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Gijubhai ki kahaniya

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गिजु भाई की बाल-कथाएं : ३

लेखक

अनुवाद

गिजुभाई बधेका

काशीनाथ गिवेदी


मैं हमेशा से ही गिजुभाई के गलखाण का दीवाना रहा हु। पहली बार जब मैंने ददवास्वप्न पढ़ा तभी से लिा की गिजुभाई का गलखाण प्रत्येक गशक्षक, अगभभावक तथा गवद्यार्थियों तक पहुचना चागहए। एक ददन इं टरनेट पर कु छ खोज रहा था तो गिजुभाई की कु छ कहागनया​ाँ सामने आई। लिा की इन कहागनयो को थोड़ा सजा कर एक दकताब के रूप में पुनः इं टरनेट पर रखना चागहए। https://wikisource.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%AD%E0% A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%82:_%E0%A5%A9_%E0%A4%9A% E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0 %A5%80_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%80 इस

ललंक पर मुझे यह कहागनया प्राप्त हुई। जहा​ाँ जहा​ाँ िलगतया थी उनमे सुधार लाया। प्रस्तुत दकताब इसीका नतीजा है। - संजय कु मार पंडािले क्षेिीय गशक्षा संस्थान, एन. सी. ई. आर. टी., श्यामला गहल्स, भोपाल - ४६२०१३ ईमेल - sanjaypandagale@gmail.com

गवषय-सूची 1.

तीन लोक का टीपना............................................................................................................................................. 1

2.

बावला-बावली ....................................................................................................................................................... 2

3.

सूप से कानवाला राजा .......................................................................................................................................... 3

4.

सोनबाई और बगुला.............................................................................................................................................. 5

5.

आमने-सामने की खी​ींचातानी ................................................................................................................................ 6

6.

कुत्ता और चीता ..................................................................................................................................................... 8

7.

खड़बड़-खड़बड़ खोदते है ................................................................................................................................ 10

8.

हीं स और कौआ ................................................................................................................................................... 12

9.

नानी के घर जाने दो ........................................................................................................................................... 14

10.

लोभी दरजी .................................................................................................................................................... 15

11.

मगर और ससयार ........................................................................................................................................... 16

12.

सटड्डा जोशी ..................................................................................................................................................... 19

13.

राजा, मै तो बड़भागी ..................................................................................................................................... 20

14.

बसनया और चोर ............................................................................................................................................. 21

15.

सगलहरी बाई .................................................................................................................................................. 22

16.

अल्लम-तल्लम करता हीं ................................................................................................................................ 24

17.

चींदाभाई की चाींदनी....................................................................................................................................... 25


1. तीन लोक का टीपना एक था दकसान। उसने एक खेत जोता। खेत में ज्वार बोई। ज्वार में बड़े -बड़े भुट्टे लिे। दकसान ने कहा, "अब एक रखवाला रखना होिा। वह ददनभर पगक्षयों को उड़ायिा और रात में रखवाली करेिा। रखवाला रात में रखवाली करता और ददन में पगक्षयों को उड़ाता रहता। इस तरह काम करते -करते कई ददन बीत िए। एक रात चोर रखवाला रखा। चोरों ने दूसरे रखवाले को भी मार डाला और भुट्टे चुरा गलये। दकसान सोचने लिा—‘अब मैं क्या करूं? यह तो बड़ी मुसीबत खड़ी हो िई। इसका कोई इलाज तो करना ही होिा।‘ सोचते-सोचते दकसान को क्षेिपाल की याद आ िई। क्षेिपाल तो बड़े ही चमत्कारी और प्रतापी देवता हैं। याद करते ही सामने आ िए। उन्होंने पूछा, "मेरे सेवक पर क्या संकट आया है?" दकसान ने कहा, "महाराज, आपकी कृ पा से ज्वार में बड़े-बड़े भुट्टे लिे हैं, पर चोर इन्हें यहां रहने कहां दे रहे हैं! चोरों ने दो रखवालों को तो मार डाला है। महाराज, अब आप ही इसका कोई इलाज कीगजए। कोई रास्ता ददखाइये।" क्षेिपाल बोले, "भैया! आज से तुम्हें कोई गचन्ता नहकर करनी है। खेत में एक मचान बंधवा लो और वहां एक बांस िाड़ दो। दिर देखते रहो।" क्षेिपाल ने जो कहा, सो दकसान ने कर ददया। शाम हुई। क्षेि​िल तो एक गचगड़या का रूप रखकर बांस पर बैठ िए। आधी रात हुई चोर आए। चोर चारों ओर घूमने-दिरने लिे। इसी बीच गचगड़या बोली: ओ, घूमते-दिरते चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोर चौंके । बोले, "अरे यह कौन बोल रहा है?" इधर-उधर देखा, तो कोई ददखाई नहकर पड़ा। चोरों ने भुट्टे काटना शुरू कर ददया। तभी गचगड़या दिर बोली: ओ, काटने-वाटने वालों चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोरों ने चारों तरि देखा, पर कोई ददखाई नहकर पड़ा। उन्होंने भुट्टों की िठरी बांध ली। गचगड़या दिर बोली ओ, बांधने-वाधने वाले चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोर इधर-उधर देखने लिे। उन्होंने गचगड़या को बोलते देख गलया। पत्थर िें क-िें ककर वे उसे मारने लिे। इस पर गचगड़या बोली: ओ, मारने वाले चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोरों ने बांस पर बैठी गचगड़या को नीचे उतार गलया। नीचे उतरते-उतरते गचगड़या दिर बोली: ओ, उतारने वाले चोरो! 1


तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोर गचगड़या पर टूट-पड़े और उसे पीटने लिे। गचगड़या दिर बोली: ओ पीटने वाले चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। इस पर चोर इतने िुस्सा हुए दक वे गचगड़या को काटने लिे। गचगड़या दिर भी बोली: ओ काटने वाले चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। चोरों ने आि जलाई और गचगड़या को भूनने लिे। गचगड़या बोली: ओ, भुनने वाले चोरो! तीन लोक का टीपना और तीसरा रखवाला। दिर सब चोर खाने बैठे। ज्यों ही उन्होंने गचगड़या के टुकड़े मुंह में रखे, गचगड़या दिर बोली: ओ, खाने वाले चोरो! तीन लोक को टीपना और तीसरा रखवाला। चोर बोले, "बाप रे , यह तो बड़े अचम्भे की बात है! जरूर यह कोई भूत-प्रेत होिा।! चोर इतने डर िए दक अपना सबकु छ वहकर छोड़कर भाि खड़े हुए। उसके बाद दिर चोर कभी आए ही नहकर। दकसान के खेत में ज्वार खूब पकी। अच्छी िसल हुई।

2. बावला-बावली एक था बावला, एक थी बावली। ददन भर लकड़ी काटने के बाद थका-मांदा बावला शाम को घर पहुंचा और उसने बावली से कहा, "बावली! आज तो मैं थककर चूर-चूर हो िया हं। अिर तुम मेरे गलए पानी िरम कर दो, तो मैं नहा लूं, िरम पानी से पैर सेक लूं और अपनी थकान उतार लूं।" बावली बोली, "वाह, यह तो मैं खुशी-खुशी कर दूंिी। देखो, वह हंडा पड़ा है। उसे उठा लाओ। बावले ने हंडा उठाया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब पास के कुं ए से इसमें पानी भर लाओ।" बावला पानी भरकर ले आया। दिर पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडे को चूल्हे पर रख दो।" बावले ने हंडा चूल्हे पर रख ददया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब लकड़ी सुलिा लो।" बावले ने लकड़ी सुलिा ली और पूछा, "अब क्या करूं?" 2


बावली बोली, "बस, अब चूल्हा िूं कते रहो। बावले ने िूं क-िूं ककर चूल्हा जला गलया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडा नीचे उतार लो।" बावले ने हंडा नीचे उतार गलया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडे को नाली के पास रख लो।" बावले ने हंडा नाली के पास रख गलया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली,"अब जाओ और नहा लो।" बावला नहा गलया। उसने पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडा हंडे की जिह पर रख दो।" बावले ने हंडा रख गलया और दिर अपने सारे बदन पर हाथ िे रता-िे रता वह बोला, "वाह, अब तो मेरा यह बदन िू ल की तरह हल्का हो िया है। तुम रोज़ इस तरह पानी िरम कर ददया करो तो दकतना अच्छा हो।" बावली बोली, "मुझे इसमें क्या आपगि हो सकती है। सोचो, इसमें आलस्य दकसका है?" बावली बोली, "बहुत अच्छा! तो अब तुम सो जाओ।"

3. सूप से कानवाला राजा एक राजा था। एक ददन वह गशकार खेलने गनकला। गशकार का पीछा करते-करते वह बहुत दूर गनकल िया, पर गशकार हाथ लिा नहकर। शाम हो आई। भूख भी जोर की लिी। राजा रास्ता भूल िया था, इसगलए वापस अपने महल नहकर जा सकता था। भूख की बात सोचता-सोचता वह एक बरिद के नीचे जा बैठा। जहां बैठे-बैठे उसकी गनिाह गचड़ा-गचड़ी के एक जोड़े पर पड़ी। उसे जोर की भूख लिी थी, इसगलए उसने गचड़ा-गचड़ी को मारकर खा जाने की बात सोची। बेचारे गचड़ा-गचड़ी चुपचाप अपने घोंसले में बैठे थे। राजा ने उन्हें पकड़ा, उनकी िरदन मरोड़ी, और उन्हें भूनकर खा िया। इससे राजा को बहुत पाप लिा, और तुरन्त राजा के कान सूप की तरह बड़े हो िये। राजा िहरे सोच में पड़ िया। अब क्या दकया जाय? वह रात ही में चुपचाप अपने राजमहल में पहुंच िया, और दीवान को बुलाकर सारी बात कह दी। दिर कहा, "सुगनए दीवानजी। आप यह बात दकसी से कगहए मत। और दकसी को यहां इस सातवकर मंगज़ल पर आने भी मत दीगजए।" दीवान बोला, "जी, ऐसा ही होिा।" दीवान ने दकसी से कु छ कहा नहकर। इसी बीच जब राजा की हजामत बनाने का ददन आया, तो राजा ने कहा, "गसि​ि नाई को ऊपर आने दीगजए।" 3


