सचिन चतर् ु वेदी नई दिल्ली संस्थापक, अनरु ाग्यम ् डॉ ध्रुव तिवारी रायपरु , छतीसगढ़ सलाहकार, कला विभाग अनरु ाग्यम ्
eq[; laikfndk डॉ तरुणा माथरु जयपरु , राजस्थान
lg laikfndk निधि बंसल नोएडा, उत्तरप्रदे श
विनीता पंढ ु ीर नई दिल्ली प्रियंका वर्मा मंब ु ई, महाराष्ट्र मीनू बाला जालंधर, पंजाब
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वर्ष 1, अंक 1, मई 2021 प्रकाशक स्थल नई दिल्ली
प्रकाशक
अनुराग्यम ्
अनरु ाग्यम ् से जड़ ु ें और अपने सभी मित्र जनों, परिवार जनों और जान पह्चान वालों को अवश्य जोड़ कर कला, साहित्य, विज्ञानं एवं संस्कृति का हिस्सा बनें \
कॉपीराइट मासिक पत्रिका कलायात्रा में संकलित सभी रचनाओं के अधिकार उनके लेखकों द्वारा आरक्षित हैं । इस प्रकाशन के किसी भी हिस्से को बिना लेखक व प्रकाशक अनुमति के पुनः प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । इसके किसी भी रूप में - इलेक्ट्रॉनिक, मैकेनिकल, फोटोकॉपी, रिकॉर्डिंग प्रयोग हे तु लेखक व संपादिका की पूर्व अनुमति आवश्यक है , यदि बगैर पूर्वानुमति के कोई इसका कहीं प्रयोग करता है तो कापीराइट अधिनियम के तहत ये दं डनीय अपराध की श्रेणी में आता है । इस संकलन को मूल रूप से लेखकों की व्यक्तिगत धारणा और अभिव्यक्ति को सम्प्रेषित करने के लिए लिखा और प्रकाशित किया गया है , जिसका मूल उद्देश्य समाज में नवचेतना का सज ृ न है । मौलिकता सभी रचनाएं विशुद्ध रूप से लेखकों के व्यक्तिगत मौलिक विचारों व धारणाओं की अभिव्यक्ति मात्र हैं, इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति समुदाय समाज की भावनाओं को आहत करने का कोई प्रयास लेखक व प्रकाशक द्वारा नहीं किया गया है इस संकलन का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक मूल्यों व जागतृ ि का संचार है । यद्यपि कलायात्रा में रचनाओं की मौलिकता को लेकर पर्ण ू संकलिप्त व सजग है फिर भी किसी रचनाकार की यदि कोई रचना चोरी की हुई पायी गई तो मौलिकता प्रमाण पत्र नियम के अंतर्गत उसकी संपर्ण ू जिम्मेदारी लेखक की स्वयं होगी । किसी भी न्यायिक प्रक्रिया के लिए प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होगा । सर्वाधिकार रचनाओं एवं आलेख के चयन व प्रकाशक के लिए उत्तरदायी सर्वाधिकार संपादकीय विभाग के पास सुरक्षित हैं। दिए गए लेखों व अन्य सामग्री के लिए संपादकीय विभाग जिम्मेदार नहीं है । किसी भी प्रकार के विवाद की दशा में न्याय क्षेत्र नई दिल्ली ही होगा। प्रकाशक, मुद्रक एवं मख ु ्य संपादिका डॉ तरुणा माथरु द्वारा गौरव प्रिंटिंग प्रेस, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, नई दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका कलायात्रा में आपको कभी - कभी ‘इम्प्रेफेक्ट पिक्चर्स’ नजर आएंगी, ये पिक्चर्स गूगल से लिए गए हैं । इन्हें बनाने में पत्रिका के संपादकीय विभाग शामिल नहीं होते। आर्थिक सहयोग यह लंबी आयु तक जीवित रह सके, इस निमित्त आर्थिक सहयोग paytm +91-9999920037 पर प्रेषित कर सकते हैं। राशि जमा करने के पश्चात ् आप मोबाईल न. +91-9999920037 पर अवश्य सूचित करें ।
अनुक्रमाणिका
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कवर स्टोरी डॉ चिन्मय मेहता
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राजस्थान की संस्कृति अनामिका जोशी
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राजस्थान के तीज-त्यौहार श्वेता शर्मा
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मोबाइल स्कूल ज्योति पाण्डेय
17
संगीत और मानव जीवन रूपेश माथुर
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सिटी पैलेस, उदयपुर अनज ु शक ु ्ला
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राजस्थानी लोकगीत ओमप्रकाश सरगरा
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उभरते बाल कलाकार
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राजस्थानी खान-पान सरिता तिवाड़ी
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कठपत ु ली सीमा वालिया
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बाल कलाकार
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कविताएं
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कलमकारी प्रवीणा महीचा
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नई शिक्षा नीति डॉ तरुणा माथरु
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चित्रकारी
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कलाकार रजनी किरण झा
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मानसिक स्वास्थ्य वसुधा गोयल
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राजस्थानी लोक नतृ ्य विनीता पुंढीर
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कविता : मन / क्या खता आरती दीक्षित
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साक्षात्कार श्रृंखला 1.0
की नैतिक जिम्मेदारियां 40 लेखक अर्चना श्रीवास्तव
41 राजस्थानी महिला आभषू ण
बदलता समाज बदलते रिश्ते अनुराधा
प्रश्नावली
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शभ ु सन्देश गागर में सागर कहावत अनुराग्यम ् पर पूर्णतः सिद्ध होती है l अनुराग्यम ् के संस्थापक श्री सचिन चतुर्वेदी जी का 'कलायात्रा' पत्रिका के माध्यम से भारत के सभी राज्यों की कला-संस्कृति को दर्शाने का अनठ ू ा प्रयास सराहना से कहीं परे है । कलायात्रा के सम्पूर्ण संपादक मण्डल को इस प्रयास के लिए मेरी ओर से शुभकामनाएं। प्रो. एस पी गर्ग (में टर) चेयरमैन, आस्क एजक ु े शन शिकागो, यूनाइटे ड स्टेट ऑफ अमेरिका
अनरु ाग्यम ् “कला -यात्रा” पत्रिका अपनी सांस्कृतिक कला यात्रा, समाज व दे श की विविधता से भरे अपने भारतीय परं परागत मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत है । दे श की विभिन्न प्रकार के सामाजिक और लुप्तप्राय संस्कृति को हमारे सामने लाने में जझ ु ारू प्रयास के लिए मैं अनरु ाग्यम ् संस्था के संस्थापक श्री सचिन चतुर्वेदी जी को दिल से धन्यवाद कर उनके मार्ग में सहायक बनने का प्रयत्न करता रहूंगा। अनुराग्यम ् के सभी परिश्रमी और अथक लगन से कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा ऊंचा रहे इसके लिए उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ l डॉ .ध्रुव तिवारी शिक्षाविद एवम प्रसिद्ध चित्रकार, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत
अनुराग्यम ् एक ऐसा कारवां है जो हर एक के दिल को छू कर, अपना मान कर साथ चलता है । आज के समय में हम सबके पास इतना भी समय नहीं होता कि हम थोड़ा सा भी वक़्त अपनी भारतीय कला, भारतीय संस्कृति को जानने के लिए दे सकें l इसीलिए अनरु ाग्यम ् का यह प्रयास “कलायात्रा पत्रिका” के माध्यम से आप सबके बीच में कैप्लेट मासिक पत्रिका, जिसमें आने वाले हर माह में हम भारत के एक-एक प्रदे श को ले कर आएंगे जहाँ से आप जान सकेंगे प्रदे श की जनजातियों, खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति और कला के बारे में । मैं शुभकामनाएं दे ता हूँ अपने सभी कलायात्रा के संपादकीय मण्डल को और साथ ही साथ आप सभी से आग्रह करता हूँ कि आप इसको जरूर पढ़ें और इस पत्रिका का फीडबैक हमारे व्हाट्सअप नंबर पर या ईमेल पर दे सकते हैं । सचिन चतर् ु वेदी प्रधान संपादक, कलायात्रा पत्रिका संस्थापक, अनरु ाग्यम ्, नई दिल्ली
वैश्विक अभियान का हिस्सा बनें। हमारे समाज के हर पहलू में अनेकों प्रयासों की आवश्यकता होती है और यह आपके साथ के बिना अधूरा है । अनुराग्यम ् आप सब से दरख्वास्त करता है कि आप इस वैश्विक लड़ाई में अनुराग्यम ् का हिस्सा बनें और अधिक से अधिक मात्रा में पेड़ पौधे लगाएं ।
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सम्पादकीय.. भारतीय कला, साहित्य व संस्कृति की पत्रिका “कलायात्रा” का ख़्याल अनरु ाग्यम ् के संस्थापक श्री सचिन चतुर्वेदी जी को यकायक आया जब उन्हें लगा कि भारतीय कला व संस्कृति के चहे तों के लिए एक ऐसी पत्रिका की आवश्यकता है जो एक ही पटल पर कला व संस्कृति के विविध आयामों को परिलक्षित करे । श्री सचिन चतर् ु वेदी जी का ये प्रयास वास्तव में सराहनीय है , कला, साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में सचिन जी की जिज्ञासा साफ झलकती है और किसी ना किसी नई योजना को आप सबके समक्ष लेकर भी आते हैं l सभी योजनाएं एक अचंभित रूप से सफल भी होती हैं, जिसका श्रेय आप सभी पाठकों व अनुराग्यम ् के सदस्यों को जाता है l “अनुराग्यम ्” अभी तक अपने हर अथक प्रयास में सफल रहा है और समय के साथ कला, साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अनुराग्यम ् का एक और नया कदम जिसका नाम “कलायात्रा” रखा है l कला-संस्कृति से जड़ ु ी इस पत्रिका में हमने पूरा प्रयास किया है , हमारे भारत के रीति-रिवाज़, बोली, खानपान, परम्पराएं, रहन-सहन, जातियां इत्यादि को समेटने का l कलायात्रा का यह प्रथम अंक भारत दे श के राजस्थान प्रदे श पर आधारित है l राजस्थानी संस्कृति की कोई तल ु ना नहीं हो सकती, सम्पूर्ण विश्व में राजस्थान की अपनी अदभुत छवि है l राजस्थान की अनेक खूबियों को हमारे लेखकों ने अपने शब्दों की जादग ू री से संजोया है । “कलायात्रा” के राजस्थान विशेषांक में मझ ु े एक ऐसे व्यक्तित्व श्री चिन्मय मेहता जी की कवर स्टोरी लिखने का मौका मिला जिन्होंने कला के क्षेत्र में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है । राजस्थान विश्वविद्यालय जयपरु ललित कला संकाय के डाॅ तरूणा माथरु डीन व प्रोफेसर के पद पर रहते हुए उन्होंने ना सिर्फ संकाय को मुख्य संपादिका एक इंफ्रास्ट्रक्चर दिया बल्कि कला के क्षेत्र में जो पढ़ाई करना चाहते थे उनके लिए बीएफए के बाद स्ववित्त पोषित एमएफए की सुविधा प्रदान की जिससे उन कला शिक्षार्थियों को प्रदे श के बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। कला की बात है तो चित्र प्रदर्शनी की बात ना हो तो पत्रिका फीकी जान पड़ती है अतः एक कोना बाल कलाकारों की पें टिंग का और अनभ ु वी कलाकारों के लिए भी रखा गया है , ताकि उभरते कलाकारों को एक पटल मिल सके। हमारा सार्थक प्रयास होगा जब हम पाठक गण को भारत की कला-संस्कृति के बारे में समझ सकने का बिगुल बजाएं और जनमानस भी कला के विविध रूपकारों से एकाकार हो सके और समझ सकें की कला नैसर्गिक सौंदर्य का प्रतिमान है और नितान्त स्वान्तः सुखाय ही नहीं बल्कि सबकी रुचि के अनुसार भी गढ़ी जाती है । हम पूरा विश्वास करते हैं की आपको ये प्रयास अवश्य पसंद आएगा l धन्यवाद Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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कवर स्टोरी
प्रो. (डॉ) चिन्मय मेहता पर्व ू प्रोफेसर एवं डीन ललित कला विश्वविद्यालय कला संकाय राजस्थान, जयपरु पर्व ू अध्यक्ष राजस्थान ललित कला अकादमी जयपरु , राजस्थान अध्यक्ष आयाम इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट एंड कल्चर जयपरु , राजस्थान
प्रदर्शन डिजाइन करने के अलावा, प्रो. चिन्मय मेहता जी ने रिसॉर्ट्स का एथनिक डिजाइन भी किया जो इस प्रकार है :
चोखी ढाणी, जयपरु
ढोला री ढाणी, है दराबाद चोखी ढाणी, राजकोट
निराली ढाणी, जोधपरु
अंबर विलास, चोखी ढाणी के अपोजिट, जयपरु गार्मिन हाट (शिल्पग्रम्स) दौसा, सवाईमाधोपरु और झंझ ु न ु ू
रूपालो रावलो (एथनिक रिसॉर्ट्स),
हवाई अड्डे के ठीक सामने, उदयपरु
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रिलिफ म्यूरल्स - प्रो. चिन्मय मेहता
एक दिन अचानक मोबाइल की घण्टी बजी
,दे खा तो मेरे गुरु गाइड प्रोफेसर डॉ चिन्मय मेहता जी का फोन था, बात की तो लगा कि यह आज भी कितने सक्रिय हैं और अपनी कलात्मक सोच के कितने पाबंद। उन्होंने मुझसे पूछा कि तुमने नई शिक्षा नीति के बारे में पढ़ा है और कहा कि नई शिक्षा नीति में सरकार कला को लेकर एक नई रूपरे खा के साथ स्थापित करने की योजना बना रही है और हमें भी इस क्षेत्र में अब काम करना चाहिए और क्योंकि वे पहले से ही शिक्षा नीति में कला की रूपरे खा और कार्यान्वयन पर अक्सर विचार विमर्श करते थे और विश्वविद्यालय स्तर पर उन्होंने बहुत कुछ करने का प्रयास भी किया था, तो इस बात को समझने में मुझे कतई दे र नहीं लगी कि वे बहुत रोमांचित और उत्साहित हैं।
