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सभी रचनाएं विशुद्ध रूप से लेखकों के व्यक्तिगत मौलिक विचारों व धारणाओं की अभिव्यक्ति मात्र हैं, इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति समुदाय समाज की भावनाओं को आहत करने का कोई प्रयास लेखक व प्रकाशक द्वारा नहीं किया गया है इस संकलन का एकमात्र उद्देश्य समजिक मूल्यों व जागतृ ि का संचार है । यद्यपि अनुराग्यम ् रचनाओं की मौलिकता को लेकर पूर्ण संकलिप्त व सजग है फिर भी किसी रचनाकार की यदि कोई रचना चोरी कि हुई पायी गई तो मौलिकता प्रमाण पत्र नियम के अंतर्गत उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी लेखक की स्वयं होगी । किसी भी न्यायिक प्रक्रिया के लिए प्रकाशन जिम्मेदार नहीं होगा । सर्वाधिकार
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जनवरी 2021
fojklr अनक्र ु म
प्यारे साथियों,
क्र. आलेख, कविताएं एवं विचारधारा
प्र.स.
1. गीतों की चित्रकार
4
5
3. शिव ताण्डव स्तोत्रमय
6
पंकज शर्मा, नई दिल्ली 2. संस्मरण कुमार आदित्य, ग्रेटर नॉएडा रं जना श्रीवास्तव, नागपुर, महाराष्ट्र 4. कविता : मधुर मिलन
6
दीक्षा राय ‘शुभ्रा’, मऊ, उतर प्रदे श 5. हाइकु : हार या जीत
6
अविनाश सिंह, गोरखपुर, बिहार 6. कहमुखरी
7
कहकशां, दे हरादन ू , उत्तराखंड 7. दोहे
7
डी पी सिंह, गाजियाबाद, उत्तर प्रदे श 8.
कविता : हे राम ! तेरे दे श
7
मीनू बाला, जालंधर, पंजाब 9. नज़्म : उलझन
8
ग़ज़ल : झूठ को छोड़ा है
8
अब्दुल वसै, नई दिल्ली 10. वसुधा की दवु िधा
8-9
प्रियंका जायसवा, गाजीपुर, उत्तर प्रदे श 11. दास्तान-ए-बनारस
10
11
श्रोजी चतुर्वेदी, संदलपुर, पटना, बिहार 13. बिसरा मुंडा
12
अनुज शुक्ला, भोपाल, मध्यप्रदे श 14. साक्षात्कार : डॉ. रूचि चतुर्वेदी
जैसा कि हमने आप सब से वादा किया था, कि हम कला, साहित्य, विज्ञान, समाजिक सरोकारों व संस्कृति के प्रचार प्रसार में निरन्तर गतिशील रहें गे - इसी दिशा में अपने सतत प्रयासों की श्रृंखला में अनरु ाग्यम ् फिर से उपस्थित है आपसब के सामने अपनी अनठ ू ी पहल “मासिक कैप्लेट पत्रिका विरासत” का दस रा अं क ले क र। ू प्राचीन संस्कृति के संस्कार और नई संस्कृति के नत ू न कलाकारों का अद्भुत मेल है - अनरु ागयम। कला, साहित्य, विज्ञान, समाजिक सरोकारों व संस्कृति को लेकर पर्ण ू तया समर्पित है और हमने इस दिशा में ये तय कर रखा है कि हम इन विधाओं के मर्ध ू न्य मनीषियों को हमारी पत्रिकाओं के विशेषांक समर्पित होंगे, उसी क्रम में यह पत्रिका, इस साल, नए साल के उपलक्ष्य में आपके लिए प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय गणितज्ञ, साहित्यकार, प्रख्याता, गायिका, कवियत्री व अन्य बहुत सी विधाओं मे पारं गत डॉ. रुचि चतर् ु वेदी जी को आपसे रूबरू कराने लाया है । सबसे महत्वपर्ण बात यह है कि ३ जनवरी ू को रुचि जी का जन्मदिवस है और अनरु ाग्यम ् अपने सभी पाठकों व समस्त परिवार की ओर से उन्हें जन्मदिवस की हार्दिक शभ ु कामनायें दे ता है । अनरु ाग्यम ् इस बार खास तौर पर आपके लिए लाया है साल के पहले माह में “डॉ. रुचि चतर् डॉ ु वेदी विशेषांक”, साथ में महान विभति ू रूचि चतर् द ी जी का साक्षात्कार, जो आपको ज़िन्दगी जीने क े ख़ास वे ु अनभ ु व व अंदाज़ बताएगा, पंकज शर्मा जी का विशेष आलेख और कवि कुमार आदित्य जी का सन ु ्दर संस्मरण, इसके अतरिक्त बनारस की दास्तान को आगे बढ़ाएंगे, मानसिक समस्याओं पर और मख ु र होंगे कविता, गीत,गजल, रूबाई, कहमक री, दोहे , हाइक , कहानी, पाती ु ु तथा अन्य रोचक लेख इत्यादि आपके मनोरं जन और ज्ञान वर्धन के लिए उपलब्ध होंगे। आपने हमारी पिछली पत्रिका को बहुत स्नेह और दल ु ार दिया विशिष्ट जनों से लेकर सामान्यजन तक हमें जो टिप्पणियां प्राप्त हुई हैं ना यकीन मनिये उसने हमारे लिए अमृतसध ु ा का कार्य किया है , इस बार की पत्रिका हमने दोगन े उत्साह और लगन से आपके लिए सजाई है , ु आशा करती हूँ पहले की तरह इस बार भी हमारी मासिक कैप्लेट पत्रिका विरासत को आपके उसी स्नेह और प्रेम का उपहार अवश्य मिलेगा, जो हमें अब तक मिलता आया है । आपकी शभ ु कामनाओं और बहुमल ू ्य टिप्पणियों की प्रतीक्षा में ...
रुखसार अहमद खान, बनारस, उत्तर प्रदे श 12. छीनता बचपन
आप सब को अनरु ाग्यम ् की ओर से नववर्ष की हार्दिक शभ ु कामनायें, नववर्ष आप सबमें नवीन ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करे , हमारी यही मंगलकामना है ।
13
आकाँक्षा शर्मा मख ्य सं प ादिका एवं महासचिव अनरु ाग्यम ् ु
पषृ ्ठ 4
आकांक्षा शर्मा, डॉ. तरुणा माथुर 15. पत्रिका विरासत के प्रथम अंक का अनावरण
17
16. संस्थापक और सदस्यों का किया सम्मान
18
17. प्रेस विज्ञप्ति
19
पषृ ्ठ 8
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पषृ ्ठ 5 पषृ ्ठ 10 अनुराग्यम ्
3
जनवरी 2021
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मन सरहद पर खड़े संतरियों के शौर्य और शरू वीरता से बार बार कृतज्ञ हो उठे तब ये अद्भुत होता है । यह दे श नमन करता वीरों को नमन कोटि बलिदानों को करता जग वंदन अभिनन्दन दे शभक्त दीवानों को है अमर तिरं गा अमर भारती नमन गीत नव लय बोलो आओ मिलकर वीर शहीदों की जयजय जयजय बोलो मन सब ु ह की किरणों के साथ ऊर्जा का संचार करे और वो ऊर्जा जीवन गीत बन जाए तो वो अलौकिक होता है स्वयं जला उजियारा सारी धरती को बाँटा करता । सर्य ू अगर ना होता दिन भी अँधियारे काटा करता ।। दक्षिण तक जाना भी है पर फिर उत्तर में आना है । हमने उजियारे का रूपक केवल रवि को माना है ।।
गीतों की चित्रकार गन्ने का रस जब गुड़ बनने की प्रक्रिया को पूरा कर रहा होता है , तब जो खुश्बू आती है या यूं कहें कि ताज़े खिले फूल पर से ओस की कोई बूंद ढुलकती है , तब जो अहसास होता है । या फिर ये भी कहा जा सकता है कि किसी मंदिर के सामने निकलते समय हवन कंु ड की महक जैसे मन को पवित्र करती चली जाती है , या फिर किसी बच्चे को नींद में मुस्कु राते दे खने का जो अनुभव होता है । वो सब एक साथ तब होता है जब कोई डॉक्टर रुचि चतुर्वेदी से मंचों की औपचारिकताओं से परे बात करता है या तब होता है जब कोई उन्हें मंच पर बाकी सारी औपचारिकताएं छोड़कर सुनता है । प्रेम के इस व्याकरण में व्याकरण सब छोड़कर, लेखनी मन पषृ ्ठ पर लिखती रहे मन व्योम को। अक्षरा गाने लगे विन्यास के पथ पर थिरक, अक्षरों के पार अक्षर स ृष्टि में बस ॐ को। ब्रज भाषा का वरदान आगरा को मिला और इसी के साथ मिली सूरदास की भक्ति के साथ साहित्य उर्वरा की शक्ति भी। आज अगर वरिष्ठ और विश्व-विख्यात कवि गीतकार दादा सोम ठाकुर इस शहर का साहित्यिक प्रतिनिधित्व करते हैं तो इस शहर की सबसे मनमोहक और समर्थ आवाज़ डॉक्टर रुचि चतुर्वेदी की भी हुआ करती है । जब आगरा के उल्लेख में रांगेय राघव, बाबू गुलाब राय, डॉक्टर प्रणवीर चौहान, डॉक्टर राम विलास शर्मा का नाम श्रद्धा से लिया जाता है तो एक नाम जो साहित्य-निष्ठा और साहित्य संस्कार के ध्वजवाहक के तौर पर लिया जाता तो है वो नाम भी डॉक्टर रुचि चतुर्वेदी का हुआ करता है । सत्य कहाँ उद्घाटित होगा सत्य समय से पूछ रहा है । साँसें कब मन को गाएंगी स्वर भी लय से पूछ रहा है ।। अपने वृक्षों पर माली का कोई भी अधिकार नहीं है । सींचे बगिया को नित लेकिन मिला भाग्य को हार नहीं है । मेरी कही करोगे कब तुम मन हिरदय से पूछ रहा है । साँसें कब मन को गाएंगी स्वर भी लय से पूछ रहा है ।। ज़िंदगी की गणित में अक्सर अनुभवों के फार्मूले काम करते हैं। लेकिन जब जीवन को दे खने का नज़रिया ही गणित हो तब मन गणितीय गणनाओं में ही ज़्यादा लगता है । ऐसे में गणित की 15 किताबें, 20 से ज़्यादा शोध पत्र और लगातार गणित के क्षेत्र में सज ृ न हो तो सामान्य है लेकिन जब इन सबके साथ साथ मन काशी में लगे और गंगा की लहरों पर भाव तैरने लगें तब ये असामान्य होता है । पावन शिव का धाम जहाँ का कण कण भी अविनाशी है । जिसको सारी धरा निहारे जगमग जगमग काशी है ।।
4
अनुराग्यम ्
और जब ये असामान्य, अद्भुत, अलौकिक भाव साहित्य में एकरूप हो जाते हैं तब वो नाम भी डॉक्टर रुचि चतर् ु वेदी होता है । काव्य की मंच परं परा में अपना स्थान निर्माण करते हुए डॉक्टर रुचि चतर् ु वेदी ने संस्कारों के साथ अपनी बोली को कभी नहीं छोड़ा। आगरा के किसी साहित्यिक मंच पर हों, विदे शी धरती पर प्रवासियों के बीच हों या दे श के श्रेष्ठतम साहित्यिक मंच लाल किले से उन्होनें काव्य पाठ किया हो उन्होनें कोई आवरण नहीं धारण किया। वो वैसी ही रहीं जैसी हैं। ज़रा सी बात पर ठहाका लगा दे ने वालीं। ज़रा सी बात पर आंखें नम कर दे ने वालीं। दनु िया के किसी भी कोने में कोई उनके काव्य की एक लाइन सन ु े उसे आगरा, जमन ु ा का किनारा, ताजमहल और वहां के पेठों की मिठाई की सग ध ं , सब याद आता चला जाएगा। ु कहौ दिवारी कैसी मन रई । धनतेरस पै का लै आये । औ का का पकवान बनाये ।। सतिया चार बनईयो द्वारे । चौक लगईयो बड़े तिवारे ।। पआ गड़ ू ु के आठ बनईयो । मनु कौं पहलें भोग खबईयो ।। मटर भिगोय दई रातइ कौं और, दाल कचौरिन काजें गल रई । कहौ दिवारी कैसी मन रई । दे श के हर राष्ट्रीय चैनल पर काव्य पाठ के समय उनका मस ु ्कु राता चेहरा इस बात का सच क होता है कि साहित्य अब भी सिर्फ ू तिकड़मबाज़ियों का मैदान नहीं है वो अब भी अविरल बहती गंगा है । दे श भर के तमाम रे डियो स्टेशनों से जब उनकी आवाज़ गंज ू ती है तब आगरा अपनी किस्मत पर इठलाता है और दे श आशीर्वाद दे ता है । और तब दे श-विदे श के 150 से ज़्यादा सम्मान डॉक्टर रुचि चतर् ु वेदी के नाम के साथ जड़ ते हैं और 2000 से ज़्यादा कवि सम्मेलनों की ु लिस्ट निरं तर खद को अपडे ट करती रहती है । ु सब अपने ही सम्मुख होंगे, या गरु ु द्रोण खड़े होंगे। और तम ्हारे पीछे अपने , अविचल मौन खड़े होंगे।। ु प्रथमध्याय सन ाता ह मैं , गीता का हे पार्थ सन ँ ु ु ो। ू अंतर्मन में हूँ मैं जीवन, रथ का प्रतिपल सार्थ सन ु ो। 3 जनवरी नए साल के तीसरे दिन की तारीख ज़रूर है लेकिन आने वाले समय में ये तारीख डॉक्टर रुचि चतर् ु वेदी के जन्मोत्सव की तारीख बनेगी। साहित्य की गंगा में उनके स्वर कल-कल बहते रहें गे। साहित्य यात्रा में मील के पत्थर उस राह पर जाने वाले हर किसी को रोक रोक कर उनका परिचय दे ते रहें गे।