अके ला नाई सातवकर मंगज़ल पर पहुंचा। नाई तो राजा के सूप-जैसे कान देखकर िहरे सोच में पड़ िया। राजा ने कहा, "सुनो, धन्ना! अिर मेरे कान की बात तुमने दकसी से कही, तो मैं तुमको कोल्ह में डालकर तुम्हारा तेल गनकलवा लूंिा। समझ लो दक मैं तुमको गजन्दा नहकर छोड़ूंिा।" नाई ने हाथ जोड़कर कहा, "जी, महाराज! भला, मैं क्यों दकसी को कहने लिा!" लेदकन नाई के पेट में बात कै से पचती! वह इधर जाता और उधर जाता, और सोचता दक बात कहं, तो दकससे कहं? आगखर वह शौच के गलए गनकला। बात तो उसके पेट में उछल-कू द मचा रही थी - मुंह से बाहर गनकलने को बेताब हो रही थी। आगखर नाई ने जंिल के रास्ते में पड़ी एक लकड़ी से कहा: राजा के कान सूप-से, राजा के काम सूप-से। लकड़ी ने बात सुन ली। वह बोली: राजा के कान सूप से, राजा के कान सूप-से। उसी समय वहां एक बढ़ई पहुंचा। लकड़ी को इस तरह बोलते देखकर बढ़ई िहरे सोच में पड़ िया। उसने गवचार दकया दक क्यों न मैं इस लकड़ी के बाजे बनाऊं और उन्हें अपने राजा को भेंट करूं ? राजा तो खुश हो जायिा। बढ़ई ने उस लकड़ी से एक तबला बनाया, एक सारंिी बनाई और एक ढोलक बनाई। जब वह इन को लेकर राजमहल में पहुंचा, तो राजा ने कहलवाया--"महल के गनचले भाि में बैठकर ही अपने बाजे बजाओ।" बढ़ई ने बाजे गनकाल कर बाहर रखे। तभी तबला बजने लिा: राजा के कान सूप-से, राजा के कान सूप-से। इस बीच अपनी बारीक आवाज में सारंिी बजने लिी: तुझको दकसने कहा? तुझको दकसने कहा। तुरन्त ढोलक आिे बढ़ी और ढप-ढक करके बोलने लिी: धन्ना नाई ने कहा, धन्ना नाई ने कहा। राजा सबकु छ समझ िया। उसने बढ़ई को इनाम देकर रवाना दकया और उसके बनाए सब बाजे रख गलए, गजससे दकसी को इस भेद का पता न चले। बाद में राजा ने धन्ना नाई को बुलाया और पूछा, "क्यों रे,धन्ना! सच-सच कह, तूने बात दकसको कही थी? नाई बोला, "महाराज, बात तो दकसी से नहकर कही, पर मेरे पेट में बहुत दकलगबलाती रही, इसगलए मैंने एक लकड़ी को कह दी थी।" राजा ने नाई को राजमहल से गनकलवा ददया और पछताने लिा दक उसने एक नाई को इस बात की जानकारी क्यों होने दी।

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4. सोनबाई और बिुला एक थी सोनबाई। बड़ी सुन्दर थी। एक बार सोनबाई अपनी सहेगलयों के साथ गमट्टी लेने िई। जहां सोनबाई खोदती, वहां सोना गनकलता और जहां उसकी सहेगलयां खोदतकर, वहां गमट्टी गनकलती। यह देखकर सब सहेगलयों के मन में सोनबाई के गलए ईर्षयाि पैदा हो िई। सब सहेगलयों ने अपना-अपना टोकरा गसर पर उठाया और सोनबाई को अके ली ही छोड़कर चली िईं। सोनबाई ने अके ले-अके ले अपना टोकरा अपने गसर पर रखने की बहुत कोगशश की, पर वह टोकरे को दकसी भी तरह चढ़ा नहकर पाई। इसी बीच उधर से एक बिुला गनकला। सोनबाई ने कहा, "बिुला भाई, बिुला भाई! यह टोकरा मेरे गसर पर रखवा दो।" बिुला बोला, "अिर तुम मुझसे ब्याह कर लो, तो मैं यह टोकरा गसर पर रखवा दूं।" सोनबाई ने "हां" कहा और बिुले ने टोकरा गसर पर रखवा ददया। टोकरा लेकर सोनबाई अपने घर की तरि चली। बिुला उसके पीछे-पीछे चला। घर पहुंचकर सोनबाई ने अपनी मां से सारी बात कह दी। मां ने कहा, "अब तुम घर के बाहर कहकर जाना ही मत। बाहर जाओिी, तो बिुला तुमको ले भािेिा।" बाहर खड़े हुए बिुले ने यह बात सुन ली। उसको बहुत िुस्सा आया। उसने सब बिुलों को बुला गलया और उनसे कहा, "इस नदी का सारा पानी पी डालो।" इतना सुनते ही सारे बिुले पानी पीने लिे और थोड़ी ही देर में नदी सूख िई। दूसरे ददन जब सोनबाई के गपता अपनी भैंसों को पानी गपलाने के गलए नदी पर पहुंचे , तो देखा दक नदी में तो कं कर-ही-कं कर रह िए हैं! उन्होंने नदी के दकनारे खड़े हुए बिुले से कहा: पानी छोड़ो बिुले भैया! पानी छोड़ो बिुले भैया! घुड़साल में घोड़े प्यासे हैं। नोहरे में िायें प्यासी हैं। बिुले ने कहा, "अपनी बेटी सोनबाई का ब्याह आप मुझसे कर देंिे तो मैं पानी छोड़ दूंिा।" सोनबाई के गपता ने बिुले की बात मान ली, और बिुले ने नदी में पानी छोड़ ददया। नदी दिर पहले की तरह कल-कल, छल-छल करके बहने लिी। सोनबाई का ब्याह बिुले के साथ हो िया। सोनबाई को अपने पंखों पर बैठाकर बिुला उसे अपने घर ले आया। दिर सोनबाई और बिुला दोनों एक साथ रहने लिे। बिुला स्वयं दाना चुि आता था और अपने साथ सोनबाई के गलए भी दाना ले आता था। ऐसा होते-होते एक ददन सोनबाई के एक लड़का हुआ। सोनबाई की खुशी का कोई ठठकाना न रहा! एक ददन सोनबाई के गपता ने सोचा - दकसी को भेजकर पता तो लिवाऊं दक सोनबाई के भाई को भेजा। भाई सोनबाई के पास पहुंचा। भाई-बहन दोनों गमले खूब खुश हुए। इतने में बिुले के चुिकर वापस आने का समय हो िया। 5


सोनबाई ने कहा, "भैया! तुम रजाइयों वाली इस कोठरी में गछप जाओ। बिुला ऐसा खूंखार है दक तुमको देख लेिा, तो मार डालेिा।" भाई कोठरी में गछप िया। सोनबाई ने दो गपल्ले पाल रखे थे। उनमें से एक को चक्की के नीचे गछपा ददया और दूसरे को झाड़ू से बांधकर घर में रखा। दिर वह दरवाजे के पास जाकर उसकी आड़ में बैठ ियी। इसी बीच बिुला आया और बोला, "दरवाज़ा खोलो।" सोनबाई तो कु छ बोली नहकर, लेदकन सोनबाई का लड़का बोला: बाबा, बाबा! मामा गछपे हैं कोठरी में। छोटा गपल्ला बैठा है चक्की के नीचे। बड़ा गपल्ला बंधा है झाड़ू से। बाहर खड़ा बिुला बोला, "सोनबाई! यह मुन्ना क्या कह रहा है?" सोनबाई ने कहा, "यह तो योंही बड़-बड़ कर रहा है।" इतने में लड़का दिर बोला: बाबा, बाबा! मामा गछपे हैं कोठरी में। छोटा गपल्ला बैठा है चक्की के नीचे। बड़ा गपल्ला बंधा है झाड़ू से। बिुला बोला, "दरवाजा खोलो।" लेदकन सोनबाई ने दरवाजा नहकर खोला। बिुला दिर चुिने चला िया। बाद में मामा कोठरी से बाहर गनकला और सोनबाई अपने लड़के को लेकर उसके मायके चली ियी। जब बिुला घर लौटा,तो उसने देखा, वहां कोई नहकर है।

5. आमने-सामने की खी ंचातानी एक था बगनया। नाम था, वीरचन्द। िांव में रहता था। दुकान चलाता था और उससे अपना िुजर-बसर कर लेता था। िांव में काठठयों और कोगलयों के बीच झिड़े चलते रहते थे। पीदढ़यों पुराना बैर चला आ रहा था। एक ददन काठठयों के मन खकरचकर गबिड़े और कोगलयों को ताव आ िया। बीच बाजार में तलवारें खकरचकर लोि आमने-सामने खड़े हो िए। काठी ने अपनी खुखड़ी गनकाल ली और कोली पर हमला दकया। कोली पीछे हट िया और काठी पर झपटा। एक बार में काठी का गसर धड़ से अलि हो िया। तलवार खून से नहा ली। मार-काट देखकर बगनया बुरी तरह डर िया और अपनी दुकान बंद करके घर के अन्दर दुबककर बैठ िया। बैठा-बैठा सबकु छ देखता रहा और थर-थर कांपता रहा। लोि पुकार उठे —दौड़ो-दौड़ो, काठी मारा िया है। चारों तरि से गसपाही दौड़े आए। िांव के मुगखया और चौधरी भी आ िए। सबने कहा, "यह तो रघु कोली का ही वार है। दूसरे दकसी की यह ताकत नहकर।" लेदकन अदालत में जाना हो, तो गबना िवाह के काम कै से चले? 6


दकसी ने कहा, "वीरचन्द सेठ दुकान में बैठे थे। ये ही हमारे िवाह हैं। देखा, न देखा, ये जानें। पर अपनी दुकान में बैठे तो थे।" बगनया पकड़ा िया और उसे थानेदार के सामने हागजर दकया िया। थानेदार ने पूछा, "बोल बगनये! तू क्या जानता है?" बगनये ने कहा, "हुजूर, मैं तो कु छ भी नहकर जानता। अपनी दुकान में बैठा मैं तो बही खाता गलखने में लिा था।" थानेदार बोला, "तुझे िवाही देनी पड़ेिी। कहना पड़ेिा दक मैंने सबकु छ अपनी आंखों से देखा है।" बगनया परेशान हो िया। गसर गहलाकर घर पहुंचा। रात हो चुकी थी। पर नकरद नहकर आ रही थी। बगनया सोचने लिा—‘यह बात कहंिा, तो कोगलयों के साथ दुश्मनी हो जायिी, और यह कहंिा, तो काठी मेरे पीछे पड़ जायिे। कु छ बगनये की अक्ल से काम लेना होिा।’ बगनये को एक बात सूझी ओर वह उठा। ढीली धोती, गसर पर पिड़ी और कं धे पर चादर डालकर वीरचन्द चल पड़ा। एक काठी के घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। काठी ने पूछा, "सेठजी! क्या बात है? क्या बात है? इतनी रात बीते कै से आना हुआ?" बगनये ने कहा, "दादाजी! िांव के कोली पािल हो उठे हैं। कहां जाता है दक आज उन्होंने एक खून कर ददया! पता नहकर कल क्या कर बैठेंिे? कल का कलं देखा जायिा।" बगनये की बात सुनकर दादाजी खुश हो िए और उन्होंने बगनये के हाथ में सौ रुपये रख ददए। कमर में रुपए बांधकर बगनया कोली के घर पहुंचा। कोली ने पूछा, "सेठजी! इस समय कै से आना हुआ? क्या काम आ िया?" बगनये ने कहा, "काम क्या बताऊं? अपने िांव के ये काठी बहुत बावले हो उठे हैं। एक को खत्म करके ठीक ही दकया है। धन्य है कोली, और धन्य है, कोली की मां!" सुनकर कोली खुश हो िया। उसने बगनये को दस मन बाजरा तौल ददया। बगनया घर लौटा और रात आराम से सोया। सोते-सोते सोचने लिा- ‘आज कोली और काठी को तो लूट गलया, अब कल अदालत को भी ठिना है।’ दूसरे ददन मुकदमा शुरू हुआ। न्यायाधीश ने कहा, "बगनये! बोल, जो झूठ बोले, उसे भिवान तौले।" बगनये ने कहा, "जो झूठ बोले, उसे भिवान तौले।" न्यायधीश ने पूछा, "बगनये! बोल, खून कै से हुआ और दकसने दकया?" बगनये ने कहा, "साहब, इधर से काठी झपटे और उधर से कोली कू दे।" "दिर क्या हुआ?" "दिर वही हुआ।" "लेदकन वही क्या हुआ?" "साहब! यही दक इधर से काठी झपटे और उधर से कोली कू दे।" "लेदकन दिर क्या हुआ?" 7