मुझे कुछ जरूरी जानकारी दे कर एक टास्क दिया कि जिसको मैं नई शिक्षा नीति को कला के संदर्भ में समझँू और फिर मैं इस दिशा में सरकार से सकारात्मक दृष्टिकोण से कार्य करने के लिए नई रूपरे खा और कार्य करने का आग्रह कर सकँू । मेरे लिए यह सब जितना चुनौतीपूर्ण था उतना ही रुचिपूर्ण भी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जिस व्यक्तित्व का मैं यहां ज़िक्र कर रही हूँ वह मेरे जैसे कितने ही शिक्षार्थियों को समय-समय पर प्रोत्साहित करते रहे हैं और उनकी प्रगति के लिए हमेशा मार्ग प्रशस्त करते रहे हैं । अनरु ाग्यम ् की पहली कला पत्रिका “कलायात्रा “में उनके व्यक्तित्व पर रोशनी डालकर आप सबके सामने लाने में मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ । प्रो. चिन्मय मेहता अपनी पहली मुलाकात में अपनी जीवनशैली से और अपने अपीरियंस से सबको प्रभावित करते हैं फिर जैसे-जैसे आप उनसे बातचीत करते हैं तो पाते हैं कि वह एक बेहतरीन प्रशासक, शिक्षक, विचारक, सौंदर्य- शास्त्री, वास्तु डिज़ाइनर, चित्रकार और शिल्पकार हैं जो दे खने से नितांत दे शज, भारतीय से और बातचीत से समसामयिक पारं परिक व आधुनिकता के सुंदर समन्वय के धनी व्यक्ति हैं। व्यावहारिक रूप में राजस्थान के झीलों की नगरी उदयपुर की कलात्मक संस्कृति से आए प्रो. चिन्मय मेहता राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में ललित कला संकाय के प्रोफेसर व डीन के पद पर पदासीन थे। 2002 में वे सेवानिवृत्त हुए किंतु ललित कला संकाय के ढांचे में
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dyk;k=k अध्यापन के अतिरिक्त विकास के लिए किए गए उनके अथक परिश्रम का फल पीढ़ियों तक कला में रुझान रखने वाले शिक्षार्थियों को मिलता रहे गा ।
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अपनी प्रशासकीय कुशलता व सूझबूझ से उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय में पहले बीएफए और बाद में 2001 में स्ववित्त पोषित आधार पर एमएफए ललित कला में स्नातकोत्तर कक्षाएं प्रारं भ की और संभाग के भवन निर्माण को नई दिशा दी, जिसमें आज भी सैकड़ों कला शिक्षार्थी कला की शिक्षा ग्रहण कर आगे बढ़ रहे हैं और दे श के विभिन्न क्षेत्रों के स्कूलों कॉलेजों में विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं । उनके बारे में आगे बताने से पहले मैं बताना चाहूंगी कि कभी जयपुर घूमने का मन करें और आप दर्शनीय स्थलों की सूची गूगल करें तो आप पाएंगे कि “चोखी ढाणी” नाम के पाँच सितारा एथनिक रिसोर्ट का नाम प्रमुखता से दिखाई दे गा आप जब वहां घूमने जाएंगे तो आप है रान रह जाएंगे कि गांव की नितांत साधारण की ढाणी-झोपड़ी के वास्तु पर आधारित उस रिसोर्ट की भव्यता के आगे आपको विशालकाय पाँच सितारा होटल फीके जान पड़ेंगे । मुझे यह बताते हुए अत्यंत गर्व महसूस हो रहा है कि कला पर पर्यटन के क्षेत्र में “चौखी ढाणी” अपने समकक्ष
खड़े कई पांच सितारा होटलों को छोड़कर अग्रज स्थान में खड़ी दिखाई दे ती है जो आधुनिक भारत के लिए एक युगान्तकारी घटना हुई और उसका श्रेय भी प्रो. चिन्मय मेहता को जाता है । ये उन्हीं की ग्राम्य अलंकारिक स्वप्न का जीता जागता नमूना है । उनकी कल्पनाशीलता में चाहे कपड़ा हो, दीवार हो, कैनवस हो या कई एकड़ ज़मीन जो वो एक नए आयाम के साथ अपनी कल्पनाशीलता को उड़ान दे ने का दम रखते हैं और उसको हकीकत का रूप दे कर “चौखी ढाणी” जैसे भव्य रूपाकार को जन्म दे कर अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में सक्षम होते हैं। चोखी ढाणी जैसे अन्य पांच और प्रोजेक्ट दे श के विभिन्न हिस्सों में अपनी उपलब्धि सिद्ध कर चुके हैं । इस एथनिक रिसोर्ट में सुविधा युक्त व समकालीन स्वभाव व अभिरुचि का ध्यान रखकर पारं परिक हाथों से स्वप्निल वातावरण संजोया गया है जो लोक बिम्बों का त्रिआयामी प्रस्तुतीकरण है । साथ ही उसमें पारं परिक कलाकारों, वाद्यकारों, गायकों को रोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं जो बहुत ही सराहनीय और स्वागत योग्य है ।
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उसमें अलंकृत झोपड़ियां, झरोखे, आतंरिक साज सज्जा का सामान्य व्यवहार भारतीय संस्कृति की धरोहर है जो चिन्मय मेहता को समकालीन कलाकारों में सिरमौर रखने में सक्षम है क्योंकि द्वि-आयामी रूपाकारों का इतना सुंदर प्रयोग त्रिआयामी पटल पर कर प्रोफ़ेसर मेहता ने सौम्य, मधुर, लयात्मक वातावरण को जन्म दिया है । प्रोफेसर चिन्मय मेहता राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, मेरठ विश्वविद्यालय मेरठ, कानपुर विश्वविद्यालय कानपुर, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट आगरा की रिसर्च डिग्री कमेटीज़ में भी हैं और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मानविकी से संबंधित शोध योजनाओं के मूल्यांकन हे तु गठित समिति के सदस्य भी हैं । वे ललित कला अकादमी राजस्थान के अध्यक्ष भी रहे हैं और बोर्ड ऑफ स्टडीज पें टिंग राजस्थान के अनेक वर्षों तक निरं तर संयोजक रहे हैं। शिक्षण संस्थान में रहते हुए शिक्षार्थियों के लिए उन्होंने विभिन्न कला प्रदर्शनियों, सेमिनार, कैं प, पुनश्चर्रया कार्यक्रमों का कुशलता पूर्वक
आयोजन भी किया। प्रोफेसर मेहता ने बांग्लादे श की राजधानी ढाका में जनवरी 2002 को “दमश एशियन आर्ट बिनाले” बांग्लादे श 2001 के अवसर पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अपना शोध पत्र पढ़ा जो बाद में “माटी से जुड़ी कला” शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ । ऐसे कितने मह्त्वपूर्ण काम उन्होंने ललित कला अकादमी राजस्थान के अध्यक्ष पद पर रहते हुए किए जिनसे तत्कालीन जुड़े कलाकारों को और कला को आगे बढ़ाने का अवसर मिला साथ ही सरकार की सांस्कृतिक नीति के निर्धारण हे तु प्रारूप
भी उन्होंने तैयार किया, जिसमें राजस्थान की सांस्कृतिक प ृष्ठभूमि में सांस्कृतिक सरोकारों एवं जड़ों को पुनर्जीवित कर कला व हस्तशिल्प के विकास के लिए योजना का प्रारूप तैयार किया । आधुनिक पाश्चात्य कला को अगर आप जानना चाहते हैं तो प्रोफ़ेसर मेहता से अच्छा शिक्षक आपको नहीं मिलेगा। पिकासो ब्रांक, रे म्र्बा, लियोनार्दो दा विंची, माइकल एंजेलो या पाश्चात्य वादों के बारे में ऐतिहासिक और शाब्दिक अर्थों का ज्ञान प्रोफ़ेसर मेहता को मौखिक ही है उनसे बातचीत से ही आप उनके ज्ञान गंगा में तैरते चले जाएंगे और है रान भी रह जाएंगे कि यह व्यक्तित्व कैसे इतना सुंदर संतुलन बैठा पाते होंगे, जब स्वयं के चित्रों में , म्यूरल्स में उत्कीर्ण संरचनाएं पूर्णतया भारतीयता की छाप के साथ संस्कृति के सज ृ नशील गुणों को आकार दे ती हैं Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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और साथ ही आधुनिक कला के अमूर्त चित्रण में कितनी बेबाक राय भी । प्रोफेसर चिन्मय मेहता को यदि हम सिर्फ एक कलाकार के रूप में जानने की कोशिश करें तो उनकी प्रथम एकल चित्र प्रदर्शनी जो आइफैक्स, नई दिल्ली में प्रदर्शित हुई थी, में दो भिन्न तरह के मूल्यों पर आधारित चित्रों की श्रंखलाएं थीं, तो हम पाएंगे कि एक और उनके चित्र राजस्थान की रं गीन लोक परं परा से प्रेरणा लेकर बनाए गए तैल चित्र व बाटिक चित्र थे जिसमें भारतीय दे शज मूलक कला तत्वों की प्रयोग शीलता का सुंदरता से समायोजन था और उन्हें दे खकर उस समय के कला समीक्षक श्री चार्ल्स फाबरी ने उनके चित्रों की तुलना जामिनी रॉय व अमत ृ ा शेरगिल द्वारा किए गए प्रयास को नए अंदाज में प्रस्तुत किया माना था। जबकि दस ू री ओर उनके अमूर्त चित्रों की श्रृंखला भी प्रदर्शित हुई थी जिसे कला समीक्षक श्री केशव मलिक ने बहुत पसंद किया था। इस तरह वे उस समय के कलाकार मन में उत्पन्न द्वंदव को बहुत बारीकी से दिखाते हैं जब उभरते कलाकारों का एक समूह जामिनी रॉय या अमत ृ ा शेरगिल सरीखे लोक शैली के नवीन रूपांतरण के पुरोधा चित्रकारों से प्रभावित था तो दस ू री तरफ एक कलाकारों का समूह फ्रान्स के उत्तर प्रभाववाद से प्रेरित मुंबई के प्रोग्रेसिव कलाकारों के समूह से, जिसमें वे रं गों का प्रयोग मुक्त भाव से नए रूपाकारों को गढ़ने में व्यस्त थे l
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इस प्रदर्शनी ने प्रोफ़ेसर मेहता को एक ऐसे कलाकार की श्रेणी में खड़ा किया जहाँ उन्होंने दे शज और अमूर्त कला के बीच एक सुंदर समन्वय को अपनी कला में जन्म दिया था उनके बाटिक चित्रों की श्रृंखला या उनके अमूर्त चित्रों को दे खकर आप उनकी यह खूबी बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। एक “श्वेत-श्याम” रं गों की चित्र श्रृंखला में अति आधुनिक चित्रकार के रूप में दिखाई दे ते हैं तो राजस्थान के मीणा समाज की प्राचीन लोक कला “माडणा” कला को नई दृष्टि में नए मानदं डों के साथ नई पीढ़ी के आगे प्रस्तुत भी करते हैं। पाश्चात्य कला समीक्षकों के उस विचार को प्रोफेसर मेहता खारिज करते नज़र आते हैं जहां वे कहते थे कि आधुनिक भारतीय कलाकार यूरोपीय आधुनिकता का अंधानुकरण क्यों करते हैं जबकि भारत के पास हजारों साल पुराना कला का वृहद और उत्कृष्ट इतिहास है । अक्सर वह अपने शोधार्थियों व कला शिक्षार्थियों को यह कहा करते थे कि अगर अमूर्त चित्रों की प्रेरणा ही लेनी है तो भारत की लोक कला, आदिवासी जनजातियों की कला की ओर दे खें ना कि पश्चिमी कला की ओर क्योंकि हमारी लोक एवं आदिम कला में स्वतः स्फूर्त, अमूर्तन, अक्षय संग्रह विद्यमान है । अपने प्रारं भिक कला यात्रा में उनके चित्रों में तैल रं गों से सरल रे खाओं के प्रयोगों से ग्रामीण जनजीवन को
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चित्रित किया जिनमें श्रृंगार करती, बातचीत करती ग्रामीण महिलाएं, गाय चराते लोग, खेतों में काम करते हुए ग्रामीणों का चित्रण प्रमुख है । बाद में उन्होंने जल रं गों से लैंडस्के प में कश्मीर, कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र के सुंदर दृश्यों को अपने कैनवस पर उतार दिया जहाँ की ख़ामोशी उनके चित्रों में गति बनकर बहती आपको नजर आएगी ।
रुचि को आप उनके चित्रों की गति में महसूस कर सकते हैं l
धीरे -धीरे दृश्य चित्रण के स्थान पर शहरी अनुभव को उन्होंने एक आदमी की मानसिक, भावनात्मक में बौद्धिक संवेदनाओं को सज ृ न में अमूर्तता के रूप में सजृ ित कर दिया। जो उनकी चित्र श्रृंखला “आफ्टर मैथ ऑफ वायलेंस” के चित्रों में दिखाई दे ती है और आप पाते हैं कि कैसे आप राजनीति के उठापटक की व्यवस्था के शिकार होकर दर्द से क्षुब्ध होते जाते हैं।
संगीत की गहन रुचि के कारण प्रोफेसर मेहता ने कई वर्षों से “स्पिक - मैके” के राजस्थान चैप्टर को बखूबी चलाया और बहुत सारे नौजवानों को उससे जोड़कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया। युवा पीढ़ी में शास्त्रीय संगीत व नतृ ्य को समझने व रुचि जागत ृ करने में “स्पिक मैके” की महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।
ऐसे ही “हाय मन ऑफ हे लोकास्ट” नामक चित्र श्रृंखला में उन्होंने सामाजिक जीवन की बेचनै ियों को दृश्यबद्ध किया है । कई कई प्रयोगों के बाद प्रोफ़ेसर मेहता आज म्यूरल के क्षेत्र में छाए हुए हैं जो कई बड़े बड़े मॉल व रिसोर्ट में लगे हुए हैं और दर्शकों की जिज्ञासा का विषय होते हैं क्योंकि उनके अमूर्त आकार अलगाव, एकांतिकता, असुरक्षा, गतिरोध, ऊर्जा जैसे अनेक अर्थों को समेटे हुए अमूर्त आकार से अपनी अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करते हैं। मूर्त से अमूर्त की ओर चलती उनकी कला यात्रा आपको सहज ही एक जीवन यात्रा, एक काल निर्धारितयात्रा की अघोषित वृतांत के दर्शन करवाती है । उनके व्यक्तित्व का संतुलन उनके चित्रों और म्यूरल्स में दे खने को मिलता है । संगीत के प्रति उनकी स्वभाविक
केंद्रीय ललित कला अकादमी द्वारा राष्ट्रीय प्रदर्शनी में उनके म्यूरल को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिसकी पुरस्कृत राशि को उन्होंने भूकंप पीड़ितों की सहायतार्थ प्रदान कर दी।
राजस्थान के प्रथम क्राफ्ट इंस्टीट्यूट की स्थापना में भी प्रोफ़ेसर मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । वर्तमान में “आयाम” कला व संस्कृति नामक संस्थान के अध्यक्ष हैं जो कला के क्षेत्र में विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा कलाकारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं । इसी से संबंधित एक महत्वपूर्ण श्रृंखला”मांडणा” लोक कला को ग्रामीण महिलाओं के पारं परिक हाथों से बनवा कर उन्होंने आधुनिक सज ृ न का महानतम ् कार्य भी किया है । उनका बनाया “क्राफ्ट हब” और ”चोखी-ढाणी” आज भी ग्रामीण हस्तशिल्पियों को नवीनतम तकनीकों की ट्रेनिंग के साथ ही व्यवसायिक आर्थिक संपन्नता के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए योजनाबद्ध है । उनके व्यक्तित्व के विशालतम कैनवास के मात्र एक पक्ष को ही मैं चित्रित कर पा रही हूँ संपूर्ण कैनवास को दे खने के लिए उनसे आपको कई मुलाकातें करनी पड़ेगीं। जीवन की
संपर्ण ू ता मात्र ज्ञान, इंद्रिय बोध या तीक्ष्ण मेधा नहीं बल्कि जीवन को ही परू ी रं गभमू ि बना दे ना, वह भी त्रिआयामी वातावरण में जीवंत कर दे ना एक सच्चे कलाकार का दर्शन है और प्रोफेसर चिन्मय मेहता इन अर्थों में एक उत्कृष्ट कला गरु ु , कला शोधक, कुशल प्रबंधक, डिज़ाइनर, गंभीर दार्शनिक चिंतक और भारतीय कला के सच्चे सौंदर्य शास्त्रीय गण ु ों को परिभाषित करते सहज व सौम्य साधक हैं ।
