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वर्ष-1 | अंक-46 | 30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

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06 राजा राममोहन राय

16 नरेंद्र मोदी

25 मशरूम फार्मिंग

यूथ मॉडल

स्वच्छता अभियान

नारी उद्धार को धार

सती प्रथा का विरोध और विधवा विवाह की ​िहमायत

मशरूम की कमाऊ खेती में रोल मॉडल बनकर उभरे दो युवा

श्रेष्ठ भारत का शस्त्र है स्वच्छता आैर स्वच्छाग्रह

160 साल बाद दोहराया इतिहास विधवा विवाह

परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ कर ही सामाजिक बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार की जा सकती है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक आधुनिक युग के एक ऐसे ही समाज सुधारक हैं, जिन्होंने बदलाव की कई नई लकीरें खींची हैं। उत्तराखंड की विधवा विनीता की शादी करवा कर उन्होंने राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर के सपनों को साकार किया है

संजय त्रिपाठी

ती प्रथा के विरुद्ध विधवा विवाह। महिला सशक्तिकरण की दिशा में राजा राममोहन राय के इस पहले कदम ने भारतीय नारियों के जीवन में बदलाव का जो अलख करीब दो सौ साल पहले जगाया, उसकी मंद पड़ती आंच को सुलभ प्रणेता से फिर से तेज कर दिया है। क्योंकि सती प्रथा भले ही खत्म मान ली गई हो, लेकिन भारतीय समाज ने विधवाअों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। समाज में मौजूद इस कुरीति के विरुद्ध सुलभ प्रणेता की पहल सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विधवाओं के कल्याण की दिशा में जो पहला और अहम कदम राजा राममोहन राय ने उठाया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने जिस सामाजिक बदलाव के पाठ बार-बार याद दिलाया। समय के

एक नजर

उत्तराखंड त्रासदी में विधवा हुई 21 वर्षीय विनीता

डॉ. पाठक ने धमधाम से करवाई विनीता की शादी रुद्रप्रयाग के विधवाओं की सुध ले रहे हैं डॉ. पाठक

साथ लोग उस पाठ को, उस सबक को भूलते गए। नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज में महिलाओं को अपने तरीके से जीने का हक मिला नहीं, जिसकी कल्पना भारतीय नवजागरण के अग्रदूतों ने की थी। इसी वजह से बहुत सारी महिलाएं आज भी वैधव्य का

पिछले 5 साल से सुलभ वृंदावन के विधवा आश्रमों में होली, दीपावली, क्रिसमस जैसे पर्व का आयोजन कर उन रूढ़िवादी परंपराओं की खिलाफत करता आ रहा है, जिसके अनुसार विधवाओं को किसी भी पर्व और त्योहार से वंचित किया जाता रहा है

अभिशाप झेलने को विवश हैं। केदारनाथ त्रासदी में न जाने कितनी महिलाओं के सुहाग लुटे। लेकिन तमाम राहत और मदद के बावजूद उन महिलाओं के जीवन में हरियाली नहीं आई, जो इस त्रासदी में विधवा हुईं। कारण सिर्फ एक है और वह है विधवा विवाह को पूरी तरह सामाजिक स्वीकृति का न मिल पाना। केदारनाथ त्रासदी की शिकार महिलाओं में एक नाम है विनीता। विनीता की खुशियां भी उस जल प्रलय में बह कर इतनी दूर चली गई कि वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बची।

युवा विनीता की बची हुई लंबी जिंदगी पहाड़ बन गई। आसुंओं का सैलाब उमड़ा। दुखों के बादल आए, उमड़े और बरसे। यह सिलसिला अब तक चलता ही रहता अगर उसे सुलभ प्रणेता का सहारा नहीं मिलता। भारत में पहली बार विधवा विवाह 7 दिसंबर, 1856 को बंगाल में ईश्वारचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से संभव हुआ। तब से अब तक कई विधवाओं की शादियां हुईं, लेकिन उत्तराखंड की विनीता और राकेश की शादी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अब तक रुद्रप्रयाग के दिवली-भनीग्राम में विधवाओं को शादी


02 आवरण कथा

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

‘डॉ. पाठक द्वारा विधवा विवाह को इस तरह समर्थन देना एक उच्च सामाजिक परिवर्तन का द्योतक है। उन्होंने कहा कि राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की श्रेणी में डॉ. विन्देश्वर पाठक का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा’ - डॉ. बलदेव बंशी करने की सामाजिक स्वीकृति नहीं थी और न ही ऐसा पहले कभी हुआ था। विनीता को अपना जीवन साथी चुनकर राकेश ने उसे एक नई और खुशहाल जिंदगी तो दे दी थी, लेकिन एक कसक रह गई थी, परिवार और समाज के बीच उमंग, उत्साह के साथ शादी करने की। जिस धूमधाम के साथ हमारे देश में शादियां होती हैं, वैसा कुछ नहीं हो सका था। एक गुमनाम शादी, जो कोर्ट और मंदिर में की गई और जिसमें शामिल हुए दोनों परिवारों के दो-चार लोग। बस एक औपचारिकता थी, जो निभा दी गई थी। पिछले लगभग 5 सालों में वृंदावन और वाराणसी के साथ-साथ उत्तराखंड की त्रासदी में ‘विधवाओं का गांव’ बन चुका रुद्रप्रयाग के दिवली-भनीग्राम सभा की विधवाओं का सुध ले रहे सुलभ इंटरनेशनल

के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक को जब यह जानकारी मिली कि सिरवाणी गांव की 21 वर्षीया विनीता, जिसके एकाकी जीवन के बारे में वे चिंतित रहा करते थे, कि शादी हो गई तो वे अपनी खुशी को रोक नहीं पाए और उनसे मिलने उत्तराखंड के उसकी नई ससुराल तिलवाड़ा तक पहुंच गए। बातचीत के दौरान जब उन्हें राकेश और उसके परिवार से पता चला कि शादी तो हुई लेकिन उस धूमधाम के साथ नहीं, जैसी होती है, कोई नाचा नहीं, कोई झूमा नहीं। विधवा विवाह के प्रबल समर्थक डॉ. पाठक नहीं चाहते थे कि सामाजिक परिवर्तन लानेवाली इस तरह की क्रांतिकारी घटना पर गुमनामी की परत चढ़ जाए। इसके बाद प्रतिकात्मक रूप से ही सही, 16 अक्टूबर, 2017 को वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में इन दोनों का जिस भव्यता के साथ उन्होंने विनीता का विवाह

करवाया उसका गवाह पूरा देश बन गया। इस शादी की कवरेज के लिए देश ही नहीं, विदेश की मीडिया भी उपस्थित थी। कोई राजनीतिक उथल-पुथल की घटना नहीं थी, किसी महान हस्ती की शादी का समारोह नहीं था, बल्कि यह एक सामाजिक परिवर्तन की घटना थी, जिसे सुलभ ने एक ऐतिहासिक रंग दिया। गोपीनाथ मंदिर में जब यह आयोजन किया जा रहा था, तब वृंदावन के विधवा आश्रमों में रह रहीं

माताएं भी वहां उपस्थित थीं। रूढ़िवादी परंपरा को चकनाचूर होते देख उनकी आंखें भर आईं। ये आंसू खुशी के थे, जिसे पूरे देश ने देखा। पिछले 5 साल से सुलभ वृंदावन के विधवा आश्रमों में होली, दीपावली, क्रिसमस जैसे पर्व का आयोजन कर उन रूढ़िवादी परंपराओं की खिलाफत करता आ रहा है, जिसके अनुसार विधवाओं को किसी भी पर्व और त्योहार से वंचित किया जाता


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017 रहा है। हर साल की तरह इस बार भी वृंदावन और वाराणसी की विधवा आश्रमों में रह रही विधवाओं के लिए वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में दीपोत्सव का आयोजन सुलभ द्वारा किया गया था। साथ में विनीता और राकेश की शादी की खबर ने आयोजन में एक अलग उत्साह भर दिया। गोपीनाथ मंदिर तक ही यह उत्सव सीमित नहीं था। राधा और कृष्ण की इस नगरी में इस बात को लेकर एक खास तरह की जिज्ञासा थी। नगरवासियों के साथ-साथ देशी-विदेशी पर्यटक भी इस बात को लेकर खासे रोमांचित थे। गोपीनाथ मंदिर की ओर जानेवाली सड़कें और गलियां विधवा माताओं से गुलजार थीं। आज वे एक ऐसी शादी की गवाह बनने जा रही थीं, जिसके बारे में सोचना भी पाप माना जाता रहा है। वे सभी इस बात को लेकर उत्सुकता थीं कि यह क्या हो रहा है? सबके तेज कदमों की दिशा गोपीनाथ मंदिर की तरफ थी। प्रांगण को आयोजन के पहले ही भरते देर नहीं लगी। सीढ़ियां, छत सब जगह लोग-ही-लोग। लड़के वाले भी। लड़की वाले भी। बराती भी। सराती भी। दूल्हा राकेश के साथ ढोल बाजे और नृत्य-मंडली के साथ-साथ बरात लेकर डॉ. पाठक जब मंदिर के तोरण द्वार पर पहुंचे तो मंदिर की संचालिका कृष्णा गोस्वामी ने लड़की वालों की तरफ से उनका स्वागत किया। बरातियों पर फूल बरसाए गए। माथे पर चंदन लगाए गए। मंडप सज चुका था। दूल्हा राकेश के पहुंचते ही माताओं ने बंगाली परंपरा के तहत ऊलूक स्वर में और ताली बजाकर उनका स्वागत किया। बता दें कि इस शादी में न सिर्फ राकेश और विनीता का परिवार शामिल था, बल्कि यहां दिवली-भनीग्राम सभा के सिरवाणी गांव की महिलाएं, बच्चे, कुछ युवा और खुद विनीता के पुराने जेठ सुरेश भी उपस्थित थे। एक समय था, जब सुरेश और उसके परिवार को विनीता का इस तरह शादी करना अच्छा नहीं लगा था। आज वे भी खुश हैं। डॉ. पाठक जैसे लोग जब शिद्दत से लगे रहेंगे तो लाजिम है बदलाव तो आएगा ही। जो कभी नहीं देखा, वह भी दीख रहा था यहां। क्या आपने कभी देखा है कि मां की शादी होने जा रही हो और बेटा गोद में जाने के लिए मचल रहा हो। बिटिया मम्मीपापा को सजे-संवरे देखकर खुश हो रही हो। तो ऐसा खुशनुमा नजारा था। यहां मंदिर का आधा प्रांगण तो मीडियाकर्मियों से ही भरा था। दोनों परिवार के सदस्यों को खोज खोज कर सवाल किए जा रहे थे। और तकरीबन सभी का यह मानना था कि यह एक ऐतिहासिक आयोजन है। इस अवसर पर डॉ. पाठक ने राकेश को (जो पेशे से ड्राइवर हैं) एक बड़ी गाड़ी देने की घोषणा की, ताकि वह आसानी से अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। आमतौर पर मीडियाकर्मी कुछ सवाल-जवाब के कुछ बाइट लेकर चले जाते हैं, लेकिन यहां तो सभी तब तक जमे रहे, जब तक शादी की पूरी रस्में न निभा ली गई। विवाह की रस्म से पूर्व डॉ. विन्देश्वर पाठक द्वारा हिंदी में लिखित पुस्तक ‘उत्तराखंड के दो फूल’ और अंग्रेजी-पुस्तक 'टू ब्लूमिंग फ्लावर्स फ्राम उत्तराखंड ' का लोकार्पण प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि डॉ. बलदेव बंशी, डॉ. पाठक एवं राकेश ने किया। डॉक्टर बंशी ने अपने उद्गार में डॉ. पाठक द्वारा विधवा विवाह को इस तरह समर्थन देना एक उच्च सामाजिक परिवर्तन का द्योतक है। उन्होंने कहा

कि राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की श्रेणी में डॉ. विन्देश्वर पाठक का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा। खैर, शुभ मुहूर्त पर लाल जोड़े में दुल्हन विनीता जब मंडप में पहुंची तो ऊलूक स्वर फिर से तेज हो गया। शंखनाद और वैदिक मंत्रों के बीच पंडित संतोष द्विवेद्वी ने विवाह-कार्य शुरू किया तो विनीता के माता-पिता की आंखें भर आईं। दोनों इतने भावुक थे कि कन्यादान की रस्म सुलभ के ही एक कर्मी और उनकी पत्नी को निभानी पड़ी। लावा मिलाने की रस्म विनीता के भाई ने निभाई। अभिभावक की तरह डॉ. पाठक तो उपस्थित थे ही। शादी के बाद जब दूल्हादुलहन को आशीर्वाद देने की बारी आई तो विनीता का आंचल रुपयों से भर गया। डॉ. पाठक ने लड़के को सोने की चेन और लड़की को एक खूबसूरत हार उपहार-स्वरूप दिए। विनीता और राकेश की मां को भी उपहार-स्वरूप चेन दिए गए। शादी के बाद डॉ. पाठक के साथ दोनों ने मुख्य

मंदिर का दर्शन कर ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त किया। शादी के बाद की महफिल सजाई स्वयं डॉ. विन्देश्वर पाठक ने। उनके गाए भजन और गीतों पर वृंदावन की माताओं और दिवली-भनीग्राम सभा से आए लोगों ने जमकर नृत्य किया। सुबह 10 बजे से शाम के 6 बजे तक सारी वृद्ध माताओं को अगर किसी से ऊर्जा मिल रही थी तो वे थे डॉ. पाठक। हर साल की तरह इस साल भी शाम ढलते ही माताओं द्वारा बनाए गए बड़े से रंगोली पर दीया जलाकर सभी दीपोत्सव में शामिल हुए। कुछ माताओं ने हाथ पर दीपक रखकर नृत्य प्रस्तुत किया। पर्यावरण और प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए फुलझड़ी और अनार नहीं जलाए गए। और अंत में जिसका सबों को बेसब्री से इंतजार था, वो घड़ी आ गई। प्रख्यात नृत्यांगना और पद्मश्री शोभना नारायण अपने साथी कलाकारों के साथ पहुंच चुकी थीं। मंच संभालते ही उन्होंने सर्वप्रथम वर-वधू को अपना आशीर्वाद दिया और साथ ही सराहना की

आवरण कथा

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डॉ. पाठक के मानवीय पक्ष की। उन्होंने कहा कि डॉ. पाठक जैसे लोगों से ही इस तरह का कार्य संभव हो सकता है। इसके बाद उन्होंने राकेश और विनीता के प्यार और फिर विवाह की पूरी कहानी को अपने नृत्य में साकार किया। प्रस्तुति इतनी मार्मिक थी कि डॉ. पाठक अपने आंसू रोक नहीं पाए। करीब एक घंटे की प्रस्तुति के बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ और सभी ने रात के खाने का आनंद उठाया। विनीता, राकेश और उनके परिवार के सदस्यों ने कहा कि यह तो कोई ईश्वरीय कृपा है, जो आज हम इस तरह के आयोजन में शामिल हुए। डॉ. पाठक के इस आह्वान को मीडिया ने जोर शोर प्रचारित किया कि राकेश जैसे युवाओं को आगे बढ़कर विधवाओं से शादी करनी चाहिए। और ठीक दूसरे दिन अखबार में एक खबर आई कि मध्यप्रदेश का एक युवक किसी विधवा से शादी करना चाहता है। लगता है अब विधवाओं के अच्छे दिन आनेवाले हैं।


04 आवरण कथा

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

सिंदूरी सौभाग्य से अभिभूत विनीता केदारनाथ आपदा में पति खो चुकी विनीता ने सोचा भी नहीं था कि उसकी जिंदगी में फिर से सिंदूरी सौभाग्य न सिर्फ लौटेगा, बल्कि यह अवसर भी खासा धूमधाम भरा होगा

के

एसएसबी ब्यूरो

दारनाथ में 2013 में आई आपदा में पति को खो चुकी 24 वर्षीय विनीता की जिंदगी को सुलभ इंटरनेशनल ने सिंदूरी सौभाग्य से भर दिया। नए जीवनसाथी के साथ फिर सात फेरे लेते हुए विनीता की खुशी उसके चेहरे पर झलक रही थी। इस मौके पर मौजूद आश्रय सदनों की विधवा माताओं की आंखें छलक आईं। खुद विनीता ने कहा, ‘मेरे लिए यह पुनर्जन्म की तरह है। मुझे लगता था कि मेरे जीवन में सब कुछ खो गया है। भविष्य अंधेरे में डूबा मालूम पड़ता था। पर एक बार फिर पारिवारिकता के सात फेरे में बंधकर मेरा एक तरह से पुनर्जन्म ही हुआ है। इस खुशी की कल्पना मैंने सपने में भी नहीं की थी।’ यह सच है कि विधवा विवाह को लेकर भारतीय समाज में जो रूढ़ियां रही हैं, उसमें एक विधवा का पुनर्विवाह पुनर्जन्म से कम नहीं है। 2013 में केदारनाथ त्रासदी में उत्तराखंड के गुप्तकाशी के पास देवली नामक गांव के रहने

वाले 32 नौजवान बाढ़ में बह गए थे। ये सभी आजीविका कमाने निकले थे। इनमें विनीता का पति महेशचंद्र भी था। विनीता की छह महीने पहले ही शादी हुई थी। इसके बाद विनीता के जीवन में न सिर्फ एक सन्नाटा पसरा, बल्कि उसके लिए आगे जीवन जीना भी मुश्किल हो गया। आजीविका की भी एक बड़ी समस्या थी उसके सामने। इस बीच, रुद्रप्रयाग जिले के गांव तिलवाड़ा निवासी टैक्सी ड्राइवर राकेश की विनीता से मुलाकात हुई। यहीं से विनीता की जिंदगी एक तरह से बदलनी शुरू हुई। बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया। दोनों ने 26 अगस्त 2014 को कोर्ट मैरिज कर ली। अाज इनके दो बच्चे भी हैं। हालांकि इस

खुशी के बीच दोनों के मन में यह कचोट कहीं न कहीं बनी रही कि उनकी शादी आम शादियों की तरह धूमधाम से नहीं हुई। न बारात सजी और न शहनाई बजी। उनके इन सपनों को साकार किया सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने। इस बारे में डॉ. पाठक ने बताया, ‘उन्हें जब इस विवाह के बारे में मालूम पड़ा, तो ऐसे साहसी युवक को समाज के सामने प्रेरणा बनाने की इच्छा हुई और वृंदावन में एक बार फिर से उन दोनों के विवाह की रस्म अदायगी करवाई।’ इस शादी में मंडप भी सजा, बारात भी आई और परिवार-समाज के लोग भी शामिल हुए। इस बारे में सुलभ प्रणेता बताते हैं

मुझे लगता था कि मेरे जीवन में सब कुछ खो गया है। भविष्य अंधेरे में डूबा मालूम पड़ता था। पर एक बार फिर पारिवारिकता के सात फेरे में बंधकर मेरा एक तरह से पुनर्जन्म ही हुआ है। इस खुशी की कल्पना मैंने सपने में भी नहीं की थी - विनीता

कि आगे भी विधवा विवाह को लेकर देशव्यापी अभियान जारी रहेगा। क्योंकि हमारे समाज में विधवाओं को एक तरह से अलग-थलग कर दिया जाता है। यहां तक कि उन्हें किसी शुभ समारोह में भी शामिल नहीं किया जाता। लेकिन वृंदावन में इस बार एक विधवा की न केवल धूम-धाम से शादी कराई गई बल्कि उसमें 500 से भी अधिक विधवाओं ने भाग लिया और दांपत्य जीवन की सफलता के लिए दंपती को आशीर्वाद भी दिया। वृंदावन के सप्त देवालयों में से एक राधा गोपीनाथ मंदिर में विधवा महिला का विवाह 16 अक्तूबर को संपन्न हुआ विनीता का विवाह समारोह पारंपरिक तौर पर संपन्न कराया गया। खास बात यह थी कि विवाह में सारी रस्में विधवा महिलाओं ने ही संपन्न कराई। इस आयोजन में मेहंदी, हल्दी तेल की रस्म के साथ गीतों का आयोजन भी विधवाओं द्वारा हुआ। मंदिर प्रांगण में सजे मंडप में विनीता ने अपने जीवन साथी के साथ सात फेरे लेकर अपना नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत की। अपने इस अनुभव को लेकर विनीता खासी अभिभूत दिखीं। उसने बताया, ‘मैं एक अत्यंत सामान्य परिवार से आती हूं। जीवन में कभी इतनी बड़ी खुशी देखी नहीं। केदारनाथ आपदा के बाद तो जैसे जीवन में सब कुछ बिखर गया था। पर बाबा केदार और डॉ. पाठक के आशीर्वाद से मेरे आंचल में इतनी खुशियां भर गईं कि उसकी कल्पना करना तक मेरे लिए संभव नहीं था।’ इस मौके पर पहुंचे सुलभ प्रणेता ने कहा कि वीरान जिंदगी गुजार रही ये विधवाएं परंपराओं की जंजीरों से जकड़ी हुई थीं। उन्होंने इन विधवाओं के साथ होली, ​िदवाली और रक्षाबंधन जैसे पर्व साथ मनाकर इनके जीवन में रंग भरने की कोशिश की है। सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के दिशा में अपनी तरह से सुलभ ऐसे सकारात्मक कदम उठा रहा है। सदियों से अंधेरी जिंदगी गुजार रहीं विधवाओं की जिंदगी रोशन करने की कोशिश सुलभ पिछले तीन साल से लगातार कर रही है। इस मौके पर सुलभ संस्था द्वारा विधवाओं को दीपावली गिफ्ट के तौर पर साड़ियां भी दी गईं। विधवाओं ने मंदिर में रंगों से रंगोली सजाई, साथ ही दीये भी जलाए। उत्सव में शामिल हुईं सभी वृद्ध विधवाओं के चेहरे से खुशी झलक रही थी।


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

आवरण कथा

बदलाव का प्रकाश

सुलभ सैनिटेशन एंड सोशल रिफॉर्म मूवमेंट ने दीपावली का त्योहार वृंदावन आश्रम की 700 विधवा माताअों के साथ मनाया। इन महिलाअों ने वैधव्य के बाद पहली बार प्रकाश का यह महापर्व मनाया

फोटो ः जयराम

प्रकाशपर्व के अवसर पर आश्रम का पूरा मंजर खुशी और उत्साह में डूबा था। विधवा माताअों ने उत्साह के साथ दीये जलाए। इस मौके पर आश्रम परिसर को रंगीन बल्बों से सजाया गया था। यहां दीयों की रोशनी और रंगोली की सुंदरता देखती ही बन रही थी। यहां विधवा माताअों ने जिस तरह पुरानी रूढ़ि को तोड़ते हुए दिवाली मनाई, वह प्रेरणा और परंपरा की एक एेसी शुरुआत थी, जिसमें कहीं कोई दुख नहीं था और ना कहीं उदासी

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06 आवरण कथा

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

नारी उद्धार को ऐतिहासिक धार राजा राममोहन राय

19वीं सदी के आरंभ में भारत में जिस नवजागरण ने अंगड़ाई ली, उसके केंद्र में जहां महिलाएं थी, वहीं इस नवविहान के प्रथम नायक बनकर सामने आए राजा राममोहन राय। सती प्रथा के नाम पर विधवाओं को जीते जी मार देने जैसी विभत्स प्रथा को समाप्त कराकर उन्होंने बारत में समाज सुधार के सर्वथा नए युग का सूत्रपात किया

एक नजर

22 मई, 1772 को एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ

महिलाओं के अधिकार के पक्ष में अभियान चलाया।

कई भाषाएं सीखीं

उनका जन्म बंगाल के राधानगर गांव में 22 मई, 1772 को एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता रमाकांत राय वैष्णव थे और मां तारिणी शाक्त 1828 में द्वारकानाथ टैगोर के साथ थीं। राजा राममोहन राय को उच्च शिक्षा मिलकर ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना के पटना भेजा गया। पंद्रह साल की उम्र में उन्होंने बांग्ला, फारसी, अरबी और संस्कृत भाषाएं सीखीं। जब वे 24 साल के थे, तब उन्होंने अंग्रेजी सीखनी शुरू कर दी। पटना में उन्होंने अरस्तु और यूक्लिड के साहित्य के अनुवाद पढ़े। उनकी पुस्तकें पढ़कर वे स्वतंत्र चिंतन करने लगे औऱ अपनी पूरी चिंतनधारा को तत्कालीन भारतीय समाज से जुड़ सरोकारों और दरकारों से जोड़ा।

