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kon h katil

Page 1

यह ीं कह ीं गिरा था रुगिर,परम ् त्याि की चेतना से बहकर,

सीमा का मान सींभारो,

यह ीं कह ीं रोया था

है ,मशव का त्रिशल ू अब भी बैरािी

हुआ था। एक-एक अश्रु शहादत के पि

सहकर,

प्रततशोि की ज्वाला जलने न

वदी का आिार र्ड़ा,वदी की राह

माता की जय कहकर।

पर तनज मान के द पक में लौ

िौरव ,पीड़ा के कींिों को भार

कैसा ये क्रींदन है ?

र्ाकी को किन बनाकर ओढ़

िआ ु ाँ छटा तो ,रर् बहुत थी िींिा

आने में ,

मा​ाँि समय की जब थी,िैयख न

रार् हट तो,अींिार बहुत थे दोषी

मनाने में ,

नह ीं कोई था बाध्य समर को,पर

शमशान परे क्या है ,तू क्या

ये वह चौर्ट है जहा​ाँ से तनकला

ने।

इतना मालम ू मिर है ,लौट वहा​ाँ

थे,राह नई िढ़ आये थे,

समर की पावनता का पाि,हमें

पढ़ आये थे।

फकतने भेजोिें दानव तम ु इस

बालक मभजवाए थे,

स्वाित है , काल र्ड़ा हर सीमा

सर पर त्याि की पिड़ी िर

समर का असल सार तम ु को

तूिान थमा तो ,दहसाब बहुत

समर का असल सार तम ु को

ततरीं िा,वीरितत का हृदय घात यह ीं कह ीं गिरा था सैतनक,भारत अब यह ममट्ट चींदन है,फिर अरे मर् ू ख ,तुझे कुछ दे र हुई थी समय अभी है जीत का जश्न दोषी को सज़ा ददलाने में ।

फक काल का र्प्पर र्ाल

उस ददन घर में ,पवलाप बहुत

है ।

द,

अब भी बाकी है।

मलया था कुछ वीरों ने, र्ोया उन िीरों ने,

रण को मलया साध्य उन वीरों

था,वापस आने की बात वो

घस ु पैदिये घर में घस ु आए

यह ीं कह ीं गिरे थे इींतज़ े ार के

पर प्रहर सजि र्ड़े थे,िीता को

यह ीं कह ीं वो अब भी हैं,िए स्वयीं

वीरता दे र्ो दश्ु मन की,लड़ने को

आघात यह है इींसाि ममला

और यहा​ाँ नन्हे बालक, पपता के

र्ैर, दे र्ें फकतना और अभी रण

आये थे।

कहकर,

फकले,मत्ृ यु शोक में ढहकर।

को जो सबकी यादों में िहकर, नह ीं,इतनी दल लें भी दे कर। बाकी है ,

मालम ू हमे है ,तनज प्राण,अभी प्रण बाकी है ।

हुआ था,

पर्ार रहा था,

तनहार रहा था,

मन से सम्भार रहा था। में बहाने को,

को जलाने को।

जाने,मैं क्या जानाँ,ू

से भी आता है सैतनक, पढ़ाने को।

िरती को जलाने को,

पर है ,उन्हें तनिल जाने को। बतलाने को। बतलाने को।


ख़तरनाक है शोर का र्ामोशी से मर जाना,

दे श का कुरुक्षेि में पहुाँच जाना,

चीर् का घुट के रह जाना,

ख़तरनाक है स्वयीं पवनाश को तनमींिण दे आना,

ख़तरनाक है सीता के मान का अयोध्या में चोदटल हो जाना,

बालकों को समर का सार मसर्ाना,

राम की प्रतीक्षा में लींका में बींद रह जाना,

र्तरनाक है महत्वकाींशा का सारथी हो जाना,

ख़तरनाक है तनरापराि मूरत का ममट्ट में ममल जाना,

अपनों से पट भू-तल को दे र् न पाना,

सीता का िरती में समा जाना,

र्तरनाक है बाहों के बल का हर जाना,

र्तरनाक है ज्ञातनयों का मौन रह जाना,

जीत के मलए छल कर जाना,

माताओीं का आिे न आना,

र्तरनाक है ममता के हृदय को आहत कर जाना,

ख़तरनाक है फकसी राम का कमख का बींद हो जाना,

पाींडव पुिों की भी बमल चढ़ जाना,

तनदोष फकसी सीता को वन छोड़ आना,

ख़तरनाक है स्िी के अींतर की आि का िरा पर उतर आना,

ख़तरनाक है फकसी सीता का अग्नन में उतर जाना,

आींिन में प्रततशोि का वक्ष ृ लिना,

अपने अींतर की आि से अग्नन को न जलाना, र्तरनाक है फिर उसी इततहास को दोहराना, एक महाभारत को रचाना, ख़तरनाक है सींवेदनह नता का सभा में ननन चले आना,

