर की जा रही है उससे तो यही लगता है कि सियासत के इस हमाम में सब नंगे हैं – क्या कां ग्रेस और क्या भाजपा! यह कोई भूलने जैसी बात नहीं कि भारतीय जनता पार्टी भ्र�टाचार और परिवारवाद के विरोध के नारों के साथ सत्ता में आई थी। आज भी सिद्धांत के स्तर पर तो वही दु हाई दी जाती है , लेकिन अब यह किसी से छिपा नहीं है कि अनेक दिशाओं से हर स्तर पर पार्टी भ्र�टाचार के आरोप झेल रही है । साथ ही, आगामी चुनावों की दहलीज पर जो यह आपाधापी मची है उससे तो यही लगता है कि सबको किसी न किसी प्रकार बस अपने लिए सत्ता चाहिए अर्थात पार्टी अब निजी लाभ की तुलना में पीछे होती जा रही है । अगर जानकारों का यह आकलन सच है तो सचमुच चिंता की बात है । इस तमान दृश्य को समकालीन चुनावी राजनीति के प्रहसन की विडं बना संपादकीयम्

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ही कहें तो ठीक होगा कि एक ओर तो भाजपा अध्यक्ष भारत भर में घूम घूम कर डं के की चोट यह ऐलान कर रहे हैं कि भाजपा आगामी चुनाव में महागठबंधन के रूप में की जा रही विपक्षी एकता की तमाम कोशिशों की धज्जियाँ उड़ा दे गी तथा दू सरी ओर उनकी अपनी पार्टी बुरी तरह कां ग्रेसी चरित्र को अपनाती दिखाई दे रही है । शिवराज सिंह चौहान, सुमित्रा महाजन, कैलाश विजयवर्गीय, नरें द्र सिंह तोमर, वीरें द्र सिंह सिसोदिया और गौरीशंकर बिसेन जैसे नामी गिरामी नेताओं का परिवार प्रेम अपनी अपनी संतानों के प्रोमोशन के लिए टिकट का जुगाड़ भिड़ाने के रूप में सामने आ रहा है , जिसके परिणाम स्वरूप कैडर पर आधारित समझी जाने वाली पार्टी भाजपा के भीतर साफ साफ दिखाई दे ने वाला रासायनिक परिवर्तन घटित हो रहा है । उपेक्षा का शिकार सामान्य कार्यकर्ता भी अनुशासित ढं ग से विरोध प्रदर्शित करने के भाजपा और संघ के पुराने चरित्र की बंदिशों से बाहर आकर बागी तेवर अपना रहा है । मारपीट और मोर्चेब�ंदी से लेकर शक्ति प्रदर्शन, दबाव तथा ‘करो या मरो’ के पोस्टर तक इस बदले चरित्र की गवाही दे ते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता का धतूरा खाकर भाजपा भी कुछ-कुछ बौरा गई है । जिस प्रकार का तालमेल सत्ता के बाहर रहते संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच कायम था, सरकार में आने पर वह टू ट गया लगता है । समन्वय के अभाव के कारण अराजकता और अनुशासनहीनता पनप रही है , जिसकी भाजपा नेतृत्व को तुरंत चिंता और चिकित्सा करनी चाहिए। अन्यथा सामान्य कार्यकर्ता की उपेक्षा जिस तरह टिकट बँटवारे की वेला में असंतोष और आक्रोश बनकर फूट पड़ी है , उससे भाजपा का अपने आप को कां ग्रेस की तुलना में भि�न चरित्र वाली पार्टी कहने का दावा खत्म होने का खतरा है । (डे ली हिं दी मिलाप, 30 अक्तूबर, 2018)

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सवर्ण आरक्षण : हल या छल? ... तो केंद्र सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की घोषणा कर ही दी। लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय कैबिनेट ने यह क्रांतिकारी फैसला किया है कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। खास बात यह है कि यह 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा के ऊपर होगा जिसके लिए संविधान संशोधन द्वारा जगह बनाई जाएगी। गरीब सवर्णों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की इस तुरत-फुरत घोषणा को दिसंबर-2018 के विधानसभा चुनाव-परिणामों के संदर्भ में दे खा जाना स्वाभाविक है । कल तक जो पार्टी कुछ प्रांतों की सरकारों द्वारा आरक्षण की सीमा के पार इस सुविधा को बढ़ाने के प्रयासों की घोर आलोचना कर रही थी, आज यदि वह स्वयं इसके लिए संविधान संशोधन की पेशकश कर रही है तो इसे पिछले नुकसान की भरपाई के लिए खेले गए दाँ व की तरह दे खा जाएगा ही। पाँ च वर्ष के शासनकाल के अंतिम छोर पर इस प्रकार का निर्णय अगले चुनाव के अवसर पर सवर्णों को लुभाने के लिए दिया गया झुनझुना या चुनावी उपहार भी हो सकता है । इसे समस्या के हल के स्थान एक राजनैतिक छल भी कहा जा सकता है कि संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन ऐसी सरकार इस निर्णय को लेकर आए जिसके पास संविधान में संशोधन करने योग्य बहुमत होना तो अलग बात, तीन तलाक जैसे अपने बिल को राज्यसभा में पास कराने योग्य शक्ति भी नहीं है । इस तरह के तमाम आरोपों की गुंजाइश के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह घोषणा एक बार फिर आरक्षण की नीति-रीति पर पुनर्विचार और मंथन की प्रक्रिया को आरं भ कर सकती है । संसद और सर्वोच्च न्यायालय से मीडिया और सड़क की राजनीति तक इस विषय के विविध पहलुओं की पड़ताल होनी ही चाहिए, क्योंक�ि किसी भी विवेकशील लोकतंत्र संपादकीयम्

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में नीतियों की विवेचना और लक्ष्यों के पुनःनिर्धारण की गुंजाइश सदा रहती है । विवेचना ही लोकतंत्र को गतिशील बनाती है । अतः अगर इस घोषणा से एक स्वस्थ बहस का वातावरण भी खड़ा हो, तो इसे भी उपलब्धि ही माना जाएगा। सर्वविदित है कि अतीत में समाज के कुछ समुदायों के साथ बरते गए कथित भेदभाव और वंचना के व्यवहार को भारतीय संविधान ने आरक्षण का आधार बनाया है तथा उसका प्रयोजन शिक्षा और नौकरी में उन्हें समुचित अवसर दे कर सामाजिक न्याय की स्थापना करना रहा है । पिछड़े पन को परिभाषित करने के लिए अब तक गरीबी को आधार नहीं बनाया जा सका। इसी धारणा के कारण, 1990 में तत्कालीन सरकार द्वारा सवर्ण गरीबों को आरक्षण दे ने का प्रयास सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया था और आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा लागू कर दी गई थी। अब अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण की इस नई पेशकश को संविधान में शामिल कर लिया जाता है , तो सामाजिक और आर्थिक मुद्दों का परस्पर घालमेल होने की पूरी संभावना है । इसलिए केवल सीमा बढ़ाए जाने से शायद काम नहीं चलेगा। संपूर्ण आरक्षण नीति पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है । इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह व्यवस्था समाज में समरसता के स्थान पर नई खाई भी पैदा कर सकती है । एक ऐसे वक्त जब दे श की अर्थव्यवस्था की हालत काफी खस्ता है और निजी तथा सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में बेरोजगारी भयानक स्तर तक बढ़ी हुई है , यह संशोधन सीमित संसाधनों के लिए सवर्णों के अपने भीतर अधिक मारामारी की स्थिति भी खड़ी कर सकता है । जाटों, मराठों और पटे लों के जैसे अन्य आं दोलन भी नए सिरे से उभर सकते हैं जिनपर फिलहाल 50 प्रतिशत आरक्षण-सीमा का अंकुश लगा हुआ है । अतः आरक्षण नीति के स्वरूप पर नए सिरे से विचार करते हुए समाज के सभी समुदायों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने पर भी चर्चा होनी चाहिए। (डे ली हिं दी मिलाप, 09 जनवरी, 2019)

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संपादकीयम्


विरोध भी, समर्थन भी : खूबी लोकतंत्र की किसिम-किसिम की अटकलों को धता बताते हुए राज्यसभा के शीतकालीन सत्र के खास तौर पर बढ़ाए गए आखिरी दिन आर्थिक तौर पर पिछड़े सामान्य वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण दे ने का संविधान संशोधन शान से पारित हो गया। इस पर दिनभर अत्यंत विस्तृत बहस-मुबाहसा चला। विरोध में बहुत सारे तर्क दिए गए। लेकिन अधिकतर दलों – खास कर कां ग्रेस – ने तमाम विरोध के बावजूद जिस प्रकार इसका समर्थन भी किया, उसे भले ही कोई मजबूरी का नाम दे ले, लेकिन सही अर्थों में वह भारतीय लोकतंत्र की खोबसूरती का प्रतीक है । विरोध के बावजूद लोकहित के प्र�न पर समन्वय का प्रदर्शन इस दे श का चरित्र रहा है । यही इस ऐतिहासिक संविधान संशोधन के पारित हो पाने का रहस्य है । सियासी चालाकियाँ और रणनीतिक दाँ वपेच अपनी जगह। संविधान के इस 124वें सशोधन में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को दिए गए 50 प्रतिशत आरक्षण से कोई छे ड़छाड़ किए बिना की गई है । इसे आरक्षण के आधार के विस्तार के रूप में भी दे खा जाना चाहिए क्योंक�ि अब तक आरक्षण की सुविधा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को ही प्राप्त थी। इसीलिए इस संशोधन का विरोध करते हुए बार-बार यह कहा भी गया िक आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय को सुनि​ि�चत करने का माध्यम है । उन्हें कौन बताए कि गरीबी के रहते सामाजिक न्याय संभाव नहीं! इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरें द्र मोदी ने इसे भारत के परिवर्तन की ओर एक कदम बताते हुए उचित ही कहा है कि, 'संविधान (124 वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 संसद के दोनों सदनों में पारित होना, यह हमारी युवा शक्ति को भारत के परिवर्तन के प्रति उनके योगदान को प्रदर्शित करने के लिए एक विस्तृत कैनवास सुनि​ि�चत करता है ।‘ चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाया और कहा कि सरकार आगामी लोकसभा चुनावों के मद्दे नजर यह कदम उठा रही है , संपादकीयम्

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लेकिन मज़ेदार बात यह है कि उसने भी तो आगामी लोकसभा चुनावों के मद्दे नजर ही विरोध के बावजूद समर्थन किया है । अगड़ों के वोट पर पक्ष-विपक्ष सबकी नज़र होना स्वाभाविक है । अगड़े -पिछड़े की राजनीति के लिहाज से ही लालू यादव की पार्टी आरजेडी इस संशोधन के सबसे कटु आलोचक के रूप में मुखर दिखाई दी। झुनझुना बजाते हुए उसके सां सद का यह कहना कि ‘यह मध्य रात्रि की डकैती है और यह संविधान के मूल ढाँ चे के साथ छे ड़छाड़ हो रही है ’ – संविधान की रक्षा से कम और अपने खिसकते वोट बैंक� की रक्षा की चिंता से अधिक प्रेरित था। आरजेडी को लगता है कि प्रधानमंत्री इस बहाने उन अगड़ों को 10 प्रतिशत आरक्षण दे रहे हैं जिनमें केवल 5 प्रतिशत ही गरीब हैं । इसे उसने बहुजनों को लूटना कहा है और प्रधानमंत्री पर ‘असली मनुवादी रं ग’ दिखाने तक का आरोप लगाया है । जानकारों का मानना है कि ऐसा करके आरजेडी दलित और पिछड़े समुदाय के उन सभी लोगों की सहानुभूति समेटना चाहती है जो अबतक आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं । लेकिन उसे समझना होगा कि पुराने चश्मे से आज की सियासत को दे खना उसे भारी भी पड़ सकता है क्योंक�ि इससे सवर्ण वोटर के साथ-साथ सामान्य वर्ग के गरीब तबकों को मिलने वाले आरक्षण के दायरे में आने वाले मुस्लिम वोटर भी उससे नाराज़ हो सकते हैं । अंततः, यह भी विचारणीय है कि अतीत में जिस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के 'फॉरवर्ड कोटा बिल' को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी और जाति आधारित आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा वाला आदे श सामने आया था, इस बार भी वैसा होगा। तय है कि चुनौती दे ने से किसी को रोका नहीं जा सकता, लेकिन ‘संशोधन’ को उलटना शायद उतना आसान नहीं होगा। (डे ली हिं दी मिलाप, 11 जनवरी, 2019)

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ज़ोर-आजमाइश से पहले शक्ति-प्रदर्शन कोलकाता के ब्रिगेड परे ड मैदान की महासभा संदेश दे गई कि लोकतंत्र का आगामी महादं गल दिलचस्प होने वाला है । वह दिन दू र नहीं जब दिल्ली फतह करने की खातिर आम चुनाव के मैदान में दिग्गज भिड़ेंग�े। असली ज़ोरआजमाइश से पहले सब अपने-अपने पहलवानों को एकजुट करने में लगे हैं । सामने वाले के हौसले पस्त करने के लिए यह भी ज़रूरी होता है कि अपने पहलवानों के डौले-शौले दिखाए जाएँ । इससे अपना मनोबल बढ़ता है और सामने वाले का घट सकता है । इसलिए रै लियाँ चाहे विपक्ष की हों या सत्तारूढ़ दल की, इस समय उनका लक्ष्य अपनी-अपनी शक्ति का दिखावा करके चुनावी माहौल के लिए हवाओं को गरम करना है । कोलकाता में ममता बनर्जी दाँ त पीस-पीस कर भाजपा की एक्स्पायरी डे ट बता रही हों या केरल में प्रधानमंत्री महोदय मुट्ठियाँ भींच�-भींच� कर दहाड़ रहे हों, फिलहाल जनता से सब डरे हुए हैं । जाने किसका तंबू उखाड़ दे ; या न जाने किसके सिर सेहरा बाँ ध दे ? सारे दिग्गज पहलवान इतिहास से इतना तो जान ही चुके हैं कि भारत की जनता का सिर कभी भी किसी भी मुद्दे पर फिर सकता है । यह चाहे तो प्याज-टमाटर की खातिर फाँ सी चढ़ा दे और न चाहे तो खुद अपना खून भी माफ कर दे । इसीलिए सारे पहलवान दे श भर में दौड़े फिर रहे हैं । प��चम की मुख्यमंत्री और तृणमूल कां ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी के शक्ति-प्रदर्शन को इस अर्थ में सफल कहा जाएगा कि कई राज्यों के मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री समेत कुल 22 राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने एक मंच पर उपस्थित होकर केंद्र से प्रधानमंत्री नरें द्र मोदी की सरकार को हटाने का संकल्प व्यक्त किया। संकल्प के सहारे बड़े -बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जाने की कहानियाँ मिलती हैं । पर यह तभी हो पाता है जब समस्याओं के ‘जाल’ में फँसे सारे ‘कबूतर’ एक ही दिशा में उड़ें । इसके लिए एक दिशा में ले जाने वाला संपादकीयम्

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‘मुखिया कबूतर’ भी चाहिए होता है । प्रस्तावित महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि ‘मुखिया कबूतर’ नदारद है ! इसीलिए ममता बनर्जी को कहना पड़ रहा है कि प्रधानमंत्री कौन होगा, यह बाद में तय कर लेंग�े। यह कहना उनकी मजबूरी है क्योंक�ि अगर वे अपनी दावेदारी ठोकेंग�ी तो उनके साथ आ सकनेवाला सबसे बड़ा दल कां ग्रेस बिदक जाएगा – राहुल गां धी क्या इतनी मेहनत-मशक्कत बिना प्रयोजन करते फिर रहे हैं ! ममता के आयोजन में राहुल और सोनिया दोनों की अनुपस्थिति सनसनीखेज भले न हो, मानीखेज ज़रूर है । उम्मीद है कि जल्दी ही चंद्रबाबू नायुडु और अरविंद केजरीवाल भी अपने-अपने राज्यों में ममता बनर्जी जैसी रै ली करके अपनी ताकत दिखाने वाले हैं । यही नहीं, मायावती भी दू सरे राज्यों की मजबूत छोटी पार्टियों से गठबंधन करने की तैयारी में हैं । इन सबकी भी तो मुखिया पद पर दावेदारी है न! एक मुखिया के अभाव में यह आशंका अधिक है कि रा�ट् रीय स्तर पर विपक्ष की एकजुटता कहीं सचमुच केवल ‘प्रदर्शन’ बनकर न रह जाए। उत्तर प्रदे श के सपा-बसपा गठबंधन से इसका संकेत पहले ही मिल भी चुका है कि क्षेत्रीय छत्रपतियों की पेशवाई में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग गठबंधन उभर सकते हैं । तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर के संघीय मोर्चे के प्रयास भी इसी दिशा में बढ़ रहे हैं । कई दलों की भाजपा के साथ-साथ कां ग्रेस से भी दू र दिखने की चाहत भी विपक्ष को उस तरह एक नहीं होने दे रही है कि हर जगह टक्कर आमने-सामने की हो सके। इसका नुकसान विपक्ष को ही तो होना है । स्वयं कां ग्रेस की रुचि भी महागठबंधन की तुलना में राज्य आधारित अलगअलग गठबंधनों में अधिक दिख रही है । इसीलिए जानकारों का कहना है कि विपक्ष का लक्ष्य भले ही साफ है कि केंद्र की सत्ता से मोदी सरकार को हटाना है ; लेकिन कैसे हटाना है - यह स्प�ट नहीं है । (डे ली हिं दी मिलाप, 22 जनवरी, 2019)

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चुनाव का मौसम और डांस बार लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं । ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अच्छा ही किया कि मुंबई के डां स बारों को दोबारा खोलने की इजाजत दे दी। मुंबई ही क्यों, कम से कम चुनाव संप�न होने और नई सरकार बनने तक दे शभर में डां स बार खुले रहने चाहिए! वैसे चुनावी राजनीति ने दे श को डां स बार बना रखने में कोई कोर-कसर तो छोड़ी नहीं है । जिधर दे खिए उधर ही डां स चल रहा है । प्रत्यक्ष में तो नेता जनता को रिझाने के लिए नाचते-कूदते दिखाई दे ते हैं । पर यह है नज़रों का फेर ही। असल में तो वे खुद अपनी धुन और ताल पर जनता को नचा रहे होते हैं । ग्राहक को लगता है कि बार-बाला नाच रही है लेकिन सच में तो वह अपने संकेतों पर ग्राहक को नचा रही होती है । नृत्य और संगीत में सम्मोहन की शक्ति होती है । उनके साथ शराब और मिल जाए तो नशा दु हरा-तिहरा हो जाता है । ऐसी रस-दशा में उन्माद की वर्षा होती है और बार-बाला नाचनेवाली न रहकर नचानेवाली बन जाती है । नेता भी पहले तो लोक को लुभानेवाला नृत्य करते दिखाई दे ते हैं ; लेकिन जाने कब वे बीन बजाने वाला सपेरा बन जाते हैं । सत्ता के इशारे पर शत-कोटि जनता फन लहरा-लहरा कर नाचती रहती है और पता ही नहीं चलता कि कब सपेरा लुटेरा बन गया। बार-बाला का डां स भी चलता रहता है और ‘लैला तुझे लूट लेगी’ भी गाया जाता रहता है । लूट चलती रहती है । नाच भी चलता रहता है । राजनीति भी। खबर है कि डां स बारों में अबसे सीसीटीवी लगाने की अनिवार्यता नहीं रहे गी। माननीय न्यायालय का कहना है कि इससे ‘निजता’ का उल्लंघन होता है । नेताओं के नाच की भी ऑडियो-वीडियो रिकार्डिं ग की इजाजत नहीं होनी चाहिए। वोटर को रिझाने के लिए जाने कौन-कौन से ‘करम’ करने पड़ते हैं , जाने क्या-क्या झूठ-सच बोलना पड़ता है ? सब रिकार्ड हो गया तो कल होश में आने पर जनता गला पकड़ लेगी कि करो अपना फलाँ वादा पूरा। याद न रहने संपादकीयम्

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का नाटक नहीं चलेगा – वीडियो है न! इसलिए नेताओं की ‘निजता’ का उल्लंघन करने वाली हर दृश्य-श्रव्य गतिविधि पर प्रतिबंध लाज़मी है ! यह भी अच्छा ही हुआ कि शीर्ष अदालत ने डां स बार में बार-बालाओं को टिप दिए जाने की अनुमति दी है , जबकि नोट बरसाने पर प्रतिबंध लगा दिया है । चुनाव-नृत्य में संलिप्त पार्टियों के लिए इसमें भी बड़ा संकेत छिपा है । खुले आम रै ली करके नोट बरसाने की अनुमति भला कैसे दी जा सकती है ? जाने कौन लूटकर ले जाए और बाद में वोट भी न दे ? किसका गला पकड़ें ? सीधे हाथ में टिप दीजिए तो कुछ जान-पहचान भी हो; कल भी आव-भगत की संभावना रहे और गला पकड़ने में भी सुविधा हो। नेता और कार्यकर्ता अगर घर-घर जाकर कैश बाँ टें, तो इसे बार-बालाओं को टिप दे ने जैसी वैधता मिलनी ही चाहिए! अब यह भी कोई बात हुई कि डां स बार धार्मिक स्थानों और शैक्षिक संस्थानों से एक किलोमीटर दू र होने चाहिए? नैतिकता की सारी ठे केदारी क्या बार-बालाओं के ही जिम्मे है ? नहीं, यह नहीं चलेगा। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिबंध भी हटा दिया है । राजनीति के नचनियों पर भी यह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता कि वे धार्मिक स्थानों और शिक्षा संस्थानों से दू र रहें । चुनाव के मौसम में तो यह तनिक भी संभव नहीं। चुनाव-नृत्य में धर्म और शिक्षा की जुगलबंदी के बिना मज़ा ही कहाँ आता है । इनके बिना उन्माद नहीं जागता; और उन्माद जगाए बिना चुनाव-नृत्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए जितनी दे र चुनाव-नृत्य चले, उतनी दे र सब तरह की नैतिकताएँ निरस्त! खूब नाच-गाना हो, शराबें बहें , उपहार लिए-दिए जाएँ , उन्माद की वर्षा हो; वशीकरण के लिए यह ज़रूरी है । बार में भी; और चुनाव में भी! (डे ली हिं दी मिलाप, 21 जनवरी, 2019)

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सबका अ�नदाता हड़ताल पर है !? भारतमाता गाँ वों में निवास करती है । भारत कृषिप्रधान दे श है । किसान इस दे श का अ�नदाता है । ऐसी तमाम अच्छी-अच्छी बातें तब जुमलेबाजी भर लगती हैं , जब लगभग प्रतिदिन दे श के किसी न किसी कोने से किसी किसान की आत्महत्या की खबर मिलती है । साधारण किसान के जीवन स्तर में सुधार हो, इसके लिए खेती-किसानी की दशा में सुधार ज़रूरी है । सरकारें आतीजाती रहती हैं । आ�वासन दिए जाते रहते हैं । पर ऊँट के मुँह में जीरा भर ही बदलाव दिखाई दे ता है । ऐसे में हड़ताल और आं दोलन भी अपनी बात जनता और सरकार के सामने रखने का एक लोकतां त्रिक जरिया है । इसीलिए पहली जून से कई प्रांतों के विभि�न किसान संगठन एक साथ 10 दिन की हड़ताल पर हैं । इसे उन्होंन�े नाम दिया है ‘गाँ व बंद'; यानि गाँ व की कोई उपज जैसे साग, सब्जी, फल, अनाज, दाल, दू ध और उसके उत्पाद गाँ व की सीमा से बाहर जाना बंद। परिणाम? 10 दिन में शहरों में स्थित कृषि उपज मंडियों में उल्लू बोलने लगेंग�े। दू सरी तरफ किसान की यह भी मजबूरी है कि अपनी उपज को वह घर में भी नहीं रख सकता। उसके पास उतनी जगह कहाँ है ? इस दशा में गुस्सा और खीझ बढ़ना स्वाभाविक है । इससे डिप्रेशन पैदा होता है । तब हर तरफ से फसल से लेकर दू ध तक को न�ट करने की खबरें आती हैं । पिछले वर्षों में ऐसा होता रहा है । लेकिन इस बार किसानों ने ‘गां धीगिरी’ का रास्ता अपनाया है । खबर है कि सड़कों पर बहा कर गुस्सा जताने के बजाय किसान दू ध और फलों का रस अस्पताल में भर्ती मरीजों में मुफ्त बाँ ट रहे हैं और गरीबों को खीर खिला रहे हैं । किसान आं दोलन का यह मानवीय पहलू दिल छूने वाला है । ऐसा नहीं है कि व्यवस्था को किसानों की समस्याओं का पता न हो। पता है , तभी तो पक्ष-प्रतिपक्ष दोनों मुखर हो उठे हैं । किसी को लगता है कि आं दोलन वास्तव में कृषक समुदाय की परे शानी का प्रतीक है , तो कोई इसे पब्लिसिटी संपादकीयम्

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स्टंट घोषित कर रहा है । यही नहीं, वैि�वक आर्थिक स्थिति से लेकर अतिरिक्त उपज तक को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । कुल मिलाकर, सियासत चल रही है और पैदावार पर सही कीमत न मिलने से परे शान किसान परिवारों के छोटे बच्चे तक हड़ताल पर बैठे हैं । सरकार ने भी अपना संकल्प दोहरा दिया है कि, 2022 तक किसान की आमदनी दोगुनी कर देंग�े। पर किसान हैं कि स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू कराना चाहते हैं । आपको याद दिला दें कि किसानों की आत्महत्याओं से विचलित होकर 2004 में हरित क्रांति के जनक प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में रा�ट् रीय किसान आयोग बनाया गया था। उन्होंन�े 2006 में ही रिपोर्ट दे कर व्यापक कार्य-योजना प्रस्तुत कर दी थी। उसके प्रकाश में कुछ नई योजनाएँ आई तो हैं , लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं । अगर आप उद्योग धंधों से लेकर बड़े बड़े व्यावसायिक प्रति�ठानों तक को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से तुलना करें ग�े तो पता चलेगा कि खेतीकिसानी लगभग उपेक्षित कार्यक्षेत्र है । यही कारण है कि ग्रामवासिनी भारतमाता की छाती गगनचुंबी इमारतों के बोझ से दबी जा रही है और कृषिप्रधान दे श में खेत-खलिहान सिकुड़ते जा रहे हैं । औद्योगिक प्रगति का यह मॉडल कारों के काफिले तो सजाता है लेकिन अ�नदाता को दो जून की रोटी मुहैया नहीं करा पाता। भला आज खेती को ‘उत्तम’ आजीविका कौन मानेगा? ज़रूरत महात्मा गां धी के ग्राम स्वराज की राह अपनाने की है । स्वामीनाथन रिपोर्ट भी यही चाहती है । हमारे किसान भी बस इतना ही तो माँ ग रहे हैं कि, कृषि ऋण माफ़ कर दो, उपज का डे ढ़ गुना लाभकारी मूल्य दे दो, अत्यंत लघु किसानों के लिए न्यूनतम आय गारं टी योजना लागू कर दो, और सारी उपज खरीदने का इं तज़ाम कर दो। इस दे श के अ�नदाता के लिए इतना तो किया ही जाना चाहिए। (डे ली हिं दी मिलाप, 05 जून, 2018)

