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वर्ष-1 | अंक-48 | 13 - 19 नवंबर 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

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12 साक्षात्कार

‘टॉयलेट मैन’

18 फोटो फीचर

सुलभ टॉयलेट म्यूजियम

स्वच्छता के क्षेत्र में डॉ. पाठक 2500 ई.पूर्व से अब तक के का अतुलनीय योगदान टॉयलेट का अनोखा संग्रहालय

शौचालय स्वच्छता और सोच

भारतीय परंपरा और सभ्यता में आधुनिकता के कई बीज संस्कार छिपे हुए हैं। भारत में जहां हड़प्पा सभ्यता के समय व्यवस्थित टॉयलेट के नमूने मिले हैं, वहीं आज देश राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के संकल्प को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है

32 रोचक

किसिम-किसिम के टॉयलेट

समय और परिस्थिति के मुताबिक बदले टॉयलेट के डिजाइन

विश्व शौचालय दिवस (19 नवंबर) पर विशेष

दे

एसएसबी ब्यूरो

श में जब ढाई दशक पहले उदारीकण का जोर बढ़ा तो भावी बदलाव पर मशहूर ब्रांड गुरु एलेक पद्मसी ने एक लेख लिखा। पद्मसी ने कहा कि आने वाला दौर ब्रांड्स का होगा। ब्रांडीकरण से ही तय होगा कि आप कितने आधुनिक हैं या समय के साथ आप चल भी रहे हैं कि नहीं। यही नहीं, ब्रांड बनने या होने की होड़ में समाज और सरकार एक साथ शामिल होंगे। तब पद्मसी की बातों की कुछ लोगों ने आलोचना भी की थी। पर आज जब शौचालय या स्वच्छता की बात की जाती है, तो इसे जागरूकता के मानक या प्रतीक के तौर पर हम देखते हैं। कह सकते हैं कि हमारे दौर में आधुनिक चेतना की जो ब्रांडिंग हुई है, स्वच्छता और शौचालय उससे जुड़े अहम कारक बन गए हैं। दिलचस्प है यह देखना कि शौचालय के साथ मानवीय सभ्यता ने ‘रूढ़ता’ से लेकर आधुनिक

खास बातें ‘टॉयलेट’ शब्द फ्रेंच भाषा के ‘टॉयलेटी’ शब्द से बना है हड़प्पा सभ्यता में हर घर में पानी से संचालित होने वाले टॉयलेट थे भारत में पहला स्वच्छता बिल 1878 में आया था


02 आवरण कथा

यदि कोई व्यक्ति अपनी स्वच्छता के साथ दूसरों की स्वच्छता के प्रति संवेदनशील नहीं है तो ऐसी स्वच्छता बेईमानी है। उदाहरण के लिए इसे अपना घर साफ कर कूड़ा दूसरे घर के बाहर फेंक देने के रुप में देखा जा सकता है। अगर सभी लोग ऐसा करने लगें, तो ऐसे में तथाकथित स्वच्छ लोग अस्वच्छ वातावरण तथा अस्वच्छ समाज का ही निर्माण करेंगे –महात्मा गांधी

13 - 19 नवंबर 2017

‘जागरूकता’ तक की एक ऐसी यात्रा पूरी की है, जो दिलचस्प तो है ही, अपने आप में खासी क्रांतिकारी भी है।

‘टॉयलेट’ शब्द की उत्पत्ति

‘टॉयलेट’ (शौचालय) शब्द फ्रेंच भाषा के ‘टॉयलेटी’ शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है कपड़ा या रैपर। शुरुआत में इस शब्द का इस्तेमाल एक ऐसे कपड़े के लिए किया जाता था, जो ऊपर से ओढ़ा जा सके। बाद में इसका इस्तेमाल ड्रेसिंग टेबल को कवर करने वाले कपड़े के तौर पर किया जाने लगा। फिर ये शब्द शौचालय के लिए चलन में आया।

भारत में ‘टॉयलेट’ की शुरुआत

कहीं न कहीं इस बात को जरूर रेखांकित करता है कि स्वच्छता और स्वास्थ्य को लेकर चेतना हमारी सभ्यतागत परंपराओं में रही है, यह और बात है कि कथित आधुनिकता की समझ में हमारे ये संस्कार हमारे व्यवहार से बाहर होते गए।

अखिल चंद्र सेन की चिट्ठी

व्यवस्थित शौचालयों का निर्माण

भारत में व्यवस्थित शौचालयों का निर्माण सबसे पहले मुगल बादशाहों ने 1556 में करवाना शुरू किया, लेकिन ये टॉयलेट सिर्फ अमीरों के लिए ही हुआ करते थे। मुगलकाल में ही कुछ जगहों पर पब्लिक टॉयलेट की पहल भी शुरू की गई, लेकिन वो सफल नहीं हो सकी। इतिहास के इस तथ्य से इस बात को बखूबी समझा जा सकता है कि कैसे शौचालय या स्वच्छता को भी सामाजिक विभेद का आधार बनाया गया। राजसी दौर से लेकर सामंती दौर तक यह आधार इस कदर गहराया कि इसने सामाजिक असमानता की जगह ले ली और इस असमानता की धारणा-मान्यता का समाज के दबंगों ने अपनेअपने तरीके से खूब फायदा उठाया। पर यह स्थिति भी कालांतर में टूटी, क्योंकि जो सामाजिक जागरूकता शिक्षा और दूसरे कारणों से आई, उससे यह बात लोग धीरे-धीरे समझने लगे कि शौचालय उनके लिए सुविधा नहीं, बल्कि स्वच्छता की एक जरूरत है।

पहला स्वच्छता बिल

भारत में हड़प्पा सभ्यता के समय व्यवस्थित टॉयलेट के नमूने मिले हैं। यह 2500 ईसा पूर्व की बात है। हड़प्पा सभ्यता के लोथल नगर में हर घर में पानी से संचालित होने वाले टॉयलेट हुआ करते थे। ईंट और चिकनी मिट्टी से बने इन टायलेट्स में मेनहोल और चैंबर हुआ करता था, जहां जाकर मल इकट्ठा होता था, लेकिन इस सभ्यता के खत्म होने के बाद से ही टॉयलेट की ये शैली भी खत्म हो गई। पर यह तथ्य

मुताबिक ड्राई लैट्रिन बनाना और इसे हाथों से साफ कराना अपराध माना गया।

इस तरह देश में धीरे-धीरे शौचालय की जरूरत लोगों को समझ में आने लगी। भारत में पहला स्वच्छता बिल 1878 में आया, जिसके तहत भारत की तत्कालीन राजधानी कोलकाता की झुग्गी बस्तियों में टॉयलेट बनाना जरूरी कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1993 में दूसरा एक्ट पारित हुआ। इसके

वर्ष 1909 तक भारत के ट्रेनों में टॉयलेट्स नहीं हुआ करते थे। यात्री गाड़ी रुकने के दौरान ही खुले में शौच के लिए जाया करते थे। ऐसे में कई बार ट्रेन भी छूट जाया करती थी। इस बारे में एक कथा काफी दिलचस्प है। एक बार पश्चिम बंगाल से अखिल चंद्र सेन नाम के एक शख्स सफर कर रहे थे। वे शौच के लिए बाहर निकले और गार्ड की सीटी सुनने के बाद खुद को संभाल नहीं सके और गिर पड़े। अखिल ने चिट्ठी लिखकर इस बात की सूचना रेलवे ऑफिस को दी। मजेदार तरीके से लिखी गई

भारत में व्यवस्थित शौचालयों का निर्माण सबसे पहले मुगल बादशाहों ने 1556 में करवाना शुरू किया, लेकिन ये टॉयलेट सिर्फ अमीरों के लिए ही हुआ करते थे