"दिर तो आमने-सामने तलवारें लखंच िईं और मेरी आंखें गमच िईं।" इतना कहकर बगनया तो भरी अदालत के बीच धम्म से गिर पड़ा और बोला, "साहब, बगनये न कभी खून की बूंद भी देखी है? जैसे ही तलवारें आमने-सामने लखंचकर, मुझे तो चक्कर आ िया और मेरी आंखें तभी खुलकर, जब गसपाही वहां आ पहुंचे।" न्यायाधीश ने कहा, "सुन, एक बार दिर अपनी सब बातें दोहरा दे।" बगनया बोला: इधर से काठी झपटे। उधर से कोली कू दे। आमने-सामने तलवारें लखंच िईं। और मेरी आंखें गमच िईं। न्यायाधीश ने बगनये को तो गवदा कर ददया, लेदकन समझ नहकर पाए दक काठी का खून दकसने दकया है। मुक़दमा खाठरज हो िया।

6. कुत्ता और चीता एक था कु िा। एक था चीता। दोनों में दोस्ती हो िई। कु िे का अपना घर नहकर था, इसगलए वह चीते के घर में रहता था। कु िा चीते के घर रहता था, इसगलए चीता उससे काम करवाता था और उसे नौकर की तरह रखता था, चौमासा आया। चीते ने कहा, "कु िे भैया! आओ हम बांगबया देखने चलें। देखें दक इस बार बांगबयों में दकतनी और कै सी-कै सी चीठटयां उमड़ी हैं।" दोनों बांगबयों के पास पहुंचे। देखा दक वहां तो अनगिनत चीठटयों और कीड़ों-मकोड़ों की कतारें लिी थकर। दोनों ने अंजली भर-भरकर चीठटयां और कीड़े-मकोड़े इकट्ठा कर गलए और उनको घर ले आए। चीते की घरवाली ने इनकी बदढ़या गमठाई बनाई और सबने जी भर खाई। बची हुई गमठाई सुखा ली िई। खा-पीकर दोनों दोस्त आराम करने बैठे। चीते ने कहा, "कु िे भैया! यह सुखाई हुई गमठाई मुझे अपनी ससुराल पहुंचानी है। तुम इसकी चार छोटी-छोटी पोटगलयां तैयार कर लो।" कु िे ने चार छोटी-छोटी पोटगलयां बांध लकर। ठाठ-बाट के साथ चीता तैयार हो िया। हाथ में सारंिी ले ली और वह िाता-बजाता ससुराल चल पड़ा। कु िे से कहा, "तुम ये पोटगलयां उठा लो।" आिे-आिे चीता और पीछे-पीछे कु िा। रास्ते में जो भी गमलता, सो पूछता, "चीते भैया, कहां जा रहे हो? कु िे भैया, कहां जा रहे हो?" चीता कहता, "मैं अपनी ससुराल जा रहा हं।" कोई कहता, "चीते भैया! ज़रा अपनी यह सारंिी तो बजाओ।" और चीता सारंिी बजाकर िाने लिता: कु िे भैया के गसर पर बह की गसरनी। कु िे भैया के गसर पर बह की गसरनी। चीता तो मस्त होकर िाता, और इधर कु िे का जी जलता रहता। आगखर कु िे भैया को िुस्सा आ िया। उसने कहा, "चीते भैया! मैं यहां थोड़ी देर के गलए रुकता हं। आप आिे चगलए। मैं अभी आया।" चीते भैया आिे बढ़ िए। 8


कु िे ने पोटगलयां खोलकर ओर सारी गमठाई खा डाली। दिर घास भरकर पोटगलयां बना लकर और कदम बढ़ाते हुए चीते भैया के पास पहुंचकर उसके साथ-साथ चलने लिा। कु छ देर के बाद कु िे ने कहा, "चीते भैया! अपनी यह सारंिी मुझे दे दो? मन होता है दक मैं भी थोड़ा-सा िा लूं और बजा लूं।" कु िे ने सारंिी हाथ में लेकर िाना शुरू दकया: अपने ससुर के गलए, मैं घास-पान लाया हं। अपने ससुर के गलए, मैं घास-पान लाया हं। चीता बोला, "वाह कु िे भैया! आपका िाना तो बहुत बदढ़या रहा!" कु िे ने कहा, "भैया, यह तो तुम्हारी ही मेहरबानी है दक मैं इतना अच्छा िा-बजा लेता हं। मैंने यह सब तुम्हकर से तो सीखा है न?" चीता िाते-बजाते अपनी ससुराल पहुंचा। ससुराल वालों ने सबके कु शल समाचार पूछे। चीते ने भी अपनी तरि से सबकी राज़ी-खुशी पूछी। चीता तो जमाई बनकर आया था। उसका अपना अलि ठाठ था। वहां कु िे को भला कौन पूछता? सास ने जमाई को बड़े प्रेम के साथ हुक्का ददया। चीता बैठा-बैठा हुक्का िुड़िुड़ाने लिा। कु िे को दकसी ने पूछा तक नहकर। कु छ देर बाद सबकी नजर बचाकर कु िा बाहर गनकल आया और दौड़ते हुए अपने घर की तरि चल पड़ा। हुक्का िुड़िुड़ाते हुए जमाई ने हंसते-हंसते कहा, "आप सबके गलए मैं यह गमठाई लाया हं। बहुत बदढ़या है। सास ने खुशी-खुशी पोटली खोली। ससुर भी आंख िड़ाकर देखते रहे। जब पोटली खुली, तो देखा दक उसमें गमठाई के बदले घास भरी है। घास देखकर चीता आि-बबूला हो उठा और कु िे को खोजने लिा। लेदकन कु िा तो बहुत पहले ही नौ-दो ग्यारह हो चुका था। चीते ने बाहर गनकलकर एक सयाने आदमी से पूछा, "बाबा, कु िे को कै से पकड़ा जाय?" उसने कहा, "ढोल बजाकर नाचना शुरू करो, तो नाच देखने के गलए कु िा भी आ जायिा।" चीते ने ढोल बजाकर नाच शुरू दकया। िाय, भैंस, भेड़ सारे जानवर इकट्ठा हो िए। लेदकन कु िे के मन में तो डर था। उसने सोचा-अिर मैं िया, तो चीता मुझे गजन्दा नहकर छोड़ेिा। दूसरा ददन हुआ। भेड़ ने कु िे से नाच की बात कही। कु िे के मन में नाच देखने की इच्छा बढ़ ियी। लेदकन नाच देखे कै से? भेड़ ने कहा, "मैं तुमको अपनी पूंछ में गछपाकर ले चलूंिी। चीता तुमको कै से देख सके िा?" तीसरे ददन दिर ढोल बजने लिे और नाच शुरू हुआ। भेड़ की पूंछ में गछपकर कु िा नाच देखने चला। चीता तो कु िे को चारों ओर खोजता ही रहता था, पर कु िा कहकर ददखायी नहकर पड़ता था। इससे चीता गनराश हो िया। अिली रात को दिर ढोल बजवाए और नाच शुरू करवाया। भेड़ की पूंछ में गछपकर कु िा दिर नाच देखने पहुंचा। ढोल जोर-जोर से बजने लिा। नाच का जोर भी खूब बढ़ िया। सब जानवर अपनी पूंछें गहला-गहलाकर नाचने लिे। भेड़ की पूंछ में तो कु िा गछपा था। भेड़ भला कै से नाचती, और कै से आपनी पूंछ गहलाती? लेदकन नाच का जोर इतना बढ़ा और ढोल भी इतने जोर-जोर से बजने लिा दक भेड़ से रहा नहकर िया। वह भी अपनी पूंछ गहला-गहलाकर नाचने लिी। कु िा पूंछ में से गनकलकर बाहर आ गिरा। कु िे ने सोचा, ‘अब मरे!’ वह िौरन ही उठकर भािा और एक आदमी की आड़ में गछप िया। चीते ने िुस्से में भेड़ को मार डाला और एक आदमी दिर वह कु िे को मारने जो दौड़ा तो आदमी ने अपना लाठी तान ली। 9


चीते ने कहा, "अच्छी बात है, कु िे भैया! कभी कोई मौक़ा गमलने दो। दकसी ददन तुमको अके ला देखि ूं ा, तो मारकर खा ही जाऊंिा।" उस ददन से कु िे और चीते के बीच दुश्मनी चली आ रही है। कु िा चीते को देखकर भाि खड़ा होता है। कु िों ने जंिल में रहना छोड़ ददया है, और तबसे लेकर अब तक वह आदमी के ही साथ रहने लिा है।

7. खड़बड़-खड़बड़ खोदते है एक ब्राह्मण था। बड़ा ही ग़रीब था। एक बार उसकी घरवाली ने उससे कहा, "अच्छा हो, आप कोई कामधन्धा शुरू करें। अब तो बच्चों को कभी-कभी भूखे सोना पड़ता है।" ब्राह्मण बोला, "लेदकन मैं करूं क्या? मुझे तो कु छ भी नहकर आता। कोई रास्ता सुझाओ।" ब्राह्मणी पढ़ी-गलखी और समझदार थी। उसने कहा, "सुगनए, यह एक श्लोक में आपको रटवाये देती हं। आप इसे दकसी राजा को सुनायंिे, तो सुन सुनकर वह आपको कु छ पैसा जरूर देंिे। श्लोक भूगलए मत।" ब्राह्मणी ने ब्राह्मण को श्लोक याद करवा ददया। ब्राह्मण श्लोक बोलता-बोलता दूर की यािा पर गनकल पड़ा। रास्ते में नदी गमली। नहाने-धोने और खाने-पीने के गलए ब्राह्मण वहां रूक िया। जब उसका मन नहाने-धोने में लिा, तो वह अपनी घरवाली का गसखाया हुआ श्लोक भूल िया। वह श्लोक को याद करने लिा, पर कु छ भी याद नहकर आया। इसी बीच उसने देखा दक एक जल-मुिी नदी-दकनारे कु छ खोद रही है। श्लोक को याद करते-करते जब उस जलमुिी को खोदते देखा, तो उसके मन में एक नया चरण उजािर हुआ। वह बोलने लिा: खड़बड़-खड़बड़ खोदत है। जब ब्राह्मण ‘खड़बड़-खड़बड़ खोदत है’ बोलने लिा, तो उसकी आवाज सुनकर जलमुिी अपनी िरदन लम्बी करके देखने लिी। यह देखकर ब्राह्मण के मन में दूसरा चरण उभरा। वह बोला: लम्बी िरदन देखत है। ब्राह्मण जब दूसरी बार बोला, तो जलमुिी मारे डर के चुपचाप गछप िई। यह देखकर ब्राह्मण के मन में तीसरा चरण जन्मा। उसने कहा: उकड़ू मुकडू बैठत है। ब्राह्मण की आवाज़ सुनकर जलमुिी तेजी से दौड़ी और पानी में कू द पड़ी। इस दूश्य को देखकर ब्राह्मण के मन में चौथा चरण उठा। वह बोला: सरसर सरसर दौड़त है। ब्राह्मण पहला श्लोक तो भूल चुका था, पर अब उसे यह नया श्लोक याद हो िया था। यह मानकर दक यही श्लोक उसे गसखाया िया है, इस श्लोक को दोहराता वह आिे बढ़ा: खड़बड़-खड़बड़ खोदत है। लम्बी िरदन देखत है। उकड़ू मुकड़ू बैठत है। सरसर सरसर दौड़त है। 10