र्तरनाक है अमभमन्यु को अिरू ा ज्ञान दे जाना, कोर् में ह भपवष्य का िढ़ ददया जाना,

र्तरनाक है फकसी दय ु ोिन को पोपषत करना, अन्याय का ,अगिकार को शोपषत कर जाना,

सींवेदनाओीं का मौन रह जाना,

र्तरनाक है एक भीष्म का अगिकार हर मलया जाना,

ख़तरनाक है कलम और मुकुट का किपत ु ल बन जाना,

फकसीशान्तनु का कमज़ोर पड़ जाना,

र्तरनाक है सींस्कृततयों को अपमातनत कर जाना,

अगिकार के मलए न लड़ पाना,

त्रबकने को बीच बाजार बैि जाना,

र्तरनाक है िींिा में ज्वार न आना,

मनुष्यता के ससींस्कार का मर जाना,

र्तरनाक है फकसी अम्बा को अपमातनत कर जाना,

सभा का मूक रह अपरािी हो जाना,

र्तरनाक है र तत-ररवाजों का आडम्बर में ढल जाना,

नार के मान को िमू मल कर जाना,

र्तरनाक है सभ्यताओीं के पौिों में घण ृ ा का फ़लना,

आवश्यक है कुन्ती-िान्िार का सभा में रह जाना,

र्तरनाक है मनुष्य का मनुष्यता की गचता को सजाना,

ख़तरनाक है फकसी ित ृ राष्र का िद्द पर बैि जाना,

र्तरनाक है मनुष्य से पहले मनुष्यता का मर जाना,

ख़तरनाक है सभा में आज भी द्रौपद को तनवखस्ि कर जाना, ख़तरनाक है एक कणख का मयाखदा भूल जाना, र्तरनाक है फकसी अग्ननसुता को अग्नन बना जाना,

िान्िार की आाँर्ों पर पट्ट बींि जाना,

ख़तरनाक है फकसी फक कमी को हाँसी में उड़ाना, फकसी को जान कर नीचा ददर्ाना, र्तरनाक है आज भी कणख का उपेक्षक्षत रह जाना, कुल की पहचान का सामर्थयख से बड़ा हो जाना,

ख़तरनाक है समाज में िुरु का अपमातनत हो जाना, दक्षक्षणा में एकलव्य का अींिूिा कट जाना, र्तरनाक है राजनीतत का अींिा हो जाना,

फकसी वस्तु की तरह जीत कर लाना,

समय के साथ कदम ममलाकर न चल पाना, मनुष्य का भेद-भाव की ममट्ट में पलना,

अपरािी हो भपवष्य को श्रापपत कर जाना,

महाभारत के पािों को आज भी प्रासींगिक कर जाना,

र्तरनाक है मनुष्यों के युद्ि में सींवेदनाओीं का हार जाना, िमख के सींरक्षक पािों पर प्रश्न उिना, र्तरनाक है सींवेदनाओीं का हार जाना, र्तरनाक है सींवेदनाओीं का हार जाना।। -पप्रींसी ममश्रा


……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… कौन है काततल? फकसने हत्या की

न िूट फकस्मत है इन रस्तों पर

हर दर ममल जाएाँिे ढोंिी ,बच्चों

इनको चलाती,

को भी ि​िने वाले।

सब तनष्प्राण,ददर्ाई दे ते हैं।

फकसी अपने,

पहले जाल त्रबछाया जाता है ,फिर

फिर,

या जाने पहचाने चेहरे से ज्यादातर

लाश र्ड़ी,मुदों से क्या पूछ रह

हैं िोर्ा र्ाती​ीं,

मशकार िाँसाया जाता है ,

है ?

मण्डी लिती है ,फिर परर् है होती,

सत्तर साल हुए आज़ाद को, बाँिी बेड़ड़यों में अब क्यों आज़ाद

जी हा​ाँ सह

सुना ,फिर परर् है

फिर एक-एक करके सारा बाजार

चीर् रह है ?

और फिर सरे आम इनकी इज़्ज़त

िे केदार करते हैं जो इन मोहल्लों

कड़वा सच, कानों को र्ब ू चभ ु ेिा,

बाज़ारू होती,

की, उनका डर बिावत के हृदय त्रबिाया

बहे िा,

ऊाँचे-ऊाँचे भाव से लेकर िुटकर तक बोल लिती है ,

जाता है ।

और फिर अपनी ह काया इनको

बींिाल,त्रबहार,असम,आींध्र और य.ू पी

है ?

पढ़

कर

सबके

ददलों

से

रक्त

रूह समेट लो अपनी अब सब, अक्षर-अक्षर

एक

काल पीर कहे िा,

'वैश्यालय'

इस पपींजरे के बींद

की

की पथराई

होती,

ि​िती है ,

फकतनी तो अपनों के ह

हाथों

हर नुक्कड़ पर सौदा करने को,एक दलाल त्रबिाया जाता है , ददर्ाया जाता है ,

की र्ेती से,

इनको इस मींडी में र्ास माँिाया

त्रबकती हैं।

जाता है ।

आाँर्ों में ,

अब सींयम बा​ाँिों,

इतना नह ीं बस,

िौर से दे र्ो तो, फकतने भेड़ड़यों

कलम इससे भी कुछ कड़वा कहने

इस काले बाजार को ,जमाने की

वाल है ,

र्ाततर,

चौंक िए फकतने पढ़कर ये?

