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Kavya rashmi

Page 1

का य र म धान संपादक सी. एस. होसगौडर

संपादक मंजन ु ाथ एन. अं बग संपादक मंडल

डॉ. वजय हं दरु ाव पाट ल डॉ. गुरमक डा नीरजा डॉ. बल वंदर कौर

डॉ. गोरखनाथ ितवार बंद ता नाएक

1/ का य र म


KAVYA RASHMI Edited By Manjunath N. Ambig थम सं करण : 2018

मू य : पृ

: 96

. 50

ितयाँ : 100

© संपादक पता :

उ च िश ा और शोध सं थान

द

ण भारत हं द

है दराबाद– 500004

चार सभा, खैरताबाद

मोबाइल : 9481854178 email :ambigdrmanjunath@gmail.com श द संयोजन : बंद ता नाएक मु क : साई िल खता

ेस, द

ण भारत हं द

खैरताबाद, है दराबाद - 500004

चार सभा प रसर

2/ का य र म


द

ण भारत हं द

चार सभा के

समकुलपित ी आर. एफ. नीरलक ट को सादर ...

3/ का य र म


आशीवचन

यह द

ण भारत हं द

चार सभा का शता द वष है । ऐसे

समय म उ च िश ा और शोध सं थान, द

ण भारत हं द

चार सभा, है दराबाद क ओर से क वता संकलन का

शंसनीय काय है । म

बधाई दे ता हू ।ँ

काशन

धान संपादक और संपादक मंडल को

द

ण भारत हं द आं

पी. ओब या अ य

चार सभा

दे श तथा तेलंगाना

5/ का य र म


आशीवचन

हष का

वषय है

क है दराबाद क

'का य र म' का य संकलन

के पी.जी.

वभाग

ारा

कािशत हो रहा है । आशा करता हू ँ

क भ व य म यह सराहनीय काय हं द का य जगत को समृ

करे गा। म इस संदभ म अपनी ओर से 'का य र म' के संपादक मंडल को शुभे छा देता हू ँ और भ व य म इस

करते रहने क आशा करता हू ।ँ

-

कार के काय

डॉ. सुभाष जी राणे पर

द

ा िनयं क

उ च िश ा और शोध सं थान

ण भारत हं द

चार सभा, म ास

6/ का य र म


शुभाशंसा

द

ण भारत

हं द

चार सभा अपने शता द

वष म कई

काय म का सफल आयोजन कर रह है ।ऐसे म पी.जी. वभाग है दराबाद क ओर से ‘का य र म’ का य संकलन का बड़े हष का वषय है । इस मागदशन और कड़

काशन

काशन से नई पीढ़ को भ व य म

ेरणा िमलेगी तथा हं द के वकास म एक और

जुड़ जाएगी। इसी शुभे छा के साथ संपादक मंडल को

बधाई।

द

पी. साईनाथ

कानूनी सलाहकार

ण भारत हं द

चार सभा

है दराबाद

7/ का य र म


संदेश

छा

एवं शोधािथय को

और शोध सं थान, द

ो सा हत करने के िलए उ च िश ा

ण भारत हं द

चार सभा, है दराबाद क

ओर से यह पहल सराहनीय है । उ च िश ा और शोध सं थान ने वा षको सव के अवसर पर वभाग के शोधािथय

ा यापक , छा

ारा िल खत क वताओं को

एवं

कािशत करने का

िनणय िलया है । यह पु तक इसी िनणय का सुप रणाम है । म पी.जी. वभाग के हर सद य को बधाई दे ता हू ँ । द

सी.एस. होसगौडर

सिचव एवं संपक अिधकार ण भारत हं द

चार सभा

है दराबाद

8/ का य र म


अनु म 1. नए मु क

2. भूलगे नह ं 3. 4.

दल क बात

हं द क पहचान

5. मन का वचार

6. मेर सहे ली

7. यह है महानगर !

8. चमड़ा

9. महँ गाई

10. बेरोजगार

11. वंदना

12. यार का दुख कतना भार है 13. गु

14. ना सोच, लोग 15. गर बी

या कहगे!

16. मेरा अिभमान

17. कहाँ गया वह बचपन

18. एक बेट क सोच 19. बेट इतनी पराई 20. माँ का कज

य?

21. नार का अ त व

22.

ाचार

23. उपकार

24. शाबाशी 9/ का य र म


25. क व क गूज ँ

26. कभी सोचा ना था... 27.

ा हश

28. छा 29.

मन

कृित का स दय

30. दलदल 31. र ते

32. म छर से माँ क

33. एक माँ क 34.

यथा

वनती

या तुझे मने दया

35. करम राजा 36. कसान

37. तु हार पहली चीख

38. एक नेता को दे खा तो

39. िसमटती िसस कयाँ 40. गर ब ब च क

41.

ान सिलला

जंदगी

42. सूरज क भाँित 43. पहचान

44. बेट से बनती 45.

या यह

जंदगी है !

46. िसफ इंतजार

47. मेर

यार

48. याग दया

रतीशा

49. नार का डर

50. कसका दोष 51.

य ऐसा सोचती हू ँ 10/ का य र म


नए मु क

क व धम

संभव नह ं क श इतना करो क

ो. ऋषभदे व शमा

हो औ' यादती न हो।

यादती को

यादती कहो।।

जनता के चारणो! सुनो,स ा के मत बनो;

तुम जागते रहो क कह ं मानव अिधकार

मरता है कोई छा

यादती न हो।।

तो िसयासत न क जए।

भूख मरे कसान तो ितजारत न क जए।। ह आप बड़े बु

मान, श द के खलाड़ !

ले कन पशाच कम क वकालत न क जए।।

यु

हाथ म लेकर पताका िशखर पर चढ़ता रहा। आदमी अपनी सरहद खींचकर लड़ता रहा।।

भूिम जसके नाम पर खून से लथपथ पड़ है ! सातव आकाश पर वह बैठकर हँ सता रहा।।

11/ का य र म


आतंक बीज

कल आपने बोई थीं गिलय म नफ़रत।

य आज लहलहाई ह घर घर म दहशत।। नादान बालक को वहशी बनाने वालो!

खाएँगी तुमको एक दन तु हार वहशत।। शिमदगी

मर कर िगरा प रं दा है । पर ह यारा ज़ंदा है ।। दे ख बेबसी धरती क ;

चाँद बहु त शिमदा है ।। शोक का वषय!

कसने कहा क खून म आता उबाल है ?

अब तो नस म बह रहा कुछ लाल-लाल है !! अिभम युओं को घेर कर वे मारते रह!

इन अजुन क आँख म सूअर का बाल है ।। थत

जनता भूखी है , हु आ करे ।

कसान नंगे ह, हु आ कर।।

जवान मरते ह, मरा कर।

स ा बची रहे , दुआ कर।।

12/ का य र म


इितहास बनाने वाले

खेत काटकर सड़क बना द , सभी सुखा द ं

मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो ह यापार ।।

कह ं तु हार

यार ।

वजय कथा म, मेरा नाम नह ं है !

ज का सब कुछ हरण कर िलया, भुता यह तु हार ।।

बंदक ू

छ जे प' च च लड़ाते कबूतर को दे ख कर; ब ती के दारोगा ने कल बंदक ू दाग द ।।

सरकार के फरमान से हम इस कदर डरे ;

बचपन के सारे खत को रो रो के आग द ।। औिच य का

बदज़ुबान क सभा क , या सदारत क जए? य

कसी पर सच जताने, क

हमाकत क जए??

मौन ह रहना उिचत है , इस नए माहौल म;

यार क बात न क रए, बस िसयासत क जए!!

सावधान

भुओं से सावधान औ' भुता से सावधान।

दं गल म जीत कर िमली स ा से सावधान।। सीता के घर म झाँकते धोबी कई-कई!

नेता तो खैर ठ क है जनता से सावधान।।

13/ का य र म


डर सा

राह चलते राह से डर सा लगे है आजकल।

आपअपनी छाँह से डर सा लगे है आजकल।। चचा चली है आ गए िसयासत म साँप भी!