पंकज शर्मा साहित्यकार एवं पत्रकार, आजतक
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जनवरी 2021
शा
म का समय था, आकाश की लालिमा ढ़लने को आतुर थी, कुछ अपूर्ण कार्य से मन विचलित सा हो रहा था। दो दिवस बाद मेरे कार्यक्रम में किसी विशिष्ट कवयित्री को लेकर टे न न्यूज नेटवर्क पर आने की चिन्ता थी। अनायास मेरे परम मित्र डाॅ प्रशान्त दे व का दरू भाष पर संपर्क हुआ और कार्य को जैसे पंख ही लग गये। दे खते ही दे खते कार्य सम्पादित हुआ। एक बड़े और जिस नाम की तलाश थी, उसकी खोज पूर्ण हुयी। एक ऐसा नाम जिसने गणित विषय में पीएचडी की हो, जिनके कई शोध प्रकाशित हुये हों, जिनके पास अनेकानेक पुरस्कार जैसे उन्हें पाने को आतुर हों, वो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी श्रेष्ठ कविताओं के लिये जानी जाती हैं, सुरीली स्वर की मलिका हैं और भावों के समन्दर में तैरना जिन्हें भली भांति आता है । सच बताऊँ वो रात बहुत ही सुकून से गुजरी, सुबह की लाली चढ़ते ही मन में बुलन्दी का आभास था। बार बार विशिष्ट कार्य के सम्पादन के लिये व्याकुल मन मोबाइल की ओर चला ही जाता था। सुबह 9 बजे ही थे, माकूल समय मानकर कर लगा दिया फोन। पहली बार हो रही बात में मेरी ओर से अनुनय विनय का भाव था। अचानक डर के बादल मंडराने लगे जब पता चला कि मेरे कार्यक्रम में किसी ट्रेनिंग कार्य की वजह से उनका उस निर्धारित समय तक आना मुश्किल सा था। पर एक आशीर्वाद का भाव जो सहज उनके स्वभाव से मिल रहा था, उससे कार्य सम्पन्नता की ओर बढ़ गया। कार्यक्रम में पहली बार समय परिवर्तन हुआ और पोस्टर बन गये। एक शानदार साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, कई नये लोग जुड़े और उनकी कविताओं को सराहा गया। आखिर बड़ा नाम तो बड़ा ही होता है ।
fojklr
संस्मरण कार्यक्रम समाप्ति के बाद बातें हुयीं फिर से और मेरे घर में मेरी धर्मपत्नी प्रिंसेस श्वेता, मेरे बच्चे सौम्या और संभ्रान्त को भी बातों में आत्मीयता मिली, आशीष मिला। मैं खश ु ी से फूले नहीं समा रहा था। मझ े लगा जै स े सालों से बिछड़ी ह य ी मेरी दीदी मझ ु ु े मिल गयी ु हांे। आज भी उनकी हर बातें मन को छू जाती हैं, आशीष के वचन और प्रभाव ऐसे हैं, लगता है साक्षात ् ईश्वर ने ही उनके माध्यम से मझ ु े प्राप्त होने के लिये भेजा हो। जब भी कोई दवु िधा होती है , मझ ु े मार्गदर्शन मिलता है , शिक्षा से लेकर अपने पारिवारिक या जीवन सम्बन्धी समस्याओं का सहज निराकरण प्राप्त होता है । जब भी सोचता हूँ -आँखों में एक सख ु द एहसास के आंसू छलक जाते हैं एक तपृ ्त हृदय में उद्गार उमड़ जाता हैं, प्रेम और आशीष की शीतल छाया में सक ु ू न के पल मिल जाते हैंै जब भी अपनी बिछड़ी दीदी डाॅ रुचि चतर् द ी को ध्यान करता हूँ। वे ु
कवि कुमार आदित्य ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदे श
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अनुराग्यम ्
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जनवरी 2021
fojklr रं जना श्रीवास्तव नागपुर, महाराष्ट्र
दीक्षा राय ‘शुभ्रा’ मऊ, उतर प्रदे श कविता : मधुर मिलन
शिव ताण्डव स्तोत्रमय रावणात सामवेद अकित शिव ताण्डव स्तोत्रमय। शनि है यदि कालमय त्रिलोकी शंभु महाकालमय।। सप्तदश स्तोत्र का हो नित पठन पाठन सिदधिमय। विश्वास हो उत्कृष्ट जीवन व्यक्तित्व पूर्ण प्रकाशमय । जटागंग कंठ भुजंग माला कर इमरू कल्याणमय। बालचन्द्र सुशोभित कृष्ण के प्रतिमा है पित ृमय।। आनन्द बदन कृपानिधान उदात्त भाल है स ृष्टिमय। माणिक्य आभा सर्प की शोभा पहुँ दिश रश्मिमय । पदपीठ पुष्प सुरमौलि वाले अञ्जलि धन धान्यमय। शिवाग्नि ज्वाला कामदे व हल कृपा शंभु अदधिमय।। अम्बा प्रकृति शिव चित्रकार हो तूलिका वरदानमय। रुद्र शिव विष कण्ठ सोहे अमावस्या ज्यो रातिमय।।
मधुर मिलन के मधुर क्षणों में भावों की बात जरुरी है बिन अधरों के खोले ही नैनों की बात जरुरी है .. छायी गहरी निशा घनेरी चाँदनी रात जरुरी है मित मिलन के मधुर क्षणों में कुछ संगीत जरुरी है .. बिन पायल के शोर किये चुड़ी की खनक जरुरी है अधरों की मिटती लाली में बिंदिया की चमक जरुरी है .. मधुर मिलन के मधुर क्षणों में भावों की बात जरुरी है तन मन भाव समर्पित कर दँ ू तेरा प्यार जरुरी है .. तेरे दिल की धड़कन पर मेरा अधिकार जरुरी है
मुण्डमाल पिलोक मती यमराज वशीकृत मृत्युमय। सौष्टांग तापमा जालित मुद्रा द्रक्कानि मृदं गमय।। इमरू जनित हैं नाद चतुर्टश माईश्वर समभावमय। करबद्ध हैं दर्शनाभिलाषा हर गीत आरत छन्दमय।। सफटिकसमान उज्ज्वल रूप शिव साक्षात धर्ममय। सर्वांग सुन्दर वृषभ गन्दी दल ू ्हे की सवारी प्रेममय।। शिव परिणय में बाराती पिशाच याला प्रेतमय। या किल्ला गंधर्व के संग बारात अदभुत ऐश्वर्यमय।। दल ू ्हावेश रुद्र शिव की अप्रतिम सीमा तेजमय पवित्र दिव्य बारात का हिमालय प्रयाण ओजमय।। नमक की उमम गजगड भेरी धुन सुनादमय। ढक्का ध्वनि और शंख का गंभीर नाद माधुर्यमय।। गौतनल्य कणन रणनकी मंगल जनि संगीतमय। शुभ निनाद से सश ु ोभित जित्लोक मुंजित काव्यमय।। बिल्वपत्र भाए राख लगाए मंडप सजा है गौरमया। नन्दी सवारी हो गण बाराती धतूराभाग आहारमय।। आनन्ददाता समाधि मुद्रा सौन्दर्य आभा परागमय। शुभ मंगला हरतालिका शिव परिणय शिवमन्नमय।। ध्यान केंद्रित मन्त्रोच्चार मुंजे भक्त शिव एकात्ममय। शिव ताण्डव गान गाएँ जीवन मधुर हो जामीमय।। स्मरण ध्यान वर्णन श्रवण फल श्रद्धा विश्वासमय। लौकिक बन्धन सारे कट मुक्ति मिले परमधाममय।।
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अनुराग्यम ्
अविनाश सिंह गोरखपुर, बिहार
हाइकु : हार या जीत
हार या जीत सिक्के के दो पहलू ना करो भेद।
हार या जीत परिवर्तन शील नही अडिग।
हार या जीत होते मन के भ्रम भरे अहम।
हार या जीत न मिले लगातार करो संघर्ष।
हार या जीत कर्म के होते फल कम या ज्यादा।
हार या जीत मिलेगा एक दिन मान या ठान।
जीत या हार जीवन के दो मंत्र रहो तैयार।
हार या जीत दे गम या अहम रहना दरू ।
हार या जीत गाड़ी-चक्का समान उलट फेर।
हार या जीत दे गा दख ु या सुख पहले उठ।
हार या जीत सावधानी से चुनो आगे को बढ़ो।
हार या जीत है दीपक के रूप दे ता प्रकाश।
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जनवरी 2021
fojklr कहकशां दे हरादन ू , उत्तराखंड कहमुखरी
मैं बारिश में उसे उठाऊँ, बाहों में भर, गले लगाऊँ, कड़ी धूप में भी वो भाता, क्या सखि साजन? नहि सखि छाता ।1। बंद कमरे में जोश दिखाता, पल में तन की आग बुझाता, उससे मुझे शर्म है कैसी, क्या सखि साजन?नहीं सखि ए.सी ।2। दो -दो बार गरम हो जाता, बजा सीटियां मुझे बुलाता, पछताई मैं उसको छूकर, क्या सखि साजन? नहि सखि कूकर ।3। तन में गर्मी ,उसे पुकारूं , बैठ उसी की राह निहारूं , सूना है आंगन भी घर का , क्या सखि साजन? नहि सखि बरखा ।4। लिपट-लिपट कर मुझको चूमे, आगे पीछे मेरे घूमे। बना रहे वो गले का पट्टा। क्या सखि साजन? नही दप ु ट्टा ।5। दिन भर उसकी राह तकंू मैं, मन मर्ज़ी से पा न सकंू मैं। वो आए तो छोड़ दं ू काम, क्या सखि साजन? नही सखि शाम ।6।
मीनू बाला
जालंधर, पंजाब हे राम ! तेरे दे श की यह है कैसी माया पहले द्रौपदी का चीर हरण, आज नोची जाती मासूम की काया.. पोषण करती छाती के दध ू से जिसका, लूट के उसकी अस्मत इंसा मर्द कहलाया.. मुझे तो यह किसी इंसान का नहीं, लगता है किसी नश ृ ंस जानवर का जाया.. नहीं चाहिए किसी की सहानुभूति, ना किसी नेता का घिनौना साया.. हे सीते! तुम ही जगाओ अब अपनी माया.. भर लो छाती में दध ू की जगह रक्त, आंखों में आक्रोश की ज्वाला.. रणचंडी बन विध्वंस कर दो हर उस नश ृ ंस नर को, जो मर्द कहला कर नारी की इज्जत ना कर पाया..
डी पी सिंह गाजियाबाद, उत्तर प्रदे श दोहे (1) ऊपर वाले का करम, और करम का लेख। तदनुसार ही फल मिले, करम हमारे दे ख।। (2) वरन चहहु कामायनी, तजहु वरन अरु ठौर। गौर वरन मत दे खिए, वरन-वरन कर गौर।। (3) माँ! ऐसा आशीष दो, मन निर्मल हो जाय। कल कल करती काव्य की, सरिता बहती जाय।। (4) जीवित रखिए आत्मा, मन में रखिए धीर। गिद्ध सदा ही नोचते, निर्बल, मृतक शरीर।। (5) तीर और शमशीर से, तेज शब्द की धार। सदा सर्वदा कीजिए, सोच समझ कर वार।। (6) छाया तबतक ही रहे , इस काया के सङ्ग। जबतक रवि की रौशनी, पड़े हमारे अङ्ग।। (7) संस्कार माँ ने दिये, जिसका है यह सार। नज़र झुका, कर, थाल में , चन्दा का दीदार।। (8) दे ख लीजिए कलयुगी, रक्तबीज अवतार। दस आतंकी मारिए, होते सौ तैयार।। (9) डीपी लखि परिवेश को, गुण अवगुण मत तोल। मधुमक्खी के डंक में , कब मिठास की घोल? (10) चादर से बाहर सदा, लेते पग फैलाय। अन्य आय फिर ढूँढते, कर कर के अन्याय।। (11) खेल कहाँ अब रे ल का, बना बालपन रे ल। बिछुड़ा माँ के अंक से, शुरू अंक का खेल।।
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अनुराग्यम ्
7
जनवरी 2021
fojklr अब्दुल वसै
शायर, नई दिल्ली नज़्म : उलझन
वसध ु ा की दवु िधा
रात, सन्नाटों से बनके मिलती है सहे ली ज़िन्दगी रोती है , चीख़ पड़ती है अकेली ज़ेहन की छत पे फिर साए पनप उठते हैं फिर ख़यालों के नए बाजार भी सज उठते हैं फिर गज़ ु रता है ये लम्हा सदियों की तरह...
