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Kalayatra Magazine | Smaran & Yatra Vritrant Special Edition | December 2021

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दिसंबर 2021

www.anuragyam.wordpress.com

कलायात्रा

अनरु ाग्यम ्

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( यात्राएं - कविताएं - लघुकथाएं - ग़ज़लें )

डिजाइनर : सचिन चतर् ु वेदी

मुख्य पषृ ्ठ : सचिन चतुर्वेदी कॉपीराइट : सचिन चतुर्वेदी

पता : मालवीय नगर, नई दिल्ली (110017) वेबसाइट : www.anuragym.wordpress.com ईमेल : anuragyam.kalayatra@gmail.com दरू भाष : +91 - 99999 20037


कलायात्रा

दिसंबर 2021

रचनाकार की रचना को पढ़ने के लिए नीचे अनुक्रमणिका पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं |

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सिक्किम यात्रा प्रियंका गहलौत

8

मर्यादा पुरुषोत्तम राम अर्चना श्रीवासतव

12

बाल कहानी लाल दे वेन्द्र

16

चाँद फाँसी अंक डॉ सम्राट सुधा

19

20

बचपन के गाँव की यात्रा रश्मि दाधीच

23

प्रेम एक शाश्वत सत्य वाणी, नेपाल

24

बीते 20 महीनें गोवेर्धन दास

26

चित्रकार - नुपुर बासु

28

लघुकथा - खत / पत्र भावना भारद्वाज

साक्षात्कार - नरे श गोसाई

30

यात्रा वत ृ ांत - योगदान राजेंद्र कुमार सिंह

31

संस्मरण - महाराष्ट्र प्रेरणा नांगरे

32

एक कद्धू और एक अंगूर डॉ रं जना जायसवाल

34

संस्मरण - छतीसगढ़ सतीश उपाध्याय

38

संस्मरण - फ़िक्र माँ की मीनू बाला

40

केरल यात्रा डॉ गल ु ाब चन्द पटे ल

42

विशाखापट्टनम यात्रा सोनिया

10

दोहे तहसीन मुरादाबादी

10

ग़ज़ल नवाव बहार सम्भली

11

ग़ज़ल ज़ुबरै मुरादाबादी

11

गीत - तेरा प्यारा अमर सिंह बिसेन

14

क्रांतिकारी चाहिए गिरे न्द्र सिंह

15

कविता - दल ु ्हन रं जना वर्मा

15

कविता - ये शहर गोल्डी मिश्रा

18

कविता - ख़ामोश समय मणिमाला चैटर्जी

22

कविता - चलो बात करते है कमला मल ु ानी

37

कविता - शब्दों से मीनाक्षी भसीन

37

43

कविता - आपना गम कृष्णा दे वी

43

गीत - भावना रानी

कविता - कहाँ अब दिन सुहाने है विजय कनौजिया

39

शीतकालीन दोहे इंद,ु अमरोहा, उत्तरप्रदे श

39

ग़ज़ल शायर मुरादाबादी

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

Book Available Hard Copy on Notion Press Store

इस तरह के चिन्ह को क्लिक करने से आप पत्रिका को ऑनलाइन पढ़ सकते है |

सितम्बर 2021 - गोवा विशेषांक वर्ष 1 अंक 5

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अगस्त 2021 - दिल्ली विशेषांक वर्ष 1 अंक 4

जुलाई 2021 - बिहार विशेषांक वर्ष 1 अंक 3 नवंबर 2021 पंजाब विशेषांक वर्ष 1 अंक 7

पिछला संस्करण जून 2021 - मध्यप्रदे श विशेषांक वर्ष 1 अंक 2

अक्टू बर 2021 छत्तीसगढ़ विशेषांक वर्ष 1 अंक 6 मई 2021 - राजस्थान विशेषांक वर्ष 1 अंक 1

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अनुराग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

सम्पादकीय डॉ. तरुणा माथुर मुख्य संपादिका, कलायात्रा पत्रिका राष्ट्रीयता के जागरण के साथ-साथ साहित्य के विविध रूपों के साथ यात्रा- साहित्य का भी जन्म हुआ था। इस दिशा में पहल करने वाले साहित्यकार थे भारतें द ु हरिश्चंद्र क्योंकि उन्होंने ही सर्वप्रथम यात्रा से संबंधित अनेक लेख लिखे जो “कवि वचन सुधा” नामक पत्रिका में गाहे -बगाहे प्रकाशित होते रहे , बाद में और कवि व साहित्यकारों ने भी अनेक पत्रिकाओं में यात्रा वत ृ ांत लिखे और साहित्य की विधा में इस प्रयोग को सम्मिलित किया गया। अनुरागयम ् अपनी मासिक पत्रिका के सात अंकों के बाद एक विशेष अंक के रूप में “यात्रा- वत ृ ांत” “संस्मरण” पर आधारित अंक पाठकों को समर्पित करता है । यात्रा से संबंधित अपने अनुभव को कविवर रविंद्रनाथ टै गोर ने इस तरह परिलक्षित किया था - इतनी बड़ी पथ ृ ्वी को : कितना भर जानता हूं ? दे श - दे श में जाने कितने नगर हैं.. कितनी राजधानियां हैं ? मनुष्य की कितनी कीर्ति है ? कितनी नदियां कितने पहाड़ ? कितने समुद्र और कितने रे गिस्तान ? जाने कितने जीव हैं जिन्हें नहीं जानता। जाने कितने पेड़ हैं । ये सब अगोचर रह गए । विश्व का अगोचर विशाल है । मेरा मन उसके एक छोटे - से कोने से जुड़ा है । इसी बेचन ै ी में उन ग्रंथों को अक्षय उत्साह से पढ़ता हूं । जिनमें यात्रा - वत ृ ांत हैं । जहां भी चित्रमय वर्ण की वाणी पाता हूं । चुनकर ले आता हूं । अपने मन के इस ज्ञान - दारिद्र्य को.. जहां तक भर सकता हूं । भर लेता हूं । संभवतः यात्राएं मानचित्र पर एक बिंद ु से दस ू रे बिंद ु तक यात्रिक होकर आवागमन का ही नाम नहीं है वरन ये हमारी चेतना से निकले हजारों आरोह अवरोह के प्रसंगों का आलोकन है । यह अंक विशेषतया भारत दे श के स्थलों के यात्रा विवरण को आपके समक्ष लाने का एक प्रयास भर मात्र है क्योंकि पिछले अंकों में भारत के सात राज्यों राजस्थान, मध्य -प्रदे श, बिहार ,दिल्ली, छत्तीसगढ़ ,गोवा और पंजाब के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्रा के दौरान यह खय ़् ाल आया कि दे श तो बहुत छोटी-छोटी जगहों की भी अनमोल धरोहरों से पटा पड़ा है । और भारतीय दे शाटन करने में अग्रणी हैं तो क्यों ना उनके दृष्टिकोण से भारत के अविस्मरणीय सुरम्य स्थानों की यात्रा कराई जाए और इसी सोच को लेकर आपके समक्ष यात्रा व संस्मरण के झरोखों को लाने का एक कौतुहल पूर्ण प्रयास है , आशा है आप पसंद करें गे । भारत अद्त भु सौंदर्य का धनी दे श है पुरातन ग्रंथों से इसके सौंदर्य के दर्शन होते आए हैं। एक लेखक अपने नेत्रों से उसका दर्शन करे और अपने मनोभावों से उसके साथ संवाद करे तो उस यात्रा वत ृ ांत को पाठक भी वैसा ही रसास्वादन करने लगता है ।सभी प्राचीन महाकाव्य में इसका वर्णन हमें बखूबी मिलता है ।नदियों की गूंजती।कल -कल ध्वनि अट्टालिकाओं की शांत एकाकीपन ,सामुद्रिक ज्वार भाटा में समाई अनंत खामोशी ,स्वर्णाभूत रे गिस्तान पूर्व का दमकता सूरज ,घने वनों की श्ख रृ ंला पठारी कठोरता, और भी बहुत कुछ के साथ-साथ दरू दराज के गांवों में भी बसी भीतरी सुंदरता, उनके रं ग बिरं गे वस्त्रों से सजेधजे आम जन ,कई मौसमों , बदलते, खिलते ,बसते ,शहरों से सजे धजे अलौकिक भारतीय संसार की यात्रा जिसने भी कि वह किंचित होश खो बैठा ।ऐसी ही यात्रा के दर्शन और यादों के संस्करणों से सजी-धजी कला यात्रा आपके समक्ष अपनी नई यात्रा पर चल पड़ी है . www.anuragyam.wordpress.com

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

सिक्किम, गंगटोक 10 फ़रवरी 2021 प्रियंका गहलौत, मुरादाबाद, उत्तर प्रदे श

प्रिय सिक्किम! मधरु स्मृति! तुम्हे याद है हमारी पहली पहल मुलाक़ात, सन 2015, अप्रैल माह में हम पहली बार रु ब रु हुए थे | न्यू जलपाईगड़ ु ी रे लवे स्टेशन पर अल सवेरे उगते सूरज के साथ मैंने ट्रेन से उतर कर एक लम्बी उबासी भरी, और अपने पति व बेटी के साथ अपना भारी सूटकेस लिए स्टेशन से बाहर चल पड़ी, फिर जल्दी से एक कार बक ु कर हम तम ु से मिलने को निकल पड़े| कुछ ही किलोमीटर चले थे के तुम्हारे लुभावने पहाड़ और बल खाती “तीस्ता “ नदी ने हमारा स्वागत किया, उसके बाद कदम दर कदम खब ू सरू त नज़ारों को दे ख आँखे जाने कौनसे आकर्षण के वशीभूत हो गयी | एक तरफ पहाड़ों की दीवार और दस ू री तरफ तीस्ता नदी का मोहक कलकल करता जल मेरे सफर की सारी थकान हरता गया और कार की खिड़की से आकर चेहरे को छूती ठं डी एवं स्वच्छ हवा को महसूस करते जाने कब मेरी आँख लग गयी |

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अनुराग्यम ्

अचानक! कार के ब्रेक लग कर रुकने से ज़ब मेरी तंद्रा टूटी तब मैं कुछ पल के लिए अचंभित रह गयी, क्यूंकि जो नज़ारा मेरे सामने था उसे मैं लाख कोशिश करूँ तो भी शब्दों में नहीं लिख सकती | वो बादलों से सजा स्वर्ग लगा मझ ु ,े उफ्फ!! ये कैसी कसक मेरे दिल को हो रही उस पल को स्मरण करते ही.... मुझे लगा मैं किसी नई दनु िया में आ गयी हूँ,हर तरफ बादल यूँ टं गे हुए थे मानो वो उड़ते दे वदत ू है और इस अनठ ू े हरित उपवन में टहल रहे है | रस्ते भर तुम्हारे सौंदर्यमकरन्द का रसपान करती मदहोश होती रही, और आखिर तुम्हारे ह्रदय अर्थात ् तम ु ्हारी राजधानी”गंगटोक” के जाने किस जादई ु स्पर्श को महसूस किया मैंने,, जो तुमसे इश्क़ कर बैठी | वो कहते है ना इश्क़ पहली नज़र में हो जाता है जो मुझे हो गया तुमसे,तुम्हारे बादलों वाले दिल (गंगटोक )से | तीन दिन दो रात ये गिनतियाँ भले छोटी हो मगर इन गिनती के लम्हों में तुम्हारे साथ मैंने मानो एक पूरा काल्पनिक जीवन अपने वास्तविक जीवन में अनुभव किया और जिया भी,,, हनम ु ान टोंक पर कोहरे के साये www.anuragyam.wordpress.com


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कलायात्रा

ज़ब मझ ु े छूते हुए गज ु रते तो पहले प्यार की पहली टै क्सी , कार दौड़ते रहे है ,, किसी अबोध बच्चे के जैसे तुम दिन भर खेल कर रात में सोये रहते हो | सिरहन सी तन मन में हो जाती | और वो “बांझाकरी” झरने पर मैंने उस अविरल जल की कलकल से तम ु ्हारी प्रेमिल कविता को सन ु ा जो जाने कब से उसे निरं तर गुनगुना रहा है ,,, मैंने सुना था कि नेपाली किंवदं ती में बांझाकरी अध्यात्मिक ऊर्जा से पूर्ण कोई व्यक्ति है जो आज भी तुम्हारी गफ ु ाओं व जंगलों में आत्माओं की पज ू ा करता है , बान का अर्थ है “जंगल” और झाकरी का अर्थ “महरम लगाने वाला “ होता है | ये अर्थ मुझे सार्थक लगा क्यूंकि मैंने अपने मन पर बांझाकरी के अद्त भु रूप को किसी अनल ु ेप सा महसस ू किया जो मेरी आत्मा को छू कर तप्ति से भर रहा था | रात्रि में स्वच्छ गगन ृ पर अधूरा चाँद अपनी मद्धिम प्रकाश से यूँ प्रतीत हो रहा था मानो रात के एक आले (दीवार पर बना ताक )पर किसी ने दीपक रख छोड़ा हो और तम ु ्हारे ह्रदय (गंगटोक ) की शांत पड़ी सड़के किसी विरहिणी के उलझें केशों सी प्रतीत हो रही थीं,, दिन के मुकाबले रात का अनुभव और भी अलौकिक था ज़ब मैं कुछ कदम उन खाली सड़क पर टहलने लगी जहां दिन भर www.anuragyam.wordpress.com

ऐसे तमाम एहसास और तुमसे मिले स्नेह के साथ मैं लौट तो आयी मगर मेरा ह्रदय तम ु ्हारे पास ही छूट गया, आज भी मैं ज़ब सकून के पल चाहती हूँ तब सबसे पहला स्मरण तुम्हारा होता है ,, मैं फिर से आउं गी तुमसे मिलने,, तुमसे प्रेम जो मेरे ह्रदयतल पर नन्ही क्यारी सा उपज गया है उसे अपनी कल्पनाओं के नीर से सींचती रहती हूँ...फिर मिलने की उम्मीद की किरणों से उस प्रेम क्यारी को पोषित करती हूँ,, दरू हो कर भी इस तरह प्रेम निभाती हूँ | मेरी शभ ु कामनायें तम ु ्हे, तम ु हमेशा यूँ ही सरल, निश्छल स्नेह से परिपूर्ण रहना ताकि ज़ब भी मैं आऊं तुम्हे पहले प्यार सा प्राप्त कर पाऊं | अब मजबरू ी के अल्पविराम के साथ कलम और अपने ह्रदय में उठती संवेदनाओं के उफान पर विराम लगाती हूँ | जल्दी ही हम फिर मिलेंगे इस उम्मीद के साथ तुम्हे मेरा बहुत स्नेह|

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

मर्यादा परू ु षोत्तम राम अर्चना श्रीवास्तव ‘आहना’ मलेशिया

भज ले हरी का नाम, हृदय से नमन, श्रीचरणम ् में .. अति पावन, मनभावन, पण ु ्य - सलील शरणम ् में .. दे वभूमि भारत में , अहोभाग्य ! श्री रघन ु ंदन जी पधारे .. कण - कण बसे श्री राम, घटित प्रतिपल मानस - नयन में .. जगत से हारा, राम सा अमत ृ - रस पान ना पाया.. बझ ू ा - जला मन, जीवन - कोलाहल से चैन गवायां.. पंच - विकारों से फंसा प्राण, भ्रमित भ्रमर गुंजार.. भल ा ू सध ु ी लियो प्रभु श्री राम, जैसे केवट - शबरी को संभाला..

