सचिन चतुर्द वे ी नई दिल्ली संस्थापक, अनुराग्यम ् डॉ ध्रुव तिवारी रायपुर, छतीसगढ़ सलाहकार, कला विभाग अनुराग्यम ् रजनी किरण झा नई दिल्ली सलाहकार, संस्कृ ति विभाग, अनुराग्यम ्
eq[; laikfndk डॉ तरुणा माथुर जयपुर, राजस्थान
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विनीता पुंढीर नई दिल्ली प्रियंका वर्मा मुंबई, महाराष्ट्र
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lg laiknd निधि बंसल नोएडा, उत्तरप्रदे श
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मीनू बाला जालंधर, पंजाब
में न्याय क्षेत्र नई दिल्ली ही होगा। प्रकाशक, मुद्रक एवं मुख्य संपादिका डॉ तरुणा माथुर द्वारा गौरव प्रिंटिं ग प्रेस, ओखला इं डस्ट्रियल एरिया, नई दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका कलायात्रा में आपको कभी - कभी
अनुज शुक्ला भोपाल, मध्यप्रदे श
‘इम्प्रेफेक्ट पिक्चर्स’ नजर आएंगी और बहुत सी तस्वीरें भी गूगल से ली गई हैं । इन्हें बनाने में पत्रिका के संपादकीय विभाग शामिल नहीं होते।
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वर्ष 1, अंक 3, जुलाई 2021 अनुराग्यम ् , नई दिल्ली
अनुक्रमाणिका
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विक्रमशिला विश्वविद्यालय डॉ मलय कुमार झा
17
कोकिल विद्यापति दया नाथ झा
(नीचे दिए गए अनुक्रम पर क्लिक करें )
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बिहार के पर्व पूनम झा
12
शान्ति धाम अलका मिश्रा
14
भारतीय जनमानस डा. नीना छिब्बर
16
वैशाख पूर्णिमा अभिषेक शुक्ला
19
खड़ पतवार मनीषा झा
20
बिहार के लोक नृत्य सलोनी झा
22
कलाकार भगवान लाल प्रसाद
24
बेटियां रोमाली तिवारी
27
सुपर 30 संगीता जाँगिड़
28
नालंदा डॉली झा
29
अशोक स्तंभ भावना मिश्रा
दरभंगा राज ममता झा
25
मन का उद्गार माला झा
26
कंठ कोकिला रजनी किरण झा
30
तक्षशिला डॉ असद अहमद
32
बिहार का परिचय नमिता सिंह
38
अनुभतिय ू ों कौशलेश कुमार
37
46
बिहार के नृत्य- नाट्य मनोरमा मिश्रा
बिहार की विरासत मुकेश बिस्सा
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48
स्केच कलाकार संजय गिरी
34
बिहार का साहित्य, कला निधि माथुर
35
स्वतंत्रता सेनानी पिंकी मिश्रा
36
कटिहार रे णु जयसवाल
42
बिहार का खानपान लीना झा
45
40
औरं गाबाद यात्रा गोपाल गुप्ता
13
लौट कर चाँद जब सतेंदर तिवारी
36
प्रकृति बड़ी महान सुशी सक्सेना
13
रिश्ते नमिता सिंह
44
यदि मैं प्रकृति होती सुशी सक्सेना
15
मानवता डॉ सरला स्निग्धा
50
यदि मैं प्रकृति होती सुशी सक्सेना
वर्ष 1, अंक 3
जुलाई 2021
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जुलाई 2021
सम्पादकीय
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श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की इन पंक्तियों से सहज ही बिहार राज्य की प्राचीन आध्यात्मिकता समृद्धि और नवाचार संस्कृ ति पर सिर झुकाने का मन करता है जिसे विश्व का प्रथम गणतंत्र होने का गौरव प्राप्त है क्योंकि लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व प्राचीन बिहार जिसे वैशाली ,पाटलिपुत्र ,मगध के इतिहास के रूप में जाना जाता है । वैशाली जन का प्रतिपालक विश्व का आदि विधाता, जिसे ढू ं ढता विश्व आज, उस प्रजातंत्र की माता । रुको एक क्षण पथिक ,इस मिट्टी पर शीश नवाओ, राज सिद्धियों की समाधि पर, फूल चढ़ाते जाओ।। वहाँ शासक की नियुक्ति जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा की जाती थी जिसके ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पुष्टि हुई है । इस राज्य का अपना पौराणिक महत्व रहा है इसलिए इसका उल्लेख वेदों में भी मिलता है । प्राचीन बिहार में जहाँ की मुख्य भाषा संस्कृ त हुआ करती थी पर समय के साथ-साथ कई भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ जैसे भोजपुरी, मैथिली, मगही ,बज्जिका, हिं दी और उर्दू भाषा आदि, किन्तु बिहारी कोई भाषा नहीं है पर अनजाने में आज दे शवासी नितांत बिहारी कह कर इति कर लेते हैं जो ठीक नहीं। बिहार का आज का पटना प्राचीन नाम पाटलिपुत्र सांस्कृ तिक दृष्टिकोण से काफी समृद्ध रहा है , सम्राट अशोक ,चंद्रगुप्त मौर्य जैसे प्रमुख राजाओं ने विश्व में दे श का गौरव बढ़ाया था, जैन धर्म व बौद्ध धर्म का उद्भव यहीं से हुआ जिसे आज विश्व के कई राष्ट्रों ने अपनाया है । सिखधर्म के दसवें गुरु गुरूगोविंद सिंह जी की जन्म स्थली यहीं हैं । मुगलों के आने के बाद से फारसी की पढ़ाई का मुख्य केंद्र भी रहा और आधुनिक भारत के हिं दी भाषा के प्रमुख कवियों ने भी इस पौराणिक भूमि को अपनी कर्म स्थली बनाया ।आज की राजनीति का गढ़ भी रहा है । कलायात्रा के इस तृतीय अंक में आप दे श की तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले इस राज्य के बारे में पढ़ें गे । बिहार शब्द का उद्भव विहार से हुआ जिसका शाब्दिक अर्थ आराम या रहने की जगह है ।जो बौद्ध धर्म के समय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने की जगह थी। किन्तु 12 वीं शताब्दी में जब मुस्लिम शासक आए तो उन्होंने इसे बिहार कहना शुरू किया । बिहार राज्य भारत की उस समृद्ध ज्ञानवान शिक्षा का केंद्र रहा था जहाँ महान राष्ट्रवादी चाणक्य के अर्थशास्त्र की नींव रखी गई थी ।विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा जो कई हजारों वर्ष पूर्व तकनीकी रूप से भी उतना परिपक्व था कि उसके खंडहरों डाॅ तरूणा माथुर में आज भी ज्ञान रूपी उस सुगंध को आप महसूस कर सकते हैं । वर्तमान मुख्य संपादिका में बिहार में जितना प्रचार प्रसार नालंदा को मिला उतना ही अछूता रहा विक्रमशिला विश्वविद्यालय जो प्राचीन भारत का विश्व का दस ू रा बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय था जहाँ अनेक विद्यार्थी विश्व के दस ू रे दे शों से आकर शिक्षा ग्रहण करते थे साथ ही ये विभिन्न विषयों के साथ-साथ महायान और संख्या योग ग्रंथों की शिक्षा का भी सबसे बड़ा केंद्र था। आठवीं शताब्दी के राजा धर्मपाल( पाल वंशज ) ने इसे स्थापित किया था एक समय में यह कार्यशैली में नालंदा विश्वविद्यालय से भी आगे निकल गया था ।पर आक्रमणकारियों ने इसकी भी विशाल ज्ञान संपदा को जलाकर खाक कर दिया था, अतः इस अंक में विक्रमशिला विश्वविद्यालय को मुख्य रूप से हमारा नमन। यह दे श का सबसे बड़ा दर्भा ु ग्य माना जाना चाहिए कि आतंकियों ने हमारी उन महान धरोहर के पुस्तकालयों को जला दिया था जहाँ हज़ारों दे श विदे श के विद्यार्थी विद्यार्जन के लिए कई सौ साल पहले रहते थे और महान गुरूओं के सानिध्य में विभिन्न विषयों की अर्जित करते थे। अनमोल ज्ञान के खजानों से हमारे ग्रंथों को राख कर दिया था क्योंकि वे जानते थे कि किसी दे श की शक्ति उसकी प्रणाली में समाहित होती है अगर उसे नष्ट कर दो तो आगामी पीढ़ियों को जो पढ़ाया जाएगा वही सही समझा जाएगा और वे लम्बे तक गुलामों की फसल पैदा कर सकेंगे।
करीब शिक्षा शिक्षा समय
ये हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को बताएं कि शिक्षा और शिक्षा सम्बन्धित जो दस्तावेज आज उपलब्ध हैं उन्हें सही अर्थों में पहचानें क्योंकि भारत की उस विशाल शिक्षा परम्परा का जो कुछ भी हम बचा पाए उसे भी पढ़ लें और उसके अलावा जो कुछ गुमनामी के अंधेरे में ढका हुआ है उसे निकाल पाए और अगर उसका एक अंश भी हम जान लें तो भी भारत विश्व गुरु कहलाने में किसी से भी कम नहीं है ।
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अनुराग्यम ्
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dyk;k=k विक्रमशिला विश्वविद्यालय
डॉ मलय कुमार झा, प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय, धाना, मध्यप्रदे श
सौजन्य: श्री परशुराम ठाकुर ब्रह्मवादी, पुरातत्ववेत्ता एवं इतिहासकार अतीत की खिड़कियों से विश्व का दस ू रा आवासीय विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, भारतीय शिक्षा, दर्शन,तंत्र, व्याकरण और न्याय के साथ साथ महायान और संख्या योग ग्रंथों की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था जहाँ लंका,चीन,तिब्बत,भूटान, नेपाल और जापान के छात्र आते थे, रहते थे और योग्य शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करते थे। विद्यार्थियों को भोजन,वस्त्र,आवास,शिक्षा आदि की व्यवस्था निःशुल्क दी जाती थी। विश्वविद्यालय का खर्च पाल-राजाओं द्वारा दिये गए जागीरों से होता था।
है कि विक्रम का अर्थ मज़बूत, शक्तिशाली और शील का अर्थ चरित्र से संबंधित है । इसका नामकरण विक्रमशिला इसलिए दिया गया कि यहाँ से जो भी विद्यार्थी विद्या प्राप्त करके निकलेंगे वो बहुत ही दृढ़ चरित्र वाले विद्वान होंगे।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय में भी नालंदा की तरह सुदरू दे शों जैसे जापान, चीन, तिब्बत, कोरिया, थाईलैंड और नेपाल तथा लंका आदि के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए लालायित रहते थे। सफल छात्रों की योग्यता की विक्रमशिला विश्वविद्यालय राजकीय-महाविहार के घोषणा सत्तारूढ़ शासक के द्वारा दीक्षांत समारोह में की रूप में प्रतिष्ठित था जिसे 8वीं शताब्दी में पाल-राजा जाती थी। यह परं परा विक्रमशिला विश्वविद्यालय में पहली धर्मपाल ने स्थापित किया था। यह विश्वविद्यालय एक बार लागू हुई थी। विश्वप्रसिद्ध विद्या-केंद्र के रूप में चार शताब्दियों तक अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का परचम फहराता रहा। उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त करके यहाँ के विद्यार्थी पंडित और महापंडित की उपाधि धारण करते थे ;ये उपाधि विक्रमशिला विश्वविद्यालय के भग्नावशेष भागलपुर या सम्मान राजा के द्वारा विद्यार्थियों को दी जाती थी। (बिहार) रे लवे स्टेशन से महज़ 50 किलोमीटर की दरू ी ये उपाधियाँ विक्रमशिला महाविहार की उच्चतम डिग्री पर अंतीचक ग्राम में मूकदर्शक बनकर अपनी गौरवगाथा थी। यहाँ भी नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा दे नी पड़ती बयान कर रहे हैं । विक्रमशिला महाविहार का नामकरण थी। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में छह प्रवेशद्वार थे वास्तव में उस महाविहार के अध्यापक व विद्यार्थियों के जो प्रकांड विद्वानों और आचार्यों द्वारा रक्षित थे और वे दृढ़ चरित्र और अनुशासन के कारण पड़ा और इसी नाम से आचार्य द्वार-पंडित कहलाते थे। इस महाविहार में प्रवेश इसकी ख्याति हुई। इस महाविहार के संबंध में कहा जाता पाने के लिए पहले द्वार-पंडितों से पहले शास्त्रार्थ करना होता था और उसमें उत्तीर्ण होने के पश्चात ही महाविहार
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अनुराग्यम ्
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dyk;k=k सिद्ध-सम्प्रदाय के आचार्य सरहपाद इस महाविहार के कुलगुरु थे। यहाँ प्रधान आचार्य को मुख्य अधिष्ठाता कहा जाता था। विदे शों से आए बौद्ध भिक्षु अपने अध्ययन काल से कुछ समय निकाल कर यहाँ की दर्ल ु भ व अच्छीअच्छी पुस्तकों का अपनी-अपनी भाषा में अनुवाद कर अपने दे श ले जाते थे। इस कार्य में उन्हें अधिक-सेअधिक सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं। इस कार्य में यहाँ के विद्यार्थी और शिक्षक बड़े ही लगन के साथ रहते थे। गोपाल द्वितीय के समय में यहाँ से प्राप्त की गई प्रजापारमिता की पाँडुलिपि अभी भी ब्रिटिश-संग्रहालय में सुरक्षित है । तिब्बती-पाँडुलिपियों से यह ज्ञात होता है कि विक्रमशिला-महाविहार में बहुत बड़े -बड़े विद्वान आचार्य के पद पर थे। वे अपनी विद्वता के साथ-साथ अपनी लेखनी के भी धनी होते थे। उनकी लिखी हुई अनेक पुस्तकें थीं। इस महाविहार के विद्यार्थी लेखन-कला में भी प्रवीण होते थे ।
महाविहार में आधुनिक एकेडमिक-कौंसिल के समान एक समिति थी जो पुस्तकालयों के कार्यों की दे ख-रे ख करती थी। १२ वीं शताब्दी के आसपास बख्तियार खिलजी के नेततृ ्व में मुसलमानों ने आक्रमण कर इस महाविहार को पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। तबाक़त विक्रमशिला विश्वविद्यालय के शिक्षक बहुत ही ए-नासीरी में विक्रमशिला-विश्वविद्यालय के विध्वंस का विद्वान और उच्चकोटि के पंडित होते थे इससे उनके छात्र विस्तृत वर्णन मिलता है । लामा तारानाथ ने लिखा है कि भी उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त करते थे। यहाँ के शिक्षकों तुरूष्क आक्रमणकारियों ने इस महाविहार को सुनियोजित और छात्रों के बीच बहुत ही सौहार्द्रपूर्ण संबंध होता था। नए तरीके से नष्ट-भ्रष्ट किया। संपूर्ण महाविहार में आग लगा विद्यार्थी प्रथमतः एक भिक्षु के पास शिक्षा पाने जाते थे दी गई। मूर्तियों को भी टु कड़ों-टु कड़ों में तोड़ दिया गया बाद में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ऊंचे स्तर के पंडितों के तथा यहाँ के विश्वविख्यात पुस्तकालयों को भी जला दिया पास भेजा जाता था। अपने अध्ययन तथा महाविहार के गया। कार्यकलापों के अलावा उन्हें एक सेवक के समान भी कार्य तारानाथ के अनुसार तुरूष्क आक्रमणकारियों ने इस करना पड़ता था। महाविहार का विध्वंस कर उसके समीप ही महाविहार की यहाँ के शिक्षकों को भी शिक्षा प्रदान करने के ईटों और पत्थरों से एक किले का निर्माण किया और उस अतिरिक्त कई जिम्मेदारियों का वहन करना होता था किले में वे कुछ समय तक रुके रहे । महाविहार के प्रांगण । नए विद्यार्थियों की दे खभाल, उनके खाने का प्रबंध, महाविहार के सेवकों के निरीक्षण, महाविहार के कार्यकलापों का संचालन तथा अनुशासन की दे ख रे ख उनकी ही जिम्मेदारी थी।तिब्बती-इतिहासकार लामा तारानाथ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘बौद्धधर्म का इतिहास’ के अनुसार १०वीं शताब्दी आते आते विक्रमशिला नालन्दा विश्वविद्यालय से भी एक वृहत शिक्षा केन्द्र बन गया था। में प्रवेश संभव था। प्रवेशार्थियों की योग्यता, चरित्र और बुद्धि की परीक्षा के लिए दस आचार्यों की नियुक्ति की गई थी। नालंदा विश्वविद्यालय की तरह यहाँ की भी प्रवेश परीक्षा बड़ी कठिन होती थी।
धर्मपाल ने अध्ययन के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए १०८ विद्वान विभागाध्यक्ष और १०८ आचार्यों की नियुक्ति की थी। विश्वविद्यालय के सभा भवन में एक साथ ८००० विद्यार्थी तथा विद्वान बैठक कर धर्म-प्रवचन सुनते थे। लामा सुम्पा के अनुसार बुद्धज्ञान प्रतिष्ठता द्वारा विक्रमशिला-महाविद्यालय का निर्माण किया गया। इसकी चारदीवारी के चतुर्दि क १०७ दे व-स्थानों की योजना थी और उसके अन्दर ५८ संस्थाएँ थीं, जिनमें १०८ पंडित रहा करते थे । Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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में अब तक दर्जनों प्रकोष्ठों को प्रकाश में लाया जा चुका है । कई जगहों से ईंट निर्मित मेहराबदार कमरों, जिनका उपयोग संभवतः योग साधना के लिए किया गया था, की भी खुदाई की गई है । मुख्य प्रवेश-द्वार के अहाते में दोनों ओर से खुलने वाले चार-चार कमरों की श्रृंखला पाई गई है । यहाँ प्रथम चरण में चार सीढ़ियों की संरचना, फिर तीन सीढ़ियाँ उसके बाद दो सीढ़ियाँ और दो मीटर के अंतराल पर अंततः एक सीढ़ी की कलापूर्ण बनावट पाई गई है । तिब्बती-स्रोतों के अनुसार यह महाविहार एक विशाल चारदीवारी से घिरा हुआ था और मध्य में महोबोधि का एक विशाल मंदिर बना था। महाविहार प्राँगण के एक भाग में मन्नत स्तूपों की कई श्रृंखलाएँ पाई गई हैं । इनमें कुछ छोटे तो कुछ मध्यम आकार वाले हैं । स्तूप के चारों ओर टे राकोटा की मूर्तियाँ लगी हैं । इन मूर्तियों में बुद्ध धर्म और सनातन धर्म से सम्बन्धित चित्र बने हैं । खुदाई के दौरान मठ पूर्णरूपेण चतुष्कोणीय है । यह ३३० वर्गमीटर में फैला है । इसमें २८ कमरे हैं । इसके अलावा १२ भूगर्भ कोष्ठ बने हैं । इसका प्रयोग चिंतन-कार्य के लिए किया जाता था। केन्द्रीय चैत्य-मीटर ऊँचा है । इसके केन्द्र के चारों ओर विपरीत दिशा के अराधना-गृह में दो प्रदक्षिणा-पथों का निर्माण किया गया है । सभी प्रदक्षिणा पथों के ताखों में मिट्टी के पकाए हुए अनेक दे वी-दे वताओं, पशु-पक्षियों, जानवर और अनेक सांकेतिक वस्तुओं का चित्रण पाया गया है । इसके अलावा खुदाई में यहाँ तंत्र-साधना के गुफा भी प्रकाश में आए हैं और वहाँ महाविहार-अंकित एक मुद्रा भी मिली है ाल शासक काल में बौद्ध धर्म के तहत तंत्रज्ञान (वज्रयान) का विकास हुआ। पाल सम्राटों ने उदं तपुरी (बिहारशरीफ) संधौन (बेगूसराय), सोमपुर (बांग्लादे श) और विक्रमशिला भागलपुर में तांत्रिक पीठ की स्थापना की थी। विक्रमशिला सबसे बड़ा तांत्रिक केन्द्र था। विक्रमशिला में तंत्र शाखा के बलि आचार्य और होम आचार्य के प्रावधान थे। इतिहासकार