13 - 19 नवंबर 2017

इन चुनौतियों से भी निपटना होगा

हा

आवरण कथा

03

देश में मैन्युअल स्कैवेंजिंग की मैली प्रथा जहां आज भी जारी है, वहीं कचरे को लेकर एक टिकाऊ प्रबंधन की दरकार है

थ से मैला ढोना (मैन्युअल स्कैवेंजिंग) भारत में प्रतिबंधित है। इसी साल मार्च में राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने बताया कि देश में 26 लाख ऐसे शौचालय हैं जहां पानी नहीं है। जाहिर है वहां हाथ से मैला ढोना पड़ता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने अपने सर्वे में बताया है कि रिपोर्ट के मुताबिक साल 1993 से अब तक 1,370 सीवर वर्कर्स की मौत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मृतकों के परिवारों को 10 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया था। 1370 में से सिर्फ 80 परिवारों को ही मुआवजा मिला है। 2013-14 में मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए 557 करोड़ का बजट रखा गया था, जबकि 2017-18 के बजट में सिर्फ 5 करोड़ रखा गया है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 1,57,478 टन कचरा हर रोज इकट्ठा होता है, लेकिन सिर्फ 25.2 फीसदी के निपटारे (ट्रीटमेंट

1909 तक भारत के ट्रेनों में टॉयलेट्स नहीं हुआ करते थे। यात्री गाड़ी रुकने के दौरान ही खुले में शौच के लिए जाया करते थे। ऐसे में कई बार ट्रेन भी छूट जाया करती थी

एंड मैनेजमेंट) के लिए ही प्रबंध है। बाकी सारा कूड़ा खुले में पड़ा रहता है और प्रदूषण फैलाता रहता है और दिल्ली के गाजीपुर में हुए हादसे जैसे खतरे भी पैदा करता है। कचरे के प्रबंधन के लिए

विश्व शौचालय दिवस और डॉ. पाठक

इस चिट्ठी में टॉयलेट न होने के कारण परेशानियों का जिक्र था। इसके बाद से ही ट्रेन में टॉयलेट की सुविधा दी जाने लगी। यह चिट्ठी आज भी दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में देखी जा सकती है।

स्वच्छता और गांधी

दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद महात्मा गांधी सबसे पहले सार्वजनिक तौर पर चंपारण में सक्रिय दिखे। चंपारण में अंग्रेज निलहों के अत्याचार से किसानों को मुक्त कराने के लिए उन्होंने जिस सत्याग्रह का रास्ता चुना, उसमें स्वच्छता और शिक्षा जैसी रचनात्मक पहल शामिल थी। गांधी जी ने एक बार कहा था, ‘स्वच्छता आजादी से महत्त्वपूर्ण है।’

स्वतंत्र भारत में स्वच्छता

भारत में स्वच्छता सुविधाओं में सुधार लाने तथा स्वच्छ पेयजल सभी के लिए उपलब्ध कराने के लिए एक प्रशंसनीय कार्य किया गया है। भारत में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि अस्वच्छ परिवेश कई रोगों के फैलाव के लिए आधार बनाता है जो स्वच्छता के रूप में लोगों के कल्याण के साथ गहरा संबंध रखती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन मानें तो प्रदूषित पानी 80 प्रतिशत रोगों का मूल कारण है, जो अपर्याप्त स्वच्छता और सीवेज निपटान विधियों

पहला कदम घर-घर से कूड़ा उठाना है, लेकिन शहरों में अभी ये आंकड़ा सिर्फ 49 फीसदी ही पहुंचा है। बीते एक साल में इसमें महज 7 फीसदी का ही सुधार आया है।

सिं

गापुर में आयोजित वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गनाइजेशन के एक सम्मेलन के दौरान डॉक्टर विन्देश्वर पाठक के मन में ‘विश्व शौचालय दिवस’ मनाने का विचार आया। उस सम्मेलन में उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी, जिन्हें का परिणाम है। आज भी बड़ी संख्या में लोग खुले स्थान पर मल त्याग करते हुए जलाशयों और पानी के अन्य खुले प्राकृतिक संसाधनों को संदूषित करते हैं। इससे प्रदर्शित होता है कि लोगों को स्वच्छता के महत्व पर जानकारी देने और शहरी तथा ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में स्वच्छता पूर्ण विधियों के उपयोग की शिक्षा देने की आवश्यकता है। अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं और जागरूकता की कमी के कारण अनेक स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं जैसे पेट में कीड़े, जो आम तौर पर

स्वच्छता प्रिय थी और स्वच्छता के क्षेत्र में उनका अप्रतिम योगदान था, उनके जन्म-दिन 19 नवंबर को ‘विश्व शौचालय दिवस’ के रूप में मनाने का सुझाव दिया। उनका यह प्रस्ताव 2013 में सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। सिंगापुर के राजदूत ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को पत्र लिखकर इस दिन को ‘विश्व शौचालय दिवस’ के रूप में मनाने का आग्रह किया और संयुक्त राष्ट्र ने इसकी स्वीकृति देते हुए 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस के रूप में घोषित कर दिया। मानवीय गोल कृमि और मानवीय हुक वर्म। इस रोग की दर आम तौर पर अर्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कम आय वर्ग में बहुत अधिक होती है।

एमडीजी

विश्व की आबादी में 2.6 बिलियन यानी 40 प्रतिशत लोगों के पास अब तक शौचालय नहीं है और यही कारण है कि स्वच्छता, संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। इस लक्ष्य को लेकर भारत ने भी अपनी

स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों और सरकारी विभागों की ही जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि यह एक बहुसाझेदारी वाला राष्ट्रीय अभियान है। लगभग सौ वर्ष पूर्व गांधी जी ने शौचालय की सफाई स्वयं करके अपने प्रयासों से यह हमें सिखाने की कोशिश की थी –रामनाथ कोविंद


04 आवरण कथा

13 - 19 नवंबर 2017 प्रतिबद्धता दिखाई है। इस लक्ष्य को पाने के लिए भारत में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा निधिकरण कई गुना बढ़ाया गया है। पानी की आपूर्ति और स्वच्छता भारत के संविधान के तहत और 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के तहत राज्य का दायित्व है, राज्यों द्वारा यह दायित्व और अधिकार पंचायती राज संस्थानों (पीआरआई) और शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को दिए गए हैं।

निर्मल भारत

अगर स्वच्छ भारत कार्यक्रम का सफलतापूर्वक लागू किया जाता है तो भारत ‘शक्तिशाली आधुनिक अर्थव्यवस्था’ बन सकता है – प्रणब मुखर्जी

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने 2012 से 2022 के दौरान ग्रामीण स्वच्छता और सफाई कार्यनीति तैयार की है। इस कार्यनीति का मुख्य प्रयोजन निर्मल भारत के संकल्प को साकार करने की रूपरेखा प्रदान करना और एक ऐसा परिवेश बनाना है जो स्वच्छ तथा स्वास्थ्यकर है। निर्मल भारत, एक स्वच्छ और स्वस्थ राष्ट्र का सपना है, जो ना‍गरिकों के कल्याण का प्रयास करता है और इसमें योगदान देता है। इस संकल्पना में एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की गई है, जहां खुले स्थान पर मल त्याग की पारंपरिक प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए, प्रत्येक व्यक्ति को सम्मा‍न दिया जाए और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार ने कार्यनीति बनाई है।

संपूर्ण स्वच्छता अभियान

भारत सरकार का केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1986 में आरंभ हुआ। अब इसे संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) के रूप में रूपांतरित किया गया है। टीएससी द्वारा उन घरों को निधिकरण के लिए सफलतापूर्वक प्रोत्साहन दिया गया है कि वे अपने घरों में शौचालय का निर्माण कराएं और वंचित समूहों को इसके लिए वित्तीय प्रोत्साहन भी दिए गए हैं। सरकारी निधि के साथ ग्रामीण सैनीटरी मार्ट और उत्पादन केंद्रों का एक राष्ट्राव्यापी नेटवर्क ग्रामीण स्तर पर बनाया गया है, जबकि इन्हें प्राथमिक रूप से स्था‍नीय शासन, गैर सरकारी संगठनों और

