सचिन चतर् ु वेदी नई दिल्ली संस्थापक, अनरु ाग्यम ् डॉ ध्रुव तिवारी रायपरु , छतीसगढ़ सलाहकार, कला विभाग अनरु ाग्यम ् रजनी किरण झा नई दिल्ली सलाहकार, संस्कृति विभाग, अनरु ाग्यम ्
eq[; laikfndk डॉ तरुणा माथरु जयपरु , राजस्थान
lg laiknd निधि बंसल नोएडा, उत्तरप्रदे श
विनीता पंढ ु ीर नई दिल्ली प्रियंका वर्मा मंब ु ई, महाराष्ट्र मीनू बाला जालंधर, पंजाब अनज ु शक ु ्ला भोपाल, मध्यप्रदे श
कलायात्रा पत्रिका के प्रथम अंक, राजस्थान विशेषांक को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के डाउनलोड कर सकते है । साथ ही साथ राजस्थान विशेषांक के विमोचन का विडियो भी नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के फेसबुक पर दे ख सकते है । डाउनलोड (Click)
अंक 1 का विमोचन दे खें सर्वाधिकार
सभी रचनाएं विशद ु ्ध रूप से लेखकों के व्यक्तिगत मौलिक विचारों व धारणाओं की अभिव्यक्ति मात्र हैं। यद्यपि कलायात्रा में रचनाओं की मौलिकता को लेकर पर ू ्ण संकलिप्त व सजग है फिर भी किसी रचनाकार की यदि कोई रचना चोरी की हुई पायी गई तो मौलिकता प्रमाण पत्र नियम के अंतर्गत उसकी संपर ू ्ण जिम्मेदारी लेखक की स्वयं होगी । किसी भी न्यायिक प्रक्रिया के लिए प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होगा । रचनाओं एवं आलेख के चयन व प्रकाशक के लिए उत्तरदायी
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वर्ष 1, अंक 2, जून 2021 अनुराग्यम ् , नई दिल्ली
अनक्र ु माणिका
(नीचे दिए गए अनुक्रम पर क्लिक करे )
6
साक्षात्कार सश् ु री नगीन तनवीर
11
आदिम जनजातियां डा. विजय चौरसिया
17
संस्मरण डॉ. ध्रुव तिवारी
19
दल ु दल ु घोड़ी राजमणि तिवारी
20
जनजातीय संग्रहालय विनय उपाध्याय
22
योग मनीषा यादव
25
प्रकृति और हम वीरें द्र कुमार झा
26
लोक संस्कृति रोहित झा
30
उभरते बाल कलाकार
34
सकारात्मकता चिराग जैन
हबीब तनवीर शैलेन्द्र कुशवाहा
46
पढ़िए और सर्जनात्मक मधु प्रसाद
आज की शिक्षा पद्धति डॉ वसधा ु प.ु कामत
36
रे खांकन बने कोलाज अनिल पांडय े
40
नारी शिक्षा अलका शर्मा
43
ब्लू पें टर शरद भारद्वाज
44
50
किला गोविंदगढ़ सध ु ीर सिंह
54
डिजिटल पें टिंग्स नेत्री सोनी
55
मर्ति ू कार रानी अधिकारी
56
लोकनतृ ्य राजश्री तिवारी पाण्डे
58
खान-पान अनज ु शक ु ्ला
64
लोक-गीत विनीता पंढ ु ीर
66
कला व इतिहास अंजला ु सिंह भदौरिया
68
ज्येष्ठ मास निधि सहगल
70
60
कविताएँ
कार्टून राजेश कुमार दब ु े
18
ग़ज़ल - हम सँवर जाएंगे अमिताभ पाण्डेय
18
दोहे : पर्यावरण कुन्दन कंु ज
42
आधार छन्द : शक्ति कर्नल प्रवीण त्रिपाठी
42
लघु कथा : स्वाभिमान मीनू बाला
53
तन्हा मक ु े श बिस्सा
53
एक सब ु ह मेरे नाम की रं जना मजम ू दार
62
माँ तेरा आँचल जय हिन्द सिंह
62
शीर्षक - माँ प्रेमलता चौधरी
63
प्रकृति सलोनी रस्तोगी
63
संद ु र फूल लाल सन ु ्दर श्रीवास्तव
67
धन ु से अरमां बन ु सिम्पी गोयल
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वर्ष 1, अंक 2
जन ू 2021
शभ ु सन्देश श्रेष्ठतम सांस्कृतिक उत्कर्ष के बिना तकनीकी विकास पर आश्रित आर्थिक प्रगति निरर्थक होगी । आज किसी भी दे श के उत्थान का आकलन मात्र (जी डी पी)आर्थिक प्रगति के आधार पर तय करने को बहुत बड़े संकीर्ण व विकृत सोच के रूप दे खा जा रहा है । आर्थिक समद ृ ्धि के साथ दार्शनिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र की उच्चतर उपलब्धियों ने ही भारत एवं ग्रीस के शास्त्रवाद को विश्वभर में सर्वोपरि श्रेष्ठता का ताज पहनाया था, जिसके आदर्शों का अनुकरण करके दनु िया के कई दे शों ने अपने राष्ट्रीय विकास की दिशाएं निर्धारित की थीं । इतिहास के इन स्वर्णिम यग ु ों से प्रेरणा लेकर कई सभ्यताएं कला एवं संस्कृति को भी उच्चतर प्राथमिकता दे ते रहे हैं l आर्थिक उत्थान के साथ साथ यह भी आकलन आवश्यक माना जा रहा है कि आर्थिक प्रगति ने अन्य मानवीय मूल्यों को तिरस्कृत करके सामाजिक समरसता को तो ध्वस्त नहीं किया है । दर्भा ु ग्य से आज राष्ट्रीय प्रगति के हमारे आदर्श मूल्य कोरे राजनैतिक व आर्थिक बदलाव में सिमट कर रह गए हैं, जिस पर पुनर्विचार अत्यंत आवश्यक है । राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में कला एवं संस्कृति को वैसी तरज़ीह नहीं मिल सकी है जो मिलनी चाहिए थी । इसी कारण सदियों से सम्पन्न हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत भी लुप्त हो रही है तथा संस्कृति के क्षेत्र में हम निरं तर पिछड़ते जा रहे हैं । आजादी के बाद भी जो महत्व एवं प्राथमिकता इन विधाओं को मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है । पिछले कुछ दशकों से हमने सरकार के भरोसे न रह कर निजी क्षेत्र में जन सहभागिता के माध्यम से संस्कृति के क्षेत्र में जो गंभीर कदम उठाए जा रहे हैं उन्हीं में आशा की किरण दिखाई दे रही है l इस कोरोना महामारी से उत्पन्न अजीबोगरीब हालात में जो भी गतिविधियां राज्य द्वारा सहायता प्राप्त संस्थानों द्वारा आयोजित होते थे, उनमें भी दःु खद शिथिलता आ गई है । ऐसी कठिन व असामान्य स्थिति में “अनरु ाग्यम ् संस्था” द्वारा “कलायात्रा पत्रिका” को प्रकशित करने की पहल बहुत ही नायाब है कि इसने कला की विभिन्न विधाओं से जुड़े कलाकारों को एक अच्छा मंच प्रदान किया है , जहाँ वे संस्कृति से जुड़े कई अहम मसलों पर खुलकर अपनी बात कला प्रेमियों तक पहुंचा सकते हैं। इस अभियान की मैं इस बात के लिए भी सराहना करता हूँ कि इसमें अन्य व्यावसायिक क्षेत्र के महारथियों का भी आशातीत सहयोग मिल रहा है । - प्रोफेसर चिन्मय मेहता कलाकार, डिज़ाइनर और शिक्षाविद पर्व ू प्रोफेसर और डीन, ललित कला संकाय राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपरु अध्यक्ष, आयाम एन. जी. ओ., राजस्थान, जयपरु “अनुराग्यम ् कलायात्रा” हमारे गौरवशाली साहित्यिक, कलात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक, पर्यावरण, परिवेश का अनुप्राणित रूपायण प्रस्तुत करने को उत्सुक एवं समर्पित एक सार्थक एवं अभिप्रेरक प्रयास है । हमारे दे श के प्रत्येक प्रांत की अपनी एक विशिष्ट पहचान है , अपनी अभिव्यक्ति है । आपके प्रयास से हम सभी उन विशिष्टताओं से लाभान्वित होंगे। ऐसी सुंदर परिकल्पना से आप्लावित यह यात्रा निरं तर प्रवाहमान रहे और उत्कर्ष के नूतन आयाम स्थापित करे यह प्रभु से प्रार्थना है । ऐसी अभिनंदनीय यात्रा में आपके साथ जुड़ना सुयोग भी है और सौभाग्य भी। कला यात्रा के सभी साथियों को अनंत अशेष शुभकामनाएँ।
श्रीमती मधु प्रसाद, अहमदाबाद, गज ु रात
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जन ू 2021
सम्पादकीय
dyk;k=k
“कलायात्रा” के जिस मिशन पर अनुराग्यम ् चल रहा है , उसमें भारत को जानने की पुरजोर कोशिश
जारी है l हम भारत के विभिन्न राज्यों को अलग-अलग अंकों में लाने का प्रयास कर रहे हैं, प्रस्तुत राज्य के खानपान नतृ ्य-कौशल, वास्तुकला, जनजातियों का ही नहीं वरन संस्कृति, कला और समद ृ ्ध नाटकों के विभिन्न शैलियों को भी
आगे बढ़ाने वाले परु ोधाओं को भी आप के समकक्ष लाने की पहल है ।पाठक गण यह भी जानें की प्रबद ु ्ध व्यक्तित्व भारत की इस धरा की धरोहर है ।
भारत के मध्य भाग में स्थित होने के कारण इस राज्य
को हम भारत का दिल कह सकते हैं, कालिदास ने अपने प्रसिद्ध
ग्रंथ “मेघदत ू “ में वर्णन किया है कि जब स्वर्ग के जीव-जंतुओं को अपना पुण्य क्षीण होने पर पथ ृ ्वी पर आना पड़ा तो वे अपने
साथ स्वर्ग का एक भाग ले आए थे, उज्जैन को वही स्वर्ग भाग माना जाता है जो वर्तमान में महाकाल का स्थान है ।
प्रस्तुत अंक में उसी मध्य प्रदे श जैसे धार्मिक व सांस्कृतिक
महत्व के राज्य को स्थान मिला है , जहाँ पहाड़, जंगल, नदियां,वनसंपदा, वन्य जीव-जंतु वहाँ के आदिवासियों से लिप्त यह संद ु र धरा बरबस ही पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है ।
नर्मदा, ताप्ती, शिप्रा, बेतवा, चंबल, सोन जैसी ऐतिहासिक
नदियों के साथ आदिवासियों की अनमोल धरोहर मध्य प्रदे श को डाॅ तरूणा माथरु मुख्य संपादिका
मिली है l रे वा जिले के बांधवगढ़ वन सफेद बाघों की अभूतपूर्व संपत्ति विश्व में प्रसिद्ध है गुफाओं, मंदिरों, किलों, महलों असंख्य स्मारकों और असंख्य धार्मिक मेलों के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदे श
में लोक-गीत,लोक-नतृ ्य,लोक संस्कृति के साथ-साथ पारं परिक
शास्त्रीय नतृ ्य और उनको समेटते हुए खजुराहो नतृ ्य महोत्सव और भारत भवन भोपाल के जनजातीय राष्ट्रीय मानव संग्रहालय का विशेष स्थान है ।
हमारा प्रयास बस इतना भर है कि हम सही मायनों में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक गर्व से अपनी श्रेष्ठता का सही
आकलन कर सकें और अपने अतीत पर सिर्फ विश्वास ही नहीं बल्कि भविष्य में भी कुछ नए कीर्तिमान स्थापित करने के लिए अग्रसर हों। अतीत पर गर्व करना हमारी नियति ना बन जाए बल्कि हम भविष्य में ऐसे सस ु ंस्कारी और रचनात्मक व्यक्तियों की सेना खड़ी कर सकें, जो भारत को वर्तमान और भविष्य में सही अर्थों में साहित्य संस्कृति और कला के क्षेत्र में दृढ़ता प्रदान कर सकें ।
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धन्यवाद Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
अनुराग्यम ्
5
जन ू 2021
dyk;k=k साक्षात्कार
सवु िख्यात लोक गायिका सश् ु री नगीन तनवीर - शैलेन्द्र कुशवाहा, रीवा, मध्यप्रदे श
सुविख्यात लोक गायिका सुश्री नगीन तनवीर जी वर्तमान समय में अंसल अपार्टमें ट भोपाल में निवासरत हैं। नगीन जी अपनी माता श्रीमती मोनिका मिश्रा और पिता श्री हबीब तनवीर की इकलौती वारिस हैं। जिनका लोकसंगीत, शास्त्रीय संगीत और रं गमंच से गहरा बावस्ता है । किसी भी गुण को सीखने और जानने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है ,खासकर शास्त्रीय संगीत में । गुरु शिष्य परं परा के दौरान पूरे मनोयोग सुर, लय, ताल की शिक्षा दी जाती है , नगीन जी कुछ इसी तरह की परं परा से संबंध रखती हैं। नगीन जी स्कूल-कॉलेज की शिक्षा के साथ सुविख्यात रं ग निर्देशक हबीब तनवीर की पारखी रचनाशीलता की साक्षी बनीं। ऐसे ही कुछ अनुभवों को साझा किया है , सुविख्यात लोक गायिका सुश्री नगीन तनवीर जी ने शैलेंद्र कुशवाहा से बातचीत के दौरान
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6
• नगीन जी, नमस्कार ! आप विश्वविख्यात रं ग निर्देशक, कवि, लेखक श्री हबीब तनवीर साहब अनुराग्यम ्
जी की पुत्री हैं, एक विशाल रं गमंच आपको विरासत में मिला जिसकी धूम दनु िया ने दे खी, आप अपने बारे में बताएं ? नमस्ते शैलेंद्र ! मेरा जन्म 28 नवंबर 1964 को दिल्ली में हुआ। माता पिता के साथ रहकर मैने प्रारं भिक शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात स्नातक की पढ़ाई के लिए बड़ौदा चली गई l वहां मैंने संगीत से स्नातक किया। उसके बाद दिल्ली आ गई और गुरु सुलोचना बह ृ स्पति जी के निर्देशानुसार मैंने संगीत से एम .ए. किया। उस समय मैं उनसे संगीत की तालीम हासिल कर रही थी, तो उन्होंने ही मुझे संगीत से एम. ए. करने को कहा, तो इस तरह मैंने फिर संगीत से एम.ए. किया। • हबीब साहब के नाटकों को अगर हम दे खते हैं तो उसमें संगीत का विशेष महत्व दिखाई दे ता है , तो आपका लोकगायन की ओर कब से झुकाव हुआ ?
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जन ू 2021 महज़ 8 साल की उम्र से मेरा रुझान संगीत की ओर हुआ। उस दौरान कोई तेज़ आवाज होती थी तो मेरे कानों को बहुत कष्ट होता था। लेकिन मैं संगीत घंटों सुनती थी, खासकर शास्त्रीय संगीत। मुझे ऐसा लगता है कि संगीत से जुड़ना मेरे लिए प्राकृतिक था और हबीब तनवीर (बाबा) की मंडली ‘नया थिएटर’ में एक से बढ़कर एक छत्तीसगढ़ी कलाकार थे, जो बड़ी शिद्दत से छत्तीसगढ़ी गीत गाते थे उनके साथ मैं भी गाने लगती थी। मैं छोटी थी तो लालू बाबा, भुलवाराम, मदन लाल, मालाबाई ये सब मुझे बहुत प्यार करते थे, मेरा बचपन इनकी गोद में बीता। आठ वर्ष की उम्र से मेरी दिलचस्पी लोकगायन की ओर हुई। मैं भुलवाराम, लालू बाबा, मालाबाई के गानों को सुनकर बड़ी हुई। बड़ोदा से जब मैं स्नातक पूर्ण कर दिल्ली आयी तो मैंने शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत दोनों को जारी रखा। • नगीन दीदी आपकी रं गयात्रा कब प्रारं भ हुई?
dyk;k=k • आपने बताया कि आप नाटकों में गीत गाती थीं, तो आपने लोक संगीत की शिक्षा कहाँ से ली, इसके बारे में बताइए? हां... यह सवाल बड़ा मुश्किल है , पहली बात तो लोक संगीत की शिक्षा मैंने किसी परं परा या किसी के सानिध्य में रहकर नहीं प्राप्त की। मैं अपना गुरुकुल नया थियेटर को ही मानती हूँ। उस दौरान नया थिएटर में कई छत्तीसगढ़ी कलाकार आ चुके थे, जो बहुत ही सुरीला गाते थे। बचपन से ही मेरे कानों को लोक संगीत की धुन सुनने को मिली। मैं उनसे खूब गाने सुनती थी और नाटकों की रिहर्सल के दौरान हफ़्तों गाने का रियाज़ चलता था तो मैं भी उनके साथ गाने लग जाती। भुलवाराम की आवाज बहुत सुरीली और कर्णप्रिय थी। ऐसी आवाज की दरू बैठा व्यक्ति भी मोहित हो जाए। मालाबाई की आवाज़ के कायल सभी रं गप्रेमी थे। उस ज़माने में बिहार के आल्हा गीत की टे प मंगवाई थी बाबा ने, तो उसको भी हम खूब सुनते थे। हमारे कलाकारों की आवाज़ तनी, खूबसूरत, सुर, लय, ताल से सजी होती थी, की कहना ही क्या ? खासकर माला बाई की आवाज कि मैं कायल थी। इतनी ऊँची और सुरीली आवाज़ कि मैं क्या बताऊँ। हमारी गुरु सुलोचना जी ने जब माला बाई के गीत सुने, तो माला उनकी प्रिय गायिका हो गई। वो मुझसे बोलीं कि नगीन एक गांव की औरत, जिसे अक्षर का ज्ञान नहीं है , वह इतना अच्छा गा रही है , मैं तो कायल हो गई इसकी आवाज़ सुनकर। खैर इसके बाद सुलोचना जी ने मुझे लोक गायन जारी रखने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया। उन्होंने मुझसे कहा कि, “लोक से ही शास्त्रीय का निर्माण हुआ है जितनी भी रागरागनियां बनी हैं, वह सब लोक की ही दे न हैं”, इसलिए लोकगायन को कभी मत छोड़ना। इस तरह मैंने छत्तीसगढ़ी संगीत को मंच पर प्रस्तुत करना शुरू किया।
मेरी रं ग यात्रा महज़ तीन साल की उम्र से शुरू हो गई थी, उस समय में मैं आगरा बाज़ार नाटक में बंदर का अभिनय करती थी। उस समय तक हबीब साहब (पिताजी) विलायत से पढ़ कर स्वदे श आ गए थे। आने के बाद ‘नया थिएटर’ की स्थापना कर नाट्य मंचन करते थे, तो उस दौरान लालू राम, मदनलाल, जगमोहन, भुलवाराम आदि छत्तीसगढ़ी कलाकार मुझे बहुत मानते थे, सब मुझे बहुत प्यार करते थे, मैं उनके अभिनय को दे खकर खूब हँसती थी। क्योंकि वो सब व्यंग्य प्रधान नाट्य शैली के सुलझे हुए कलाकार थे। तो एक दिन रिहर्सल के दौरान मेरी माँ ने कहा कि बेबी बंदर हं सते नहीं है (माँ मुझे घर में बेबी कहकर पुकारती थी) l उस दिन से अभिनय करते समय मेरा हं सना बंद हुआ। उसके बाद जब मैं 6 साल की हुई तो बाबा किश्तियों का चपरासी नाटक निर्देशित कर रहे थे, जो बांग्लादे श युद्ध को लेकर था, तो उसमें मैंने एक गरीब लड़की का रोल किया। जिसके बारे में एक बड़े अखबार में • हम दे खते हैं कि लोक संगीत, गीत और रं गमंच की उस समय मेरी फोटो छापी गई थी। इसके बाद जब मैं विधिवत शिक्षा आपको अपने पिता श्री हबीब तनवीर बड़ी हुई तो बाबा ने मुझे नाटक में जोड़ दिया। सत्रह साल से प्राप्त हुई, तो दीदी नया थिएटर में रहकर आपने की उम्र से मुझे तनख़ाह भी मिलने लगी। कौन-कौन से नाटकों में काम किया? • ह बीब साहब के थिएटर कंपनी के अलावा और किन के साथ नाटकों में काम किया या कोई ऐसा अनुभव रहा हो ? हां, मैंने अनामिका हक्सर जी के थिएटर में दो नाटकों में काम किया। उसमें अभिनय भी किया और गीत भी गाए। उसके अलावा भी एक-दो संस्थानों में काम किया और स्नातक के दौरान कॉलेज में खूब नुक्कड़ नाटक भी किए।
जैसा कि मैंने आपको बताया कि तीन वर्ष की उम्र से मैंने आगरा बाज़ार में अभिनय शुरू किया। इसके बाद जब मेरी पढ़ाई स्नातक की पूर्ण हुई और मैं दिल्ली आ गई तो यहां आकर मैंने बाबा के नाटकों में छोटे -मोटे अभिनय करना और गीत गाने शुरू किये। वर्ष 1983 में मैंने बहादरु कलारिन नाटक में राजा के लड़के का रोल किया। इसकी प्रस्तुति विदे श में हुई। उसके बाद मैं चरणदास चोर में गीत गाती थी और बाद के वर्षों में फिर रानी का रोल भी मिला। लाला शोहरत राय, ससुराल, राजरक्त, हिरमा की
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अनुराग्यम ्
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जन ू 2021
dyk;k=k अमर कहानी, दे ख रहे हैं नैन आदि नाटकों में गाना गाती थी और यथासंभव अभिनय भी करती थी। बाबा के जो भी नाटक चल रहे थे उन सभी से मेरा बहुत लगाव था। दर्शकों का बेहद प्यार भी मिलता था। मजे की बात ये है कि जब हम विदे श जाते थे नाटक करने, तो जिन गोरों को हिंदी की समझ नही थी वो छत्तीसगढ़ी नाटक को इतनी उन्मुक्तता से दे खते थे कि कहना ही क्या और सबसे बड़ी बात ये कि जो कलाकार मंच पर होते थे वो भाव से एक-एक दृश्य स्पष्ट करते थे। अंत में उनकी तालियों की गड़गड़ाहट हम कलाकारों को ये बता दे ती थी कि उनको परू ा नाटक समझ में आ गया है । इसलिए कहते हैं कि प्रस्तुति किसी भाषा की मोहताज नहीं रही। • बहुत ही उम्दा जवाब मिला, आपसे मझ ु े यही आशा थी। दीदी आपने अपने जीवन काल में एक लंबा अनभ ु व नया थिएटर और अपने पिताजी के सन्निधाय में रहकर अर्जित किया है , हम जानना चाहते हैं कि आपको क्या कोई सम्मान भी मिला है ? मझ ु े राज्य सरकार या भारत सरकार से कोई सम्मान अभी तक नही मिला। हाँ.... मझ ु े याद आ रहा है पहला अवार्ड मझ ु े लेडी मैकबेथ नाटक में मिला जो मैंने कोलकाता में किया था l उस समय मझ ु े 33,000 का चेक प्राप्त हुआ, जो मेरा पहला सम्मान था। इसके बाद मझ ु े जनू ियर फ़ेलोशिप प्राप्त हुई। मैंने “नया थिएटर में संगीत” विषय पर अध्ययन किया। हबीब साहब और अनप े ू रं जन पांडय ने मेरी मदद की थी, इस विषय पर। • द ीदी आपने किन-किन नाटकों में संगीत दिया और हबीब साहब की संगीत में कैसे मदद करती थीं ? मैंने कभी अपने आप को निर्देशक नहीं माना और न कभी कोई नाटक निर्देशित किया l हाँ, ये ज़रूर हुआ कि पढ़ाई परू ी होने के बाद मैं संगीत में बाबा की मदद करती थी। वो मझ ु से शास्त्रीय गायन की धन ु सन ु ा करते थे। वर्ष 1978 में शाजापरु की शांति बाई नाटक के गीत की धन ु से मैंने बाबा की मदद की। उसके बाद साल 1985 में हिरमा की अमर कहानी नाटक से ये सिलसिला लगातार चलता रहा। कुछ नाटकों में मैंने संगीत दिया लेकिन वो नया थिएटर के नही बल्कि दस ु दीपाली ू री संस्थाओं के थे। मेरी गरु नाग जी ने मझ ु े कई धन ु सिखाई थीं। रईस लोगों के घरों में हाउस कॉन्सर्ट होता था, जैसे शीला दीक्षित जी या और भी बहुत से, तो उनके घर में पहले यह दस्तूर था कि हाउस कॉन्सर्ट मैं बड़े-बड़े गायकों (उस्तादों) को जाता था। उस्ताद गायकी करते थे और ु TOP बलाया वहां गिने चन ु े लोग होते थे। कई बार मैं भी ऐसे
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अनुराग्यम ्
समारोह का हिस्सा बनी। वहां बड़ी- बड़ी पार्टियां होती थीं। सब उत्सव मनाते थे, दावतें होती थी और अंत में इत्र लगाया जाता था। जिसका मतलब ये होता था कि अब आप यहां से तशरीफ़ ले जाएं। ऐसी परं परा दे खने को मिली जो अब लगभग लपु ्तप्राय सी हो गयी। हाँ, मैंने वर्ष 2009 में पीपली लाइव फ़िल्म में गीत गाया है , जो आमिर खान प्रोडक्शन के तले बनी थी। आमिर खान और किरण दोनों बहुत सल ु झे व्यक्तित्व के हैं। • दीदी पीपली लाइव फ़िल्म में कौन सा गीत आपने गाया और क्या अनभ ु व रहे फ़िल्म के ? पीपली लाइव फ़िल्म में “चोला माटी के..... “गीत गाया। जो फ़िल्म के अंत में दिखाया गया। इस दौरान आमिर खान और उनकी टीम से जड़ ु ने का मौका मिला। रिकॉर्डिंग सामान्य तरीके से हुई। बाद में जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो मझ गया। मेरी इच्छा ु े बॉम्बे में गायन के लिए बलाया ु आगे भी फ़िल्म में गीत गायन की थी, लेकिन किसी ने मझ नहीं l ु े बलाया ु • दीदी आपने शीला दीक्षित जी की बात की, तो हम ये जानना चाहते हैं कि आपके परिवार से उनके रिश्ते कैसे थे ? अरे शीला दीक्षित जी के साथ बड़े प्यारे अनभ ु व थे। मैं उनको आंटी कहती थी। उस समय हम साउथ एवेन्यू दिल्ली में रहते थे, तो मैं और उनके परिवार के बच्चे सब साथ में खेलते थे। उस समय वह राजनीति से नहीं जड ु ़ी थीं, उनके पति राजनीति में थे। बाबा उस समय राज्यसभा संसद सदस्य थे और शीला ऑन्टी के ससरु श्री उमाकांत दीक्षित भी राज्यसभा सांसद थे। उनके परिवार से बहुत गहरे संबंध थे। बाबा को शीला जी हबीब भाई कहती थीं। एक बार हबीब साहब का एक्सीडेंट के दौरान कमर की हड्डी टूट गई थी, उस समय हमें और बाबा को लंदन जाना था, तो एक्सीडेंट होने के बाद उन्होंने अपने बंगले में एक महीने बाबा को रखा, तब शीला दीक्षित जी दिल्ली की मख ु ्यमंत्री थीं और उन्होंने अपने पैसे से बाबा का इलाज करवाया, ऐसे रिश्ते थे। बाद में जब हबीब साहब 2009 में नेशनल हॉस्पिटल भोपाल में भर्ती थे, तब भी उन्होंने बाबा की बहुत मदद की। बड़ा अनठा ू रिश्ता था उनके परिवार के साथ। बाबा बताते थे कि पहले 1973 में जब ससरु ाल नाटक तैयार हो रहा था तो लालकृष्ण आडवाणी (एल. के. आडवाणी) अपने परिवार सहित रिहर्सल दे खने आते थे। मतलब दिल्ली में जब तक ग्प रु था, तो बहुत ही अच्छा था। बाद के वर्षों में जब बाबा को रं ग मंडल भारत भवन भोपाल का निदे शक बनाया गया तब हम भोपाल आ गए
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जन ू 2021 और तब से हम यहीं हैं। • दीदी आपके पास जीवन के कई पहलओ ु ं के अनभ ु व हैं, हम जानना चाहते है कि आपने अब तक किन-किन दे शों की यात्राएं की ? हमने कई दे शों की यात्रा की। वर्ष 1982 में जब चरणदास चोर नाटक को बावन मल ु ्कों के नाटकों में पहला परु स्कार मिला तब से ये सिलसिला रुका ही नही। कभी अपनी मंडली के साथ, तो कभी बाबा अम्मा के साथ जाना पड़ता था। इस तरह मैंने अब तक य.ू के.,लंदन,रूस,जर्मनी,अमेरिका और यरू ोप में कुछ दे शों के संगीत और रं गमंच को नज़दीक से दे खा।
dyk;k=k संस्थान में ऐसा माहौल था कि कलाकार अपने कमरे में बैठकर भोजन पका रहे हैं और वही से संवाद बोल रहे हैं। रं गकर्म के प्रति ये आस्था अब नगण्य है । शायद ही अब के संस्थान ऐसी तालीम दे ते हों। दस ु ू री बात आज के यवा बहुत ज़हीन और समझदार हैं। किसी भी भाव को आसानी से पकड़ लेते हैं। लेकिन अभिनय का स्तर और नाटकों के चयन में नीरसता दे खने को मिलती है । अब कलाकार और निर्देशक मेहनत नहीं करना चाहते। इसलिए आज के यवावर्ग से मेरा यही कहना है कि धैर्य और सक् ु ू ष्म विचार से सब कुछ हासिल किया जा सकता है । कोविड के इस दौर से घबराने की आवश्यकता नहीं है । कल का सरू ज बहुत हसीन होगा। हम इस दौर को योग अध्यात्म और आत्म चिंतन से खश ु नम ु ा बनाएं। नए नए कार्य घर पर ही किये जा सकते हैं।