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यह मान चुके हैं कि विक्रमशिला में तंत्र की साधना के साथ नरबलि की भी प्रथा थी। नरबलि की प्रथा का केन्द्र विक्रमशिला महाविहार से लगभग एक किलोमीटर की दरू ी पर बुधासन झील के पास बाँस के घने जंगलों में स्थित आशावरी दे वी स्थान था। विक्रमशिला में निरदे ह रचना शास्त्र की भी पढ़ाई होती थी जिसमें अस्त्र का प्रयोग, शल्य क्रिया अन्य वीभत्स कार्यों जैसे क्रियाओं से गुजरना पड़ता था। नरदे ह रचना शास्त्र, शाक्त आचार्यों द्वारा दी जाती थी। आशावरी स्थान में बलि प्रदान के बाद मृत शरीर शक्त आचार्यों को सौंप दिया जाता था जो परदे ह रचना पर शोध किया करते थे। कुल मिलाकर ये कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय अद्भुत था अपने आप में संरचना हो या परिवेश, शिक्षा हो या प्रवेश, पूर्ण पल्लवित हो या उसका ध्वंसावशेष, सब कुछ प्रेरित करता था प्रेरित करता है उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने को । ये हमारी प्राचीन सभ्यता के सबसे मुखर स्तंभ रहे हैं और दे श विदे श में भारत को विश्वगुरु कहलाने का समुचित कारण । खुदाई का कार्य आज भी चल रहा है और नयी जानकारियाँ प्राप्त हो रही हैं जिससे पता चलता है कि भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली कितनी गौरवमयी थी। नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा का माध्यम पाली था जबकि विक्रमशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा का माध्यम संस्कृ त हुआ करता था । विक्रमशिला खुदाई स्थल से प्राप्त पुरातात्विक सामाग्रियों में कांस्य मूर्तियां, मृदभांड,स्तंभ, मुहरें , मृण मूर्तियां, आदि के अतिरिक्त हजारों किस्म की प्रस्तर कला भवन निर्माण कला,लोहा, तांबा, सोना, चांदी, विभिन्न पशुओं की अस्थियां , नवरत्न की माला, मातृदेवी, शिवयोगी के विभिन्न रुप, विष्णु, वरुण, ब्रह्मा, कृ ष्ण, राम, संदीपनी मुनि, आदि बुद्ध, तारा, वृहस्पति, पुरुरवा, उर्वशी आदि की प्रतिमाएं मिली हैं जो हिमयुग की सभ्यता संस्कृ ति से लेकर वैदिक युग , रामायण युग, महाभारत Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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युग, सिद्धार्थ बुद्ध तक के साक्ष्य प्रस्तुत करती है । विक्रमादित्य की राजधानी का ऐतिहासिक दस्तावेज “बत्तीसी आसन” अभी भी यहां अवशेष के रूप में मौजूद है । आज भी इसके ध्वंसावशेष भारत की गरिमागाथा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है । भागलपुर तो गौरवान्वित है ही पूरा बिहार प्रान्त और भारत दे श के गौरव का प्रतीक है विक्रमशिला विश्वविद्यालय। -----X-----
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अनुराग्यम ्
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dyk;k=k बिहार के पर्व (बरसाईत पूजा - वट सावित्री ) आ रही है । माँ सीता की जन्म स्थली मिथिलांचल मे कई पर्व बड़े स्तर पर मनाये जाते हैं , जैसे छठ पूजा, मधुश्रावंनी, बरसाईत, नाग पंचमी, जुड़ी शीतल, चौकी- चाँन, अनंत पूजा, जितिया पावन, समा चकेवा, नवांन इत्यादि हैं । इन सभी पर्वो में बरसाईत, जिसे बिहार और भारत के अन्य राज्यों में वट सावित्री के नाम से भी जाना जाता है , उसका अलग महत्व है । बरसाईत की पूजा मिथिला की लगभग हर सुहागन मिथिलानी करती हैं । चलू चलू हे सखी, किछू गाबू हे सखी, बर- पूजा के होइया अबेर हे , पूजा करब सब संगे हे । ऐसे ही कई कर्णप्रिय मधुर मैथिली लोकगीत की गूँजों के साथ मिथिला के पावन पर्व बरसाईत के लिये सभी सुहागन मिथिलानी तैयार होती हैं । यह पर्व हर वर्ष जेठ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है ।
पूनम झा
नासिक, महाराष्ट्र
बिहार अनेक संस्कृ तियों का संगम है । जिसमे भोजपुरी, मैथिली, मगही, तिरहुत तथा अंग संस्कृ तियाँ शामिल हैं । बिहार के लोग अपने रीति रिवाजों का पालन बड़ी श्रद्धा से करते हैं । किसी भी संस्कृ ति में पर्व त्यौहार का अपना महत्वपूर्ण स्थान है । बिहार के मिथिला की लोकश्रुति कई सदियों से चली
इस दिन सभी सुहागन मिथिलानी अपने पति के लंबी उम्र और सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं । इस पर्व के पीछे एक पौराणिक कथा अति प्रसिद्ध है । कहा जाता है कि इस दिन सावित्री ने अपने पति के प्राण वापस लौटाने के लिये यमराज को विवश कर दिया था। और यह संपर्ण ू घटना वट वृक्ष के नीचे हुई थी, इसलिए बरसाईत पूजा के दिन वट वृक्ष का पूजन कर सावित्री -सत्यवान की कथा को याद किया जाता है । विवाह के प्रथम वर्ष में नव विवाहित मिथिलानी के यहाँ बडे धूम धाम से इस पूजा का आयोजन होता है । पूजा हे तु कई सामग्रियों की आवश्यकता होती है । बांस की टोकरी (डाला), मीना की पत्तियाँ, मिट्टी से बने विशहर (सांप), पीला/लाल धागा, नावैद्य, अंकुरित काले चने/मूँग, हाथ पंखा( बिएन ्), पीसे हुए गीले कच्चे चावल ( पीथार) इत्यादी। इस दिन सुहागन सवेरे उठ कर, नहा धो कर, सोलह श्रृंगार कर सभी पूजा की सामग्री लेकर वट वृक्ष के नीचे बैठ, विधि विधान से पूजा करती हैं । वट वृक्ष की परिक्रमा कर जल, फल, दध ू , मिठाई अर्पण कर के vat वृक्ष के चारो ओर पीला या लाल धागा बांधती हैं और पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं । बरसाईत प्रेम, विश्वास और श्रद्धा का प्रतीक है , जिसमे एक सुहागन अपनी श्रद्धा अर्पित ् कर ईश्वर से अपने सुहाग और वैवाहिक जीवन की मंगल कामना करती हैं । -----X-----
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dyk;k=k शान्ति धाम : कहलगाँव भागलपुर
अलका मिश्रा पटना, बिहार ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी से बचने के लिए आइये आपको आज अपने साथ ले चलती हूँ एक ऐसी यात्रा पर जो तन मन को शुद्ध, शांत व सात्विक विचारों से भर दे गी। यह यात्रा आपकी आत्मा में सिद्ध व सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे गी।
के लिए कई महापुरुष यहाँ आकर रम गए। मान्यता है की यह स्थान भौगोलिक व आध्यात्मिक तौर पर दै विक साधना के लिए पंचतत्वों का मिलान करती है । इसी कारण से यह स्थान महाज्ञानियों से परिपूर्ण है । योगी शांति बाबा, जो राजस्थान से वैराग्य धारण कर गंगा के किनारे यहाँ आए थे। कठोर साधना से माँ गंगा की भक्ति से सिद्धि प्राप्त की थी। जिनके बहुत से चमत्कार के किस्से सुनने को मिलते हैं । दे वेंद ु जी ने एक प्रचलित कथा कही, जिसमें ये बताया की एक बार किसी समारोह में ठं डी शरबत बनाने के लिए सूखे मेवे सिलबट्टे पर पीसे जा रहे थे।
तो तैयार हो जाइये, शुरू करतें हैं विचरण बिहार राज्य के भागलपुर जिले के कहलगाँव का, जो ऐतिहासिक तौर पर त्रेतायुग के महामुनी नाट्य शास्त्र के ज्ञाता कहोल ऋषि के नाम पर इस स्थान का नाम करण हुआ। यह मुनिश्रेष्ठ परम ् ज्ञानी श्री अष्टावक्र जी के पूज्य पिता थे। जहाँ कोल जनजातियों का वर्चस्व था तथा यह स्थान बौद्ध विहारों व विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अचानक उसमें घरे लू मक्खियाँ भी पिस गईं। अब लिए विख्यात है । यहां की मुख्य भाषा अंगिका है । यहां वहाँ सभी उपस्थित लोग उस शरबत को ग्रहण करने से की सुंदरता मनमोहनी और शीतलता प्रदान करती है । इनकार करने लगे, तब शांति बाबा जी ने उसे ये कहते कहलगाँव रे लवे स्टेशन से बस 500 मीटर की दरू ी हुए पिया की ये तो प्रभु के प्रसाद के रूप में तैयार हो रहा पर उत्तरवाहिनी माँ गंगा की गोद में अत्यंत रमणीक स्थान था तो उनका प्रसाद ग्रहण करने का हक तो मक्खियों को जीवंत पहाड़ों पर स्थित है , जहाँ बसे कई आश्रम हैं । जैसे भी था अब इसमें इन मक्खियों का क्या दोष तभी दे खा तापस बंगाली बाबा आश्रम, पंजाबी बाबा आश्रम और सबसे गया की जैसे ही उन्होंने शरबत पी कर अपना मुंह खोला मनोरम शांति बाबा आश्रम जहाँ की प्राकृतिक सुंदरता की सारी मृत मक्खियाँ जीवित हो कर उड़ने लगी सभी लोग इसे दे ख कर अचंभित रह गए। ऐसी कई कथाएं सुनने छटा नयनों को भी शांति प्रदान करती है । में आती हैं । अगहन मास में गीत संगीत की गोष्ठी होती गंगा नदी के बीच में तीन अद्भुत आकर्षक पहाड़ों है और बड़े बड़े प्रसिद्ध संगीतज्ञ व संगीत प्रेमी इसमें की श्रृंखला में सबसे ऊँची पहाड़ी पर बसा है शांति धाम शिरकत करते थे। इस समारोह में शांति बाबा की तरफ से आश्रम। इस आश्रम के साथ कई कथाएं प्रचलित हैं । यहाँ आठ नावें निःशुल्क दर्शनाभिलाषी की सेवा में रखी जाती के स्थानीय निवासी हिं दी साहित्य के शिक्षाविद अंगिका के थीं ताकि आवागमन में कठिनाई न हो। प्रसिद्ध साहित्यकार आदरणीय डॉ इन्दु भूषण ‘दे वेंद’ु जी द्वारा कथित दन्त कथाओं के अनुसार यह धाम प्रारम्भ से शांतिबाबा के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद उनके ही ऋषि मुनियों के आकर्षण का केंद्र रहा है । योग साधना जाने के बाद उनके शिष्यों ने इस धाम का सौन्दर्यीकरण
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कर शांति बाबा के साथ साथ कितने ही दे वी दे वताओं की मूर्तियां स्थापित कीं। साथ ही साथ उनकी परम्परा को जीवंत रूप प्रदान करने हे तु आज भी गुरु पूर्णिमा के दिन भव्य आयोजन होता है । जहाँ दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है , उसी प्रकार अगहन मास का संगीत मेला आज भी आयोजित किया जाता है ।
भी गए। कुछ समय बाद बाबा का दे हावसान हो गया। कहा जाता है कि ये वियोग उनका वो बन्दर भी सह न पाया और मृत्यु को प्राप्त हो गया।
शांति बाबा जैसे महापुरुष के पहले भी वहाँ एक बाबा रहते थे। उनके पास पुत्रवत व्यवहार करने वाला उनका बंदर था। जिसके कारण उन्हें बन्दर वाले बाबा के नाम से भी जानते थे। कहा जाता है कि एक बार बाबा पर कोई आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद किया गया तो उनके उसी बन्दर ने एक पुत्र की भाँति उनके खान-पान से लेकर उन्हें आरोप से मुक्त करवाने के लिए सारे सबूत इकट्ठा कर वकील की भी व्यवस्था की, यहां तक की वो रोज़ नाव चलाकर बाबा से मिलने भी जाता रहा। उसके अथक प्रयास से बाबा निर्दोष साबित हुए और जेल से छूट
वर्तमान समय में कहलगांव एन0टी0पी0सी0 के निर्माण से प्रसिद्ध है । इस आधुनिकीकरण में व्यस्तता के कारण हम मानव अत्यंत व्याकुल प्रतीत होते हैं और अगर आप अपने तन मन को सुकून के कुछ पल प्रदान करना चाहतें हैं , तो नौका विहार का आनंद लेते हुए इस आध्यात्मिकता से ओतप्रोत शांति धाम पर आ कर शांति बाबा के दर्शन ज़रूर करें । आशा करती हूँ की आपके जीवन में शांति व सकारात्मकता का प्रवाह होगा।
लौट कर चाँद जब वापिस आया खुशी खुशी सब बातें माँ को बताया बोला माँ, बहुत प्यारा सा दे श है धरती पर सच में एक स्वर्ग है दे वो की भूमि तो है ही हिं दस ु ्तान वीरों का दे श है वो सबसे महान समझ आया ये तारे टू ट कर कहा जाते हैं ये भारत माँ से मिलकर आते हैं ।। धन्य हुआ ये जानकर आज मैं इसके वासी मिलने मुझसे आये थे दे ख माँ ये तिरं गा उस दे श का भेंट में मुझको दे कर गए थे।। अनमोल ये तोहफा सीने से लगा लिया है वीरों की इस भूमि को दिल मे बसा लिया है ।।
सतेंदर तिवारी गांधीनगर, गुजरात
इन सब कथाओं से और यहाँ हुए चमत्कारों से इस स्थान की खूबसूरती में और आकर्षक बदलाव प्रतीत होता है ।
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रिश्ते रिश्तों की डोर थामे रखना इन बंधन को बाँधे रखना रिश्ते होते हैं अनमोल मन को ये समझाए रखना। पथ में हो शूल भी अगर मन को हौंसला दिलाए रखना। चुभते हैं कभी-कभी रिश्ते भी प्यार से उनको सहलाए रखना। रिश्ते होते हैं मोतियों की तरह माला में उनको पिरोए रखना। जहर घुलने ना पाए रिश्तों में कभी कोशिश ये बनाए रखना। न उधड़े कभी रिश्तों की बुनाई धागों को सुलझाए रखना। गर्माहट बनी रहे रिश्तों में प्यार की ज्योति जलाए रखना। रिश्तों की डोर थामे रखना इन बंधन को बाँधे रखना।
नमिता सिंह "आराधना" अहमदाबाद, गुजरात
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चित्रकार : डॉ तरुणा माथुर
भारतीय जनमानस परं पराएं और प्रकृति
डा. नीना छिब्बर जोधपुर, राजस्थान प्रकृति और मनुष्य के अटू ट संबंध है । दोनों एक दस ू रे के पूरक हैं । हम मनुष्यों के लिए धरती हमारे घर का आँगन है , आसमान छत, सूरज, चाँद, तारे रोशनी के स्त्रोत, सागर नदियाँ, जल के स्त्रोत और पेड़ पौधे हमें भोजन दे ते हैं , अर्थात प्रकृति परिवार के मुखिया या गुरू की तरह हमें सही मार्गदर्शन दे ती है । प्रकृति की हर करवट, हर हरकत, हर ऋतु और हर आहट हमें कुछ सिखाती है । पतझड़ सिखाता है कि यह अंत नहीं पुनर्निर्माण का समय है । मौसम बदलते हैं और संदेश दे जाते हैं कि परिवर्तन ही जीवन है । भारतीय परं पराएं और संस्कृ ति सबसे पुरानी और वैज्ञानिक भी है । हमारे त्यौहार, पर्व-उत्सव, खानपान, वस्त्र और पूजा विधियाँ भी शास्त्र सम्मत हैं । भारत में पंचतत्वों को महत्व दिया जाता है । हम ने आदिकाल से प्रकृति को जाना, माना और समझा। पेड़, पहाड़, जल नभ, अग्नि, वायु को हम दे वतुल्य मानते हैं । हमारे पर्व या त्यौहार कितने वैज्ञानिक और मानव हितकारी हैं यह जानना जरूरी है । मुख्यतः दस त्यौहार इस की पुष्टि कर दें गे। नवसंवत्सर - चैत्र माह की प्रतिपदा सूर्य के गति बदलने से होती है । 21 मार्च ऐसा दिन है जब धरती सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है । प्राचीन काल में अरब, रोम और यूनान के लोग भी इस चैत्र माह को नववर्ष मानते थे। महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा, सिंध में चेटीचंड, आँध्र में ं युगादि, कशमीर में नौरोज के नाम से मनाया जाता
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है । इस दिन सूर्य, नीम की पत्तियाँ, जल की पूजा और पूरनपोल, श्रीखंड का भोग लगता है । ध्वजा की पूजा होती है । मकर संक्रांति- सूर्य के एक राशि से दस ू री राशि में जाने को ही संक्रांति काल कहते हैं ।ं वैसे तो सूर्य की बारह संक्रातियाँ होती हैं पर चार ही महत्वपूर्ण हैं , यह हैं ं मेष, तुला, कर्क और मकर। सूर्य जब मकर राशि में जाकर उतरायण होता है , अर्थात धरती का उतरीय गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ता है , उसे उतरायण कहते हैं जो दे वताओं का दिवस माना जाता है । इस दिन खिचड़ी, तिल, गुड़, रे वड़ी, गजक का दान और प्रसाद चढ़ाया जाता है । इसी प्रकार मेष संक्रांति में बैसाखी, तुला में गणेश चतुर्थी, कर्क में वर्षा, शरद, हे मंत ऋतु का आरं भ होता है । छठ पूजा - कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है । यह सामूहिक रूप से मनाया जाता है । यह सूर्य आराधना से जुड़ा है । इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है । छठ तिथि एक खगोलीय अवसर है । इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित होती हैं । उसके कुप्रभाव को कम करने के लिए और यथासंभव रक्षा के लिए जल अर्पण किया जाता है । वसंत पंचमी- इस समय प्रकृति अपने यौवन पर होती है । फल, फूल, गेहूँ की बालियाँ, आम पर बौर,
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तितलियाँ आनंद और उल्लास का पूजन। जीवन और मृतप्राय पड़ा था। वटवृक्ष दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक प्रकृति को भी आनंद की आवश्कता है । है । तुलसी विवाह - तुलसी का पौधा भारतीयता का गंगा दशहरा - यह स्वर्ग से गंगा का धरती पर प्रतीक है । ऐसी मान्यता है कि दे वता जब जागते हैं तो अवतरण का दिन है । इस दिन गंगा-स्नान, दान और पहली प्रार्थना हरिवल्लभ तुलसी की ही सुनते हैं । तुलसी उपवास का महत्व है । प्रत्येक गंगा मंदिर मे भगवान शिव विवाह दे व जागरण का प्रतीक भी है । का अभिषेक होता है । शीतलाष्टमी- माता शीतला की पूजा दे श के हर धुलंड़ी और होली - यह मौसम परिवर्तन का सूचक कोने में किसी ना किसी रूप में होती है । इस दिन बासा है । फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका दहन तक का समय भोजन खाया जाता है । बालकों के स्वास्थ्य के लिए विशेष होलाष्टक कहलाता है । शरद ऋतु की समाप्ति और वसंत पूजा होती है । ऋतु का आरं भ पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया को बढ़ा दे ते हैं । होलिका दहन से तापमान करीब 145 फारे नहाइट यह सारे पर्व व त्यौहार जो हमारी आस्था, संस्कृ ति, बढ़ जाता है , जो दोनों को शुद्ध करता है । फिर होली परं परा और मानवीयता के आधार हैं , हमें प्रकृति के और उत्साह से शरीर की सुस्ती भगा दे ती है । करीब लाते हैं । हमारे पूर्वजों ने हमें जो रीति-रिवाज़ सिखाए वो पर्यावरण संरक्षण के साथ मानवता की सीख भी दे ते हैं । आँवला नवमी - कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की विश्व आज इस बात को मानता है कि भारतीय पौराणिक नवमी को आँवला की पूजा महिलाएँ करती ह़ै । इस दिन कथाएं व रीति रिवाज़ मात्र कल्पना नहीं हैं । आज सभी द्वापरयुग आरं भ हुआ था। ऐसा माना जाता है कि आँवले तथ्यों को समझ कर मानव को नया दायित्व लेना है और के पेड़ में विष्णु का वास है । नयी पीढ़ी को जागरूक बनाना है । इस अटू ट रिश्ते को स्नेहपगा बनाना है । वट सावित्री- वट या बरगद सकरात्मक उर्जा और शक्ति का संचार करता है । सावित्री ने अपने पति की -----X----यमराज से रक्षा की थी और सत्यवान इसी पेड़ के नीचे