डॉ. पाठक ने धमधाम से करवाई विनीता की शादी

वेदांत से प्रभावित

भा

एसएसबी ब्यूरो

रतीय नवजागरण के साथ खास बात यह रही कि इसका स्वरूप और इसके लिए हुई ऐतिहासिक पहल पूरी तरह अपनी माटी-पानी में सना था। इस पहल ने एक तरफ जहां देश को सांस्कृतिक रूप से सबल मनाया, वहीं इससे परंपरा के नाम पर ढोई जा रही सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बड़ी जागृति आई। आगे इसी सबलता ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की भी जमीन तैयार की। भारतीय नवजागरण की एक बड़ी विशेषता यह भी रही कि इसके केंद्र में कहीं न कहीं स्त्री रही। यही कारण है कि 19वीं सदी में भारत में महिला सशक्तिकरण को लेकर जिस तरह के प्रयास हुए और उन्हें सामाजिक आधार पर जितनी सफलता मिली, वैसा उदाहरण विश्व इतिहास में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है।

उदारवादी विचारधारों से प्रेरणा

राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना के बाद उसके जरिए समाज सुधार को गति प्रदान की। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के पैरोकार राजा राममोहन राय ने कुरीतियां दूर की और कहा कि ऐसा करना धर्मानुकूल है राजा राममोहन राय 19 वीं सदी के प्रारंभ में उन ‘बंग भद्र पुरूषों’ में थे, जो अंग्रेजों के संपर्क में सबसे पहले आए। उन्होंने फ्रांसीसी क्रांति जैसी पश्चिमी उदारवादी विचारधाराओं से प्रेरणा ली, लेकिन सामाजिक सुधार के संदर्भ में उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में ढ़ाला। राजा राममोहन राय ने लार्ड विलियम बेंटिक की मदद से महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और कानून बनवाकर न केवल सती प्रथा को अवैध करार दिया बल्कि इस मुद्दे पर सामाजिक जागरूकता भी फैलाई। इससे पहले भारत में विधवाओं की स्थिति काफी त्रासद थी। राजा राममोहन राय के प्रयास के बाद विधवा विवाह को सामाजिक मान्यता मिली।

सूफीवाद का भी अध्ययन

पिता की मौत के बाद वे लौट आए और उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में नौकरी शुरू कर दी। कंपनी में अंग्रेज अधिकारी जॉन डिग्बी के सहायक के तौर वे पश्चिमी संस्कृति और साहित्य से अवगत हुए। उन्होंने जैन विद्वानों से जैन धर्म का अध्ययन किया। उन्होंने मुस्लिम विद्वानों से सूफीवाद सीखा। वर्ष 1814 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी। उन्होंने ‘आत्मीय समाज’ की स्थापना की और सामाजिक एवं धार्मिक सुधार की शुरुआत की। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह एवं संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार समेत

वे मूर्ति पूजा और कट्टरपंथी धार्मिक कर्मकांडों, धर्मांधता, अंधविश्वास के खिलाफ थे। धार्मिक मुद्दों पर पिता से पटरी नहीं बैठने पर उन्होंने घर छोड़ दिया। उन्होंने हिमालय की यात्रा की। वे तिब्बत भी गए। घर लौटने से पहले उन्होंने व्यापक भ्रमण किया। वापस आने पर उनके परिवार ने इस उम्मीद के साथ उनकी शादी करवा दी कि वह बदल जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वे वाराणसी चले गए और वहां उन्होंने वेद, उपनिषद और हिंदू दर्शन का गहराई से अध्ययन किया और अंत में वेदांत को अपने जीवन तथा कार्यों का आधार बनाया। उन्होंने अनेक हिंदू शास्त्रों का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिससे ये शास्त्र विश्व भर को प्राप्त हो सकें।

अंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित

राजा राममोहन राय मानते थे कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शिक्षा पारंपरिक भारतीय शिक्षा प्रणाली से बेहतर है। 1822 में उन्होंने एंग्लो हिंदू स्कूल की स्थापना की और उसके चार साल बाद वेदांत कॉलेज खोला। जब पश्चिम बंगाल सरकार ने पारंपरिक कालेज का प्रस्ताव रखा तब उन्होंने उसका जोरदार विरोध किया। उनके ही प्रयास से कलकत्ता में 1827 में हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई, जो बाद में प्रेसीडेंसी कालेज के रूप में विख्यात हुआ।

‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

भा

बड़े भाई की मौत से लगा गहरा आघात

रत में स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक व समाजसेवी ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय के पूर्वजों ने बंगाल के नवाबों के यहां उच्च पद पर कार्य किया, किंतु उनके अभद्र व्यवहार के कारण पद छोड़ दिया। वे लोग वैष्णव संप्रदाय के थे। माता शैवमत की थीं। राजा राममोहन राय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने बीस वर्ष की आयु में पूरे देश का भ्रमण कर अपनी दृष्टि, मानस और चिंतन को आधारभूत विस्तार दिया। 1816 में उनके परिवार

में एक अत्यंत पीड़ादायक घटना घटी। बड़े भाई की मृत्यु हुई। उस समय सती प्रथा प्रचलन में था। सो, भाई की चिता के साथ ही उनकी पत्नी को चिता पर बैठा दिया गया। इस घटना का उनके मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि 1885 में सती प्रथा के विरोध में प्रथम धार्मिक लेख लिखा। एक प्रकार से भारतीय समाज में आचारविचार को स्वतंत्रता का श्रीगणेश यहीं से प्रारंभ हुआ। सती प्रथा के विरोध में यह उनका प्रथम प्रयास था।

सती प्रथा का विरोध विधवा विवाह का समर्थन

सती प्रथा के उन्मूलन ने राजा राममोहन राय को संसार को मानवतावादी सुधारकों की प्रथम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया

रा

जा राममोहन राय ने नारी समाज के उद्धार के लिए अनेक प्रयास किए। यह उनके ही प्रयास का परिणाम था कि 1828 में सती प्रथा को समाप्त करने का कानून बनाया गया। उन्होंने विधवा विवाह का भी समर्थन किया था। सती प्रथा के समर्थक कट्टर लोगों ने जब इंग्लैंड में प्रिवी कॉउंसिल में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया, तब उन्होंने भी अपने प्रगतिशील मित्रों और साथी कार्यकर्ताओं की ओर से ब्रिटिश संसद के सम्मुख अपना विरोधी प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया। उन्हें तब प्रसन्नता हुई, जब प्रिवी कॉउंसिल ने सती प्रथा के समर्थकों के प्रार्थनापत्र को अस्वीकृत कर दिया। सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय संसार के मानवतावादी सुधारकों की सर्वप्रथम पंक्ति में आ गए। राजा राममोहन राय के प्रयासों का तब के सामाजिक माहौल में क्या स्थिति थी, इसका महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि सती के नाम पर बंगाल में औरतों को जिंदा जला दिया जाता था। समाज में बाल विवाह की भी प्रथा

था।

थी। कहीं-कहीं तो 50 वर्ष के व्यक्ति के साथ 12-13 वर्ष की बच्ची का विवाह कर दिया जाता था और फिर अगर उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी तो उस बच्ची को उसकी चिता पर बिठा कर जिंदा जला दिया जाता

इस तरह की अनेक कुरीतियों के खिलाफ राजा राममोहन राय ने अपने ही लोगों से जंग लड़ी। लोगों ने उन पर ब्रिटिश एजेंट होने तक के आरोप लगाए, लेकिन उच्च आदर्श के एक सच्चे योद्धा की तरह वे अडिग रहे और विजयी भी हुए। वे रूढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे, लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव के गुण उनके दिल के बहुत करीब थे। वे स्वतंत्रता चाहते थे, लेकिन उनकी यह भी हसरत थी कि देश के नागरिक उसकी कीमत पहचानें। उनके व्यक्तित्व दृष्टिकोण एवं विचार पर गहन दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो गया है कि उनके विचारों पर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव था। उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रसार किया तथा मूर्ति पूजा, बलिप्रथा, भेदभाव, छुआछूत, बहुविवाह एवं सती प्रथा का विरोध किया। वे सभी संस्कृतियों में समन्वय में विश्वास रखते थे। वे धार्मिक तौर पर काफी सहिष्णु थे।

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राजा राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया

रा

शिक्षा और समाज सुधार से लेकर धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्रों में राजा राममोहन राय ने कई नए सर्ग लिखे

जा राममोहन राय 1830 में इंग्लैंड गए। भारत के शिक्षित लोगों में से भारतीय संस्कृति की मशाल को इंग्लैंड ले जाने वाले वह पहले व्यक्तियों में से थे। उनके बाद स्वामी विवेकानंद तथा अन्य विभूतियों नें पश्चिम में भारत का परचम फहराया। राजनीति, लोक प्रशासन, शिक्षा सुधार, समाज सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्रों में किए गए उनके कार्य उनको भारत ‘ब्रह्म समाज’ भारत का एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन है, जिसने बंगल के पुनर्जागरण युग को प्रभावित किया। 1828 में ब्रह्म समाज को राजा राममोहन और द्वारकानाथ टैगोर ने स्थापित किया था। इसका एक उद्देश्य भिन्न भिन्न धार्मिक आस्थाओं में बंटी हुई जनता को एक जुट करना तथा समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना है। राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना के बाद उसके जरिए समाज सुधार को गति प्रदान की। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के पैरोकार राजा राममोहन राय ने कुरीतियां दूर की और कहा कि ऐसा करना धर्मानुकूल है। राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया, बल्कि उसके अंतर्गत ही समाज सुधार, ज्ञानार्जन पर बल दिया। ब्रह्म समाज की स्थापना से भारतीय सभ्यता में नवप्रभात का आगमन हुआ। इस समाज ने प्रायश्चित को मोक्षप्राप्ति का मार्ग बताया, जिसका तात्पर्य यह था कि मनुष्य पाप करने में सहज रूप में प्रवृत्त हो जाता है। अतएव उसे सामाजिक कठोर दंड न देकर उसे फिर से अच्छा जीवन व्यतीत करने का अवसर देना चाहिए। ब्रह्म समाज ने एक प्रकार से हिंदुओं की धार्मिक एवं सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। ब्रह्म समाज के सिद्धांतों में कोई जटिलता नहीं है। ब्रह्म समाज के प्रमुख सिद्धांत • परमात्मा कभी जन्म नहीं लेता। • वह संपूर्ण गुणों का भंडार है। • परमात्मा प्रार्थना सुनता तथा स्वीकार करता है। • सभी जाति के मनुष्यों को ईश्वर पूजा का अधिकार प्राप्त है। • पूजा मन से होती है। • पाप कर्म का त्याग करना तथा उसके लिए प्रायश्चित करना मोक्ष का साधन है। - संसार में सभी धर्म ग्रंथ अधूरे हैं।

स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक

राजा राममोहन राय ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने समाचार पत्रों की स्थापना, संपादन तथा प्रकाशन के

की एक विभूति की श्रेणी में खड़ा करते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार, ‘राजा राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया।’ उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का पिता तथा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है। उनके धार्मिक, सामाजिक समरसता जैसे विचारों के पीछे अपने देशवासियों की राजनीतिक उन्नति करने की भावना मौजूद रहती थी। क्षेत्र में बड़ा कार्य किया। राय ने अंग्रेजी, बांग्ला तथा उर्दू में अखबार निकाले। उनको स्वतंत्र पत्रकारिता का जनक भी कहा गया है। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने कठिन संघर्ष किया। राजा राममोहन राय का व्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वायत्ता, समानता तथा न्याय में दृढ़ विश्वास था। उन्होंने राजनीतिक मूल्यों का कभी भी परित्याग नहीं किया। भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता का संदेश देने वाले राजा राममोहन राय पहले व्यक्ति थे। वे एक पत्रकार, संपादक तथा लेखक थे। उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ का बांग्ला भाषा में तथा पर्शियन भाषा में ‘विराट उल’ अखबार का सफल संपादन किया। वे लिखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धान्त का समर्थन करते थे। 1823 में द्वारका नाथ ठाकुर, सज्जन बोस गौरी शंकर बनर्जी तथा चंद्र कुमार आदि के साथ मिलकर हाई कोर्ट के सामने एक याचिका प्रस्तुत करके उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता की मांग की थी। याचिका अस्वीकृत कर देने पर राजा राममोहन राय ने इस निर्णय के विरुद्ध मंत्री परिषद में अपील की ।

संवैधानिक जागरूकता

जब जनता को अपने नागरिक अधिकारों का कोई ज्ञान न था और विदेशी हुकूमत के सामने अपनी बात रखने की सोचता भी न था तब राजा राममोहन राय ने राजनीतिक जागरण में अपना अमूल्य योगदान दिया। अपने ओजपूर्ण राजनीतिक विचारों को शासन सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में कामयाब रहे। भारत में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने के कारण ही उन्हें नए भारत का संदेश वाहक कहा जाता है। सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने उन्हें संवैधानिक जागरूकता का जनक कहा था।

ब्रिटेन में निधन

1830 में राजा राममोहन राय मुगल सम्राट के दूत के रूप में उनके पेंशन और भत्ते के बारे में पक्ष रखने ब्रिटेन गए। ब्रिस्टल के समीप स्टेप्लटन में 27 सितंबर, 1833 को इस महान विभूति का निधन हो गया। वहां उनकी समाधि है और कॉलेज ग्रीन में उनकी एक भव्य मूर्ति भी लगी हुई है।


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विधवा विवाह को शास्त्र सम्मत सिद्धि ईश्वरचंद्र विद्यासागर

आधुनिक भारत में विधवा विवाह को शास्त्र सम्मत बताकर इसे सामाजिक प्रचलन का हिस्सा बनाने वाले महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने एक तरह से देश में महिलाओं के लिए आधुनिकता की राह खोली

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एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

उनके प्रयासों से 7 दिसंबर 1856 को पहला विधवा विवाह संपन्न हुआ

गाल में लड़कियों को स्कूल ले जाने वाली गाड़ी, पालकियों तथा शिक्षण संस्थाओं की दीवारों पर एक जमाने में मनुस्मृति का एक श्लोक लिखा रहता था। जिसका अर्थ था- बालिकाओं को बालकों के समान शिक्षा पाने का पूरा अधिकार है। बंगाल सहित पूरे देश में बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन देने का यह महत्वपूर्ण कार्य किया था ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने। उन्होंने अपने समय में अनेक क्षेत्रों में सुधार किए। उनके विचार और प्रयासों से आधुनिक भारत में सामाजिक नवजागरण की जहां शुरुआत हुई, वहीं महिलाओं की सामाजिक-शैक्षिक स्थिति को लेकर ठोस पहल करने वालों में अग्रणी रहे।

विधवा विवाह को मिला श्रीरामकृष्ण परमहंस का भी समर्थन गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके बांग्ला गद्य को आदर्श बताया है

‘विद्यासागर’ की उपाधि

देश में नारी उत्थान के प्रबल समर्थक व सामाजिक क्रांति के अग्रदूत ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 16 सितंबर 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर के ग्राम वीरसिंह में हुआ था। विद्यासागर का परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का था जिसके कारण उनको भी अच्छे संस्कार मिले। उन्होंने नौ वर्ष की अवस्था से लेकर 13 वर्ष की आयु तक संस्कृत विद्यालय में ही रहकर अध्ययन किया। घर की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए दूसरों के घरों में भोजन बनाया और बर्तन साफ किए। ईश्वरचंद्र अपनी मां के बड़े आज्ञाकारी थे तथा किसी भी हालत में वह उनका कहा नहीं टालते थे। उन्होंने काफी कठिन साधना की। रात में सड़क पर जलने वाले लैंप के नीचे बैठकर पढ़ाई की। कठिन साधना के बल पर संस्कृत की प्रतिष्ठित उपाधि ‘विद्यासागर’ प्राप्त हुई।

दयानंद सरस्वती से प्रभावित

दरअसल, जिन दिनों महर्षि दयानंद सरस्वती बंगाल के प्रवास पर थे तब ईश्वरचंद्र जी ने उनके विचारों को सुना। वे उनसे प्रभावित हो गए। उन दिनों बंगाल में विधवा नारियों की हालत बहुत दयनीय थी। बाल विवाह और बीमारी के कारण उनका जीवन बहुत कष्ट में बीतता था। ऐसे में उन्होंने नारी उत्थान के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया।

पहला विधवा विवाह

उन्होंने धर्मग्रंथों द्वारा विधवा विवाह को शास्त्र सम्मत सिद्ध किया। वे पूछते थे कि यदि विधुर पुनर्विवाह कर सकता है तो विधवा क्यों नहीं। उनके प्रयास से 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह को बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने स्वीकृति दे दी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसंबर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह संपन्न हुआ।

बांग्ला गद्य का आदर्श

ईश्वरचंद्र जी के प्रयासों से 7 दिसंबर 1856 को पहला विधवा विवाह संपन्न हुआ सती प्रथा का भी विरोध

इससे बंगाल के परंपरावादी लोगों में हड़कंप मच गया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का सामाजिक बहिष्कार होने लगा। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। लेकिन इसी बीच उन्हें बंगाल की एक अन्य महान विभूति श्रीरामकृष्ण परमहंस का समर्थन

भी मिल गया। उन्होंने नारी शिक्षा का प्रबल समर्थन किया। उन दिनों बंगाल में राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में काम कर रहे थे। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने उनका भी साथ दिया और फिर इसके निषेध को भी शासकीय स्वीकृति प्राप्त हुई।

1841 में वे कोलकाता के फोर्ट विलियम कालेज में पढ़ाई करने लग गए। 1847 में संस्कृत महाविद्यालय में सहायक सचिव और फिर प्राचार्य बने। वे शिक्षा में विद्या के सागर और स्वभाव में दया के सागर थे। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में विभिन्न विषयों पर 50 पुस्तकों की रचना की| कवींद्र रवींद्र ने उनके बांग्ला गद्य को आदर्श बताकर उसकी सराहना की| पिछले 150 सालों से अनेक पीढ़ियां उनकी लिखी पुस्तक ‘वर्ण परिचय’ के अक्षर ज्ञान सीखती आ रही हैं। नारी शिक्षा और उत्थान के प्रबल समर्थक ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई 1891 को हृदयरोग से निधन हो गया।


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जीवन में रंग भरने के दिन आए उ

दिवली-भनीग्राम के सिरवाणी गांव की बहू विनीता ने, जिसने उस आपदा में अपने पति महेशचंद्र को खो दिया था, उनसे जुड़ी उन यादों को भूलकर, जो आंखों में सिवाय आंसू छोड़कर कुछ नहीं दे सकतीं, फिर नए सिरे से जीवन जीने का निर्णय लिया और तिलवाड़ा के राकेश कुमार को अपना जीवनसाथी चुन लिया

डॉ. विन्देश्वर पाठक

त्तराखंड में आई आपदा ने रुद्रप्रयाग जिला के दिवली-भनीग्राम सभा की विधवाओं के करुण विलाप भी सुनाए। लेकिन सुलभ के प्रयासों से उनके आंसू भी थमते देखे, स्वावलंबन भी आया, लेकिन एक सूनापन बना रहा कई दिनों तक। इसी सूनेपन में सारी मान्यताओं को ठुकराते हुए उमंग-उत्साह के साथ जीवन जीने का एक फैसला भी सुना। दिवली-भनीग्राम के सिरवाणी गांव की बहू विनीता ने, जिसने उस आपदा में अपने पति महेशचंद्र को खो दिया था, उनसे जुड़ी उन यादों को भूलकर, जो आंखों में सिवाय आंसू छोड़कर कुछ नहीं दे सकतीं, फिर नए सिरे से जीवन जीने का निर्णय लिया और तिलवाड़ा के राकेश कुमार को अपना जीवनसाथी चुन लिया। घटना के चार साल बाद भी मुझे विनीता का वह चेहरा याद है, जब मैं आपदा के बाद देहरादून और दिवली-भनीग्राम सभा की विधवाओं से मिलने गया था। विधवाओं के समूह में वह सबसे कम उम्र की थी। बरसती आंखों के सिवाय उसके चेहरे पर तब कोई भाव नहीं था। और अचानक जब सुना कि उसी विनीता की शादी हो गई है और उसके दो बच्चे भी हैं तो उससे मिलने रुद्रप्रयाग के ही उसकी नई ससुराल तिलवाड़ा पहुंच गया। पहली नजर में पहचान ही नहीं पाया विनीता को। जिन आंखों से आंसू झरते देखा था, उन्हीं आंखों में अब खुशी झलक रही थी, आंखों से भी और बातों से भी। अस्त-व्यस्त थी घर की स्थिति और खुद उसकी भी। खुद को ठीक करे, बच्चों को या घर को। चेहरे पर हंसी लिए वह सब सहेजने की कोशिश कर रही थी। उसे देखकर सुकून मिल रहा था। घर पर तब पति राकेश, सास सूरमा देवी, जेठ दीपलाल, देवर रजनीश और विनीता के दोनों बच्चे बेटा आर्यन (ढाई साल) और बेटी अदिति (एक साल) से मुलाकात हुई। जेठानी खेत में काम पर गई थीं और राकेश से छोटा भाई शैलेश

मुझे विनीता का वह चेहरा याद है, जब मैं आपदा के बाद देहरादून और दिवली-भनीग्राम सभा की विधवाओं से मिलने गया था। विधवाओं के समूह में वह सबसे कम उम्र की थी। बरसती आंखों के सिवाय उसके चेहरे पर तब कोई भाव नहीं था


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देहरादून में किसी काम से है। आज के इस दौर में शहरों में, जहां हम अपने रिश्तों को भूल रहे हैं, हम अपने पड़ोसी तक को नहीं जानते, वहीं उत्तराखंड के विशाल पर्वतों पर दूर-दूर बसे गांवों में लोग एकदूसरे को जानते-पहचानते हैं, उनका मिलना-जुलना भी होता है। हर गांव का दूसरे गांव से कोई न कोई रिश्ता है। विनीता की इस नई जिंदगी को देखने-सुनने के लिए मैं उसकी नई ससुराल तिलवाड़ा, मायका कुमड़ी और पहली ससुराल सिरवाणी गया। इसके लिए करीब सात सौ किलोमीटर की यात्रा तय करनी पड़ी। खैर, बात शुरू करते हैं राकेश और विनीता की नई जिंदगी की, और राकेश से ही, क्योंकि पहल तो उन्होंने ही की थी। राकेश कार ड्राइवर हैं। इस पहाड़ से उस पहाड़ तक उनका आना-जाना लगा रहता है। राकेश का ननिहाल मोसाडुंग है, जो विनीता के मायके कुमड़ी से थोड़ा आगे है, वहां वह अपनी मां को नानी से मिलाने गाड़ी से ले जाया करते थे। एक बार जब राकेश अपनी मां को नानी के घर छोड़कर वापस आ रहे थे तो रास्ते में विनीता और उसके बड़े भाई सुरेश मिल गए। राकेश और सुरेश की पुरानी पहचान थी, एक दोस्त के रूप में। पता चलाए विनीता की तबीयत खराब है और सुरेश उसे किसी डॉक्टर के पास दिखाने ले जाने के लिए किसी वाहन का इंतजार कर रहा है। राकेश ने दोनों को अपनी कार में लिफ्ट दी और डॉक्टर के पास ले

'मुझे विनीता का वह चेहरा याद है, जब मैं आपदा के बाद देहरादून और दिवली-भनीग्राम सभा की विधवाओं से मिलने गया था। विधवाओं के समूह में वह सबसे कम उम्र की थी। बरसती आंखों के सिवाय उसके चेहरे पर तब कोई भाव नहीं था। और अचानक जब सुना कि उसी विनीता की शादी हो गई है और उसके दो बच्चे भी हैं तो उससे मिलने रुद्रप्रयाग के ही उसकी नई ससुराल तिलवाड़ा पहुंच गया' -डॉ. पाठक आए। राकेश यह जानते थे कि विनीता ने अपना पति उत्तराखंड की आपदा में खो दिया है और वह वैधव्य जीवन जी रही है। इसके पहले राकेश ने विनीता को नहीं देखा था। राकेश ने बताया कि जब वह उन दोनों को डॉक्टर के पास छोड़कर आ रहा था तो उसे विनीता की बहुत याद आई। मैं उसके बारे में ही सोचता रहा कि वह किस तरह इतनी कम उम्र में विधवा हो गई! उसका उदास चेहरा मेरे दिल से

निकल ही नहीं रहा था। एक दिन उसी तरह रास्ते में सुरेश से फिर मेरी मुलाकात हुई। मैंने विनीता की बात सुरेश से छेड़ दी। पूछा, ‘तुमलोग उसकी दूसरी शादी क्यों नहीं कर देते।’ वह उदास हो गया और कहा,‘कौन करेगा उससे शादी’ हम दोनों बहुत देर तक चुप रहे और मैं वापस घर आ गया। विनीता की याद और गहरी हो गई। उसका उदास चेहरा मेरे मन से निकल ही नहीं रहा