एक ततहाई से ऊपर इस काले

शाद

मानो मैंने िाल द हो।

बाजार में , बच्चे त्रबक जाते हैं,

बाज़ार लिाया जाता है ,

असभ्य नह ीं कुछ भी कहती हूाँ, जो सच ,पर कड़वा है ,उसे कािज़

ऐसे लोिों का हृदय क्या भावों से

दाम जहा​ाँ लड़के का घर दे ता है ,

र्ाल है ?

और इतने पर भी लड़की के घर

पर रर्ती हूाँ।

मलर् कर भी ये चभ ु ती सच्चाई

को सींकोच न होता है ,

िाल हैं जो,

िेरो नह ीं नज़र ये, और िौर से

दे के आया है ?

पहचान कराओ उनकी भी, इन

दे र्ो अपने बच्चों को,

सच ये है फक,

िमलयों में इनको लाया जो,

सोचो क्या कर िुज़रोिे, नज़र कोई

मुनाफ़ा कमाने की र्ाततर,कच्चा

इसी उम्र के हैं ज्यादातर ,बच्चे

कल को बेच फकसी बाज़ार उसे वो

का अक्स ददर्ेिा।

तथाकगथत सभ्य समाज में भद्द

मालूम नह ीं हो तुमको तो बतला दाँ ,ू

अपने

कदम

ज्यादातर आती​ीं,

चलकर

नह ीं

है

हर लव्ज़ सवाल ,

जो इनपर डाले काल ,

जैसे पावन ररश्ते का भी

फकतनी बार सुना फक,लड़का दहे ज

दाम चक ु ाया है ।

बाज़ारों में इन त्रबकने लाये जाते।

आएिा,

नह ीं

और फिर नया मशकार िाँसाएिा।

कोई

है

र्ैरख्वाह,न

ज़ख्मों पर मरहम रर्ने वाले,

कोई


बेहतर

ग्ज़न्दिी

के

सपने

फकतने

ददर्लाये,

अपने दामन को पाक साि बताते

एक नज़र उिर भी कर लेना,

हो,

और एक और मत्ृ यु के शोक में आाँर्ें

सभ्य समाज के वासी कहलाते हो, फिर फकसी 'मसतारा,लक्ष्मी,माया' को

फिर क्यों इन काल िमलयों में जाते

त्रबकने को ले आये।

हो?

दबोच

कह ीं

फकसी

िल

कींू चे

से,अनजान राह पर पहुाँचाया, और फिर भटकने का इल्जाम,उसी के

नम कर लेना।

िूल यहा​ाँ भी खर्लता है , हालाींफक,

तुम न जाओ तो बाज़ार लिें िे क्यों?

जन्म के साथ ह ,जीवन का अमभशाप

फकसी नन्ह ीं बच्ची के,र्ाब त्रबकेंिे

भी ममलता है ।

क्यों?

जीवन अमभशाप भी ममलता है ।

सर आया,

फकसी

बदहष्कृत इस समाज से,यह तनदोष

क्यों?

सब तनष्प्राण ,ददर्ाई दे ते हैं,

रह ,

इतना कह कर भी,एक अहम बात तो

ग्जन्होंने दलदल से बाहर तनकलने

रह ह ियी,

लाश र्ड़ी मुदों से क्या पूछ रह है ।

ददया नह ीं,हैं असल दोषी वह ।

अब अच्छी-बरु तय र्द ु कर लेना,

कौंन है काततल,फकसने हत्या की, लाश र्ड़ी,मद ु ों से क्या पाँछ ू रह ?

एक

औरत

बार

इन

फकलकार तो,

के

अरमान

िमलयों

त्रबकेंिे

में

िाँज ू े

कौन है काततल,फकसने हत्या की है ,

-पप्रींसी ममश्रा


कल का बीता लम्हा कुछ र्ास रहा ,

जो िुज़र िया, एक कड़वा एहसास रहा, चलती लाशों का, मौन यहा​ाँ शमशान रहा, तपखण को घाट िए तो,िींिा का पानी लाल रहा, इस पर भी, हाथों में जो घट था उसमे, ग्जींदा दहींदस् ु तान रहा,