"क्या हुआ आज घर नहीं जाना क्या ?" कनक ने जब तेज आवाज में पूछा तो वसुधा जैसे नींद से जाग गई। अपना पर्स उठाते हुए घर जाने की तैयारी करने लगी । रास्ते में भी वसुधा ने अपनी सहे ली कनक से कोई बात नहीं की, बस सड़क पर गुजरते वाहनों को दे खती रही।
उसी लम्हे में कहीं दरू , किसी और शहर में फिर उसी शहर के, दोराहे की तंग गली में क़ैद से कमरों में , साज़ों पे थिरकते हुए मन डूबे हुए रोशनी में , ग़म से बे-होश से मन चीख़ को खद ु में , दबोचे हुए ख़ामोश से मन किसी शर्बत के नशे में , मदहोश से मन दर्द में लिपटे , वो लहराते नज़र आते हैं रात की गोद में अक्सर वो बिखर जाते हैं...
घर आ कर पति मयंक के लिए चाय तैयार कर खुद भी चाय की चुस्की लेते लेते यादों की दनु िया में खो गई।
रात वीराने में रूह, निकलती है खश ु ी कि दबे क़दमो से, चली जाती है मीलों तक दर-ब-दर सर् को पटकती है , कोई तो सन ु ले घसीटती जाती है खद को, स न सान सड़क पर ु ु क़तरा क़तरा ही सही, रूह फ़ना होती है छिल जाता है वजद ू , बाहर से भी अंदर से कुरे दती रात है ज़ख्म, ग़म के नाखन ू ों से लहू बहता है , साथ में अरमाँ सारे तिलमिला उठती है दर्द से, रो उठती है कर्ब है कितना, जो ज़िन्दगी सहलेती है ... सांप सी रें गती उसी रात के, पिछले पहे र में यानी कोई और सा दे श, कहीं और शहर में बंद होजाते हैं सभी कान दर-ओ-दीवरों के ज़िन्दगी चीख़ती है , ख़न ू के फौव्वारों में सिलवटें चादर की, बेरहमी से ज़बह होती है बड़ी तहज़ीब लिए आख़िर, यह सब ु ह होती है
ग़ज़ल : झूठ को छोड़ा है झूठ को छोड़ा है जब से, सब कटीले हो गए ख़ोवाब सारे ज़िन्दगी के, और नक ु ीले हो गए गांव की बगिया में तितली,कुछ कंवारी हैं अभी कौन केहता था के सब के, हाथ पीले हो गए इश्क़ में उसके ज़हे र,या वो बुरा था कियूं कहुँ इश्क़ उस के लब से पीकर होंठ नीले हो गए था कसा उसका बदन, जब वो मेरे हमराह था अब बिछड़कर मुझसे कंगन,उसको ढीले होगए लफ्ज़'वासे' गालियों के दिल दख ु ाते भी नहीं होंठ का छू कर के कोना सब रसीले हो गए बस ख़ुमारी के लिए, अंगूर का शर्बत ही क्यों इक नज़र नैनों को दे खा, अर नशीले हो गए
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प्रियंका जायसवा गाजीपरु , उत्तर प्रदे श
अनुराग्यम ्
" सावित्री तुम बेकार ही चिंता करती हो हमारी बेटी ही हमारा बेटा है । आज समाज बदल रहा है हमें भी अपनी सोच को बदलना होगा । हम अपनी वसुधा को खूब पढ़ाएंगे और इसे अपने पैरो पर खड़ा करें गे और तुम दे खना वसुधा ही हमारे बुढ़ापे का सहारा होगी। " पिताजी की बाते पर्दे के पीछे खड़ी वसुधा भी सुन रही थी और मन ही मन तब से ही वसुधा ने निश्चय किया था कि आत्म निर्भर बन कर अपने पिताजी के सपने को अवश्य पूरा करे गी। ऐसे तो वसुधा के पिताजी एक छोटे से कपड़े की दक ु ान चलाते थे पर वसुधा और सुधा की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया । बेटियों ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। समय बिता और वसुधा ने विश्व विद्यालय में प्रवेश लिया । विश्वविद्याल वसुधा के कस्बे से दरू शहर में था। पिताजी ने भी सहर्ष अनुमति दे दी और साथ ही हॉस्टल में भी दाखिला करा दिया ताकि आने जाने में समय बर्बाद ना हो और वसुधा पूरी तरह से पढ़ाई पर ध्यान दे सके। वसुधा घर के आर्थिक हालत से भली भांति परिचित थी उसने भी पिताजी पर पूरी पढ़ाई का बोझ ना आए इसलिए ट्यूजन दे ने का निश्चय किया और जल्दी ही उसकी मेहनत रं ग लाई। साथ ही साथ सरकारी नौकरी की तैयारी भी करने लगी। कुशार्ग बुद्धि की मालिक वसुधा ने तो जैसे सोच ही रखा हो कि जल्द से जल्द आत्म निर्भर बन कर पिताजी के सपने को पूरा करे गी। और वो दिन भी आ गया जब वसुधा का चयन कर्मचारी आयेाग में हो गया। पिताजी को यह समाचार दे ते हुए वसुधा भी अंदर ही अंदर गौरवान्वित महसूस कर रही थी और पिताजी तो जैसे झूम उठे " मै ना कहता था सावित्री बेटी और बेटा मे कोई अंतर नहीं है । " उस दिन सोमनाथ जी ने पूरे मोहले में यह समाचार मिठाई के साथ दी कि आज उनकी बेटी ने उनका सपना पूरा कर दिया। कुछ ही दिनों बाद वसुधा की पहली पोस्टिं ग दिल्ली हो गई और वह दिल्ली चली आई। समाज के रीति को बदलना मुश्किल है , बेटी तो पराई होती है उसको दस ू रे घर जाना होता है । अब सोमनाथ को वसुधा के लिए योग्य वर की तलाश थी। सोमनाथ ने बेटी को कभी बेटी नहीं समझा था इसलिए कभी दहे ज की भी चिंता नहीं की। लेकिन जब वर के तलाश में निकले तो पता चला कि समाज में अभी दहे ज का लोभ वहीं है बस तरीका बदल गया है मांग की। आखिरकार उन्होंने अपनी वसुधा के लिए मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत मयंक को पसंद किया । विवाह संपन हुआ और वसुधा मयंक के साथ दिल्ली आ गई। हमेशा पढ़ाई में लीन रहने वाली वसुधा के लिए बाहरी दनु िया में यह पहला कदम था । पति मयंक ने उससे अपने प्यार के समन्दर में डूबो दिया। वसुधा खुद को
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जनवरी 2021 भा्यशाली समझती थी कि इतना समझदार, सुलझा, हसमुख पति मिला। वसुधा खुश थी मयंक को पा कर और मयंक खुश था वसुधा जैसी जीवनसंगिनी पा कर। दिन बीते और शादी के चार महीने भी हो गए। अब वसुधा को लगा कि यही समय है मयंक से बात करके अपने पिताजी के सपने के बारे में बताने की। वसुधा ने मयंक को बताया कि किस तरह आमदनी ना होने पर भी उसके पिताजी ने उससे पढ़ाया लिखाया और इस काबिल बनाया, और हमेशा ही उसको अपना बेटा माना। " मयंक मुझे लगता है कि मुझे अब सुधा की जिम्मदारियां उठानी चाहिए आखिर मेरा भी तो अपने घर के प्रति कोई जिमेदरी होती है आज में को कुछ भी हूं उनके वजह से ही हूं। " वसुधा " तो मैंने भी तो बिना दहे ज लिए तुम से शादी की, एक तरफ़ मेरे दोस्तों को बड़ी गाड़ी और नगद मिल रहा था मैंने तुमको सिर्फ इसलिए चुना की तुम कमाती हो , अगर तुमको अपने पिताजी का बोझ ही उठाना था तो तुमको शादी नहीं करनी चाहिए थी। " मयंक वसुधा ने मयंक को समझने का प्रयास किया और कहा " लेकिन तुम बेटी और बेटे में अन्तर कर रहे हो । जिस तरह तुम अपने माता पिता को गांव से लेकर शहर में सेवा करना चाहते हो में भी अपने पिताजी के बुढ़ापे का सहारा बन कर उनकी जिममेदारियां उठाना चाहती हूं , सुधा के पढ़ाई और शादी के खर्च में पिताजी को सहयोग करना चाहती हूं ।" " और मेरी सारी तनख्वाह तो तुम ही के लेते हो" लगभग रोते हुए वसुधा ने कहा " तो क्या तुम यहां फ़्री में रहना और खाना चाहती हो, अगर तुमको अपने घर की हालत ही बदलनी थी तो शादी नहीं करनी चाहिए थी, पड़ी रहती अपने बाप के घर में ।" गुस्से में कहते हुए मयंक कमरे से बाहर निकाल गया। सोफे पर बैठी हुई वसुधा को आसुओं के साथ कब नींद आ गई पता ना चला । "लगता है आज चाय कुछ ज्यादा ही अच्छी बनी है इसलिए तुम चुपचाप पी रही हो" कहते हुए मयंक ने वसुधा के कंधे पर हाथ रखा तो वसुधा वर्तमान में लौट आई। बात को ताकते हुए वसुधा ने कहा " नहीं सोच रही थी कि रात के खाने में क्या बनाऊं"। आज तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही खाना छोड़ दो मैं कुछ बाहर से मांगा लेता हूं। कहते हुए मयंक अपने लैपटॉप की दनु िया में खो गया। अचानक ही मयंक को जैसे कुछ याद आया " अरे हां आज सुबह तुम्हारे पिताजी का फोन आया था क्या कहा रहे थे वो ?" " कुछ भी तो नहीं बस हाल समाचार ले रहे थे" वसुधा का दिल चाह रहा था कि वह मयंक से बात करे और बता दे की समय आ गया जब उसे अपने बाबूजी के सपने को सकार करना होगा लेकिन का ना सकी। " में कपड़े बदल कर आती हूं " इतना कह वसुधा कमरे म चली गई। अंदर से ही हिम्मत कर वसुधा कमरे से ही बोल पड़ी " मयंक सुधा के लिए शादी का प्रस्ताव आया है , अच्छे लोग है , लड़का सरकारी डॉक्टर है । उनको भी हमारी सुधा बहुत पसन्द है । लेकिन..... लेकिन क्या ? उनको दहे ज चहिए। अरे भाई , सब मेरी तरह कहा होते है जो बिना दहे ज के शादी करे ।" मयंक " नहीं मयंक उनको दहे ज नहीं चाहिए । बस शादी किसी अच्छे होटल से करना चाहते है । जैसा कि तुमने कहा था। दहे ज ना लेकर
fojklr वसुधा की दवु िधा.... भी अच्छी शादी के नाम पर जो बोझ तुमने मेरे पिता पर डाला था वो किसी दहे ज से कम नहीं था। घर की पहली शादी थी इसलिए पिताजी ने वह भार उठा लिए था लेकिन इस बार पिताजी यह भार अकेले नहीं उठा सकते। इसलिए में सोच रही थी कि अगर हम..…...।" वसुधा अगर हम क्या ? बीच में ही मयंक ने बात काट कर मयंक ने कहा " मैंने तुमको पहले ही कहा है अगर तुमको अपने बाप की जिममेदारियां ही उठानी है तो तुम उनके घर जा कर ही रहो । " और अपना गुस्से से दमदमता हुए चेहरा लेके कर मयंक घर से बाहर निकाल गया। रात वसुधा के आंखो में कोई नींद नहीं थी बार बार बस सोचे जा रही थी कि क्या बेटियां सच में पराई होती है ?" क्या बेटियों कि यह जिममेदारी नहीं की वह अपने माता पिता की दे खभाल करे ?" तो क्या वह जमाना सही था जब बेटियों को बेटे कि तरह पालन पोषण नहीं मिलता था। कहा बदल पाया है समाज ? आज भी बेटियां पराई है । आज का पढ़ा लिखा कहा जाने वाला वर्ग भी कहा बदल पाया है , और ना ही इस बात को स्वीकार कर पाया है कि बेटियां बेटे की तरह अपने माता पिता की जीमेदरी उठा सकती है । इन सब बातो से उलझती हुई वसुधा कब सो गई उससे पता नहीं चला। नींद तब खुली जब मयंक चाय बनाने के लिए आवाज दे रहा था। आज ऑफिस नहीं जाना क्या ? मयंक " नहीं कल रात से तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है तो सोच रही हूं कि आज घर पर आराम करूं "। वसुधा "अच्छी बात है आज तुम आराम कर लो "कहते हुए मयंक तैयार होने बाथरूम में चला गया। घर में इतना अंधेरा क्यूं है , कहते हुए मयंक वसुधा को आवाज दे ने लगा, लेकिन वसुधा नहीं मिली , मिला तो उसका लिखा हुआ पत्र प्रिय मयंक मै आपका बहुत धन्यवाद करती हूं , आपने अपनी पत्नी को प्यार और सम्मान दिया जिसकी में सदै व आभारी रहूंगी । किन्तु इन दो सालो में एक घुटन सी महसूस होती थी । सब कुछ था मेरे पास आपका प्यार , आपका साथ पर हमेशा एक बात की कमी लगती थी। कल जब बाबूजी का फोन आया तो उस घुटन का कारण समझ आया जिस सपनों को आंखो म लिए में बड़ी हुई उसे पूरा किए बिना में आपके सपनों में रं ग भरने लगी। मयंक में जा रही हूं अपने बाबूजी के सपने को साकार करने । उनके बुढ़ापे का सहारा बनने । आपकी वसुधा मयंक को लगा सांप सूंघ गया हो दिल किया अभी जाए और वसुधा को वापस ले आए पर दिमाग ने कहा नहीं अगर अभी गया तो वसुधा को उसके मायके वालों की आर्थिक मदद करने से कभी भी रोक नहीं पायेगा। सोचा २-४ दिन में वसुधा खुद चली आएगी या उसके घर वाले भेज दें गे। दिन, महीना, साल बीत गए पर वसुधा नहीं अाई। आखिर उसको अपने दवु िधा का कारण जो पता चल गया था।