था। एक दिन सुरेश को फोन कर विनीता को लेकर फिर से वही सवाल किया। सुरेश का वही जवाब, ‘कौन करेगा किसी विधवा से शादी’ शायद इस बीच मैं विनीता को चाहने लगा था। मुझे यह भी पता था कि विनीता अब अपनी ससुराल में नहीं रहती। मैंने सुरेश से फोन पर ही कहा कि ‘मैं विनीता से शादी करूंगा।’ सुरेश कुछ देर तो चुप रहा, फिर उसने कहा,‘मैं घर में बात करके देखता हूं।’ मैंने भी अपने घर में इस बात की चर्चा नहीं की थी। हमारे यहां लड़कों की शादी 20 से 22 साल में हो जाती है। मां मेरी शादी को लेकर काफी चिंतित रहती थीं। मैंने मां को विनीता के बारे में बताया। पहले तो वो चुप हो गईं, लेकिन मैंने जब मां को बताया कि मैं विनीता को चाहता हूं तो वे राजी हो गईं। विनीता को पहली शादी से कोई संतान नहीं है, मां को इस बात से थोड़ा संतोष हुआ। उधर विनीता के भाई ने भी जब घर पर अपने माता-पिता से शादी को लेकर चर्चा की तो वे लोग भी राजी हो गए। मैं विनीता से भी इस बात को लेकर सहमत होना चाह रहा था। मैंने फोन पर ही अपनी बात विनीता तक पहुंचाई तो उसने कहा, ‘जब सबकी सहमति है तो मुझे भी यह रिश्ता मंजूर है।’ मैं यह जानता था कि मेरा समाज और विनीता की पहली ससुराल के लोग इस बात की अनुमति नहीं देंगे। इधर मेरी मां की एक ही इच्छा थी कि मेरी शादी धूमधाम और रीति-रिवाज से हो। मैं घोड़ी पर चढूं,


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विनीता जब 20 साल की थी, तब विधवा हो चुकी थी। अब नई और खुशहाल जिंदगी जी रही विनीता पुरानी बातों को भूल चुकी है। वह उसे याद भी नहीं करना चाहती और अब तो बच्चों और परिवार में ही इतनी उलझी रहती है कि कुछ और सोचने का होश कहां

बारात लेकर जाऊं और डोली पर विनीता को विदा कराकर लाऊं। लेकिन विनीता के पिता ने कहा कि ‘यह संभव नहीं हो सकेगा। एक ही लड़की की दो बार घर से डोली उठे, यह अच्छा नहीं लगताए हां, इसके बाद तुम जो कहो, हमें मंजूर है। विनीता की पहली ससुराल वाले कोई अड़चन ना पैदा करें, इसके लिए हम दोनों ने 26 अगस्त, 2014 को कोर्ट में शादी कर ली। वहां से हम कुमरानारायण मंदिर गए। दोनों परिवार की उपस्थिति के बीच हमारे रीति-रिवाज के अनुसार शादी संपन्न हुई। मैं घोड़ी चढ़कर और विनीता डोली पर हमारे घर आई। सोलह श्रृंगार में विनीता का चेहरा खिल उठा और यही खुशी तो मैं विनीता के चेहरे पर देखना चाहता था। आज हमारे दो बच्चे हैं। ‘राकेश जब अपनी बातें सुना रहा था तो उसके चेहरे की खुशी साफ-साफ पढ़ी जा सकती थी। पास बैठी विनीता की मुस्कान भी तो यही बता रही थी। विनीता जब 20 साल की थी, तब विधवा हो चुकी थी। नई और खुशहाल जिंदगी जी रही विनीता पुरानी बातों को भूल चुकी है। वह उसे याद भी नहीं करना चाहती और अब तो बच्चों और परिवार में ही इतनी उलझी रहती है कि कुछ और सोचने का होश कहां। कहती है, ‘आपने जिक्र किया तो वह सारा मंजर याद आ गया, जब दिवली-भनीग्राम सभा के गांवों के घरों में खबर आने लगी कि केदारनाथ में आई आपदा में किसी का बेटा, किसी का पति तो किसी के पिता लापता हो गए हैं। मेरे पति महेशचंद्र, ससुर देवलाल और जेठ सुरेश भी उन दिनों केदारनाथ में ही थे। वे वहां घोड़ागाड़ी चलाते थे। दो दिन बात जेठ से खबर मिली कि मेरे पति और ससुर मलबे में बह गए। मैंने अपना पति ही नहीं, एक भले इंसान को भी खो दिया। मेरे पिता भी आए। उन्हें खोजने की तमाम कोशिश बेकार गई। उनके बिना घर काटने को दौड़ता था। सच कहूं तो वहां कुछ ताने भी मिलने लगे थे, सो

तीन-चार महीने बाद मायके लौट आई। इसके बाद फिर मैं वहां नहीं गई। अगर मैं ससुराल में ही रहती तो शायद मेरी फिर से शादी नहीं होती। और शायद जिंदगी भर घुट-घुट कर वहीं मर जाती। महेश जी अच्छे इंसान थे। पीड़ा सिर्फ इस बात की है कि अंतिम समय में उनका चेहरा तक नहीं देख सकी। विनीता की सास सूरमा देवी की उम्र 50 वर्ष है। एक विधवा से अपने कुंआरे और योग्य लड़के की शादी को वे इतनी सहजता से कैसे स्वीकार कर गईं, यह पूछने पर उनकी आंखें भर आईं। कहा, ‘जब मैं

विनीता की उम्र की थी, तब मैं भी विधवा हो गई थी। तब एक से चार साल की उम्र के मेरे 6 बच्चे थे। कैसे खुद को और फिर बच्चों को संभाला है, यह मैं ही जानती हूं। तब मैं भी सोचती थी कि कोई तो होता, जिसका सहारा लेती। हां, इतना सोचने का हौसला नहीं था कि मैं दूसरी शादी कर लूं। कोई तैयार नहीं होता। जवान विधवा को देखकर सिर्फ उसके शरीर के बारे में सोचते हैं लोग। कोई उसे अपनाने की ताकत नहीं रखता। मुझे अपने बेटे पर गर्व है कि उसने यह हिम्मत दिखाई। शादी लड़के की मर्जी से ही हो तो अच्छा लगता है। बहू अच्छी है, अब और क्या चाहिए। ब्याह कर आई और सुंदर लगी तो 500 रुपए मुंह दिखाई भी दिया। विनीता के बच्चों का नाम भी दादी ने ही रखा है, भले ही वह उसका मतलब नहीं जानती हों। आर्यन को दिए चॉकलेट का मजा वे भी ले रही थीं। देवर रजनीश को भाभी के हाथ का खाना और साथ में खाना अच्छा लगता है। उसी दिन विनीता को अपने मायके भी जाना था। वहां से किसी और गांव, जहां उसके एक रिश्तेदार की शादी थी। हमने भी उनके साथ जाने का कार्यक्रम बनाया। विनीता ने आधे घंटे की मोहलत मांगी कि जल्द ही बच्चों को और अपने को तैयार करती हूं। हम घर से नीचे सड़क पर उतर आए, जहां हमारी गाड़ी लगी थी। कुछ देर बाद जब विनीता और राकेश अपने बच्चों के साथ नीचे आए तो सजे संवरे थे। आर्यन ने गले में एक बड़ा-सा लॉकेट भी टांग रखा था।

कार से हम साथ-साथ विनीता के मायके कुमड़ी के लिए निकले, जो बगल के एक पहाड़ पर बसा था। रास्ता दुर्गम और जोखिम भरा था, कई बार ऐसा मौका भी आया कि हम डर से सहम गए। माहौल को सामान्य बनाने के लिए मैंने दोनों के दांपत्य जीवन को लेकर बातें शुरू कर दी। ‘ड्राइवर हूं, घर पर मैं अधिक समय नहीं दे पाता हूं। अगर काम नहीं मिला तो ही घर पर होता हूं। ‘बात राकेश ने शुरू की, बच्चों से लेकर घर का पूरा दायित्व विनीता का ही है। बाहर से सामान लाना हो, बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाना हो, सारा काम विनीता ही देखती है। विनीता इस बात का बिलकुल बुरा नहीं मानती है। जब रात को देर हो जाती है तो थोड़ा गुस्सा करती है। जब उसे एक दिन यह पता चला कि मुझे घर आने में देरी इसीलिए होती है कि मैं दोस्तों के साथ बैठकर दारू पीता हूं, तब काफी गुस्सा हुई थी। दो-तीन दिन मनाने में लग गए थे। तब से मैंने दारू पीनी छोड़ दी। अन्य महिलाओं की तरह विनीता को भी फुर्सत के क्षणों में टीवी देखना पसंद है। घर के काम से निपटकर विनीता भी चाहती है कि कुछ देर टी.वी. देखे। कोई फिल्म या सीरियल देखे, लेकिन बच्चे कार्टून देखना नहीं छोड़ते। कहती है, अब तो मुझे भी कार्टून ही देखना अच्छा लगता है। विनीता पांचवीं पास है और उसने आर्यन को आंगनवाड़ी भी भेजना शुरू कर दिया है। दोनों बच्चों का टीकाकरण नियमित समय पर हो, विनीता इसका भी ध्यान रखती है। बताते चलें कि राकेश को विनीता के दांत


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समाज में आज इस बात की जरूरत है कि कम उम्र की इन विधवाओं का पुनर्विवाह कराकर उन्हें हंसी-खुशी फिर से अपनी जिंदगी जीने का अवसर दिया जाए। राकेश जैसे हजारों-लाखों मानवीय दृष्टि रखनेवाले युवा हैं हमारे देश में, उन्हें इस कार्य के लिए आगे बढ़ना चाहिए- डॉ. पाठक

और विनीता को अपने पति की नाक बेहद पसंद है। इन्हीं सब बातों के साथ हम कुमड़ी पहुंच गए। विनीता के घर से 1 किलोमीटर पहले ही गाड़ी रोकनी पड़ी। वहां से हमें पैदल जाना था। रास्ते में ही विनीता के पिता देवदास मिल गए, जिन्हें देखते ही आर्यन और अदिति उनकी गोद में जाने के लिए लपक पड़े। आर्यन को वह अपने कंधे पर बिठाकर घर की ओर चल पड़े। गांव और घर के बच्चों ने हमें दूर से ही देख लिया था और दौड़ते हुए नीचे तक आए। विनीता किसी की दादी थी तो किसी की बुआ। सबने विनीता और राकेश के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। थोड़ी चढ़ाई के बाद हम विनीता के घर पहुंचे। मां भाग्या देवी और दादी सुनदी के अलावा गांव के बच्चे हमारा इंतजार कर रहे थे। विनीता के पांव छूते ही मां और दादी ने उसे गले से लगा लिया। पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और बड़े ही यत्न से उन्होंने अपने बच्चों को पाला है। याद है उन्हें वह दिन, जब इसी घर में महेशचंद्र घोड़ी चढ़कर आया था और दुल्हन के रूप में उनकी बेटी को डोली में बिठा कर ले गया। बेटी के हाथों की मेहंदी अभी सूखी भी नहीं थी कि आपदा ने उसकी मांग का सिंदूर धो दिया था। विनीता के पिता देवदास थोड़ा और भावुक होते हैं और बताते हैं, ‘आपदा में महेशचंद्र के लापता होने की खबर मिलते ही मैं उसकी खोज में निकल गया।

भूखे-प्यासे कई दिनों तक पहाड़ की खाक छानी, गौरीकुंड तक गया, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। लौटकर वापस बेटी के पास गया तो उसका चेहरा देखा नहीं गया। हमेशा हंसने वाली विनीता को मानो काठ मार गया हो। बाद में यह भी पता चला कि ससुराल में मुआवजे की रकम को लेकर भी उसे सताया जा रहा है तो मैं उसे लेकर वापस घर आ गया। सबकुछ भगवान के सहारे छोड़ दिया। विनीता के साथ-साथ पूरा घर भी उदास रहने लगा। उसकी दूसरी शादी के बारे में तो चाह कर भी सोच नहीं सकता था। ‘मेरे बेटे ने जब मुझे बताया कि तिलवाड़ा का राकेश विनीता से शादी करना चाहता है तो पहले मैं चौंका। विश्वास करनेवाली बात भी नहीं थी। जब विनीता ने बताया कि इस तरह का प्रस्ताव राकेश की ओर से आया है तो आंखों से आंसू निकल गए। जब राकेश से मिला तो उसके मधुर व्यवहार से भी परिचित हुआ। ड्राइवर है और आठवीं पास भी है, परिवार चलाने भर कमाई तो हो ही जाती है। मुझको इससे ज्यादा क्या चाहिए था। मेरे घर भगवान बनकर आया राकेश। उसकी सिर्फ एक ही इच्छा थी कि वह बारात लेकर आता और विनीता को डोली में बिठाकर ले जाता। लेकिन मैं उसे पूरा नहीं कर सका। हां, इसके अलावा उसने जिस तरह से

चाहा, वैसा ही हुआ। यहां जब भी आता है तो दामाद बनकर नहीं, बेटा बनकर। मेरी खुशी तो दुगुनी हो गई, जब मैं नाना बना। विनीता की मां भाग्या देवी बताती हैं, ‘बेटी को पहली बार जब विदा किया और जब उसका सुहाग उजड़ते देखा, उस समय उतनी रुलाई नहीं आई, जितना दूसरी बार उसका मांग भरते देखा, खुशी के आंसू निकल आए। जिस भगवान को तब कोस रही थी कि उसने यह दिन क्यों दिखाए, आज उसी भगवान को धन्यवाद दे रही हूं, जिसने मेरी बेटी को नई जिंदगी दी है।’ भाग्या देवी भी राकेश में भगवान को देख रही हैं, ‘मेरा घर ही नहीं, पूरा गांव इस बात से खुश है कि विनीता को दूसरा जीवन मिला है।’ पहाड़ी झरने का मीठा पानी और गुड़ खाकर हम वापस लौट आए। विनीता की शादी को लेकर उसके पहले ससुरालवालों और गांववालों की क्या प्रतिक्रिया है, यह जानने-समझने के लिए हम रुद्रप्रयाग की सबसे ऊंची पहाड़ी दिवली-भनीग्राम सभा के सिरवाणी गांव की ओर रवाना हो गए। कार से 200 किलोमीटर की यात्रा के अलावा तीन किलोमीटर की पैदल चढ़ाई के बाद हम सिरवाणी पहुंचे। दिवल-भनीग्राम मूलतः ऊंची जाति बहुल गांव है। दो-चार घर वाल्मीकि परिवार के हैं। उन्हीं में से एक घर स्वण देवलाल का है। देवलाल और उनका छोटा बेटा महेशचंद्र उस आपदा के शिकार हुए थे। घर पर थी विधवा सास बिछना देवी, बड़ा लड़का सुरेश और उनकी पत्नी संजू। जिक्र छिड़ते ही सभी की आंखें नम हो गईं। कुछ देर तक हम सभी खामोश ही रहे। मेरे पास भी पूछने के लिए कुछ विशेष नहीं था। बातों से लगा कि विनीता की दूसरी शादी से वे खुश नहीं हैं। बिछना देवी कहती हैं, ‘पति के साथ-साथ हमने भी अपना जवान बेटा खोया है। ऐसा नहीं था कि हम विनीता की देख-रेख नहीं कर सकते थे। हमें उसकी चिंता नहीं थी, ऐसा नहीं है। हम समाज में रहते हैं। विनीता तो चली गई, सुनना तो हमें पड़ रहा है। कभी विनीता की जेठानी रह

चुकीं संजू ने एक तरह से सास को रोकते हुए कहा, ‘हमें इस बात की खुशी है कि उसने दूसरी शादी कर ली। अभी उसकी उम्र ही क्या है! बाल-बच्चे होते तो शायद वह ऐसा नहीं करती। दुःख सिर्फ इस बात का है कि जिसके साथ हमारा खाना-पीना होता था, सुख और दुख भी साथ काटे हैं, उसे हमसे अपनी बात तो कहनी चाहिए थी। वह कुछ दिन के लिए मायके गई थी और पिफर बाद में दूसरों के माध्यम से पता चले कि उसने दूसरी शादी कर ली है तो बताइए, आपको कैसा लगेगा!’ हमारे साथ गांव के पूर्व प्रधान केशव तिवारी भी थे, उन्होंने संजू से तुरंत पूछ लिया,‘क्या वह यहां रहकर यह सब करती तो आपलोग उसका विवाह होने देतीं’ इसका कोई उत्तर नहीं मिला। वापस लौटते समय मेरी मुलाकात गीता से हुई। यह वही गीता है, जिसके पति सुनील का निधन आपदा में हो गया था। जब मैं पहली बार दिवली-भनीग्राम आया था तो उसके सबसे छोटे बेटे को मैंने गोद लिया था। विनीता की शादी की खुशी सबसे अधिक गीता को ही है। कहती है, ‘हमारे तो तीन-तीन बच्चे हैं, उनके सहारे जी लूंगी, लेकिन विनीता के साथ तो कोई ऐसा नहीं था, जिसके सहारे वह जीती। ‘थोड़ा और नीचे उतरने पर सुलभ ट्रेनिंग सेंटर पर रुका। वहां पूनम तिवारी, सावित्री तिवारी, रजनी पुरोहित, किरण पुरोहित, ज्योति सेमवाल, धनिता, गीता देवी, संगीता और रजनी जैसी विधवाओं से मिला। सभी की उम्र 25 से 30 के बीच की होगी। यहां सभी को इस बात की खुशी तो है कि विनीता ने दूसरी शादी कर अपना नया घर बसा लिया, लेकिन खुद दूसरी शादी करें, ऐसा सोचना भी उनके लिए पाप है। समाज में आज इस बात की जरूरत है कि कम उम्र की इन विधवाओं का पुनर्विवाह कराकर उन्हें हंसी-खुशी फिर से अपनी जिंदगी जीने का अवसर दिया जाए। राकेश जैसे हजारों-लाखों मानवीय दृष्टि रखनेवाले युवा हैं हमारे देश में, उन्हें इस कार्य के लिए आगे बढ़ना चाहिए।


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

अंतरराष्ट्रीय

डेनमार्क के जीरो कार्बन शहर

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प्रोजेक्ट जीरो के तहत डेनमार्क के चार शहरों को कार्बन निरपेक्ष बनाने के मिशन पर तेजी से काम चल रहा है

एक नजर

सोंडरबोर्ग को 2029 तक कार्बन निरपेक्ष बनाने की योजना प्रोजेक्ट जीरो पीपीपी मॉडल के तहत काम कर रहा है

डेनमार्क में 2005 व 2016 के बीच 35 फीसद कार्बन कटौती की गई

वेंकटचारी जगन्नाथन

‘आ

ई एम ए बिग जीरो’, यह प्रोजेक्ट जीरो ए-एस के प्रबंध निदेशक पीटर राथजे के बैज पर लिखा है। वह डेनमार्क के शहर सोंडरबोर्ग को वर्ष 2029 तक कार्बन निरपेक्ष बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं। राथजे बताते हैं, ‘नहीं, मुझे इस बैज को पहली बार या बाद में भी लगाने में कोई परेशानी नहीं हुई।’ प्रोजेक्ट जीरो 75000 प्राणियों वाले इस शहर (यहां 4,40,000 सूअर और 2,50,000 मुर्गियां भी हैं) में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से चलाया जा रहा है। इसका मूल मकसद निवेशकों, पर्यटकों को लोगों को इस शहर में रहने के लिए आकर्षित करना है, साथ ही हरित रोजगार के अवसर पैदा करना है। प्रोजेक्ट जीरो का मकसद सोंडरबोर्ग को खेती, उद्योग व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था से निकाल कर एक हरित व्यवसाय आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील करना है। कार्बन निरपेक्षता प्राप्त करने के लिए इस शहर को ऊर्जा का कुशल उपयोग करना होगा, जिससे 7,22,000 टन कार्बन उत्सर्जन से ज्यादा न हो, जैसा कि वर्ष 2007 के इस स्तर को आधारचिन्ह बनाया गया है। मेयर एरिक लॉरिटजेन ने उनसे मिलने पहुंचे पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय समूह को बताया, ‘प्रोजेक्ट जीरो सोंडरबोर्ग का एक लाइटहाउस प्रोजेक्ट है। इसका मकसद सोंडरबोर्ग को एक रहने और काम करने के लिए एक उत्तम जगह बनाना है।’ अन्य दो

लाइट हाउस प्रोजेक्ट के जरिए नगर के बंदरगाह के सामने के इलाके को रिहायश में तब्दील किया जा रहा है और नगर को पर्यटक स्थल बनाया जा रहा है। राथजे के मुताबिक, इस परियोजना का मुख्य मकसद ऊर्जा दक्षता है, जिसे तर्कपूर्ण इस्तेमाल के जरिए ऊर्जा की मांग को सीमित कर पूरा किया जा रहा है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा और जरूरत पड़ने पर आवश्यक हो तो जीवाश्म ऊर्जा का भी उपयोग किया जा रहा है, लेकिन जितना संभव हो उतनी कुशलता और साफ सफाई के बाद इसका उपयोग किया जाता है। राथजे बताते हैं, ‘2005 व 2016 के बीच 35 फीसद कार्बन कटौती की गई और अब 2020 तक 50 फीसद कटौती का लक्ष्य रखा गया है। इस दौरान निर्माण, ऊर्जा परामर्श व ग्रीन डिस्ट्रिक्ट हिटिंग में 800 लोगों को रोजगार मिला।’ वर्ष 2020 के लिए तय लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में किए जा रहे कार्यकलापों के बारे में राथजे ने बताया कि ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए घरों, दफ्तरों, वाणिज्यिक भवनों में नई सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही सौरशक्ति, बायोगैस संयंत्र और सागरतटों पर पवनचक्की स्थापित करने से भी इस लक्ष्य की

प्राप्ति में मदद मिलेगी। राथजे ने बताया कि दो बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए हैं, जिसके बाद अब सार्वजनिक परिवहन की बसें बायोगैस से चलने लगी हैं। उन्होंने कहा कि कई घरों में औसतन 21000 यूरो के खर्च से नई सुविधाओं को संयोजन किया गया है। इसे नई नौकरियां भी पैदा हुई हैं और हर घर में 45 फीसद ऊर्जा खपत में बचत हुई है। हरित पर सतत जोर देने के लिए बच्चों को सिखाया जाता है कि कचरा भी मूल्यवान है और विविध रूपों में इसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। दूसरी ओर, डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन ने साल 2025 तक कार्बन निरपेक्षता का लक्ष्य रखा है, जो सोंडरबोर्ग से चार साल आगे हैं। कोपेनहेगेन के मेयर मोर्टन कैबेल के अनुसार, डेनमार्कवासियों को यह समझाना सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे अपनी कारों को हटाकर सार्वजनिक परिवहन व साइकिल को उपयोग में लाएं। उन्होंने बताया, ‘मैंने अपने कार्यालय में इस्तेमाल होने वाली कार बेच दी और ई-बाइक से कार्यालय आना शुरू कर दिया।’ कोपेनहेगेन की आबादी 6,00,000 है, और कैबेल शहर के सात मेयरों में से

ढेर सारे डेनमार्कवासी कोपेनहेगेन में काम पर जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। साइकिल के लेन यहां चौड़े बनाए गए हैं और प्रशासन उन्हें और चौड़ा बनाने पर विचार कर रहा है

एक हैं। कैबेल कहते हैं, ‘5-7 किलोमीटर की दूरी यहां लोग साइकिल से तय करते हैं। हम इसे बढ़ाकर 10 किलोमीटर करना चाहते हैं। लोग ई-बाइक्स का भी प्रयोग कर सकते हैं।’ ढेर सारे डेनमार्कवासी कोपेनहेगेन में काम पर जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। साइकिल के लेन यहां चौड़े बनाए गए हैं और प्रशासन उन्हें और चौड़ा बनाने पर विचार कर रहा है, ताकि जगह की कमी ना पड़े और लोग कारों का प्रयोग करने के लिए हतोत्साहित हों। वे कहते हैं, ‘कारें जगह घेरती है और औसतन केवल एक आदमी के आवागमन के काम आती है। ऐसे शहर की पहले से योजना बनानी चाहिए, जहां कारों का उपयोग होने वाला हो। वहां लोग कार खरीद सकते हैं और चला सकते हैं।’ कैबेल कहते हैं, ‘हम एक बढ़ता हुआ शहर हैं। शहर की आबादी सालाना दो फीसदी बढ़ जाती है। हमारे लिए अवसंरचना, स्कूलों और अन्य सुविधाओं को बढ़ाना एक चुनौती है।’ वर्ष 2025 तक कार्बन निरपेक्षता प्राप्त करने की चुनौती पर कैबेल का कहना है कि वर्तमान में तय की गई योजनाओं के मुताबिक शहर उस समय तक 92 फीसदी लक्ष्य को हासिल कर लेगा। उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा, ‘शेष 8 फीसदी को हासिल करने के लिए नई योजनाओं को बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा।’ कैबेल ने कहा, ‘अब तक हमने लक्ष्य का 33 फीसदी प्राप्त कर लिया है। संपत्ति मालिकों से कहा जा रहा है कि वे अपनी इमारतों में विशिष्ट हीटिंग और कूलिंग सुविधा मुहैया कराएं।’ शहर ने उर्त्सजन को 2005 के स्तर पर रखने का आधारचिन्ह तय किया गया है। एक बॉयोमास ऊर्जा संयंत्र का भी निर्माण किया जा रहा है और साल 2020 तक यह काम करने लगेगा, जिससे शहर की 80 फीसदी हीटिंग प्रणाली कार्बन निरपेक्ष हो जाएगी। कैबेल के मुताबिक, निगम द्वारा दिए गए डब्बों में घरों में कचरे को अलग-अलग करने से जैविक कचरे का प्रयोग बॉयोमास संयंत्र में किया जा सकता है। शहर की स्ट्रीट लाइटों को ऊर्जा दक्ष एलईडी बल्बों से बदल दिया गया है और ज्यादातर कचरा ट्रक गैस से चलाए जा रहे हैं।