• दीदी आप कई दे शों के यात्राओं की साक्षी रही हैं, यकीनन आपने उस दौर को नज़दीक से महसस ू किया • दीदी यदि अपनी तरफ से कुछ कहना चाहती हैं आप या ये कहें कि आपके मन में कुछ बताने की जिज्ञासा होगा। आज डिज़िटल का ज़माना आ गया है , ऊपर से रह गयी हो तो आप उसको बता सकती हैं ? महामारी का प्रकोप चरम पर है , तो हम जानना चाहते हैं कि आपके उस दौर के अनभ ु व और जो दौर अभी चल रहा है इसे कैसे दे खती है आप, विशेषकर रं गमंच शैलेन्द्र मेरे मन में क्या जिज्ञासा हो सकती है । बस यही कहना चाहती हूँ कि इस दौर की समाप्ति के बाद एक के दृष्टिकोण से ? खब ू सरू त सब ु ह होगी जिसका हम सभी को धैर्य के साथ वास्तव में यह समय बहुत ही मश्किल है । कोविड-19 के इंतज़ार करना होगा। तम ु ने बड़ी आत्मीयता से सारे सवाल ु रूप में यह बीमारी भयावहता लेकर आई है । ऐसे समय में पंछ ू े । मझ ु े बड़ी खश ु ी है कि मेरे जवाब से तम ु संतष्ट ु होंगे, इंसानों को जीवन बचाने की पड़ी है , तो कला की बात ही ऐसी मैं आशा करती हूं । क्या की जाए l लेकिन अध्यात्म कहता है कि इस दौर को संगीत, योग, मन और वाणी को पवित्र कर आसानी से शैलेन्द्र : बिल्कुल दीदी हम आपके जवाब से पर्ण ू रूपेण हैं। हमारे लिए ये बहुत ही सार्थक जानकारी है । काटा जा सकता है । महामारी से डरने की कोई चिंता नही संतष्ट ु है । परू ी प्रकृति हलचल में है । लेकिन धैर्य और सात्विक आपने हमें समय दिया और अपने अनभ ु व सांझा किए भाव से ऐसे समय को एकांत रहकर आसानी से जिया जा इसके लिए हम आपका हृदयतल से धन्यवाद दे ते हैं। मझ ु े सकता है । संकल्प से सिद्धि की प्राप्ति होती है । ऐसा नहीं लगता है बहुत सारी रोचक जानकारी इस साक्षात्कार से है कि 1970 और 1980 के दशक में ऐसी परिस्थितियां पाठकों तक पहुँचेगी। हम पन ु ः आपसे एक नए संस्करण नहीं आई। कई घटनाएं उस दौर में भी हुई, लेकिन सभी के साथ जड़ ु ेंगे, तब तक के लिए नमस्कार। ने हिम्मत से काम लिया उस समय सीमित संसाधन थे। और आज तो डिज़िटल का जमाना है । आज बीमारियों के बारे शैलेन्द्र : नगीन दीदी को एक बार पन ु ः शक्रिया ु में आसानी से पता लगाया जा सकता है और उसका उचित धन्यवाद ! नमस्ते ! उपचार किया जा सकता है । दनु िया विकसित हो रही है , नमस्ते! यह दौर अपनी जगह सही है और वो दौर अपनी जगह। नगीन जी : आपको भी शक्रिया ु हां, संस्कृति में आज बहुत बदलाव आया है पहले की अपेक्षा। पहले रं ग को कर्म और अनशा ु सन माना जाता था। एक कलाकार अपना परू ा जीवन एक संस्थान में बिता दे ता था। कितनी भी विषम परिस्थिति क्यों न आ जाए l चाहे जितना लड़ाई झगड़ा हो जाए, रियाज़ के दौरान कभी एहसास ही नहीं होने दे ते थे। नाटक की प्रस्तुति उतनी ही उम्दा होती थी। रात रातभर अभ्यास चलता। हमारे
शैलेन्द्र कुशवाहा रीवा, मध्यप्रदे श
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मध्यप्रदे श की आदिम जनजातियां डॉ. विजय चौरसिया गाड़ासरई जिला डिंडौरी, मध्यप्रदे श
मध्यप्रदे श में कई जनजातीय समुदाय हैं जनजातीय
समुदायों के साथ जुड़ा सामान्य तथ्य है कि वे प्राय: जंगलों में और विशिष्ट भू-प्रदे शों में रहते हैं। उनकी जीवन शैली में व्यापक रूप से एक प्रकार की समानता होती है । संस्कृति और परं परा के स्तर पर उनमें एक जैसी बातें दे खी जा सकती हैं परं तु उनमें कुछ भिन्नताएं भी हैं। मध्यप्रदे श में 47 जनजातियां पाई जाती हैं। मध्यप्रदे श की प्रमुख जनजातियां गोंड, मील, कोरकू बैगा, कोल, भारिया, सहरिया, अगरिया, पारधी, सौर, धानुक, बंजारा और उरांव प्रमुख हैं। • मध्यप्रदे श में गोंड जनजाति मध्यप्रदे श की दस ू री सबसे बड़ी और भारत का सबसे बड़ा जनजाति समूह है - गोंड l जनजाति की उत्पत्ति तेलुगु के कोंड शब्द से हुई है जिसका अर्थ पर्वत है । इस जनजाति में कई प्रकार से विवाह होते हैं। जैसे दध ू लौटाना, पठौनी, चढ़ विवाह, लमसेना विवाह प्रमुख हैं। इस जनजाति के प्रमुख त्यौहार बिदरी पूजा, हरियाली अमावस्या, नवाखानी, जवारा, मड़ई और छे र छे र छे रता त्यौहार प्रमुख हैं।
उत्पत्ति द्रविण भाषा के भील शब्द से हुई है जिसका अर्थ धनुष होता है । भीलों में धनुष बाण का अत्यधिक महत्व होता है इसलिए इस जनजाति का नामकरण भी इसी के आधार पर किया गया है । भील जनजाति के लोगों का निवास स्थल मुख्यतः झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बडवानो, रतलाम एवं खरगोन जिलों में है । इनकी कई उपजातियां हैं जैसे भील, मिलाला पट्टीलिया, बारे ला एवं राठिया है मील जनजाति के लोग अपने आपको एकलव्य एवं वाल्मीकि के वंशज मानते हैं। भील जनजाति के लोग भूरे से गहरे रं ग, मध्यम, सुगठित शरीर, बड़ी आँखें, चौड़ा माथा और घुंघराले बालों के रहते हैं। मील महिला एवं पुरूष अन्य जनजातियों की तुलना में अधिक सुंदर रहते हैं। इस जनजाति के लोग उँ चे क्षेत्रों में रहना पसंद करते हैं। भीलों के गाँव को पाल कहा जाता है जो दरू दरू रहते हैं। इनके घर लकड़ी, बांस आर छप्पर से बने रहते हैं। जो आकार में बड़े होते हैं।
इस जनजाति के प्रमुख दे वी दे वताओं में हिन्दू दे वी दे वताओं के साथ बड़ा दे व, ठाकुर दे व, दल ू ्हा दे व, बाघेश्वर दे व, सूरजदे व, धरती माता, रात माई आदि प्रमुख हैं। इस जनजाति के प्रमुख लोक नतृ ्य हैं - कहरवा, करमा, शैला रीना, भड़ौनी, सुआ, बिरहा, ददरिया l
भील पुरुष शरीर पर धोती और बंडी पहनते हैं एवं सिर पर साफा बाँधते हैं। महिलाएं घाघरा चोली और ओढ़नी पहनती हैं l महिला पुरुष दोनों में आभूषणों का प्रचलन है । महिलाएं अपने शरीर में गोदना गोदवाती हैं इस जनजाति में विधवा विवाह तथा वर वधू मूल्य प्रचलित है ।
गोंड जनजाति के लोगों का निवास स्थल बैतूल, होशंगाबाद, डिंडौरी, मंडला, छिं दवाड़ा,बालाघाट, अनूपपुर, उमरिया, शहडोल और सागर जिलों में है ।
भगोरिया हाट भीलों का आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व का मेला है जो फागुन माह में लगता है । इनके लोक नतृ ्यों में भगोरिया, गौरी, घम ू र नतृ ्य प्रसिद्ध हैं।
• मध्यप्रदे श में भील जनजाति
• मध्यप्रदे श में कोरकू जनजाति
भील मध्यप्रदे श की सबसे बड़ी जनजाति है इनकी जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार 4618068 है । भील शब्द की
कोरकू शब्द “कोर कू” के रूप में मिला हुआ है । कोर शब्द का अर्थ है मनषु ्य, कू बहुवचन लगने से अर्थ हो जाता
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dyk;k=k है मनुष्यों का समूह संसार की सभी जातियों में अपने वंश कुल गोत्र उत्पत्ति को लेकर अहम ् का भाव दे खने को मिलता है । सभी में अपनी महानता और श्रेष्ठता का भाव सुनने को मिलता है । लेकिन संभवत: ‘कोरकू’ जनजाति ही अकेली और विशिष्ट जनजाति है , जो अपना परिचय मनुष्यों के रूप में दे ती है । संसार में जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है ।
सुविधा के अनुसार त्यौहार मनाने का दिन तय करते हैं।
कोरकू जनजाति के गीत उनकी बोली में ‘सिरिज’ अर्थात गीत का पर्यायवाची शब्द कहलाते हैं। कोरकू सिरिज (गीत) विस्मय कौतुहल और निश्छलता के गीत हैं। इन गीतों में पूरे संसार पर प्रकृति आच्छादित है । पेड़-पौधे, वनस्पति,पशु, पक्षी, पानी, नदी, खेती, फसल, दाने इनकी सर्वप्रिय विषय वस्तु है । कोरकू जनजाति के लोग जिन कोरकू जनजाति के लोगों का निवास स्थल मुख्यत: पहाड़ों, जंगलों और दर्ग ु म भूगोल में रहते हैं वहाँ आमतौर सतपुड़ा पर्वतमाला क्षेत्र के खड़वा, हरदा, छिं दवाड़ा, बैतूल, पर शहर में रहने वाले लोग नहीं जाते पर अब इस होशंगाबाद के जिलों में हैं। जनजाति के लोग अपनी आजीविका की तलाश में अपने गाँव से बड़े शहरों और कस्बों की ओर उन्मुख हैं। कोरकू जनजाति के सारे गोत्र वनस्पति और प्रकृति पर आधारित हैं। कोई कासडा (मिट्टी) कोई ढिकार (मछली) यदि इस जनजाति के जीवन में हम हर्ष, आह्लाद और कोई पठारे (पहाड़) कोई जामुनकर (जामुन), कोई सुचार सुख तलाशना चाहें तो वह केवल नतृ ्य और गीतों में (हरा वृक्ष) आदि आदि हैं। इनका संपूर्ण जीवन प्रकृति से मिलेगा होरोरिया, डंडा, ढांडल, डोलार, फगनई, विवाह, जुड़ा है । मौसम भूख, गरीबी, अकाल इनके गीतों नतृ ्यों सिडोली, खचाउ मन, दे वखम, चिटकोरा, चिलोरी, चाचरी, और उत्सवों में कभी आड़े नहीं आते। इस जनजाति में झमटा लेंगी, मिमलाव इनके गीतों और नतृ ्यों के केवल कोई भी त्यौहार पंचांग-पोथी की घोषित तिथि और घड़ी नाम भर नहीं हैं। भोजन और श्रम के बाद इनके जीवन पल से नहीं होता, बल्कि गाँव की जातीय पंचायत सबकी का सर्वाधिक अहम ् हिस्सा भी है । इस जनजाति में बाल विवाह प्रथा नहीं है । • मध्यप्रदे श में बैगा जनजाति बैगा छोटा नागपुर की आदिम जनजाति भुईया की मध्यप्रदे शीय शाखा है जिसे भूमिया बैगा कहा जाने लगा। सर्वप्रथम बैगाओं ने ही छोटा नागपुर से छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया लेकिन बाद में यह जनजाति मंडला, डिंडौरी, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, राजनांद गांव एवं बालाघाट के दर्ग ु म वनों में निवास करने लगी l बैगा जनजाति के लोग मैकल पर्वत की गहन गिरी कंदराओं घाटियों तथा नर्मदा नदी के किनारे ही निवास करते हैं l रीवा एवं जबलपुर जिलों में भी कहीं कहीं दे खे जा सकते हैं l हिंडौरी जिले और बिलासपुर जिले के बीच का भाग ही बैगा चक कहलाता हैं l बैगाओं की मुख्य सात शाखाएं इस प्रकार हैं- भूमिया, बिंझवार, नरौटिया या नाहर, मरौतिया, मैना, कोडवान, मुडिया या मुरिया l
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सन 1989 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या 248,949 थी। इनकी त्वचा का रं ग प्राय: गहरे काले से लेकर हल्का बादामी तक रहता है । इनकी नाक चौड़ी और होंठ मोटे होते हैं l बैगा पुरुष के बाल जीवन में एक बार ही जन्म के समय कटते हैं जिसे बैगा झझालर कहते हैं l जन्म से लेकर मतृ ्यु तक ये अपने बाल कभी नहीं काटते। इनके बाल लंबे गहरे काले और घुंघराले होते है ये अपने बालों में जूड़ा बांधते हैं। महिलाओं के बाल गहरे काले और लंबे होते हैं। Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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बैगाओं से लगी हुई हर जगह गोंडों की बस्तियां हैं पर गोंड़ इनकी तुलना में बहुत सभ्य हैं l बैगा मुंडा वंश के हैं और गोंड द्रविण वंश के हैं, तब भी बैगाओं और गोंड में गहरे संबंध हैं I वे स्वयं को गोंड़ों का ही एक अंश मानते हैं इस संबंध में उनकी अनेक रोचक लोक कथाएं एवं किंवदन्तियां भी प्रचलित हैं l इसी प्रकार गोंड़ों में भी अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं l दोनों एक दस ू रे को भाई मानते हैं दोनों में शादी विवाह तो नहीं होते पर पुरुषों में आपस में खान-पान खूब चलता है l गोंड के सारे धार्मिक कार्य बैगा कराते हैं इसलिये बैगा उनके धर्म गुरु हैं परं तु जो भी हो अधिकांश विद्वान इन्हें द्रविणयन परिवार का ही मानते हैं। बैगा जनजाति के लोग अपने स्वभाव के कारण ऊँचे स्थानों एवं घने जंगलों में ही बसना पसंद करते हैं। बैगा समूह में रहते हैं। आठ दस घरों का टोला इनका पूरा गाँव होता है । जिस तरह आज बैगाओं की बसाहट है , वे पहले इस तरह नहीं बसते थे। आज से बीस पच्चीस साल की बसाहट और आज की बसाहट में बहुत अंतर आ गया है । पहले बैगाओं का टोला एक गोल घेरे में बसता था, बीच में मैदान होता था मैदान के चारों ओर दो चार मकान बने होते थे। सभी मकानों का मँह ु मैदान की तरफ रहता था। मकानों के अंतर को लकड़ी की बागड़ से घेर दिया जाता था। मकानों तक जाने के लिए एक ही रास्ता रहता था। मकानों के पीछे मैदान में घर के बच्चे खेल रहे हों तो अकेली आजी घर के सामने बैठी सबकी रखवाली कर सकती थी। इस तरह पहले की से सलाह लेते हैं। इस समाज में माँ बहिन, नानी, दादी बैगा बस्तियां ज़्यादा सुरक्षित रहती थीं। वही सम्मान पाती हैं, जो अन्य सभ्य समाज में होता है । बैगा जनजाति में वधू मूल्य की जगह वर मूल्य की प्रथा घर के कामों के अलावा कृषि कार्यों में स्त्री परु ु ष के साथ आज भी यथावत कायम है । वर पक्ष के लोग कन्या पक्ष बराबर हाथ बंटाती है । महिलाएं शारीरिक साज सज्जा पर को विवाह के समय यथा शक्ति अनाज, ज़मीन रुपया तथा विशेष ध्यान दे ती हैं। गहनों के साथ वे अपने शरीर में शराब दे ते हैं, जिसका कारण है कि वधु घर में आकर वर गोदना भी गद ु वाती हैं। इस जनजाति के लोग संगीत के पक्ष वालों के घर के दै निक कार्यों और खेती-बाड़ी में जीवन शौकीन रहते हैं। इस जनजाति के लोग अत्यंत नतृ ्य प्रेमी भर सहयोग दे ती है । इस प्रथा में अभी बदलाव दे खने को होते हैं। करमा नतृ ्य इनका प्रिय नतृ ्य है । नहीं मिला। परं तु कहीं कहीं जो लड़के पढ़ लिखकर नौकरी करने लगे हैं। वे वधु मूल्य मांगने लगे हैं। संपूर्ण विवाह • मध्यप्रदे श में कोल जनजाति में शराब का खर्च ज़्यादा आता है , क्योंकी प्रत्येक नैग में यह मध्यप्रदे श की दस शराब ही परोसी जाती है l ू री सबसे बड़ी जनजाति है । इसकी 22 उपशाखाएँ हैं। कोल जनजाति के लोगों का निवास स्थल महिलाओं का अनादर पूरे बैगा समाज का अनादर माना मख ु ्यतः रीवा, सतना, जबलपरु , सीधी, डिडौरी, अनप ू परु जाता है । ऊपर से रूढ़िग्रस्त दिखने वाला आदिम बैगा एवं शहडोल जिलों में पाया जाता है । ये मध्यप्रदे श के समाज आंतरिक रूप से नारी को कई प्रकार की स्वायत्तता विंध्य कैमरू श्रेणियों के मल ू निवासी हैं। कोल मड ु ़ा समह ू की एक प र ानी जनजाति है । यह ऑस्ट्रिक परिवार सम ह स्वछं दता एवं स्वतंत्रता प्रदान करता है । कोई भी युवती अपने ु ू से सं ब ध ं ित जनजाति है , जिसका म ल स्थान मध्यप्रदे श मनपसंद युवक से विवाह कर सकती है , विवाह विच्छे द ू क े रीवा जिले का क राली क्षेत्र है । इस जनजाति के लोग कर सकती है । बैगा समाज में सामाजिक दशु ्चरित्रता नाम ु मात्र को नहीं है । रिश्ते तय करते समय पुरुष महिलाओं Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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काले रं ग के मध्यम कद, होंठ मोटे , माथा उभरा हुआ एवं जाते हैं। छिं दवाड़ा जिला में तो भारिया के अलावा गोंड बाल काले होते हैं। भी पाए जाते हैं। भारिया प्रदे श की महत्वपूर्ण जनजाति है - प्राचीनता की दृष्टि से, संख्या में कम होने की दृष्टि इस जनजाति के लोग अपने गाँव अधिकतर खुले स्थानों से और पातालकोट जैसे विलक्षण भू-क्षेत्र में रहने की दृष्टि पर बसाते हैं तथा घर मिट्टी के बने होते हैं, जिनकी से, परं तु मारिया पातालकोट के आदि निवासी नहीं माने छत घास से बनाई जाती है । इस जनजाति के लोग अन्य जाते l इनको द्रविण प्रजाति का बताया जाता है । इनको जनजातियों की तुलना में शरीर में पूरे वस्त्र धारण करते गोंड जनजाति से भी जोड़कर दे खा जाता है । हैं l महिलाएं शारीरिक साज सज्जा पर विशेष ध्यान दे ती हैं l गहनों के साथ वे अपने शरीर में गोदना भी गुदवाती • मध्यप्रदे श में भारिया जनजाति हैं I इस जनजाति के लोग संगीत के शौकीन रहते हैं। पातालकोट में निवास करने वाली भारिया जनजाति की कोल समाज पितस ृ त्तात्मक एवं एवं विभिन्न गोत्री हैं। गणना विशेष पिछड़े समुदाय के रूप में की जाती है , इनमें टोटम का प्रचलन नहीं है । इस जनजाति में दो क्योंकी इनकी जनसंख्या बहुत कम है । मात्र ढाई से उपवर्ग होते हैं रौतिया और रौतेले। इसके अलावा अन्य तीन हज़ार के बीच और इनका निवास स्थान पातालकोट उपवर्ग दशेरा, ठाकुरिया, कागबरियां हैं। पति की मतृ ्यु पर सचमुच विलक्षण है । इनकी उत्पत्ति संबंधी मिथकथा के विधवा अथवा तलाकशुदा स्त्री से विवाह की प्रथा है । अनुसार अर्जुन ने भर्स नामक घास को मंत्र शक्तियों से भारियायों में बदल दिया। उन भारियायों ने महाभारत के कोल एक कला संस्कृति सम्पन्न जनजाति है , कोल दहका युद्ध में भाग लिया था। इसलिए भारिया अपने आप को उनका प्रसिद्ध आदिम नतृ ्य है । इस जनजाति के लोग पांडुवंशी कहते हैं। भारिया जनजाति की महिलाओं में सोने खेतीहर मजदरू होते हैं l हिन्दुओं के संपर्क में रहने के के गहनों का रिवाज़ नहीं के बराबर है । इस जनजाति की कारण इस जनजाति के लोग हिंद ू दे वी दे वताओं की पूजा महिलाएं अपने शरीर पर गुदना गुदवाती हैं। गले में चाँदी करते हैं। इसके अलावा ठाकुर दे व बघेसुर दे व,भैरव बाबा, के सिक्कों का हार और सांकल, कमर में कमरपेट या शारदा माता, मरही माता आदि दे वी दे वताओं की अराधना करधोना विशेष गहने होते हैं। इसी प्रकार कानों में बाली, भी करते हैं। इस जनजाति में फसलों की रक्षा करने के नाक में लोंग, बाँहों में बहुटा, कलाईया में कंगना, पैरों में लिये सूर्य, चंद्रमा तथा पवन की आराधना की जाती है । तोड़र और पैरों की अंगुलियों में चुटकी पहनती हैं। यह लोग जाद ू टोना पर विश्वास करते हैं। भारिया जनजाति इनका मुख्य भोजन कोदों, कुटकी, धान, सांवा, मक्का के लोग अधिकतर छिं दवाड़ा एवं जबलपुर जिले में पाए ज्वार और चावल है । ये इन अन्नों से एक प्रकार की खिचड़ी या दलिया बनाते हैं जिसे पेज कहते हैं। मक्का,ज्वार और गेहूँ की रोटी भी इनको पसंद है । ये लोग आम के गुठली के बीजों को पीसकर उसकी रोटी बनाकर खाते हैं। भारिया जनजाति के लोगों का निवास स्थल मुख्यतः जबलपुर एवं छिं दवाड़ा के जिलों में पाया जाता है l • मध्यप्रदे श में सहरिया जनजाति मध्यप्रदे श में सहरिया जनजाति का विस्तार लगभग दो दर्जन जिलों में है । ग्वालियर संभाग में इनका घनत्व सर्वाधिक है । सहरिया जनजाति के लोगों का निवास स्थल मुख्यत: शिवपुरी, गुना, श्योपुर, दतिया, सागर, भोपाल, पन्ना, ग्वालियर, मुरैना, भिंड, विदिशा, रायसेन, सीहोर जिलों एवं बुदेलखंड क्षेत्र के जिलों में निवास करते हैं। मध्यप्रदे श में सहरिया जनजाति की कुल आबादी 2001 की जनगणना के अनुसार 4,50,217 है । सहरिया जहाँ भी बसते हैं, उस बसाहट को सहराना कहा जाता है । सहरियों
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का सनातन स्वभाव किसी गाँव या शहर के किनारे प्रथक लोहगड़ ु ी राजा ज्वालामख ु ी, कोयलासरु से संबंधित अनेकों समूह में निवास करने का है । इनके आवासों की सामूहिक मिथक हैं l आकृति कुछ इस प्रकार होती है कि कई परिवारों की अगरिया जनजाति के लोग मध्यप्रदे श के लोहा पिघलाने हलचल सबके सामने होती है । वाले तथा लोहार हैं l मैकल पर्वत की श्रृंखलाओं में वे अंग्रेजी के यू आकार में एक दस ु ्यत: मध्यप्रदे श के डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, दमोह, ू रे से सटकर अपना घर मख बनाते हैं, जिनके मिट्टी और गोबर से लिपे पुते आंगन रीवा, सागर, सिवनी, जबलपरु जिलों में निवास करते हैं। इसके अलावा दे श के भंडारा जिला, बिलासपरु जिला, एक दस ू रे के आंगनों से जुड़े रहते हैं। चाँद जिला, दर्ग ु जिला, जशपरु जिला, खैरागढ़ रियासत, भीलों की भांति सहरियायों को उनके रूप- रं ग के आधार कांकेर जिला, कोरिया जिला, मिर्ज़ापरु जिला, रायगढ़ पर प ृथक से पहचानना कठिन है । वे सामान्य नाक-नक्श, जिला रायपरु जिला, सरगज ु ा जिला, मेनपाट का पठार, औसत शरीर और प्राय: गहरे सांवले रं ग के कारण दस ू रे राँची तथा पलामू जिला में भी पाए जाते हैं। साधारण मजदरू और किसानों से भिन्न नज़र नहीं आते। अगरिया जनजाति के लोग मध्यम कद-काठी, बलिष्ठ, भरा-परू ा तथा बलशाली शरीर, चिकने लहरियादार बालों सहरिया जनजाति में उनकी उत्पत्ति को लेकर तरह तरह एवं काली भरू ी चमकती रं गत वाली त्वचा, चौड़ा सिर और के मिथक प्रचलित हैं। इनमें एक धारणा यह भी है कि वे भारी नाक लिए बहुत कुछ लोहारों की तरह लगते हैं। वे महर्षि वाल्मीकि के वंशज हैं। वे गर्व से खुद को वाल्मीकि अपने बालों को जड ू ़े के रूप में सिर के बायीं ओर बांधते की संतान कहते हैं। माना जाता है कि वाल्मीकि भील हैं। अगरिया अधिकतर बैगा और घोबा जनजाती के गाँवों जाति के थे, सहरिया स्वयं को भीलों का ही सहोदर मानते में रहते हैं। ज़्यादातर ये लोग अपना मकान गोंड नमन ू े के अनस हैं। ु ार बनाते हैं। प्रत्येक स्थान पर एक चारदिवारी के अंदर तीन चार छोटी झोपड़ियों के पीछे या थोड़ी दरू ी पर लोहा तैयार करने की भट्टी लगी रहती है l • अगरिया अगरिया शब्द का संभवत: अर्थ है आग में या आग के साथ इनके रिश्ते नाते के नियमवर्जनाएँ वसीयत के कानन ू , काम करने वाले लोग अगरिया वास्तव में अग्नि के सेवक गर्भावस्था, माहवारी के नियम, जन्म संस्कार लगभग वैसे हैं। इनके कुल दे वता अग्यासुर हैं। इनके पास अग्यासुर, ही हैं, जैसे गोंडों के होते हैं। अगरिया शादियों में सात मांवर वाली शादियाँ होती हैं। अगरिया लोग बैगाओं की तरह ही तथा गोंड़ों के विपरीत शादियों के समय परधोनी करते हैं और एक विवाह हाथी बनाते हैं। गोंड़ों की तरह अगरियों में भी विवाह के समय दल ू ्हा दल ु ्हन को हिन्दी खजरू का मक ु ु ट पहनाया जाता है । अगरिया जनजाति की औरतें नाक में लोंग नहीं पहनती तथा अपनी मांग में सिंदरू भी नहीं भरती हैं। वे कांच की चडू ़ियां भी नहीं पहनतीं l महिलाएं अपनी माहवारी के नियम कायदों का बड़ी कड़ाई से पालन करती हैं। वे नतृ ्य समारोहों एवं अन्य उत्सवों पर बैगा जनजाति में प्रचलित कपड़े पहनती हैं। अगरियों को अपने वर्गों या गोत्रों के नाम नहीं मालम ू हैं तथा गोत्र संबंधी रीति रिवाज़ों का पालन नहीं करते है । मत ृ कों को सामान्यतः जलाया नहीं जाता उनको दफ़नाया जाता है । अगरिया जनजाति के लोग बड़े दे व की पज ू ा नहीं करते। ----x---TOP
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संस्मरण : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल
- डॉ. ध्रुव तिवारी कला शिक्षक, रायपुर, छत्तीसगढ़ अप्रैल 1993 एमएफए की पढ़ाई समाप्त करते ही मझ ु े भोपाल स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल में वरिष्ठ कलाकार के पद पर अस्थाई पदभार ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हुआ। उस समय डायरे क्टर श्री विकास जी और चेयरमैन श्री जे स्वामीनाथन की दे खरे ख में संग्रहालय उत्तरोत्तर अपने मूल स्वरूप में आ रहा था।
मेरे वरिष्ठ कलाकार वहां स्वर्गीय आनंद टहनगुरिया पहले से ही वहां कलाकार के पद पर कार्यरत थे, जिनके सहयोग से यह अवसर मुझे मिला था । 200 एकड़ का क्षेत्रफल और तीन पहाड़ियों के बीच में इस मुक्ताकाशी कला वीथिका का प्रारूप तैयार किया गया था जिसमें शैल गुफाएं और गुफा चित्र बहुत महत्वपर्ण ू है जो पंचमढ़ी तक सिलसिलेवार विद्यमान है । पूरे भारतवर्ष में यह संग्रहालय अद्वितीय और एकमात्र है जिसे संस्कृति विभाग भारत सरकार द्वारा मध्यप्रदे श के भोपाल शहर के श्यामला हिल्स पर स्थापित करने का निर्णय 1985 में लिया