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अनुराग्यम ्

अंतर के उत्थान, दे श प्रेम, जग - कल्याण मे वांछित.. श्री राम बुद्धि - शुद्धि दे , क्षणिक आवेश - आवेग से उबारो.. श्री राम दर्द ु ांत रावणों के कुटिल अट्ठाहासों से छलनी उर - कमल भक्ति - शक्ति से सांसो में गंथ ू कर, तेजोमय - ज्योत जलाओ.. श्री राम राम यह एक शब्द नहीं हमारे अंतकरण को आंदोलित करने वाला व्यापक मनोदशा है ।चाहे हम कैसी भी अवस्था या मनोदशा से गुजर रहे हो राम शब्द का उच्चारण करते ही एक अलौकिक तरावट और सुकून मिल जाता है ।जैसे बेचन ै ी के चंचल बुलबुले राम नाम के शांत सरोवर में एकबारगी विलीन हो जाते है । मर्यादा परु ु षोत्तम श्रीराम शब्द में ऐसा क्या जाद ू है , जिसकी गहराई और व्यापकता को समझना www.anuragyam.wordpress.com


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कलायात्रा

जरूरी है । हमारा दे श जो दे वभूमि के नाम प्रख्यात है । अनेकानेक दे वों - दे वी का प्रादर्भाव हुआ है । सभी ु अपनी पसंद और इच्छानुरूप अपने इष्टदे व - दे वी की आराधना और भक्ति करने को स्वतंत्र है । लेकिन एक मर्यादा पुरूषोत्तम राम ही अकेले और अनोखे विष्णु अवतरित रूप में सभी जन सामान्य के जननायक के रूप मे सर्व विदित लोकप्रिय महापुरुष है ।

यह विषय विवाद का हो सकता है कि आज के कलियुग मे मानव प्रभु श्रीराम की लीला का बखान और विवरण हम सिर्फ़ किताबी जानकर बातचीत में उपमा और उपमान और व्याख्यान मे उनको प्रयुक्त कर लेते है ।

भाव विन्यास हो शब्द विन्यास हमारे जीवन की शुरूआत और अंत तक राम ही दृष्टिगोचर है । आखिर में मनुष्य रूप मे श्रीराम के प्रमुख गुणों की पडताल कर उन्हें रे खांकित करना आवश्यक है जो श्रेष्ठता के सर्वोच्च पद आसिन करता है :

श्रीकृष्ण की तरह श्रीराम ने कोई अलग से अपनी वाणी या उपदे श नहीं दिया है जग को मगर उनका जीवन ही इतना बडा और गहरा संदेश मानवीय जगत को प्रदान कर चुका है कि उसकी पुनरावति ृ अब असंभव है ।

वास्तविक जीवन में उनकी शीलता,करूणामय श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण करना अव्यावहारिक मानने भारतीय जनमानस में श्री राम चरित्र और लगे है जिसे यथार्थ में पालन करना असंभव - सा रामकथा का प्रभाव और प्रसार बहुआयामी स्तर पर साबित करने में तुले है । इस हद तक जुडा हुआ है , जिसकी जड़े कोई नहीं नाप सकता है । खैर जो भी हो श्रीराम जी चरित्र चित्रण और उनकी अविस्मरणीय जीवन गाथा युगों युगों से दे श सभी यही दोहराए जाते है परदे श तक दह ु राया और समझाया जा रहा है ।वो सभी ” मुझे अपनी शरण मे ले लो राम युगों में अद्त भु , अद्वितीय,आदर्श नायक के रूप मे दनु िया मे अब मेरा नहीं काम ” पूजे, स्मरण किये जाते आ रहे है ।

• किसी भी विषम परिस्थितियों से सामना करते अपनी हर भूमिका और रिश्तों के निर्वहन में हुए अपना धैर्य और संयम पर नियंत्रण रखते हुए श्रीराम ने जो आदर्श और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत वांछित कर्म पथ पर अडिग और अचल रहकर किया वो कलांतर में अनोखा और अविस्मरणीय है । अप्रितम सहनशीलता का परिचय दे ना। हम सभी, युगों से संतो, मनीषियों के अनेकानेक • नीज हीत, कामना - पसंद को परिवार, समाज और तपस्या और साधना के फलस्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम दे श के लिए सहजता,सहृदयता से बलिदान करने श्रीराम की जीवनलीला और चरित्र लीला का काव्य, मे जरा भी संकोच ना करना। छं द, कहानियों और कलावों के माध्यम से रसास्वादन लेते हुए अपना कल्याण करते आ रहज है । • अपने संगे - संबंधियों, भाई - बंधुओं का ख्याल और संभाल खुद के स्वार्थ और भलाई से ऊपर उठ कहा जाता है राम की महिमा और रामकथा कर करना। का वाचन - मनन अपरम्पार है । गुणीजनों ने तो यहां तक दांवा कर गये कि कलयुग में राम का सिर्फ नाम • लोगो और जीवों के प्रति अतिशय करुणा एवं ही भव सागर से पार लगा सकने.में सक्षम है । अगाध प्रेम एवं मैत्री की भावना रखना जो कपि सेना और दस सभी रामभक्तों को चाहे वो बजरं गबली हो, ू रे जीवों से मित्रता के रुप में दिखता है ,भक्त वत्सल श्रीहनुमान और विभिषण को शरण या गोस्वामी तुलसीदास सभी प्रभुकृपा से सदगति को में लेने को आतुर रहता है । प्राप्त है । • गुरू, माता - पिता की आज्ञा को सर्वोपरि आदर राम को सभी सूक्ष्म - से - सूक्ष्म, वह ृ द - से - सत्कार से निष्ठा पूर्वक पालन को तत्पर रहना - वह द जीवों का शाश्वत और प्रमाणिक आधार माना ृ चाहे जो संकट का सामना करना पडे। गया है । तभी तो कहा गया है : • अपनी भार्या के प्रति अपार प्रेम और लग्न - निष्ठा की अतिशय जिसने श्रीरामजी को सीता - हरण प्रसंग मे अपर्याप्त साधन के भी रावण जैसे महान बलशाली,आसूरी शक्ति से लडने और सीता को वापस प्राप्त करने की प्रेरणा दी। www.anuragyam.wordpress.com

” हरि अनंत हरि कथा अनंता ” ” राम से बढकर कोई नहीं दज ू ा ”

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

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दोहे

तहसीन मुरादाबादी मुरादाबाद

ग़ज़ल

नवाब बहार सम्भली रफतपुरा मुरादाबाद

मेरे हक में हो गया मुंसिफ का फरमान

जो याद आपकी करती है अश्क बार मझ ु े

मेज पर रख्खा जिस घड़ी चांदी का भगवान

गुमां ये होता है आ जायेगा करार मुझे

खूब घुटन है मौसम में सांस न आये जाये

लगे है ठे स तो आंखे बरसने लगती है

कली कनी का दम घुटे फूल सभी मुरझाये

मिले हैं ज़ख्म ज़माने से बेशुमार मुझे

उर्दू के अश्आर में हिन्दी की तहरीर

ये जानता हूँ के वादे वफ़ा नही होते

रस्मुल खत में दे खिए शायर की तस्वीर

तुम्हारे वादे का फिर भी है ऐतबार मुझे

हिन्दी उर्दू आज भी सुख दख ु में है साथ

चला भी जाऊं कहीं पर तो ऐसा लगता हैं

दोहों के आहं ग में लम्बे इनके हाथ

की जैसे खींच रहा है दायरे यार मुझे

चारों में महफूज़ हैं भक्ति के बू वांस

में जिस जगह भी रहा आसमान बनके रहा

सरू -कबीर और जायसी राम के तल ु सी दास

अता किया है खुदा ने ये इफ्तेखार मुझे

सबने जत्थे बांधे है सबकी जय जयकार

मुझे यकीं है चमन में ज़रूर आएगी

सबके हाथों में मिली मज़हब की तलवार

वो ही बहार के जिसका है इंतज़ार मुझे

बिल्कु ल अनपढ़ होकर भी बनता कालीदास

बहार इसलिए घर से में कम निकलता हूँ

पाठ अहिंसा का पढ़ें झटपट खाये मास

हवा नही है ज़माने की साज़गार मुझे

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अनुराग्यम ्

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ग़ज़ल

ज़ुबरै मुरादाबादी जिगर निशाँ, मुरादाबाद कुछ फ़ज़ाओ की किस्मत संवर जाएगी जब हसी ज़ुल्फ़ खुलकर बिखर जाएगी दौलते सब्र पल भर में बिखर जाएगी आप याद आएंगे आंख भर जाएगी दिल दख ु ाते हुए ग़म नज़र आएंगे जिस तरफ भी तुम्हारी नज़र जाएगी शाम ही से सताने लगा दिल को ग़म रात रो रो के शायद ग़ज़ ु र जाएगी अरे ए मेरी बदनसीबी मेरे साथ रह तू मुझे छोड़ के किसके घर जाएगी एक सा वक़्त रहता नही है कभी ये उदासी की रुत भी ग़ज़ ु र जाएगी ये मुमकिन है कि खुद को भुला दें ज़ुबरै दिल से लेकिन न यादे जिगर जाएगी --- x --www.anuragyam.wordpress.com

गीत

अमर सिंह बिसेन बहराइच, उत्तर प्रदे श तेरा प्यारा संद ु र मख ु ड़ा, है जैसे कोई चांद का टुकड़ा, तुझमें मुझको रब दिखता है , तेरे प्यार में सब दिखता है , तन ू े ही तो भाव दिया है श्रृंगार का, मैंने तो बस गीत लिखा है प्यार का....१ मेरी दनु िया कि तु खुशी है , मेरे होठों की तू हं सी है , तेरी आंखों में मैं जीता हूं , इश्क लबों से मैं पीता हूं , तू तो है पतवार मेरी मझधार का, मैंने तो बस गीत लिखा है प्यार का......२ तू फूलों की हर डाली में , तू ही टे शू की लाली में , तू कोयल की कुहू कुहू में , तू पपिहे की पिहू पिहू में , सीप से निकली तू मोती है , दीपशिखा कि तू ज्योति है , कारण है तू खशि ु यों से अभिसार का , मैंने तो बस गीत लिखा है प्यार का.....३ -- x --अनरु ाग्यम ्

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दिसंबर 2021

बाल कहानी

खुशियाँ लेकर आई दीवाली लाल दे वेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, बस्ती, उत्तर प्रदे श

सूरज आज बहुत खुश था। उसके मन-मस्तिष्क में अपने पापा के सपने पूरे होने की उम्मीद फिर से जाग उठी थी। हाँ, निश्चय ही पापा यानी अपने बापू के दे खे सपनों को वह पूरा करके दिखाएगा। आज सूरज को अम्मा ने दीवाली के बाद स्कू ल जाकर पढ़ाई करने को बता दिया। उसे तो जैसे पंख लग गए हों। सूरज अब पढ़ाई में जी-जान लगा दे गा, और अपने पापा के सपनों को साकार करके ही दम लेगा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, वो माँ को प्यार करने लगा। सूरज की माँ भी आज खुश थी, वह भी अपने जिगर के टुकड़े बेटे सूरज को को बांह में लेकर प्यार करने लगी।

दिखाना है । मैं पास हो गया हूँ। कक्षा में मेरे सबसे अधिक नंबर आए हैं। मैंने स्कू ल में टॉप किया है । जुग जुग जिओ मेरे लाल। बापू का और खानदान का नाम रोशन करो।” सूरज की अम्मा ने कहा। और हाँ, तुम्हारे बापू तालाब से मिट्टी लेने गए हैं, आते ही होंगे। सूरज का परिवार गाँव में रहता था। मिट्टी के दीये, कुल्हड़, खिलौने, घड़े, बर्तन आदि बनाने का उनका पुस्तैनी काम था। मिट्टी के दीये, कुल्हड़, खिलौने, घड़े, बर्तन आदि बनाकर गांव, बाजार में बेचते थे।

उसी कार्य के लिए सूरज के पिता रामप्रकाश तालाब से मिट्टी लेने गए थे। यही इनकी आजीविका का साधन था। रामप्रकाश गरीब थे, पर बहुत ही आज सूरज को दो वर्ष पूर्व की वे तमाम परिश्रमी थे। साथ ही बड़े नेकदिल इंसान थे। पूरे गाँव बातें सिनेमा की रील की तरह आँखों के सामने आने में बहुत सीधे-साधे व्यक्ति के रूप में रामप्रकाश की लगीं। बहुत-सी चीजें याद आ रही थीं। जब वह गाँव पहचान थी। रामप्रकाश पाँचवी में पढ़ रहे थे कि पिता के प्राइमरी स्कू ल से कक्षा पाँच का रिजल्ट लेकर घर की असामयिक मतृ ्यु हो गई जिससे वे आगे नहीं पढ़ आया था। सूरज बहुत खुश था। कक्षा में उसने टॉप सके थे और घर की जिम्मेदारी बचपन से ही उनके किया था। अपने पिता को सूरज बापू कहता था। बैग कंधों पर आ पड़ी थी। रामप्रकाश अधिक नहीं पढ़ सके जल्दी से चारपाई पर फेंककर वह माँ से लिपटते हुए पर अपने इकलौते बेटे सूरज को आगे पढ़ा-लिखाकर बोला - “अम्मा बापू कहाँ हैं ? क्यों क्या हुआ सूरज एक अफसर बनाना चाहते थे। सूरज भी पढ़ने में बहुत ? तुम्हारे हाथ में यह कैसा कागज है ? ” होशियार था। हर कक्षा में अव्वल आता था।

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“ अम्मा आज मेरा रिजल्ट मिला है , बापू को अनुराग्यम ्

तब तक रामप्रकाश मिट्टी लेकर आ गए। सूरज www.anuragyam.wordpress.com


दिसंबर 2021 ने दौड़कर बापू के सिर से मिट्टी उतरवाई और अपने पिता से बोला- “बापू ये दे खो मेरा रिजल्ट। आज मिला है ।” रिजल्ट दे खकर रामप्रकाश बोले- “अरे वाह ! बेटे, तुमने तो फिर कमाल किया, तुमने पूरे कक्षा में टॉप किया है । कल बाजार बर्तन बेचने जाऊँगा और तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की चीजें लेकर आऊँगा।” अपनी पत्नी यशोदा से बोले- “दे खो ! मेरा बेटा पढ़ने में कितना अच्छा है । इस बार भी इसने टॉप किया है । इसे आगे खूब पढ़ाऊँगा। यह मेरी तरह मिट्टी के बर्तन नहीं बनाएगा बल्कि मेरा सपना है कि पढ़-लिखकर अफसर बने।” सूरज की माँ यशोदा ने कहा- “पर गाँव के स्कू ल में कक्षा पाँच तक ही पढ़ाई होती है । अगलबगल के गाँव में आगे कक्षा में पढ़ाई के लिए सरकारी स्कू ल नहीं है ।” हाँ, ये बात तो है ।” कुछ दे र सोचने के बाद रामप्रकाश पत्नी यशोदा से बोले- “हाँ, इधर नजदीक कोई सरकारी स्कू ल आगे पढ़ने के लिए नहीं है । हम सोच रहे हैं कि अब हम सूरज को शहर के किसी प्राइवेट स्कू ल में पढ़ाएं। इधर जो स्कू ल की गाड़ी आती होगी, उसी से सूरज आया-जाया करे गा।” यशोदा ने कहा- “पर हम गरीब हैं। प्राइवेट स्कू ल में पढ़ाने में फीस और कॉपी-किताब आदि में अधिक पैसा लगता है और ऊपर से स्कू ल की बस से आने जाने का किराया।”

कलायात्रा चारों तरफ हाहाकार मच गया। हर गाँव, हर मुहल्ले में लोग संक्रमण से प्रभावित होने लगे। बहुत लोग मौत के मँह ु में चले गए। स्कू ल, मार्के ट सब बंद हो गए। पता नहीं कैसे सूरज के पिता भी महामारी की चपेट में आ गए। महीनों अस्पताल में भर्ती रहे पर बच न सके। सूरज के परिवार पर जैसे वज्रपात ही गिर पड़ा। पाँच-छह माह बाद महामारी नियंत्रित होने पर एक बार फिर से स्थिति सामान्य हुई। घर की जिम्मेदारी रामप्रकाश की तरह अब सूरज और उसकी माँ के कंधों पर आ चुकी थी। सूरज और उसकी माँ ने मिलकर किसी तरह मिट्टी के बर्तन बनाना शुरू किए। बर्तनों को सूरज बाजार में ले जाकर बेचने लगा। सूरज का स्कू ल जाना बंद हो गया। घर चलना ही मुश्किल था तो ऐसे में सूरज पढ़ता कैसे? वह अपने बैग और कॉपी-किताबों को दे खता तो चुपचाप रोने लगता। सूरज की माँ उसे चुप कराती। सूरज अपनी माँ से पूछता- “अम्मा भगवान ने ऐसा क्यों किया, बापू को हमसे क्यों छीन लिया। अब मैं पढ़ने नहीं जाऊँगा क्या ?” उसकी अम्मा बेचारी क्या जबाब दे ती बस ! अपने और सूरज के आँसुओं को पोंछती रहती। कहते हैं कि समय बीतते दे र नहीं लगती है । समय करवट बदलता है । अगले माह दीवाली आने वाली है । दीयों और मिट्टी की बनी अन्य चीजों की मांग बढ़ गई। सूरज और उसकी माँ ने बहुत मेहनत कर अधिक मात्रा में दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, गुल्लक और खिलौने आदि बनाए। अधिकतर बिक गए। बिक्री से अच्छा पैसा मिला। सूरज की माँ ने सोच-विचार कर निर्णय लिया कि दीवाली के बाद सूरज के स्कू ल की फीस जमाकर सूरज को अब पढ़ने के लिए भेजें। पढ़ाई के बाद वह दक ु ान के काम में सहायता किया करे गा। पर अब सूरज पढ़े गा। यशोदा ने सूरज को बुलाया“बेटा सूरज ! दीवाली के बाद तुम पढ़ने जाओगे।” क्या... क्या कह रही हो अम्मा... फिर से एक बार बोलो” हाँ, अब तुम दीवाली के बाद अपने उसी स्कू ल में पढ़ने जाओगे।” उसकी अम्मा ने दह ु राया।