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अ�नदाता से दिल्ली दू र क्यों? आखिर आं दोलनकारी किसानों को दिल्ली में प्रवेश कर किसानघाट तक जाने की अनुमति मिल गई और फिलहाल आं दोलन थम गया है । लेकिन, यह विडं बना नहीं तो और क्या है कि अहिं सा दिवस यानी बापू-शा�त्री जयंती के अवसर पर दे श की राजधानी की सीमा पर किसान और जवान को आमनेसामने आना पड़े , परस्पर भिड़ना पड़े ! भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले हरिद्वार से किसानघाट के लिए प्रस्तावित किसान क्रांति यात्रा की तरफ सरकार ने कई दिन तक कोई ध्यान नहीं दिया और जब भारी तादाद में आं दोलनकारी किसान उत्तर प्रदे श और दिल्ली की सीमा पर आ पहुँचे, तो तरह-तरह के बहाने बनाकर दिल्ली में उनके प्रवेश को अवां छित और निषिद्ध घोषित कर दिया गया। दे श भर से आए हुए ये किसान ‘किसानघाट’ तक जाना चाहते थे और बाद में ‘अपने’ (!) प्रधानमंत्री के समक्ष अपना दु खड़ा रखना चाहते थे क्योंक�ि प्रधानमंत्री उन्हें बार-बार ‘अ�नदाता’ कहकर संबोधित करते और आ�वासन दे ते रहे हैं कि हमारी कार्यसूची में अ�नदाता का सर्वोपरि स्थान है । इतना ही नहीं, यथाशीघ्र किसानों की आय दोगुना करने की लोकलुभावन वाणी भी लगभग रोज ही आकाश में तैरती रहती है - जमीन पर उतरती नहीं! इसीलिए यह जरूरी हो गया था कि सोई हुई दिल्ली के कानों तक किसान एक बार फिर अपनी आवाज पहँु चाएँ । ऐसा इस वर्ष में यह तीसरा प्रयास था इससे पहले भी पिछले तीन-चार वर्षों में कम से कम 6 बार किसान आं दोलन दिल्ली दरबार को खटखटाने की कोशिशें कर चुका है । हर बार पहले दे र तक उपेक्षा और उसके बाद सुंदर-सुंदर आ�वासन मिलते रहे हैं ; लेकिन कोई ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया। कर्ज़ माफ़ी के नाम पर तो कहीं-कहीं हास्यास्पद राशि वाले चेक दिए जाने के उदाहरण भी सामने आ चुके हैं , जिनसे पता चलता है कि व्यवस्था दे श के अ�नदाता के प्रति कितनी संवेदनहीन रही है । संपादकीयम्

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किसी लोकतां त्रिक व्यवस्था में यदि चुनी हुई सरकार अपनी जनता से मिलने से बचने लगे, यहाँ तक कि गाँ वों और किसानों का दे श कहे जाने वाले भारत में उन्हीं शां तिप्रिय ग्रामीणों और किसानों का राजधानी में प्रवेश वर्जित कर दिया जाए जो सही अर्थों में दे श को रोटी दे ते हैं और जिनके बेटे दे श की रक्षा के लिए जान दे ते हैं , तो यह किसी भी प्रकार शोभनीय स्थिति नहीं है । समझ में नहीं आता निहत्थी जनता से सरकार कितनी डर क्यों जाती है कि उसे रोकने के लिए भारी पुलिस बल का प्रयोग करना पड़ता है , लाठियाँ चलानी पड़ती हैं , आँ सू गैस छोड़नी पड़ती है और पानी की बौछारों से हमला करना पड़ता है ? यह स्थिति आने से पहले तक सरकार कहाँ सोई रहती है ? सारे दे श को पता था पर शायद सरकार को ही नहीं पता था इसीलिए इस तरह के बहाने गढ़े गए कि दिल्ली में प्रवेश के लिए अनुमति तो ली ही नहीं गई। सरकार के इसी प्रकार के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण पहले भी अ�ना हजारे से लेकर अखिल भारतीय किसान सभा, किसान मुक्ति संसद और तमिलनाडु के किसानों तक को बार-बार दिल्ली दरवाजे पर दस्तक दे ने के लिए मजबूर होना पड़ता है । सवाल यह भी है कि जब हालात बेकाबू होने लगे, सरकार को वार्ता करने का ख्याल तभी क्यों आया? ऐसी आनन-फानन वार्ता से स्थायी समाधान कभी नहीं मिलते; इस बार भी नहीं! किसानों ने आधी-अधूरी माँ गें मानने की नीति पर वि�वास न होने के कारण सुझाए गए समाधान को स्वीकार करने से पहले इनकार किया तो कोई अचरज नहीं। किसान इतनी बार छला जा चुका है कि अब तात्कालिक समाधानों से बहलता नजर नहीं आता। फिलहाल किसान अपने घरों को लौट गए हैं लेकिन उन्हें लगता है कि वे कहने भर को सरकार की प्राथमिकता है ; कर्म के स्तर पर नहीं! शायद ऐसे ही किसी समय रा�ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘दिल्ली’ को अ�व-मेध की तर्ज पर कृषक-मेध करने वाली रानी कहा था-

वैभव की दीवानी दिल्ली । कृषक-मेध की रानी दिल्ली ॥ अनाचार-अपमान-व्यंग्य की चुभती हुई कहानी दिल्ली॥ (डे ली हिं दी मिलाप, 04 अक्तूबर, 2018)

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संपादकीयम्


कर्ज़ माफ़ करने की राजनीति पाँ च राज्यों में विधानसभा चुनाव संप�न हुए। परिणाम भी आ गए। सरकारें भी गठित हो जाएँ गी। चुनाव प्रचार के दौरान किए गए बड़े -बड़े वादों को पूरा करने की चुनौती इन सरकारों के सामने होगी। अगले साल लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं ; इसलिए कोई भी पार्टी यह नहीं चाहे गी कि इस समय उस पर अपने वादों से मुकरने का आरोप लगे। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि जो सब्ज़बाग जनता को चुनाव भाषणों के दौरान दिखाए गए हैं , उन्हें हकीकत बनाना बेहद मुश्किल काम होगा। विशेष रूप से कां ग्रेस के सामने यह चुनौती है कि जिन राज्यों में उसने राख से उठकर पुनर्जीवन प्राप्त किया है , वहाँ की जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतर कर दिखाए। चुनावी सभाओं में कां ग्रेस अध्यक्ष राहुल गां धी ने बार-बार यह सवाल उठाया कि अगर बड़े उद्योगपतियों को सरकार द्वारा लाभ पहुँचाया जा सकता है , तो हिं दुस्तान के करोड़ों किसानों का कर्ज माफ क्यों नहीं किया जाए। अगले ही साँ स में वे यह वचन दे ते रहे हैं कि अगर कां ग्रेस की सरकार बनती है , तो तुरंत 10-15 दिन के भीतर किसानों का कर्ज़ माफ़ किया जाएगा क्योंक�ि यह तो किसान का हक है । अर्थशा�त्री इस विषय पर कुछ भी कहते रहें , राजनीति की तो मजबूरी है कि उसे लोगों को किसी न किसी तरह लुभाना है और यही वे करते रहे । स्मरणीय है कि इससे पहले महारा�ट्र , उत्तर प्रदे श और राजस्थान में भाजपा ने और पंजाब तथा कर्नाटक में कां ग्रेस और उसके सहयोगियों ने किसानों के कर्ज़ माफ़ किए हैं । लेकिन अभी इसका मूल्यां कन होना बाकी है कि खैरात का वास्तव में किसे और कितना हुआ है । अगर ‘किसान का 2 लाख कर्ज़ माफ़ और बिजली बिल हाफ़’ के नारे को वास्तव में चरितार्थ करना चाहें तो किसी भी सरकार के लिए यह बेहद महँ गा सौदा साबित होगा। इसमें संदेह नहीं कि इन विधानसभा चुनावों में भाजपा को राजस्थान, मध्य प्रदे श और छत्तीसगढ़ में कां ग्रेस ने अकेले अपने दम पर जमीन सुँघाई है , संपादकीयम्

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इसलिए वहाँ किए गए वादे पूरे तो करने पड़ेंग�े। लेकिन इससे खासतौर से राजस्थान और मध्य प्रदे श की राजकोषीय स्थिति काफी बिगड़ सकती है ; छत्तीसगढ़ भले ही इस घाटे को झेल जाए। जानकारों का मानना है कि अगर किसानों का एक लाख का ऋण माफ़ किया जाए तो इसके लिए राजस्थान सरकार को 220 अरब रुपये, मध्य प्रदे श सरकार को 160 अरब रुपये और छत्तीसगढ़ सरकार को 30 अरब रुपये की व्यवस्था करनी होगी। अगर कर्नाटक की तर्ज पर प्रत्येक किसान का 1.5 से 2 लाख तक का कर्ज़ माफ़ किया जाए तो यह बोझा उसी अनुपात में बढ़ जाएगा जिसे ढोने में इन राज्यों की वित्त व्यवस्था की कमर टू ट सकती है । ये तो हुईं राजनीति की विवशताएँ ! लेकिन आर्थिक नीतिकारों का कहना है कि कर्ज़ माफ़ी से किसानों की समस्याएँ दू र नहीं होतीं, क्योंक�ि इसका फायदा बहुत ही सीमित वर्ग को मिल पाता है । आमतौर से बड़े किसान यह चालाकी करते हैं कि बैंक�ों से कर्ज़ा उठा लेते हैं और कर्ज़ा माफ़ी की प्रतीक्षा करते रहते हैं ; जबकि छोटे किसान आज भी महाजनों और सूदखोरों के शिकंजे में फँसे हुए हैं । यही कारण है कि कर्ज़ माफ़ी की सियासती चालों पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं । रिजर्व बैंक� भी कर्ज़ा माफ़ी का पक्षधर नहीं है क्योंक�ि इससे सरकारी खजाने पर बोझ तो बढ़ता ही है , महँ गाई पर भी अंकुश नहीं रहता। इसलिए किसानों का जीवन स्तर उठाने के लिए कर्ज़ माफ़ी के बजाय उन्हें खेती-किसानी की मूलभूत सुविधाएँ मुफ्त मुहैया कराना और नकद फसलों के उत्पादन के लिए सहायता दे ना बेहतर विकल्प है । अंततः, दे खना होगा कि मध्य प्रदे श, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कर्ज़ माफ़ी के लिए आवश्यक राशि का जुगाड़ नई सरकारें कहाँ से करें ग�ी। (डे ली हिं दी मिलाप, 14 दिसंबर, 2018)

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आत्महत्याओं का इलाज़ कर्ज़माफ़ी नही ं 2018 के अंतिम महीनों में हुए विधानसभा चुनावों से 3 राज्यों में सत्ता में आते ही ज़ोर-शोर से कां ग्रेस ने किसानों के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणाओं से एक ऐसा माहौल पैदा कर दिया है जिसमें अन्य राज्यों की सरकारों पर भी कर्ज़ माफ़ी का दबाव बढ़ रहा है । पहले महारा�ट्र , उत्तर प्रदे श, पंजाब और राजस्थान की सरकारों ने इस नीति को लागू करके इन राज्यों के सकल घरे लू उत्पाद (जीडीपी) को भारी नुकसान पहुँचाया, अब अपनी सरकार वाले राज्यों में कां ग्रेस ताल ठोक-ठोक कर यही कर रही है । आ�चर्य नहीं होना चाहिए अगर 2019 के आम चुनाव से पहले पूरे दे श में कर्ज़ माफ़ी की बाढ़ आ जाए। भले ही इस जनता-रिझाऊ टोटके के चक्कर में सरकारी खजाने खाली हो जाएँ अथवा साधारण करदाता की जेब कटती जाए। फिलहाल कोई भी पार्टी किसानों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहती। वैसे जमीनी सच्चाई यह भी है कि जितनी घोषणाएँ की जाती हैं , उतना कर्ज़ माफ़ हो नहीं पाता। जानकार बताते हैं कि विरोधियों को पटखनी दे ने के लिए 2008 में मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने दे शभर में 70,000 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने की चाल चली थी। लेकिन 4 साल में केंद्र सरकार केवल 52,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ माफ़ कर पाई और वादे के मुताबिक 18,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ शेष रह गया। कर्नाटक में बनी नई कुमारस्वामी सरकार ने 8,000 करोड़ रुपये की कर्ज़ माफ़ी घोषित की जिसमें से अभी केवल 400 करोड़ रुपये का कर्ज़ माफ़ हो सका है । इस माफ़ी का लाभ छोटे और सचमुच ज़रूरतमंद किसान तक कितना पहुँच पाता है , इसमें भी बड़ा संदेह है । उदाहरण के लिए, मध्यप्रदे श की नवगठित कां ग्रेस सरकार की कर्ज़माफ़ी की योजना के दायरे में कथित रूप से न आने के कारण एक सप्ताह के अंदर दो किसानों ने आत्महत्या कर ली। साथ ही, कर्ज़माफ़ी का दु ष्प्रभाव दू सरी लोक संपादकीयम्

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हितकारी योजनाओं पर भी पड़ता है । जैसे कि मप्र में ही किसानों को यूरिया नहीं मिल रहा और रबी फसलों को लेकर चिंतित किसान अब फिर गुस्से में हैं । अतः राजनैतिक दलों को दे श के लिए आत्मघाती इस खेल से बाज़ आना चाहिए तथा किसानों की समस्याओं के स्थायी समाधान खोजने चाहिए। कर्ज़माफ़ी का झुनझुना थमाकर रीझते फिरने की बचकाना सियासत के दू रगामी परिणाम खतरनाक हो सकते हैं । कर्ज़ को किसान आत्महत्याओं का एकमात्र कारण मान बैठना भी ठीक नहीं है । प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि का तो कहना है कि किसानों की आत्महत्या के आँ कड़ों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि हाल के वर्षों में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या वास्तव में घटी है । इसका अर्थ यह है कि किसानों की आत्महत्या और गरीबी के बीच उतना सीधा रिश्ता नहीं है , जितना बताया जाता है । वरना आत्महत्या का आँ कड़ा बिहार और उत्तर प्रदे श जैसे गरीब प्रदे शों से की तुलना में महारा�ट्र और आं ध्र प्रदे श जैसे अपेक्षाकृत अमीर राज्यों में ज़्यादा क्यों होता? इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि गरीब किसानों पर अमीर परिवारों के मुकाबले दे नदारी ज्यादा रहती है , लेकिन आत्महत्या उनकी तुलना में अमीर किसान ज़्यादा करते हैं । नेशनल सैंप�ल सर्वे ऑफिस के आँ कड़ों के मुताबिक, महारा�ट्र में आत्महत्या करने वाले किसानों में से लगभग 90 फीसदी के पास 2 एकड़ से ज्यादा ज़मीन थी और हर 10 में से 6 किसान 4 एकड़ से ज्यादा ज़मीन के मालिक थे। दू सरी ओर, बिहार जैसे राज्यों में कर्ज़दाताओं के बोलबाले के बावजूद कम आत्महत्याएँ दे खने को मिली हैं । दरअसल किसानों की आत्महत्या की समस्या से कारगर ढं ग से निबटने के लिए ज्यादा लक्षित कार्यक्रमों की जरूरत है जिससे वे आशावादी और सुरक्षित महसूस कर सकें। इस दृि�ट से जीवन बीमा, फसल बीमा, चिकित्सा बीमा, फसलों की तुरंत खरीद और तुरंत भुगतान की गारं टी कर्ज़माफ़ी की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकते हैं । (डे ली हिं दी मिलाप, 27 दिसंबर, 2018)

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अब जिसे भी दे खिए, उस पर गुलेलें हैं सुनते हैं , दु निया के कुछ मुल्कों में – भारत में नहीं – अपराधियों को प्राणदं ड दे ने का क्रूरतम तरीका यह था कि उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया जाता था। भीड़ का कोई चेहरा तो होता नहीं। मुखौटा होता है । इस मुखौटे के सहारे कायर से कायर आदमी भी क्रूर से क्रूर हो जाता है । बुरे से बुरा आदमी भी न्यायाधीश हो जाता है । इसलिए भीड़ का न्याय पागलों का न्याय होता है । उस जमाने में भी ऐसा ही था। भीड़ तथाकथित अपराधी के प्रति चरम बर्बरता बरतती और उसकी जान ही नहीं लेती बल्कि लाश की भी दु र्गति करती। इसीलिए कभी किसी लैला को अपने मजनू की खातिर भीड़ के पत्थर अपने तन-बदन पर झेलने पड़ते, तो कभी कोई मसीहा चुनौती दे ता कि पत्थर मारने का हक़ उसी को है जो निष्पाप हो। किसी न किसी रूप में यह बर्बर प्रथा आज भी कुछ दे शों में प्रचलित है । लेकिन भारत के समाज ने इसे कभी उचित नहीं माना। तो फिर इधर के कुछ वर्षों में यह भीड़-न्याय हमारे यहाँ क्यों प्रचलित होता दिख रहा है ? क्या कोई बड़ा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हमारे सामाजिक-मन में घटित हो रहा है और विकास-विकास के शोरगुल के तले हमें कोई ताकत वापस पत्थर-युग में धकेल रही है ? लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा भीतरी खतरा यही बताया जाता है कि वह अगर भीड़-तंत्र में बादल जाए तो स्वयं अपना नाश कर सकता है । दरअसल, हम भीड़-न्याय की यह चर्चा महारा�ट्र से असम तक सामने आ रही हिं सा की खबरों के प्रसंग में कर रहे हैं । इधर कुछ महीनों में अलग-अलग स्थानों पर उग्र और हिं सक भीड़ ने कोई उनतीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया। क्यों? शक हुआ कि वे बच्चा-चोर हैं । शक और अफवाह को हवा दे ने का काम सोशल कहे जाने वाले एं टी-सोशल मीडिया के सहारे बड़ा आसान हो गया है । हमें तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारा समाज इन फेसबुक, व्हाट् सएप और ट्विटर जैसी चीजों के योग्य ही नहीं है । इसीलिए इन माध्यमों का अत्यंत व्यापक उपयोग हम हिं सा और अश्लीलता के प्रचार-प्रसार के लिए करने में संपादकीयम्

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अग्रणी हैं । सोशल मीडिया के अनुशासन को तोड़ हम रहे हैं और ज़िम्मेदारीजवाबदे ही के उपदे श इन मंचों के मालिकों को दे रहे हैं ! अच्छा ये बच्चे चुराए क्यों जाते हैं ? गुलाम बनाए जाने के लिए। आतंक फैलाने में इस्तेमाल के लिए। व्यभिचार के लिए। पोर्नोग्राफी के लिए। भीख मँगवाने के लिए। इसे रोकने के लिए कानून हैं । पर बच्चा-चोरी जारी है । अर्थात प्रशासन इस जघन्य अपराध पर लगाम कसने में असफल दिखाई दे ता है । यह असफलता शायद इतनी बढ़ गई है कि जनता प्रशासन से हताश हो गई है । या फिर उसके मन में व्यवस्था के प्रति न सम्मान बचा है , न वि�वास और न भय। ऐसे स्थिति में जनता का कानून हाथ में लेना और जुनूनी भीड़ में तब्दील हो जाना बेहद खतरनाक सच्चाई है । इस घातक प्रवृत्ति को तब और ताकत मिलती है , जब खुद लोकतंत्र के मसीहा दलगत राजनीति के स्वार्थ साधने के लिए ‘भीड़ द्वारा हिं सा’ के संरक्षक बन जाते हैं । कुछ बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठन जब किसी आं दोलन की सफलता के लिए लोगों की जूतों और झाड़ुओं से पिटाई पर इतराते हैं , तब वे भी हिं सकसमुदाय को उकसाने का नैतिक अपराध कर रहे होते हैं । कई दशकों से लगभग सभी भारतीय भाषाओं की फिल्में भी भीड़ द्वारा कानून को हाथ में लेने और बर्बरता बरतने का समर्थन और महिमा-मंडन करती आ रही हैं । ऐसे में केवल तात्कालिक उपाय से काम नहीं चलेगा। ज़रूरी है कि लोगों के मन में कानून और व्यवस्था के प्रति वि�वास को बहाल किया जाए। वरना भीड़ का मुखौटा पहनकर अराजक तत्व अपनी व्यक्तिगत, सां प्रदायिक और राजनैतिक खु�नस भिक्षाटन करने वालों तक से निकालते रहेंग�े। फिलहाल तो बस इतना ही कि -

ईंट, ढे ले, गोलियाँ , पत्थर, गुलेलें हैं अब जिसे भी दे खिए, उस पर गुलेलें हैं क्या पता क्या दं ड दे , यह आज क़ातिल को भीड़ पर तलवार हैं , ख़ंजर गुलेलें हैं (डे ली हिं दी मिलाप, 05 जुलाई, 2018)

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लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़-न्याय दे श के सब सयाने एक बार फिर चिंता में हैं कि कानून को अपने हाथ में लेकर दिन दहाड़े खुले आम किसी को भी मौत के घाट उतारने को तत्पर हिं सक भीड़ के साथ कैसे निबटा जाए। कानून बनाने वाले भी और उसकी चौकसी करने वाले भी असहाय से नज़र आ रहे हैं । लीडरों के बयान और जजों के निर्देश� सब धरे के धरे रह जाते हैं और अगली सुबह एक और आदमी के भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार दिए जाने की मनहूस खबर मिलती है । कड़ी कार्र वाई होगी! मगर कब? लोग मर रहे हैं । उन्मत्त भीड़ द्वारा फिल्मी अंदाज़ में मारे जा रहे हैं । इन मौतों पर सियासत नहीं होनी चाहिए। पर हो रही है । कानून हाथ में लेने वालों और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करने वालों की निशानदे ही होनी चाहिए। ऐसा कुछ होता दीख नहीं रहा। बल्कि सयानों के बीच एक और अनिर्णीत बहस सी छिड़ गई है । बहस इस बात पर कि भीड़-न्याय कोई नई चीज़ नहीं। यह तो पहले से होता आया है । 1984 के घाव कुरे दे जा रहे हैं । लेकिन क्या इस आधार पर 2018 में जारी भीड़ द्वारा हत्या को उचित माना जा सकता है ? उस समय के खलनायकों की आज पहचान कराना तब तक कोई अर्थ नहीं रखता जब तक आज के खलनायकों को न पहचाना जाए। इस बारे में सोशल मीडिया को खूब गरियाया जा रहा है । लेकिन सोशल मीडिया पर इस तरह की उत्तेजना जगाने वाली सामग्री का स्रोत कहाँ है , यह कोई नहीं बता रहा। सुनने में तो यहाँ तक आता है कि ज़्यादातर राजनैतिक दल ही अपने निहित स्वार्थ साधने के लिए ऐसी सामग्री के प्रचार को हवा दे ते हैं । ज़रूरत है कि दे श में लोकतां त्रिक न्याय के शासन को बहाल किया जाए और भीड़-न्याय के प्रति व्यवस्था ज़ीरोटालरें स� की नीति अपनाकर आम नागरिक के मन में राज्य-व्यवस्था के प्रति भरोसा जगाए। वैसे मॉब-लिंचिंग का एक प्रसंग महात्मा गां धी की आत्मकथा में भी मिलता है । बात 10 जनवरी, 1897 की है । गां धी जी भारत के संक्षिप्त दौरे के बाद संपादकीयम्

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परिवार को लेकर डरबन लौट रहे थे। वहाँ बसे हुए गोरों की नाराज़ भीड़ उन्हें समाप्त कर ही दे ती अगर शुभचिंतकों ने वक़्त पर उन्हें न बचा लिया होता। वे भाग्यशाली थे। आज की भीड़ के शिकार उतने भाग्यशाली नहीं हैं । शायद उनके कोई शुभचिंतक ही न हों, जो बचाने आएँ । यह पगली भीड़ ऐसे ही लोगों पर निशाना साधती है जिनके लिए तुरंत कोई आ न सके। यह पागल भीड़ आती कहाँ से है ? क्या यह बहुत आक्रोश से भारी हुई है ? प्रायः कहा जाता है कि ऐसे लोग किसी समुदाय या विचार के प्रति असंतोष से भरे होते हैं । इतना भर होता तो शायद लगाम कसी जा सकती थी। कोढ़ में खाज तो तब पैदा होती है जब इस आक्रोश और असंतोष को किसी विचार का सहारा लेकर घोर घृणा में तब्दील किया जाता है । ऐसे विचार न्याय के राज्य में यकीन नहीं रखते और अपनी धारणा को ही अंतिम सत्य मानकर लोगों को तत्काल मृत्युदं ड के लिए प्रेरित करते हैं । कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसा भीड़तंत्र किसी भी लोकतंत्र को कलंकित ही कर सकता है । वैि�वक अर्थव्यवस्था के इस युग में ऐसी घटनाएँ भयानक रूप से विकासविरोधी हैं । भला दु निया का कोई व्यवसायी ऐसी जगह को अपने उद्योग और व्यवसाय के लिए क्यों चुनेगा जहाँ पगलाई भीड़ कानून को हाथ में लिए फिरती हो? दु निया भर में ऐसी दिशाहीन भीड़ का राजनीति अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करती आई है । नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने यही तो किया था। बाद में यही भीड़ बासमसूर बनकर अराजकता पैदा करती है । अंत में, 1991 में लिखे हरिशंकर परसाई के व्यंग्य ‘आवारा भीड़ के खतरे ’ के हवाले से कहा जा सकता है कि, ‘यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है । यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दे । फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं । यह भीड़ कट्टरवादियों का हथियार बन सकती है । हमारे दे श में यह भीड़ बढ़ रही है । इसका उपयोग भी हो रहा है । आगे इस भीड़ का उपयोग सारे रा�ट् रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है ।‘ (डे ली हिं दी मिलाप, 26 जुलाई, 2018)