गया था। मल ू रूप से अपने इस प्रारूप के कारण ये संग्रहालय ,मानव संग्रहालय कहलाया क्योंकि भारत दे श के हर राज्य की सभ्यता संस्कृति और रहन-सहन को यहाँ जीवंत प्रदर्शित करना था इसलिए इससे किसी भी प्रांत के गांव से जनजीवन को उसी के अनस ु ार उन्हीं के साजो- सामान जैसे लकड़ी ,बांस मिट्टी, रोजमर्रा की चीजें, पेड़ -पौधे आदि समस्त सामग्री उसी जगह से लाई गई और उसे संग्रहालय के प्रांगण में स्थापित किया गया फिर वहां रहने वाले भी लाए गए तो जीवंत वहां रह रहे हैं और अपनी संस्कृति व सभ्यता के अनरू ु प वहां जीवन जी रहे हैं । पूरे भारत दे श की संस्कृति को अगर हमें संक्षेप में दे खना है तो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय दे खे बिना आपकी संग्रहालय दर्शन की यात्रा पूरी नहीं कहलाई जाएगी । संग्रहालय आदि मानव से लेकर अभी तक की भू दर्शनीय, प्रमाण सहित खुले आसमान के नीचे दे खने को प्रदर्शित है । संग्रहालय जो मानवीय सभ्यता की गाथा खद ु कहता है भारतीय सभ्यता और संस्कृति की उच्चतम उदाहरण दे खने को यहां मिमते है । खुले प्रांगण में लगभग 8 तथा अंतरं ग में 12 विथिकाओं में अलग-अलग विषयों को प्रदर्शित किया गया है । आप की जानकारी, शिक्षा व आनंद के अभिभूत के दृष्टिकोण से इसे विस्तार दिया गया है । विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ संग्रहालय में होती रहती हैं जैसे डिबेट, रिसर्च ,कलाकारों के लिए वर्कशॉप ,फिल्मेकिंग ,डांस ,ड्रामा प्रांतीय खाना ,हाट बाजार आदि। मेरे जीवन में अद्भुत बदलाव के लिए वहां किए गए काम के 6 महीने मेरे जीवन में बहुत बड़ा अनुभव और परिवर्तन का रहा विश्व स्तर की कार्यशैली मुझे वहां सीखने को मिली जो आज भी मुझे आगे बढ़ने में सहायक है । -----x-----
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dyk;k=k ग़ज़ल - आप के प्यार में हम सँवर जाएंगे आप के प्यार में हम सँवर जाएंगे । दे ख ऐसे न हमको बिखर जाएंगे ।। नाम लेके ज़ुबाँ पर तुम्हारा प्रिये। हम हृदय में तुम्हारे उतर जाएंगे ।। मिल गयी गर इजाज़त मुझे आपकी। आप ही के जिगर में ठहर जाएंगे ।।
जीवन वायु जब तक है , तब तक जग में प्राण। जीव बिना वसुंधरा, लगती है सुनसान।। वृक्ष दे ता शुद्ध हवा, और बचाता जान।
मौत हर रोज दे रहा, फिर भी क्यों इंसान।। हरि भरी बनाती धरा, है खिलता संसार।
बेवजह हम को, ऐसे न दे खा करो। इश्क़ में हम तुम्हारे निखर जाएंगे ।।
हमें सब कुछ मिलता है , तुमसे पालनहार।।
दे ख कर गर नज़र फेर ली आपने। है ख़ुदा की कसम हम गुज़र जाएंगे ।।
वृक्षों के संरक्षण से, होगी भू गुलज़ार।।
मान लो बात मेरी अमित आज तुम। बन के दरिया समंदर उतर जाएंगे ।।
अमिताभ पाण्डेय गोरखपुर, उत्तर प्रदे श
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दोहे - पर्यावरण
अनुराग्यम ्
वृक्षारोपण हम करें , और लाये बहार।
अधूरी सारी दनु िया, है अधूरा विज्ञान।
सारा जीव सांस बिना, जैसे है बेजान।।
कुन्दन कंु ज पूर्णिया, बिहार
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दल ु दल ु घोड़ी लोक नर्तक
मुझे याद
है बचपन में पिताजी का हाथ थामे मेले की सैर जहाँ पर तरह तरह के खेल-तमाशे दिखाए जाते थे, उसी मेले की भीड़ में कहीं किनारे विदष ू क का रूप धरे काठ की घोड़ी पहने एक कलाकार ठे ठ दे हाती लोक गीतों की मस्ती में सबके मन को मोहित कर रहा होता था, उसके गीतों में मिट्टी की सोंधी सुगंध और बघेलखंड के तीज त्योहारों की भरपूर मिठास साफ महसूस की जा सकती थी l
सन 2000 में रीवा शहर में प्रयास रं ग समूह के द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य कार्यशाला के दौरान दल ु दल ु घोड़ी लोक गुरु श्री साजन काकू से मिलना मेरे लिए इस विधा को पुनर्जीवित करने का वरदान साबित हुआ l मैंने विधिवत दल ु दल ु घोड़ी लोक नतृ ्य की बारीकियां सीखी और उन्हीं के साथ कई मंचों पर प्रस्तुतियां भी दीं l शुरुआत के दिनों में जब मैंने दल ु दल ु घोड़ी नचाना शुरू किया तो मुझे भी तिरस्कार और अपमानजनक शब्दों को सुनना पड़ा, शायद इसलिए कि मैं वर्तमान समय के फैशन से बहुत पीछे चल रहा था और मत ृ हो रही लोक कला को जीवित रखने की कोशिश कर रहा था कुछ लोगों ने तो मुझे “बाम्हन नाचय गोड़िन दे खय” जैसे व्यंग्य भी बोले, पर मुझे उन्हीं लोगों से प्रशंसा पाने की जिद हो बैठी और मैंने अपना अभ्यास और अधिक करना शुरू कर दिया l
गीतों के मध्य में वह अपने दर्शकों से कुछ हँसीठिठोली के साथ संवाद भी किया करता था और अपनी प्रस्तुति के दौरान समसामयिक समस्याओं से भी रूबरू कराता रहता था l उसकी इस तमाशबीन प्रतिभा को दे खकर सभी मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे और प्रोत्साहन के रूप में कुछ पैसे उसकी ओर फेंक दिए जाते थे l फेंके हुए पैसे को माथे से लगाकर वह कलाकार दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करता था l मुझे उसका यही निश्चल समय के साथ मैंने अपनी प्रस्तुतियां प्रदे श और भाव बचपन से ही प्रभावित करता रहा l दे श के कई गौरवपूर्ण मंचों में दीं और अब निरं तर अपनी कहीं-कहीं किसी गांव दे हात के वैवाहिक कार्यक्रमों नई पीढ़ी को इस विलुप्त हो रही दल ु दल ु घोड़ी लोक नतृ ्य में बारातियों का मनोरं जन करने के लिए दल ु दल ु घोड़ी से परिचित करा रहा हूँ, साथ ही प्रशिक्षण के माध्यम से दिखाई पड़ती थी I कलाकार दल ू ्हे के आगे-आगे ऐसे खुश नए नए कलाकारों को भी तैयार कर मंच प्रदान कर रहा हूँ होकर नाचता, मानो उसी की शादी हो रही हो उसका और आशा करता हूँ कि आने वाले समय में दल ु दल ु घोड़ी लोकनतृ ्य की लोककला को अंतराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान भोलापन मेरे मन के भीतर तक उतर जाता l दिला पाऊंगा l समय बीतता गया और समय के साथ यह अल्हड़ कलाकार अपनी कला के साथ न जाने कहाँ खो गए l मेरी उत्सुकता ने इन्हें खोजने का प्रयत्न भी किया, तो पता चला सामाजिक उदासीनता और कान फोड़ू डीजे के TOP प्रचलन से कलाकार अब मज़दरू ी करने शहरों की राजमणि तिवारी तरफ पलायन कर चुके थे, उन्हें अब इस कला के रीवा, मध्यप्रदे श माध्यम से परिवार चलाना दभ ू र जान पड़ता है l Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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मध्यप्रदे श जनजातीय संग्रहालय
- विनय उपाध्याय, मध्यप्रदे श स्मृतियों
का यह जगमग संसार जब जंगलों से गुज़रता अपने बसेरे की शक्ल लेता है तो ज़र्रे-ज़र्रे से कहानियाँ बोल पड़ती हैं। वनवासी जीवन की ऐसी ही दर्ल ु भ और बेमिसाल दास्तानों का घर है - मध्यप्रदे श जनजातीय संग्रहालय। सात बरस पहले 6 जून को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने संस्कृति के इस सदन की दे हरी पर मंगल दीप जलाकर यह अनमोल सौगात दे श को सौंपी थी l इसके स्थापत्य सौंदर्य और आदिम आवाज़ों की ख़ामोश पुकारों ने कुछ इस तरह सम्मोहित किया कि हर दिन यह जगह आगंतुकों से गुलज़ार रहने लगी। भोपाल की श्यामला पहाड़ी की सख़्त चट्टानों पर एक सुंदर कविता की तरह उभर आई l इस इमारत में गोंड, बैगा, भील कोरकू और सहरिया जैसी जनजातीय बिरादरियाँ अपने पुरखों, दे वताओं, मिथकों, गाथाओं और मनौतियों की विरासत थामे परं परा का गौरव गा रही हैं। श्रद्धा, आस्था और समर्पण के बीच सांसें भरती एक सामुदायिक इच्छाशक्ति है जो अपने परिवेश और प्रकृति के प्रति वफ़ादारी का सबक दे ती है । जन्म से लेकर इस दनु ियाए-फ़ानी को अलविदा कहने तक ये सबक और सौगंध पूरे होते हैं।
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अमत ृ को पाकर अपनी धरोहर का सच्चा पहरे दार रहा है । इसी रं ग-रौशनी से उतरकर कुछ सवाल आधुनिकता की चौखट पर खड़े होते हैं कि अपनी धरती, अपने पर्यावरणपरिवेश और जीवन के प्रति सच्ची वफ़ादारी हमारे समय में कहाँ, कितनी बाकी है ? साधक-ऋषियों ने जिस अद्वैत की अवधारणा में परमतत्व को खोजने का उपदे श दिया, जंगलों में रहने वाले समुदाय उसके जीवंत साक्ष्य बन गये। यहाँ हर गतिविधि, हर क्रियाकलाप और अनुष्ठान पंच तत्वों के उजास से भरे हैं कि हमारा होना भूमि, पानी, आसमान, आग और हवा होना है । यहाँ कुछ भी बेमानी नहीं है । मिट्टी का छोटा सा क़तरा और घास का तिनका भी अपने मक़सद के साथ जीवन का अभिन्न हिस्सा है । आंगन-दे हरी, दीवार, पर जो रं ग हैं और जो छटाएँ बिखरी हैं, प्रकृति ही उनका स्रोत है ।
आस्था का हर आयाम यहाँ मिथकों से जुड़ा है । ये मिथक पूर्वजों की कथा कहते हैं, जो एक सनातन को आत्मसात करने और उसे विरासत की तरह आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की गवाही दे ते हैं... निखर आयी सी यह सुंदर दनु िया किसी मठ या गुरूकुल से पाए उपदे श की हमारा शहरी मन इसे माने या न माने, लेकिन प्रेरणा नहीं है । प्रकृति के पन्नों पर लिखे सुनहरे पाठ हैं जिसे अहोभाव से जस का तस जीवन में उतारने का मौन जीवन की मग ृ त ृष्णा के असल सच को सदियों पहले भाँप चुका जंगली समुदाय आदिम सख ु के स्वीकार है । Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com अनुराग्यम ्
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यहाँ परं परा में जीवन अपनी आँखें खोलता है । वो परं परा जो मनोरोगों से मुक्ति दिलाते गोंडजनों के पागल दे व, पशु-प्रेम का संदेश दे ती माडिया जनों की टं टल दे वी, विजय पथ पर ले जाते बस्तर के दशहरा-रथ, अठारह वाद्यों को ईज़ाद करने वाले लिंगों, दे वताओं और सामाजिक जीवन का बेहतर ताना-बाना रचने वाली घोटुल बिरादरी तक सामूहिकता और सौहार्द का पैगाम दे ती है । स्वस्थ जीवन के लिए उदार होती शीतला माँ का वास भी यहीं है । यहाँ प्रकृति के खुले आंगन में खेलता बचपन, जय-पराजय की किसी होड़ से परे अंततः मैत्री की बेजोड़ मिसाल बन जाता है । विवाह के सुंदर मंडप में ब्रह्माण्ड की कल्पना कर सकता है । यहाँ बासिन कन्या समूचे जीवन पर आच्छादित हो सकती है । वहाँ बड़ा दे व वृक्ष से उतरकर बाने की तान पर स्मृतियों को पुकार सकता है l यहाँ नाद की स्वर लहरियाँ किसी वृक्ष पर आसरा ढूँढ लेती है । पुरखे रक्त की धार बनकर धरती पर प्रकट हो सकते हैं। पूर्वजों की शक्तियाँ अश्व के प्रतीकों में इच्छाओं की तरह रह सकती हैं। दीवार पर पिठौरा की आकृतियों में जल-दे वता इन्द्र की आहट सुनी जा सकती है । यहाँ जो है , समय में है , आज और अभी के जीवन में है , चलते रहने में है । एक ऐसी गति, जिसकी गंतव्य में नहीं, यात्रा में ही सार्थकता है । उसका सारा पुरूषार्थ,
सारी प्रार्थनाएँ इस धरती और प्रकृति के प्रति उसका हार्दिक आभार है । आदिम स्मृतियों का यह बसेरा एक ऐसे ही सफ़र पर चल निकलने का आमंत्रण है , जहाँ, हम अपनी ही धड़कनों को सुनते हुए अनंत को पुकार सकते हैं। कुदरत की इसी नेमत को निहारती आँखों में जागता रहा है - जीवन का सपना। कुछ सुरमई इच्छाएँ समय की थाप पर थिरकती हैं और उमंगों की उं गली थामकर समय में अपने होने का उत्सव मनाती हैं। आसमान और धरती के फ़ासले सिमट जाते हैं। सूरज, चाँद, सितारे , नदी-समंदर, जंगल-पर्वत और हवाओं की हमजोली में यहाँ आपसदारी की आहटें अपना ठौर तलाशती हैं। यहाँ जिंदगी की मुंडरे पर रखा एक चिराग़ है , वक्त के हर दौर में जिसकी मुस्कु राती रौशनी इंसानियत का पैगाम दे ती रही है । इसी उजास से हरा-भरा एक इंसानी ज़ीवन अपनी मौलिकता के छं द रचता है और कुदरत की दी हुई धरोहर पर निहाल हो उठता है l
विनय उपाध्याय लेखक, वरिष्ठ कला समीक्षक, मध्यप्रदे श
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dyk;k=k विश्व योग दिवस विशेष
वृक्षासन
योग
अब आते हैं पाइन्ट न. 2 पर, इस समय शरीर एक बाहरी जटिल बीमारी से लड़ रहा होता है । जटिल इसलिए है क्योंकि इसका कोई सशक्त उपचार अभी तक सामने नहीं आया हैं, जिसके कारण पूरी मनुष्य जाति में भय का वातावरण पनप रहा है जो घबराहट पैदा कर दे ता है l आगे चलकर यही भय मनुष्य के मानसिक पटल से होकर शरीर पर बीमारी के रूप में कब्जा कर लेता है । शरीर भी इस दशा में अपनी इम्युनिटी पावर खो चक ु ा होता है , जिस कारण हर कोई योगाभ्यास करने में समर्थ नहीं हो पाता। योगाभ्यास प्रारम्भ करने से पहले हमें अपनी वर्तमान इस समय सबसे अधिक आवश्यकता होती है आध्यात्मिक स्थिति को समझ लेना अति आवश्यक है , जो निम्न प्रकार उपचार की | क्या करें : से हैं : • डाक्टर द्वारा दिये गए निर्देशों का पालन करें l 1. जिनको कोरोना बीमारी नहीं हुई हैं या जा पूरी तरह • शुद्ध सात्विक आहार लें l • जल का व क्षारीय आहार का निश्चित मात्रा में सेवन स्वस्थ हैं l करें । 2. जो कोरोना से ग्रस्त हैं, इस बीमारी से जूझ रहे हैं l 3. जिनको कोरोना हो कर जा चुका है , जो रिकवरी की • ज़्यादा से ज़्यादा आराम करें l • यदि संभव हो सके तो भुजंगासन करे , अनुलोमतरफ जा रहे हैं। विलोम, योगिक स्वास प्रस्वास, भ्रामरी, ॐ का जाप ऐसे अभ्यास हैं जो असमर्थ होने पर मरीज बिस्तर आइए बात करते हैं पाइन्ट नं 1 की, जिनको कोरोना पर लेटे-लेटे भी कर सकते हैं, नियमित ऊँ के छह बीमारी नहीं हुई हैं उन व्यक्तियों को आवश्यकता है कि मिनट उच्चारण मात्र से गंभीर बीमारियों में बदलाव व नियमित योगाभ्यास करें ताकि शरीर में रोग प्रतिरोधक रिकवरी दे खी गयी है । क्षमता बनी रहे । ऐसे लोग सभी तरह के आसन रोज 1 से एक प्रकार की आध्यात्मिक प्रक्रिया है , जिसमें शरीर, मन और आत्मा में सामंजस्य बैठाया जाता है । उपनिषद, महाकाव्य, परु ाण और योग सत्र ू ने ‘योग’ शब्द का अर्थ यही बताया है कि शरीर, इंद्रियों, दिमाग और बद ु ्धि को एकजुट और नियंत्रित करता है । निरं तर योगाभ्यास से मन को शांति मिलती है व बेहतर स्वास्थ्य के लिए ये अति आवश्यक है l योग जीवन को उचित तरीके से जीने का विज्ञान सिखाता है l
2 घन्टा व्यायाम व ध्यान जरूर करें | हल्के व्यायाम से शुरू करते हुए अभ्यास बढ़ाएं | जिससे शारिरिक, मानसिक, यदि ॐ के उच्चारण में दवु िधा महसूस हो तो अपने इष्ट भावनात्मक एवम ् आध्यात्मिक तौर पर व्यक्तित्व का दे व का नाम जो मुख पर रहता हैं लगातार इसका भी मानसिक जाप किया जा सकता हैं , जैसे-राम राम, राधे संपर्ण ू विकास हो । कृष्णा |
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dyk;k=k चक्रासन
बात करते हैं तीसरे पाइन्ट की, जो रिकवरी कर रहे हैं, आप को आवश्यकता है अपने शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने की। इसमें भी 3 बातों पर ध्यान दे ने की आवश्यकता है :
लाभ निरन्तर अभ्यास से नाभि अपने स्थान पर आती है । कन्धे चौडे व मजबूत, कब्ज़ दरू , तेज भूख लगना प्रारम्भ हो जाता है |
1. बच्चों को अपनी आयु के आधार पर योगासन करना • प्राणायाम - कपालभाती क्रिया,अनुलोम-विलोम,यौगिक चाहिए। श्वास-प्रश्वास, भ्रामरी, उज्जयी प्राणायाम,उद्गीथ ओम 2. बड़े बज को भी अपनी शारीरिक स्थिति को ध्यान का उच्चारण,ध्यान | ु र्गो ु में रखते हुए ही अभ्यास करना चाहिए । 3. नौजवानों को सब अभ्यास करने चाहिए । योगाभ्यास के साथ-साथ प्राणायाम का विशेष महत्व है । प्राणायाम मतलब साँस (प्राण) पर नियंत्रण | शारीरिक, अभ्यास क्या करें : मानसिक, बीमारियों से मुक्ति के साथ साथ शान्ति और आनन्द की प्राप्ति का कर सकते हैं | • सूर्य नमस्कार - संपूर्ण शारीरिक, मानसिक आत्मिक बल, नेत्र ज्योति , स्मरण शक्ति | शवासन - सभी अभ्यासों के अन्त में शवासन का अपना महत्व है । जिससे शारीरिक व मानसिक तनाव दरू होकर • भज ु ंगासन - शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाने मन शांति का अनभ ु व करता है । इसी स्थिती में आप योग में विशेष आसन हैं I पीठ, फेफड़े, हृदय को मजबूती का भी अभ्यास कर सकते हैं। प्रदान करता हैं । नोट - किसी भी प्रकार के अभ्यास से पूर्व अपने योग गुरु • सेतुबंध आसन - भोजन के उपरान्त गैस से छुटकारा l व डॉक्टर से सलाह अवश्य लें l • नौकासन - सेतुबंध के समान लाभ , नस नाडियों में रक्त प्रवाह तेज करना | श्वास मनीषा यादव सम्बंधी बीमारियों को दरू | कमर पता : शालिमार बाग, नई दिल्ली व गर्दन दर्द में उत्तम, पेट की चर्बी कम करना | व्यवसाय : योग शिक्षिका • धनुरासन - नौकासन के समान
इमेल : da.gorgiousone@gmail.com सम्पर्क सूत्र : 9999270452
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dyk;k=k शवासन
भुजंगासन
अर्ध पवनमक ु ्तासन
पवनमक ु ्तासन
अश्व संचालनासन
मार्जरी आसन
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नौका संचालनासन
सेतु बंधासन
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जब
dyk;k=k प्रकृति और हम
जब हमने प्रकृति को अपने अधीन करने की कोशिश की या अपने इशारों पर नचाना चाहा,तब तब वैश्विक तबाही दे खने को मिली। पहले तो हम सुनते ही थे, आज हम इस बात के साक्षी बन रहे हैं, जहाँ दे खो वहाँ लाशों के ढे र, कोई ऑक्सीजन की कमी से चला गया या कोई बिना इलाज के l संस्कार करने के लिए ना तो लकड़ी है , ना व्यवस्था एक बात ज़रूर हमें समझ में आई की हमें प्रकृति के हिसाब से ही अपनी जीवनचर्या का निर्वहन करना चाहिए। जैसे सुबह समय से उठना शारीरिक, व्यायाम करना योगा, प्राणायाम करना और आयुर्वेदिक हर्बल एवं प्राकृतिक चिकित्सा से अपने को स्वस्थ रखना आज प्रकृति ने हमें मजबूर कर दिया है कि हम अपने आसपास हरियाली लगाएं और उसमें भी जीवन रक्षक हर्बल जैसे तुलसी नीम अश्वगंधा गिलोय आदि हैं। चलिए आज हम टे रेस गार्डन, किचन गार्डन आदि जैसे शब्दों को सार्थक करें गे अपने आसपास छोटी से छोटी जगह में गमलों में गिलोय जिसको हम गुरुच कहते हैं ,अमत ृ ा कहते हैं, लगा सकते हैं I इसका उपयोग कर सकते हैं, यह आज राष्ट्रीय औषधि भी घोषित की जा चुकी है । उसके अलावा वातावरण को शुद्ध रखने के लिए कुछ पौधे जिसको आप गूगल में भी सर्च करके लगा सकते हैं, जैसे कि स्नेक प्लांट और पाम जैसे भी कुछ पौधे हैं जिनको आप घर के अंदर लगाकर शुद्ध हवा प्राप्त कर सकते हैं l इसके अलावा अगर आपके पास जगह बचती है तो ऑर्गेनिक साग-सब्जी को भी अपने घर पर ही उगा सकते हैं। जिसके लिए कोई विशेष जगह नहीं लगती और ना ही ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है l सिर्फ आप में इच्छाशक्ति होनी चाहिए। जब आप इस घरे लू बागवानी के क्षेत्र में आएंगे तो आपको बहुत ही अच्छा लगेगा जब आप इनके बीच में बैठकर शुद्ध हवा प्राप्त करें गे, तो आपको महसूस होगा कि यह भी प्रसन्न होकर प्राणवायु हमें प्रदान करते हैं और जो आपको जो हरे रं ग से एनर्जी मिलती है , वह अतुलनीय है और इनके बीच में बैठकर जब आप प्राणायाम जैसे कि भस्त्रिका, अनुलोम विलोम, कपालभाति, उज्जायी, भ्रामरी और सिंहासन के साथ-साथ योगासन भी करें गे उसमें यह आपकी बागवानी दोहरा असर दिखाएगी।
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जिससे आप ना तो बीमार पड़ेंगे और बीमार पड़ गए तो जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे I अब हम
प्रकृति के विपरीत कोई भी कार्य नहीं करें गे और जो भी कार्य करें गे वह प्रकृति के हिसाब से ही करें गे अन्यथा वह अप्राकृतिक कार्य कहलाएगा और प्रकृति हमें कभी क्षमा नहीं करे गी l प्रकृति का दस ू रा नाम ईश्वर भी है , भगवान भी है , आप जैसे भी हैं, किसी भी धर्म या जाति के है , सभी लोग प्रकृति को ही पूजते हैं। चाहे वह नदी हो, पहाड़-पेड़ हो और दवाइयां हो जोकि हर्बल पेड़ों से बनती हैं। घर पर रहिए, सुरक्षित रहिए, मास्क हमेशा पहनिये, सोशल डिस्टें सिग ं का पालन करिए, यही आपको बचाएगा और दस ू रों को भी बचाएगा।
वीरें द्र कुमार झा जबलपरु , मध्य प्रदे श
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बंद ु े लखंड की लोक संस्कृति और रं गमंच में प्रयोग
भारत की हृदयस्थली के रूप में स्थापित मध्य प्रदे श कलात्मक और सौंदर्यपूर्ण स्थलों में परिपूर्ण हैं। अपने नाम के अनुरूप ये मध्य में स्थित है । इसका प्राकृतिक और कलात्मक सौंदर्य मनमोहक है l मध्यप्रदे श की सबसे बड़ी जीवन दायिनी नदी नर्मदा है l इसके अलावा यहाँ अन्य पवित्र और कल्याणकारी नदियाँ हैं। नदियाँ दे श की जीवन रे खा मानी जाती हैं। कोई भी सभ्यता या लोक संस्कृति का उदगम नदियों के किनारे ही होता आया है । मध्यप्रदे श में छः लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार हैं जिसमे निमाड़, मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड, महाकौशल, ग्वालियर (चम्बल )सांस्कृतिक क्षेत्र हैं। प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली, शैली, वाचिक परं परा और परिवेश है l बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को रं गमंच में प्रयोग करने के पहले उसकी वाचिक परम्परा, जीवन शैली, लोकोत्तियां, लोकनतृ ्य, लोकगीत, लोकसंगीत, वेशभूषा, आभूषण, लोकवाद्य, चित्रकला, रीतिरिवाज़, जन्म से मरण के संस्कार, बोली, सामाजिक एवं राजीनीतिक परिवेश आदि को समझना जरुरी हैं। इसीलिए संक्षेप में व्याख्या कर रहा हूँ।
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बुंदेलखंड का पारं परिक लोक नाट्य स्वाँग हैं। स्वाँग प्राय : लोक नतृ ्य राई के विश्राम के क्षणों में किया जाता है । स्वाँग की अवधि अधिक से अधिक 15 से 20 मिनट तक होती है इसी के अनुरूप बुंदेली स्वाँग का रूप भी निर्धारित हुआ बुंदेलखंड में इसे अनुराग्यम ्
नकल उतारना कहते हैं l स्वाँग का अर्थ रूप धारण करने से लिया जाता है l स्वाँग भारतीय लोक की अति प्राचीन परं परा है l बुंदेलखंड के लोकनतृ ्यों में राई, सैला, ढिमरयाई, बधाई, कर्मा, अहीर आदि हैं जिन्हें अलग अलग तीज त्योहारों, संस्कारों, फसलों की बुआई, कटाई, उत्सवों इत्यादि पर किया जाता हैं। बुंदेलखंड के लोक गीतों में बम्बुलिया, लमटे र, राई, कर्मा,ढिमरयाई, बधाई, अहीर,फाग, कजरी, आल्हा गायन,बिराहा, चौमासा, बन्ना, सुहाग, गारी, विदाई, होरी, फगुआ, सोहर, बारहमासी,धोबीया, दादरा, दे वी गीत, आदि को जन्म से मरण तक,अलग अलग तीज त्योहारों, संस्कारों, फसलों की बुआई, कटाई, उत्सवों इत्यादि पर गाए जाते हैं। बुंदेलखंड के लोकवाद्य में मद ृ ं ग, पखावज, नक्कारा, टिमकी,रमतूला, तुरही,अलगोजा,सुनायची,स्वर किन्नरी, टोंटा, चिंकाड़ा, नागफनी, पपीरा, सिंगी, ढप, खंजरी, ढांक, ताशा, घेरो, लोटा नरगा, झांझ ,चमीटा, वौकनास, हुड़क आदि हैं जिन्हें अलग अलग लोकगीतों, नतृ ्यों, शादी ब्याह, दे वपूजा, तीज त्यौहार आदि में बजाया जाता है l आभूषणों में निम्नलिखित गाँव में अधिक प्रचलित थे, जैसे टिकुली, छुटा, बिचौली, सुतिया हमेल, ककना, दौरी, पुंगरिया, दरू , कनफूल, छापें - छाल, गजरा, चुरियाँ, करधोनी, पैजना, बिछिया, श्रृंगार प्रसाधनों में सिंदरू , टिपकिया, पटियाँ, अंजन, कजरा, में हदी, महावर और