ग्जतना भी था,जीवन भर वदी का अमभमान रहा,

जलते अींिारों में पलता,हर आाँर् में चमकता,हृदय का भाव ये िततमान रहा,

श्रि ीं ृ ार ममले जब वीर भाव से,दाम्पत्य उनका महान रहा,

अथी के चरणों को चम ू ,छलकता िरती

अनाथ होते बच्चों के बल से,सनाथ ये

पीछे चलते पपता के चरणों से,चींदन हो

अपनों की आाँर्ों से िौरव बन बहता,हर

जाने का ममट्ट को अमभमान रहा,

वीर जवान रहा,

का हर एहसास रहा,

हर गिरते जवान के बल से,शममिंदा मसयासत का र्ोर्ला अमभमान रहा, कौन है जो िरती-अम्बर के क्रींदन से अनजान रहा, नन्हें बालक की आाँर्ों से गिरता तनश्चल आाँस,ू पीड़ा की पहचान रहा,

दहींदस् ु तान रहा,

सैतनक के घर से िीरे -िीरे ररस्ते सुर् के बल पर,र्श ु हाल ये दहींदस् ु तान रहा, नन्हें बालक के हाथों में मुर्ाग्नन

दे र्,मत्ृ यु की आाँर्ों में जीवन का मान रहा,

सीमा के यज्ञ में आहूतत बन, अपपखत तनज प्राण रहा,

आाँर्ों में चढ़ कर, ज़ब ु ा​ाँ तक आता,

नन्हें कदमों की पद-रज को चम ू ,ररणी

सब तीरथ दे र् मलए पर,सरहद सा न

घायल मा​ाँ के छलनी आाँचल को,बेटे का

सैतनक के घर के मातम के बल पर,जन-

कोई भी िाम रहा, सरहद के आाँसू के बल से,केसररया िींिा तट का पररिान रहा,

इतनी कुबाखनी से िल ु -िल ु कर उजला भारत का मान रहा,

ग्जसमें छलकता ,नीले अम्बर का शीतल अमभमान रहा, शुशोमभत हर ओर िारा पर,िानी िरती का भाल रहा,

लहराता तनज मान सींभारे ,ततरीं िा मेरातेरा महान रहा, फिर भी चलती लाशों का मौन यहा​ाँ शमशान रहा, तपखण को घाट िए तो िींिा का पानी लाल रहा, उजले पवखत पर ददर्ता लहू,भारत के माथे पर कुमकुम बन पहचान रहा,

ममट्ट हो जाने वाला,अजर-अमर शह द हर जवान रहा, हाथों में जो घट था उसमें ग्ज़ींदा दहींदस् ु तान रहा,

यतू नट का अमभमान रहा, इींतज़ार रहा,

िरती का अमभमान रहा, िण-मन ये महान रहा,

िमू मल और ढका िगू िया कोहरे से,करवे

कुबाखनी का िरती के कण-कण को भान

पज ू ा की चौकी पर सज कर बैिा,पत्नी

तनरथखक-तनलखझ मसयासत का ,शममिंदा

चलनी से पल-पल झा​ाँकता, प्यार नयन

नन्हें बालक की आाँर्ों से छलकते ददख

का चा​ाँद रहा,

का इींतज़ार रहा, के द्वार रहा,

रहा,

झि ू ा अमभमान रहा,

से,िींिा में ज्वार रहा,

मुरझाता सा अब वो पूरक,बाहों का हार

हाथों में जो घट था उसमें ,ग्ज़ींदा

पायल,त्रबतछया के मातम में ,होिों पर

चलती लाशों का मौन यहा​ाँ शमशान रहा,

रहा,

मन का ज्वार रहा, पायल और चड़ ू ी का क्रींदन सुनता ,घर ये र्ाल सा मकान रहा,

लाल ओढ़नी पर भार ,ततरीं िा वो महान रहा, फिर भी ,वीरता,त्याि तपस्या पर भार

दहींदस् ु तान रहा,

युद्ि भूमम की पावनता का सैतनक को भान रहा,

वन्दे -मातरम मुरझाते होिों पर अींततम िान रहा,

अम्बर तक लहराता ततरीं िा,शह द के किन का मान रहा,

,अब भी श्रि ीं ृ ार रहा,

युद्ि काल का िौरव, शाग्न्त युि में

साथ रहा,

तनज कुटुम्भ के त्याि के बल से ,ग्ज़ींदा

घुलता जो िीरे -िीरे ,अब भी उन्ह ीं के आज़ाद पररींदा दे र्ो,पपींजरे को बींजर होने का आघात रहा,

चोदटल बमल बेद का मान रहा, दहींदस् ु तान रहा।

ग्जींदा दहींदस् ु तान रहा।।


00000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000 कािज़ के चींद टुकड़ों में बींद होती है ,

लफ़्ज़ों की बड़ी तीर्ी ज़ुबान होती है ,

जब कलम सच की मसयाह से भीिी होती है ।

उसल ू ों की फकताब अक्सर,र्न ू के आाँसू रोती है ।

सच के पहरे दार को सक ु ू न की नी​ींद कहा​ाँ नसीब होती है ? भटक िए हैं फकतने इस रास्ते की भल ै ा में , ू भल ु य