यार!अपनी बाँह से डर सा लगे है आजकल।। हालचाल

मौसम का हालचाल, हमसे न पूिछए।

यार क चाल-ढाल, हमसे न पूिछए।।

नेता क रग म पैठ के, कुस के क ट ने या- या कया कमाल,हमसे न पूिछए।।

गम !

हाँफ रह है कदम-कदम चल,बूढ़ साँस क ठठर । दोपहर क जोगन भटके, पहने हु ए फट कँथर ।। धरती पर बढ़ती जाती है , गम आपाधापी क ;

छे द-छे द कर डाली, नीले आसमान वाली छतर !!

भय

डर रहे बूढ़े सयाने, सब कह 'हम

या कर'?

िछप गए सब कोटर म, जान कर भी

चाँदनी म बाल खोले, घूमती है

और ब चे ह क बाहर खेलने क

ेतनी!

य मर??

ज़द कर!

14/ का य र म


जीवन जो जया

झ लाई सी सुबह, पगलाई सी शाम। ोध भर दोपहर, य ह

ेत ठोकते

दवस तमाम।।

ार, ले ले मेरा नाम!

रात भूतनी बनी, यहाँ कहाँ व ाम।। जीने क कला

मत समझ, है जंदगी केवल समर।

सीख ले कुछ मु कुराने का हु नर ।। है अगर वपर त मौसम, या हु आ? धूप पीकर फूलता है गुलमुहर।। पग घुँघ

द वार पर िल खी हु ई चेतावनी को बाँच!

हर ओर दूर-दूर तक बखरा हु आ है काँच!! कहती है कोई मीराँ कान म बार -बार;

अब पाँव क ज़ंजीर को पायल बनाके नाच!! जजी वषा

पंख जल गए, ववश पखे

फर भी खसक रहा है ।

इ छाएँ िगर ग , ाण, पर, अब भी िससक रहा है ।।

दे ह जूझती है अंितम रण, साँस-साँस ितल-ितल भर रोम-रोम म धँसा केकड़े का नख कसक रहा है ।।

15/ का य र म


मलंग बानी

कल तक थे ध ना सेठ, अब जेल म पड़े ह।

जो जज बड़े थे, आज वे मुज रम से खड़े ह।।

गाते हु ए मलंग ने,

जनके िसर पे ताज थे,

जाते हु ए कहा -

पैर म कड़े ह।।

[क व के अ कािशत क वता संकलन ‘मलंग वाणी’ से गृह त] -

पूव आचाय एवं अ य , उ च िश ा और शोध सं थान, द भारत हंद

ण

चार सभा, खैरताबाद, है दराबाद – 500004

16/ का य र म


भूलगे नह ं

भूलगे नह ं

- रे णुका बाले होसूर

आँख से िनकले आँसू मन का दद बढ़ाया

वचिलत हू ,ँ रोऊ या हँ सू

तेर याद ने बहु त सताया... कल समझी हु ई बात

भूल गए उठते सवेरे

य कटती नह ं रात

बना तेरे सपन के सवारे

अधूर ह रह जाए मुलाकात मत होना उदास चेतन

हर पल िमले खुिशय का सौगात गव करे तुझ पर सारे वतन

इस धरती का कण है रे णू तेर याद से भरा

माथे पर रख एक-एक अणु तेर यश का ऐलान कर छोड़ दो मन का संशय

17/ का य र म


रखो हरपल हरदम व ास

सच है यह दल का आशय भूलगे नह ं जब तक रहे

ास...

शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

18/ का य र म


दल क बात - रे णुका बाले होसूर कुछ तो कहना है ज र

क जाती ह बात मगर

िनगाह म झुकते डरकर

पलक म रह जाते िछपकर बहाना समझने क कोिशश

बढ़ा दे ती है मन क किशश कदम के जाने-माने रा ते

क रहे अनजान के वा ते

सुख-दुख भाव के बंधन

जो भी हो भीगना ह जीवन िमले या ना िमले मं जल चलते रहना है हर पल

भर आंख से हँ सना है

यार से जंदगी सवारना है

व ास ह

ेम का अंकन है

बस इसी का नाम जीवन है

शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

19/ का य र म


हं द क पहचान

दे शी ने हं द को

ो.मंजुनाथ एन.अं बग

े ष कया।

वदे शी ने हं द को पास कया।

वदे शी जानते ह इस क शान।

इसम है सब क पहचान।।

माता को ह भेजते ह वृ ा म।

हं द को छोड़ते कहाँ?से सब शैतान। हं द है भारत क वाणी।

हं द है व

क वाणी।।

मुँह से बोलते हं द है मीठ ।

इसको पीछे से मारते है लेकर लाठ । मारने से नह ं मरती हं द ।

इन सबसे नह ं डरती हं द ।।

हं द को मालूम है , अपनी पहचान।

उसने नह ं छोड़ है अं ेजीक शान। या कर सकगे यह सब शैतान।

अपने आप कर लेगी पहचान।।

आचाय एवं अ य

उ च िश ा और शोध सं थान, है दाराबद 20/ का य र म


मन का वचार -

ो.मंजुनाथ एन.अं बग

मन का है वचार

उसी म है सदाचार

मन को हमेशा चमकाओ

कसी को कभी न धमकाओ ।

मन को मत मारो तीर दय को मारो वीर

मन क बात िमट जाएगी

दय क बात रह जाएगी ।

मन क बात को न उड़ने दो इसे कभी न सड़ने दो

मन म बुरे वचार कभी न बुलाओ अपने वचार को हमेशा धुलाओ।

अ छे वचार को बार-बार बुलाओ ितर कार को बार-बार सुलाओ हमेशा अ छे मन को बनाओ

कसी को कभी गाली न सुनाओ।

मन म है सभी वचार

उसे कभी मत बनाओ दुराचार अ छे वचार को चुन लो

अ छे दन को िगन लो । 21/ का य र म


मेर सहे ली -

ो.मंजुनाथ एन.अं बग

मेर सहे ली

सांवली रं गवाली। छोटे कदवाली

ह टो म है लाली।। दखने म लगती है

मासूम यार ।

मुह से बोले तो

िगराती बमबार ।।

ये यंजन तो नह ं बनाती

ले कन सभी कामनोरं जन कराती। कसी को लगती है अ छ

कसी को लगती है ब ची। जंदा रहने के िलए

करती नौकर क खोज

ले कन बार-बार सताता है

इसको घर का बोझ। इसके जीवन म है गम

इसिलए हमेशा रहती है ।

इसक आँख नम

गम म ह जीवन को ढोती है । 22/ का य र म


उसी म सपने बोती है

बहु त कुछ उसी म खोती है ।

इसी म डू बी रहती है

फर भी अपने को संभाल पाती है ।

भगवान से मेर उस के क

बनती है

दूर कर ।

ज द इसको पार कर

नह ं तो यह जल जाएगी,

बाद म गल जाएगी ।

आचाय एवं अ य

उ च िश ा और शोध सं थान, है दाराबद

23/ का य र म


यह है महानगर!

अजीब है यह जंदगी का सफर

डॉ. गुरमक डा नीरजा

नह ं है हम मं जल क ख़बर

चार ओर ह कं

ट का जंगल

वाह रे भाई, या यह है महानगर ! लाख -करोड़ गगन चुंबी अ टािलकाएँ

मगर नह ं द खता है घर

इस ितकड़मी संसार म

बछे ह काँटे हर कदम पर, डगर डगर पर

दुिनया क भीड़ म लाख अजीज ह

ढू ँ ढ़ा बहु त,पर कोई अपना नह ं िमला

दो ती करने आ ख़र जाएँ हम कहाँ

प थर के बने आदमी ह यहाँ

सभी आसमान को छूना चाहते ह

उ मु

गगन म पंछ बन उड़ना चाहते ह

मगर मं जल तक पहु ँ चने से पहले ह भटक जाते ह

भटकते-भटकते पता नह ं कहाँ पहु ँ च जाते ह

24/ का य र म


शहर क इस भीड़ म हम खोगए ऐसे

रात दन ने

से अ ु बहते रहे

कैसे बयाँ क ँ अपने इस दद को

अपन के बीच ह अजनबी बन के रहे झ पड़ म अंधेरे का रा य है

महल म रोशनी का सा ा य है

मेहनतकश भूख मरते ह

भगवान के कर ट पर ह रे जड़ते ह खून पसीना बहाने के बाद भी

गर ब क र ढ़ क ह ड जुड़ नह ं

िम ट भी अपना रं ग बदलने लगी

भूख से पेट क अंत डयाँ कराहने लगीं टू टते संबंध के इस दौर म

आदमी बँट गया है टु कड़ म

शराब पीकर नाचती दुिनया सुख खोज रह है दुखड़ म टू टे दल को जोड़कर

ऊँच-नीच क द वार तोड़कर

अपनी तकद र रच कैसे?

