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dard

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सीरवी प्रकाश पंवार पिता – श्री बाबूलाल सीरवी

माता – श्री मती सन् ु दरी दे वी जन्म - 5 जुलाई 1997

िता - अटबडा, तह-सोजत ससटी, जजला- िाली राजस्थान वततमान िता-श्यामनगर,रावत भाटा रोड,कोटा (राजस्थान) सिक्षा - इंजीननयररंग(वततमान) रुचि- लेखक(writer) संिकत - 9982661925 Facebook-www.facebook.com/seervipp Gmail-www.seerviprakashpanwar@gmail.com Web sitewww.seerviprakashpanwar.blogspot.com www.seervibhasha.blogspot.com


"ममत्व या मजबूरी"


गीत - "माफकरना.... एक लम्हा जो मझ ु से तेरा रहा, एक वादा जो तझ ु से मेरा रहा, जो लम्हे तोडे मैने तेरे ही थे,

जो वादे तो मेरे ननभा ना सका, माफ करना...... माफ करना ऐ मा​ाँ मैँ कुछ कर ना सका। एक आाँसू जो मुझ से तेरा रहा, एक झूट जो तुझ से मेरा रहा,

जो आाँसू बहाएाँ मैने तेरे ही थे,

जो झूट तो मेरा सि बनाना सका, माफ करना......

माफ करना ऐ मा​ाँ मैँ कुछ कर ना सका। एक सिना जो मुझ से तेरा रहा,

एक जन्नत जो तुझ से मेरी रही​ीँ, जो सिने तोडे मैने तेरे ही थे,

जो जन्नत तो मेरी सजा ना सका, माफ करना...... माफ करना ऐ मा​ाँ मैँ कुछ करना सका। हर एक िल जो मझ ु से तेरा रहा,

एक पवश्वास जो तुझ से मेरा रहा, जो िलना समझे मैने तेरे ही थे,

जो पवश्वास तो मेरा मैँ रख ना सका, माफ करना...... माफ करना ऐ मा​ाँ मैँ कुछ कर ना सका।


"सिने"

िाहत तो उसकी आसमां छूने की, िर लकीरों ने फफर झूका ददया,

फकस्मत क्यासाथ दे गी उन िंच्छीयों का, जजनके

िंखो को उडान के िहले काट सलया।

लकीरों ने तो फकसको नारो का, जो होता है तौडकर ही होता, िर जो लकीरों की आहट में करे , सिने उन्ही के होते। महफील के सागर का, मंढर सा घूट नहीं,

मंझील तो तकदीर में सलखी होती, िर सिनों को लकीरों का साथ नहीं।


फिर अपनी है वाननयत

ददन गज ु र गए, रातें बीत गयी, िर...... िर नही थकते, इन आॅखों के मंझर, उत्सादहता होती हर िल, बिकानी बनने को, क्यों हूई एक बार उसकी, जजन्दगी में हे र फेर, जूदाईयाॅ लम्बी हो गयी,

ओर फफर क्यो भरा उसका, नयन सागर रक्त से, सागर तो ददत बता रहा, िर..... रक्त िता नहीं, िता नहीं.....


लगता है जलाएगा, िर फकसे.... अिने कलजे के टूकडे को, या.....

फफर यू ही िान्त होकर मूझे, सलखने को मझबूर कर रही, िर िता नहीं....

कोन से िब्द सागर से बयां करू, आज फफर लफ्जों की कमी मुझे, ननिा ददखा रहीं, या...... ददत सलखने का प्रोत्साहन दे रही, ऐ.....

खुदा माफकरना मुझे,

फक फकतनहीं कर िारहा में , मदहनों का ददत बयां करू, या.... दोिल का अहसास, अहसास मूझे भी ना हूआ, िर... आंसुओ फक इस जजन्दगी में , ददत ही बयां कर िा रहा, फक बस..... फफर अिनी है वाननयत।


मा​ाँ मैं गलत नह ं हाँ...

मा​ाँ...... मा​ाँ मैं गलत नहीं हूाँ.... फसा ले गयी मुझे...

अिने आाँखों के आंसू में ... िता नहीं था मा​ाँ...

फक जरूरत िडीं तो,


आाँखों के आंसुओ को, यु ही बहा दे गी..... मा​ाँ......