14 जनलिपि

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

700 साल पुरानी लिपि 'कैथी' बिहार की 700 साल पुरानी जनलिपि 'कैथी' को संरक्षित करने के प्रयास में जुटा है नालंदा खुला विश्वविद्यालय

एसएसबी ब्यूरो

क ऐसे दौर में जब भाषाएं ही एक के बाद एक प्रचलन से बाहर हो रही हैं, तो उनकी लिपियों की हालत क्या होगी, यह आसान से समझा जा सकता है। ऐसी ही एक लिपि है- कैथी। कैथी एक ऐतिहासिक लिपि है, जिसे मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता था। खासकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किए जाने के भी प्रमाण पाए जाते हैं। पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम प्रांत, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा और अवध में। इसका प्रयोग खासकर न्यायिक, प्रशासनिक एवं निजी आंकड़ो के संग्रहण में किया जाता था।

16वीं सदी में प्रचलन

कैथी एक पुरानी लिपि है, जिसका प्रयोग कम से कम 16वीं सदी में धड़ल्ले से होता था। मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था। इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक

लिपि का दर्जा दिया गया था।

विश्वविद्यालय का सराहनीय प्रयास

बिहार की करीब 700 साल पुरानी जनलिपि 'कैथी' को संरक्षित करने के साथ ही युवाओं में इस लिपि के बारे में जागरूकता लाने का प्रयास नालंदा खुला विश्वविद्यालय कर रहा है। विश्वविद्यालय इस लिपि में उपलब्ध शिला लेख, महापुरुषों के पत्र और डायरी सहित अन्य पांडुलिपियों को लाइब्रेरी में संरक्षित किया जाएगा। विश्वविद्यालय के सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इस लिपि में उपलब्ध साहित्य को डिजिटलाइजेशन कर संरक्षित किया जाएगा। इसके अलावा कैथी लिपि की अक्षर माला प्रकाशित की जाएगी, जिससे युवा पीढ़ी इस लिपि को पढऩालिखना सीख सकें। नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रास बिहारी सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय का

काम सिर्फ परीक्षा लेना नहीं है। विश्वविद्यालय को समाज से भी जुड़ना चाहिए। हमने सामाजिक दायित्व के तहत कैथी लिपि को डिजिटलाइज्ड कर संरक्षित करने का निश्चय किया है। इसके तहत विश्वविद्यालय में युवाओं के लिए एक कार्यशाला भी आयोजित की जा चुकी है। विश्वविद्यालय में ऐसी कार्यशालाएं नियमित अंतराल पर आयोजित की जा रही हैं। कार्यशाला में इस लिपि के डॉ. भवनाथ झा और डॉ. मो. हबीबुल्लाह अंसारी सरीखे जानकार कैथी के इतिहास, इसके प्रचलन और इसकी उपयोगिता के बारे में बताते हैं।

बिहार की पुरानी जन-लिपि

गौरतलब है कि कैथी लिपि बिहार की अपनी लिपि है। करीब 700 साल पहले से ब्रिटिश काल तक सरकारी कामकाज और जमीन के दस्तावेज भी इसी लिपि में लिखे जाते थे। अब इस लिपि के जानकार

कैथी को ‘महाजनी लिपि’ भी कहते है, क्योंकि सैकड़ो साल से महाजन इस लिपि में बही-खाता लिखते थे। थानों में एफआईआर भी कैथी लिपि में लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं

एक नजर

16वीं सदी में धड़ल्ले से होता था कैथी लिपि का प्रयोग

गुप्त काल के शासकीय अभिलेख कैथी लिपि में लिखे गए

जब देवनागरी प्रचलित नहीं थी तो कैथी में ही साहित्य सृजन होता था

बहुत ही कम लोग रह गए हैं। इस लिपि के जानकार भैरवलाल दास बताते हैं कि गुप्त काल के शासकीय अभिलेख कैथी लिपि में लिखे जाने का प्रमाण मिला है। पटना म्यूजियम में भी कैथी लिपि में एक स्टोन स्क्रिप्ट संरक्षित है। चंपारण आंदोलन के लिए महात्मा गांधी को बिहार लानेवाले राजकुमार शुक्ल की डायरी भी कैथी लिपि में मिली है। भैरवलाल बताते हैं कि बिहार में अंगिका, बज्जिका, मगही, मैथिली और भोजपुरी भाषाओं के भी साहित्य को कैथी में लिपिबद्ध किया गया है। कैथी जनलिपि थी। बिहार से लेकर उत्तरप्रदेश तक में आम जनों, महिलाओं और कम शिक्षित वर्ग भी कैथी में ही अपनी अभिव्यक्ति लिखते थें।


लोहे के कील चुनने वाले ‘कवि जी’ मगही के वरिष्ठ कवि उदय शंकर शर्मा 2010 से सड़कों पर कांटी चुन रहे हैं। इसे बेचकर जो पैसे उन्हें मिलते हैं उससे वे अपने गांव में एक पुस्तकालय बनाना चाहते हैं

जो

लोग इस बुजुर्ग साहित्यकार को पहचानते हैं, उनके लिए तो कोई नई बात नहीं होती पर अनजान लोग यह देखकर कई बार कई तरह की जिज्ञासाओं से भर जाते हैं कि एक हाथ में साइकिल की हैंडल और दूसरे में छड़ी लिए यह वृद्ध आखिर सड़क पर कर क्या रहा है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं मगही के वरिष्ठ कवि उदय शंकर शर्मा की। उनकी चर्चा कैथी लिपि के संरक्षण के मुद्दे पर हम पहले कर भी चुके हैं। उनकी छड़ी में चुंबक लगा है, जिसे सड़क पर सटाते हुए वे आगे बढ़ते हैं। इस तरह छड़ी में लोहे की कीलें सटती जाती हैं। अगर आप उदय जी से पूछिए भी कि वे क्या कर रहे हैं तो वे भी जवाब यही देते हैं कि कांटी चुन रहा हूं। उनके गले में एक थैला भी होता है, जिसमें वे कीलें, नट बोल्ट आदि जमा करते हैं। कई बार इस थैले का वजन एक किलो से ऊपर हो जाता है। उदय शंकर शर्मा को लोग ‘कवि जी’ के रूप में भी जानते हैं। मगही के वे वरिष्ठ काव्य हस्ताक्षर हैं। वैसे वे हिंदी में भी कविताएं लिखते हैं। वे नालंदा के हरनौत थाने के पोआरी गांव के रहने वाले हैं और पटना में मंदिरी में रह रहे हैं। उनके हर दिन की दिनचर्या है कि दो-तीन घंटे पटना की सड़कों पर कांटी चुनते हैं। कई किताबें भी आई हैं कवि जी कीमगही गीता, मगही दुर्गाशप्तशती, सुजनी, भक्त शिरोमणि शबरी। ये सब मगही में हैं। उन्होंने गीतांजलि और मेघदूत का अनुवाद भी मगही में किया है। वे कहते हैं, ‘सरकार तो सारे काम करती ही है, कुछ काम हम नागरिकों को भी समय निकाल कर करना चाहिए जैसे कि मैं कांटी चुनता हूं। पता नहीं यह कांटी किसे अस्पताल पहुंचाने में देर कर दे! दो माह पहले ही कांटी बेची है, अब फिर से 40-50 किलो जमा हो गया है।’ उदय शंकर शर्मा 2010 से कांटी चुन रहे हैं। इसे बेचकर जो पैसे उन्हें मिलते हैं उससे वे अपने गांव में एक पुस्तकालय बनाना चाहते हैं। कांटी चुनने की शुरुआत की तो घर वालों ने कहा कि पागल हो गए हैं। सगे-संबंधी भी मजाक उड़ाते

सराहनीय कदम लु

प्त होती भाषाओं को ध्यान में रखते हुए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के हिंदी विभाग ने एक सराहनीय कदम उठाया है। उत्तर प्रदेश के मेरठ के बावली गांव के ठेठ मुहावरे अब बावली तक सीमित नहीं रहेंगे। किनौनी में सदियों से चली आ रही लोकोक्ति से भी पढ़े लिखे लोग अनजान नहीं रहेंगे। इन क्षेत्रों में प्रचलित ठेठ लोकोक्तियां और मुहावरे अब सहेजे जाएंगे, ताकि इसकी जीवंतता बनी रहे। हिंदी विभाग इसे एक

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जनलिपि

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2500 भाषाएं हो जाएंगी लुप्त!

यू

नेस्को ने भाषा एटलस जारी किया, जिसके मुताबिक दुनिया की करीब 6000 भाषाओं में से 2500 के लुप्त होने की आशंका है। भारत में सर्वाधिक 196 भाषाओं पर लुप्त होने का खतरा है। दूसरा स्थान अमेरिका का है जहां की 192 भाषाओं पर यह संकट है। यूनेस्को के अनुसार दुनिया में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वाले 10-10 से भी कम लोग हैं। भाषा की मौत का अर्थ गहरा है। इसके साथ खास संस्कृति का भी अंत

हो जाता है, मनुष्यों की विशिष्ट पहचान गुम हो जाती है। भाषा का मरना दुनिया की विविधता पर भी चोट है। यह हमारे एकरंगी विश्व की ओर जाते कदम का सूचक है। दुनिया के भाषा विज्ञानी इसे लेकर सांसत में हैं। वैश्वीकरण के बाद भाषाओं के विलोप में काफी तेज़ी आई है। आज दुनिया के करीब 97 फीसदी लोग केवल चार भाषाएं बोलते हैं। इससे उलट दुनिया की 96 फीसदी भाषाएं केवल तीन फीसदी आबादी द्वारा बोली जाती है।

• ऑस्ट्रेलिया के जनजातीय समूह में बोली जाने वाली दो भाषाएं ‘यावुरू’ और ‘मगाटा’ को बोलने वाले केवल तीन लोग बचे हैं। इसी तरह भाषा अमुरदाग है, जिसे बोलने वाला केवल एक व्यक्ति ज़िन्दा है। • बो - यह ग्रेट अंडमानी भाषा इसी साल लुप्त हुई, जब इसे बोलने वाली एकमात्र महिला बोआ सीनियर की मौत हुई। यह भाषा उत्तरी अंडमान के पश्चिमी किनारे पर बोली जाती थी। यह भाषा लिपिहीन थी इसलिए इसके सम्बंध में अब कोई जानकारी नहीं है। • इयाक - यह 21 जनवरी 2008 को लुप्त हुई। इसे बोलने वाले आखरी व्यक्ति थे स्मिथ जोन्स। इयाक एक सदी पहले अलास्का के प्रशांत महासागरीय तटीय क्षेत्रों में काफी प्रचलित थी। • अकाला सामी - यह रूस के कोला पेनेसुएला में बोली जाती थी। इसे बोलने वाले आखरी व्यक्ति मार्जा सर्जीना थे जिनकी मौत 29 दिसंबर 2003 को हुई। इसका लिखित ज्ञान इतना कम है कि इसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। • गागुडजू - इसकी मौत 23 मई 2002 को इसे बोलने वाले आखरी व्यक्ति बिग बिल निएट्जी के साथ हुई। यह कभी उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में बोली जाती थी। इस भाषा को काकाडू या गागाडू के नाम से भी जाना जाता है।

• उबयेख - यह कभी तुर्की के कॉकेशियन प्रांत में बड़े पैमाने पर बोली जाती थी। यह क्षेत्र काला सागर के इलाके में पड़ता है। उबयेख के अंतिम जानकार का नाम अज्ञात है, लेकिन माना जाता है कि उनकी मृत्यु 1992 में हुई थी। • मुनिची - यह कभी पे डिग्री के यूरीमागुआस प्रांत के मुनिचीस गांव में बोली जाती थी। इस भाषा के अंतिम जानकार हुऐनचो इकाहुएटे थे जिनकी मौत सन 1990 में हुई थी। • कामास - इसे कामाशियन के नाम से भी जाना जाता है। यह रूस के यूराल पर्वतमाला क्षेत्र में बोली जाती थी। आखरी बोलने वाले कलावाडिया पोल्तोनिकोवा थे जिनकी मौत सन 1989 में हो गर्ई। भाषा का व्याकरण अभी भी उपलब्ध है। • मियामी इलिनाइस - यह देशज अमेरिकन भाषा थी। 1989 में हुए अध्ययन के बाद पाया गया कि इसे बोलने वाला कोई नहीं बचा है। लुप्त होने से महज 25 साल पहले तक अमेरिका के इलिनॉय, इंडियाना, मिशिगन, ओहायो जैसे प्रांतों में इसे बोलने वाले कुछ लोग थे। • नेगरहॉलैंड्स क्रिओल - यह 1987 में लुप्त हुई। आखरी व्यक्ति जो इस भाषा की जानकार थी वे थी श्रीमती एलिक स्टीवेंसन। यह भाषा अमेरिका के वर्जिन आइलैंड में बोली जाती थी।

25 साल में लुप्त हुई भाषाएं

थे कि क्यों कवि जी इतना दिन खराब हो गया लोहा चुनने लगे हैं। वे कहते हैं, ‘मैंने इस सब की परवाह नहीं की। कांटी बेचकर दो अलमारी खरीदी, उसमें एक में धार्मिक साहित्य और दूसरे में मगही साहित्य की किताबें रखी हैं। इन पैसों से कभी-कभी किताब-कॉपी आदि देकर गरीब बच्चों की मदद भी करता हूं।’ लोहा चुनने की अपनी आदत के बारे में कवि जी एक रोचक अनुभव बताते हैं। वे कहते हैं, ‘एक दिन गांव में एक श्राद्ध में जा रहा था कि मोटरसाइकिल पंचर हो गई। उसे बनवाई, फिर पंचर हो गई तो फिर बनवाई। इस दिन मैंने संकल्प लिया कि मैं कांटी चुनूंगा। तब से सिलसिला चल रहा है लगातार। पहले कांटी जमीन में गाड़ देता था, लेकिन अब बेचकर उस पैसे का बेहतर इस्तेमाल करता हूं। अब तो हर रात अगले दिन का क्षेत्र तय कर लेता हूं। किसी एंबुलेंस को कांटी से पंचर होता देखता हूं तो कलेजा फटने लगता है कि इसका दोषी मैं ही हूं, मैं पहले इस इलाके में क्यों नहीं आया।’ साहित्य और संवेदना का रिश्ता वक्त पड़ने पर सड़कों पर लोहे की कील भी चुन सकता है, यह देखना और समझना एक प्रेरक अनुभव से गुजरने जैसा है। किताब का रूप देकर कोर्स में शामिल करने वाला है। इस संदर्भ में पांच सौ से अधिक लोकोक्तियां और मुहावरे एकत्र किए जा चुके हैं। बहरहाल, लुप्त हो रही भाषाओं के बारे में सोचकर मन व्याकुल हो उठता है, क्योंकि भाषा का सीधासाधा लगाव उस क्षेत्र के संस्कृति, परिवेश, अस्मिता, खान-पान और रहन-सहन से है। भाषा अपने आप में अपने समाज का प्रतिबिंब होती है। कुल मिलाकर कहें, तो भाषा अपने आप में प्रतिबिंब हैं। लुप्त हो रही भाषाओं पर सिर्फ चिंता व्यक्त न करके हमें चाहिए की ऐसी भाषाओं को सृजनात्मक तरीके से आत्मसात करें।

मिले हैं। कैथी को ‘महाजनी लिपि’ भी कहते है क्योंकि सैकड़ों साल से महाजन इस लिपि में बहीखाता लिखते थे।

शेरशाह का संरक्षण ‘महाजनी लिपि’

कैथी लिखने में आसान होने के कारण जनलिपि थी। जब देवनागरी प्रचलित नहीं थी, तब कैथी में ही साहित्य, कविता, नाटक, उपन्यास लिखा जाता था। यहां तक की कोई 50-60 साल पहले भी जमीन के दस्तावेज इस लिपि में लिखे जाते थे। थानों में एफआईआर भी कैथी लिपि में लिखे जाने के प्रमाण

शासकीय वर्ग में सर्वप्रथम शेरशाह ने 1540 में इस लिपि को अपने कोर्ट में शामिल किया। उस वक्त कारकुन कैथी और फारसी में सरकारी दस्तावेज लिखा करते थे। शेरशाह ने अपनी मुहरें भी फारसी के साथ कैथी लिपि में बनवाई थीं। कैथी में लिपिबद्ध कई धार्मिक ग्रंथ भी प्राप्त हुए हैं। बिहार में मगही अकादमी के अध्यक्ष रह चुके उदय शंकर शर्मा ने बताया कि मगही के कई नाटक और अन्य साहित्य कैथी में उपलब्ध हैं। अकादमी द्वारा इनके संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है।


16 खुला मंच

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

‘विद्या सबसे अनमोल धन है। इसके आने मात्र से ही सिर्फ अपना ही नहीं, अपितु पूरे समाज का कल्याण होता है’

अभिमत

पीएम मोदी के एप्प पर हुए सर्वे के मुताबिक 94 फीसदी लोग मानते हैं कि स्वच्छ भारत का बापू का सपना पूरा होकर रहेगा

विं

स्टन चर्चिल ने कहा था कि आधुनिकता के दौर में हम जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे वैसे-वैसे हमारे लिए हमारे लिए आगे बढ़ने का मसला ज्यादा पेंचीदा हो जाएगा। कहना मुश्किल है कि चर्चिल ने 21वीं सदी की दुनिया की कल्पना की थी कि नहीं पर उनकी यह बात तो सच साबित हो रही है कि आधुनिकता के साथ विकास की चुनौती आज बढ़ गई है। बात भारत की करें तो भारत ने मौजूदा सदी में विकास की चुनौतियां को जिस कुशलता से स्वीकार किया है, उससे हमारी वैश्विक हैसियत दुनिया में आज खासी ऊंची है। खास तौर पर बीते तीन सालों में जिस तरह भारत में विकास का मुहावरा और उस पर अमल का तरीका बदला है, वह एक बड़ी परिघटना है। एक हालिया सर्वे में कहा गया है कि विश्व की 56 प्रतिशत औसत की तुलना में भारत में 76 प्रतिशत के साथ डिजिटल प्रतिभाएं उपलब्ध हैं। सर्वेक्षण में कहा गया कि भारत, ब्रिटेन और जर्मनी में सबसे ज्यादा डिजिटल प्रतिभाएं की उपलब्ध हैं। कैपेगिनिनी और लिंक्डइन के इस सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के बाद इटली में 66, स्पेन में 65, ब्रिटेन में 62, नीदरलैंड 61 और अमेरिका में 55 प्रतिशत डिजिटल प्रतिभा की उपलब्धता है। वैसे इस सर्वेक्षण में एक और तथ्य जोर दिया गया है, जिस पर खास तौर पर भारत को गंभीरता से विचार करना होगा। सर्वे के मुताबिक भारत से 47 फीसदी प्रतिभाएं अमेरिका, 14 फीसदी ब्रिटेन, 6 फीसदी संयुक्त अरब अमीरात में पलायन कर रही हैं। अपनी सबसे कुशाग्र प्रतिभाअों के लिए अपने यहां कार्य करने के अवसर देना भारत के आगे बड़ी चुनौती है। सरकार की कुछ कोशिशें इस दिशा में कारगर भी हो रही हैं। मसलन, 12,000 करोड़ रुपए के बजट के साथ शुरू हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत देश में अब तक 56 लाख से ज्यादा युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं, जिनमें से करीब 24 लाख अपने हुनर से जुड़े क्षेत्र में रोजगार पा चुके हैं। देश में डिजिटल क्रांति के बढ़े जोर के कारण निकट भविष्य में रोजगार का एक बड़ा आधार खड़ा होगा। उम्मीद है कि इन पहलों से देश की प्रतिभाअों को देश में ही सम्मानजनक अवसर मुहैया होंगे और तब विकास और प्रतिभा-सामर्थ्य में अपना देश और आगे बढ़ जाएगा।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

प्रधानमंत्री

स्वच्छता अभियान हर भारतवासी का सपना

-ईश्वरचंद्र विद्यासागर

डिजिटल प्रतिभा में भारत सर्वोच्च

नरेंद्र मोदी

ती

हमें स्वराज्य मिला है, स्व राज्य का शस्त्र था- सत्याग्रह। श्रेष्ठ भारत का शस्त्र है स्वच्छता, स्वच्छाग्रही

न साल में हम कहां से कहां पहुंचे। मुझे बराबर याद है कि मैं अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र की मीटिंग से एक अक्टूबर रात देर से आया और 2 अक्टूबर सुबह झाड़ू लगाने निकला था। उस समय के सारे अखबार, मीडिया, हमारे सभी साथी दल के साथियों, यानी राजनीतिक दलों ने मेरी इतनी आलोचना की थी कि 2 अक्टूबर का छुट्टी का दिन होता है। हमने बच्चों की छुट्टी खराब कर दी। बच्चे स्कूल जाएंगे कि नहीं जाएंगे, बच्चों को इस काम में क्यों लगाया। मेरा स्व।भाव है कि बहुत सी चीजें मैं चुपचाप झेलता रहता हूं क्योंकि दायित्व भी ऐसा है कि झेलना भी चाहिए और धीरे-धीरे मैं क्षमता भी बढ़ा रहा हूं झेलने की। लेकिन आज तीन साल के बाद बिना डिगे, बिना हिचकिचाए इस काम में हम लगे रहे और लगे इसीलिए रहे‍ कि मुझे पूरा भरोसा था कि महात्मा गांधी ने जो कहा है, वो रास्ता गलत हो ही नहीं सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि चुनौतियां नहीं हैं। चुनौतियां हैं, लेकिन चुनौतियां हैं इसीलिए देश को ऐसे ही रहने दिया जाए क्या? चुनौतियां हैं, इसीलिए उन्हीं चीजों को हाथ लगाया जाए जहां वाह-वाही होती रहे, जयकारा बोला जाए? क्या ऐसे काम से भागना चाहिए? ऐसा नहीं है कि गंदगी हमारी आंखों के सामने नहीं होती थी। ऐसा नहीं है कि गंदगी में हम भी कुछ योगदान नहीं देते थे और ऐसा भी नहीं है कि हमें स्वच्छता पसंद नहीं है। कोई इंसान ऐसा नहीं हो सकता है कि जिसको स्व‍च्छ‍ता पसंद न हो। अगर आप रेलवे स्टेशन पर जाइए, चार बेंच पड़ी हैं, लेकिन दो में कुछ गंदगी है तो आप वहां नहीं बैठते। जहां अच्छी जगह है, वहां जाकर बैठते हैं, क्यों? मूलत: हमारी प्रकृति स्वच्छता पसंद करने की है। स्वच्छता होनी चाहिए, इसमें देश में किसी को मतभेद नहीं है। समस्या यही रही कि कौन करे? एक बात मैं बता दूं और मुझे ये निस्संकोच कहने में कोई संकोच नहीं है, ये मेरे वाक्य के बाद हो सकता है मेरी कल ज्यादा धुलाई भी हो जाए, लेकिन अब देशवासियों से क्या छिपाना? अगर

1000 महात्मा गांधी आ जाएं, एक लाख नरेंद्र मोदी आ जाएं, सभी मुख्यमंत्री मिल जाएं, सभी सरकारें मिल जाएं, तो भी स्वच्छता का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता है। लेकिन अगर सवा सौ करोड़ देशवासी आ जाएं, तो देखते ही देखते यह सपना पूरा हो जाएगा। दुर्भाग्य से हमने बहुत सी चीजें तो सरकार के लिए बना दीं, सरकारी बना दीं। जब तक वो जनसामान्य की रहती है, कठिनाई नहीं आती ऐसी। अब आप देखिए कि कुंभ का मेला होता है। हर दिन गंगा के तट पर कुंभ के मेले में यूरोप का एक छोटा सा देश इकट्ठा होता है। लेकिन वो ही सब कुछ संभाल लेते हैं, अपनी चीजें कर लेते हैं और सदियों से चला आ रहा है। समाज की शक्ति को अगर स्वीकार करके हम चलें, जन-भागीदारी को स्वीकार करके चलें, सरकारी दखल को कम करते चलें, समाज को बढ़ाते चलें, तो ये आंदोलन प्रश्न चिह्न के बावजूद सफल होता जाएगा, यह मेरा विश्वास है। कुछ लोग हैं, जो अभी भी इसका मजाक उड़ाते हैं, आलोचना करते हैं। वे कभी गए भी नहीं स्वच्छता के अभियान में। उनकी मर्जी, उनकी शायद मुश्किलें होंगी। पर मुझे विश्वास है। आप देखिएगा 5 साल आते-आते देश का मीडिया यह खबर नहीं छापेगा कि स्वच्छता में कौन काम कर रहा है, कौन भाग ले रहा है। खबर में उनकी तसवीरें छपने वाली हैं कि इससे कौन-कौन दूर भाग रहे थे, इसके खिलाफ