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मेरा मेरे ऐसे गरू ु को शत-शत नमन और अभिनंदन ।अनरु ाग्यम ् उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता है और अपने जीवन पथ के कुछ तथ्यों को आप सबके सामने लाने की सहमति के लिए उन्हें डॉ तरुणा माथुर धन्यवाद ज्ञापित करता है । जयपुर, राजस्थान
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राजस्थान की संस्कृति इण धरती रो म्हाने अभिमान हो, इण पर वारा प्राण हो, आ धरती राजस्थान री.... क्यूँ न हो, राजस्थान भारत के खब ू सरू त राज्यों में से एक है । यहाँ की संस्कृति दनु िया भर में मशहूर है । विभिन्न समद ु ायों का योगदान है । जब भी राजस्थान का नाम लिया जाता है हमारी आँखों के आगे थार का रे गिस्तान, ऊँट की सवारी, घम ू र, कालबेलिया नतृ ्य और रं ग बिरं गे पारं परिक परिधान आते हैं। अपने सभ्य स्वभाव और शालीन मेहमान नवाज़ी के लिए प्रसिद्ध है राजस्थान। सभ्यता, सन ु ्दरता और शालीनता की त्रिवेणी तो यहाँ के परिधान की अनप ु म विशेषता है । चटक रं ग के गोटाकिनारी लगे लहं गे और सिर पर ओढ़ी हुई ओढ़नी। बाहरी लोगों के सामने घंघ ू ट में चांद सा चमकता चेहरा, जो सामने वाले व्यक्ति को सम्मान का अहसास करवाती है । परू ु षों के सिर पर जो पगड़ी है मात्र पगड़ी नहीं, उनका सर्वस्व है सम्मान, प्रतिष्ठा का प्रतीक है । लोक प्रसिद्ध आभष ू ण जिसे केवल स्त्रियाँ ही नहीं परू ु ष भी धारण करते हैं।
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अनुराग्यम ्
अब एक आकर्षक शब्द है घूमर l जिसे करने की निपुणता केवल और केवल राजस्थानी महिलाओं में ही होती है । लय, कदम, ताल और घेरे में घूमने का अद्भुत समन्वय। वाह! क्या दृश्य होता है । यहाँ का परं परागत भोजन दाल बाटी चूरमा चाहे आपको किसी भी शहर में मिल जाए लेकिन यकीनन यहाँ जैसी बात कहीं ओर नहीं मिलेगी। घी में डूबी गरमा-गरम बाड़ी दे खकर मँह ु में पानी आ जाता है । अब बात करते हैं त्यौहारों की फरवरी माह में मनाया जाने वाला डेज़र्ट महोत्सव जहाँ अतरं गी मुकाबले होते हैं। ऊंटों के खेल के बीच पुरुषों की लम्बी-लम्बी मूछों के बीच होने वाला मुकाबला अद्भूत होता है । बीकानेर में आयोजित होने वाला ऊँट मेला, उन्हें दल ु ्हन की तरह सजाना, उनके बीच दौड़ करवाना, आतिशबाजी से इन सब के बीच आसमान को रोशन करना, क्या नज़ारे होते हैं। राजस्थान को सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के समद ृ ्ध प्रदे श में गिना जाता है । यहाँ की संस्कृति जहाँ त्याग बलिदान एवं शौर्य की अद्भुत दास्तान है , वहीं कला,
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मई 2021
dyk;k=k राजस्थानी रहन-सहन
अनामिका जोशी ‘आस्था’
बीकानेर , राजस्थान
संगीत, साहित्य एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का विशाल सागर है । यहाँ की संस्कृति प्रसादों से लेकर घर के जन-जन में समाई हुई है । यहाँ की संस्कृति का स्वरूप रजवाड़ों और सामन्ती व्यवस्था में दिखाई दे ता रहा है । इसके वास्तविक स्वरूप को बचाए रखने का श्रेय ग्रामीण अंचल को जाता है । जहाँ यह संस्कृति जीवन्त हो उठती है । इस जादई ु भूमि में रे गिस्तान का सौन्दर्य, वीर- पुरूष और स्त्रियों का नम्र और सहृदयता पूर्ण आचरण विविध संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा है । आतिथ्य और शुद्ध आनंद की भावना इस भूमि के हर नुक्कड़ में आपको दे खने को मिलेगी। पाश्चात्य संस्कृति के फास्ट-फूड कल्चर ने चाहे सुरसा की तरह मँह ु पसार लिया हो लेकिन राजस्थानी पाक शैली बहुत ही संवेदनशील है । यहाँ के खाद्य पदार्थ एवं व्यंजन अपनी संस्कृति के अनुरूप सुपाच्य, पौष्टिक,
स्वास्थ्यवर्धक एवं गुणवत्ता युक्त है । वर्षा की कमी एवं सिंचाई के साधनों की कमी की वजह से हरी सब्जियों की बहुतायत न होने पर भी यहाँ की प्रकृति ने कई प्रकार के पेड़ पौधे उपलब्ध करवाकर इस कमी का पूरा कर दिया है । कैर, सांगरी, कुमटिया सूखे मेवे की होड़ करते हैं l प्रकृति की इसी खास सौगात के चलते राजस्थानी अपने मेहमानों के लिए “अतिथि दे वो भव’ की परम्परा का निर्वाह करने में सफल रहते हैं। तारीफ तो जितनी की जाए उतनी ही कम है । जिस प्रकार प्रेम को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता ठीक उसी प्रकार इस राजस्थान की संस्कृति को जी केवल जिया जा सकता है शब्दों में पिरोया नहीं जा सकता तभी तो कहा गया है । अरे , हठिलो, ओगरवीलो मरूधर म्हारे दे स, पछे मैं क्यों जावा परदे श।
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राजस्थान के तीज-त्यौहार
केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे दे श राजस्थानी संस्कृति एक बेहतरीन संस्कृति है जो गाँव-ढाणी, चैपाल-पनघट, महल-झोपड़ी, किले-गढ़, खेत-खलियान से बहती हुई जन-जन रूपी सागर के संस्पर्श से इन्द्रधनुषी छटा बिखेरती है और अपनी महक के साथ पर्व, मेले, तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज, श्रृंगार आदी में दिखाई दे ती है । वस्तुतः राजस्थानी संस्कृति व रीति-रिवाज़ लोक जीवन का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं। जिन्होंने राजस्थानी संस्कृति की इन सब बातों का अनुभव किया है वे बहुत खुशनसीब हैं लेकिन जो इससे अन्जान है आशा करती हूँ कि वह इसे अनुभव करने एक बार अवश्य राजस्थान आएंगे l
‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे दे श’ इस लोकगीत के माध्यम से गायिका द्वारा जिस स्थान पर आने की मनह ु ार की जा रही है वह स्थान और कोई नहीं भारत का रं ग-रं गीला राज्य राजस्थान हैं। जी हाँ, राजस्थान। इस राज्य का नाम ही काफ़ी है इसकी आन-बान-शान व वीरता को बताने के लिए। राजस्थान भारत के सबसे खूबसूरत राज्यों में से एक हैं। यहाँ की संस्कृति दनु ियाभर में मशहूर है । आज भी जब राजस्थान का नाम लिया जाए तो हमारी आँखों के सामने थार रे गिस्तान, ऊँट की सवारी, घूमर और कालबेलिया नतृ ्य और रं ग-बिरं गे पारं परिक परिधान आते हैं। अपने सभ्य स्वभाव और शालीन मेहमाननवाज़ी के लिए जाना जाता है यह राज्य। राजस्थान भारत का सबसे बड़ा व ऐतिहासिक राज्य है जो अपनी समद ृ ्ध संस्कृति, परम्परा, विरासत आदि के लिए एक अलग ही पहचान रखता है । राजस्थान के लिए कहा जाता है कि यह एक ऐसा प्रदे श है जहाँ बीस कोस पर पानी व चालीस कोस पर रीति-रिवाज़ बदलते हैं। यह भारत का ऐसा राज्य है जहाँ सबसे ज्यादा रीति-रिवाज हैं तथा यहाँ त्यौहारों के बारे में भी कहा जाता है कि यह तीज से शुरू होकर गणगौर पर खत्म होते हैं। तभी तो राजस्थानी कहते हैं कि ‘‘तीज तिंवारा बाबड़ी ले डूबी गणगौर’’ इसी प्रकार राजस्थान में जन्म से लेकर मतृ ्यु तक के जो रीति-रिवाज हैं वे बड़े अनोखे हैं।
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अनुराग्यम ्
आइये ले चलते हैं आपको उन्हीं अनोखे राजस्थानी रीति - रिवाज़ों और परम्पराओं के आँचल में । पहल करते हैं हम उन सोलह संस्कारों से जो कि मनषु ्य के जन्म पूर्व से शरू ु होकर मतृ ्योपरांत भी चलते रहते हैं। 1. गर्भाधान : मेवाड़ में इस प्रथा को बदरू ात प्रथा के रूप में भी जाना जाता है । यह सबसे पहला संस्कार माना जाता है जिसके द्वारा आत्मा कोख में प्रवेश करती है । 2. पुंसवन : गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है । इस दिन पति वटवृक्ष की छाल का रस पत्नी की नाक में डालता है । 3. सीमंतोनयन : यह संस्कार गर्भावस्था के छठे से आठवें महीने में किया जाता है । इस संस्कार को राजस्थान में आगरणी भी कहा जाता है । इस दिन गर्भवती महिला की माता महिला के लिए घाट व घेवर भेजती है । 4. जातकर्म : गर्भस्थ बालक के जन्म के समय पर यह संस्कार किया जाता है । 5. नामकरण : यह बच्चे के जन्म से सात दिन बाद किया जाता है । नामकरण किसी ज्योतिषी से करवाया जाता है । 6. निष्क्रमण : इस संस्कार में पिता शंख ध्वनि और वैदिक भजनों की ध्वनि के साथ बच्चे को सूरज की ओर दिखाता है । 7. अन्नप्राशन : राजस्थान में इसे दशोटन भी कहा जाता है । यह बच्चे को पहली बार अन्न दे ने की क्रिया है । 8. चूड़ाकरण : यह आठवा संस्कार है और राजस्थान में इसे जड़ूला भी कहा जाता है । 9. कर्णवेध : बच्चे के कान बींधने का संस्कार किया जाता है । 10. विद्यारम्भ संस्कार : बच्चे को विद्यारम्भ करवाया जाता है । 11. उपनयन संस्कार : जनेऊ पहनाया जाता है और गुरू के पास भेजा जाता है । 12. वेदारं भ : वेदों के अध्ययन हे तु यह संस्कार किया जाता है । 13. केशान्त : जब दाढी-मँछ ू को पहली बार कटाया जाता है । इस संस्कार को गोडाना या गोदानकर्मन के रूप में भी जाना जाता हैं। 14. समावर्तन : शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात गुरूकुल से वापस लौटना। 15. विवाह : इस संस्कार के बाद ब्रम्हाचारी व्यक्ति गह ृ स्थाश्रम में प्रवेश करता है । 16. अंतिम संस्कार : यह मनुष्य जीवन का अन्तिम संस्कार होता है ।
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मई 2021 राजस्थानी संस्कृति में उपर्युक्त सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार व अन्तिम संस्कार को महत्वपूर्ण माना गया है जिससे सम्बन्धित रीति-रिवाज यहाँ की संस्कृति के आवश्यक अंग हैं। जिसमें से कुछ महत्वपूर्ण इस प्रकार हैं, वैवाहिक रीति-रिवाज : सिंझारी, पहरावणी या चिकनी कोथली, पीली चिट्टी (लग्न-पत्रिका), कुमकुम पत्री, इकताई, मग ु थणा, छात, पाट/बाने, हल्दायत, कांकण-बंधन, रातिजगा, रोड़ी / थेपड़ी पूजन, बत्तीसी/भात नूतना, मायरा, चाक पूजन, मोड बांधना, बिंदौली/ बिंदौरी/निकासी/जान चढ़ाना, टूँटीया की रस्म, बरी-पड़ला, ठूमावा/आगवानी/ सामेला, तोरण मारना, जेवड़ो, झाला-मेला की आरती, हथलेवा जोड़ना, गठबन्धन, अभयारोहण, परिणयन/फेरे /भाँवर, पगधोई, कन्यादान । कन्यादान के पश्चात विवाह सम्बंधित कुछ अन्य रीति-रिवाज भी हैं जैसे अखनाल, जेवनवार, जुआ-जुई, मामटा, सीटणा, बारणा रोकना, जात दे ना, सोटा-सोटी खेलना, ओलंदी, ननिहारी, मांडा झांकना, बंदोला, मक ु लावा या गौना, बढार आदी। मतृ ्यु सम्बन्धी रीति-रिवाज : धार्मिक व सामाजिक परम्पराओं के अनुसार शोक की रस्मों की भी पर्ण ू सम्मान के साथ में महत्व दिया जाता है तथा दिवंगत आत्मा के प्रति निष्ठा प्रकट की जाती है । शोक सम्बन्धी प्रमुख रिवाज निम्न हैं: बैकुण्ठी, बखेर उछाल, आधेटा, दण्डोत, लोपा, भद्रर, कपाल क्रिया, पानीवाड़ा, सातरवाड़ा, फूल चुनना, तिया या बैठक, मौसर/जौसर । इसके अतिरिक्त दोवनियाँ, नारायण बली व पिण्डदान की रस्में भी की जाती हैं।
dyk;k=k राजस्थान का समाज ठहरा हुआ भी हैं तो गतिशील समाज भी हैं। अगर हम पीछे ना जाएं और आज की बात करें तो पाएंगे कि राजस्थान में आज जो रीतिरिवाज़ विद्यमान हैं उनमें ठहराव व गतिशीलता दोनों का एक अनठ ू ा सामंजस्य झलकता है । यहाँ के लोग आधनु िक होकर पश्चिमी तौर-तरीकों को अपना रहे हैं लेकिन अपने पारम्परिक रीतिरिवाजों के साथ भी पर्ण ू तया जड़ ु े हुए हैं ।
राजस्थान की सभ्यता व संस्कृति में ऊपर बताए गए जन्म से मरण तक के संस्कारों तथा हर्ष व शोक के रिवाजों के अतिरिक्त कुछ ऐसी प्रथाएं या रिवाज़ भी हैं जिनमें से कुछ राजस्थान की शान के प्रतीक रही हैं तो कुछ सामाजिक बरु ाइयों की ओर भी इंगित करती हैं। हालांकि कुछ चलन में हैं ओर कुछ का चलन समाप्त हो चक ु ा है : 1. जोहर प्रथा : युद्ध के पश्चात महिलाएं अपने सतीत्व की रक्षा हे तु आग में कूद कर अपने प्राण दे दे ती थी। इसे जोहर कहते हैं। 2. केसरिया : राजपत ू वीर योद्धा जब केसरिया वस्त्र पहनकर यद ु ्ध में शत्रुओं को मारते हुए शहीद हो जाते थे तो इसे केसरिया करना कहते हैं। 3. अनुसरण : पति की मतृ ्यु कहीं दस ू रे अन्य स्थान पर हो जाने पर उसकी किसी निशानी के साथ चिता में जल जाना अनस रण कहलाता है । ु 4. सती प्रथा : पति की मतृ ्यु के बाद पत्नी का पति की चिता के साथ जल जाना। 5. नाता प्रथा : यह प्रथा आदिवासियों में अधिक प्रचलित है । इसमें पत्नी अपने पति के जीवित होने या मतृ ्यु के पश्चात किसी अन्य पुरूष के साथ रहने चली जाती है 6. डावरिया प्रथा : प्राचीन समय में लड़की के विवाह में दहे ज के रूप में कंु आरी कन्याओं का दिया जाना। 7. त्याग प्रथा : राजकुमारियों के विवाह के अवसर पर चारण व भाट कवियों को दिये जाने वाले उपहार। 8. हाकन/डाकन प्रथा : जब किसी स्त्री को डाकन होने का आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जाता है तो उसे डाकन प्रथा कहते है । आदिवासियों में अधिक प्रचलित है । 9. कन्या वध प्रथा : यह राजस्थान में प्राचीन काल में अधिक प्रचलित थी। इस प्रथा में लोग कन्या को जन्म लेते ही अफीम चटा कर मार डालते थे। 10. बेगार प्रथा : जमींदारों या शासक वर्ग द्वारा आम लोगों से बिना वेतन काम करवाना। श्वेता शर्मा 11. सागड़ी : इसे बंधवा ु मजदरू प्रथा भी कहते हैं। TOP ब्यावर, राजस्थान Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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मोबाइल स्कूल यह उड़न खटोला मन के वेग से चलता है । उसको प्राप्त करने के बाद बच्चे वह करते हैं जो मन में आता है , वह नहीं जो समझ में आता है । इसके आगे भी एक स्कूल है , यह उन बच्चों को मिला है जिनके पास टीवी या मोबाइल नहीं है । ज़िन्दगी के स्कूल में पढ़ने का मौका इन्हीं किस्मत वालों को मिला है । यह मीलों दरू पैदल चलकर अपने गांव लौट आए हैं।
