परिचय रचनाकार का नाम :शहर का नाम :-
पन ू म झा कोटा , राजस्थान
Email:-poonamjha14869@gmail.com
पन ू म झा
साहित्य पटल पर सक्रिय लेखिका के रूप में अपनी पिचान स्थापपत कर चक ु ी िै । आप सोशल मीडिया पर भी
अपनी उपस्स्थतत दर्ज कराते िुये ब्लॉग लेिन करने के साथ-साथ फेसबक ु के पिभभन्न साहिस्त्यक ग्रप ु से र्ड़ ु कर अपना रचनात्मक योगदान दे रिी िै । पिभभन्न पत्र-पत्रत्रकाओं में आपकी कपितायें, लघक ु था, इत्याहद प्रकाभशत िो चुकी िै । प्रगततशील लेिक संघ ईकाई - कोंच द्िारा प्रकाभशत काव्य श्ंि ु ी िै । आपकी र ला में भी आपकी रचनायें प्रकाभशत की र्ा चक
कलम तनरन्तर चलती रिे और समार् को हदशा दे ने का काम करती रिे इसी उम्मीद के साथ तेर्स्िनी प्रकाशन आपके उज्र्िल भपिष्य की कामना करता िै ।
कविता
पारसमणि अग्रवाल
प्रबंध तनदे शक- तेर्स्िनी प्रकाशन
8005271243
" बेटटयााँ " ———— ये पूछो मत मुझसे क्या होती है बेटी
न शब्द न पररभाषा में बंधती है बेटी। * चचड़िया नहीं, ममता से भरी मानव है हाँसते हुए बहुत कुछ सहती है बेटी । * सबको अपना समझती,कहाये 'परायी' पररवार से बहुत लगाव रखती है बेटी । * खद ु द:ु ख सहकर भी खश ु ी दे ती है अपने ददद बयां कम करती है बेटी । * दरू रहकर भी टदल में रखती सबको
स्नेह भरा टदल,पर भावुक होती है बेटी। * भावुक कर दे ती , जाती जब ससुराल दो कुल को आपस में जोिती है बेटी । * दजाद बराबरी का दं भ भरता समाज पर घर में भी इससे वंचचत रहती है बेटी। * कटु सत्य,आज भी कम खश ु ी होती
'मन में ' घर में जब जन्म लेती है बेटी। * " काश, बेटी न होकर होती मैं भी बेटा " इसी ववडंबना से घायल सोचती है बेटी । * शब्द कम हैं, कहूं 'बेटटयों' के बारे में साहस अदम्य फिर भी सहमती है बेटी। * गर सुववधा ममले आगे बढ़ने की "पूनम" तो हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकती है बेटी
गीत
------कब आओगे मोहन सुन मेरे प्यारे कृष्णा। तेरे बबना सूना सूना वंद ृ ावन तुझे पुकारे
गोपी तेरी राह ननहारे सब बनी अब जोगन
कब आओगे मोहन। * मन में सोच रही राधा जीवन क्यों बची आधा। सखखयों को क्या बताऊाँ उर चैन कैसे मैं पाऊाँ नीरस लागे अब जीवन कब आओगे मोहन । * झूले पर गए बागों में
मेहाँदी रच गई हाथों में बदरा उमि-घुमि आये गरज गरज हमें डराये
मस्ती में छे ि जाए पवन कब आओगे मोहन | * बहारों ने ली जो अंगराई है तेरे प्रेम की ही गहराई है गेसुएाँ ननगोरी चम ू ें गालों को समझाऊाँ कैसे मतवालों को प्राण तजूं अब मैं बबरहन
कहो कब आओगे मोहन |
कववता
पहचान ----------------------अच्छा ! कहो क्या पूछते हो ? मेरी पहचान ?
मैं भी तो बचपन से अपनी पहचान ढ़ूंढ़ रही हूाँ । जब फकसी एक उपमा को अपनी पहचान बनाने लगती हूाँ
तो दस ू री उपमा ममल जाती है । एक से दस ू रे
दस ू रे से तीसरे
तीसरे से ........... अब कहो फकस उपमा को अपनी पहचान कहूं ? कैसी बातें करते हो ? नारी हूाँ यह जानते हुए भी मेरी .......... नारी की कोई स्वतंत्र पहचान नहीं होती । तुम्हें ववश्वास नहीं तो दे खो
" न " भी स्वतंत्र नहीं " ना " " र " भी स्वतंत्र नहीं " री " " नारी " अब बोलो ? पर सत्य वचन सन ु लो नारी बबन नर का भी वो सम्मान नहीं ।
गजल झूठा ननकला करार तेरा ।
फिर भी है इंतजार तेरा ।।
* लाख समझाऊाँ टदल को चाहे फिर भी दीदार तेरा । * माना जब बेविा हो तम ु
क्यूं टदल चाहे प्यार तेरा । * जख्म कुरे द लेते खद ु ही
हम तो करके एतबार तेरा । * बीमार फकया खद ु को "पन ू म"
जबफक खबर है इनकार तेरा ।
कववता ----------सावन आयो री झूम के,
चहुं ओर हररयाली छाई है , झल ू े
पर गए बागों में , मस्त-मस्त पवन झम ू ें , संग-संग
ये मन भी डोले, आओ सखी झूला झूलूं मस्ती में आज , पें गे ले झल ू ा
ले चलाँ ू आकाश , पवन संग गेसुएं
अलमस्त हो लहराये, साथ-साथ
आंचल झूमें और इठलाये , चहूाँ ओर हररयाली छाई है , बहारों ने ली अंगराई है , झूम झूम