आज स्वच्छता अभियान न पूज्य बापू का रहा है, न यह भारत सरकार का रहा है, न ही यह राज्य सरकारों का रहा है, न ही ये म्युनिसिपैलिटी का रहा है। आज स्वच्छता अभियान देश के सामान्य मानव का अपना सपना बन चुका है


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

कौन थे, उनकी तसवीरें छपने वाली हैं। क्योंकि जब देश स्वीकार कर लेता है तो आप चाहें या न चाहें, आपको उसके साथ जुड़ना ही पड़ता है। आज स्वच्छता अभियान न पूज्य बापू का रहा है, न यह भारत सरकार का रहा है, न ही यह राज्य सरकारों का रहा है और न ही ये म्युनिसिपैलिटी का रहा है। आज स्वच्छता अभियान देश के सामान्या मानव का अपना सपना बन चुका है। अब तक जो सिद्धि मिली है, वो सिद्धि सरकार की है, ऐसा मेरा रत्ती भर क्लेम नहीं है। न यह भारत सरकार की सिद्धि है, न यह राज्य सरकार की सिद्धि है, अगर यह सिद्धि है तो स्वच्छाग्रही देशवासियों की सिद्धि है। हमें स्वराज्य मिला है, स्वराज्य का शस्त्र था- सत्याग्रह। श्रेष्ठ भारत का शस्त्र है स्वच्छता, स्वच्छाग्रही। अगर स्वराज्य के केंद्र में सत्याग्रही था तो श्रेष्ठा भारत के केंद्र में स्व‍च्छाग्रही हैं। हम दुनिया में किसी भी देश में जाते हैं, वहां की सफाई देखते हैं तो आकर चर्चा करते हैं, अरे यार कितना साफ-सुथरा है भाई, मैं तो देखता ही रह गया। ऐसे लोग मुझे कहते हैं तो मैं पूछता हूं कि वहां साफ देखा तो आपको आनंद आया, लेकिन किसी को कूड़ा-कचरा फेंकते देखा था क्याे? बोले वो नहीं देखा। मैं बोला... तो हमारी समस्या वह है। खुलकर इस बारे में चर्चा करने से हम डरते थे। राजनेता इसीलिए चर्चा नहीं करते थे, सरकारें इसलिए चर्चा नहीं करती थीं कि उन्हें डर लगता था कि यह कहीं उनके माथे न पड़ जाए। अरे भाई, पड़ेगा तो पड़ेगा। हम जवाबदेह लोग हैं, हमारी जवाबदेही है। आज स्वच्छता के कारण क्याें स्थिति बनी है। यह जो स्वच्छ‍ता की रैंकिंग हो रही है और सबसे स्वच्छ शहर कौन सा, दूसरा कौन सा, तीसरा... और जब अंक कम आते हैं तो उन शहरों में चर्चा होती है। दबाव पैदा हो रहा है नीचे से राजनेताओं के ऊपर भी, सरकारों पर भी कि देखो उस शहर को तो स्वच्छता में अच्छे अंक आए हैं, तुम क्या कर रहे हो? फिर सिविल सोसाइटी भी मैदान में आती है कि भाई ये तो हमसे पीछे था, आगे निकल गया, चलो हम भी कुछ करें। एक सकारात्मक प्रतिस्पर्द्धी माहौल बना है और इसका भी अच्छा परिणाम इस सारी व्यवस्था में नजर आ रहा है। यह बात सही है कि हम टॉयलेट बनाते हैं, लेकिन उपयोग नहीं होता है। लेकिन जब ये खबरें आती हैं तो वो बुरी नहीं हैं। ये जगाती हैं हमें। इनसे नाराज नहीं होना चाहिए। अगर ये भाव आए तो अच्छा होगा कि भाई ये समाज का दायित्व है, परिवार का दायित्व है, व्यक्ति का दायित्व है कि वो टॉयलेट के इस्तेमाल को लेकर आग्रही बनें।

मैं तो पहले सामाजिक संगठन में काम करता था। राजनीति में बहुत देर से आया। मैं गुजरात में काम करता था। वहां मोरवी में माचू डैम टूट गया था, हजारों लोग मारे गए थे, पूरा शहर पानी में डूब चुका था, तो बाद में वहां सफाई, सेवा कार्य के लिए वहां लगा हुआ था। ये सब काम करीब महीने भर चले थे। बाद में हम लोगों ने कुछ सिविल सोसायटी, एनजीओ के माध्यम से तय किया कि जिनके घर-वार तबाह हो गए, उनके कुछ मकान बनाएंगे, तो हमने एक गांव गोद लिया। लोगों से धन संग्रह किया। गांव का पुनर्निर्माण करना था। छोटा सा गांव था। कोई 350400 घर होंगे। घर के डिजाइन बन रहे थे। मेरा बड़ा आग्रह था कि टॉयलेट तो होना ही चाहिए। गांव वाले कहते थे कि नहीं जी, टॉयलेट की जरूरत नहीं, हमारे यहां तो खुला बहुत मैदान है, टॉयलेट मत बनाइए, थोड़ा कमरा बड़ा बना दीजिए। मैंने कहा कि समझौता नहीं करूंगा। कमरा जितने हमारे पास पैसे हैं उतने से बनाकर देंगे आपको, लेकिन टॉयलेट तो होगा ही। खैर उनको तो मुफ्त में मिलने वाला था तो फिर ज्यादा उन्होंने झगड़ा नहीं किया और इस तरह टॉयलेट बन गया। करीब 10-12 साल के बाद मैं उस तरफ गया तो मुझे लगा चलो यार पुराने लोगों से मिलके आऊं कि मैंने कई महीनों तक वहां रह कर काम किया था, तो मिलने चला गया। वहां जा कर मैं अपने माथे पर हाथ पटक रहा था। जितने टॉयलेट बनाए थे, सब में बकरियां बंधी हुई थीं। अब यह समाज का स्वभाव है, बनाने वाले का दोष नहीं है, न सरकार का दोष है। समाज का एक स्वभाव है। इन मर्यादाओं को समझते हुए भी हमें बदलाव लाना है। कोई मुझे बताए क्या हिंदुस्तान में अब आवश्यकता के अनुसार स्कूल बने हैं कि नहीं बने हैं? आवश्यकता के अनुसार टीचर भर्ती हुए कि नहीं हुए? आवश्यकता के अनुसार स्कूल में सुविधाएं स्कूल के अंदर किताबें, सब हैं कि नहीं? यह सब एक हद तक काफी है। उसकी तुलना में शिक्षा की स्थिति पीछे है। अब सरकार ये कोशिश करने के बाद भी, धन-खर्चे के बाद भी, मकान बनाने के

बाद भी, टीचर रखने के बाद भी, समाज का अगर सहयोग मिलेगा तो शत-प्रतिशत शिक्षा तक पहुंचते देर नहीं लगेगी। यही इंफ्रास्ट्रक्चर, इतने ही टीचर शत-प्रतिशत के लक्ष्य की तरफ जा सकते हैं। पर समाज की भागीदारी के बिना यह संभव नहीं है। ये टॉयलेट भी वैसा ही मामला है। स्वच्छता के लिए वैचारिक आंदोलन भी जरूरी है। व्यवस्थाओं के विकास से ही परिवर्तन नहीं आता है जब तक कि वैचारिक आंदोलन पैदा नहीं होता। फिल्म बनाइए, रचनात्मकता लाइए, निबंध लिखिए, ये सारी चीजें इसको एक वैचारिक अधिष्ठान देने का प्रयास है। जब कोई बात हमारे जेहन में विचार के रूप में घुस जाती है, तत्वों के रूप में स्थापन पा लेती है, फिर उसको करना बड़ा सरल हो जाता है। आज से चार-पांच साल पहले आप कई टीवी पर ऐसे कार्यक्रम, जिसमें किसी स्कूल में अगर बच्चेे सफाई करते पाए गए तो बड़ी स्टोरी बनती थी, टीचरों पर वार होता था कि बच्चों से सफाई करवाते हो स्कूल में? फिर अभिभावक भी पहुंच जाते थे। क्यों मेरे बच्चों को पढ़ाई कराओगे या सफाई कराओगे? आज इतना बदलाव आया है कि किसी स्कूल में बच्चे स्वच्छता का कार्य कर रहे हैं तो टीवी की मुख्य खबर बन जाती है। यह छोटी चीज नहीं है। मैं मानता हूं कि इस पूरे आंदोलन को इस देश के मीडिया ने अपने कंधों पर उठाया है। तीन साल हो गए। देश के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी तरह स्वच्छता के साथ अपने-आपको जोड़ दिया है। वे दो कदम कभी-कभी हमसे आगे भी चल रहे हैं। स्वच्छता के विषय को महिला के नजरिए से नहीं देखोगे, तो कभी इसकी ताकत का अंदाज नहीं हो पाएगा। आप उस मां को देखिए कि जिसके घर में हर किसी को कूड़ा-कचरा, चीजें इधर-उधर फेंकने का हक है। एक अकेली मां है, जो सफाई करती रहती है। कमर टूट जाए तब करती रहती है। उस मां को पूछिए कि जब हम लोग जाने से पहले अपनी-अपनी चीजें ठीक रखते हैं तो मां तुम्हें कैसा लगता है? मां जरूरी कहेगी कि बेटे मेरी कमर टूट जाती थी, अच्छा हुआ अब तुम सारी चीजें

खुला मंच

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जहां डालनी चाहिए, वहां डालते हो तो मेरा काम दस मिनट में निपट जाता है। स्वच्छता का एक ही तराजू मेरे दिमाग में है। पुरुषों को मैं जरा पूछना चाहता हूं कि आपको तो कहीं भी चौराहा मिल जाए खड़े हो जाते हो। माफ करना मुझे इस प्रकार की भाषा बोलने के लिए। उस मां की, बेटी की, बहन की हालत देखी होगी, वो भी कभी बाजार जाती है कुछ खरीदने जाती हैं, उसको भी तो प्रा‍कृतिक जरूरत पड़ती होगी, लेकिन वे खुले में कभी कोई क्रिया नहीं करती हैं। घर पहुंचने तक अपने शरीर को दमन करती हैं, झेलती रहती हैं। वो कौन से संस्कार हैं? अगर उस मां के अपने ही घर में अपनी बहन, अपनी बेटी में संस्कार हैं, तो मेरे अंदर क्यों नहीं हैं? क्यों कि पुरुष होने के नाते हम मान कर चलते हैं कि इन सब सब की तो हमें इजाजत है। जब तक इस बारे में बदलाव नहीं आएगा, हम स्वच्छता को सही रूप में समझ नहीं पाएंगे। अभी यूनिसेफ ने एक रिपोर्ट दी है, उसने भारत में 10 हजार उन परिवारों का सर्वे किया, जिन्होंने अब टॉयलेट बनाया है। उनका आकलन है कि एक परिवार में टॉयलेट न होने से, स्वच्छता की जागरूकता न होने से बीमारी के पीछे सालाना 50,000 रुपए औसत खर्च होता है। परिवार का एक मुखिया बीमार हो गया, बाकी सारे काम ठप्प हो जाते हैं। ज्यादा बीमार हो गया तो परिवार के और दो लोगों को उसकी सेवा में लगना पड़ता है। बीमारी से बचने के लिए किसी से, साहूकार से ज्यादा ब्याज से पैसा लाना पड़ता है। एक प्रकार से 50 हजार रुपए का बोझ एक गरीब परिवार पर आ जाता है। अगर हम स्वच्छता को अपना धर्म मान लें, स्वच्छता को अपना कार्य मान लें, तो एक-एक गरीब परिवार में 50 हजार रुपयों और बीमारी के कारण जो मुसीबत आती है, उसे बचा सकते हैं। उसकी जेब में हम रुपए डालें या न डालें, लेकिन उसके जीवन में ये 50 हजार रुपया बहुत काम आता है। पूज्य बापू और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर हम फिर एक बार अपने-आपको देश को समर्पित करें, स्वच्छता को हम प्राथमिकता से लें। यह स्वच्छता ऐसा काम है कि जो देश की सेवा के लिए कुछ नहीं कर सकता, कुछ करने की ताकत नहीं रखता है, वह भी यह कर सकता है। यह इतना सरल काम है। जैसे आजादी के आंदोलन में गांधी जी ने कहा, ‘कुछ नहीं कर सकते हो, तकली लेकर बैठो बस’, ये आजादी का काम है। मुझे लगता है कि श्रेष्ठ भारत बनाने के लिए यह छोटा सा काम हर हिंदुस्तानी कर सकता है।


18 फोटो फीचर

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

लोकपर्व छठ

कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले लोकपर्व छठ के साथ करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हैं। चार दिनों तक मनाया जाने वाला सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व हर वर्ष सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के दिल्ली स्थित आवास पर काफी श्रद्धा और आस्थाएं के साथ मनाया जाता है। इस महापर्व के आयोजन की कुछ झलकियां फोटो ःमोंटू


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

फोटो फीचर

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छठ महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह एक तरफ जहां हमारी लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है, वहीं इस अवसर पर परिवार और समाज का सौहार्द विशेष रूप से प्रकट होता है। छठ की सादगी और पवित्रता के बीच सामाजिक सौहार्द का संदेश महत्वपूर्ण तो है ही, यह हमारे दौर के लिए प्रेरक सबक भी है


20 स्वास्थ्य

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

तंबाकू खाने वालों की संख्या 81 लाख घटी

ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे 2016-17 के मुताबिक भारत में तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है

एक नजर

विश्व में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं

29.6 फीसदी पुरुष धुआं रहित तंबाकू का उपयोग करते हैं

12.8 प्रतिशत महिलाएं धुआं रहित तंबाकू का इस्तेमाल करती हैं

तंबाकू के धुआं रहित उत्पादों गुटखा व देशपानमेंमसाले पर लगी रोक के सुखद नतीजे आने

लगे हैं। तंबाकू का सेवन करने वालों की संख्या में 81 लाख की गिरावट आई है। यह खुलासा ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे 2016-17 में किया गया है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने देश के सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को निर्देश दिया है कि वे गुटखा और पान मसाले के उत्पादन और बिक्री पर लगी रोक को पूरी तरह लागू कराएं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव सीके मिश्रा ने सभी राज्यों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों और संबंधित विभागों को इसी माह पत्र लिखकर कहा है कि भारत सहित विश्व में तंबाकू सेवन मौतों और बीमारियां के उन कारणों में है, जिन्हें बहुत हद तक रोका जा सकता है। मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट के 23 अक्टूबर, 2016 के निर्देश का हवाला देते हुए बिहार, कर्नाटक, मिजोरम, मध्य प्रदेश और केरल के मुख्य सचिवों को छोड़कर सभी राज्य के

मुख्य सचिवों से कहा है कि वे खाद्य एवं सुरक्षा मानक अधिनियम, 2011 के अंतर्गत बनाए गए खाद्य एवं सुरक्षा मानक (निशेध और प्रतिबंध) विनियमन, 2011 के तहत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करें। इस विनियमन में प्रावधान है कि तंबाकू और निकोटिन को हमारे भोजन उत्पादों के घटकों के रूप में शामिल नहीं किया जा सकता, इसीलिए सभी गुटखा एवं पान मसाले जैसे खाद्य उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाई जाए, जिसमें घटक के रूप में तंबाकू और निकोटिन मौजूद हैं। टाटा मेमोरियल अस्पताल के प्रोफेसर एवं कैंसर सर्जन डॉ. पकंज चतुर्वेदी ने बताया कि ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे 2016-17 में खुलासा किया गया है कि 29.6 प्रतिशत पुरुष, 12.8 प्रतिशत महिला और 21.4 प्रतिशत वयस्क वर्तमान में धुआं रहित तंबाकू का उपयोग करते हैं। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से तंबाकू उत्पादों, जैसे गुटखा, पान मसाले (तंबाकू और निकोटिन सहित) का उपयोग

एफएसएसएआई ने राज्यों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को निर्देश दिया है कि वे गुटखा और पान मसाले के उत्पादन और बिक्री पर लगी रोक को पूरी तरह लागू कराएं

करने वालों की संख्या लगभग 81 लाख तक कम हो गई है। वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी) के मध्य प्रदेश के पैटर्न डॉ. ललित श्रीवास्तव ने बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव द्वारा जारी निर्देश में कहा गया है कि गुटखा की बिक्री पर प्रतिबंध को विफल करने और दंड से बचने के लिए, निर्माता अलग-अलग पाउचों में स्वादिष्ट चबाने वाले तंबाकू के साथ पान मसाला (बिना तंबाकू) बेच र हे हैं। ऐसा होने पर उपभोक्ता पान मसाला और तंबाकू एक साथ खरीद लेते हैं। डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक, सचिव के निर्देशों में कहा गया है कि पहले से तैयार मिश्रण लेने के बजाय तंबाकू कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं को गुटखा और पान मसाला उपलब्ध कराने का रास्ता खोज निकाला है। यह उपभोक्ताओं को जुड़वा पैक में बेचा जा रहा है। एक पैक में गुटखा होता है तो दूसरे में पान मसाला। भारत सहित विश्व में तंबाकू सेवन से मौतें और बीमारियां बढ़ रही हैं, जिन्हें बहुत हद तक रोका जा सकता है। भारत में धुआं रहित तंबाकू के सेवन के कारण मृत्यु दर और रोगों में इजाफा हो रहा है। तंबाकू के कारण भारत में प्रति वर्ष लगभग 10 लाख लोगों की मौतें होती हैं। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि विश्व में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं। (आईएएनएस)

स्वच्छ हवा की जिम्मेदारी सभी की एसोचैम ने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित करना अकेले शीर्ष अदालत की जिम्मेदारी नहीं है

र्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंध को सही तरीके से लागू नहीं करने पर चिंता व्यक्त करते हुए उद्योग संगठन एसोचैम ने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित करना केंद्र, राज्य सरकारों, नागरिक समाज और लोगों की सबकी जिम्मेदारी है, यह जिम्मेदारी अकेले शीर्ष अदालत की नहीं है। एसोचैम के महासचिव डीएस रावत के मुताबिक, ‘हालांकि व्यापारियों और निर्माताओं का आर्थिक हित शामिल था, लेकिन एक बार जब सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया, तो इस आदेश का पालन समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में करवाने की जिम्मेदारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, दिल्ली सरकार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राज्य सरकारों की थी।’ एसोचैम ने कहा कि हालांकि कुछ चयनित क्षेत्रों में इसका स्वैच्छिक अनुपालन किया गया, लेकिन इस प्रतिबंध को कई इलाकों में शातिर लोगों द्वारा पटाखों की बिक्री कर खारिज कर दिया गया। हालांकि इस साल पिछले कई सालों की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान हुआ। लेकिन एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण अभी भी 18 गुणा ज्यादा है। एसोचैम ने कहा, ‘इस साल के अनुभव से पता चलता है कि न सिर्फ दिवाली के दौरान, बल्कि पूरे साल वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक अच्छी तरह से समन्वित कार्य योजना की आवश्यकता है। खासतौर से सर्दियों के दिनों में जब आसमान धुंध और विषाक्त गैसों से घिरा होता है, जो लाखों लोगों, विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।’ (एजेंसी)


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एसएलई रोग पुरुषों में कम महिलाओं में ज्यादा

स्वास्थ्य

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एसएलई को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह एक पुरानी आटोइम्यून बीमारी है। महिलाओं में यह समस्या अधिक पाई जाती है

एसएलई के लक्षणों से निपटने के कुछ उपाय

भा

आईएएनएस

रत में हर 10 लाख लोगों में करीब 30 लोग सिस्टेमिक ल्यूपूस एरीथेमेटोसस (एसएलई) रोग से पीड़ित पाए जाते हैं। महिलाओं में यह समस्या अधिक पाई जाती है। इस रोग से पीड़ित 10 महिलाओं के पीछे एक पुरुष ल्यूपस से पीड़ित मिलेगा। एसएलई को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जागरूकता की कमी के कारण, अक्सर चार साल बाद लोग इसके इलाज के बारे में सोचते हैं। एसएसई एक पुरानी आटोइम्यून बीमारी है। इसके दो फेज होते हैं- अत्यधिक सक्रिय और निष्क्रिय। ल्यूपस रोग में हृदय, फेफड़े, गुर्दे और मस्तिष्क प्रभावित होते हैं और जीवन को खतरा पैदा हो जाता है। ल्यूपस पीड़ितों को अवसाद या डिप्रेशन होने का खतरा बना रहता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के

अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा, ‘एसएलई एक ऑटोइम्यून रोग है। प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रामक एजेंटों, बैक्टीरिया और विदेशी रोगाणुओं से लड़ने के लिए बनी है। इसके काम करने का तरीका है एंटीबॉडीज बना कर संक्रामक रोगाणुओं से मुकाबला करना। ल्यूपस वाले लोगों के खून में ऑटोएंटीबॉडीज बनने लगती हैं, जो विदेशी संक्रामक एजेंटों के बजाय शरीर के स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती हैं।’ डॉ. अग्रवाल ने बताया, ‘हालांकि, असामान्य आत्मरक्षा के सही कारण तो अज्ञात हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह जीन और पर्यावरणीय कारकों का मिश्रण हो सकता है। सूरज की रोशनी, संक्रमण और कुछ दवाएं जैसे कि मिर्गी की दवाएं इस रोग में ट्रिगर की भूमिका निभा सकती हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘ल्यूपस के लक्षण समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन आम लक्षणों में थकावट, जोड़ों में दर्द और सूजन, सिरदर्द, गाल व नाक, त्वचा पर चकत्ते,

एसएलई के लिए कोई पक्का इलाज नहीं है। हालांकि उपचार से लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। यह रोग तीव्रता के आधार पर भिन्न हो सकता है- डॉ. केके अग्रवाल

एक नजर

ल्यूपस पीड़ितों को अवसाद या डिप्रेशन होने का खतरा बना रहता है

देश में 10 लाख लोगों में करीब 30 लोग इस रोग से पीड़ित हैं ल्यूपस रोग में हृदय, फेफड़े, गुर्दे और मस्तिष्क प्रभावित होते हैं

बालों का झड़ना, खून की कमी, रक्त के थक्के और उंगलियों व पैर के अंगूठे में रक्त न पहुंच पाना प्रमुख हैं। शरीर के किसी भी हिस्से पर तितली के आकार के दाने उभर आते हैं।’ डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ‘एसएलई के लिए कोई पक्का इलाज नहीं है। हालांकि उपचार से लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। यह रोग तीव्रता के आधार पर भिन्न हो सकता है। आम उपचार के विकल्पों में- जोड़ों के दर्द के लिए नॉनस्टीरॉयड एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं शामिल हैं, रैशेज के लिए कॉर्टिकोस्टोरोइड क्रीम, त्वचा और जोड़ों की समस्या के लिए एंटीमलेरियल दवाएं काम करती हैं।’

• चिकित्सक के निरंतर संपर्क में रहें। पारिवारिक सहायता प्राप्त करना भी महत्वपूर्ण है। • डॉक्टर की बताई सभी दवाएं लें। नियमित रूप से चिकित्सक के पास जाएं और अपनी देखभाल ठीक से करें। • हमेशा सक्रिय रहें। इससे जोड़ों को लचीला रखने और हृदय संबंधी जटिलताओं को रोकने में मदद मिलेगी। • तेज धूप से बचें। पराबैंगनीकिरणों के कारण त्वचा में जलन हो सकती है। • धूम्रपान से बचें और तनाव व थकान को कम करने की कोशिश करें। • शरीर का वजन और हड्डी का घनत्व सामान्य स्तर पर बनाए रखें। • ल्यूपस पीड़ित युवा महिलाओं को उचित समय पर गर्भधारण करना चाहिए। ध्यान रखें कि उस समय आपको ल्यूपस की परेशानी नहीं होनी चाहिए। • गर्भधारण के दौरान सावधान रहें। नुकसानदायक दवाओं से परहेज करें।