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अनुराग्यम ्
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दास्तान-ए-बनारस
रुखसार अहमद खान बनारस, उत्तर प्रदे श मङ्गल यत्र विभूतिश्च विभूषणम ् । कौपीन यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ।। इस श्लोक में काशी अर्थात वाराणसी का महत्व बताते हुये काशी के पवित्र और पुण्य यश का बखान किया गया है । “जहां पर मृत्यु को प्राप्त होना परम कल्याणकारी और पुण्यदायी हो। जहां पर शरीर पर भस्म धारण करना एक आभूषण धारण करने के समान हो। जहां साधारण सी लंगोट भी रे शमी वस्त्र के समान हो। उस काशी के पुण्यदायी स्वरूप की तुलना किससे की जा सकती है । ऐसी काशी का यश एवं महत्व अतुलनीय है ”। सामूहिकता जीवन का परिचायक है तो वही एकाकीपन नीरसता को संबोधित करता है । बनारस एक कैसा शहर है जो अपने सामूहिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है । संभवत विश्व के सबसे प्राचीनतम शहरों में से एक, जहां समय भी रुक जाता है यहां पर तमाम ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें पता ही नहीं कि वह यहां कब से रह रहे हैं। इन लोगों में आम आदमी, नागा साधु एवं विदे शी भी शामिल है । किसी ने क्या खूब लिखा है कि बनारस दिल में तो आता है पर समझ में नहीं आता। यह मात्र एक धार्मिक नगरी नहीं बल्कि एक ऐसा शहर है जहां अनेकों सभ्यताएं एक साथ चलती है और बखूबी एक दस ू रे को अपने में समेटे हुए हैं। यह सामूहिकता ही इस शहर को एक अलग रं ग प्रदान करती है । हिंदी में एक कहावत है : काशी का अद्भुत व्यवहार, सात वार, नौ त्योहार। यानी बनारस है एक ऐसा शहर है , जहां हर समय त्योहार सा माहौल रहता है । यह माहौल बनारस की सामूहिक संस्कृति का जीता जागता उदाहरण है । यहां के लोग अकेले ना रह कर समूह में जीना पसंद करते हैं इसलिए चाहे वह चाय की दक ु ान हो पान की दक ु ान हो अथवा कोई अन्य प्रतिष्ठान, सर्वत्र आपको बनारसी समूह में दिखाई दें गे। यदि हम इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि महात्मा बुध के एकाकीपन को भी काशी ने समाप्त कर दिया था और महात्मा बुद्ध के 5 शिष्य तुमने काशी में मिले जिन्हें महात्मा बुध ने सर्वप्रथम उपदे श दिया उस घटना को हम धर्म चक्र प्रवर्तन के नाम से जानते हैं। बौद्ध कथाएँ हमें बतलाती हैं कि शक्र और महाब्रह्मा की प्रार्थना को स्वीकार कर बुद्ध वज्रासन से उतर पड़े और वाराणसी की ओर चले।
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वहां पर सारनाथ में , जिसे उस समय इसिपतन कहते थे, उन्हें उनके पुराने पांच साथी मिल जो आगे चल कर पंच भद्रवर्गीय भिक्षु कहलाये। इन भिक्षुओं को उन्होंने सर्वप्रथम बहुजनहिताय बहुजनसुखाय अपना अमूल्य उपदे श दिया और इस प्रकार अपने धर्मचक्र को गति दी। काशी आज भी सामूहिकता के धागे में पीर हुआ अपने लोगों को समूह में रखने के सामर्थ्य को बनाए हुए हैं इस तकनीकी युग में जहां नई पीढ़ी मोबाइल इंटरनेट इत्यादि में फंसकर एकाकीपन की ओर बढ़ रही है वही बनारस आज भी नुक्कड़ सभा चाय और पान की दक ु ान पर स्थानीय दे सी ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय विश्व पर विमर्श करते हुए दे खा जा सकता है . बनारस एक ऐसा शहर है , जहां के लोग धर्म जात एवं आर्थिक स्तरीकरण से ऊपर उठते हुए अपने दोस्तों के समूह को प्राथमिकता दे ते हैं . यह बनारस की संस्कृति है जो हमें ना भेदभाव से दरू करती है बल्कि इस युग में जहां लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो रहे हैं बनारस के लोग एक दस ू रे का साथ बनाए हुए हैं. यहां के लोग दिन में कितनी ही मेहनत मशक्कत क्यों न करें , शाम को अपने दोस्तों के साथ समय व्यतीत करना बैठना पसंद करते हैं. बनारस की सामूहिकता केवल जीवन में ही नहीं बल्कि उन लोगों की जिनकी जीवन की शाम ढल चुकी है वह भी मुमुक्षु भवन में सामूहिक रूप से जीवन अवसान की ओर अग्रसर होते हैं बनारस के सामूहिकता यहां भी समाप्त नहीं होती यह थोड़ा आगे बढ़ती है एवं जीवन के अंतिम चरण पर भी अपनी मुहर लगाती है तभी तो चाहे मणिकर्णिका घाट हो अथवा हरिश्चंद्र घाट हो ब्रह्मलीन होते शरीर भी सामूहिक रूप से अग्नि का आवाहन करते हैं इस प्रकार हम दे खते हैं कि बनारस जिसे लोग अनेक कारणों से जानते हैं उन्हें भी शायद यह नहीं पता है कि बनारस अजर क्यों है , शायद इन कुछ पंक्तियों के बाद उन्हें भी पता चल जाए कि बनारस की समूह में रखने वाली संस्कृति ही इसे अजर बनाती है जब तक बनारस के लोग समूह में रहें गे तब तक यह शहर भी अपने यौवन अवस्था में जीता हुआ अजर रहे गा यह दे खिये कैसी सुरम्या , राजति काशीपुरी शिव भक्ति से अतिदरू होती , छद्म माया आसुरी जलपान से है ज्ञान बढ़ता , ज्ञानवापी कूप से कुष्ठादि रोग निवृत्त होते विश्वनाथी धूप
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छीनता बचपन बचपन शब्द कानों में पड़ते ही हमारे जेहन में मस्ती, शरारत, भोलापन इत्यादि जैसी बातें असर दिखाने लगती है । यह जीवन की एक ऐसी अवस्था है जिसमे खेलना -कूदना, भागना -दौड़ना, जिद करके कोई भी चीज प्राप्त कर लेना शामिल है । माँ का आँचल हमे जन्नत से भी प्यारा दिखता है वही हम अपने माता पिता के दल ु ारे , आँख के तारे होते हैं तथा माता पिता भी छोटी से छोटी जिद को भी पूरा करने में कोई कोर कसर नही छोड़ते। वही दस ू री तरफ हम दे खें तो समाज का एक ऐसा तबका भी है जिनका बचपन इन सब चीजों से वंचित रह जाता है । जब एक पिता अपने लाडले को स्कू टर पर या फोर व्हीलर में स्कू ल छोड़ने जाता है तो चाय की दक ु ान पर या सत्तू की दक ु ान पर बर्तन धोता हुआ बच्चा उसे दे खकर क्या फील करता होगा? सोचता होगा बेचारा ''काश मैं भी स्कू ल जा पाता, मुझे जीने को मिलता''। सर्दियों में जब हम गर्म कम्बल में है तो न जाने कितने बच्चे उस समय काम पर जाते
भी ऐसा बचपन आराम फरमाते हुए मिलते हैं ।
बिहार के सीमावर्ती जिले पूर्णिया में हर साल मखाना उद्योग में फसल कटाई और प्रसंस्करण संबंधी कार्यों में मधुबनी और दरभंगा से हज़ारों मजदरू विस्थापित होकर मजदरू ी करते हैं जिसके कारण मजदरू ों के बच्चों की शिक्षा अनियमित और अस्थिर हो जाती है । इसके अलावा बहुत सारे वैसे बच्चे है जिन्होंने कभी स्कू ल का मुंह भी नही दे खा और मजदरू ी में लग गए। आज दोपहर में अपने टीम के साथियों के साथ पूर्णिया जिले के हरदा क्षेत्र में फील्ड विजिट के दौरान चौकाने वाले तथ्य सामने आए। यहां काम करने वाले मजदरू ों में करीब 70% नाबालिग बच्चे हैं (फोटो में आप दे ख सकते हैं) जिन्हें दो समय का खाना दिया जाता है और 16 से 18 घंटे तक कार्य लिया जाता है । अगर हम कपड़े की बात करे तो बच्चों के तन पर हाफ पैंट के अलावा और कुछ नही है । पूरी दनु िया में बाल मजदरू ी पर रोक न लगा पाने को लेकर चिंताएं हैं (ध्यान दीजिए सिर्फ चिंताएं ही हैं)। भारत समेत कई दे शों में असंगठित क्षेत्र में बाल मजदरू ी एक विकराल समस्या बन गई है ।
श्रोजी चतुर्वेदी संदलपुर, पटना, बिहार सरकार भी विभिन्न कार्यक्रम चलाती है लेकिन वे भी कुछ दरू चलकर दम तोड़ दे ते हैं। भारत में बाल मजदरू ी प्रकट-अप्रकट कई स्तरों पर मौजूद है जबकि उन्मूलन के उपाय कमतर होने के कारण उसके हश्र क्या हो रहे है वो आप दे ख ही रहे है ।चमक दमक से घिरी विभिन्न आर्थिक रिपोर्टो में इस बदहाली पर ध्यान दे ना न सरकार को सूझता है न ही उसके कारिंदों को। भारत में बाल मजदरू ी मिटाने वाली आमूलचूल बदलावों की प्रक्रिया नदारद है और उसपर भुखमरी, प्राकृतिक आपदा, बीमारी, बेरोजगारी, पलायन और विस्थापन ने हालात को और मुश्किल तथा पेचीदा बना दिया है । भारत में बाल मजदरू ी से निपटने के लिए खतरनाक व्यवसायों से (मखाना बनाने की प्रक्रिया भी खतरनाक तरीके से संचालित होती है ) बच्चों को छुड़ाने की सरकारी और गैर सरकारी कोशिशों को और सेंट्रलाइज्ड एनर्जी के साथ चलाए जाने की जरूरत है । यहाँ ध्यान दे ने वाली बात यह भी है कि सिर्फ बाल मजदरू ी ही नहीं बल्कि तस्करी और यौन उत्पीड़न के जाल में भी बच्चों को फसाया जा रहा है ।c इस लिहाज से सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों को और भी बेहतर तरीके से कार्य करने की जरूरत है । उन्हें बेहतर तरीके से पुनर्वासित करने की जरूरत है (बेहतर तरीके से पुनर्वासित करने का मतलब सिर्फ पीड़ित बच्चों को आवासीय सुविधा या भूख से बचाना ही नहीं, बल्कि उन्हें मनोवैज्ञानिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रखना भी जरूरी है )। इसके अलावा समाज के जागरूक युवाओं का एक सक्रिय दल बनाकर बाल मजदरू ी पर 24 घंटे एक मुस्तैद निगरानी सिस्टम की भी जरूरत है । मेरा मानना है कि कानून के डर और नियमों की सख्ती से ज्यादा जरूरी है कि स्थायी सहयोग और निरं तर काउं सिलिंग होती रहे ।