इस आ मण म बच कैसे?

-

अिस टट

ोफेसर,

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

25/ का य र म


चमड़ा एक व

ऐसा था

ताड़ प

पर

डॉ. गुरमक डा नीरजा

जब हम िलखते थे प थर पर तांबे पर

पेड़ क छाल पर. फर धीरे -धीरे सीख गए

िलखना कागज़ के टु कड़े पर. ले कन अ याचार का इितहास िलखा जाता है आज भी

चमड़े पर. चमड़ा पशुओं का,

चमड़ा मनु य का –

औरत और ब च का

कसान और मजदूर का! -

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

26/ का य र म


महँ गाई

- अनुपम कुमार लूटा हम ऐसीमहँ गाई च कर खा गए हाय

लूट-लूट कंगाल बनाया कैसी घड़ आई

लूटा हम ऐसीमहँ गाई

चावल दाल आता थैली म

हजार दो हजार बताता दाम िमलता दूध दह चमचे भर और बोतल म पानी। रोट म घी नदारद

भाजी से तेल मसाला

लूट लूट कंगाल बनाया लूटा हम ऐसीमहँ गाई च कर खा गए हाय जहाँ-जहाँ

डालो

धूम मची है लूट क जग म। जो जग म महँ गा रहता

27/ का य र म


बाजार उसी का बकता

मोल भाव का नाता नह ं

अब तो बस बकता महँ गाई

लूटा हम ऐसीमहँ गाई च कर खा गए हाय रोट से

यादा भूख रहता

मौज शौक का नाम नह ं

प रधान िलबास है ढकता

जन जन जािलम यापार बनाया लूट-लूट कंगाल बनाया लूटा हम ऐसीमहँ गाई

च कर खा गए हम भाई!! - पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

28/ का य र म


बेरोजगार - अनुपम कुमार बेकार बेरोजगार दद जंदगी का खाकर ठोकर

दे कर अ जयाँ

पाया दद बेकार का बेकार बेरोजगार

है दद जंदगी का

खाली पेट दाना से

दर-दर क ठोकर खाकर है भरता पेट पानी से बेकार बेरोजगार दद जंदगी का

दन सारा फरता भटकता

शाम थक हार लौटता दे ख खाली रसोई ह काँप जाता

अपनी बेबसी कससे कह दद मेरा हर लेता

दो घड़ क रोट खाितर दद हजार सह लेता

पीड़ा पेट के सहपाऊँ

दबा वैद बताता

29/ का य र म


अपनी और अपने लोग क

काश िनजात दला म पाता

बेकार बेरोजगार है दद जंदगी का

खाकर ठोकर दे कर अ जयाँ पाया दद बेकार का

- पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

30/ का य र म


वंदना - अनुपम कुमार वीणा बजाती

ान क दे वी

हरे पाप मद लोभ अ ानता तू

जग म बहाओ ान क गंगा

वीणा बजाती

ान क दे वी

ेत प

ेत वसन

ेत रं ग म जग नहलाओ

वेद क

रचा

ऋ षय क वाणी जन जन

को कल कंठ वराजी

हरे पाप मद, लोभ अ ानता तू तृ

करो माँ जग सारा

दे कर अमर

वीणा बजाती

ान क धारा

ान क दे वी

हरे पाप मद लोभ अ ानता तू

ान के द पक से

जगमग करो जग

31/ का य र म


योित जलाओ ऐसी

हर आंगन

जग म बहाओ वीणा बजाती

ान क गंगा

ान क दे वी

हरे पाप मद लोभ अ ानता तू

- पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

32/ का य र म


यार का दुख कतना भार है

- डॉ. राजकुमार नायक मन के घेरे म

म िगर गया हू ँ

अब अनिगनत दुख मेरे िम

ह।

मेरा सुंदर जीवन

दुख से िघर गया है ।

और मेरा यार मुझसे बहु त दूर जा रहा है । मेरा यार अब मेरे

ेम के का बल नह ं है ।

मेरा

दय अब दुख का

आिलंगन कर रहा है यह यार का दुख कतना भार है !

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान धारवाड़

33/ का य र म


गु

जंदगी म कौन है क से बनगे

े

- र ा सदािशव गौडा

हम बिल

सोचते बैठ थी

एक दन

खयाल म थे हजार नाम

मुझे चा हए थे असली पैमाने

हम तो पौधे थे बने कैसे पेड़?

दया कौन िश ाचार

िमला कैसे सदाचार कसने दया

ान का भंडार

मुझम था यह सोच- वचार सोचते बैठ थी एक दन

नजर के सामने थे 34/ का य र म


हजार िच

मुझे चा हए था असली िच

सोचते-परखते

तुलना करते-करते

आ गया दमाग म एक नाम

नजर के सामने था सह पैमाना

वह थे दुिनया म सबसे बिल

े

और विश

िनः वाथ

ाणी

कोमल और कुशल भगवान से ऊँचे

माँ-बाप से िनकट

जंदगी क राह दखाने वाले

यह है सबसे

े

इनसे बनगे हम सबसे बिल

यह सोच रह थी एक दन

इनको ढू ँ ढ़ रह थी मन ह मन

भीतर से कसी ने पूछा 35/ का य र म


कौन है वे महान

तब जोर से िच लाई बार-बार दोहराई वह है

े

वह है बिल

दुिनया का िनमाता नसीब को बदलता व ा का दाता

वह गु

कहलाता पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

36/ का य र म


ना सोच, लोग

ना सोच, लोग

या कहगे!

या कहगे!

- संगीता गौड

यह बनेगी तेर बड़ कमजोर तू यह सोच तुझे

या करना है

नह ं तो जीवन म होगी हे रा फेर तू एक कदम बढ़ाएगी

कोई सोचेगा कुछ कह दे गा

और दस कदम पीछे ले लेगा सारा संसार तुझपर हँ सेगा तू नह ं लाचार क...

तुझे कोई इशार पर नचाए तुझम है इतनी ताकत

अपनी सफलता तूने दुिनया को दखाया

बस न सोच लोग

या सोचगे

तू अपने मन क सुन सदा लोग से तुझे

या लेना दे ना

ई र दे गा तेरा साथ सवदा

37/ का य र म


दल से पाना है कोई चीज न हच कचा उसे अपना बनाने म जी-जान से कर कोिशश ई र दे दे तुझे वरदान

िनडर बन पराय क सोच कोिध कार तेरा िनज जीवन पर है पूरा अिधकार तू अपने साधन से खुद रा ता बना बसन सोच लोग

या सोचगे

एम.ए. व ाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

38/ का य र म


गर बी

- गहनीनाथ झोपड़ म रहने वाले महल क अयाशी होती उ ह तकलीफ महल वाले

या जाने,

या जाने।

जाड़ा हो या बरसात रहना है उसी झोपड़ म ,

झेलते वे कतनी तकलीफ महल वाले

या जाने।

तन पर कपड़ा तो रहता है , पर बहु त कम , ल जा

या होती है ,महल वाले

बा रश म वो रोज ह भींगते ह,

भींगने क तकलीफ महल वाले

या जाने । या जाने।

उनके घर म कभी-कभी ह अ न रहता है , पेट क आग क तकलीफ महल वाले

या जाने ।। पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

39/ का य र म


मेरा अिभमान - गहनीनाथ जब म पहाड़ पर गया नीचे गहर खाई थी

लोग भी छोटे दखाई दे ते थे मुझे लगा म सबसे बड़ा हू ँ मुझे बहु त खुशी हु ई,

जब म पहाड़ से उतरा

सभी लोग समान नजर आए फर मने वचार कया या जादू है ये

कसी ने कहा

ये जादू तु हारे सोचने और दे खने का है अिभमान हो गया था तु ह

इसीिलए तु ह सब छोटे दखाई दे ने लगे थे।। पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