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अब किसके पिता की बारी है ? उत्तर प्रदे श में बुलंदशहर के गाँ व स्याना का हिं सक घटनाक्रम किसी भी शां तिप्रिय नागरिक को विचलित करनेवाला और किसी भी सभ्य समाज को शर्मिंदा करनेवाला घटनाक्रम कहा जा सकता है । हिं सक भीड़ के संभवतः सोचे-समझे आक्रमण के तहत शहीद हुए पुलिस अधिकारी के बेटे का यह सवाल कि, ‘हिं दू-मुस्लिम विवाद में मेरे पिता की जान जाने के बाद अब और किसके पिता की बारी है ?’ - कोई फिल्मी संवाद नहीं है ; बल्कि उत्तर प्रदे श की शां ति और व्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों से हर जागरूक दे शवासी का प्र�न है । बुलंदशहर के उस अपेक्षाकृत शां त और सद्भावपूर्ण इलाके में उस दिन क्या-क्या हुआ, कैसे-कैसे हुआ और उसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार है ; इस बारे में तमाम तथ्य व्यापक जाँ च के बाद सामने आ पाएँ गे। लेकिन प्रदे श के अत्यंत वरि�ठ पुलिस अधिकारी का यह स्वीकार करना स्थिति की भयावहता का संकेत दे ता है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे किसी बड़े षड्यंत्र की आशंका है । पहले के अनुभवों के आधार पर यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि भीड़ द्वारा हिं सा के ऐसे मामलों में तमाम जाँ च-पड़ताल के बावजूद अंततः किसी को सजा नहीं दी जा पाती क्योंक�ि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। भीड़ के मुखौटे के सहारे आपराधिक तत्व साफ-साफ बच जाते हैं । इसीलिए अब ऐसे आपराधिक तत्वों ने उन्मत्त भीड़ का सहारा लेने की तकनीक सोचसमझकर अपनाई है । दे खना होगा कि भीड़ के मुखौटे के पीछे छिपे वास्तविक अपराधियों को बेनकाब करने में प्रशासन और न्यायपालिका कहाँ तक समर्थ हो पाती है । कथित गोहत्या के कारण गुस्से में उफनती हुई भीड़ अगर अचानक थाने पर टू ट पड़ती, तो यह समझा जा सकता था कि यह कां ड त्वरित प्रतिक्रिया और आवेश का परिणाम है । लेकिन जिस प्रकार योजनाबद्ध ढं ग से खेतों में मिले संपादकीयम्

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अवशेषों को थाने के सामने लाकर प्रदर्शन किया गया और समझाने-बुझाने वाले पुलिस अधिकारी को लक्ष्य बनाकर हमला किया गया, व्यापक पथराव और आगजनी की गई, उससे तो ऐसा नहीं लगता कि जो कुछ हुआ वह अचानक फूट पड़े गुस्से का परिणाम था इसके विपरीत जिस प्रकार की तैयारी के साथ इस हिं सक वारदात को अंजाम दिया गया, उसके पूर्व नियोजित होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। भीड़ द्वारा हिं सा किए जाने की ऐसी वारदात चाहे तात्कालिक क्रोध से पैदा हुई हो या किसी सुनियोजित साजिश का परिणाम हो, दोनों ही स्थितियों में निंदनीय है । इस प्रकार की घटनाओं का एक ही अर्थ निकलता है कि राज्य तेजी से अराजकता की ओर बढ़ रहा है । संविधान और कानून की सर्वोपरिता के स्थान पर दशकों से वहाँ दलगत राजनीति की प्राथमिकताएँ प्रमुख होती गई हैं जिसकी परिणति किसी न किसी रूप में हिं सा के महिमामंडन के रूप में सामने आई है । यह बेहद चिंताजनक है । स्मरणीय है कि लोकतां त्रिक न्याय-व्यवस्था बदले की भावना, क्रोध और घृणा के आधार पर नहीं चलती। वह सुधार और बदलाव चाहती है ताकि समाज में शां ति, सुरक्षा और व्यवस्था बनी रहे । इसलिए अगर कोई भी घृणा, क्रोध और बदले की भावना से संचालित होकर कानून को अपने हाथ में लेता है , तो ऐसे आपराधिक तत्वों को बढ़ावा दे ने, संरक्षण दे ने अथवा उनके दु ष्कृत्यों के प्रति आँ ख मूँद लेने वाले व्यक्ति और तंत्र को भी लोकतंत्र का हत्यारा ही माना जाना चाहिए। अभिप्राय कि उन्मादग्रस्त भीड़ द्वारा हिं सा की घटनाओं पर अंकुश लगाने के बजाय ऐसी हिं सा का समर्थन या महिमामंडन करने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है । भीड़ द्वारा हिं सा किसी भी प्रकार वैध नहीं और इसके लिए जि़म्मेदार लोगों को किसी भी प्रकार बख्शा नहीं जा सकता। जब तक व्यवस्था की ओर से यह संदेश आपराधिक तत्वों तक नहीं जाएगा, तब तक वे भीड़ का मुखौटा लगाकर इसी तरह उपद्रव मचाते रहेंग�े, हत्याएँ करते रहेंग�े और हर बार किसी बेटे को यह पूछना ही पड़ेगा कि, ‘अब किसके पिता की बारी है ?’ (डे ली हिं दी मिलाप, 07 दिसंबर, 2018)

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न्याय का शासन ... अंततः सिख विरोधी दं गों के दोषी पाए गए तत्कालीन कां ग्रेस नेता सज्जन कुमार कोर्ट के आदे श के अनुसार जेल की सलाखों के पीछे पहुँच ही गए। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इं दिरा गां धी की हत्या के बाद भड़की हिं सा के दौरान उग्र तथा उन्मादी दं गाइयों को हत्या और आगजनी के लिए भड़काने के लिए जिम्मेदार किसी राजनीतिक शख्सियत को इस प्रकार दं डित किए जाने से इस बात की तो तसल्ली हुई है कि तमाम तरह की खामियों और सीमाओं के बावजूद भारतीय लोकतंत्र में अभी ‘न्याय का शासन’ शेष है ! गौरतलब है कि इस अंजाम तक पहुँचने में इस मामले को कई अवि�वसनीय उतार-चढ़ाव और मोडों से गुजरना पड़ा। अब भी सज्जन कुमार आत्मसमर्पण के लिए अतिरिक्त समय तथा अपनी पसंद की जेल की मां ग कर रहे थे, जिसे माननीय न्यायालय ने ठु करा दिया। वैसे इस न्याय-प्राप्ति में जितना अधिक समय लगा है , वह हमारी न्याय व्यवस्था की विसंगति और विडं बना पर स्वत: एक प्रतिकूल टिप्पणी है । इतनी लंबी अवधि तक न्याय की प्रतीक्षा में बच्चे बूढ़े हो गए हैं और बूढ़े मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं ! माननीय न्यायालय की यह टिप्पणी इस मामले की जघन्यता की ओर इशारा करती है कि 1984 का सिख विरोधी दं गा मानवता के खिलाफ उन लोगों द्वारा किया गया अपराध था जिन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था। साथ ही यह दु र्भा ग्यपूर्ण पहलू भी शोचनीय है कि न्यायालय ने कानून लागू करने वाली एजेंस�ियों द्वारा इन लोगों की मदद किए जाने की बात भी स्वीकार की है । न्याय-प्राप्ति में इतनी अधिक दे री के पीछे भी इन दोनों कारणों की अहम भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस पूरी स्थिति को लोकतंत्र के लिए घातक ही मानना पड़ेगा। सरकार का अबाध शक्ति संपन्न हो जाना और सुरक्षा एजेंस�ियों का दे श की जनता तथा संविधान की रक्षा के स्थान पर केवल सरकार और उसमें शामिल लोगों की रक्षा के लिए समर्पित होकर रह जाना संपूर्ण लोकतां त्रिक व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने का द्योतक है । इस अप्रिय स्थिति से बचने का कोई कारगर उपाय शायद अब तक भी हमारे संपादकीयम्

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पास नहीं है । आज भी आए दिन सां प्रदायिक और राजनैतिक उन्माद से प्रेरित अंधी भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने और हत्याएँ करने के बाद साफ बच जाने के समाचार हमारी प्रशासनिक और न्यायिक प्रणाली की पंगुता की ही कहानी तो कहते हैं ! स्मरणीय है कि 17 दिसंबर, 2018 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि 1984 के दं गों में दिल्ली में 2700 से अधिक सिख मारे गए थे जो नि​ि�चत ही अकल्पनीय पैमाने का नरसंहार था। जगजाहिर है कि हिं सक भीड़ के बे-चेहरा होने का लाभ उठाकर प्रायः ऐसे अपराधों के दोषी कभी साक्ष्य के अभाव तो कभी संदेह का लाभ उठाकर बच निकलते हैं । ऐसा बहुत कम होता है कि भीड़ के मुखौटे के पीछे उपस्थित वास्तविक चेहरों को पूरी तरह बेनकाब किया जा सके और पहचाना जा सके। लेकिन इस मामल में ऐसे चेहरों की असंदिग्ध रूप से शिनाख्त हो सकी तथा उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचाया जा सका; तो इसे न्याय के शासन में साधारण नागरिक के वि�वास को पुनः स्थापित करने वाली घटना कहा जा सकता है । राजनीतिक महत्वाकां क्षा, दलगत प्रतिबद्धता और प्रतिशोध की मानसिकता किसी भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही नहीं, प्राणघातक भी है । इस अमानुषिक हत्याकां ड को इस सत्य के भी काले उदाहरण के रूप में याद रखा जाएगा। साथ ही, किसी जननेता के इस प्रकार के जनविरोधी चरित्र का पर्दाफाश होने की इस गाथा से भारत के लोकतंत्र को पाठ लेना चाहिए और ‘भीड़ न्याय’ की खतरनाक आत्मघाती दिशा में जाने से परहे ज करना चाहिए! (डे ली हिं दी मिलाप, 02 जनवरी, 2019)

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़ े क न्यूज़ का चक्रव्यूह कैसे टू टे गा फ पिछले कुछ महीनों में भारत समेत दु निया के कई दे शों में सोशल मीडिया के दु रुपयोग के कारण हिं सा और उपद्रव की बहुत सारी अप्रिय घटनाएँ हुई हैं । समझा यह जाता था कि मीडिया का यह नया अवतार सूचना-संप्रेषण के क्षेत्र में सचमुच लोकतंत्र की स्थापना कर दे गा। अभिव्यक्ति पर किसी सरकार या किसी प्रति�ठान का प्रतिबंध नहीं रहे गा। लेकिन यह नहीं पता था कि यह दोधारी तलवार सिद्ध होगा। तब निरं कुशता के इस आलम की कल्पना भी नहीं थी कि जिसे ‘सोशल’ कहा जा रहा है , वह ‘एं टी सोशल’ भूमिका निभाएगा। इसीलिए फेसबुक, व्हाट् सएप्प और यूट्यूब जैसे मंचों को भस्मासुर बनते दे खकर कई दे शों ने इन पर प्रतिबंध लगा रखा है । उदाहरण के तौर पर श्रीलंका की बात की जा सकती है । वहाँ पिछले वर्षों में फेसबुक को इतनी लोकप्रियता मिली कि खबरें और सूचनाएँ पाने के लिए स्थानीय मीडिया के स्थान पर लोग फेसबुक पर निर्भर हो गए। इसमें कोई बुराई नहीं थी। लेकिन बुराई तब पैदा हो गई जब यूजर्स ने इन खबरों और सूचनाओं का दू सरे रास्ते से सत्यापन करना छोड़ दिया। परं परागत मीडिया में दु हरे सत्यापन का रिवाज रहा है । वही उसकी वि�वसनीयता का स्रोत है । नए अथवा सोशल मीडिया के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं हैं । वहाँ तो खबरों का उन्मुक्त प्रवाह महत्वपूर्ण है । इस कारण फेक न्यूज, झूठी खबर, भ्रामक सूचना अथवा अफवाह के लिए वहाँ की ज़मीन बहुत उपजाऊ है । ऐसी ही निरधार खबरों के कारण श्रीलंका में इसी साल फरवरी में सां प्रदायिक हिं सा फ़ेल गई थी। उस वक़्त सोशल मीडिया नफरत भरे भाषणों के माध्यम से लोगों में गुस्सा, डर और विद्वे ष की आग भड़काने वाला खतरनाक मंच बनकर सामने आया। यहाँ तक कि हालात को काबू में रखने के लिए इमरजेंस�ी लगानी पड़ी। फेसबुक को वहाँ बैन कर दिया गया। भारत में भी पगलाई भीड़ ने कम से कम 9 राज्यों में जो व्यापक स्तर पर अलग-अलग तरह के आरोप लगाकर घृणा और विद्वे ष पूर्वक 27 लोगों की संपादकीयम्

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हत्या कर डाली है , उसके मूल में लोगों को भड़काने के लिए व्हाट् सएप्प जैसे मंच के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया जा सकता। विभि�न सोशल मीडिया मंच यह कहकर पल्ला झाड सकते हैं कि सूचनाओं पर उनका कोई वश नहीं चलता। यूजर्स को अवश्य यह सुविधा प्राप्त है कि वे अपनी आडिएं स से लेकर रुचि की सूचनाएँ चुन सकते हैं । अप्रिय को ब्लॉक भी कर सकते हैं । कौन सी ़ े क, इसे निर्धारित करना इन मंचों को सूचना सच है और कौन सी झूठी या फ उपलब्ध करने वाली किसी कंपनी के हाथ में नहीं है । ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि जब तक हमारा समाज अफवाह और समाचार या प्रोपेगंडा और विश्लेषण की तमीज न विकसित कर ले, तब तक दू सरे कई दे शों की तरह इन मंचों को बैन कर दिया जाए। लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में ऐसा करना व्यावहारिक नहीं होगा। साथ ही, हमारे राजनेता और शासक भी ऐसे प्रतिबंध के लिए तैयार नहीं होंग�े क्योंक�ि एक क्लिक से व्यापक जनसमूह तक अपनी झूठी-सच्ची बात पहुँचाने वाले इस ‘जि�न’ को कोई भी खोना नहीं चाहे गा। भले ही जि�न जन-जन को खा जाए। भारत जैसे विशालतम बाज़ार में ‘बैन’ जैसी अप्रिय स्थिति न आने पाए, इस बारे में इन मंचों के मालिक सतर्क हैं । इसलिए यूट्यूब ने भामक सूचनाओं पर शिकंजा कसने और समाचार संगठनों की मदद के लिए ‘सच्चाई की परख’ के लिए कई कदमों की घोषणा की है । समाचार स्रोतों को अधिक वि�वसनीय बनाने और फर्जी वीडियो की रोकथाम के लिए उसने कर्मचारी प्रशिक्षण का प्रस्ताव सामने रखा है । फेसबुक भी बार-बार इस बात पर बल दे रहा है कि आपत्तिजनक सामग्री को पहचाना और रोका जाए। इसी सिलसिले में व्हाट् सएप्प ने तमाम माध्यमों पर विज्ञापन जारी करके यह सदाशयता प्रकट ़ े क न्यूज के प्रचार-प्रसार पर लगाम कसने का इच्छु क है । की है कि वह फ लेकिन ये सारे प्रयास सदिच्छा मात्र हैं क्योंक�ि इन मंचों पर प्रकाशित किए जाने वाले ‘कंटेंट�’ पर उनका अधिकार नहीं है और न ही हर प्रवि​ि�ट या संदेश का सत्यापन किया जाना संभव है । क्योंक�ि ये मंच प्रयोक्ताओं के परस्पर संवाद के मंच हैं । इसीलिए कंपनियाँ केवल परामर्श दे सकती हैं । वही दे रही हैं । अब यह प्रयोक्ताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे समाजविरोधी, असत्य और अफवाह कोटि की सूचनाओं और आॅ डियो-वीडियो सामग्री की खुद निशानदे ही करें ़ े क न्यूज के चक्रव्यूह को तोड़ने और उसे आगे न भेजकर हतोत्साहित करें । फ का जागरूकता के अलावा अन्य मार्ग नहीं! (डे ली हिं दी मिलाप, 12 जुलाई, 2018)

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ऊपरवाला दे ख रहा है भारत सरकार के गृह मंत्रालय के एक नए आदे श के अनुसार इं टेलीजेंस� ब्यूरो और दिल्ली के पुलिस कमि�नर समेत 10 सरकारी एजेंस�ियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी अतिरिक्त आदे श के बिना अब किसी भी नागरिक के कंप्यूटर पर हो रही सब प्रकार की गतिविधियों पर निगरानी रख सकती हैं । इस प्रकार उन्हें साधारण नागरिक के फोन और कंप्यूटर के कॉल तथा डाटा को इं टरसे�ट करने की अबाध शक्ति प्राप्त हो गई है । ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है । 2009 से ही इस प्रकार का कानून लागू है । लेकिन अब तक ऐसी किसी जाँ च या निगरानी के लिए इन एजेंस�ियों को गृह मंत्रालय से उस खास मामले का उल्लेख करते हुए हर बार अनुमति लेनी पड़ती थी। इस नए आदे श के द्वारा अब वैसी अनुमति की जरूरत खत्म कर दी गई है ; और यही किसी भी व्यक्ति के लिए चिंता की बात है क्योंक�ि अब मात्र शक का हवाला दे कर ये एजेंस�ियाँ साधारण नागरिक की निजता पर आक्रमण करने के लिए अधिकृत हो गई हैं । यदि यह कहा जा रहा है कि इस आदे श के द्वारा हम अपने लोकतंत्र को एक ऐसे ‘निगरानी राज्य’ की दिशा में धकेल रहे हैं , जहाँ सत्ता अपने नागरिकों की निजता में हस्तक्षेप करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है तो शायद गलत न होगा। इससे यह स्थिति पैदा हो सकती है कि हर नागरिक प्रतिक्षण इस बात को लेकर आशंकित रहे कि उसे लगातार ‘ऊपरवाला’ दे ख रहा है । जैसा कि प्रायः होता है , इस आदे श के संबंध में भी सरकार द्वारा यह तो कहा ही जा सकता है कि इसका इस्तेमाल दु र्लभ मामलों में ही किया जाएगा और ध्यान रखा जाएगा कि यह सामान्य नागरिकों को सताने का आधार न बने। किसी भी दे श की सुरक्षा के लिए ऐसे कानून आवश्यक होते हैं , इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन इसके साथ ही एक ऐसे मैकेनिज्म को विकसित करने की आवश्यकता है जिसके द्वारा यह सुनि​ि�चत किया जा सके कि आपराधिक पृ�ठभूमि वाले संदिग्ध व्यक्तियों और आम जनता को एक ही हं टर से न हाँ का संपादकीयम्

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जाए। इसीलिए यह व्यवस्था शायद बेहतर थी कि शक के हर मामले के निजी गुण-दोष पर विचार करते हुए गृह मंत्रालय द्वारा उसकी निगरानी का आदे श दिया जाता। लेकिन गृह मंत्रालय ने रोज-रोज के सिरदर्द से बचने के लिए एक स्थायी आदे श जारी कर दिया। अधिकारियों का सिरदर्द अब जनता का सिरदर्द बन गया है जिसे हर क्षण यह लगता रहे गा, कुछ भी बोलते-करते समय यह अहसास बना रहे गा कि ‘ऊपरवाला’ दे ख रहा है और किसी भी क्षण उसके हर ‘कर्म’ का हिसाब बराबर करे गा। इसमें दो राय नहीं कि किसी भी दे श की सुरक्षा सर्वोपरि है और उसके समक्ष नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार गौण एवं स्थगित हो जाने चाहिए। लेकिन ऐसा केवल असामान्य स्थिति या आपात स्थिति में ही स्वीकार्य है । साधारण परिस्थितियों में भी यदि नागरिक को यह लगता है कि कोई एक आँ ख लगातार उसकी हर गतिविधि को ताकझाँ क कर दे ख रही है , तो सरकार का यह अबाध अधिकार नागरिक के लोकतां त्रिक अधिकार का अतिक्रमण है । वैसे भी, पुलिस और उसके समान चरित्र वाली अन्य एजेंस�ियों के अब तक के इतिहास को दे खते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील हैं । साथ ही, राजनैतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए इस आदे श का सहज ही इस्तेमाल किया जा सकता है । यह बेहद खतरनाक स्थिति है जो साधारण नागरिक को आशंकित, भयभीत, आतंकित और असुरक्षित मानसिकता के दबाव में जीने के लिए मजबूर करे गी, इसलिए इस आदे श पर माननीय उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय के प्रकाश में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जिसके अनुसार ‘निजता’ को नागरिक का ‘मौलिक अधिकार’ माना गया है । (डे ली हिं दी मिलाप, 25 दिसंबर, 2018)

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इं तज़ाम की पोल खोलती पहली बारिश भारत में यों तो छहों ऋतुएँ अपनी पूरी खूबसूरती के साथ आती और जाती हैं , लेकिन बरसात की बात ही अलग है । सारा दे श आसमान की तरफ मुँह उठाए बारिश का इं तज़ार करता है और पहली बौछार का स्वागत उत्सव की तरह किया जाता है । ऐसा हो भी क्यों न? चुभती-जलती गर्मी से तो सभी को राहत चाहिए। लेकिन, समझ नहीं आता कि कैसे यह ‘राहत’ कुछ ही घंटों के भीतर ‘आफत’ में बदल जाती है ! अगर वैज्ञानिक सुख-सुविधाओं और तकनीकी प्रगति से वंचित किसी दू रदराज इलाके में बारिश राहत के बजाय आफत लाती, तो भी एक बात थी। मगर यहाँ तो बड़े शहरों, महानगरों और राजधानियों की हालत इतनी खस्ता है कि मुंबई हो या है दराबाद, बंगलोर हो या दिल्ली, केवल कुछ घंटों में ही सब जगह जलप्रलय का दृश्य उत्प�न हो जाता है ! इसमें दो राय नहीं कि 1875 से काम कर रहा भारत का मौसम विभाग अब बड़ी हद तक मौसम के सही पूर्वा नुमान लगाकर सटीक भविष्यवाणी करने लगा है । पर इससे क्या होता है ? अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद नहीं है , तो बचने का कोई उपाय नहीं। अंतररा�ट् रीय रे डक्रॉस एजेंस�ी ने अपने एक अध्ययन में बताया है कि आपदा प्रबंधन के दो मोर्चे होते हैं । पहला ‘पूर्वचेतावनी’ और दू सरा ‘तुरंत राहत’। कहना न होगा कि जापान, चीन और अमेरिका जैसे बड़े दे शों की तुलना में हम आपदा प्रबंधन के खासकर दू सरे मोर्चे पर अभी बहुत कमजोर हैं । इसीलिए छोटी सी बारिश भी हर बार बहुत बड़ा नुकसान कर जाती है । जागरूकता लाकर और सिस्टम को अधिक जिम्मेदार बनाकर स्थिति को सुधारा जा सकता है - बशर्ते कि हम सुधरने को तैयार हों। अब दे खिए न; अभी तो मानसून आया भी नहीं था, उसका हरावल दस्ता ही कुछ बूँदाबाँ दी लेकर आया था कि इतने भर से जेडचर्ला में एक फ़ैक्टरी की दीवार गिर गई और 47 भेड़ें दबकर मर गईं। उनकी जगह आदमी और बच्चे होते तो? संपादकीयम्

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हम हर बारिश से पहले अपनी छतों, दीवारों, गलियों, सड़कों, नालियों और तालाबों का ठीक से मुआयना क्यों नहीं करते? मरम्मत क्यों नहीं कराते? व्यक्तिगत से लेकर संस्थागत स्तर तक व्याप्त लापरवाही का ही यह परिणाम होता है कि गलियाँ और सड़कें पानी-पानी हो जाती हैं । इस कार्य के लिए जिम्मेदार संस्थाओं का रवैया साल-दर-साल के अनुभव के बावजूद इतना उपेक्षापूर्ण रहता है कि आँ धी-पानी के आते ही सबसे पहले बिजली गुल होती है । रास्ते बंद होते हैं , ट् रेफिक जाम होता है , मेनहोल उफन पड़ते हैं और दु र्घटनाएँ घटित होने लगती हैं । इसे क्या कहिएगा कि सड़कों पर अलग-अलग कारणों से मलबा इकट्ठा हो जाता है और उसे कोई नहीं उठाता। सड़क की खुदाई और तोड़फोड़ से त्रस्त होकर पिछले दिनों हाई-टे क सिटी के एक इलाके में आईटी कर्मियों ने बैलगाड़ी के ऊपर पोस्टर प्रदर्शनी लगाई! पर व्यवस्था को क्या कभी शर्म आती है ? हम आपको बताना चाहेंग�े कि आँ धी, तूफान और बारिश से होने वाली मुसीबतों का सामना करने लिए अब हमारे पास भी आधुनिकतम सुविधाएँ उपलब्ध हैं । एरियल ड्रोन तकनीक ऐसे समय में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है । ड्रोन को इस प्रकार प्रोग्राम किया जाता है कि वह बहुत कम ऊँचाई पर तथा क्षतिग्रस्त मकानों के भीतर भी उड़ान भर सकता है । अँधेरे में दे ख सकने वाले कैमरों की सहायता से मलबे में फँसे हुए लोगों को तलाश सकता है । इसके साथ ही ऐसी व्यवस्था करना ज़रूरी है कि घरों, रास्तों और रिहायशी इलाकों में जल-भराव हो ही नहीं। अर्थात, वर्षा के पानी के निकास और संरक्षण की समुचित व्यवस्था हर साल मानसून आने से पहले युद्धस्टर पर की जानी चाहिए। यदि ऐसा किया जा सके तो. ग्लोबल वार्मिंग से पैदा हुए जलवायुपरिवर्तन के खतरे का भी सामना किया जा सकेगा तथा विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन भी साधा जा सकेगा। (डे ली हिं दी मिलाप, 09 जून, 2018)