सावन आयो री |
मुक्तक ------------चन ु ाव आते ही नेता वादे पर वादे करते हैं
जनता के पैर छूने को भी तैयार ये रहते हैं चन ु ाव जीतते ही बन जाते हैं ये शहं शाह -
भल ू वादे कुसी के ही इदद -चगदद ये रहते हैं ।
मुक्तक --------------------धन्य हैं वे माता-वपता, संस्कारी बच्चे जजनके होते समाज में आदर के पात्र वे और बच्चे उनके होते करता सम्मान माता-वपता का और करता सेवा जो कहाते श्रवण कुमार, आज्ञाकारी बच्चे जजनके होते ।
मुक्तक ------------
काश अलग-अलग धमद नहीं होते धमद के खानतर फिर अधमद नहीं होते एक मानव जानत केवल होती तो इतने सारे अनगदल कमद नहीं होते ।
कववता ------------आज स्कूल में फकसी दे वी की
तस्वीर बना कर लाने कहा है । क्या बनाऊाँ ? मैंने तो दे खा ही नहीं है दे वी को । सोच में पिी है लाडली , मााँ को लक्ष्मी कहती है दादी । मलया तूमलका हाथ में
लगी उकेरने अपनी मााँ की ही तस्वीर । अंफकत करती जाती बना मुद्रा गंभीर । आंखों को काजल से सजा दं ू जरा, होंठों में लाली लगा दं ू जरा ।
कानों में बाली पहना दं ू जरा,
चााँद भी ईष्याद करे ऐसी तस्वीर मााँ तेरी बना दं ू जरा । ओफ्िो !!!
मााँ दे खो न । फकतना सजाया , फिर भी तम ु सा संद ु र नहीं बन पाया । तम ु सबसे प्यारी हो ।
कल चलना मेरे साथ तम ु , मेरे स्कूल, टीचर से कहूंगी,
दे ख लीजजए मेरी मााँ को ये है दे वी, जब दे वी ही है सामने तो तस्वीर बनाकर क्या करना । है न मााँ ? है न ?
व्यंग्य...... ........ पत्नी -- " अजी , बमाद जी आपसे नाराज हैं क्या ? " पनत -- " क्यों ? " पत्नी -- " आजकल दे खकर भी नजरअंदाज कर दे ते हैं । " पनत -- " वो ऐसा है फक कुछ टदनों से मैं ड़डस्टबद था, तो मुझे खश ु रहने के तरीके बताते थे । और जब मैं खश ु रहने लगा तो वो मझसे खिा हो गए । "
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लघुकथा " घण ृ ा " ---" शाल,ू ममनी को सोने दो । छोटा सा तो काम है , 20-25 ममनट में तो हम आ ही जाएंगे ।
यटद बीच में उठ भी गई तो ववजय ( ममनी का चाचा ) है न सम्भाल लेगा ।" ------रवव तैयार
होते हुए कह रहा था । " अरे यटद ये बीच में उठ गई और मुझे नहीं दे खेगी तो बहुत परे शान होगी । "-----शालू सािी का पल्लू ठीक करते हुए । रवव -----" अब ये साढ़े पााँच साल की हो गई , स्कूल जाती है और घर में अकेले भी तो नहीं है । ".......
शालू ममनी को लगभग खींचकर उठाते हुए ---- " रवव आप नहीं समझोगे । "...... ममनी को चप्पल पहनाते हुए मन ही मन -----" इन परु ु षों के स्वभाव को समझना आसान
नहीं है | "-- उसके सामने अपना बचपन घूमने लगा और अपने चाचा की छवव याद आ गई | अंदर ही अंदर शालू एक घण ृ ा भाव से छटपटा गई ।
आप बीती पर आधाररत ....... ..... लघुकथा " एक सच ऐसा भी ".... -------------" उईईईईइइइ !!!!!! " ---डरकर जोर से चीखती हुई शीलू उछल पिी ।..... वहीं खिा समीर हाँ सने लगा ---" अरे ये रबर का सााँप है । " शीलू ---" समीर कहााँ से आ रहे हो और ये क्यों ले आये ? ये तो बबल्कुल सााँप का बच्चा लगता है । "
समीर---" बाजार से आ रहा था तो बस यूं ही दस ू रे खखलौनों के साथ इसे भी खरीद मलया । "
शीलू----" मााँ कहती है ऐसी चीजें घर में नहीं रखना चाटहए क्योंफक इससे सचमुच का सााँप भी आ जाता है । "....
समीर ---" ऐसा कुछ नहीं होता है । "....
शीलू---" ये तो ममनी को मत ही दे ना । "
फिर सभी अपने कामों में व्यस्त हो गए । ममनी भी खखलौनों में व्यस्त हो गई । शाम का वक्त था । कुछ दे र बाद शीलू ममनी को गोद में लेकर बाहर जाने के मलए चप्पल
पहनने लगी तो उसे पैर और चप्पल के बीच कुछ महसूस हुआ | उसे लगा कोई खखलौना है | उसने चप्पल को जोर से झटका टदया । फिर !!!! दे खा फक झटकते ही सामने िशद पर सााँप का छोटा सा बच्चा रें गने लगा । शीलू स्तब्ध हो िटी नजरों से दे खती रह गई ।