मा​ाँ कद्र ना हूई तेरे... तेरे आंि...ल..की, मा​ाँ..सोिने ना ददया. .. तेरे लफ्जो की कहानी को.... मा​ाँ िता नहीं था वो.... वो इस िाल से िलेंगी.... माफ मत करना, ऐ मा​ाँ..... ठुकराया तेरे..... अल्फाजों को...

िर मा​ाँ तूने भी नारो का.... क्यों मा​ाँ... क्यों. ...

क्यों कमझोर िड गयी... इन ईश्कबाजों के आगे... मा​ाँ..मा​ाँ मैं जा रहा हूाँ... ये जहा​ाँ छोडकर.... मा​ाँ... मा​ाँ...बस... बस रोना मत ऐ मा​ाँ.. मा​ाँ मैं गल............. ........अंत।


जान दे आते है नेताओं फक जब ु ां बनकर भी, जान दे आते है ........

फफर आज इन मजहबों की, आवाज बन जाते है ....... क्यों जररयाबना दे ते है , अिनी जब ु ानों का....

क्यों मजाक बना दे ते है , इनकी अमर कहानी का..... अिना हुनूर ददखाने का इतना ही िौक है तो, बबना उनके दहन्दस् ु तां में बोल में ददखाएाँ. ....। खद ु जब ु ां िर खद ु को भरोसा नहीं, उन्हें क्या िता हुसल ू -ए-जब ु ां, अरे जब खुद कुछ ना कर सके,

उनसे तहजीब फक तमीज की उम्मीद नहीं।


"ददत "


एक िाहत है मेरी, िररभाषा दे ने की, उसके इश्क याफफर भोलेिन के ददत की, क्या करू... कम िड रहे मायने पवधाओ में, सलखु तो कोन से िल का, कभी..... कभी िन्नें तो कभी वक्त कम िडता िर.... िर अन्त नहीं उसके ददत और उसकी वससयनतय हरकतों का।


जासलम


कोई दहन्द ू िैदा नहीं होता, ना कोई मुजस्लम िैदा होता, मा​ाँ की कोख से कोई, जासलम िैदा न होता, गोदरा में दहंदस् ु तानी मरा था गज ु रात में भी दहंदस् ु तानी मरा था, सुन लो ऐ तुम दे ि वासियो, फफर वो ही दहंदस् ु तानी वोट बैंक बना था। कल jnu जला था आज du जला हैं, कल बंगाल जला था आज कल क्या जलेंगा, अरे क्या ढूंढ़ रहे हो दोगली राजनीती में , जो कल लड रहे थे आज तसरी फरख रहे हैं। इस दनु नया के रं ग और भेद से ही, इंसान जासलम नही होता। बस िढ़ते है रं ग दनु नया के न्यारे , कोई इंसा तो कोई आतंकवादी बनता, हा​ाँ इरादे तो सभी के होते, िर उनके मजबूत इरादें इंसान ही बनाता।


क्या पछं मैं

क्या िूछूं मैं इससे, क्या ददत है तेरा ?

या यह िूछूं मैं इससे ,

फक फकतना ददत है तेरा ? जब हाथ से अंगुली ,

और सर से हाथ छूटा है । क्या यह िूछूं मैं..?

तेरा ददत फकतना हैं ?


मा​ाँ का कवी हाँ ..

एक नहीं अनेक मा​ाँ की, फकस्मत की कलम हूाँ मै, फकसी का भूत तो, फकसी का भपवष्य उकेरा हैं, अंजान हूाँ मगर, मा​ाँ का नाम उकेरा हैं,


छोटी सी कलम हूाँ मगर, फकसी मा​ाँ की लकीरें उकेरी हैं, फकसी का ददत उकेरा हैं, तो फकसी का कजत उकेरा हैं, कभी अंगुली उठी हैं, तो कभी हाथ बजा हैं, फफर भी मा​ाँ का कवी हूाँ.. ि​ि ु नहीं बैठ सकता।

िालीनता कही गायब हैं…….