सूरज के पिता ने कहा- “हाँ, सही है कि प्राइवेट स्कू ल में पैसा बहुत लगता है , पर क्या करें , इधर कोई स्कू ल भी नहीं है । हम और मेहनत करें गे पर सूरज को आगे पढ़ाएंगे। पढ़ने का मेरा सपना पूरा न हो सका, पर अपने बेटे सूरज को कुछ भी, कैसे भी करके पढ़ाएंगे।” सूरज बहुत खुश था कि वह शहर के प्राइवेट स्कू ल में पढ़ने जाएगा। खूब पढ़े गा और अपने बापू के सपनों को पूरा करे गा। स्कू ल खुलते ही रामप्रकाश ने सूरज का एडमिशन शहर के एक अच्छे प्राइवेट स्कू ल “आर्य शिक्षा निकेतन’ के कक्षा 6 में करा दिया। सूरज की ड्रेस, कॉपी, किताब सब खरीद दी। अब सूरज रोज स्कू ल की बस से पढ़ने के लिए जाने लगा था। वह मन लगाकर पढ़ता था। उसके कई अच्छे दोस्त भी बन गए थे। स्कू ल के शिक्षक भी सूरज को मानते थे। सूरज की खुशी का ठिकाना न रहा। वह अपनी माँ से लिपट गया- “अम्मा सच कह रही हो, अब मैं अभी दो तीन माह पढ़ाई का गुजरा ही था पढ़ने जाऊँगा ?” हाँ, बेटा ! तुम्हारे बापू के चले जाने कि पूरे दे श में न जाने कौन सी महामारी आ गई से हमारी सारी खुशियों को ग्रहण लग गया था। उनकी कि स्कू ल बंद हो गए। सूरज का भी स्कू ल जाना बंद कमी कभी नहीं पूरी होगी। पर इस दीवाली में इतनी हो गया। सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा कर दी। बढ़िया बिक्री हुई है कि आसानी से तुम्हारी फीस भरकर सब दक ु ानें ठप्प हो गईं। सूरज के पिता का कारोबार पढ़ने के लिए तुम्हें भेज सकँू गी।” अम्मा आज मैं बहुत भी बंद हो गया। घर में रखे पैसे धीरे -धीरे खत्म हो खुश हूँ। मैं स्कू ल जाऊँगा। सच में अम्मा, मुझे पढ़ना रहे थे। लगभग साल भर सब बंद रहा। धीरे -धीरे बहुत अच्छा लगता है । पढ़-लिखकर अफसर बनँग ू ा स्थिति सामान्य होने लगी। स्कू ल और बाजार खुले, और बापू का सपना पूरा करूँ गा। ये दीवाली हमारे लिए पर यह सिलसिला तीन चार माह ही रहा। उसके बाद खुशियाँ लेकर आई है ।” इतना कहकर सूरज अम्मा से अचानक महामारी की दस ू री लहर आ गई, जो और भी लिपट गया। माँ और बेटे दोनों की आँखों से आँसू बहने खतरनाक साबित हुई। लगे। www.anuragyam.wordpress.com

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

कविता - क्रान्तिकारी चाहिए

क्या घण ृ ा क्या द्वेष ईर्ष्या लोभ लालच क्या बला। हो न मन में

पर

इन्हें

पहचानने

की हो कला ।

नीति के पक्के पुजारी चाहिए इस दे श को। आज ऐसे क्रान्तिकारी चाहिए इस दे श को।। अन्धविश्वासी चलन जो सक ु र्मों

की

से बदल दें

तोड़ दे श

दें जंजीर को। की तकदीर को।

राष्ट्र के निर्माण का संकल्प जिनकी आन हो।

गिरे न्द्रसिंह भदौरिया “प्राण” इन्दौर, म•प्र• जो स्वयं कर्तव्य की हर साधना को साध लें। आपदा की आँधियों को मुट्ठियों

में

बाँध लें।

मानवी

शत्रु की

प्रहर

जो हृदय इंसानियत दे श

पर

हर

मुर्गे

वीर हों

इस तरह के क्रान्तिकारी चाहिए इस दे श को।। दस ू रों का

मँह ु

न ताकें

साथियों को साथ दें ।

जो गिरे उसको उठा लें हाथ को निज हाथ दें । भल ू कर भी भारती माँ की न निन्दा सह सकें। दे ख कर प्रेम

को

बेचन ै धरती खुद न जिन्दा रह सकें। पज ू ा समझ कर धर्म को आधार दें ।

जो हृदय की बीथियों में व्योम सा विस्तार दें ।

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अनुराग्यम ्

चाहिए

इस

दे श को।

एक युग की नींव में जो ईंट से डटते दिखें।

के राग के आगार हों।

वे परु ु ष हों या कि नारी चाहिए इस दे श को।

बाँके प्रहरी

आज ऐसे क्रान्तिकारी चाहिए इस दे श को।।

सरीखी बाँग दें ।

हाल मिटने के लिए तैयार हों।

को पर्व ू में ही भाँप लें।

आग सा ले तेज चल दे आँधियो को चीरता।

क्रू र होकर जो अहम ् को खूटियों पर टाँग दें । हर

रण योजना

धैर्य धरती सा भरा हो सिन्धु सी गम्भीरता ।

टूट जाएँ शब्द अपने आप आते शाप के।

की

मूल्यों का सुहाता गान हो ।

जो क्षितिज की दरू ियों को दरू से ही नाप लें।

काँप उट्ठें नाम सन ु थर थर कलेजे पाप के।

जागने

अनमोल

मेघ से सब कुछ लट ु ाने के लिए उठते दिखें। फूल से कोमल हृदय में

प्रीति हो पाषाण सी।

स्वप्न में भी जो न चिन्ता पालते हों प्राण की। जो

समय

हाथ में

के पत्थरों

पर चिह्न छोड़ें पाँव के ।

जिनके पलें युग

धूप वाली

छाँव के।

जो शहीदों को झुकाकर शीश अभिनन्दन करें । दे श की

स्वाधीनता

का

उम्र

कर्म - कारी धर्म - धारी चाहिए

भर चिन्तन करें । इस

दे श

को।।

आज ऐसे क्रान्तिकारी चाहिए इस दे श को।। --- x --www.anuragyam.wordpress.com


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दिसंबर 2021

कविता - दलु ्हन

रं जना वर्मा गिरिडीह, झारखंड कुमकुम थाल पर पग रखकर.... ससुराल की दे हरी पार करी

कितने उमंग और उल्लास लिए मन में साथ में दवु िधाएं भी है साथ खड़ी।

नया परिवेश नये लोग नया संबंध.... सहयोग की भावना है कम.... पर लब में है मुस्कान बड़ी ।

अनिश्चित भविष्य की कल्पना ले विविधता से भरे इस परिवेश में

फैले खुशी और आनंद का उजास

उषा के आलोक में हो असीम उल्लास। खुली पलक..ससुराल का प्रथम प्रभात

हृदय की धक - धक....भीतर से उभरती है अपार पर स्नेह सा प्रिय रूप दे खकर

पाता है दिल अद्त भु साहस का संचार मेरा गहना है मेरी मुस्कान

मझ ु में रचा बसा है मेरा संस्कार

स्वरों में ध्वनित हो फिर अम्लान रच बस जाऊंगी यहाँ

जैसे काँस और सिवार --- x --www.anuragyam.wordpress.com

कविता - ये शहर और शोर

गोल्डी मिश्रा गाजियाबाद, उत्तरप्रदे श मेरे शहर में शोर बे शुमार है ,!! यहां हर सांस में गूंज एक गीत की है , होठों पर ख़ामोशी लाज़वाब है , यहां खूबसूरती भी एक राज़ है , और सादगी से होता श्रृंगार है , मेरे शहर में शोर बे शुमार है ,!! यहां गंगा की बहती धारा है , बन्धन को जोड़ता सिर्फ एक धागा है , यहां झुकती पलको में इज़हार है , किसी की आखों में सिर्फ गहरा इंतजार है , मेरे शहर में शोर बे शुमार है , यहां दियों से रोशन काशी के घाट है , तो कही कोई हालात की अग्नि में झुलसता दिन रात है , यहां हर दिन तीज त्यौहार है , तो कही कोई दो निवालों का मोहताज है , मेरे शहर में शोर बे शुमार है , यहां किसी को धूप मिली, किसी ने बारिश में भी एक राहत खोज ली, यहां किसी की हर ख्वाहिश पूरी है , तो किसी की दआ बरसो से अधूरी है , ु मेरे शहर में शोर बे शुमार है , यहां पाप पुन्य को लेकर गहरी बहस है , तो कोई धर्म से बंधा बेबस है , यहां नजदीकियों में कैसी दरू ी है , ना जाने कितने किस्से कहानी आज भी अधूरी है । --- x --अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

डॉ. सम्राट् सुधा असिस्टें ट प्रोफ़ेसर (हिन्दी), रुड़की, उत्तराखंड

राष्ट्रप्रेमियों के लिए अमल ू ्य और दर्ल ु भ भें ट पत्रिका चाँद फाँसी अंक प्रथम बार नवम्बर माह सन १९२८ में प्रकाशित हुआ था तब हमारा दे श अंग्रेजों का गुलाम था । अंग्रेज सरकार को इसका प्रकाशन अपने लिए हानिकारक लगा और इस पत्रिका ‘चाँद फाँसी अंक’ को जब्त कर लिया । स्वतन्त्र भारत में यह एक बार फिर से छपा । पुनः विदे शी ताकतों ने आंतरिक तौर पर इसका पुरजोर विरोध किया । जी हाँ जब दे श में स्वतंत्रता की सुभावनाएँ दे शप्रेमियों के हृदय में हिलोरें मार रही हों और उनके दमन के लिए आक्रांता शासक उन्हें पकड़कर फाँसी दे रहे हों, तो ऐसे में साहित्य भी भला कैसे मौन रह सकता था ! दे शप्रेम की भावना का अतिरे क कहें या भावी के प्रति अनिश्चितता के भाव कि नवम्बर, 1928 में , उस समय इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘ चाँद ’ ने अपना ‘फाँसी- अंक’ प्रकाशित किया। अवसर दीपावली का था और यह अंक चाँद पत्रिका के सातवें वर्ष का प्रथम अंक था। यह स्पष्ट कर दे ना समीचीन होगा कि चाँद का उक्त फाँसी - अंक विशुद्ध साहित्यिक नहीं था, वरन ् इसमें फाँसी सम्बद्ध साहित्यिक कहानी ; कविता एवं लेखों के साथ- साथ क़ानूनी तथा इतिहासगत, फाँसी सम्बद्ध सामग्री भी प्रचुर मात्रा में प्रकाशित की गयी थी। पत्रिका के चाँद के फाँसी- अंक का सम्पादन चतुरसेन शास्त्री ने किया था। इस अंक में ‘विनयांजलि’ शीर्षक के अपने सम्पादकीय में उन्होंने आत्मा को झकझोर दे ने वाली बातें लिखीं। कतिपय अंश प्रस्तुत हैं - चाँद की बहनों, भाइयों और बुज़ुर्गों

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अनुराग्यम ्

के हाथ में , दीपावली के शुभ अवसर पर, फाँसी - अंक जैसा हृदय को दहलाने वाला साहित्य सौंपते हमारा हाथ काँपता है । परन्तु, हम नङ्गे हैं, भूखे हैं, रोगी हैं, निराश्रय हैं ; हम स्वार्थी ; पापी और भीरु हैं ; हम पूर्वजों की अतुल संपति को नाश करने वाली संतान हैं, बच्चों को भिखारी बनाने वाले माता-पिता हैं ! रूढ़ि की वेदी पर स्त्रियों को बलिदान का पशु बनाने वाले पुजारी हैं !! हम ख़ानदानी बाप के कुकर्मी बेटे हैं !!! यह ध्यान रखने की बात है कि जब यह सब लिखा जा रहा था, वह परतन्त्रता का समय था, फिर भी वस्तुस्थिति व उसका कारण बताते हुए फाँसी-अंक के सम्पादक ‘भविष्य’ के प्रति अत्यंत आश्वस्त थे इसी सम्पादकीय में उन्होंने ये पंक्तियां भी लिखीं - प्यारी बहिनों, माताओं, भाइयों और बुजुर्गों ! फांसी-अंक को दिवाली की अमावस्या समझिये ! दे खिये, इसमें बीसवीं शताब्दी के हुतात्मा के दिये कैसे टिमटिमा रहे हैं, उदीयमान जातियां विशेष अवसरों पर विनोद नहीं करतीं ; वेदना-स्थलों की जाँच किया करती हैं ! कुछ मास व कुछ वर्ष व्यतीत होने दो - एक महान ् विप्लव की आंधी सायँ-सायँ करती चली आ रही है , जो पचासों वर्ष तक भारत को दिवाली के दिये न जलाने दे गी, परन्तु उसके बाद जो दिये जलेंगे, वे क्षुद्र www.anuragyam.wordpress.com


दिसंबर 2021

कलायात्रा

मिट्टी के टिमटिमाते दिये न होंगे, वे होंगे रत्नदीप; और गद्य सामग्री के रूप में फ़्रांस की ‘ रक्त- क्रांति’ पर उन्हें साक्षात ् राज्य- लक्ष्मी अपने हाथों से जलायेगी !” रघव ु ीर सिंह का विस्तृत लेख ‘ फ़्रांस की राज्यक्रांति के कुछ रक्त- रं जित पषृ ्ठ ’ फाँसी -अंक का विशेष मूल सम्पादकीय के अतिरिक्त चतुरसेन शास्त्री आकर्षण रहा । सभी बातें प्रच्छन्न रूप से लिखनी थी, ने चाँद के फाँसी- अंक में ‘सम्पादकीय विचार’ के इसका प्रमाण उक्त लेख के अंत से सुस्पष्ट मिलता अंतर्गत दण्ड का निर्णय, अपराध का विकास, क़ानून है - यों रोबेस्पियर तथा उसके साथ ही भयानक शासन और उसका विकास, क्रान्तिवाद और फाँसी उप- शीर्षकों का अंत हो गया। जिन पुरुषों ने राजा-रानी का वध कर के अन्तर्गत फाँसी सम्बद्ध गहन विचार प्रस्तुत किये। पुरातन ज़मींदारी - प्रथा से तथा निरन्तर दबाव और इन विचारों की आज भी पर्याप्त प्रासंगिकता है । शीर्षक अत्याचार से दे श को छुड़ाया था, उन्होंने यद्यपि कई ‘दण्ड का निर्णय’ के अंतर्गत प्रस्तुत यह अंश द्रष्टव्य निर्दोष पुरुषों का रक्त बहाया, किन्तु उन्होंने फ़्रांस का है - कोई मनुष्य चाहे कितना भी योग्य विद्वान हो, इतना बड़ा उपकार किया कि उनसे फ़्रांस- निवासी कभी वह निभ्रांत तो हो ही नहीं सकता। यदि मनुष्य के भी उऋण नहीं हो सकते। ईश्वर की चक्की धीरे - धीरे निर्णय में कहीं पर परमाणु बराबर भी भूल हो गयी, पीसती है , किन्तु अत्यंत बारीक पीसती है । तो वह उसके हाथ अन्याय हुआ और यदि यह अन्याय ऐसे व्यक्ति से और ऐसे स्थान से हुआ कि जिसे चाँद के इस फाँसी- अंक में ‘ विप्लव - यज्ञ समाज और राजसत्ता ने न्यायाधिकार की स्वच्छंदता की आहुतियां शीर्षक के अंतर्गत किन्हीं निर्भय का एक दी है , तो यह अक्षम्य अपराध हुआ समझना चाहिए ! लेख कूका - विद्रोह के बलिदान छपा, जिसमें पंजाब में हुए कूका - विद्रोह को बहुत गहनता से प्रस्तुत किया उक्त फाँसी-अंक को सांगोपांग अध्ययन करने गया । उक्त लेख के कतिपय हृदयस्पर्शी अंश प्रस्तुत से चतुरसेन शास्त्री की सम्पादन - मेधा का परिचय हैं - दे खते- दे खते पंजाब - केशरी रणजीत सिंह अपने प्राप्त होता है । स्थूल रूप से यह अंक दीपावली पर प्यारे पंजाब को छोड़कर महायात्रा पर निकल गये। एक संदर्भहीन व प्रासंगिता- विहीन प्रकाशन लगता उनके आँख मूंदते ही अंग्रेजों की बन आयी। दस ही है , परन्तु वर्ष 1928 में , जब हम ग़ल ु ाम थे, इसके वर्ष के भीतर पंजाब का नक़्शा भी लाल रं ग में रं ग प्रकाशन का मूलोद्देश्य था तो रचनाओं के दीपों के दिया गया। माध्यम से स्वतंत्रता का दीप प्रज्वलित करना ही! मूल उद्देश्य स्थापित हो, इसके लिए बहुत संभलकर अलीपुर और सुबराओं तथा गुजरात और चलने की आवश्यता थी, क्योंकि अंग्रेज सरकार उस चेलियाँवाला में वीर सिक्ख सैनिकों ने जिस वीरता समय प्रकाशित होने वाले प्रत्येक हिन्दी समाचारपत्र - का परिचय दिया था, उसकी याद आज भी रोमांचित पत्रिकाओं पर अतिरिक्त दृष्टि रखती थी। किये बिना नहीं रहती । परन्तु, दे श का दर्भा ु ग्य! नेताओं ने सदा धोखा दिया । और आख़िर पंजाब भी फाँसी-अंक में प्रथम पषृ ्ठ पर पंडित रामचरित पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ दिया गया। इसी लेख उपाध्याय की कविता ‘प्राणदण्ड’ प्रकाशित की गयी, जो में कूका आंदोलन के नेता गुरु रामसिंह के बलिदान सामान्यतः फाँसी दिये जाने के विपक्ष में थी और इस का सविस्तार से वर्णन करते हुए उक्त लेख के अंक विशेष को फाँसी को लेकर एक विचार - विमर्श लेखक निर्भय ने बहुत मार्मिक शब्दों में लिखा - आज का अंक होना दर्शाती थी, परन्तु अंक के भीतर बहुत लोग इन हुतात्माओं को भूल चुके हैं, उन्हें मूर्ख और निपुणता व परोक्ष रूप से वस्तुतः अंग्रेजी सत्ता के के उतावले, पथ- भ्रष्ट तथा आदर्शवादी बतलाते हैं, परन्तु प्रति विद्रोह की सामग्री प्रकाशित की गयी। उक्त अंक कहाँ है आज वह उत्साह और साहस ? कहाँ है वह में प्रकाशित विद्याभास्कर शुक्ल की कविता मतृ ्यु में निर्भीकता और तत्परता ?” जीवन’ का यह अंश द्रष्टव्य है इस अंक विशेष का मुद्रण व प्रकाशन तत्कालीन “ था सुषुप्ति का सुखमय काल कलकत्ता से कराया गया था ; उस समय इसके किसी ने बरबस दिया धकेल ! प्रकाशन पर कागज़ रीम से लेकर सम्पादकीय व्यय स्वप्न-शय्या पर सहसा डाल आदि कुल मिलाकर बारह हज़ार पाँच सौ रुपये का स्वयं होकर हृदयासीन !! खर्चा आया था । पत्रिका चाँद का उपर्युक्त ‘ फाँसी लगा कहने - जग के सर्वस्व ! अंक ’ वस्तुतः हिन्दी साहित्य की एक धरोहर है । वर्ष चेतना- रहित, ज़रा तो चेत । 1928 में इस प्रकार का अंक प्रकाशित किया जाना अमरता की अंतस्थल में कितना दषु ्कर रहा होगा, इसका अनुमान सहज ही नहीं क्या अभिलाषा भी शेष ?” लगाया जा सकता है ; साहस तो इसमें अप्रतिम था ही यही नहीं, उपर्यु ! पत्रिका ‘ चाँद’ का उक्त ‘ फाँसी- अंक’ प्रकारांतर से एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , जिस पर हम सभी सहज उपर्युक्त के अतिरिक्त इस अंक में फाँसी ही गर्व कर सकते हैं। सम्बद्ध 09 अन्य कविताएं भी प्रकाशित की गयीं। www.anuragyam.wordpress.com