पानी की आपूर्ति और स्वच्छता भारत के संविधान के तहत और 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के अंतर्गत राज्य का दायित्व है

समुदाय आधारित संगठनों द्वारा चलाया जाता है। ये मार्ट और उत्पादन केंद्र स्वच्छ शौचालयों और अन्य सुविधाओं के निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करते हैं। ये आउटलेट उन लोगों के लिए परामर्श केंद्र के रूप में भी कार्य करते हैं, जो अपने घरों में शौचालय का निर्माण कराने में दिलचस्पी रखते हैं। इससे आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा मिला है, 138 मिलियन ग्रामीण घरों की जरूरतें पूरी करते हुए

स्वच्छता और सफाई को प्रोत्साहन दिया गया है। टीएससी एक सफलता की कथा है और इससे पिछले कुछ वर्षों में हजारों गांवों में खुले स्थानों पर मल त्याग की प्रथा (ओडीएफ) को समाप्त किया गया है। शहरी क्षेत्रों के लिए 2008 में शहरों में स्वच्छता प्रावधानों में तेजी लाने के लिए राष्ट्रीय शहरी स्वच्छता नीति आरंभ की गई थी।

ग्रामीण स्वच्छता

कार्यनीति खुले स्थान पर मल त्याग की पारंपरिक आदत को पूरी तरह समाप्त करना और इसे इतिहास की घटना बना देना ठोस और तरल अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन के लिए प्रणालियों को प्रचालित करना उन्नत स्वच्छता व्यवहारों को अपनाने के लिए बढ़ावा देना महिलाओं, बच्चों, वृ‍द्ध और विकलांग व्यक्तियों पर विशेष ध्यान सहित इसकी पहुंच में असमानता को संबोधित करना सुनिश्चित करना कि प्रदाता के पास इस स्तर पर सेवाओं की प्रदायगी की क्षमता तथा संसाधन हैं ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य , पर्यावरण और सुभेद्य वर्गों से संबंधित सार्वजनिक क्षेत्र एजेंसियों में सहयोग को उद्दीपित करना और समर्थ बनाना कार्यनीति के लक्ष्योंे को पूरा करने के लिए व्यापार, शिक्षा और स्वैच्छिक क्षेत्र के भागीदारों के साथ मिलकर कार्य करना

लक्ष्य संपूर्ण स्वच्छता पर्यावरण का सृजन (2017 तक): एक स्वच्छ‍ परिवेश की प्राप्ति और खुले स्थान पर मल त्याग की समाप्ति, जहां मानव मल अपशिष्ट का सुरक्षित रूप से प्रबंधन और निपटान किया जाता है। उन्नत स्वच्छता प्रथाएं अपनाना (2020 तक) : ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोगों को, खास तौर पर बच्चों और देखभालकर्ताओं द्वारा हर समय सुरक्षित स्वच्छता प्रथाएं अपनाना। ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन (2022 तक) : ठोस और तरल अपशिष्ट का प्रभावी प्रबंधन इस प्रकार करना कि गांव का परिवेश हर समय स्वच्छ बना रहे

निर्मल ग्राम पुरस्का‍र

टीएससी के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने निर्मल ग्राम पुरस्कार की शुरूआत की। एक नकद पुरस्कार के रूप में, यह पुरस्कार पूरी तरह कवर किए गए पंचायती राज संस्थानों और उन व्यक्तियों तथा संस्थानों को मान्यता देता है, जो अपने प्रचालन क्षेत्र में संपूर्ण स्वच्छता कवरेज सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य करते हैं। यह परियोजना जिले को एक इकाई के रूप में लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यान्वित की गई है।

स्वच्छ भारत अभियान

2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो स्वच्छता के संकल्प को राष्ट्रीय संकल्प बनाने की तैयारी शुरू हो गई। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में स्वच्छता को लेकर सबसे बड़ा कदम है। इसी वर्ष दो अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद झाड़ू उठाकर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की। इस साल दो अक्टूबर को इस अभियान के तीन वर्ष पूरे हो गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता के प्रति देश में आई जागरूकता की सराहना की। उन्होंने भरोसा जताया कि स्वच्छता को लेकर देश में आई जन-जागृति के चलते महात्मा गांधी की 150वीं जयंती, यानी 2019 तक इसे और अधिक सफलता मिलेगी। देशवासियों की मूल प्रकृति स्वच्छता को पसंद करने की है, लेकिन जब करने की बारी आती है तो प्रश्न उठ खड़ा होता है कि यह दायित्व किसका है? प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अगर 1000 महात्मा गांधी आ जाएं, एक लाख मोदी मिल जाएं, सभी मुख्यमंत्री मिल जाएं, सभी सरकारें भी मिल जाएं तो भी स्वच्छता का सपना नहीं पूरा हो सकता, लेकिन अगर सवा सौ करोड़ देशवासी मिल जाएं तो स्वच्छता का


खुले में शौच बीमारियों को खुला आमंत्रण

खु

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आवरण कथा

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खुले में शौच से जहां एक तरफ डायरिया, हैजा जैसे घातक संक्रमण-जनित रोगों के फैलने का खतरा रहता है, वहीं इससे भूजल प्रदूषित होता है

ले में शौच का मतलब बीमारियों को निमंत्रण देना है। खुले में शौच से डायरिया, हैजा जैसे घातक संक्रमण-जनित रोगों के फैलने का खतरा रहता है। आंकड़े बताते हैं कि पांच साल से कम उम्र के चार से पांच लाख बच्चे प्रतिवर्ष इन्हीं संक्रामक बीमारियों के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। महिलाओं के लिए खुले में शौच के लिए जाने की विवशता तो और भी भयावह है। शौचालय न होने की वजह से उन्हें अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएं सीधे तौर पर उनकी सुरक्षा से जुड़ी हुई हैं। दरअसल, स्वच्छता केवल मानव स्वास्थ्य के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए भी निहायत जरूरी है। बावजूद इसके भारत में पूर्ण स्वच्छता के सामने कई चुनौतियां हैं। लोगों के मन, वचन और कर्म में गहरे पैठी हुई आदतों को बदलना इतना आसान नहीं होता। खुले में पड़े हुए मल से न केवल भू-जल प्रदूषित होता है, बल्कि कृषि उत्पाद भी इस

प्रदूषण से अछूते नहीं रहते। यही मल डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी घातक बीमारियों के कीटाणुओं को भी फैलाता है। उचित शौचालय न केवल प्रदूषण और इन बीमारियों से बचने के लिए जरूरी है, बल्कि एक साफ-सुथरे सामुदायिक पर्यावरण के लिए भी जरूरी हैं क्योंकि शौचालय ही वो स्थान है, जहां मानव मल का एक ही स्थान पर निपटान संभव है, जिससे पर्यावरण साफसुथरा सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे मानव मल में मौजूद जीवाणु हमारे जल, जंगल, जमीन को प्रदूषित नहीं कर पाते हैं। जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण और लोगों

की भलाई ये सारे पक्ष आपस में जुड़े हुए हैं। प्रदूषित जल का पीना, मल का ठीक से निपटान न करना, व्यक्तिगत और खाद्य पदार्थों के स्वास्थ्य और सफाई की कमी, कचरे का ठीक से प्रबंधन न होना भारत में बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है। यहां हर साल लगभग 5 करोड़ लोगों को जल जनित बीमारियों का शिकार होना पड़ता है। दूषित पेयजल से स्वास्थ्य को जो सबसे बड़ा और आम खतरा है वो है मानव और पशु मल और उसमें मौजूद छोटे-छोटे जीवांश का संक्रमण। आमतौर पर हम इसे ‘ई-कोलाई’ के नाम से जानते हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों ने भी यह साबित कर दिया है कि खुले में शौच को रोककर और गांवों को निर्मल बनाकर ही हम न केवल पेयजल के प्रदूषण को कम कर सकते हैं, बल्कि इससे गांव प्रदूषण मुक्त होने के साथ-साथ डायरिया, हैजा, टाइफाइड और अन्य संक्रामक रोगों से भी मुक्त होंगे। बेहतर स्वच्छता सुविधाएं लोगों के स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि उनके आर्थिक और सामाजिक विकास को भी बेहतर बनाती हैं। सपना पूरा होकर के रहेगा।’