मानवता होता जाता जीवन मुश्किल लोग यहां पर अटे पड़े। बिना बात आपस में भिड़ते युद्ध हे तु वह डटे पड़े। जीवन दे ने की शक्ति नहीं पर लेना जीवन है आता। यह धरती हो खुशहाल शान्त ऐसा उनको कब भाता? होड़ में पागल इक दज ू े के मानवता से हटे पड़े। फुटपाथों पर सोते कितने दिखलाई ना दे ता है ।
छत होता है अम्बर उनका सड़कों पर सो लेता है । दम है तो इनके हित कर तू पट भी जिनके फटे पड़े। लड़ते भिड़ते नित आपस में कितने हैं जाते मारे । धरा सोचती सिर को पकड़े अपने जाये से हारे । त्रस्त हुई चीत्कार करें फिर कितने टु कड़े कटे पड़े।
डॉ सरला स्निग्धा नई दिल्ली
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dyk;k=k वैशाख पूर्णिमा
अभिषेक शुक्ला सीतापुर, उत्तर प्रदे श वैशाख पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है । इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है । इसके बाद श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है । इस दिन धर्मराज की पूजा करने की भी मान्यता है । यह मान्यता है कि सत्यविनायक व्रत से धर्मराज खुश होते हैं । धर्मराज मृत्यु के दे वता हैं , इसलिए उनके प्रसन्न होने से अकाल मौत का डर कम हो जाता है । यह भी मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन तिल और गुड़ का दान शुभ होता है । इस दिन गुड़ और तिल दान करने से अनजाने में हुए पापों से भी मुक्ति मिलती है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पूर्णिमा तिथि का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के मन और शरीर पर पड़ता है । ज्योतिष में चंद्रमा को मन और द्रव्य पदार्थों का कारक माना जाता है । क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता है । इसलिए आज के दिन व्यक्ति के मन पर पूर्णिमा का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है । वहीं मनुष्य के शरीर में लगभग 80 फीसदी द्रव्य पदार्थ हैं । अतः पूर्णिमा को चंद्र ग्रह की पूजा का विधान है , ताकि मन और शरीर पर चंद्रमा का शुभ प्रभाव पड़े।
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इसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है । बुद्ध पूर्णिमा को स्नान-दान करने का विशेष महत्व है । बुद्ध पूर्णिमा के दिन किया गया दान बहुत लाभकारी होता है । वैशाख महीने की पूर्णिमा के दिन ही भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। यह मान्यता है कि महात्मन बुद्ध श्री हरि विष्णुि का नौवां अवतार हैं । बुद्ध पूर्णिमा को हिं दओ ु ं के अलावा बौद्ध धर्म के लोग बौद्ध जयंती के रूप में मनाते हैं । बुद्ध पूर्णिमा (वेसक या हनमतसूरी) बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है । यह बैसाख माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है । बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था। श्रीलंका व अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई दे शों में इस दिन को ‘वेसाक’ उत्सव के रूप में मनाते हैं जो ‘वैशाख’ शब्द का अपभ्रंश है ।
बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. बैसाख मास की पूर्णिमा
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हैं और प्रार्थनाएँ करते हैं । इस दिन बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है । विहारों व घरों में बुद्ध की मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाते हैं और दीपक जलाकर पूजा करते हैं । इस दिन बोधिवृक्ष की भी पूजा की जाती है । वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सत्य की खोज के की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में लिए सात वर्षों तक वन में भटकते रहे । यहाँ उन्होंने कठोर जाना जाता है । तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया दनिया के दो सौ से अधिक दे शों में बौद्ध अनुयायी में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। ु तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है । हैं । किन्तु चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, महापरिनिर्वाणस्थली कुशीनगर में स्थित महापरिनिर्वाण भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, लाओस, सिंगापुर, विहार पर एक माह का मेला लगता है । इस विहार में दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरिया समेत कुल तेरह दे शों भगवान बुद्ध की लेटी हुई (भू-स्पर्श मुद्रा) 6.1 मीटर लंबी में बौद्ध धर्म ‘प्रमुख धर्म’ है । भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इं डोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि दे शों मूर्ति है । जो लाल बलुई मिट्टी की बनी है । में भी करोडों बौद्ध अनुयायी हैं । विहार के पूर्व हिस्से में एक स्तूप है । यहाँ पर भगवान बुद्ध ने कहा था कि भविष्य के सपनों में भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। यह मूर्ति भी अजंता में बनी भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मूर्ति मत खोओ और भूतकाल में मत उलझो सिर्फ वर्तमान पर ध्यान दो। जीवन में खुश रहने का यही एक सही रास्ता की प्रतिकृति है । है । विश्व भर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते -----X----को लुंबिनी, शाक्य राज्य (आज का नेपाल) में हुआ था। इस पूर्णिमा के दिन ही 483 ई. पू. में 80 वर्ष की आयु में ‘कुशनारा’ में उनका महापरिनिर्वाण हुआ था। वर्तमान समय का कुशीनगर ही उस समय ‘कुशनारा’ था।
कवि कोकिल विद्यापति (1352-1448ई.),
विद्यापतिजी का जन्म, जिला-दरभंगा (बिहार) के विसफी ग्राम के एक विद्यानुरागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गणपति ठाकुर संस्कृ त के उच्चकोटि के विद्वान ् और राजाश्रित कवि रहे हैं । विद्याध्ययन एवं लेखन का संस्कार उन्हें अपने परिवार से मिला था। अपने पिता की भांति उन्होंने राजा शिवसिंह एवं रानी लखिमा दे वी का आश्रय प्राप्त किया। विद्यापति मैथिली और संस्कृ त कवि, संगीतकार, लेखक, दरबारी और राज पुरोहित थे। वे शिव के भक्त थे, लेकिन उन्होंने प्रेम गीत और भक्ति वैष्णव गीत भी लिखे। उन्हें ‘मैथिल कवि कोकिल’ (मैथिली के कवि कोयल) के नाम से भी जाना जाता है । विद्यापति का प्रभाव केवल मैथिली और संस्कृ त साहित्य तक ही सीमित नहीं था, बल्कि अन्य पूर्वी भारतीय साहित्यिक परम्पराओं तक भी था।
दया नाथ झा मधुबनी, बिहार
विद्यापति भारतीय साहित्य की ‘श्रृंगार-परम्परा’ के साथ-साथ ‘भक्ति-परम्परा’ के प्रमुख स्तंभों में से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं । इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरूप का दर्शन
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dyk;k=k किया जा सकता है । इन्हें वैष्णव, शैव और शाक्त भक्ति के सेतु के रूप में भी स्वीकार किया गया है । मिथिला के लोगों को ‘दे सिल बयना सब जन मिट्ठा’ का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महान ् प्रयास किया है ।
अपनी विवशता या द:ु ख नाचकर या लाचार होकर सुनाता है ।
कहा जाता है कि विद्यापति की भक्ति व रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक दिन वेश बदल कर उनके घर आ गए। शिव जी ने अपना नाम उगना बताया। मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले शिव सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने के लिए गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति-रस तैयार हो गए। में पगी रचनाएँ जीवित हैं । पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनाएँ हैं । मैथिल कवि कोकिल, रसासिद्ध कवि एक दिन उगना विद्यापति के साथ राजा के दरबार विद्यापति, तुलसी, सूर, कबीर, मीरा सभी से पहले के में जा रहे थे। तेज गर्मी से विद्यापति का गला सूखने कवि हैं । अमीर खुसरो यद्यपि इनसे पहले हुए थे। इनका लगा, लेकिन आसपास पानी नहीं था। विद्यापति ने उगना संस्कृ त, प्राकृ त अपभ्रंश एवं मातृ भाषा मैथिली पर समान से कहा कि कहीं से जल का प्रबंध करो। भगवान शिव अधिकार था। विद्यापति की रचनाएँ संस्कृ त, अवहट्ट, एवं कुछ दरू जाकर अपनी जटा खोल कर एक लोटा गंगाजल मैथिली तीनों में मिलती हैं । विद्यापति मैथिली, संस्कृ त, भर लाए। विद्यापति ने जब जल पिया तो उन्हें गंगाजल अपभ्रंश के भी सिद्धहस्त कवि रह चुके हैं । कीर्तिलता, का स्वाद आया, पर उन्होंने सोचा कि इस वन में यह जल कीर्तिपताका उनकी अपभ्रंश में लिखी रचनाएं हैं । कवि ने कहां से आया। विद्यापति को संदेह हो गया कि उगना उनकी भाषा को अवहट्ट का नाम दिया है । कीर्तिलता में स्वयं भगवान शिव हैं । जब विद्यापति ने उगना को शिव उन्होंने आश्रयदाता कीर्ति सिंह की प्रशस्ति में अनुपम व कह कर उनके चरण पकड़ लिए, तब उगना को अपने प्रौढ़ रचना की है । वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा और महादे व अपना शिव का रूप दिखाए और बोले कि इस बात को गुप्त ही रखना विद्यापति की रचनाओं में राजस्तुति परक पद भी | मिलते हैं । इसमें मुख्य रूप से भक्ति एवं शृंगार का भाव समय गुजरता गया। एक दिन विद्यापति की भी मिलता है । यद्यापि शिव, दर्गा ु व गंगा के प्रति अनन्य पत्नी सुशीला उगना को कोई काम करने के लिए बोली भक्ति-भाव से भी उन्होंने रचनाएं की हैं , तथापि जिन पदों | उगना को काम करने में कुछ दे र हो गई, जिस कारण में राधा-कृ ष्ण को नायक-नायिका के रूप में ग्रहण कर घोर सुशीला उगना को झाड़ू से मारने लगी | उगना झाड़ू की श्रृंगारिक वर्णन किया है , उनमें उनकी दृष्टि राधा के मुख मार खा ही रहे थे कि विद्यापति की नजर उन पर पड़ी एवं उरोजों पर ही गयी है । और अपनी पत्नी सुशीला को डांटने लगे, लेकिन सुशीला झाड़ू से उगना को मारती ही रही, इस पर भावावेश में जनश्रुति है कि महाप्रभु चैतन्य उनके पदों को गाते- आकर विद्यापति सुशीला से बोले कि ओ ना समझ नारी, गाते मूर्च्छि त हो जाया करते थे। इन पदों में रूप, अभिसार जिसे तुम मार रही हो यह कोई साधारण आदमी नहीं, और मिलन का बहुधा चित्रण हुआ है । राधा और कृ ष्ण की ये तो साक्षात शिव हैं | यह बात सुन कर उगना वहीं पर क्रीड़ाओं को उन्होंने ऐन्द्रिक आसक्ति से पूर्ण बताया है । अंतर्ध्यान हो गए | कहा जाता है कि जिस स्थान पर महाकवि विद्यापति भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उगना ने अपना शिव का रूप विद्यापति को दिखाया था उन्होंने महे शवानी और नचारी के नाम से शिवभक्ति से उसी जगह पर आज उगना महादे व का विशाल मन्दिर है । सम्बन्धित अनेक गीतों की रचना की। महे शबाणी में जहाँ जन्मतिथि की तरह महाकवि विद्यापति की मृत्यु शिव के परिवार के सदस्यों का वर्णन, दे वाधिदे व महादे व के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है । पर इतना स्पष्ट भगवान शंकर का फक्कर स्वरुप, दनिया के लिए दानी, है और जनश्रुतियाँ बताती है कि आधुनिक बेगूसराय ज़िला ु अपने लिए भिखारी का वेष, भूत-प्रेत, नाग, बसहा बैल के मउबाजिदपुर (विद्यापतिनगर) के पास गंगातट पर और मूस सभी का एक जगह समन्वय, चिता का भस्म महाकवि ने प्राण त्याग किया था। शरीर में लपेटना, भाँग-धतूरा पीना आदि शामिल है तो दस -----X----ू री ओर नचारी में एक भक्त भगवान शिव के समक्ष
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खर पतवार ने ली कला का रूप
मनीषा झा
रामपुर, मधुबनी, बिहार खेतो में स्वतः जन्म लेने वाला खर, जिसे गोल्डेन ग्रास नाम से भी जानते हैं । जिसे दे खभाल करने की जरूरत नहीं पड़ती है । नदी नालों के किनारों का शोभा बढ़ाती हैं । जिसे हम लोग सिक्की नाम से जानते हैं l प्राचीन समय से ही खड़ का उपयोग हो रहा है । पहले खर से ही घर का छप्पर तैयार किया जाता था। घर को साफ करने के लिए खर से बने हुए झाड़ू का उपयोग आज भी हो रहा है । उसके बाद महिलाएँ सब मौनी, पथिया चँगेरी सब बनाके घर में उपयोग करने लगीं। मधुबनी जिला के रै याम गाँव के कुछ कलाकार ने खर से मूर्ति, कान के आभूषण और चूड़ी बनाई। धीरे - धीरे खर का महत्व बढ़ने लगा। कुछ कलाकार ने सिक्की से फोटो बनाने के बारे में सोचना शुरू किया और इस सोच को सार्थक किया रामपुर गांव के निवासी श्री धीरें द्र लाल दास जी ने। उन्होंने सिक्की को पेंटिं ग का रूप दिया और अपनी कड़ी मेहनत से इस क्षेत्र में महारथ हासिल की। उन्हें सिक्की पेंटिं ग का जन्मदाता कहा गया। आदरणीय धीरें द्र लाल दास जी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है । गेहूं के डं ठल की कलाकारी तो अनुपम होती है । गेहूं के डं ठल से बने हुए पंखे दे खने में बड़े ही मनमोहक लगते है , इससे छोटे -छोटे बॉक्स खिलौने इत्यादि भी बनाए जाते है । बहुत ही उपयोगी वस्तु है गेहूँ का डं ठल। कुछ कलाकार पुआल के डं ठल की ओर आकर्षित हो रहे हैं । उनका कहना है कि प्राकृतिक चीजों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग होना चाहिए l जितना हो सके कृत्रिम चिजों का कम से कम उपयोग करना चाहिए। जैसे मिथिला की कला मधुबनी पेंटिग दे श -विदे श तक पहुंची वैसे ही सिक्की कला को भी पहचान दिलानी है । और अपने मिथिला के प्राचीन कला को आगे बढ़ाना है । -----X----Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k बिहार के लोक नृत्य
सलोनी झा
नीमराना, राजस्थान विविधताओं से भरा बिहार मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंग तथा तिरहुतके प्राचीन संस्कृ ति का मिश्रित स्वरूप है । बिहार में लोक नृत्य का एक अलग ही महत्व है । यहां दै निक जीवन के विभिन्न क्रियाओं विवाह उत्सव, मांगलिक कार्य, और ऋतु के आधार पर लोक नृत्य आकर्षित करती है । प्राचीन काल में बिहार एक पुरुष प्रधान राज्य रहा है । यहां की प्राचीन संस्कृ ति में लोक नृत्य पुरुषों द्वारा ही किया जाता था। जिसमें पामारिया नाच, जोगीरा नाच, विदे शिया नाच उल्लेखनीय है । आइए जानते हैं बिहार के लोक नृत्य के नाम और उन्हें कब कहां और कैसे किया जाता है । कजरी-सावन के महीने में औरतें परदे स कमाने गए पुरुष को याद कर और अपने मायके को याद कर नृत्य करती हैं । झिझिया-यह मिथिला क्षेत्र का सांस्कृ तिक नृत्य नाट्य है । दर्गा पूजा के अवसर पर महिलाएं छिद्र ु वाला घड़े में दिया जला कर अपने सर पर रख कर समूह में नृत्य करती हैं । कुप्रथा डायन को पहचानने के लिए यह नृत्य किया जाता है । विदे शिया, लौंडा नाच-लौंडा शब्द अपने आप में कई तरह के अर्थ को लेकर आता है । प्राचीन संस्कृ ति में मंच पर औरतो और महिलाओं का आना वर्जित था। भोजपुरी साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी की माने तो भिखारी ठाकुर ने सबसे पहले कलात्मक प्रतिभा वाले पुरुष को स्त्री की वेशभूषा में मंच पर उतारा और विदे शिया, लौंडा नाच
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का प्रचलन शुरू किया। विदापद नाच-फणीश्वर नाथ रे नू द्वारा 1960 में बनाई गई नाच मंडली, अब इतिहास बन कर रह गई है । मैथिली महाकवि विद्यापति द्वारा लिखित राधा कृ ष्ण श्रृंगार गीतों को अंगिका भाषा में प्रस्तुत किया जाने लगा। विदापद नाच कोसी की पौराणिक परं परा है । जट जटिन-जब भी बिहार लोक नृत्य की बात होती है जीवन चक्र के अलग-अलग नृत्य है । जोड़े में किया जाने वाला जट जतिन नृत्य मगध, मिथिला और कोसी क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नृत्य है । यह नृत्य कठिन परिस्थितियों में प्रेमियों के व्यथा को बताने के लिए किया जाता है । बाढ़ सूखा जैसे प्राकृतिक आपदा जो बिहार में आमतौर पर दे खा जाता है । गरीबी दख ु को भी इस नृत्य के द्वारा दिखाया जाता है । जोगीरा नाच-अवधी और भोजपुरी काव्य की एक मिश्रित विधा है । यह हास्य और व्यंग्य का एक रूप है । विशेषकर होली के रं ग और भांगके साथ गांव में ढोल, मंजीरे के साथ होली खेलने वालों की टोली जोगीरा के स्थान पर झूमती नाचती हुई निकलती है । जम्बूरी नृत्य-स्थानीय संस्कृ ति परं परा से जुड़ा हुआ है जमुरी नृत्य। इस नृत्य की समानता गुजरात के गरबा नृत्य से है । यह नृत्य विवाहित महिलाओं के लिए विशिष्ट है । खीलडीन नृत्य-यह नित्य अतिथि के मनोरं जन के लिए होता है ।