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

खामोश समय

मणिमाला चैटर्जी नागपुर, महाराष्ट्र खामोश समय बहता जाता अचंचल - निडर अनजान काल प्रवाह के साथ अपलक आंखों के सामने बदलता रहता चित्रपट बदलते समय के साथ - साथ।। पलों के स्मृति - संचय बसे रहते हृदय के गहरे आयाम के पट में समय का निर्वाक पदचिन्ह रच जाते सफ़र के हर मोड़ में ।। खामोश पलकें पी जाते हैं अश्रुधार दख ु के बच जाता है एक तपिश एक कभी न शीतल होने वाली ज्वालामुखी जलती रहती अहर्निश।। मानव का विवर्तन का इतिहास वो खुद कभी नहीं तय कर सकता प्रकृति के नियम से बंधा मनुष्य हमेशा बदलता रहता खोता रहता।। काल्पनिक सीमारे खा मन का मोड़ लेकर विलीन हो जाता किसी अनंत अरण्य में

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अनुराग्यम ्

खो जाते हैं नैतिकता आदर्श और मानविक बोध किसी अनजानी खाई में मानव लड़ता रहता इस घनघोर अंधकार जंगल में निरं तर साक्षी रहते इस लड़ाई के हर एक क्षत - बक्ष ृ हर एक बिखरा हुआ पत्थर।। अंतर के अंतस्थल में बहता रहता एक निशब्द रक्तपात विवर्तन के नियम के साथ चेतन से अचेतन तक चलता रहता विवाद।। मनुष्य अनंत नहीं है सीमित हैं उसका अस्तित्व और अहं कार जीवन संघर्ष में इस सत्य की परिभाषा प्रतिफलित होती है बार - बार।। समय के इस महाप्लावन में कभी खो जातें रिश्तें - नातें घर - परिवार; भंवर में पल में खामोश समय जीवन को बदल दे ता एक शन्य में ।। ू जब समय छीन लेता है जीने की हर आस रह जाता है एक निथर विरह, खो जाती है रोशनी फैलता रहता है एक अंधकार, असह।। हे मानव! क्या खामोश रहोगे काल के अंतहीन सागर में डूबने तक? जान है तो जहाँ है का नारा लगाओ कर लो जीवन सार्थक।। फैलाओ प्रेम का संगीत सुनाओ आशा की वाणी थाम लो हर निराश व्यक्ति को विश्वास का दीप जलाओ विद्रोही मानव! नष्ट कर दो काल के मूक शासन को।। --- x --www.anuragyam.wordpress.com


कलायात्रा

दिसंबर 2021

संस्मरण - खत / पत्र भावना भारद्वाज, नई दिल्ली

दसवीं कक्षा में थी जब पहला प्रेम पत्र लिखा मैने ।अरे नही नही मेरा किसी से कोई नाता नहीं । बात ये थी कि मेरी बचपन की सहे ली पिंकी (सुनीता )का और मेरा प्यार बहुत ही ज्यादा था । पिंकी के पिता बहुत गरीब थे । आठ भाई बहन मिला कर दस जनों का परिवार था ।घर में कोई भी पांचवीं कक्षा से ज्यादा पढ़ा नहीं ।यही हाल पिंकी का का था ।घर के सारे काम करती मगर पढ़ाई में कोई रुचि नहीं ।पांचवी के बाद छोड़ दिया पढ़ना । ऐसे ही समय बीतता गया । मैं दसवी कक्षा में आ गई और पिंकी घर के कामों में निपुण । एक दिन मैं और पिंकी मेरे घर की छत पर बैठे थे तो उसने बताया कि आते रविवार को उसे लड़के वाले दे खने आ रहे है । उस समय तो मै बहुत खुश हुई कि मेरीसहे ली की शादी होगी ।लेकिन बाद मे एक एहसास उसको खोने का उदास कर गया ।कुछ दिनों में उसका रिश्ता पक्का हो गया ।लड़का पंजाब से था ।

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सगाई के बाद उसके पिता ने समय मांगा शादी की तैयारी के लिए साथ ही पिंकी भी अभी केवल सत्रह साल की थी ।तो शादी एक डेढ़ वर्ष बाद का निर्णय लिया गया । तो अब शुरू हुआ खतों यानी प्रेम पत्रों का सिलसिला शुरू ।पहला पत्र उसके मंगेतर ने भेजा ।जिसमे उसने पिंकी को पत्र लिखने को कहा ।अब पिंकी घबराई मेरे पास आई कि क्या करूं । उसने मुझे कहा कि तू लिख दे मुझे तो आता नही ।तो बस मैने लिखने शुरू कर दिए पत्र लेकिन पिंकी की सहे ली की तरफ से ।जो कुछ वो लिखवाना चाहती वो लिख दे ती । आज उस बात को याद करती हूं तो हं सी आती है खुद पर ।और एक बात कि उन पत्रों में सच्चा प्रेम तो था बिना किसी लग लपेट के छुपाने के लिए भी कुछ नहीं होता था । ये था प्रसंग मेरे लिखे प्रेम पत्रों का ।

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

बचपन के गांव की यात्रा

रश्मि दाधीच, सरू त, गज ु रात

मम्मी के घर से नानी का घर मात्र 2 किलोमीटर दरू था। मम्मी के बिना, पढ़ाई कैसे हो??? और नानी के बिना, नींद कैसे आए???? उस 8 साल की लड़की की सबसे बड़ी समस्या यही थी!!! यही सोच कर मम्मी ने घर में 5:00 बजे मास्टर जी को बुलाना शुरू किया, वो 6:00 बजे छोड़ते। वो 8 साल का बचपन 6:00 बजे अपने मम्मी के घर से निकल कर, गांव की गलियों में घूमता - फिरता, जाने- पहचाने चेहरों से बातें करता अपनी नानी के घर पहुंच जाता। मेरे बचपन का यह किस्सा उस गांव की यादें ताजा कर दे ता है जो शायद अब किताबों में बसते हैं। 1 दिन मास्टर जी आने में लेट हो गए और छोड़ते- छोड़ते 8:30 बजा दिए। मुझे पता था अब इतनी रात को मम्मी मुझे नानी के पास नहीं जाने दे गी। 8 साल का वह बचपन बिना किसी को बताएं नानी के घर की तरफ दौड़ चला। रात के सन्नाटे सांय sssसांय sssकर रहे थे। सुनसान गलियों में घोड़ों की टप टप और कुत्तों के भौंकने की आवाजें थी। पर, मेरे मन के भीतर कोई डर नाम की चिड़िया नहीं थी, मानो सारा गांव मेरा ही तो था। कभी अंधेरा कभी रोशनी, कभी चिरपरिचित लोग, तो कभी अनजान लोगों के सवालों का जवाब दे ते - दे ते नानी के घर तक पहुंच ही गई। उन दिनों आम घरों में फोन नहीं होते थे, तो बस!!!

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पीछे -पीछे , सुध - बुध खोई हुई चिंता में लिपटी अनुराग्यम ्

मम्मी, लोगों से मेरे बारे में पूछती - पूछती घर तक पहुंची और गुस्से से भरा मेरे गाल पर एक चांटा जड़ दिया। हालांकि इस बात के लिए मम्मी को नानी नाना से बहुत डांट पड़ी, पर मुझे भी समझाया गया। सच तो यह है , वो बिंदास, बेबाक, निडर, बचपन मुझे उस गांव के लोगों के अपनेपन, भोलेपन, निस्वार्थ प्रेम की वजह से मिला था। नानी के किराएदार, बड़े बाबू जी के कंधे पर बैठ कर मैं पूरे गांव की सैर करती, पड़ोस की छोटी मां के घर जाकर लहसुन की चटनी और रोटी खाती तो पास की काकी के यहां नीम के पेड़ पर लगे झूले पर, अपना हक जताती, सामने की ठकुराइन भाभों वह तो मुझे दे वी ही मानती थी मेरे लिए तरह-तरह के उपहार और राजपूती पोशाक बनाती थी। आज भी इन सभी की बातें करते करते हैं इनके चेहरे मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं। हर घर में गाय भैंस बकरी आम थी एक परिवार के सदस्य की भांति उन से लगाव होना भी बड़ा स्वाभाविक था। अनजाने में ही बच्चे बच्चे के ह्रदय में प्राणी मात्र के लिए सम्मान और प्यार भर जाता था। घी , दही, छाछ, दध ू , अनाज यह तो कहीं टिकते ही नहीं थे!!! हर घर में इधर-उधर घूमते रहते, जिसके पास भी ज्यादा होता, वह बांटने में ही विश्वास करता। अब शायद परिवार बड़े हो गए हैं या ह्रदय छोटे ??? आज पड़ोस तो क्या रिश्तेदार भी निस्वार्थ प्यार नहीं कर पाते…. www.anuragyam.wordpress.com


दिसंबर 2021

कलायात्रा उन दिनों पूरा मोहल्ला ही एक घर के जैसा लगता था। जब कभी गांव में पीपल के गट्टे पर कठपुतली का खेल होता, रामलीला होती, दशहरे में रात- रात भर कार्यक्रम चलते, तो सब एक साथ उन कार्यक्रमों का आनंद उठाते। पूरे मोहल्ले में बस एक ही टीवी थी, हर रविवार भाभों के यहां जाकर सभी एक साथ रामायण दे खा करते । जब स्क्रीन पर श्री राम और सीता आते, तो मानो पूरे हॉल में भावनाओं का समंदर उमड़ पड़ता, बड़ी-बड़ी लहरें सभी की आंखों से छलक कर बाहर आती। यकीन मानिए उस एक पल के लिए साक्षात ईश्वर सभी के ह्रदय में विराजमान रहते थे। मोहल्ले में किसी एक के यहां शादी या गमी होती तो समझिए कि पूरा मोहल्ला ही उन अतिथियों की आवभगत में लग जाता। कहीं से बिस्तर, कहीं से बर्तन, तो कहीं से खाने का सामान चुटकियों में एकत्रित हो जाता। ठीक त्योहारों से पहले तरह तरह के स्वांग सजाए “भांड” पूरे गांव में चहलकदमी करते और त्योहारों के आने का माहौल बनाते। उनके आगे पीछे घूमती हम बच्चों की टोली हर घर में खुशियों के आगमन का बिगुल बजाती। शाम होते ही गांव के घर गोधूलि से सराबोर हो जाते, सभी अपने अपने घरों के चबूतरो पर चढ़कर उन गायों को दौड़ते हुए दे खते जो घर अपने बच्चों से मिलने जा रही होती थी। मंदिर की घंटियां बजने लगती और हम बच्चों को स्वतः ही यह संदेश मिल जाता कि मंदिर में आरती करो प्रसाद लो और अपने अपने घर लौट जाओ। बारिश की बूंदों का पानी जब लबालब गलियों से नदी बनकर गुजरता तो न जाने कितनी कॉपियां उस नदी में कश्तियां बनकर तैरने लगती। पीछे बची गीली मिट्टी से न जाने कितने ही सपनों के घर बनते। सीमित साधनों में सीधा सरल जीवन, छल- कपट, ईर्ष्या, अपराध से दरू , शुद्ध वातावरण और शुद्ध ह्रदय वाले लोग मिलावट की तो कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं थी। बड़ा अफसोस होता है , कि आज अपने बच्चों के लिए हम ये बचपन, वो गाँव, यह माहौल बचा ही नहीं पाए!!!! कोमल मिट्टी से हम सख्त सड़क बन गए हैं जहां बस महं गी गाड़ियां ही चल सकती है । मैं उम्र के किसी भी पड़ाव में रहूं, पर अपने बचपन का यह सफर उस गांव के लोगों की वजह से मेरे दिल के बहुत करीब रहे गा। आपने भी अगर किसी गांव की ऐसी झांकी दे खी है या दे ख रहे हैं तो जरूर बताइएगा।

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अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

कविता - चलो बात करते हैं

कर गया तबाह कौरव कुल सारा

श्री कृष्ण ने श्री मद् गीता का सबक

दिया कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में अर्जुन को, पांडवों की हार बदलकर जीतना

सिखलाया उस उच्च उपदे श श्रीकृष्ण जी के, गीता सिखाती जीवन रहस्य

कर्म योगी बनना, फल की इच्छा त्याग

कर्तव्य पथ पर चलते जाना दे ता स्वयं अधिकार, जीने का अद्त भु दिव्य योग

कमला मूलानी ठाणे, महाराष्ट्र चलो आज कुछ बात करते हैं

आज है स्वार्थ का ये युग एक और

कलयुग है प्यारे , ज्यादा ये कर युग

इस हाथ दे उस हाथ ले, का है ये युग

अपनी सीमाओं से निकल कर

जैसी करनी वैसी भरनी कहां कोई भाई है साथ

सतयुग बीता आया त्रेतायुग

अपनी डफ़ली अपना राग सुनाता

एक भाई राजा था बनने वाला

नहीं कहीं कोई सही राह दिखाता

इस जमाने की बात करते हैं

सत्य त्याग प्रेम का था ये यग ु

निभाता, सिमटा जाता

खो गए हैं सिद्धांत सभी कहीं

रातों रात बात बदल गयी ऐसे

युग बीतने के साथ ही उस युग की मर्यादा,

चला सर्वस्व राज्य पाट त्याग कर

सभी कुछ तो अक्सर है बदल जाता

छोटे भाई भरत ने राज्य पाकर त्यागा

दस ू रों के लिए जीना,

माता-पिता की आज्ञा मानकर

बने साथी सिया, भाई लक्ष्मण ले चरण पादक ु ा श्री राम की

मनु िवेश बनाकर, महल के बाहर बनायी कुटिया श्री राम का राज जानकर की सारी व्यवस्था,

सिद्धांत, व्यक्तित्व, आचरण अपनी चिंता छोड़,

ही हमेशा आदर्श बन जाता

दीपक तले अंधेरा ही मंडराता

आज न किसी को कद्र प्यार की

१४ वर्ष यूं बिताए भरत ने

न विरह में कोई प्राण त्याग करता

उर्मिला और मांडवी जी ने भी, पति के साथ

कलुषता का बोलबाला छाया

साथ उनके भोगा बनवास

श्री राम जी लौटे जब अयोध्या वापस

कैसा है ये कलयुग आया

आज है फिर आवश्यकता यहां

पूरी नगरी जगमगाहट के साथ मुस्कायी,

उस श्री कृष्ण और राम जी की

फिर दे खो आया द्वापर यग ु स्वार्थ पर आधारित,

जिसने हर युग में आनन्द लहराया।।

अपनों का अधिकार छीनकर जीना

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वो था युग त्याग व प्रेम का महाभारत था छाया ऐसे

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छोड़ विषाद, अवसाद, कर्म योगी बन

अनुराग्यम ्

अविचल अविरल प्रेमधारा की

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प्रेम एक शाश्वत सत्य वाणी कर्ण, नेपाल