फकतने र्ा रहे हैं िोते असमींजस के ज्वारभाटे में ,

फकतनों को मालम ू ह नह ीं लेर्नी हगथयारों का नह ीं, बग्ल्क पवचारों का एक ऐसा द्वींद है , जहा​ाँ शब्द कुछ ऐसे टकराते हैं,

फक पवनाश नह ीं ,नव तनमाखण होता है । और जो स्वयीं से यद् ु ि नह ीं करता,

वो इस यद् ु िभमू म के योनय योद्िा नह ीं होता है ।

याद रहे कलम की चाल स्वतींि सोच के साथ चले, भीड़ में इसका अग्स्तत्व समाप्त हो जाता है ।

आदत है इस कलम की ,लाल रीं ि की मसयाह पा, ये मलर्ने को मजबरू हो जाती है ,

और चीर्-चीर् कर इींसाि की िह ु ार लिती है ।

अत्याचार होता दे र् इसके कदम गथरकने लिते हैं, और एक पवभत्स ताींडव करने लिते हैं। हर ओर िादह-िादह मच जाती है ,

जब कलम पवचारों की भमू म पर यद् ु ि-राि िाती है । कलम दहकते अींिारों को कािज़ पर रर् दे ती है , ग्जसकी जलन कािज़ न सह ,

पर कई लोिों के ददलों और सोच को जला जाती है । याद रहे कलम एक आईना है जो वह ददर्ता है , जो उसके सामने र्ड़ा हो,

पर इसे ज़रूरत होती है सच और सींयम की रोशनी की, तभी दे र्ने वाला इसमें न्याय का अक्स दे र् पाता है ।

कलम को मन के शीतल भावों का समींदर र्ब ू भाता है , और पढ़ने वाला इसमे र्ो जाता है । पर मजबरू है इसकी ,

सच का लींिर इसको र्ारे भावों के पानी में ह रर्ता है , मीिा पानी तो कभी -कभी ह इसकी प्यास बझ ु ाता है ।

अक्सर ये र्ारा पानी एक लेर्क की कलम से छलक जाता है , और कािज़ को मभिो दे ता है ।


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फक हो तनरीं कुश रक्त पीने का तनश्चय

मना रहें हैं कृष्ण मरु ार ,

हथेमलयों को िो लो ज़रा,

प्रेम की मटकी िूट ..

रािा उनसे क्यों रूिी?

पछ ू े है रािा रुगिर भरे नैनों से,

लाद मझ ु े क्यों ददया पवरह िहनों से?

ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

फकया।

वो फक जो महज़ आींर्ों को तर कर जाए,

फक दहसाब की स्याह भी लाल है ,

वो फक जो टूटे ददल फक दास्तान सन ु ाये,

हर शख्स की काया यहा​ाँ बदहाल है ।

वो फक जो मोहब्बत के सर् ु ख लबों की

फकस जुमख की कीमत चुकाई है?

ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

कुछ ऐसा ह मसयासत का हाल है ।

ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं। ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

मेरा श्रींि ु ह हो मोहन, ृ ार तम्

मेर ज़ुबान पर, बस एक ह सवाल है ,

जीवन का ये र्ेल अनि ू ा।

भीड़ ने ये रस्म कैसी तनभाई है ?

वो फक जो मयर्ानों से टपकती बाँद ू ों का

फक मनष्ु यता की आत्मा,

ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

तम ु त्रबन श्रींि ू ा, ृ ार है झि

तम ु त्रबन भी तम् ु हर ह हूाँ, प्रेम है फकतना कौन ित कहूाँ?

हृदय द्वार र्ड़े नैन भरे पानी से,

डरती हूाँ बह न जाये समग्र सींसार, टूट िया जो बा​ाँि,

तनदोष रक्त है मेर मसयाह , फकसने मत्ृ यु सींि ब्याह ? फकसने की थी मशकायत? कहा​ाँ लिी थी अदालत?

सि ु बि ु ाहट सन ु ाये,

मोहताज हो,

वो फक जो मेहबब ू का नाम सा​ाँसों में िढ़ जाए , ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

तेर प्रेम बा​ाँसरु की बानी से।

कब हुई पक्ष-पवपक्ष की कवायद?

वो फक जो रुर् से बह कर इल्जाम लिा

हृदय राि ये कह लेती हूाँ,

जो इस भीड़ ने,

ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

पर फिर,पवरह ये सह लेती हूाँ,

फकसने सज़ा सन ु ाई थी?

ज्ञात मझ ु े है तू मेरा है ,

जल्लाद बन उसे िा​ाँसी लिाई थी।

रािा मन श्याम बसे हैं,

भीड़ ने ये रस्म कैसी तनभाई थी?

होंिों पर तनत घनश्याम हाँसे हैं।

आाँर्ों पे बा​ाँि सींयम की लाश,

फिर ये कैसा अज्ञात तम् ु हे ?

अब मग्ु ल्ज़म फकसे बनाओिे?