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dyk;k=k पवड़िया नृत्य-यह नेट पुरुषों द्वारा स्त्री के वेशभूषा में किया जाता है । यह नृत्य बच्चों के जन्म पर किया जाता है । झरनी-बिहार के मुस्लिम समाज का प्रसिद्ध लोक नृत्य है । मुहर्र म के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है । इन्नी बिन्नी नृत्य-पति-पत्नी प्रसंग पर महिलाएं नृत्य करती है । यह अंगिका क्षेत्र की प्रमुख नृत्य है । बगुलों नृत्य- ससुराल से रूठ कर जाने वाली स्त्री की दस ू री स्त्री के साथ हो रहे नोकझोंक को अभिनय द्वारा दर्शाया जाता है । मांझी नृत्य-नाविकों को द्वारा नदी में नित्य मुद्रा में गाया जाने वाला गीत।
कीर्तनया नृत्य-भगवान श्री कृ ष्ण के लीला का वर्णन भावपूर्ण कीर्तन के गीतो और अभिनय के द्वारा किया जाता है । सामा चकेवा-कार्तिक शुक्ल सप्तमी से पूर्णिमा तक किया जाने वाला सामा चकेवा भाई बहन के ऊपर आधारित लोक नृत्य है । इसके पात्र मिट्टी के बने होते हैं । इसका नित्य प्रश्न उत्तर के रूप में गीतों द्वारा क्रमबद्ध किया जाता है विशेषकर यह नृत्य मिथिला के लड़कियों और महिलाओं द्वारा किया जाता है । डोमकच-बारात के विदा हो जाने के बाद लड़के के घर में बची महिलाएं हास्य परिहास के रूप में यह नृत्य करते हैं । धोबिया नृत्य-मांगलिक अवसर पर धोबी समाज द्वारा किया जाने वाला जातिगत नृत्य है । यह नृत्य भोजपुर में ज्यादा प्रचलित है ।
गंगिया-गंगा स्तुति में किया जाने वाला नृत्य गंगिया नृत्य है । नचारी-महादे व गौरी के गीतों पर किया जाने वाला नृत्य। इसके साथ ही बिहार लोक संस्कृ ति में बहुत से ऐसे लोकनृत्य हैं जो समय के साथ विलुप्त होते जा रहे हैं जैसे बसंती, लगाई नृत्य शैली ,दे वहर घांटो ,धन कटनी, गोंडिन,लौढियारी लोग नृत्य की इतनी विशाल विरासत होने के बावजूद भी, बिहारी लोक नृत्य कहीं विलुप्त होती जा रही है और उसकी जगह फूहड़ नृत्य ले रही है । यह हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि बिहारी लोक नृत्य को जीवंत रखें। और इस क्रम में मैं सलोनी झा बिहारी लोक नृत्य के संरक्षण के लिए प्रयासरत हूं। -----X-----
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कलाकार - भगवान लाल प्रसाद, मधुबनी, बिहार
(अलह - उदल विषय पर 300 से अधिक पेंटिं ग बनाई हैं )
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वह भारत के एक बहुआयामी कलाकार हैं । वह गांव की मिट्टी से जुड़े कलाकार हैं वह एक ऐसे कलाकार हैं जो मिथिला क्षेत्र की मिट्टी से सीधे जुड़े हुए हैं । मिथिला की कला और संस्कृ ति की समृद्धि उनकी पेंटिं ग में आसानी से दे खी जा सकती है । स्थानीय विषय के साथ-साथ वे विभिन्न परम्परागत मूल्यों पर शोध कर रहे हैं , इन्हीं में से एक विषय आल्हा-उदल है । उन्होंने अपने शोध के माध्यम से अलह-उदल विषय पर 300 से अधिक पेंटिं ग बनाई हैं । जिसे उन्नीस अध्याय में वितरित
किया गया है , जो मधुबनी शैली में बनाई गई चित्रों की सबसे बड़ी श्रृंखला है । आला उदल की गहराई के बारे में जानने के लिए वे थिएटर ग्रुप में शामिल हो गए, जो विशेष रूप से भारत के कई हिस्सों में विशेष रूप से आंतरिक भाग या गाँव में नौटं की का प्रदर्शन कर रहे थे। कला का उनका सफर बचपन से ही शुरू हो गया था, जब उनकी मां श्रीमती लक्ष्मीनिया दे वी पेंटिं ग के साथ-साथ सुंदर घास के भूसे से रं ग-बिरं गी सिक्की टोकरी बना रही थीं। अपने करियर में उन्होंने दे वी दर्गा और काली की ु कई श्रृंखलाओं को गढ़ा। वह
मूर्तिकला में स्थानीय रूप से प्रसिद्ध हो गए, लेकिन वह इससे कभी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने मधुबनी पेंटिं ग में काम करना शुरू किया, जिसे वे अपनी मां को प्रेरणा मानते हुए लक्ष्मीनिया दे वी पेंटिं ग कहते हैं । प्रारं भ में उन्होंने बुद्ध, रामायण, महाभारत, ग्राम रीति-रिवाजों जैसे विषयों पर काम किया, लेकिन आल्हा-उदल के शोध के दौरान उन्होंने आवश्यकतानुसार अपनी शैली को अपना प्रभाव दे ना शुरू कर दिया। उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह से कला क्षेत्र को समर्पित कर दिया। -----X-----
भगवान लाल प्रसाद
मधुबनी, बिहार
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dyk;k=k बेटियां
वाले समाज़ में लड़कियों को अपने खुले विचारों के साथ आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। कभी लोग क्या कहें गे, तुम लड़की हो, बैठेने उठने का ढं ग ठीक रखो, धीरे बोलों, कम बोलों दस ू रे के घर शादी कर के जाना है , खाना बनाना क्यों नही आता, पति, परिवार, बच्चों को सम्भालने जैसी तमाम बेमतलब बातों की जंजीरों से जकड़ा जाता है ।
रोमाली तिवारी
इं दौर, मध्यप्रदे श
सृष्टि जिसके बिना थम जाए, ऐसी है नारी, सृष्टि जिस पर घूम रही, वह धुरी है नारी।। जब गर्भ में नही मारोगे, तभी तो तुम्हारी है नारी, जब नारी है , तभी तो है सृष्टि सारी।। श्री अभिषेक मिश्र की ये पंक्तियां बखूबी दनिया के हर ु शख़्स के लिये ‘बेटी’ की महत्ता बयां कर रही है । ‘बेटी’ शब्द उच्चारते ही मानों लब खुल जाते है । मानो कह रहे हों लो दिल के दरीचे खुल गए। अब भावनाओं की गांठ खोल दो, बहने दो मन को ‘बेटी’जो हुई है । ‘ख़्वाब, इश्क़ और ख्वाहिश को सुरत दे दी, ईश्वर ने एक दिन संसार को स्त्री दे दी। ‘ बेटी एक छोटे से शब्द में समाए पूरे संसार के अस्तित्व, विश्वास और प्यार का प्रमाण है । फिर हम कैसे कह सकते हैं कि ‘बेटी’ परिवार और समाज के लिए बोझ है । वर्तमान समय में ‘बेटी’ सिर्फ़ परिवार की सहायिका नहीं, बल्कि अच्छी शिक्षा, सहज करियर, खेल, ग्लैमर व स्वतंत्र आमदनी के साथ हर क्षेत्र में अपने हौंसले और मेहनत के दम पर अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली ‘मूर्त’का नाम है ‘बेटी’। जिन कामों में वे सहज महसूस करती थी, आज उन्हीं कामों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर चुकी है । आज इन्हीं बेटियों के आगे जनमानस नतमस्तक है , आज इन्ही के कारण तो भारत का ऊँचा मस्तक है । बेटियां कम नही किसी से, शक्ति का अवतार है , इनको जो सम्मान न दे उनका जीना धिक्कार है ।। एक-एक क़दम पर बेटियों ने ख़ुद को साबित किया है । लेकिन कहते है न हर सिक्कें के दो पहलू होते है । सिक्के का ये एक पहलू था जो काफ़ी सकारात्मक है । लेकिन वहीं दस ू रा पहलू काफी नकारात्मक है । जहाँ हर क़दम पर लड़कियों को दबाने की कोशिश की जा रही है । जहां हमें लक्ष्मी, दर्गा ु , सरस्वती का रूप माना गया है , वही दस ू री ओर हमें अशुभ मानकर अभिशाप माना जाता है । आज बेटी को अलग-अलग स्थान दिलाने की, उसे उसकी जिंदगी अपने हिसाब से जीने दे ने की क़वायद में ‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’, ‘बेटी है तो कल है ’ की बात करने वाले लोग, संस्था और सरकार अपने लक्ष्य से भटकती नज़र आ रही है । ‘बेटी’ की महत्वता को समझने की बजाए उस पर पाबंदी लगाकर उसके अधिकार छीनने पर ज़्यादा बल दिया जा रहा है । आज 21वीं सदी में भी बेटी को बोझ समझकर सिर्फ़ उपयोग की वस्तु माना जा रहा है , आज भी इस खुले विचार
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तुम्हें ही समझना है तुम्हे अपनी इच्छाओं को मारना है , अपने सपनों से समझौते करना है क्यों?क्योंकि तुम एक लड़की हो। क्यों हमें ही गंदी नज़रो से बचना पड़ता है ?बलात्कार, ताने, घृणा से परे शान होकर हमें ही मरना पड़ता है या क्यों हमें ही दहे ज़ के लिए मार दिया जाता है ?क्यों हमें ही रात को घर से निकलने से पहले या किसी बस- ट्रैन में चढ़ने से पहले हमें सोचना पड़ता है ? सीधा-सा जवाब है क्योंकि नारी की सहनशीलता उसकी कमज़ोरी बन गई है । अगर फ़ितरत हमारी सहने की नही होती, तो हिम्मत तुम्हारी कहने की नहीं होती। अब परे शानियों को सहन कर डर के भागने का नहीं, बल्कि जागने का, अत्याचारों पर आवाज़ उठाने का वक़्त है । क्योंकि “अगर सहन करने की हिम्मत रखती है एक औरत, तो तबाह करने का हौंसला भी रखती है ।“ अब नही तो कब? क्योंकि किसी ने बेटियों पर क्या खूब कहा है कि “बेटी हर औरत के दिल का अरमान, हर औरत में बसने वाला नाम। फ़िर क्यों लिंग -भेद में शामिल होकर, करती आ रही है सदियों से खुद अपना अपमान। कहती है सरकार यही, कम हुआ है लिंग-भेद का मान, पर उन बेटियों का कौन है जिनकी जा रही है जान। कभी मज़हब का घूंट पिलाकर, कभी दिखाकर अपनी शान, कर दे ते है अपनी बेटियों को मुरझाये फूलों के समान। रानी एक थी, एक थी वो रज़िया सुल्तान। बेटियां ही थी वो सारी, जिन्होंने भरी थी उड़ान। हम भी उन्हें याद करते है , दे ते है हर मुमकिन सम्मान। फ़िर क्यों इन दर्गा ु ओं को भूल जाते हैं , जब दे ते अपनी इस नन्हीं अंश का बलिदान। कर लो प्रण मन ही मन, दिल में लो अब ठान। मज़हब, धर्म, स्वार्थ के कारण, नहीं जाएगी अब इन फूलों जान। ये तो दे श की शान, सब में नारी की पूजा है , चाहे हो ‘रामायण’ या ‘कुरान’। “ -----X-----
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dyk;k=k मन का उद्गार
सभी सदस्य इस अनुभति ू से अवश्य ही गुजरे होंगे। मेरा उत्साह दे खकर, मेरे बच्चे मुझपर हं सते थे। मेरे उत्साह का कारण था कि मैं बचपन से ही दादाजी को मिथिलाक्षर में ही लिखते-पढ़ते दे खी थी। वे दर्गा ु सप्तशती का पाठ भी मिथिलाक्षर में ही पढ़ते थे। जब ससुराल आई, तो मेरे ससुर जी तो अपनी डायरी भी मिथिलाक्षर में ही लिखते थे। (वैसे यह एक संयोग है कि मेरे दादाजी और ससुर जी दोनों प्रिय मित्र थे। एक साथ ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। दादाजी वैद्याचार्य और ससुर जी व्याकरणाचार्य थे।) लेकिन इस बात की कभी भी चर्चा नहीं हुई कि हम लोगों को भी मिथिलाक्षर सीखना चाहिए। न मायका, न ससुराल में और न ही स्कूल कॉलेज में। वैसे अब मेरे पति के साथ हमारे परिवार से बहुत सारे लोग प्रवीण हुए हैं । कुछ माला झा सक्रियता से भी इस अभियान में जुड़े हुए हैं । इसके लिए RJ Host, BHARAT FM मैं अभियान के स्तंभ पंडित श्री अजय नाथ गुरु जी का आजीवन ऋणी रहूंगी। जिन्होंने अपनी मातृभाषा, अपनी मुंबई, महाराष्ट्र लिपि से परिचय करा कर हमें प्रवीण बनाया। आज हम दर्गा सप्तशती मिथिलाक्षर में लिख सकते हैं , पढ़ सकते ु मैं मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान से जुड़े अपना हैं । अपने आप पर गर्व महसूस करते हैं । हृदय से आभार अनुभव, अपनी खुशी आप लोगों से शेयर करना चाहती गुरुदे व। हूँ। मेरी कोशिश होगी, कि बहुत कम समय लेते हुए इसे आप लोगों तक पहुंचा सकंू । मैं जुलाई 2019 में 72 बैच जब मैं प्रवीण होकर सक्रियता से अभियान में जुड़ी, वहां से मिथिलाक्षर प्रवीण बनीं (अभी 176 बैच चल रहा है ) बहुत कुछ सीखने को मिला। अभी भी सीख ही रही हूं। और आज इस अभियान में संरक्षिका के पद पर कार्यरत यहां एक विशाल मिथिला परिवार से परिचय हुआ। बहुत हूं। मैंने ग्रेजए ु शन तो मिथिला यूनिवर्सिटी से ही किया। सारी सखी-सहे ली मिली। सच कहूं तो इससे जुड़ी हुई शादी के बाद पति ओएनजीसी में थे, तो कभी आसाम, खुशी, मन का उद्धार तो इतना है , कि उसे कुछ शब्दों कभी गुजरात...मैं मिथिला से कट ही गई। लेकिन हम में समेटना संभव नहीं है । लेकिन हम लोगों की स्त्री वर्ग लोग घर में मैथिली में बात करते हैं तो हमारे बच्चे भी की उत्कृ ष्ट वरिष्ठ संरक्षिका श्रीमती रुनू जी के लिए कुछ मैथिली बोल लेते हैं । मेरी बेटी 2012 से अमेरिका में है , शब्द कहे बिना तो यह खुशी, मन का उद्गार संपूर्ण ही अभी भी फोन पर सगे सम्बन्धियों से मैथिली में ही बात नहीं होगा। वह बहुत ही धैर्य और परिपक्वता के साथ करती है । महिला वर्ग का संचालन करती हैं । अंत 99 में हमारा ट्रांसफर मुंबई हुआ। यहां मिथिला, मैथिली से जुड़े हुए बहुत सारे कार्यक्रम होते रहते हैं , जैसे विद्यापति समारोह आदि। हम लोगों को भी आमंत्रित किया जाता था। वहां काफी मैथिल परिवार से मिलने का अवसर मिला। एक मुंबई सखी बहिना Whatsapp ग्रुप था, मैं उससे भी जुड़ गई। एक दिन ग्रूप में मैसेज आया, जो भी मिथिलाक्षर लिपि सीखना चाहते हैं , अपना नाम दे सकते हैं । मै बिना कोई सवाल किये उन्हें अपनी सहमति दे दी। अमेरिका में थी, दिन रात का फर्क था तो अलार्म सेट किया और जिस दिन पहला अभ्यास मिला, मैं छवि दे खकर घबरा गई। कैसे लिखूँगी, थोड़ा मुश्किल तो लगा था। लेकिन गुरु जी वीडियो में इतनी सरलता से सिखाते हैं कि सब कुछ आसान हो गया। एक दिन भी अब्सेंट किए बिना मैं अभ्यास भेजी थी। मेरी पहली खुशी! (उद्गार) जब मैं मिथिलाक्षर में अपना नाम लिखना सीखी थी। मुझे लगता है अभियान के
एक गुरु बनकर स्नेह से भरे कठोरता के साथ मार्गदर्शन भी करती हैं , साथ ही एक प्रिय सखी बनकर हम लोग उनसे अपने मन की बात भी कर सकते हैं । यही तो इस अभियान की विशेषता है । अनुशासित रहते हुए, एक परिवार जैसे यह विशाल मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान आगे बढ़ रहा है । दे श-विदे श में अपनी अस्तित्व को पुनः स्थापित कर रहा है । जिसमें मन की खुशी, मन का उद्गार तो अनंत है , अथाह है । अंत में समस्त मिथिला वासी को, एक संदेश दे ना चाहती हूं कि (इतनी सुगमता से घर बैठे हुए whatsapp पर, दे श विदे श से सब सीख रहे हैं ) जो कोई इस सुख से वंचित हैं , वे अपने परिवार के साथ जुड़ें, सीखें और एक प्रतिज्ञा करें कि अपनी मातृभाषा अपनी लिपि को एक-एक घर तक पहुंचाएंगे। संपर्ण ू मिथिला को मिथिलाक्षरमय बनाएंगे। -----X-----
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जुलाई 2021
dyk;k=k कंठ कोकिला - मैथिली ठाकुर कंठ कोकिला मैथिली ठाकुर गायकी की दनिया ु की सबसे छोटी फनकार हैं । मैथिली बिहार के मधुबनी जिले की रहने वाली एक सादगीपूर्ण वातावरण में जन्मी पली बढ़ी है । इतनी छोटी सी उम्र में माता पिता का अथक प्रयास एवं उनकी स्वर साधना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है । इनके गीतों की मिठास जनमानस पर अपनी उत्तम छाप छोड़ रही है । उनके स्वरों की मिठास को चाहने वाले असंख्य हैं और हो भी क्यों न सरल, चपल और सहज मैथिली जब लोगों से मिलती हैं तो वाकई में प्रफुल्लित हो जाता है । मैथिली के दो भाई भी है जो हर कार्यक्रम में उनके साठोतेय है ऋषभ ठाकुर व अयाची ठाकुर दोनो ही संगीत प्रवीण है और एक तबले पर तो दस ू रा हारमोनियम पर संगत दे ते है । उनके घर के इस पारिवारिक संगीतमय वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति होती है । मैथिली द्वारा गाये गए शास्त्रीय संगीत को 11 साल तक आकाशवाणी पर प्रसारित किया जाएगा। इतनी छोटी सी उम्र में मैथिली ने अपनी कठिन साधना से गरिमामय कीर्तिमान अर्जित किया है । मैथिली का जन्म 20 जुलाई 2000 में बिहार के बेनीपट्टी, मधुबनी में हुआ था। इनके पिता का नाम रमेश ठाकुर एवम माता का नाम पूजा ठाकुर है । मैथिली ने अपनी पढ़ाई बाल भवन इं टरनेशनल स्कूल से पूरी की व कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज से कर रही हैं । मैथिली को बचपन से ही संगीत में बहुत रुचि थी। महज 4 वर्ष की थीं तभी संगीत सीखना एवम गायन शुरू कर दिया था। संगीत शिक्षा की शुरुआत इनके दादा जी के मार्गदर्शन में हुई जो स्वयं एक संगीतकार थे। मैथिली को प्यार से सब तन्नू बुलाते है । मैथिली को पुर्या धनाश्री राग बहुत ही पसंद है । मैथिली ने पहली बार 2011 में लिटिल चैंप्स का ऑडिशन दिया लेकिन कामयाबी हाथ न आई फिर एक के बाद एक कई शोज में ऑडिशन दिए पर टॉप 20 तक आते आते रिजेक्ट हो जाती थीं लेकिन लगातार अपनी साधना को बल दे ती रही। इन्होंने 2015 में जीनियस यंग सिंगिंग स्टार का खिताब जीता था फिर इं डियन आइडल2 में भी टॉप 30 में अपनी जगह बनाई थी। अंत में मिथिला की बेटी मैथिली की संगीत साधना की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए निरन्तर अपनी कामयाबी की उचाईयों को छुए और दस ू रे बच्चों की प्रतिभा को निखारे ।
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रजनी किरण झा नई दिल्ली
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कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते है जो इस संसार पर अपनी छाप छोड़ जाते है लेकिन कुछ ऐसे होते है जो जीवन भर के लिये हम सभी को प्रेरित कर जाते है । ऐसा ही एक व्यक्तित्व है बिहार के पटना में जन्मे आनंद सर जो अपने इं स्टीट्यूट सुपर 30 को लेकर सुर्खियों में रहे है । आनंद सर एक साधारण व्यक्ति है जो असाधारण प्रतिभा के धनी है । हर साल तीस जोड़ी आँखों में वे न केवल एक खूबसूरत ख्वाब अंकुरित करते है बल्कि अपने प्रयासों से उसे वृक्ष बना दे ते है ।