प्रेम तो स्वाभाविक है , अपने विशुद्ध रूप में रहता है । यह प्रेम किसी का किसी के लिए हो सकता है । प्रेम सीमित नही होता । प्रेम तो अथाह है । आत्मा से आत्मा और मन से मन के तार जहां जड़ ु े हो वही प्रेम है ।प्रेम न तो दै हिक है और न ही आसक्ति। ये हम है जो प्रेम को सीमित करके उसे नाम दे दे ते है । आप एक मक ू जानवर को रोज खाना खिलाये वो इतने घरों में आपके घर को ,आपकी दे हरी को और आपको पहचान जाता है , आपके समीप आ जाता है वो प्राणी जिसे आप प्रेम दे ते है ।प्रेम सर्व शक्तिमान है , प्रेम शाश्वत है , प्रेम सत्य है । कृष्ण राधा का प्रेम दै हिक नही था लेकिन सत्य स्वरूप था अपने विशुद्ध रूप में था। जहां छल कपट हो जहां कोई भी बरु ी भावना हो वहां प्रेम नही हो सकता। एक मानव का मानव के प्रति, एक मूक प्राणी के प्रति, प्रकृति के प्रति, अपने ईश के प्रति, ये प्रेम ही है जो सबको बांधे रहता है । प्रेम निश्छल है । प्रेम निष्कपट है । लोग कहते है प्रेम अंधा होता है । प्रेम रूप रं ग नही दे खता ।क्यों ? क्योंकि ये आत्मिक है । किसी की बनावट दे खकर किसी के संद ु र रूप को दे खकर आप आसक्त हो सकते है पर प्रेम नही हो सकता । प्रेम हृदय में www.anuragyam.wordpress.com

निवास करता है । एक मानव क्यो किसी मूक जानवर से प्रेम कर बैठता है ,ये प्रेमवश ही होता है । एक सत्य भावना, एक विशद्ध ु भावना, जब आप किसी के लिए अच्छा सोचते है उसके लिए आपके मन मे अच्छी भावनाये आती है , ये प्रेम ही तो है जो अपने सत्य स्वरूप में होता है । प्रेम से ही रिश्तों की उत्पत्ति होती है । रिश्तों के कारण प्रेम नही उपजता।प्रेम एक स्वाभाविक और सत्य भावना है । इसे न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही बदला जा सकता है । संत कबीर के शब्दों में प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाय राजा प्रजा जे ही रुचे सीस दे ही ले जाये अर्थात प्रेम को न तो खेती में उपजाया जा सकता है और न ही हटिये में या बाज़ार में खरीदा जा सकता है , ये हमे तभी मिलता है जब हम अपने शीश दे दे ते है ।इसका अर्थ बहुत गूढ़ है । शीश दे ने का अर्थ हुआ आप अपने क्रोध, मोह, काम, इच्छा इन सब भावनाओ का त्याग कर दे ते है तभी आपको विशुद्ध सत्य, शाश्वत प्रेम की प्राप्ति होती है चाहे वो राजा हो या प्रजा।

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

बीते 20 महीनों ने बहुत कुछ सिखाया है

गोवर्धन दास बिन्नाणी “राजा बाबू” बीकानेर, राजस्थान बीते 20 महीनों में हमने मानसिक तनाव बहुत झेला 5. सच में दे खा जाए तो दे श में हमारे आस-पास है । यह मानसिक कष्ट कई कारणों से रहा जिसमें स्वच्छता - सफाई , जिसका सरकार पीछे कई वर्षों प्रमख रहा चीन पाकिस्तान क े साथ य द्ध का भय व से अभियान चलाये हुए थी उसका सही अर्थों में ु ु कोरोना महामारी । परन्तु हम सभी यह भी जानते महत्व इस बीते 20 महीनों ने हमें सिखा दिया | हैं कि हमारी सरकार ने चीन व पाकिस्तान दोनों पर अपना दबदबा बनाये रखा और कोरोना महामारी पर 6. हम सभी बिना बाल कटाए, दाढ़ी बनवाये, रूपबहुत हद तक काबू भी पाने में सफल रही । लेकिन सज्जा [मेकअप ] के बिना यानि बिना नाई के इन सभी के बीच बीते 20 महीने हम सभी को बहुत पास [ सैलून ] गए भी रह सकते हैं इसकी पुष्टि कुछ सिखा के भी गया है और उस शिक्षा नें हमारी भी इन्ही 20 महीनों के दौरान दे खने को मिल सोच व कार्य पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया ही गयी | है । अब हम उस पर ही यहाँ संक्षेप में चर्चा करते हैं 7. वैसे तो हम सभी जानते ही हैं की सावधानी रखना कितनी जरूरी है लेकिन “सावधानी हटी और 1. कोरोना के चलते जो पूर्णबन्दी [लॉकडाउन] लगा, दर्घ ु टना घटी” का महत्व इन्ही बीते 20 महीनों में उसमे सीमित संसाधनों में भी कैसे जी सकते बखब ू ी समझ में आ गया | हैं,सिखा दिया । 8. इसी तरह एक दस ू रे की मदद करना भी हमें 2. पूर्णबन्दी [लॉकडाउन] के दरमियान हम घर की बचपन से सिखाया गया है लेकिन इसका महत्व चार दीवारी में रहने के लिए आवश्यक संयम का भी बहुत ही बढ़िया ढ़ं ग से हमें इन्ही बीते 20 महत्व सीख गये । महीनों में एक नए तरीके से सीखने को मिला है | 3. इन बीते 20 महीनों में हमने न केवल अपने माँबाप बल्कि बच्चों को भी परू ा परू ा समय दे पाये। इसके अलावा उन सब की आवश्यकताओं का सही आँकलन भी कर पाये । 4. इसी तरह इसी बीते 20 महीनों ने हमें स्वयं का काम स्वयं करना चाहिये ,के महत्व को बतला दिया |

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अनुराग्यम ्

9. अन्न की कीमत क्या होती है इसका अनुभव भी हर स्तर के लोगों को दे खने मिला है | 10. मानसिक संतल ु न की आवश्यकता क्यों और इसे कैसे बनाये रखना है इसको भी हमने अच्छी तरह से सीखा है | 11. इन्ही बीते 20 महीनों मे हमने यह भी सीखा है कि घर के काम में सभी हाथ बंटाते हैं तो कितनी आसानी से सारे गह ृ कार्य निपट जाते हैं यानि ये www.anuragyam.wordpress.com


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दिसंबर 2021 बीते 20 महीने सीखा गया |

घर के काम में हाथ बंटाना भी

पहन, पूरी दो गज की दरू ी से ही आदर-सत्कार वाली औपचारिकता निभायें ।

21. इन 20 माह में अभिवादन का तरीका भी हाथ मिलाने की जगह अब नमस्कार हो गया है । अतः दरू से ही आपस में नमस्ते कर औपचारिकता निभा रहे हैं ताकि सोशल डिस्टें सिंग की पालना हो जाय । यहाँ एक तथ्य और बता दँ ू की हमारी इस 13. इन्ही बीते 20 महीनों में अमीरी-गरीबी का भेद सनातन परम्परा को सारे विश्व ने भी अंगीकार जिस तरह से मिटा है यानि प्रकृति ने किसी से कर लिया है । भेदभाव नहीं किया,वह भी एक अलग तरह का अनुभव हुआ है | 22. इन्ही बीते 20 महीनों में कोरोना के चलते शिक्षा संस्थान बन्द करने पड़े | उस समस्या से निपटने 14. इन्ही बीते 20 महीनों ने यह भी अनुभव करा के लिये बीते महीनों वाले समय ने संचार संपर्क दिया कि सीमित लोगों के साथ कम खर्च में शादी [ऑनलाइन ] के माध्यम से पढाई की ब्यवस्था से सम्पन्न की जा सकती है | उस पर पार पाना सिखाया | 15. इन्ही बीते 20 महीनों ने अंतिम संस्कार की पद्धति ही बदल कर रख दी जिससे यह स्पष्ट हो गया 23. हम संचार सपन्न अंकीय प्रणाली [ डिजिटल ] युग में रह रहे हैं लेकिन उसका सदप कि कम लोगों की उपस्थिति में भी अंतिम संस्कार ु योग कर हम क्या क्या लाभ उठा सकते हैं, इस विषय को विस्तार हो सकता है | से समझाया गया और लोगों ने उसका लाभ भी खूब उठाया | 16. किसी भी बीमारी से पार पाने में मानसिकता का अलग महत्व है | यही बात यानि आनेवाली किसी भी तरह की विपदा को मजबूती से निपटाने की 24. समयाभाव के चलते या किसी भी कारण से जो लोग व्यायाम / योगाभ्यास नियमित नहीं करते थे, मानसिक तैयारी कैसी हो यही हमें इन्ही बीते 20 उन्हें इसका महत्व इन्ही बीते 20 महीनों में समझ महीनों में सीखने को मिला है | में आ गया और तब से अब तक वो कर ही रहे हैं | 17. हम सभी प्रायः नित्य ही अपने अपने पूजा स्थल जाते ही रहे हैं। लेकिन कोरोना काल में पूजा 25. प्रायः आम लोग आयुर्वेदिक दवा को अहमियत नहीं दे ते थे लेकिन कोरोना के कारण इन्ही बीते स्थल बन्द हो जाने से इन्ही बीते 20 महीनों वाले 20 महीनों में केवल आम लोग ही नहीं बल्कि समय ने उस सर्वशक्तिमान प्रभु का घर पर ही ऐलोपेथिक डॉक्टर भी आयुर्वेदिक काढ़ा सभी को दर्शन, अर्चना करना सिखा दिया | नियमित सेवन की सलाह भी दी और स्वयं भी लेना शुरू किया यानि हमारे वैदिक काल वाली दवा 18. जो लोग समय अभाव के कारण पूजा अर्चना कर कितनी कारगर है ,यह सभी ने माना | नहीं पाते थे उन्हें आध्यात्मिक चिंतन करना इन्ही बीते 20 महीनों में सीखने मिला | 26. बीते 20 महीनों ने हमें हर तरह की समस्या से संघर्ष करना भी सिखाया है |और इसी संघर्ष के 19. साधारण समय में हम एकदम अकेले रह ही नहीं चलते दे श में ही कोरोना की कारगर दवा विकसित सकते । कम से कम दो जनें साथ रहते ही आये कर पाने में हमारी दवा कंपनियाँ सफल हो पायीं । हैं। लेकिन इस बीते 20 महीनों में हम लोगों में से अनेक लोगों ने एक नया नया अनुभव किया जिसमें कोरोना संक्रमित सम्भावित व्यक्ति अपने कृपया ध्यान दे लें बीते 20 महीने जीवन का सही घर पर ही अपने आप को दस ू रे लोगों के संपर्क में मूल्य समझा कर विदा हो गया है | निष्कर्ष में यही आने से बचने के लिये किसी एक कमरे में सब बताना चाहता हूँ कि इन्ही बीते 20 महीनों ने हमारी सोच, व्यवहार , चिंतन को एक नयी अनूठी दिशा तरह से एकदम अलग रहना भी सीख गया । प्रदान की है | बीते साल ने हमे स्पष्टरूप से समझा 20. इन्ही बीते 20 महीनों के दौरान पहले पहले तो दिया है कि सही सोच, हिम्मत और धैर्य से हम सभी न कोई किसी के यहाँ जाता और न कोई अपेक्षा प्रकार की मुसीबतों से राहत पा सकते हैं और इसी रखता था। लेकिन जब सरकार ने कुछ ढील दी तब सोच अनुसार इसी साल 2021 में दे श में ही विकसित दोस्तों के साथ साथ रिश्तेदारों का कुशलक्षेम पूछने टीके के आ जाने पर यह सभी लाभर्थियों तक पहुँचाने जाना आना शुरू किया। लेकिन तब से लेकर अभी में हम सभी अपने अपने स्तर अनुसार सरकार के साथ तक सब समय यह ध्यान रखा जा रहा कि मास्क सहयोग कर अपनी सहभागिता निभा रहे हैं | 12. प्रकृति को सहे जना चाहिये यह तो सभी जानते हैं लेकिन उसके प्रभाव का प्रत्यक्ष अनुभव भी इन्ही बीते 20 महीनों में हुआ है |

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अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

चित्रकार -

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अनुराग्यम ्

नुपुर बासु उदयपुर, राजस्थान

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

नप ु रु बासु उदयपुर, राजस्थान www.anuragyam.wordpress.com

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

अविस्मरणीय साक्षात्कार

सभ ु ाष घई की फ़िल्म मिलना मेरे लिए बड़ा अचीवमें ट था.. - नरे श गोसाई

नरे श गोसाई बहुत परिश्रमी, समर्पित, अभिनय के प्रति निष्ठावान और प्रतिभावान अभिनेता हैं.उन्होंने स्टेज, टी वी. और फिल्मों में बतौर अभिनेता खासी पहचान बनाई हैं और तो और एडवरटाइजिंग फिल्मों में बहुत कम समय में ना केवल अपार लोकप्रियता हांसिल की है बल्कि एडवर्ल्ड से सम्बद्ध कलाकारों में अपना बढ़िया रे पो भी बनाया.दरू दर्शन पर प्रसारित धारावाहिक ‘फिर वही तलाश, ‘’दिल दरिया ‘और..’दस ू रा केवल ‘ से अपने कैरियर की शरुआत नरे श गोसाई ने छोटीछोटी किन्तु महत्वपूर्ण भूमिकाओं से की. बेहतरीन संवाद अदायगी और भावप्रवण अभिनय की वज़ह से वह बहुत जल्दी निर्देशक लेख टं डन के प्रिय हो गए.

सारे धारावाहिक और टे ली फ़िल्में भी दिल्ली में की...

मगर उनका मक़सद मायानगरी मंब ु ई के नामचीन फ़िल्म मेकर्स और बड़े कलाकारों के साथ उम्दा काम करना था. अपने इसी सपने को साकार काने के लिए नरे श मुंबई कूच कर गए. श्रीकृष्ण सरल ने सही कहा है -”अगर तम ु ठान लो तो तारे गगन के तोड़ सकते हो... ’’इसी राह पर नरे श गोसाई पहले दिल्ली और फिर मंब ु ई में फ़िल्म, सीरियल और एड्स यानी एंटरटे नमें ट इंडस्ट्री में बड़े जोरशोर से स्ट्रगल करने लगे. जब कोई शख्श धर जा या मर जा .. जैसी जिद्द कर बैठे तो ऊपर वाला भी उसे अपना ग्रीन सिग्नल दे ही दे ता है . कैरियर की पहली नरे श गोसाई को बचपन से ही सांस्कृतिक “मनोरमा “ उन्हें अपने दिल्ली प्रवास पर ही मिली. गतिविधियों में गहरी रूचि थी जब वह अपने पिता कुलदीप गोसाई जो भारत सरकार के कर्मचारी होते हुए दिल्ली में आपने स्टेज, टे लीविज़न सीरियल्स और भी राम लीला तथा स्टेज कार्यकर्मों में बढ़ चढ़ कर भाग एड्स में काम किया, मंब ु ई आते ही पहली फ़िल्म कांची लेते हुए दे खते थे तो बड़े ही थिरल हो जाया करते थे. आपको कैसे मिली? अपने बेटे की रूचि दे खकर नरे श गोसाई को दरू दर्शन पर प्रसारित होने वाले प्रातः कालीन धारावाहिक पोपट मैंने तो हर पल यह महसूस किया है कि आपका जासस , हमारे मै न े ज र, आदि में सं क् षिप्त रोल्स में वर्किं ग कार्ड ही आपके आगे बढ़ने में सहायक होता ू प्रोमोट करना शुरू कर दिया.अपनी कार्य कुशलता है मेरे साथ भी यही हुआ. दिल्ली में किए काम का और बढ़िया व्यवहारिकता के बल पर नरे श गोसाई ने रिस्पांस मझ ु े मंब ु ई पहुंचते ही मिला, हुआ यूँ निर्माता, दिल्ली स्तर पर धारावाहिक निर्माताओं, निर्देशकों का निर्देशक सुभाष घई उन दिनों अपनी अगली अपने दिल जीत लिया जिसके चलते उन्हें बतौर अभिनेता फ़िल्म कांची की प्लानिंग कर रहे थे उनके दिमाग़ नियमित काम मिलने लगा.यूँ तो नरे श गोसाई ने ढे र में एक हं समुख सा ज़िंदादिल पुलिस इंस्पेक्टर का

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अनुराग्यम ्

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दिसंबर 2021 किरदार घूम रहा था जिसे वो रूटीन एक्टर से कराना नहीं चाहते थे.. उन्हें कॉमेडी की प्रॉपर टाइमिंग वाला तरो ताज़गी लिए, कम एक्सपोज एक्टर चाहिए था उन्होंने अपनी यह मंशा अपने कास्टिं ग डायरे क्टर को बता दी. मयंक दीक्षित मेरा काम दे ख चुके थे बावजूद इसके कैरे टर ऑडिशन के बाद मझ ु े फाइनल ग्रीन सिंग्नल मिल गया. इतने बड़े फ़िल्म मेकर की फ़िल्म मिलना मेरे लिए मिलना बहुत बड़ा अचीवमें ट था.. कांची के बाद कौन-कौन सी फ़िल्में आपको मिली उनके बारे में विस्तार से बताएं? सुभाष घई साहब की कांची के बाद तो मेरी एक्टिं ग की गाड़ी चल पड़ी...उसके बाद धीरे - धीरे मेरी पहचान बॉलीवुड में होने लगी. जाने माने युवा पीढ़ी के निर्माता, निर्देशकों की नज़र में आ गया. जिसकी वजह से ‘व्हायट इज फिश’ निर्देशक गुरमीत सिंह, ‘तीन थे भाई ‘ निर्देशक मिर्ग दीप लाम्बा,’लकी ओये लकी’ ‘निर्देशक दिबॉनकर बनर्जी, ‘आँखों दे खी ‘ निर्देशक रजत कपरू और वेब सीरीज ‘ मिर्ज़ापरु ‘ और ‘इल लीगल ‘में मुझे नोटिस किए जाने वाले रोल्स मिले. आप एंटरटे नमें ट के सभी माध्यमों से जड़ ु े हैं किस तरह की फ़िल्में और रोल्स करने की ख्वाइश रखते हैं?