ये तो बस तनयतत का िेरा है । हृदय कोफकल बन ,

सन ु रे रागिके ,सब है ज्ञात तम् ु हे ,

क्या वीरता ददर्ाई थी! कारण रहा हो कुछ भी, दे र् कुछ न पाए,

जि में रािे-श्याम कहाता हूाँ,

मज ु ररम है या नह ीं ,ये कैसे बताओिे?

तम् ु हरे लोचन में स्वयीं मैं जि जाता हूाँ।

फकया।

तनत लोचन में स्वयीं से पहले,

और जित में कृष्ण से ज्यादा, रािे का श्याम कहाता हूाँ। रािे का श्याम कहाता हूाँ।

…………………………………………………………. हो तनरीं कुश रक्त पीने का तनश्चय फकया,

हो तनरीं कुश रक्त पीने का तनश्चय फकया। आवेश जलके कोयला ह बाकी रहा।

तौलने तनकले हो फक र्ून फकतना बहा?

फक हो तनरीं कुश रक्त पीने का तनश्चय

अब आवेश जलके कोयला ह बाकी रहा।

जाए,

फिलहाल तो नह ीं।

फिर इनकी पहचान क्या है ? फिर ये इश्क की इबादत हैं, रािा-कृष्ण की पज ू ा हैं, ररश्तों की वो गिरहें है ,

जो कुटुम्भ की नी​ींव हैं। ये रूह के टुकड़े हैं,

जज़्बातों की जींि हैं,

ये उपेक्षक्षत विख का आईना हैं, बेड़ड़यों की चीर् हैं,

ये भर् ू की िरु ाखहट हैं,

वो फक जो तझ ु े,

दामन थाम इश्क़ की शामों में ले जाये, ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

वो की जो तझ ु े दतु नया की रीं ित ददर्लायें, ये वो अल्फ़ाज़ नह ीं।

वो फक जो मेहबब ू की बाहों का हार पहनायें,

बया​ाँ करने की तलब हैं,

ये घायल आबरू के जख्म हैं, उस आईने की कहानी हैं,

ग्जसमें समाज की ननन तस्वीरें हैं। सतह नह ीं ये िहरा पानी हैं, ये ममट्ट की ख़ुशबू हैं,

रिों में बहता यकीन हैं,


ये इततहास की दल लें हैं, वतखमान का सत्य हैं,

ये भपवष्य की िह ु ार हैं,

ये हर रूह की पक ु ार हैं। ये मेर मलर्ी,

तनरीं तर काम में अपने रमा हुआ था,

सई ु का तनशाना पहले से सिा हुआ था। चमड़े की चप्पल को ऐसे मसलता,

मानों यह एक काम था ग्जससे उसको सर् ु ममलता।

तेर पढ़ ,

इतना सोच फिर मैंने पछ ू ा,

-पप्रींसी ममश्रा

हा​ाँ त्रबदटया सबको पवद्या द है,

सारे जहान की, एक ह मक ु म्मल कहानी हैं।

पढ़े मलर्े हैं सब क्या?

इसी कमाई से सबने मशक्षा ल है ।

बेटे बारहवी​ीं पास हैं,बेदटया​ाँ नह ीं कोई हाथों में लेकर काले जूत,े बढ़ ू े मोची ने हर ओर से दे र्ा,

बैि िया फफ़र,मसकुड़ िई कुछ माथे की रे र्ा।

दे र्ों बाबा , कुछ उम्मीद फक बन पाएाँि?े मेरे जूते ये, क्या फिर चल पाएाँिे?

अरे त्रबदटया तम ु फफ़कर ततनक न करना, समय लिेिा िैयख ज़रा तम ु िरना। नया नवेला इनको मैं कर दीं ि ू ा,

दाम मिर चाल स रुपये से एक न कम

अनपढ़।

मस् ु कान दौड़ ियी चेहरे पर मेरे,

जाने क्या था बढ़ ू काया को घेरे।

हाथों में ब्रश और पॉमलश नह ीं रर्ा,

बच्चों को नह ीं लिाने ददया घरों के िेरे ।

इतना कह कर शक्कर की गचड़ड़या र्ाई, और फिर पानी पी प्यास बझ ु ाई। रहा नह ीं िया फिर मैंने पछ ू ा, और बाबा तम् ु हार पत्नी ?

लि ूीं ा।

मसकुड़ िई कुछ माथे की रे र्ा।

दे र्ो त्रबदटया,

िज़ ु र ियी बारह साल अब बीते,

चाल स रुपये! फफ़ज़ूल दाम नह ीं कुछ भी कहता हूाँ,

ग्जतना र्चाख आएिा उतना ह लेता हूाँ।

अरे नह ीं बाबा ,बात नह ीं जो तम ु समझे, तीन जोड़ी जूतों की परू मसलाई, और क्या यह तम् ु हार कमाई?