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बिसरा मुंडा 15 नवंबर 1875 के दशक में छोटा किसान के गरीब परिवार में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। छोटा नागपुर पठार (झारखण्ड) निवासी मुंडा एक जनजातीय समूह था । आदिवासी लोंगो को संगठित दे खकर ब्रिटिश सरकार ने बिरसा जी को 1900 में इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें 2 साल की सजा दी गई । और अंत में 9 जून 1900 को लगभग सुबह 8 बजे मे अंग्रेजो द्वारा उन्हें जहर दे ने के कारण उनकी मौत हो गई। गरीब परिवार में बिरसा का जन्म हुआ जो मुंडा जनजाति के थे। पिता का नाम सुगना पुर्ती और माता का नाम करमी पुर्ती था। झारखण्ड के राँची के खूंटी जिले के उलीहातू गाँव में बिरसा पुर्ती का जन्म 15 नवम्बर १८७५ को हुआ था। साल्गा गाँव में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे चाईबासा (गोस्नर एवंजिलकल लुथार) विधालय में शिक्षा प्राप्त की। इनका मन हमेशा अपने समाज प्रति समर्पित था वो अँग्रेजों द्वारा की गयी अनिष्ट दशा पर सोचते रहते थे। बिरसा मुंडा ने लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिये अपना नेततृ ्व प्रदान किया और स्वतंत्रता संग्राम की युद्ध में उतर गए। १८९४ में छोटानागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की। आर्थत आंधविशवस जैसे भूत प्रेत डाईन प्रथा से दरु करने के लिय लोंगों को प्रेरित किया करते थे । नौजवान नेता के रूप में 1 अक्टू बर १८९४ को सभी मुंडाओं को एकत्र कर बिरसा ने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। बिरसा को 1895 गिरफ़्तार कर लिया गया उन्हें दो साल के कारावास की सजा दी गयी और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में भेज दिया गया। अपने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की बिरसा और उनके शिष्यों ने ठान रखी थी और जिससे बिरसा अपने जीवन काल
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अनुज शुक्ला भोपाल, मध्यप्रदे श
में जनता के लिए एक महापुरुष हुए। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा करते थे। उनके प्रभाव की वृद्धि होने के बाद पूरे आदिवासी मुंडाओं में संगठित होने की लौ जली। मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों 1897 से 1900 के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके साथी लोगों ने अंग्रेजों को खूब सबक सिखाया और उन्हें खूब परे शान किया था। बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर अगस्त 1897 में खट ूँ ी थाने पर धावा बोला। मुंडाओं 1898 में तांगा नदी के किनारे अंग्रेज सेनाओं से युद्ध हुआ जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार हुई ततपश्चात उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं। एक घटना में बहुत सी औरतें व बच्चे मारे गये थे जो डोम्बरी पहाड़ पर जनवरी 1900 में हुआ था । उस जगह बिरसा अपनी जनता को अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने व दे श की स्वतंत्रता के ऊपर भाषण दे रहे थे। कुछ समय पश्चात बिरसा के कुछ शिष्यों को बंदी बना लिया गया और अन्त में स्वयं जननायक बिरसा भी चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये दिनांक 3 फरवरी 1900। बिरसा ने 9 जून१९०० को अपनी अन्तिम साँसें लीं उनकी मृत्यु आंग्रेजों द्वारा जहर दे कर हुई थी| आज भी जननायक बिरसा मुण्डा को बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में भगवान की तरह पूजा जाता है । राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित बिरसा मुण्डा की समाधि स्थल है और वहीं उनकी मूर्ति भी स्थापित की गई है । बिरसा मुंडा की स्मृति में रांची में केन्द्रीय कारागार तथा अंतरराष्ट्रीय विमानक्षेत्र भी है ।
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आकांक्षा शर्मा cukjl] mÙkj çns’k प्रिय पाठक गण, मुझे श्रीमती रुचि चतुर्वेदी जी के साक्षात्कार को लिखने में आज अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है , श्रीमती रुचि चतुर्वेदी जी दे श में एक ऐसी विदष ु ी महिला हैं जो गुणों की खान हैं।हमारा सौभाग्य है कि हमें इनके बारे में इतना कुछ जानने को मिला है , अनुराग्यम ् की महा सचिव श्रीमती आकांक्षा शर्मा जी ने इस महान व्यक्तित्व का साक्षात्कार किया, उनका हम धन्यवाद करते हैं कि आपने अपने अमूल्य समय में से कुछ समय निकालकर अनुराग्यम ् को अवसर दिया कि हम आप का साक्षात्कार कर सकें और हमें अनुमति दी कि इस साक्षात्कार को हम अपनी मासिक पत्रिका विरासत में स्थान दें सकें। श्रीमती रुचि चतुर्वेदी एक जानी-मानी अंतर्राष्ट्रीय लेखिका और गणितज्ञ हैं जिनके बारे में हम इस साक्षात्कार में जानेंगे कि उनकी कितनी उपलब्धियां रही हैं और दे श को अपनी इस बेटी पर कितना अभिमान होना चाहिए। आकांक्षा शर्मा : सुप्रभात दीदी, हम एक बार फिर मुखातिब हैं, सबसे पहले मैं चाहूंगी कि आप हमारे पाठकों को अपने बारे में कुछ बताएं, अपनी पारिवारिक पषृ ्ठभूमि ,अपना परिचय अपनी शिक्षा -दीक्षा , के बारे में हमें अवगत कराएं। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : मेरा परिचय आप सब से शुरू होता है ,आप सबके स्नेह और सहयोग आप सबकी शुभकामनाओं ने आप सब बड़ों के आशीर्वाद ने मेरी इस लेखनी को चाहे गणित विषय को लेकर चली हो या कविताओं को लेकर,मुझे आशीर्वाद दे कर इस पथ तक लाने में मेरा सहयोग किया है । मैं अपने परिवार के बारे में बताती हूं कि मेरे अलावा मेरे परिवार में मेरी दो बहनें और एक भाई हैं। मुझसे बड़ी दीदी इटावा निवास करती हैं और छोटी बहन कोलकाता रहती है एक भाई है जो आगरा में रहते हैं और पापा उन्हीं के साथ आगरा में निवास करते हैं आकांक्षा शर्मा : दीदी आप गणित की प्राध्यापिका हैं , गणित जैसा मुश्किल विषय जो ज्यादातर महिलाओं को मुश्किल लगता है , ना ़ पसंद होता है ,उस विषय में आपकी पी.एचडी.की डिग्री है , आप आई टी के बच्चों को गणित पढ़ाती हैं, बहुत सारे अन्य बच्चों को भी पढ़ाती हैं ,ट्रेनिंग के कई कार्यक्रमों का संचालन भी करती हैं, तो गणित जैसा विषय और फिर साहित्य में इतनी गहरी रूचि होना और साहित्य में आपका योगदान दे ना ,इसके पीछे क्या कहानी है ? डॉ. रुचि चतुर्वेदी : आकांक्षा मैं आपसे सहमत हूंँ कि गणित विषय सबको नहीं भाता है क्योंकि कहीं ना कहीं सब लोग इसे नीरस विषय कहते हैं लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि जिंदगी के प्रारं भ से अंत
डॉ रूचि चतर् ु वेदी साक्षात्कार
तक शून्य से लेकर शून्य तक की यात्रा है यह जीवन और शून्य से शून्य के बीच जो कुछ भी है वही आपका जीवन है तो क्योंकि यह जीवन पूरा का पूरा गणित है तो मैंने उस गणित को गणित के साथ साथ-साथ साहित्य से और गीतों से जोड़ दिया । अगर उस गणित को समझना है तो उसे गीतों में और अपनी रचनाओं में शब्दों और अंकों को जोड़ते हुए मैंने अपने जीवन का एक पथ निर्धारित किया हुआ है और मैं उस पथ पर चल रही हूँ जो अंकों के साथ साथ शब्दों की भी यात्रा करता है , मैं जानती हूं यह बहुत कठिन कार्य है लेकिन जिसके लिए यह साधना होता है वह कार्य आप अपने मन से करते हैं तो आपके लिए कठिन नहीं रहता वह सबसे सरल हो जाता है ,जब काम आपके मन का होता है तो आप कितने भी व्यस्त हों ,कॉलेज के इंटरनेशनल कांफ्रेस की तैयारियों के बाद भी रात को गीत लिखने बैठ जाना उसके बाद अपनी पुस्तक लिखने बैठ जाना फिर अपने शोध ग्रन्थ के लिए बैठ जाना आसान नहीं होता लेकिन आप कर पाते हो क्योंकि आपके मन का काम है जो आपको थकाता नहीं है और ना ही दिमाग झल्लाता है ना परे शान होता है क्योंकि वह काम मन से करते हैं । आकांक्षा शर्मा : दीदी मुझे यह भी बताएं कि साहित्य के प्रति आपका रुझान कब और कैसे हुआ और किस तरह से जीवन की धारा बदली। इसमें आपके परिवार का क्या योगदान रहा और आप की उपलब्धियों से आपके व्यस्ततम जीवन शैली पर कितना प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव पड़ा, आप के परिजन इसे किस रूप में लेते हैं और किस तरह सेआगे बढ़ने में सहयोग करते हैं ताकि हमारे पाठकों को इससे प्रेरणा मिल सके। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : मेरे माता-पिता दोनों बहुत अच्छे गायक हैं प्रोफेशनल तो नहीं है पर दोनों को स्वर का ज्ञान है इसलिए मेरे पापा की यह भावना थी कि मैं गायन, वादन ,और संगीत के क्षेत्र में भी सीखूँ और आगे भी उसको अपने जीवन पथ तक बढाऊ़ ँ और उसी भावना के साथ उन्होंने मुझे छोटी सी उम्र से ही हारमोनियम, तबला, वादन शास्त्रीय गायन और शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दिलवाई ।पापा का जहाँ-जहाँ स्थानान्तरण हुआ वहाँ -वहाँ मैंने नृत्य, गायन, वादन में पढ़ाई के साथ-साथ शिक्षा प्राप्त की, मेरा पहला कार्यक्रम आगरा में था जब" माथुर- वैश्य" सभागार में कत्थक का कार्यक्रम था और मेरे जीवन का सबसे पहला कार्यक्रम भी जहाँ माँ सरस्वती ने शायद वहीं से प्रारं भ किया था मुझे आशीर्वाद दे ना। उस कार्यक्रम में सभी ने कहा था कि इतनी छोटी बच्ची ने इतना अच्छा भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत किया
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अनुराग्यम ्