आज तेरीआवाज में , िालीनता कही गायब हैं, आज तेरी आवाज में , जस्थरता कही कायम हैं, आज फफर मेरे ददमाग की, लकीरें वही कायम हैं, जरा समटा दे ना इन लकीरो को,


यह धागे बहुत िरु ाने हैं, भले ही लकीरे न हो इन धागों की, वसीयत जरूर बनानी हैं। ररश्ते ददलो के बनना भी जरूरी नहीं, बस तेरा तेरा जैसा मीत कही दे खा नहीं, भले ही वक्त ना हो बात करने का,

िर तेरे ददत में याद करना भूलना नहीं।

जजस मा​ाँ ने ससन्दरू गवाया था….

जजस मा​ाँ ने ससन्दरू गवाया था, उसी मा​ाँ ने नतलक लगाया था, अरे िछ ू ो तम ु उस मा​ाँ से, क्या डडब्बी में ससन्दरू कम था, अरे िूछो तुम उस मा​ाँ से, क्या स्तन में दध ू कम था,


अरे तुमने तो राजनीनत की आड में , बसलदान का कजत नोटों से िुकायाहैं, फफर वही नतरं गा लहराकर, जब ु ां से तीर िलाया हैं, अरे उस वीर प्रसूता मा​ाँ ने, अिना ससन्दरू और दध ू गवाया हैं, तुमने तो दे िद्रोदहयो से कन्धासमलाकर, फफर उस बसलदान को नीिा ददखाया हैं, अरे िमत करो दोहरे िररत्र िर, तूने नतरं गे को समट्टी में समलाया हैं।

हाऊ मि ददस

इक दोई िार... ना बेटा,


इक दोई िार ना, एक दो तीन िार... सुबह सुबह की यह करतल ध्वनन, कानों को महफूज करती थी,

आज भी सुनता हूाँ तो, खुद का कल याद आ जाता। हाऊ मि ददस डेड....?? वन टू थ्री फोर... जवाब ......!!

बरसो से ईक का​ाँि टूटा हैं,

यह दे खन में नहीं आती तेरे, अब इस अनिढ़ से िूछता, हाऊ मि ददस डेड..???

"सख ु ा बारूद"


हर रोज फूल सा खखलने की िाहत थी उसकी,

सूखे बारूद को को अंगारे सी िाहत थी उसकी, बेवजह बाररि कर क्या कर ददया तूने, सख ू े बारूद को गीला कर ददया तन ू े।

अगर हाथ मा​ाँगा होता तो हाथ थमा दे ता,

पवश्वास मा​ाँगा होता तो जमाना थामा दे ता, फफर िेड नंगा कर के यह क्या कर ददया तूने, ददल मा​ाँगा तो जमाने से ररहा कर ददया तूने।

जरूरी नहीं था की जरूरी नहीं था की दनु नया के रं ग दे ख,ूाँ

जजगर का टुकडा बनाना भी जरूरी नहीं था, बस जरूरी था की तेरे गभत में िलभर रहूाँ, वैसे तो बेटी कहना भी तो जरूरी नहीं था,

सही कहा​ाँ है फकसी ने की फकस्मत खुदा के हाथ में , मेरा खुदा भी तू और जीना भी तेरे हाथ में ,

िायद मेने जहा​ाँ के रं ग कुछ िहले छे ड ददए होंगे,

फक रं ग दे खने के िहले तन ू े जमी में दफना ददया। िायद खद ु ा होने नाते मा​ाँ तन ू े मेरा भपवष्य दे खा होंगा,

कभी लकीरों की आड में तो कभी दष्ु कमत की आड में जला होगा, मान लुंगी मा​ाँ लकीरों के आगे तेरी भी मजबूरी रही होंगी, फफर भी मा​ाँ लकीरों की आड में तो भरोसा जलाया होगा।


एक गीत रचा हैं मैने

एक गीत रिा हैं मैने........

एक गीतसुना हैं तूने.......... फफर याद मेरी यू आई,

आाँखों से आाँसू ननकला,

एक गीत रिा हैं मैने............... वो ददन क्या याद हैं तझ ु को, आाँखों से समलन हुए थे, वो ददन क्या याद हैं तझ ु को, जी भर हस कर रोए थे,

जब बात आई अिनों की, मेने तोडा था बंधन िुराना,

एक गीत रिा हैं मैने....................... एक बात तू याद रखना,

हाथों में हाथ ना ददखें गे,


एक िलतू याद रखना,

अब बात ना तेरी करें गे, तेरी इस बेवफाई को, मै जन्म-जन्म न भल ू ाँ ग ू ा

एक गीत रिा हैं मैने.................