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ये मौत की सड़कें... एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दे श के सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना जनता की भी चिंता का विषय है कि- ‘दे श में इतने लोग सीमा पर या आतंकी हमलों में नहीं मरते जितने सडकों पर गड्ढों की वजह से मर जाते हैं ।‘ सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि लोगों का इस तरह मरना दु र्भा ग्यपूर्ण है और इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब माँ गा है । नागरिकों के सामान्य दै निक जीवन को आसान और सुरक्षित बनाए रखने के लिए ज़रूरी मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराना किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की पहली ज़िम्मेदारी है , इसलिए टू टीफूटी और गड्ढों से भरी ऐसी जानलेवा सड़कों की दयनीय हालत को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की चिंता पूरी तरह न्यायसंगत है । यह किसी एक इलाके या राज्य की बात नहीं है । बल्कि इस मामले में सारे दे श की सड़कों की कहानी एक ही जैसी है । गाँ वों ही नहीं शहरों में भी यह दृश्य आम है कि नालियाँ अवरुद्ध होने तथा कई जगहों पर नालियाँ ही न होने के कारण घरों से निकलने वाला गंदा पानी सड़क पर जमा रहने से सड़क पर गड्ढे पड़ जाते हैं जिससे वहाँ से गुजरने वाले वाहन चालकों को परे शानियों का सामना करना पड़ता है । विभि�न एजेंस�ियों के बीच तालमेल न होने के कारण महानगरों तक में सड़कों का कई-कई महीने उपेक्षित पड़े रहना मानो रोज़मर्रा की बात हो गई है । हर बार बरसात में हालात और भी बिगड़ जाते हैं और लोग अनजाने ही मौत के मुँह में ले जाने वाले इन गड्ढों में गिरकर जान गँवा बैठते हैं । इस स्थिति को बदला जाना ज़रूरी है वरना इन सड़कों पर चलते हुए लोग इसी तरह अकारण मौत के मुँह में जाते रहेंग�े। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की यह चिंता सबकी साझी चिंता है । इस मामले के प्रति सर्वोच्च न्यायालय की संवेदनशीलता और गंभीरता का पता इस बात से भी चलता है कि उसने केंद्र सरकार को निर्देश� दिया है कि वह सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदे शों से सलाह कर इस संबंध में अपना जवाब दाखिल करे । स्मरणीय है कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज के. एस. राधाकृष्णन की संपादकीयम्

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अगुवाई वाली रोड सेफ्टी कमेटी ने पिछले दिनों दाखिल की अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि सड़कों में बने गड्ढों के कारण दे शभर में 2013 से 2017 के बीच 14,926 लोग मारे जा चुके हैं । सुप्रीम कोर्ट ने इस कमेटी को यह भी दे खने को कहा था कि ‘क्या गड्ढों की वजह से दु र्घटना में जान गँवाने वाले लोगों को मुआवजा दिया जा सकता है ?’ आँ कड़ों की मानें तो केवल 2017 में सड़कों पर गड्ढों में गिरने से 3927 लोगों की मौत हुई है । इसका अर्थ है कि प्रतिदिन औसतन दस से ज़्यादा लोग इन हादसों में अपनी जान गँवा रहे हैं । पहले भी ऐसे मामलों के प्रकाश में आने पर सुप्रीम कोर्ट अपनी नाराजगी जता चुका है तथा सुनवाई के दौरान यह पाए जाने पर कि राज्य सरकारें सड़कों पर गड्ढों को हटाने को लेकर गंभीर नहीं हैं , काफी सख्त टिप्पणी कर चुका है । लेकिन हालात सुधरने के बजाय लगातार और बिगड़ते जा रहे हैं । इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह बेहद गंभीर समस्या है । आठ राज्यों ने इस मामले में मिनिस्ट्री ऑफ रोड एं ड ट् रांसपोर्ट के साथ मीटिं ग की है लेकिन यह नाकाफी है । अभिप्राय यह है कि यह बात केवल सड़कों की मरम्मत और रखरखाव तक सीमित नहीं है बल्कि संबंधित विभागों की लापरवाही और गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण आम नागरिकों की बेशकीमती ज़िंदगियों के साथ खिलवाड़ हो रहा है । इसे आपराधिक कृत्य माना जाना चाहिए। यह किसी इनसान की जिंदगी और मौत का गंभीर मुद्दा है और जो लोग इस तरह की दु र्घटनाओं के कारण जिंदगी खो दे ते हैं , वे मुआवजा पाने के हकदार हैं । (डे ली हिं दी मिलाप, 11 दिसंबर, 2018)

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बिन पानी सब सून भारत तेज़ी से भीषण जल-संकट की ओर बढ़ रहा है । नीति आयोग पहले ही दे श को सतर्क कर चुका है कि इतिहास के सबसे बड़े जल-संकट का सामना करने को तैयार रहें । यह तथ्य चिंताजनक नहीं तो और क्या है कि हमारी 60 करोड़ जनसंख्या पानी की कमी झेल रही है ! इसका कारण जल का अभाव उतना नहीं, जितना जल का प्रदू षित होना है । सरकारी स्तर पर तो ऐसी योजनाओं की ज़रूरत है ही जिनके सहारे जल को प्रदू षित होने और बह जाने से बचाया जा सके, पर हमें तब तक कोई संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता जब तक व्यक्तिगत स्तर पर हम इसके लिए सकारात्मक कदम नहीं उठाते। आज अगर हमारा 70 प्रतिशत जल प्रदू षित हो चुका है और जलगुणवत्ता की दृि�ट से 122 दे शों की सूची में हम 120 वें स्थान पर है तो इसका यह अर्थ है कि हम तेजी से विनाश की ओर बढ़ रहे हैं – तमाम अंधाधुंध विकास की बदौलत! राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर दे ते हुए पेयजल एवं स्वच्छता राज्यमंत्री ने यह कहकर सचेत किया है कि दे श में 2030 तक पानी की माँ ग उसकी उपलब्धता से दु गुनी हो जाएगी। यानी केवल 12 वर्ष के बाद दे श की जनता एक-एक बूँद पानी को तरस सकती है । इसलिए जल-संसाधन के तेज गति से विकास की ज़रूरत है । जल को प्रदू षित होने से बचाने के लिए व्यापक जलचेतना का जागरण ज़रूरी है । साथ ही जल-संरक्षण के लिए जन-जन को प्रशिक्षित करना होगा। वरना जल्दी ही अपनी असावधानी से हम प्रकृति की इस नेमत से पूरी तरह वंचित हो भी हो सकते हैं । हमारी परं परा जल को सृि�ट-रचना के मूलभूत पाँ च तत्वों में अत्यंत महत्वपूर्ण मानती आई है । जल को नारायण का निवास-स्थान माना गया है । उसे दे वता का दर्जा प्राप्त है । इसे केवल मिथ कहकर नहीं टाला जा सकता। बल्कि इससे हमारे पूर्वजों की जल-संसाधन के प्रति चिंता और सदिच्छा का संपादकीयम्

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पता चलता है । हमारा यह परं परागत वि�वास जड़हीन नहीं है कि मनुष्य सहित सभी प्राणी अ�न या भोजन पर निर्भर हैं और अ�न या भोजन की प्राप्ति जल के बिना संभव नहीं है । अतः जल हमारे अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है । इसलिए यह ज़रूरी है कि हम जल के प्रति गंभीर हों और जल की एक-एक बूँद बचाएँ , ताकि आगामी पीढ़ियों को प्यास से न मरना पड़े । जल की शुद्धता और स्वच्छता की रक्षा नहीं की गई तो प्रदू षित जल के सेवन से रोगग्रस्त होकर हम कल के मरते आज ही मर जाएँ गे। नदियों को हमारे पूर्वजों ने माता अकारण ही नहीं कहा था। पर हम ऐसे कपूत निकले कि न माता, न धरती और न नदी – किसी के प्रति भी हम जवाबदे ह नहीं रहे । उनके स्वास्थ्य की रक्षा तो नहीं ही की, उल्टे अपनी गंदगी से उन्हीं को प्रदू षित कर डाला। इसी का यह परिणाम है कि तमाम जलस्रोत या तो सूखते जा रहे हैं या प्रदू षित होते जा रहे हैं । आज इस ऐतिहासिक तथ्य के पीछे निहित सूझ को आत्मसात करने की ज़रूरत है कि पुराने समय में जल की अबाध आपूर्ति की संभावनाओं का विचार करके ही गाँ व और शहर बसाए जाते थे। जहाँ आसपास नदी या झरने नहीं होते थे, वहाँ झीलों और तालाबों का पूरा जाल बिछा दिया जाता था, ताकि वर्षा का जल व्यर्थ न बहने पाए और जल का अभाव न होने पाए। जल प्रबंधन के उस दे सी मॉडल को पुनर्जीवित करके वर्तमान और भावी जल-संकट का सामना किया जा सकता है , इसमें संदेह नहीं। दिल्ली की द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी ने इसका उदाहरण भी पेश कर दिया है । कमेटी के सदस्यों ने सरकारी महकमे की उदासीनता और कानूनी दाँ वपेंच� के बावजूद अपने इलाके के दो तालाबों को जीवंत रूप दे ने में सफलता हासिल की है । अन्यत्र भी जन-आं दोलन के स्तर पर जल-संरक्षण के अभियान की आवश्यकता है , वरना हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है । (डे ली हिं दी मिलाप, 27 जुलाई, 2018)

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ये सेि�टक टैंक� साफ करने वाले... दिल्ली में सीवर की सफाई करने के लिए उतरे एक युवक की मौत कमजोर रस्सी टू टने के कारण गिर जाने से हो गई। यह ऐसी इकलौती खबर नहीं है । कुछ ही दिन सीवेज टैंक� की सफाई करते वक्त पहले पाँ च युवकों की दर्दनाक मौत दिल्ली में ही तो हुई थी। उड़ीसा से भी ऐसे हादसों की खबरें आ चुकी हैं । छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में पंदरीपानी गाँ व में सेि�टक टैंक� में एकएक कर उतरे चार सफाईकर्मी मकान मालकिन समेत दम घुटने से मारे गए। ये तो वे कुछ सूचनाएँ हैं जो मीडिया में आ जाने के कारण चर्चित हो गई हैं । लेकिन सीवर और सेप्टिक टैंक� की सफाई के दौरान इस तरह की बहुत सारी मौतें होती ही रहती हैं जो अनदे खी और अचर्चित रह जाती हैं । ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के बरक्स ऐसी दु र्घटनाओं का होना और भी अधिक चिंताजनक है । शायद इसे हमारे समाज की क्रूर और अस्वस्थ सच्चाई ही कहना चाहिए कि आज भी जब सीवेज और सेि�टक टैंक� की गंदगी साफ करने के लिए जीतेजागते आदमी को गंदगी के गर्भ में उतरना पड़ता है और जानबूझकर स्वयं को बहुत बार मौत के मुँह में धकेलना पड़ता है । दिल्ली की दु र्घटना से यह भी पता चला है कि जिन युवकों की मौत हुई है वे न तो इस कार्य के लिए प्रशिक्षित थे और न ही तैयार। उन्हें ठे केदार द्वारा उस नर्क में उतरने के लिए बाध्य किया गया जहां से उनकी लाश ही बरामद हुई। अभिप्राय यह है कि सेि�टक टैंक� और सीवर की सफाई करने वाले इन सफाईकर्मियों की जान की कीमत समझने को अभी भी हमारा समाज तैयार नहीं है । उन्हें चंद पैसों की खातिर गर्दन पकड़कर गंदगी के नर्क में धकेल दिया जाता है । ऐसा नहीं कि इस संबंध में कोई कानूनी प्रावधान न हो। सब हैं ; लेकिन उनकी अनदे खी की जाती है । इसलिए यह जरूरी है कि ऐसी दु र्घटनाओं के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों, एजेंस�ियों या संस्थाओं की निशानदे ही की जाए और इस अमानुषिक और आपराधिक कृत्य के लिए उन्हें कानून के तहत दं डित किया जाए। साथ ही, समाज में भी स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति चेतना के प्रसार की आवश्यकता है क्योंक�ि उसके अभाव के कारण ही ऐसी नौबतें आती हैं । संपादकीयम्

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इसमें कोई दो राय नहीं कि सीवेज और सेि�टक टैंक� की सफाई का कार्य प्राणघातक कार्य है । साथ ही, गंदगी से जूझने का भी कार्य है । यही कारण है कि ऐसे टैंक�ों की मनुष्य के द्वारा सफाई कराया जाना प्रतिबंधित है । सफाईकर्मियों को इसके लिए विवश नहीं किया जा सकता। लेकिन अशिक्षा और दरिद्रता के चलते आज भी सेि�टक टैंक�ों की मनुष्य द्वारा सफाई की प्रथा चालू है । इसे बंद होना चाहिए और इसके स्थान पर मशीनों द्वारा सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए; क्योंक�ि यह कार्य खतरनाक होने के साथ-साथ तिरस्कारपूर्ण भी है । कानूनी प्रावधान के अनुसार सेि�टक टैंक�ों की मशीन द्वारा ही सफाई की अनुमति है । इसके बावजूद अगर मनुष्य के द्वारा सफाई करने की विवशता ही आ पड़े तो पक्की सुरक्षा व्यवस्था का भी प्रावधान है । सेि�टक टैंक� की सफाई के लिए उस व्यक्ति को इस काम के लिए तैयार विशेष सूट उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिसे टैंक� में उतरना हो। साथ ही, ऑक्सीजन सिलेंड�र, मास्क, गम शूज और सेफ्टी बेल्ट की भी व्यवस्था अनिवार्य है । यही नहीं, किसी प्रकार की आपातकालीन स्थिति के लिए तैयार रहने हे तु पहले से ही एं बुलस� ें को भी सूचित करने का नियम है । यदि इन सब नियमों का पालन किया जाए तो न तो यह कार्य तिरस्कारपूर्ण रहे गा और न ही इतना जोखिम भरा कि सफाईकर्मी का दम घुट जाए और जान ही चली जाए! अतः ‘स्वच्छ भारत’ अभियान को केवल सड़कों की सफाई और अधिक से अधिक शौचालयों के निर्माण से आगे बढ़कर सीवर और सेि�टक टैंक� के रखरखाव तथा इसके लिए जान जोखिम में डालने वाले सफाईकर्मियों की सुरक्षा को भी अपने लक्ष्यों में शामिल करना चाहिए क्योंक�ि राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता के बिना ये हालात बदलने वाले नहीं है । यह सरकारी आँ कड़ा चौंक�ाने वाला है कि पिछले 3 साल में अकेले तमिलनाडु में सीवर और सेि�टक टैंक� सफाई करते हुए 144 सफाईकर्मियों ने प्राण गँवा दिए। दरअसल, जैसे-जैसे शहरों और गाँ वों में शौचालयों की संख्या बढ़ रही है , वैसे-वैसे सेि�टक टैंक�ों की संख्या भी बढ़ रही है । परं तु उनकी साफ-सफाई की मशीनी व्यवस्था लगभग शून्य है । ऐसे में ‘गड्ढों’ की सफाई की बाध्यता सफाईकर्मियों को खतरे से खेलने के लिए मजबूर करने के समान है । यों, आवश्यकता है कि इस पूरी सफाई व्यवस्था का प्राथमिकता के स्तर पर दे श भर में मशीनीकरण किया जाए और गंदगी के गर्भ में उतरने वाले इन सफाईकर्मियों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए। (डे ली हिं दी मिलाप, 19 सितंबर, 2018)

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हिं सा के महिमामंडन का दु ष्परिणाम उत्तर प्रदे श की राजधानी लखनऊ में पुलिस ने एपल के एक अधिकारी विवेक तिवारी की आधी रात सरे -राह सिर में गोली मारकर क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी और कई दिन तक इस हत्या को दु र्घटना सिद्ध करने का उच्च अधिकारियों तक के द्वारा प्रयास किया जाता रहा! वह तो भला हो सीसीटीवी फुटे ज का जिसने सारी घटना का साक्ष्य दे दिया वरना पुलिस तो झूठ पर झूठ बोलकर अपने आपराधिक कृत्य पर लीपापोती करने में लिप्त थी। इस सारे घटनाचक्र से यह प्र�न उठता है कि, हमारी पुलिस ‘मानव’ होना कब सीखेगी अथवा राज्य से अपराध का ‘सफाया’ करने के नाम पर सदा ‘राक्षस’ बनी रहे गी? रक्षक का राक्षस बन जाना लोकतंत्र की दृ��ट से न तो स्वीकार्य है और न श्रेयस्कर; लेकिन बढ़ते हुए अपराध की दु हाई दे कर उत्तर प्रदे श ही नहीं अन्य प्रदे शों की सरकारें भी बहुत बार अपनी पुलिस को ‘खुला खेलने की इजाजत’ दे ती रही हैं जो कानून के राज्य में किसी भी प्रकार उचित नहीं है । पुलिस का सर्वाधिकार संप�न शिकारियों के झंुड में बदल जाना तो जंगल राज्य की ही सूचना दे ता है । चुनी हुई सरकारें ही अगर जंगल राज्य को बढ़ावा देंग�ी तो लोकतां त्रिक मूल्य कैसे बच पाएँ गे? यह किसी के लिए भी भय और चिंता का विषय हो सकता है ; होना ही चाहिए। माना कि इस हत्याकां ड में लिप्त सिपाही प्रशां त चौधरी और संदीप कुमार को अंततः बर्खास्त कर दिया गया या कि दिवंगत युवक के परिवार को सरकार अथवा दू सरी संस्थाएँ कई प्रकार की सुविधाएँ और अनुदान दे देंग�ी या फिर इस पूरे घटनाक्रम की सीबीआई जाँ च भी कराई जा सकती है ; लेकिन क्या इस सबसे उत्तर प्रदे श पुलिस के वर्तमान हिं सक चरित्र को स्वीकार्य बनाया जा सकता है या इस सच्चाई का कोई क्या करे कि चुनी हुई सरकार की शह पर पुलिस तानाशाह की तरह बर्ताव कर रही है ? ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार और पुलिस अपने आप को सर्वसमर्थ मानते हैं तथा दे श के संविधान और दं ड संहिता से भी ऊपर समझते हैं । जब सरकार ने ही ‘ठोक दे ने’, मार डालने और संपादकीयम्

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मुठभेड़ में यमलोक भेज दे ने को अपने पौरुष और गौरव का प्रतीक मान लिया हो, तो इसके अलावा और कोई परिणाम को भी नहीं सकता। भय से किसी भी साधारण नागरिक के रोंग�टे खड़े कर दे ने वाले इस हत्याकां ड से यह भी सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदे श में सिपाहियों को रिवाल्वर या पिस्तौल रखने का अधिकार प्राप्त है ? क्या उन्हें इसका प्रशिक्षण दिया जाता है ? इन दोनों प्र�नों का उत्तर नकारात्मक है । इसके बावजूद उन दोनों सिपाहियों के पास ये श�त्र कहाँ से आए? मतलब साफ है कि उत्तर प्रदे श की राजधानी में पुलिस खुद अपने लिए बनाए गए कायदे कानून का पालन नहीं करती । अंततः, अगर किसी लोकतां त्रिक व्यवस्था में कोई सरकार ऐसी स्थिति में आ जाए कि उसे अपने समाज को अपराधमुक्त करने के लिए तथाकथित अपराधियों को मुठभेडें कर-करके मारना पड़े , तो इसे सामान्य स्थिति नहीं कहा जा सकता। उत्तर प्रदे श सरकार ने गर्वपूर्वक अपना यह रिकॉर्ड बताया है कि उसकी पुलिस ने 180 दिन में 420 मुठभेड़ें कीं और 15 अपराधियों को मौत के घाट उतारा। इनमें भी मात्र 48 दिन में 10 तथाकथित अपराधियों को ’उड़ाने’ का रिकॉर्ड और भी रोमां चक है । उत्तर प्रदे श पुलिस की यह रोमां चकारिता तब तो अपने चरम पर दिखाई दे ती है , जब किसी मुठभेड़ का ‘लाइव कवरे ज’ किया-कराया जाता है । कहना न होगा कि हिं सा के इस प्रकार महिमामंडन का ही यह दु ष्परिणाम हुआ है कि उत्तर प्रदे श पुलिस के सिपाही यमदू त बनकर किसी एक विवेक की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या पर उतारू हैं । हे ई�वर! इन्हें विवेक दे , क्योंक�ि ये भली प्रकार जानते हैं कि कितना जघन्य अपराध कर रहे हैं ! (डे ली हिं दी मिलाप, 03 अक्तूबर, 2018)

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संपादकीयम्


हिं सा और हताशा युवक ने अपने दोस्त की हत्या कर दी। पाँ च हज़ार रुपए नहीं लौटाए थे।... एक अन्य युवक की हत्या करके शव पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी गई।... चुनाव का बैनर बाँ धने से शुरू हुआ झगड़ा सिर पर पत्थर पटककर हत्या की वजह बन गया।... एक ने प्रेमिका के सहयोग न करने पर फाँ सी लगा ली।... एक अन्य ने पढ़ाई से परे शान होकर ट् रे न से कटकर आत्महत्या कर ली।...किसी और से संबंध का शक होने पर पति ने प�नी को, उसके ऑफिस में, 15 बार चाकू से गोद-गोदकर मौत के घाट उतारा। - हत्या और आत्महत्या की ऐसी तमाम खबरें कोई एक दिन या कभी-कभी की बात नहीं होती। रोज अखबार कालम-दर-कालम इनसे भरे रहते हैं । कभी तो ऐसा भी लगता है कि हिं सा की न्यूज़-वैल्यू के कारण ऐसी खबरें ‘गढ़ी’ तो नहीं जातीं! लेकिन नहीं, दै निक जीवन में, यानी अखबार के बाहर भी, ऐसी खबरें रोज ही दे खने-सुनने को मिलती रहती हैं । भला ऐसा क्या हो गया है समाज को कि जिधर दे खिए उधर ही लोग जान लेने-दे ने पर उतारू हैं ? हर आदमी कुछ इस तरह खीझ और गुस्से से भरा हुआ है कि ज़रा-ज़रा सी बात पर बिफर पड़ता है । मरनेमारने पर तुल जाता है । हर वक़्त की इस खीझ और गुस्से से हताशा और हिं सा उपजती है । व्यवहार में आक्रामकता आ जाती है । अगर खीझ और गुस्सा स्थायी हो जाएँ , तो आक्रामकता भी स्थायी भाव के रूप में जम जाती है । हमारे दे श की राजनीति भी इसका मज़ेदार नमूना है । हमारे नेताओं में जो अधीरता और आक्रामकता दिखाई दे ती है , उसकी जड़ में भी खीझ और गुस्सा ही तो हैं । ऐसे नेतालोग हरदम आक्रमण की मुद्रा में रहते हैं । मौका मिल जाए तो प्रतिपक्षी को पत्थरों से कूच-कूचकर या चाकू से गोद-गोदकर मार ही डालें! इस तरह के दु ष्कृत्य की प्रेरणा नफरत से मिलती है । हमारे समय का दु र्भा ग्य है कि मीडिया से लेकर राजनीति तक हर कहीं नफरत की पाठशालाएँ खुली हुई हैं । नफरत को महिमामंडित करनेवाली संपादकीयम्

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फिल्में हों या नफरत की आग फैलाने वाले नेता हों; समाज कान खड़े और आँ खें फैला कर उन्हें सुनता-दे खता भर ही नहीं, उनसे प्रेरित और उत्तेजित भी होता है । नफरत के ये सौदागर चौबीसों घंटे आम आदमी पर इतना गुस्सा थूकते हैं कि आक्रामकता नेताओं और अभिनेताओं से चलकर आम आदमी का स्थायी भाव बन जाती है । नफरत से संचालित ऐसा आदमी अनजाने ही हिं सा का ‘कैरीयर’ बना घूमता रहता है । तनिक सी आँ च मिलते ही वह फट पड़ता है । फलतः, खुद को नुकसान पहुँचाने से लेकर आगजनी, लूटपाट, हत्या, बलात्कार तथा तमाम तरह की क्रूरताएँ आवेश के एक पल में घटित हो जाती हैं । आक्रामक कौन होता है ? कोई आक्रामक क्यों होता है ? हथियार लेकर वही चलता है न, जिसे डर लगता है ! असुरक्षा महसूस करने वाला आदमी आक्रमण करता है ; हमलावर हो जाता है । आज हम एक ऐसे समाज में परिवर्तित हो गए हैं , जो हर वक़्त डरा रहता है । इसीलिए हर समय आक्रमण की मुद्रा में रहता है । शायद आदिम काल में जंगली जानवरों के बीच रहनेवाला आदमी इतना न डरता होगा, जितना आज का आदमी खुद आदमियों से डरता है । असफलता उसे डराती है । और वह या तो आत्महत्या कर लेता है , या मीडिया और फिल्म के क्रोधभरे चरित्रों की तरह हत्या का रास्ता अख़्तियार कर लेता है । इसी असुरक्षाभाव, नफरत, बदले और हिं सा का राजनीतिक रूप चुनावों में दिखाई दे ता है । यह बेहद चिंताजनक है । पक्ष-प्रतिपक्ष के नेतागण परस्पर नफरत और बदले की भावना से भरे होने के कारण मंचों पर आग उगलते हैं । वे आम आदमी को डराते हैं कि भविष्य असुरक्षित है । आम आदमी अपनी मुसीबतों से पहले ही भरा बैठा है । उसे उन्मत्त करके वोट के हथियार से प्रतिपक्ष की हत्या भी कराई जा सकती है । आत्महत्या तो वह हर मतदान में करता ही है ! (डे ली िहं दी िमलाप, 2 फरवरी, 2019)