22 स्वास्थ्य

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

मानसिक तनाव की बढ़ी परेशानी हर चौथे इंसान को कभी-न-कभी मानसिक रोग होता है। दुनिया-भर में इस रोग की सबसे बड़ी वजह है- निराशा

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एसएसबी ब्यूरो

री दुनिया में लाखों लोग मानसिक रोग के शिकार हैं और इसका असर उनके साथ साथ उनके पूरे परिवार पर पड़ता है। देखा गया है कि हर चौथे इंसान को कभी-न-कभी मानसिक रोग होता है। दुनिया-भर में इस रोग की सबसे बड़ी वजह है- निराशा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मानसिक रोग के शिकार बहुत-से लोग इलाज करवाने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि लोग उनके बारे में न जाने क्या सोचेंगे। मानसिक रोग से जुड़ी एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अमेरीका में 8 से 15 की उम्र के जिन बच्चों को मानसिक रोग था, उनमें से करीब 50 प्रतिशत बच्चों और 15 से ऊपर की उम्र के करीब 60 प्रतिशत लोगों का इलाज नहीं हुआ।

मानसिक रोग है क्या

जब एक व्यक्ति ठीक से सोच नहीं पाता, उसका अपनी भावनाओं और व्यवहार पर काबू नहीं रहता, तो ऐसी हालत को मानसिक रोग कहते हैं। मानसिक रोगी आसानी से दूसरों को समझ नहीं पाता और उसे रोजमर्रा के काम ठीक से करने में मुश्किल होती है। इस बारे में लखनऊ के केजीएमयू के मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ डॉ विवेक अग्रवाल बताते हैं, ‘मानसिक रोग के लक्षण, हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं।

ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसे कौन-सी मानसिक बीमारी है। मानसिक रोग किसी को भी हो सकता है, फिर चाहे वह आदमी हो या औरत, जवान हो या बुजुर्ग, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, या चाहे वह किसी भी संस्कृति, जाति, धर्म, या तबके का हो। अगर मानसिक रोगी अच्छी तरह अपना इलाज करवाएं, तो वह ठीक हो सकता है। वह एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जी सकता है, लेकिन ज्यादातर मामले में लोग काउंसलिंग करवाने से डरते हैं कि लोग उन्हें पागल

पिछले साल अमेरीका में 8 से 15 की उम्र के जिन बच्चों को मानसिक रोग था, उनमें से करीब 50 प्रतिशत बच्चों और 15 से ऊपर की उम्र के करीब 60 प्रतिशत लोगों का इलाज नहीं हुआ

एक नजर

मानसिक रोग के लक्षण, हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं देर से उठने वाले लोगों का मेटाबॉलिज्म ठीक नहीं रहता है

डिप्रेशन एक डिसऑर्डर है, इसमें उदासी की भावना घेर लेती है

समझेंगे और समस्या बढ़ जाती है।’ मानिसक रोग कई प्रकार के होते हैं। तनाव, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, गुस्सा ये सभी इसी के अंतर्गत आते हैं।


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मानसिक रोगियों को प्यार और सुरक्षा का अहसास कराएं कम उम्र में ही डिप्रेशन का सामना कर चुकीं दीपिका ने एक संस्था बनाई है, जिसका उद्देश्य अवसाद दूर करना और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे लोगों को सहायता प्रदान करना है

व, लव, लाइफ फाउंडेशन’ चलाने वाली ‘लि अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने लोगों से आग्रह किया है कि वे मानसिक रूप से बीमार

लोगों को प्यार और सुरक्षा का अहसास कराएं। कम उम्र में ही अवसाद (डिप्रेशन) का सामना कर चुकीं दीपिका ने यह फाउंडेशन शुरू किया है, जिसका उद्देश्य अवसाद दूर करना और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे लोगों को सहायता प्रदान करना है। बॉलीवुड अभिनेत्री ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य

तनाव

तेजी से बदलते माहौल में हमारे शरीर और मन पर जो असर पड़ता है, उसे तनाव (टेंशन) कहते है। तनाव दो तरह का होता है। पहला – अच्छा तनाव और दूसरा – बुरा तनाव। जहां अच्छे तनाव की वजह से आप अपनी नौकरी में प्रमोशन पाते है, वहीं बुरे तनाव में आप किसी से गुस्से में बहस कर लेते हैं। सिरदर्द, पीठदर्द, नींद न आना गुस्सा, हताशा, किसी एक चीज पर ध्यान न लगा पाना, रोना और दूसरों को नजरअंदाज करना तनाव के लक्षण हैं। नियमित रूप से 20 से 30 मिनट शारीरिक व्यायाम करने से तनाव की समस्या से निपटा जा सकता है। इससे आपके दिमाग को सोचने का वक्त मिलेगा। आमतौर पर तनाव की शुरुआत आपकी सुबह से ही हो सकती है अगर आप रोज देर से सोकर उठते हैं। डॉक्टर भी मानते हैं कि देर से उठने वाले लोगों का मेटाबॉलिज्म ठीक नहीं रहता है जिससे उन्हें थकान, तनाव और उदासीनता अधिक सताती है। शोधों में भी यह माना गया है कि देर से उठने वाले लोग अक्सर सुबह का नाश्ता छोड़ते हैं, जिससे उनका बॉडी साइकिल गड़बड़ होता है और वे जल्द तनावग्रस्त होते हैं। घंटों टीवी देखना आपको तनाव और अवसाद की स्थिति तक पहुंचाने के लिए काफी है। बजाय घंटों तक टीवी देखने के आप अपना समय परिवार के साथ बिताएंगे या सैर करेंगे तो तनाव से

दिवस पर अपने संदेश का प्रसार करने के लिए कर्नाटक सरकार के साथ हाथ मिलाया। दीपिका ने इस बारे में कहा, 'अवसाद का शिकार किसी भी उम्र, पृष्ठभूमि या अर्थिक स्थिति के लोग हो सकते हैं। दुर्भाग्य से जो लोग अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़त हैं, वे पूर्वाग्रह और भेदभाव का सामना करते हैं।' विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर दीपिका पादुकोण कर्नाटक के जगालुर तालुका में स्थित एक हेल्थ सेंटर गई थीं। जहां उन्होंने मानसिक

रोगियों से मुलाकात कर सेंटर की यथास्थिति जानी। के लिए बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण वहां उन्होंने कहा, ‘मैं भी डिप्रेशन का शिकार हो की पहल सराहनीय है। बात करें डिप्रेशन की तो चुकी हूं। उस दौरान मेरी मां बहुत डर गई थीं, दीपिका ने बीते साल खुद के बारे में डिप्रेशन की लेकिन इस समस्या से बाहर निकलने में यानी मेरी बात का सबसे पहले खुलासा किया था। उनके इस रिकवरी प्रोसेस में उनका अहम योगदान है। मेरी खुलासे के साथ इन्हों ने लोगों को चौंका दिया था। मां, जो आमतौर पर घर से बाहर नहीं निकलती इतना ही नहीं बीते साल 21 मार्च से ही उन्होंलने थी, खासतौर तब जब मेरी फिल्म संबंधित कोई डिप्रेशन डिप्रेशन की दवा भी लेनी शुरू की थी। काम हो, लेकिन पिछले दो वर्षों में काफी कुछ दीपिका खुद बताती हैं कि अपनी नई संस्था की बदला है। वे मुझसे काफी क्लोज हो गई हैं, क्योंकि शुरुआत और कामकाज को लेकर वह संबंधित उन्हें पता है कि मैंने डिप्रेशन के दौरान क्या-क्या डॉक्ट रों और मनोचिकित्स कों से लगातार संपर्क में रहती हैं। सहा है। सच कहूं वैसे सिर्फ तो मेरी रिकवरी का ‘मैं भी डिप्रेशन का शिकार हो चुकी वे खास हिस्सा हैं।’ हूं। उस दौरान मेरी मां बहुत डर गई थीं, दीपिका पादुकोण पहली ऐसी दीपिका ने कहा कि सरकार द्वारा लेकिन इस समस्या से बाहर निकलने में बॉलीवुड सेलेब किया गया हालिया यानी मेरी रिकवरी प्रोसेस में उनका अहम नहीं हैं, जो डिप्रेशन में गईं पहल दर्शाता है योगदान है’ –दीपिका पादुकोण हों। इससे पहले कि अधिकारीगण बॉलीवुड की अवसाद जैसी चकाचौं ध बड़े-बड़े सितारों को पहले भी डिप्रेशन चुनौती के निपटारे को लेकर प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि एक साथ मिलकर ऐसा वातावरण के कगार तक ले जा चुकी है। इनमें से कुछ के बनाया जा सकेगा, जिसमें मानसिक बीमारियों से साथ तो नौबत यहां तक आई कि इसके वजह जूझ रहे लोग सहजता, लगाव और सुरक्षा को से उन्हेंस जान तक भी देनी पड़ी। मीना कुमारी, परवीन बॉबी, गुरुदत्त‍ जैसे कई फिल्मीड कलाकार महसूस कर सकेंगे। दिमागी रूप से बीमार लोगों की मदद करने इनमें प्रमुख रहे हैं।

एक रिसर्च के मुताबिक स्कूल जाने वाले बच्चों में डिप्रेशन का मामला लगातार ज्यादा देखा जा रहा है। यही वजह है कि बच्चों में सुसाइड की घटना पहले से बढ़ी है- डॉ. मनु अग्रवाल, मनोचिकित्सक कोसों दूर रहेंगे। धूम्रपान आपका तनाव बढ़ाती है। धूम्रपान से धड़कन तेज हो जाती है, जिससे तनाव बढ़ता है।

अवसाद

अवसाद (डिप्रेशन) एक ऐसी बीमारी है जिसके मरीज आपके आसपास सबसे ज्यादा नजर आते हैं। आज की तारीख में आम बीमारियों में से एक है डिप्रेशन। बच्चे, जवान और बूढ़े हर तबके के लोग इस बीमारी के शिकार हैं। कारण सबका अलगअलग हो सकता है पर लक्षण लगभग एक जैसे ही हैं। दरअसल डिप्रेशन एक डिसऑर्डर है, जिसमें उदासी की भावना किसी इंसान को दो हफ्ते या इससे भी ज्यादा लंबे वक्त तक घेरे रहती है। इससे जिंदगी के प्रति दिलचस्पी कम हो जाती है। नकारात्मक भावनाएं हावी हो जाती हैं। डिप्रेशन में किसी भी इंसान को अपना एनर्जी लेवल लगातार घटता महसूस होता है। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। लगातार उदासी से

घिरे रहना, बेचैनी महसूस करना, मूड खराब रहना, घोर निराशा, अपराध बोध होना, नींद न आना, भूख कम लगने से लगातार वजन गिरना, जरूरत से ज्यादा खाने से मोटापा और सुसाइड का ख्याल आना आदि डिप्रेशन के लक्षण हैं। मनोचिकित्सक डॉ. मनु अग्रवाल बताते हैं, ‘एक रिसर्च के मुताबिक स्कूल जाने वाले बच्चों में डिप्रेशन का मामला लगातार ज्यादा देखा जा रहा है। यही वजह है कि बच्चों में सुसाइड की घटना पहले से बढ़ी है। बड़ी बात यह है कि बच्चों में डिप्रेशन के कारण बहुत छोटे-छोटे होते हैं।’ वे आगे बताते हैं, ‘माता पिता की उम्मीदों पर पढ़ाई में खरे न उतरना। घर में दो बच्चों की तुलना से किसी एक बच्चे में डिप्रेशन आ जाना। मां-बाप के आपसी संबंध ठीक न रहने से बच्चे में डिप्रेशन आ जाना। ये कई मुख्य कारण हंस बच्चों के डिप्रेशन के।’ डिप्रेशन भले ही शुरू में समझ नहीं आता हो पर ऐसा देखा गया है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ये परेशानी ज्यादा और जल्दी घर करती है। मोटे अनुमान के अनुसार 10 पुरुषों में एक जबकि 10

महिलाओं में हर पांच को डिप्रेशन की आशंका रहती है। ऐसा माना जाता है कि पुरुष अपना डिप्रेशन स्वीकार करने में संकोच करते हैं जबकि महिलाएं दबाव और शोषण के चलते जल्दी डिप्रेशन में आ जाती हैं। आपनी जीवनशैली और आदतों में सुधार से डिप्रेशन से बचा जा सकता है। मसलन, अच्छे दोस्त आपको आवश्यक सहानुभूति प्रदान करते हैं और साथ ही साथ अवसाद के समय आपको सही निजी सलाह भी देते हैं। इसी तरह फल, सब्जी, मांस, फलियां, और कार्बोहाइड्रेट आदि का संतुलित आहार लेने से मन खुश रहता है। संतुलित आहार न केवल अच्छा शरीर बनता है, बल्कि यह दुखी मन को भी अच्छा बना देता है। अपनी समस्याओं के संबंध में बात करना भी तनाव दूर करने का उत्तम जरिया है। अधिकतर लोग खुद तक ही सीमित रहते हैं। अंदर ही अंदर घुटते रहने से और भी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। यह भी बेहद महत्वपूर्ण है कि आप व्यस्तता के बावजूद अपनी जरूरतों और देखभाल के लिए भी कुछ समय निकालें। आराम करने के लिए भी पर्याप्त समय बचा कर रखें। अवसाद के शिकार लोगों को मनोचिकित्सक से सलाह लेने से नहीं हिचकना चाहिए। मनोचिकित्सक की सलाह से आपको अवसाद की जड़ तक जाने और इसे दूर करने में मदद मिलती है।


24 स्वास्थ्य

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

चांद पर मिली गुफा जापान के वैज्ञानिकों ने चांद पर 50 किलोमीटर लंबी और 100 मीटर चौड़ी गुफा का पता लगाया है

मोटापे पर 1,200 अरब डॉलर होगा खर्च

वर्ष 2025 तक दुनिया में कुल 2.7 अरब वयस्क अधिक वजन वाले या मोटापे के शिकार होंगे और इनमें से ज्यादातर को इलाज की जरूरत होगी

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पान के वैज्ञानिकों को चांद पर एक बहुत बड़ी गुफा का पता चला है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस गुफा में चंद्रमा पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट रह सकते हैं। इससे वे खतरनाक विकिरण और तापमान में बदलाव से बच सकते हैं। जापान के एईएईएनई लूनर ऑर्बिटर से मिले आंकड़ो के अनुसार चांद पर मौजूद यह गुफा 3.5 अरब साल पहले भूगर्भ के अंदर हुई हलचल की वजह से बनी होगी। इस गुफा की लंबाई 50 किलोमीटर और चौड़ाई 100 मीटर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह गुफा भूगर्भ से निकले लावे की वजह से तैयार हुई होगी। जापानी वैज्ञानिकों ने ये आंकड़े और नतीजे अमेरिकी पत्रिका जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित कराए हैं। जापानी वैज्ञानिक जुनिची हारुयामा ने कहा, 'हमें अभी तक ऐसी चीज के बारे में पता था और माना जाता था कि यह लावा ट्यूब हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी की पुष्टि पहले नहीं हुई थी।' जमीन के अंदर मौजूद यह गुफा चंद्रमा के मारियस हिल्स नामक जगह के पास है। जापानी वैज्ञानिक ने कहा कि इस गुफा में रह कर अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा प्रवास के दौरान विकिरण और तापमान में होने वाले तेज बदलावों के दुष्प्रभाव से बच सकते हैं। जापान ने इसी साल जून में साल 2030 तक चंद्रमा पर अंतरिक्ष मिशन भेजने की घोषणा की है। भारत और चीन भी अपनेअपने अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहे हैं। चंद्रमा पर सबसे पहले 20 जुलाई 1969 को मनुष्य ने कदम रखा था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के दो एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रीन अंतरिक्ष विमान अपोलो 11 में सवार होकर चांद पर पहुंचे थे। (एजेंसी)

एक नजर

पिछले 10 सालों में मोटापे का प्रसार नाटकीय रूप से बढ़ा है

आधुनिक दुनिया के सबसे बड़े खतरे हैं- मोटापा और धूम्रपान

कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक्स और मधुमेह जैसे रोग इसी कारण बढ़ रहे हैं

दु

आईएएनएस

निया भर में मोटापे से जुड़ी बीमारियों पर होने वाला सालाना खर्च वर्ष 2025 तक 1,200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। अगर तेजी से बिगड़ती स्थिति पर काबू नहीं पाया जाता है। विशेषज्ञों के नए अनुमान से यह जानकारी मिली है। विश्व मोटापा संघ (डब्ल्यूओएफ) ने अपने अनुमान में कहा है कि कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक्स और मधुमेह जैसे रोग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं जिसका प्रमुख कारण मोटापा और धूम्रपान है। इन रोगों को गैर-संचारी रोग की श्रेणी में रखा गया है।

‘द गार्जियन’ में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि ये दोनों (मोटापा और धूम्रपान) आधुनिक दुनिया के सबसे बड़े हैं। इसमें बताया गया कि अमेरिका में इलाज का बिल महज 8 सालों में 325 अरब डॉलर से बढ़कर 2014 में 555 अरब डॉलर हो गया। ब्रिटेन में यह वर्ष 2025 तक 19 अरब डॉलर सालाना से बढ़कर 31 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। अखबार ने संघ की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि अगर मोटापे को रोकने के उपाय नहीं किए जाते हैं, तो अगले 8 सालों में अमेरिका में मोटापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर कुल 4,200 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे, जबकि जर्मनी 390 अरब डॉलर, ब्राजील

अगर मोटापे को रोकने के उपाय नहीं किए जाते हैं, तो अगले 8 सालों में अमेरिका में मोटापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर कुल 4,200 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे

251 अरब डॉलर और ब्रिटेन 237 अरब डॉलर खर्च करेगा। इसमें कहा गया कि वर्ष 2025 तक दुनिया में कुल 2.7 अरब वयस्क अधिक वजन वाले या मोटापे के शिकार होंगे और इनमें से ज्यादातर को इलाज की जरूरत होगी। इसका मतलब यह है कि दुनिया की एक तिहाई आबादी अधिक वजन या मोटापा का शिकार होगी। डब्ल्यूओएफ के अध्यक्ष इयान काटरसन ने कहा, ‘मोटापे से होने वाले रोग जैसे मधुमेह या हृदय रोग के इलाज पर होनेवाला खर्च वास्तव में खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।’ उन्होंने कहा, ‘डब्ल्यूएएफ द्वारा की जा रही निरंतर निगरानी से यह पता चलता है कि पिछले 10 सालों में मोटापे का प्रसार नाटकीय रूप से बढ़ा है और अनुमान है कि 2025 तक 17.7 करोड़ वयस्क गंभीर रूप से मोटापे से ग्रस्त होंगे। यह स्पष्ट है कि अब सरकारों द्वारा अपनी अर्थव्यवस्थाओं पर से इस बोझ को कम करने के लिए कार्य करने की आवश्यकता है।’


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स्टेट न्यूज

मशरूम फार्मिंग के यूथ मॉडल

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झारखंड के जमशेदपुर और बिहार के नालंदा में मशरूम की कमाऊ खेती करके स्थानीय लोगों के बीच रोल मॉडल बनकर उभरे दो युवा

एक नजर

संजीव माथुर ने दिल्ली से होटल मैनेजमेंट की डिग्री ली है

उन्होंने मशरूम की खेती के लिए लाखों के पैकेज वाली नौकरी छोड़ी नालंदा निवासी संजीव कुमार ने भी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ी

1991 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले संजीव कुमार ने दिल्ली में दो वर्ष नौकरी भी की परंतु गांव की मिट्टी की सोंधी महक उन्हें वापस गांव खींच लाई।

पहले सुनने पड़े ताने

आईएएनएस/प्रदीप मोदक

च्छी-खासी नौकरी और प्रोफेशनल करियर छोड़ देश के युवा उन क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं, जिनमें आमतौर पर शिक्षित लोग काम नहीं करना चाहते हैं। इन क्षेत्रों में सर्वप्रमुख है कृषि क्षेत्र। आज कई ऐसे होनहार युवा रोल मॉडल बनके सामने आए हैं, जिससे खेती-किसानों से जुड़े लोगों को नए तरीके से खेती करने की प्रेरणा मिल रही है। अच्छी बात यह है कि खेती के ये नए तरीके काफी कमाऊ भी साबित हो रहे हैं।

मैनेजमेंट की नौकरी छोड़ी

ऐसे ही एक युवा हैं संजीव माथुर। देश के बड़े संस्थान से प्रबंधन की डिग्री हासिल कर लाखों के पैकेज की नौकरी छोड़कर खेती करने का जोखिम विरले लोग ही लेते हैं। संजीव माथुर ने नौकरी छोड़ कर न केवल मशरूम की खेती शुरू की, बल्कि इसे कारोबार का रूप देकर कई युवाओं को रोजगार भी उपलब्ध कराया। संजीव ने दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ होटल्स से प्रबंधन की डिग्री ली है। लाखों के पैकेज पर वे इंपीरियल ग्रुप ऑफ होटल्स एंड मैनेजमेंट के गया स्थित होटल के जनरल मैनेजर थे। इस दौरान उन्हें मशरूम की खूबी की जानकारी हो गई थी। देश में इसकी उपज कम और मांग ज्यादा है। इस कारण उन्होंने मशरूम की खेती करने का निर्णय लिया। अप्रैल 2015 में नौकरी छोड़ दी। झारखंड राज्य बागवानी मिशन से संपर्क किया। उन्हें जानकारी मिली कि आयस्टर मशरूम के उत्पादन के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान चाहिए।

जमशेदपुर और आसपास मौसम इसके अनुकूल सालों भर रहता है।

पिता बीडीओ थे

संजीव के पिता रवींद्र कुमार माथुर वर्ष 2000 तक जमशेदपुर प्रखंड के बीडीओ थे। लिहाजा वे शहर व आसपास के इलाकों से वाकिफ थे। इस कारण संजीव जमशेदपुर चले आए। यहां डिमना रोड स्थित झारखंड राज्य बागवानी मिशन से तीन दिनों की ट्रेनिंग ली और आयस्टर मशरूम की खासियत के बारे में जाना। इस दौरान उन्हें पता चला कि क्षेत्र में मशरूम की पैदावार होती है। ढंग से मार्केटिंग हो तो बड़े कारोबार के साथ कई लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। संजीव ने कदमा की भाटिया बस्ती में फार्म हाउस बनाया और आयस्टर मशरूम की खेती शुरू की। उत्पादकों को संगठित कर मार्केटिंग की शुरुआत की। थोड़े ही दिनों में उन्होंने शहर में मशरूम की बिक्री के लिए 80 काउंटर खुलवा दिए, जहां हर दिन 30-35 किलो तक मशरूम बिक रहा है। उनकी पहल से युवाओं को रोजगार मिला, साथ ही कई किसान जुड़ गए हैं।

मशरूम सबसे अच्छा आहार

संजीव के मुताबिक, मशरूम कुदरत का दिया हुआ सबसे अच्छा आहार है। यह स्वादिष्ट के साथ

स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद है। इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, लो फैट, मिनरल्स और विटामिन हैं। शाकाहारी लोगों के लिए अमृत के समान है। यह एंटी फंगल, एंटी वायरल, एंटी वैक्ट्रियल और एंटी ऑक्सीडेंट है। कैंसर, लीवर की बीमारी, उच्च रक्तचाप, दमा, मधुमेह, गठिया, हेपेटाइटिस बी, श्वांस रोगों के लिए लाभदायक है।

जमशेदपुर का मौसम अनुकूल

जमशेदपुर व आसपास का मौसम मशरूम उत्पादन के लिए अनुकूल है। यहां आर्गेनिक मशरूम का उत्पादन किया जा रहा है, जो केमिकल फ्री है। संजीव अपनी भावी योजना के बारे में बताते हैं, ‘मैं इस कारोबार को उद्योग का रूप देना चाहता हूं। अगले 5-6 साल में देसी मशरूम को विदेश तक पहुंचाना है। अभी से तैयारी शुरू कर दी है।’

इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ी

इसी तरह के एक और संजीव रोल मॉडल बनकर उभरे हैं। बिहार के संजीव कुमार। इंजीनियर अगर खेती करने लगे तो हर किसी को भी आश्चर्य होगा। पर बिहार के नालंदा जिले का बिंद गांव निवासी एक इंजीनियर न केवल खुद खेती से अच्छी आमदनी कर रहा है, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी दे रहा है। बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सिंदरी से वर्ष

मैं इस कारोबार को उद्योग का रूप देना चाहता हूं। अगले 5-6 साल में देसी मशरूम को विदेश तक पहुंचाना है। अभी से तैयारी शुरू कर दी है- संजीव माथुर

गांव लौटने के बाद उन्होंने मशरूम की खेती प्रारंभ की। उनकी खेती करने की सनक पर लोगों ने शुरू में खूब ताने दिए। परंतु वे अपने इरादे से नहीं भटके। संजीव ने बताया कि उन्होंने कई युवाओं को जोड़कर एक समूह बनाया और उन्हें मशरूम की खेती के लिए तैयार किया। मशरूम की उन्नत खेती के लिए संजीव ने हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित राष्ट्रीय खुंभ (मशरूम) अनुसंधान केंद्र में प्रशिक्षण भी हासिल किया।