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गुदना लोकप्रिय थे।
व्यवस्था समन्वयवादी, पारस्परिक स्नेह एवं सम्मानवर्धक है । ब्राह्मण पुत्री के विवाह में नाई का विशिष्ट स्थान है उसमें पैर की अंगुलियों के बिछिया और अनौट तथा धोबिन से सुहाग मांगा जाता है । सामाजिक एकरुपता (अनवट, जो बुंदेली में अनौटा हो गया है ), पैरों के बाँकों, में सभी वर्ग अनन्योश्रित हैं। विवाह की लकड़ी काटने हे तु घघ ुँ रु और जेहर; कटि के छुद्रघंटिका (करधनी), हाथ की छे ई के बुलउवा से अन्त्येष्टि तक का बुलउवा लगता है । अँगुलियों के मँद ु री, हाथ के कौंचा में पौंची, कंकन, वलय मतृ ्यु के पश्चात भी फेरा डालने में सामाजिक तथा आर्थिक और चूड़ी, कण्ठ के कण्ठमाल और हार, कानों के कर्णफूल सहयोग की भावना महत्वपूर्ण है । और खुटिला, नाक के नकमोती, माथे का तिलक, माँग का माँगफूल, सीस का सीसफूल तथा वेणी का वेणीफूल वीरता और जनसेवा जहाँ केवल बखानी ही नहीं उल्लिखित हैं। जाती है उसे दे वत्स की प्रतिष्ठा दी जाती है । हरदौल तथा कारसदे व आदि वह व्यक्तित्व हैं जिसे मानव होकर भी परिधानों में परदे निया, सारी, लहँगा, नुगरों, रे जा, दे वत्व की गरिमा प्राप्त है । उनका चबूतरा लोक की आस्था अंगिया, चोली, पोलिका, चुनरिया, पैछौरा आदि स्रियों का केन्द्र बन जाता है । में प्रमुख वस्र थे। पुरुषों में पचरं ग पाग, झामा- कुर्ती, अंगरखा, बंडी, बंडा, साफा, झोला, सुजनी प्रमुख थे। बुन्देलखण्ड के विशिष्ट पर्व यथा कजलियों के मेले में प्रेम से आलिंगनबद्ध होकर मिलना, कजलियां दे ना लोक-जीवन के सांस्कृतिक पक्ष में लोक संगीत, तथा बड़ों का चरण स्पर्श करना लोक धर्म है । बुन्देली लोकगीत,लोकनतृ ्य, लोकवाद्य, लोककथाएं, लोकगाथाएं, लोक जीवन में अधिकतर शुभकार्य उत्तरायण तथा पंडितों बुझौअल पहे ली,लोकोक्तियां, रीतिरिवाज़, पर्व उत्सव, से मुहूरत निकलवा कर किये जाते हैं। पर्वतों नदियों, व्रतपूजन, अनुष्ठान, लोक दे वता, ग्रामदे वता, मेले आदि सरोवरों, और वृक्षों की पूजा की जाती है । पीपल, बरगद, का समावेश है । कला पक्ष के अन्तर्गत भूमि भित्त, नीम, आंवला, तुलसी, केला, बेलपत्र आदि वनस्पतियों को अलंकरण, मूर्तिकला, काष्ठशिल्प, वेशभूषा, आभूषण, पूज्य कोटि में रखा गया है । गुदना, आदि दृष्टव्य है । सभ्यता पक्ष के अन्तर्गत दै निकचर्या --ब्रह्ममूहुर्त में जागना, लोकाचार, दादा दादी के पैर जनमानस अपना उल्लास और कसक लोक गीतों स्पर्श, टोटका, भोजन-व्यंजन, लोक-रं जन, लोकक्रीड़ा तथा के माध्यम से व्यक्त करता है । इन गीतों का लोकत्व यह उद्यम व्यापार की चर्चा शामिल है । बुन्देलखण्ड के लोक चिंतन में शाश्वत जीवन मूल्यों का संरक्षण, भारत की चिरं तन संस्कृति का पोषण एवं रागात्मक बोध है । यहाँ की लोकधारा वैदिक, स्मृति, पुराण काल से प्रवाहित होती हुयी अपनी लोक संजीवनी शक्ति के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में समरसता बनाए हुई थी। वर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k है कि यह विशिष्ट धुनें यमुना नदी से नर्मदा नहीं तक और चम्बल से टोंस नदी तक प्रायः एक जैसी गाई जाती हैं। स्वररागिनी तथा केन्द्रीय भाव एक समान रहते हैं। यह गीत लिखित में कम वाचिक परम्परा में अधिक है । यह गीत प्रायः दे वी-दे वताओं के पूजा विषयक संस्कार गीत, ॠतु विषयक गीत, श्रृंगार गीत, श्रमदान गीत, जातियों के गीत, बालक-बालिकाओं के क्रीड़ात्मक उपासना गीत या शौर्य प्रशस्ति गीत होते हैं। बुन्देली लोक गीत लोक संस्कृति के दपंण हैं।
लोकनतृ ्य-लोकनतृ ्य उल्लास पूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है l हर्ष के क्षणों में जब समूह में उमंग की हूक उठती है तो पैर स्वतः ताल लय में थिरकने लगते हैं। यह नतृ ्य प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-सार्वजनिक नतृ ्य, पारिवारिक नतृ ्य तथा जातीय या आदिवासियों के लोकनतृ ्य। करमा और शैला आदिवासियों के लोक नतृ ्य हैं। सार्वजनिक नतृ ्य के अंतर्गत दिवारी-अहीर हाथ में डण्डे लिये रहते हैं, कमर में घुंघरु बांधे रहते हैं तथा टे र के साथ गाते हैं, नतृ ्य ढोलक तथा नगड़िया के साथ समूह में होते हैं।
नतृ ्य प्रस्तुत किया जाता है । पारिवारिक नतृ ्य में शिशु जन्म के समय बुआ द्वारा लाये गये बधाई के साथ किया जाता है । लाकौर या रास बधावा नतृ ्य विवाह में भांवर पूरी होने के पश्चात कन्या पक्ष की महिलायें द्वारा जब वह डेरों पर जाती हैं तो बहू का टीका पूजन, वर पक्ष के रिश्तेदारों द्वारा किया जाता है । बालिकाएं व महिलाएं बन्नी गाते हुये नतृ ्य करती हैं। इसी प्रकार बहू उतराई का नतृ ्य विवाहोपरान्त वर पक्ष के निवास में होता है । सगुन चिरै या गीत गाये जाते हैं। लोक कथाएं, लोक गाथाएं दादी या नानी द्वारा सुनाई जाती थीं। बहुधा यह पद्यमय होती थीं। लोकोक्तियां व्यवहार तथा नीति सम्बन्धी होती हैं। बुझौअल पहे ली बालक, बालिकाएं आपस में बूझते हैं। मुहावरों का प्रयोग लेख या मौखिक वार्ता में होता है । लोक दे वता, ग्राम्य दे वता तथा रीतिरिवाज़ सामाजिक स्वीकृति के आधार पर जन्मते तथा विकसित होते हैं। लोक कलाएं हमारे सामाजिक जीवन को सुसंस्कृत और सम्पन्नता प्रदान करती हैं।
बुन्देली वेशभूषा में महिलाओं में बांड-घाघरा पहनने का प्रचलन था। श्रमिक महिलाएं कांछ वाली धोती पहनती हैं। पुरुष साफा, बंडी, मिर्जई, कुर्ता, धोती पहनते हैं, स्रियां पैरों में पैंजना दो किलो के वज़न तक तथा गले में सुतिया एक किलो वज़न तक प्रायः चांदी या गिलट के होते हैं। चूड़ा, पैजनिया, करघनी, कड़ा, कठुला पहनते हैं। आदिवासी तथा ग्रामीण आंचल की महिलाएं सौन्दर्य वृद्धि के लिये गुदना गुदवाती हैं। इनमें पशु, पक्षी, फूल, स्वयं का नाम इष्टदे व का नाम आदि होता है । लोकाचार में सगुन-असगुन, टोटका,झाड़फूंक पर विश्वास अधिक राई नतृ ्य प्रमुख रुप से बेड़िया जाति का नतृ ्य है । प्रचलित है । लोक मंच में रामलीला, रास लीला, स्वांग, झिंझिया क्वार माह की पूर्णिमा को टे सू के अवसर पर नौटं की समय-समय पर आयोजित होते हैं। कंु वारी बालिकाओंसे लेकर वृद्ध महिलाओं तक के द्वारा नतृ ्य किया जाता है । कानड़ा,धुबियायी,रावला, काछी, धोबी, रं गमंच में बुंदेली बोली-बानी और नतृ ्य के चलते चमार, गड़रिया, मेहतर, कोरी आदि में एक पुरुष स्री का उनकी लोकप्रियता ने लोगों की ओर ध्यान आकर्षित किया वेश रखता है । दस ू रा विदष ू क बनकर रावला गीत रमतूला है l लोग कवि ईसुरी की कविता और उनके जीवन संघर्ष सारं गी के साथ गाते नाचते हैं। ढीमरयाही ढीमर जाति पर रखे गए नाटक में लोक कलाओं को स्थापित करने द्वारा विवाह के अवसर पर पुरुष तथा महिलाओं द्वारा की भरपूर संभावनाएं थी, जिसके चलते अकेले एक नाटक
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में बुंदेलखंड की सभी लोक कलाएं समाहित हो गईं l मेला शादी फागुन का मुकाबला अखाड़ा और होली जैसे त्योहारों को मंच पर उतारने से नाटक ना केवल बन चला वरन राई नतृ ्य और अहीर नतृ ्य की उपस्थिति ने इसमें लोकरं ग के कई तत्व जोड़े l नाटक ‘हँसा उड़ चल दे श विराने’ ईसुरी में बुंदेली भाषा,बोली,नतृ ्य, गीत संगीत की संरचनाओं से संजोई गई प्रस्तुति है l नाटक में वेशभूषा मंच सामग्री, मंच सज्जा में बुंदेली लोक संस्कृति का अनूठा समायोजन दे खने को मिलता है जो दर्शकों के मन पर लोक संस्कृति का प्रभाव छोड़ता है l ठे ठ बुंदेली शब्द, मुहावरों और लोकोक्तियों का भी प्रयोग इस नाटक में दे खने मिलता है । लोक संस्कृतियों की विरासत समाज में बची हुई है यह इस नाटक में स्पष्ट दे खने मिलता है । नाटक का संगीत और नतृ ्य पक्ष लोकगीतों की पारं परिक धुनों के अलावा ईसुरी की फागों को अनेक शास्त्रीय रागों में भी बांधा गया है ,जिसके चलते हर फाग रूप और रं ग में अलग अलग दिखाई दे ता है । ‘हं सा कर ले किलोल’ नाटक भी बुंदेलखंड की एक सच्ची घटना पर आधारित है विद्रोह की प ृष्ठभूमि में रचे गए इस नाटक में लोक कलाओं की ताकत को स्थापित किया गया है । ‘हं सा कर ले किलोल’ की कथा का तानाबाना राई नतृ ्य की जुंदैया और मद ृ ं ग वादक नरबत के जीवन संघर्ष पर बुना गया है I इसमें बेड़नी का दर्द मुखरता से प्रदर्शित हुआ है । लोकनाट्य की इसी कड़ी में भोले भैया, कर्पूर मंजरी,लाला हरदौल, विक्रमोर्वर्षी को दे खा जा सकता है । बुंदेलखंड के लोक नायक लाला हरदौल की कथा करना नाटक मध्ययुगीन बुंदेलखंडी लोक रं ग मे रचा बसा है । पारिवारिक रिश्ते,रिश्तों में प्रेम, कलह, हरदौल का लोकयश और मुगलों के खिलाफ कटिबद्धता, शाहजहां की सत्ता लोलुप प्रवृत्ति और अंततः पारिवारिक कलह के कारण अल्पायु में हरदौल की विषपान मतृ ्यु नाटक का प्रमुख बिंद ु है । इस नाटक में भी लोक गीतों, मंच, पारम्परिक वेशभूषा आदि का प्रयोग दे खने मिलता हैं, जो दर्शकों के समक्ष उस युग की झलक प्रस्तुत करता है l नाटक ‘सुदामा के चावल’ में भी बुंदेलखंडी बोली में खेला गया l यह नाटक श्री कृष्ण सुदामा की दोस्ती को केंद्र में रखकर आज की व्यवस्था की पोल खोलता हुआ नज़र आता है l यह नाटक प्रसिद्ध व्यंगयकार हरिशंकर परसाई के व्यंग्य पर आधारित है l ये प्रस्तुति बुंदेलखंड की वाचिक परम्पराओं एवं लोकनतृ ्यों के तर्कों से आगे बढ़ती हैं, जिसमें मुख्यतः बरे दी, अहीर भक्ते, चौपाई एवं लोक
वाद्यो का प्रयोग दे खने मिलता है l नाटक में लमटे र, बम्बुलिया लोक गायकी, राई एवं अहीर नतृ ्य का प्रयोग किया गया है l मंच सज्जा, वेशभषा ू ,शैली,मंच सामग्री, और रूपसज्जा भी परं परागत एवं लोक तत्वों से परिपर्ण ू दिखती है l रं गमंच किसी भी लोक कला एवं संस्कृति को संपर्ण ू ता में समावेशित करता है l इसलिये उन नाटकों को उल्लेखित किया हैं जिसका रं गमंच में अप्रतिम स्थान हैं, जिन्हें दे श भर में सबसे ज़्यादा खेला और प्रदर्शित किया गया है एवं दर्शकों द्वारा प्रशंसा, सराहा और स्वीकाररोक्ति प्राप्त है l चंकू ि रं गमंच में मेरी विगत दो दशकों से सक्रियता बनी हुई है l रं गमंच के मंच पर और मंच से परे कार्यों में जिसमे मंच निर्माण, मंच सज्जा, रूपसज्जा, वेशभषा ू , मंच सामग्री, गायन, वादन, मंच व प्रस्तुति प्रबंधन, पोस्टर निर्माण,अभिनय तथा कला निर्देशन में दखल रहा है ।यह कला हमें विरासत में प्राप्त हुई हैं। हम तीसरी पीढ़ी के रूप में इस कलाकर्म से जीवकोपार्जन करते आ रहे हैं, यही हमारी जिजीविषा हैं।
रोहित झा जबलपरु , मध्यप्रदे श
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उभरते बाल
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(4) Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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(7) (1) हितिक्षा, कक्षा 12, वडोदरा, गुजरात (2) अनुशिका गुप्ता, कक्षा , वडोदरा, गुजरात (3) मानसी, कक्षा 12, पंचकुला, हरियाणा (4) आराध्य सिंह, कक्षा 6, वड़ोदरा, गज ु रात (5) खुशी यादव, कक्षा 12, सूरतगाढ़, राजस्थान (6) अर्पित गुप्ता, कक्षा 6, वड़ोदरा, गुजरात (7) पर् ू वी रजक, कक्षा 6, विशाखापट्टनम, आन्ध्रप्रदे श Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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पार्थी जैन, कक्षा 8 ईस्ट रिफ्फा, बहरीन
नितीश कुमार, कक्षा 7 हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत
स्नेहा, कक्षा 8 वड़ोदरा, गुजरात, भारत
कौस्तुभ त्यागी, कक्षा 8 पोरबंदर, गुजरात, भारत
संस्कृति गुप्ता, कक्षा 10 झासी, उत्तरप्रदे श, भारत
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dyk;k=k सकारात्मकता
की आय,ु मानसिकता के अनरू ु प, स्वतः ही बढ़ जाती है l
चित्रकार : प्रज्ञा मिश्र, पुणे
मान लिया जाए, किसी व्यक्ति को कोई विशेष कार्य करना है और उस कार्य के प्रति उस व्यक्ति के मन एवं मस्तिष्क में पहले से ही सकारात्मक भावनाएं उपस्थित हैं। तब ऐसी स्थिति में अमक ु व्यक्ति के भीतर व्याप्त सकारात्मकता, आत्मविश्वास में परिवर्तित हो जाती हैं। तत्पश्चात यही आत्मविश्वास एक नवीन ऊर्जा का संचार करता हैं एवं परिणामस्वरूप एक सामान्य अथवा नकारात्मक व्यक्ति की तल ु ना में सकारात्मक व्यक्ति, कम समय में एवं पर्ण ू सफलता के साथ अपना कार्य संपन्न कर सकता है l उक्त व्यक्त संपर्ण ू तथ्य से यह सिद्ध होता है कि मात्र सकारात्मकता एक भाव अथवा गण ु न होकर, विभिन्न भावों एवं तत्वों की एक सम्पूर्ण श्रृंखला है जिसने अपने आप में अपार ऊर्जा अथवा शक्ति को समाहित कर रखा है ।
भौतिकता के हवाले से दे खा जाए तो, एक सामान्य व्यक्ति को जीवनयापन करने के लिए, आवास, वस्त्र एवं भोजन की आवश्यकता होती है , जो कि प्रत्येक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। लेकिन यदि वास्तविक जीवन के विषय में गहन चिंतन किया जाए तो ज्ञात होगा कि जीवन में आने वाले सुख–दख ु , योग–वियोग, रोग इत्यादि जैसे अनेक क्षणों एवं प्रत्येक कार्य में , मनुष्य का मानसिक रूप से सकारात्मक होना भी अनिवार्य होता हैं। यदि कोई व्यक्ति सदै व सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर, जीवन के पथ पर निरं तर गतिमान रहता हैं तो मात्र वह मानसिक तौर पर ही नहीं, अपितु शारीरिक रूप से भी सदा स्वस्थ्य रहता है । लेकिन सकारात्मकता के विषय में मात्र इतना कहना, उसकी वास्तविक परिभाषा को झुठला दे ने के तुल्य होगा। क्योंकि सकारात्मकता, मानव जीवन को सुचारू रूप से संचालित रखने वाले प्रमुख तत्वों में से भी, सबसे मुख्य एवं अनिवार्य तत्व के अंतर्गत आती है , जो कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से, प्रत्येक व्यक्ति में , भिन्न-भिन्न मात्रा में निहित रहती हैं।
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सकारात्मकता अपने आप में एक ऐसी अद्भुत शक्ति है , जो व्यक्ति के जीने की इच्छा में वृद्धि कर दे ती है , जिससे सकारात्मक व्यक्ति अनुराग्यम ्
सकारात्मकता के कई लाभ हैं जैसे, सकारात्मकता से कार्य के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं, सकारात्मक दृष्टिकोण तनाव एवं भय जैसे अंतःजाग्रत रोगों का मल ू से पतन कर दे ता है । इसके अतिरिक्त सकारात्मकता, आत्मविश्वास एवं कार्य में रुचि जैसे भावों को जाग्रत करती हैं, जिससे व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक तो रहता ही है , साथ ही कार्य के पर्ण ू होने के पर्व ू ही, उसकी सार्थकता का अग्रिम परु ु स्कार व्यक्ति को मानसिक रूप से प्राप्त हो जाता है l लेकिन जिस प्रकार प्रत्येक कार्य, वस्तु, तत्व एवं भाव एक निश्चित तथा निर्धारित सीमा तक ही सीमित रहता है , ठीक उसी प्रकार जीवन एवं मस्तिष्क में सकारात्मकता भी एक निश्चित सीमा तक ही उचित एवं लाभकारी होती है l यदि व्यक्ति आवश्यकता से अधिक अर्थात अत्यधिक सकारात्मक दृष्टिकोण का बन जाता है तब उस व्यक्ति का सकारात्मक गण ु , हानिकारक हो जाता है , क्योंकि अत्यधिक सकारात्मकता लापरवाही नामक राक्षस को जन्म दे ती हैं जो भीतर से मनषु ्य को खोखला कर, जीवन को दशु ्वार कर दे ता है l
चिराग जैन नीमच, मध्यप्रदे श
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भारत भवन, भोपाल
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dyk;k=k रे खांकन बने कोलाज
केन्द्र सरकार द्वारा महापंडित राहुल सांकृत्यायन परु स्कार से सम्मानित गज ु राती पस ु ्तक ‘सौन्दर्यनी नदी नर्मदा’ साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा अकादमी परु स्कार से सम्मानित वाराणसी में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान गज ु राती पस ु ्तकों के लिए गज ु रात साहित्य अकादमी का गौरव परु स्कार मध्यप्रदे श का गौरव सम्मान। लेखक की पस ु ्तकें
अमत ृ लाल वेगड़ अमत ृ लाल वेगड़ जी का जन्म 3.10.1928 को हुआ था। जबलपुर में 1948 से 1953 शान्तिनिकेतन में कला का अध्ययन। 1953 से 1988 स्थानीय आर्ट कॉलेज में चित्रकला के अध्यापक। चित्रकला के लिए मध्यप्रदे श शासन के संस्कृति विभाग का शिखर सम्मान।
हिन्दी : सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमत ृ स्य नर्मदा, तीरे तीरे नर्मदा गज परिक्रमा नर्मदा मैयानी, सौन्दर्यनी नदी ु राती : नर्मदा, तीरे तीरे नर्मदा, स्मृतिओनंु शांतिनिकेतन, नदिया गहरी नाव परु ानी, सरोवर छली पड्या मराठी : सौंदर्यवती नर्मदा, अमत ृ स्य नर्मदा, तीरे तीरे नर्मदा, स्मृतितील शांतिनिकेतन संस्कृत : सौंदर्यस्रोतस्विनी नर्मदा अंग्रेजी : Narmada River of Beauty, Narmada River of Joy हिन्दी : नर्मदा तम ु कितनी सन ु ्दर हो (चित्रों का अलबम) बंगला : सौंदर्यर नदी नर्मदा, अमत ृ स्य नर्मदा, तीरे तीरे नर्मदा
अमत ृ लाल वेगड़ का 6 जुलाई 2018 को दे वलोकगमन हो चुका है । संलग्न लेख उनकी पुस्तक ‘नर्मदा रे खांकन’ से लिया गया है । वे हिन्दी और गुजराती भाषा में अपनी नर्मदा यात्राओं को जीवन पर्यन्त मोहक और सहज भाव से लिखते-कहते-रचते आये । ये उनकी रचना शैली का नर्मदाव्रती एक पहलू था,वे शांतिनिकेतन से दीक्षित थे और जबलपुर, मैं लेखक चित्रकार मध्य प्रदे श के फ़ाइन आर्ट्स कॉलेज में अध्यापक थे। हूँ। मैंने नर्मदा एक चित्रकार के रूप में कोलाज़ शैली में काम करते की परू ी परिक्रमा रहे ,नर्मदा को विषय वस्तु बनाकर उसके आस-पास धड़क की है । नर्मदा रहे मानवीय स्पंदन को बखूबी कोलाज़ से रचते रहे अपनी और उसकी तीन कला से पूरे दे श में ख्याति अर्जित की। मेरी भूमिका उनकी सहायक नदियों किनारे की गयी अनगिनित यात्राओं में से कुछ में सहयात्री के रूप के में रही । मैं भी फ़ाइन आर्ट्स का छात्र था । उनके साथ 4000 कि.मी. की गयी यात्राओं में नर्मदा, प्रकृति और जीवन को समझ से भी अधिक पाने का गुरु प्रसाद मिल सका इसके लिये “वेगड़ सर” का पैदल चला हूँ। इन यात्राओं जीवन पर्यन्त आभारी रहूँगा.. के दौरान मैंने खंडों में नर्मदा की पूरी परिक्रमा नर्मदा पदयात्रा वृत्तांत की अनगिनत स्केच तीन पुस्तक हिन्दी और गुजराती दोनों में लिखीं। दोनों ही किए दस-पन्द्रह बनाता, भाषाओं में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हिन्दी स्केच एकाध TOP पुस्तकें मध्यप्रदे श शासन के संस्कृति विभाग तब होता। द्वारा राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान से सम्मानित। अच्छा
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बात यह है कि फूल-पत्ती, पेड़-पौधे या मकान का स्केच बनाना आसान है , क्योंकि ये स्थिर हैं, हिलते-डुलते नहीं लेकिन कार्यरत लोगों के स्केच उतारना काफी कठिन है । इसके लिए लम्बा अभ्यास चाहिए। जिसका आप स्केच बना रहे हैं, वह अपने काम में मशगूल है , उसकी क्रियाएं लगातार चल रही हैं, इसी में आपको उसका स्केच कर लेना है । यह भी हो सकता है कि स्केच आधा ही बन पाया हो और वह उठ कर चल दे । इसलिए आन द स्पॉट स्केच जल्द से जल्द हो जाना चाहिए। स्केच यानी त्वरित आलेखन। गति को, लय को या छन्द को छोटे रे खांकन में पकड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है । मेरे स्केच छोटे ही हैं, प्रायः पोस्टकार्ड साईज के। नदी में स्नान करती या घाट पर कपड़े बदलती स्त्रियों के स्केच करना सबसे मुश्किल था। अपने स्वस्थ सुघड़ शरीर के कारण कुछे क स्त्रियाँ तो सौन्दर्य की साकार प्रतिमा जान पड़तीं। मैं उनके स्केच बनाताचोरी से लुक छिपकर l बराबर डर बना रहता कि कहीं कोई मेरी हड्डी पसली एक न कर दे ।
पर लकड़ियों का भारी गठ्ठर लिए नदी का तेज प्रवाह पार करती कैसा रोमांच है इसमें l
रे खांकन करते समय कई बार, चाहे कुछ क्षणों के लिए ू शादियाँ दे खने को मिलीं ही सही, अपने अस्तित्व को ही भूल जाता। कई बार मैंने एक बार गर्मियों में चले तो खब मधुर-सी सिहरन या एक तरह के पावन भय का अनुभव जहाँ शादी होती, वहाँ बड़े-बड़े नगाड़े बजाता वादक होता और पास में छोटी-सी टिमकी बजाता दस ू रा वादक होता। किया है । दल ु े ज़्यादा आकृष्ट ू ्हा दल ु ्हन के बजाय इन वादकों ने मझ ु े लगा था कि मैं खद ु अगर कोई स्केच अच्छा बन पड़ता तो मैं खुशी से भर किया। उनका स्केच बनाते समय मझ नगाड़े बजा रहा ह । कलाकार और कलाक क े बीच जब ँ ृति जाता सोचता, मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मेरे पास ू इतना तादात्म्य स्थापित होता है तब कलाक ृति सजीव हो अभिव्यक्ति का ऐसा विलक्षण माध्यम है । दृश्यमान जगत को जानने का, उसकी तह में जाने का सशक्त माध्यम उठती है । है - रे खांकन l रे खाओं से मैं उस सौन्दर्य को व्यक्त कर सकता हूँ, जो शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं कर सकता जहाँ ऐसा भी हुआ कि मेरे लालच ने मेरे स्केच को बिगाड़ दिया। मझ ु े लालच हो आता कि स्केच में यह ले लँ ,ू वह शब्द मौन हो जाते हैं, रे खाएँ बोल उठती हैं। ले लंू और इसी लोभ में अपने स्केच में बहुत सारा कबाड़ ग्रामीणों का पैदल नर्मदा पार करना मेरा प्रिय विषय रहा इकठ्ठा कर लेता और उसके सौन्दर्य को बिगाड़ दे ता। है । इसके मैंने कई रे खांकन किये। वे पहले माँ नर्मदा को मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्केच में या किसी भी प्रणाम करते, इसके बाद ही नदी में उतरते मुख्य धारा कलाकृति में केवल आवश्यक चीज़ों को ही दर्शाना चाहिए, ू क छोड़ दे ना चाहिए। के आने पर सिर की गठरी ठीक करते, गोद का बच्चा अनावश्यक चीज़ों को निर्ममतापर्व संभालते, काँवर का सन्तुलन ठीक करते और एक दस ू रे स्के चिंग का सार यह जानने में है कि क्या लेना चाहिए का हाथ थाम लेते पानी गहरा नहीं, लेकिन प्रवाह तेज है और क्या छोड़ दे ना चाहिए। मैं यह जानता हूँ फिर भी ऐसा और काई के कारण पैर फिसलते हैं। बहुत सम्भाल कर हो जाता। कभी यत्न करने पर भी कोई स्केच अच्छा न पार करना होता है । कभी-कभी तो ग्रामीण नारियाँ सिर होता, तो कभी अनायास ही अच्छा बन जाता। Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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जन ू 2021 कमरे की मिट्टी की दीवार को दे खने लगा। मिट्टी कहीं-कहीं उधड़ गयी थी और वहाँ तरह-तरह के आकार बन गये थे। सहसा मुझे ऐसा लगा मानों एक ग्रामीण परिवार नर्मदा को पार कर रहा है । आगे पति है । कंधे पर रखे बोझ से झुक सा गया है । पीछे पत्नी है , उसकी पीठ से बच्चा बँधा है । बढ़िया संयोजन था मैने हल्के बुखार में ही यह स्केच कर लिया।