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आधुनिक गुलामी और हम राजनैतिक व्यवस्था की दृष्टि से धरती पर ज्ञात ज़्यादातर मुल्क आज आज़ाद हैं । लेकिन किसी दे श पर दू सरे दे श की हुकूमत ही तो गुलामी नहीं होती न? गुलामी की और भी बहुत सी शक्लें हैं । दु निया का अभी इन तमाम दू सरी तरह की गुलामियों से आज़ाद होना शेष है । जब तक कहीं भी किसी मनुष्य के मनुष्य होने से जुड़े किसी मूलभूत अधिकार का हनन हो रहा है , तब तक गुलामी कायम है । हमारे यहाँ तो यों भी प्रायः किसी न किसी प्रसंग में मानसिक गुलामी तक के मौजूद होने की बात कही जाती है । फिलहाल उसकी चर्चा छोड़ दें , तब भी आस्ट्रे लिया में स्थित वैि�वक मानवाधिकार संगठन ‘वॉक फ्री फ़ाउं डेशन’ की रिपोर्ट के ‘आधुनिक गुलामी’ संबंधी आँ कड़े चिंताजनक हैं । ‘वॉक फ्री फ़ाउं डेशन’ की मानें तो दु निया भर के 167 दे शों में भारत में ऐसे लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है जो ‘आधुनिक गुलाम’ हैं । यह बात अलग है कि प्रति हज़ार जनसंख्या के लिहाज से आधुनिक गुलामी इं डेक्स में भारत 53 वें स्थान पर है । दरअसल, किसी भी तरह की गुलामी आदमी और आदमी के बीच गैरबराबरी का जघन्यतम रूप है – ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’। गुलामी के कारकों के रूप में तरह-तरह के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सां स्कृतिक और धार्मिक दबाव हमेशा सक्रिय रहते हैं । अधिकां श सभ्य समाजों में गुलामी या दासप्रथा अवैध, प्रतिबंधित और निषिद्ध होते हुए भी आज नए रूप में मौजूद है । इस नए रूप को ही आधुनिक गुलामी कहा जा रहा है । जब किसी ‘व्यक्ति’ द्वारा किसी दू सरे ‘व्यक्ति’ की आज़ादी का हरण किया जाता है तो दे श और समाज की आज़ादी के बावजूद यह स्थिति आधुनिक गुलामी की स्थिति है । अगर किसी व्यक्ति को अपने शरीर पर अधिकार प्राप्त नहीं है , उसकी दे ह पर किसी अन्य का मालिकाना हक़ है ; अगर किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई काम करने को विवश किया जाता है , उसे उस काम के लिए ‘न’ कहने का हक़ हासिल नहीं है ; अगर किसी से कोई काम डरा-धमका कर, हिं सा द्वारा, दादागिरी से, सत्ता के दु रुपयोग द्वारा या छलसंपादकीयम्

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कपट द्वारा कराया जाता है – तो, इस स्थिति का नाम आधुनिक गुलामी है । आं कड़े कुछ भी हों, लेकिन इस सच्चाई से मुँह नहीं चुराया जा सकता कि हमारे समाज का काफी बड़ा हिस्सा इस तरह की गुलामी का अभिशाप भोग रहा है । वॉक फ्री की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार,सारी दु निया में 4 करोड़ से ज़्यादा लोग आधुनिक गुलाम हैं । कोई दे श, समाज, क्षेत्र और कार्यक्षेत्र इस कलंक से अछूता नहीं है । जापान में इस तरह की गुलामी सबसे कम पाई गई है , जबकि अमेरिका में 4 लाख तथा भारत में 80 लाख लोग आधुनिक गुलाम हैं । दु निया के 2 तिहाई आधुनिक गुलाम केवल एशिया-प्रशां त क्षेत्र में होना इस क्षेत्र में मानव-अधिकारों के हनन की कहानी कहता है । इसकी जड़ में मानव तस्करी, मनुष्य की गुलामी को बरकरार रखने वाली प्रथाएँ , सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व जनित पराधीनता, जबरन मजदू री, बँधुआ मजदू री, बलपूर्वक या इच्छा के विपरीत विवाह, बाल श्रम और बच्चों की तस्करी जैसे कारक मौजूद हैं । संगठन का मानना है कि कोई भी दे श इन कारकों से मुक्त हुए बिना आधुनिक गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता। यही कारण है कि उसे मात्र कानून बनाना इस समस्या का समाधान नहीं लगता; और वह आधुनिक गुलामी को मिटाने के लिए सरकारों और समाज के एकजुट संघर्ष का अाह्वान करता है । यह स्थिति और भी चिंताजनक है कि ग्लोबलाइज़ेशन के कारण आधुनिक गुलाम बनाने और उन्हें दु निया भर में मुहैया कराने की एक पूरी शृंखला को विकसित होने का अनुकूल मौका मिला है । ि�त्रयों, पुरुषों और बच्चों के श्रम के इस तरह शोषण के लिए जहाँ कमजोर व्यवस्थाएँ जिम्मेदार हैं , वहीं इसे बनाए रखने में गरीबी और बेरोजगारी की केंद्रीय भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए, व्यापक सामाजिक-आर्थिक सुधारों और गरीबी-बेरोजगारी के उन्मूलन के अलावा आधुनिक गुलामी से मुक्ति का कोई दू सरा रास्ता नहीं। (डे ली हिं दी मिलाप, 24 जुलाई, 2018)

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क्यों होती हैं बुराड़ी जैसी भीषण घटनाएँ ग्यारह सदस्यों का एक हँ सता-खेलता परिवार अचानक एक रात फाँ सी पर झूल जाए, तो प्रत्यक्ष दे खकर भी एकबारगी वि�वास करने का मन नहीं होता। इसीलिए बुराड़ी की इस भीषण घटना की तरह-तरह की व्याख्याओं को बल मिला। मनोविज्ञान और समाजशा�त्र के पंडित है रान होते दे खे गए कि सबसे हिलमिल कर रहने वाला परिवार, पढे़ -लिखे आधुनिक सदस्यों वाला परिवार, भला सामूहिक आत्महत्या कैसे कर सकता है । इसके विपरीत जिन्हें आत्महत्या की बू आ रही थी, वे इसके पीछे किसी गुरु या बाबा को दे ख रहे थे। सारी बहसें प्रमाणों के सामने धरी की धरी रह गईं जब पता चला कि किसी बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि तथाकथित अदृश्य आत्मा की प्रेरणा से और अलौकिक चमत्कार के घटित होने की झूठी गारं टी से प्रेरित होकर पूरा परिवार खुद-ब-खुद मौत के आगोश में चला गया। ग्यारह वर्ष से वह परिवार एक असामान्य मनोदशा का शिकार था। मर चुका पिता बेटे के माध्यम से बोलता था और पूरे परिवार को अपनी मर्जी से चलाता था। धमकियाँ भी दे ता था। सर्वनाश से सब डरते हैं , वे सब भी डर गए होंग�े। तथाकथित आत्मा ने पूरी तैयारी की कि सब कैसे-कैसे आत्महत्या करें ग�े। सब तैयार हो गए क्योंक�ि उन्हें वि�वास दिलाया गया था कि पिता की आत्मा प्रकट होकर सबको बचा लेगी। वि�वास यह भी दिलाया गया था कि इस प्रक्रिया से वे सब परम शक्तिशाली बन जाएँ गे और एक-दू सरे को बंधन मुक्त कर सकेंग�े। लेकिन ऐसा कोई चमत्कार नहीं हुआ और सबका प्राणां त हो गया। कुल मिलाकर सारा कुछ अंधवि�वास का क्रूर खेल साबित हुआ। क्या आपको नहीं लगता कि अंधवि�वास की यह घटना अकेली नहीं है । शेष दु निया की बात फिलहाल छोड़ भी दें , तो क्या हमारा समाज इधर नए सिरे से कुछ ज़्यादा ही भाग्यवादी नहीं होता जा रहा है ? कुर्सी का खेल खेलने वालों के लिए धर्म और भगवान के दु रुपयोग का आधार भी क्या चमत्कार, आत्मासंपादकीयम्

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परमात्मा, परलोक-पुनर्जन्म आदि में हमारी ‘अंधी आस्था’ में ही नहीं छिपा है ? वह परिवार तो खैर चुपचाप अपने घर में वट-पूजा कर रहा था, किसी सेलिब्रिटी के संकटग्रस्त होते ही जो दे शभर में पाखंड और प्रदर्शन वाली छद्म भक्ति का ज्वार फूट पड़ता है उसे आप क्या कहेंग�े? चमत्कारों और अलौकिक शक्तियों को महिमामंडित करने वाले हम सब भी तो बुराड़ी के उस परिवार की तरह आत्महत्या ही कर रहे हैं ! हम कहना यह चाह रहे हैं कि यदि अंधवि�वास ही धर्म बन जाए तो ऐसा समाज अफीम का सेवन करके धीरे -धीरे आत्महत्या करने वाले लोगों के समुदाय में बदल जाता है । तनिक ध्यान दीजिए। क्या हम ऐसे ही तर्क -विरोधी और अंध-श्रद्धावादी समाज में तब्दील नहीं हो रहे हैं ? प्रकृति के इस शा�वत नियम को हम क्यों भूल जाते हैं कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं हो सकता और किसी भी कार्य का परिणाम अनिवार्य होता है । बबूल के पेड़ पर आम नहीं उगते। मरकर कोई प्रभु भी जीवित नहीं हो सकता। किसी प्रतिमा में स्वयं अपनी भी रक्षा करने की शक्ति नहीं होती। अकर्मण्य समाज को बचाने के लिए कोई शक्ति आसमान से नहीं उतरती। फिर भी हम ऐसा सब होने का भ्रम पाले रहते हैं । ये भ्रम अंधवि�वास ही तो हैं । एक मनोवैज्ञानिक हुए बी.एफ. स्किनर। उन्होंन�े कबूतरों पर एक प्रयोग किया था। कबूतरों को एक नि​ि�चत समय पर दाना दिया जाता था। बाकी समय प्रतीक्षा करनी होती। एक कबूतर अपने पंजे से सिर खुरच रहा था कि दाना आ गया। उसी समय दू सरा अपनी गरदन गोल-गोल घुमा रहा था तो कोई तीसरा पिंजरे में चहल कदमी कर रहा था; चौथा-पाँ चवाँ कुछ और या कुछ और। दाना आया तो हर एक को लगा कि मेरी इस क्रिया से दाना ‘प्रकट’ हो गया। यही है , अंधवि�वास का मनोविज्ञान। कार्य-कारण संबंध की तरफ से आँ ख मूँद लेना और अतार्कि क कारणों से चमत्कारी कार्यों की प्रतीक्षा करना। इसे धर्म नहीं, अविवेक और मूर्खता कहा जाता है जो सचमुच किसी भी समाज के लिए अफीम है । बुराड़ी जैसी घटनाएँ अलार्म की तरह हैं कि, अब तो अंधवि�वास की नींद� से जागो! (डे ली हिं दी मिलाप, 6 जुलाई, 2018)

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संपादकीयम्


तो शब्दकोश में नही ं रहे गा – दलित? कुछ समय पहले दबी-छिपी सी यह चर्चा अब खुल कर सामने आ गई है कि मीडिया को ‘दलित’ शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए तथा यथोचित संदर्भों में ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ जैसी संविधानसम्मत शब्दावली का व्यवहार करना चाहिए। शां त झील में कंकड़ मारने का यह अवसर पहले मध्य प्रदे श और अब महारा�ट्र हाईकोर्ट के आदे श के कारण आ उपस्थित हुआ है । केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ‘दलित’ कहने-लिखने से परहे ज की सलाह दी है क्योंक�ि माननीय हाईकोर्ट ने ऐसा चाहा है । हाईकोर्ट और मंत्रालय की मंशा कुछ भी हो, लेकिन क्या किसी स्वीकृत शब्द को प्रतिबंधित करना इतना ही सहज है ? शायद नहीं। वैसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अनुसार तो सटीक पारिभाषिक शब्द ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ ही हैं और उनकी तुलना में ‘दलित’ अपने आप में अस्प�ट और ढिलमुल सा शब्द है । पिछले दिनों मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने पंकज मेश्राम की याचिका पर मंत्रालय को मीडिया द्वारा ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को लेकर एक परामर्श जारी करने पर विचार करने का दिशा निर्देश� दिया था। इससे पहले जनवरी में मध्य प्रदे श हाईकोर्ट ने भी यह राय व्यक्त की थी कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि दलित शब्द का प्रयोग सरकार द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंक�ि संविधान में इसका उल्लेख नहीं किया गया है ।‘ पंकज मेश्राम ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि “मैंन�े याचिका इसलिए दायर की क्योंक�ि `दलित` अपमानजनक शब्द है । मैंन�े दलित शब्द का अर्थ खोजने की कोशिश की तो पता चला कि इसका मतलब अछूत, असहाय और नीचा होता है । यह उस समुदाय के लिए अपमानजनक है । डॉ. बाबा साहे ब अंबेडकर भी इस शब्द के पक्ष में नहीं थे। दलित शब्द का इस्तेमाल संविधान में कहीं नहीं किया गया है । अगर संविधान में इस समुदाय के लिए `अनुसूचित जाति` टर्म का इस्तेमाल किया गया है , तो फिर दलित क्यों कहा जा रहा है ?” संपादकीयम्

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मेश्राम की दलील में दम है । हो सकता है कि उनके जैसे और भी अनेक लोगों को एक समुदाय के रूप में यह संबोधन तिरस्कारपूर्ण लगता हो। लेकिन चूँकि पिछले कुछ दशकों में राजनीति और साहित्य दोनों में इस शब्द को समुदाय विशेष के क्रोध को एकीकृत अभिव्यक्ति दे ने के लिए उसकी अस्मिता का वाचक बना दिया गया है , इसलिए वैसे तमाम बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता यह सिद्ध करने में जुट गए हैं कि नहीं, दलित कहे जाने में किसी का कोई तिरस्कार नहीं होता। इसके विपरीत, यदि निष्पक्ष रूप से दे खा जाए तो लगेगा कि इस शब्द को सुनियोजित ढं ग से सामाजिक घृणा का वाचक बना दिया गया है और यदि इसके प्रयोग को असंवैधानिक मान लिया जाए तो घृणा की राजनीति करने वालों को थोड़ी सी तो दिक्कत होगी ही। लेकिन यदि सामाजिक समरसता के लिए इस शब्द के प्रयोग से बचना श्रेयस्कर लगे तो, मीडिया अगर थोड़ा सा वाक-संयम बरत ले तो क्या बिगड़ जाएगा? हाँ , ‘प्रतिबंध’ जैसी कोई सरकारी बाध्यता नहीं होनी चाहिए। आखिर, अतीत में भी तो कई सारे शब्द सामाजिक चेतना के चलते प्रयोग से बाहर हुए हैं । इसी समुदाय के लिए कभी महात्मा गां धी का दिया हुआ नाम ‘हरिजन’ अत्यंत लोकप्रिय था – अखबार तक का नाम था। कालां तर में `हरिजन` से लोगों को वैसे अर्थ की गंध आने लगी जैसी अब पंकज मेश्राम को `दलित` से आ रही है और इतना सुंदर शब्द प्रयोग से बाहर हो गया। कां शीराम के जमाने में ‘बहुजन’ शब्द खूब स्वीकार्य था, लेकिन ‘दलित’ ने उसे अपदस्थ कर दिया। तब भला ‘दलित’ से ही इतना मोह क्यों? एक और बात। प्रायः दलित को ‘अनुसूचित जनजाति’ का वाचक भी मान लिया जाता है । यह भ्रामक है । दलित अर्थात ‘अनुसूचित जाति’ तो हिं दू समाज के वर्णभेद का शिकार उसका एक अंग है ; जबकि ‘अनुसूचित जनजाति’ को वैसा वर्ण-आधारित भेदभाव नहीं झेलना पड़ा है बल्कि उसके ‘वंचित’ रहने के कारण कुछ और हैं । इसलिए भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति दोनों को समग्रत: ‘दलित’ कहना न्यायसंगत नहीं है । (डे ली हिं दी मिलाप, 06 सितंबर, 2018)

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‘प्रणय’ की हत्या, प्रति�ठा के नाम पर! तेलंगाना के नलगोंड�ा जिले में परिवार और जाति की झूठी प्रतिष्ठा की रक्षा के नाम पर एक युवक प्रणय की दिनदहाड़े कुल्हाड़ी मारकर क्रूरतापूर्वक हत्या हमारे समाज के बदसूरत चेहरे को बेनकाब करने वाली सच्चाई है । आँ कड़ों की मानें तो केवल 2014–2016 की अवधि में दे शभर में ‘ऑनर किलिंग’ के 356 मामले प्रकाश में आए हैं । इससे पता चलता है कि 21वीं सदी में भी यह दे श वर्ण और जाति से जुड़ी ऊँच-नीच की भावना से पैदा होने वाले भेदभाव से किस तरह चिपका और जकड़ा हुआ है । यह घटना इस सच्चाई की भी मुनादी करती है कि हमारे समाज में �त्री को आज भी चयन और वरण की आजादी हासिल नहीं है । हमारे समाज का पितृसत्तात्मक ढाँ चा पूरी तरह पुरुष प्रधान है । भले ही ढोंग� यह किया जाता है कि इसके केंद्र में �त्री है । �त्री केंद्र में है ; लेकिन केंद्रीय शक्ति तो पुरुष ही है । इसलिए खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने से लेकर मरने-जीने तक के सारे फैसले पुरुष प्रधान व्यवस्था द्वारा ही किए जाते हैं । उनका बोझा �त्री को ढोना पड़ता है । जातिगत अहं कार इस स्थिति को और भी विकृत तथा भयानक बना दे ता है । प्रणय की हत्या के पीछे ये दोनों ही कारण अपनी पूरी तीव्रता के साथ सक्रिय दिखाई दे ते हैं । यह सारे सभ्य समाज के लिए शर्म से डूब मरने जैसी वारदात है कि हम ऐसी मानव-द्रोही दु निया में जी रहे हैं जहाँ मनुष्य की इच्छा का कोई महत्व नहीं; उसके प्रेम और समर्पण का कोई मूल्य नहीं तथा उसे अपनी जिंदगी अपनी रुचि से जीने का कोई हक नहीं। हम ऐसी दु निया में जीने के लिए मजबूर हैं जहाँ परिवार, जाति, वर्ण, धर्म और संप्रदाय मनुष्य की जान से ज्यादा कीमती हैं । झूठी शान के लिए यहाँ किसी की भी जान ली जा सकती है । जिस जातिगत और पारिवारिक प्रति�ठा की खातिर षड्यंत्र पूर्वक प्रणय को उसके ससुर ने मरवा डाला, उस प्रति�ठा के खोखलेपन को यह समाज आखिर कब समझेगा? संपादकीयम्

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यह समस्या किसी एक युवक या युवती की हत्या भर की नहीं है ; बल्कि इसका संबंध हमारे समाज की उस बीमारी से है जिसे ‘दोहरी मानसिकता’ कहा जा सकता है । लंबे समय से हमारे समाज में आदर्श और यथार्थ के बीच गहरी फाँ क चली आ रही है । आदर्श के तौर पर हम यह कहते नहीं थकते कि इस सृि�ट में केवल मनुष्य और मनुष्य ही नहीं बल्कि समस्त जड़ और चेतन एक ही परमात्मा के स्वरूप का विस्तार होने के कारण सभी समान हैं , सारी वसुधा एक कुटुं ब के समान है ; लेकिन व्यावहारिक स्तर पर हमने मनुष्यों को धर्म, भाषा, लिंग, नस्ल, वर्ण और जाति के आधार पर अनेक तरह से छोटे -बड़े के रूप में बाँ ट रखा है । इस बँटवारे से पैदा होने वाला अहं कार यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाता कि किसी उच्च समझे जाने वाले वर्ग की लड़की किसी अपने से नि�न समझे जाने वाले वर्ग के लड़के से प्रेम कर ले, विवाह रचा ले या घर बसा ले। ऐसा होने पर जातिगत अहं कार और पुरुष अभिमान दोनों ही चोटिल साँ प की तरह भयानक हो उठते हैं । बदले की भावना उन्हें पूरी तरह अमानुषिक बना दे ती है और तब खाप पंचायतों के अलोकतां त्रिक फैसलों से लेकर प्रति�ठा के लिए की जाने वाली हत्याओं तक के ऐसे परिणाम सामने आते हैं जो मनुष्यता को शर्मसार कर जाते हैं ! जाति-पाँ ति की तुलना में मनुष्यता को श्रे�ठ मानने के भारतीय आदर्श की पुनः प्रति�ठा के बिना ऐसी क्रूर मानसिकता से मुक्त होना संभव नहीं। शायद यह कहना ठीक होगा कि अभी तक हमारे समाज का नवजागरण अधूरा है और जब तक जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता तब तक अधूरा ही रहे गा। कड़े कानून और उसके दृढ़तापूर्वक पालन के साथ ही सामाजिक चेतना की इस दे श को आज बड़ी जरूरत है । (डे ली हिं दी मिलाप, 21 सितंबर, 2018)

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तुम्हारी जाति क्या है , डॉक्टर? पिछले दिनों जबलपुर में एक चिकित्सक की कथित उच्च जाति के मरीजों के परिजनों द्वारा पिटाई की घटना ऊपर से दे खने में मामूली लग सकती है , लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक संकेत छिपे हैं जो भेदभाव की बीमारी से पीड़ित भारतवर्ष की बेहद चिंताजनक स्थिति का पता दे ते हैं । हुआ कुछ यों कि शासकीय सुभाष चंद्र मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में उस शाम साढ़े सात बजे दु र्घटना में घायल दो महिलाओं को आकस्मिक चिकित्सा विभाग में भर्ती कराया गया। ड्यूटी पर तैनात शल्य चिकित्सक डॉ. गीतेश रात्रे ने तुरंत नर्स स्टाफ को उनके प्राथमिक उपचार के निर्देश� दे दिए और चिकित्सा में जुट गए। उस समय आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में अकेले वही डॉक्टर ड्यूटी पर थे। कुछ ही दे र में वहाँ दर्जनभर लोग आ गए जो इन घायल महिलाओं के परिजन या शुभचिंतक थे। इनका नेतृत्व उमेश यादव नामक शख्स कर रहा था। इससे अधिक दु र्भा ग्य की बात और क्या होगी कि इन लोगों ने आते ही दु र्घटनाग्रस्त महिलाओं की स्थिति और उनकी परिचर्या आदि के बारे में न पूछकर इस बारे में पूछताछ शुरू कर दी कि उनकी चिकित्सा कर रहे डॉक्टर का नाम क्या है और जाति क्या है । जैसे ही उन्हें पता चला कि डॉक्टर गीतेश रात्रे अनुसूचित जनजाति से आते हैं तो वे लोग खफा हो गए और माँ ग करने लगे कि किसी उच्च जाति के डॉक्टर को ही उनका इलाज करना चाहिए। डॉ. रात्रे ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वे और भी नाराज हो गए और उनके साथ हाथापाई करने लगे। दर्जन भर लोगों की भीड़ ने कालर खींच� कर डॉक्टर के साथ मारपीट की और गालियां बरसाईं। इसके बाद अस्पताल से किसी भी प्रकार की अनुमति लिए बिना वे दोनों घायल महिलाओं को जबरदस्ती लेकर चले गए क्योंक�ि उन्हें किसी अनुसूचित जनजाति के डॉक्टर की अपेक्षा इलाज न करवाना बेहतर लगा। यह तमाम घटनाचक्र इस कारण अत्यंत चिंता का विषय है कि इससे हमारे संपादकीयम्

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समाज की इक्कीसवीं शताब्दी में भी विद्यमान विकृत जातिवादी मानसिकता का पता चलता है । इस मानसिकता को गहराई तक जड़ें जमाने का अवसर सां प्रदायिक और राजनीतिक तत्वों द्वारा फैलाई गई इस गलत धारणा के बल पर मिलता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रत्याशियों को आरक्षण के कारण विभि�न सेवाओं में आने का अवसर तो मिल जाता है लेकिन वे इनके योग्य नहीं होते। खासकर चिकित्सा व्यवसाय में तो बहुत ही सावधानी की आवश्यकता है क्योंक�ि यहाँ अनेक मरीजों की जान डॉक्टर के हाथ में होती है । लेकिन यह धारणा पूरी तरह तथ्यहीन और भ्रामक है । तथ्य यह है कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के समय तो आरक्षण मिलता है , लेकिन अध्ययन,परीक्षा, प्रशिक्षण तथा परिवीक्षा के क्षेत्र में किसी अनुसूचित जाति/ जनजाति को आरक्षण नहीं दिया जाता। सभी को एक जैसी परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त करनी होती है । अतः यह सोचना कि आरक्षित वर्ग से आने वाले डॉक्टर अयोग्य होंग�े, केवल दु ष्प्रचार मात्र है । यदि ऐसी किसी धारणा के कारण वे लोग अपने मरीजों को अस्पताल से उठा कर ले गए तो यह अत्यंत दु र्भा ग्यपूर्ण है । ज़रूरत है कि इस प्रकार की मिथ्या धारणाओं को निर्मूल किया जाए। एक दू सरा कारण भी इन मरीजों को बिना चिकित्सा कराए ले जाने का यह हो सकता है कि अपनी उच्चवर्णीय मानसिकता के कारण उनके परिजन यह न चाहते हों कि कोई अनुसूचित समुदाय का डॉक्टर उनका स्पर्श करे या उनकी चिकित्सा करे । यदि ऐसा है तो यह और भी दु र्भा ग्यपूर्ण है क्योंक�ि ऐसी छु आछूत और भेदभाव की भावना असंवैधानिक तो है ही, घोर अमानुषिक भी है । अंततः, उच्च जाति का वर्णगत अहं कार यदि आज भी इस प्रकार के दु राग्रहों से संचालित है तो कहना चाहिए कि समाज में बड़े परिवर्तन और जागृति की आवश्यकता है , अन्यथा यह जातिवादी मानसिकता दे श के तमाम विकास, प्रगति, सभ्यता और संस्कृति के दावों को अँगूठा दिखाती रहे गी और हम हिं सक तथा बर्बर स्थितियों में जीने को मजबूर रहेंग�े। (डे ली हिं दी मिलाप, 20 अक्तूबर, 2018)