टी वी राइटर और फ़िल्म डायरे क्टर का माध्यम है इन मीडियम में एक्टर्स को उनकी कैपिसिटी और ऐज ग्प के अनस रु ु ार ही कास्ट बॉलीवुड में ऐसा कोई नामचीन निर्देशक जिसके साथ किया जाता है . अभी तो मेरे सही सफर की आप काम करने की इच्छा रही हो? शरु ु आत है जब मौका आएगा तब ज़रूर बताऊंगा.” हां यश चोपड़ा मेरे पसंदीदा निर्देशक थे. वक़्त, दाग,चांदनी, डर सिलसिला, दीवार, मेरी फेवरिट फ़िल्में रही हैं काश मैं उनके निर्देशन में काम कर पाता!” क्या आपकी रूचि अभिनय के अलावा प्रोडक्शन, डायरे क्शन में भी काम करने की भी है .? अभिनय मेरा पहला प्यार या यूँ कहिये मेरी खुराक है और इसी फन में एन्जॉय करना चाहता हूं. जबकि प्रोडक्शन और डायरे क्शन की विधाओं में थोड़ा सक्षम भी हूं.”. आपकी आनेवाली फ़िल्में ? यूँ तो मैं बहुत अच्छी अच्छी फ़िल्में कर रहा हूं मगर ‘लकी ओये लकी ‘को लेकर बहुत थिरल हूं. दिबाकर बनर्जी की इस फ़िल्म में मैं सनी लियोनी के पिता की बढ़िया भूमिका कर रहा हूं.”

- संजय एम. तराणेकर इंदौर, मध्यप्रदे श

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संस्मरण

योगदान

राजेंद्र कुमार सिंह, इंद्रानगर, वडाला वक्त का मिजाज हमेशा बदलते रहता है । परं तु जब से मैं उस अपंग वद्ध ृ व्यक्ति को दे ख रहा हूं उसमें लेश मात्र भी परिवर्तन नहीं दिखा। वह मेरे बस्ती में रहता है और मांग कर गज ु ारा करता या पेट भरता है ।एक सरकारी परु ाना धुराना बंगला जो बरसों से बेकार पड़ा था उसी को व्यवस्थित रूप दे कर रात को विश्राम करता है ।जर्जर बंगले को व्यवस्थित रूप में परवर्तित दे खकर गांव के कुछ लोगों के आंखों की किरकिरी बन गया।उसी में वे लोग अपने माल मवेशियों को बांधने लगे थे।उसका बसेरा छीन गया “मालिक यही तो एक सहारा था।”निरीह कपकपाते स्वर में बोला। “भागता है कि नहीं बे।मेरा माल-मवेशी कहां रहे गा तेरे सर पर।” वह करता क्या?उसके बाद बस्ती में किसीकिसी के घर के अगले हिस्से में रहकर गुजारा

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अनुराग्यम ्

करता पर जब गांव वालों को पता चला तो उसे दतु ्कारने लगे थे। ठं ड का मौसम।कड़ाके की कनकनीऔर खुलाआकाश। उसने बस्ती के एक-एक कर सबसे संपर्क कर परु ाने-धरु ाने ओढ़ना मांगा था ताकि वह ठं ढ से बच सके।लेकिन कहीं से उसेओढ़ना के नाम पर बीत भर कपड़ा नहीं मिला। अगले दिन बस्ती के मख ु ्य मार्ग के किनारे पर मत ृ पाया गया।ठं ड से उसका शरीरअकड़ गया था।चेहरे पर ढे रों सारी मक्खियां भिन-भिना रही थी... बस्ती के लोगों कीआंखों में आस ं ू थे।कफन के लिए क्षण भर में सैकड़ों रूपया जमा हो गए।और वहअपनी आंखों से दे खते हुए मानों मन-ही-मन यह कह रहा था--”यही योगदान एक दिन पहले किए होते मालिक...पहले किए होते तो.....”

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संस्मरण

मनोरम पर्यटन स्थल ही इसकी पहचान है , महाराष्ट्र ही मेरी प्रेरणा नांगरे , पंचकुला जान है .. वैसे तो भारत के सभी राज्यों की एक अलग संस्कृति और पहचान है परं तु महाराष्ट्र से मेरा अलग ही लगाव है । दरअसल यह मेरा होमटाउन है । हमारी ट्रेन रात 3:00 बजे की थी। यहां जाने की बेताबी और उत्साह ऐसा था कि एक भी पल काटना मेरे लिए मुश्किल था ।आखिरकार वह समय आ ही गया जब हम स्टेशन के लिए रवाना हो गए। हम सभी ने अपने रिजर्वेशन सीट पर आसन जमा लिया। अगले दिन सुबह तक हम दिल्ली पार कर चुके थे। ट्रेन में मैंने और मेरे भाई बहन ने मनोरं जन के बहुत से साधन निकाल लिए जैसे एक सीट से दस ू री सीट पर कूदना, अंतर आक्षी खेलना, आने जाने वाले यात्रियों को गौर से दे खना, आदि। यात्रा के दौरान मैंने पहाड़ों की चोटियां, हरी-भरी फसलें, नदियां और बहुत से खूबसूरत नजारों का लुफ्त उठाया। महाराष्ट्र में प्रवेश करते ही एक अंगूठे के आकार की पहाड़ी दिखाई दे ती है और ट्रेन जब गहरी खाई से गुजरती है तो बहुत ही दिलचस्प अनुभव होता है । जैसे ही हम पुणे स्टेशन पर पहुंचे तो वडा पाव और चाय की खुशबू ने मेरा मन मोह लिया। यू ही हं सी मजाक करते, खाते - पीते, एंजॉय करते हमारी 2 दिन की रे ल यात्रा समाप्त हुई। हम www.anuragyam.wordpress.com

सब मिरज जंक्शन पर पहुंच गए। स्टेशन से बस पकड़ कर हम अपने गांव नेल्करनजी आ गए। वहां पहुंचते ही अलग सा अपनेपन का एहसास होने लगा । चूल्हे कि खुशबू, नदी की कल कल की आवाज, सूरज की किरणें, लाल आसमान, मानो मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था। कहते हैं कि जीवन में सभी खुशियां परिवार के बिना अधूरी होती है , मुझे भी अपने परिवार से मिलकर बहुत अच्छा लगा। गांव में पहुंचने के पश्चात हम सब मिलकर खरसुंडी, अजंता एलोरा, ऐतिहासिक स्थल घूमने गए। ऐसे ही अपनी दादी - दादा, नानी, चाचा चाची, भाई, बहनों, आई - बाबा के साथ बहुत आनंद आया। हर बीतते दिन के साथ हम कुछ नया करने की कोशिश कर रहे थे। हर उगता दिन हमारे लिए एक रोचक अनुभव लेकर आ रहा था। अब हमारी छुट्टियां समाप्त होने वाली थी। नई ऊर्जा और उल्लास से काम करने की इच्छा और अपनों से दरू होने की कशमकश में हमने अपनी यात्रा समाप्त कर दी और हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए।

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कलायात्रा

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एक कद्दू और एक अँगरू डॉ. रं जना जायसवाल, मिर्जापुर, उत्तर प्रदे श

सिन्हा साहब का प्रमोशन हुआ था, घर में एक बड़ी पार्टी रखी गई थी। खाने-पीने का शानदार इंतजाम किया गया था। शाकाहारी से लेकर मांसाहारी तक... हर तरह के पकवान मेज पर लगे हुए थे।ऐसी पार्टियों में शराब पीना आम बात है ...शराब पानी की तरह बह रही थी।घड़ी ने एक बजा दिए थे पर पार्टी अभी भी चल रही थी।गाने की आवाज अभी भी शकंु तला के कमरे तक पहुँच रही थी। शकंु तला और ननकू दोनो ही जाग रहे थे,कारण पार्टी का शोर नहीं कुछ और ही था। शकंु तला सिन्हा साहब के यहाँ नौकरी करती थी झाड़ू-पोछे का काम... उसका पति यही चौकीदारी किया करता था। करोना की दस ू री लहर में उसकी जान चली गई। सिन्हा दम्पति भगवान की तरह उसके जीवन में आए थे, आखिर वह ऐसे समय में अपनी दस साल के बेटे को लेकर जाती भी तो कहाँ...जब तक पति जिंदा था तब वो उनके यहाँ चौकीदारी का काम करता था पर उसके जाने के बाद दाल-रोटी की भी समस्या हो गई थी। कोरोना के कारण सिन्हा जी की नौकरानी गाँव चली गई थी और ऐसी गई कि वापस लौट कर नहीं आई। सिन्हा साहब को कामवाली की जरूरत थी और शकंु तला को काम की, सिन्हा दम्पति थोड़ी दयालु प्रवत्ति के थे।उन्होंने तरस खाकर शकंु तला को ृ

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घर के काम करने के लिए रख लिया। आज महीने की पच्चीस तारीख थी, हाथ में मट् ु ठी भर पैसे आते थे।ननकू की तबीयत कुछ दिन से ठीक नहीं चल रही थी। बेटे के इलाज के लिए एडवांस में लिए पैसे भी खत्म हो गए थे।अभी महीना खत्म होने में पाँच दिन बाकी थे,मालकिन पैसे को लेकर बहुत कीच-कीच करती थी।आज तो घर में चूल्हा भी नहीं जल पाया था। शकंु तला और ननकू को भूख की वजह से नींद नहीं आ रही थी। तरह-तरह के पकवानों की खुशबू कमरें तक आ रही थी। “अम्मा! बहुत भूख लगी है बाहर दे खो न कितने पकवान बने हैं।” “तुझे डॉक्टर ने तला-भुना खाने से मना किया है न, तू तो उन पकवानों की सोच भी मत...मेरी तरफ दे ख मैं तुझे एक अच्छी सी कहानी सुनाती हूँ।” “कहानी…!” शकंु तला ने ननकू के सर को अपनी गोद में रख लिया और कहानी सन ु ानी शरू ु की। “एक बार एक आदमी होटल में गया और उसने होटल के मालिक से कहा.. आपके होटल का जो सबसे अच्छा www.anuragyam.wordpress.com


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दिसंबर 2021 पकवान हो उसे लेकर आओ।”

“सो गई थी क्या…”

“फिर…?”

क्या कहती शकंु तला अमीरों को भरे पेट नींद नहीं आती और गरीबों की कितनी रातें भूख की वजह से खाली चली जाती है ।

“थोड़ी दे र में होटल का कर्मचारी रोटी और सब्जी लेकर आया और उसने कहा कि हमारे होटल की सबसे स्वादिष्ट सब्जी है । कद्दू और अँगूर…” “ये कौन सी सब्जी होती है ?” “तू बोलता बहुत है … चुपचाप कहानी सुन।” “हम्म…”

“क्या हुआ भाभी सब ठीक है न…” “घर में पार्टी चल रही है , तम ु ्हारे साहब को तो जानते ही हो किसी का दर्द उनसे दे खा नहीं जाता।ये ले तेरे लिए कटोरा भरकर मुर्गा और तंदरू ी रोटी लाई हूँ।तेरे ननकू को मुर्गा बहुत पसंद है न तेरा मर्द बताता था।आज तो तेरी मौज हो गई।”

“उस आदमी ने कर्मचारी से कहा,इसमे तो अंगूर तो है मालकिन कटोरा हाथ मे थमा कर चली गई,शकंु तला ही नहीं… जानते हो उस कर्मचारी ने क्या जवाब दिया” के खश ु ी के मारे बोल नहीं फूट रहे थे।शकंु तला को मालकिन इस वक्त अन्नपर्णा का अवतार लग रही थी ू “क्या…?” “कौन है अम्मा इतनी रात को...” “है न साहब एक कद्दू एक अँगूर…” शकंु तला अपनी सोच के घेरे को तोड़कर वर्तमान में “अम्मा!तुम भी न…” आ गई, शकंु तला की बात सुनकर ननकू खिलखिला कर हँस “उठ रे ननकू! दे ख मलकिन तेरे लिए तेरी पसंद का पड़ा और पेट दबा कर जमीन पर लोटने लगा।अचानक खाना लेकर आई थी, एक कटोरा भर कर मर्गा लाई ु उसकी हँसी दर्द में तब्दील हो गई। है ।” “अम्मा! भूख के मारे पेट खींच रहा है ,ठीक से हँस भी “अरे वाह! आज तो मजा आ गया।” नहीं पा रहा हूँ पेट में मरोड़ उठ रही है । कुछ खाने को दो न…” ननकू खुशी से झूम उठा,तंदरू ी रोटी सूखकर कड़क हो गई थी।शकंु तला ने उसका भी इलाज निकाल लिया,वह शकंु तला की आँखें भर आई,अपने आँसुओं को आँचल गिलास में पानी भर कर ले आई। रोटी को इसी में में समेट शकंु तला ने ननकू से कहा, डूबो-डुबोकर मल ु ायम करके मर्गे ु के साथ खा लेगी।कम से कम पेट तो भर जाएगा। “ननकू!पुराने जमाने में साधु-संत कहते थे,कभी-कभी पेट को आराम दे ना भी बहुत जरूरी होता है । एक दिन “अम्मा! मैं जल्दी से प्लेट ले आता हूँ।” खाना न खाने से किसी को कुछ नहीं होता।मैं कल कोई न कोई इंतजाम जरुर कर लँ ग ू ी तू चुपचाप से सो ननकू दौड़कर प्लेट और चम्मच ले आया। शकंु तला जा...मैं तुझे दस ने बड़ी उम्मीद से कटोरा खोला।कटोरा रस्से से भरा ू री कहानी सुनाती हूँ।” हुआ था,शकंु तला ने चम्मच कटोरे में डाला तो मुर्गे का “जाने दो अम्मा… अब कोई कहानी मत सन ाओ। फिर एक पीस उसका मँह ु ु चिढ़ा रहा था।ननकू खिलखिला से दर्द होने लगेगा।” कर हँस पड़ा, ननकू का पेट भूख से पीठ में चिपक गया था,वो पेट “अम्मा!एक कद्दू और एक अँगूर…” दबाकर उकड़ू बैठ गया।शायद इससे दर्द कुछ कम हो जाये।तभी दरवाजे पर किसी ने हौले से थपथपाया, शकंु तला के चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आई शायद दरवाजे पर मालकिन खड़ी थी। यह लकीरें भख ू की वजह से नहीं थी…

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कलायात्रा

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संस्मरण

सतीश उपाध्याय मनेंद्रगढ़, छत्तीसगढ़

जनजातीय वर्ग के सम्मान के प्रतीक अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य महोत्सव, से छत्तीसगढ़ को मिली वैश्विक पहचान

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य- महोत्सव के मंच से, पारं परिक जनजातीय सभ्यता, संस्कृति परं पराओं को करीब से जानने और समझने का अवसर 3 दिवस में मुझे मिला ,सच कहूँ तो, इतनी आदिम जानकारी मुझे 30 वर्षों में जनजाति संस्कृति के इतिहास परं पराओं को खंगालने के बाद भी नहीं मिली । 7 दे शों, भारत के 27 राज्यों एवं 6 केंद्र शासित प्रदे शों के कलाकारों ने जब साइंस कॉलेज मैदान पर मार्च पास्ट किया तो ऐसा लगा जैसे पूरे विश्व की जनजातीय संस्कृति, छत्तीसगढ़ की धरती पर उतर आई हो।

करने के लिए बहुत बेहतर काम कर रही है । उन्होंने आशा व्यक्त किया कि- सदियों से उपेक्षित जनजातियों को इस आयोजन से एक नई पहचान मिल सकेगी।

पूरे भारतवर्ष में केवल छत्तीसगढ़ में ही जनजातीय संस्कृति के इस अंतरराष्ट्रीय समागम की विशेषता को दे खते हुए सांसद राहुल गांधी ने भी बधाई संदेश भेजकर छत्तीसगढ़ सरकार का हौसला बुलंद किया और छत्तीसगढ़ सरकार की आदिवासी संस्कृति, कला को पोषित करने की कोशिश की सराहना की। उन्होंने कहा - छत्तीसगढ़ सरकार -के इस पहल से आदिवासी कला संस्कृति को संवर्धन मिल रहा है । इस महोत्सव के शानदार आगाज से अभिभूत होकर मख ु ्यमंत्री ने सधे हुए एंकर की तरह महोत्सव के मुख्य अतिथि एवं झारखंड के मुख्यमंत्री हे मंत सोरे न से जब पूछा कि- हमारा छत्तीसगढ़ आपको कैसा लगा?