कुछ सामने पेड़ या चट्टान में है , कुछ मन में है , कुछ कल्पना में है । इन तीनों के मिले-जुले रूप हैं इस प्रकार के रे खांकन दर्शकों के लिए यह अन्दाज़ लगाना मुश्किल होगा कि इन रे खांकनों को बनाते समय इन यात्राओं में मुझे साधु-संन्यासियों के साथ रहने का मेरे सामने कोई नहीं था। यह सब कल्पना का खेल था। और उनके स्केच करने का अवसर मिला। एक दब ु ले-पतले हाँ, मेरी कल्पना को जगाया उन आकारों ने। साधु ने एक ही पैर पर खड़े रहने का व्रत लिया था। पेड़ों, चट्टानों या दीवारों पर बने आकार मानो ढका हुआ कुछ रे खांकन मैने सर्वथा भिन्न तरीके से बनाये हैं। चलते- पकवान है , जो ढक्कन उठा सके, इसे ले ले l चलते जब किसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठते, या यों ही फुरसत के समय, मैं पेड़ के तने को या किसी चट्टान को बड़ा कलाकार वह है जो मन की आँखों से दे ख सके। गौर से दे खता। तने में कहीं-कहीं छाल निकल जाती है मुझ में यह क्षमता नहीं पर जब कोई पेड़ या चट्टान और अजीबोगरीब आकार बन जाते हैं। ऐसा ही चट्टानों मेरी में या दीवारों पर होता है । इन आकारों को काफी दे र तक कल्पना को गौर से दे खते रहने के बाद मुझे उनमें कुछ जानी-पहचानी जगाते हैं, सी आकृतियाँ दिखायी दे ने लगती हैं। ऐसा हमेशा नहीं तो थोड़ी होता, कभी-कभी ही होता है , पर जब दिखाई दे ती हैं तो दे र के लिए उन पर से मैं स्केच बना लेता हूँ। मेरे कुछ अच्छे स्केच ही सही, इसी प्रकार से बने हैं। मेरे लिए यह लुका-छिपी का खेल मैं मन था। प्रकृति की पाण्डुलिपियों में छिपी सौन्दर्य सम्पदा को की आँखों ढूंढना कितना दिलचस्प होता था। से दे खने लगता हूँ। एक बार एक पेड़ के तने में मुझे कुएं से पानी निकालती तब जो स्त्री दिखायी दी। कुआँ कच्चा है और रस्सी छोटी है । वह रे खांकन इतना झुक गयी है कि उसकी केवल पीठ ही दिखायी दे ती बनते हैं, है । एक बार एक चट्टान में मुझे मद ृ ं ग बजाता वादक उनका नज़र आया। मैंने अपना खुद का जो रे खांकन किया है वह स्वाद कुछ भी इसी प्रकार बना है । और होता है । एक बार एक किसान के घर में हम दोपहर का TOP भोजन बनाने के लिए रुके थे। मैं बहुत थक गया रे खांकन था, सो गया। उठा तो तेज बुखार लेकर वहीं रुक मैंने चाहे जाना पड़ा। जब बुखार कम हुआ तो मैं पड़ा पड़ा जिस तरीके Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com अनुराग्यम ्
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से बनाए हों, सामने दे खकर या अस्पष्ट आकारों से प्रेरित होकर, लोग यह नहीं पूछेंगे कि यह रे खांकन तुमने किस प्रकार बनाया। वे तो यही दे खेंगे कि वह है कैसा अच्छा या बुरा। मैने दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी स्केच किये हैं और आधी रात को चाँदनी में भी किये हैं। एक शिकारी की तरह हर घड़ी मौके की तलाश में रहता l पता नहीं कब, कहाँ, क्या मिल जाए l समुद्र पार करते समय नाव में भी स्केच बनाये और पहाड़ी पगडंडी पर चलते-चलते भी स्केच बनाये। नर्मदा के तटवर्ती प्रदे श का भूगोल तेज़ी से बदल रहा है । उसकी वन्य एवं पर्वतीय रमणीयता बहुत कम रह गयी है । घने जंगल काट डाले गये हैं। कभी इन जंगलों में जंगली जानवरों की गरज सुनायी दे ती थी। अब पक्षियों का कलरव तक सुनायी नहीं दे ता। उन दिनों नर्मदा के तट पर पशुपक्षियों का राज्य था, लेकिन उसमें आदमी के लिए भी जगह थी। अब आदमी का राज्य हो गया है , लेकिन उसमें पशु-पक्षी के लिए कोई जगह नहीं। बाँधों के कारण नर्मदा तट के कई गाँवों का अस्तित्व नहीं रहा अनेक गाँवों का तथा नर्मदा के सैकड़ों किलोमीटर लम्बे किनारों का अस्तित्व समाप्त हो गया। शूलपाण की पूरी झाड़ी डूब में आ गयी। जब मैने ये यात्राएँ की थीं, तब एक भी गाँव डूबा नहीं था। नर्मदा बहुत कुछ वैसी ही थी, जैसी हजारों वर्ष पूर्व थी। मुझे इस बात का संतोष रहे गा कि नर्मदा के उस विलुप्त होते सौन्दर्य को मैंने सदा के लिए इन प ृष्ठों पर संजोकर रख दिया है । नर्मदा के राशि सौन्दर्य में से मैं थोड़ा सा सौन्दर्य
ही ले सका हूँ। सामने तो अथाह सागर है , पर हम उतना ही तो ले पाते हैं, जितना हमारा पात्र होता है । ये रे खांकन मैंने 1977 के दौरान किये थे। 1977 की प्रथम यात्रा के समय मैंने आयु के 50 वें वर्ष में प्रवेश किया था और अन्तिम यात्रा के समय 60 वें वर्ष में अब मैं 90 का हूँ और पहाड़ों और जंगलों की वैसी कठिन पदयात्राएँ करना मेरे लिए सम्भव नहीं। वे दिन पीछे छूट गये हैं और उनके लौटने की कोई उम्मीद नहीं ये रे खांकन उस अतीत को मेरे लिए फिर से जीवित कर दे ते हैं। उन उल्लास भरे दिनों को मैं पन ु ः जी सकता हूँ। ये रे खांकन नर्मदा से मिले अनमोल उपहार हैं। नर्मदा तम ु मेरी प्रेरणा स्रोत हो। तम ु ने मेरी कला को नया आयाम दिया, मैं तम ु ्हारे प्रति कृतज्ञ हूँ।
अनिल पांडय े इंदौर, मध्यप्रदे श
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“ प्राचीन भारत में नारी शिक्षा ” - अलका शर्मा, शामली, उत्तर प्रदे श
“तू नारायणी”
से विभषू ित कर सनातन काल से ही भारतीय संस्कृति में नारियों को विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया है । वेदों के कुछ मंत्रों से ज्ञात होता है कि वैदिक यग ु में नारियों के लिए शिक्षा अनिवार्य समझी जाती थी। नारी का शिक्षित, सांस्कारिक होना अनिवार्य समझा जाता था। भारतवर्ष में नारियों को पज ू ्या शक्तिस्वरूपा माना गया है । इतिहास का कुछ अंधकारमय कालखंड छोड़ दिया जाए तो प्राचीन समय से ही नारियों की शिक्षा एवं संस्कारों पर विशेष ध्यान दिया गया। गोभिल गह ू में कहा गया है ृ सत्र कि अशिक्षित नारी यज्ञ करने में समर्थ नहीं होती थी। वेदों की रचनाओं को गढ़ने में भारतीय विदषु ियों का विशिष्ट स्थान रहा है । ऋगवेद के दशम मण्डल के 39वें एवं 40वें सक ू ्त की ऋषिका रोमशा, लोपामद्रा ु , विश्ववारा, इंद्राणी, शची और अपाला थीं । वैदिक यग ु में स्त्रियां वेदाध्ययन तथा प्रातः शाम को होम इत्यादि करती थी। शतपथ ब्राह्मण में व्रतोपनयन का उल्लेख मिलता है । हरित संहिता के अनस ु ार वैदिक काल में दो प्रकार की कन्याएँ होती थी।ब्रह्मावादिनी और सद्योपात ्। सद्योपात 16 साल तक की कन्याएँ, जब तक उनका विवाह नहीं हो जाता था वेदाध्ययन करती थी। उन्हें यज्ञों के लिए आवश्यक महत्वपर्ण ू मंत्र पढ़ाए जाते थे, संगीत एवं नतृ ्य की शिक्षा भी दी जाती थी। ब्रह्मवादिनी
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को यज्ञकार्य एवं वेदाध्ययन, भैष्यचर्या के अधिकार प्राप्त थे। सल ु भा, गार्गी, मैत्रेयी परम विदष ु ी महिलाएं पावन भारतीय धरा पर अवतरित हुई हैं। घोषा ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया: “मैं राजकन्या घोषा सर्वत्र वेद की घोषणा करनेवाली, सर्वत्र वेदों का संदेश पहुँचाने वाली स्तुतिपाठिका हूँ।” ऋग्वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ के कुछ मंत्रों में 70 ब्रह्मवादिनी स्त्रियों का उल्लेख है । शौनक ने वृहत्देवता में मंत्रदृष्टा नारियों का वर्णन किया है । राजा जनक के शासन काल में ऋषि याग्वल्क्य और ब्रह्मवादिनी गार्गी के बीच हुए शास्त्रार्थ का वर्णन वृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है । महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भी परम विदष ु ी एवं ब्रह्मवादिनी थी। 500वर्ष ईसा पर्व ू अष्टाध्यायी व्याकरण के प्रणेता पाणिनी ने भी नारियों के वेदाध्ययन की बात कही है । सत्र ू कार पतंजलि ने जिस शाक्ति के शब्द का प्रयोग किया है उसका अर्थ भाला धारण करने वाली है । जिससे ज्ञात होता है कि एक ओर जहाँ उस समय की नारियां हवन यज्ञ में पति के साथ भाग लेती थीं, वहीं राजा दशरथ की पत्नी कैकेयी एवं खेलराज की भार्या विश्पला के यद ु ्ध में भाग लेने का वर्णन भी ग्रंथों में मिलता है । जिससे पता चलता है कि वैदिक काल में नारियों की साहित्यिक तथा यद ु ्ध कला सीखने की व्यवस्था बहुत अच्छी थी।
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जन ू 2021 बौद्धकालीन स्त्रियों की शिक्षा के विषय में जातक कथाओं से पता चलता है । जैन और बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि कुछ भिक्षुणियों ने साहित्य सज ृ न में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिसमें सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा भी थी। उस समय पितस ृ त्तात्मक व्यवस्था होने के कारण स्त्री शिक्षा वैदिक काल की अपेक्षा कम महत्व की ओर ही चली गई। महात्मा बुद्ध के मठों मे स्त्रियों को प्रवेश की अनुमति थी। वे वहाँ पर स्वतन्त्रतापूर्वक विद्याध्ययन करती थी। परं तु समय व्यतीत होने के साथ ही मठों में स्त्री शिक्षा अच्छी नहीं रही। मध्यकाल में स्त्रियों की शिक्षा की प्रगति शासकों और समद ृ ्ध लोगों के संरक्षण में धीमी गति से हुई। उच्च कुल की हिन्दू और मुस्लिम महिलाओं साहित्यिक कृतियों में रूचि ली। परं तु आम हिंद ू विदषु ियों का अभाव ही दिखाई दे ता है । जिसका कारण मध्यकालीन शासकों, सेनापतियों का आतातायी होना है । इस समय में नारियों की स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो गई। पर्दाप्रथा और बालविवाह का प्रचलन बढ़ गया। सामान्यतः शासक और उच्च वर्ग के लोग अपनी पुत्रियों एवं बहनों को शासनकार्य में प्रशिक्षित करते थे। आम परिवारों के लिए नारियों की शिक्षा व्यवस्था लगभग नगण्य ही थी। लड़कियों की शिक्षा के प्रति उनके माता पिता अन्मनयस्क हो गए थे।
dyk;k=k स्त्री शिक्षा के मार्ग में सामाजिक बाधाएं और असुरक्षा की भावना भी थी। आधुनिक युग को अगर वैज्ञानिक युग के साथ ही नारी युग भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्राचीन युग की शानदार परम्परा का निर्वहन करते हुए नारियां फिर से उसी गरिमामय स्थान की ओर अग्रसर हो रही हैं l प्रयास अलग हो सकते हैं, अन्दाज़ जुदा हो सकते हैं जीवन के इस पथरीले पथ पर, कंकड़ भी चुभ सकते हैं ll बढ़ चली जब इस पर आगे, पीछे कदम नहीं रखना है धरा से लेकर क्षितिज तलक, इतिहास नया अब रचना है ll
अलका शर्मा शामली, उत्तर प्रदे श
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dyk;k=k आधार छन्द : शक्ति
लघु कथा : स्वाभिमान
आधार छन्द- शक्ति (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - लगागा लगागा लगागा लगा मात्रा भार- 122 122 122 12 समान्त- आर, पदान्त- है .
जून के महीने की चिलचिलाती धूप थी। ऐसा लग रहा था जैसे सूरज अपनी गर्मी से पूरी दनु िया को पिघलाने पर उतर आया है । मैंने अपने पर्स में से पानी की बोतल निकाली और पानी पीकर कॉलेज के बाहर रिक्शेवाले का इंतज़ार करने लगी ।
बनाना हमें स्वच्छ संसार है । यही स्वास्थ्य का मात्र आधार है । ढिलाई नहीं इस दिशा में करें । नहीं गंदगी आज स्वीकार है ।
कुछ दे र इंतज़ार करने के बाद एक रिक्शावाला दिखा। मेरी सांस में सांस आई। वह पास आकर जीवंतता के साथ बोला,” कहां जाना है बीबी जी?” मैंने झट से उत्तर दिया, “गोपाल नगर ,चलोगे ? कितने पैसे लोगे ?”
सफाई रखें स्वस्थ सारे रहें । सख ु ी जिंदगी का यही सार है ।
“अरे बीबी जी ! जो वाजिब लगे दे दे ना। आप बैठो तो सही l” तसल्ली दे ते हुए वह बोला।
करें मत सहन आप बेहूदगी। बुरी सोच पर यह सही वार है ।
“नहीं, भैया तुम पहले ही बता दो, फिर बाद में तुम लोग चिकचिक करने लगते हो ,कल एक भैया ने पहले तो 20 रुपए बोले और घर पहुँचने पर 30 मांगने लगा।” मैंने शिकायती अंदाज़ में कहा।
दिखे यदि कहीं पर मलिनता अगर। उसे दरू करना एक उपकार है । महत्ता सभी लोग अब जानते। बनी स्वच्छता आज अधिकार है । जगाएँ शुचित भावना हम सभी। बुरी आदतों का ये’ उपचार है ।
कर्नल प्रवीण त्रिपाठी नोएडा, उत्तर प्रदे श
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“बीबी जी ! सब एक जैसे नहीं होते । आप इत्मीनान से बैठिए,” अपने गमछे से उसने रिक्शे की सीट को साफ करते हुए कहा। आप जिद्द करती है तो बताए दे ता हूँ , 25 रूपये दे दे ना, ठीक है ।” मैं झट से रिक्शे पर बैठ गई। बैठते हुए मैंने दे खा पसीने के मारे उसके सारे कपड़े गीले हो चक ु े थे । पैरों मे बिवाइयां पड़ी हुई थीं, जो टं की हुई जूती से साफ दिख रही थी। मुझे उस पर बड़ा तरस आया ।वह अपनी ही धुन में गुनगुनाता मस्ती में रिक्शा चलाए जा रहा था l कुछ दे र बाद मेरा स्टॉप आ गया और मैं रिक्शे से उतर गई । “यह लो भैया !” मैंने उसे 50 रुपए का नोट पकड़ाते हुए कहा । अरे बीबी जी! छुट्टा दीजिए ना..।” “कोई बात नहीं भैया, तुम बाकी के 25 रुपए भी रख लो,कुछ ठं डा पी लेना...बहुत गर्मी पड़ रही है ।”बड़े उदार मन से मैंने उसे कहा। “नहीं,बीबी जी! ना ना हम ठं डा नहीं पीते । गर्म पानी पीने की ही आदत -सी पड़ गई है हमें ।” अपनी जेब से पांचपांच के पांच सिक्के मेरे हाथ पर धरकर वह बोला। फि र पें डल घम ाता ग न ग न ाता चल पड़ा और मैं व ह ीं ु ु ु अवाक् सी. ..खड़ी दरू तक उसे दे खती रही।
मीनू बाला जालंधर, पंजाब
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dyk;k=k भारत का ब्लू पें टर
ललित कला अकादमी द्वारा राज्य कला पुरस्कार से समानित
शरद भारद्वाज, जिनका जन्म 25 अक्टू बर 1985 को उदयपुर राजस्थान में हुआ l इनका पें टिंग का कार्य समस्त नीला रं ग की प्रधानता लिए हुए रहता है , साथ ही प्रकृति में निहित विभिन्न टे क्सचर उसके हिस्से होते हैं l शरद का कहना है कि नीले रं ग से उन्हें शांति, प्यार और सौंदर्य का अनुभव होता है l शरद भारद्वाज बहुत सारी प्रदर्शनी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय जगह पर लगा चुके हैं l साथ ही, इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स 2008 व 2015 में भी चयनित हुआ है और शरद भारद्वाज को ललित कला अकादमी द्वारा राज्य कला पुरस्कार 2017 में दिया TOP गया है l शरद भारद्वाज को पूरे विश्व में “भारत का
प्रमुख प्रसिद्ध हैं l शरद भारद्वाज ने बैचलर डिग्री राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर व मास्टर डिग्री कर्नाटका चित्रकला परिषद, बेंगलुरु से की है l शरद भारद्वाज ने अनेकों प्रकार के विभिन्न यूट्यूब चैनल पर व कई प्रकार की वेब पेज पर भी अपना वेबीनार दिया है l साथ ही,अनेकों माध्यम से सामाजिक प्रतियोगिताओं में जजमें ट,चैरिटी,वेबीनार,वर्चुअल शो आदि से नवयुवक व कला प्रेमियों को लाभ पहुँचाया है l साथ ही दृश्य कला के प्रति रुझान प्रकट किया है l अतः भविष्य में भी शरद भारद्वाज नीले रं ग के बनाए हुए चित्र और प्रदर्शित करें गे l
ब्लू पें टर” के नाम से जाने जाते हैं I शरद भारद्वाज ने कई सीरीज़ पर कार्य किया है , जैसे यूनिवर्स,अंडर वॉटर, मेल्टिं ग स्कल्पचर ऑफ गणेशा आदि l इनके लाइव टे लीकास्ट इंटरव्यू दरू दर्शन, ऑल इंडिया रे डियो, बिग एफ एम, अनेकों जगह लांच हुए हैं I शरद भारद्वाज का नाम अमेरिकन जनरल (जेसीएम) व भारत के अनेकों न्यूज़ पेपर टाइम्स ऑफ इंडिया, राजस्थान पत्रिका, दै निक भास्कर, हिंदस ु ्तान टाइम, राष्ट्रदत ू व विभिन्न राज्यों के प्रकाशन में प्रकाशित हुए हैं l शरद भारद्वाज की पें टिंग अनेकों संग्रहालय में कलेक्शन के तौर पर संग्रहित है व साथ ही इन के तीन प्रमुख शरद भारद्वाज कार्य ब्लू एलीफेंट, ब्लू उदयपुर, राजस्थान ईगल, ब्लू जीसस आदि
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dyk;k=k हबीब तनवीर का रं ग संसार
लोक संस्कृति
और संस्कार इंसान को विशिष्ट बनाते हैं l लोक में जो भी व्याप्त है उससे कहीं न कहीं हमारे पुरखे जुड़,े उन संस्कारों को स्वीकार किया और बदले में कुछ हद तक दे कर भी गए, जिसके कारण आज हम भीतर से मजबूत हैं। बसंत निरगुडे जी कहते हैं- “हबीब तनवीर जिस संस्कृति, जिस समाज, जिस लोक से आते हैं, वह छत्तीसगढ़ी लोक है । जहाँ के लोगो को अपनी पारं परिक लोक कलाओं के प्रति गहरा लगाव है । गहरा लगाव ही नहीं बल्कि उनके लिए पूरी सजगता और संजीदगी भी है ” l समूचे नाट्य जगत को नाटकों के माध्यम से लोहा मनवाने वाले हबीब अहमद खान का जन्म वर्ष 1923 में हुआ। लगभग तीन दशक तक लगातार अध्ययन, शोध और चिंतन- मनन के बाद हबीब ने अपने तरीके से नाट्य जगत निर्मित करने की कोशिश की। अपने पूरे जीवनकाल में सैकडों नाटकों का संसार रचाते-बसाते हबीब ने अपने रं ग व्यक्तित्व का निर्माण किया। जिसके कारण आज समूचा नाट्य जगत उनको याद करता है । लोक संस्कृति और नाचा कलाकारों के साथ सामंजस्य बैठाते हुए हबीब ने अपना रं ग संसार निर्मित किया। वो कभी लकीर के फकीर नहीं हुए। हमेशा आपने नाटकों में प्रयोगात्मक रं गमंच को बढ़ावा दे ते हुए नवीन प्रयोग करते रहे । कई बार तो एक ही नाटक के संवाद को कहानी की लयात्मकता के अनुरूप काटछाँट करते। हबीब कहा करते थे कि नाटक का असली मज़ा कहानी को दर्शकों तक आसानी से पहुँचाना है । जिससे आम दर्शक नाटक को समझ सके। एक दौर ऐसा भी आया जब नवीन प्रयोग के दौरान कई बार असफलता हाथ लगी। वे रं ग पारखी थे। दर्शकों के बीच बैठकर नाटक दे खना, उनकी राय जानने के लिए जगह बदल कर उनकी बातें सुनना, यह सब भी नाट्य मंचन के दौरान करते रहे । फिर नाटक के संवाद में तब्दीली लाना जिससे नाटक उम्दा हो सके, ऐसे अनेक प्रयास संघर्ष के दिनों में करते रहते। हबीब राडा (रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामैटिक्स आर्ट्स लंदन) के दो वर्षीय पाठ्यक्रम को बीच में छोड़कर ब्रिस्टल TOP ओल्ड विक थिएटर स्कूल यूके से नाट्य निर्मिति और निर्देशन के एक वर्षीय पाठ्यक्रम को पूर्ण किया।
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इसके बाद यूरोप की यात्रा की और वहां के रं गमंच को नज़दीक से दे खा। स्वदे श आने के बाद बेगम कुदसिया ज़ैदी से किया वादा भी पूरा किया, हिंदस ु ्तानी रं गमंच को पुनः संभाला, जबकि मोनिका मिश्रा उस समय वहाँ की निर्देशिका थी। हबीब के आने के बाद दोनों प्रणय सूत्र में बंधकर जीवन भर के लिए दोनों पतवार बन गए। 1958 में हबीब जी छत्तीसगढ़ की यात्रा के दौरान रायपुर में रातभर नाचा दे खा, सुबह जब नाचा की प्रस्तुति पूर्ण हुई तो एक अभिनेता से दिल्ली में अपनी संस्था से जुड़ने के लिए कहा तो वो तैयार हो गए और इस तरह छः छत्तीसगढ़ी कलाकारों के साथ दिल्ली आ गए। जिसमें ठाकुर राम, भुलवाराम, बाबूदास, मदनलाल, जगमोहन कामले और लालूराम थे। यहीं से हबीब तनवीर के जीवन में नया मोड़ आता है । जब हबीब ने हिंदस ु ्तानी रं गमंच के संस्थापक बेगम ज़ैदी से इन कलाकारों की मुलाकात करवाई तो वो बहुत नाराज़ हुईं, जिसका गहरा असर हबीब तनवीर पर पड़ा। हबीब जी ने हिंदस ु ्तानी रं गमंच को छोड़कर अपनी स्वतंत्र मंडली बनाने की सोची और वर्ष 1959 में गैरिज में मोनिका मिश्रा के सहयोग से 9 कलाकारों के साथ नया थिएटर की स्थापना की। यह नाम मोनिका मिश्रा द्वारा सुझाया गया था। हबीब तनवीर अब अपनी तरह का रं गमंच करने के लिए स्वतंत्र थे। अपनी मंडली के माध्यम से कई नाटकों की रचना की। गीत, संगीत एवं निर्देशन किया। यह सिलसिला एक खोज तरह माना जा सकता है । उस दौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत एक खोज का स्वर बुलंद किया तो दस ू री ओर हबीब तनवीर शहरी और ग्रामीण कलाकारों के साथ सामंजस्य बैठाने की उहापोह में निरं तर प्रयासरत थे। कहते हैं जब तक आपके सपने को पर नहीं लगता, तब तक उड़ने की जद्दोजहद
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जन ू 2021 अनवरत जारी रहती है । वर्ष 1982 में हबीब तनवीर के इस सपने को नई उड़ान दी नाटक चरणदास चोर ने। यह नाटक वर्ष 1975 में हबीब जी के द्वारा तैयार किया गया था। जिसके गीत हबीब साहब के मार्गदर्शन में तैयार किया था स्वर्णकुमार जी ने। नाटक के संगीत और वाद्ययंत्र रानूवर्धन के कुशल नेततृ ्व में पूर्ण हो सका। जिसके शुरुआती दौर में सरोद, सितार, वायलिन, चेल्लो के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी वाद्ययंत्र भी प्रमुखता से शामिल किया गया। यह नाटक नहीं बल्कि दर्शन है । चाहे इसके गीत हों, संगीत या धुन हो। कुल मिलाकर यह एक पूर्ण नाटक बना जो हबीब जी के सपने को उड़ान दे सका। मौका था लंदन में हो रहे 52 मुल्कों के एडिनबरा फेस्टिवल में चरणदास चोर नाटक को फ्रिं ड्ज़ फर्स्ट अवॉर्ड के प्रथम स्थान पाने का। उसके बाद तो जैसे यह कारवां रुका ही नहीं। अपनी मंडली के छत्तीसगढ़ी और शहरी कलाकारों के साथ नई रचनाओं की नाट्य निर्मित कर उसे दे श-विदे श में प्रस्तुति करते। नाटक को तैयार करने में 1 से 2 साल लग जाते। कथावस्तु के अनुरूप गीत लिखते फिर उसका संगीत और धुन बनाते, धुन ऐसी कर्णप्रिय होती कि दर्शकों को झूमने में मजबूर कर दे ती। नाटक के दौरान गीत और संगीत से जुड़े पहलुओं पर अपने दोस्त साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी से बातचीत करते। घुमक्कड़ी जीवन जीने वाले हबीब साहब अलग अलग प्रान्तों के गीतों की धुन उनकी मिठास को तलाशते रहते। कान के इतने पक्के थे कि कोरस के समूह में कई कलाकारों के गायन की रियाज़ के दौरान बेसुरे व्यक्ति की तलाश कर तुरंत पहचान लेत।े एक ही संवाद कलाकारों को कई तरीके से कहलवाते। छत्तीसगढ़ी कलाकारों को हिंदी न आने के कारण कई वर्षों तक जद्दोजहद करते रहे । फिर एक बार हबीब जी ने हिंदी के संवाद को छत्तीसगढ़ी में बोलने के लिए कहा तो जैसे उन कलाकारों के पर लग गए हों। उसके बाद हबीब जी ने कलाकारों के हिसाब से संवाद लिखना शुरू किया। पहले नाटक का ड्राफ्ट समझाते, फिर उसे इम्प्रोवाइज़ेशन करने के लिए कहते, नाचा के कलाकार इस काम में पारखी थे। वो तुरंत ही एक सीन बनाते और उसे प्रस्तुत कर दे त।े प्रस्तुति के दौरान हबीब साहब महत्वपूर्ण संवाद अपनी डायरी में लिख लेते और फिर कई महीनों तक उसका रियाज़ चलता। यदि अभिनेता उसी संजीदगी से संवाद बोलता तभी रखते, नहीं तो हटा दे ते थे। यानि पहले दिन संवाद में जितना मज़ा आया उतना ही मज़ा महीने भर बाद भी उस संवाद में आये तभी रखते थे। इतना धैर्य इतना साहस किसी महान आत्मा में ही हो सकता है । उनके लिखे नाटकों में विश्व प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर, आगरा बाज़ार, गांव के नाव ससुराल मोर नाव दमाद, मंगलू दीदी, बहादरु कलारिन, हिरमा के अमर कहानी, सड़क, पोगा पंडित,अनुदित नाटकों में मिट्टी की गाड़ी,कामदे व का अपना वसंत ऋतु का सपना, मुद्रा राक्षस, ज़हरीली हवा, शाजापुर की शांति बाई, जिस लाहौर नई दे ख्या वो जन्मया ही नई , राज रक्त आदि कई नाटकों का सज ृ न कर लगातार अपनी तरह का रं ग संसार रचते रहे । वर्ष 1972 में हबीब जी की नौकरी छूट चुकी थी, जो नगीन बेटी के जन्म के दौरान वर्ष 1964 में उन्हें