40/ का य र म


कहाँ गयावह बचपन

कहाँ गयावह बचपन

- वषा कुमार

वह सुकून,वह चैन

सब िमले जमाने हो गए। वह म ती, वह शरारत,

सब कए जमाने हो गए ।

वह खल खलाना,वह हँ सना

सब कए जमाने हो गए। वह रोना,वह िच लाना

सब कए जमाने हो गए।

माँ से झूठ बोलकर,घर से भागना सब कए जमाने हो गए।

पता क डाँट, पता क मार

सब दे खे जमाने हो गए।

बचपन को बीते जमाने हो गए। पीएच.ड शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

41/ का य र म


एक बेट क सोच - वषा कुमार

काश म भी िच ड़या होती

पंख के सहारे उड़ती रहती

ना कसी क परवाह करती ना कसी से डरती,ना ह

कसी से भेद-भाव रखती,

ना धम क परवाह करती ना जाित क

कभी इस पेड़ पर बैठती

तोकभी उस पेड़ पर बैठती,

मन को ब कुल साफ रखती ना कसी से बैर,ना कसी से

काश म भी िच ड़या होती

ेम,

पंख के सहारे उड़ती रहती।

ना कोई िम

सभी

होता,ना कोई दु मन

नेह भर नजर से दे खते

काश.....काश मेरा भी जीवन िच ड़याजैसा होता ।।

पीएच.ड शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

42/ का य र म


बेट इतनी पराई ज म मने िलया,शर र मेरा,आ मा मेर

य? - वषा कुमार

मन मेरा,सबकुछ तो मेरा है , माँ ने ज म दया,

पता ने परव रश क

माँ ने सीने से लगाया

पता ने भ व य बनाया,

माँ ने मेर इ ज़त बचाई

पता ने मुझे मयादा िसखाया

माँ ने नौ मह ने कोख म पाला पता ने अपनी पेट कटाई

माँ ने अपनी नींद गँवाई

पता ने अपनी खुशी भुलाई

ये सब

य?

बेट के िलए?

फर भी बेट इतनी पराई

य? पीएच.ड शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

43/ का य र म


माँ का कज माँ ने बेटे को नौ मह ने कोख म रखा,

- वषा कुमार

माँ ने बेटे को ज म दया, माँ ने बेटे को पाला,

माँ ने बेटे को बोलना िसखाया, माँ ने बेटे को चलना िसखाया, माँ ने बेटे को यार दया,

माँ ने बेटे क परव रश क , माँ ने बेटे को िश

त बनाया,

माँ ने बेटे को घर-प रवार दया,

माँ ने बेटे को अपना नाम दया,

माँ ने बेटे को समाज म इ ज़त दलाई,

माँ ने बेटे को र ते िनभाना िसखाया, माँ ने बेटे को सबकुछ दया, बेटे ने माँ का कज उतारा,

वृ ा म का रा ता दखाकर! पीएच.ड शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

44/ का य र म


नार का अ त व

- बंद ता नाएक

नह ं है इस जगत म िसफ भोग क व तु

नह ं है िसफ ब चे पैदा करने वाली मशीन यार, बिलदान और आ मसमपणक

अंितम पराका ा है वह।

हँ सती है जीवन म सब कुछ खोकर

बचपन का घर प रवार, र ते नात को छोड़कर सजाती है कसी अनजान य

का घर

कतना भी दुख हो वह नह ं बताती कसी को।

नह ं है इस जगत म िसफ भोग क व तु होता है उसके साथ हर व

शोषण

कभी उसका ताऊ, चाचा तो कभी पता

कभी उसका भाई तो कभी उसका मामा

वयं

र क ह भ क बन उसे लूट रहे ह

नह ं है नार केवल भोग क व तु

वहनह ं दे तीशोषण का जबाब

रोता है उसका दल

45/ का य र म


पर बाहर से खुश दखाई दे ती है ।

शोषण को सहतेहु ए भी हँ स कर बात करती है । उनके साथ गलत न हो,

जसने हमारे साथ गलत कया......

ऐसा केवल नार ह सोच सकती है । नार इस जगत म केवल भोग क व तु नह है । उसके भी अरमान होते ह, उसक भी कुछ

वा हश होती ह।

अपने अरमान पर, अपने

वा हश को

कनारे कर वह सबके िलए जीती है ।

कभी बेट बनकर, कभी बहन बनकर, कभी बीवी बनकर, कभी माँ बनकर।

नार इस जगत म केवल भोग क व तु नह ं है ।

जो औरत, अपने सारे सपन को

याग कर दूसर के िलए जीती है ।

उसी औरत के साथ,

आये दन बबरता होती है । कभी दहे ज के नाम पर,

कभी घरे लू हं सा के नाम पर, वह बस चुपके से रोती है ।

सामने अगर कोई आ जाये तो, वह कहती है

कुछ नह ं हु आ, है बस थोड़ सी चोट लग गई है 46/ का य र म


कल काम करते व त िगर गई थी।

वह उसको बचाती है , जसने उसको चोट दया है ।

नार केवल इस जगत म भोग क व तु नह ं है । ले कन अब सहने क सीमा जा चुक है । माँ वाली ममता भी जा चुक है ।

तुम हर व त उसको दद दोगे और सहती जाएगी वह नह ं, कभी तो

ितकार करे गी वह

लड़े गी तुमसे, तु हारे घमंड को चूर-चूर करे गी वह। पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

47/ का य र म


ाचार दे श के कुछ ग ार ने देश को गत म धकेला है ।

- बंद ता नाएक

आम आदमी का पैसा अपने खात म उड़े ला है । करोड़ म नह ं अब अरब म

पया भर ले जाते ह।

बाद म भारत क अथ यव था पर वह अफसोस जताते ह।

दे श के कुछ ग ार ने देश को गत म धकेला है ।

पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

48/ का य र म


उपकार - अनुपम कुमार

ओ माँ

तेरा उपकार कतना मुझ पर वणन क ँ ।

जाए बीत सार उ । धरा पर लाकर तून,े

कए उपकार है ऐसा।

कभी गोद म उठाया

कभी रोते से हँ साया।

जब भी पांव लड़खड़ाया आके िगरने से बचाया। नभ म उड़ना तूने िसखलाया। ओ माँ

तेरा उपकार कतना मुझ पर। वणन क ँ !

जाए बीत सार उ ।। दए सं कार है ऐसा

क ँ स मान म सबका।

दे खूँ!

वाब िसतार क

रहू ँ धरती पर हरदम म

बनाऊ! अंबर पर महल रखूँनींव पृ वी पर।

दए सं कार है ऐसा

बनूँ पहचान म खुद का।। ममता क आँचल से

49/ का य र म


बचाया हर तूफान से।

गम को मेरे लगाया दल से तूने जंदगी के सफर म पाया

हरदम साथ तेरा।

उ मीद के दए बुझने ना दया मन से िनराशा भर मन म

जलाएँ द प आशाओं के।।

ओ माँ

तेरा उपकार कतना मुझ पर।

वणन क ँ !

जाए बीत सार उ ।। धरा पर लाकर तूने

कए उपकार है ऐसा।

पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

50/ का य र म


शाबाशी - डॉ. स वता ड .

भोर क मीठ झपक झटक कर दूर फक

आलस के िलए फैले हाथ

िसमटकर लग जाते ह काम म । यु

का मैदान बना घर

सुबह क भागदौड़ के बाद जब शांत होता है तब

याद आती है ठं ड पड़ चाय।

खाली ड बे अ त य त सामान इनम िछपे य त

िचढ़ाते ह मुँह बाए

मेरे हाथ के फर शु

ण

पश के िलए!