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अच्छी चीजें अपनी जगह आप बना लेती है । बस ऐसे ही दनिया में अब इस इं स्टिट्यूट को पहचाना जाने ु लगा है मार्च 2009 में Discovery चैनल ने 1 घंटे का डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रसारण किया था। इस पर National Geographic Channel के द्वारा डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बन चुकी है ।
अमेरिकी समाचार “The New york Times ” करीब आधे पेज पर सिर्फ सुपर 30 के बारे में एक लेख लिखा था। इसके अलावा पूर्व मिस जापान और अभिनेत्री नोरिका आनंद सर के बारे में लिखने के लिये शायद शब्द फुजिवारा जब पटना आयी थी तो उन्होंने एक सुपर 30 कम पड़ जाये। सूपर 30 के बारे में आप सब जानते ही है । पर एक शार्ट फिल्म बनायीं थी। आज जब स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं रहे , एक स्टेटस सिंबल बन गये है । उच्चतर शिक्षा अब लक्जरी में आती है । ऐसे आनंद सर अब किसी परिचय के मोहताज नहीं है । में एक शिक्षक आता है , अपने उच्चतर उसूलों को लेकर उन जैसा जजब़् ा बहुत कम दे खने मिलता है । जब कभी और दे श की सबसे प्रतिष्ठित परिक्षा की तैयारी करवाता अच्छे इं सान की परिभाषा पूछी जायेगी, जवाब आनंद सर है उन होनहार गरीब बच्चों को, जो बड़े कोचिंग क्लासों होगा। वो प्रेरणास्रोत है बहुत सारे लोगों के। न जाने कितने का शुल्क भरने में असमर्थ है । आनंद सर इन छात्रो को ही लोगों का जीवन संवरा है आनंद सर के आँगन में। आई आई टी के लिये तैयार ही नहीं करते बल्कि उनके रहने, खाने पीने का खर्चा भी उठाते है । इस काम में उनका परिवार उनका सहयोग करता है । बच्चों का खाना उनके घर पर उनकी माँ बनाती है । सुपर थर्टी सपनों को सच में बदलता है । आनंद सर अपना एक अलग एजुकेशनल इं स्टिट्यूट भी चलाते हैं । उनके इं स्टिट्यूट का नाम Ramanuj School of Mathematics है , इसी की आमदनी से सुपर थर्टी का खर्चा चलाया जाता है ।
संगीता जाँगिड़ ठाणे, महाराष्ट्र
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dyk;k=k नालंदा
डॉली झा
इं दौर, मध्य प्रदे श प्राचीन भारत का गौरव, बिहार का मुकुटमणि एवम हमारी सभ्यता का शिखर था, नालंदा विश्वविद्यालय। अपनी तरह का अनोखा शिक्षण संस्थान:ध्यान, आध्यात्म का समावेश शिक्षण में कर व्यक्तिगत उत्कृ ष्टता, ज्ञान विज्ञान को जीवन से जोडकर सामुदायिक उत्तमता और दे श, धर्म सीमा से ऊपर उठकर वसुधैव कुटु ं बकम ् की अवधारणा लिए हुए था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यह उच्च शिक्षा का बौद्ध संस्थान, विश्व का पहला पूर्ण आवासीय विश्व विद्यालय था जहां दस हजार छात्र एवम दो हजार विद्वान आचार्य शोध अन्वेषण में जुटे रहते थे।
छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे। बारहवीं शताब्दी में अवध सेना में कार्यरत तुर्क सरदार बख्तियार खिलजी ने ज्ञान के इस केंद्र को नष्ट कर डाला। तीन माह तक जलता रहा पुस्तकालय जिनमें नौ मिलियन पांडुलिपियां थीं।
यूनेस्को द्वारा इसे विश्व की प्रसिद्ध धरोहर स्थल माना गया है । 427ईस्वी में गुप्त शासक कुमारगुप्त के संरक्षण में इस बौद्ध धर्म के महायान शिक्षण संस्थान का निर्माण हुआ जिसे हमेशा संरक्षण मिलता रहा सम्राट हर्षवर्धन, पाल एवम स्थानीय शासकों का भी। 780 वर्ष तक निरं तर, 1197ईस्वी तक शिक्षण कार्य चलता रहा यहां। दे श के कोने- कोने से ही नहीं, कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इं डोनेशिया, फारस, तुर्की आदि दे शों से
ह्वे नसांग अपने लेखों में मठवासी जीवन की पवित्रता का उत्कृ ष्ट वर्णन करते हैं । परिसर में आठ विशाल भवन, 300 कमरे जिनमें आख्यान होते थे, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष, अध्ययन कक्ष, विशाल पुस्तकालय, सुंदर बगीचे और मनोरम झील थीं जो शांत सुरम्य वातावरण बनाते थे जहां सहज ही मन अंतर्मुखी हो ज्ञान विज्ञान शोध की तरफ उन्मुख हो जाता था। व्यापक व्यवस्थित निकासी प्रणाली, यांत्रिकी विशेषज्ञता का परिचायक थीं।
नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर अपने स्थापत्य कला के लिए विख्यात था। विशाल दीवारों से घिरा और अति विशाल मुख्यद्वार मानों ज्ञान प्राप्ति को तत्पर जिज्ञासुओं के लिए बाहें फैलाए खड़ा रहता था। जलवायु के अनुकूल लाल पत्थरों से निर्माण कार्य उत्तर से पश्चिम की ओर किया गया था। पूर्व में मठों की कतार और पश्चिम में भारत में बिहार के पटना से लगभग 95 किलोमीटर भव्य स्तूप एवम मंदिर थे जिनमें भगवान बुद्ध की सुंदर दक्षिण पूर्व में स्थित है । नालंदा, बिहार प्रांत का एक जिला मूर्तियां थीं। मठ आवासीय संकुल थे जो एक से अधिक है जिसके शहर बिहार शरीफ के नजदीक प्रमुख पर्यटन मंजिल के थे। कक्ष में पत्थर की चौकी शयन के लिए, स्थल है । पर्यटक प्राचीन नालंदा विश्व विद्यालय के अवशेष, किताब दिये वस्त्र के लिए आले बने हुए थे। हर मठ के नवीन नालंदा महा विहार परिसर जो बारह किलोमीटर दरू आंगन में एक कुआं था। बगीचे से घिरा मठ छात्रों के लिए है , ह्वे नसांग मेमोरियल हाल दे खने आते हैं । बेहद अनुकूल था।
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जुलाई 2021 पुस्तकालय:धर्मगंज नाम से विख्यात तीन विशाल बहुमंजिली इमारतें रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरं जका थीं जिनमें नौ लाख से अधिक पुस्तकें जिज्ञासुओं के लिए संग्रहित थीं। रत्नोदधि नौ मंजिला ऊंची इमारत थी जिसमें अनमोल हस्त लिखित पुस्तकों का संग्रह था। कठिन प्रवेश परीक्षा के उपरांत दे श विदे श से आए छात्रों को, बौद्ध धर्म के महायान, हीनयान के अलावा वेद, तर्कशास्त्र, व्याकरण, दर्शन, चिकित्सा विज्ञान, सांख्य, गणित, धातु मूर्ति कला प्रशिक्षण एवम खगोल शास्त्र का अध्ययन कराया जाता था। शिक्षण:मौखिक आख्यान, पुस्तक व्याख्या, शास्त्रार्थ एवम शंका समाधान सत्र चलते रहते थे।
dyk;k=k 1951 में बिहार सरकार एवम भारत सरकार के सहयोग से राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी के संरक्षण में नवीन नालंदा महाविहार की प्रस्तावना को 2006 में विश्वविद्यालय की मान्यता मिली। अब्दुल कलाम जी का उल्लेखनीय योगदान रहा। 455 एकड़ भूमि का अधिग्रहण एवम 2727 करोड़ के आवंटन के साथ पुनः उठ खड़ा हुआ यह संस्थान, चीन, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड आदि अठारह दे शों से सहयोग प्राप्त कर रहा है । उद्दे श्य है कि भविष्य में उद्यमियों, वैचारिक नेततृ ्वकर्ता, शोध कर्ता, ज्ञान विज्ञान, कृषि, शिल्प आदि स्थानीय विकास के साथ नालंदा विश्वविद्यालय की मूल अवधारणा वैश्विक रूप से सबको साथ लेकर विकास के शिखर पर चलते जाना।
आचार्यों की तीन श्रेणियां थीं। विख्यात आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति, स्थिरमति का आइए भारत को ज्ञान मार्ग द्वारा विश्व से जोड़ने वाले नाम उल्लेखनीय है । कुलपति जिन्होंने महत्वपूर्ण योगदान इस सेतु को हम ख्याति दें , गौरव दें , सहयोग दें । दिया:ज्ञानचंद्र, प्रभामित्र, नागार्जुन, शीलभद्र एवम आर्यभट का नाम विशेष रूप से लिया जाता है । पुनरुत्थान:ज्ञान -----X----अपने उत्कर्ष की राह ढू ं ढ ही लेता है ।
अशोक स्तंभ क्या है अशोक चिन्ह भारत का राजकीय प्रतीक है । यह सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया। अशोक स्तंभ एक बौद्ध मठ के निकट वैशाली और रामकुन्ड नामक एक राज्याभिषेक टैं क के सबसे लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है । सम्राट अशोक जो चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और मौर्य काल के तीसरे सम्राट ने स्तंभ के चारो ओर सिंह गर्जना करते हुए सिंहों को बनवाया, जिसका अभिप्राय है -- दहाड़ते हुये ये शेर धर्म चक्र परिवर्तन के समान दृष्टिमान है । “सत्यमेव जयते” भारत के राष्ट्रीय प्रतीक में चिन्हित है , और यह मूल रूप से “मूण्डकोपनिषद” से लिया गया। भारत का राष्ट्रीय चिन्ह या प्रतीक जो अशोक के सारनाथ स्तंभ से लिया गया है । इसे 26 जनवरी 1950 को अपनाया गया था। इसका प्रारूप सारनाथ में बने चक्र से लिया गया है । जिसमें व्यास सफेद पट्टी की चौड़ाई के लगभग बराबर है । इसमें 24 तीलिया है । भारत संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था।
भावना मिश्रा नई दिल्ली
अन्य स्तंभो से अलग है , और यह एक सिंह वाला स्तंभ है । इसमें सिंह का मुँह उत्तर दिशा हैं । स्तंभ के उत्तर में बौद्ध स्तूप भी है । भगवान बुद्ध ने अपनी यात्रा उत्तर दिशा में किया, इसलिए सिंह के मुँह उत्तर दिशा में है और भगवान ् बुद्ध को प्रथम बोधित्व यही पर प्राप्त हुई थी।
अशोक स्तंभ एक बौद्ध मठ के निकट वैशाली और रामकुन्ड नामक एक राज्याभिषेक टैं क के सबसे लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है । विश्व का प्रथम गणराज्य वैशाली था। महान ् सम्राट अशोक ने #अशोक_स्तंभ का निर्माण करवाया था। कहा भगवान ् महावीर का जन्म वैशाली गणतंत्र राज्य क्षत्रिय जाता है कि कलिंग विजय के बाद बौद्ध धर्म के अनुयायी बन कुण्डलपुर में हुआ था। इस कारण भी इस स्थान का महत्व है । गए थे और उन्होंने वैशाली में #अशोक_स्तंभ बनवाया था। भगवान ् महावीर के जन्म दिन पर यहाँ दीपोत्सव मनाया जाता है । चूँकि भगवान ् बुद्ध ने वैशाली में अपना अंतिम उपदे श दिया था, उसी की याद में यह स्तंभ बनवाया गया था। यह -----X----Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k तक्षशिला
डॉ असद अहमद
लखनऊ, उत्तर प्रदे श इतिहास: तक्षशिला आधुनिक ‘तक्षिता’ का प्राचीन नाम है । तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार की राजधानी और एशिया में शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय को दनिया का सबसे पहला विश्वविद्यालय ु माना जाता है । ये तक्षशिला शहर में था, जो प्राचीन भारत में गांधार जनपद की राजधानी और एशिया में शिक्षा का प्रमुख केंद्र था यह माना जाता है । यह विश्वविद्यालय लगभग 1000 ईसा पूर्व में तैयार हुआ था। इसके बाद से यहां भारत समेत एशिया भर से विद्वान पढ़ने के लिए आने लगे। इनमें चीन, सीरिया, ग्रीस और बेबीलोनिया भी शामिल हैं । वर्तमान में तक्षशिला भौगोलिक रूप से पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में इस्लामाबाद एवं रावलपिंडी से उत्तर-पश्चिम में 32 किमी. पर तीन महान मार्गों के संगम पर स्थित है ।
विख्यात विद्यापीठ था और तक्षशिला नगरी विद्या और शिक्षा के महान केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध थी। यही पर तक्षशिला विश्वविद्यालय था। यह विश्व के प्राचीन विश्वविद्यालयों में से एक है । बौद्धयुग में तो वह विद्या का सर्वमुख्य क्षेत्र थी। यह हिन्दू एवं बौद्ध, दोनों के लिए अत्यंत महत्त्व का केंद्र था। बनारस, मिथिला, उज्जैन जैसे दरू -दराज क्षेत्रों के विद्यार्थी भी विश्वप्रसिद्ध गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आते थे। रामायण के अनुसार इस स्थान की स्थापना राम के छोटे भाई भरत ने किया था. उनके दोनों बेटों क्रमशः तक्ष एवं पुष्कला के लिए तक्षशिला और पुष्कलावती की स्थापना की गयी।
शिक्षा का केंद्र: भारत के ज्ञात इतिहास का यह सर्वप्राचीन विश्वविद्यालय था। यहां प्रसेनजित, बन्धुलमल्ल, महाली, जीवक, कौमारभृत्य तथा चाणक्य एवं वसुबन्धु 1. उत्तरापथ: वर्तमान ग्रैण्ड ट्रंक रोड जो गांधार को मगध इसी प्रसिद्द विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे. इस विश्वविद्यालय से जोड़ता है ; की एक विशेषता यह थी कि यहाँ राजघराने के विद्यार्थियों 2. उत्तर पश्चिमी मार्ग: जो कापिश और पुष्कलावती आदि के सामान ही गरीब परिवारों के विद्यार्थियों से भी व्यवहार से होकर जाता था. एवं; किया जाता था। तक्षशिला राजनीति और शस्त्रविद्या की 3. सिन्धु नदी मार्ग: श्रीनगर हरिपुर घाटी से होते हुए उत्तर शिक्षा का अन्यतम केन्द्र थी। वहाँ के एक शस्त्रविद्यालय में मानसेरा रे शम मार्ग और दक्षिण में हिन्द महासागर में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार पढ़ते थे। तक्षशिला तक जाता था। में धनुर्द वे , आयुर्द वे और विधिशास्त्र, वैद्यक तथा अन्य विद्याओं की उच्च शिक्षा दी जाती थी और इसके लिए वहां भारतीय इतिहास में तक्षशिला प्राचीन समय का विशेष विद्यालय थे। वहाँ से प्राप्त आयुर्द वे सम्बन्धी जीवक के अपार ज्ञान और कौशल का विवरण विनयपिटक से
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dyk;k=k
मिलता है । चाणक्य वहीं के स्नातक और अध्यापक थे और उनके शिष्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसने अपने गुरु के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। तक्षशिला में प्रायउच्चस्तरीय विद्याएँ ही पढ़ाई जाती थीं और दरू -दरू से आने वाले बालक निश्चय ही किशोरावस्था के होते थे जो प्रारं भिक शिक्षा पहले ही प्राप्त कर चुके होते थे। वहाँ के पाठयक्रम में आयुर्द वे , धनुर्द वे , के अतिरिक्त हस्तिविद्या, त्रयी, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष, गणना, संख्यानक, वाणिज्य, सर्पविद्या, तन्त्रशास्त्र, संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि का मुख्य स्थान था। ज्योतिष विज्ञान यहां काफी बड़ा विषय था. माना जाता है कि यहां पर लगभग 64 विषय पढ़ाए जाते हैं ।
उनके मुताबिक अरब आक्रांताओं ज्ञान के इस शहर को पूरी तरह से खत्म कर दिया ताकि इससे विद्वान न निकल सकें। छठवीं सदी में यहां पर अरब और तुर्क के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू किए और बड़ी संख्या में तबाही मची। आज भी यहां पर तोड़ी हुई मूर्तियों और तक्षशिला में आने वाले विद्यार्थी अपनी प्रारं भिक बौद्ध प्रतिमाओं के अवशेष मिलते हैं । शिक्षा घर से एवं माध्यमिक शिक्षा आश्रम से प्राप्त करके किसी विशेष विषय में ज्ञान प्राप्ति के लिए तक्षशिला आते पुनः खोज पहली बार साल 1863 में जमीन के थे. इस विश्व विद्यालय में किसी प्रकार का बाह्य हस्तक्षेप नीचे दबे इस महान विश्वविद्यालय के अवशेष मिले. 1863 नहीं होता था। शिक्षक अपने घर पर ही अपनी पसंद से ई. में जनरल कनिंघम ने तक्षशिला को यहां के खंडहरों विद्यार्थियों को पढाते थे. उनको पढ़ाने के लिए किसी विशेष की जांच करके खोज निकाला। इसके बाद 1912 से 1929 प्रकार के सिलेबस की आवश्यकता नहीं होती थी. कक्षाओं तक सर जॉन मार्शल ने इस स्थान पर खुदाई की और के लिए कोई समय निर्धारित नहीं था, शिक्षक को जब प्रचुर तथा मूल्यवान सामग्री को खोजकर इस नगरी की लगता था कि विद्यार्थी ने आवश्यक ज्ञान अर्जन कर लिया वैभवता को प्रकट किया। ये पूरी तरह से विकसित शहर है तब कक्षाएं समाप्त की जाती थी। था, जहां पक्के मकान, पानी के निकासी की व्यवस्था, बाजार और मठ, मंदिर थे। ये व्यापार का भी बड़ा केंद्र था किसी एक विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करने में और मसालों, मोतियों, चंदन, रे शम जैसी चीजों का व्यापार लगभग 8 वर्ष का समय लगता था. विद्यार्थी जब तक एक हुआ करता। अध्याय / इकाई में विशेषज्ञता प्राप्त न कर लें तब तक उनको आगे बढ़ने के लिए अनुमति नहीं मिलती थी। गुरु इसका पता 1863 में लगा, जब पुरातात्विक खुदाई दक्षिणा के रूप में आदर एवं सम्मान ही पर्याप्त था। ऐसा के दौरान जनरल कनिंघम को यहां के अवशेष मिले. इससे भी पता चला है कि शुल्क दे ने वाले विद्यार्थियों जैसे राज शहर के अलग-अलग पहलू खुलते गए। बता दें 5वीं ईस्वीं घराने के राजकुमार, इत्यादि को दिन में पढ़ाया जाता था में चीन से बौद्ध भिक्षु फाहियान यहां आए थे और उन्होंने जबकि शुल्क न दे पाने वाले छात्रों को रात में शिक्षा दी शहर के साथ विश्वविद्यालय को अपने पूरे वैभव में दे खा। जाती थी। कोई भी शिक्षक किसी भी विद्यार्थी को पढ़ाने से हालांकि 7वीं ईस्वीं में चीन के एक अन्य भिक्षु श्यानजांग मना नहीं कर सकता था। को शहर में वीरानी और मलबा ही दिखा. इस बीच क्या हुआ, इसके बारे में कई बातें प्रचलित हैं । पतन : एक के बाद एक कई आक्रांताओं ने इस शहर को पूरी तरह से खत्म कर दिया. कुछ इतिहासकारों विश्व धरोहर: यूनेस्को ने साल 1980 में तक्षशिला का कहना है कि मध्य-एशियाई खानाबदोश जनजातियों ने को विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया। यूनेस्को द्वारा यहां आक्रमण करके शहर को खत्म कर डाला। इस कड़ी 2010 में जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि तक्षशिला विश्व में शक और हूण का जिक्र आता है । हालांकि बहुत से की 12 ऐसी साइट्स में से एक है जो अपूर्णनीय क्षति की इतिहासकार कुछ और ही बताते हैं । उनके मुताबिक शक तरफ जा रही है । और हूण ने भारत पर आक्रमण को किया था लेकिन उसे लूटा था, नष्ट नहीं किया था। -----X----Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k बिहार का परिचय
शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहार हमेशा से अग्रणी रहा है । गुप्त काल के दौरान बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय अपनी शिक्षा के लिए विश्वविख्यात था। दे श विदे श से कई छात्र यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे। बाद में मुस्लिम शासकों के आक्रमणों ने नालंदा विश्वविद्यालय को तहसनहस कर दिया। आज भी इसके खण्डहर बिहार में मौजूद है , जो एक दर्शनीय स्थल है । भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म भी बिहार में ही हुआ और छात्र नेता जयप्रकाश नारायण को कौन नहीं जानता। बिहार के लोगों का शिक्षा की तरफ विशेष झुकाव है । खासकर आई.ए.एस. और आई.आई.टी. की तरफ। व्यापार करने को वहाँ प्रधानता नहीं दी जाती है ।
नमिता सिंह "आराधना" अहमदाबाद, गुजरात
आज बिहार एक पिछड़े राज्य के रूप में जाना जाता है । लेकिन अगर हम बिहार के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गौरवगाथा को दे खें तो यह भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे समृद्ध रहा है । बिहार का प्राचीन नाम मगध था। यहाँ चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, शेरशाह सूरी जैसे महान शासकों का शासन रहा। भारत के राष्ट्रीय निशान अशोक स्तंभ और राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र सम्राट अशोक की ही दे न है । अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य (चाणक्य) का जीवन भी बिहार की धरती पर ही व्यतीत हुआ। भगवान बुद्ध की कर्मभूमि रहे बिहार में ही सबसे पहले गणराज्य के बीज बोए गए जो बाद में आधुनिक लोकतंत्र के रूप में फलीभूत हुए। बिहार के बोधगया में ही भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। जैनों के चौबिसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म भी बिहार के वैशाली में हुआ और बिहार के ही पावापुरी में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म भी बिहार की राजधानी पटना में ही हुआ था। यहाँ पर एक भव्य गुरुद्वारा है , जिसे पटना साहिब के नाम से जाना जाता है , जो सिखों के पाँच पवित्र तख्तों में से एक है ।
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खानपान - लिट्टी चोखा बिहार का पारं परिक भोजन है जिसे वैश्विक पहचान मिली हुई है । इसके अलावा वहाँ की कढ़ी पकौड़ी, सत्तू का पराठा, अनरसा, पेड़किया, खाजा बालूशाही, लौंग -लता, मनेर के लड्डू , परवल की मिठाई, खुबी का लाई, तिलकुट, ठे कुआ, मालपुआ, चावल का पीठा इत्यादि प्रसिद्ध एवं स्वादिष्ट पकवान हैं । सत्तू का शरबत वहाँ खूब पिया जाता है । यह गर्मी के दिनों में तरावट दे ता है और लू से बचाता है । पर्व त्यौहार - बिहार का सबसे बड़ा त्यौहार छठ है । यह महापर्व के रूप में मनाया जाता है । चार दिनों का यह त्योहार आस्था का पर्व है । इसमें बहुत ही कड़े नियम और शुद्धता का पालन किया जाता है । छठ का प्रसाद बनाने से पूर्व स्त्रियों का स्नान करना अति आवश्यक है । इसमें सूर्य भगवान को अर्ध्य दिया जाता है । इसके अलावा पति की लंबी उम्र के लिए तीज और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जितिया का व्रत भी रखा जाता है । होली, दिवाली, दर्गा पूजा, रक्षाबंधन इत्यादि भी बड़े उत्साह के साथ ु मनाया जाता है । मधुबनी चित्रकारी - पहले यह कला ग्रामीण अंचल तक ही सीमित था। इसे रं गोली के रूप में बनाया जाता था। लेकिन धीरे -धीरे यह कपड़ों, दीवारों और कागज पर उतर आई है और इसे वैश्विक पहचान भी मिलने लगी है । मधुबनी रे लवे स्टेशन की दीवारों को कलाकारों ने निःशुल्क मधुबनी पेंटिं ग की कलाकृतियों से सजाया है , जिसे विदे शी पर्यटकों एवं सैलानियों द्वारा बहुत पसंद किया जा रहा है । इस चित्रकारी में हिं द ू दे वी -दे वता, सूर्य, चंद्रमा, मोर, मछली, धार्मिक पौधे जैसे तुलसी इत्यादि को विशेष रूप से चित्रित किया जाता है । रं गों के लिए भी प्राकृतिक रं गों का ही उपयोग किया जाता है । घर की सजावट के लिए लोग मधुबनी पेंटिं ग दीवारों पर लगाते हैं । इसके
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जुलाई 2021 अलावा आजकल साड़ियों, सलवार सूट और दप ु ट्टों पर भी मधुबनी पेंटिं ग खासा पसंद किया जा रहा है । पर्यटन - जब भी पर्यटन की बात आती है तो किसी का भी ध्यान बिहार की तरफ नहीं जाता है । लेकिन बिहार में पर्यटन की दृष्टि से बहुत से ऐसे स्थल हैं जहाँ जाकर किसी को निराशा नहीं होगी। विष्णुपद मंदिर - विष्णुपद मंदिर बिहार के महत्वपूर्ण हिं द ू तीर्थ स्थानों में से एक है । दं तकथाओं के अनुसार गयासुर नामक दै त्य का वध करते समय भगवान विष्णु के पदचिन्ह यहाँ पड़े थे, जिन्हें आज भी विष्णुपद मंदिर में दे खा जा सकता हैं । गया पिंड दान के लिए भी प्रसिद्ध है । दरू -दरू से लोग फल्गु नदी के तट पर अपने पितरों का पिंडदान करने यहाँ आते हैं । मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से उनके पितरों को वैकुंठ प्राप्त होता है । बोधगया - बौद्ध धर्म के लोगों का यह सबसे प्रमुख दार्शनिक स्थल है । यहाँ पीपल का एक वृक्ष है जिसके बारे में कहा जाता है कि उस वृक्ष के ही नीचे बैठकर भगवान बुद्ध ने तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यहाँ बौद्ध लोगों का एक विशाल मंदिर है जिसे महाबोधि मंदिर कहते हैं । जिसके दर्शन के लिए हर वर्ष दे श विदे श से काफी तादाद में लोग यहाँ आते हैं । महाबोधि मंदिर के अलावा यहाँ तिब्बती मंदिर, साईं मंदिर, जापानी मंदिर, वर्मा का मंदिर इत्यादि भी हैं । राजगीर - जापान सरकार द्वारा निर्मित ‘विश्व शांति स्तूप’ नामक बौद्ध मंदिर राजगीर में ही है । यह छोटे पहाड़ पर स्थित है , जहाँ रोपवे के जरिए जाया जाता है । इसके अलावा यहाँ वेणुवन, सप्तपर्णी गुफा, गृद्धकूट पर्वत, जरासंध का अखाड़ा, गर्म पानी के कंु ड एवं गर्म पानी के झरने हैं । जहाँ लोग काफी संख्या में स्नान करने आते हैं । मान्यता है कि इस पानी से स्नान करने से सभी प्रकार के चर्म रोग दरू हो जाते हैं । पावापुरी - यह जैनियों का तीर्थ स्थल है । कहा जाता है कि भगवान महावीर ने पावापुरी में ही निर्वाण प्राप्त किया था। यहाँ का जल मंदिर दर्शनीय स्थल है ।
dyk;k=k नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष - नालंदा विश्वविद्यालय विश्व का सबसे प्राचीनतम और सबसे बड़ा अध्ययन केंद्र था। इसकी स्थापना पाँचवी शताब्दी में हुई थी। दे श-विदे श से लोग यहाँ अध्ययन करने आते थे। यह आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय था। यहाँ दनिया भर के दस हजार विद्यार्थी अध्ययन करते थे। ु सातवीं सदी में ह्येनसांग भी यहाँ अध्ययन के लिए आया था। विश्वविद्यालय के अवशेष के अलावा यहाँ पुरातत्वीय संग्रहालय, नव नालंदा महाविहार तथा ह्येनसांग मेमोरियल हॉल दे खे जा सकते हैं । संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है । दे वार्क सूर्य मंदिर - यह मंदिर बिहार के औरं गाबाद जिले में दे व नामक स्थान पर स्थित है । अन्य सूर्य मंदिरों की भाँति यह पूर्वाभिमुख ना होकर पश्चिमाभिमुख है । यह भारत के तीन प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक है । भागलपुर - यह टसर सिल्क उद्योग केंद्र है । यहाँ के टसर की साड़ियाँ, सलवार सूट, दप ु ट्टा अपनी अच्छी पहचान बना चुके हैं । इसके अलावा भागलपुरी चादरें भी काफी प्रसिद्ध हैं । आजकल यहाँ टसर के अलावा घाँची सिल्क की साड़ियाँ, सलवार- सूट, दप ु ट्टे भी काफी प्रसिद्ध हैं । इनके अलावा वैशाली का अशोक स्तंभ, सीतामढ़ी में जानकी मंदिर एवं जानकी कंु ड, सासाराम में शेरशाह का अष्टकोणीय मकबरा, चंपारण में दनिया का सबसे बड़ा ु बौद्ध स्तूप, पटना का हनुमान मंदिर भी आदर्श पर्यटन स्थल हैं । अगर हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दे खें तो बिहार हर दृष्टिकोण से समृद्ध एवं उन्नत राज्य था। लेकिन राजनीतिक दाँवपेच का शिकार होकर आज इसकी स्थिति दयनीय हो गई है । लेकिन वहाँ जाकर किसी भी पर्यटक को यह जरूर महसूस होगा कि बिहार के लोगों में अतिथि दे वो भवः की भावना कूट-कूट कर भरी है । -----X-----
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dyk;k=k बिहार का साहित्य, कला, संगीत
बिहार की मुख्य कला मधुबनी है । ये ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाई जाती है । मधुबनी मिथिला पेंटिं ग के नाम से सम्पूर्ण विश्व में जानी जाती है । इस कला का जन्म जब सीता जी का स्वयंवर रचा जा रहा था, उस समय राजा जनक ने नागरिकों से कहा कि मिथिला को सजाओ तो नागरिको ने इस पेटिं ग से सजाया भारती दलाल मुख्य कलाकार रहे हैं । इस कला में मुख्यत रामायण से सम्बंधित चित्र और इसके चित्र चमकीले रं गो से बनाये जाते हैं । ये प्राकृतिक रं गो से दीवार, फर्श और कैनवास पर उकेरी जाती। मधुबनी कला से ही मधुबनी शहर बसा मधुबनी शहर बिहार के दरभंगा शहर से 26 किलोमीटर दरू स्थित है । मधुबनी का अर्थ मधु+बानी अर्थात मीठी वाणी। मधुबनी स्टेशन भी इसी चित्रकला से सजा हुआ है । नेपाल बॉर्डर पर लौकाहा और नेपाल में स्थित थाडी में मधुबनी कला से सम्बंधित व्यापारिक सम्बन्ध हैं ।
निधि माथुर
बिहार का संगीत :
बिहार की संस्कृ ति में भिन्न-भिन्न नृत्य शैलियां हैं । बिदे सिया नृत्य - यह नृत्य नाट्य शैली में प्रस्तुत किया जाता है । लोक रं गमंच से उत्पन्न हुआ और बिहार भारतवर्ष साहित्य, कला, संगीत के परिपेक्ष्य में के भोजपुरी भाषा क्षेत्र में प्रचलित है । इसमें विरोधाभासी अत्यंत समृद्ध दे श रहा है । हमारे दे श में हर राज्य की विषयों को लिया जाता है । महिलाओं के भाग को पुरुष अपनी विशेषता है । आज हम बिहार के बारे में बात करते ही महिलाओं की साज-सज्जा करके प्रस्तुत करते हैं । जाट जतिन नृत्य : कोसी और मिथिला क्षेत्र में जाट जातिन हैं । नृत्य उत्तर बिहार का सबसे लोकप्रिय नृत्य है । जिसे युगल बिहार भारत के पूर्व भाग में स्थित राज्य है । बौद्ध नृत्य के रूप में सामाजिक विषयों के साथ प्रस्तुत किया धर्म के अनुयायी इस राज्य में विहार करते थे इसलिए जाता है । इसका नाम बिहार पड़ा। बिहार शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी जुमरी डांस: ये नृत्य स्थानीय परम्परा और संस्कृ ति रहा है । प्रसिद्द नालंदा विश्वविद्यालय यही स्थित है । बिहार अत्यंत समृद्ध था परन्तु विदे शियों के आक्रमण एवं से जुड़े हुए हैं । ये नृत्य गुजरात के गरबा के समान है । घटिया राजनीति के कारण आज बिहार शिक्षा एवं समृद्धि झिझिया नृत्य: फसल कटाई के मौसम में पुरुष में पिछड़ रहा है । और स्त्री मिलकर हारमोनियम, ढोलक, बांसरु ी के साथ बिहार की तपोभूमि में अनेक विद्वान कवि, लेखक नृत्य करते हैं । कजरी नृत्य: कजरी नृत्य में सुकून और एवं जानेमाने साहित्यकार हुए हैं । दे वकीनंदन खत्री, राहुल ताजगी वर्णित हुये नृत्य बारिश के मौसम में शुरूआत में सांकृत्यायन, शरतचंद्र चटोपाध्याय, उपमन्यु चटर्जी ये किया जाता है । सभी बिहार के जाने-माने हिन्दी के लेखक हुए हैं । पाइका नृत्य : पाइका नृत्य प्रदर्शन का मूल उद्दे श्य सै न ्य दल का साहसिक और शारिरिक गतिविधियों का बिहार के रज़ा नकवी वाही उर्दू के कवि जिन्हें विकास था। ये नृत्य ढाल और तलवार के साथ किया गालिब पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जाता है । विद्या पति ठाकुर, उषाकिरन खान प्रसिद्ध मैथिली ऋतुराज फगुआ, चैता, कजरी, हिं डोला, चतुर्मास, लेखक हैं । भिखारी ठाकुर, रामेश्वरम सिंह कश्यप भोजपुरी कवि और लेखक हुए हैं । इस पावन भूमि पर सम्राट बारहमासा, आदि गीत परम्परा में गाये जाते हैं । कहरवा जरासंध, अजातशत्रु, अशोक, बिमबिसार राजाओं का जन्म और दादरा ताल की लय की ठु मरी शैली में कजरी को हुआ। भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी का जन्म गाया जाता है । कजरी का ही एक रूप मिथिला में मल्हार नाम से प्रसिद्ध है । भी बिहार में हुआ। बिहार राज्य की कला
जयपुर, राजस्थान
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जुलाई 2021 स्वतंत्रता सेनानी डा. अनुग्रह नारायण सिंह भारतीय राजनेता, बिहार के प्रथम उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री थे जो , भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक एवं राजनीतिज्ञ रहे । जिन्होंने महात्मा गाँधी तथा डा. राजेंद्र प्रसाद के साथ मिलकर चम्पारण सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी! जो थे आधुनिक बिहार के निर्माताओं में एक ,अपनी इन्हीं लोकप्रियता के कारण उन्हें बिहार विभूति के रूप में जाना जाता था । उनकी सौम्य, शीतल, परोपकारी, अहं कारहीन शख्सियत ही उन्हें महान बनाती है । इनका जन्म औरं गाबाद जिले के पोईअवा नामक गांव में हुआ ।
dyk;k=k प्रचार कराया। पूसा का कृषि अनुसंधान फार्म उनकी ही दे न है । मृत्यु तक बिहार के उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री रहे । बिहार-विभूति को शत शत नमन। ऐसे तो कितने है स्वतंत्रता सेनानी बिहार के लेकिन कुछ बहुत ही प्रसिद्ध व्यक्तित्व है जो हमेशा इतिहास में अमर रहें गे उन्ही में से यह एक हैं ।
जिनके पिता का नाम ठाकुर विशेश्वर दयाल सिंह जी था। ये अपने इलाके के एक वीर पुरुष थे। कॉलेज के तुरंत बाद आजादी की लड़ाई लडी़। जब शिक्षित व्यक्तियों के हृदय में परतंत्रता की वेदना का अनुभव होने लगा था। डा. अनुग्रह नारायण सिंह डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह गुलामी की जंजीर में जक़डी हुई मानवता का चित्कार अब उन्हें सुनायी पड़ने लगा था। वे उस जंजीर को तोड़ फैंकने के लिए व्याकुल होने लगे थे, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह तथा योगिराज अरविंद ऐसे महान आत्माओं से मुलाकात होने लगी थी उनकी । उनका हृदय भी भारतमाता की सेवा इनकी ही जीवन के कुछ पल एक रचना द्वारा प्रस्तुत है के लिए तड़प उठा और वे उस पावन मार्ग पर अग्रसर हो गये। नाम जिनका राजेंद्र प्रसाद सिंह ‘बिहारी छात्र सम्मेलन’ नामक संस्था संगठित की गई, जिसमें दे शरत्न राजेन्द्र बाबू ऐसे मेधावी छात्रों के साथ कार्य करने तथा नेततृ ्व करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध चम्पारण से अपना सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था। बिहार-विभूति का भारत की आजादी में सहभागिता रही थी। अनुग्रह बाबू आधुनिक बिहार के निर्माता थे। वे दे श के उन गिने-चुने सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में से थे जिन्होंने अपने छात्र जीवन से लेकर अंतिम दिनों तक राष्ट्र और समाज की सेवा की। उन्होंने आधुनिक बिहार के निर्माण के लिए जो कार्य किया, उसके कारण लोग उन्हें प्यार से बिहार विभूति के नाम से पुकारते हैं । बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री बाबू साहब बिहार प्रान्त के वित्त मंत्री बने। श्रम विभाग में अपनी न्याय प्रियता लोकतांत्रिक विचारधारा एवं श्रमिकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का जो परिचय दिया वह सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय है । श्रम मंत्री के रूप में अनुग्रह बाबू ने ‘बिहार केन्द्रीय श्रम परामर्श समिति’ के माध्यम से श्रम प्रशासन तथा श्रमिक समस्याओं के समाधान के लिए जो नियम एवं प्रावधान बनाये वे आज पूरे दे श के लिये मापदं ड के रूप में काम करते हैं । तृतीय मंत्रिमंडल में उन्हें खाद, बीज, मिट्टी, मवेशी में सुधार लाने के लिए शोध कार्य करवाए और पहली बार जापानी ढं ग से धान उपजाने की पद्धति का
जन्म भूमि है इनकी बिहार छोटे से गांव जीरादे ई के वासी थे धोती-कुर्ता और सर पर टोपी पहनकर राजेंद्र बाबू जो कहलाये थे वकालत छोड़ी जिसने स्वदे शी आन्दोलन में भाग लेने के लिए जो बने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प्रथम राष्ट्रपति दे श के बने जो भारत रत्न अपने नाम किया जिन्होंने उनके जन्म दिवस के रूप में अधिवक्ता , दिवस मान्य दे शवासियो ने एक महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ दे श के अच्छे संचालक भी रहे , सादा जीवन में उच्च विचार के अपने सिद्धांत का निर्वाह उन्होंने जीवन पर्यन्त किया. अनुवादक बन कर खूब नाम कमाया जिन्होंने दे श ही नहीं विदे श में भी उनकी कवितायों का प्रकाशन हुआ..