dyk;k=k मिली थी। मोनिका जी ने हबीब साहब को बहुत डाँटा, इसी बीच आर.के. धवन जी जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पी.ए. थे। उन्होंने हबीब तनवीर से राज्यसभा संसद सदस्य बनने की सहमति मांगी। हबीब साहब ने इसके लिए हाँ कह दी और इस तरह उनको राज्यसभा संसद सदस्य बनाया गया। उन्होंने कई फिल्मों में उम्दा अभिनय भी किया। हबीब साहब को रं गमंच के क्षेत्र में किये गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण, म.प्र. का कालिदास, भवभूति सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमें ट अवार्ड के साथसाथ पी.एच.डी. और डी. लिट की उपाधि दी गयी। हबीब साहब हमेशा कलाकारों के साथ नाटकों के संवाद को आसानी से दर्शकों तक पहुंचाने की जद्दोजहद करते रहे । उदय राम कहते थे - “ यदि यमराज आ जाए और वह कहे कि अब आपके जाने का समय हो गया है , तो हबीब यमराज से कहते कि ज़रा रुक जाओ, एक सीन कर लें फिर चलते हैं।” ऐसी दीवानगी, ऐसी यायावरी, ऐसा जुनून शायद ही किसी में दे खने को मिले। डायरी और पेन हमेशा उनके साथ चलता, किसी भी नाटक की निर्मिति के दौरान पूरा ड्राफ्ट तैयार करना, उस नाटक को रिसर्च से जोड़ना, कलाकारों को यथा स्थिति से अवगत कराना, गीत, संगीत, सेट,लाइट आदि सभी को बारीकी से परखना, रिहर्सल के दौरान कई बार भोर (सुबह) हो जाती थी, जिसके कारण कलाकारों का गुस्सा भी सहना पड़ता, कलाकारों का रे पर्टरी कंपनी छोड़ कर आना-जाना उसके बावजूद लगातार शो (प्रस्तुति) करना। मतलब एक व्यक्ति जो शासन-प्रशासन से लेकर ज़मीन से जुड़े आम नागरिक तक का ख़्याल रख, अपने नाटकों के माध्यम से लोगों को उत्साहित करे , यह कोई विशाल हृदय वाला व्यक्ति ही कर सकता है । हबीब साहब को वैश्विक स्तर पर विशाल वटवृक्ष की तरह दे खा जा सकता है । जिसकी अब कई शाखाएं हैं। मुझे उनके रं ग संस्थान से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ है । उनके लिखे नाटकों में अभिनय करने और बारीकियों को समझने का अवसर प्राप्त हुआ है । यही वह दौर था जब मुझे हबीब साहब के रं ग संसार को नज़दीक से दे खने का अवसर प्राप्त हुआ। अपने नाटकों में हबीब साहब कई रूपों में दिखाई दे ते हैं, जैसे शायर, कवि, नाटककार, लेखक, निर्देशक और जर्नलिस्ट सभी रूपों में परिपक्व थे। इस तरह इतना बड़ा रं ग संसार निर्मित कर हबीब साहब 8 जून सन 2009 में दनु िया को अलविदा कह गए। जितना विशाल हृदय, उतनी ही बड़ी सोच इंसान को महात्मा बनाती है । इसलिए निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि वह वैश्विक फलक के सज ृ न धर्मी थे।
शैलेन्द्र कुशवाहा रीवा, मध्यप्रदे श
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“पढ़िए और सज ृ नात्मक चैतन्य को जाग्रत कीजिए” - मधु प्रसाद, अहमदाबाद, गज ु रात
अनिवार्यता बन गयी। आज पुस्तकें पत्र पत्रिकाएँ, समाचारपत्र को पढ़ना मानो आदिम युग में जीना। यह इस पीढ़ी की कहें या इलेट्रानिक उन्नति का प्रतिफलन है या अज्ञानता का सीमान्त रीडिंग हे बिट जिनको है , ये अत्याधुनिक ही नहीं, ज्ञान, जनरल नॉलेज, संस्कार और धैर्यवान तो है ही, सौभाग्यशाली भी कि उन्हें पुस्तकों ने गढ़ा है , मढ़ा है और जीवन को सकारात्मक सज ृ नात्मक और सार्थक बनाने का सुयोग प्रदान किया। मेरा पूरा जीवन पढ़ते-पढ़ाते और नित स्वयं को तराशते बीता है । यह आदत जन्म से ही प्राप्त हो गई थी या कहूँ ऐसा परिवार, परिवेश प्रकृति का सान्निध्य मिला कि यह पता ही नहीं चला कि यह कब जीवन की
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थोड़ा शुरु से शुरू करती हूँ, क्योंकि बचपन में पड़ी इस नींव के कारण ही मेरी जीवन यात्रा तमाम अवरोधों, गतिरोधों, अवसाद, निराशा और दख ु ों को वहन करते हुए मुझे सशक्त बनाती रही, सर्जनात्मकता मुझमें भरती रही और सहज बने रहने का गुरु मंत्र प्रदान करती रही। मेरा बचपन खुरजा की तंग गलियों में खेलते कूदते और ‘पराग’ ‘नंदन’, ‘बाल भारती’, ‘राजा भइया’, ‘माधुरी’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘बेताल’ आदि पत्र पत्रिकाओं को पढ़ते बीता। मेरे पापा उस समय एन. आर. सी कालेज में अंग्रेजी के प्रोफसर थे। गरमी की छुट्टियों में कॉलेज लाईब्रेरी से, चीन, जापान आदि की लोक कथाएँ लाते, पंचतन्त्र, महाभारत, रामायण आदि की
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जन ू 2021 बातें घर में होती थीं। पापा बहुत तरह तरह की शिक्षाप्रद आध्यात्मिक और संतों आदि के बचपन की कहानियाँ सुनाते थे। पापा अंग्रेजी के प्रोफेसर थे इस कारण होमर की ‘इलीयड’, ‘ओडिसी’ आदि और शेक्सपीयर के नाटकों के कथाकरण आदि से आँख खोलते ही परिचय हो गया था। प्रेमचंद, शरतचन्द्र, रवीन्द्रनाथ टै गोर आदि भी पढ़े और समझे और आत्मसात बड़े होने तक किया है । मेरी मम्मी लखनऊ से थीं और पापा कानपुर से l
dyk;k=k से हुई थी, जिनको प्रकारान्तर में पापा ने सहारनपुर में महाराजसिंह कॉलेज में भारतीय इतिहास एवं. संस्कृति पर भाषण दे ने हे तु आमंत्रित किया था। पापा उस कालेज में अंग्रेज़ी के विभागाध्यक्ष थे। सहारनपुर में स्व. श्री कन्हैया लाला मिश्र ‘प्रभाकर’ जी हमारे स्कूल या कालेज में अक्सर मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में आते रहते थे। आदरणीय विष्णु प्रभाकर जी भी आए थे। में उस समय अंग्रेजी में एम.ए. के प्रथम वर्ष की छात्रा थी।
मेरी मम्मी अपने खानदान में लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.ए. करने वाली पहली महिला थीं। फिर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.टी. किया और बाद में विवाहोपरांत आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी से एम. ए. किया। भजन गाते रहने की उनकी आदत थी। नहाते समय, खाना बनाते समय कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती थीं । पापा और स्व. गिरजाकुमार माथुर परम मित्र थे। पापा उनके गीतों और कविताओं के प्रशंसक थे । पापा स्वयं भी गीत-कविताएँ आदि लिखते थे।
प्रारम्भ से ही मुझे गायन, वादन नतृ ्य और चित्रकला का शौक था। माँ शारदा की कृपा से उस समय आवाज़ भी अच्छी थी। बी.ए. में मेरे पास संगीत वादन (सितार) मुख्य विषय था, हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त भातखंडे महाविद्यालय से गायन में संगीत विशारद बारहवीं तक आते आते हो गया था। बी.ए. में हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों साहित्य का बहुत विशद और गहन अध्ययन किया। तभी से महादे वी वर्मा जी आत्मा में बस गई। विद्यालय में और कालिज में आयोजित पाठ्यक्रम सहगामी हर प्रतियोगिता में भाग उनके सारे लेखन को जो १९३८ से १९९८ तक लेती रही। कभी आई, कभी रह गई पर उत्साह कभी कम था, मैंने संकलित कर पुस्तक रुप में २०१८ में प्रकाशित नहीं हुआ। करवाया l मैं २०१६ में केन्द्रीय विद्यालय अहमदाबाद केंट से सेवा निवृत्त हुई थी। फिर दो वर्ष अनवरत में पापा के हमारे घर में उर्दू, फारसी, हिन्दी अंग्रेजी संस्कृत लेखन को एकत्रित कर संपादन में जुट गई I कागज भी सभी भाषाएँ बोली जाती थीं। पापा और मम्मी तो उर्दू, समय के साथ पीले हो गए थे। बहुत कुछ दोबारा लिखना फारसी में भी निष्णात थे। मणीपुरी नतृ ्य का भी कोर्स हुआ पापा की पुस्तक ‘अमर बाबू’ नाम से प्रकाशित किया पर वो पूरा नहीं हुआ, क्योंकि फिर पढ़ाई में अव्वल करवाई, क्योंकि उनके पिताजी और चाचा जी उन्हें बचपन आना जीवन का उद्देश्य बन गया था l मुझे अपने जीवन से ही ‘अमर बाबू’ कहते थे। वैसे उनका पूरा नाम ‘डॉ. में बहुत विशिष्ट और ख्याति प्राप्त महानुभावों से मिलने अमर नाथ जौहरी’ था। का सौभाग्य मिलता रहा । नाम गिनाऊंगी तो पोथी बन जाएगी। उनके संस्मरण लिखती रहती हूँ । पापा और मेरे सबसे बड़े भाई साहब दोनों बहुत ही सुमधुर गायक थे। आए दिन हमारे यहाँ गाने की महफिल गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहं स, स्वामी विवेकानन्द जमती रहती थी। बड़े भाई साहब ९ वर्ष की आयु से ही आदि की गाथाएँ कब मन में समाती चली गई पता कविताएँ- कहानियाँ लिखते थे, जो ‘पराग’, ‘नंदन’, ‘बाल ही नहीं चला। केन्द्रीय विद्यालय में और अन्य शैक्षिक ‘भारती’ आदि पत्रिकाओं में छपती थीं। पापा एन. आर. सी. संस्थानों में लगभग ३२ वर्ष अंग्रेजी पढ़ाती रही। मेरा कॉलेज के सांस्कृतिक आयोजनों के इनचार्ज भी थे। कालेज लेखन मातभ ृ ाषा हिन्दी में निरन्तर चलता रहा। जन्म में उस समय काव्य गोष्ठियां आयोजित होती थीं। मैं घुट्टी के साथ रीडिंग की आदत पड़ गई जो आज तक उस समय बहुत छोटी थी, पर तब से ही श्री नीरज दादा, भी वैसी की वैसी ही है । मैंने जीवन में जो कुछ, पाया श्री किशन सरोज दादा, श्री भारत भूषण दादा, श्री काका वह पारिवारिक वातावरण, मेरे पसंदीदा कवि, कथाकारों, हाथरसी दादा, श्री बालकवि बैरागी दादा आदि कालजयी चित्रकारों से, प्रकृति, परिवेश, मधुर-कटु अनुभव, मेरे सारस्वत साधकों को सुनने पापा के साथ जाती थी। गुरुजन, मेरे शिष्य, पड़ोसी, आत्मीय स्वजन या संक्षिप्त में कहूँ तो माँ शारदे की अनंत असीम कृपा से l पापा ने अपना शिक्षा क्षेत्र बिरला कालिज ऑफ एजूकेशन अब बी आई. टी. एस. से शुरु किया था। मम्मी कभी मैं महादे वी वर्मा जी को अपनी आत्मा में समाया बिरला बालिका विद्यापीठ में अंग्रेजी की शिक्षिका थी। वहाँ पाती हूँ, कभी नदी, पर्वत, झरने, वृक्ष, हरसिंगार मेरे से ही पापा की मित्रता स्व. डा. भगवत शरण उपाध्याय अन्दर हलचल करते हैं, कभी मेरे विद्यार्थियों की कौतूहल Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k भरी आँखें बाँधती है , कभी मेरे शिक्षकों का आशीष। यहाँ की कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव आदरणीय डॉ किशोर काबरा सर का सत्संग मात्र संयोग नहीं, मेरे जीवन की विशेष उपलब्धि है ।
हमारी अन्य तरह की रुचिपूर्ण क्रिया कलायों में किताब, पत्रिकाएं समाचारपत्र और जो भी अच्छी सामग्री मिले उसको आत्मसात कीजिए। पढ़ने से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है , ज्ञान से अन्तर आलोकित होता है ।
मैंने गीत की कविता की बारीकियाँ, अभिव्यक्ति की सर्तकता एवं शालीनता तथा उन्दों का विशद ज्ञान उनकी काव्य शिष्या बनकर प्राप्त किया। यह सार्वभौम सत्ता की अहै तुकी कृपा रही, जो परम विद्वान सद्गुरु का सानिध्य प्राप्त हो सका।
सर्जनात्मक विचार यापन लेते हैं, विषमताओं से लड़ने की शक्ति आ जाती हैं। आप सब केवल मोबाइल से ही जीवन पायन न करे । रीडिंग को अपने जीवन में एक अच्छे दोस्त की भाँति अपनाएँ । आप स्वयं में अद्भुत परिवर्तन पाएगें । जिनकी एसी आदत है वे अपने आस पास ऐसा वातावरण बनाएं, जिससे युवा पीढ़ी को रीडिंग है बिट आप सबसे जीवन की कुछ बातें साझा करने का की उपयोगिता का ज्ञान हो । तन,मन,जीवन का प्रक्षालन यह सुअवसर मिला है । इसका उद्देश्य मात्र इतना है कि अच्छी किताबें सदै व करती आई हैं। मैंने परिवार, परिवेश और सम-विषम परिस्थितियों को भरपूर जिया और बहुत सीखा। ताली बजाने वालों से भी लाइब्रेरी जाइए, जीवन के कुछ घंटे किताबों को और हँसने परिहास करने वालों से भी मेरा आज की युवा दे खते हुए व्यतीत कीजिए l कुछ किताबें पढ़ कर उनके पीढ़ी को यही संदेश है कि जीवन की विषमताएँ और विद्रूप विषय में साथियों से चर्चा कीजिए। आप के अन्दर का परिस्थितियां हमारी परीक्षा लेती हैं। रचनाकार यदि कुछ कहे , तो लिखिए फिर उसको पढिए l दे खिए,फिर आपके अन्दर कितना परिवर्तन होता है । सारी आप जानते हैं कि जीवन किसी के लिए भी सहज, ऊर्जा, सारी शक्तियां सर्जनात्मकता की और स्वयं ही सरल नहीं होता। कदम दर कदम अवरोध और विसंगतियां उन्मुख होने लगें गी l हमें ताकती रहती हैं। आज की युवा पीढ़ी बहुत सतर्क है , सजग है और महत्वाकांक्षी भी l महत्वाकांक्षा को हृदय तक सुकून और चैन आपके दोस्त बन जाएंगे। इस समय रखें यदि मस्तिष्क में चली गई और आप अपने निर्धारित हमारी युवा पीढ़ी को मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता गंतव्य तक पहुँचने में सफल नहीं हुए तो अवसाद और है । हमारी युवा पीढ़ी दे श का गौरव है । यही पीढ़ी हमारी पीड़ा आपको घेर लेती है । विरासत,हमारी सभ्यता,संस्कृति और आध्यात्म को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। यही कामना है , यही भावना है कठिन समय जीवन का एक चिर-परिचित अटूट और यही संदेश है । मैं लाई बेकन के शब्दों में कहना चाहती अंग है , जो किसी न किसी रूप में हर व्यक्ति के जीवन हूँ, “बौद्धिक,शारीरिक,आध्यात्मिक, सांस्कृतिक,मानसिक में कभी न कभी सम्मुख आ जाता है । यदि आपने पुस्तकों यानी सम्पूर्ण व्यक्तिव्य का सम्पूर्ण विकास” l को अपना साथी बनाया है तो जान लीजिए आपकी यह आदत आपको जीवन की जटिल और घातक परिस्थितियों ज्ञान अर्जन, मनोरं जन, सत्संग सब पुस्तकों के में संबल बनेगी और आप नैराश्य और अवसाद को चपेट साथ करते रहिए, प्रयासरत रहिए और पुस्तकों का अपना में कभी नहीं आएगें । अच्छी पुस्तकें पढ़ने से मन और मित्र और पत्र पत्रिकाओं, समाचारपत्र को दै निक दिनचर्चा आत्मा दोनों का परिष्कार होता है । पुस्तकें हमें अंदर से में शामिल कीजिए। आप पाएंगे कि आपका जीवन कितना सशक्त करती हैं और बाहर से ऊर्जावित | व्यवस्थित, सुनियोजित और सौन्दर्यमय हो उठा है । ये पंक्तियां याद आ रही हैं: अच्छी पुस्तकों की अच्छी बातें जब आप अपने साथियों या किसी से भी साझा करते हैं,तो आप का आदमी के अन्दर एक इंसान होना चाहिए, व्यक्तिव्य दिलचस्प होता जाता है । आप अर्नगल बातों से कायदे का घर में कुछ सामान होना चाहिए” दरू होते जाते हैं और नैतिक मूल्यों की ओर उन्मुख l आज वातावरण में दहशत, आतंक, असुरक्षा और अमानवीय दख ु द प्रसंग मन और मस्तिष्क को असुरक्षा की भावना से भर दे ते हैं। इसको एक कारण हमारा किताबें पढ़ने की अच्छी आदत के प्रति उदासीनता है ।
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मधु प्रसाद अहमदाबाद, गुजरात
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dyk;k=k गोविंदगढ़ का किला
विश्वनाथ सरोवर और गोविंदगढ़ का किला
- सुधीर सिंह, रीवा, मध्यप्रदे श
पर्यटन की अपार संभावनाओं को संजोए रीवा मुख्यालय से 20 किलोमीटर दक्षिण की ओर कैमोर पहाड़ की तराई में एक बहुत ही खूबसूरत जगह है गोविंदगढ़ l गोविंदगढ़ अपने तालाब और लेक पैलेस की वजह से काफी चर्चित है । कैमोर पर्वत की तराई में एक सरोवर एवं महल महाराजा रघुराज सिंह द्वारा बनवाया गया। बाद में महाराज मार्तंड सिंह की वजह से वैश्विक हुआ। इस तालाब और महल के निर्माण को लेकर कई कहानियाँ फैली हुई हैं l एक कहानी काफी चर्चा में है की रघुराज सिंह की शादी राणावत महारानी से इस शर्त पर हुई थी की मायके की तर्ज पर लेक पैलेस बनवाना पड़ेगा। दस ू री कहानी में महाराजा ने अपनी रानी को खुश करने के लिए जिससे वे अपने मायके को भूल जाएं या वैसा ही लगे l खैर जो भी हो, हमें एक नायाब तोहफा दिया महाराज ने। एक घटना याद आई, किसी कार्य के सिलसिले में याद आया आज से 28-29 वर्ष पूर्व लोक कला, गीत साहित्य पर काम कर रहा था उसी सिलसिले में कई बिरहा (अहिरहइ) गायकों से मिला। कई बिरहा में राजाओं की महानता बखान में बांध, बावली और तालाब बनवाने की तारीफ की गई, उन्हीं में एक बिरहा था जिसमें बताया गया था की कैसे राजा ने मिट्टी के बदले TOP अनाज दिया और गर्मियों में पानी, दस ू रे राजा
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कुआँ-तलैया बनवाते हैं, पर मेरे रीवा के राजा बनाते हैं सागर l कुछ वर्ष पूर्व की बात है एक गाँव में एक बहुत ही बुज़ुर्ग व्यक्ति ने कविता सुनाई उसे बिरहा कहते हैं l उसका आशय यह था कि महाराजा रघुराज सिंह से प्रजा का दख ु दे खा ना गया तो उन्होंने अपने बखारी के द्वार खोल दिए और सब का पेट भरते रहे और हमने एक मेड़ बनाया, करीब 6 या 7 किलोमीटर लंबा और चौड़ा, इतना कि दो सेना लड़ सकें। कैमोर पहाड़ से बारिश का पानी बह कर आ मिलता है बीहर में और मिल कर कभी कभी रीवा में उत्पात मचाया करता था l बांध बनाने से बहुत राहत मिली और पानी की परे शानियों से निजात भी विश्वनाथ सरोदर (गोविंदगढ़ तालाब) से फसलें सींची गई और रीवा में कई बार पीने के लिए पानी लाया गया है । बहरहाल तालाब निर्माण के पीछे जो भी कारण रहा हो । विश्वनाथ सरोवर का निर्माण कार्य प्रारं भ हुआ तो हज़ारों लोगों को काम मिला। कैमोर पहाड़ के तराई की भूमि में उत्तर की ओर एक खंदक की प्राकृतिक संरचना है । कैमोर पहाड़ जो 450 मीटर से भी ज्यादा ऊँचा है , पहाड़ पर से उतरती कई धाराएं यहीं आ कर एक दस ू रे से मिल कर एक बड़ी धारा का स्वरूप धारण कर लेती है । इसे सरिता बनने के पूर्व माटी की मोटी और मजबूत मेड़ से बांध दिया गया। बाधित धाराएं वहीं पर इधर-उधर फैल
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गई थीं l 1.3 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को जल प्लावित कर डाला और एक भव्य झील निर्मित हो गयी l इसका पूर्वी उत्तरी कोना जो कुछ ऊँचा था, नज़र आने लगा टापू सा l यहीं उस टापू पर लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में निर्मित हुए महल और दे वालय जिसमें रमा गोविंद भगवान की प्रतिमा स्थापित हुई और नामकरण हुआ ‘रमागोविंद मंदिर’ साथ ही निर्मित महल का नाम ‘लेक पैलेस’ l
गोविंदगढ़ का किला और विश्वनाथ सरोवर को ‘गोविंदगढ़ का तालाब’ l यहाँ तक कि पुरानी खंधो की बस्ती भी कहलाने लगी l गोविंदगढ़ बस्ती किले में हवामहल, कठबंगला, संगमरमरी बारादरी, सीपद्वीप सभी आकर्षक एवं अद्वितीय बने किले परिसर में कई मंदिरों का भी निर्माण किया गया। धीरे -धीरे बस्ती बढ़ती गई और एक छोटे से कस्बे का रूप ले लिया।
गोविंदगढ़ लेक पैलेस के परिसर में प्रसिद्ध जातियों के आम और शोभायमान वृक्षों के पौधे रोपे गए फूलों की क्यारियों से बगीचा सजाया गया । उत्तरी तरफ गहरी तथा चौड़ी खाई का निर्माण कराकर प्रवेश द्वार का निर्माण कराया गया। यह प्रवेश द्वार लकड़ी और लोहे का बना है जो जंज़ीरों और चरखियों के द्वारा उठाया गिराया जाता था। उठा दे ने पर द्वार बंद और गहरी चौड़ी खाई अवरोधक हो जाती थी। द्वार को गिरा दे ने से सेतु निर्मित हो जाया करता था। यह सब पूर्ण हुआ इसवी सन 1855 में मंदिर को तो लोग रामागोविंद भगवान का मंदिर ही कहते रहे l किंतु ‘लेक पैलेस’ को जनवाणी ने बना डाला
महाराजा रघुराज सिंह अपनी राणावत महारानी के साथ आकर यहीं रहने लगे थे। उनके बाद के सभी राजाओं और जनता के लिए यह स्थान गर्मियों की राजधानी रही आई थी। महल के दक्षिण की ओर सरोवर दरू तक फैला हुआ है । जिसके जल स्तर पर महल से उतरती हैं सीढ़ियां, हवाओं से विचलित लहरें मानो बारबार उन सीढ़ियों को धोती रहती हैं। बगल में ही खड़ा है लकड़ी का बना दो मंजिला कठबंगला, जिसका भूमि तल के नीचे वाला हिस्सा जल राशि को स्पर्श करता है । इसके ऊपरी तल पर महाराजा रघुराज सिंह और महारानी सौभाग्यकंु वरी (राणावत महारानी) बैठे हैं विश्वनाथ सरोवर को निहारते हुए।
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के महाराजा मार्तंड सिंह द्वारा विश्व के लिए सबसे बड़े योगदान की शुरुआत इसी किले से हुई 1951 में उन्होंने एक सफेद बाघ जिसका नाम मोहन रखा गया, को पाला और इसी के वंशज पूरे विश्व में फैलाए गए I मोहन की मतृ ्यु के बाद ससम्मान किले परिसर में दफनाया गया और समाधि बनाई गई, जो आज भी है I खुशकिस्मती से अब मोहन का वंश पुनः अपने मूल स्थान के पास वापस आ गया है , जिसे मुकंु दपुर के चिड़ियाघर में रखा गया है ।
महाराजा कट रमन सिंह ने अपने शासन काल में तालाब का विस्तार और किले में निर्माण कराया। अब सरोवर का क्षेत्रफल हो चला था 5 वर्ग किलोमीटर मेड़ के ऊपर से रामनगर और शहडोल को जोड़ने के लिए सड़क निकाली गई। सड़क के दोनों किनारों में प्रसिद्ध कलमी आम के पौधे रोपे गए। बीच-बीच में कटहल, जामन ु , दे शी-विदे शी दर्ल ु भ शोभायमान प्रजातियों के पौधे अन्यत्र स्थान से लाकर लगाए गए फूलदार झाड़ियां भी लगवाई गईं। केवड़े का तो अब जंगल ही तैयार हो गया है । कालांतर में जब रीवा शहर की आबादी बढ़ती गई, बिछिया और बीहर नदियों का जल सख ू गया तब इसी सरोवर का जल शहर तक लाकर पीने के पानी का प्रबंध हुआ था अब तो सोन नदी का पानी प्यास बझ ु ा रहा है ।
महाराजा मार्तंड सिंह जी ने 1968 में राज्य सरकार को यह स्थान दान में दिया, उस समय यह स्थान भव्य और व्यवस्थित था, बाद में सन 1984 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी द्वारा इस किले को पुलिस प्रशिक्षण शाला के लिए उद्घाटन किया गया तालाब के दक्षिणी भाग में एक कोठी जिसे महाराजा मार्तंड सिंह ने बनवाया है , खखरीकोठी कहते हैं। खखरी कोठी में दानी महाराजा मार्तंड सिंह जी का निवास स्थान था। यह कोठी किले से दरू है पर इसका दर्शनीय खूबसूरत मॉडल आज भी किले में शोभायमान है । एक महत्वपूर्ण बात छूटी जा रही थी वो ये कि रीवा राज्य में एक महत्वपूर्ण कजली का त्यौहार जिसे स्थानीय भाषा में खजुलैयाँ कहते हैं। इसका त्यौहार मनाने के लिए पहले गोविंदगढ़ के किले में ही आयोजन किया जाता था। हज़ारों लोग यहाँ आया करते थे l महाराजा स्वयं खजुलैयाँ के लिए बैठा करते थे स्थानीय लोगों से खजुलैयाँ लेने और दे ने की परं परा रही है । काफी दिनों तक गोविंदगढ़ के किले में रीवा राज्य की खजुलैयाँ बड़ी धूमधाम से मनाई जाती रही हैं।
अब यह किला सजने सँवरने की बाट जोह रहा है , जब से यह मध्यप्रदे श शासन के हत्थे पड़ा, अब यह शायद पर्यटन विभाग के अधिकार में है । समाचार माध्यमों गोविंदगढ़ के किले का निर्माण संभवत: 1852 से जानकारी मिलती रहती है , की ये होगा, वो होगा I पर से लेकर 1855 तक चला जिसे रघरु ाज सिंह जी ने शरू ु काफी दिन हो रहे हैं कुछ दिख नहीं रहा है की क्या होगा करवाया l लेकिन बाद में महाराजा रघरु ाज सिंह के वंशजों l बड़ा सा तालाब है , समद ृ ्ध प्रकृतिक छटा है , भव्य महल ने आवश्यक सधा र भी करवाया। इस किले में उलटा महल ु और मंदिर है और हाँ तालाब के मध्य में एक टापू भी है , भव्य सेंट्रलहाल जहाँ राजदरबार लगा करता था, बना है । जिसे मछली विभाग द्वारा सजाया गया था l सब इंतजार किले परिसर में महाराजा गला ु ब सिंह ने सन 1923 में में है कि किसी बुद्धिमान प्रशासक या जनप्रतिनिधि की दरियामहल का निर्माण कराया l अब खस्ताहाल हैं जो नज़रें इनायत हों l किला पहले खब ू सरू त और भव्य था। परिसर में आज भी दो गजरथ रखे हुए हैं एक बड़ा और एक छोटा । गजरथ एक विशाल रथ जिसमें हाथी जोते जाते थे और परू ा राजदरबार रथ पर विराजमान रहता था। सन 1911 में इंग्लैण्ड के सम्राट का भारत आगमन हुआ था तब सुधीर सिंह इन्हीं में से एक गजरथ दिल्ली भेजा गया था। इसी वंश
रीवा, मध्यप्रदे श
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dyk;k=k तन्हा तुम तब भी नहीं थे करीब तुम अब भी नहीं हो करीब दिल इतना सूना सा है । होने से किसी की कमी
रुकता नहीं जीवन कभी किसी का जीने को सांसें लेना बेमानी सा है । इस बगियाँ में है खुशबू तुम्हारी चाहे वजूद यहाँ नहीं तुम्हारा सपनों में भी तु ही करीब सा है l
एक सब ु ह मेरे नाम की एक सुबह मेरे नाम की होगी, जब तारों पर धूल न होगी,
जब आकाश को गिनने में भूल न होगी, जब मेरे दर्द खो जाएंगे,
जब मेरे दख ु सो जाएंगे,
जब निराशा की आंधी छट जाएगी,