होती है दूसर जंग

साफ सफाई स जी क थैली सूखे कपड़ क िसलवट

ब च के खाने के च चले और उनक पढ़ाई पर

ा

साथ अपने कंध पर लादकर

जब रात म पड़तीहू ँ ब तर पर

तब होता है मेर गलितय का हसाब इसे सुनते मेरे कान सब कुछ भुलाकर

खो जाते ह सुनहरे सपन म

कतनी मजबूत हो गई हू ँ म 51/ का य र म


वयं को दे ती हू ँ शाबाशी

अपनी ह पीठ थपथपाती हू ँ

जब क पता है कोई नह ं दे गा इस समारोह म....

ताली बजाने के िलए अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान चे नई

52/ का य र म


क व क गूँज म भी अनजान, छुआ मने गूँज के

- डॉ.पी. नजीम बेगम

श द कुशा को,

पाया अपने अंत: थल म क व क गूँज

क धारा को। बस था

या

मेरे रग म बहता गया गूंज का अ र,

मुझम समा गई

क व क गूँज।

एकाकार होने लगे,

मेरे श द क व के, श द कुशा से।

संयोग क बात ना थी,

जो क व ने पाया,

वह ं मने कया एहसास, समसामियकता का बोध

कस गए कुंज के श द कुशा

असोिसएट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान

चे नई

53/ का य र म


कभी सोचा ना था....

एक ितहाई ह सा है

- डॉ.ड .ड .दे साई

पानी धरती का,

फर भी बंद बोतल म बकेगा एक दन

कभी सोचा ना था। जहाँ पद म सुर

त थी नार ,

है वािनयत के िशकंजे कसगे

एक दन कभी सोचा ना था। जन हाथ ने चलना, पढ़ना, जीना िसखाया,

उ ह ं हाथ को वृ ा म जाना पड़े गा एक दन कभी सोचा ना था।

मं दर म चलेगा राज पं डत का,

और ठे ले पर बकगे भगवान एक दन कभी सोचा ना था।

आग और जहर से मरते थे लोग जहाँ ई या से इं सान जल मरे गा एक दन

54/ का य र म


कभी सोचा ना था। तीज- यौहार पर जगमगाती थी गिलयाँ, चौराह पर बछे गी लाश एक दन कभी सोचा न था।

मान-स मान,अिभमान ह जीवन जसका, इं सान ह इं सान को काटे गा एक दन कभी सोचा न था।

व ा

द

बीएड महा व ालय

ण भारत हं द

चार सभा

है दराबाद

55/ का य र म


वा हश - डॉ.ड .ड .दे साई

राह भटकते राह को,

हर हाल म रोकना है मुझे। बनके सहारा राहगीर का,

कुछ पल संग चलना है मुझे। बहु त हु ई

ढ़वा दता

ठोस प रवतन लाना है मुझे। राज करते ह नकाब पोश

इ ह बेनकाब करना है मुझे। चोर -चकार ,

ाचार का कद ऊँचा,

इनक औकात नह ं है मुझे।

यूं तो बहु त छोटे ह हाथ मेर,े

फर भी इनक िगरे बान पकड़नी है मुझे ।

धोखेबाज से मंड सजी,

जेबकतर से चौराह भरे ह,

दं गे-फसा ो से धधकता शहर। कह ं से अमन लाना है मुझे।

बाजार से भी बड़ हो गई दुकान

असली बिनयापन िसखाना है मुझे।

िश ालय को चढ़ है दुकान क खाल पुनः व ा मं दर इसे बनाना है मुझे अपने-पराए का

ऐसे इं सािनयत क

ान कर

वा हश है मेर ।

धन-लाभ से भी बड़े ह कत यधम,

56/ का य र म


ऐसी दुिनया बसाने क

वा हश है मेर ।

हर इं सान म इं सािनयत भर दूँ ,

हर एक क कमी को पूरा कर दूँ

हं सते-हं साते िनकले सूरज जहाँ और भाईचारे से हो शाम जहाँ ऐसे दे श म जीने क

वा हश है मेर । व ा

द

बीएड महा व ालय

ण भारत हं द

चार सभा

है दराबाद

57/ का य र म


छा

मन - र ा सदािशव गौडा

पहला भट अनजान होकर

आखर अल वदा अपने बनकर बीच क मासूिमयत

हम दे ती खुिशय क बरसात मु धता से भरे हु ए छा करते ह रोज शरारत

आपस म होती बात-चीत

कहते नह ं असली हक कत

डाँट खाते ह,झूठ बोलते ह ज़

करते ह, ह ला मचाते ह

सुबह से शाम तक म ती करते ह फर भी अ छे ह,स चे ह

रोज आनेवाले लड़ कयाँ

कभी कभार दखने वाले लड़के अंितम

ण क पढ़ाई

रोते-हँ सते पर

ाएँ

बना मन से आगमन

भार

दल से िनगमन

आँख म है हजार

व न

साथ ह साथ आँख नम

58/ का य र म


यह है बचपन

दखाते ह भरपूर अपमान खुदा ह जाने

मासूम ब च के धड़कन।। पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

59/ का य र म


कृ ित का स दय कृ ित क सुंदरता दे खो

- संगीता गौड

बखर चार ओर है

कह ं पर पीपल, कह ं अशोक और कह ं बरगद छोर है ! लाल गुलाब से सुख है

दे खो धरती के दोन गाल, लीली, चमेली मचा रहे ह,

दे खो कैसे धूम धमाल

दे खो हम से भरा हमालय नंदा क ऊंची पवत चोट

कल-कल कैसे बहती दे खो,

गंगा यमुना क िनमल रे ती कृ ित ने हम सबको दया

जीवन का अनुपम संदेश

आओ िमटाए, मन क दूर

दूर हटाए क

लेश !

एम.ए. व ाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

60/ का य र म


दलदल

समतल नद म दलदल !

- डॉ. बल वंदर कौर

शायद आप भी अचंिभत हो जाएँ ! पर ऐसा सच म है !

ये दलदल आपको लील लेगा !

इसक ख़बर भी न होगी ! जतना आप दूर भाग ...

ये और भी कर ब-गहराता आएँ !

ये बड़ आ मयता से िशकार बनाता ! और िशकार कर फर यथा थत कोई शक भी न कर पाएँगा इतना बु

मानी...!

शायद हम इस कला म िनपुण नह ं... इसिलए तो इसक आलोचना...

नह ं-नह ं आम आदमी नह ं बोल सकता

अपनी पीड़ा का दद नह ं खोल सकता !

भला सुनेगा कौन ?

बहु मत क राजनीित है भाई ! बहु मत कसका?

61/ का य र म


गूँगे, बेहरे , अनदे खे का...! अकेला आदमी पागल

अर तु ने सह कहा था...!

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान, है दराबाद

62/ का य र म


र ते फर

ं

- डॉ. बल वंदर कौर

म झुझलाया मन !

र ते समपण चाहते ह?

म कब पीछे थी इसम?

पर

ं

कस बात का...

असल म र ता होते ह कुछ... बंधने-सा लगता...

र ते भी सीमा म जकड़ने लगते

ऐसे म जो पूरे डू बते

या फर सतह पर ह रहते ... उनका

या ?

उ ह िमलती - असुर ा और... और िनराह

ं

!

तो अब समझ आया

सभी कुछ नह ं िनभ सकता ईमानदार से !

कुछ न कुछ छूट ह जाता है

वे लोग और है जो िनभा जाते ह...

हर र ते को... पर कैसे...? इसी

ं

म हू ँ ...

शायद कभी उ र िमल !

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान, है दराबाद 63/ का य र म


म छर से माँ क ओ म छर तू

या कर दया ?

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

ओ म छर तू

या कर दया

वनती - वी.