पिंकी मिश्रा
शेवहार, बिहार
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dyk;k=k दरभंगा राज
का किला भी कहा जाता है ।
ममता झा
डालटे नगंज, झारखंड
दरभंगा की पुरानी बस स्टैं ड के समीप स्थित “दरभंगा राज का किला है ।इतना भव्य और सुंदर है कि सड़क से गुजरने वालों का ध्यान बरबस खींच लेता है । महाराज का किला आकर्षक इमारतों में एक है । पोखर,संस्कृ त विश्वविद्यालय मंदिर इमारत की शोभा बढा रही है । इसका इतिहास कुछ ऐसा है कि खण्डवा राजवंश भारत में कई ब्राह्मण राजवंश में एक था। 1960 तक मुगल सम्राट अकबर ने मिथिला क्षेत्र पर शासन किया था।दरभंगा महाराज 16वीं सदी में दरभंगा शहर की स्थापना की। प्राचीन संस्कृ तियों को लेकर आज “दरभंगा राज “का नाम महत्वपूर्ण स्थान पर है ।श्री महे श ठाकुर शासन संस्थापक थें।उनकी विद्वता की चर्चा सम्पूर्ण भारत में उत्कृ ष्ट स्तर पर फैली हुई थी। दरभंगा राज लगभग 8380 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है ।लाल किले से मिलता-जुलता है दरभंगा राज का किला।बहुत कम लोगों को पता है कि दरभंगा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह संविधान सभा के सदस्य के रूप में भी कार्यरत थें। दरभंगा राज के अंदर रामबाग पैलेस स्थित होने के कारण इसे रामबाग
प्रकृति बड़ी महान प्रकृति दे ती जाती है ।
हमें बहुत कुछ सीखाती है । अपने स्वार्थ के लिए मत करना, प्रकृति का अपमान। प्रकृति बड़ी महान।
एक पल सोचो जरा, जो वृक्ष न रहें गे।
जीवन दे ते ये हमको, फिर हम क्या करें गे। वृक्ष लगाकर पृथ्वी को हरा बनाओ,
किला के परिसर में एक भव्य और आकर्षक मंदिर है । ऐसा माना जाता है कि श्मशान में चिता के उपर स्थित है श्यामा काली मंदिर। ये मंदिर महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बनाया गया है । मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह ने की थी।माता की प्रतिमा के दाई ओर गणपति एवं बटु क भैरव दे व की मंदिर है । किले की दीवारों का निर्माण लाल ईंटों से हुई है ।ऐसा अनुमान है कि इसकी दीवार एक किलोमीटर लंबी है ।किले के मुख्य द्वार पर सिंह द्वार है । ऐसा किला राज परिवार की सुरक्षा के लिए बना था।दीवार के उपरी भाग में वाच टावर और गार्ड हाउस बनाया गया था। महाराज महे श ठाकुर के द्वारा स्थापित एक कंकाली मंदिर भी इसी किले के अंदर है । ये सब संरक्षण के अभाव में क्षतिग्रस्त हो ढह रही है । इसकी चारदीवारों पर ढे र सारे विज्ञापन बदरं ग बना रहे हैं । दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह के मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने रामबाग परिसर की कीमती जमीन को बेचना शुरू कर दिया। दे खते ही दे खते अनेक मकान और कालोनियों का निर्माण हो गया और आलिशान होटल व सिनेमाघर और अनेक दक ु ान की स्थापना हो गई है । इतनी भव्य जगह दरभंगा महाराज की यह स्मृति अब रख रखाव के अभाव में एक खंडहर में तबदील हो रहा है । इस सबके बावजूद दरभंगा का राज किला सम्पूर्ण मिथिलांचल के लिए आकर्षण का केंद्र बना है । -----X-----
प्रकृति का सौन्दर्य अनोखा, मन को भाए, दे खो जरा न हो इसको कोई नुक़सान प्रकृति बड़ी महान। प्रकृति में ही ईश्वर है , जिसने हमें तराशा है । प्रकृति ने हमें सिखाया, जीने का सलीका है । प्रकृति मां हमारी, इसने हमको पाला है , हम सब हैं , इस प्रकृति की संतान। प्रकृति बड़ी महान।
ये हरियाली ही तो है प्रकृति की शान। प्रकृति बड़ी महान।
सूरज चांद सितारे ये इसके अनमोल खजाने हैं ।
पर्वत तुमको साहस दे ता नदियां सुनाती तराने हैं ।
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सुशी सक्सेना इं दौर, मध्य प्रदे श
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बिहार के नृत्य- नाट्य का इतिहास
मनोरमा मिश्रा मुंबई, महाराष्ट्र
बिहार में अनेक भाषाएं प्रचलित हैं जिनकी अपनी अलग अलग संस्कृ ति है , पहचान है , और उनकी पहचान उनके रीति - रिवाज़, खान - पान, कला से होती है । आज बिहार के लोग अपनी पहचान हर क्षेत्र में बना रहे हैं चाहे वो फिल्म जगत में हो या कला, नृत्य, संगीत, नाटक आदि। भोजपुरी फिल्में आज केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदे शों में भी अपनी पहचान बना रही है । आज मैथिली सिनेमा या भोजपूरी सिनेमा हमारे सामाजिक स्थितियों को दर्शा रही है ।
सूखा और बाढ़ साथ ही गरीबी, दःु ख, प्रेम, पतिपत्नी के बीच होने वाला मन- मुटाव आदि सभी इस बिहार के जन मानस में लोक नृत्य का एक अपना नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं । इसी प्रकार से ही महत्व है , जंहा लोक - संगीत एवं नृत्य अनेक रूप से झिझिया भी मिथिला का एक प्रमुख लोक नृत्य है , जो प्रचलित है , जिनका संबंध दै निक जीवन की विभिन्न क्रिया दर्गा ु - पूजा के मौके पर किया जाने वाला नृत्य है , जिसके - कलाप से है , चाहे वह विवाहोत्सव हो, अन्य मांगलिक दौरान लड़कियां सर पर घड़ा लेकर नृत्य करती हैं । विशेष कार्य या मनोरं जन लोक नृत्य का आकर्षण दे खते ही बनता बात यह है कि घड़े के अंदर अग्नि प्रज्वलित रहती है है । और मान्यता यह है कि यह बुरी शक्तियों के प्रभाव से बचने के लिए किया जाता है । यह लोक नृत्य धीरे - धीरे मैं जब बिहार के लोकनृत्यों में उतरी तब मैंने पाया विलुप्त होते जा रहे हैं , मगर अब गांव - शहर की छोटी कि यहां पर रामलीला नृत्य, भगत नाच, कीर्तनिया नाच छोटी टीमें कला संस्कृ तियों को संजोगने में लगी है । लोक नृत्य उल्लेखनीय है , जो महत्त्वपूर्ण काव्य रचनाओं पर आधारित है । मिथिला में जट- जटिन नृत्य उत्तर बिहार यह कार्य अब इतना बढ़ गया है कि यह काबिले का सबसे लोक प्रिय नृत्य है । आमतौर पर यह मानसून में तारीफ है । बिहार में भोजपुरी बोली जाने वाले प्रांतों में चांदनी रात में युगल जोड़े के द्वारा किया जाता है । इस बिदे सिया, पनवरिया नाच आदि लोक - नृत्य शामिल है । नृत्य का मूल विषय यह है कि यह प्रेमियों जट और जटिन बिदे सिया नृत्य बिहार के ग्राम क्षेत्रों में अधिक प्रसिद्ध है । कि महाकाव्य प्रेम कहानी की याद है । ये अलग अलग और इसमें समाज से जुड़ी बुराइयों को समाप्त करने का संदेश कठिन परिस्थितियों में रहते थे। लेकिन समकालीन समय दिया गया है । में जट - जटिन के माध्यम से प्राकृतिक आपदा जैसी कई सामाजिक स्थितियों की चर्चा की जाती है । -----X----Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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अनुभतिय ू ों के चित्रकार कौशलेश
कौशलेश कुमार आरा, बिहार
पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृ तिक केंद्र उदयपुर एवं कला एवं
संस्कृ ति विभाग गोवा सरकार के संयुक्त तत्वावधान में,
25 जनवरी से 01 फरवरी 2019 तक गोवा में आयोजित, समकालीन चित्रकला कार्यशाला के लिए चित्रकार कौशलेस
का चयन किया गया है । कौशलेस बिहार राज्य के, भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा के रहने वाले हैं । इन्होंने काशी
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dyk;k=k अनुभतिय ू ों के चित्रकार कौशलेस
हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से बीएफए तथा कला
महा विद्यालय लखनऊ से एमएफए किया है । वर्तमान
किसी गहरी वेदना से विदग्ध है और उसके घायल मन का इलाज नहीं है । क्या भौतिक जगत क्या अभौतिक जगत,
में ये केन्द्रीय विद्यालय बीएचयू वाराणसी में कार्यरत हैं । मेडिकल साइं स के सोच के बाहर, अत्याधुनिक टै कनॉलाज़ी
हाल ही में इन्हें केन्द्रीय विद्यालय संगठन तथा नवोदय की सीमाओं से परे , कलाकार का अतृप्त मन, विदग्ध विद्यालय संगठन द्वारा आयोजित, संगीत कला संगम
हृदय जैसे रं ग और रे खाओं से दोस्ती कर बैठा हो। उनके
प्रदर्शनी में प्रदर्शित उनकी पेंटिं ग ‘ हार्ट टू हार्डवेयर ‘ के
रे खाएँ कलाकार को कह रहीं हो आओ दोस्त, आओ हमसे
2018 के तहत नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कला लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है ।
कौशलेस अति सक्रिय कलाकार हैं । कला शिक्षक के
रुप में व्यस्तता के साथ ही वे समकालीन कला गतिविधियों
चित्रों को दे खते हुए यह महसूस होता है जैसे, रं ग और साझा करो अपनी वेदना और कलाकार भी जैसे रं ग और रे खाओं के हवाले हो जाता है । कौशलेस के चित्रों पर लंबी बात चित की जरूरत है ।
में भी समान रूप से भाग लेते रहें हैं । कौशलेस कैनवस पर
बहरहाल गोवा समकालीन कला कार्यशाला में
ऐक्रेलिक और पेस्टल के दक्ष प्रयोग से प्रिंट सरीखे अमूर्त कौशलेस का चयन बहुत ही सुखद उपलब्धि है । उम्मीद है रूपाकार रचते हैं , जो कलाकार की विविध अनुभतिय ू ों को
उनकी प्रतिभा नित्य नई ऊंचाई हासिल करे गी। कौशलेस
यथा हर्ष, विशाद, प्रेम, शोक और को इहलौकिक जगत की को बधाई और शुभकामनाएं। विडं बनाओं को रूपायित करता हुआ लगता है । एक तरह से उनकी कला अनुभूतियों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया ही है । कुछ व्यक्त कुछ अव्यक्त। ऐसा लगता है कलाकार
- राकेश कुमार दिवाकर -----X-----
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रे णु जयसवाल “ रे णक ु ा “
कटिहार
कटिहार, बिहार
हिं दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रे णु जी की महानतम कृतियों में उनके आंचलिक परिदृश्य की सुंदर झलक दे खने को मिलती है साथ ही उस मिट्टी की भी सुगंध आती है जहाँ इस महान साहित्यकार का जन्म हुआ था.
की धरती धन्य होकर तीर्थस्थल हो गई. इसी क्रम में माता सती के कटि (कमर) का हार यहाँ गिरा था और इस भूमि का नाम “कटिहार” पड़ गया एवं माता सती का वह पौराणिक मंदिर आज भी यहाँ मौजूद है .
बिहार राज्य में स्थित इस पावन भूमि औराही हिं गना से लगभग अस्सी किलोमीटर की दरू ी पर कटिहार जिला के हसनगंज प्रखण्ड में रे णु जी की ससुराल थी, वहाँ की मिट्टी आज भी उनकी पगधूली से अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है .
गंगा कोशी एवं महानंदा जैसी प्रमुख नदियों से घिरे होने के कारण यहाँ चारों ओर हरियाली नजर आती है . जिले में मक्का, गेहूँ, धान और केले की फसलें प्रचुर मात्रा में होती है साथ ही तरह तरह की सब्जियों का उत्पादन भी खूब होता है , इन सब के अलावा यहाँ मखाने की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है .
बिहार राज्य के 38 जिलों में से एक कटिहार जिला कई मायनों में अनोखा है .यह बिहार के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित एक बड़ा जिला है जो 3, 056 वर्ग कि. मी. में फैला हुआ है .
कटिहार शहर रे लमार्ग के द्वारा भारत के अधिकांश प्रमुख शहरों से सीधे जुड़ा हुआ है , इसके अलावा सड़क मार्ग, हवाई मार्ग एवं जलमार्ग के द्वारा भी यहाँ आवागमन की सुविधा मौजूद है .
एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने जब सती स्वरूप में क्रोधित होकर हवन कंु ड में आत्मदाह कर लिया था तब भगवान शिव ने सती के शरीर को कंधे पर धारण कर तांडव प्रारं भ कर दिया था, जिससे संपूर्ण ब्रह्माण्ड अस्त व्यस्त हो उठा था. उनके इस क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर को काटना शुरू किया. कहा जाता है कि जहाँ जहाँ माता के अंग व आभूषण गिरे वहाँ
अनेकता में एकता इस छोटे से शहर की बहुत बड़ी खासियत है . यहाँ हर संप्रदाय के लोग एक दस ू रे के धर्म का सम्मान करते हुए शांतिपूर्वक तरीके से रहना पसंद करते हैं . सभी एक दस ू रे के त्योहारों में हर्षोल्लास के साथ शामिल होते हैं व उन्हें साथ मिलकर मनाते भी हैं . जहाँ एक ओर दीपावली के दीयों से पूरा शहर जगमगा उठता है वहीं दस ू री ओर ईद के सिवइयों की खुशबू हर गली से आती है . यहाँ मनाए जाने वाले त्योहारों में दर्गा ु पूजा व
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सूर्योपासना का प्रमुख त्योहार छठ पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है . यहाँ दर्गा ु पंडालों की सुंदरता व साजसज्जा बहुत ही उच्च कोटि की होती है . इसकी सजावट के लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है . ज्यादातर पंडाल प्राकृतिक चीजों का उपयोग करके वातावरण अनुकूल (इको फ्रेंडली) तरीके से बनाए जाते हैं , जैसे कि मिट्टी, नारियल के छिलके, जूट, सीपियाँ, बांस की कलाकृति आदि. पर्यटन की दृष्टि से भी कटिहार का खासा महत्व रहा है , पौराणिक कथाओं में वर्णित अवशेषों एवं ऐसे ही अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर यहाँ पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है . कटिहार के लक्ष्मीपुर में स्थित गुरुद्वारा सिखों का एक प्रमुख तीर्थस्थल है जो सिखों के नवें गुरु श्री तेगबहादरु साहिब के आगमन के प्रतीक स्वरूप बनाया गया है . इस गुरुद्वारे में प्राचीन लिपियाँ व प्राचीन महत्व के दस्तावेज संघारित हैं . यहाँ गुरु ग्रंथ साहिब का एक प्राचीन संस्करण भी संरक्षित है .
गोगाबिल झील अपनी अद्भुत सुंदरता एवं प्रवासी पक्षियों के आश्रय स्थल के रूप में जानी जाती है और पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करती है . मुख्य रूप से यहाँ हिं दी भाषा का प्रयोग किया जाता है , इसके अलावा मगही, मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, बांग्ला व अंग्रेजी भाषाएँ भी बोली जाती हैं . आवागमन की बेहतरीन सुविधा होने के फलस्वरूप कटिहार शहर एक अच्छा व्यवसायिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित है और निरं तर विकास की ओर अग्रसर है . यहाँ विभिन्न प्रकार के उद्योग धंधों का भरमार है जिनके उत्पाद अन्य शहरों व राज्यों में निर्यात किए जाते हैं . कई प्रकार के थोक व्यवसाय यहाँ की अर्थव्यवस्था को संभाले रखने में सक्षम हैं .