तब एक सुबह मेरे नाम की होगी ।। जब बरसता झिरझिर सावन होगा, स्वपनिल मेघों का आँचल होगा,
आशाओं का जगमग इन्द्रधनुष होगा, मानव रूप में युग पुरुष होगा,
आकाश से जीवन सरिता उतरे गी,
ये चाहत तुम्हारी न कम थी पहले न अब होगी पहले से कम यादों के झरोखों में निगाहों में नमी सी है l जलसा-ए-जीवन भी होगा जश्न-ए-जिंदगी भी होगी तुम बिन इतने अकेले सी है ।
मुकेश बिस्सा जैसलमेर, राजस्थान
तब एक सुबह मेरे नाम की होगी ।। घरों पर बिखरती चन्द्रकिरण होगी,
आशा कुलांचे भरती हिरनी सी होगी,
विश्व की हवा हरि सुमिरन सी होगी,
मानवता शांति की पायल छनकाती होगी, भूख,गरीबी,बेकसी मँह ु छिपाएगी,
तब एक सुबह मेरे नाम की होगी ।।
रं जना मजूमदार नई दिल्ली
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ू dyk;k=kजन
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डिजिटल पें टिंग्स
नैत्री सोनी अहमदाबाद, गज ु रात
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मूर्तिकार
रानी अधिकारी, नई दिल्ली
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dyk;k=k मध्यप्रदे श के लोकनतृ ्य
- राजश्री तिवारी पाण्डे , बालाघाट, मध्यप्रदे श मध्यप्रदे श की अपनी ही एक लोक कला संस्कृति है । यह संस्कृति परं परा के रूप में वर्षों से चली आ रही है । मध्यप्रदे श भारत का एक ऐसा प्रदे श जो आदिवासीय बहुत क्षेत्र के रूप में जाना जाता है । भारतवर्ष की तरह यहाँ भी सभी धर्मों के लोग रहते हैं, किन्तु यहाँ की मुख्य विशेषता ये है की दे श के सबसे प्रसिद्ध आदिवासी मध्यप्रदे श के ही निवासी हैं।
करते हैं । कर्मा नतृ ्य गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है । रं ग-बिरं गे कपड़ों व जेवरों से सजे नर्तक बहुत ही मोहक लगते हैं ।
३) मटकी नतृ ्य : मालवा की मिट्टी की सुगंध लिए, अलग-अलग अवसरों पर किया जाने वाला यह नतृ ्य एक सामूहिक नतृ ्य है जिसे एक विशेष प्रकार के वाद्ययंत्र से संचालित किया जाता है । मटकी नतृ ्य विशेष रूप से विभिन्न जनजाति के लोग अपने अपने समूहों में , महिलाओं द्वारा किया जाता है । भिन्न त्योहारों पर विभिन्न पारं पारिक नतृ ्य करते हैं। यह उनकी परं परा का एक हिस्सा है , जो आज मध्यप्रदे श के ४) तत ृ ीली नतृ ्य : यह भी बेहद लोकप्रिय नतृ ्य है । इसमें लोकनतृ ्य कहे जाते हैं । मंजीरों को पांव, घुटने,क़मर,कंधे आदी शरीर के विभिन्न हिस्सों पर बांध कर तथा दोनों हाथों में भी मंजीरे ले कर मध्यप्रदे श के कुछ लोकनतृ ्य इस तरह से बंटे हुए उन्हें विशिष्ट लय में बजाया जाता है । इस नतृ ्य में गति हैं जिनमें , पुरुषों के नतृ ्य, महिलाओं द्वारा किए जाने वाले वाली भंगिमाएं विशेष आकर्षित करती हैं । यह नतृ ्य कमर नतृ ्य, महिला वर्ग पुरुष दोनों के साथ किए जाने वाले नतृ ्य जनजाति के लोगों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । इसे दो तथा एक विशेष प्रकार का नतृ ्य होता है जो केवल कंु वारी अथवा तीन महिलाएं ज़मीन पर बैठ कर प्रस्तुत करती हैं। लड़कियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । ५) मुरिया नतृ ्य : मुरिया नाम ‘मुरीस’ जनजाति से पड़ा इन नतृ ्यों को विभिन्न नामों से जाना जाता है जो है । मुरीस जनजाति के लोग अपने दे वता की पूजा में कि नीचे दिए गए हैं : प्रार्थना के रूप में साथ ही साथ नतृ ्य शुरू करते हैं । १) राई नतृ ्य : राई नतृ ्य मध्यप्रदे श का राजकीय नतृ ्य है ६) बारदी नतृ ्य : अन्य नतृ ्य की तरह बारदी नतृ ्य भी । यह नतृ ्य विशेषतः विवाह आदि पर विशेष रूप से किया दिपावली से शुरू होता है तथा कार्तिक पूर्णिमा तक किया जाता है ।राई नतृ ्य एक लोकप्रिय नतृ ्य है । जाता है । इसमें नर्तकियां सुंदर वस्त्र धारण कर के युवकों के सामने नतृ ्य प्रस्तुत करतीं हैं । २) कर्मा नतृ ्य (कर्म नतृ ्य) : राज्य के लगभग सभी आदिवासी नतृ ्यों में यह सबसे पुराना माना जाता है , इसे ७) अहिरी नतृ ्य : यह नतृ ्य ग्वालियर की विशेष पहचान है बोली भाषा में ‘कर्मा’ कहा जाता है । यह नतृ ्य । इसे पशुपालकों द्वारा धार्मिक आयोजन पर किया जाता भाद्रपद से कार्तिक मास तक किया जाता है l है , इस समुदाय में इसका विशेष महत्व होता है । जिन TOP गोंड,बैगा,कोरकू समुदाय के लोग इस नतृ ्य को समुदायों के लोग यह नतृ ्य करते हैं उन्हें भगवान कृष्ण
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का वंशज माना जाता है ।
से प्रार्थना करती हैं ।
८) लेहंगी नतृ ्य : मानसून के दौरान ‘बंजारा’ तथा ‘कंजर’ जनजाति द्वारा किया जाता है ।’राखी’ के त्यौहार पर भी यह नतृ ्य किया जाता है । इसे पुरुषों द्वारा हाथ में लाठी लेकर किया जाता है । यह भी एक लोकप्रिय नतृ ्य है ।
१३) भगोरिया नतृ ्य : यह नतृ ्य शुभ अवसरों पर किया जाता है । इसे प्रसन्नता एवं खुशी की भावना व्यक्त करने के लिए भील आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । हम नतृ ्य विशेष रूप से बारात का स्वागत तथा मनोरं जन के लिए करते हैं ।
९) जवारा नतृ ्य : जवारा नतृ ्य मुख्यत: समद ृ ्धि के लिए उत्सव के तौर पर करते हैं । ‘बुंदेलखंड’ क्षेत्र में यह नतृ ्य १४) परधोनी नतृ ्य : यह नतृ ्य भी विवाह के अवसर पर ही स्त्री एवं पुरुष दोनों ही साथ साथ करते हैं। स्त्रियां सिर किया जाता है । बैगा आदिवासियों द्वारा बारात आगमन पर जवारे की टोकरी अथवा पड्डा रखकर नतृ ्य करती है । पर किया जाता है । १०) फूल पाटी नतृ ्य : यह नतृ ्य कंु वारी कन्याओं द्वारा किया जाने वाला नतृ ्य है । होली के पर्व पर विवाह हे तु यह नतृ ्य किया जाता है ।
१५) सुवा नतृ ्य : सुवा नतृ ्य करबा के आदिवासियों द्वारा ‘छे डछड़ा’ त्यौहार पर किया जाता है । पंद्रह दिन यह त्यौहार चलता है । महिला एवं पुरुष साथ करते हैं। क़मर एवं गोंड समाज के लोगों द्वारा यह नतृ ्य प्रस्तुत किया जाता है ।
१०) ग्रिडा नतृ ्य : जैसे कि हम सभी जानते हैं मध्यप्रदे श एक कृषि प्रधान राज्य है और यहाँ फसलों की बुआई से लेकर कटाई तक की शुरुआत में पूजा अर्चना करने का और भी कई नतृ ्य हैं जैसे कि ग्रिडा ,सैला नतृ ्य जो रिवाज़ है । इसी के तहत जब रबी की फसल बोई जाती छिं दवाड़ा, बैतूल, सरगुजा जिलों में विशेष लोकप्रिय है । है तब यह ग्रिडा नतृ ्य किया जाता है । सैरा, ढिमरई, रास, रावला, रात बधाया, कातिकिया, दे ई दे वता, काठी, कहरवा, डाडरिया आदी । ११) रीना नतृ ्य : दीपावली पर्व के बाद यह नतृ ्य करने की परं परा है । इस रीना नतृ ्य को महिलाओं द्वारा प्रस्तुत मध्यप्रदे श के आदिवासी व अन्य जनजाति जैसे किया जाता है । विशेष कर बैगा एवं गोंड समाज की गोंड, बैगा, कोरकू, भील, भारिया, कोल आदि सभी के महिलाओं द्वारा किया जाता है । पारं परिक लोकनतृ ्य हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं जिसे हमें अगली पीढ़ी तक संभाल १२) नौराता नतृ ्य : यह नतृ ्य विशेष रूप से अविवाहित कर रखना चाहिए । कन्याओं के लिए होता है । मध्यप्रदे श के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस नतृ ्य की परं परा है । इस नतृ ्य में कंु वारी कन्याएं राजश्री तिवारी पाण्डे अच्छे जीवन साथी व सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ईश्वर बालाघाट, मध्यप्रदे श Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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आज की शिक्षा पद्धति हमारे समय की बात अलग ही थी। हमें हमारे माता पिता ने हमारी संस्कृति,परं परा,प्रेम,त्याग,आदर,सह नशक्ति आदि गण ु ों से परिपर्ण ू भर दिया था। यही सब हमारे समय में विद्यालय में भी होता था। हर पाठ के पीछे तात्पर्य और उद्देश्य के साथ नीति कथाएं बताकर पाठ की शरु ु आत होती और उस पाठ का असर जीवन पर ज़रूर पड़ता था और जीवन की परिभाषा समझ भी जाते थे। हमें पग पग पर हार का सामना करना पड़ता तो माता पिता कहते और मेहनत करो, एकाग्रता से पढ़ना सिखो। पढ़ने के साथ-साथ खेलकूद, मौज मस्ती, दादी माँ की कहानियां, कहानियों में छिपे मर्म और औषधियों की परू ी जानकारी हमें लगभग मिल ही जाती थी । हम हमारे जीवन में घर का सारा काम कर फिर पढ़ाई करते थे। माता-पिता व गरु ु का आदर हमने हमारे जीवन काल में भरपरू किया। विद्यालयों में काले फलक पर तो सफेद खड़ू ऐसे चलता मानो कोयले की खान में मोती चमक रहें हों, जिसे दे ख हम विद्यार्थी फलक पर लिखने के लिए भागे-भागे जाते, कभी मह ु ावरों से फलक सजाते तो कभी सवु िचारों से सजाते। पाठशाला हो, प्रौढ़ शिक्षा हो, महाविद्यालय हो, इन क्षेत्रों में हमेशा खेलकूद जैसे खो-खो, कबड्डी, फुटबाल, रस्सी खेंचा, लगोरी, गल्लि डंडा, जेवलीन थ्रो, ु TOP डिसकस थ्रो आदि खेल बाहरी प्रांगण में खेले जाते थे। आज यह कहीं लपु ्त होते नजर आ रहें हैं। अब
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- डॉ वसुधा पु. कामत, बैलहोंगल, कर्णाटक तो सिर्फ खाली मैदान, जैसे वो दोनों हाथ फैलाकर हमसे बोल रहा हो आओ और खेलो और मुझे कृतार्थ करो । जब भी परीक्षाओं का समय आता, हर बच्चा तनाव ग्रस्त नज़र आता, दिन रात पढ़कर भी वह 65% से 80 %के आगे नहीं बढता । इतना ही नहीं कई बच्चे तो साधारण अंकों से पास होने को ही गौरवान्वित समझते थे l बस समय समय की बात , ना जाने कहां गये वो दिन । • आधुनिक शिक्षा के लिए विचार अब के बच्चे हमेशा मानसिकता से घिरे नज़र आते हैं। ना खेलना, ना कूदना, बस हमेशा पढ़ाई, ट्यूशन से स्कूल, स्कूल से ट्यूशन, ट्यूशन के बाद मोबाइल या कंप्यूटर के सामने नज़र आते हैं । हमेशा तनाव सेे घिरे रहते हैं या फिर अपने मित्रों से बात करते नज़र आते हैं। रिश्तों से भागते हैं, खुलकर बात नहीं करते, उनको रिश्तों से भी ज़्यादा मित्र मंडल प्रिय है । कई बार बच्चे घरवालों से अपनी निज़ी बात छुपाते हैं पर अपने मित्रों से बोलना नहीं भूलते, अकेले में समय यापन करना उन्हें पसंद है । घुल-मिलकर नहीं रहते, ऐसे अनेक गुण बच्चों में नज़र आते ही नहीं और इसके जिम्मेदार हम पालक हैं , जिन्हें बच्चों के मन के बात को जानने से ज्यादा उनके फलितांश की चिंता है l आडंबिक जीवन के कारण हर पालक को उनके सोसायटी में उनके प्रेस्टिज की चिंता है और कई बार
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पालक खुद जाकर पैसे दे कर बच्चों के फलितांश भी बदल आते हैं और इसका असर सीधे उनके जीवन पर पड़ता है । आजकल हर बच्चा बंदिशों में पल रहा है । घर में बंदिश, पाठशाला में बंदिश, उसे खुद का सोच विचार करने के लिए समय दे ते ही नहीं, हमेशा अपनी ही सोच उन पर लाद दे ते हैं । हमारे समय में माता पिता हमें सोचने पर मजबूर करते, गर आपको सीखना है तो खुद के बलबुते पर, इसलिए हम आत्म निर्भर होकर जी रहे हैं ।
है , इस पर ध्यान दें । 9. बच्चों को परीक्षा में जितने अंक प्राप्त हुए हैं, उसी के अनुसार उसके ज्ञान की बढ़ोतरी करें l 10. इंटरनल अंक को निकाल दे ना ही बेहतर है । 11. सेम होने के कारण बच्चा सही ज्ञानोदय की ओर नहीं जा पा रहा । 12. आज की शिक्षा पद्धति के कारण बच्चा आत्म निर्भरता खो रहा है ।
आजकल के बच्चे पालकों पर निर्भर है l हमारे समय के जैसे दिन शायद कभी नहीं आएंगे, हम लोगों ने खुले आसमान में जीना सीखा तो आज के बच्चे बंद दरवाजे में पढ़ना लिखना सीख रहें हैं तो सहज है , वे कहीं न कहीं मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं और गुजरते रहें गे। इसलिए आज की शिक्षा पद्धति को दे खते हुए इन बातों का ज़रुर ध्यान रखना चाहिए :-
हर बच्चा हम दे ख सकते हैं, हर बात को कंठस्थ करता नज़र आता है , क्योंकि आजकल के शिक्षकों को वही उत्तर चाहिए, जो पाठ्य पुस्तक में है । बच्चा स्वावलंबी होने के बजाय परावलंबी नज़र आ रहा है ।
ऐसे अनेक कारण हैं, जो आधुनिक और तकनीकी शिक्षा पद्धति के कारण बच्चा कहीं न कहीं अपनी आत्म 1. बच्चों को सबसे पहले अच्छे संस्कार मिलें । निर्भरता खोता नज़र आ रहा है । वह हमेशा इंटरनल अंक 2. बच्चों को भारतीय संस्कृति का परिचय दें l पर ज़्यादा निर्भर है । अब हर बच्चे को आत्म निर्भर बनाना 3. बच्चा ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल के बाद माता पिता के है तो ऑनलाइन ही सही, सबसे पहले नितीश पाठ सिखाया साथ समय गुज़ारे । जाए और बच्चों में आत्म निर्भरता भरने का प्रयास करना 4. बच्चों को छोटी उम्र में ट्यूशन ना भेजकर माता पिता यह हम सबका परम कर्तव्य है । ही समय निकालकर सिखाएं। 5. बच्चों को नीति बोध के पाठ पढाएं । 6. पढ़ाई का महत्त्व समझ आए इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा पुस्तकें पढ़ने की आदत रखें। डॉ वसुधा पु. कामत 7. जब बच्चे मोबाईल लें तो बड़ा कोई उनके साथ रहें । बैलहोंगल, कर्नाटक 8. प्रतिशत से ज़्यादा बच्चा कितना ज्ञान प्राप्त कर पाया Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k मध्यप्रदे श का खान-पान
- अनज ु शक ु ्ला, भोपाल, मध्यप्रदे श मध्य प्रदे श
रजवाड़ों का राज्य रहा है और यहाँ के राजघराने ग्वालियर और इंदौर में स्थित थे। यहाँ के खान-पान में रजवाड़ों की स्पष्ट छाप दिख जाती है । जहाँ ग्वालियर और इंदौर के व्यंजनों में दध ू का इस्तेमाल ज़्यादा होता है , वहीं भोपाल के व्यंजनों की विशेषता मांस और मछली है । वे इन व्यंजनों में खासतौर पर तीखेचटपटे रोगनजोश, कोरमा, बिरयानी, कबाब को मुख्य रूप से शामिल करते हैं। लेकिन आप मध्य प्रदे श के इन ज़ायकों को एक साथ चखने की कोशिश ना करें क्योंकि ये काफी गरिष्ठ होते हैं, जिससे हाज़मा बिगड़ने का खतरा रहता है । दे श का दिल यानी मध्यप्रदे श अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है । त्योहार-उत्सव, नाच-गान, सभी में मध्यप्रदे श की अनूठी छाप नज़र आती है । राज्य की विविधता इस तरह से दे खने को मिल सकती है कि अगर उत्तरी मध्य प्रदे श दे खें तो वहां के तौर-तरीके, रहन-सहन अलग दिखाई दे ते हैं और दक्षिणी क्षेत्र की तरफ दे खें तो वे भी अपनी अलग सांस्कृतिक विरासत को समेटे नज़र आता है । मध्य प्रदे श के लोग अपनी मेहमानवाज़ी के लिए काफी मशहूर हैं उनकी मेहमाननवाज़ी “अतिथि दे वो भव:” के कथन को चरितार्थ करती हुई लगती है । जब TOP भी उनके घर कोई मेहमान जाता है , वे उनका स्वागत स्वादिष्ट व्यंजन और डेज़र्ट से करते हैं।
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मध्यप्रदे श के ग्रामीण लोग मेहमाननवाज़ी के मामले में ज्यादा ही धनी होते हैं। उनके घर से कोई मेहमान भख ू ा जाए इसे वे अपनी बेइज्ज़ती समझते हैं। भारत के इस राज्य की संस्कृति खान-पान में भी धनी है और वहाँ के रीति-रिवाज़ में भी विविधता दे खी जा सकती है । • खान-पान की विविधता मध्यप्रदे श में व्यंजन स्थान के अनस ु ार बदलते हैं, अलगअलग क्षेत्र के अलग खान-पान हैं। उत्तर और पश्चिम क्षेत्र में जहाँ लोग रोटी और मीट खाना पसंद करते हैं। वहीं दक्षिण और पर्व ू के लोगों का पसंदीदा व्यंजन चावल और मछली है । व्यंजनों में खास वहाँ के व्यंजनों में बाफला काफी मशहूर है । ये आटे का केक होता है , जो दे शी घी से बनाया जाता है । इसे लोग दाल के साथ खाते हैं, इस स्वादिष्ट व्यंजन को मीठे लड्डू के साथ लिया जाए तो इसका ज़ायका और बढ़ जाता है । गर्मियों के दिन में यहाँ के लोग अपने भोजन में फलों को विशेष रूप से शामिल करते हैं, आम, खरबज ू ा, तरबज ू , शरीफा, केला, पपीता अमरूद जैसे मीठे फल खाने के अंत में जरूर लेते हैं। • शाकाहार मध्यप्रदे श के भोजन में शाकाहार का भी बेहद महत्व है । यहाँ के व्यंजन राजस्थानी और गज ु राती खाने का मिश्रण लगते हैं। लेकिन इन दो जगहों की तरह यहाँ बेसन का इस्तेमाल नहीं होता। बेसन की जगह लोग ज्वार का
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इस्तेमाल करते हैं, लेकिन गें हू यहां का मुख्य भोजन है । राज्य के ज़्यादातर व्यंजन शाकाहारी होते हैं। यहाँ के व्यंजनों में भुट्टे के कीस काफी मशहूर हैं, इसे भुट्टे और दध ू से बनाया जाता है । पहले भुट्टे को अच्छे से पीसते हैं और फिर इसे घी में भूना जाता है । इसके बाद इसमें दध ू डाल कर, फिर मसाला मिलाया जाता है । इस खाने का अंदाज़ कुछ ऐसा है कि एक बार अगर किसी ने खा लिया तो वे इसे बार-बार खाने की चाह रखता है । मध्यप्रदे श के कुछ खास मीठे पकवान काफी मशहूर हैं, ये हैं मावा बाटी, खोपरापाक, श्रीखंड और मालपुआ। • मांसाहार
मुरीद बन जाता है । यहाँ के दावतों में कबाब विशेष रूप से खिलाया जाता है , खासतौर पर सींक कबाब, शामी कबाब। मध्यप्रदे श के खान-पान में वैसे ज़्यादातर शाकाहारी खाने मध्यप्रदे श की कई चीजें दे श के अन्य हिस्सों से अलग हैं। मिलते हैं, लेकिन मांसाहार खाने वालों की संख्या भी कम मध्यप्रदे श के मालवा क्षेत्र के व्यंजनों के ज़ायके की बात नहीं है । स्वादिष्ट मांसाहारी व्यंजन विशेष कर भोपाल ही अलग है । कई लोगों ने मध्यप्रदे श के व्यंजनों के बारे में पाया जाता है । यहाँ का मसालेदार रोगनजोश काफी में इसलिए नहीं सुना क्योंकि यहां की जनसंख्या का बहत ु मशहूर है , अगर कोई एक बार इसे खा ले तो फिर इसका सा हिस्सा जनजातियों का है , जो कभी राज्य से बाहर ही नहीं निकले। शायद इसी वजह से राज्य की खूबसूरती राज्य के अंदर ही सिमट कर रह गई है । • भारत के स्ट्रीट फूड की राजधानी मध्यप्रदे श के ज़ायके का आनंद लेना चाहते हैं तो फिर इंदौर जरूर जाएं। यहां के होटलों, रे स्तरांओं में मध्यप्रदे श की खुशबू के दर्शन अवश्य होंगे। इंदौर वैसे भारत के स्ट्रीट फूड की राजधानी कहलाता है । यहां के सर्राफा बाज़ार और छप्पन दक ु ान काफी मशहूर गली है , जो नमकीन और मीठे के शौकीन लोगों के लिए काफी शानदार जगह है । दक ु ानों के स्टॉल में कई ऐसे व्यंजन दिख जाते हैं जो दे श के अन्य कोने में मुश्किल से ही दिखते हों। पोहा, जलेबी, भुट्टे का कीस यहां लोगों में काफी चर्चित है । यहाँ की चाट और मिठाई की दक ु ान में लोगों की भीड़ हमेशा ही दे खने को मिलती है , इसीलिए आपको भी इन व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए लंबी कतार को पार करने की जरूरत होती है । जहाँ तक मध्यप्रदे श के लोगों की बात है , वे अपने खान-पान को लेकर काफी क्रे ज़ी होते हैं। ये सब कुछ उनके खाना बनाने के तरीके में नज़र आता है । वे खान-पान के मामले में बहुत गुणी होते हैं। भारतीय व्यंजनों में मध्यप्रदे श के व्यंजनों का काफी महत्वपूर्ण स्थान है ।
अनज ु शुक्ला भोपाल, मध्यप्रदे श Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k माँ तेरा आँचल कुछ रं ग भरे फूलों ने, कुछ रं गे हमें बादल ।
सोंधी खुशबू दे ता है माँ अब भी तेरा आँचल ।। कितने दःु ख सहे होंगे, उजगी होंगी कितनी रातें l
बरु ी नजर से बचे रहें लगाए तन ू े कितने काजल ll तेरी डाँट से क्षाुब्ध हो माँ छिप कहीं हम सो जायें l व्याकुल विह्वल हो-हो के ढूँढ़ - ढूँढ़ होती पागल ll नभ से माँ तू ऊँची है , तू सागर से भी गहरी l
रहती बन के सदा साथ माँ प्रहरी सजग अटल ll तेरा सदा मचलता वात्सल्य, दया स्नेह दला ु र l
छलक आता आँसू तेरे दृग से जब होता घायल ll तेरा हृदय हिमालय सा माँ, पर हिम जैसा है मन l बरु ी बला जो सिर आ जाये मनौती करती विकल ll विधर्मों से बचा रहें हम खरा उतरें तेरे पड़ले l नेक राह पर चल सके हम व्रत रखती है निर्जल ll सिखायी तू पाँव से चलना, तूने ही जग की भाषा l पढ़ लिख बडा ़ बन जाऊँ तूने बेची अपनी पायल ll निस्पृह तपसी आचारी प्रणम्य है तू दे वी माँ l
परिपुष्ट कर विज्ञ बनाया गुरुकुल माँ तेरा आँचल ll
जय हिन्द सिंह ‘हिन्द’ आजमगढ़, उत्तर प्रदे श
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माँ माँ गंगा सी पावन माँ पतझड़ में सावन माँ गीता का ज्ञान माँ ही वेद पुराण माँ तल ु सी की क्यारी माँ सुंदर फुलवारी माँ की एक मुस्कान हर लेती पीड़ा सारी माँ स्नेह का निर्झर माँ ममता का सागर दया, प्रेम, धैर्य, त्याग, माँ समर्पण की मरू त माँ सुख का आंचल माँ आँखों का काजल माँ जीवन का प्रकाश माँ बिन जग अंधकार माँ हृदय का स्पंदन माँ मख ु की मुस्कान माँ शब्द में ही बसता संपूर्ण संसार माँ काबा कैलाश माँ जग का आधार माँ के चरणों में सारे तीर्थ चारों धाम माँ दे वी स्वरूप माँ ईश्वर का रूप माँ स ृष्टि का नूर माँ ही कोहिनूर माँ के आशीर्वाद से बन जाते बिगड़े काम माँ की सेवा मात्र से खुल जाते स्वर्ग के द्वार
प्रेमलता चौधरी फालना, पाली राजस्थान
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जन ू 2021
dyk;k=k प्रकृति
रचाया जब यह संसार, सजाया भी जतन करके l
दिया हमको खुला आकाश, जो है अनन्त से बढ़के ll अथाह सागर भी धरती पर, हिलोरे मारता है क्यूं l
सुंदर फूल लाल, पीले, हरे , गुलाबी,
कितने सुंदर लगते फूल l
खुशबू बिखेर दें जीवन में ,
खज़ाने भरके लहरों को, किनारे डालता है यूं ll
जीवन में रं ग भरते फूल ll
गिरी पर्वत या वन उपवन, सजाया खेत फसलों से l
फूल खिले ख़ुश होता मन,
कहीं सर्दी कहीं गर्मी, कहीं बसंत पतझड़ से ll
लुटाया है बहुत कुछ पर, दिये है कुछ नियम हमको l करोगे पालन जब ही, करे गी तपृ ्त ये तम ू को ll
रं ग बिरं गे अच्छे लगते फूल l हर मौसम में अलग अलग,
ख़ुशियों के रं ग भरते फूल ll
अगर तुम साथ चलते हो, तो ये भी साथ चलती है l
गुलाब, चमेली, चंपा, गें दा,
प्रकृति ने धरोहर से, नवाज़ा है ओ अनज़ानों l
न कोई खुशबू फूलों जैसी,
गर तू हाथ न थामे, तो दो - दो हाथ करती है ll
कितने सारे महकते फूल l
समझ लो संगी साथी है , सहोदर है ये पहचानो ll
सारे ग़म को हम जाते भूल ll
कभी तू बन ज़रूरत, ये कभी तेरी जरूरत हो l
सुबह पार्थना करें प्रभु का,
तू अपनी चाल चलता है , ये अपनी चाल चलती है ll
चरणों में करते अर्पित फूल l
प्रभु के ही रचाए हैं, प्रकृति और तू मानव l
सम्मान करें हम श्रेष्ठजनों का,
प्रकृति रूप में बैठा, प्रभु हमको चेताता है l
मनुष्य के अंतिम यात्रा में ,
न मानेगा अगर उपकार, तो ये प्रतिकार करती है ll
हार में गढ़े गुलाब के फूल ll
समय की चाल मत बदलो, यही हमको बताता है ll
श्रद्धाजंलि में चढ़ाते फूल l
समपर्ण भाव जो रखें, तो अंगीकार करती है ll
तिरं गे में लिपटाते फूल ll
दिया है ज्ञान और बुद्धि,
इसे समद ृ ्ध करने को l
जब शहीद कोई हो सैनिक,
प्रकृति है , प्रकृति की तरह ही बात करती है l
सुख व शांति के प्रतीक,
हाँ, अंगीकार करती है l
चिंतित जब हम होते हैं,
समर्पित जो करें खुद को, तो ये स्वीकार करती है ll हाँ, स्वीकार करती है ll
सलोनी रस्तोगी जयपुर, राजस्थान
सदियों से रहे हैं फूल l
सुकून सदै व दे ते फूल ll
लाल दे वेन्द्र श्रीवास्तव बस्ती, उत्तरप्रदे श
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अनुराग्यम ्
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मध्यप्रदे श के लोक-गीत