चलते चलते वह एक निर में पहुंचा। वह निर के राजा के दरबार में िया और सभा में जाकर उसने अपना श्लोक सुना ददया। राजा ने यह गवगचि और नया श्लोक गलख गलया। श्लोक का अथि न राजा की समझ में आया, और न दरबाठरयों में से ही दकसी की समझ में आया। यह देखकर राजा ने ब्राह्मण से कहा, "महाराज! दो-चार ददन के बाद आप दिर दरबार में आइए। अभी हमारे मेहमान-घर में खा-पीकर आराम से रगहए। हम आपको आपके इस श्लोक का जवाब देंि।े " राजा ने ब्राह्मण का यह श्लोक अपने सोने के कमरे में गलखवा गलया। राजा श्लोक का अथि लिाने के गलए रोज रात बारह बजे जािता और रात के सुनसान में अके ला बैठकर श्लोक का एक-एक चरण बोलता और उसके अथि पर गवचार करता रहता। एक रात की बात है। चार चोर राजा के महल में चोरी करने आए। राजमहल के पास पहुंचकर वहां से खोदने लिे। रात के ठीक बारह बजे थे। उस समय राजा श्लोक के पहले चरण के बारे में सोच रहा था। उधर चोर खोदने के काम में लिे थे। राजा की बात उनके कानों तक पहुंची: खड़बड़-खड़बड़ खोदत है। चोरों ने सोचा दक राजा जाि रहा है और खोदने की आवाज सुन रहा है। इसगलए चोरों में से एक चोर राजमहल की गखड़की पर चढ़ा और उस बात का गनश्चय करने के गलए दक राजा जाि रहा है या नहकर, वह लम्बी िरदन करके कमरे में देखने लिा। ठीक इसी समय राजा ने दूसरा चरण दोहराया: लम्बी िरदन देखत है। यह सुनकर गखड़की में से देखने वाले चोर को गवश्वास हो िया दक राजा जाि रहा है। यही नहकर उसने उसकी लम्बी िरदन को भी देख गलया है। इसगलए वह तेजी से नीचे उतर िया और उसने अपने सागथयों को इशारे से कहा दक सब चुपचाप बैठ जायं। सब गसमटकर चुपचाप बैठ िए। इसी बीच राजा ने तीसरा चरण दोहराया: उकड़ू-मुकड़ू बैठत है। सुनकर चोरों ने सोचा दक अब भािना चागहए। राजा को पता चल िया है और वह हमें देख भी रहा है। अब हम जरूर पकड़े जायेंिे और मारे भी जायंिे। सब डरकर एक साथ दौड़े। इतने में राजा ने चौथा चरण दोहराया: ये चोर तो राजा के दरबान ही थे। ये ही राजमहल के चौकीदार भी थे। इनकी नीयत खराब हो िई थी, इसगलए चोरी करने गनकल पड़े। चोर तो भािकर अपने घर पहुंच िए। लेदकन जब दूसरे ददन दरबार िए तो वे सलामी के गलए राजा के सामने हागजर नहकर हुए। उनको पक्का भरोसा हो िया था दक राजा सबकु छ जान िए हैं और उन्होंने उनको पहचान भी गलया है। जब दरबान सलामी के गलए नहकर आए, तो राजा ने पूछा, "आज दरबान सलामी के गलए क्यों नहकर आए? उनके घर कोई बीमार तो नहकर है?" राजा ने दूसरे गसपागहयों से कहा दक वे दरबानों को बुला लाएं। दरबान आए तो राजा को सलाम करके खड़े हो िए। राजा ने पूछा, "कगहए, आज आप लोि दरबार में हागजर क्यों नहकर हुए?"

11


दरबान तो थरथर कांपने लिे। उनको भरोसा था ही दक राजा सारी बात जान चुके हैं। यह सोचकर दक अिर झूठ बोलेंि,े तो ज्यादा सजा भुितनी होिी—उन्होंने रातवाली सारी बात सही-सही सुना दी। बात सुनकर राजा को तो बहुत ही अचम्भा हुआ। उसने सोचा दक यह सारा प्रताप तो ब्राह्मण के उस श्लोक का ही है। श्लोक तो बड़ा ही चमत्कारी गसद्ध हुआ! राजा ब्राह्मण पर बहुत प्रसन्न हो िया। उसने ब्राह्मण को बुलाया और भरपूर इनाम देकर गवदा दकया।

8. हंस और कौआ एक सरोबर था, समन्दर जैसा बड़ा। उसके दकनारे बरिद का एक बहुत बड़ा पेड़ था। उस पर एक कौआ रहता था। कौआ तो काजल की तरह काला था, काना था और लंिड़ा था। कौआ कांव-कांव बोला करता था। जब वह उड़ता था, तो लिता था दक अब गिरा, अब गिरा। दिर भी उसके घमण्ड की तो कोई सीमा नहकर थी। वह मानता था दक उसकी तरह तो कोई उड़ ही नहकर सकता, न कोई उसकी तरह बोल ही सकता है। कौआ लालबुझक्कड़ बनकर बैठता और सब कौओं को डराता रहता। एक बार वहां कु छ हंस आए। आकर बरिद पर रात भर रहे। सबेरा होने पर कौए ने हंसों को देखा। कौआ िहरे सोच में पड़ िया—‘भला ये कौन होंिे? ये नए प्राणी कहां के हैं?" कौए ने अपनी गजन्दिी में हंस कभी देखे होते तो वह उनको पहचान पाता? उसने अपना एक पंख घुमाया, एक टांि उठाई और रौब-भरी आवाज़ में पूछा, "आप सब कौन हैं? यहां क्यों आए हैं? गबना पूछे यहां क्यों बैठे हैं?" हंस ने कहा, "भैया! हम हंस हैं। घूमते-दिरते यहां आ िए हैं। थोड़ा आराम करने के बाद आिे बढ़ जायेंिे।" कौआ बोला, "सो तो मैंने सब जान गलया, लेदकन अब यह बताओ दक आप कु छ उड़ना भी जानते हैं या नहकर? या अपना शरीर योंही इतना बड़ा बना गलया है।" हंस ने कहा, "हां, हां उड़ना तो जानते हैं, और कािी उड़ भी लेते हैं।" कौए ने पूछा, "आप कौन-कौन-सी उड़ानें जानते हैं? अपने राम को तो इक्कावन उड़ाने आती हैं।" हंस ने कहा, "इक्कावन तो नहकर, लेदकन एकाध उड़ान हम भी उड़ लेते हैं।" कौआ बोला, "ओहो, एक ही उड़ान! अरे, इसमें कौन-सी बड़ी बात है?" हंस ने कहा, "हम तो बस इतना ही जानते हैं।" कौआ बोला, "कौए की बराबरी कभी दकसी ने की है? कहां इक्कावन, और कहां एक? कौआ तो कौआ है ही, और हंस हंस हैं!" हंस सुनते रहे। वे मन-ही-मन हंसते भी रहे। लेदकन उन हंसों में एक नौजवान हंस भी था। उसके रहा नहकर िया। उसका खून उबल उठा। वह बोला, "कौए भैया! अब तो हद हो िई। बेकार की बकवास क्यों करते हो?

12


आओ हम कु छ दूर उड़ लें। लेदकन पहले तुम हमें अपनी इक्कावन उड़ानें तो ददखा दो! दिर हम भी देखेंिे, और हमें पता चलेिा दक कै से कौआ, कौआ है, और हंस, हंस हैं।" हंस बोला, "लो देखो।" हंस ने कहा, "ददखाओ।" कौए ने अपनी उड़ाने ददखाना शुरू दकया। एक गमनट के गलए वह ऊपर उड़ा और बोला, "यह हुई एक उड़ान।" दिर नीचे आया और बोला, "यह दूसरी उड़ान।" दिर पिे-पिे पर उड़कर बैठा और बोला , "यह तीसरी उड़ान।" बाद में एक पैर से दागहनी तरि उड़ा और बोला, "यह चौथी उड़ान।" दिर बाईं तरि उड़ा और बोला, "यह पांचवकर उड़ान।" कौआ अपनी ऐसी उड़ानें ददखाता िया। पांच, सात, पन्रह बीस, पच्चीस, पचास और इक्कावन उड़ानें उसने ददखा दकर। हंस तो टकटकी लिाकर देखते और मन-ही-मन हंसते रहे। इक्कावन उड़ानें पूरी करने के बाद कौआ मस्कराते-मुस्कराते आया और बोला, "कगहए, कै सी रही ये उड़ानें! हंसो ने कहा, "उड़ानें तो ग़जब की थकर! लेदकन अब आप हमारी भी एक उड़ान देखि ें े न?" कौआ बोला, "अरे, एक उड़ान को क्या देखना है! यों पंख िड़िड़ाए, और यों कु छ उड़ गलए, इसमें भला देखना क्या है?" हंसों ने कहा, "बात तो ठीक है, लेदकन इस एक ही उड़ान में हमारे साथ कु छ दूर उड़ना हो, तो चलो। उड़कर देख लो ज़रा। तुम्हें पता तो चलेिा दक यह एक उड़ाने भी कै सी होती है?" कौआ बोला, "चलो, मैं तो तैयार हं। इसमें कौन, कोई शेर मारना है।" हंस ने कहा, "लेदकन आपको साथ ही में रहना होिा। आप साथ रहेंिे, तभी तो अच्छी तरह देख सकें िे न?" कौआ बोला, "साथ की क्या बात है? मैं तो आिे उड़ूंिा। आप और क्या चाहते हैं?" इतना कहकर कौए ने िटािट पंख िड़िड़ाए और उड़ना शुरू कर ददया। गबलकु ल धीरे -धीरे पंख िड़िड़ाता हुआ हंस भी पीछे-पीछे उड़ता रहा। इस बीच कौआ पीछे को मुड़ा और बोला, "कगहए! आपकी यही एक उड़ान है न? या और कु छ ददखाना बाक़ी है?" हंस ने कहा, "भैया, थोड़े उड़ते चलो, उड़ते चलो, अभी आपको पता चल जायिा।" कौआ बोला, "हंस भैया! आप पीछे-पीछे क्यों आ रहे हैं? इतना धीमी चाल से क्यों उड़ रहे हैं? लिता है, आप उड़ने में बहुत ही कच्चे हैं!" हंस ने कहा, "ज़रा उड़ते रगहए। धीरे-धीरे उड़ना ही ठीक है।" कौए के पैरों में अभी जोर बाक़ी था। कौआ आिे-आिे और हंस पीछे-पीछे उड़ रहा था।