छुपा ले ज़रा मा​ाँ आशशयाने में कोई दे ख रहा है मुझे,

मा​ाँ आसियाने में छुिा ले जरा, भोर की महक होठों से दे कर,

मा​ाँ सिनो की दनु नया से जगा ले जरा, ओढ़नी की आड में छुिाकर, मा​ाँ दग्ु धिान करा ले जरा, अमत ृ नील से तप्ृ तकर,

मा​ाँ आाँखों में काजल लगा ले जरा, दितण में खद ु को ही ददखाकर,

मा​ाँ िेहरे िर लकीरें बना दे जरा, फफर वो वीरांगना सुनकर,

मा​ाँ हदत य उत्प्लापवत कर दे जरा, िेहरे िर थकान दे खकर, मा​ाँ सिनो की दनु नया बना दे जरा, फफर वो ही लोरी सुनाकर,

मा​ाँ तेरी कोख में सल ु ा ले जरा, कोई दे ख रहा है मझ ु े,

मा​ाँ आसियाने में छुिा ले जरा।


कह झुक ं नह ं हैं

वो म्यानों की तलवारें और सर की िगडी कही झक ु ीं नहीं हैं,

वो िैरो की छाि और आाँगन की आवाज कही खोयी नहीं हैं, क्यों छोटी-छोटी हरकतों से दहलडुल रहा है ऐ तू िाफकस्तान,


वो वीर प्रसत ू ा मा​ाँ और नतलक लगाने वाली बहन कही गयी नहीं हैं।

कारचगल की लडाईऔर सजजतकल स्राइक को कही भूले नहीं हैं,

वीरभगत की फांसी और झांसी रानी की कहानी कही फीकी नहीं िडी हैं,

कश्मीर के सिनें छोड तू लाहोर की चिंताकर अब,

यहा​ाँ लेखको की कलम और कपवयों की जब ु ानी कही सोयी नहीं हैं।

इक वजह तो िाँछ ू ु

दो रत्न क्या जड ददए हुस्न में , ये तो खुद को मुमताज समझ बैठे...


कागजों के बीि दो खोटे ससक्के का बजने से, ये तो खुद को जजस्म के मोहताज कर बैठे... आंखखर ये जो बेवजूद जीते इन लोगो से, जीने की इक वजह तो िाँछ ू ु ...

जो िल भर लकीरें क्या गढ़ ली िेहरे िर, ये तो हर घर की िौखट समझ बैठे... जब दो िब्द क्या सलख सलए व्यंग्य के, ये तो खुद को बेउम्र मासूस समझ बैठे... आंखखर वो जी कर क्या कर लेंगे,

जो खद ु को सब ु ह का अख़बार समझ बैठे.... मै तो था ही अजीब िैदा होने से ही,

बेवजह तुम तो मुझे अलग समझ रहे हो...

आंखखर क्या वजद ू रखती ये लकीरे मेरे आगे,

जो तुम लोग मुझे इन का मोहताज कर बेठे।

कोई लौटा दे मेरा बि​िन


कद भर के आसियाने िर, नन्हें िैरो को दहलाते हुए, नील आसमां में िंिल मन से, िंनछयो की नई उडानों के बीि, उगते हुए सूरज को दे खना, कोई लौटा दे मेरा बि​िन। छोटे से जल सागर के, नीर में अटखेसलयां खेलते, तन िंिल करते मासम ू हाथ, फफर काला िन्दन लगाकर, दग्ु धिान कराती मा​ाँ को, िैरों से उसे ही मारना,

कोई लौटा दे मेरा बि​िन।

"जोरोकीहैं.."


रातो के इन सायों में जो तम ु , भूत बन नजर आते हो,

लगता हैं बदलते वक्त की हवा, वक्त के िहले जोरों की हैं। अक़्सर इश्क के दौर में जो तुम, िागल बन नजर आते हो,

लगता हैं इन िहरों की सडकों िर, नंगो की आवाज ही जोरों की हैं। फफर सूर जब न बादल में छुिते नजर आते हो तुम, महफफल का मंझर बन उभर आते हो,

लगता हैं सडको के इन इश्क़बाजो फक, महफफलों में आवाम जोरों की हैं।


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