नालंदा में मशरूम की खेती

आज संजीव के कारण बिहार के उन इलाकों में मशरूम की खेती हो रही है, जहां पारंपरिक तोर पर इसकी खेती नहीं होती थी। नालंदा जिले के बिंद, जहाना, रसूलपुर, मेंहदीपुर, धर्मपुर, दायनचक सहित नवादा और पटना जिले के कई गांवों में मशरूम की खेती हो रही है। संजीव ने बताया कि आज इस व्यवसाय से जुड़े प्रत्येक लोगों को एक वर्ष में 40-50 हजार रुपए की आमदनी हो रही है। उन्होंने बताया कि पटना में प्रतिदिन 10 क्विंटल मशरूम खपाने वाले दिल्ली के व्यापारियों को भी बिहार के मशरूम के कारण परेशानी उठानी पड़ रही है। हालांकि उन्होंने माना कि भारी मांग के बावजूद वे मात्र एक क्विंटल मशरूम ही प्रतिदिन पटना भेज पा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए बीज की अनुपलब्धता को बड़ा कारण बताया। अभी वे रांची से मशरूम का बीज लाते हैं।

‘किसान श्री’ पुरस्कार से सम्मानित

बिहार सरकार द्वारा ‘किसान श्री’ पुरस्कार से सम्मानित संजीव ने चार हेक्टेयर जमीन पर पपीते की खेती भी प्रारंभ की है। उन्होंने एक हेक्टेयर भूमि पर ढाई हजार ‘रेड लेडी’ पपीता लगाया है। अनुमान के मुताबिक एक पौधे से 18 माह में 350 रुपए कमाए जा सकते हैं।


26 प्रेरक

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

वायकोम सत्याग्रह का प्रेरक उत्तर पाठ

हाल में ही केरल में मंदिरों का प्रबंधन देखने वाली त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड ने मंदिरों के पुजारी के तौर पर छह दलितों को नियुक्त किया है

एक नजर

1924-25 में दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए हुआ था वायकोम सत्याग्रह हाल में केरल के मंदिरों में 36 गैरब्राह्मणों को बनाया गया पुजारी पहला दलित पुजारी चुने जाने का गौरव मिला येदु कृष्णा को

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एसएसबी ब्यूरो

रतीय स्वाधीनता संग्राम की यह बड़ी खासियत रही कि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही ललक से भरने के बजाय देश में सांस्कृतिक नवजागरण का अध्याय पूरा किया। नवजागरण की यह अलख बंगाल से लेकर केरल तक हर तरफ देखी गई। आज जिस सामाजिक न्याय को लेकर खूब बात होती है, उसका प्रस्थान बिंदु आज से आठ-नौ दशक पहले तय हो गया था। खासतौर पर दलित अस्मिता और इस समाज के सशक्तिकरण की बात करें तो जिस एक ऐतिहासिक घटनाक्रम को याद रखना जरूरी है, वह है केरल का

वायकोम सत्याग्रह। 1924-1925 के बीच चला यह सत्याग्रह एक प्रकार का गांधीवादी आंदोलन था। वायकोम सत्याग्रह का उद्देश्य निम्न जातीय एझवाओं एवं अछूतों द्वारा गांधी जी के अहिंसावादी तरीके से त्रावणकोर के एक मंदिर के निकट की सड़कों के उपयोग के बारे में अपने-अपने अधिकारों को मनवाना था। उन दिनों केरल में छूआछूत की जड़ें काफी गहरी थीं। वहां सवर्णों से अवर्णों को,

जिनमें ‘एझवा’ और ‘पुलैया’ अछूत जातियां शामिल थीं, 16 से 32 फीट की दूरी बनाए रखनी होती थी।19वीं सदी के अंत तक केरल में नारायण गुरु, एन. कुमारन, टीके माधवन जैसे बुद्धिजीवियों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई। केरल में सर्वप्रथम हिंदू मंदिरों में प्रवेश तथा सार्वजनिक सड़कों पर हरिजनों के चलने को लेकर त्रावनकोर के ग्राम ‘वायकोम’ में आंदोलन शुरू

‘मुझे लगता है कि कोई आदमी ब्राह्मण अपने कर्म और ज्ञान से होता है, जन्म से नहीं’ - अनिरुद्ध तंत्री, येदु कृष्णा के गुरु

हुआ। आंदोलन का नेतृत्व एझवाओं के नेता टीके माधवन, के. केलप्पन तथा केपी केशव मेनन ने किया। वायकोम ग्राम में स्थित एक मंदिर में 30 मार्च, 1924 को केरल कांग्रेसियों के एक दल ने, जिसमें सवर्ण और अवर्ण दोनों सम्मिलित थे, मंदिर में प्रवेश किया। मंदिर में प्रवेश की खबर फैलते ही सवर्णों के संगठन ‘नायर सर्विस सोसाइटी’, ‘नायर समाजम’ व ‘केरल हिंदू सभा’ ने आंदोलन का समर्थन किया। नंबूदरियों (उच्च ब्राह्मण) के संगठन ‘योगक्षेम’ ने भी इस आंदोलन को समर्थन प्रदान किया। 30 मार्च, 1924 को केपी केशव मेनन के नेतृत्व में सत्याग्रहियों ने मंदिर के पुजारियों तथा त्रावनकोर की सरकार द्वारा मंदिर में प्रवेश को रोकने के लिए लगाई गई बाड़ को पार कर मंदिर की ओर कूच किया। सभी सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया। इस सत्याग्रह के समर्थन में पूरे देश से स्वयंसेवक वायकोम पहुंचने लगे। पंजाब से एक अकाली जत्था तथा ईवी रामस्वामी नायकर, जिन्हें ‘पेरियार’ के नाम से जाना जाता था, ने मदुरै से आए एक दल का नेतृत्व किया। मार्च, 1925 में गांधी जी की मध्यस्थता में त्रावणकोर की महारानी से मंदिर में प्रवेश के बारे में आंदोलनकारियों से समझौता हुआ। आंदोलन के ये बीज केरल में आज भी सामाजिक विषमता को दूर करने में भूमिका निभा रहे हैं। हाल में ही केरल में मंदिरों का प्रबंधन देखने वाली त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड (टीडीबी) ने मंदिरों के पुजारी के तौर पर छह दलितों को नियुक्त किया है। सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए मंदिरों में गैर ब्राह्मण पुजारी की नियुक्ति का फैसला किया है। इसके साथ ही 36 गैर-ब्राह्मणों की नियुक्ति की गई है। बोर्ड के अनुसार, राज्य के 1,248 मंदिरों में लोक सेवा आयोग की तर्ज पर लिखित परीक्षा और


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017 इंटरव्यू के आधार पर पुजारियों की नियुक्ति की जाएगी। देवास्वम मंत्री कदकमपल्ली रामचंद्रन ने बताया कि बोर्ड प्रबंधन में चलने वाले मंदिरों में पुजारियों का चयन मेरिट के आधार पर होगा। वहीं केरल की वामपंथी सरकार ने भी विश्वास जताया है कि दलित पुजारियों को लेकर समाज में आम सम्मति की राय ली जाएगी। टीडीबी के अनुसार, पुजारियों की नियुक्तियों में भी आरक्षण व्यवस्था लागू की गई है। सभी वर्ग के युवाओं को पुजारी बनने का अवसर प्रदान किया गया। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का 32 प्रतिशत आरक्षण है, जबकि मेरिट लिस्ट में आने वाले 36 युवक ओबीसी वर्ग से हैं। पहला दलित पुजारी चुने जाने का गौरव प्राप्त करने वाले येदु कृष्णा के साथ पांच अन्य दलित युवकों को भी पुजारी बनाया गया है। बता दें येदु कृष्णा पहले सेवक के रूप में कार्य करते थे जिनका काम फूल लाना था। दक्षिण भारत के जाने-माने अभिनेता कमल हासन ने अपने ट्वीटर हैंडल पर ट्वीट करते हुए कहा कि, ‘वाह त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड। 36 गैर-ब्राह्मण पुजारियों को नियुक्त करने के लिए केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को सलाम है। पेरियार का सपना हकीकत बन गया।’ केरल के मंदिरों में पूजा-पाठ करने के लिए पिछड़े वर्ग के पुजारियों की नियुक्ति के बाद अब तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन ने राज्य सरकार को केरल से सीख लेने को कहा। उनका कहना है कि जातिवाद से हटकर काबिल लोगों को पुजारी के तौर पर नियुक्त किया जाए। बात करें येदु कृष्णा की तो उनके जीवन में आई उपलब्धि किस तरह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का एक सुनहरा पन्ना है, इस बात का अहसास उन्हें खुद भी है। इसीलिए बात करने पर वे प्रसन्नता तो जाहिर करते ही हैं, साथ ही कुछ बातें संजीदगी से भी कहते हैं। दिलचस्प है कि छह साल की उम्र में येदु कृष्णा ने थ्रिसार जिले में एक मंदिर में बतौर हेल्पर काम करना शुरू किया था। अब कृष्णा को केरल के त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड (टीडीबी) ने पहला दलित पुजारी चुना है, तो जाहिर है उसकी खुशी का ठिकाना नहीं है। वैसे कृष्णा कहते हैं, ‘मैं इसे नौकरी की तरह नहीं लेता। ये मेरे लिए उपासना का जरिया है।’ त्रावणकोर बोर्ड राज्य में एक हजार मंदिरों की देख-रेख करता है और उनके प्रशासन का काम भी इसी के जिम्मे है। 22 साल के कृष्णा, एर्नाकुलम में गुरूदेव वैदिक तंत्र विद्या पीठम के ब्रह्माश्री के अनिरुद्ध तंत्री के शिष्य हैं और उनका चुनाव परीक्षा और इंटरव्यू से हुआ है। पहले पुजारी कृष्णा के गुरू अनिरुद्ध तंत्री ने कहा कि वह पहली बार कृष्णा से नालुकेट्ट श्रीधर्मा शास्त्र भद्रकाली मंदिर में मिले थे। तंत्री वहां पर आचार्य थे और एक मजदूर का लड़का कृष्णा वहां पर हेल्पर था। तंत्री ने बताया, ‘वह अनुशासित शिष्य था। वह पूजा के लिए फूल लाता था। मैंने उससे कभी उसकी जाति नहीं पूछी। मैंने उससे पूछा कि क्या वह शांति पूजा सीखना चाहता है। वह राजी हो गया और मैं उसे अपने विद्या पीठ ले गया।’ तंत्री ब्राह्मण समाज से नहीं, बल्कि ओबीसी

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खत्म होगी भारत में मानसून की चिंता

अमेरिका की फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी का दावा है कि उन्होंने एक ऐसा टूल विकसित किया है जो भारतीय के ग्रीष्म ऋतु में मानसून के आने और जाने के समय का बेहतर पूर्वानुमान लगा सकता है

समाज से आते हैं। वे कहते हैं, 'उनकी विद्यापीठ 30 सालों से शांति पूजा सिखा रहा है और इस बैच में 30 से ज्यादा विद्यार्थी हैं। वो हर जाति से आते हैं और उनके कई शिष्य राज्य और देश के दूसरे इलाकों में अलग-अलग मंदिरों में हैं। वह देवास्वम बोर्ड द्वारा कृष्णा की नियुक्ति को ऐतिहासिक मानते हैं।' तंत्री ने कहा, ’कृष्णा जब विद्यापीठ में आया था, तब 12 साल का था और आज संस्कृति, व्यवहार, खान-पान और हर चीज में आज ब्राह्मण है।' अनिरुद्ध तंत्री ने आगे कहा कि उन्हें कई लोगों से इस बात के विरोध की भी आशंका है कि गैरब्राह्मण लोग पुजारी कैसे बन सकते हैं। इस मुद्दे पर पूछने पर कृष्णा ने भी माना कि उनकी नियुक्ति का विरोध हो सकता है। पिछले महीने दलित समुदाय के एक पुजारी बीजू नारायण पर केरल के पलक्कड़ जिले में हमला हो गया था। मातृकुला धर्म रक्षा आश्रम नारायण जब घर पर आराम कर रहे थ, तब उनके हाथ और कंधे पर अज्ञात शख्स द्वारा धारदार हथियार से वार किया गया। वह महायज्ञ की तैयारी कर रहे थे, जिसे दिसंबर में होना था और उसमें कई दलित भी शामिल होने वाले थे। हमले से पहले उन्हें फोन और फेसबुक पर धमकियां मिल रही थीं। जून में हिंदू मठ कन्वेंशन के विरोध के बाद देवास्वम बोर्ड ने अलप्पुझ के चेट्टीकुलंगड़ा देवी मंदिर में एक गैर-ब्राह्मण पुजारी की नियुक्ति रद्द कर दी थी। कन्वेंशन का कहना था इससे देवी नाराज हो जाएंगी। हालांकि जब पुजारी ने राज्य मानवाधिकार आयोग में अपील की तब उसे फिर से कीझशांति (जूनियर पुजारी) के तौर पर नियुक्त कर दिया। अनिरुद्ध तंत्री ने कहा कि वे जातिवाद खत्म करने के लिए हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि ब्राह्मण आदमी अपने कर्म और ज्ञान से होता है, जन्म से नहीं।

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रतीय अर्थव्यवस्था की मानसून पर निर्भरता किसी से छुपी नहीं है। यहां तक कि मानसून का मिजाज भारत की राजनीति तक को प्रभावित कर देता है। जाहिर है मानसून के सटीक पूर्वानुमान की आवश्यकता हमेशा से ही महसूस की जाती है और भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के पूर्वानुमानों की हमेशा से परीक्षा होती रहती है। ज्यादातर मौसम विभाग को पूर्वानुमान गलत साबित होने के आरोपों का सामना करना पड़ता है। देश के लोगों को हमेशा से मानसून के आने और खत्म होने की तारीखों को लेकर स्पष्ट और ठोस जानकारी मानदंड की कमी लंबे समय से खलती रही है और उनकी दिलचस्पी हमेशा से ही ऐसे सिस्टम में रही है जो बेहतर तरीके से मानसून का पूर्वानुमान लगा सके। ऐसे में अमेरिका से आई एक खबर सुकून देने वाली हो सकती है जहां के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा टूल बनाने का दावा किया है जो भारतीय मौसम विभाग से ज्यादा बेहतर तरीके से मानसून के आगमन और विदाई की जानकारी दे सकता है। अमेरिका की फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी का दावा है कि उन्होंने एक ऐसा टूल विकसित किया है जो भारत में मानसून के आने और जाने के समय का बेहतर पूर्वानुमान लगा सकता है। यह नई पद्धति क्लाइमेट डायनामिक्स जर्नल में प्रकाशित हुई है, जो कि किसी स्थान के पूरे प्रभावित क्षेत्र में पूरे मानसून के दौरान हुई वर्षा को चिह्नित करती है। अर्थ, ओशीन एवं एट्मास्फियरिक साइंस के असोसिएट प्रोफेसर और प्रमुख अनुसंधानकर्ता वासु मिश्रा का कहना है कि अभी के मौसम

पूर्वानुमान और निगरानी प्रोटोकॉल मानसून के आने और जाने के एक ही जगह के समय पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वह भी देश के दक्षिण पश्चिम कोने के केरल राज्य पर और उसी आधार पर अन्य जगहों का एक्सट्रापोलेशन करते हैं। जबकि अनेक विशिष्ट जगहों को लेकर हमने पूरे देश को शामिल किया है और किसी भी वर्ष में मानसून के आने और जाने की तारीखों का ‘तटस्थ रूप से निर्धारण किया है। इस पद्धति से, जो प्रश्न मौसम वैज्ञानिकों को दशकों से परेशान कर रहा था, उसका सरल और लागू करने योग्य जवाब मिल गया है। आपको जटिल परिभाषाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी। मिश्रा ने कहा कि अब हमने वर्षा की परिभाषा को आधार दे दिया है और यह असफल नहीं हुई है। गौरतलब है कि देश के कुछ हिस्सों में मानसून की बारिश देशभर के कुल वर्षा के 90 प्रतिशत से भी ज्यादा होती है और मानसून के आगमन का गलत पूर्वानुमान देश की राजनीतिक और कृषि जीवन को अस्थिर कर देती है। इससे आम जनता और मानसून का इंतजार करते लोगों में भारी निराशा और भ्रम पैदा हो जाता है, क्योंकि कोई भी कभी इतने विस्तार में नहीं गया। उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं के मुताबिक यह नया सिस्टम जो मानसून के आगमन को स्थान विशेष के वर्षा के आंकड़ो से जोड़ता है,लोगों के इस असंतोष को कम कर सकता है। मिश्रा ने कहा आगे कहा कि हमने 105 साल के डेटा के आधार पर इसे बनाया है और यह भारत के किसी भी स्थान के लिए एक बार भी गलत नहीं हुआ है। (आईएएनएस)


28 गुड न्यूज

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

नई शिक्षा नीति दिसंबर तक नई शिक्षा नीति का निर्माण अंतिम चरण में है

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द्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने कहा कि नई शिक्षा नीति का निर्माण अंतिम चरण में है और दिसंबर तक इसकी घोषणा हो जाएगी। तिरूअनंतपुरम में 'राष्ट्रीय अकादमी सम्मेलन' का उद्घाटन करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि नई शिक्षा नीति का लक्ष्य देश में औपनिवेशिक प्रभाव वाली शिक्षा प्रणाली में संशोधन करना है।

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अधिकतर शिक्षा विशेषज्ञों ने ब्रिटिश और पश्चिमी विद्वानों का अनुसरण किया है और जानबूझकर भारतीय संस्कृति की उपेक्षा की है। शिक्षा प्रणाली और सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारतीय मानसिकता को किस प्रकार औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त किया जाए। सरकार इस दिशा में कार्य कर रही है। मंत्री ने कहा कि यह पहली शिक्षा नीति

है, जिसकी परत-दर-परत और सूक्ष्मता से परिचर्चा की गई है। डॉ. सिंह ने कहा कि शिक्षा प्रणाली की कुछ प्रमुख चुनौतियां हैं- प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, उच्च शिक्षा के खर्च में कमी लाना तथा इसे लोगों के लिए सुलभ बनाना। उन्होंने कहा कि कौशल विकास सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है। उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में छात्रों द्वारा विदेश जाने में कमी लाने के लिए डॉ. सिंह ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा है कि देश में उच्च शिक्षा तक पहुंच मात्र 25.6 प्रतिशत है, जबकि यह अमेरिका में 66 प्रतिशत, जर्मनी में 80 प्रतिशत और चीन में 60 प्रतिशत है। देश की महंगी उच्च शिक्षा का जिक्र करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए और इसे कम खर्चीला बनाया जाना चाहिए। डॉ. सिंह ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम में बदलाव की जरूरत है। अधिनियम में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था है। परंतु यदि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं तो इसका क्या समाधान है, इसीलिए देश की प्राथमिक शिक्षा में विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों की आवश्यकता है। सम्मेलन का आयोजन विचार केंद्रम के निदेशक पी. परमेश्वरम के नवथी समारोह के तहत भारतीय विचार केंद्रम के द्वारा किया गया। (एजेंसी)

भूजल पर राज्यों से जवाब तलब देश में नियमानुसार भूजल निकाला जाना सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण कई निर्देश जारी कर रहा है

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द्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) ने भूजल निकालने के लिए 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' जारी करने का प्रारूप दिशा निर्देश और 'जन सूचना' प्रारूप को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को भेजा

है, जिस पर उन्हें 60 दिन के भीतर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा गया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में काफी संख्या में दायर याचिकाओं के कारण अधिकरण की विभिन्न शाखाएं सीजीडब्ल्यूए को निर्देश दे रही हैं कि देश में नियमानुसार भूजल निकाला जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जल संसाधन मंत्रालय से जारी बयान के अनुसार, इन दिशा निर्देशों से देश भर में एक समान नियामक प्रारूप सुनिश्चित होगा, ताकि नियमन की असमानता को समाप्त या कम किया जा सके। बयान में कहा गया कि दिशा निर्देशों के प्रमुख संशोधनों में संपूर्ण देश का कवरेज, भूजल निकालने की मात्रा पर आधारित (जिले के

राजस्व प्रमुख, स्टेट नोडल एजेंसी, राज्य भूजल प्राधिकरण और सीजीडब्ल्यूए) अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्राधिकरणों का विकेंद्रीकरण, परियोजना प्रस्तावित करने वालों द्वारा, कृत्रिम रीचार्ज प्रस्तावों से संबंधित प्रावधानों के अनुरूप वितरण करना शामिल है। इसके साथ ही कृत्रिम रीचार्ज संरचनाओं का निर्माण, रीचार्ज व्यवस्था के बदले जल संरक्षण शुल्क शुरू करना, प्रभावी भूजल प्रबंधन के लिए राज्यों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले जल संरक्षण शुल्क के जरिए कोष बढ़ाना भी शामिल है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 की धारा-3(3) के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा गठित सीजीडब्ल्यूए देश में भूजल विकास और प्रबंधन का नियमन करता है। यह प्राधिकरण उद्योगों, बुनियादी ढांचा, खनन परियोजनाओं के वास्ते भूजल निकालने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान करता है। (एजेंसी)

सुपर-30 के छात्रों से मिले योशिनो टोक्यो विश्वविद्यालय के भारत में ऑपरेशन प्रमुख हिरोशी योशिनो ने संस्थान सुपर-30 का दौरा किया

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पान के टोक्यो विश्वविद्यालय के भारत ऑपरेशन प्रमुख हिरोशी योशिनो सोमवार को यहां भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने के लिए चर्चित संस्थान सुपर30 का दौरा किया और यहां के छात्रों व संस्था के संस्थापक आनंद कुमार से मुलाकात की। योशिनो ने छात्रों को अनुसंधान और इनोवेशन (नवाचार) के लिए प्रेरित किया तथा आगे की पढ़ाई के लिए जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय आने का निमंत्रण दिया। योशिनो ने कहा, ‘आज शोध और नवाचार ही दुनिया के मार्गदर्शक हैं। यही चीजें दुनिया को आसान बनाती हैं। जब तक शोध और अनुसंधान नहीं होगा, तब तक दुनिया प्रगति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता।’ उन्होंने सुपर-30 के अभिषेक गुप्ता और कुणाल कुमार की तरह इस साल भी यहां से कम से कम एक छात्र को टोक्यो विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए आने का न्योता देते हुए कहा कि सुपर-30 के छात्रों के पास जो जुनून देखने को मिलता है, वह शायद किसी शिक्षण संस्थान के छात्रों के बच्चों में नहीं दिखता। योशिनो ने सुपर-30 की तारीफ करते हुए कहा कि इस लोकप्रिय संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह संस्थान निर्धन परिवार के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है और उसके लिए प्रयासरत है। उल्लेखनीय है कि सुपर 30 के अभिषेक और कुणाल टोक्यो विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि पिछले वर्ष यहां के पांच बच्चे टोक्यो विश्वविद्यालय की 15 दिनों की शैक्षणिक यात्रा पर गए थे। इस क्रम में छात्रों ने कई तकनीकी संस्थानों, प्रयोगशालाओं का दौरा कर नई जानकारी हासिल की थी। (एजेंसी)


अब मेट्रो स्टेशनों पर क्लॉक रूम और पोर्टर सेवा

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

गुड न्यूज

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दिल्ली के सात मेट्रो स्टेशनों पर क्लॉक रूम सेवा शुरू करने की योजना

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ट्रो में सफर करने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए डीएमआरसी एक नई पहल करने जा रही है। दिल्ली-एनसीआर के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से सटे मेट्रो स्टेशनों पर बाहर से आने वालों की सुविधा के लिए क्लॉक रूम और पोर्टर सर्विस शुरू की जाएगी। लोग मेट्रो स्टेशन पर बनने वाले क्लॉक रूम में ही अपना सामान जमा करवा सकेंगे। वापस आने पर सामान ले सकेंगे। इसके लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं। डीएमआरसी के मुताबिक अगले साल मार्च तक यह सुविधा शुरू हो जाएगी। मेट्रो स्टेशन के क्लॉक रूम में लोग एक दिन से ज्यादा के लिए भी अपना सामान रखवा सकेंगे। चार्ज कितना लिया जाएगा, यह अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि प्रतिघंटे या प्रतिदिन के हिसाब से चार्ज लिया जाएगा।