13


कौआ बोला, "कहो, भैया! यही उड़ान ददखानी थी न? चलो, अब हम लौट चलें। तुम चलें। तुम थक िए होिे। इस उड़ान में कोई दम नहकर है।" हंस ने कहा, "ज़रा आिे तो उगड़ए। अभी उड़ान ददखाना तो बाक़ी है।" कौआ आिे उड़ने लिा। लेदकन अब वह थक चुका था। अब तक आिे था, पर अब पीछे रह िया। हंस ने पूछा, "कौए भैया! पीछे क्यों रह िए! उड़ान तो अभी बाक़ी ही है।" कौआ बोला, "तुम उड़ते चलो, मैं देखता आ रहा हं और उड़ भी रहा हं।" लेदकन कौए भैया अब ढीले पड़ते जा रहे थे। उनमें अब उड़ने की ताक़त नहकर रही थी। उसके पंख अब पानी छू ने लिे थे। हंस ने पूछा, "कौए भैया! कगहए, पानी को चोंच छू आकर उड़ने का यह कौन-सा तरीका है?" कौआ क्या जवाब देता? हंस आिे उड़ता चला, ओर कौआ पीछे रहकर पानी में डू बदकयां खाने लिा। हंस ने कहा, "कौए भैया! अभी मेरी उड़ान तो देखनी बाकी है। आप थक कै से िए?" पानी पीते-पीते भी कौआ आिे उड़ने की कोगशश कर रहा था। कु छ दूर और उड़ने के बाद वह पानी में गिर पड़ा। हंस ने पूछा, "कौए भैया! आपकी यह कौन-सी उड़ान है? बावनवकर या गतरपनवकर?" लेदकन कौआ तो पानी में डु बदकयां खाने लिा था और आगखरी सांस लेने की तैयारी कर रहा था। हंस को दया आ िई। वह िु रती से कौए के पास पहुंचा और कौए को पानी में से गनकालकर अपनी पीठ पर बैठा गलया। दिर उसे लेकर ऊपर आसमान की ओर उड़ चला। कौआ बोला, "ओ भैया! यह तुम क्या कर रहे हो? मुझे तो चक्कर आ रहे हैं। तुम कहां जा रहे हो? नीचे उतरो, नीचे उतरो।" कौआ थर-थर कांप रहा था। हंस ने कहा, "अरे जरा देखो तो सही! मैं तुमको अपनी यह एक उड़ान ददखा रहा हं।" सुनकर कौआ गखगसया िया। उसको अपनी बेवकू िी का पता चल िया। वह गिड़गिड़ाने लिा। यह देखकर हंस नीचे उतरा औरा कौए को बरिद की डाल पर बैठ ददया। तब कौए को लिा दक हां, अब वह जी िया। लेदकन उस ददन से कौआ समझ िया दक उसकी गबसात दकतनी है।

9. नानी के घर जाने दो एक मेमना था। एक बार वह अपनी नानी के घर जाने के गलए गनकला। रास्ते में उसे एक गसयार गमला। गसयार ने मेमने से कहा, "मैं तो तुझे खा लेता हं।" मेमना बोला: नानी के घर जाने दो। मोटा-ताजा बनने दो। दिर खाना चाहो, खा लेना। गसयार ने कहा, "अच्छी बात है।" 14


मेमना कु छ ही दूर िया दक रास्ते में उसे एक गिद्ध गमला। गिद्ध ने कहा, "मैं तो तुझे खा लेता हं।" मेमना बोला: नानी के घर जाने दो। मोटा-ताजा बनने दो। दिर खाना चाहो, खा लेना। गिद्ध ने कहा, "अच्छी बात है।" मेमना आिे बढ़ा। रास्ते में उसे एक बाघ गमला। बाघ ने कहा, "मैं तुझे खा लेता हं।" मेमना बोला: नानी के घर जाने दो। मोटा-ताजा बनने दो। दिर खाना चाहो, खा लेना। बाघ ने कहा, "अच्छी बात है।" मेमना आिे बढ़ा, तो उसे रास्ते में भेगड़या, िरुड़, कु िा आदद कई जानवर गमले। मेमने ने सबको एक ही बात कही: नानी के घर जाने दो। मोटा-ताजा बनने दो। दिर खाना चाहो, खा लेना। इस तरह सबसे बचता हुआ वह अपनी नानी के पास पहुंचा, और उससे नानी से कहा, "नानीजी! मुझको खूब गखलाओ-गपलाओ। मैंने जानवरों को वचन ददया है, इसगलए वे सब मुझे खा जाने वाले हैं।" मेमने ने खूब खाया, खूब पीया और वह मोटा-ताजा बन िया। दिर मेमने ने अपनी नानी से कहा, "नानीजी! मेरे गलए चमड़े का एक ढोल बनवा दो। मैं उसमें बैठकर जाऊंिा, तो कोई मुझे पहचानेिा नहकर और इसगलए कोई मुझको खायेिा भी नहकर।" नानी ने मेमने के गलए एक अच्छा-सा ढोल बनवा ददया। ढोल के अन्दर बदढ़या रूई गबछा दी। दिर मेमना ढोल के अन्दर बैठ िया। ढोल को एक जोर का धक्का मारा तो वह लु ढ़कता-लुढ़कता चल पड़ा। रास्ते में िरुड़ गमला। िरुड़ पूछा, "भैया! मेमने को देखा है?" ढोल के अन्दर बैठा मेमना बोला: कौन-सा मेमना? कौन हो तुम? चल रे ढोल, ढमाक ढु म। यों जवाब देता-देता मेमना बहुत दूर गनकल िया। अन्त में गसयार गमला। गसयार ने पूछा, "कहकर मेमने को देखा है?" अन्दर से मेमना बोला: कौन-सा मेमना? कौन हो तुम ? चल रे ढोल, ढमाक ढु म। गसयार ने सोचा, "अरे, लिता है दक मेमना तो इसके अन्दर बैठा है। चलूं इस ढोल को िोड़ डालूं और मेमने को खा लूं।" लेदकन इसी बीच मेमने का घर आ िया, और मेमना अपने घर में घुस िया। गसयार दरवाजे के पास खड़ा-खड़ा देखता रह िया।

10.

लोभी दरजी

एक था दरजी, एक थी दरगजन। दोनों लोभी थे। उनके घर कोई मेहमान आता, तो उन्हें लिता दक कोई आित आ िई। एक बार उनके घर दो मेहमान आए। दरजी के मन में दिकर पैदा हो िई। उसने सोचा दक ऐसी कोई तरकीब चागहए दक ये मेहमान यहां से चले जायें। दरजी ने घर के अन्दर जाकर दरगजन से कहा, "सुनो, जब मैं तुमको िागलयां दू,ं तो जवाब में तुम भी मुझे िागलयां देना। और जब मैं अपना िज लेकर तुम्हें मारने दौड़ू तो तुम आटे वाली मटकी लेकर घर के बाहर गनकल जाना। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ूिा। मेहमान समझ जायेंिे दक इस घर में झिड़ा है, और वे वापस चले जायंिे।" दरगजन बोली, "अच्छी बात है।"

15


कु छ देर के बाद दरजी दुकान में बैठा-बैठा दरगजन को िागलयां देने लिा। जवाब में दरगजन ने भी िागलयां दकर। दरजी िज लेकर दौड़ा। दरगजन ने आटे वाली मटकी उठाई और भाि खड़ी हुई। मेहमान सोचने लिे, "लिता है यह दरजी लोभी है। यह हमको गखलाना नहकर चाहता, इसगलए यह सारा नाटक कर रहा है। लेदकन हम इसे छोड़ेंिे नहकर। चलो, हम पहली मंगजल पर चलें और वहां जाकर-सो जाएं। मेहमान ऊपर जाकर सो िए। यह मानकर दक मेहमान चले िए होंिे, कु छ देर के बाद दरजी और दरगजन दोनों घर लौटे। मेहमानों को घर में न देखकर दरजी बहुत खुश हुआ और बोला, "अच्छा हुआ बला टली।" दिर दरजी और दरगजन दोनों एक-दूसरे की तारीफ़ करने लिे। दरजी बोला, "मैं दकतना होगशयार हं दक िज लेकर दौड़ा!" दरगजन बोली, "मैं दकतनी िु रतीली हं दक मटकी लेकर भािी।" मेहमानों ने बात सुनी, तो वे ऊपर से ही बोले, "और हम दकतने चतुर हैं दक ऊपर आराम से सोए हैं।" सुनकर दरजी-दरगजन दोनों गखगसया िए। उन्होंने मेहमानों को नीचे बुला गलया और अच्छी तरह गखलागपलाकर गबदा दकया।

11.

मिर और गसयार

एक थी नदी। उसमें एक मिर रहता था। एक बार िरगमयों में नदी का पानी गबलकु ल सूख िया। पानी की एक बूंद भी न बची। मिर की जान गनकलने लिी। वह न गहल-डु ल सकता था और न चल ही सकता था। नदी से दूर एक पोखरा था। पोखरे में थोड़ा पानी था, लेदकन मिर वहां जाये कै से? तभी उधर से एक दकसान गनकला। मिर ने कहा, "ओ, दकसान भैया! मुझे कहकर पानी में पहुंचा दो। भिवान तुम्हारा भला करेिा।" दकसान बोला, "पहुंचा तो दूं, पर पानी में पहुंचा देने के बाद तुम मुझे पकड़ तो नहकर लोिे?" मिर ने कहा, "नहकर, मैं तुमको कै से पकड़ूिा?" दकसान ने मिर को उठा गलया। वह उसे पोखरे के पास ले िया, और दिर उसको पानी में छोड़ ददया। पानी में पहुंचते ही मिर पानी पीने लिा। दकसान खड़ा-खड़ा देखता रहा। तभी मिर ने मुड़कर दकसान का पैर पकड़ गलया। दकसान बोला, "तुमने कहा था दक तुम मुझको नहकर खाओिे? अब तुमने मुझको क्यों पकड़ा है?" मिर ने कहा, "सुनो, मैं तो तुमको नहकर पकड़ता, लेदकन मुझे इतनी जबरदस्त भूख लिी है दक अिर मैंने तुमको न खाया, तो मर जाऊंिा। इससे तो तुम्हारी सारी मेहनत ही बेमतलब हो जायिी? मैं तो आठ ददन का भूखा हं।" मिर ने दकसान का पैर पानी में खकरचना शुरू दकया। दकसान बोला, "ज़रा ठहरो। हम दकसी से इसका न्याय करा लें।" मिर ने सोचा—‘अच्छी बात है, थोड़ी देर के गलए यह तमाशा भी देख लें। उसने दकसान का पैर मजबूती के साथ पकड़ गलया और कहा, "हां, पूछ लो। गजससे भी चाहो, उससे पूछ लो।"