छत्तीसगढ़ की माटी को नई पहचान दी। ऐसे आयोजन से जनजाति समाज को एक नई दिशा, ताकत एवं प्रोत्साहन मिलता है । यह सच है कि आदिवासी नतृ ्य महोत्सव के माध्यम से सरकार ने आदिवासियों को सम्मान दे ने की एक स्वस्थ परं परा शुरू की है । इसके माध्यम से दे श विदे श की जनजातियो की संस्कृति को समझने का अवसर मिलता है ,एवं नई पहचान के साथ कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिलता है । इसमें दो मत नहीं कि राष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य महोत्सव के माध्यम से छत्तीसगढ़ अपनी पहचान को और पख ु ्ता करने में सफल हुआ है ।

अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य महोत्सव में विदे शी कलाकारों के आने से छत्तीसगढ़ वैश्विक स्तर पर चर्चित हुआ। विदे शी कलाकारों में नाइजीरिया, फिलीस्तीन, युगांडा, श्रीलंका, उज्बेकिस्तान, स्वाजीलैंड, माली के आदिवासी कलाकारों ने अपने अपने दे श के जनजाति संस्कृति, पर्व से संबंधित विधाओ और पंरपराओ को प्रस्तुत कर कार्यक्रम को और ऊंचाइयां प्रदान की।

आदिवासी बाहुल्य जिला कोरिया के विविध जन जातीय परं पराओं एवं संस्कृति के करीब मै पिछले 30 वर्षों से जड़ा ु हुआ हूँ ।कई विशेष जनजातियो तो उन्होंने कहा कि मुझे तो लग रहा है कि के प्रकृति से जुड़ी परं पराओं को एवं उनकी संस्कृति को मैं झारखंड में ही हूं ।छत्तीसगढ़ सरकार अपने प्रदे श समझने के लिए कोरिया के बोडेमुड़ा जैसे आदिवासी के आदिवासी समुदाय की आर्थिक पिछड़ापन को दरू गोड़ एवं विशेष बैगा जनजातियों की बस्तियों में भी मैने 6 माह गज ु ारा है ।

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कलायात्रा

पर एक ही मंच पर दे श विदे श की विविध लोक कला करते हुए कहा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री शोषित एवं संस्कृतियों से सहजता से परिचित होने का यह आदिवासियों को सम्मान दे ने एवं उन्हे बराबर का दर्जा दे कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ रहे हैं । मेरा पहला अवसर था । दे श के 27 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदे शों के रायपुर में 28 से 30 अक्टू बर तक संपन्न कलाकारों के साथ 7 दे शों में नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान ु ांडा ,सज ू ी लैंड मालदीप, वैलेंटाइन और अंतरराष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य महोत्सव महज एक ,श्रीलंका, यग मनोरं जन एवं रोमांच का ही दस्तक नहीं था, बल्कि सीरिया से आए विदे शी कलाकारो ने छत्तीसगढ़ राज्य इन जनजातियों का प्रकृति,जल, जंगल, जमीन के को खूब पसंद किया। आदिवासी कलाकारों ने मुक्त साथ आत्मीय रिश्ता एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा कंठ से छत्तीसगढ़ शासन की सराहना की। अपनी में इनके आदिम सोच को जनमानस तक पहुंचाने का कला के प्रदर्शन के दौरान कलाकारों में भारी उत्साह दे खा गया। एक सरस माध्यम था। या यह कहें कि-आदिवासियों के पारं परिक त्यौहार, अनुष्ठान फसल कटाई, कृषि आपसी रिश्तों एवं अन्य पारं परिक विधाओं को समझने के लिए यह एक साझा और जीवंत मंच था। उत्तर प्रदे श, बिहार के कलाकारों के साथ जब छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने अपने पारं परिक-”करमा नतृ ्य -”की प्रस्तुति दी तो लोगों को छत्तीसगढ़ वासियों को अपनी माटी की सांस्कृतिक महक का आभास हुआ। बिहार लोक नर्तक दल का -”मयूरपंख”, नतृ ्य, उत्तर प्रदे श के कलाकारों के करमा नतृ ्य में वक् ृ षों की पज ा, प रु षों एवं स्त्रियों द्वारा ढोल और तालियों की ू ु सुंदरता, वक्ष ृ की परिक्रमा, वन संपदा और प्रकृति से जुड़े मनोभाव को धरती माता एवं प्रकृति के पंच तत्वों की महत्ता, एवं अपने आराध्य की पूजा, उनके पारं परिक परिधान, जन मानस को प्रकृति का संरक्षण संदेश दे ते नजर आए।

राजस्थान के कलाकारों से मैं व्यक्तिगत रूप से मिला। छत्तीसगढ़ आकर वे बेहद खश ु एवं उत्साहित नजर आये। राजस्थान के एक कलाकार ने कहा -जीवन में पहली बार इतना सम्मान, मुझको मिला यह मेरे जीवन के सबसे अद्त भु पल है । आदिवासी समाज से आने वाले झारखंड सीएम हे मंत सोरे न ने भी कहा कि-” मैं स्वयं आदिवासी समाज से आता हूं और वास्तव में आदिवासियों के सामने चुनौती काफी गहरी होती है आज मुझे मुख्य अतिथि के रूप में मुझे आने का मौका मिला है और यदि मैं मख ु ्य अतिथि नहीं भी होता तो छत्तीसगढ़ की जनजाति समाज के बीच छत्तीसगढ़ जरूर आता।

”उन्होंने कहा कि - इस कार्यक्रम से आदिवासी जनजातियों को एक विशेष प्रोत्साहन मिला है ” बात का समर्थन करते हुए मैं भी एक कहना चाहता हूं कि आदिवासियों के उत्थान में सचमुच यह सरकार प्रतिबद्ध है , गोधन न्याय योजना या नरवा गरवा, घरु वा, बाड़ी वहीँ अंतरराष्ट्रीय कलाकारों द्वारा आकर्षक भूमिहीनो के लिए न्याय योजना, हाट बाजार क्लीनिक, बहुरंगी छटा दे खने को मिली,। उज़्बेकिस्तान न्यूजीलैंड आदिवासी समाज के क्रांतिवीर झाड़ा सिरहा के नाम ,श्रीलंका और युगांडा सहित दे श के विभिन्न राज्यों के पर इंजीनियरिंग महाविद्यालय धरमपुरा की घोषणा नतृ ्य की अनुशासित एवं सजी हुई मनोरं जक प्रस्तुति आदि निर्णय से जनजाति वर्ग से निकट का रिश्ता जब नजर के सामने आई तो मैंने सोचा भी नहीं था रखने वाले राज्य के मुखिया का चेहरा सामने आता है । कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपरु में कभी विश्व के आदिवासियों के उत्थान के लिए, उनके आर्थिक इन दे शो के ऐसे आदिवासी नतृ ्य दे खने का अवसर मजब त ी प्रदान करने के लिए एवं जमीन से जड़ी ू ु मिलेगा। तमाम संचालित सरकारी योजनाओं से छत्तीसगढ़ के इस डांस फेस्टिवल में मनोरं जन यही कारण आदिवासियों को विशेष संबल मिला है , वहीं इनके मान था। इस आदिवासी नतृ ्य महोत्सव में शुभारं भ के सम्मान को एक नई पहचान भी मिली है । अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री हे मंत सोरे न बतौर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की यह दरू दर्शी सोच का मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए एवं दे श-विदे श के विभिन्न आदिवासी कलाकारों के रं गारं ग कार्यक्रम को ही परिणाम था कोरोना काल में जब पूरे दे श में मंदी दे खकर भाव विभोर हो उठे ।उन्होंने अपने संबोधन में छाई हुई थी तब छत्तीसगढ़ के बाजार गुलजार था। दो कहा - छत्तीसगढ़ पूरे दे श में ऐसा राज्य है जहां पर रुपए गोबर खरीदने वाला छत्तीसगढ़ राज्य दे श का पहला राज्य है । आदिवासी संस्कृति से जुडे इन राज्यों ऐसा अद्त भु आयोजन हो रहा है जो अकल्पनीय है । से आए कलाकारों ने मुक्त कंठ से यह कहा कि हम सीएम सोरे न ने भूपेश बघेल को धन्यवाद ज्ञापित www.anuragyam.wordpress.com

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कलायात्रा छत्तीसगढ़ आकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इस महोत्सव में विविध रं ग दे खने को मिले। उत्तराखंड के, थारू समुदाय का - झीझीहन्ना लोक नतृ ्य, छत्तीसगढ़ का करमा लोक नतृ ्य में पर्यावरण संरक्षण का संदेश छुपा हुआ है । तेलगांना का गुसाड़ी नतृ ्य, झारखंड का उराव, राजस्थान का गैर घम ु रानतृ ्य, जम्मू कश्मीर का धमाली, छत्तीसगढ़ का गौर सिंग नतृ ्य, प्रकृति एवं उसके महत्व को प्रतिपादित करने प्रकृति के संरक्षण में विशेष भूमिका निभाती है । इस वैश्विक स्तर पर आयोजित इस महोत्सव में विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने छत्तीसगढ़ को समझने के लिए विभिन्न स्टालों का भी बारीकी से अवलोकन किया। जनसंपर्क विभाग द्वारा फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से दे श विदे श के कलाकारों ने छत्तीसगढ़ राज्य के पर्यटन, पारं परिक वेशभूषा, गहने वाद्य यंत्रो से परिचित हुए ,कई कलाकार तो इस बात के लिए छत्तीसगढ़ की धरती को पावन धरती की संज्ञा दी जब उन्हें बताया गया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम 14 वर्ष के अपने वनवास का अधिकांश समय छत्तीसगढ़ में ही गज ु ारा है । वे इस बात पर नतमस्तक हुए जब उन्होंने सुना कि राम वन गमन पथ परियोजना के माध्यम से राम वन गमन पथ को आने वाले समय में दर्शनीय तीर्थ की संज्ञा दी जा रही है । इस सफल आयोजन के लिए पुलिस प्रशासन भी मुस्तैद रहा। कलाकारों के ठहरने और खाने की इतनी शानदार व्यवस्था थी, जिससे वे काफी गदगद नजर आए। प्रदे श के दस ू रे अंतररष्ट्रीय आदिवासी नतृ ्य महोत्सव में 1000 कलाकारों की उपस्थिति थी जिसमें 27 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदे शों के 59 आदिवासी नर्तक दल शामिल हुए। जिसमे 63 विदे शी कलाकार थे। इस महोत्सव में हथकरघा वस्त्रों, हस्तशिल्प के स्टाल ,फूड एरिया के स्टाल भी लगे हुए थे। इन स्टॉलो का निरीक्षण करते हुए दो आदिवासी बहुल राज्यो छत्तीसगढ़ एवं झारखंड के मख ु ्यमंत्रियो ने पांरपरिक वाद्य यंत्र - ”ठोड़का” और “तुरही” भी बजाया तो, पूर्व राज्यसभा सदस्य बीके हरिप्रसाद एवं युगांडा और पेलिस्टाईन के काउं सलर ने गौर मुकुट लगाकर, मांदर की थाप दे कर महोत्सव के आदिवासी नतृ ्य महोत्सव के कलाकारो का उत्साह वर्धन भी किया। आदिवासी संस्कृति के अनुरूप आदिवासी कलाकारों के पारं परिक पोशाक, आभूषण, मोर पंख से बने मुकुट ढोल ,मजीरा ,जवारा कलश, चंग ,मद ृ ं ग को न केवल बारीकी से दे खा बल्कि उसकी खूबियां भी बताई।

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दिसंबर 2021 छत्तीसगढ़ के हजारों लोगों ने अलग-अलग राज्यों एवं दे शों से आए हुए आदिवासी संस्कृति के फसल कटाई, विवाह, पर्व, त्यौहार के मौके पर किए जाने वाले नतृ ्यो को खूब पसंद किया। रामायण, महाभारत जैसे प्रसंगों पर आधारित कथाओं पर कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नतृ ्य से दर्शकों को पौराणिक संदर्भों की नई जानकारी मिली। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के आदिवासियों के दल ने मादर की थाप के साथ जब हाथों में अपने पारं परिक वाद्य यंत्र के साथ, हाथों में डंडा, मोर पंख, तीर कमान, भाला, बरछी लेकर जब अपने सधे हुए कदमो से मंच पर नतृ ्य किया तो दर्शक झूम उठे । दर्शकों को तेलंगाना के गस ु ाड़ी डीम्सा नतृ ्य, झारखंड का उरांव नतृ ्य राजस्थान का गैर घुमरानतृ ्य जम्मू कश्मीर का धमाली, छत्तीसगढ़ का गौर सिंग नतृ ्य, पर हाथो से ताली की थाप दे ते दे खा गया। इसी प्रकार निकोबारी नतृ ्य, अंडमान और निकोबार, राजस्थान का स्वांग, गुजरात कावासवा,झारखंड का - छाऊ, पंश्चिम बंगाल का - संथाली, मणिपुर का-खरिंग खरग फेचक,लद्दाख का - घा हानू, नागालैण्ड कामाकहनिची, राजस्थान कागारसिया, छत्तीसगढ़काहारूल, करमा, झैंता, उतराखंड का हरिण नतृ ्य को भी दर्शकों ने खब ू बहुत पसंद किया। आदिवासी नतृ ्य महोत्सव में कलाकारों ने दे श प्रेम के प्रसंगों को भी अपने नतृ ्य में पिरोया। उन्होंने अपने वीर सैनिक, योद्धाओं के शौर्य को अपने नतृ ्य में बखूबी प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का आदिवासी समाज की भाषा संस्कृति लोक कला परं परा की अमूल्य विरासत को पहचान दे ने एवं जनजातीय समुदाय की लोक कला और संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से आयोजित दे श-विदे श में चर्चित अंतरराष्ट्रीय जनजातीय नतृ ्य महोत्सव छत्तीसगढ़ के इतिहास का दस ू रा सुनहरा पन्ना कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सख ु द बात तो यह रही अपने आथित्य से भाव विभोर छत्तीसगढ़ से अपनी सुनहरी यादों के साथ दे श दनु िया के आदिवासी विदा हुए, वो कलाकार छत्तीसगढ़ के इस जनजातीय समागम को शायद इतनी जल्दी भल ु ा न पाए।।

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

कविता - शब्दों से आच्छादित कर लो

मीनाक्षी भसीन द्वारका, दिल्ली शब्दों से आच्छादित कर लो,

कविता - कहाँ अब दिन सुहाने हैं

विजय कनौजिया

अम्बेडकर नगर, उ0 प्र0 नही है फ़िक्र अब वैसी

आंखे सब कुछ कह दे ती हैं शुष्क संबंध हों, सख ू े मन से, आंखें नम नम रह लेती हैं

नहीं वादे पुराने हैं निभाते थे जिसे पहले कहाँ रिश्ते पुराने हैं..।।

रिश्तों में है स्नेह जरुरी

लुभाते थे कभी जो गीत हम भी गुनगुनाते थे नहीं भाते हैं अब मन को कहाँ ऐसे तराने हैं..।।

झठ ू बहुत दिन छिपा कहां है हृदय प्रेम भी बिका कहां है

अनुबंधों से यह टिका कहां है घर का आंगन सह न पाए, दीवारें सब सह लेती हैं

सुख सुविधाएं संचित कर लो

फर्श, छतों को सुसज्जित कर लो नया फर्नीचर ले आओ तम ु चदर पर्दे रोज बदल लो

संवाद नहीं जब तक अपनों से,

राज खिड़कियां सब कह दे ती है पत्थर भी जीवित हो उठते प्रेम स्पर्श के आलंगिन से कड़वे बोल शहद हो जाते,

मन चिंतन की कस्तूरी से

बंधन दिलों से बांधकर दे खो

आजाद करें फिर गुण-दोषों से रोटी में महक प्रासाद की, पानी में गंगा बह लेती है --- x --www.anuragyam.wordpress.com

झलक धूमिल सी लगती है झुकी नज़रों में अक्सर अब है बदला प्रेम का मौसम कहाँ अब दिन सुहाने हैं..।। चुराते थे कभी जो दिल चुराते हैं नज़र अब वे जो मरते थे कभी हम पर कहाँ ऐसे दीवाने हैं..।। जुगत मिलने की करते थे कोशिशें रं ग लाती थीं नहीं होता है मिलना अब कहाँ ऐसे बहाने हैं..।। कहाँ ऐसे बहाने हैं.. -- x --अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा

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संस्मरण

फि़क्र माँ की..