इसके अलावा यहाँ विभिन्न सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों में दे श के कोने कोने से नौकरीपेशा लोग आकर काम करते हैं और यहाँ के माहौल में पूरी तरह से रच कटिहार के मनिहारी प्रखण्ड में बहने वाली माँ बस जाते हैं क्योंकि कटिहार शहर का भयमुक्त माहौल हर ु को सुरक्षा की दृष्टि से आश्वस्त करता है एवं यहाँ गंगा का विशाल स्वरूप अद्भुत है , इसके पावन तट पर आगंतक हर पवित्र आयोजन से पूर्व विशेष कर छठ पर्व के दौरान के निवासी अपनी सनातन संस्कृ ति "अतिथि दे वो भवः" में विश्वास करते हुए हर किसी का स्वागत करते हैं "कटिहार" गंगास्नान करने वाले भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है . मनिहारी से लगभग सात किलोमीटर की दरू ी पर स्थित
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बिदवता कुमारी, कक्षा 7, केन्द्रीय विद्यालय, मकरपूरा, वड़ोदरा, गुजरात Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k बिहार का खानपान
लीना झा
जयपुर, राजस्थान बिहार पुरातन राज्यों में से एक है । किसी भी राज्य की पहचान वहां की वेशभूषा, भाषा, राजनीति के साथ साथ वहां के खान पान से भी होता है । बिहार अपने सांस्कृ तिक विरासत के साथ साथ अपने खान पान के विरासत में भी बहुत समृद्ध है । बिहार में निरामिष और सामिष दोनों तरह के व्यंजन को पसंद किया जाता है । हम यहां के खानें की आदतों को यहां बोली जाने वाली भाषा के आधार पर तीन भागों में बांट सकते हैं । यहां मैथिली, भोजपुरी और मगही विशेष बोली जाती है और खाने की आदतें भी इस बोली कि तरह विविध हैं और यही विविधता इसकी विशेषता है । इन विविधता के वावजूद यहां कुछ विशेष खाने की परं परा रही है जो तीनों भाषाओं को बोलने वालों के यहां जरूर बनता है । अक्सर बिहार के खाने कि बात होती है तो लोग बस लिट्टी चोखा पर आ कर रूक जाते हैं किन्तु बिहार में खाने की बहुत विस्तृत परं परा रही है । ऐसे ही कुछ विशेष व्यंजनों कि चर्चा आज हम आपके साथ करें गे। यहां सुबह के नाश्ते में मुख्यत: चुडा़, दही को चीनी या नमक, अपनी अपनी पसंद के अनुसार खाया जाता है । इसके साथ रसेदार सब्जी विशेष कर आलू परवल या आलू गोभी की खाई जाती है । साथ में अचार और हरी मिर्च भी होता है । दाल पूडी़ - दाल पुडी़ यहां पर हर विशेष अवसर पर जरूर बनता है । बिहार में हर घर के कुल दे वता या
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दे वी की पूजा की परं परा रही है । उस पूजन विधि को वहां के लोकल बोली में पातईर दे ना कहते हैं । जिसमें दाल पूडी़ और खीर बनाकर कुल दे वता या दे वी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है । दाल पूडी़ चन्ने के दाल से बनाते हैं । ये पूडी़ त्यौहारों पर जरूर बनती है । शादियों में, मुंडन संस्कार और यज्ञोपवीत संस्कार आदि के उपलक्ष्य पर इसे अवश्य बनाते हैं । मीठी पूडी़ या चीन पूडी़ - ये पुडी़ विशेष रूप से चौठ चांद जिसे बिहार में चौउरचंद कहते हैं उसमें अवश्य बनता है । अन्य दिनों बच्चों के नाश्ते के लिए बहुत बनाया जाता है । चीन पूडी़ के लिए जब आटा तैयार करते हैं तो बाकी पुडियों के लिए तैयार करने के तरीके को ही अपनाते हैं । बस इस आटे में नमक नहीं मिलाते हैं । आटे के बीच में चीनी भर कर हल्के हाथों से बेल कर तवे पर घी में सेंक लिया जाता है । कढ़ी बडी़ - बिहार के पारं परिक खाने में इसका विशेष महत्व है । जब भी बेटी ससुराल से मायके आती है तब कढ़ी बङी जरूर बनाया जाता है । बिहार में कढ़ी बिना बडी़ के नहीं बनाई जाती है । कढ़ी बनाने के लिए भी तीन तरीके अपनाए जाते है । यहां दही वाली कढ़ी, आमील वाली कढ़ी (आमील, कच्चे आम के पतले पतले टु कड़ों को धुप में सुखा कर बनाया जाता है । ये आमिल आराम से साल दो साल रख सकते हैं ।) मसाले वाली कढ़ी।
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जुलाई 2021 चावल की रोटी - चावल की रोटी यहां बहुत पसंद की जाती है । चावल की रोटी के लिए आटा और चावल को पीसकर बनाया जाता है । ये रोटी बहुत मुलायम होती है इसलिए बच्चों और बुजर्गों ु को बहुत पसंद आती है । खास कर बच्चों को ये रोटी गुड़ के साथ बहुत पसंद आती है । आलू परवल की सब्जी - गरमियों में बिहार में परवल बहुत पाया जाता है और वहां परवल से रसेदार और सुखी दोनों तरह कि सब्जी बनाई जाती है । परवल से बिहार में मिठाई भी बहुत अच्छी बनती है । ओल या जिमिकंद की चटनी - बिहार की थाली में चटनी विशेष रूप से पाया जाती है । मौसम के अनुसार चटनी के रुप बदलते रहते हैं । कच्चे आम की धनिया के साथ पीसकर चटनी, आम लहसुन की चटनी, पुदीने और कच्चे आम की चटनी। किंतु ओल या जिमिकंद की चटनी जिसे सन्ना भी कहते हैं बहुत खास है । जिमिकंद से अक्सर अन्य प्रांत में सब्जी बनती है किन्तु जिमिकंद या ओल से चटनी मात्र बिहार की विशेषता है । बिहार में लगभग हर क्षेत्र में इसकी चटनी बहुत पसंद करते हैं । इसकी चटनी बनाना बहुत आसान है । बस ओल को छिलका उतारकर उबाल लेना होता है और गरम रहते हुए ही इसका पेस्ट तैयार कर उसमें हरी मिर्च, अदरक को महीन कतर कर, नमक और सरसों पाउडर के साथ ओल में अच्छी तरह मिला कर नींबू का रस और कच्चा सरसों तेल मिलाकर परोसते हैं ।
dyk;k=k कर बनाया जाता है और घी में डु बा कर आग पर पक्के हुए बैंगन और टमाटर की चटनी के साथ खाते हैं । बड़ - उड़द दाल से बना यह पकवान अपने आकार के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है । उड़द की पीठी में हरी मिर्च, अदरक और काली मिर्च, हींग, नमक मिलाकर हथेली पर फैला कर एक तरफ से तवा पर सेंकते हैं फिर कडा़ही में गरम तेल में तलकर गरम गरम परोसा जाता है । विशेष कर शादी या अन्य बडे ़ आयोजनों में इसे अवश्य बनाते हैं । हींग वाली सत्तू कचौड़ी - सत्तू की बातें होते ही बिहार से बाहर इसे लिट्टी तक सीमित कर दिया जाता है जबकि बिहार में इस सत्तु में हींग और विभिन्न मसालों के आकर्षक मिश्रण से हींग कचौड़ी बनती है जिसे आलू टमाटर की सब्जी के साथ खाया जाता है । जब भी बिहार में मिठाई की बात होती है तो बहुत विस्तृत है यह क्षेत्र। बिहार की मिठाई की खासियत है कि वो सुखी होती है । मिठाई में भी कुछ नाम तो बहुत आम हो गये हैं ... जैसे खाजा, टे कुआ, पिरुकिया, मालपुआ, मखाना खीर, बालूशाही पर इन सब से अलग कुछ विशेष नाम हैं जो बिहार की पहचान है ।
अरिकंचन की सब्जी - अरिकंचन बिहार में अरबी के पत्ते को कहते हैं । इस पत्ते से बहुत स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है । पत्ते पर बेसन और चावल के आटे में विभिन्न मसालों को मिला कर गाढ़ा पेस्ट बना कर अरिकंचन के पत्तों को एक के उपर एक इस पेस्ट के सहायता से जमा कर बेलन की तरह लपेट कर रोल तैयार करते हैं जिसे वहां बिङिया कहते हैं । इसे भाप में पका कर फिर गोल गोल चकले काट कर दोनों तरफ से पेस्ट लगा कल तेल में तलकर सरसों मासाला का ग्रेवी तैयार कर इसे उसमें पकाया जाता है और फिर चावल के साथ इसे परोसते हैं । सकरौउरी - मखाना बिहार की पहचान है खासकर बिहार के मिथिलांचल प्रदे श की। जहां कदम कदम पर मखाना के उपज के लिए पोखर मिल जाता है । इसी मखाना को बूंदी के साथ मिलाकर एक विशेष व्यंजन बनता है जिसे सकरौउरी कहते हैं । दध ू को गाढ़ा कर उसमें मखाना पाउडर और बूंदी मिला कर उबाल लेते हैं और फिर उसमें चीनी और ढ़ेर सारा सुखा मेवा के साथ इलाइची रसकंद, एरिसा या अरिसा दोनों नामों से पहचान है पाउडर मिलाकर इसे तैयार करते हैं । किसी भी भोज की इस मिठाई की जो चावल के आटे और गुड़ सौंफ से मिल शान माना जाता है सकरौउरी। कर तैयार किया जाता है । इसे पहले बेटी विदाई में बेटी के साथ जरुर दिया जाता था। हालांकि अब इस मिठाई को लिट्टी चोखा - बिहार की वैश्विक पहचान हो लगभग भूल गए हैं लोग। इसके बनाने की पद्धति थोडी़ गई है । मुख्यत: भोजपुरी बोलने वाले प्रदे श से निकल जटिल है इस कारण से। परवल की मिठाई। पलवल के कर संपर्ण ू बिहार ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसने बीज को हटा कर उसे चाशनी में पकाकर कर उसमें खोया अपनी पहचान बना ली है । आसन और सादा भोजन में भरकर ये मिठाई बनाई जाती है । यह सर्वोपरि है । लिट्टी को कंडे /गोईठा के आग में सेंक Website : www.anuragyam.wordpress.com | Email : anuragyam.editor@gmail.com
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dyk;k=k इन के अलावा कुछ और व्यंजन हैं जो विशेष हैं .. दाल बगिया, गुड़ पिठ्ठा, दध ू पिठ्ठा, काला जामुन और सहजन की सब्जी, बैंगन चोखा, आलु चोखा, अनरसा, लौंगलता ये कुछ नाम हैं । शाकाहारी के अलावे बिहार में निरामिष भोजन भी बहुत चाव से खाया जाता है । गंगा, कोशी, गंडक, बुढ़ी गंडक, सोन नदी के कारण मछली बहुत आसानी से उपलब्ध है यहां। इस कारण मछली से विभिन्न तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं यहां। छोटी मछली से लेकर बङी मछली सभी को नाना प्रकार के मसालों से बना कर खाते हैं लोग। रसेदार मछली के लिए मुख्यत: यहां सरसों मासाला का इस्तेमाल किया जाता है । मछली फ्राई के लिए हरी चटनी और पोस्ता दाना का इस्तेमाल करते हैं । छोटी मछली को अक्सर मसाले के साथ सूखा भून कर खाया जाता है । झींगा और मछली के अंडे से पकौड़ी बनाई जाती है । जिसमें बेसन और अन्य मसालों को मिलाया जाता है । बिहार का आहूना मटन या चंपारण मटन बहुत प्रसिद्ध है । जिसे मिट्टी के बर्तन में सभी साबुत मसाले के साथ तेल और प्याज़ के साथ साबुत लहसुन में लपेटकर कर बहुत ही धीमी आंच पर पकाया जाता है फिर इसे चावल या रोटी के साथ परोसा जाता है ।
जाता है जिसे लाई कहते हैं । कचरी और छील्ली बिहार का स्नैक्स है । कचरी प्याज को महीन कतर कर बेसन और मसाले के साथ मिलाकर तेल में तलकर बनाते हैं । छिल्ली बेसन की मसालेदार चकली होती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है । चाय के साथ बहुत पसंद की जाती है । बिहार में नदी और तालाब की अधिकता रही है और बारिश भी बहुत होती है वहां जिस कारण बरसात के मौसम में सब्जियों की उपलब्धता बहुत कम हो जाती है । ऐसे समय के लिए वहां के निवासी लगभग प्रत्येक हरी सब्जियों को उड़द दाल के साथ मिलाकर बडी़यां बना कर रखते हैं । साथ ही साथ कुछ सागों को भी उड़द दाल के पीठी में लपेटकर सुखा कर रख लेते हैं । जिससे वक्त पङने पर आलु के साथ मिलाकर बहुत स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है । ऐसी कुछ सब्जियां जैसे कौहरा/भतुआ/ कच्चापेठा को घिसकर कुम्हरौरी बनाते हैं । ऐसे ही मुरौरी जो मुली से बनता है । चन्ने का साग से बिङिया बनता है जिसे झुङी भी कहते हैं ।
यहां सबसे ज्यादा भात, भुना हुआ अरहर का दाल और आलू का चोखा, मौसमी साग बहुत पसंद किया जाता है । ये भोजन जितना सादा होता है उतना ही सेहतमंद भी होता है । यहां एक कहावत बहुत प्रचलित है जिससे पता चलता है कि वहां के लोगों में खिचङी कितना पसंद किया शाम के नाश्ते में अक्सर चिड़वा को भूज कर उसमें जाता है ... खिचड़ी के चार यार, घी पापड़, दही और अचार। मौसम के अनुसार हरा मटर या मूंगफली मिला कर कच्चे इनके अलावा आलू का चोखा या सन्ना अतिरिक्त सजावट प्याज और हरी मिर्च के साथ खाया जाता है । यहां चुडा़ है थाली में। सरल बिहार की सादी थाली। के साथ काले चने को भिगो कर बनाया गया धुधन्नी भी -----X----खाते हैं । इसके अलावा मुरही भी बहुत स्वाद के साथ लोग खाते हैं । मुरही से ठं ड में अक्सर गुड़ के साथ लड्डू बनाया
यदि मैं प्रकृति होती
जैसे ये पर्वत, कभी न झुकती, डटी रहती।
बनके हवा गगन में लहराती, कभी ओढ़ के हरियाली, बागों बागों फिरती जाती। यदि मैं प्रकृति होती। सूरज चांद सितारे मेरे अनमोल खजाने होते।
बनके छाया वृक्षों की पथिक की राह तकती। उमड़ घुमड़ कर आती बारिश सी झमझमाती। धरती पर धूल की तरह इठला कर उड़ती। सबको सब कुछ दे ती कभी निराश न करती। प्रकृति के हर कण में जीवन है ये सबको सिखाती।
झरनों की झन झन में मेरे ही तराने होते। बन कर सरिता सबकी प्यास बुझाती जाती।
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सुशी सक्सेना इं दौर, मध्य प्रदे श अनुराग्यम ्
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गोपाल गुप्ता “गोपाल” नई दिल्ली
मित्रों आप को कलम के माध्यम से आज भारत के गोरवशाली नगर में ले चलता हूँ, बिहार के औरं गाबाद में इस अपना इतिहास बहुत ही शानदार रहा है । औरं गाबाद चंद्रगुप्त मौर्य के वँशज की कर्मभूमि रहा है वही दे श के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की जन्मभूमि है । इसे बिहार का कि चितौड़ भी कहा जाता है जो की सूर्यवंश के राजाओं की वजह पड़ा आजादी मे इस की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता नारयण सिंह और कँु वर सिंह ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। हम ने विकासः के नए आयाम पाए हैं , किन्तु अपने इस इतिहास पर हं मे गर्व है और ये जानकारी अगली पीढ़ी को दे ना हमारा फर्ज है । पर्यटन की दृष्टि से भी ये जगह काफी महत्वपूर्ण है , १-दे व २-दे वकंु ड उमगा ३- अमझहर शरीफ ४- पवई माली ५- चंदनगढ़ ७- पीरू सिरिस आदि काफी शानदार जगह है : दे व मन्दिर : भगवान सूर्य को समर्पित है , यह इकलौता पश्चिम मुखी सूर्य मन्दिर है , दे वार्क अपनी अनूठी शिल्पकला के लिए भी जाना जाता है , मंदिर परिसर में उत्कृ ष्ठ नक़्क़ाशी दे खते ही बनती है । दे वकंु ड : का भगवान शिव को समर्पित मंदिर है , शिवरात्रि का त्यौहार यहाँ बड़ी श्रद्घा एवम धूमधाम से मनाया जाता है इस समय यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है कंु ड के बारे मे यह प्राचीन मान्यता भी है कि महाऋषि च्वनय ने इस मंदिर में शरण ली थी इस
औरं गाबाद यात्रा लिए ये और भी पवित्र स्थान माना जाता है । उमगा मन्दिर : भगवान विष्णु को समर्पित है ग्रेनाईट पत्थरों से बना यह मंदिर अद्भुत वास्तुकला एवं शिल्पकला का नमूना है मन्दिर मे अन्य दे वताओं की भी पूजा अर्चना होती है । अमझहर शरीफ़ : इस्लाम धर्म का एक तीर्थ स्थल जो धार्मिक दृष्टी से काफी महत्वपूर्ण है , आप को बता दें कि यह दरगाह हज़रत सय्यदाना मुहम्मद जिलानी के नाम से जाने जाने बाले पीर की दरगाह है । पवई माली , चन्दनगढ़ पुरातत्व मे रूचि रखते बालो के लिए उत्तम स्थान है यहाँ कई सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं । पिरू को हर्षवर्धन के दरबार से कवि भट्ट से जुड़े होने के लिए जाना जाता है । इस स्थान को पहले पृथ्वीकोटा के नाम से जाना जाता था। इस जगह का नज़ारा काफ़ी शानदार है मेरी राय मे आप एक बार जरूर जाए यहाँ पर हमें बिहार के मशहूर लिट्टी चोखे का अलावा मद्रास का इडली डोसा भी खाने को मिला दोस्तो सिरिस को मुगल काल में परगना और एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जहां 1857 का विद्रोह हुआ था। यहां पर औरं गज़ेब के शासन में बनी एक मस्जिद भी स्थित है । यह जगह हमेशा ही इतिहासकारो के बीच आकर्षण का केंद्र रही है । -----X-----
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dyk;k=k बिहार की विरासत
भी जाना जाता है , भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान प्रसिद्ध ‘शनै वादक’, द्रौपदी गायक मिश्रा और मलिक बिहार के कुछ महान संगीतकार हैं । बिहार में कई लोक गीत हैं जो ज्यादातर आम लोगों के जीवन से संबंधित हैं , उनमें से कुछ हैं ‘सोहर’- बच्चे के जन्म के दौरान किया जाता है , ‘रोपनीगीत’- धान की बुवाई के मौसम में किया जाता है , ‘कटनीगीत’- धान की कटाई के मौसम में किया जाता है , ‘सुमंगली’ - शादी के दौरान की जाती है , और बहुत कुछ यह सब महिलाओं द्वारा किया जाता है । बिहार का लोक संगीत बहुत ही अनोखा है , हर कार्यक्रम के लिए एक गीत (गीत) होता है । बिहार के संगीत और नृत्य रूप
मुकेश बिस्सा
जैसलमेर, राजस्थान बिहार अपने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है और यह तीन सहस्राब्दी पूर्व का है , जिसकी उत्पत्ति इं डो-आर्यन जातीय समूह से हुई थी। बिहार में अधिकांश स्मारकों के महान ऐतिहासिक संबंध हैं और हिं द ू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के इतिहास को बताते हैं । महाबोधि मंदिर के अंदर बोधि वृक्ष जिसके नीचे बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और बौद्ध धर्म को जन्म दिया, नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त राजवंश द्वारा की गई थी और इसे नालंदा विश्व विद्यालय के रूप में जाना जाता था, इसका पुस्तकालय उस समय सभी सुविधाओं के साथ दनिया ु का सबसे बड़ा पुस्तकालय था और यह है हर प्रकार की किताबें, लेकिन तुर्की के राजा बख्तियार खिलजी ने विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया, विश्वविद्यालय में आग लगा दी गई। पहले पटना को पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था, यह अपने धार्मिक विचारों और धन के कारण बहुत शक्तिशाली था। बिहार के ऐतिहासिक महत्व का पता लगाना चाहिए।
बिहार में मिथिला लोक नृत्य, आदिवासियों के लोक नृत्य और सरायकेला के चौ नृत्य के विभिन्न रूप हैं । मिथिला नृत्य रूप विभिन्न विषयों पर आधारित है जैसे राम-लीला नच, भगत नच, नारद नच, कंु जवत नच, आरती नच, और कई अन्य, सभी नृत्य हिं द ू धर्म से संबंधित हैं । बिहार के सरायकेला खरसावम क्षेत्र में, चाऊ बिहार की कला - बिहार की कला और शिल्प काफी नृत्य जो पहले लड़ाई की तकनीकों का अभ्यास करने के प्रसिद्ध हैं । बिहार के मिथिला क्षेत्र में मिथिला पेंटिं ग लिए किया जाता था, कलाकार नृत्य के दौरान एक मुखौटा प्रसिद्ध है , पेंटिं ग मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा पीढ़ी-दर- पहनता है जिसे प्राचीन दिनों में कलाकार की पहचान पीढ़ी की जाती है । मिथिला पेंटिं ग ज्यादातर ताजा प्लास्टर छुपाने के लिए माना जाता था। जनजातीय लोक नृत्य की हुई मिट्टी की झोपड़ियों पर की जाती थी। यह पेंटिं ग कुछ विशिष्ट उद्दे श्य रखता है , और वे अपनी नृत्य कला से प्रकृति के प्रति अपना प्यार दिखाते हैं । संथालों (बिहार अपने दस ू रे नाम मधुबनी कला के लिए प्रसिद्ध है । के आदिवासी) के कुछ मुख्य त्योहार बा पर्व, दसिया पर्व, बिहार की मधुबनी कला - भारतीय शास्त्रीय संगीत माघी पर्व और कर्म हैं । पाइका, जात्रा, कर्मा और जदरु में बिहार का बहुत बड़ा योगदान है । भिखारी ठाकुर एक उरांव और मुंडाओं के कुछ प्रमुख नृत्य उत्सव हैं । प्रसिद्ध कवि, जिन्हें भोजपुरी के शेक्सपियर के रूप में -----X-----
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जूही शर्मा, कक्षा 9, केन्द्रीय विद्यालय, मकरपूरा, वड़ोदरा, गुजरात
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dyk;k=k स्केच कलाकार
कवि संजय गिरी, नई दिल्ली - स्केच कलाकार, ग़ज़लकार
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कवि, चित्रकार और पत्रकार संजय कुमार गिरि का जन्म उत्तरप्रदे श के आजमगढ़ जिले में 27 जून, 1975 को हुआ था। जो वर्तमान में हिन्दुस्तानियों के दिल दिल्ली में G4S SECURITY SUPERVISOR (सुपरवाइजर) के पद पर कार्यरत हैं । आप बहुमखी प्रतिभा के धनी हैं । सुरक्षा अधिकारी के पद पर काम करते हुए भी आप अपने कीमती समय में से प्रतिदिन साहित्य, चित्रकला और पत्रकारिता के लिए समय निकाल ही लेते हैं । अब तक आप बहुत से गीत, ग़ज़ल और दोहे रच चुके हैं । सोशल साइट मुखपोथी (फेसबुक) पर सक्रियता काबिलेतारीफ है । दर्जनों स्केच बना कर सबके दिलों पर राज करने वाले संजय गिरी जी अपनी कविताओं से सबके मन अपना मकां बना ही लेते है । दिल्ली की अनेकों साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं में विभिन्न पदों के दायित्व का निर्वहन भी आप तन-मन और धन से कर रहे हैं साथ ही अनेकों पुस्तकों में सहयोगी काव्य संकलन कर चुके है । अनेकों सम्मान से नवाज़े जा चुके है ।
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कवि संजय गिरी, नई दिल्ली स्केच कलाकार, ग़ज़लकार (+91-9871021856)
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गुरूजी, पं. श्री अजय नाथ झा शाश्त्री जी को मेरी ओर से मिथिलाक्षर लिपि में यह कविता सादर समर्पित.. मिथिलाक्षर लिपि को पुनर्जीवित कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने हे तु सादर नमन..
माला झा RJ Host, BHARAT FM मुंबई, महाराष्ट्र
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