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उधर से एक बूढ़ी िाय गनकली। दकसान ने उसकी सारी बात सुनाई और पूछा, "बहन! तुम्हकर कहो, यह मिर मुझको खाना चाहता है। क्या इसका यह काम ठीक कहा जायिा?" िाय ने कहा, "मिर! खा लो तुम इस दकसान को। इसकी तो जात ही बुरी है। जबतक हम दूध देते हैं , ये लोि हमें पालते हैं। जब हम बूढ़े हो जाते हैं, तो हमको बाहर गनकाल देते हैं। क्यों भई दकसान! मैं ठीक कह रही हं न?" मिर दकसान के पैर को ज़ोर से खकरचने लिा। दकसान बोला, "ज़रा ठहरो। हम और दकसी से पूछ देख।ें " वहां एक लंिड़ा घोड़ा चर रहा था। दकसान ने घोड़े को सारी बात सुना दी और पूछा, "कहो, भैया,क्या यह अच्छा है?" घोड़े ने कहा, "मेहरबान! अच्छा नहकर, तो क्या बुरा है? जरा मेरी तरि देगखए। मेरे मागलक ने इतने सालों तक मुझसे काम गलया और जब मैं लंिड़ा हो िया, तो मुझे घर से बाहर गनकाल ददया? आदमी की तो जात ही ऐसी है। मिर भैया! तुम इसे खुशी-खुशी खा जाओ!" मिर दकसान के पैर को जोर-जोर से खकरचने लिा। दकसान ने कहा, "ज़रा ठहरो। अब एक दकसी और से पूछ लें। दिर तुम मुझको खा लेना।" उसी समय उधर से एक गसयार गनकला। दकसान ने कहा, "गसयार भैया! ज़रा हमारे इस झिड़े का िै सला तो कर जाओ।" गसयारन ने दूर से ही पूछा, "क्या झिड़ा है भाई?" दकसान ने सारी बात कह दी। गसयार िौरन समझ िया दक मिर दकसान को खा जाना चाहता है। गसयार ने पूछा, "तो दकसान भैया, तुम वहां उस सूखी जिह में पड़े थे?" मिर बोला, "नहकर, वहां तो मैं पड़ा था।" गसयार ने कहा, "समझा-समझा,तुम पड़े थे। मैं तो ठीक से समझ नहकर पाया था। अच्छा, तो दिर क्या हुआ?" दकसान ने बात आिे बढ़ाई। गसयार बोला, "भैया, क्या करूं? मेरी अकल काम नहकर कर रही है। मैं कु छ समझ नहकर पा रहा हं। सारी बात एक बार दिर समझाकर कहा। हां , तो आिे क्या हुआ?" मिर गचढ़कर बोला, "सुनो, मैं कहता हं। यह देखो, मैं वहां पड़ा था।" गसयार अपना गसर खुजलाते-खुलजाते बोला, "कहां? दकस तरह?" मिर ताव में आ िया। उसने दकसान का पैर छोड़ ददया और वह ददखाने लिा दक वहां, दकस तरह पड़ा हुआ था। गसयार ने िौरन ही दकसान को इशारा दकया दक भाि जाओ! दकसान भािा। भािते-भािते गसयार ने कहा, "मिर भैया! अब मैं समझ िया दक तुम कहां, दकस तरह पड़े थे। अब तुम बताओ दक बाद में क्या हुआ?" मिर छटपटाता हुआ पड़ा रहा िया और गसयार पर दांत पीसने लिा। वह मन-ही-मन बोला, "कभी मौका गमला, तो मैं इस गसयार की चालबाजी को देख लूंिा। आज इसने मुझे ठि गलया है। कु छ ददनों के बाद चौमासा शुरू हुआ। नदी में जोरों की बाढ़ आई। मिर नदी में जाकर रहने लिा। एक ददन गसयार नदी पर पानी पीने आ रहा था। मिर ने उसे दूर से देख गलया। मिर दकनारे पर पहुंचा और गछपकर दलदल में बैठ िया। न गहला, न डु ला। गसि​ि अपनी दो आंखें खुली रखकर। गसयार ने मिर की आंखें देख लकर। वह

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वहां से कु छ दूर जाकर खड़ा रहा और हंसकर बोला: नदी-नाले के दल-दल को दो आंखें गमलकर। नदी-नाले के दल-दल को दो आंखें गमलकर। सुनकर मिर ने एक आंख मकरच ली। आंखें मटकाते हुए गसयार ने कहा: नदी-नाले के दलदल की एक आंख वची। नदी-नाले के दलदल की एक आंख बची। सुनकर मिर ने दोनों आंखें मकरच लकर। गसयार बोला: ओह् हो! नदी-नाले के दलदल की दोनों आंख भी िईं। नदी नाले के दलदल की दोनों आंखें भी िईं। मिर समझ िया दक गसयार ने उसको पहचान गलया है। उसने कहा, "कोई बात नहकर। आिे कभी देखेंिे।" बहुत ददन बीत िए। गसयार कहकर गमला नहकर। एक बार बहुत पास पहुंचकर गसयार नदी में पानी पी रहा था। तभी सपाटे के साथ मिर उसके पास पहुंचा और उसने गसयार की टांि पकड़ ली। गसयार ने सोचा - ‘अब तो बेमौत मर जाऊंिा। इस मिर के गशकं जे में िं स िया।’ लेदकन वह ज़रा भी घबराया नहकर। उलटे, ज़ोर से ठहाका मारकर हंसा और बोला, "अरे भैया! मेरा पैर पकड़ो न? पुल का यह खम्भा दकसगलए पकड़ गलया है? मेरा पैर तो यह रहा।" मिर ने महसूस दकया दक सचमूच उससे भूल हो िई। उसने िौरन ही गसयार का पैर छोड़ ददया खम्भे को कचकचाकर पकड़ गलया। पैर छू टते ही गसयार भािा। भािते-भािते गसयार ने कहा, "मिर भैया, वह मेरा पैर नहकर है। वह तो खम्भा है। देखो मेरा पैर तो यह रहा!" दिर गसयार ने उस नदी पर पानी पीना बन्द कर ददया। मिर ने बहुत राह देखी। ददन-रात पहरा ददया। पर गसयार नदी पर क्यों आने लिा? अब क्या दकया जाये? नदी-दकनारे एक अमराई थी। वहां गसयार अपने सागथयों को लेकर रोज आम खाने पहुंचता था। मिर ने सोचा दक अब मैं अमराई में जाकर गछपूं। एक ददन वह डाल पर पके आमों के बड़े-से ढेर में गछपकर बैठा। गसयार को आता देखकर उसने अपनी दोनों आखें खुली रखकर। हमेशा की तरह गसयार अपने सागथयों को लेकर अमराई में पहुंचा। िौरन ही उसकी गनिाह दो आंखों पर पड़कर उसने गचल्लाकर कहा, "भाईयों, सुनो! यह बड़ा ढेर सरकार का है। इसके पास कोई जाना मत। सब इस दूसरे ढेर के आम खाना।" इस बार भी गसयार पकड़ में नहकर आया। मिर ने सोचा दक अब तो मैं इस गसयार की िुिा में ही जाकर बैठ जाऊं। वहां तो यह पकड़ में आ ही जायिा। एक बार गसयार को बाहर जाते देखकर मिर उसकी िुिा में जा बै ठा। सारी रात जंिल में घूमने-भटकने के बाद जब सबेरा होने को आया, तो गसयार अपनी िुिा में लौटा। िुिा में घुसते ही उसने वहां मिर की दो आंखें देखकर। गसयार ने कहा, "वाह-वाह, आज तो मेरे घर में दो दीए जल रहे हैं।" मिर ने अपनी एक आंख बन्द कर ली। गसयार बोला, "अरे रे , एक दीया बुझ िया।" मिर ने अपनी दोनों आंखें बन्द कर लकर। गसयार ने कहा, "वाह, अब तो दोनों ही दीये बुझ िए। अब इस अंधेरी िुिा में कौन जाय! दकसी दूसरी िुिा में चला जाऊं।" गसयार चला िया। आग़िर मिर उकताकर उठा और वापस नदी में पहुंच िया। गसयार दिर कभी मिर की पकड़ में नहकर आया। 18


12.

गटड्डा जोशी

एक थे जोशी। वे ज्योगतष तो जानते नहकर थे, दिर भी ददखावा करके कमाते और खाते थे। एक ददन वे अपने िांव से दूसरे िांव जाने के गलए रवाना हुए। रास्ते में उन्होंने देखा दक दो सिे द बैल एक खेत में चर रहे हैं। उन्होंने यह बात अपने ध्यान में रख ली। जोशीजी िांव में पहुंचे और एक पटेल के घर ठहरे। वहां उनसे गमलने एक दकसान आया। उसके साथ ही उसकी घरवाली भी आई। दकसान ने जोशीजी से कहा, "जोशी महाराज! हमारे दो सफ़े द बैल खो िए हैं। क्या आप अपना पोथी-पिा देखकर हमको बता सकें िे दक वे दकस तरि िए हैं?" जोशीजी कु छ बुदबुदाए। दिर एक बहुत पुराना सड़ा-सा पंचांि गनकालकर देखा और कहा, "पटेल! तुम्हारे बैल पगश्चमी गसवान वाले िलां खेत में हैं। वहां जाकर उनको ले आओ।" जब पटेल उस खेत में पहुंचा, तो वहां उसे अपने बैल गमल िए। पटेल बहुत खुश हुआ और उसने जोशीजी को भी खुश कर ददया। दूसरे ददन जोशीजी की परीक्षा करने के गलए मकान-मागलक ने उनसे पूछा, "महाराज" अिर आपकी ज्योगतष गवद्या सच्ची है, तो बताइए दक आज हमारे घर में दकतनी रोठटयां बनी थकर? जोशीजी के पास कोई काम तो था नहकर, इसगलए तबे पर डाली जाने वाली रोठटयों को वे गिनते रहे थे। गिनती तेरह तक पहुंची थी। इसगलए अपनी गवद्या का थोड़ा ददखावा करने के बाद उन्होंने कहा, "पटेल! आज तो आपके घर में तेरह रोठटयां बनी थकर।" सुनकर पटेल को बड़ा अचरज हुआ। इन दो घटनाओं से जोशी महाराज का नाम सारे िांव में िै ल िया, और िांव के लोि उनके पास ज्योगतषसंबंधी बातें पूछने के गलए आने लिे। उन्हकर ददनों राजा की रानी का नौलखा हार खो िया। जब राजा ने जोशीजी की कीर्ति सुनी, तो उन्होंने उनको बुलवाया। राजा ने जोशी से कहा, "सुनो, ठटड्डा महाराज! अपने पोथी-पि में देखकर बताओ दक रानी का हार कहां है या उसको कौन ले िया है? अिर हार गमल िया तो हम आपको गनहाल कर देंिे।" जोशीजी घबराए। िहरे सोच में पड़ िए। राजा ने कहा, "आज की रात आप यहां रगहए। और सारी रात सोचसमझकर सुबह बताइए। याद रगखए दक अिर आपकी बात िलत गनकली, तो आपको कोल्हु में पेरकर आपका तेल गनकलवा लूंिा।" रात ब्यालू करने के बाद ठटड्डा जोशी तो गबस्तर में लेट िए। लेदकन उन्हें नकरद नहकर आई। मन में डर था दक सबेरा होते ही राजा कोल्हु में पेराकर तेल गनकालेिा। वह पड़े-पड़े नकरद को बुला रहे थे। कह रहे थे , "ओ नकरद रानी आओ! ओ, नकरद रानी आओ!" बात यह थी दक राजा की रानी के पास नकरद रानी नाम की एक दासी रहती थी। और उसी ने रानी का हार चुराया था। जब उस दासी ने ठटड्डा जोशी को नकरद रानी आओ, नकरद रानी आओ’ कहते सुना, तो वह एकदम घबरा िई। उसे लिा दक अपनी गवद्या दक बल से ही गडड्डा जोशी को उसका नाम मालूम हो िया है। बच गनकलने के गवचार से नकरदरानी ने हार ठटड्डा जोशीजी को सौंप देने का गनश्चय कर गलया। वह हार लेकर जोशीजी के पास पहुंची और बोली, "महाराज! यह चुराया हुआ हार आप संभागलए। अब मेरा नाम दकसी को मत बताइए। हार का जो करना हो, कीगजए।"