योित बाई

बेटे का तो खून चूस िलया ? चेहरे पर तो फुँसी लगाया

बेटा तो बीमार पड़ गया

बेटे को अ पताल िभजवाया बेटे को तू मले रया फैलाया

बेटा तो दवाइयाँ खाना इनकार कर दया बेटे क मासूिमयत का फायदा उठा तो िलया ओ म छर तू

या कर दया।

गुड नाईट बेटे का साथ नह ं दया । ओ म छर तू ओ म छर तू

या कर दया

या कर दया।

पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

64/ का य र म


एक माँ क

यथा

एक माँ के सारे ब चे

- पूजा पाराशर

आपस म झगड़ते रहते

प- रं ग पर मुँह िसकोड़ते

कभी अपनी भाषा पर अकड़ते मां बार-बार समझाती उनको य शिमदा करते मुझको

तुम सब मेरे लाल समान

कस बात का तुमको गुमान

एक दन दुखी हो माँ रो आई

जब सुना ! तूने मेर रोट छ नी....

तूने मेर रोट खाई.....

कहा माँ ने- मेरे यह सं कार कहाँ मने तो बोया बस

ेम का जहां

िमल बांटकर खाना तुम सब

िमलकर कदम बढ़ाना तुम सब आज ये कैसा अनथ हु आ

सोचा कुछ था कुछ और हु आ

भेदभाव बना डाला अपने ह घर म

सं कार को िमटा डाला अपने ह सुत ने बिलदान क इस धरती पर ये बू

वाथ क कहाँ से आई

रख लो लाज अब मेरे ब च

तुम सुत मेरे और सब अपने ह भाई 65/ का य र म


जहाँ भी रहोगे नाम मेरा ह सजेगा

तुम सबक उ नित से मान मेरा ह बढ़े गा पूव हो या प

उ र हो या द

म मेरे

ण मेरे

ब च , चलोगे एक साथ जो तुम िमटाकर भेदभाव जो तुम

जहाँ म, मेरा स मान बढ़े गा

तु हार माँ ‘भारत’ का द प हर दल म जलेगा ।।

एम.ए. व ाथ

उ च िश ा और सोध सं थान चे नई

66/ का य र म


या तुझे मने दया द

कर ई र तूने मंजल ु अ त व स व का,

- पूजा पाराशर

सांस का मोल ना िलया।

जीव जंतु को भी आ य दया। पु प दे वी का

पश दया।

मानव मू य का व तार कया।। दय म

हे स व !

ेम

काश दया।

या तुझे मने दया?

बस िलया िलया और लेता ह गया।

असफल म, एक बार ध यवाद भी न कया। तूने

ाण को भरा।

मने तो बस

य कया।।

अवशेष सागर म बहाया। वषा

बात म िमलाया।

नादान को घृणा पा

बनाकर ,

ेम तो मने ऐसे भुलाया।

वंिचत आज

वयं को पाया।।

परं तु उजाड़ रहा

कृ ित को,

या छोड़ रहा अपनी संतित को?

दे रहा

मेरे धृ

योता अशेष अिभशाप को। वाथ बताव,

न मुझे लगे क

म, ब क सबको।।

िमटा रहा रं ग उस खूब त वीर का। जसे नाम दया हमने

कृ ित का।

67/ का य र म


ाथना

वीकार

र ा मेर करो,

भु -

वयं क मुझसे करो।

तुझे ना मेर र ा करनी, आज यह

प

हु आ।

मेरे भ ण चंगुल से,

आज सुर ा तेर होनी। ऐसा यह

य

हु आ।। एम.ए. व ाथ

उ च िश ा और सोध सं थान चे नई

68/ का य र म


करम राजा

राजा साल म एक ह बार आते हो

य ?

- कृ ण चं

िसंह

रोज आना जैसे आते ह – रात और दन

तुम आते हो भादो मह ने क एकादशी म आना-आना-हर एकादशी को तुम बसे हो

कृ ित क गोद म

तु हारा अ त व और स दय बसा है – दो कुंआर क याओं के हाथ म तुम बसे हो वृ

क डाली म

कमल, प , फूल , और फल म

जैसे नद , झरना, पहाड़ बसे ह। कृ ित क गोद म।

तुम बसे हो गीत और कहािनय म तुम बसे हो लोक व ास म तुम हमार समृ

का

तीक हो

राजा तु हारे गीत अपार है । खाली हाथ से मत आना

साथ म ले आना मांदल बाजा 69/ का य र म


सब दन लाना-गीत और नृ य हाथ से हाथ िमला के

कमर-से-कमर िमला के पैर-से-पैर िमला के कौन

ी?कौन पु ष?

कौन ब चा?कौन वृ ?

सब म है - वशवास और भाईचारा

राजा साल म एक बार आते हो

य?

रोज आना जैसे आते ह – रात और दन

तुम आते हो भाद मह ने क एकादशी को आना-आना हर एकादशी को

राजा तुम हमारे लोक दे व हो

महादे व तो उस दन नशे म थे ! नशे से पथ

हो गए थे !

राजा तुम भी

या भटक रहे हो ?

ऐसा

य मुझे

ात होता है ?

मत भूलना अपनी पहचान को

इसम इितहास भी गवाह नह ं होगा।

तुम तो हमारे वािचक परं परा म हो न ह तु हारा

थान है – इितहास म,

न पुराण म, न वेद म

तु हे

थान िमला है , केवल लोक म

और िमला है , लोक व ास म

70/ का य र म


नह ं तो तुम भी एक दन बेचे जाओगे महादे व क तरह मूित बन के

कसी हाटबाजारऔर गिलय क दुकान म...! पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और सोध सं थान है दराबाद

71/ का य र म


कसान - कृ ण चं

म एक कसान हू ।ँ

िसंह

मेर आजी वका बसी है , खेत म मेरे कम क िनयित है , दो बैल और एक हल

म उगाता हू -ँ धान, गहू ,ँ ग नेऔर म का और उगाता हू –ँ

साग और स जी

र व और खर फऋतु म

साल म एक ह बार नह ं!

अनेक बार उगाता हू ,ँ फसल म एक कसान हू ।ँ म दे श क शान हू ।ँ

म दलाल और जमींनदार के,

ॠण के पैर म दबा रहता हू ।ँ

म स जी बेचता हू ,ँ

जब हाट और बाजार म और

ाहक क मुँह

जबानी क मत म दब जाता हू ।ँ

हर कंपनी ने ली है , मेर सहायता िनकाल ह, हर क म के सभी ने िलया है , मेरे

ांड

म का उधार

कंतु कोई दे ता नह ं है मेरा साथ

72/ का य र म


म दब जाता हू ,ँ मानिसक तनाव म और दब जाता हू ,ँ म म

जब ब खलाये हु ए मानिसक पीड़ा से

म अपने को फाँसी पर लटका दे ता हू ।ँ

दब जाता है , मेरा गला टं गी हु ई र सी म िनकलती है , मेरे मुँह से एक चीख

और वह रह जाती ह, जनता के बीच शासन, पुिलस,वक ल और सरकार

जब मेर मौत के कारण क छान-बीन करती है । और म दब जाता हू ,ँ

उनक बंध फाइल म!

हमेशा हमेशा के िलए। पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और सोध सं थान है दराबाद

73/ का य र म


तु हार पहली चीख - कृ ण चं

पृ वीकेगभ से व फु टत होकर

िसंह

िनकलती है भूकंप, वालामुखीऔर लावा

ये व फोटका क जो क

उसकाथा।

होते हु ए भी मौनथा।

वैसे तु हारा भी क

है ।

दय से व फोट हो कर िनकलता है , क

जो क

होते हु ए भी मौनथा।

!