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मंदिर प्रवेश : समाज सुधार या राजनीति केरल के शबरीमलै मंदिर में रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को लेकर जिस प्रकार का हिं सामय वातावरण निर्मित हुआ है , उसे बेहद चिंताजनक ही कहा जा सकता है । इस अवां छित स्थिति को विवेकपूर्वक टाला जा सकता था। ऐसी स्थिति तभी पैदा होती है , जब विवेक पर ज़िद हावी हो जाती है । कुछ महीने पहले जब सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर के कपाट हर आयु वर्ग की महिलाओं के लिए खोलने का निर्णय दिया था, तभी से विरोध और आं दोलन आरं भ हो गया था। स्वयं यह निर्णय दे ने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में सम्मिलित एक न्यायाधीश का मत इस प्रकार की अनुमति दे ने के पक्ष में नहीं था, क्योंक�ि उनकी दृि�ट में यह प्र�न �त्री-अधिकार की अपेक्षा समुदायविशेष की अपनी परं परा और मान्यता की रक्षा का अधिक है । इसमें दो राय नहीं हो सकती कि यदि पितृ-सत्तामूलक और पुरुषवर्चस्ववादी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था स्त्रियों के साथ गैर-बराबरी का व्यवहार कर रही है , तो किसी भी लोकतां त्रिक समाज में ऐसे भेदभाव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई धार्मिक परं परा �त्री को अपवित्र मानती है और उसे लगता है कि �त्री के मंदिर प्रवेश से दे वता की तपस्या भंग हो जाएगी, तो उस परं परा के औचित्य पर पुनर्विचार की ज़रूरत है । लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि शबरीमलै मंदिर में 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को प्रवेश की सदा से अनुमति है । अतः समस्या ि�त्रयों के साथ भेदभाव की नहीं, बल्कि उस विश्वास की है जो यह मानता है कि संतान-उत्पत्ति योग्य महिलाएँ इस मंदिर के दे वता की उपासना की पात्र नहीं हैं । विचारणीय है कि किसी मंदिर के साथ जो मिथक, पौराणिक गाथाएँ या आस्थाएँ जुड़ी होती हैं , वे ही उसके दू सरे मंदिरों से अलग अस्तित्व का आधार हुआ करती हैं । ऐसे में यह प्र�न भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि, ‘जो महिलाएँ शबरीमलै मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए लड़ रही हैं , क्या वे इस मंदिर से जुड़ी हुई गाथा में वि�वास रखती हैं ?’ यदि नहीं; तो संपादकीयम्

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फिर उनके लिए इस मंदिर का महत्व ही क्या है ? क्यों इसमें प्रवेश करके उन लोगों की आस्था को चोट पहँु चाई जाए जो अपने ढं ग से अपनी पूजापद्धति का पालन कर रहे हैं ? और यदि इन प्रवेशार्थी महिलाओं की आस्था शबरीमलै मंदिर के इ�ट दे वता से जुड़ी गाथा और मान्यताओं में है , तो यह संभव ही नहीं कि वे उनके इस मंदिर से जुड़े नियमों का उल्लंघन करना चाहें । इसलिए यह लगना स्वाभाविक है कि �त्री-अधिकार के नाम पर मंदिर प्रवेश की ज़िद शायद किसी न किसी स्तर पर राजनीति का शिकार हो गई है ! अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार तक यथास्थिति कायम रखने में तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी। केरल सरकार की ज़िद भी उसकी नीयत पर संदेह पैदा करती है । माना कि सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय दे दिया और उसे लागू करने की िज़म्मेदारी सरकार पर है । लेकिन सरकार पर एक और बड़ी िज़म्मेदारी है और वह है शां ति तथा व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी। पुलिस संरक्षण में इनी-गिनी कुछ महिलाओं को चोरी-छिपे मंदिर में ले जाकर केरल सरकार आखिर साबित क्या करना चाहती है ? इस तरह तो समाज नहीं सुधरता! यदि सरकार की मंशा वास्तव में स्त्रियों को भेदभाव और अन्याय से मुक्ति दिलाने की है , तो उसे विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक पक्षों के साथ मिल-बैठकर समाधान खोजना चाहिए था; टकराव बढ़ाने के बजाय मंदिर प्रशासन को वि�वास में लेना चाहिए था। वार्ता द्वारा किसी भी समस्या का समाधान खोजा जा सकता है , बशर्ते की ‘सदाशयता’ हो, ‘सियासत’ नहीं! वैसे कहा तो यह जाता है कि जहाँ आपका स्वागत नहीं होता, वह चाहे पिता का घर भी क्यों न हो, वहाँ नहीं जाना चाहिएआवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह। ‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥ (डे ली हिं दी मिलाप, 07 जनवरी, 2019)

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ये बच्चे भारत के नागरिक नही ं? मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कां ड मामले की जां च प्रक्रिया के बारे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की कठोर टिप्पणी न्याय व्यवस्था के असफल होने के मूल कारण की ओर इशारा करती है । आए दिन दे खने में आता है कि सबसे गंभीर और जघन्य अपराध के अभियुक्त स्वयं अभियोग पक्ष की ढील और लापरवाही के कारण अंततः साफ बचकर निकाल जाते हैं । जगजाहिर है कि यह कां ड मासूम लड़के-लड़कियों के यौन शोषण और दु ष्कर्म की घिनौनी आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है , लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने पाया है कि इस मामले में दर्ज प्राथमिकी में उचित धाराएँ नहीं लगाई गई हैं । इसीलिए बिहार सरकार को उस एफआईआर को बदलने का आदे श दे ते हुए अगले 24 घंटे में इस मामले में भारतीय दं ड संहिता की अप्राकृतिक यौनाचार और दु ष्कर्म से जुड़ी धाराओं और पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने को कहा गया है । इस टिप्पणी के रूप में व्यक्त सर्वोच्च न्यायालय की पीड़ा सारे न्यायप्रिय समाज की पीड़ा है कि, “आप (राज्य सरकार) क्या कर रहे हैं ? यह शर्मनाक है ! अगर किसी बच्ची के साथ अप्राकृतिक यौनाचार होता है तो इस पर आप कहते हैं कुछ नहीं हुआ है ! यह अमानवीय है ! हमें बताया गया था कि सरकार इस मामले को पूरी गंभीरता से दे ख रही है , क्या यही है आपकी गंभीरता? हर बार जब भी इसकी फाइल पढ़ी जाती है , यह भयावह होता है ?” कहना न होगा कि इतने संवेदनशील केस में तंत्र की यह लापरवाही बेहद अफसोसजनक तो है ही, इससे यह भी पता चलता है कि पानी असल में कहाँ ठहरा हुआ है । सत्ता और विपक्ष की अवसरवादी राजनीति से हटकर विचार करें तो, इस कां ड के बहाने हमें हमारे समाज का दोगला चरित्र एक बार फिर उजागर होता दिखाई दे गा। एक ओर ऊँचे ऊँचे आदर्शों की बात करना तथा दू सरी ओर घृणित आचरण को दे खकर भी आँ ख मूँद लेना! हमारी इसी प्रवृत्ति के कारण समाज के बीचोंब�ीच इस प्रकार के कुकृत्य होते रहते हैं और समाज तब तक नहीं चेतता जब तक किसी न्यायमूर्ति से किसी सरकार को फटकार नहीं संपादकीयम्

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मिलती। वैसे अब भी समाज कहाँ चेत रहा है उन मासूम ज़िंदगियों के बारे में, जिन्हें आश्रय और सुधार के नाम पर अप्राकृतिक यौनाचार और दु ष्कर्म की आग में झोंक� दिया गया? याद रहे कि मई, 2018 में टाटा इं स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइं स, मुंबई (टीआईएसएस) ने अपने सोशल ऑडिट के आधार पर मुजफ्फरपुर के साहु रोड स्थित बालिका सुधार गृह (शेल्टर होम) में नाबालिग लड़कियों के साथ कई महीने तक रे प और यौन शोषण होने का खुलासा किया था। लेकिन क्या समाज ने उस सोशल ऑडिट का कोई नोटिस लिया और अपनी ज़िम्मेदारी निभाई? नहीं; और एक कथित एनजीओ द्वारा संचालित इस गर्ल्स शेल्टर होम में नाबालिग बच्चियों का रे प और यौन शोषण तब तक चलता रहा जब तक कि न्याय प्रक्रिया ने चूलें कसनी शुरू नहीं कीं। ढिलाई बरतने और लीपापोती के बावजूद इस तथ्य को नकारना संभव नहीं कि मेडिकल जाँ च में शेल्टर होम की कम से कम 34 बच्चियों के साथ रे प की पुि�ट हुई थी। पीड़ित कुछ बच्चियों ने कोर्ट को बताया कि उन्हें नशीला पदार्थ दिया जाता था। फिर उनके साथ दु ष्कर्म किया जाता था। इस दौरान उनके साथ मारपीट भी होती थी। पीड़ित लड़कियों ने बताया कि जब उनकी बेहोशी छँ टती थी और वे होश में आती थीं तो खुद को निर्व�त्र पाती थीं। इस कां ड में समाज और राजनीति के बड़े लोगों के लिप्त होने के बावजूद अगर प्राथमिकी दर्ज करने तक के स्तर पर ढील दी गई दिखाई दी है तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अशोभनीय है । उम्मीद की जानी चाहिए कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस कठोर टिप्पणी के बाद हालात बदलेंग�े कि, ‘क्या ये बच्चे भारत के नागरिक नहीं?’ (डे ली हिं दी मिलाप, 30 नवंबर, 2018)

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सुरक्षित नही ं हैं हमारे बच्चे बच्चा चुराने के शक और ऐसा करने वालों के गिरोह की सक्रियता की अफवाहों के कारण निरपराध लोगों की पीट-पीट कर हत्या की घटनाओं को लेकर इन दिनों दे श में चिंता व्याप्त है । लोग तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ प्रकट कर रहे हैं और परामर्शों का भी बाज़ार गर्म है । जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की घटनाओं के तीन पक्ष होते हैं । एक तो कोई ऐसा वर्ग जिस पर सामूहिक अत्याचार किया जाना आसान हो या जिसे आसानी से शिकार बनाया जा सके। कहना न होगा कि �त्री, बच्चे, वंचित और अपढ़ गरीब लोग ऐसे ही ‘सॉफ्ट टार्गेट�’ होते हैं । (किसी धनी-मानी पर ऐसी भीड़ हाथ नहीं डालती। वे तो बड़े -बड़े कां ड करके भी साफ निकाल जाते हैं ।) दू सरे पक्ष में वे लोग होते हैं जो किसी कुंठा के कारण इस हद तक गुस्साए घूमते रहते हैं कि ज़रा सी गर्मी मिलते ही फट या फूट पड़ते हैं । ये ही लोग उस हिं सक भीड़ का निर्माण करते हैं जो उग्र और हिं सक कार्र वाई को अंजाम दे ती है । तीसरा पक्ष भुस में आग लगाकर तमाशा दे खने वालों का होता है जो ऐसी अफवाहों और सूचनाओं के प्रेरक होते हैं और लोगों को कानून हाथ में लेने के लिए उकसाते हैं । स्वाभाविक है कि बच्चों को लेकर किसी समूह को उकसाना ऐसे लोगों के लिए तुलनात्मक रूप से अधिक आसान है क्योंक�ि समाज का हर वर्ग इस बारे में भावुक होता है । इसलिए यह महसूस किया जा रहा है कि समाज को ऐसे प्रशिक्षण की आवश्यकता है कि वह आक्रोश पर नियंत्रण रख सके और अफवाह फैलाने वालों के उकसावे में न आए। समस्या के इस तात्कालिक पहलू के अलावा यह भी चिंता का विषय है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर भावुक होने के पीछे क्या कुछ छिपा है । दरअसल बच्चों की चोरी की घटनाओं से उत्तेजित होना तो आइसबर्ग के केवल एक हिस्से के समान है जो सामने से दिखाई दे रहा है । असली खतरा तो उस समूचे वातावरण में छिपा है जो बच्चों के खिलाफ तरह-तरह के अपराधों में बढ़ोतरी के यथार्थ से जुड़ा है । चाहे रोज़मर्रा की खबरों को दे ख लें, या सरकारी आँ कड़ों संपादकीयम्

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का अवलोकन कर लें, दीवार पर लिखी इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हमारे समाज में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं । एक ओर तो वे गरीब, वंचित, असहाय और बेघर बच्चे हैं जो अपनी इसी आर्थिक दशा के कारण अपराधियों का शिकार होते हैं और अपराध में धकेल दिए जाते हैं । दू सरी ओर वे बच्चे हैं जिनका अपहरण गुलाम बनाने से लेकर यौन अपराधों तक में इस्तेमाल के लिए कर लिया जाता है । तीसरी ओर तेजी से बढ़ते हुए बाल और किशोर अपराध हैं । इन अपराधों में छोटी-मोटी चोरी-बेईमानी से लेकर योजनाबद्ध ढं ग से हत्या और बलात्कार के संगीन अपराध तक शामिल हैं । ऐसे वातावरण में बच्चा चोरी के डर और उससे जुड़ी अतिरिक्त संवेदनशीलता को बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता। दरअसल, प्रगति और विकास के तमाम प्रयासों के बावजूद भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में जो बढ़ोतरी दे खी जा रही है , उसके कारण बच्चों की सुरक्षा के बारे में चिंता बढ़ना स्वाभाविक है । गृह मंत्रालय ने 2017-18 की अपनी रिपोर्ट में जो आँ कड़े जारी किए हैं उनसे पता चलता है कि 2016 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1 लाख से ऊपर मामले दर्ज किए गए जो पिछले साल से 14 फीसदी अधिक हैं । क्या यह तथ्य दिल दहलाने वाला नहीं है कि इस साल भारत से 55,000 बच्चों का अपहरण किया गया। बच्चा चुराने की ये घटनाएँ एक साल में 30 फीसदी बढ़ी हैं । इस प्रकार ये आँ कड़े गवाह हैं कि भारत में बचपन कितना असुरक्षित है । बच्चे किसी भी समाज या दे श का भविष्य होते हैं । इसलिए असुरक्षित और अपराध की ओर जाते हुए बच्चों वाले दे श के भविष्य को भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। आक्रोश में भरकर हिं सा पर उतारू रहना इसका समाधान नहीं। बल्कि, बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण दे ना सभ्य नागरिकों की सामूहिक सामाजिक ज़िम्मेदारी है । (डे ली हिं दी मिलाप, 11 जुलाई, 2018)

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असहाय और असुरक्षित बुढ़ापा सर्वोच्च न्यायालय ने दे श में बेसहारा माता-पिता और बुजुर्गों की असुरक्षित स्थिति का नोटिस लेते हुए एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को यह सुनि​ि�चत करने का निर्देश� दिया है कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदे श माता-पिता और बुजुर्गों के कल्याण के लिए बनाए गए 2007 के कानून का पालन करें । न्यायालय ने यह भी कहा है कि हर जिले में कम से कम एक वृद्धआश्रम होना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे दे श में बुजुर्ग नागरिकों की चिकित्सा ही नहीं, भोजन और आवास जैसी सुविधाओं तक की उपेक्षा की जाती है । यह भी दे खने में आता है कि बहुत बार स्वयं परिवार के लोग ही उनसे ये सुविधाएँ छीन लेते हैं । इसी बात को ध्यान में रखते हुए बुजुर्गों के लिए मासिक वृद्धावस्था पेंश�न की भी व्यवस्था है । आज के समय में यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि 60 से अधिक और 70 से कम उम्र वाले बुजुर्गों के लिए यह पेंश�न ₹200 मासिक है और 70 या उससे अधिक वालों के लिए ₹500 ! इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने बुजुर्गों की पेंश�न बढ़ाने की संभावना पर भी विचार करने के लिए कहा है । लेकिन फंड की अनुपलब्धता के नाम पर इसे आसानी से ठं डे बस्ते में डाला जा सकता है । अतः परिवारों द्वारा उपेक्षित बुजुर्गों अथवा असहाय वृद्धों की हालत सुधरने के आसार फिलहाल तो नजर नहीं आते। माना कि बुजुर्ग लोग शारीरिक रूप से अशक्त होने के कारण धन-उपार्जन के लिए सक्षम नहीं रहते। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मनुष्य भी नहीं रहते। मनुष्य होने के नाते उन्हें भी जीने और आजादी के मूलभूत अधिकार प्राप्त हैं । इन अधिकारों को चरितार्थ करने के लिए सरकार के पास कोई बहुत सटीक और प्रभावी कार्य योजना नहीं है । इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय में यह भी निर्देश� दिया है कि बुजुर्गों के स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए चिकित्सा सुविधाओं और साथ ही बुढ़ापे की बीमारियों की दृि�ट से आवश्यक सुविधाओं को मुहैया कराने की जिम्मेदारी सरकारों को निभानी चाहिए। इससे अधिक संपादकीयम्

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दु खद बात और क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति अपनी जवानी भर अपनी पूरी क्षमता के साथ कमाता रहे और परिवार का पालन-पोषण करता रहे लेकिन जब उसकी जवानी ढल जाए तो वही परिवार उसे बोझ समझने लगे। इस दु र्व्यवहार का परिणाम मानसिक असंतोष और उससे जुड़ी बीमारियों के रूप में सामने आता है । जानकारों के अनुसार 2011 में भारत में बुजुर्गों की संख्या 10 करोड़ 38 लाख थी जो लगातार बढ़ रही है । बुजुर्गों की इस बढ़ती जनसंख्या के ग्लोबल और लोकल दोनों ही स्तरों पर असर दिखने स्वाभाविक हैं । इसीलिए एक ऐसी रा�ट् रीय वृद्धजन नीति की जरूरत है जो उनकी सामाजिक सुरक्षा तथा अन्य लाभों की दे खभाल कर सके। यह भी विचारणीय है कि बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होने से आज के समय में आमतौर पर 70 वर्ष की आयु तक बुजुर्ग अपनी उत्साहपूर्ण मनोदशा के कारण पर्याप्त सक्रिय और रचनात्मक रहने की दशा में हैं और संतु�ट जीवन जीने के अवसर ढँू ढ़ना उनके लिए स्वाभाविक है । लेकिन 58 या 60 की उम्र में रिटायर होने पर वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं । अतः ऐसी नीति की आवश्यकता है जो यह सुनि​ि�चत करे कि घर और बाहर बुजुर्गों के अधिकारों का हनन न हो। उन्हें विकास के फायदों में उचित अवसर और बराबर का हिस्सा मिले। खासतौर से ग्रामीण बुजुर्गों के मामले में यह भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र उनके प्रति संवेदनशील हो और उनकी स्थिति तथा मानसिकता का ध्यान रखे। इसी प्रकार वृद्ध महिलाओं के संबंध में ध्यान रखना होगा कि लिंग, वैधव्य और आयु के कारण भारत की वृद्धाओं को अतीत में जिस तरह का तिहरा तिरस्कार और भेदभाव झेलना पड़ा है , उससे उन्हें बचाया जाए। कुल मिलाकर, वृद्धों के पुनर्वास के प्रति समाज और सरकार दोनों को ही सचेत और संवेदनशील होने की आवश्यकता है । (डे ली हिं दी मिलाप, 19 दिसंबर, 2018)

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भुखमरी : सब पर अभिशाप! मानसी : आयु 8 साल। शिखा : आयु 4 साल। पारुल : आयु 2 साल। तीन बच्चियाँ । तीनों बहनें। ‘थीं!’ अब नहीं हैं !! नहीं, यह कोई पुरानी कहानी नहीं है । पूर्वी दिल्ली में संसद भवन से मात्र कुछ किलोमीटर की दू री पर स्थित मंडावली के एक परिवार की अभी-अभी की त्रासदी है । इन बच्चियों की माँ , जिसका नाम वीणा है , मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है । पिता मंगल सिंह रिक्शा चलाकर रोजी कमाता था। पर रिक्शा चोरी हो गया। किराया न भर पाने के कारण घर भी छूट गया। पूरा परिवार सड़क पर आ गया। बारिश और कीचड़ में फँसे परिवार को एक मित्र ने अपने यहाँ शरण दी। पर उसे पता नहीं था कि बच्चियों को हफ्ते भर से खाने को नहीं मिला था। खाली पेट में उठती मरोड़ के लिए पिता ने गरम पानी में कोई घरे लू दवा दी शायद। और काम की तलाश में निकल गया। बच्चियाँ दम तोड़ गईं। आज़ादी मिले 70 साल बीत गए। पर दे श गरीबी से आज भी आज़ाद नहीं हुआ। आज भी भूख, गरीबी, अभाव और कुपोषण से भारत की संतानें दम तोड़ रही हैं , तो यह केवल शोक प्रकट करने और शर्मिंदा होने की बात नहीं। यह चेतावनी है कि यदि व्यवस्था ने अपनी प्राथमिकताएँ नहीं बदलीं, तो आज़ादी और डे मोक्रे सी – सारी चीज़ें व्यर्थ हो जाएँ गी। यह मान लेना क्या हमें दोषमुक्त करने के लिए काफी है कि ऐसी मौतों के लिए सरकार जि़म्मेदार है और कि ऐसे ज़रूरतमंदों तक पहुँचने में सिस्टम असफल रहा है ? लोग गरीबी के चंगुल से मुक्त हों, बच्चे और बड़े कोई भी कहीं भी भुखमरी के शिकार न हों, रोटीरोजी और इलाज के लिए साधनहीन और कमेरे वर्गों को असहाय होकर भटकना न पड़े – यह ज़िम्मेदारी सरकार की है । पर सबको मालूम है कि गरीब के कल्याण के मामले में हर सरकार की चूलें ढीली हैं । राजनीति के खेल से फुर्सत हो तो, भूख और गरीबी दिखाई भी दें ! इसीलिए अब कोई आँ गनवाड़ी योजना की दु हाई दे रहा है , तो कोई पीड़ित परिवार के पास जाकर कुछ हज़ार रुपए दे ने का पुण्य कमा रहा है । किसी अन्य को `मनरे गा` और खाद्य सुरक्षा कानून याद आ रहे हैं । संपादकीयम्

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इस सबके बीच बच्चियों के शव का दो-दो बार पोस्टमार्टम किया गया। पर डाक्टरों को उनके पेट में अ�न का एक दाना भी खोजे नहीं मिला। जाँ च करने वाला सरकारी तंत्र भले ही मौत का कोई अन्य कारण खोज डाले, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं छोड़ी है । यहाँ तक कि तीनों बच्चियों का शारीरिक ढाँ चा भी कुपोषण से मौत का गवाह है । सात-आठ दिन से जिन बच्चों को खाना न मिला हो, उनका ढाँ चा बंदर के बच्चे जैसा ही तो रह जाएगा! कहना ही पड़े गा कि उनके लिए तो ‘गरीबी हटाओ’ से लेकर ‘बेटी बचाओ’ तक की सारी कवायद निरर्थक है । ‘बेटी पढ़ाओ’ की तो बात रहने ही दीजिए। पहले ज़रूरी है कि बच्चों की और उनके बचपन की सुरक्षा सुनि​ि�चत की जाए। अगर भूखे बच्चे इसी तरह मौत के मुँह में जाते रहेंग�े तो यह समाज के अस्तित्व के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। संयुक्त रा�ट्र की खाद्य एजेंस�ी के ताज़ा आकलन के मुताबिक दु निया भर में भूख के कारण मृत्यु के कगार पर पहुँच गए लोगों की संख्या 12 करोड़ 40 लाख पाई गई है । यह लगातार बढ़ भी रही है । वि�व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदे शक डे विड बीसली ने दु निया को आगाह किया है कि भूख और संघर्ष के बीच में बड़ा विध्वंसकारी रिश्ता है । इससे खाद्य-असुरक्षा पैदा होती है और खाद्य-असुरक्षा से अस्थिरता तथा तनाव पैदा होता है जिससे हिं सा फैलती है । उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे लोकतंत्र के कर्णधार भी भूख और हिं सा के इस भयानक रिश्ते को समझेंग�े। (डे ली हिं दी मिलाप, 04 अगस्त, 2018)

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विकास बनाम भुखमरी दु निया भर में भूख से पीड़ित और भुखमरी से मरने वाले लोगों के बारे में आई वैि�वक रिपोर्ट का यह खुलासा चौंक�ाने वाला ही नहीं, बड़ी हद तक शर्मनाक भी है कि 119 दे शों की सूची में भोजन और पोषण की उपलब्धता की दृि�ट से भारत 103 वें स्थान पर है । श्रीलंका, नेपाल और बां ग्लादे श जैसे दे श हमसे बेहतर हालत में है , तो इसे चिंताजनक ही माना जाना चाहिए। ग्लोबल हं गर इं डेक्स रिपोर्ट-2018 के अनुसार दु निया भर में करोड़ों लोग असाध्य भूख के शिकार हैं , तो अनेक दे श भीषण रूप से खाद्या�न के अभाव और अकाल से ग्रस्त हैं । रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि तमाम तरह की संपदाओं से भरपूर इस धरती पर आज की तारीख में लाखों लोगों को भोजन का बुनियादी मानवाधिकार तक प्राप्त नहीं है ; उन्हें हर रात भूखे पेट सोना पड़ता है । इसके पीछे जबरन विस्थापन की भी बड़ी भूमिका है जिसका समाधान दु निया के दे शों को राजनैतिक स्तर पर खोजने की जरूरत है । दु निया भर में तरह-तरह के संघर्ष और युद्ध, ऋतुचक्र और पर्यावरण में असाधारण बदलाव, प्रशासन के स्तर पर अव्यवस्था और शोषण की स्थितियाँ भोजन के अभाव और भुखमरी के फैलाव के लिए जिम्मेदार हैं । सर्वेक्षण में पाया गया है कि असंतुलित विकास की दौड़ के कारण अनेक दे श गरीबी और भूख जैसी समस्याओं की अनदे खी भी कर रहे हैं । सर्वे किए गए 119 दे शों में से केवल 43 दे श भूख की समस्या से मुक्त पाए गए हैं । 24 दे श ऐसे हैं जहाँ की स्थिति ठीक-ठाक कही जा सकती है । 44 दे शों को गंभीर स्थिति वाले वर्ग में रखा गया है । भारत इसी में शामिल है । 7 दे श खतरे की ऊपरी सीमा पर है जबकि एक दे श (सेंट�्र ल अफ्रीकन रिपब्लिक) भीषण रूप से गंभीर खाद्य-संकट से ग्रस्त है । भूख और कुपोषण की स्थिति का आकलन जिन आधारों पर किया जाता है उनमें 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों में पोषण का अभाव, अतिशय कुपोषण से ग्रस्त अर्थात मां सपेशी और वसा ऊतकों के क्षरण से पीड़ित होना, है जा जैसी बीमारियों के कारण विकास का अवरुद्ध होना तथा शिशुओं की अकाल मृत्यु शामिल हैं । संपादकीयम्