- विनीता पंढ ु ीर, संपादिका, कलायात्रा मध्य प्रदे श की संस्कृति, परम्परा, बोली-भाषा, आधारित होता है l रहन-सहन, जनजातियों व लोक-नतृ ्य से सजा हुआ है , तो भला लोक-गीत से कैसे अछूता रह सकता है l लोक-गीत • संत सिंगाजी भजन : समूची निर्माण एवं माला के यानि कि लोक जगत के गीत, लोक समाज के लोग अपने कुछ हिस्सों में यह लोकगीत किसी भी अवसर पर तरीके से छं दबद्ध वाणी से रचना या गीत का सज न इतने गाए जाते हैं l खेती एवं गह ृ ृ स्थी संबंधी प्रतीकों के सुन्दर और विशिष्ट तरीके से करते हैं कि एक बार सुनने साथ आध्यात्मिक भजन गायन इसके विषय होते हैं l मात्र से ही मन आनंदित हो उठता है l शादी-ब्याह, मौसमउच्च स्वर में एकल एवं समूह गायन शैली होती है l परिवर्तन, नई फ़सल, तीज-त्यौहार व पूजा -पाठ इत्यादि जैसे अवसरों पर ये लोक गीत एक एक अलग माहौल बना • फाग गायन : निमाड़, बंद ु े लखंड एवं बघेलखंड में ये दे ते हैं, व इन अवसरों को और अधिक शोभायमान करते लोकगीत प्रमुख है l होली के अवसर पर इसे गाया हैं l जाता है l ऊँचे स्वर में सामूहिक गायन शैली होती है l राधा और कृष्ण की लीलाओं से संबंधित गीत गाए गायन शैली, विषय वस्तु, मनमोहक अंदाज़, छं दबद्ध जाते हैं l लय और ना जाने कितनी ही असीम खूबियां समेटे हुए ये लोकगीत एक राज्य का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत • गरबा गीत : निमाड़ अंचल में स्त्री परक लोक गायन का गौरव हैं l यहाँ पर मध्य प्रदे श के कुछ लोकगीतों का में गरबा गीत मुख्य है l नवरात्रि के अवसर पर इसे संक्षिप्त वर्णन किया गया है और साथ ही क्षेत्र, अवसर, गाया जाता है l दे वी के भक्ति गीतों पर आधारित गायन शैली व विषय-वस्तु के बारे में भी निम्नलिखित इसकी गायन शैली होती है l नतृ ्य सहित द्रुत सामूहिक उल्लेख किया है : गायन शैली में इसकी प्रस्तुति होती है l • निरगणु िया गायन शैली : यह लोकगीत संपर्ण ू निर्माण • गरबी गीत : निमाड़ अंचल में परु ु ष परक लोक गायन एवं मालवा अंचल में प्रसिद्ध है । एकल एवं समूह शैली में गरबी गीत प्रमुख है l नवरात्रि के अवसर पर इसे में यह प्रस्तुत किया जाता है l यह लोकगीत किसी भी गाया जाता है व इसकी विषय वस्तु भक्ति, श्रृंगार समय पर साधु एवं भिक्षुकों के द्वारा गाया जाता है । और हास्य परक से परख होती है । कबीर, मीरा, रै दस,दाद ू आदि संतों के भक्ति पदों का गायन इस शैली की मुख्य विषय वस्तु है l • नागपंथी गायन : निमाड़ अंचल में पुरुषों द्वारा गायन काफ़ी प्रचलित है और इसे अधिकतर पर्व त्योहार के • कलगी तुर्रा : संपूर्ण निमाड़ अंचल में यह लोकगीत अवसर पर गाया जाता है l मूलतः कृष्ण की रास प्रसिद्ध है l कलगी तरु ्रा की प्रतिस्पर्धात्मक लोक लीलाओं से संबंधित गीत केंद्र बिंद ु होते हैं l मद ृ ं ग एवं गायन शैली है और यह शक्ति एवं शिव की आराधना ढोल पर एकल एवं सामूहिक गायन शैली में इसकी में रात के समय गाए जाने वाले लोकगीत है । आँसू प्रस्तुति लाजवाब तरीके से होती है l कविता के साथ-साथ महाभारत की कथाओं, पौराणिक आख्यान ओं से लेकर वर्तमान प्रसंगों के गायन पर • संजा गीत : मालवा अंचल क्षेत्र में पित्र पक्ष में शाम
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के समय में इस संजा लोक गीत का विधान है l वाद्य सामूहिक भजन शैली का प्रयोग किया जाता है l रहित सामूहिक गायन शैली में इसे पेश करते हैं और इसकी विषय वस्तु गोबर एवं फूल पत्तियों से दीवार पर • बसदे वा गायन : बंद ु े लखंड में हरबोले जाति द्वारा संजा बनाकर उससे संबंधित बाल्यावस्था की कोमल अपने यजमान के समक्ष दिन में गाया जाता है और भावनाओं के गीत होते हैं l श्रवण कुमार की कथा, रामायण कथा, कर्ण कथा आदि पर आधारित होता है बसदे वा गायन l सामूहिक हीड गायन : मालवा अंचल क्षेत्र में श्रावण के महीने के गाथा गायन शैली द्वारा प्रस्तुति की जाती है l पावन अवसर पर हीड गायन की मान्यता है l इसकी विषय वस्तु ग्यारस माता की कथा तथा कृषि संस्कृति • बिरहा गायक : बुंदेलखंड क्षेत्र में किसी भी समय, का सूक्ष्म वर्णन है l इसकी गायन शैली प्रतिस्पर्धात्मक सुनसान राहों में गोंड एवं बेगा आदिवासी विवाह एवं लाभ पर आधारित होती है l दीपावली के अवसर पर श्रृंगार परक विरह गीत गाए जाते हैं l ऊंची टे र सहित सवाल-जवाब गायन शैली बरसाती बारता : मालवा अंचल क्षेत्र में बरसात के का प्रयोग होता है l समय रात में इसे उत्साहपूर्वक गाया जाता है l ऋतु कथा गीत एवं बारहमासा गीत गाए जाते हैं l चंपू • विदे शिया गायन : बंद ु े लखंड में रात के समय प्रायः काव्य की सामूहिक गायन शैली ही इसका आधार होते जंगल एवं सुनसान जगहों पर लोकनायक एवं नायिका हैं l के बिछोह एवं मिलन की अभिलाषा पर केंद्रित गीत गाए जाते हैं l लंबे राग सहित गंभीर एकल तथा लावनी : मालवा एवं निमाड़ अंचल क्षेत्र में प्रायः सब ह सामहि ु ू क गायन शैली का प्रयोग किया जाता है l के समय गाया जाता है l निर्गुणी दार्शनिक गीत इसका मुख्य विषय है व सामूहिक द्रुत गायन शैली का प्रयोग • ढोला मारू गीत\ लोकनाट्य : मालवा, निमाड़ तथा किया जाता है l बुंदेलखंड के क्षेत्रों में ढोला मारू गीत का गायन रात के समय ढोला-मारू नाटक के साथ साथ किया जाता आल्हा गायन : बुंदेलखंड में मुख्य रूप से वर्षा ऋतु है । ढोला एवं मारू की प्रेम कथा का उच्च स्वर सहित में रात के समय इसे गाया जाता है l इसकी विषय लोक गायन शैली में किया जाता है वस्तु महोबा के आल्हा एवं उदल की वीर गाथा पर आधारित होती है l एकल एवं सामहि ू क गायन शैली • पंडवानी गीत\ लोकनाट्य : शहडोल, अनप ू परु एवं उच्च स्वर सहित गायन शैली का प्रयोग किया जाता बालाघाट के क्षेत्रों में अधिकतर शाम के समय आयोजित है l किया जाता है और इसमें पांडवों की कथा का वर्णन किया जाता है l उच्च स्वर सहित कि कल कथा गायन भोला या लमटे रा गीत : बंद े ल खं ड क्षेत्र में शिवरात्रि, शैली द्वारा प्रस्तुत किया जाता है l ु बसंत पंचमी एवं मकर सक्रांति के समय शिव एवं शक्ति की भक्ति से संबंधित भजन गीत गाए जाते • बांस गीत : छत्तीसगढ़ क्षेत्र से जुड़े जिलों में रात के हैं l विना वाद्य यंत्र के स्त्री-पुरुष में प्रश्नोत्तर गायन समय मोरध्वज एवं करने की कथाएं बांस गीत में शैली में गाए जाते हैं l गायी जाती हैं l उच्च स्वर में कथा गायन शैली द्वारा लाजवाब प्रस्तुति होती है l बेरायता गाय : बुंदेलखंड में धार्मिक त्योहारों के अवसर पर रात के समय गाया जाता है । महाभारत की कथाएं, • घोटूल पाटा गीत : मुड़िया आदिवासी क्षेत्रों में मतृ ्यु के लोक नायकों की कथा तथा ऐतिहासिक चरित्रों पर अवसर पर इस लोक गीत का रिवाज़ है l राजाओं, आधारित गीत गाए जाते हैं l संवाद युक्त कथा गायन साय की कथा के साथ प्रकृति के जटिल रहस्यों का शैली का प्रयोग होता है l वर्णन इन गीतों में किया जाता है l बुजुर्गों द्वारा सामूहिक कथा गायन शैली का प्रयोग होता है l दे वासी गायक : बंद े ल खं ड क े क्षेत्र में दीपावली क े ु अवसर पर अहीर, गवली ग्वालों द्वारा कृष्ण राधा प्रेम • ददरिया गीत\ लोक नतृ ्य : बैगा आदिवासी क्षेत्रों में प्रसंग, वीर रस युक्त दोहे गाए जाते हैं l द्रुत नतृ ्य किसी भी अवसर पर लोक जीवन एवं साहित्य की सहित दोहा गायन शैली द्वारा प्रस्तुति होती है l प्रेम कथाओं पर आधारित गीतों को गाया जाता है l सामहि ू क सवाल-जवाब गायन शैली द्वारा प्रस्तुति की जगदे व का पुरावा : बुंदेलखंड में चैत्र और क्वार महीने जाती है l में दे वी की स्तुति से संबंधित भजन गाए जाते हैं l -----x-----
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अनुराग्यम ्
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dyk;k=k भारतीय कला व उसका इतिहास भारतीय कला में विभिन्न प्रकार के कला रूप शामिल हैं, जिनमें चित्रकारी, मूर्तिकला, मिट्टी के बर्तन और कपड़ा कला शामिल हैं। भारतीय कला की उत्पत्ति के चिन्ह तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में मिलते हैं। आज के वर्तमान स्वरूप में पहुँचने के लिए कला ने काफ़ी लंबा समय तय किया। भारतीय कला पर संस्कृति के प्रभाव के साथ-साथ हिंद ू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म और इस्लाम धर्म के प्रभाव प्रभाव भी हैं। धार्मिक परं पराओं के इस जटिल सम्मिश्रण के बावजूद प्रचलित कलात्मक शैली को प्रमख ु धार्मिक समह ू ों द्वारा स्वीकृत किया गया। ऐतिहासिक कलाओं में मुख्य रूप से पत्थर और धातु की मूर्तिकला, विशेषकर धार्मिक ने अन्य माध्यमों की तुलना में भारतीय जलवायु का बेहतर ढं ग से सामना किया। इसके फलस्वरूप हम अधिकांश स्थानों पर बेहतर स्थिति में अवशेष दे ख सकते हैं। यह हमें भारतीय कला का अध्ययन करने में सबसे सहायक सिद्ध हुए और आज हमारी सबसे बहुमूल्य कलात्मक धरोहर है ।
लाखों मूर्तियाँ हैं। भारत में सबसे पहले पाषाण नक्काशियों की खोज भारत में सक्रिय एक अंग्रेजी पुरातत्व वैज्ञानिक आर्चीबाल्ड कार्लाइल ने की जो स्पेन में अल्टामिरा की गुफा से बारह साल पहले हुई थी। हालांकि उनका काम जे कॉकबर्न (1899) के माध्यम से बहुत बाद में सामने आया। (ऊपर दिया गया चित्र भीमबेटका रॉक शेल्टर में एक पत्थर पर चित्रित कृति है )
भारतीय कलाकारों की शैलियाँ पर न केवल भारतीय धर्म व संस्कृति की छाप है बल्कि वह भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर जैसे तिब्बत व दक्षिण पूर्व एशिया आदि से भी कुछ हद तक प्रभावित है । भारतीय कला पर विशेष रूप से मध्य एशिया, ईरान और यूरोप का प्रभाव भी पड़ा।
भारतीय पुरातत्व वैज्ञानिक डॉ. वी. एस. वाकणकर ने विंध्य पर्वत श्रृंखला के आसपास मध्य भारत में स्थित कई पत्थर के चित्रित आश्रयों की खोज की। भीमबेटका रॉक शेल्टर में उपस्थित 750 स्थानों को यूनेस्को (UNESCO) के विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामांकित किया गया है । इनमें सबसे पुरानी पें टिंग लगभग १०,००० साल पुरानी है । यह भारत में मानव जीवन को सर्वप्रथम प्रदर्शित करने वाली कृति होने का गौरव संजोए हुए है । इन स्थलों पर मौजूद चित्रों में मानव जीवन के दृश्यों के साथ पशुओं को भी दर्शाया गया है ।
भारत की पाषाण कला में दक्षिण एशियाई पाषाण युग से नक्काशी और पें टिंग शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 1300 पाषाण कला स्थल हैं जिनमें
साथ ही पत्थर के औजारों से शिकार करने के दृश्य भी उकेरे हुए हैं। चित्रों शैली क्षेत्र और समय के साथ भिन्न थी, लेकिन एक समान विशेषता यह थी कि सब जगह लाल रं ग के गेरू नामक पाउडर खनिज का उपयोग करके चित्र बनाए गए थे, जो आयरन ऑक्साइड (हे मेटाइट) का एक रूप है ।
अंजुला सिंह भदौरिया प्रयागराज, उत्तर प्रदे श
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अनुराग्यम ्
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जन ू 2021
dyk;k=k धुन से अरमां बुन
ज़िन्दगी की क़शमक़श में , शौक़ खोता जा रहा था, दनु िया की दक़ियानस ू ी सोच के बीच, अरमां पंख फैला रहा था ll शब्द न होकर भी, निःशब्द अंतर्मन न था, कुछ न कहकर भी, उन पन्नों ने सब कुछ कहा था
ll
न चाहती थी लिखना, ये दर्द, ये दर्द भरी पक ु ार, न चाहती थी लिखना, ये है वानियत, ये बलात्कार ll न मन ने सोचा था ऐसा कुछ भी, न ख़्याल कभी था ऐसा आया, अचानक बैठे एकांत मन ने, शब्दों का जाल स्वयं बनाया ll चल पड़ी फुर्ती से कलम, न रुक सका एक लेखक का मन, दिमाग के घोड़ों को करना शांत, कहाँ होता है इतना आसान, होता है एक लेखक का मन, चंचल और जिद्दी संतान ll
बचपन से था एक ही राग सीखा, लड़की का जीवन है केवल चूल्हा-चौका, ख्यालों ने एक सैलाब उठाया, जीवन को मिला एक अनोखा सा मौका ll अपनी धुन में अपनी सोच मिलाई, चाहते हुए भी स्वयं को वो रोक न पाई, ऐसी धुन कलम ने लगाई, उसकी कला जहां में छाई, जीवन को फिर पीठ न दिखाई, शब्दों की हर पल नई माला बनाई, झलकती जिनमें मन की सच्चाई ll बेशक लड़ती अपने मन से, चाहती न थी कुछ जीवन से, बस कमी थी एक धुन की उसमें , मिली जो उसको एक कलम से ll उस कलम की धुन ने भरी उड़ान, लिया उसने स्वयं को पहचान, चली जब उसकी तलवार, काटे उसने अनेक है वान ll
न चाहती थी लिखना, दनु िया का ये दरु ाचार, चाहती थी वो कलम बस, प्रेम, मानवता, व परोपकार ll इतना रोका पल-पल टोका, समझाया मन को इतना, अब न चलेगी ये कलम, न होगा इससे कुछ भी लिखना
लेखनी के है लक्षण यही, कोरे कागज़ पर मानो बिखरी स्याही, कलम की लगी यही धुन, बनाती नवीन पथ पर चलता राही ll
ठान लिया जब सच्चे मन से, लक्षण दिखते क्यों न लेखन के, बिन धुन है हर राग अधूरा, पन्ने कैसे भरते बिन धुन जीवन के
ll
पर ये संभव हो न सका, दिल में बसा लेखक यूँ खो न सका, कलम में बसी थी ऐसी धन ु , शब्दों की माला अचानक गई बन ु , बिन उस धन ु के लेखक का अस्तित्व नहीं, लेती है वो कलम अपना मालिक स्वयं चन ll ु
ll
कुछ ऐसी थी कहानी उसकी, कलम के बिखेरे अनोखे जाद ू की, अनजान राह पर निकली थी जो, कहानी थी उसकी सच्ची धुन की ll
सिम्पी गोयल
धारूहे ड़ा, हरियाणा
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जन ू 2021
dyk;k=k ज्येष्ठ मास
- निधि सहगल, आगरा, उत्तर प्रदे श हिंद ू पंचाग
के अनुसार ज्येष्ठ या फिर जेठ का महीना चंद्र मास का तीसरा माह होता है , जो चैत्र और वैशाख के बाद आता है । ज्येष्ठ मास का नाम सुनते ही तपती हुई दप ु हरी का चित्र दिमाग में जरूर बनता हैं। बनेगा भी क्यों नहीं इस मास में झुलसा दे ने वाली गर्मी जो पड़ती है । इस समय उत्तरी भारत अधिकतम तापमान तथा न्यूनतम वायुदाब के क्षेत्र में परिवर्तित होने लगता है । उत्तर-पश्चिमी भारत में स्थित थार मरुस्थल पर मिलने वाला न्यूनतम वायुदाब क्षेत्र बढ़कर सम्पूर्ण छोटा नागपुर पठार को भी आवृत्त कर लेता है , जिसके कारण स्थानीय एवं सागरीय आर्द्र हवाओं का परिसंचरण इस ओर प्रारम्भ हो जाता है और स्थानीय प्रबल तूफानों का जन्म होता है । मूसलाधर वर्षा एवं ओलों के गिरने, यहाँ तीव्रगति वाले प्रचण्ड तूफान भी बन जाते हैं, जिनका कारण स्थलीय गर्म एवं शुष्क वायु का सागरीय आर्द्र वायु से मिलना है । सूर्य के पथ ृ ्वी के निकट आ जाने से यह ऋतु उत्पन्न होती है l इस ऋतु मैं प्रायः भारत के सभी स्थानों का तापमान बढ़ जाता है l उत्तर पश्चिमी भारत के शुष्क भागों में इस समय चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवाओं को लू कहा जाता है । राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदे श में प्रायः शाम के समय धूल भरी आँधियाँ आती है , गर्मियां वैसे तो फाल्गुन मास के उतरते समय ही शुरू हो जाती हैं फिर चैत्र और वैशाख पार करने पर जब ज्येष्ठ मास का आरं भ होता है तो गर्मी का मौसम ऊफान पर होता है । इसलिये हमारे ऋषि-मुनियों ने ज्येष्ठ में जल का महत्व बहुत
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अधिक माना है । वैदिक हिन्दू पंचांग के अनस ु ार इस बार 27 मई से 24 जन ू 2021 से ज्येष्ठ मास शरू ु हो जाएगा। अंग्रेजी कैलेंडर के अनस ु ार यह मास अक्सर मई और जन ू के महीने में पड़ता है । मनमोहक और रागयक ु ्त वसंत का अन्त होते ही ग्रीष्म की प्रचंडता आरम्भ हो जाती है । वसन्त ऋतु जहाँ काम से, वहीं ग्रीष्म क्रोध से सम्बन्धित है । ग्रीष्म ऋत,ु भारतवर्ष की छह ऋतओ में से एक ऋतु ही है , जिसमें वातावरण ु का तापमान प्रायः ज़्यादा रहता है । दिन बड़े हो जाते हैं रातें छोटी होने लगती है । शीतल संग ु धित पवन के स्थान पर गरम-गरम लू चलने लगती है । धरती पर अधिक गर्मी के चलते नदी-तालाब, सरोवर-पोखर सख ू ने लगते हैं। हरे भरे पौधे, फूल आदि मरु झा जाते हैं। ऐसा लगता है मानो चहुँ ओर अग्नि की वर्षा हो रही हो। ज्येष्ठ मास में तो ग्रीष्म की अखंडता और भी प्रखर हो जाती है जिससे बहुत अधिक गर्मी पड़ने लगती है । छाया भी छाया ढूंढने लगती है । ऐसे गर्मी के मौसम में शीतल पेय और ठं डा वातावरण ही मन को भाता है । इस ऋतु में वर्षा भी होती है l इस मौसम में कुछ खरीफ की फसलें बोई जाती है । यदि गर्मी अच्छी पड़ती है तो वर्षा भी खब ू होती है । गर्मी के कारण ही अनाज पकता है और खाने योग्य बनता है । ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के कारण विषैले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस ऋतु में आम, लीची आदि अनेक रसीले फल भी होते हैं। इनका स्वाद निराला होता है ।
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जन ू 2021
इस माह में वातावरण और शरीर में जल का स्तर गिरने लगता है , अतः जल का सही और पर्याप्त प्रयोग करना चाहिए। इस माह में सन स्ट्रोक और खान-पान की बीमारियों से बचाव आवश्यक है । इस माह में हरी सब्जियां, सत्तू, जल वाले फलों का उपयोग काफी लाभदायक होता है । इसके अलावा इस माह में दोपहर का विश्राम करना भी लाभदायक माना गया है । ‘ज्येष्ठ मास जो दिन में सोए, ओकर जर असाढ़ में रोए।’ यह घाघ की कहावत है । यानी जो व्यक्ति जेष्ठ के महीने में दिन में सोता है , वह रोगी होता है । महाभारत के अनशा ु सन पर्व में लिखा है -”ज्येष्ठामल ू ं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत ्। ऐश्वर्यमतल ु ं श्रेष्ठं पम ु ान्स्त्री वा प्रपद्यते।।” अर्थात ज्येष्ठ के महीने में जो व्यक्ति एक समय भोजन करता है वह धनवान होता है । दरअसल इससे व्यक्ति स्वस्थ रहता है और चिकित्सा में धन नष्ट नहीं होता है । इस माह में निर्जला एकादशी, अपरा एकादशी, गंगा दशहरा, बड़ा मंगल, वट सावित्री व्रत, शीतलाष्टमी, दे वशयनी एकादशी और गरु ु पर्णि ू मा आदि त्योहार आते हैं।
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दिन जल की एक बंद ू तक व्रती को ग्रहण नहीं करनी होती साथ ही उसे दस ू रों को जल पिलाना होता है । सब्र, संतोष और जल संरक्षण सहित जल के महत्व को समझने का यह उपवास ज्येष्ठ शक ु ्ल एकादशी को रखा जाता है । निर्जला एकादशी सभी एकादशियों में श्रेष्ठ मानी जाती है । इसी दिन भारत के कुछ क्षेत्रों में खासकर महाराष्ट्र, गज ु रात और दक्षिण भारत के राज्यों में यह ज्येष्ठ पर्णि ू मा के दिन वट पर्णि ू मा व्रत मनाया जाता है l जेठ के महीने में ही बड़ा मंगल पड़ता है और इस परू े महीने हनम ु ान जी की विशेष आराधना और पज ू ा की जाती है । गरु ु पर्णि ू मा के बाद से श्रावण मास शरू ु होता है और इसी से ऋतु परिवर्तन हो जाता है और वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है ।
जल संरक्षण के महत्व को दर्शाता यह माह स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की भी सीख दे ता है । वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण गर्मी पथ ृ ्वी पर दिन -प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है , ऐसे में हमें गर्मी में बिजली और पानी अनावश्यक रूप से खर्चा नहीं करना चाहिए और ग्लोबल वार्मिंग के बरु े प्रभावों को रोकने के लिए अपने आसगंगा दशहरा और निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है । पास के क्षेत्रों में अधिक पेड़-पौधे लगाने चाहिए और गर्मी गंगा दशहरा का त्यौहार ज्येष्ठ मास में मनाया जाने वाला को कम करने के लिए उन्हें नियमित रुप से पानी दे ना विशेष त्यौहार है । यह त्यौहार मोक्षदायिनी माँ गंगा के चाहिए। महत्व को बतलाता ही है साथ ही जल के सरं क्षण का संदेश भी दे ता है । निर्जला एकादशी का उपवास काफी कठिन होता है । इस
निधि सहगल आगरा, उत्तर प्रदे श
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राजेश कुमार दब ु े जी का जन्म जबलपुर, मध्यप्रदे श में हुआ था l वर्ष 1987 से वह कार्टून बना रहे हैं l राजेश जी ने राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं के लिए कई प्रकार के कार्टून्स बनाए हैं l अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों के लिए भी राजेश जी के कार्टून्स चयनित हुए हैं l इनके कार्टून्स का विषय मुख्यत: सामाजिक जागरूकता पर आधारित होता है l वर्तमान समय में राजेश जी फ्रीलैंसिग ं कर रहें हैं l
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राजेश कुमार दब ु े जबलपुर, मध्यप्रदे श Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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हिंदी प्रश्नावली 1. “दे खन जौ पाऊँ तौ पठाऊँ जमलोक हाथ, दज ू ौ न लगाऊँ, वार करौ एक करको”, ये पंक्तियाँ किस कवि द्वारा सजृ ित हैं? (i) हृदयराम (ii) अग्रदास (iii) तुलसीदास (iv) नाभादास 2. ‘भक्तमाल’ भक्तिकाल के कवियों की प्राथमिक जानकारी दे ता है , इसके रचयिता थे? (i) वल्लभाचार्य (ii) नाभादास (iii) रामानंद (iv) नन्ददास 3. अमीर ख़ुसरो ने किसके विकास में अग्रणी भूमिका निभाई?
(i) भरतनाट्यम (iii) ओडिसी
(ii) कुचिपड ु ़ी (iv) कथकली
9. प्रियंवदा मोहं ती का सम्बन्ध किस शास्त्रीय नतृ ्य कला शैली से है ? (i) कथकली (iii) ओडिसी
(ii) भरतनाट्यम (iv) कूडियाट्टम
10. मण ृ ालिनी साराभाई का सम्बन्ध किस शास्त्रीय नतृ ्य कला से है ? (i) कथकली (iii) कूडियाट्टम
(ii) भरतनाट्यम (iv) कुट्टी अट्टम
भारतीय इतिहास प्रश्नावली
(i) ब्रज भाषा (ii) अवधी (iii) खड़ी बोली (iv) भोजपुरी
11. महावीर ने ‘जैन संघ’ की स्थापना कहाँ की थी?
4. त्रिपुरा की राजभाषा है ?
(i) कुण्डग्राम (ii) वैशाली (iii) पावापरु ी (iv) वाराणसी
(i) हिन्दी
(ii) नागा
(iii) संस्कृत
(iv) बांग्ला
5. ‘हरिश्चन्द्री हिन्दी’ शब्द का प्रयोग किस इतिहासकार ने अपने इतिहास ग्रंथ में किया है ? (i) मिश्रबंधु (ii) शिवसिंह ‘सेंगर’ (iii) रामचन्द्र शुक्ल (iv) रामविलास शर्मा
कला प्रश्नावली 6. सितारा दे वी का सम्बन्ध शास्त्रीय नतृ ्य की किस शैली से है ? (i) मणिपुरी (iii) गरबा
(ii) कत्थक (iv) हिन्दुस्तानी गायन
7. यामिनी कृष्णमूर्ति का सम्बन्ध किस शास्त्रीय नतृ ्य से है ? (i) भरतनाट्यम (iii) ओडिसी
(ii) कथकली (iv) कुचिपुड़ि
8. लीला सैम्सन का सम्बन्ध किस शास्त्रीय नतृ ्य शैली से है ?
12. किस विदे शी दत ू ने अपने को ‘भागवत’ घोषित किया था? (i) मेगस्थनीज़ (iii) प्लूटार्क
(ii) हे लिओडोरस (iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं
13. वैदिक कालीन लोगों ने सर्वप्रथम किस धातु का प्रयोग किया? (i) लोहा
(ii) कांसा
(iii) ताँबा
(iv) सोना
14. हल सम्बन्धी अनष्ठा ु न का पहला व्याख्यात्मक वर्णन कहाँ से मिला है ? (i) गोपथ ब्राह्मण में (iii) ऐतरे य ब्राह्मण में
(ii) शतपथ ब्राह्मण में (iv) पंचविंश ब्राह्मण में
15. किस वेद की रचना गद्य एवं पद्य दोनों में की गई है ? (i) ऋग्वेद (iii) यजर् ु वेद
(ii) सामवेद (iv) अथर्ववेद
उत्तर : 4, 2, 3, 4, 3, 2, 4, 1, 3, 1, 3, 2, 3, 2, 3
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अनुराग्यम ्
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