मीनू बाला, जालंधर ,पंजाब

“बेटी! स्कू ल जाने से पहले खाना जरुर खा कर जाना,रोज खाना बीच में छोड़ कर चली जाती हो, सारा दिन कैसे निकालोगी ? वहां कैं टीन में भी खाने को कुछ ढं ग का नहीं मिलता,अपनी सेहत का ख्याल रखा करो, यह सेहत ही तुम्हारे आगे काम आएगी।” यह थी, हर रोज की तरह मां की हिदायत जो वह अक्सर मुझे स्कू ल जाने से पहले दिया करती थी और मैं उसे अनसुना कर सहे लियों के साथ स्कू ल की तरफ भाग निकलती, स्कू ल जाकर जब भूख के मारे जान निकलती तो बैग में कुछ खाने को टटोलती तो एकाएक टिफिन हाथ लगता जो माँ हर बार की तरह चोरी से बैग में डाल दिया करती थी। आज मां को इस दनु िया से गए पूरे 8 साल हो गए हैं। सुबह से ही मन बहुत उदास है मां की बातें ... याद करते करते सारा दिन कैसे गुज़रा पता ही नहीं चला, कुछ बनाने को मन नहीं किया, ना ही कुछ खाने को.. ।मां की तस्वीर दे खते हुए मैंने उनसे कहा, “मां.. अब तुम बिन.. कोई नहीं पूछता - बेटी! खाना

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खाया कि नहीं...?” तुम मुझे छोड़कर इतनी जल्दी क्यों चली गई? अब भूख लगने पर कौन.. मुझे खाना खिलाएगा? कौन मेरी फिक्र करे गा? मन फफ़क फफ़क कर रोने लगा। आंसुओं की झड़ी ऐसी बही कि मां की तस्वीर आंखों से धुंधला कर ओझल... होती दिखाई दी। ‘टिंग - टोंग टिंग - टोंग ‘अचानक डोर बेल की आवाज़ से मेरी यादों का टांका टूटा। जैसे - तैसे अपने आप को संभालते हुए मैंने दरवाजा खोला तो दे खा.. सामने पड़ोस वाली आंटी हाथ में प्लेट लिए खड़ी थी, मुस्कु राते हुए बोली, ”बेटी!आज मैंने सांभर - डोसा बनाया है , खाकर बताओ तो कैसा बना है ? मेरी बेटी कुछ दिन के लिए जाॅब टूर पर गई है आज उसका जन्मदिन है मुझे उसकी बहुत याद आ रही थी.. सोचा क्यों ना तुमसे उसकी फेवरे ट डिश शेयर करूं ?” मेरा ध्यान एकाएक मां की तस्वीर पर गया जो मुस्कु रा कर मुझसे कुछ.. कह रही थी और मैं समझ गई।

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

शीतकालीन दोहे

इन्दु अमरोहा, उत्तर प्रदे श जाड़े की दस्तक हुई, ठं डी लगती रात। होत प्रभात धूप खिले, खिल खिल जाते पात।। पर कोहरा भी आ रहा, हरने सूर्य प्रकाश। पाती पाती कांपती, कैसे होय विकास।।

ग़ज़ल

शायर मरु ादाबादी बाड़ा शाह सफा, मुरादाबाद फूलों की महक हो या

तारों की चमक अब भी है मेरी निगाहों में

उनकी ये झलक अब भी गो उसने ताल्लुक

तो मुददत से नहीं कोई लेकिन मैरे सीने में

बाकी है कसक अब भी

चुस्कियां संग चाय के, और पकौड़ी साथ। नरम मुलायम धूप हो, फिर बन जाए बात।।

सब बदले अपने हालात नहीं बदले

महिलाओं को भा रही, रं ग बिरं गी ऊन। स्वेटर बुनते बीतती, शाम सुबह दो जून।।

सब बर्क का गहवारा

पहले भी मुखालिफ

था दश्म ु न है फलक अब भी कल तक जिसे कहते थे उस शाखे नशेमन में

बाकी है लचक अब भी

शायर पे था जो अपना

राहें ओझल, मंजिले, हैं बन कर गुमनाम। कोहरे में रातें थकीं, नूर चाँद नाकाम।।

बाकी उन्हें शक अब भी

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वो सब ही लट ू ा बैठा

है उसकी मोहब्बत पर

अनरु ाग्यम ्

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कलायात्रा यात्रा वत ृ ांत

दिसंबर 2021

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तिरुवनंतपरु म (केरल)

डॉ गल ु ाब चन्द पटे ल गुजरात भारत सरकार के मानव संशाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली की ओर से जनवरी २०१४ में केरल में तिरुवनंतपुरम में हिंदी नव लेखक साहित्य शिबिर में जाना हुआ | मैं रे ल मार्ग से जा रहा था| रस्ते में जो जो रे लवे स्टेशन आये वह एकदम साफ़ -सुथरे दिखे |

स्टोर से एक सफेद धोती खरीद ली | शिविर के आठों दिन सुबह में आश्रम में सभी के साथ प्रार्थना करने जाने लगा | रात में आश्रम रं गबेरंगी लाईट के प्रकाश में बहुत सुंदर दिखाई दे ता था | मंदिर सफेद पत्थरों से बना हुआ था | इसका लोटस जैसा था, यानि कि ‘कमल’ आकार था | आश्रम में सुबह में जा कर में भी इस प्रकार प्रार्थना करता था |

२१ जनवरी को में कोचुवली रे लवे स्टेशन पर रात में तीन बजे पहुंचा | सरकार ने उनके समय में ओम श्री करुनाकरण गरु ु ए नम: पर ब्रह्मे नम: मुसाफिरों के लिए दो वॉल्वो बस तिरुवंतपुरम जाने के ओम श्री करुनाकरण गुरु सत्यप्रधाये नम: लिए रखी है | में करीब ४-०० बजे तिरुवनंतपुरम बस ओम श्री करुनाकरण गुरु अतीवा सत्यप्रकाशे नम: अड्डा पहुंचा | मार्ग सुनसान थे | करीब ५ बजे चहल ओम श्री करुनाकरण गुरु अतीवा सत्यप्रकाशाए नम: पहल शरु ु हुई इसके पहे ले में अकेला बस अड्डा पर बैठा था | कंट्रोलर भी कहीं चला गया | ५-३० सुबह में आश्रम में ५० के करीब समर्पित बहनें थी बस शांतिगिरी आश्रम के लिए प्राप्त हुई | शिविर का | मंदिर में प्रसाद में श्रीफल नहीं धराया जाता | ये स्थल शान्तिगिरी आश्रम था | आश्रम का अर्थ है , यहाँ आ और प्रभु के लिए श्रम कर | न से पांच जनवरी २००५ में हे ल्थ, शांति (पीस) एंड करीब ६ बजे शान्तिगिरी आश्रम पहुंचा | वहां स्पिरिच्युलिटी के लिए इंटरनेशनल कोंन्फरन्स ‘ममान सफेद वस्त्रों में पुरुष और स्त्रियाँ दे खने को मिली | मापिला होल’ कोटयाम केरल में शांतिगिरी आश्रम के आश्रम के बाहर में बैठा | कुछ अजीब सा लग रहा था सहयोग से आयोजित किया गया था | | मैंने दिए गये मोबाईल नम्बर पर वहां के आयोजक से बात की तब उन्होंने मुझे एक कमरे में ठहराया | शांतिगिरी आश्रम में नवज्योत श्री करुणाकरण मैं भी स्नान करके आश्रम की ओर चला | गुरु की पर्णशाला का समर्पण १२ सितम्बर २०१० में किया गया | इस समय घर घर में पर्णशाला समर्पण आश्रम पहुँचते ही मेरी थकान दरू हो गई | मन अवसर के लिए निमंत्रण एवं सन्देश भेजा गया था | में शांति प्राप्त हुई | मैंने भी सभी के साथ करुनाकरण जब १९६८ में शान्तिगिरी आश्रम की स्थापना हुई तब गुरु की प्रार्थना की | दस ू रे दिन मैंने भी आश्रम के नारियल के पत्तों से बनी हुए मामूली पर्णकुटी में ही

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अनुराग्यम ्

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दिसंबर 2021

कलायात्रा

गुरु निवास करते थे | उसी पर्ण’शाला का विकास हुआ | आश्रम में पर्णशाला कुटीर का मॉडल रखा गया है |

आश्रम के सामने मॉल है | मॉल में सभी प्रकार की चीजें मिलती है | आगे के भाग में एक केंटिन है | ये लोटस बनाने १० साल लगे थे | पूर्व राष्ट्रपति आज संगेमरमर में निर्मित सफेद कमल के प्रतिभा पाटिल ने १३ अगस्त २०१० में इस पर्णशाला आकार में पवित्र सौध के रूप में हुआ है | यहाँ गुरु को इनोग्रेशन किया था | यहाँ स्पिरिच्युअल जोन, नित्य दर्शन दाता के रूप में निवास करते थे | किसी एग्रीकल्चर जोन, इन्डस्ट्रीअल जोन, हर्बल गार्डन और कारण धर्मनिति में कोई गलती के कारण संसार की शोपिंग मोल है | दर्दु शा से लोगों को मुक्त करने के लिए गुरु ने अपनी ७२ साल की त्यागपूर्ण जीवन के प्रतिक के रूप में यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नइ दिल्ही में भी ये पर्णशाला निर्मित है | १२ सितम्बर २०१२ को सारे ऐस लोटस टे म्पल आया हुआ है | गज ु रात में एस.जी. संसार की आराधना के लिए समर्पित किया गया | हाई वे पर भी ऐसा लोटस टे म्पल दिखाई दे ता है | भारतीय जनता पार्टी का प्रतिक भी लोटस है | लोटस यह चैतन्य धाम से अमत ृ वाणी से जीवन का फुल बहुत पवित्र माना जाता है | उसकी मुलायम यात्रा में शाश्वत आश्रय एवं सांत्वन दे ता है | गरु पत्तियां अपने जीवन में मधरु ता के साथ जीवन सरल ु के बचन मुताबिक नित्य स्मरण और गुरु वाणी से और मुलायम बनाता है | कमल के फुल में भौंरा पराग सर्व प्रकार की बीमारियाँ से मुक्ति मिलेगी | जीवन का रस भर दे ता है | ‘कमल’ काद्व में खिलता है | वो शांतपूर्ण एवं मंगलमय होगा | यह ‘लोटस’ धर्म निरपेक्ष, काद्व से उपर रहता है | मनुष्य को अपनी बुराइयाँ आध्यात्मिकता एवं विश्व शांति का प्रतीक है | असंख्य निचे दबाकर उपर उठने का सन्देश दे ता है | ‘कमल’के शिष्यों के आत्म समर्पण के फल स्वरूप यह संगेमरमर फुल अलग अलग रं गों में पिंक, सफेद, पिला, हरा पर्णशाला आज सुशोभित है | और अन्य राज्यों के और नीला कमल पाया जाता है | कमल के फुल को लोग भी आकर पर्णशाला का एवं गुरु का दर्शन करके भगवान को अर्पित करने से जीवन ‘कमल’के तरह धन्यता प्राप्त करते हैं | लोटस ‘कमलम’ रात्रि में खिलता है | दे खने से बड़ा अच्छा लगता है | उसमे लवन्डर, ग्रीन और रे ड, स्काय ब्लु जैसे कलर वाला लोटस दे खने को शांतिगिरी आश्रम में आने से शांति मिलती मिलता है | आश्रम में गुरु करुणाकरण की १ फोटो भी है | शांतिगिरी हजारों मनुष्यों में उन्नति लाया है लगी है | | पोंडीचेरी में रवीन्द्रनाथ टे गोर का शान्तिनिकेतन आश्रम भी लोगों को शांति पहुंचाता है | शांतिगिरी ऐसा लगता है सफेद साड़ी पहने आई हुई केरल की शान है | एक मुलाकात लेने से बार बार आने स्त्रियाँ स्वर्ग में से जैसे परियाँ उतर आई हो | छोटी का मन करे ऐसी सुंदर, सत्यप्रकाश दे ने वाली जगह है छोटी बालिकाओं सब ु ह में ६ बजे प्रार्थना के समय दे ख | यहाँ कोई भगवान की मर्ति ू नहीं है | गरु ु ही भगवान कर बड़ी प्रसन्नता महसूस करते थे | यहाँ मेडिकल है | यहाँ होल में शादियाँ भी होती है | शान्ति का एक होस्पिटल एवं मेडिकल कालेज है | सिद्धकेंद्र है | करीब सुदंर सन्देश शांतिगिरी आश्रम पहुंचाता है | चालीस हजार परिवार यानि कि दो लाख लोग इस आश्रम से जड़ ु े है | यहाँ आश्रम की २०० एकर जमीन तिरुवनंतपरु म में अन्य एक नारायण स्वामी में खेती होती है | इसी धान से भोजनशाला में लोगों का आश्रम भी है | शहर में पद्मनाभ का मंदिर है | को प्रसाद खिलाया जाता है | यहाँ स्कु ल भी है | नास्ता जहाँ से विपुल मात्रा में धन सरकार को प्राप्त हुआ है चाय पानी के लिए केंटिन भी है | तिरुवनंतपुरम से | उस मंदिर में भी दर्शन के लिए जाना हो तो फक्त केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस की यहाँ सवु िधा होती है सफेद धोती पहन कर ही जा सकते है | यहाँ समंदर | आश्रम की अंदर और बाहर में सुंदर बाग़ प्रसन्नता भी है | विदे शी लोग भी यहाँ पर्यटक के रूप में दिखाई दे ता है | दे ते है | तिरुवनंतपुरम के साथ पूरा केरल एक हरा भरा राज्य है | यहाँ काजू की खेती अच्छी होती है | मंदिर में गरु वाणी एवं ज्ञानवाणी की किताबें , केरल के लोग गोड अयप्पा को खब ु ू मानते है | केरल हिंदी, मलयालम एवं इंग्लिश में बुक स्टोल से प्राप्त से कन्याकुमारी करीब है | वह भी एक सुंदर जगह है होती है | गुरु का शिष्यों को योग करने का आदे श के | दरिया में स्वामी विवेकानंदजी का स्टेच्यु है | वहां मुताबिक योग करने की व्यवस्था रखी गई है | यहाँ बोट से जाना होता है | यह यात्रा एक अविस्मरणीय पित ृ दोष का निवारण किया जाता है | यहाँ भोजन है | शाला भी है |

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

संस्मरण

मेरा होमटाउन मेरा दिल विशाखापट्टनम.. सोनिया, चंडीगढ़

आज हम सब परिवार अपनी सुंदर नगरी - शिकार का केन्द्र भी है । विशाखापट्टनम एक छोटी विशाखापट्टनम के लिए रवाना हो लिए हैं बहुत दिनों खाडी ़ पर स्थित हैं। विशाखापट्टनम को (विइजाग) के से इंतजार था कि कब छुट्टियां हो और हम अपने नाम से भी जाना जाता है ।विशाखापट्टनम भारत का होम टाउन विशाखापट्टनम जाएं। आज वह दिन आ ही चौथा सबसे बड़ा बंदरगाह है । गया। लंबी यात्रा के बाद हम अपने होम टाउन पहुंच गए हैं। चलो आज आपको मैं इसके बारे में थोडी ़ जैसे कि हम सब जानते हैं हमारा भारत बहुत जानकारी बताऊं । से खूबसूरत ऐतिहासिक स्थानों और संस्कृतियों से भरा है ऐसे ही एक अलग प्रकार की खूबसूरती और यह एक सुंदर तथा बहुत विशाल शहर है । संस्कृति आपको विशाखापट्टनम में दे खने को मिलेगी आंध्र प्रदे श उत्तर तट पर गोदावरी नदी के समीप जैसे डोलपील नोश, कम्बलाकंु डा वितंडर सन्चरी, स्थित है । यह भारत का चौथा सबसे बड़ा पोताश्रय रसीकंु डा बीच, इंदिरा गांधी चिड़िया घर, शिमाचलम है । विशाखापट्टनम यहां का मुख्यालय तथा भारतीय मंदिर, अरकु वैतली, रामकृष्णा बीच, बोरा गुफा, कैलश नौसेना के पूर्वो कमांड का केंन्द्र है यह जलयान बनाने गिरी, समबीरीयन म्यूजियम आदि। का कारखाना है यह एक प्राकृतिक तथा सुरक्षित समुंद्री बंदरगगाह है । आप जब कभी विशाखापट्टनम घूमने आये तो इन दस स्थानों पर जाना ना भूले। आप यहां आकर कृषि एवं खनिज सम्पत्ति से समद्ध ृ आंध्र अपने आप को अत्यधिक उत्साहित महसूस करें गे। प्रदे श, मध्यप्रदे श एवं उड़ीसा राज्य इस बंदरगाह के पषृ ्ठ प्रदे श कहलाते हैं। यह एक उल्लेखनीय मत्स्य

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कलायात्रा

दिसंबर 2021

कविता- अपना ग़म किसी से मत..

कृष्णा दे वी पाण्डे नेपाल गंज, नेपाल

गीत

भावना रानी प्रीत विहार, मेरठ

अपने ग़म को भल ु ाने के लिए,

दिन निकल कर शाम तक तो आ गया है

कुछ दिन तन्हा हो लेना,

हाय मन क्यों रात से घबरा रहा है

कितना भी कोई पछ ु े , किसी से कुछ मत कहना कुछ तो दया सहानभ ु ति ू दें गे कुछ तो

पीठ पीछे हं सग ें े

कुछ तो मौका का फायदा खोजेंगे, इससे अधिक साथ कोई नहीं दें गे सब कुछ खद ु ही करना होता है खुद ही हं सना और रोना होता है अपने आप को पहचानना जरूरी है , क्योंकि उसी पर हमारा कर्म निर्भर होता है । जितना महसस ू किया है उतना ही कृष्णा ने लिखा है ।

मशवरा दे ने लगे है वो हवा को जिनको आंधी सोचकर भी डर लगा है दरू तक तकती रही मैं बस उसी को भीड़ में पर कौन मेरा हो सका है उलझने आसान होती ही नहीँ है उसका मेरा एक ही तो राब्ता है ‘भावना’ अफ़सोस करना भी ग़लत है एक लड़का कहके ये रोने लगा है -- x ---

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चित्रकार -

नप ु रु बासु उदयपरु , राजस्थान


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Kalayatra Magazine | Smaran & Yatra Vritrant Special Edition | December 2021 by Anuragyam - Issuu