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fojklr है उसी कार्यक्रम में मैंने गाया भी था और दोनों में पुरस्कृत हुई थी। सुभाष पार्क शिशु मन्दिर एटा में ,फिर विधूना में पढ़ाई की उसके बाद पापा फर्रु खाबाद में रहे उस दौरान जो मेरे साथ सकारात्मक हुआ मुझे ऐसा लगता है कि मुझे कविता के लिए आशीर्वाद वहीं से मिला था ,क्योंकि वह महादे वी वर्मा जी की धरा थी ,तुलसी जयंती पर एक काव्य पाठ का आयोजन किया गया था और एक प्रतियोगिता थी जिसमें तुलसीदास जी की रचनाओं का सस्वर पाठ करना था तो उसमें सस्वर पाठ करने के बाद जैसे ही कविता का समापन हुआ और मुझे प्रथम पुरस्कार की घोषणा हुई जीवन का पहला पुरस्कार "गीता" के रूप में मिला और वहीं" रामचरितमानस "की छोटी पुस्तक भावार्थ के साथ मुझे पुरस्कार स्वरूप मिली कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एक साहित्यकार थे उन्होनें कहा कि आप स्वयं कुछ लिखती हैं बिटिया, मैंने कुछ पंक्तियां सुनाईं उसे सुनने के बाद उन्होने कहा बिटिया आप जानती हैं की आप किस धरा पर खड़ी हैं? तब मैंने कहा कि हांँ मैं जानती हूं यह श्रद्धेय महादे वी वर्मा जी की धरा है जो मुझे विद्यालय से जानकारी हुई है । तब उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि यहाँ का आशीर्वाद आपको मिल गया है । उस कार्यक्रम के बाद मेरे गुरु जी ने मुझे परम श्रद्धेय शिव ओम अंबर जी को जो सभी के मार्गदर्शक, प्रेरणा -स्रोत और दे श के सुप्रसिद्ध संचालक रहे हैं, उनके पास लेकर गए उनसे कहा कि "बच्ची अच्छा लिखती और आप इसे सुनिए हमें लगा कि आपका आशीर्वाद इसे मिलना चाहिए" उसके बाद श्रद्धेय महादे वी वर्मा जी की जयन्ती के कार्यक्रम में मुझे बुलाया गया जो उस समय के उत्तर प्रदे श के मंत्रिमंडल में ब्रह्मदत्त द्विवेदी जी कार्य कर रहे थे उन्होने मेरी रचनाओं को सुनकर आशीर्वाद दिया । वह ऐसा समय मेरे जीवनकाल का रहा है जिसने मुझे कविता लिखने की प्रेरणा दी उसके बाद मेरी लेखनी ने चलना शुरू किया दे श के इतने बड़े साहित्यकार का आशीर्वाद मिल जाना बड़े सौभाग्य की बात थी। और उसके बाद पिता का स्थानान्तरण इटावा हुआ तो वहाँ के कॉलेज में अनवरत काव्य पाठ प्रतियोगिता में भाग लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया साथ ही गायन स्पर्धा में भी राज्य स्तरीय कार्यक्रम में भाग लिया। वाद-विवाद व भाषण प्रतियोगिता में राष्ट्रीय स्तर पर कानपुर विश्वविद्यालय से प्रतिभागी बनी और प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया, मुझे याद आता है " काउं सिल बोर्ड अफेयर्स" ने उसे आयोजित किया था जिसमें अपने मित्र के साथ पहली बार नयी दिल्ली गई थी। गणित विषय मेरा प्रिय विषय था, नृत्य के क्षेत्र में कक्षा 6 -7 के बाद में ने भाग नहीं लिया था, कक्षा 10 तक बैडमिंटन में जिला स्तर तक भाग लेकर उसमें भी पुरस्कार प्राप्त किये ।बीएससी गणित विषय से और अच्छे नंबर से की थी मेरे ससुर जी पढ़ाते थे इसीलिए उनका शुभाशीष मिलता रहा और मुझे आगे की पढ़ाई में बहुत सहयोग दे ते रहे | ससुराल सराय नोधना में है मुझे पसंद है कि गाँव में हमारे दे श की संस्कृति बहती है , वहाँ घूंघट प्रथा है जो मुझे पसंद है क्योंकि परिवार का मान सम्मान उसके साथ जुड़ा होता है तो मैं वहाँ जब भी जाती हूँ घूंघट में रहती हूँ। मेरा सौभाग्य रहा की सासु जी के कहने पर मेरे दादा -दादी ससुर ने आगे पढ़ने के लिए अनुमति दी। मेरे पति का बहुत सहयोग रहा उन्होंने समर्पण भाव से मुझे सहयोग दिया और शादी के बाद में ने msc-phd तथा अन्य कोर्स भी किए। मेरा कविता के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए भी मेरे पति का बहुत सहयोग रहा। उनके समर्पण और उसका ऋण को जीवन पर्यंत तक नहीं चुका पाऊंगी। आगरा विश्वविद्यालय की घनश्याम अस्थना की स्म्रति में हुए कार्यक्रमों में लगातार दो बार विश्वविद्यालय स्तर पर काव्य- पाठ में पुरस्कार प्राप्त किया ,जहाँ निर्णायकों के रूप में परम श्रद्धेय रामें न मोहन त्रिपाठी जी ,श्रद्धेय सोम ठाकुर जी, स्वर्गीय कैप्टन विकास चौधरी जी ,स्वर्गीय प्रताप दीक्षित जी ,आदरणीय कमलेश नागर जी, ने कहा था हमें लगता है कि निकट भविष्य में बहुत बड़ी कवयित्री
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को हम सुनेंगे ,उनके आशीर्वाद से ही मैं जानती हूँ कि कविता के क्षेत्र में ,मैं आज जो भी कुछ कर पा रही हूँ और सार्थक कर पा रही हूँ वह इसीलिए था। इसी क्रम में मेरी सासु माँ की इच्छा के स्वरूप मुझे दरू दर्शन के कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया ,हिरोर के रचनाकार आदरणीय सतीश मधुप जी को धन्यवाद दं ग ू ी जिन्होंने मेरे संकोच को दरू करने के लिए मुझे सपरिवार बुलाया । 2008, दे वर में कार्यक्रम था जो शहीदों की याद में था जहाँ मैं अपने उसी पति के साथ गई थी और और काव्य पाठ किया था उसके बाद से मैं अनवरत रूप से कार्यक्रमों में जा रही हूँ वहाँ मुझे जीवन का पहला मानदे य भी वहीं मिला था । मेरा गणित विषय पर एक शोध पेरिस में प्रस्तुत होने के लिए चयनित हुआ था। मुझे पहली बार हवाई यात्रा करनी थी, 2012 में मैं पेरिस गई वहाँ 8 अन्य संस्थानों को भी जाने का मौका मिला और वहाँ मेरे शोध को पुरस्कृत किया गया स्कॉलरशिप मिली और वर्ल्ड साइंस एंड टे क्नोलॉजी पेरिस ने मुझे सम्मानित भी किया। इसके बाद आइज़क न्यूटन कैं ब्रिज विश्वविद्यालय जाने का मौका मिला जहाँ उन्होंने महिला गणितज्ञ के साक्षात्कार को प्रकाशित किया था जिसमें मेरे शोध को भी पुरस्कृत किया गया और मेरे साक्षात्कार को भी प्रकाशित किया।यह सौभाग्य की बात है , मैं उनका इसके लिए आभार प्रकट करती हूँ। उसके बाद गणित की यात्रा भी चलती रही ,फिर आईआईटी कानपुर, आईआईटी रुड़की आईआईटी खड़कपुर,एनआईटी भोपाल में मैंने शोध पत्र प्रस्तुत किए, मेरे 25 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं इनमें से बहुत सारे शोध सुप्रसिद्ध शोध ग्रंथों में प्रकाशित हैं और इसके साथ मैंने हिंदी में भी गणित के शोध पत्र लिखें हैं उनको भी सम्मान मिलता रहा । मैंने गणित विषय की 18 पुस्तकें भी लिखी हैं हालांकि और भी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं | "प्रणवी "नाम से, "दिल्ली पुस्तक सदन" में मेरी हिंदी गीतों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है , कई ओर पांडुलिपियां भी तैयार हैं | बेटा मेरा क्रिकेट के क्षेत्र में प्रयासरत है और बेटी मेरी अभी छोटी 6 वर्ष की है प्रणवी उसी का नाम है यह मेरा परिवार है और यहां तक कि मेरी जीवन यात्रा है । आकांक्षा शर्मा : साहित्य के अतिरिक्त आपकी और क्या अभिरुचियाँ हैं ? जो आपको खुशी दे ती होंगी साथ ही आप की उपलब्धियों के बारे में भी बताएं ।ऐसे तो आप की उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है फिर भी कुछ मैं नहीं भी जानती होंगी। हमारे पाठक गण भी जानना चाहें गे। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : साहित्य के अतिरिक्त मेरी रुचि गायन में है , दरअसल गायन और कविता मेरे लिए प्राणवायु जैसे हैं जब भी मेरा मन विचलित होता है मैं यहाँ कोई गीत लिख दे ती हूँ या गाती हूँ, मुझे गाना बहुत पसंद है । गायन से पहले बचपन में मुझे नृत्य का बहुत शौक था पर जैसे ही जैसे बड़ी हुई नृत्य छूट गया। इसके अलावा मैं मिमिक्री करती थी और चित्रकला में पोट्रेट बनाना मुझे बहुत पसंद था, गर्मियों की छुट्टियों में क्रोशिया ,स्वेटर बनाना, ऑयल पें टिग ं फैब्रिक पें टिग ं ,सारे कार्य मैं बहुत अच्छे से करती थी ।ढोलक बजाना मुझे बहुत पसंद है मेरे घर की हर पारं परिक कार्यक्रम में मैं ही ढोलक बजाती हूँ यह व्यक्तिगत रूप से मुझे बेहद पसंद है । सम्मान और दस ू रे उपलब्धियों की बात करूं तो अभी प्रधानमंत्री कार्यालय से मुझे एक सराहना पत्र प्राप्त हुआ है ।दे श के पहले स्वच्छता पर प्रकाशित ग्रंथ में मेरी एक रचना प्रकाशित हुई है । माननीय प्रधानमंत्री जी के जीवन पर आधारित एक पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में मुझे काव्य पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ लगभग सभी समाचार चैनलों पर काव्य पाठ का अवसर मिला सभी रे डियो एफएम चैनल्स आकाशवाणी से भी मेरे काव्य पाठ का प्रसारण हुआ है ।
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जनवरी 2021 दरू दर्शन का एक कार्यक्रम है "वैज्ञानिका" जिसमें विज्ञान और गणित पर ही काव्य पाठ करना होता है वहाँ मैंने काव्य पाठ किया है | "गोयनका अचीवर्स " प्लेटफार्म पर एक चैनल में मेरा साक्षात्कार प्रसारित हुआ है ,"नमोकार चैनल "पर भी साक्षात्कार प्रसारित हुआ। "बेस्ट स्टेटटिशियन अवार्ड" भी मुझे मिला है । साहित्य के क्षेत्र में बेंगलुरु के "ब्राह्मण संघ"से 'शब्द- श्री" का सम्मान मिला है , इलाहाबाद से "सुभद्रा कुमारी चौहान" सम्मान मिला है . कोटा से "अक्षर -श्री" सम्मान मिला है . नाथद्भारा संस्था से "हिंदी मनिषी "सम्मान मिला है ,जितना मैंने सोचा नहीं था मांँ सरस्वती ने उससे कहीं अधिक मुझे दिया है ।ये सारे सम्मान उन्हीं को समर्पित हैं। इन सभी सम्मानों में से एक महत्वपूर्ण सम्मान मुझे "प्रथम गीत ऋषि नीरज सम्मान" से मिला जिसने मुझे सबसे ज़्यादा भावविभोर किया है जो आगमन संस्था द्वारा मुझे मिला ।दनु िया के जाने माने गीतकार के नाम से दिया जाने वाला यह पहला सम्मान था जो मुझे मिला। ये मेरी उपलब्धियों में और मेरे सम्मान में श्री वृद्धि करता है । आकांक्षा शर्मा : साहित्य के लिए अतिरिक्त आपकी और क्या अभिरुचियाँ हैं जो आपको खुशी दे ती होंगी साथ ही आप की उपलब्धियों के बारे में भी बताएं ।ऐसे तो आप की उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है फिर भी कुछ मैं नहीं भी जानती हूँगी। हमारे पाठक गण भी जानना चाहें गे। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : साहित्य के अतिरिक्त मेरी रुचि गायन में है , दरअसल गायन और कविता मेरे लिए प्राणवायु जैसे हैं | “गोयनका अचीवर्स “ प्लेटफार्म पर एक चैनल में मेरा साक्षात्कार प्रसारित हुआ है ,”नमोकार चैनल “पर भी साक्षात्कार प्रसारित हुआ। “बेस्ट स्टेटिसस्टिक अवार्ड” भी मुझे मिला है । साहित्य के क्षेत्र में बेंगलुरु के “ब्राह्मण संघ”से ‘शब्द- श्री” का सम्मान मिला है , इलाहाबाद से “सुभद्रा कुमारी चौहान” सम्मान मिला है . कोटा से “अक्षर -श्री” सम्मान मिला है . नाथद्भारा संस्था से “हिंदी मनिषी “सम्मान मिला है ,जितना मैंने सोचा नहीं था मांँ सरस्वती ने उससे कहीं ज़्यादा मुझे दिया है ।ये सारे सम्मान उन्हीं को समर्पित हैं। इन सभी सम्मानों में से एक अतिरिक्त सम्मान मुझे “प्रथम गीत ऋषि नीरज सम्मान” से मिला जिसने मुझे सबसे ज़्यादा भावविभोर किया है जो आगमन संस्था द्वारा मुझे मिला ।दनु िया के जाने माने गीतकार के नाम से दिया जाने वाला यह पहला सम्मान था जो मुझे मिला। ये मेरी उपलब्धियों में और मेरे सम्मान में श्री वृद्धि करता है । आकांक्षा शर्मा : दीदी आप हिंदी के लिए इतना काम करती हैं, कई मुहिमों में ,कई संस्थानों में आप सक्रिय सदस्य हैं तो मैं जानना चाहती हूं कि हिंदी साहित्य और साहित्य साहित्यकारों के बारे में आपके क्या विचार हैं? डॉ. रुचि चतुर्वेदी : जी ,आकांक्षा जी मैं राष्ट्रीय कवि संगम ब्रज प्रांत की संरक्षिका हूँ,”शब्दोत्सव” संस्था के माध्यम से मैंने एक संस्था का गठन किया है जिसने राम भक्ति धारा पर लगातार 24 घण्टे बोलने का एक कार्यक्रम रखा था जिसमें विश्व के विभिन्न दे शों की 65 वक्ताओं ने 9 भाषाओं में भाग लिया था ।ये कार्यक्रम श्री राम मंदिर के भवन निर्माण के शिलान्यास के दिन था जिसे पूरे दे श से बहुत सराहना मिली। इसके साथ-साथ” केन्या उच्च आयोग “ की हिन्दी समिति ने मुझे काव्य पाठ का अवसर दिया ,”हे ल्पिंग हैंड फाउं डेशन “संस्था से, “सैल्यूट तिरं गा” से “भारत तिब्बत” संस्था से भी मैं जुड़ी हुई हूँ। हिंदी के प्रेम के चलते 3 वर्ष पूर्व मैंने इसमें मास्टर्स की डिग्री भी ली है और अब मैं इसमें पीएचडी करने के लिए प्रयासरत हूँ। आपका प्रश्न है कि साहित्य को लेकर मेरे क्या विचार हैं, तो साहित्य ,वाचिक, लेखन और अभिव्यक्ति रूप में है अगर दे खा जाए तो इन तीनों के समावेश को हम साहित्य कहते हैं, लेकिन साहित्य का सार है ,जो समाज का आईना हो जो समाज को समर्पित काम करता हो, आज के समय में साहित्य के लिए मुझे खुशी है कि आज रचनाकारों की