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इसे विडं बना ही कहा जा सकता है कि भारत को जहाँ दु निया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था माना जा रहा है , वहीं इसका प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर एक राज्य झारखंड बुरी तरह से भूख-ग्रस्त पाया गया है । यह और भी विडं बना का विषय है कि केंद्र में सत्तासीन तथा गरीबों के लिए हितकारी तमाम तरह की विकास-योजनाओं को लागू करने का दावा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी ही झारखंड में भी सत्ता में है । इस अध्ययन से उसकी आँ खें खुल जानी चाहिए जिसमें झारखंड के 15 जिलों के 1057 घरों का सर्वेक्षण किया गया। इन जिलों में बोकारो, दे वघर, दु मका, गिरडीह, गोड्डा, गुमला, हजारीबाग, जमातरा, खुंटी, लातेहर, लोहरदगा, पाकुड़, साहे बगंज, सरायकेला-खरसावन और प��चमी सिंहभूमि शामिल हैं । यह पाया गया है कि झारखंड में 50 प्रतिशत से अधिक परिवार ऐसे हैं जिन्हें जरूरत के मुताबिक खाना नहीं मिल पाता। 59 प्रतिशत परिवारों को तीन वक्त का खाना नसीब है जबकि 26 प्रतिशत परिवार दो वक्त का ही खाना जुटा पाते हैं और 4 प्रतिशत ऐसे भी हैं जिन्हें एक ही वक्त के अपर्याप्त खाने पर संतोष करना पड़ता है । इस राज्य में पिछले वर्ष 14 लोगों की मृत्यु भूख के कारण हुई बताई जाती है । सर्वेक्षण के अनुसार यह बात भी सामने आई है कि खाने की कमी सबसे ज्यादा जुलाई से सितंबर के बीच रहती है जो कि भारत में वर्षाकाल है । कहने की जरूरत नहीं कि खाने की कमी से ग्रस्त इन परिवारों में सबसे बड़ी संख्या अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के परिवारों की है । (डे ली हिं दी मिलाप, 22 अक्तूबर, 2018)

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धरती का बढ़ता बुखार पोलैंड� के शहर कातोवित्स में संयुक्त रा�ट्र के ‘सीओपी-24’ सम्मेलन में दु निया के 197 दे शों के प्रतिनिधि मिलकर धरती की सेहत के बारे में गंभीर विचार-विमर्श कर रहे हैं । पिछले कुछ वर्षों के अनुभव से दु निया की समझ में यह आ गया है कि लगातार औद्योगीकरण और अंधाधुंध विकास की दौड़ में पड़कर मनुष्य ने प्रकृति को तमाम तरह के कूड़े दान में बदलकर बहुत बड़ा अपराध किया है । जलवायु परिवर्तन के प्रलयकारी परिणामों को दे खने के बाद यह कहना ही पड़ता है कि धरती के बढ़ते बुखार के कारण पूरे परिवेश सहित मनुष्य के विनाश का नगाड़ा बज चुका है । इसलिए इस सम्मेलन की सबसे मुख्य चिंता यही है कि धरती के बुखार को और न बढ़ने दिया जाए। चिंता का विषय यह भी है कि तमाम तरह की कोशिशों के बावजूद धरती का औसत तापमान वां छित दर से कहीं अधिक बढ़ रहा है । तापमान बढ़ने की इस तेज होती रफ्तार को रोकना बेहद जरूरी है । जानकारों का कहना है कि अगर इक्कीसवीं सदी के अंत तक धरती का तापमान अठारहवीं सदी के मध्य के औसत तापमान की तुलना में 3 से 5 डिग्री बढ़ गया तो चारों ओर हाहाकार मच जाएगा। धरती का बुखार बढ़ना रोकने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि वातावरण को गर्म करनेवाली कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती की जाए। यह तभी संभव है जब तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे ईंधन के इस्तेमाल पर रोक लगे। ऊर्जा उत्प�न करने के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश किए बिना अब गुजारा नहीं हो सकता। इसीलिए जलवायु परिवर्तन विषयक इस सम्मेलन में विभि�न दे शों के लिए एक रूलबुक भी तैयार की जा रही है । दु निया के बड़े दे शों की अहम्मन्यता को दे खते हुए जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए अंतररा�ट् रीय सहयोग को सुनि��चत करना भी एक बड़ी संपादकीयम्

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चुनौती है । इस सच्चाई से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि बहुत से विकासशील दे श अपने यहाँ गरीबी के उन्मूलन और साथ ही कार्बन डाइ ऑक्साइड जैसी धरती का बुखार बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन को घटाने की दोहरी लड़ाई लड़ने में समर्थ नहीं है । ऐसे दे शों को बढ़ावा दे ने के लिए धनराशि जुटाना भी एक बड़ी चुनौती है । इसी कारण पेरिस में हुए 2015 के समझौते में विकसित औद्योगिक दे शों ने 2020 से 2025 तक विकासशील दे शों की सहायता के लिए प्रतिवर्ष 100 अरब डालर की सहायता दे ने का वचन दिया था। लेकिन अभी तक इसके लिए आवश्यक राशि एकत्र होने में संतोषजनक और उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है । इसी के साथ यह भी बुरी खबर है कि अमेरिकी रा�ट्र पति डोनाल्ड ट् रं प ने ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ के लिए भी धनराशि मुहैया कराने से इनकार कर दिया है । कहना गलत न होगा कि पहले अमेरिका और अब ब्राजील ने जिस प्रकार अपने आप को ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के इन सामूहिक अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से अलग कर लिया है ,वह धरती के अस्तित्व के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है । इसी तरह उदारता और प्रगतिशीलता के तमाम दावों के बावजूद यूरोपीय संघ भी तापमान बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के मामले में गंभीर दिखाई नहीं दे रहा है । वहाँ की जनता की माँ ग के बावजूद जर्मनी भी उल्टी दिशा में चल रहा है । इन सब विपरीत परिस्थितियों में भी भारत अब भी पेरिस के जलवायु रक्षण समझौते के प्रति पूरी तरह वचनबद्ध और अडिग है । अंततः, जलवायु परिवर्तन के प्रति जो बड़े दे श अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं , उन्हें इस चेतावनी की ओर भी ध्यान दे ने की जरूरत है कि धरती के बुखार को बढ़ने से अगर न रोका गया तो प्लेग जैसी महामारी का बैक्टीरिया कभी भी सक्रिय हो सकता है तथा गिल्टी और मलेरिया जैसी बीमारियाँ भी वि�वभर में फैल सकती हैं । (डे ली हिं दी मिलाप, 10 दिसंबर, 2018)

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... तो क्या समुद्र में समा जाएँ गे तटीय शहर? धरती और धरतीवासियों के अस्तित्व पर मँडराते खतरों से आगाह करने वाली संयुक्त राष्ट्र के इं टरगवर्नमेंट�ल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज� (आईपीसीसी) की रिपोर्ट द्वारा एक बार फिर संपूर्ण मनुष्य जाति के पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर होने की ज़रूरत उजागर हुई है । तुनकमिजाज प्रकृति के बदलते मूड को पहचान कर अगर आदमी ने खुद को जल्दी नहीं बदला तो जो स्थितियाँ सामने आ सकती हैं , शायद उन्हें ही ‘प्रलय’ कहा जाता है । इसलिए ग्लोबल वार्मिंग का सामना करने के व्यापक इं तजाम आज बेहद ज़रूरी हो गए हैं । इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर धरती अभी मात्र 2 डिग्री सेल्सियस और गरम हो जाए, तो भारत जानलेवा गर्म हवाओं से घिर सकता है , इसलिए हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि धरती का गोला अब और अधिक न तपे। रिपोर्ट की मानें तो, अगर ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है तो, समाज के सभी हलकों में अभूतपूर्व बदलाव लाने होंग�े। यह संभावना काफी चिंताजनक है कि खेतीबाड़ी और मछलीपालन पर निर्भर भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले दे शों को समुद्र के स्तर के बढ़ते जाने के भयंकर परिणाम झेलने पड़ सकते हैं । अगर धरती का तपना न रुका तो वैज्ञानिकों का मानना है कि सचमुच क़यामत आ जाएगी! अभिप्राय यह है कि अब जलवायु संकट पर भाषणों और घोषणाओं से आगे बढ़कर कुछ ठोस करने का वक्त आ गया है । यह कोई अच्छी बात नहीं है कि दु निया भर के समझदार(!) दे श इस खतरे को भली प्रकार भाँ पने के बावजूद इसके समाधान की कोई दिशा अभी तक तय नहीं कर सके हैं । वे अभी तक यह बताने में सफल नहीं हो सके हैं कि कार्बन उत्सर्जन को आखिर कैसे घटाया जा सकता है , जबकि किसी वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में तमाम तरह का धुआँ निरं तर पर्यावरण को प्रदू षित करता जा रहा है । हवा अगर इसी तरह जहरीली होती रही तो जीवधारी एक-एक कर मृत्यु के मुँह में समाते जाएँ गे। इसी तरह यह भी चिंतनीय है कि जलवायु का संकट केवल जल और संपादकीयम्

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वायु का संकट नहीं, बल्कि इसके कारण पूरी धरती की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं । जानकारों का कहना है कि धरती का तापमान अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले दशकों में बहुत से दे शों को सुनामी या इसी तरह के भयंकर तूफान तबाह कर डालेंग�े। अभी हम साल भर यह शिकायत करते नहीं थकते कि जब जहाँ जितनी वर्षा होनी चाहिए तब वहाँ उतनी वर्षा नहीं हो रही है और मौसम का मिजाज इतना बदल गया है कि सारे पूर्वा नुमान व्यर्थ हो रहे हैं । हमें समझना चाहिए कि ये बेमौसम की बारिशें, जिनका परिणाम अभूतपूर्व बाढ़ और सूखे के रूप में आता है , धरती के बढ़ते तापमान का ही नतीजा हैं । इनसे बचना है तो धरती को और गरम होने से रोकने के कारगर उपाय खोजने होंग�े। यह तथ्य चौंक�ानेवाला है कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों का तापमान 19वीं शताब्दी की तुलना में अब 1 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा बढ़ गया है । इस स्थिति का परिणाम केरल जैसी बाढ़ के रूप में दे श को झेलना पड़ रहा है । ऐसी बाढ़ें और भी बढ़ सकती हैं क्योंक�ि समुद्र का जलस्तर ऊपर उठ रहा है और नदियों का पानी नगरों की ओर लौटने को मजबूर है । ऐसे में अनेक तटीय नगरों के समुद्र में समा जाने के खतरे से आँ ख नहीं मूँदी जा सकती। अतीत में जिस प्रकार महाबलीपुरम और द्वारकापुरी के समुद्र में समा जाने की गाथाएँ सुनी जाती हैं , क्या हमारे अनेक तटीय शहर आने वाली पीढ़ियों के लिए इसी तरह की गाथा बनकर रह जाएँ गे? अंततः इतना ही कि पर्यावरण प्रदू षण पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो ऋतुचक्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाएगा और तुनकमिजाज मौसमों के कारण कहीं गरम हवाओं, कहीं जहरीले धुएँ, कहीं अतिवृि�ट और कहीं अनावृि�ट से सारी मानव सभ्यता ध्वस्त भी हो सकती है । (डे ली हिं दी मिलाप, 11 अक्तूबर, 2018)

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जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना... हर मसले पर धर्म, संप्रदाय और परं परा की दु हाई दे ने वाले समाज को यह बात पसंद भले न आए कि सर्वोच्च न्यायालय दीवाली जैसे त्योहार पर पटाखेबाजी के आड़े आ रहा है , लेकिन इस सत्य से आँ ख फेरना भी धर्मसम्मत न होगा कि पटाखे जलाने और आतिशबाज़ी की अति होने से लोगों का साँ स लेना तक दू भर हो सकता है । उसकी इस मंशा में कोई खोट नहीं है कि विशेष रूप से रा�ट् रीय राजधानी क्षेत्र में वायु और ध्वनि प्रदू षण के खतरे को दे खते हुए दीवाली पर रात आठ से दस बजे तक ही पटाखे जलाए जाएँ । साथ ही, केवल लाइसेंस� प्राप्त कारोबारी ही अब पटाखे बेच पाएँ गे तथा ऑनलाइन व्यवसाय करने वाली वेबसाइटों पर पटाखों की बिक्री पर रोक रहे गी। इसके अलावा, यदि केवल ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के प्रस्ताव पर अमल किया जा सके तो पूरे समाज के लिए यह बेहद कल्याणकारी कदम होगा। ग्रीन पटाखों का मतलब है , ऐसे पटाखे जो जलने पर आवाज़ और रोशनी तो वैसी ही देंग�े जैसी आम पटाखे दे ते हैं , लेकिन पर्यावरण को उनकी तुलना में बहुत कम प्रभावित करें ग�े। ये प्रदू षण रहित पटाखे आग की चिंगारियाँ ही नहीं पानी की बूँदें भी फेंक�ने में समर्थ होंग�े, ताकि वायु प्रदू षण को रोका जा सके। ज़िद और आवेश को किनारे करके सोचें तो समझा जा सकता है कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में यह हमारी एक क्रांतिकारी पहल हो सकती है । ज़रूरत है तो सामाजिक ज़िम्मेदारी के अहसास और जागरूकता की। लेकिन, सुझाव अच्छा होने के बावजूद इतनी दे र से सामने आया है कि इस दीवाली पर तो शायद ही ऐसे पटाखे बाज़ार में उतारे जा सकें। जब तक ये ग्रीन पटाखे उपलब्ध नहीं होते, तब तक भी समाज कम से कम पटाखे जलाने के लिए न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा का तो पालन कर ही सकता है । अगर हमारी ज़िद पर्यावरण के नाश का कारण बनती हो, तो इसे प्रकृति और लोक के प्रति द्रोह और अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। अतः पटाखे फोड़ने के असीम अधिकार की माँ ग करने वालों को समझना चाहिए कि दीवाली दीयों संपादकीयम्

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और खील-बताशों का त्योहार है , उसे आतिशबाज़ी के सीमित होने के बावजूद परम हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जा सकता है । कोई इस मुगालते में भी न रहे कि समय सीमा का यह बंधन केवल दशहरे दीवाली के लिए है । क्रिसमस और नव वर्ष के अवसर पर भी मध्य रात्रि में केवल एक घंटे के लिए ही पटाखेबाज़ी की अनुमति होगी। हम यह भी जानते हैं कि ऐसे आदे शों को लोग आम तौर पर गंभीरता से नहीं लेते। पिछले साल पटाखों की बिक्री पर लगा अस्थायी प्रतिबंध इसी कारण व्यवहार में अप्रभावी साबित हुआ था। फिर भी इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय इसलिए गंभीर है कि इससे जनता के जीवन और स्वास्थ्य जैसी बड़ी और लोकव्यापी चिंताएँ जुड़ी हुई हैं । इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने आदे श के उल्लंघन को अपनी अवमानना बताते हुए इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी संबंधित थाना प्रभारी पर डाली है । शायद इस कदम का कुछ सुखद परिणाम सामने आए – बशर्ते कि जनता और पुलिस एक दू सरे का साथ दें । यह किसी से छिपा नहीं है िक हर वर्ष अनेक लोग पटाखों के धुएँ और शोर के कारण गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं ; पर्यावरण प्रदू षण तो अपनी जगह है ही। अतः विवेकी और जिम्मेदार नागरिकों को इस दिशा में सोचने और कारगर पहल करने की ज़रूरत है । अमर्यादित पटाखेबाज़ी और आतिशबाज़ी के बुरे नतीजों को हर जनसंचार माध्यम और सोशल मीडिया द्वारा बड़े स्तर पर प्रचारित किया जाना चाहिए ताकि लोगों में यह समझ विकसित हो कि पर्यावरण को प्रदू षित करना अपने जीवन को स्वयं न�ट करने जैसा है । इस संदर्भ में नीरज के एक प्रसिद्ध गीत की पंक्ति को (क्षमायाचना सहित) थोड़ा बदलकर यह कहा जा सकता है किजलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना; प्रदू षण फ़िजाँ में कहीं भर न जाए!! (डे ली हिं दी मिलाप, 27 अक्तूबर, 2018)

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दु र्गा पूजा में विदे शी रुचि का अर्थ उत्सवों के इस मौसम में यह जानना काफी रोचक है कि इस साल कोलकाता में दु र्गा पूजा उत्सवों में विदे शी दू तावास खास दिलचस्पी दर्शा रहे हैं । कहा जा रहा है कि अमेरिकी राजदू त इस सद्भावना से दु र्गा पूजा में सक्रिय रूप से भाग लेने पधारे हैं कि इससे उन्हें पूर्वी भारत के साथ सां स्कृतिक संबंध बढ़ाने का अवसर मिलेगा। वे दे खना चाहते हैं कि यह कैसा त्यौहार है जिसे जाति, पंथ और धर्म से ऊपर उठकर सारा बंगाल एक जैसे रा�ट् रीय भाव से मनाता है । कैसा विचित्र चरित्र है अमेरिका का कि एक तरफ तो ईरान और रूस के साथ भारत के सारे संबंधों पर प्रतिबंध लगाने को कटिबद्ध है और दू सरी तरफ उसी से सां स्कृतिक रिश्ते इतने गहरे करना चाहता है कि दे वी के पंडालों तक में घुसा आ रहा है । इस दोहरे पन के कारण सहज ही आशंका जगती है कि पूर्वी भारत में अमेरिका की यह रुचि सां स्कृतिक से कुछ अधिक है – व्यावसायिक और कूटनीतिक! इस ‘दु र्गा पूजा कूटनीति’ में चीन भी उतनी ही रुचि प्रकट कर रहा है जितनी अमेरिका। खबर है कि चीन के 39 कलाकार कोलकाता आ रहे हैं । ये वहाँ दु र्गा पूजा पंडालों में अपनी प्रस्तुतियाँ देंग�े जिनमें जैस्मीन फ्लॉवर नृत्य, पारं परिक युद्ध कला तथा मयूर नृत्य आदि शामिल हैं । चीन का इतना उत्साह भी अचरजकारी ही है क्योंक�ि पिछले काफी समय से भारत के साथ उसके रिश्ते वैसी गर्मजोशी के नहीं रहे हैं कि वह हमारे घरे लू त्यौहार के अवसर पर नाचे-कूदे । आशंका होनी ही चाहिए कि इस दिखावटी उत्साह के पीछे चीन की असली मंशा क्या है । अमेरिका और चीन से एक कदम आगे बढ़कर फ्रांस के दू तावास की योजना बंगाल के गां वों में जाकर दु र्गा पूजा दे खने की है । इन सब गतिविधियों से यह तो साफ है ही कि दु निया के ये ताकतवर दे श भारत की सरकार से रिश्ते तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि आगे बढ़कर जनता के बीच पहुँचना संपादकीयम्

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चाहते है , उससे जुड़ना चाहते हैं । इसका यह भी अर्थ है कि धार्मिक-सां स्कृतिक मेलजोल का फायदा उठाकर वे भारतीयों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाना चाहते हैं ताकि उनके प्रति हम परायेपन का बर्ताव न करें । ऐसा करने के पीछे उनकी विवशता यह है कि भारत उनके लिए बहुत बड़ा और संभावनाओं से भरा हुआ बाज़ार है जिसे लुभाना इन दे शों के वाणिज्यिक हित साधने के लिए ज़रूरी है । यही मानसिकता ब्रिटे न की भी है । इस विचार की पुि�ट के लिए कोलकाता में ब्रिटिश उप उच्चायुक्त का यह कथन विचारणीय है कि "मैं दु र्गा पूजा के दौरान कोलकाता में पंडालों का दौरा करूँगा। मेरी रुचि खासकर उन पंडालों में है जिनकी विषयवस्तु और सजावट में ‘यूके कनेक्शन’ मौजूद हो।“ दरअसल हर एक विदे शी दू तावास की रुचि इस लोकव्यापी उत्सव में इसीलिए है कि उनके दे श का ‘कनेक्शन’ दिखाई दे सके! अर्थात सारी कवायद ‘वाणिज्य’ के वास्ते है , ‘संस्कृति’ तो बहाना है । असल में तो किसी को यहाँ से मुनाफा कमाने की चिंता है और किसी को अपने लोगों के लिए रोजगार पैदा करने या अपने माल के निर्यात के लिए बाज़ार खोजने की। हमें याद रखना चाहिए कि कोई भी महाशक्ति अपने हितों को छोड़कर कुछ भी नहीं सोचती। इसीलिए ये दे श बंगाल में लाखों भारतीयों के उपभोक्ता बाज़ार तक अपनी पैठ गहरी करने भर के लिए दु र्गा पूजा और दीपावली का उपयोग करने को सोच समझकर ‘संस्कृति’ का दाँ व खेल रहे हैं । इन दे शों का दु र्गा पूजा के लिए अचानक उमड़ता सारा प्यार `माया-प्रेरित` है । भारत को इस जाल में फँसने से बचना होगा। बेहतर हो अगर भारत सरकार ऐसे सब विदे शी राजनयिकों को यह परामर्श दे कि वे भारत की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में इस तरह दखलंदाज़ी से बाज आएँ और हमारे धार्मिकसां स्कृतिक जीवन में ज़्यादा भीतर तक घुसने की कोशिश न करें । (डे ली हिं दी मिलाप, 15 अक्तूबर, 2018)

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लद गए वै�वीकरण के दिन? अमेरिका और चीन के बीच व्यापार-युद्ध शेष वि�व के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है । इस दौरानअमेरिका ने चीन से आयातित सामान पर नया टै क्स लगा दिया है । ट् रं प प्रशासन का यह भी कहना है कि अगर चीन ने अमेरिकी लोगों को नुकसान पहुँचाने वाली नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो वह चीन से होने वाले पूरे आयात पर शुल्क लगाएगा। इससे पहले चीन भी अमेरिका से आयातित बहुत सारी वस्तुओं पर शुल्क लगाने की घोषणा कर चुका है । इस घमासान का बाकी दे शों के व्यापार पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है । यह भी कहा जा सकता है कि इस तरह की व्यावसायिक कुश्ती लड़ते हुए ये दोनों आर्थिक पहलवान राष्ट्र वैि�वक अर्थव्यवस्था में नई हलचल पैदा कर रहे हैं । इस नई हलचल के प्रभाव को जानकार लोग उदारीकरण और वै�वीकरण की आत्मा के खिलाफ मान रहे हैं । यह माना जा रहा है कि नए टै क्स लगाकर अमेरिका और चीन वै�वीकरण की नीति से पीछे हट रहे हैं । अमेरिका द्वारा भारत से आयातित स्टील पर आयात कर बढ़ाने को भी ऐसी ही गतिविधि माना जाना चाहिए। स्मरणीय है कि वै�वीकरण की अर्थव्यवस्था को अपनाने के पीछे एक बड़ा कारण यह रहा है कि वि�व व्यापार संगठन में शामिल दे शों द्वारा इसके तहत आयातों पर उनके द्वारा लगाए जाने वाले टै क्स की अधिकतम सीमा तय कर ली जाती है । माना यह जाता है कि टै क्स की दर कम होने से दु निया के सभी दे शों में व्यापार बढ़ना चाहिए और सारी दु निया को सस्ता माल उपलब्ध होना चाहिए। इसी का लाभ उठाकर चीन ने दु निया भर के बाजार को सस्ते माल से पाट दिया क्योंक�ि कोई दे श उस पर तयशुदा हद से ज्यादा टै क्स नहीं लगा सकता। भले ही वह माल उसके यहाँ चीन की तुलना में महँ गा हो। इसके विपरीत, अब जबकि अमेरिका अपने यहाँ भारत और चीन से आने वाले स्टील संपादकीयम्

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पर टै क्स बढ़ा रहा है , तो अमेरिकी स्टील कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में आसानी होगी; क्योंक�ि अब तक अमेरिका का यह उत्पाद इन दोनों दे शों से आने वाले उत्पाद की तुलना में महँ गा था। इसका अर्थ हुआ कि अपनी दादागिरी की आदत से मजबूर अमेरिका वि�व व्यापार संगठन की आयात कर संबंधी नीति का उल्लंघन कर रहा है । इस तरह वह वै�वीकरण से बाहर होने की पहल कर चुका है । इसके अलावा वै�वीकरण के बहाने सदस्य दे श पेटटें � कानून के अंतर्गत आ जाते हैं । पहले अगर किसी दे श में कोई नई तकनीक विकसित होती थी, तो दू सरे दे श उसकी नकल करके झट से अपने यहाँ उसका इस्तेमाल करने को आजाद थे। वै�वीकरण के तहत यह तय हुआ कि किसी भी नई खोज पर 20 साल तक पेटटें � रहे गा। उस समय यह अमेरिका के लिए लाभकारी था। उसने कंप्यूटर आदि की अपनी तकनीक दु निया भर में खूब महँ गी बेचकर फायदा उठाया। दरअसल, पेटटें � कानून लाया ही विकसित दे शों के फायदे के लिए गया था। विकसित दे शों का इसमें दोहरा फायदा था। उदारवादी बाजार व्यवस्था के कारण विकासशील दे शों में बना सस्ता माल विकसित दे शों को सस्ते में मिलता था, जबकि वे अपनी पेटटें � तकनीक महं गे में बेचते रहे । लेकिन पिछले कुछ वर्षों की बात करें तो पता चलता है कि इन दिनों विकसित दे शों में नई तकनीक की खोज में कुछ खास प्रगति नहीं दिखाई दे रही। फलतः पेटटें � कानून से अब उन्हें पहले जैसा फायदा नहीं हो रहा। अमेरिका को अब लगने लगा है कि वै�वीकरण का जितना फायदा मिलना था, मिल चुका। अब इसे जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता है । इसलिए वह इस प्रकार की नीतियाँ लागू करने की ओर अग्रसर है , जो वै�वीकरण अथवा वि�व व्यापार संगठन के सिद्धांतों के खिलाफ हैं । बढ़े हुए नए आयात करों की घोषणा भी उसका ऐसा ही सोचा समझा कदम है । चीन भी इसमें कुछ पीछे नहीं है । अंततः स्पष्ट है कि वै�वीकरण के दिन शायद लद गए! (डे ली हिं दी मिलाप, 27 सितंबर, 2018)