डीएमआरसी के मुताबिक, अभी दिल्लीएनसीआर के 7 मेट्रो स्टेशनों पर क्लॉक रूम की सुविधा शुरू करने के लिए टेंडर निकाला गया है। इनमें शाहदरा, कश्मीरी गेट, चांदनी चौक, हुडा सिटी सेंटर, बॉटनिकल गार्डन, जहांगीरपुरी और आनंद विहार मेट्रो स्टेशन शामिल हैं। कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन एक ओर इंटरस्टेट बस अड्डे से कनेक्टेड है, तो दूसरी ओर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन भी यहां से काफी नजदीक है। आनंद विहार मेट्रो स्टेशन भी इंटरस्टेट बस अड्डा और रेलवे स्टेशन से कनेक्टेड है। चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से जुड़ा है, तो शाहदरा और जहांगीरपुरी मेट्रो स्टेशन भी रेलवे स्टेशनों के पास है। वहीं हुडा सिटी सेंटर और बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशनों के पास एनसीआर के

शिरडी के लिए फ्लाइट सेवा

दो प्रमुख बस अड्डे बने हुए हैं। डीएमआरसी का मानना है कि इन रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से रोज बड़ी तादाद में लोग दिल्ली आते हैं। उनमें से कई लोग ऐसे होते हैं, जो एक या दो दिन के लिए किसी जरूरी काम के चलते दिल्ली आते हैं और मेट्रो से ट्रैवल करते हैं, मगर सामान रखने के लिए क्लॉक रूम न होने की वजह से उन्हें अपना सामान भी साथ लिए घूमना पड़ता है। डीएमआरसी इन स्टेशनों पर सही जगह चिह्नित करके वहां बड़े आकार के क्लॉक रूम्स बनवाएगी और प्राइवेट कंपनियों को उन्हें ऑपरेट करने का जिम्मा सौंपेगी। यह सारी प्रक्रिया अगले साल मार्च तक पूरी हो जाएगी। अभी एयरपोर्ट मेट्रो लाइन के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही क्लॉक रूम की सुविधा उपलब्ध है।

डीएमआरसी से मिली जानकारी के मुताबिक, क्लॉक रूम का इस्तेमाल करने के लिए चार्जेस का जो स्लैब बनाया जाएगा, उसके तहत पहले 4 घंटे के लिए एक समान चार्ज लगेगा। उसके बाद प्रति घंटे के हिसाब से अतिरिक्त चार्ज देना पड़ेगा, जो लगेज के साइज यानी स्मॉल, मीडियम और लार्ज पर निर्भर करेगा। यह चार्ज 10 से 20 या 30 रुपए प्रति घंटे तक भी हो सकता है। ये क्लॉक रूम ऐसी जगहों पर बनेंगे, जहां जाने से पहले यात्रियों को पहले सीआईएसएफ के फ्रिस्किंग जोन से गुजरना पड़ेगा और अपने सामान की चेकिंग करवानी होगी। इसका फायदा यह होगा कि कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह का संदिग्ध सामान बैग में लेकर क्लॉक रूम तक नहीं पहुंच सकेगा। ऐसा सुरक्षा के लिए जरूरी है। (आईएएनएस)

शिरडी जाने के लिए अब श्रद्धालुओं को मुंबई या औरंगाबाद नहीं जाना होगा, क्योंकि जल्द ही शिरडी के लिए फ्लाइट सेवा शुरू होने वाली है

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ईं बाबा के भक्त अब शिरडी भी फ्लाइट से आ जा सकेंगे। अब तक फ्लाइट से आने-जाने वालों को औरंगाबाद या फिर मुंबई उतरना पड़ता है और वहां से सड़क के रास्ते तीन से पांच घंटे का सफर तय करके शिरडी पहुंचा जाता है। एविएशन रेग्युलेटर डीजीसीए के शिरडी एयरपोर्ट को लाइसेंस जारी करने के बाद अब

उम्मीद की जा रही है कि जल्द मुंबई और दिल्ली से शिरडी के लिए फ्लाइटस शुरू होंगी। फिलहाल शिरडी एयरपोर्ट को जो लाइसेंस दिया गया है, वह फ्लाइटस को दिन के समय ऑपरेट करने के लिए दिया गया है। इस एयरपोर्ट पर बने रनवे की लंबाई ढाई हजार मीटर है, इसीलिए इस एयरपोर्ट पर ए 320 और बोइंग 737

विमान भी उड़ान भर सकते हैं। एविएशन से जुड़े एक्सपर्टस का मानना है कि शिरडी से फ्लाइट शुरू होने से इस रूट पर फ्लाइटस की डिमांड जल्द ही देखने को मिल सकती है। इसकी वजह यह है कि शिरडी में रोजाना लगभग 80 हजार श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। अभी ये श्रद्धालु या तो ट्रेन

से वहां पहुंचते हैं या फिर उन्हें औरंगाबाद या मुंबई एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट पकड़नी पड़ती है। मुंबई से सड़क के रास्ते शिरडी पहुंचने में पांच घंटे और औरंगाबाद एयरपोर्ट से शिरडी पहुंचने में तीन घंटे का वक्त लगता है। ऐसे में शिरडी एयरपोर्ट चालू होने से श्रद्धालु आसानी से शिरडी पहुंच सकेंगे। (एजेंसी)


30 गुड न्यूज

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

सौर मंडल में है प्लैनेट नाइन

लाखों साल पुराना जीवाश्म मिला

नासा के वैज्ञानिकों का दावा है कि सौरमंडल में नौवें ग्रह का अस्त्वि है

ना

सा के वैज्ञानिकों ने कहा है कि प्लैनेट नाइन की अवधारणा वास्तविक है और संभव है कि वह पृथ्वी के द्रव्यमान से 19 गुना ज्यादा और वरुण (नेपट्यून) की तुलना में सूर्य से 20 गुना ज्यादा दूर हो। प्लैनेट नाइन या सौर मंडल का नौवां ग्रह सुपर अर्थ ग्रह हो सकता है, जिसके बारे में वैज्ञानिक बातें करते रहे हैं और जिसका द्रव्यमान पृथ्वी से ज्यादा है, लेकिन यूरेनस और नेपट्यून से काफी कम है। अमेरिका के कैलिफॉर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ

टेक्नॉलजी में प्लैनेटरी ऐस्ट्रोफिजिसिस्ट कंस्तनचीन बैटीगिन ने कहा कि प्लैनेट नाइन के अस्तित्व का संकेत देने वाले अब 5 अलग-अलग व्याख्यात्मक प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप इस व्याख्या को हटाते हैं और प्लैनेट नाइन के न होने की कल्पना करते हैं तो आप हल करने से ज्यादा समस्याओं को जन्म देंगे। वैज्ञानिकों ने इससे पहले भी कहा था कि सौर मंडल के बाहरी भाग काइपर घेरे से भी आगे एक संभावित ग्रह है। अब एक और व्याख्या के जरिए वैज्ञानिकों ने इसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया है। बैटीगिन ने बताया कि एकाएक आपके पास 5 अलग-अलग पहेलियां हैं और उन्हें स्पष्ट करने के लिए आपको पांच अलग -अलग सिद्धांत पेश करने होंगे। बता दें कि कभी प्लूटो सौर मंडल का नौवां ग्रह हुआ करता था लेकिन साल 2006 में ग्रह की परिभाषा बदल जाने के बाद इंरनेशनल ऐस्ट्रॉनमी यूनियन ने इसे ग्रहों की श्रेणी से बाहर कर दिया था। (एजेंसी)

कच्छ में वैज्ञानिकों ने 1500 लाख पुराने समुद्री जीवश्म के अवशेषों को खोज निकाला है

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रत के अब तक के इतिहास में पहली 1500 लाख साल पुराने समुद्री जीवाश्म के अवशेष मिले हैं। गुजरात के कच्छ में भारत और जर्मनी के वैज्ञानिकों की टीम को यह जीवाश्म मिला है। 5.5 मीटर लंबे इस समुद्री प्रजाति के जीवाश्म से वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि उपमहाद्वीप में जीवन और प्रकृति के कुछ रहस्यों को जानने में मदद मिल सकेगी। अभी तक भारत में जुरासिक काल के किसी अवशेष के मिलने के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से

पर्यावरण संरक्षण के लिए सोलिटेयर ग्रुप सम्मानित

320 करोड़ रुपए का स्टार्टअप फंड लांच

सोलिटेयर ग्रुप ने ग्रेटर नोएडा में एशिया के सबसे बड़े एसटीपी प्लांट का निर्माण किया है

त्तर प्रदेश में इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र एवं पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली-एनसीआर के प्रसिद्ध रियल एस्टेट डेवलपर सोलिटेयर ग्रुप को अहम सम्मान से नवाजा। यह सम्मेलन उत्तर प्रदेश में प्रगति एवं चुनौतियां के विषय पर आयोजित किया गया था, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोलिटेयर ग्रुप के सीएमडी हरजीत सिंह साहनी को राज्य में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पुरस्कृत किया। उत्तर प्रदेश के विकास में क्या चुनौतियां हैं तथा दूसरे संबंधित मुद्दों पर इस सम्मेलन में परिचर्चा हुई, जिसमें राज्य के दोनों उप मुख्यमंत्री

केशव प्रसाद मौर्य एवं दिनेश शर्मा के अलावा कई अन्य नेताओं ने भी शिरकत की। परिचर्चा के दौरान मुख्यमंत्री द्वारा सभी को सम्मानित किया गया। सैंकड़ो की तादाद में आम जनता एवं राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों तथा अन्य लोगों ने भी इस सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस अवसर पर हरजीत सिंह साहनी ने कहा, ‘यह सम्मान सोलिटेयर ग्रुप के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इससे उत्तर प्रदेश को एक बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर एवं पर्यावरण समृद्ध प्रदेश बनाने में हमारी मुहिम को पहचान मिली है। सोलिटेयर ग्रुप लोगों को बेहतर आवास मुहैया कराने और साथ ही उन्हें बेहतर पर्यावरण से सुसज्जित जीवनशैली प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।’ सोलिटेयर ग्रुप ने ग्रेटर नोएडा में एशिया के सबसे बड़े एसटीपी प्लांट का निर्माण किया है जिसमें पूरे नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सीवर का पानी इकट्ठा होता है और उसे साफ कर पीने लायक स्वच्छ जल में परिवर्तित किया जाता है। स्वच्छ जल के अभाव के गंभीर संकट से जूझ रहे उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में सोलिटेयर ग्रुप द्वारा किए गए इस प्रयास ने निश्चित रूप से समाज को काफी राहत पहुंचाई है। (एजेंसी)

नहीं कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों की टीम कच्छ में अपने रूटीन काम में लगी थी जब इस जीवाश्म के संकेत मिले। काफी मशक्कत के बाद टीम जीवाश्म को निकालने में सफल रही। जीवाश्म के शरीर को देखकर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी बड़े शॉर्क या समुद्री जीव जैसा कुछ होगा। इसकी उत्पत्ति का समय 2500 से लेकर 900 लाख साल पहले तक का हो सकता है। आकृति विज्ञान की स्टडी के अनुसार अनुमान है कि जीवाश्म 1650 से 900 लाख साल पहले पाए जाने वाले समुद्री जीव के प्रजाति परिवार से ही है। खोज टीम का नेतृत्व दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रफेसर गुंटुपल्ली वी आर प्रसाद ने किया। प्रसाद डीयू के जियॉलजी डिपार्टमेंट में पढ़ाते हैं। इस खोज से संबंधित पेपर का नाम उन्होंने फर्स्ट इस्थीसॉर फ्रॉम द जुरासिक ऑफ इंडिया दिया है। (एजेंसी)

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ऊर्जा क्षेत्र में नवाचारों का समर्थन के लिए आगे आईं 10 तेल और गैस कंपनियां

ट्रोलियम मंत्रालय की नई पहल के तहत 10 तेल और गैस कंपनियों ने ऊर्जा क्षेत्र में नवाचारों का समर्थन करने के लिए एक स्टार्टअप कार्यक्रम की शुरुआत की है। इसके तहत उद्यमियों को फंड मुहैया कराने के लिए एक कोष स्थापित किया जाएगा, जिससे 3 साल की अवधि में 320 करोड़ रुपए मुहैया कराए जाएंगे। इस योजना के लिए इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और गेल इंडिया समेत कई सरकारी कंपनियों ने 36 स्टार्ट अप के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान ने इस मौके पर कहा, ‘जिन लोगों के साथ हम आज भागीदारी कर रहे हैं, वे देश के लिए नए मानक स्थापित करेंगे।’

प्रधान को हाल ही में कैबिनेट रैंक दिया गया है और उन्हें कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। उन्होंने कहा कि भारत औद्योगिक क्रांति 4.0 को नहीं चूक सकता, जो सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा किए गए परिवर्तनों का प्रतीक है। (एजेंसी)


30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

छत्तीसगढ़ की लोक कथा

अनोखा दोस्त कौआ

क कौआ था। वह एक किसान के घर के आंगन के पेड़ पर रहता था। किसान रोज सुबह उसे खाने के लिए पहले कुछ देकर बाद में खुद खाता था। किसान के खेत में चले जाने के बाद कौआ रोज उड़ते-उड़ते ब्रह्माजी के दरबार तक पहुंचता था और दरबार के बाहर जो नीम का पेड़ था,

उस पर बैठकर ब्रह्माजी की सारी बातें सुना करता था। शाम होते ही कौआ उड़ता हुआ किसान के पास पहुंचता और ब्रह्माजी के दरबार की सारी बातें उसे सुनाया करता था। एक दिन कौए ने सुना कि ब्रह्माजी कह रहे हैं कि इस साल बारिश नहीं होगी। अकाल पड़ जाएगा। उसके बाद ब्रह्माजी ने कहा - पर पहाड़ों में

सोच-समझ कर इजाजत ए स्विट्जरलैंड की लोक कथा

क किसान ने दूध से भरा जग अपने पड़ोसी को कुछ देर के लिए सहेजकर रखने के लिए दिया। जब वह अपना जग वापस मांगने के लिए गया तो पड़ोसी ने उससे कहा कि दूध मक्खियां पी गईं। इस बात पर दोनों का झगड़ा हो गया। बात बहुत बढ़ गई तो वे दोनों अदालत गए और वहां पर न्यायाधीश ने यह फैसला सुनाया कि पड़ोसी को दूध का हर्जाना भरना पड़ेगा। ‘लेकिन मैंने दूध नहीं पिया, दूध तो मक्खियों ने पी लिया!’ – पड़ोसी बोला। ‘तुम्हें मक्खियों को मार देना चाहिए था’ – न्यायाधीश ने कहा। ‘अच्छा’ – पड़ोसी बोला – ‘आप मुझे मक्खियों को मारने की इजाजात देते हैं?’

‘मैं इजाजत देता हूं’ – न्यायाधीश ने कहा – ‘तुम उन्हें जहां भी देखो, उन्हें मार डालो’ उसी समय एक मक्खी उड़ती हुई आई और न्यायाधीश के गाल पर बैठ गई। पड़ोसी ने यह देखा तो पलक झपकते ही न्यायाधीश के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जमा दिया। मक्खी मरकर नीचे गिर गई और न्यायाधीश तिलमिला गया। इससे पहले कि न्यायाधीश कुछ कहता, पड़ोसी चिल्लाकर बोला – ‘मैंने पहचान लिया! इसी मक्खी ने सारा दूध पी लिया था!’ कुछ क्षणों पहले ही न्यायाधीश ने पड़ोसी को मक्खी मारने के लिए अनुमति दी थी इसीलिए अब वह कुछ नहीं कर सकता था।

खूब बारिश होगी। शाम होते ही कौआ किसान के पास आया और उससे कहा - बारिश नहीं होगी, अभी से सोचो क्या किया जाए। किसान ने खूब चिंतित होकर कहा - तुम ही बताओ दोस्त क्या किया जाए।

लोक कथा

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कौए ने कहा - ब्रह्माजी ने कहा था पहाड़ों में जरुर बारिश होगी। क्यों न तुम पहाड़ पर खेती की तैयारी करना शुरु करो? किसान ने उसी वक्त पहाड़ पर खेती की तैयारी की। आस-पास के लोग जब उस पर हंसने लगे, उसे बेवकूफ कहने लगे, उसने कहा - तुम सब भी यही करो। कौआ मेरा दोस्त है, वह मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाता है। पर लोगों ने उसकी बात नहीं मानी। उस पर और ज्यादा हंसने लगे। उस साल बहुत ही भयंकर सूखा पड़ा। वह किसान ही अकेला किसान था, जिसके पास ढेर सारा अनाज इकट्ठा हो गया। देखते ही देखते साल बीत गया इस बार कौए ने कहा - ब्रह्माजी का कहना था कि इस साल बारिश होगी। खूब फसल होगी। पर फसल के साथ-साथ ढेर सारे कीड़े पैदा होगें। और कीड़े सारी फसल को चौपट कर देंगे। इस बार कौए ने किसान से कहा - इस बार पहले से ही तुम मैना पंछी और छछूंदरों को ले आना, ताकि वे कीड़ों को खा जाएं। किसान जब ढेर सारा छछूंदरों को ले आया, मैना और पंछी को ले आया, आसपास के लोग उसे ध्यान से देखने लगे - पर इस बार वे किसान पर हंसे नहीं। इस साल भी किसान ने अपने घर में ढेर सारा अनाज इकट्ठा किया। इसके बाद कौआ फिर से ब्रह्माजी के दरबार के बाहर नीम के पेड़ पर बैठा हुआ था जब ब्रह्माजी कर रहे थे - फसल खूब होगी पर ढेर सारे चूहे फसल पर टूट पड़ेंगे। कौए ने किसान से कहा - इस बार तुम्हें बिल्लियों को न्योता देना पड़ेगा - एक नहीं, दो नहीं, ढेर सारी बिल्लियां। इस बार आस-पास के लोग भी बिल्लियों को ले आए। इसी तरह पूरे गांव में ढेर सारा अनाज इकट्ठा हो गया। कौए ने सबकी जान बचाई।


32 अनाम हीरो

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

30 अक्टूबर - 05 नवंबर 2017

अनाम हीरो

अलाहिया वंजारा

अपना शौक भूल बचाई बच्चे की जान दो साल के नन्हे बच्चे को कैंसर से बचाने के लिए करीब डेढ़ लाख रुपए जमा किए

मुं

बई में माहिम स्थित बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल की 13 वर्षीय छात्रा अलाहिया वंजारा ने दो साल के नन्हे बच्चे को फेफड़े के कैंसर से बचाने के लिए करीब डेढ़ लाख रुपए जमा किए। पिछले महीने ही अलाहिया की मां ने उसे वीर पवार के बारे में बताया। वीर का घर अलाहिया के घर के पास ही था। नन्हे वीर को अपनी कैंसर की बीमारी से उबरने के लिए कम से कम चार लाख रुपए की तत्काल जरूरत थी। वीर के माता-पिता की जो हैसियत थी, उसमें इतनी बड़ी रकम का इतनी जल्दी इंतजाम हो जाना आसान बात नहीं थी। यह सब जानने के बाद अलाहिया काफी भावुक हुई और उसने वीर को बचाने के लिए खुद पैसे जमा करने की ठान ली। उसने सबसे पहले अपने पसंदीदा बॉलीवुड स्टार बॉलीवुड स्टार वरुण धवन की कंपनी के सामान से अपने कमरे को सजाने के शौक से तौबा कर ​िलया। ऐसा करते हुए अलाहिया ने करीब 10 हजार रुपए जमा कर लिए। अलाहिया की मां हुस्ना वंजारा बताती हैं कि जब उसने वीर की बीमारी के बारे में एक फेसबुक पोस्ट के

न्यूजमेकर

बारे में पढ़ा तो उन्होंने इसके बारे में अपनी बेटी को तो बताया ही, साथ अस्पताल से यह पता लगाया कि क्या यह मामला सही है। एक बार जब इस खबर की पुष्टि हो गई तो अलाहिया के साथ पूरे वंजारा परिवार ने वीर की मदद करने का मन बना लिया। इसके लिए इस बारे में उनकी तरफ से हर जगह मैसेज सर्कुलेट किए गए और इस तरह मदद की राशि आने का सिलसिला शुरू हो गया। वीर के टैक्सी ड्राइवर पिता बताते हैं कि उनके लिए इस तरह मदद के हाथ उठने बड़ी बात थी, क्योंकि इससे पहले वे खासे निराश हो चुके थे। वीर के एक भाई की मौत इसी तरह जन्म के महज 15 दिनों बाद हो गई थी। अलाहिया की पहल और दिलचस्पी से वीर के लिए मदद का सिलसिला इतना आगे बढ़ा कि उसके इलाज में अस्पताल ने भी अपनी तरफ से काफी मदद की। वीर को बचाने के लिए ‘मिलाप’ नाम की एक स्वयंसेवी संस्था भी समाने आई। यही नहीं, अलाहिया के स्कूल ने भी अपनी छात्रा की इस नेक पहल को अपना समर्थन दिया।

नाम ‘छोटी’, ब्रिटेन का सबसे सम्मान बड़ा युवा करोड़पति

छोटी कुमारी सिंह

माज के अंतिम पायदान पर माने जाने वाले मुसहर समाज के लोगों की मदद करने वाली बिहार के भोजपुर जिले की 20 वर्षीय छोटी कुमारी सिंह को स्विट्जरलैंड स्थित वीमेंस वर्ल्ड समिट फाउंडेशन ने ग्रामीण परिवेश में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले रचनात्मक कार्यों की श्रेणी में सम्मानित किया है। दिलचस्प है कि छोटी खुद सवर्ण जाति से आती हैं। बावजूद इसके उन्होंने वर्ष 2014 में अपने गांव रतनपुर में मुसहर समुदाय के लोगों को शिक्षा देना और सामाजिक स्तर पर उनकी सहायता करनी शुरू करने का साहसिक फैसला लिया। उन्हें इसकी प्रेरणा आध्यात्मिक और मानवतावादी माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) के प्रतिष्ठित अमृतानंदमयी मठ द्वारा

मुसहर समाज के लोगों के शैक्षिक और सामाजिक विकास के लिए कार्य कर रहीं बिहार की छोटी कुमारी को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

संचालित एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद मिली थी। अभी तक मुसहर समुदाय के 108 बच्चों को ट्यूशन देने में कामयाब रही छोटी का कहना है कि ज्यादातर भूमिहीन श्रमिकों के रुप में काम करने वाले उसके गांव के मुसहर समुदाय के लोग बेहद गरीब हैं। उन्हें बच्चों की शिक्षा का महत्व समझाने और इसके लिए प्रेरित करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी, क्योंकि समुदाय के ज्यादातर लोग अपने बच्चों को शिक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। छोटी ने एक स्वयं सहायता समूह भी शुरू किया, जिसमें इस समुदाय की हर महिला एक महीने में 20 रुपए बचाकर घर-आधारित गतिविधियों को शुरू करने के लिए बैंक खाता में जमा करती है।

भारतीय मूल के युवा ने ब्रिटेन में महज 16 महीने में करोड़ों रुपए की कंपनी खड़ी की

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रतीय अपनी प्रतिभा से पूरी दुनिया में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। ऐसे ही ब्रिटेन में रहने वाले एक भारतीय मूल के युवा ने सिर्फ 16 महीने में करोड़ों रुपए की कंपनी खड़ी कर सभी को चौंका दिया है। अपनी इस कामयाबी के बलबूते यह भारतीय मूल का किशोर ब्रिटेन का सबसे युवा करोड़पति बन गया है।19 साल का अक्षय रुपरेलिया अपनी ऑनलाइन एस्टेट एजेंसी के जरिए प्रॉपर्टी बेचकर इतने कम समय में करोड़पति बन गए हैं। हैरानी की बात है कि अक्षय अभी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं और पढ़ाई के दौरान ही वह अब तक 10 करोड़ पाउंड की प्रॉपर्टीज बेच चुके हैं। दरअसल, अक्षय ने एक वेबसाइट बनाकर कमीशन पर प्रॉपर्टीज बेचना शुरू किया था। जहां अन्य एजेंट घर बिकवाने के कई हजार पाउंड कमीशन लेते हैं, वहीं अक्षय यह काम सिर्फ 99 पाउंड में करते हैं। बस

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 46

अक्षय रुपरेलिया यही कारण है कि अक्षय की कंपनी की लोकप्रियता तेजी से बढती गई और आज वह यूके का सबसे युवा करोड़पति हैं। अक्षय की कंपनी की इस सफलता के बाद कई निवेशकों ने अक्षय की कंपनी में पैसा लगाया है। आज अक्षय की कंपनी की कीमत 12 लाख पाउंड तक पहुंच गई है। जहां अभी तक अक्षय की कंपनी में 12 लोग काम कर रहे थे, वहीं अब अक्षय अपने कर्मचारियों की संख्या दोगुनी करने पर विचार कर रहे हैं। दिलचस्प है कि अक्षय ने सिर्फ 7 हजार पाउंड से अपनी कंपनी की शुरुआत की थी, जो कि आज करोड़ों की कंपनी बन चुकी है।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 46)  
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