fojklr संख्या बढ़ रही है ,लेकिन इसके साथ साथ ऐसा नहीं है कि कुछ भी लिख दे ने को साहित्य कहें गे। मैं यह स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगी कि कविता तब होती है जब उसका कोई भाव हो और ऐसा भाव हो जो समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए और समाज को संदेश दे ते हुए लिखा गया हो। सकारात्मक और संदेशात्मक भाव को कविता कहा जाएगा ।इसलिए पहले नव रचनाकारों को बड़े और सुप्रसिद्घ रचनाकारों को ,जिन्होंने इस दे श को अपनी लेख ़ नी से एक दिशा दी है को पढ़ना चाहिए। जब तक आप उन्हें पढे गें नहीं, तब तक आप अपने लेखन में भाव नहीं ला सकेंगे। आप जितना ज्यादा पढ़ें गे उतना ज्यादा गढ़ें गे,। मेरा यही संदेश है युवा रचनाकारों को, चाहे वह साहित्यकार हों या नव गणितज्ञ ।गणित के क्षेत्र में भी कुछ अगर आप कार्य कर रहे हों तो पहले उन्हें अपने से बड़े लोगों को पढ़ना चाहिए ,समझना चाहिए तब वह लिखें अगर वह गणित के क्षेत्र में भी कुछ काम कर रहे हों तो जैसे एक इक्वेश्चन बना दे ना ही गणित नहीं है उसमें भी सारे भाव आने चाहियें। अध्ययन करके आएं जितना पहले किया गया और लिखा जा चुका है उसे पहले पढ़ें । आकांक्षा शर्मा : दीदी प्रत्येक रचनाकार अपनी पीढ़ी के रचनाकारों से, पहले के रचनाकारों से और आने वाले नए रचनाकारों से कहीं ना कहीं प्रभावित होते हैं आनंदित और आह्लादित होते हैं तो मैं जानना चाहूंगी कि आपके प्रिय रचनाकार कौन हैं ?और उनमें से हिंदी के लिए कौन अच्छा कर रहे हैं? और हिंदी के उत्थान के लिए प्रयासरत हैं। रुडॉ. रुचि चतुर्वेदी : जैसा कि आपका प्रश्न है कि मुझसे पहले की पीढ़ी में जो रचनाकार हुए हैं उनके बारे में बताएं उनमें से लगभग मैंने सभी को पढ़ा है और इतना अच्छा उन्होंने लिखा है कि उनके लिए जो भी कहा जाए कम होगा इसमें मैने महादे वी वर्मा जी ,सुभद्रा कुमारी चौहान जी, सुमित्रा नंदन पंत जी, कवि निराला जी, मैथिलीशरण गुप्त जी, माखनलाल चतुर्वेदी जी, द्वारिका प्रसाद महे श्वरी जी, रांगेय राघव जी, दिनकर जी, अयोध्या प्रसाद उपाध्याय जी, सभी को खूब पढा ़ है ।अगर इतना हम पढ़ें गे तो निश्चित रूप से एक पथ मिलेगा ही। रही बात मेरी पीढ़ी के रचनाकारों को तो लगभग सभी को सुना है और मैं आदरणीय सोम ठाकुर जी ,रोमन राय जी, मोहन त्रिपाठी जी ,आदरणीय कंु वर बेचैन जी ,राजेंद्र राजन जी, इन सबके गीत मुझे बहुत भातें हैं। लेकिन हमारी पीढ़ी की सभी रचनाकारों का मैं बहुत मान करती हूं इन सभी की रचनाएं सुनना मुझे अच्छा लगता है । आने वाली पीढ़ी की बात करूं तो पंकज भैया की लेखनी हर विषय पर चलती है ,और राजीव राज जी, अजय अंजाम जी, सतीश मधुप जी सोमरुपा विशाल जी ,मदन मोहन समग्र जी, योगें द्र शर्मा जी, मनवीर मधुर जी, गजेंद्र सोलंकी जी, ऐसे बहुत से रचनाकार हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि अलग से कहने का नजरिया भी हो सकता है । मेरी बहन अंकिता की वाचन शैली उसकी एंकरिग मुझे बहुत भाती है और मैं क्षमा चाहूंगी कि किसी का नाम छूट गया हो तो ,हाँ आगरा की शशी तिवारी बहुत अच्छा लिखती हैं। इनमें एक नाम त्रिवें द्र भदोरिया जी का है जो बहुत अच्छे छं द लिखते हैं और प्रताप दीक्षित जी जिन्होंने लोकशैली में बहुत अच्छा लिखा “तुम कवि कम पंडा ज़्यादा,गोबर कम और कंडा ज़्यादा” जैसी कई प्रसिद्ध रचनायें हैं जिनका उपयोग करता गाहे बगाहे के किसी भी मंच पर हो जाता है , अभी उनका हाल ही में निधन हुआ है । पूर्व रचनाकारों के नाम तो सबसे पहले आने चाहिए वही छूट गए, जिनमें श्री वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास जी हैं जिन्होंने राम के जीवन तक हम सब को पहुंचाया है ।कहते हैं जो प्रणब में हैं वही छूट गए जाते हैं लेकिन वो हमारे अंतर्मन में होता है इसलिए स्वतः ही प्रस्फुटित होते हैं। इन दोनों के अतिरिक्त सूरदास जी और कबीर दास जी जिन्होंने जीवन दर्शन को समझने में और भगवान श्री कृष्ण के भाव तक हमें पहुंचाने का कार्य किया है । श्री कृष्ण के चरणों को
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fojklr मैं नमन करती हूँ उनकी वाणी को प्रणाम करती हूँ क्योंकि श्री कृष्ण ने हमें “गीता” के माध्यम से जीवन दर्शन तक पहुंचाया है । आकांक्षा शर्मा : दीदी आप जिंदगी को किस नज़रिए से दे खती हैं? आपकी खुशी के क्या मायने हैं? डॉ. रुचि चतुर्वेदी : जिंदगी सांसों का आना जाना है । सांसों की इस नदी में जो दे ह रूपी नाव चल रही है मेरे हिसाब से यही जि़दगी है , लेकिन जि़दगी का यह मतलब नहीं है कि खाना पीना और चले जाना । जन्म लिया है तो मनुष्य रुप में रहते हुए औरों के हित के लिए क्या कभी सोचा, क्या हम कुछ क्षण के लिए औरों के लिए जिए ,औरों का मतलब परिवार नहीं वह तो हम सब जीते हैं। उसका मतलब समाज है , दे श है ,मातभ ृ ूमि है , हमने इस मातभ ृ ूमि ,इस दे श और समाज को क्या कुछ दिया है । अगर दिया है तो जीवन सार्थक है वरना तो आने जाने का एक प्रक्रम है जिसे आप जिंदगी कह सकते हैं पर यह क्या हुआ आए और चले गए । आपने खुशी की बात की है तो खुशी के अपने-अपने मायने और परिभाषाएं होती हैं ,कुछ लोगों को अच्छा खा कर खुशी मिलती है , कुछ लोगों को अच्छे लोगों से मिलकर खुशी मिलती है ,कुछ लोगों को अच्छी चीजें दे खकर खुशी मिलती है तो किसी को किसी ओर से। सबकी अपनी परिभाषा है लेकिन मैं सबको दे ख कर खुश होती हूँ और इससे बढ़कर और कोई खुशी मुझे नहीं होती मेरा सदै व यह भाव रहता है कि मेरे कुछ कहे से, कुछ लिखे से ,सदै व यह भाव रहता है कि मुझसे कुछ ऐसा ना हो जाए कि किसी के चेहरे पर मैं दख ु ले आऊँ ।यकीन मानिए कि कभी मुझे ऐसा लगे कि मुझसे कोई रूठ गया है नाराज है तो मैं पूरा प्रयास उनको मनाने का करती हूँ ,हालाँकि लोग मुझे मना करते हैं और कहते हैं कि आप इससे स्वयं का ओरा कम करती हैं, मत किया कीजिए ।सबको नहीं मना सकती पर मुझे यह भाव रहता है कि कोई नाराज ना हो ये पता करके कि क्यों नाराज है पता करूं मनाऊं तो मुझे उसकी खुशी में अपनी खुशी मिलती है । सबसे ज़्यादा खुशी तब मिलती है जब मैं सुबह से कोई भाव सोच रही हूँ और उस पर कोई रचना लिख दे ती हूँ। जीवन के प्रति सकारात्मकता पर भी कुछ भी लिख दं ू तो भी मुझे खुशी मिलती है । और जब मैं अपनी बेटी के चेहरे पर मुस्कान दे खती हूँ और अपने बेटे को क्रिकेट में कुछ अच्छा करते दे खती हूँ तो भी मुझे खुशी मिलती है । जब आप अपने परिवार के सदस्यों को खुश दे खते हैं तो खुशी मिलती है ।समाज को आगे बढ़ते दे खते हैं, जब मैं अपने दे श को विश्व गुरु के स्थान पर पहुंचते दे खती हूँ तब खुशी मिलती है जब मैं मां भारती को वैभव पाते दे खती हूँ तो खुशी मिलती है । आकांक्षा शर्मा : दीदी आप को जितना सुनती जा रही हूँ उतनी आपकी प्रशंसक होती जा रही हूँ, पहले दिन से ही आपने बहुत मुतासिर किया था ,ऐसा अमूमन होता नहीं है कोई इस हद तक प्रभावित कर जाए और आपके जेहन पर छाया रहे । जिसकी मुस्कु राहट आपको याद रहे और जब भी आप उसके बारे में सोचो तो आपके चेहरे पर वही मुस्कान आ जाए ,एक सकारात्मक उर्जा का संचार हो, दीदी आप सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई हैं। आप अपने आप को किस तरह से सकारात्मक रख पाती है मैं समझ नहीं पा रही थी पर आज जब आपके शौंक सुन रही हूँ आपको जानने का मौका मिला है तो ऐसा लगता है कि आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं, माँ सरस्वती की ऐसी पुत्री हैं जिसे शायद सब कुछ विरासत में मिला। आपमें गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं ,गायन में इतनी अभिरुचि है और विविध कलाओं में इतनी अभिरुचि रखती हैं तो ,मैं चाहूंगी कि आप बताएं कि आपके पसंदीदा गायक कौन कौन से हैं? और भारतीय संगीत की किस विधा में आपकी विशेष रूचि है ? कौनसी संगीत शैलियां आप को आकर्षित करती हैं ?साथ -साथ भारतीय कला और