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ठटड्डा जोशी मन-ही-मन खुश हो िए। और बोले, "यह अच्छा हुआ। दिर ठटड्डा जोशी ने नकरद रानी से कहा, "सुनो यह हार अपनी रानीजी के कमरे में पलंि के नीचे रख आओ।" सबेरा होने पर राजा ने ठटड्डा जोशी को बुला भेजा। जोशीजी ने अपनी गवद्या का ददखावा करते हुए एक-दो सच्चे-झूठे श्लोक बोले और दिर अपनी अंिुगलयों के पोर गिनकर और होंठ गहलाकर अपना लम्बा पिा गनकाला और कहा, "राजाजी! मेरी गवद्या कहती है दक रानी का हार कहकर िुम नहकर हुआ है। आप तलाश करवाइए। हार रानी के कमरे में ही उनके पलंि के नीचे गमलना चागहए।" तलाश करवाने पर हार पलंि के नीचे गमल िया। राजा ठटड्डा जोशी पर बहुत खुश हो िया और उसे खूब इनाम ददया। ठटड्डा जोशी की और परीक्षा लेने के गलए राजा ने एक तरकीब सोची। एक ददन राजा ठटड्डा जोशी को अपने साथ जंिल में ले िए। जोशीजी जब इधर-उधर देख रहे थे, तब उनकी गनिाह बचाकर राजा ने अपनी मुट्ठी में एक ठटड्डा पकड़ गलया। दिर मुट्ठी ददखाकर ठटड्डा जोशी से पूछा, "ठटड्डाजी, कगहए, मेरी इस मुट्ठी में क्या है? याद रगखए, िलत कहेंिे, तो जान जायेिी!" ठटड्डा जोशी घबरा िए। उनको लिा दक अब सारा भेद खुल जायिा और राजा मुझे मार डालेिा। घबराकर अपनी गवद्या की सारी हकीक़त राजा से कह देने ओर उनसे मािी मांि लेने के इरादे से वे बोले: टपटप पर से तेरह गिने। राह चलते ददखे बैल। नकरद रानी ने सौंपा हार।राजा, ठटड्डे पर क्यों यह मार? जैसे ही ठटड्डा जोशी ने यह कहा वैसे ही राजा को भरोसा हो िया दक जोशी महाराज तो सममुच सच्चे जोशी ही हैं। राजा ने अपनी मुट्ठी में रखे ठटड्डे को उड़ा ददया और कहा, "वाह जोशीजी, वाह! आपने तो कमाल कर ददया।" ठटड्डे जोशी मन-ही-मन समझ िए दक इधर मरते-मरते बचे, और उधर सच्चे जोशी बने! दिर तो राजा ने जोशीजी को भारी इनाम ददया और उनको सम्मान के साथ गबदा दकया।

13.

राजा, मै तो बड़भािी

एक थी गचगड़या। एक ददन दाना चुि रही थी दक उसे एक मोती गमला। गचगड़या ने मोती नाक मे पहन गलया और इतराती-इतराती पेड़ की एक डाल पर जा बैठी। तभी उधर से एक राजा गनकला। राजा को देखकर गचगड़या ने कहा: राजा, मै तो हं बड़भािी। मेरी नाक मे गनमिल मोती। राजा, मै तो हं बड़भािी। मेरी नाक मे गनमिल मोती। राजा मन-ही-मन खीज उठा। लेदकन उस ददन गबना कु छ कहे-सुने वह अपनी कचहरी मे चला िया। दूसरे ददन जब राजा कचहरी मे जा रहा था। गचगडया ने दिर कहा: राजा, मै तो हं बड़भािी। मेरी नाक मे गनमिल मोती। राजा, मै तो हं बड़भािी। मेरी नाक मे गनमिल मोती। इस बार राजा बहुत िुस्सा हो िया। राजा ने लौटकर गचगड़या को पकड़ गलया ओर उसकी नाक मे से मोती गनकाल गलया। गचगड़या,भला राजा से क्यो डरने लिी? उसने कहना शुरू दकया: 20


राजा भित गभखारी। मेरा मोती ले गलया। राजा भित गभखारी। मेरा मोती ले गलया। राजा और अगधक िुस्सा हुआ? उसने कहा, "क्या मै गभखारी हं? मै तो राजा हं। मुझे दकस बात की कमी है? दे दो, गचगड़या को उसका मोती।" राजा ने गचगड़या को मोती दे ददया। इस पर गचगड़या ने कहना शुरू दकया: राजा मुझसे डर िया। मेरा मोती मुझको दे ददया। राजा मुझसे डर िया। मेरा मोती मुझको दे ददया। अब तो राजा को बहुत ही बुरा लिा। उसने कहा, "अरे, यह क्या कर रही है? यह अभागिन गचगड़या, छोटा मुंह इतनी बड़ी बात कै से कह रही है!" राजा ने गचगड़या की पकड़वा गलया। उसका गसर मुंडवा ददया और उस पर चूना पुतवाकर उसे बाहर गनकाल ददया। गचगड़या ने कहा, "राजा को और राजा के पूरे घर का गसर न मुंडवाऊं, तो मेरा नाम गचगड़या नहकर।" दिर गचगड़या शंकर के मंददर मे जाकर बैठ िई। राजा रोज शंकर के दशिन करने आते और कहते , "हे शंकर भिवान! भला दकजीए!" रोज की तरह राजा दशिन करने आए और शंकर के आिे गसर झुकाकर बोले, "हे शंकर भिवान! भला कीगजए!" तभी गचगड़या बोली, "नहकर करूिां।" राजा तो सोच मे पड़ िए। उन्होने दिर गसर झुकाया और बोले , "हे भिवान! मुझसे कोई कसूर हुआ हो तो माि कीगजए! आप जो कहेिें , मै करूंिा। हे भिवान! मेरा भला कीगजए!" गचगड़या बोली, "राजा! तुम और तुम्हारा सारा घर गसर मुड ं वाए, गसर पर चूना पुतवाए और मेरे पास आए, तो मै तुम्हारा भला करूंिा।" दूसरे ददन राजा ने और उसके पूरे घर ने गसर मुंडवाया, गसर पर चूना पुतवाया और सब मंददर मे आए। आकर सबने कहा, "हे शंकर भिवान! हमारा भला कीगजए!" इसी बीच गचगड़या िु र…र…र करती हुई उड़ी और बाहर जाकर कहने लिी: गचगडया एक मुंडाई। राजा का घर मुंडाया। गचगड़या एक मुंडाई। राजा का घर मुंडाया। सुनकर राजा गखगसया िया और नीचा मुंह करके अपने महल मे चला िया।

14.

बगनया और चोर

एक था बगनया। उसे घी खरीदना था, इसगलए वह घी की कु प्पी और तेरह रूपए लेकर दूसरे िांव जाने के गलए रवाना हुआ। रास्ते मे शाम हो िई। जहां पहुचना था, वह िांव दूर था। थोड़ी ही देर मे अंधेरा छा िया। बगनये ने अंधेरे मे दूर कु छ देखा। उसके मन मे शक पैदा हुआ दक कहकर कोई चोर तो नहकर है! बगनया डर िया पर आग़िर वह बगनया था। वह खांसा-खंखारा, मूंछ पर ताव ददया और बोला: 21


अिर तू है खूटा खम्बा। तो मै हं मरद मुछन्दर। अिर तू है चोर और डाकू । तो ले ये तेरह रूपए और कु प्पी धर। बगनया यूं बोलता जाता था, खासंता-खंखारता जाता था, और धीमे-धीमे आिे बढ़ता जाता था। जब गबल्कु ल पास पहुंच िया, तो देखा दक वहां तो पेड़ का एक ठं ठ खड़ा था। बगनये ने चैन की सांस ली।

15.

गिलहरी बाई

एक बुदढ़या थी। एक बार उसकी हथेली मे िोड़ा हुआ। जब िोड़ा िू टा, तो उसमें से एक गिलहरी गनकली। बुदढ़या ने गिलहरी के गलए पेड़ पर एक झोली बांध दी और उसमें उसको सुला ददया। घर का काम करते-करते बुदढ़या कभी इधर जाती, कभी उधर जाती, और गिलहरी को झुलाते-झुलाते लोरी िाती: हाथ के लूंिी हजार। पैर के लूंिी पांस सौ। नाक के लूंिी नौ सौ। दिर भी अपनी गिलहरीबाई को धरम रीगत से दूंिी। सो जाओं, गिलहरीबाई, सो जाओं। एक ददन पास के िांव का एक राजा गशकार के गलए गनकला। बुदढ़या की कु ठटया के पास से जाते -जाते उसने गिलहरीबाई की लोरी सुनी। राजा सोचने लिा—‘भला, यह गिलहरीबाई कै सी होिी? जब बुदढ़या इसके गलए इतने अगधक रूपए मांि रही है, तो जरूर ही गिलहरीबाई बहुत रूपवती होिी!’ राजा बुदढया के पास िया, और उसने बुदढ़या से कहा, "मांजी, मांजी! आप यह क्या िा रही है? आपकी गिलहरी कहां है? मुझकों अपने बेटी ददखा दो। मै उससे ब्याह करना चाहता हं।" बुदढया बोली, "भैया! आप तो राजा हैं। भला आप गिलहरी से कै से ब्याह करेंिे ? वह तो जानवर की जान है। लोरी तो मै इस गिलहरीबाई के गलए िाती हं। मेरी दूसरी बेटी नही है।" राजा ने बुदढ़या की बात नही मानी। उसने कहा, "मांजी, भले ही आपकी गिलहरीबाई जानवर हो! मै तो उसी से ब्याह करूंिा।" सुनकर बुदढ़या बोली, "तो जाइये, रूपए ले आइये। आप मुझे मेरा यह कु ल्हड भरकर रूपये देिें , तो मै अपनी बेटी का ब्याह आपसे कर दूंिी।" राजा रूपए लेने िया। बुदढ़या लोगभन थी। ढेर सारे रूपए लेने की एक तरकीब उसने सोच ली। एक बड़ा-सा िढ्ढा खोदा। िड्ढे पर कोठी रख दी। कोठी पर एक मटका रखा। मटके पर ि​िरी रखी और ि​िरी पर कु ल्हड़ रख ददया। ऊपर से नीचे तक सबके पेंदों मे छेद बना ददया। राजा आया। राजा के लोि कु ल्हड़ मे रूपए डालने लिे , पर कु ल्हड़ तो भरता ही न था। आगखर जब बहुत सारे रूपए डाल ददये िए तो कु ल्हड़ भर िया। दिर बुदढ़या ने गिलहरीबाई का ब्याह राजा के साथ कर ददया। राजा गिलहरीबाई को ब्याहकर अपने घर ले आया। राजा ने गिलरीबाई के गलए सोने का एक बदढ़या लपंजर बनवाया, और उसे अपने महल की सांतवकर मंगजल पर टंिवा ददया। राजा का हुक्म हुआ दक वहां कोई जाये नही। सब सोचने लिे दक राजा दकसे ब्याह कर लाये है? गिलहरीबाई को रोज बदढ़या-बदढया दाने डाले जाते थे। गिलहरीबाई दाने खाती और अपने लपंजरे मे कू दा करती। राजा रोज सुबह शाम गिलहरीबाई से गमलने