सार्वभौमिक स्वच्छता पंचायती राज संस्थानों कवरेज प्राप्त करने में संगठनों को उनके द्वारा किए गए द्वारा निभाई जाने वाली उत्प्रेरक प्रयासों को स्थायी बनाने के की भूमिका को मान्यता देकर लिए प्रोत्साहन देना, ताकि वे टीएससी कार्यान्वयन में संपूर्ण स्वच्छता कवरेज के मार्ग सामाजिक प्रेरणा से अपने क्षेत्र में खुले स्थान को बढ़ाना पर मल त्याग की प्रथा को समाप्त कर सकें

खुले स्थान पर मल त्याग रहित और स्वच्छ ग्रामों का विकास करना जो अन्य लोगों के अनुकरण के लिए मॉडल के रूप में कार्य करेंगे

ग्रामीण भारत में विकास के लिए सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में अग्रणी बनने के लिए स्वच्छता लाना

निर्मल ग्राम पुरस्कार

स्वच्छाग्रह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को आरंभ से समझते रहे हैं कि स्वच्छ भारत का संकल्प तभी पूरा होगा जब सरकार और समाज का साझा पुरुषार्थ प्रकट होगा। इसीलिए उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को लेकर कहा, ‘अगर समाज की शक्ति को स्वीकार करके चलें, जन-भागीदारी को साथ लेकर चलें, सरकार की भागीदारी को कम करके चलें, तो भी स्वच्छता का आंदोलन तमाम रुकावटों के बावजूद सफल होकर रहेगा।’ तीन साल पूरा होने पर भारत स्वच्छता की दिशा में जितना आगे बढ़ चुका है, वह जहां अब तक की प्रगति को संतोषजनक मानने के लिए पर्याप्त है, वहीं अब तक की सफलता इस मिशन की सफलता का भरोसा जगाता है। इस बात को प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार करते हुए कहा है- ‘अब यह अभियान न बापू का है और न ही सरकारों का है। आज स्वच्छता अभियान देश के सामान्य मानव का अपना सपना बन चुका है। ... अब तक जो भी सिद्धि मिली है, वह सरकार की सिद्धि नहीं है। अगर सिद्धि मिली है तो यह स्वच्छाग्रही देशवासियों की सिद्धि है। उन्होंने कहा कि बापू के स्वराज का शस्त्र था सत्याग्रह। श्रेष्ठ भारत का शस्त्र है स्वच्छाग्रह। स्वराज के

हम विकासशील देशों में प्रचलित एड्स, टीबी, मलेरिया अथवा अन्य एेसी बीमारियों से तब तक छुटकारा नहीं पा सकते, जब तक हम पीने का साफ पानी, स्वच्छता और मूलभूत स्वास्थ्य के साथ जारी जंग न जीत लें - कोफी अन्नान


06 आवरण कथा

13 - 19 नवंबर 2017

सर्वे में मिशन ने मारी बाजी

स्वच्छता मिशन से सबसे ज्यादा सुधार ग्रामीण इलाकों में आया है, जहां ​िबना शौचालय वाले घरों की तादाद घटकर 32.5 प्रतिशत रह गई है

किसी को भी सड़क पर न थूकना चाहिए और न ही नाक साफ करना चाहिए – महात्मा गांधी

स्व

च्छ भारत मिशन के तीन सालों में शौचालय निर्माण के कुछ विरोधाभासी आंकड़े और खबरें भी आई हैं। खासतौर पर शौचालय निर्माण और उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) ने ग्रामीण इलाकों में एक व्यापक सर्वेक्षण के जरिए देखना चाहा कि सेवा दायरे और गुणवत्ता के लिहाज से किए गए वादे से कितना मेल खाती है। क्यूसीआई प्रमाणन (एक्रीडिटेशन) की एक राष्ट्रीय संस्था है, जिसने साफ-सफाई का मूल्यांकन अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया है। क्यूसीआई के सर्वेक्षण का नाम है, स्वच्छ सर्वेक्षण (ग्रामीण)- 2017। इसके अंतर्गत 700 जिलों के 140,000 घरों का जायजा लिया गया है। सर्वेक्षण में शामिल हर घर की जियो-टैगिंग (भौगोलिक आधार पर नाम देना) हुई ताकि सर्वेक्षण को लेकर कोई संदेह न रह जाए। सर्वेक्षण में तकरीबन छह माह लगे और सर्वेक्षण 2017 के अगस्त महीने में पूरा हुआ, जिससे कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष निकले। स्वच्छता मिशन की आलोचना करते हुए

बताया गया कि बने हुए टॉयलेट में अनाज रखा जा रहा है लेकिन सर्वे का निष्कर्ष यह है कि टॉयलेट की तादाद और इस्तेमाल में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। योजना के तीन साल बाद कहा जा सकता है कि लोगों की टॉयलेट जाने की आदतों में स्पष्ट अंतर आया है, खासकर ग्रामीण भारत में। 2011 की जनगणना के मुताबिक 10 में से 5 घरों में टॉयलेट नहीं थे यानी तकरीबन 50 फीसदी परिवारों के घर टॉयलेट विहीन थे। ग्रामीण इलाकों में 10 में से 7 घरों में टॉयलेट सुविधा नहीं थी, जबकि शहरों में 10 में से 2 परिवारों के सदस्य खुले में टॉयलेट जाने पर मजबूर थे। किंतु सर्वेक्षण कहता है कि 10 में से 3 से भी कम घरों (26.75 फीसदी) अब टॉयलेट नहीं हैं। सबसे ज्यादा सुधार ग्रामीण इलाकों में आया है, जहां ऐसे घरों की तादाद घटकर 32.5 प्रतिशत रह गई है, जहां टॉयलेट नहीं है। जबकि, 2011 की जनगणना में ऐसे घरों की तादाद 69 प्रतिशत थी। यानी तीन वर्षों में वहां टॉयलेट की संख्या दोगुनी बढ़ी है। शहरी इलाकों में टॉयलेट रहित घरों की संख्या 18 से घटकर 14.5 फीसदी रह गई है।

स्वच्छ सर्वेक्षण 2016 में 73 शहरों को शामिल किया गया था। इसमें से 54 शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) के मामले में अपने अर्जित अंकों में इजाफा किया है केंद्र में सत्याग्रही थे और स्वच्छाग्रह के केंद्र में स्वच्छाग्रही हैं।’

स्वच्छता की रैंकिंग

स्वच्छता की रैंकिंग के चलते नेताओं एवं अफसरों पर समाज का सकारात्मक दबाव पड़ रहा है। आज घर-घर के छोटे बच्चे स्वच्छता के सबसे बड़े एंबेसडर बन गए हैं। वह घर में ही गंदगी देखने पर

बड़ों को टोकने लगे हैं, जिससे लोगों के स्वभाव में परिवर्तन आने लगा है। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, ‘तीन सालों में स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच में बड़ा बदलाव आया है। पहले स्कूलों में बच्चों से सफाई का काम देखकर लोग भड़क जाते थे। लेकिन आज बच्चे स्कूल में स्वच्छता से जुड़ते हैं तो टीवी की बड़ी खबर बन जाती है।’ उन्होंने स्वच्छता के प्रति जागरूता बढ़ाने के लिए मीडिया की भी