ज्योति पाण्डेय, प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय 2 हिंडन, गाज़ियाबाद, उत्तरप्रदे श चादर में लिपटे हुए राहुल बेटा सोच रहा था कि अगर कक्षा के बीच सोने को भी मिल जाता तो कहना ही क्या था। वैसे आँख खोल कर सोने का सुख अब नसीब में था ही नहीं ।इसी बीच आवाज़ आई “राहुल अपना वीडियो ऑन करो”।राहुल को अपनी दशा पर दया आ गई, दीवार पर से गिरती हुई पापड़ी और राहुल के परीक्षाओं में गिरते हुए अंक दोनों जुड़े हुए मुद्दे थे। अंको के ऊपर उठने की और घर ठीक होने की आशा और इच्छा तो सबको थी, मगर अलमारी के पास कपड़े पहनते हुए पापा को कौन समझाए कि राहुल क्यों टीचर के कहने पर भी वीडियो ऑन नहीं करता। टीचर भी ज़्यादा ज़बरदस्ती नहीं करती क्योंकि कल ही आकाश के पिता पोछा लगाते हुए नज़र आ गए थे। आकाश की माँ दारोगा हैं l अतः घर के काम नहीं कर पा रहीं तो घर के काम पिताजी ही कर रहे हैं। रचना की माँ ने आकर कहा की “रचना, दे खो यह मच्छर आकर मेरे अंडे का घोल चूसना चाहता है ” l रचना ने झटपट माइक ऑफ किया पर पूरी क्लास हँसने लगी। वहां आकांक्षा अपने आलीशान घर में भी वीडियो ऑन नहीं करती। उसका घर तो सुंदर है , उसे कैसी शर्म? अरे उसके पास मोबाइल स्कूल नहीं है , मगर यह कैसे? इतनी अमीर लड़की पर मोबाइल नहीं? आकांक्षा के पास अपना फोन है । माँ-बाप का फोन तो बच्चों का मोबाइल स्कूल है , लेकिन अपना फोन सपनों का उड़न खटोला होता है ।
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इस विद्यालय में पढ़ने के बाद छात्र वो सब कुछ कर सकते हैं जो जीने के लिए आवश्यक है । ऑनलाइन पढ़ाई के साथ अब ऑनलाइन निरीक्षण का भी कमाल दे खिए। अब निरीक्षक दल भी दे खने लगे हैं कि शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैं? अब पहले वाली खातिरदारी नहीं रही कभी-कभी तो मास्टर साहब ने निरीक्षक को कक्षा के बाहर ही रोक दिया।एक बार तो गज़ब हो गया निरीक्षक को खाली कक्षा में भेजकर मास्टर साहब मज़े से दस ू री जगह छात्रों को पढ़ाते रहे । ऑफलाइन में तो इस बात पर बवाल मच जाता मगर ऑनलाइन में इसे कहा जाता है कि गलत लिंक चला गया। गज़ब तो तब हुआ जब निरीक्षक कक्षा के बाहर खड़े होकर सुनते रहे कि कक्षा में क्या हो रहा है पर कक्षा में प्रवेश नहीं कर पाए। इसे भी टे क्निकल ग्लिच कहा गया। अब छात्र टे क्नोलॉजी के गुरु बनकर गुरु को सिखा रहे थे। गुरु ने भी हिम्मत नहीं हारी, एक नए युग में प्रवेश कर ही लिया। राहुल और आकाश ने घर में एक कोना ढूंढ लिया है , अब वह वीडियो ऑन कर लेते हैं। रचना माइक म्यूट और अनम्यूट करना सीख गई है । आकांक्षा का उड़न खटोला धम्म से ज़मीन पर गिर गया। मैडम ने उसके पिताजी को फोन जो कर दिया था। इतनी मेहनत के बाद भी शिक्षकों पर दबाव है “कुछ बच्चे अभी भी छूट क्यों रहे हैं?” ज़िन्दगी के स्कूल में पढ़ रहे बच्चे अभी स्कूल नहीं लौटे हैं। ज़िन्दगी उन्हें पास करके ही भेजेगी। ज़िन्दगी भी तो एक गुरु है । मैंने कहा ना गुरु ने एक नए युग में प्रवेश कर लिया है । कोरोना वायरस धीरे -धीरे हार रहा है । ज़िन्दगी ने भी एक नए युग में प्रवेश कर लिया है । TOP -----x-----
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मई 2021
dyk;k=k संगीत और मानव जीवन
प्रकृति की हर घटना में संगीत का समागम है । स ृष्टि की उत्पति के साथ ही संगीत की उत्पति हुई है । प्रकति के किसी भी भाग में चले जाएं, हमें एक संगीत सुनाई दे गा, एक गूंज सुनाई दे गी । पानी के बहने की आवाज़ हो, बारिश की टिपटिप हो पक्षियों की चहचहाहट हो या हवा का साय साय पन। प्रकृति अगर शांति भी महसूस कराती है तो वहाँ भी एक संगीत महसूस होता है । हर सुंदर चीज़ की तरफ मानव का झुकाव बरबस ही चला जाता है तो संगीत इससे कैसे दरू रह जाए l संगीत में ऐसी एक अलौकिक शक्ति है जो मनुष्य को हृदय, मस्तिष्क और बाहरी(शारीरिक) तौर पर खुद को जताता है । जहा हिंदस ु ्तानी संगीत हमारी रूह से जुड़कर मानसिक शांति प्रदान करता है वही पाश्चात्य संगीत हमारे शरीर में ऊर्जा उत्पन्न करता है , एक सनसनाहट पैदा करता है , हमारे हाथ पांव में अपने आप ही हरकत महसूस होती है । हिंदस ु ्तानी लाइट और क्लासिकल संगीत हमारे मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ता है । जहाँ पाश्चात्य
संगीत सुनने से शरीर में तीव्र गतिमान हरकतें उत्पन्न होती हैं, वही हिंदस ु ्तानी संगीत हमारी गर्दन, सर के हिस्से को हिलने पर मजबूर कर दे ता है l यही कारण है कि हिंदस ु ्तानी संगीत सुनते समय, कई बार कोई बहुत अच्छा शेर सुनते समय या तबले की थाप के साथ हमारे सिर और हाथ हिलने के साथ मँह ु से वाह निकल जाता है । आत्मा को परमात्मा से साक्षात्कार कराने का सबसे सरल माध्यम संगीत है । संगीत की मानसिक अनुभूति सिर्फ सैद्धान्तिक ही नहीं है बल्कि प्रायोगिक, मेडिकली एवम ् बायलोजिकली सिद्ध है । कई वैज्ञानिक रिसर्चों भी से यह सिद्ध हो चुका है कि संगीत सुनने से हमारे मस्तिष्क में कुछ हार्मोन्स बनते हैं, ये ऐसे हार्मोन्स होते हैं जो हमें अच्छा महसूस कराते हैं, सुकून दे ते हैं l हिंदस ु ्तानी क्लासिकल म्यूज़िक में राग रागिनियों द्वारा बीमारियों का उपचार तक किया जाता है और वर्तमान में तो पूरे अंतरराष्ट्रीय स्तर
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पर म्यूज़िक थेरेपी एक मेडिकल एड बन कर मानव जीवन को बहुत बड़ा सहारा दे रही है । प्रायः सभी लोगों को संगीत पसन्द होता है । ऐसा दे खा गया है कि जो लोग संगीत पसन्द करते हैं और स्वयं भी गातेगुनगुनाते हैं, वे बहुत प्रसन्न रहते हैं। संगीत हमारे जीवन में मनोवैज्ञानिक तरीके से कार्य करता है । प्रत्येक कला का मानव जीवन में बहुत बड़ा योगदान है विभिन पहलुओं में ये कलाएं भिन्न भिन्न रूप में जीवन को परिभाषित ओर सहयोग करती है । नाद का अर्थात संगीत का अभी मानव कल्याण के लिए समुचित उपयोग नहीं हुआ है । जिस तरह विज्ञान मानव जाति के लिए उपयोगी सिद्ध है उसी तरह जिस दिन नाद का अर्थात संगीत का मानव के लिए समुचित उपयोग होगा उस दिन संगीत विज्ञान से ज़्यादा मानव कल्याण में सिद्ध होगा ।
रूपेश माथुर जय नारायण व्यास विश्व विद्यालय जोधपुर में संगीत के स्कॉलर
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सिटी पैलेस सिटी पैलेस की स्थापना १६वीं शताब्दी में आरम्भ हुई। इसे स्थापित करने का विचार एक संत ने राजा उदय सिंह को दिया था। इस प्रकार यह परिसर ४०० वर्षों में बने भवनों का समूह है । यह एक भव्य परिसर है । इसे बनाने में २२ राजाओं का योगदान था। परिसर प्रवेश के लिए टिकट लगता है । बादी पॉल से टिकट लेकर आप परिसर में प्रवेश कर सकते हैं। परिसर में प्रवेश करते ही आपको भव्य त्रिपोलिया द्वार दिखेगा। इसमें सात वृत्त-चाप (आर्क ) हैं। ये आर्क उन सात स्मरणोत्सवों का प्रतीक हैं जब राजा को सोने और चांदी से तौला गया था तथा उनके वजन के बराबर सोना-चांदी को गरीबों में बांट दिया गया था। इसके सामने की दीवार ‘अगद’ कहलाती है ।
को एक पवित्र पुरुष ने पिछोला झील के पास पहाड़ी पर ध्यान करते हुए अपनी राजधानी इसी स्थान पर स्थापित करने का मार्गदर्शन दिया। अरावली श्रृंखला से घिरे , वनों और झीलों से युक्त् इस स्थान को चित्तौड़गढ़ की तुलना में कम संवेदनशील पाया गया। महाराणा उदय सिंह की मतृ ्यु 1572 में हुई और उनके स्थान पर महाराणा प्रताप आए जिन्हों ने मुगल आक्रमणों से उदयपुर की रक्षा वीरतापूर्वक की। महाराणा प्रताप सबसे अधिक सम्मानित राजपूत व्यक्तिव माने जाते हैं और वे 1576 में हल्दीघाटी के अंदर मुगलों से वीरता पूर्वक लड़े। उदयपुर भी निष्पाोदन कलाओं, हस्तहशिल्पर और अपनी प्रसिद्ध लघु तस्वीरों का केन्द्र रहा है ।
यहां पर हाथियों की लड़ाई का खेल होता था। इस परिसर में एक जगदीश मंदिर भी है । इसी परिसर का एक भाग सिटी पैलेस संग्रहालय है । इसे अब सरकारी संग्रहालय घोषित कर दिया गया है । वर्तमान में शम्भूक निवास राजपरिवार का निवास स्थान है । इससे आगे दक्षिण दिशा में ‘फतह प्रकाश भवन’ तथा ‘शिव निवास भवन’ है । वर्तमान में दोनों को होटल में परिवर्तित कर दिया गया है ।
सिटी पैलेस पिछोला झील पर स्थित है । महाराणा उदय सिंह ने इस महल का निर्माण आरं भ किया किन्तु आगे आने वाले महाराणाओं ने इस संकुल में कई महल और संरचनाएं जोड़े, इसमें संकल्पना की एक रूपता को बनाए रखा है । महल का प्रवेश हाथी पोल की ओर से है । बड़ी पोल या बड़ा गेट त्रिपोलिया अर्थात तीन प्रवेश द्वारों में से एक है । एक समय यह रिवाज था कि महाराणा इस प्रवेश द्वार के नीचे सोने और चांदी से तौले जाते थे और झीलों के शहर, उदयपुर को पूर्व का वेनिस शहर कहा जाता फिर यह गरीबों में बांट दिया जाता था। है । महाराणा उदय सिंह - II ने 1568 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा उनके चित्तौड़गढ़ पर कब्ज़ा कर लेने के बाद अब यहां मुख्य टिकट कार्यालय है । बालकनी, कूपोला और उदयपुर की नींव रखी। दं त कथाएं कहती हैं कि उदय सिंह बड़ी बड़ी मीनारें इस महल को झील से एक सुंदर दृश्य
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के रूप में दर्शाती हैं। सूरज गोखड़ा एक ऐसा स्थान है जहां से महाराणा जनता की बातें सुनते थे, मुख्यत: कठिन परिस्थितियों में रहने वाले लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए उनसे बातें करते थे। मोर चौक एक अन्य स्थान है जिसे दीवारों पर मोर के कांच से बने विविध नीले रं ग के टुकड़ों से सजाया गया है । महल का मुख्य हिस्सा अब एक संग्रहालय के रूप में संरक्षित किया गया है जो कलात्मक वस्तुओं का एक बड़ा और विविध संग्रह प्रदर्शित करता है । सिटी पैलेस के संग्रहालय में जाने के लिए गणेश दहरी से प्रवेश किया जाता है । यह रास्ता आगे राज्य आंगन में जाता है यहीं वह स्थान है जहां महाराणा उदय सिंह उस संत से मिले थे, जिसने उन्हे यहां शहर बनाने के लिए कहा था। एक
शस्त्र संग्रहालय में सुरक्षात्मक औजारों और हथियारों के साथ जानलेवा दो धारी तलवार शामिल है । महल के कमरे शीशों, टाइलों और तस्वीरों से सजे हुए हैं। माणक महल या रूबी पैलेस में कांच और दर्पण का सुंदर संग्रह है जबकि कृष्णा विलास में छोटी तस्वीरों का विशाल संग्रह दर्शाया गया है । मोती महल में दर्पण का सुंदर कार्य है और चीनी महल में सभी स्थानों पर सजावटी टाइले लगी हैं। सूर्य चौपड़ में एक विशाल सजावटी सूर्य बना हुआ है जो सूर्य के शासन का प्रतीक है , जिसे मेवाड़ राजवंश का संकेत माना जाता है । बड़ी महल एक केंद्रित उद्यान है जिससे शहर का अद्भुत द्रश्य दिखाई दे ता है । जनाना महल या महिला कक्ष में कुछ ओर सुंदर तस्वीरों को दे खा जा सकता है , जो आगे चलकर लक्ष्मी चौक मे खुलता है और यह एक
सफेद मंडप है । अलग अलग महलों के अंदर बड़ी चौक के दक्षिण से जाने पर शिव निवास और फतेह प्रकाश पैलेस हैं, अब जिन्हें पोर्टल के रूप में चलाया जाता है । पिछोला झील के किनारे सिटी पैलेस वास्तुकला और राजस्थान के शासकों के अधीन सांस्कृतिक दोहन के उत्कृष्ट उत्पादों के उदाहरण हैं। ये महल पूरी दनु िया के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं और अपनी सुंदरता और भव्यता से उन्हें बांध लेते हैं।
अनुज शुक्ला भोपाल, मध्यप्रदे श
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सिटी पैलेस (गैलरी)
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dyk;k=k राजस्थानी लोकगीत
धोरां री धरती है अपणी धोरां री धरती है अपणी, धन्य धरा गरबीली है ।
अठै शूरमा शौर्य दिखावै, रणचंड्यां भड़कीली है ।। ऊंचा-ऊंचा मंगरा जिणमें मोर-कोयल्यां बोलै है । मधरो-मधरो बायरियो कानां म्हं रस घोळै है ।।
तू म्हारा सांसा री सरगम तू म्हारी सांसा री सरगम, तू म्हारी कविता री भाषा । तू म्हारी है कनक कामणी, तू म्हारासुपना री आशा ।। थांसू म्हांरो जीवण महके ,थांसू म्हांरो पल-क्षण हरखे । थूं ई म्हारी जीव जड़ी हैं ,निस दिन नेणा थांने ई निरखे ।।
उडती बाळू रे त अठै की सोना ज्यूं चमकीली है ।
तू खिलती रजनीगंधा है ,तू गला ु ब री खश ु बू जेहड़ी । तू चंदा री धवळ चांदणी ,तू म्हारी गीतां री औळ्या ।।
नैणां-नैणां प्रेम समायो हिवड़ै-हिवड़ै नेह भर्यो ।