इतना भी त्रबदटया कौंन है दे ता, जैसे तैसे रोट हूाँ काम लेता।

क्यों बाबा औलाद नह ीं तम् ु हार कोई? है ना त्रबदटया,

चार बेदटया​ाँ ,ग्जनका कन्यादान फकया, दो बेटे जो दरू दे श कमाते हैं।

इतना सन ु कुछ सोचा मैंने बज़ ु ुिख की हालत पर,

आज फक कुछ कायखरत औलादों की लानत पर।

इतना सन ु बोला,

बोल बढ़ ू काया पानी पीते-पीते।

फिर बाबा बच्चे तम् ु हारे र्चाख नह ीं उिाते क्या?

अपने फ़ज़ख नह ीं तनभाते क्या?

त्रबदटया पैसे से तनभते हो ररश्ते, साथ,चैन,और सर् ु हो ममलते, तो फिर तो तनभते हैं ररश्ते।

इतना कह लिा अवज़ार तनकालने, र्ी​ींच-र्ी​ींच िािे को लींबा फकया, और फिर नाप जूते का मलया।

क्यों बाबा ऐसा क्यों कहते हो?

सर् ु से सींतापपत क्यों लिते हो? नह ीं त्रबदटया ,

बढ़ ू आाँर्े अब बच्चों की शकलें कहा​ाँ पाती हैं,

पर उनके सर् ु को दे र् तनत हषाखती हैं। फिर पछ ू ा मैंने,

अच्छा फकतना कमा लेते हो ददन भर में ?

ज्यादा नह ीं मिर दो-तीन सौ पा जाता हूाँ, जब ददन भर 'बट ू पॉमलश' राि सन ु ता हूाँ। इतना कह बोला ,

लो त्रबदटया तम् ु हारे जूते हो िए अब चोक्र्े, कोई फकतना चाहे िरती पर इनको िोके। सौ का नोट ददया मैंने ,

तो लिा टटोलने जेबें अपनी। बाबा रर् लो जो भी दे ती हूाँ,

समझ ियी मैं ईमान नह ीं अमीर की कथपत ु ल।

कमाई तम् ु हार है ये,र्ैरात न दे ती हूाँ।

सन ु कर ,मसकुड़ िई कुछ माथे की रे र्ा। कुछ ऐसे बढ़ ू आाँर्ों ने मझ ु को दे र्ा। सींकोच करो न तम ु थोड़ा भी,

तम् ु हार मेहनत से कीमत ज्यादा न दाँ ि ू ी,

र्द् ु दार का तम् ु हार मैं गिक्कार न लाँ ि ू ी। -पप्रींसी ममश्रा


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एक ख़ाब की ि​िर बा​ाँिके चले िए।

हररजन को िले लिाते थे,

अकाल और भर् ु मर से जलती लाशों के

को ,

चररि पवशाल था िा​ाँिी का इनता,

इस सब से मुक्त कराने को,

एक लि और अड़डि अदहींसा के इींक़लाब फकतनों के सीने में दाि के चले िए। मोहन दास करम चींद िा​ाँिी...?

क्या पहचानते हो इस इींक़लाब को?

जातत - िमख का न मोल लिाते थे। छोड़-छाड़ अपने काम,

सबने बराबर साथ ददया।

चौर -चौरा ने भयींकर घात फकया,

शमशान में।

अींग्रेजी साम्राज्य में नह ीं जो ढलता था, उस सूरज को अस्त करने को,

िा​ाँिी ने तनज जीवन का त्याि फकया।

आबो - हवा में महक थी जलते भारत की।

लोिों का सींयम टूटा,

अींग्रेज़ी साम्राज्यवाद फक इमारत की।

दे र् दहींसा का ताींडव,

िा​ाँिी ग्जस दहींसा से कोसों दरू रहे ,

भूल िए कुछ लोि यहा​ाँ,

द प बुझा िए,

ग्जतना वे कर िए,

एक इींक़लाब ने कीमत अदहींसा की,

ग्जतना था युद्ि ज़रूर ,

फकसी नीच ने ये लौ बेरहमी से बुझाई थी।

िाींव प्रितत करें ,ददन रात आिे बढ़े ,

िा​ाँिी तो फिर भी ग्जींदा हैं,

सबको हक हो जीने का,

है ,

चरर्े पर सूत कातते,

बढ़ते भारत की आाँर्ों से,

अींग्रेजों के र्ाततर था भारत माि एक

क्या इींसाि हुआ है ?

तब जाके हा​ाँमसल जीत हुई।

नील , चाय , अिीम और जाने क्या-क्या

तनज मींथन की ,और उनकी सीर् को र्द ु

जाने कैसी माया थी?