जहां तक इस्तेमाल की बात है तो टॉयलेट सुविधा वाले 10 में से 9 घरों (91.29 प्रतिशत) में इसका इस्तेमाल हो रहा है। यही शहरी इलाकों में हुआ। स्वच्छ सर्वेक्षण 2016 में 73 शहरों को शामिल किया गया था। इसमें से 54 शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) के मामले में अपने अर्जित अंकों में इजाफा किया है। कोई कह सकता है कि खुले में टॉयलेट से मुक्त घोषित शहर में अब भी यह जारी है लेकिन, ऐसे मामले इक्कादुक्का ही मिलेंगे। भले शत-प्रतिशत कामयाबी नहीं मिली है, लेकिन स्वच्छ भारत मिशन के विशाल आकार को देखते हुए क्या 90 प्रतिशत से ज्यादा का आंकड़ा उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है? मिशन के कारण शहरों और जिलों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हुई है। स्व-सहायता समूह, स्वयंसेवी संस्थाएं और इलाके के जाने-माने लोगों ने योगदान दिया है और नतीजे साफ दिखाई दे रहे हैं। बेशक, मिशन को सरकार का सहारा है, लेकिन यह सामाजिक परियोजना है और हम सब इसके भागीदार और संचालक हैं। इस योजना का एक पक्ष अगर स्थानीय निकायों को धन तथा संसाधन मुहैया कराना है तो दूसरा पक्ष जाति, लिंग और गरीबी का है जो उतना ही महत्वपूर्ण है। योजना का मापन, उसके दर्जे का निर्धारण और साथ ही खुले में टॉयलेट के चलन पर अंगुली उठाना तथा ऐसा करने वालों को शर्मिंदा करना- ये तीन काम स्वच्छ भारत मिशन से जुड़े हैं, जो कारगर साबित हुए हैं। हमें इस फार्मूले का इस्तेमाल कामकाज के अन्य क्षेत्रों में भी करना चाहिए। रेलवे एंड पोर्ट (बंदरगाह) अथॉरिटी ने इससे मिलती-जुलती परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। ढांचागत सुविधाओं के साथ व्यवहार में आए बदलाव का भी आकलन जरूरी है। सफाई की समस्या को सिर्फ कंक्रीट के ढांचे खड़े करके दूर नहीं किया जा सकता। अगर इसे लेकर जन आंदोलन चले, साथ ही गति देने के लिए जमीनी तैयारी हो और किए गए काम के असर का आकलन किया जाए तो नतीजे ज्यादा तेजी से आएंगे। जमकर सराहना की।

चुनौती के लिए आलोचना मंजूर

स्वच्छता मिशन की तीसरी वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री ने साफ किया कि 2022 तक दुनिया में देश को आगे बढ़ा के रखना है। चुनौतियों के लिए देश को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार सिर्फ वाहवाही वाले काम हाथ में नहीं ले सकती। तीन साल पहले


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अगर समाज की शक्ति को स्वीकार करके चलें, जन-भागीदारी को साथ लेकर चलें, सरकार की भागीदारी को कम करके चलें, तो भी स्वच्छता का आंदोलन तमाम रुकावटों के बावजूद सफल होकर रहेगा – नरेंद्र मोदी ‘स्वच्छ भारत अभियान’ शुरू होने पर भी उनकी बहुत आलोचना शुरू की गई थी। गांधी जयंती की छुट्टी खराब करने जैसे आरोप लगाए गए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, ‘मेरा स्वभाव है कि बहुत कुछ चुपचाप झेलता हूं। धीरे-धीरे अपनी कैपिसिटी बढ़ा रहा हूं झेलने की।’ उन्होंने ‘स्वच्छता ही सेवा’ के तहत 15 दिनों में फिर से स्वच्छता को गति देने के लिए लोगों को बधाई दी। उन्होंने देशवासियों का आह्वान किया कि श्रेष्ठ भारत बनाने के लिए थोड़ा-थोड़ा स्वच्छता के कार्य में सबको जुटना होगा।

ओडीएफ राज्यों की संख्या

स्वच्छ भारत अभियान के तीन वर्ष पूरा होने के अवसर पर पांच और राज्यों मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और हरियाणा ने अपने सभी शहरों और कस्बों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया है। इसकी घोषणा केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्वच्छ भारत अभियान की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान की। देश भर में शहरी क्षेत्रों में अभियान की प्रगति के संबंध में जानकारी देते हुए पुरी ने कहा कि 66 लाख व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 38 लाख शौचालयों का निर्माण किया जा चुका है और 14 लाख शौचालयों का निर्माण प्रगति पर है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत 5 लाख सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों के लक्ष्य के मुकाबले 2 लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण अब तक किया जा चुका है। पुरी ने कहा की अब ठोस कचरा प्रबधंन पर विशेष जोर दिया जा रहा है और शहरी क्षेत्रों में पूरे ठोस कचरे को परिवर्तित कर 500 मेगावॉट बिजली और 50 लाख टन से अधिक कूड़े से खाद बनाने के प्रति प्रयास जारी है। पुरी ने कहा की स्वच्छता जन्मसिद्ध अधिकार होने के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है। उन्होंने जानकारी दी कि एक पखवाड़े तक चले ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान में शहरी क्षेत्रों में 80 लाख से अधिक लोगों ने 3.5 लाख से अधिक गतिविधियों में भागीदारी की है। स्वच्छता कवरेज बढ़ा सरकारी आंकड़ो के अनुसार 85 प्रतिशत से अधिक लोग अब शौचालयों का उपयोग कर रहे हैं। स्वच्छता का कवरेज स्वच्छ भारत मिशन लांच के समय 39 प्रतिशत था। अब यह बढ़कर 67.5 प्रतिशत हो गया है। 2,39,000 गांव और 196 जिले खुले में शौच मुक्त हो चुके हैं। यह अपने आप में बड़ी सफलता है। यूनिसेफ ने ताजा स्वतंत्र सर्वेक्षण

आवरण कथा

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जो सभ्यता अपना अपने समाज में सफाई न रख सके, वह अपने को कैसे आगे बढ़ाएगी – स्वामी विवेकानंद


08 आवरण कथा

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हमें एक सुंदर और खूबसूरत सी दुनिया मिली थी, लेकिन हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं। हमें जरूरत है स्वच्छता की। आईए स्वच्छता का प्रण लें – अमिताभ बच्चन

(जो 12 राज्यों के 10000 अलग-अलग परिवारों पर आधारित है) में पाया कि खुले में शौच मुक्त होने पर प्रति एक परिवार ने समय, दवाइयों पर खर्च और जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा के माध्यम से साल में पचास हजार रुपए की बचत की। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परमेश्वरन अय्यर के मुताबिक भारत सरकार स्वच्छ

भारत अभियान को लेकर बेहद गंभीर है। सरकार किसी भी कीमत पर इस में सफलता हासिल करना चाहती है। सरकार के सभी मंत्रालयों को यह आदेश दिया गया है कि वह हर महीने में एक बार कार्यालय में सफाई अभियान के तहत साफ-सफाई करें। सरकार 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त करना चाहती है। थर्ड पार्टी सर्वेक्षण के हवाले से उन्होंने दावा किया कि 91 प्रतिशत लोग शौचालय का उपयोग कर रहे हैं। पानी की कमी को मानते हुए उन्होंने ओडीएफ गांव को पानी मुहैया कराने में प्राथमिकता देने की बात कही। उनके अनुसार ग्रामीण पैन में कम पानी खर्च होता है, सरकार सूखे गड्ढ़े वाले और जैव शौचालय को बढ़ावा देना चाहती है, ताकि पानी बच सके। उनका मानना है कि व्यवहार में बदलाव के बिना इस अभियान में सफल नहीं हो सकते। इसीलिए सरकार ने अडवाइजरी जारी की है। अय्यर का कहना है कि अब लोग सफाई के महत्व को महसूस करने लगे हैं तभी तो कई गांवों ने शौचालय बनाने के लिए दिए गए सरकार के पैसे