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आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड भारत ने कठोर शब्दों में जब यह साफ कर दिया कि हमें दक्षेस शिखर सम्मेलन में शामिल होने का पाकिस्तान का न्योता तब तक स्वीकार नहीं हो सकता जब तक पाकिस्तान भारत में होने वाली आतंकी गतिविधियों का अपनी जमीन से संचालन करना नहीं छोड़ता, तो पाकिस्तान के अत्यंत चतुर खिलाड़ीप्रधानमंत्री इमरान खान ने यह कहकर खेल को पलटने की चाल चली है कि दू सरे दे शों में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे ने के लिए अपने दे श की सीमा के इस्तेमाल की इजाजत दे ना पाकिस्तान के हित में नहीं है । लेकिन उन्होंन�े यह कतई नहीं कहा कि पाकिस्तान ऐसा करना व्यावहारिक रूप में कब से बंद करे गा। आदर्शवादी बयान दे कर दु निया के सामने शां ति का मसीहा बनने का पाखंड अलग चीज है और उस आदर्श को अमली जामा पहनाने के लिए पहल करना एकदम दू सरी चीज। क्या पाक के प्रधानमंत्री यह घोषित कर सकते हैं कि आज से उनका दे श आतंकवादियों और आतंक के समर्थकों को संरक्षण दे ना बंद कर दे गा? नहीं! क्योंक�ि पाकिस्तान की सरकार, वहाँ की सेना और आतंकवादी संगठनों का अस्तित्व एक-दू सरे के साथ जुड़ा हुआ है । कई घटनाएँ एक के बाद एक घटित हुईं। भारत ने करतारपुर साहिब गलियारे की घोषणा की। पाकिस्तान ने भी की। दोनों तरफ उद् घाटन हुआ। पाकिस्तान ने इस अवसर पर राग-कश्मीर अलापा - यह जानते बूझते कि इसके लिए यह उचित मंच नहीं था। तुरंत बाद दक्षेस शिखर सम्मेलन में भारत को आमंत्रित करने का नाटक किया गया ताकि दु निया के सामने यह कहा जा सके कि पाकिस्तान तो अमन का मसीहा है , भारत ही खलनायक है जो साथ दे ने को तैयार नहीं। वरना उन्हें मालूम था कि भारत इस न्योते को स्वीकार नहीं कर सकता। भारत ने ठीक ही किया जो एक बार फिर से साफ-साफ कह दिया कि पहले अपनी आतंकी हरकतें बंद करो वरना दोनों दे शों के बीच कोई शां ति वार्ता संभव नहीं और न ही भारत का दक्षेस में हिस्सा लेना। संपादकीयम्

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करतारपुर साहिब गलियारे का निर्माण धार्मिक-सां स्कृतिक मुद्दा है और दोनों दे शों की जनता के मानस के अनुकूल है । लेकिन आतंकवाद के मुद्दे को इस बहाने पतला नहीं किया जा सकता। इसलिए भारत का सख्त रुख बना हुआ है और बना रहना चाहिए। यदि पाक प्रधानमंत्री की इच्छा वास्तव में विवादों को हल करने की होती, तो उन्हें आगे बढ़कर अपनी जमीन के आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था और दाऊद इब्राहीम तथा हाफ़िज़ सईद जैसे आतंकवादियों के सरगनों को गिरफ्तार करके दिखाना चाहिए था। लेकिन नहीं। उनके साथ तो खून का रिश्ता है ! यह तब एक बार फिर उजागर हुआ जब गलियारे के उद् घाटन के समय खालिस्तानी आतंकी नेता गोपाल सिंह चावला पाक के प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष के साथ मंच पर उपस्थित दिखा। कोई इनसे पूछे कि, वह क्या वहाँ अपनी मर्जी से टहलता हुआ आकर बैठ गया था? नहीं। बाकायदा बुलाकर बिठाया गया था ताकि भारत को धमकाया जा सके कि, ‘दे खो, खालिस्तान का हथियार हमारी जेब में है । ज़्यादा चूँ-चपड़ की तो कश्मीर के साथ-साथ फिर से पंजाब में आतंक मचा देंग�े।‘ अशां ति फैलाने वालों को शरण दे ते रहें और शां ति तथा सभ्य रिश्तों की कामना का पाखंड करते रहें - बस पाकिस्तान की शां ति-नीति का यही सारां श है ! इसकी पुि�ट तब फिर से हो गई जब वहाँ छिपे बैठे और छु ट्टे घूमते मुंबई हमले के अभियुक्तों के बारे में पूछे जाने पर खिलाड़ी-खान ने अतीत में न जी सकने का उपदे श दे दिया। साथ ही यह धमकी भी कि ‘हमारे पास भी भारत में वां टेड की लिस्ट है !’ संदेश साफ है कि अमन की ख्वाहिश केवल दिखावा है ।अंतररा�ट् रीय दबाव के समक्ष पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की मजबूरी है कि वे भारत के साथ सभ्य रिश्तों की इच्छा तो प्रकट करते रहें , लेकिन अपने दे श के असभ्य व्यवहार को पहले जैसा ही बनाए रखें। (डे ली हिं दी मिलाप, 01 दिसंबर, 2018)

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संपादकीयम्


हथियार चमका रहा ड्रैगन! चीन के राष्ट्र पति शी जिनपिंग ने चीनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने निर्देश� दिए हैं । आशंका है कि महाबलियों की प्रतिद्वंद्विता के कारण 2019 नए तनावों का साक्षी बन सकता है । किसी से छिपा नहीं है कि एक ओर तो दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय विवादों के बीच चीन अपने सशस्त्र बलों को बढ़ावा दे रहा है तथा दू सरी ओर व्यापार से लेकर ताइवान की स्थिति तक के मुद्दों पर अमेरिका के साथ तनाव बढ़ा रहा है । स्थिति की गंभीरता का अनुमान जिनपिंग के इस कथन से लगाया जा सकता है कि, “इस समय वह सब कुछ करने की जरूरत है जो युद्ध के लिए जरूरी होता है । चीनी सेना को नए युग के लिए रणनीति तैयार करनी चाहिए। सश�त्र बलों को अपनी सुरक्षा और विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करना चाहिए। आपातस्थिति में सेना तुरंत हरकत में आए इसके लिए उसे तैयार रहना होगा।" इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका के समक्ष अपने दे श को इक्कीस सिद्ध करने के लिए रा�ट्र पति शी जिनपिंग शायद किसी भी हद तक जा सकते हैं । इसका संकेत उनके इस आदे श में छिपा है कि चीन के स्थापना दिवस की 70वीं वर्षगाँ ठ के अवसर पर थियानमेन चौक में पीपल्स लिबरे शन आर्मी की सभी टु कड़ियों की सैन्य परे ड होगी जिसमें पीपल्स लिबरे शन आर्मी की सही युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया जाएगा तथा ऐसी सेना की झलक मिलेगी जो हर युद्ध जीतने की क्षमता रखती है । स्मरणीय है कि शी जिनपिंग 2012 में चीन के राष्ट्र पति और सेंट�्र ल मिलिट् री कमीशन के चेयरमैन बने थे। तभी से वे लगातार पीपल्स लिबरे शन आर्मी को मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं । जानकारों का मानना है कि उनके सत्ता में आने के बाद से चीन वैि�वक राजनीति में अधिक मुखर हुआ है और वहाँ सत्तावाद के युग की शुरूआत हुई है । वे चीन को वि�व शक्ति के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं । इसके लिए अमेरिका के विस्तार को रोकना ज़रूरी है । संपादकीयम्

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अमेरिका के साथ व्यापार के मुद्दों को लेकर और ताइवान के साथ भी चीन के रिश्ते तनावग्रस्त हैं । साथ ही चीन दक्षिण चीनसगर में भी अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहता है । यह कहना गलत न होगा कि इस समय चीन और अमेरिका दु निया के बाज़ार पर अपने-अपने अधिकार की गलाकाट होड में हैं । ऐसे में अमेरिकी रा�ट्र पति डोनाल्ड ट् रं प ने ‘एशिया रीएश्योरें स� इनिशिएटिव एक्ट’ को कानूनी जामा पहना कर चीन को चिढ़ाने का काम किया है । दु निया की लगभग आधी आबादी वाले एशिया-प्रशां त क्षेत्र के लिए बने इस कानून के अनुसार, ‘दक्षिण चीन सागर में चीन का अवैध निर्माण और उसकी सैन्य मौजूदगी अमरीका के रा�ट् रीय हितों, क्षेत्र में शां ति और वैि�वक स्थायित्व के विरुद्ध है ।‘ चीन को यह भी बर्दाश्त नहीं कि ताइवान को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है । इसलिए भड़के हुए चीन ने मौका मिलते ही ताइवान को घुड़क दिया कि, “इस सच्चाई को कोई बदल नहीं सकता कि ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है । ताइवान को नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग किया जा सकता है , लेकिन हम शां तिपूर्ण एकीकरण चाहते हैं ।“ उन्होंन�े ताइवान के लोगों से कहा है कि वे इस बात को स्वीकार कर लें कि ताइवान को चीन के साथ 'मिलना होगा' और यह 'मिलकर ही रहे गा।' इस पर ताइवान की राष्ट्र पति साई इं ग-वेन ने अंतररा�ट् रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई है कि वह इस स्वशासित द्वीपीय दे श के लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आए। अर्थात, ताइवान के बहाने कहीं अमेरिका और चीन को आमने-सामने न आना पड़ जाए, इस अंदेशे से ड्रैगन ने हथियार चमकाने शुरू कर दिए हैं । (डे ली हिं दी मिलाप, 08 जनवरी, 2019)

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संपादकीयम्


संयुक्त रा�ट्र की बंधक स्थिति बहुपक्षवाद (मल्टी-लेटरलिज़्म) को मजबूत करने और संयुक्त रा�ट्र की भूमिका के बारे में आयोजित सुरक्षा परिषद की परिचर्चा के दौरान वहाँ भारत के स्थायी दू त सैयद अकबरुद्दीन ने संयुक्त रा�ट्र के निष्प्रभावी होते जाने के प्रति जो चिंता व्यक्त की, इस वैि�वक संस्था को उसे गंभीरता से लेना चाहिए। वरना दु निया को सुधारने की उसकी सारी कवायद ज़बानी जमा-खर्च बनकर रह जाएगी। आज धरती के अस्तित्व पर आतंकवाद के साए जिस कदर घिरे हुए हैं , उसे दे खते हुए आतंकी गतिविधियों को लेकर जवाबदे ही तय करने में ढिलमुल रवैया कहीं न कहीं संयुक्त रा�ट्र के कमजोरी को ही दर्शाता है । इसमें भी दो राय नहीं कि सुरक्षा परिषद के अधीनस्थ कई संस्थानों का कामकाज काफी जटिल बन गया है । इसलिए भारत का यह कहना संयुक्त राष्ट्र को आईना दिखाने जैसा है कि एक ऐसे युग में जब दु निया भर के जागरूक लोग साझा संस्थाओं से ज़्यादा पारदर्शिता की माँ ग कर रहे हैं , संयुक्त रा�ट्र की प्रतिबंध समितियाँ अपनी स्पष्टता के मामले में सबसे खराब उदाहरण हैं और उनमें जवाबदे ही का अभाव है । उल्लेखनीय है कि प्रतिबंध समितियां समूचे संयुक्त रा�ट्र की ओर से काम करती हैं अतः उन्हें सभी सदस्यों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। लेकिन अफसोस कि वे आम सदस्यों को सूचित तक नहीं करतीं। इसका एक बड़ा कारण कुछ दे शों को मिले निषेध के विशेष अधिकार अर्थात वीटो पावर से है । किसी से छिपा नहीं है कि इसी वीटो पावर के बल पर चीन आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को सुरक्षा परिषद की अल-कायदा प्रतिबंध समिति के तहत आतंकवादी नामित कराने की भारत की कोशिशों को बार-बार नाकाम करने में कामयाब रहा है । अजहर द्वारा स्थापित आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की संयुक्त रा�ट्र की संपादकीयम्

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सूची में पहले से शामिल है । फिर भी इस मुद्दे पर भारत को अमेरिका, ब्रिटे न और फ्रांस का समर्थन प्राप्त होने के बावजूद सफलता न मिल पाना संयुक्त रा�ट्र की बंधक स्थिति का प्रतीक है । कोढ़ में खाज यह कि प्रतिबंध समितियाँ इतनी रहस्यपूर्ण हो उठी हैं कि ये आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने के अनुरोध को स्वीकार न करने की वजह भी कभी नहीं बतातीं। . भारत आतंकवाद पर लगाम न लगा पाने की विवश दशा में पहुँच चुके संयुक्त रा�ट्र की पहले भी आलोचना करता रहा है । विदे श मंत्री सुषमा स्वराज ने भी संयुक्त रा�ट्र में अपने संबोधन में पाकिस्तान की आतंकवाद को पोषित करने के लिए खिंचाई की थी और इस वैि�वक संस्था को भी अपनी वां छित भूमिका की याद दिलाई थी। सुषमा स्वराज ने संयुक्त रा�ट्र में साफ शब्दों में कहा था कि उसे अनिवार्य रूप से यह स्वीकार करना चाहिए कि मूलभूत सुधारों की जरूरत है । उन्होंन�े यह भी कहा था कि “सुधार सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए। हमें संस्थान के दिलोदिमाग में बदलाव करने की जरूरत है , जिससे यह समसामयिक वास्तविकता के अनुकूल हो जाए।“ अतः भारत का यह कहना कतई बेबुनियाद नहीं कि सुरक्षा परिषद कार्यनिष्पादन, वि�वसनीयता, औचित्य और प्रासंगिकता के संकट का सामना कर रही है । आज के समय में परिषद की सदस्यता वैि�वक शक्ति के वितरण के अनुरूप नहीं है और यह मौजूदा जरूरत को पूरा नहीं करती। इस संदर्भ में सुरक्षा परिषद को अपने भीतर सुधार करने की भारत की चेतावनी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अन्यथा असंतुलन का शिकार होकर वि�व व्यवस्था प्रतिद्वं द्वी टु कड़ों में बँट जाएगी, जिसे वि�वशां ति के लिए हितकर नहीं माना जा सकता। बहुपक्षवाद का तक़ाज़ा है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार वर्तमान वि�व के अनुरूप किया जाए ताकि संयुक्त रा�ट्र को बंधक स्थिति से मुक्ति मिल सके। (डे ली हिं दी मिलाप, 13 नवंबर, 2018)

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संपादकीयम्


अंतरिक्ष पर कब्जे की खातिर रूस के रा�ट्र पति व्लादिमीर पुतिन गर्व और आनंद से फूले नहीं समा रहे । उनका दावा है कि अंतरिक्ष में हथियारों के क्षेत्र में फिलहाल कई दशकों तक कोई उन्हें चुनौती नहीं दे सकता। यह ताकत उन्हें नए ‘किंझल हाइपरसोनिक मिसाइल’ और ‘अवां गार्द हाइपरसोनिक ग्लाइडर वेहिकल’ से मिली है । ये हाइपरसोनिक हथियार रूस को अंतरिक्ष का बादशाह बनाने के लिए काफी हैं । अमेरिका सहित दु निया के किसी भी दे श के पास ध्वनि की गति से 10 गुना अधिक तेज ऐसे हथियार अभी तक नहीं हैं । फिलहाल अमेरिका ने भी रूस की इस उपलब्धि के सामने सिर झुका लिया है । लेकिन इसमें संदेह नहीं किअंतरिक्ष में हथियारों के ज़ोर पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की यह दौड़ धरती के लिए तो खतरनाक है ही, पर्यावरण और अंतरिक्ष के लिए भी इसे ‘अच्छी बात’ नहीं कहा जा सकता! अंतरिक्ष पर धरतीवासियों की दखलंदाजी बढ़ाने वाले किंझल मिसाइल 12,500 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ सकते हैं । रूस ने पूरी युद्धक तैयारी के साथ इन्हें अंतरिक्ष में तैनात कर दिया है जिसने खासतौर पर अमेरिका की नींद� हराम कर दी है । अगले साल अवां गार्द ग्लाइडर भी तैनात हो जाएगा और अंतरिक्ष में रूस की बेजोड़ बादशाहत को चुनौती दे ना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। अमेरिका की चिंता का इस कारण और भी बढ़ना स्वाभाविक है कि अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए चीन और रूस के एं टी-सैटेलाइट हथियार पहले से ही खतरा बने हुए हैं । यहाँ यह कहना प्रासंगिक होगा कि अमेरिका की दादागिरी को रोकने के लिए चीन और रूस का गठजोड़ अब पूरी तरह कारगर होता दिखाई दे ने लगा है । शायद इसी से डरकर अमेरिका ने कुछ ही दिन पहले खुद को न्यूक्लियर ताकतों के समझौते से अलग करने की धमकी दी थी। दू सरी ओर रूस का कहना है कि उसने जो भी क्रू ज मिसाइल विकसित किए हैं , उनसे इस समझौते का कहीं उल्लंघन नहीं होता। स्मरणीय है कि यह समझौता अमेरिका के संपादकीयम्

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रा�ट्र पति रोनाल्ड रीगन तथा सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोफ के बीच हुआ था। पुतिन इस समझौते को गैर-बराबरी का समझौता मानते हैं क्योंक�ि उस वक्त जो मिसाइल अमेरिका के पास थे, उन्हें सोवियत संघ के लिए प्रतिबंधित करना असंगत था। अब रूस ने वह ताकत प्राप्त कर ली है , तो अमेरिका बौखला गया है । अपनी चौधराहट टू टती दे ख वह समझौते को तोड़ने के नए नए बहाने खोज रहा है । अपने सैन्य प्रमुखों से चर्चा करते हुए पुतिन ने रूस को ‘दु निया का सबसे ताकतवर दे श’ कहा है । उनकी इस घोषणा के पीछे जो हथियार तैयार खड़े हैं , उनमें एक ओर तो सरमाट मिसाइल शामिल है जो द्वीपों को भी भेद सकता है । दू सरी ओर लेजर हथियार, क्रू ज़ मिसाइल तथा पानी के भीतर से खुद मार करने वाले मिसाइल उपस्थित हैं । इनके साथ अंतरिक्ष भेदी हाइपरसोनिक हथियारों के आ जुड़ने से रूस की ताकत अनेक गुना बढ़ गई है , इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि रूस की सैन्य शक्ति इन दिनों इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि अमेरिका बौखला उठा है । किस्सा कोताह यह कि अब अमेरिका भी चुप बैठने वाला नहीं है । रूस द्वारा अंतरिक्ष के इस हाइपरसोनिक श�त्रीकरण का यह परिणाम तो किसी भी प्रकार अब टाला ही नहीं जा सकता कि धरती पर ही नहीं, अब अंतरिक्ष पर कब्जे की खातिर नए सिरे से ‘शीतयुद्ध’ छिड़ना अवश्यंभावी है हिं सा की दू कान खोलकर, बैठे ऊँचे दे श। आशंका से दबी हवाएँ , आतंकित परिवेश॥ गर्म हवाओं के पंखों पर, लदा हुआ बारूद; ‘खुसरो’ कैसे घर जाएगा, रै न हुई चहुं दे स॥ (डे ली हिं दी मिलाप, 21 दिसंबर, 2018)

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संपादकीयम्


युद्ध करना नही ं, शांति लाना है बहादु री आखिर वह घड़ी (शुभ घड़ी) आ ही गई जिसका पूरी दु निया इं तज़ार कर रही थी। अमेरिकी राष्ट्र पति डोनाल्ड ट् रं प और उत्तर कोरियाई शीर्ष नेता किम जोंग� उन के ‘मधुर मिलन' की घड़ी! सिंगापुर में संप�न शिखर वार्ता के दौरान दोनों दे शों के बीच हुए समझौते से कम से कम इतना तो तय है कि इन ताकतवर(और किसी सीमा तक सनकी भी?) नेताओं के अहं के आपसी टकराव से जो परमाणु/नाभिकीय महायुद्ध का खतरा सारी धरती पर मँडरा रहा था; फिलहाल वह टल गया है । ट् रं प जैसे कूटनीति के मँजे हुए खिलाड़ी का किम जोंग� की प्रशंसा में यह कहना ठं डी हवा के झोंक�े जैसा है कि ‘किम एक बहुत प्रतिभावान व्यक्ति हैं जिन्हें अपने दे श से बहुत प्रेम है '। सब कुछ भुलाकर आगे बढ् ने के वादे के साथ दस्तखत किए गए दस्तावेज़ में कोरिया प्रायद्वीप में परमाणु निर�त्रीकरण और द्वि्पक्षीय संबंधों को सुधारने की वचनबद्धता को दोहराया गया है । रा�ट्र पति ट् रं प ने इस इलाके में स्थायी शां ति की माँ ग करते हुए यह साफ कहा है कि जब तक इस बात के पक्के सबूत नहीं मिल जाते कि उत्तर कोरिया ने सचमुच पूर्ण निर�त्रीकरण लागू कर दिया है , तब तक अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध हटाए नहीं जाएँ गे। साथ ही यह भी दे खा जाएगा कि वहाँ के लोगों के मानवअधिकार पूरी तरह बहाल कर दिए जाएँ । किम जोंग� उन ने भी यकीन दिलाया है कि कोरिया ने अपने मिसाइल केंद�्रों को नष्ट करना शुरू कर दिया है । दोनों नेता एक दू सरे के बारे में इतनी अच्छी अच्छी बातें कर रहे हैं कि यकीन नहीं होता, कल तक ये साँ प-नेवेले की तरह घात लगा रहे थे। अगर सच ही केवल हाथ नहीं, दिल मिल गए हैं ; तो इस समझौते को सचमुच महान घटना समझा जाएगा। यह शायद भविष्य के लिए अच्छा संकेत है कि अमेरिका ने कोरिया प्रायद्वीप जैसे इलाकों में वर्चस्व के लिए चलने वाले महँ गे सैन्य अभ्यास के अप्रासंगिक होने को महसूस किया है । ट् रं प का यह कहना कहीं न कहीं संपादकीयम्

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‘कनफेशन’ सरीखा है कि ‘वार-गेम का चलते रहना उचित नहीं होता!’ (ई�वर करे कि यह सद् बुिद्ध स्थायी हो)। याद रहे कि 2006 से चले आ रहे परमाणु परीक्षणों को बंद करने और शिखर वार्ता की मेज पर बैठने का फैसला उत्तर कोरिया ने तब लिया है , जब उसने परमाणु हथियारों की डिजाइन पर अपने लिए ज़रूरी पूरी महारत हासिल कर ली है । ठीक भी है , अहिं सा उसे ही शोभा दे ती है जिसके पास हिं सा की ताकत हो!(और किम जोंग� के पास तो एक शहर का सफाया करने जितनी मारक क्षमता वाला परमाणु बम है )। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि इस समझौते से इक्कीसवीं शताब्दी की वि�व-राजनीति में नया अध्याय जुड़ गया है । उस समय महात्मा गां धी एक बार फिर आज की दु निया के लिए अनिवार्य प्रतीत हुए, जब कल तक युद्ध-उन्माद में डूबे रा�ट्र पति डोनाल्ड ट् रं प ने तनावहीन प्रस�न मुद्रा में कहा, “युद्ध तो कोई भी कर सकता है , लेकिन शां ति लाना केवल बहादु रों के बस का काम है ।” लेकिन यह बेहद ज़रूरी है कि दोनों ही पक्ष ईमानदारी से अपने वचन निभाएँ । अगर परमाणु युद्ध को टालने के महान लक्ष्य की प्राप्ति न हो सकी, तो सारा तामझाम निरर्थक हो जाएगा। घटनाएँ और समाचार अपनी जगह हैं , लेकिन इस सबसे यह बात उभर कर सामने आई है कि युद्ध के उन्माद, ज़िद, जुनून, सनक और धमकियों के बावजूद किसी भी महाविनाश को टालने के लिए वार्ता और संवाद सबसे अधिक ज़रूरी हैं । छोटा सा दे श होते हुए भी उत्तर कोरिया अमेरिका के लिए ही नहीं, वि�व शां ति के लिए बड़ा खतरा बन चुका था। वही अब 65 साल पुरानी दु श्मनी को भुलाने के लिए तैयार हो गया है , तो इसमें चीन की सकारात्मक भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उसने पहले तो उत्तर कोरिया को शक्तिशाली बनाया और जब वह अमेरिका को आँ ख दिखाने लायक हो गया, तो उसे शिखरवार्ता के लिए समझाया। इसी का परिणाम है कि अब अमेरिका उत्तर कोरिया की सुरक्षा की गारं टी ले रहा है । इस समझौते के बाद अब उत्तर कोरिया को अपनी जनता के जीवनस्तर की फिक्र करनी चाहिए ताकि लोग वहाँ से दू सरे दे शों को पलायन करना बंद करें । रा�ट्र पति ट् रं प के लिए तो खैर यह उपलब्धि छवि सुधारने में सहायक होगी ही। (डे ली हिं दी मिलाप, 14 जून, 2018)

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संपादकीयम्


ऋषभदे व शर्मा

जन्म - 4 जुलाई,1957, ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदे श। कार्यक्षेत्र – इं टेलीजेंस� ब्यूरो (1983-1990)। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिं दी प्रचार सभा (1990-2015)। प्रकाशन – 19 मौलिक और 43 संपादित पुस्तकें। संप्रति - स्वतंत्र लेखन।

अख़बार का दोहरा दायित्व होता है पाठक और जनतंत्र की ओर। ख़बरें लिखने वालों की जवाबदे ही उनके पाठकों की ओर होती है । वह संपादकीय ही है जो जनतंत्र का प्रहरी बन खड़ा होता है , डटा रहता है । वह पाठकों की ओर कम और सत्ता की, सरकार की तथा लोकतंत्र के बाकी लठधारियों की ओर अधिक उन्मुख होता है ।

सं पादकीयम्

संपादकीयम्

शायद यही कारण है कि रीडरशिप सर्वे बार-बार यह दिखाते हैं कि पाठक संपादकीयों को कम पढ़ते हैं । पर मुझे लगता है , यह बात ‘संपादकीयम्’ के लिए सच नहीं है । पाठकों की प्रतिक्रियाओं से यह साफ है कि वे इन्हें बहुत ग़ौर से पढ़ते हैं - उन्हें यह उम्मीद तो नहीं रहती कि लठधारी कुछ उत्तर भी देंग�े, पर वे इनमें उठाए प्र�नों के साथ खड़े हैं । ये उन्हीं के प्र�न हैं ।

- कुमार लव kummarluv@gmail.com

परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद

ISBN :978-93-84068-79-0

ऋषभदे व शर्मा

और जब इन प्र�नों में कुछ तंज उभर आता है , कोई व्यंग्य चोट करता है , चुभता है – तो वह उन्हें भी उतना ही चुभता है जितना सत्ता या लठधारियों को। क्योंक�ि जनतंत्र का सबसे बड़ा गुंडा तो ‘जन’ ही है । उस ही के वोटों ने इस बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल (बच्चों के खेलने की जगह) को सलामत रखा है ।


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