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जाता। एक बार राजा के दीवान ने जानना चाहा दक रानी कौन है? दीवान ने परीक्षा करने की बात सोची और राजा से पूछा, "राजा जी, राजा जी! क्या आपकी रानी कु छ काम करना जानती है?" राजा ने कहा, "हां जानती है।" दीवान ने पूछा, "क्या रानी धान मे से चावल तैयार कर देंिी?" राजा ने हां कहा, और धान की वह टोकरी गिलहरीबाई के पास रख दी। गिलहरीबाई समझ िई। उसने अपने पैने दांतों से धान के गछलके इस खूबी के साथ गनकाले दक एक भी दाना टूटा नही और एक ही रात मे सारी टोकरी चावलों से भर दी। सवेरे राजा टोकरी दीवान के पास ले िए। चावल देखकर दीवान तो दंि रह िया! एक बार और रानी की परीक्षा लेने के गवचार से दीवान ने पूछा, "राजा जी! क्या आपकी रानी िीली गमटटी पर गचिकारी कर सकती है?" राजा ने कहा, "हां, इसमें कौन बड़ी बात है?" दीवान ने एक कमरे मे िीली गमटटी तैयार करवा दी ओर राजा से कहा, "रात को रानीजी इस पर अपनी गचिकारी करें।" गिलहरीबाई अपनी दूसरी सब सहेगलयों को बुला लाई और दिर सब गिलहठरयों ने कमरे मे इधर-से-उधर उधर-से-इधर दौड़ने की धूम मचा दी। सवेरा होते-होते तो गमटटी पर बदढ़या गचिकारी तैयार हो िई। सबेरे सारी गचिकारी देखकर दीवान तो िहरे गवचार मे डू ब िया। उसने कहा, "सचमुच रानी तो बहुत ही चतुर हैं।" बाद मे एक बार राजा को दूसरे िांव जाना पड़ा। राजा ने गपजरे मे दाना-पानी रख ददया। राजा को लौटने मे देर हो िई और लपंजरे का दाना-पानी खत्म हो िया। गिलहरीबाई को बहुत प्यास लिी। िले मे कु ल्हड़ बांध कर वह कुं ए पर पानी भरने िई। जब वह कुं ए पर खड़ी-खड़ी पानी भर रही थी, उसी समय ऊपरसे शंकरपाविती का रथ गनकला। शंकर ने पूछा, "पाविती जी! आप जानती है, यह गिलहरी कौन है?" पाविती ने कहा, "नही।" शंकर बोले, "यह तो एक स्त्री है। इसे एक देव का शाप लिा है, इसगलए इसको गिलहरी का जन्म लेना पड़ा है।" पाविती को दया आ िई, और उन्होने शंकर से गवनती की दक जैसे भी बने, वे गिलहरी को दिर से स्त्री बना दें। जैसे ही शंकर ने ऊपर से पानी गछड़का, वैसे ही गिलहरी सोलह साल की सुन्दरी बन िई। सुन्दरी बनने के बाद गिलहरीबाई राजा के महल मे पहुची। जब राजा घर लौटे तो उनको सारा हाल मालूम हुआ। राजा बहुत खुश हुआ और वे आराम से रहने लिे।

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16.

अल्लम-तल्लम करता हं

एक था कौआ, और एक थी मैना। दोनो मे दोस्ती हो िई। मैना भली ओर भोली थी, लेदकन कौआ बहुत चंट था। मैना ने कौए से कहा, "कौए भैया! आओं, हम खेत जोतने चले। अनाज अच्छा पक जायेिा, तो हमको साल भर तक चुिने नही जाना पड़ेिा, और हम आराम के साथ खाते रहेिे।" कौआ बोला, "अच्छी बात है। चलो चलें।" मैना ओर कौआ अपनी-अपनी चोच से खेंत खोदने लिे। कु छ देर बाद कौए की चोंच टूट िई। कौआ लुहार के घर पहुचा और वहां अपनी चोंच बनवाने लिा। जाते जाते मैना से कहता िया, "मैना बहन! तुम खेत तैयार करो। मै चोंच बनावाकर अभी आता हं।" मैना बोली, "अच्छी बात है।" दिर मैना ने सारा खेत खोद गलया, पर कौआ नही आया। कौआ की नीयत खोटी थी। इसगलए चोंच बनवा चुकने के बाद भी वह काम से जी चुराकर पेड़ पर बैठा-बैठा लुहार के साथ िपशप करता रहा। मैना कौए की बाट देखते -देखते थक िई। इसगलए वह कौए को बुलाने गनकली। जाकर कौए से कहा, "कौए भैया, चलो! खेत सारा खुदचुका है। अब हम खेत मे कु छ बो दें।" कौआ बोला: अल्लम-टल्लम करता हं। चोंच अपनी बनवाता हं। मैना बहन, तुम जाओं, मै आता हं। मैना लौट िई ओर उसने बोना शुरू कर ददया। मैना ने बदढ़या बाजरा बोया। कु छ ही ददनो के मे वह खूब बढ़ िया। इस बीच नकरद ने गनराने का समय आ पहुचा। इसगलए मैना बहन दिर कौए को बुलाने िई। जाकर कौए से कहा, "कौए भैया! चलो, चलो बाजरा बहुत बदढया उिा हैं। अब जल्दी ही गनरा लेना चागहए, नही तो िसल को नुक़सान पहुंचेिा।" पेड़ पर बैठे-बेठे ही आलसी कौआ बोला: अल्लम-टल्लम करता हं। चोंच अपनी बनवाता हं। मैना बहन, तुम जाओं, मै आता हं। मैना वापस आ िई। उसने अके ले ही सारे खेत की गनराई कर ली। कु छ ददनों के बाद िसल काटने का समय आ लिा। इसगलए मैना दिर कौए को बुलाने िई। जाकर कौए से कहा, "कौए भैया! अब तो चलो िसल काटने का समय हो चुका है! देर करके काटेंिें, तो नुकसान होिा।" कौआ बोला : अल्लम-टल्लम करता हं। चोंच अपनी बनवाता हं। मैना बहन, तुम जाओं मै आता हं। मैना तो गनराश होकर वापस आ िई। और िुस्से-ही-िुस्से में अके ली खेत की सारी िसल काट ली। इसके बाद मैना ने बाजरे के भुटटों मे से दाने गनकाले। एक तरि बाजरे का ढेर लिा ददया और दूसरी तरि भूसे का बड़ासा ढेर बनाकर उसके ऊपर थोड़ा बाजरा िै ला ददया। 24


बाद मे वह कौए को बुलाने िई। जाकर बोली, "कौए भैया! अब तो तुम चलोिें? मैने बाजरे की ढेठरयां तैयार कर ली है। तुमको जो ढेरी पसन्द हो, तुम रख लेना।" कौआ यह सोचकर खुश हो िया दक गबना मेहनत के ही उसको बाजरे का अपना गहस्सा गमलेिा। कौए ने मैना से कहा, "चलों बहन! मै तैयार हं। अब मेरी चोंच अच्छी तरह ठीक हो िई है।" कौआ और मैना दोनो खेत पर पहुंचे। मैना ने कहा, "भैया! जो ढेरी तुमको अच्छी लिे, वह तुम्हारी।" बड़ी ढेरी लेने के गवचार से कौआ भूसे वाले ढेर पर जाकर बैठ िया। लेदकन जैसे ही वह बैठा दक उसके पैर भूसे मे धंसने लिे, और भूसा उसकी आंखों, कानों और मुंह मे भर िया। देखते-देखते कौआ मर िया! बाद मे मैना सारा बाजरा अपने घर ले िई।

17.

चंदाभाई की चांदनी

एक थे राम लसंह भाई और दूसरे थे चन्दाभाई। दोनों जािीरदार। रामलसंह भाई िावं मुगखया, और पाच-सात िांवों के मागलक। चन्दाभाई के पास गसि​ि दो हल की ज़मीन। रामलसंह भाई का अपना राज-दरबार था। जो भी आता, चौपाल पर बैठता। हुक्का-पानी पीता। खाना खाता और घर जाता। चन्दाभाई के घर मे तो कु छ भी नही था। घर के दरवाजें आया हुआ भूखा ही लौट जाता। लेदकन चन्दाभाई ज़बान के बहुत तेज-तरािर थें। एक बदढया घोड़ी रखते थे। सिे द कपड़े पहनते थे, और िावं मे बैठकर िप्पे हांका करते थे। जहां भी पहुच जाते , मेहमान के ठाठ से रहते और मौज करते। चन्दाभाई ने रामलसंह भाई के साथ दोस्ती कर ली। रामलसंह भाई को कमी दकस बात की थी? चन्दाभाई रामलसंह भाई के घर साल मे दो-तीन महीने रहते। खाते-पीते और चैन की बंसी बजाते। लौटते समय बहुत आग्रह करके कहते, रामलसंह भाई! अब तो एक बार आप मेरे घर जरूर ही पधाठरए!" संयोि से एक बार रामलसंह भाई को कहकर ठरश्तेदारी मे जाना हुआ। रास्तें मे चन्दाभाई का िांव पड़ा। रामलसंह भाई ने सोचा - चन्दाभाई बार-बार आग्रह करके कहे रहते है, पर हम कभी इनके घर जाते नहकर। चलूं , क्यों न इस बार मै इनका िढ़ भी देख लू? ं " रामलसंह भाई ने ओर उनके भतीजों ने अपनी घोगडयां चन्दाभाई के िावं की ओर मोड़ दी। दकसी ने चन्दाभाई को खबर दी। वह परेशान हो िये। सोचने लिे - रामलसंह भाई के घर तो मै खूब खाता-पीता रहा हं लेदकन मै उनको गखलाऊंिा क्या? घर मे तो चूहे डण्ड पेल रहे थे। इतने मे रामलसंह भाई की घोड़ी गहनगहनाई और रामलसंह भाई ने आवाज लिाई, "चन्दाभाई कहां है?" बेचारे चन्दाभाई क्या मुंह ददखाते? वे तो ठु करानी की साड़ी ओढ़कर सो िए। ठाकु र रामलसंह िढ़ के अन्दर आ पहुचे। पूछा, "क्या ठाकु र चन्दाभाई घर मे है?" एक बहन ने बाहर गनकलकर कहा, "दरबार तो जूनािढ़ की जािीर के काम से िए है। कल-परसों तक लोटेिें।" रामलसंह भाई के मन मे शक पैदा हुआ। सोचा बात कु छ िलत लिती है। कल ही तो खबर गमली थी दक चन्दाभाई िांव मे ही है। ठाकु र रामलसंह ने कहा, "अच्छी बात है। लेदकन घर के अन्दर ये सोए कौन है? कोई बीमार तो नही है?" बहन बोली, "ये तो जसोदा भुवा है। गसर दुख रहा है, इसगलए सोई है।"

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ठाकु र रामलसंह ने सोचा - जसोदा भुवा के कु शल समाचार तो पूछ ही लें। घर मे पहुचकर उन्होने साड़ी ऊपर उठाई और पूछा, "क्यों भुवा जी! गसर क्यों दुख् रहा है?" तभी देखते क्या है दक भुवाजी की जिह वहां मूंछों वाले चन्दाभाई लेटे पड़े है! देखकर रामलसंह भाई तो दंि रह िए। गखगसया भी िए। उनके साथ एक चारण था। उससे रहा नही ियां। उसकी जीभ कु लबुलाई वह बोला: चन्दाभाई की चांदनी और रामजी भाई की रोटी। जसोदा भुआ के मूंछे आई घड़ी कलजुि की खोटी।

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Gijubhai ki kahaniya by Dr. Sanjay Kumar Pandagale - Issuu