तू हं स दे तो हसज्या उपवनतू चाले तो नाचे मधुबन । तू लड़ती ई लागेचोखी , तू ई म्हारा छं दा री लत है ।।
धोरां री धरती है अपणी, धन्य धरा गरबीली है ।। रूखो-सूखो मौसम ह्वे पण मनड़ो सबको रह्वै हर्यो ।। संस्कारां री जड़ां जोर स्यूं आपां नैं जकड़्योड़ी है । धौरां री धरती है अपणी, धन्य धरा गरबीली है ।। हल्दीघाटी का चेतक-सी जीवटता डीलां में है ।
मातभोम नैं अजेय राखां हिम्मत इण टीलां में है ।। जोत जागती रह्वै चतर्दि ु क दीवां लौ पळक्योड़ी है । धोरां री धरती है अपणी धन्य धरा गरबीली है ।। रोहिड़ां रा रं ग लेय कर धरती खेलै फाग अठै ।
होळी में ढप, ढोल, मंजीरा, ऐहड़ो मौज, हुलास कठै ? गेर नाचती टोळ्यां सच म्हं कतरी भांत-भंतीली है ।
तू म्हारां होठा री खुशबु है ,तू म्हारा हाथा री मेनत है । तू म्हारा भावा री यमुना ,तू चंदा री आभा जेहड़ी ।। थां सू म्हारो जीवण महके ,थां सूं म्हारो तन मन चहके । थां सू जीवण रं ग बिरं गो ,थां सू म्हारो हर पळ चंगो ।। थां सी कोई हूर नही है ,थां सी कोई नरू नही है । तू म्हारा शबदां री माळा ,तूम्हाराकंठा री हाला ।। तू म्हारां म्हं ,म्ह थारा म्ह ,म्हा ,थारां म्ह, फरक नही है । तू म्हारा धीरज री परीक्षा ,तू म्हारी गरू ु जेहड़ीदीक्षा । । ज्या सबके हो ऐहड़ी नारी ,विपदा मिटज्यावेगी सारी । खुशबु सूं आंगण महकेगो ,जीवण होगो गौरवशाली ।।
धोरां री धरती है अपणी धन्य धरा गरबीली है ।।
मीरां अर पदमण रा किस्सा सगळी दनु िया गावै है । लोकदे व, जूझार,भोमिया भावै मन रींझावै है ।।
ओमप्रकाश सरगरा “अंकुर” धोरां री धरती है अपणी, धन्य धरा गरबीली है ।। TOP संगरिया, भीलवाड़ा, राजस्थान जोधाणै री चन ू ड़ ओढ्यां चंदा-सी चमकीली है ।
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उभरत
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कला
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ते बाल
लाकार
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उभरते बाल कलाकार (1) धनुषी पटे ल, कक्षा 9, वडोदरा, गुजरात, भारत (2) तनीषा साहू, कक्षा 11, नोएडा, उत्तरप्रदे श, भारत (3) तान्या वीरमणि, कक्षा 11, रोहतक, हरियाणा, भारत (4) नीतीश डोभाल, कक्षा 9, रुड़की, उत्तराखंड, भारत (5) माही राणा, कक्षा 12, रुड़की, उत्तराखंड, भारत (6) दृष्टि अग्रवाल, कक्षा 9, मऊरानीपुर, उत्तरप्रदे श, भारत (7) उन्नति कोठारी, कक्षा 11, वडोदरा, गुजरात, भारत (8) प्रांजल तरं ग, कक्षा 9, पुणे, महाराष्ट्र, भारत (9) नीलम, कक्षा 11, पंचकुला, पंजाब (10) मनीष, बी ए पार्ट 1, पंचकुला, पंजाब TOP (11) दिवजोत बरार, कक्षा 6, मोहाली पंजाब, भारत Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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धरती धोरां री रं गीलो राजस्थान अपनी अनूठी छठा लिए विश्व विख्यात है तो इसके स्वादिष्ट शुद्ध शाकाहारी व्यंजन भी अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। दाल बाटी चूरमा इसका मुख्य भोजन माना जाता है । इसके अलावा यहाँ बनाए जाने वाले मुख्य मीठे व नमकीन व्यंजन निम्न प्रकार हैं।
जाता है । सांगरी : राजस्थान का राज्य पेड़ खेजड़ी जिसपे सांगरी लगती है । सांगरी कैर की सब्जी लोग बड़े चाव के साथ खाते हैं। हरी सांगरी को सूखाकर उसका इस्तेमाल कई सालों तक किया जा सकता है ।
लापसी : यह गेहूं के दलिये व गुड़ से बनाया जाना वाला मीठा पकवान है जो मुख्य रूप से किसी भी शुभ कार्य के समय बनाकर भगवान गणपति को भोग लगाया जाता है । राजस्थान में यह मान्यता है कि गह ृ प्रवेश के समय सबसे पहले चूल्हा पूजन करके लापसी का ही भोग लगता है । मँग ू ेड़ी (बड़ी) : ये मूंग या मोठ की दाल को भिगोकर पीसकर बनाई गई बड़ी की सब्जी राजस्थान में बड़े चाव के साथ खाई जाती है । विशेष तौर से बीकानेर की बड़ी पूरे दे श भर में प्रसिद्ध है । इसके साथ ही पापड़ भुजिया भी बीकानेर के बहुत ही चाव के साथ खाएं जाते हैं । जिस तरह शुभ कार्य में मीठे में लापसी अपनी अलग जगह रखती है वैसे ही लापसी के साथ बड़ी की सब्जी बनाना भी शुभ माना
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बाजरे की रोटी : राजस्थान का जो मुख्य भोजन है , वो है बाजरे की रोटी इसे सोगरा भी कहते हैं । ये हाथ से पीटकर बनाई जाती है ।
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मई 2021
dyk;k=k राजस्थानी खान-पान
छाछ राबड़ी : पशु -पालन राजस्थान का मुख्य व्यवसाय होने के कारण यहाँ दध ू दही छाछ की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता रहती है । अतः यहाँ की छाछ से बनी राबड़ी बहुत ही प्रसिद्ध है । इसको छाछ में गें हू का आटा उबाल कर बनाया जाता है कुछ लोग स्वादानुसार बाजरे के आटे से भी बनाते हैं । सूखी सब्जी : कृषि प्रधान राज्य होने के कारण राजस्थान में सूखी सब्जियों की भरमार रहती है जिनमें मुख्य रूप में गोटक, कोकले फोफलिये, फलियाँ, खेलरिया, काचरी, संगरिया आदि हैं जिनको खेती के समय सुखाकर स्टॉक कर लिया जाता है और साल भर
सब्जी बनाने के काम आती है । त्यौहार विशेष : राजस्थान में हर उत्सव त्यौहार पर विशेष पकवान बनते हैं जैसे तीज पर बनाये जाने वाले पकवान में सत्तू l विशेष पकवान है ये चावल गें हू और चने के बनते हैं । गणगौर उत्सव पर ढोकले विशेष पकवान में बनाये जाते हैं । ये बाजरे और गें हू के आटे के बनते हैं। खीचड़ा खिचड़ी : ये राजस्थान का विशेष पकवान माना जाता है यह बाजरे को कूट कर कई दालों को मिलाकर बनाया जाता है । खिचड़ा राजस्थान में अक्षया तत ृ ीया की दिन सभी घरों में बनाया जाता है । राजस्थान का खानपान विदे शों में भी प्रसिद्ध है विदे शी सैलानी भी बड़े चाव के साथ खाते हैं । जय जय राजस्थान जय जय राजस्थानी ।
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सरिता तिवाड़ी (पारीक) बीकानेर , राजस्थान
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अनुराग्यम ्
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कठपत ु ली राजस्थान रं गों, कला और पारं परिक प्रदर्शन कला के लिए जाना जाता है । यूँ तो राजस्थान की आन बान और शान हमेशा से ही गौरव गाथाओं द्वारा चरितार्थ होती आई है । राजस्थान के शासकों की वीर गाथाओं को प्रचलन में लाने वाली पहली झलक हमें काठ के पुतलों द्वारा दर्शाई गई थी काठी का अर्थ लकड़ी और पुतला का अर्थ खिलौना होता है । कठपुतली के खेल की शुरुआत राजस्थान के रे गिस्तान के मुहाने पर जोधपुर के पास नागौर में हुई थी यह कठपुतली “भाट” समुदाय के लोग ही बनाते थे जो आज भी इस परं परा को संजोए हुए हैं इसमें सबसे रोचक तथ्य यह है की इस परं परा को निभाने में महिलाएं भी बराबर की हिस्सेदार हैं।
राजपूतानी कला और संस्कृति की झलक हमें कठपुतली के खेल के द्वारा बहुत ही रोचक ढं ग से दर्शाई गई है काठ की पुतलियों को रं गबिरं गी पोशाकों पगड़ी पहनाकर गौरव गाथा सुनाई जाती रही हैं।
आनंद भी दिया जाता है । राजस्थान में शाही घरानों में एक कठपुतली कलाकार का अहम स्थान होता था, जिसे “चारण” के नाम से संबोधित किया जाता था।
कठपुतली को राजस्थान में पहचान बंजारों द्वारा मिली, जो आज भी परं पराओं को निर्वाह करते हुए घूम घूम कर कठपुतली की कला के द्वारा राजा रानियों की शौर्य गाथा इन लोगों को सुनाते आए हैं ।
जब यह कठपुतलियां प्रयोग में लाने के लिए नहीं रहती तब इन्हें परं परा के अनुसार पानी में विसर्जित किया जाता है I कठपुतली का खेल दे श की एक अनूठी कला रही है इसमें शामिल कला दक्षता और ज्ञान को बढ़ाने के लिए इसको बच्चों को भी अवगत कराना चाहिए ।
बेजान पुतलों में अपनी कला अपने गीतों में प्रेम-वियोग साहस और त्याग भी दर्शाया है । दस अंगुलियों से बंधी डोर इशारों पर नतृ ्य करती हुई अपनी शैली से अपनी कहानी कह जाती है ।
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अनुराग्यम ्
कठपुतली को नचाने में ज़रूरी ताल और नियंत्रण भी जरूरी होता है कठपुतली कलाकारों को शाही घरानों का समर्थन भी मिला है इसीलिए हमारे भारत में आए सैलानियों को कठपुतली के कार्यक्रमों का पूरा
क्या आप जानते हैं, सर्वप्रथम जो कठपुतली द्वारा शौर्य गाथा गाई गई थी वह नागौर के “अमर सिंह राठौर” की थी जो शाहजहां के दरबारी थे कठपुतली में “अनारकली” का नतृ ्य भी बहुत प्रसिद्ध रहा है । कठपुतली को सिर और सीने से बंधी एक ही डोर से नियंत्रित किया जाता है ।
सीमा वालिया बीकानेर , राजस्थान
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Picture Art : Prajna Mishra
मई 2021
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सरू ज की किरणें बिल्कुल वैसे ही कहाँ है बदली दोपहर भी वैसे हा उष्णता दे ती धीरे -धीरे धप ू का जाना संध्या का अपने कदम बढ़ाना बिल्कुल वैसे ही जैसे हर रोज़ वो फिर चाँद का आना अपनी शीतलता बिखेर जाना वैसे ही फूलों का खिलना तितलियों का मंडराना वही पंछी वही डाल वैसे ही मौसम का आना और जाना कुछ नही बदला सब बिल्कुल वैसा बस बदल गया तो ये मन कहाँ वैसा जैसा हुआ करता था मोर के नतृ ्य से कहाँ झम ू ता बारिश की बंद ू ें जिसमें भीग नाच लिया करते थे बंद ू ें आज भी वहीं, कहां बदली मन कहाँ नाचता है कुछ नहीं बदला बस मन बदल सा गया मन कुछ रीता सा हो गया है कुछ नहीं बदला बस मन बदल गया है !!
क्या ख़ता मझ ु े भी साथ ले लेते क्या तनिक भी भरोसा ना था जहाँ भी बाधक बनती छोड़ दे ते मझ ु े भी साथ ले लेते
मन
आरती दीक्षित मेरठ, उत्तरप्रदे श एक रात ऐसी आएगी यूँ जिन्दगी बदल जाएगी ना जाना ना सोचा था कभी चलो जाना ही था अगर कोई इशारा कर जाते मुझें भी....
गन ु ाह कोई गिनाओ ना कोई ख़ता बताओ ना क्यूँ छोड़ अकेला गए कुछ तो मझ ु े बता जाते मझ ु े भी....
मैं गर यूँ गई होती समाज क्या स्वीकारता कितने दाग़ सहे होते बेदाग़ कहाँ रहे होते गुनाहों की सूची में मेरा नाम तुम्हीं लिख दे ते मुझे भी.....
जाना ही था तो क्यूँ बांधा बंधन मक ु ्त रहने दे ते कोई जिम्मेदारी भी हमें भी फ़िर ना दे दे ते मझ ु े भी....
तुम गए तो ज्ञानी बन गऐ बुद्धत्व को तुम पा गऐ हम अज्ञानी बन यहाँ पथ सूना यूं निहारते मुझे भी.....
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अनुराग्यम ्
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अप्रैल 2021
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अनंगश पॉल, कक्षा 12 धुबरी, असम, भारत
मोहम्मद इमाम, कक्षा 6 चेन्नई, तमिलनाडु, भारत
प्रियदर्शनी राणा, कक्षा 8 वडोदरा, गुजरात, भारत
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अनुराग्यम ्
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अप्रैल 2021
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संवि चड्ढा, कक्षा 7 डबलिन, आयरलैंड
हर्ष, कक्षा 10 गुरुग्राम, हरियाणा, भारत
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अनुराग्यम ्
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मई
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कुछ इस तरह ही तेरा जीवन भी आहिस्ता आहिस्ता इस हल्के गुलाबी रं ग सा हो जाएगा जो तुझे सुकून, मुझे केवल दे खने मात्र से मिलता है ये सुकून तेरे जीवन का आधार बन जाएगा
जब दे खती हूं आसमां को जब दे खती हूं आसमां को तो अमम ू न नीले बादलों से घिरा लगता है कभी एक मस ु ्कु राते चेहरे की तरह तो कभी मरु झाया सा लगता है एक टक निहारते निहारते कभी तो उम्मीदों का बादल मेरी झोली में डाल दे ता है कभी ख़द ु के भारीपन से मझ ु े भी डरा दे ता है फ़िर अचानक से एक दिन वो आसमां हल्के गला ु बी रं ग से सराबोर होकर
दामिनी जोशी आगरा, उत्तर प्रदे श
खोया खोया सा रहता हूँ
रहती तुम आज बड़े महलों में , हर पल पाता तुझको मैं दिल से ll
आजकल जीवन बड़ा मुझको, अकेला अकेला सा लगता है l तुम्हारे साथ ना होने से, जीवन खाली खाली सा लगता है ll
पपीहा तड़पे स्वाति नक्षत्र को, मैं भटकँू तुमसे मिलन को l आजकल खोया खोया सा रहता हूँ, जन जन में निहारू मैं तुझको ll
जब जब तन्हा होता हूँ मैं, तुझ बिन बैचन ै सा रोता हूँ मैं l बन्द आँखों से दे ख तुम्हे मैं, तुममें खोया सा रहता हूँ मैं ll
एक बार तू ज़रा लौट के आ, मुझको नींद की थपकी दे जा l इस भोले भाले मेरे दिल को, अपने घर का पता बता जा ll
बिन तुम इस जीवन में , अकेला अकेला सा रहता हूँ l किसे बताऊँ मन की व्यथा, ख़ुद में खोया खोया सा रहता हूँ ll
तुम बिन खाली खाली सा लगता हूँ, तुम बिन तड़प तड़प कर जीता हूँ l प्रेम मिलन के बगिया में आ जा प्रिया, तुम बिन खोया खोया सा रहता हूँ ll
कमी खलती है मुझको भी तेरी दरू रहकर उर में बसती तू मेरी l कैसे करूँ तुम बिन मैं कल्पना, मैं पतंग और तुम हो डोरी मेरी ll
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फ़िर मेरे नीले या गुलाबी होने से तेरी शिनाख़्त में कोई बदलाव नहीं आएगा तू मुझे जब भी दे खेगी मैं मुस्कु राता हुआ एक आईना नज़र आऊंगा बस थोड़ा इंतजार और बस थोड़ा सा.....