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संस्कृति को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है । और वर्तमान में किस तरह से उन पर काम किया जाए कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर जो धीरे -धीरे लुप्त होती जा रही है ,जबकि विदे शों में हमारी संस्कृति को लोग अपना रहे हैं उनके लिए आगे आकर काम कर रहे हैं तो कहीं ना कहीं हमसे वह पीछे छूट रही हैं जैसे अलाप, कजरी ,बिरहा, चैती जो हमारे समाज का एक हिस्सा हुआ करती थीं, हमारी चेतना का, हमारे त्यौहारों का प्रतीक हुआ करती थीं। हमारी ऐसी कलाएं और लोक कलाएं हैं जो हमारी समृद्ध संस्कृति को दिखाती थीं वह विलुप्तिकरण के कगार पर खड़ी हैं ,हाशिए पर हैं,क्योंकि या तो लोग उनके बारे में जानते नहीं या उन्हें बताने वाले लोग अब रहे नहीं या लोग ही सुनना नहीं चाहते ,तो ऐसे में उस पर क्या किया जाए । अनुराग्यम ् तो इस ओर प्रयासरत है ही, पर मैं आपसे जानना चाहूंगी क्योंकि आप एक समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं तो आप बताएं कि ऐसा क्या किया जाए कि हम अपनी संस्कृति की तरफ लौटें । पाश्चात्यीकरण एक हद तक अपने आप में बुरा नहीं है पर जहाँ तक कि मैं दे ख पा रही हूँ अपनी संस्कृति को साथ लेकर चलना उतना ही आवश्यक है जितना की दस ू री संस्कृति को आत्मसात करना। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : सही है मैं आशा जी की बहुत बड़ी फैन हूँ, लता जी को मैं 24 घंटे भी सुनँू तो मेरा मन नहीं भरता है ।स्वर्गीय रफी साहब के गीत मुझे बहुत पसंद है | “तुम्हें याद करते करते” आम्रपाली फिल्म का सॉन्ग मेरा पसंदीदा गीत है ।15 अगस्त पर गणतंत्र दिवस पर में लता जी का वह गाना गाती हूँ” जो सफर पर हो गए अमर, मैं उनकी याद में गा रही हूँ श्रद्धा गीत” जब हम रूस में हरे कृष्णा हरे रामा गाते हुए दे खते हैं, अमेरिका में पीले वस्त्र में श्री राम के भजन गाते हुए दे खते हैं, तो लगता है सारा विश्व भारतीय संस्कृति के आगे नतमस्तक हूँ, ऐसे में मेरी सरकार से यही प्रार्थना है कि सरकार छोटे -छोटे कार्यक्रमों में मोहल्लों में गली मोहल्लों में गांव गली चौपालों में नुक्कड़ नाटकों से हमारी सभी पुरानी संस्कृति को आल्हा गीत, उदल ,रसिया, ब्रज के बसावरी, जैसे कायर्क्रम कराएं जाएं ताकि भारत की संस्कृति को हमारे बच्चे भी जानें और हमारी संस्कृति आगे बढ़े और हम विश्व गुरु के पद पर पुनः स्थापित हो जाएं। मैं भी विभिन्न भाषा में लिखने का प्रयास करती रहती हूँ बुंदेली, कन्नौजी ,भदावरी ब्रज भाषा में भी लिखने का प्रयास करती रहती हूँ कृष्ण को मैं प्रणाम करती हूँ” चलो बज ृ की ओर चले नहीं तो बहुत हुए तो विभोर चले” और ऐसे ही ब्रज की और कैलाश की और सारा विश्व भारत की और ओर चलने की बात करें इस भावना के साथ मैं आभार व्यक्त करती हूं कि सारा विश्व ही ब्रज धाम की ओर चले। आकांक्षा शर्मा : बहुत शुक्रिया दीदी, अनुराग्यम ् को आपने इतना समय दिया इतना कुछ बताया, हमें पूरा विश्वास है कि हमारे पाठक गणों को यह साक्षात्कार बहुत पसंद आएगा और आपसे जानना चाहूंगी कि अनुराग्यम ् का अब तक का जो कामकाज आपने दे खा है , हम जिस स्तर पर काम कर रहे हैं और हमारी जो कमियां आपको समझ आ रही हों तो हमें बताएं, इस पर मैं आपकी टिप्पणी चाहूंगी। डॉ. रुचि चतुर्वेदी : अनुराग्यम ् का मैं बहुत आभार व्यक्त करती हूँ कि इस छोटी सी बिटिया को सम्मान दे ते हुए एक छोटे से व्यक्तित्व का साक्षात्कार लोगों तक पहुंचा कर मुझे बहुत बड़ा बना दिया है । मैं संदेश के रूप में अपनी कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगी कि जीवन के हर क्षेत्र में स्वयं को सकारात्मकता से लबरे ज रखिए तो आप दे खोगे कि नकारात्मकता और निराशा आपके आसपास नहीं होगी और निश्चित रूप से आप सफलता के करीब होंगे और स्वयं को
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जनवरी 2021 सम्भल दें । “घोर निराशा मुझसे मिलने आई कल, लेकिन आशा लेकर घर को लौट गई.. मुझे हताशा मिलने आई द्वारे तक, जिससे आई उसी डगर को लौट गई.. खुद को खुद ही संबल दे ना पड़ता है , जीवन प्रश्नों का हल दे ना पड़ता है .. अपने हैं दो चार, पराया शेष जगत, मन में साहस का एक ऊंचा सा पर्वत.. दख ु की तेज हवा आंधी को छूने आई, छूना पाई सुप्त सफर को लौट गई.. घोर निराशा मुझसे मिलने आई कल।”
fojklr पाठक गण हमें पर्ण ू विश्वास है कि आपको यह साक्षात्कार अच्छा लगा होगा। हम दे श की इस सप ु रिचित लेखिका और बेटी का हृदय से धन्यवाद करते हैं कि अपना क़ीमती समय दे कर उन्होंने अनरु ाग्यम ् को अपनी जीवन यात्रा से परिचय कराया और आप सब को प्रोत्साहित करने हे तु अपने अनभ ु वों को, कामयाबी को और अपनी उपलब्धियों को आपके साथ साझा किया।
डॉ. तरुणा माथरु साक्षात्कार, संकलनकर्ता
"अनरु ाग्यम ् की मासिक पत्रिका विरासत केप्लेट के प्रथम अंक का अनावरण"
कला, संस्कृति और साहित्य की साझी धरोहर को सहे जने और भारतीय कला संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलवाने एवम भारतीय विधाओं कला, संस्कृति और साहित्य को जनसामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से लगभग दस महीने पहले अनुराग्यम ् के संस्थापक श्री सचिन चतुर्वेदी जी ने अनुराग्यम ् की नींव रखी थी। अनुराग्यम ् ने समय-समय पर कला-संस्कृति और साहित्य के अनेक कार्यक्रम किये हैं और इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए अनुराग्यम ् ने अपनी मासिक " केप्लेट पत्रिका विरासत" का अनावरण गण्मान्य अतिथियों द्वारा किया गया ।साहित्य नमन अंतर्राष्ट्रीय एवं अनुराग्यम ् के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम साहित्य आइडल २०२० एवं कवि सम्मेलन के मध्य कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री प्रशांत त्रिपाठी जी, विशेष अतिथि श्रीमती दर्शना सक्सेना जी, वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय कवियत्री रुचि चतुर्वेदी जी, शबनम खान जी, नमिता नमन जी, कवि नीर गोरखपुरी जी, डॉक्टर अरुण पांडय े जी और साहित्य आइडल २०२० के विजेता बाबूलाल जी रहे । संस्था के संस्थापक सचिन चतुर्वेदी जी ने दिनांक ६.१२.२०२० को आर्य समाज गुरुकुल, सेक्टर ३४, नोएडा, उत्तर प्रदे श में पत्रिका का अनावरण किया। 'कैप्लेट पत्रिका विरासत' की मुख्य संपादिका श्रीमती आकाँक्षा शर्मा अक्स जी के साथ-साथ अनुराग्यम ् कला विभाग की प्रमुख निधि बंसल जी, प्रधान निरिक्षिका तरुणा माथुर जी, साहित्य विभाग की प्रमुख विनीता पुंढीर जी, रुखसार अहमद खान जी, अभिषेक शुक्ला जी, गोपाल गुप्ता जी और सौरव वर्मा जी इत्यादि इस अवसर पर उपस्थित थे। साहित्य आइडल २०२० कार्यक्रम का सफल संचालन अनुराग्यम ् संस्था की महासचिव आकाँक्षा शर्मा जी द्वारा किया गया। Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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जनवरी 2021
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काव्य कार्नर फाउं डेशन ने अनुराग्यम ् के संस्थापक और सदस्यों का किया सम्मान
कला, साहित्य और संस्कृति के मंच काव्य कार्नर फाउं डेशन ने अपना वार्षिकोत्सव 'जश्न-ए-जुनूं 20 दिसंबर 2020 को मनाया। यूं तो यह फेसबुक व इंस्टाग्राम पर सप्ताह भर यानी दिसंबर 13 से 19 तक विभिन्न प्रांतों के कवि सम्मेलनों और शुभकामना संदेशों के माध्यम से एक दिन में तीन-तीन या चार चार बार वर्चुअल कार्यक्रमों के द्वारा दे श-विदे श में धूम मचा चुका था। लेकिन जो धमाका वार्षिकोत्सव के रूप में फिल्म सिटी, सूर्या समाचार बिल्डिंग, नोएडा के सभागार में हुआ, उसकी गूंज अविस्मरणीय रही। साहित्य जगत की महान शख्सियत डा. कंु वर बेचैन के अचानक स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनकी अध्यक्षता वर्चुअल रही लेकिन उनका आशीर्वाद संदेश के माध्यम से प्रत्यक्ष मिला। इसके बावजूद डा. मधु मोहिनी उपाध्याय और डा. चेतन आनंद के साथ साथ सभागार में मौजूद साहित्य जगत की सभी हस्तियों ने उनकी वर्चुअल अध्यक्षता को अद्भुत गरिमा प्रदान की। डा. दम्यती शर्मा जी भी किन्हीं कारणों से कार्यक्रम में शिरकत नहीं कर सकी लेकिन उनकी वर्चुअल शुभकामनाएं मार्गदर्शनक के लिए अनुपम रही। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और अलवर राजस्थान से शिरकत कर रहे वरिष्ठ गीतकार श्री प्रवें द्र पंडित द्वारा सरस्वती वंदना से हुई। इसके बाद संचालन की कमान स्वयं फाउं डेशन की संस्थापिका एवं राष्ट्रीय अध्यक्षा डा. पूजा सिंह गंगानिया और साहित्यके सशक्त हस्ताक्षर कवि कुमार आदित्य ने संभाली। कला और साहित्य के सुप्रसिद्ध नाम जैसे सुश्री शोभा सच्चान, अन्तर्राष्ट्रीय कवि श्री अमित शर्मा, कवि व अभिनेता श्री मनोज भावुक, पारस टी वी फेम डॉ. राहुल जैन, जी न्यूज़ के न्यूज़ एकर श्री दिव्यांश शर्मा, रुद्राणी फाउं डेशन की संस्थापिका सुश्री पूनम सकुजा और अनुराग्यम के संस्थापक श्री सचिन चतुर्वेदी विशिष्ट व विशेष अथिति के रूप में उपस्थित रहे । इसके अलावा काव्य कार्नर फाउं डेशन द्वारा चित्रकार, कलमकार वपत्रकार श्री संजय गिरि, सुप्रसिद्ध गीतकार व गजलकार श्री जगदीश मीणा व विरासत की संस्थापिका सुश्री आकांक्षा शर्मा अक्स को एकलव्यम साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में सभी कवियों ने अपनी कविताओं से न सिर्फ खूबसूरत समा बांधा अपितु दर्शकों को खूब लुभाया। कवियों में सुश्री मुस्कान शर्मा श्री मनोज चौहान, सुश्री वंदना कँु वर रायजादा, डॉ ममता वार्ष्णेय, श्री आशीष प्रकाश , श्री प्रवें द्र पंडित व डॉ चेतन आनंद ने शिरकत की। कार्यक्रम के अन्य आकर्षण नायाब कला प्रदर्शनी जिसमें सुश्री निधि बंसल, सुश्री सुषमा अग्रवाल, सुश्री मोनालिसा, श्री अरुण कामती, सुश्री अदिति, सुश्री श्रेयशी आदि ने बेहद आकर्षक कलाकृतियां के साथ सुश्री मोनालिसा धर, सुश्री श्रेयशी चंद्रा व उदिता श्री द्वारा मनमोहक नृत्य भी रहे । संगीत की लोकप्रिय गायिका सुश्री ज्योति उप्रेती सती व उनकी बहन डॉ नीरजा उप्रेतीने इतना मुख्य कर दिया कि सभागार में मोजूद साहित्य जगत की लोकप्रिय हस्तियां अपने आपको न रोक पाई और नृत्य, कला और संगीत का ऐसा संगम प्रस्तुत किया जिसकी मिसाल साहित्य जगत में मौजूद नहीं है । अंत में काव्य कार्नर फाउं डेशन के सभी टीम में बर्स (श्री राजपाल यादव, श्री पीयूष शुक्ला, सुश्री मेघना खा, श्री कुमार गुलशन, सुश्री मनीषा यादव, सुश्री वर्णिका रायजादा आदि ) को भी संस्था द्वारा सम्मानित किया गया जिसमें हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली व अन्य सी प्रान्तों के पदाधिकारी शामिल रहे व केंद्रीय टीम श्री ईश कुमार गंगानिया डॉ पूजा सिंह गंगानिया, श्री अमित चौहान, श्री प्रदीप सिंह व सुश्री शिल्पी चौहान ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन प्रीतिभोज के साथ हुआ। निस्संदे ह यह अपने किसम का बड़ा ही अद्भुत वार्षिकात्सव रहा। ऐसा लगता है इसकी गूंज साहित्य जगत में लम्बे समय तक रहने वाली है ।
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प्रेस विज्ञप्ति
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