वापस कर दिए बिजनौर जिले का मुबारकपुर गांव इस का एक उदाहरण है।

चार लाख गांव ओडीएफ होने हैं

प्रश्न यह है कि भारत में वह कौन से कारण हैं जो खुले में शौच मुक्त होने में बाधक हैं। पिछले तीन वर्षों में सफाई से संबंधित जो कुछ प्रकाश में आया उसमें आमतौर पर लोगों ने गंभीरता से काम किया और अपने क्षेत्रों को ओडीएफ बना लिया। पर कहीं न कहीं मंजिल अभी दूर है। आधिकारिक आंकड़ो के बारे में बात करें तो अब भी 6,40,867 गांवों में से 4,01,867 गांवों खुले में शौच से मुक्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। 511 जिलों को ओडीएफ होना है। इसी प्रकार, स्वच्छता का कवरेज 67.5 प्रतिशत होने की घोषणा की गई है, लेकिन देश के बड़े राज्यों, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और केरल में यह केवल 50 प्रतिशत तक है। इस स्थिति को बदलने के लिए अधिक काम और ध्यान की आवश्यकता है। वैसे इस वर्ष सौ प्रतिशत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो योजना बनाई गई है उस से स्थिति के बदलने की आशा की जा सकती है।

‘स्वच्छ सभ्य स्थान’

स्वच्छता कार्य योजना के अंतर्गत 76 मंत्रियों को 12000 करोड़ रूपए दिए गए हैं। 100 प्रसिद्ध स्थानों को साफ करने के लिए ‘स्वच्छ सभ्य स्थान’ का नाम दिया गया है। इसमें 20 स्थान ऐसे हैं, जिनकी दूरी बहुत अधिक है। नमामी गंगे कार्यक्रम के तहत 4500 गंगा किनारे के गांवों को ओडीएफ किया जाना है। स्वच्छता पखवाड़े में सभी मंत्री और उनके विभाग स्वच्छता से जुड़े विभिन्न क्रिया-कलापों से जुड़े। जिला स्वच्छ भारत प्रेरक के रूप में 600 युवा पेशेवर निजी क्षेत्र के फंड की सहायता से जिले का विकास करेंगे। इस परियोजना को लागू करने के लिए स्वच्छ भारत कोष से 660 करोड़ रुपए दिए गए हैं।


स्क्वेटर्स बेहतर या सिटर्स

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स्वास्थ्य

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शौच को लेकर परंपराअों का इतिहास भ्‍ाा ही पुराना है। दिलचस्प यह कि इसमें भारतीय परंपरा पाश्चात्य परंपरा से हर लिहाज से बेहतर रही है

आंतरिक स्वच्छता पहली वस्तु है, जिसे पढ़ाया जाना चाहिए। बाकी बातें इसे पढ़ाने के बाद ही लागू की जानी चाहिए –महात्मा गांधी

एसएसबी ब्यूरो

भिनेत्री विद्या बालन जब घर-घर शौचालय बनाने के अपने अभियान के लिए विज्ञापन में कहती हैं कि ‘जहां सोच, वहीं शौचालय’, तो इस बात का अर्थ सिर्फ शौचालय को लेकर लोक शिक्षण या लोक जागरुकता भर से नहीं जुड़ा है। शौच और उससे जुड़ी आदतों और परंपराओं का इतिहास भी उतना ही पुराना है, जितना धरती पर जीवन का। ज्यादातर वैज्ञानिकों की राय यह है कि धरती पर मनुष्य का इतिहास करीब 60 लाख वर्ष पुराना है। कह सकते हैं शौच से लेकर सोच की जड़ें भी इतिहास में तकरीबन इतनी ही गहरी हैं। दुर्भाग्य से मनुष्य के शरीर और जीवन से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया के बारे में या तो हम बहुत कम जानते हैं या जो जानते भी हैं, वह शोध तथ्यों पर नहीं, बल्कि धारणाओं के आधार पर बनी राय है। इस कारण कई भ्रामक धारणाएं हमारे बीच कायम हैं। इन धारणाओं में पूर्व और पाश्चात्य का भेद भी खूब है। मसलन, आमतौर पर भारत में शिक्षित लोग अपनी परंपराओं को दकियानूसी नजरिए से देखते

रहे हैं। इसके उलट पश्चिमी प्रचलन और परंपराओं को लेकर ललक हमारे यहां खूब देखी जाती है। दिलचस्प यह कि हमें ये परंपराएं विज्ञान सम्मत भी लगती रही हैं। मल विसर्जन के पाश्चात्य तरीके को ही लें, जिस तेजी के साथ हमने इसे अपनाया वह दंग कर देने वाली स्थिति है। दिलचस्प यह कि चिकित्सा विज्ञानियों की तकरीबन पूरी जमात ने भी इसे अपनी तरह से स्वीकृति प्रदान की है। इस तरह की धारणाएं हमारे यहां तो पाश्चात्य ठप्पे के कारण संभ्रांत जीवनशैली का हिस्सा बन जाती हैं, जबकि अमेरिका जैसे देश में इस तरह के किसी प्रचलन को लेकर बहस होती है। बात सिटिंग टॉयलेट की करें तो इसको लेकर भारत में यही धारणा है कि यह पुराना तरीका है जो आज की फैशन डिमांड से पूरी तरह बाहर है। डॉ. मनोहर भंडारी अपने एक शोधपूर्ण लेख में बताते हैं कि 1978 के क्रिसमस के कुछ पहले की बात है, जब अमेरिकी राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर को गंभीर खूनी बवासीर (सिवियर हिमोरायड्स) के कारण हुए अत्यधिक कष्ट और दर्द ने इतना परेशान किया कि उन्हें एक दिन की छुट्टी लेनी पड़ी और एक शल्य

प्रसिद्ध आर्किटेक्ट एलेक्जेंडर कीरा ने 1966 में अपनी पुस्तक ‘द बाथरूम्स’ में स्पष्ट लिखा है कि स्क्वेटिंग पोजीशन मानव शरीर के लिए सर्वथा अनुकूल है

खास बातें ‘हमारा शरीर सिटिंग टॉयलेट के लिए बना ही नहीं है’ एनो रेक्टल एंगल सिटिंग पोजीशन में कम हो जाता है स्क्वेटिंग पोजीशन कोलोन कैंसर से बचाती है

क्रिया से गुजरना पड़ा। इजिप्ट के राष्ट्रपति अनवर सादात ने अपने परम मित्र की व्यथा से उद्वेलित होकर अपने देशवासियों से अपील की कि वे सभी जिमी कार्टर के लिए प्रार्थना करें। इस घटना के कुछ सप्ताह बाद ‘टाइम’ मैगजीन ने वहां के सुप्रसिद्ध प्रोक्टोलाजिस्ट डॉ.माइकेल फ्रेलिच से प्रेसिडेंट की बीमारी के बारे में पूछा तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया कि हमारा शरीर सिटिंग टॉयलेट के लिए बना ही नहीं है, बल्कि यह स्क्वेटिंग के लिए ही बना है। उन्होंने तब मीडिया को बताया था कि हिमोरायड्स में एनल केनाल की रक्त शिराएं (वेंस) फूल जाती हैं और कभी-कभी उनसे रक्तस्राव भी होने लगता है।


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फिजियोलॉजी का नजरिया स्क्वेटिंग पोजीशन में अपशिष्ट भोजन की एन्टीग्रेविटी यात्रा आसान हो जाती है

हम मिलकर इस बड़े देश को स्वच्छ बना सकते हैं। हमें संकल्प लेना चाहिए और स्वच्छता उपाय अपनाने चाहिए - प्रणब मुखर्जी