मझ ु े चौका दे ता है ....मानो मझ ु से कह रहा हो... दे ख
भले दरू हो तुम आज मुझसे, दे खता मैं तुम्हें बन्द चक्षु से l अनुराग्यम ्
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TOP
अंकुर सिंह जौनपरु , उत्तर प्रदे श
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मई 2021
dyk;k=k आओ योग करें
परिवर्तन
जब सुखद स्वास्थ्य की बात हो जब इच्छित स्वस्थ गात हो कर स्व को एकाग्रचित्त स्थिरता को हृदय में कर के स्थित तन मन से दरू हर रोग करें आओ योग करें
चीर तिमिर को जब मयंक ने दामन को अपने फैलाया l हुई प्रज्वलित सभी दिशाएँ तारामंडल ने नभ को सजाया ll रात की रानी ने प्रमुदित होकर वन-उपवन को यूँ महकाया l शीतल- शीतल मंद पवन ने धरती को फिर स्वर्ग बनाया ll
शांति की जब पराकाष्ठा हो निरोग रहने की जब चेष्टा हो जब आत्म जुड़े परमात्म से मन ओत प्रोत हो आध्यात्म से ईश्वर की दी इस दे ह का किंचित उचित प्रयोग करें आओ योग करें
ओस की बँद ू ों ने जब आकर मोती थाल से भू को सजाया l स्नेहसिक्त हो क्षितिज ने फिर तो धरती अंबर का मिलन कराया ll
जहाँ विचरता है स्वस्थ तन वहीं घर बनाए है स्वस्थ मन तनिक खान पान का ध्यान हो जीवन के सत्य का ज्ञान हो जो कर दे जीवन को सरल ऐसा तनिक उद्योग करें आओ योग करें
मिली सूचना जब रवि को तम की उसने अपना रथ मँगवाया l अरुणिमा को भेज व्योम को रं ग सिंदरू ी से सजवाया ll रक्तिमा चहुँ ओर हो गई जब रवि ने अपना रूप दिखाया l अंधकार को दरू भगाने मानो दिवस ने उसे बुलाया ll
वो बगिया ही फूले फले जहाँ खाद अच्छी है डले व्यायाम को अपना लो अब उपवन सा दिखेगा ये जग अपने ही ऋषियों की ये दे न जीवन को हम आरोग्य करें आओ योग करें
मोनिका कपूर फरीदाबाद, हरियाणा
परिवर्तन है नियम ईश का प्रकृति ने सबको यह समझाया l दिवस के बाद निशा आती है रवि मयंक ने बोध कराया ll
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रूचि असीजा मैनपुरी, उत्तरप्रदे श
अनुराग्यम ् कलायात्रा पत्रिका का हिस्सा बनने के लिए आप भारत के किसी भी राज्य या स्थान की कला व संस्कृति से जुड़ी स्वरचित व मौलिक रचना, लेख - आलेख
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मई
dyk;k=k कलमकारी और वनस्पतिजन्यरं ग भारत अपनी उत्तम कला के लिए विश्व में प्रसिद्ध है l जिसमें लोक कला का रं ग हर क्षेत्र हर राज्य में दे खने को मिलता है | हर जाति, धर्म, एवम ् क्षेत्र की अपनी अपनी पारम्परिक सांस्कृतिक धरोहर है l जिसमें मैं आज आपके साथ कलमकारी की बात करूं गी |
गुजरात के अहमदाबाद के वासणा एवं धोलका में वाघरी समुदाय के चित्रकारों द्वारा इसे ईश्वर के प्रति भक्ति भाव की कथा वार्ता के लिए बनाया जाता है l उन दिनों में वाघरी समुदाय के लोगों को मंदिर में जाने की अनुमति नहीं थी इस लिए मंदिर के पीछे पछे ड़ी लगाकर अपनी भक्ति एवं साधना करते थे l परिवार के सभी लोग मिलकर पछे ड़ी को बनाते हैं l
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श्री कृष्णा, सूर्यदे व जैसे विविध दे वी-दे वताओं का चित्रण दे खने को मिलता है | कच्छ के धमड़का गांव की ठप्पा (ब्लॉक) प्रिंटिंग अपने नेचुरल रं गों के लिए विश्व में प्रसिद्ध है l ‘अजरक’ शब्द फ़ारसी भाषा से आया है जिसका मतलब अधखुला या अजोर है | इसके अवशेष मोहन जोदड़ो के अवशेषों से मिले हैं | लकड़ी के ब्लॉक पर खोदे गए ज्यामितीय आकृति का अद्वितीय रूप परम्परा से चला आ रहा है l पुरुष इसे पगड़ी के रूप में , महिलाएँ दप ु ट्टे की तरह , शाल या चादर के रूप में दे खने को मिलते है | अजरख प्रिन्टिंग प्राकृतिक रं गों से बनाये जाते हैं l
राज्यस्थानी बगरु प्रिंटिंग कलमकारी की कला राजस्थान में बगरू प्रिन्ट के नाम से ठप्पा ब्लॉक ( प्रिंटिंग ) अपनी डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है l गुजरात में यह कला माता की पछे ड़ी के रूप में करीब ३०० वर्ष पूर्व से चली आ रही है |
माता नी पछे ड़ी (चंदरवों) गुजरात
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अनुराग्यम ्
आंध्रा प्रदे श की कलम कारी पें टिंग कलमकारी आंध्रप्रदे श की अत्यंत प्रचलित लोक कला है | नाम से ही स्पष्ट है - कलम की कारीगरी या कलम और कारीगर l जिसमें बाम्बू की छड़ी से वनस्पति जन्य रं गो का उपयोग करके चित्र बनाना | आंध्रा के श्री कलाहस्ती और मछलीपुरम नामक स्थान इसके लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है | श्री कलाहस्ती जहाँ कारीगर कलम का उपयोग करके चित्रकारी करते हैं, जबकि मछलीपुरम में ठप्पों(ब्लोक) का चलन है । इन कलाओं की कलाकृतियों के मुख्य विषय रामायण, महाभारत, पुराण, दे वी दे वताओं के चित्र, जैसे - माँ सरस्वती, दे वी लक्ष्मी, श्री गणेशाय,
कच्छ की अजरख प्रिंटिंग वनस्पति जन्य रं ग जैसे हरड़ा, बहे ड़ा, मजीठ, हल्दी, प्याज के छिलके, रतनज्योत, मेहंदी जैसे कई वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है l रं गने की यह कला खूब महे नत के साथ तैयार होती है l बाज़ार से लाया हुआ सूती कपड़े को हरड़े का कवाथ लगाकर तैयार किया जाता है , कपड़े के ऊपर मास्टर या घर का
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रं गने कि विधि
dyk;k=k मुखिया कलम से रे खांकन करता है , जिस में जंग लगा लोहा एवं गुड़ के मिश्रण से काले रं ग की छपाई या रे खांकन किया जाता है l बाद में घर के दस ू रे सदस्य उसमें भराई यानि रं ग भरने का काम करते हैं जो मुख्यत: फिटकरी के गोले से किया जाता है , फिर उसे पानी से धोया जाता है , बाद में उसे मजीठ के पानी में उबाला जाता है , जिससे कपड़े पर चटाकेदार लाल एवं काला रं ग प्राप्त होता है l उसके बाद पीला जो हल्दी से, कत्थई रं ग काथा से, हरा रं ग मेहंदी से, नीला रं ग इंडिगो (नील ) से प्राप्त होता प्रवीणा महीचा, चित्र शिक्षक है l इस तरह करीब बड़ी नई दिल्ली मेहनत मशक्कत से चित्र तैयार होता है |
नई शिक्षा नीति - निर्माण
प्रस्तुत पें टिंग में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि बच्चों का स्वभाविक डॉ तरुणा माथरु गुण है , "बढ़ना", जिस तरह से किसी बीज का, तो वह खाद, पानी, मिट्टी एक तरह से उनके परवरिश में उनके माता-पिता दे ते हैं पर उन्हें और सहयोग की जरूरत पड़ती है l अपने आपको नए परिवेश में बढ़ने के लिए, अपनी कलात्मक खबिय ों को जानने के लिए, वह ू कार्य शिक्षक करता है l तो, शिक्षक यहाँ पर एक वृक्ष है और बच्चों को एक लता की तरह से बनाने की कोशिश की है और शिक्षक जो एक वृक्ष के समान है , लता को शिक्षक अपने आसपास अपनी शिक्षा के द्वारा और शिक्षा नीति के द्वारा आगे बढ़ने के लिए उसको सहारा दे ता है और बच्चा शिक्षक के सहयोग के साथ बढ़ता हुआ जिस तरह से एक लता वृक्ष के ऊपर चढ़ जाती है और अपने आप को फल फूल से अच्छादित कर दे ती है उसी तरह से अगर बच्चे को भी सही परवरिश परिवार के द्वारा मिल जाती है लेकिन अगर उसे सही शिक्षक भी मिल जाए और सही शिक्षा के द्वारा वह भी अपने आप को ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखता है ।
TOP
1. इस पूरे चित्र में यही दर्शाने की कोशिश की गई है प्रथम चित्र में रे खांकन द्वारा एक भूमिका बनाई गई है । 2. दस ू रे चित्र में नए कोपलों, नए पत्तों को पीले रं ग से संयोजन रखने की प्रक्रिया प्रारं भ हुई । 3. तीसरे चित्र में आप दे खेंगे कि वातावरण को किस तरह वातावरणीय दृष्टिकोण से रं ग लगाने की प्रक्रिया को प्राप्त किया जाता है । 4. अंतिम चरण में संपूर्ण रं गों के चयन से आवश्यक आवासीय गहन रं गों के चुनाव से तत ृ ीय आयाम को बांधने की प्रक्रिया से यह चित्र पूर्ण हुआ और जिससे मैं अपनी बात को आप तक समझा पाई।
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वंदना वेदांगी ब्यावर, राजस्थान
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वंदना जी राजस्थान के अजमेर जिले में ब्यावर से हैं l वंदना जी ने स्वयं बहुत संघर्ष दे खा है और इन्ही संघर्षों से लड़ते हुए आज से पर्व ू पांच साल पहले “वेदांगी संघ” का जन्म हुआ । वंदना जी को दे ख कर अनेकों बच्चियों एवं महिलाओं में जोश आता है , कुछ कर दिखाने का जन ु न ू पैदा होता है । अनेकों लड़कियों के लिए वंदना जी एक आदर्श हैं । वंदना जी छोटी बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं के लिए शाखा लगाती हैं, जिसमें उनको आत्म रक्षा, दे श रक्षा ओर धर्म रक्षा कैसे करें , जो आज के समय मे अत्यंत आवश्यक है इसका ज्ञान दे ती हैं । अनरु ाग्यम ् की एक अन्य पहल इंटरव्यू श्रृंखला में 12 मार्च 2021 की शाम अनरु ाग्यम ् की साक्षात्कारकर्ता निधि बंसल जी द्वारा ‘वंदना वेदांगी जी’ का इंटरव्यू लिया गया l (click for watch live interview on facebook)
समु ित रावल जी 18 वर्ष से वास्तु विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। समु ित रावल जी अब तक 10,000 से भी अधिक घरों का वास्तु दोष ठीक कर चुके हैं। सबसे अनोखी बात यह है कि घर बैठे ही मोबाइल और वीडियो कॉलिंग द्वारा किसी के भी घर एवं दक ु ान का वास्तु दोष दरू कर सकते हैं। वास्तु शास्त्र के साथ-साथ फेंगशुई ज्ञान से भी भलीभांति परिचित हैं। उन्होंने भारतीय वैदिक संस्कृति की महत्ता को वास्तु शास्त्र की उपयोगिता के साथ सिद्ध किया है । समु ित रावल जी के विचारों को जानने का सव ु सर मिला 24 फ़रवरी 2021 की शाम अनुराग्यम ् के फेसबुक पेज पर हमारी साक्षात्कारकर्ता “निधि बंसल जी” के द्वारा l
(click for watch live interview on facebook)
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अनुराग्यम ्
समु ित रावल हरिद्वार, उत्तराखंड
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मई 2021
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गीता जोशी जी अपनी “राइज़िंग टीम” के साथ “मनी रोबोट” से दे श व विदे श में बहुत से लोगों की धन से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान कर रहीं हैं। गीता जी पिछले 20 सालों से एक आध्यात्मिक हीलर हैं जो टै रो रीडिंग, न्यूमेरोलॉजी, मोबाइल न्यूमेरोलॉजी आदि करती हैं। वह मोबाइल न्यूमेरोलॉजी करने में माहिर हैं। यह एक ऐसी विद्या है जहाँ आपके मोबाइल नंबर के विश्लेषण से ही संपूर्ण जीवन पद्धति को डिकोड किया जाता है । इन सभी सेवाओं के लिए कार्यशालाएँ और परामर्श शाखाएँ आयोजित की जाती हैं। वह एक आहार विशेषज्ञ भी हैं जिसमें आपको अपनी जन्म तिथि के आधार पर आहार दे ती हैं - “एक मात्रात्मक आहार दृष्टिकोण” I अनुराग्यम ् के फेसबुक पेज पर गीता जोशी जी का इंटरव्यू निधि बंसल जी द्वारा 10 फ़रवरी 2021 की शाम लिया गया, जो कि पूर्णतया सफल आयोजन रहा l
गीता जोशी मंब ु ई, महाराष्ट्र
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रिया जैन
भोपाल, मध्यप्रदे श
रिया जैन जहां एक और बहुत अच्छी कलाकार हैं दस ू री ओर गणित में अपने अप्रतिम ज्ञान से सबको चकित कर दे ने वाली भी हैं। टूटी-फूटी चीजो ़ को वैज्ञानिकता के साथ जोड़कर वह एक ऐसा नया रूप दे दे ती है जो सबको अचंभे में डाल दे ता है । संवेदनशील लेखिका होने के साथसाथ वह कराटे में ब्लैक बेल्ट भी है । अपनी सफलताओं का श्रेय वह अपने माता-पिता को दे ती है जिन्होंने उसे हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और वह सभी अभिभावकों से आग्रह करती है कि वह भी अपने बच्चों को अपनी रूचि के अनुसार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें । राष्ट्रीय बालपरु स्कार से सम्मानित रिया जैन 230 से अधिक अवार्ड प्राप्त कर चक ु ी हैं lअनुराग्यम ् संस्था ने भोपाल मध्य प्रदे श की बहुमुखी प्रतिभा की धनी रिया जैन को उसके अलग-अलग क्षेत्रों में प्रस्तुत गुणवत्ता व कारनामों से प्रभावित होकर उसे ‘ध्रुव तारा’ नाम से नामांकित किया। ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ मुहिम की ब्रांड एंबेसडर रिया जैन का इंटरव्यू निधि बंसल जी के साथ अनुराग्यम ् के फेसबुक पेज पर 1 फ़रवरी 2021 की शाम में रखा गया l (click for watch live interview on youtube)
अनीश रखीजा जी करियर कॉउं सलिंग को ज्योतिषशास्त्र के साथ जोड़कर कई प्रतिस्थापित संघर्षशील विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर चक ु े हैं l कोरोना महामारी लाॅकडाउन के दौरान बच्चों को अपने करियर को लेकर काफी प्रश्न एवं चिंताएं थी जिसका निराकरण अनीश रखेजा ने बड़ी मनोवैज्ञानिकता के साथ किया। आईआईटी रुड़की से संबंधित अनिश जी ने अपने 20 वर्षों के अनभ ु व से संघर्षशील विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर उचित कैरियर चन ु ने के सझ ु ाव व उपाय निर्देशित किए। 22 जनवरी 2021 की शाम को अनरु ाग्यम ् के फेसबक ु पेज पर इंटरव्यू श्रृंखला में निधि बंसल जी के साथ अनीश रखीजा जी के विचार जानने का मौका मिला l (click for watch live interview on youtube)
डॉ. ध्रुव तिवारी भिलाई, छत्तीसगढ़
अनीश रखीजा नोएडा, उतरप्रदे श
डॉ. ध्रुव तिवारी जी छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर से हैं। अभी आप रायपुर में कला शिक्षक के रूप में अपनी कला से केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों को लाभान्वित कर रहे हैं । छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में इनका कला स्टू डियो है , जहाँ दे श के विभिन्न राज्यों से कलाकार और कला-प्रेमी आते हैं और दे श विदे श की कला चर्चा के साथ-साथ उनसे कला तकनीक की जानकारी भी लेते हैं। रायपरु के विभिन्न पटल पर अक्सर आप इन्हें बच्चों और बड़ों को कला सिखाते दे ख सकते हैं। डॉ. तिवारी की कलाकृतियों का प्रदर्शन रायपुर एयर पोर्ट पर होता रहा है , साथ ही कई समह ू प्रदर्शनी का भी आप हिस्सा रहे हैं। इन्हें कई परु स्कारों से परु स्कृत किया जा चुका है और एन सी आर टी के ये संसाधक हैं l केन्द्रीय विद्यालय संगठन भी संसाधक के रूप में इनकी सेवाएँ लेता है । डॉ. तिवारी ने बस्तर के आदिवासी लोगों के बीच में जाकर उनकी कला को अपनी पीएचडी का विषय बनाया था, जो आदिवासी वहाँ अपनी मौलिकता से जो कलाकृतियाँ बनाया करते थे उन्हीं पर उन्होंने अपनी पूरी रिसर्च की है ।
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अनुराग्यम ्
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मई
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2021
चित्रकारी
कहकशां दे हरादन ू , उत्तराखंड
अर्पिता मित्रा, दिल्ली
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अनुराग्यम ्
मंजलेश मीणा, जयपुर, राजस्थान
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मई 2021
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श्रीमती रजनी किरण झा मधुबनी पें टिंग की प्रस्तावक हैं, जो भारत की प्रमुख लोक कलाओं में से एक है जो मूल रूप से बिहार में मधुबनी नामक स्थान से आती है l श्रीमती रजनी किरण झा खद ु बिहार से आती हैं और संस्कृतियों, परं पराओं के साथ दृढ़ता से जुड़ती हैं, उन्होंने अपना जीवन मधुबनी पें टिंग के इस विशेष कला रूप के लिए समर्पित कर दिया है ।
अबकी बार..