तु हारे मुँह से िनकलती है -‘जब पहली चीख’ सुनते ह च क जाता हू ,ँ म

तु हार आँख म जो आँसू था। वह िसफ तु हारा नह ं था। उसम मेरा भी था।

मने उसे आ मसात कर िलया था।

तुमने मुझे लूटूत के ज रए द थी

जब मेरे

दय के मोबाईल,

और मन क

वचऑन थी।

ये दद के आँसू विश

थे।

य क, वह तु हार पहली चींख थी...! पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

74/ का य र म


एक नेता को दे खा तो - डॉ. सुभाष नारायण भालेराव गो वंद एक नेता को दे खा तो ऐसा लगा जैसे धांधली का वोट जैसे घोटाले का नोट जैसे बाँध का खोट

आ ह ता-आ ह ता रोता ये दे श

एक नेता को दे खा तो ऐसा लगा जैसे शेयर के भाव

जैसे भाषण का ताव जैसे

ाचार क छाव

जैसे लूटने का चाव

सड़क पर जैसे बैनर

एक नेता को दे खा तो ऐसा लगा जैसे कर शन का साइन

जैसे खुराफात क लाइन

जैसे दे श को लूटने का टाइम

आ ह ता-आ ह ता बखरा यह दे श एक नेता को दे खा तो ऐसा लगा।

75/ का य र म


िसमटती िसस कयाँ

- डॉ. मुकेश कुमार

डॉ टर मो हनी

सावन जैसी उमंग

ज म दन बनाऊँगी

दय म

बात मन क आज सार य को बताऊँगी

सपने जो सुनहरे बुने स चा उ ह बनाऊँगी उड़ना जो हो

ितज तक

उ ह पंख से सजाऊँगी सपने तो सपने रहे िम

जब ना आ सके

तार टू टे आज के

गीत जब न गा सके आंख म अ ध ु ारा

वरह म कब जा सके

वेदना ह शेष हो तो

76/ का य र म


सुकून कौन पा सके

नया खोल न बंद हु ए

न सपने क भौर हु ई

आँख से आंसू सूख चुके उदासी और हु ई

िसमटती िसस कयां भी अब काली घटा घनघोर हु ई मेरा जग

लय सी

चुपके से बन सोर हु ई

यिथत जब सकल लगे

अब एक ह सहारा है

ले जाता पार दुख के वह स चा कनारा है

क चे धागे र ते बंधन उससे र ता

यारा है

अब बस आज उसी पर अनंत ह हमारा है

ाम अथालाना

जला कनाल, ह रयाणा

77/ का य र म


गर ब ब च क

सुबह का था

थम

न हे -मु ने ब च क

जंदगी

हर

- डॉ. शिशकांत िम ा

आवाज सुनाई द कमरे के अंदर

खड़क खोलकर जब मने झांका,

ब च ने सब मेर ओर दे खा।

सब के हाथ म थी एक-एक थाली

एक-दूसरे से बितया रहे थे तुतलाती बोली।।

जा रहे थे हॉ टे ल के डाइिनंग हॉल क ओर तब तक नह ं हु आ था भोर। डाइिनंग हॉल म जाकर घुसे मन भरकर पेट म ठू ं से जो कुछ बचा

अपनी-अपनी थाली म भर कर चले,

लौटते व

फर मने दे खा

अपने-आप म झगड़ रहे ह

एक-दूसरे से जूठा चावल छ न रहे ह।

तबयाद आए

िभ ुक और िनराला, 78/ का य र म


याद आए

ेमचंद के घीसू और माधव

याद आए चाचा नेह

और उनका िशशु

िधक-िधक है

ेम

राजनैितक नरभ ीगण

िधक तु हार िशशु वकास नीित

िधक तु हार प रक पत योजनाएँ। य दे ते हो

तेिलया िसर पर तेल?

जरा कूड़ा-करकट क तरह

पड़े हु ए ब च क तरफ तो दे खो या गलती है उनक ?

या उनके माता- पता क ? अगर वोट दे ना उनके

माता- पता का है मौिलक अिधकार उनके ब च का वकास

य नह ं है तु हारा फज?

अगर नह ं,

तो बदल डालो सं वधान को

बदल दो नाम हं द ु तान का,

िलख दूँ वहाँ यह

थान है पूँजीपितय का।।

हं द

वभागा य

ए.वी. कॉलेज, है दराबाद 79/ का य र म


ान सिलला

एक बूँद को भी म समंदर करती चली गई

- डॉ. मो हनी

सिलला हू ँ वरासत क बढ़ती चली गई।। कहाँ कौन कहाँ कस िनिम

ज मलेता है ।

है कसके हाथ, सृ कता ह सब दे ता है ।

नमन है अनंत को जग िनयिमत कर लेता है । विध के िनयम वधान म ढलती चली गई।

सिललाहू ँ वरासत क ......

खल पु प,सारे जग बने सुंदर उपवन।

महके सारे कुसुम, यारा लगे यह मधुवन।

कृ ित के िनयम का बना रहे ये सुंदरवन।

शृंखलाएँ पु पमाला क इनसे बनती चली गई।

सिलला हू ँ वरासत क ....

अब से उपजी कोष जमा जमाकर आगे बढ़ चली संघष से जूझती समु

बन चढ़ चली।

िश ा द प से रा ते सब रोशन करती चली गई सिलला हू ँ वरासत क

िनज हे तु न स जन कुछ है

ण 80/ का य र म


पर उपकार का जीवनदाई कोश मेरा, है उ म सं कार का

अनुकरणीय पथ हु आ बना

े

यवहार का

एक सुखद जीवन के सपने बुनती चली गई सिलला हू ँ वरासत क ...

बाधाएँ सभी पथ क ठोकर से ठे ली है ।

आपदाएँ सभी पद क मेर लहर से खेली है ।

िमली जो इनसे अमृत बनकर

ेरणाएँ लेली है ।

काँटे जो पथ म िमले चुनती चली गई।

सिलला हू ँ वरासत क बढ़ती चली गई।

एक बूंद को भी म समंदर करती चली गई। ोफेसर एवं अ य

उ चतर िश ा वभाग ह रयाणा

81/ का य र म


सूरज क भाँित

- र या मंजूनाथ नायक

रात ढलते ह िनकल पड़े

सोने क छड़ लेकर आसमान म गूँजउठे पंिछय के नाद,

एक नए दन क शु आत क पुकार। पूरब से ऐसी िनकली या ा

सब जीव रािशय क दुिनया को जगमगाते प

म दशा आपके

िमलने के िलए िगनती रह मा ा। आभार ह आप से जग सारा सूरज क इस भाती से

जल और आसमान भी लेकर बैठे रं ग व

प पूरा।

पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान

है दराबाद

82/ का य र म


पहचान िगरना भी अ छा है ,

- र या मंजूनाथ नायक

औकात का पता चलता है ।

बढ़ते ह जब हाथ उठाने को, अपन का पता चलता है ज ह गु सा आता है

वो लोग अ छे होते ह। मने झूठ को अ सर,

मु कुराते हु ए दे खा है । सीख रह हू ँ म भी,

इनसान को पढ़ने का हु नर। सुना है चेहरे पे, कताब से

यादा िलखा होता है । पीएच.ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

83/ का य र म


बेटे से बनती चलते-चलते याद करना बचपन क बात को

- रे णुका बाले होसूर

मरण

माँ क ममता को भूल कर बु ू बनकर ना रहना

हम यहाँ से ले चलना

बीवी क बात म आकर

ब च को हमसे बछुड़ाकर पापा क नजर से बचकर बु ू बनकर ना रहना

हम यहाँ से ले चलना

ाण रखकर पाले पोसे

भूखे रहकर रख भरोसे

ममता क िनगाह से मुड़कर

बु ू बनकर न रहना

हम यहाँ से ले चलना

जंदगी के लाड़ले हो तुम

ना दो हम इतना गम

इस भवन म हम तड़पाकर बु ू बनकर न रहना

हम यहाँ से ले चलना मत करो वृ

क उपे ा

शेष नह ं हम कोई अपे ा 84/ का य र म


या यह

जंदगी है !

कट रह बे खी सी जंदगी

- डॉ. वजय हं दरु ाव पाट ल

दद दे ता मु कुराता जंदगी दन बेजान, कुछ अनजान

कुछ पहचान अतु

नकली मुकुट से,

आ माओं से

वाथ चेहर से

दर दर भटकता बेजान सा

फर उसी राह पर मजबूरन

लौट आता है –

एक बार फर जीने क दौड़ म – िच

साँस क

थम गई तो?