दि हम शौच की क्रिया की फिजियोलॉजी का एक बार पुनरावलोकन करें तो शौच के श्रेष्ठ तरीके को समझने में आसानी होगी। स्क्वेटिंग पोजीशन में जब दाईं जांघ का दबाव सिकम पर पड़ता है तो अपशिष्ट भोजन की ऊपर की तरफ की यानी एन्टीग्रेविटी यात्रा आसान हो जाती है। यदि यह अपशिष्ट पदार्थ ज्यादा देर तक सिकम या एसेन्डिंग कोलोन में रहेंगे तो मल कण एपेंडिक्स में प्रवेश कर सकते हैं, जो संक्रमण का कारण बन सकता है। यदि मल पदार्थ अधिक समय तक एसेन्डिंग कोलोन से रुकता है तो जल का अवशोषण होता रहता है लिहाजा मल कठोर हो जाता है और कब्ज का खतरा भी शुरू हो जाता है। सिटिंग पोजिशन में ही ऐसा सम्भव है, स्क्वेटिंग पोजिशन में इसी आशंका न के बराबर है। रेक्टम और एनल केनाल के संधि स्थल पर जो कोण यानी एंगल बनता है, उसे एनो रेक्टल एंगल कहा जाता है। इसे सबसे पहले नापा था 1966 में वैज्ञानिक टगर्ट ने। ‘टाउन सेंड लेटर फॉर डॉक्टर्स एण्ड पेशेन्ट्स’ शीर्षक से टगर्ट का एक लेख प्रकाशित हुआ। उन्होंने शौच की विभिन्न स्थितियों में एनो रेक्टल एंगल को नापा और पाया कि स्क्वेटिंग में यह कोण थोड़ा सीधा हो वैसे तो हिमोरायड्स मोटापे, एनल सेक्स और प्रिगनेंसी के कारण हो सकता है, परंतु सबसे बड़ा कारण है मल त्याग के समय का स्ट्रेन। सिटिंग पोजीशन में स्क्वेटिंग की अपेक्षा तीन गुना ज्यादा जोर लगता है, जिसके कारण रक्त शिराएं फूल जाती हैं। यही वजह है कि लगभग पचास प्रतिशत अमेरिकन इस रोग से ग्रस्त हैं। उन्होंने अपने चिकित्सा विज्ञान के ज्ञान तथा अनुभवों के आधार पर बताया था कि स्क्वेटिंग कोलोन कैंसर से भी बचाती है। हालांकि इसको लेकर वे जरूरी शोध पूरा नहीं कर सके। इजरायली शोधकर्ता डॉ. डोव सिकिरोव ने 2003 में किए अपने एक अन्य अध्ययन में पाया कि स्क्वेटर्स को मल निष्कासन में औसत 51 सेकेंड लगते हैं और सिटर्स को 130 सेकेंड। उनका यह शोध अध्ययन ‘डायजेस्टिव डिसीजेस एण्ड साइंसेज’ में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने इसके लिए एनो रेक्टल एंगल को जिम्मेदार ठहराया था, जो कि सिटिंग पोजिशन में कम हो जाता है और मल मार्ग को संकरा कर देता है। इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए जापानी चिकित्सकों ने मलाशय यानी रेक्टम में

जाता है, जिसके कारण मल निष्कासन में समय तथा जोर (स्ट्रेन) कम लगता है। आमतौर पर यह कोण करीब 90 डिग्री का होता है। इस कोण को यानी रेक्टम और एनल केनाल के जंक्शन (मिलन स्थल) को पुबो रेक्टेलिस मसल थामे रखती है। यदि यह मसल रिलैक्स रहती है तो रेक्टम और एनल केनाल एक सीध में आ सकते हैं तथा रास्ता खुल जाता है और यदि यह मसल कांट्रेक्टेड रहती है तो रेक्टम और एनल केनाल के बीच 90 डिग्री का कोण बनता है, जिसके कारण मल मार्ग संकरा हो जाता है। अप्रैल 2002 में ईरान के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सईद राद ने अपने एक क्लीनिकल अध्ययन के दौरान पाया कि सिटिंग टॉयलेट के समय एनो रेक्टल एंगल लगभग 92 डिग्री का रहता है, जबकि स्क्वेटिंग पोजिशन में यह कोण सामान्यतया 132 डिग्री से 180 डिग्री तक का हो जाता है। जिसके कारण मल का विसर्जन पूर्णरूपेण तथा आसानी से हो जाता है। उन्होंने 11 से 75 वर्ष के 21 पुरुषों तथा 9 महिलाओं पर दोनों ही स्थितियों में बेरियम एनिमा के माध्यम से अपने अनूठे क्लीनिकल अध्ययन को अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि सिटिंग पोजीशन के कारण रेक्टोसिल हो जाता है। डॉ. सईद ने पाया कि उकड़ू स्थिति में पुबो रेक्टेलिस मसल आसानी से पूरी तरह रिलैक्स हुई, जिसके कारण मल का निष्कासन पूर्णरूपेण शीघ्र सम्पन्न हो सका जबकि सिटिंग पोजीशन में पुबो रेक्टीलिस मसल के रिलैक्स न होने के कारण मल विसर्जन पूर्णरूपेण भी नहीं हो पाता है और रेक्टोसिल की भी आशंका बढ़ जाती है। रेडियो कंट्रास्ट साल्यूशन डाल कर वीडियोग्राफी की और पाया कि सिटिंग में एनो रेक्टल एंगल 100 डिग्री का होता है और स्क्वेटिंग पोजिशन में यह 126 डिग्री का हो जाता है। उनका यह अध्ययन ‘लोअर यूरिनरी ट्रेक्ट सिमटम्स’ नामक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ था। भंडारी अपने लेख में बताते हैं कि वैसे सिटिंग टॉयलेट के खिलाफ वैज्ञानिकों ने मोर्चा जिमी कार्टर को हुए कष्ट की घटना से काफी पहले ही खोल दिया था। दरअसल, 1960 और 1970 के दशक के दौरान इस अभियान ने अच्छा जोर पकड़ा। बोकूस की ‘गेस्ट्रोएंट्रोलाजी को-टेक्स्ट बुक’ (1964), जो कि उस समय की बेहद प्रचलित और मानक पुस्तक मानी जाती थी, में स्पष्ट लिखा है कि मल

जिमी कार्टर, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति त्याग के लिए स्क्वेटिंग ही आदर्श स्थिति है, जिसमें जांघें मुड़कर पेट को दबाती हैं। प्रसिद्ध आर्किटेक्ट एलेक्जेंडर कीरा ने 1966 में अपनी पुस्तक ‘द बाथरूम्स’ में स्पष्ट लिखा है कि स्क्वेटिंग पोजीशन मानव शरीर के लिए सर्वथा अनुकूल है। एक नए अध्ययन के अनुसार अमेरिका में ही 12 लाख लोग शौचालय नहीं होने से स्क्वेटिंग पोजीशन में ही मल त्याग करते हैं। उससे भी कहीं बहुत ज्यादा संख्या में लोग एशिया, मिडिल ईस्ट और यूरोप के कई हिस्सों में आज भी स्क्वेटिंग के हिसाब से बनी टॉयलेट्स का ही इस्तेमाल करते हैं। बताया जाता है कि 18वीं सदी में शौच के लिए पूरी दुनिया के लोग घर से बाहर ही उकड़ू बैठकर शौच करते थे। 1850 के आसपास ब्रिटेन के किसी राजपुरुष की बीमारी के दौरान सुविधा की दृष्टि से शौच के लिए कुर्सीनुमा शौच सीट यानी कमोड जैसी व्यवस्था का आविष्कार किया था। बाद में तो गोरे अंग्रेजों के राजा-रानियों को खुश करने की नीयत से सुतारों और प्लंबरों ने कुर्सी की डिजाइन मे थोड़ा परिवर्तन करते हुए बैठक वाली शौच सुविधा को प्रचलित कर दिया। राज घराने के पीछे बिना सोचेसमझे भागने की मानवीय प्रवृति के चलते कमोड ने पश्चिम में व्यापक रूप धारण कर लिया। हालांकि उन्नीसवी सदी तक यह राज घरानों और प्रभावी लोगों के बीच ही प्रचलन में रहा।