कलाकार
इसमें उन्होंने अपनी मूल शैली के साथ-साथ पारं परिक कला के दायरे में भी प्रयोग किया है । उन्होंने इस भारतीय परं परा को जीवित रखने के लिए कई युवा और आने वाले कलाकारों को यह कला रूप सिखाया है । उन्होंने इस भारतीय पारं परिक कला को विदे शी धरती पर फैलाने के प्रयास किए हैं l हाल ही में उन्होंने कार्डिफ, वेल्स, यूनाइटे ड किंगडम में कार्यशालाएँ आयोजित कीं, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश छात्रों को भारतीय कला के रूप सिखाए। उनके प्रयासों की बहुत प्रशंसा हुई और वहाँ पर उनकी सराहना की गई। उनके प्रयासों ने भारत और विदे शों में उनकी पहचान हासिल की है । उन्होंने अपने चित्रों के माध्यम से कई सामाजिक कारणों को संबोधित किया है , जैसे सेव द गर्ल चाइल्ड, वूमेन एम्पावरमें ट, एजक ु े शन आदि। उनके चित्रों में हमेशा सामाजिक संदेश के अलावा महाकाव्यों और परं पराओं का चित्रण भी होता है । उसकी प्रमुख उपलब्धियां कुछ इस प्रकार हैं : • 10 एकल शो रजनी किरण झा नई दिल्ली
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• 36 समह ू कला प्रदर्शनी • उन्होंने 12 कला प्रदर्शनियों को आयोजित भी किया है I • वे 'कलाश्री' और 'कलारत्न' परु स्कार से सम्मानित हुई हैं। • 7 राष्ट्रीय पुरस्कारों की विजेता रही हैं। • 2 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की विजेता भी रही हैं। • कई राज्य स्तरीय पुरस्कारों की विजेता रही हैं। • उनके चित्रों का स्वामित्व दनु िया भर के कई कलाप्रमियों के पास हैं।
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अनुराग्यम ्
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मई
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2021
बदलता समाज बदलते रिश्ते
अनरु ाधा नई दिल्ली वर्तमान भारतीय समाज अब परम्परागत समाज नहीं रहा, बल्कि अब इसे आधनु िक समाज के रूप में दे खा जाने लगा है । आज का समाज केवल समाज तक ही सीमित नहीं रह गया है वरन ् आधनु िक समाज बन गया है । क्योंकि वर्तमान समाज में आज का यवा ु वर्ग खद ु में ही समाहित होना चाहता है । माता-पिता भी अपने बच्चों को यह सिखाते हैं कि अपने भविष्य के बारे में खद ु फैसले लेना सीखो, क्या पसंद है , आगे का जीवन कैसे व्यतीत करना है , और तो और किसी-किसी घर में तो यदि उनके माता-पिता उनके लिए सोचते भी हैं तो बच्चे यह कहकर नकार दे ते हैं कि तम ु ्हें क्या पता तम ु इस ज़माने के थोड़ी हो। ऐसे में रिश्तों की नींव व समाज की संरचना भी डगमगाती नज़र आती है । आज का यवा ु केवल पैसा नहीं चाहता है , बल्कि ऐसा काम करना चाहता है , जिससे उसके पास पैसा तो रहे ही साथ ही साथ उनका पैशन भी बन जाए । चेहरे पर एक नकली मस ु ्कान और औपचारिक भाषा। आपसी रिश्ते यहीं तक सीमित हो कर रह गए हैं। कंपनियों की यह आदत अब लोगों के संबंधों में भी दिखने लगी है । घरों में भी लोग एक दस ू रे से
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अनुराग्यम ्
मात्र औपचारिकता स्वरूप बातचीत करते हैं। औपचारिकता केवल आज एकाकीपन को बढ़ा रही है । क्योंकि आज लोग केवल काम से काम रखना चाहते हैं अपने परिवार रिश्तेदारों से दरू ी बनाए रखना चाहते हैं वह नहीं चाहते कि कोई दस ू रा उनके व्यक्तिगत जीवन में दखलअंदाज़ी करे । इसलिए वह अपने में ख़ुश रहना अधिक पसंद करते हैं। पहले के समाज में संयुक्त परिवार हुआ करते थे जहाँ सब परिवार मिल जुल कर साथ रहते थे l किसी एक की मजबूरी में पूरा परिवार लग जाता था किन्तु आज का परिवार एकल परिवार रह गया है , जो केवल एक बच्चे में संतुष्ट रहना चाहता है । उसे अपने माता- पिता तक से मिलने की चाहत समाप्त होती जा रही है । क्योंकि आज का युवा वर्ग एकल परिवार में उस तरह रहना चाहता है जहाँ आसपास कोई उसका रिश्तेदार ना हो। वो अपने स्वयं के परिवार, रिश्तेदार, पुराने दोस्त सभी से रुख मोड़ना चाहता है । इसलिए तो कहते हैं कि वर्तमान समाज रिश्तों कि कद्र करना भूलता जा रहा है । रीतिरिवाज़ोंसे दरू ी बनाए रखना चाहते हैं। पसंद- नापसंद में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। वर्तमान परिवेश में हम आज की लगातार बदलती जीवन शैली में अपनी सुख-सुविधा, मान-मर्यादा और स्टेटस को लेकर इतने अधिक स्वार्थी हो चुके हैं कि अब हमारे लिए अपनी व्यक्तिगत प्रतिबद्धताओं और निजी स्वार्थ के अलावा बाकी सामाजिक सरोकारों से कोई लेना-दे ना नहीं है ।
इसके अतिरिक्त हमारी आज की पीढ़ी पर आधुनिक फैशन व पैसों के अलावा कुछ नहीं। आज हर काम के लिए पैसा ज़रूरी हो गया है , यहाँ तक की स्कूल की अच्छी शिक्षा के लिए लोग पैसा दे ते हैं और महं गे स्कूलों में दाखिला दिलवाते हैं जिससे उनकी शान बढ़े। पैसों और निजी रिश्तों की ही परवाह करती दिखाई पड़ती है और इसका प्रमाण है आज के दौर में बढ़ता ‘लिव इन रिलेशन’। आजकल का समाज अपने में सिमट कर रहना चाहता है l वह नहीं चाहता की कोई दस ू रा व्यक्ति उनके पारिवारिक या व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप करे । समाज में आज के युवा स्वयं फैसला लेने पर ज्यादा विश्वास रखते हैं। उनके लिए आज पैसा और पैशन दोनों ही जरूरी है । आधुनिकीकरण के ज़माने में वह दिखावा चाहते हैं कि किसी भी तरह उनकी वाह-वाही हो l यही है हमारा आज का समाज जो रीति-रिवाजों, परिवार, रिश्तेदारों से दरू ी, पुराने दोस्तों से दरू ी बनाए रखने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। मसलन खुद के ही इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। -----x-----
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मई 2021
dyk;k=k मानसिक स्वास्थ्य - एक ज़रूरत
वसधा ु गोयल दे हरादन ू , उत्तराखंड कुछ महीनों पहले मैंने समाचार सन ु ा कि कपिल शर्मा तनाव और अवसाद की स्थिति से ग्रस्त हैं। उन्होंने अपने सीरियल को बनाना छोड़ दिया । मझ ु े इस घटना ने झकझोर दिया। मैं सोचने पर मजबरू हो गई कि कपिल शर्मा जैसे सेलिब्रिटी जो दस ू रे को हँसाते हैं, वह स्वयं तरह से तनावग्रस्त कैसे हो सकते हैं l मेरे लिए यह बड़े दख ु की खबर थी। मैंने यह भी सन ा कि ु दीपिका पादक ोण, जिसक े पास पैसा ु है , नाम है , इज़्ज़त है , काम है वह भी एक समय अवसाद और तनाव की स्थिति से ग्रस्त थीं। मझ ु े समझ नहीं आता कि यह सब क्यों होता है । अक्सर दे खा जाता है कि हम लोग मानसिक स्वास्थ्य की बात आते ही पीछे हट जाते हैं। हम सब अकसर मानसिक स्वास्थ्य की तरफ ध्यान नहीं दे त।े दरअसल समाज में यह विषय अभी भी नया हैं। धीरे -धीरे लोगों ने इस बार बात करनी शरू ु कर दी है , पर खल क े आगे अभी ु भी नहीं आए हैं मझ ु े लगता है कि समाज की अधिकतर प्रॉब्लम्स की जड़ मानसिक स्वास्थ्य ही हैं। मानसिक स्वास्थ्य की शरु ु आत धीरे धीरे होती है , पर हम इसको समझ नहीं पाते। धीरे -धीरे यह प्रॉब्लम बढ़ती जाती है और समाज में एक विकराल रूप ले लेती हैं। वैसे तो
यहां बहुत सारी मानसिक समस्याएं हैं पर मैं एक विषय की बात करूं गी, जैसे कि क्रोध । वैसे तो मानसिक स्वास्थ्य के बहुत सारे कारण हैं, परं तु क्रोध उनमें सर्वोपरि हैं। क्रोध जन्म दे ता है मानसिक विकार को। समाज में क्रोध को बुरा नहीं माना जाता, क्योंकि हम क्रोध को समझ ही नहीं पाए । क्रोध कई तरह का होता है और शुरू में जब हम क्रोध करना शुरू करते हैं, तो यह नहीं समझ में आता कि आगे चलकर विकराल रूप धारण कर लेगा। शुरू में हम दस ू रों पर चिल्लाते हैं कभी कभी हाथ भी उठा दे ते हैं। बहुत सोचने के बाद मुझे समझ में आया कि ज़िन्दगी जीने के तरीके हमारे बहुत गलत होते हैं। हमारे समाज में पैसा, शोहरत, दौलत ही सर्वस्व है , जो कि बहुत गलत है । इन सब चीजों को बनाए रखने के लिए पहले हम थोड़ा तनाव लेते हैं और सोचते हैं कि आज कल की दनु िया में तनाव नॉर्मल है और धीरे धीरे वह बढ़ता जाता है । वह हमारी मानसिक स्थिति पर हावी हो जाता हैं। जिसके फलस्वरूप हम ना कुछ काम कर पाते हैं ना कुछ सोच पाते हैं बस परे शान रहते हैं। कभी-कभी तो यह तनाव इतना बढ़ जाता है कि आत्महत्या जैसी घटनाएं भी हो जाती हैं। जैसे हाल ही में कुछ केस हुए हैं- प्रत्यूषा बनर्जी, जिया खान, कौशल पंजाबी। इसके कारण कुछ भी हो सकते हैं l कई बार टूटी हुई रिलेशनशिप, कई बार पैसा कम मिलना, काम ना मिलना आदि हो सकते हैं। सेलिना गोमेज़ जैसे सिलेब्रिटी तो थोड़े कम फॉलोअर भी बर्दाश्त नहीं कर पाई।
अपनी पोज़ीशन बरकरार रखने के लिए बड़ी मेहनत की। लेकिन फिर भी वह तनाव में चली गई। कई बार सेलिब्रिटीज अगर ज़रा सा भी कम पॉपुलर हो जाते हैं, तो भी वह तनाव की स्थिति में आ जाते हैं। यह सब सिर्फ एक मानसिक अवस्था हैं। पर मैं यह सोचती हूं कि ऐसा नहीं है क्योंकि बहुत से लोगों के पास पैसा कम होता है , काम नहीं होता वह फिर भी खुश रहते हैं। तनाव और अवसाद एक मानसिक स्थिति है । पहले यह थोड़ा थोड़ा हमारे दिमाग पर हावी होता है और फिर पूरी तरह से हमारे दिमाग को जकड़ लेता है । इससे निबटने का सबसे सरल तरीका है कि समय-समय पर लाइफ कोच की मदद ली जाए । कपिल शर्मा और दीपिका पादक ु ोण ने भी यही किया अपनी प्रॉब्लम को अपने समय से समझा और उसका इलाज करवाया l इलाज कराने के बाद ना सिर्फ उन्होंने अपनी मदद की, बल्कि उनकी प्रतिभा और भी ज़्यादा निखर कर आई और वह पहले से भी ज्यादा फेमस हो गए। कहने का तात्पर्य है कि ना जॉब, ना रिलेशनशिप, ना पैसा कुछ भी हमारी मानसिक स्थिति को खराब नहीं कर सकता जब तक कि हम ना चाहें । हमें हर स्थिति से निबटने के लिए तैयार रहना चाहिे ए। हमारे दिमाग में इतनी शक्ति होती है कि हम हर स्थिति से निपट सकते हैं । सच तो यह है कि तनाव अवसाद सिर्फ एक मानसिक स्थिति है ।
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-----x----अनुराग्यम ्
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मई
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2021
लेखक की नैतिक जिम्मेदारियां लेखक हमारी कोई जाति नहीं, ना कोई खास पहचान आदि से अंत, जीवन के राही स ृष्टि के हम अन्वेषक ज्ञान के खोजी-उपासक मनुष्यता हमारी धरोहरें न कुछ तेरा,न कुछ मेरा पल का है ये रै न बसेरा जगा कोई ऐसा विहान ना उसका हो कभी अवसान भावों के दीपक में शब्दों की बाती को संवेदना के तेल में डुबोकर हम प्रेम,आंनद,उत्सव के नित्य गीतों से जग को रौशन करते...