जंदगी पर

फर आने पर याद तेर

साँस

क जाती है

रात के अँधेरे म

85/ का य र म


सूरज को तलाशते ह या यह

जंदगी है ?

असोिसएट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान है दराबाद

86/ का य र म


िसफ इं तजार - डॉ. वजय हं दरु ाव पाट ल िमलते है कुछ यार दलदार जमाने के बाद

करवट लेती जंदगी म

गरजते बादल क तरह

कहते – अतीत क गलितयाँ दु

त करगे

भ व य को काफ खुशहाल बनाएँगे

ले कन उनको वतमान –

या पता

बंजर भूिम क तरह

बा रश का इं तजार करता लगातार – अब िचथड़े

दय के

जोड़ना नामुम कन न दु

त अतीत

न खुशहाल भ व य बेदद वतमान – बस िसफ

इं तजार ...

असोिसएट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान, है दराबाद 87/ का य र म


मेर

मेर

यार

रतीशा

सबक दुलार

यार

रतीशा

- डॉ. जयल मी पाट ल

रतीशा

दुिनया म बड़ िनराली वह सुंदर सा गोल गोल चेहरा रं ग सुनहरा

छोट सी उसक मुँह

मुँह म हो अंगरू के दाने जैसे दाँत

यार से सब उसे

बुलाते रतू

मीठ मु कान

जादू क पु ड़या है तू । वह जब हँ सती

जीवन क बिगया महकती वहाँ जब रोती

तो सुना होता आँगन

हमेशा हट करती दखाई दे ती 88/ का य र म


माँ क साड़ पहने गोल गोल घूमती माँ के जैसे बाल बनाकर

बनकर ट चर सब को डाँटती माँ का हाथ थाम वह मुझसे कहती

िलखो म जैसे िलखोवाऊँ बोलो ‘अ’

मुझे िलखते दे ख

वह खल खलाकर हं सती फर से मुझे चुमती

आकर मेरे गले वो लगती अपनी यार

यार बोली से

वह सबके दल म बसती म मी पापा नाना नानी सबक है बहु त दुलार ।

इन सब क टू शन लेती बनके मा टर

इ ह ं सब पर रोब जमाती ।

पापा का सेवर लेके आईने के सामने वह बैठती। रोज सुबह जैसे वे करते

हू ँ वह हू ँ वैसे ह वह नकल करती पापा को वहां आते दे ख

झट से उठती

उठकर वहाँ से तुरंत मेरे पास

आकर राजकुमार रोती और कहते पापा ने डांटा म उसे लगा कर गले उसक आँसू पोछते

89/ का य र म


झूठ-मूठ से उसके

पापा को एक चांटा म लगाती दे ख उसे वह खुश होती तािलयाँ बजाकर

खूब जोर जोर से हं सती हम भी वह खूब हं साती मेर मेर

यार

रितशा सबक दुलार

जंदगी म आने के िलए

तु हार शु

या ।

मुझे खास बनाने के िलए शु तुमसे जुड़ मेर नई पहचान

रितशा।

या।

आन मान स मान और अिभमान मेर

यार

रितशा

सबक दुलार र ितशा।

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान धारवाड़

90/ का य र म


याग दया - डॉ. जयल मी पाट ल

य

याग दया,

घर संसार बाबा! ज म लेते ह

मां बछड़ गई। म सहमी सी नह ं सी मा

तीन मह ने क

या जानू माँ बाबूजी

का यार,

बाबा माँ के बाद

आपने मुझे संभाला

कराया, पलाया, बड़ा कया

तो अचानक ऐसा

या हु आ

जो आपने मुझे याग दया और

याग दया

घर-संसार ।

अनुपमा अभािगन को

अकेले, आ म के म छोड़ चले पु ी मोह याग के

सार दुिनया से यूं मुंह मोड़ के र ते नाते सब छोड़ कसक खोज म

91/ का य र म


आप चल पड़े

सार दुिनया को छोड़

मुझ से इतनी दूर आप कसे म अपना मानू

य चल पड़ ?

कसे म बाबा बुलाओ

माँ तो वापस अब आ नह ं सकती

बाबा तुम तो लौटके आओ मुझे आ म से ले जाओ।

म कसी चीज के िलए हट नह ं क ं गी सदा तु हार सेवा क ं गी ।

बाबा,म तु हारे साथ रहना चाहू ँ

बाबाम तु हारे साथ जीना चाहू ँ मत करो मुझे अपने से दूर

वरनाले चलो मुझे भी अपने साथ य

याग दयाबाबा

आपने मुझे और यह घर संसार।

अिस टट

ोफेसर

उ च िश ा और शोध सं थान धारवाड़

92/ का य र म


नार का डर

डर लगता है मुझे भूत

- ज़िनत सबा

ेत से नह ं

इं सान के

वे जानवर

प म भे ड़ए से,

जो खुले घूम रह ह बड़े शान से, वे !आगे बढ़ने पर

दबोच लेना चाहते ह मुझे..

समाज म कदम रखने से पहले

मेरे कदम को रोक दे ना चाहते ह

मेरे अ त व का वखंडन करना चाहते ह !

डर लगता है मुझ,े

डर लगता है मुझे इस अंधी संसद से जो सब जान कर भी चुप है

मुझे डर लगता है हर उस सपने से जसम उस मानव का वहशीपन है

डर लगता है मुझे ...

पीएच.ड . शोधाथ

है दराबाद व

व ालय

93/ का य र म


कसका दोष

अपन को, पराय को, या भगवान ् को

- डॉ. गोरखनाथ ितवार

कसको दोष दूँ म?

क, हमेशा ज टल परे शािनय से,

जूझता रहता हू ,ँ फर भी,

उससे लड़ता हू ,ँ िभड़ता हू ,ँ

संघष जार रखता हू ,ँ

पुनः धड़ाम से िगरता हू ,ँ धूल-धूस रत अंग से

झटसे उठकर, पुनः संघष म लीं हो जाता हू .ँ मन म मा

एक ह उ साह,

क, जब मेरे आदश पु ष,

संघष से जूझकर,

छू लेते ह, ऊँचाइय को

तो कैसे न म उ ह ं का

अनुकरण कर छू सकूँगा?

और लड़ सकूँगा परे शािनय से.

जब कभी मन म यथा होती है अपरं पार, और संघष से दल काँप उठाता है ,

94/ का य र म


तो याद आते ह, ऐसे आदश संिचत पु ष,

ध य हू ँ म जो ऐसी महान वभूित आदश संिचत पु ष पाया हू ,ँ

जो मुझे साहस दे ते ह अपार तब

ण मा

डट जाता हू .ँ

म पुनः, कत य माग क तरफ

सर सफलता क तरफ अ िसत हो जाता हू ,ँ इसिलए सदै व ऋणी हू ँ म,

अपने आदश पु ष का, जनका

मरण करते ह ,

म कंटक को चीरते-फाड़ते हु ए

सफलता क सी ढ़य क तरफ दौड़कर सफलता

ा

कर ह लेता हू .ँ

अिस टट

ोफ़ेसर

उ च िश ा और शोध सं थान है दाराबद

95/ का य र म


य ऐसा सोचती हू ँ

हर दन जान क क

- के. कांचना

कए बना

जी-जान यागकर मेहनत करती हू ँ कभी प रवार से तो कभी अपने म इतना

य कुं ठत रहती हू ँ

य ऐसा सोचती हू ँ

सुबह से शाम कड़ धूप म तपती रहती हू ँ

य पागल सा जीवन का कटु मधु पीती हू ँ

बाढ़ हट गई उ

कट गई फर भी

य ऐसा सोचती हू ँ

समाज से डरती हू ,ँ आ मस मान हमेशा पाती हू ँ फर

य ऐसा सोचती हू ँ

कभी यह नह ं सोचती हू ँ क य म ऐसा करती हू ँ

य म कुछ नह ं सोचती हू ँ य ऐसा सोचती हू ँ

पीएचड .ड . शोधाथ

उ च िश ा और शोध सं थान है दाराबद

96/ का य र म


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