भूर्े फकसान ,र्ाल पेट ह सोते थे।

आज हर भारतवासी को ज़रूरत है ।

आि लिाई समूचे बींिाल में।

उनकी सूरत है ।

कमज़ोर होनी थी नी​ींव अब,

अकेला नह ीं ,मिर ज़रूर नाम ये याद रहे , इततहास चीर् - चीर् कर ये बात कहे ।

िुजरात के घाट पर द पक ये जन्मा था,

अपमान का घट ू पी कर ज्वाला बन ये दहका था।

मालूम मिर था ,

आि लिी तो वतन बराबर दहकेिा,

और िुएाँ में अींग्रेजों का सपना ह महकेिा।

मुमफकन नह ीं फक दश्ु मन को ख़ाक कराने को,

अपने ह हाथ अपने घर को जल जाने दो। इसमलए अदहींसा का मािख चुना, एक-एक ईंट रर्ी,

दाींडी माचख, सत्याग्रह, असहयोि आींदोलन, मसपवल नािरमानी,...

पतल दब ु ल क्या थी,

राम नाम का जप करते थे,

सत्य - अदहींसा थे दो साथी।

दबे-कुचलों सींि मोह अगिक था,

उत्थान के उनके सपना अड़डि था। एक वचन था ,एक कमख था,

िा​ाँिी ने पवष घाँट ू पपया,

पर फकसे पता था ,

रुकने का तनश्चय फकया।

अींत उतना ह दहींसक होिा।

िा​ाँिी भी थे केवल इींसान,

सारे वतन को अनाथ कर,सबको रुला िए।

क्या कोई कर पाया है ?

दहींसा से चुकाई थी,

उतना ह था िा​ाँिी के सपनों का होना।

वतन करे िा माि नह ीं,

तभी शहर दटक पाएींिे।

थे वे ऐसा इींक़लाब जो ग्स्थर जब हो जाता

बोझ नह ीं था केवल ये िा​ाँिी के सीने का।

अजर-अमर कहलाता है ।

और स्वदे शी का ह वचन मा​ाँिते।

िा​ाँिी का सपना अब भी छलक जाता है ।

बाज़ार।

क्या भारत अब िा​ाँिी के सपनों का है ?

बोते थे,

में आत्मसात करने की,

बाटों और राज करो की नीतत ने,

याद आज भी हर भारतवासी को ,

जश्न मानाया ताजपोशी का अींिेज़ी रानी ने,


शहर ,िाींव ,िल -कूचों से हर रोज सुनाई

घर की औरत र्ायेिी सबके र्ाने के बाद,

हर कोने से एक औरत इज़्ज़त की दह ु ाई

लोिों के मन में जमी ये कैसी मैल िाद?

दे ती है ,

दे ती है ।

पवगचि तनयम ये,

जब कह ीं फकसी काल रात तले,

वतखमान की कीमत पर पुरातन तनयम को

एक औरत अपने सीने पर ढोती है ,

और भपवष्य को ज़ज़खर िािे में पपरोते हैं।

बोती है ।

जीवन,

होती है ।

दतु नया ये उसको कमजोर बताती है ,

औरों की पोती कामलर् को ,

ढोते हैं,

पवनाश के बीज को इस िरती के िभख में

पूजन माला सा शद् ु ि-सरल औरत का

पी-पी कर ग्स्ियों का रक्त िारा ये मसींगचत

अपनी महक से घर-आाँिन महकाती है ।

िैरत हो मन में लेश माि भी शेष अिर,

और,

क्यों न मुझको इन आाँर्ों मे ददर्ाई दे ती

बल पाने को पूजन शग्क्त का करती है ।

है ।

स्वयीं को ह हाँ सी का पाि बनाती है ।

त्रबलर्-त्रबलर् कर जब कुचल बच्ची कोई

ग्जतने भी हैं दे व यहा​ाँ,

काल पूजन की बात कह ीं न होती है ।

मशव-शग्क्त को,पवष्णु-लक्ष्मी को ह

लक्ष्मी पैदा होने पर कचरे में उसको बहाय

दे व तम् ु हारे दटक न पाए,

पाप ये ररस-ररस कर इस समाज को सी​ींचे

आये,

रोती है ,

स्वयीं आप में हैं अिूरे,

लक्ष्मी पूजन यूाँ तो सबको भाय है ,

पाकर,होते हैं पूरे।

है ।

काल को शान्त कराने मशव पैरों के नीचे

है ,

ममटा नह ीं उनका सम्मान,

मदत को बढ़ने वाले हाथों को भी भी​ींचे है ।

तुम तो केवल इींसान।

ग्जस घर के तनमाखण का दम्भ भरा तेरा

याद रहे , स्िी माि नह ीं सम्मान,

उसकी नी​ींव दटकी है औरत के नाज़ुक तन

स्वतींि वजूद है उसका,बींिन उसकी इच्छा

ग्जस ददन ममट जाएिी,तेर हस्ती भी

कमज़ोर है नार , ये ममर्थया है ।।

मन में ,

उसकी कीमत को तू पहचान।

में ।

है ।

लेकर जाएिी,

एक डोर है ग्जससे तू बींिा इसी औरत के वजूद से,

उसके त्रबन ये घर, ये लोभ, ये दतु नया न तुझको भाएिी।

अन्नपूणाख का पूजन करते हो हर कौर के बाद,

-पप्रींसी ममश्रा

प्रिंसी मिश्रा


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