अर्चना श्रीवास्तव मलेशिया
सदियों से भारतवर्ष में सनातनी परं परा का आधार ही ज्ञान,गुरु, अध्ययन-पाठन रहा है l इस ज्ञान-विज्ञान की जडें “मनसा वाचा कर्मणा” के सिद्धांत को ही पूरी प्रखरता आवश्यक है l क्योंकि सभी आसानी से पढ़ तो सकते हैं, से पुष्पपित और प्रतिपादित करने जोखिम भरी भूमिका लेकिन लिखना सामान्यतः कठिन है l का निर्वहन करती आ रही हैं l एक लेखक को सूर्य की किरणों सा तेज,दीप्त, एक बहुत प्रतिष्ठित और प्रभावी स्थान इन गुरुओं चटख, भावपूर्ण प्रस्तुति में चांदनी की शीतलता, मधुर और विद्वानों को भारतीय समाज में दे ने की संस्कृति और मलय का समन्वय कर उसे असंभावित रुप से मनमोहक प्रवृत्ति व्यापक है । कलांतर यही जिम्मेदारी लेखक और बनाने का प्रयोजन करना चाहिए l संवेदनशील मुद्दों पर साहित्कारों के कंधों पर आ गई l ज्ञान की असली बातों लेखन का उद्देश्य, धारणा और दृष्टि बिल्कुल जल सदृश को बहुत सावधानी और प्रखर दृष्टि से बहुत स्पष्टता से निर्मल, स्वच्छ और पारदर्शी होना नितांत जरूरी है । अपनी मौलिकता के प्रति सजग रहते हुए नकल से परहे ज़ और जन-जन तक प्रसारित करना । ताबड़तोड़ प्रतिस्पर्धा तथा सस्ती लोकप्रियता से दरू रहना चाहिए। अपनी परं परा और कला -संस्कृति की गहरी समझ असतो मा सदगमय ॥ रखते हुए, समाजिक-राजनीतिक तौर पर जागरूक रह तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ अपनी मिट्टी-जडों से स्वाभाविक जुडाव, पहचान l थोड़ा मतृ ्योर्मामत ृ म ् गमय ॥ तर्जुबा, प्रमाणिक, स्थापित पुस्तकों का निरतंर अध्ययन, सत्यमेव जयते प्रतिष्ठित लेखकों का मनन-चिंतन तथा गुणीजनों का सत्यम शिवम ् सुंदरम ् सानिध्य, आशीर्वाद का लाभ लेने की सहज प्रवृत्ति हो l इन्हीं मंत्रों को मानस में स्थापित करते हुए एक लेखक अपनी धारणाओं और विषय-वस्तु को सामान्य जन तक पहुँचाता है l लेखन कला को ईश्वरीय वरदान समझकर अपने लेखन की संपूर्ण नैतिक जिम्मेदारियां लेते हुए इसके विकास, निखार और संवर्द्धन के लिए निम्नलिखित मान बिन्दुओं पर गौर करना और सामर्थ्यानुरुप पालन करना
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अनुराग्यम ्
विषय-वस्तु का समुचित ज्ञान, जिज्ञासु प्रवृत्ति से तथ्यों का अन्वेषण-परखकर लोगों के समक्ष रूचिपूर्ण और ग्राह्य बनाकर प्रस्तुत करना l अति और कोरी भावुकता से परहे ज़ करते हुए गंभीर विषयों पर आत्ममुग्ध और आत्मकेन्द्रित लेखन से दरू ी कायम रखना l कम और सटीक-संतुलित शब्दों मे अपनी अभिव्यक्ति को दिशा दे ना l भाषा और
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मई 2021
dyk;k=k
शैली को निरं तर परिमार्जित करते हुए अपनी मजबूत पकड़ इन सब मुख्य बिन्दुओं को रे खांकित करने के उपरांत मैं बनाये रख अभद्रता, अपशब्द और अशिष्टता से परहे ज़ एक अत्यंत ज़रूरी बिन्दु पर प्रकाश डालना चाहती हूँ l अब करना l तक जो हमारे दे श में राजनीतिक और सामाजिक कारणों से बड़े-से-बड़े मुद्दे पर आधी-अधूरी सच्चाई दिखाने या अपनी धारदार लेखन को सत्य, जोश,जोखिम से लैश कर सत्य को पूरी तरह से पलटकर भ्रामक झूठ पेश करना असत्य, प्रपंच और अनीति पर जोरदार प्रहार करने वाला एक परं परा-सी हो गई थी, वो हमारे आने वाली पीढियों के हथियार बनाया जाए । लेखन द्वारा आत्म विकास, समाज लिए घातक सिद्ध होगी । निर्माण की प्रभावशाली भूमिका निभाने का सजग, सार्थक पहल करते हुए समस्याएं उजागर करते हुए समाधान की आज के अत्याधुनिक ग्लोबल सोशल मीडिया वाले राहों की ओर उन्मुख होना l गंभीर और उबाऊ विषयों को समाज में कोशिश के बावजुद सच को ज़्यादा दे र तक कैसे रोचक और अनोखे ढं ग से प्रस्तुत करें , यह पूर्णतः: दबाया नहीं जा सकता। एक सुशिक्षित, सभ्य, जागरूक, लेखक के व्यक्तिगत कला-कौशल,निपुणता और विवेक पर विवेकशील और सुदृढ़ व्यक्ति और समाज के निर्माण के निर्भर करता है l खातिर हमें आगे आकर सत्य का वरण और अंगीकार करना होगा l कब तक हम एकतरफा अन्यायपूर्ण थोपी संदर्भित विषय में अपनी अनुभूति-अनुभव को प्रज्ञापूर्ण गई शांति, सद्भाव, समरसता, तुष्टिकरण के नाम पर समावेश करना, लेखन-सामग्री के आकर्षण में “सोने पर धर्म-सत्य को हारते दे खने को विवश रहें गे? यह एक सुहागा” साबित होता है l इसके अतिरिक्त निष्पक्षता,बेबाकी ज्वलंत प्रश्न है l सच को दे खना व महसूस करना अलग और स्पष्टता भी लेखक के श्रेष्ठ गुणों का परिचायक हैं बात है और उसे प्रकट करना, लिखना अभी भी एक बड़ा l लेखक को अनावश्यक बाहरी दबाव, तनाव और प्रभाव जोखिम का काम है । इसी के साथ मैं अपनी को लेखनी तथा मुख्यतः विभिन्न प्रलोभनों से बचने की चेष्टा करनी विराम दे ती हूँ। चाहिए अपनी लेखकीय धर्म की गुणवत्ता की रक्षा हे तु l -----x-----
राजस्थान
की बात हो और राजस्थानी महिला आभष ू णों के बारे में उल्लेख ना हो तो कुछ अधरू ा सा लगता है l ये राजस्थानी गहने एक स्त्री की सुंदरता में चार चाँद तो लगाते ही हैं बल्कि राजस्थान की एक अदभुत छवि स्वयं में बयां करते हैं l यहाँ पर कुछ प्रमुख आभूषणों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है , जो इस प्रकार हैं : • सिर के प्रमुख आभूषण : शीशफूल, रखड़ी, बोर..
• माथे के प्रमुख आभूषण : बोरला, टीका, दामिनी, साँकली, बिन्दी..
राजस्थानी महिला आभष ू ण
• नाक के प्रमुख आभूषण : बेसर, नथ, लोंग, चूनी, लटकन, वारी..
(संपादिका की कलम से..)
• कान के प्रमुख आभूषण : झुमका, टाॅप्स, कर्णफूल सुरलिया, भूचारिया, टोटी, पाटी, बाली, मुरकी.. • दांत के प्रमुख आभूषण : रखन, चूप आदि प्रमुख दांत के आभूषण हैं..
• गले के प्रमुख आभूषण : झालर, कंठी, मटरमाला, ठूस्सी, मोहरण, हालरो, पंचलड़ी, तिमणिया,
तुलसी, पोत, चंदनहार, हं सहार.
• कलाई के प्रमुख आभूषण : गजरा, गोखरू, चूड़ियाँ, चूड़ा, हथफूल, पाटला, कंगन, छल्ला कड़ा.. • अंगुली के प्रमुख आभूषण : दामणा, हथपान, बीदिया, • बाजू के आभूषण
अंगुठी, बींठी, मूंदड़ी, नथड़ी..
: बाजू, बाजूबंद, भुजबंध, अणत तकथा, बट्टा, हारपान, आरत, टड्डा..
• कमर के प्रमुख आभूषण : कंदोरा, तागड़ी, कणकती, सटका (लहं गे के नेफे में अटकाकर लटकाया जाने
• पैर के प्रमुख आभूषण
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वाला आभूषण)..
: कड़ा, नवरी, आंवला, पायजेब, पायल, नूपुर, बिछिया, फोलरी, जोधपुरी जोड़, घुंघरू, झांझरिया..
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अनुराग्यम ्
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मई
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2021
राजस्थानी लोक नतृ ्य
राजस्थानी लोक नतृ ्य विश्वप्रसिद्ध है
l कलायात्रा पत्रिका का ये अंक राजस्थान पर आधारित है और यहाँ के लोक नतृ ्य के बारे में चर्चा ना की जाए तो ये विशेषांक अधरू ा सा जान पड़ता है l यहाँ पर उन नतृ ्यों के बारे में संक्षिप्त विवरण दिया गया है , जिन्हें राजा-महाराजा अपने मनोरं जन के रूप में इस्तेमाल किया करते थे I ये सभी लोक नतृ ्य अलग अलग जनजातियों से उत्पन्न हुए हैं और ये लोक नतृ ्य इतने मनोरं जक और आकर्षक हैं जो हर व्यक्ति को अपनी ओर स्वत: ही खींच लेते हैं l राजस्थानी शास्त्रीय नतृ ्य, व्यावसायिक नतृ ्य और जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य कुछ इस प्रकार हैं : कालबेलिया जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
कथोड़ी जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
कालबेलिया नतृ ्य, शंकरिया नतृ ्य
होली नतृ ्य, मावलिया नतृ ्य
सहरिया जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
भील जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
शिकारी नतृ ्य इंद्रपरी नतृ ्य झेला नतृ ्य लहं गी या लहं गा नतृ ्य
गवरी नतृ ्य युद्ध नतृ ्य द्विचक्री नतृ ्य लोक नतृ ्य घूमर नेजा नतृ ्य हाथी मन्ना नतृ ्य
व्यावसायिक नतृ ्य
भवाई लोक नतृ ्य, कच्छी घोड़ी नतृ ्य, चरी नतृ ्य ऐसे नतृ ्य जिनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना है । पेशव े र लोकनतृ ्यों में यह बहुत लोकप्रिय है । इसमें नतृ ्य स्त्री - पुरुष दोनों करते है । यह नतृ ्य कांच के टुकड़ों पर, गिलास पर, तेज़ तलवार की धार पर, ज़मीन पर रखे रुमाल को मुंह से उठाना किया जाता है ।
क्षत्रिय नतृ ्य गीदड़ नतृ ्य, चंग नतृ ्य, ढोल नतृ ्य गैर नतृ ्य, रास तूड़ा नतृ ्य, किलियो - बोरियो नतृ ्य घुडला नतृ ्य, मयूर नतृ ्य कंजर जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
गरासिया जनजाति द्वारा किए जाने वाले नतृ ्य
धाकड़ नतृ ्य चकरी नतृ ्य धार्मिक नतृ ्य तेरहताली नतृ ्य अग्नि नतृ ्य लांगुरिया नतृ ्य डांग नतृ ्य थाली नतृ ्य
वालर नतृ ्य लरु नतृ ्य कूद नतृ ्य मांदल नतृ ्य गोर नतृ ्य ज्वारा नतृ ्य मोरिया नतृ ्य
राजस्थान का एकमात्र शास्त्रीय नतृ ्य कत्थक है इसके प्रवर्तक भानुजी महाराज है । जयपुर घराना कत्थक नतृ ्य का सबसे पुराना घराना है वर्तमान में कत्थक नतृ ्य उत्तर भारत का शास्त्रीय नतृ ्य है तथा बिरजू महाराज इस नतृ ्य के अन्तर्राष्ट्रीय कलाकार हैं l
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अनुराग्यम ्
विनीता पंढ ु ीर नई दिल्ली
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मई 2021
dyk;k=k 9. 20वीं शताब्दी का गायक कौन है ?
हिंदी प्रश्नावली 1. दे वनागरी लिपि को राष्ट्रलिपि के रूप में कब स्वीकार किया गया था? i. 14 सितम्बर, 1949 iii. 23 सितम्बर, 1949
ii. 21 सितम्बर, 1949 iv. 25 सितम्बर, 1949
2. ‘रानी केतकी की कहानी’ की भाषा को कहा जाता है ? i. हिन्दुस्तानी
ii. खड़ी बोली
iii. उर्दू
ii. मेवाड़ी भाषा iv. पिंगल भाषा
4. निम्नलिखित में से कौन-सी प्रेमचंद की एक रचना है ? i. पंच-परमेश्वर iii. ताई
ii. उसने कहा था iv. खड़ी बोली
5. वीर रस का स्थायी भाव क्या होता है ? i. रति
ii. उत्साह
iii. हास्य
iv. परिहास
6. निम्नलिखित में से कौन-सा तबला वादक चारों घराने के तबला वादन में सिद्ध रहा ? i. अहमद जान थिरकवा iii. किशन महाराज
ii. सामता प्रसाद iv. मुन्ने ख़ाँ
7. बसंत ताल में कितनी मात्राएँ होती हैं? i. 5
ii. 7
iii. 9
iv. 11
8. कर्नाटक अवनद वाद्य के एक गुरु कौन हैं ? i. पालघाट मणि अय्यर iii. मदरु ाई मणि अय्यर
i. गस ु ादी
ii. आम्र नतृ ्य
ii. टी. आर. महालिंगम iv. चें बई वैद्यनाथ अय्यर
iii. मोर नतृ ्य
iv. बिहू नतृ ्य
भारतीय इतिहास प्रश्नावली 11. टीपू सल ु ्तान ने अंग्रेज़ों के साथ यद ु ्ध करते हुए कब वीरगति प्राप्त की? i. 1857 ई. ii. 1793 ई. iii. 1799 ई. iv. 1769 ई. 12. बद ु ्ध में वैराग्य भावना किन चार दृश्यों के कारण बलवती हुई ? i. बढ़ा ू , रोगी, मत ृ क, संन्यासी ii. अन्धा, रोगी, लाश, संन्यासी iii. लंगड़ा, रोगी, लाश, संन्यासी iv. यवा ु , रोगी, लाश, संन्यासी 13. सम्राट अशोक की वह कौन-सी पत्नी थी, जिसने उसे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था ? i. चंडालिका
कला प्रश्नावली
ii. अय्यर मथ ु स ु ्वामी दीक्षितर iv. सब्र ु ह्मण्यम भारती
10.आन्ध्र प्रदे श की गोंड जनजाति का प्रसिद्ध नतृ ्य कौन-सा है ?
iv. अपभ्रंश
3. प्रादे शिक बोलियों के साथ ब्रज या मध्य दे श की भाषा का आश्रय लेकर एक सामान्य साहित्यिक भाषा स्वीकृत हुई, जिसे चारणों ने नाम दिया? i. डिंगल भाषा iii. मारवाड़ी भाषा
i. चेम्बई वैद्यनाथ iii. त्यागराज
ii. चारुलता
iii. गौतमी
iv. कारुवाकी
14. निम्नलिखित में से सबसे प्राचीन राजवंश कौन-सा ह ै? i. मौर्य वंश ii. गपु ्त वंश iii. कुषाण वंश iv. कण्व वंश 15. अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला प्रथम अंग्रेज़ कौन था ? i. कर्नल टॉड iii. हे मचंद्र रायचौधरी
ii. जेम्स प्रिंसेप iv. चार्ल्स मैटकॉफ़
उत्तर : 1, 3, 2, 3, 1, 1, 2, 4, 1, 2, 3, 1, 4, 1, 2
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