नैसर्गिक है स्क्वेटिंग

विश्व के अधिकांश शिशु नैसर्गिक रूप से स्क्वेटिंग के जरिए ही मल निष्कासन करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए जिन बुनियादी बातों की जरूरत होती है, उनमें स्क्वेटिंग, पानी का खूब सेवन, अच्छी नींद, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम सम्मिलित हैं। असल में जांघों के दबाव

अमेरिका के जे.लियू ने वहां स्क्वेटिंग का प्रचार करने वाले लोगों का उत्साह बढ़ाते हुए बताया था कि मैंने अपनी चीन यात्रा के दौरान स्क्वेटिंग को अपनाया और मल निष्कासन के आनंद का अनुभव किया


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जापान में 2010 में हुए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि यदि हिप जाइंट पर अधिकतम फ्लैक्शन (मुड़ना) हो तो एनो रेक्टल कोण अधिक सीधा होता है और मल निष्कासन आसानी से होता है के अभाव में ज्यादा जोर लगाना जरूरी हो जाता है, जिसके कारण मल मार्ग की रक्त शिराएं फूल जाती हैं। इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का कारण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसकी वजह से चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोगाें की जान भी चली जाती है। इसके अलावा स्क्वेटिंग की तुलना में कोलोनिक डाइवरटीकुलोसिस की संभावना 75 प्रतिशत अधिक रहती है। सिकिरोव ने अपने एक अन्य शोध के तहत हिमोराइड्स के रोगियों के एक छोटे समूह को स्क्वेटिंग पद्धति से शौच करने की सलाह दी। उन्होंने पाया कि बीस रोगी हिमोराइड्स से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, लगभग पचास प्रतिशत रोगियों को कुछ दिनों में ही काफी लाभ हुआ, जबकि शेष की स्थिति में सुधार होने में अधिक समय लगा। यानी सभी को लाभ जरूर हुआ।

स्क्वेटिंग के पक्ष में कई अध्ययन

स्क्वेटिंग के पश्चिमी प्रचारक मानते हैं कि सिटिंग के दौरान मल का पूरी तरह निष्कासन नहीं होने से यानी फिकल स्टेगनेशन के कारण अपें‌िडसाइटिस तथा क्रोंस डिसीज हो जाती है, जो कि परम्परागत स्क्वेटिंग को अपनाने वालों में तुलनात्मक दृष्टि से बहुत कम (रेयर) होती है, जबकि वेस्टर्न पद्धति को अपनाने वालों में तुलनात्मक रूप से अधिक लोग इन रोगों के शिकार होते हैं। इसके लिए उनका वैज्ञानिक तर्क है कि सिटिंग के दौरान एनो रेक्टल एंगल के संकुचित होने के कारण रेक्टम में बचा मल दबाव के कारण विपरीत दिशा में गतिमान होता है। वे इसे समझाने के लिए टूथपेस्ट के ट्यूब को बीच से दबाने पर होने वाले प्रभाव का उदाहरण देते हैं। जिसमे पेस्ट नीचे तथा ऊपर की तरफ गतिमान होता है। उनके अनुसार लम्बे समय का फिकल स्टेगनेशन अंतत: मल को सिकम की तरफ धकेलता है, जो एपेंडिक्स के लिए खतरनाक सिद्ध होता है।

माइचीलीन ड्यूक्लेफ ने बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के एक कार्यक्रम के दौरान शौच की वेस्टर्न पद्धति को कब्जियत तथा हिमोराइड्स के लिए दोषी ठहराते हुए मायो क्लीनिक के हवाले से बताया कि पचास वर्ष की उम्र तक आते-आते पचास प्रतिशत अमेरिकन हिमोराइड्स के लक्षणों से पीड़ित हो जाते हैं। वे मानते हैं कि इसमें सिटिंग पद्धति की महत्वपूर्ण भूमिका है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वेस्टर्न वर्ल्ड में कोलोन कैंसर, कब्ज, डाइवरटीकुलोसिस, इरिटेबल बावेल सिन्ड्रोम, प्रोस्टेट व गर्भाशय संबंधी डिसआर्डर्स तथा अन्य कुछ बीमारियों के प्रकरण तुलनात्मक रूप से ज्यादा होते हैं। इन सबका उत्तर खोजने के बाद उन्होंने मल विसर्जन की सिटिंग पोजीशन को दोषी पाया। शोधों मे पाया गया कि स्क्वेटिंग पोजीशन कई बीमारियों का अंत करने में समर्थ है। जापान में 2010 में हुए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि यदि हिप जाइंट पर अधिकतम फ्लैक्शन (मुड़ना) हो तो एनो रेक्टल कोण अधिक सीधा होता है और मल निष्कासन आसानी से होता है। अमेरिका के चिकित्सक तथा आधुनिक गेस्ट्रोइंट्रोलाजी के शोधकर्ता डॉ. एम.के.रिज्क स्क्वेटिंग पोजीशन को बेसबाल की कैचर्स पोजीशन का नाम देते हैं और उनका कहना है कि स्क्वेटिंग पोजीशन श्रेष्ठ है। स्क्वेटिंग के अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए अमेरिका के जे.लियू ने वहां स्क्वेटिंग का प्रचार करने वाले लोगों का उत्साह बढ़ाते हुए बताया था कि मैंने अपनी चीन यात्रा के दौरान स्क्वेटिंग को अपनाया और मल निष्कासन के आनंद का अनुभव किया है। उन्होंने मल त्याग के वेस्टर्न तरीके को कोसते हुए कहा है कि आप लोग वेस्टर्न वर्ल्ड को मल त्याग के अंधे युग से निकालकर उन्हें सिविलाइज्ड बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रसव और पीठ दर्द में आराम

वैज्ञानिकों के अनुसार गर्भवती महिलाएं यदि नियमित रूप से प्राचीन यानी भारतीय शैली को अपनाएं तो

स्क्वेटिंग पोजीशन फायदे ही फायदे

lप्रोस्टेट,

मूत्राशय तथा गर्भाशय की नर्व्स को स्ट्रेच तथा डेमेज होने से बचाव lपुबो रेक्टीलिस मसल पूरी तरह रिलैक्स होने से रेक्टम चोक नहीं होता है l यह हिमोराइड्स का अत्यधिक प्रभावशाली तथा नॉन इन्वेसिव उपचार है l मल विसर्जन शीघ्र, पूर्णरूपेण, आसान और तीव्रता से हो जाता है lफिकल स्टेग्नेशन नहीं होने से कोलोन कैंसर, एपेंडीसायटिस तथा इन्फ्लेमेटरी बावेल डिसीज नहीं होते हैं l इलियोसिकल वाल्व के सील हो जाने से छोटी आंत में बैकफ्लो के कारण बड़ी आंत से मल प्रवेश नहीं हो पाता है, यानी छोटी आँत न तो प्रदूषित होती है और न ही संक्रमित lजांघों के सहयोग से कोलोन पर नैसर्गिक दाब के कारण ज्यादा जोर (स्ट्रेन) नहीं लगाना पड़ता है। अधिक समय तक यदि अधिक जोर लगाना पड़े तो हर्निया, डाइवरटीकुलोसिस तथा पेल्विक आर्गन्स के प्रोलेप्स का खतरा हो सकता है l गर्भवती स्त्री यदि नित्य इस पोजिशन में मल विसर्जन करे तो गर्भाशय पर दबाव नहीं पड़ता है तथा यह पोजिशन नैसर्गिक प्रसव के लिए पेल्विक फ्लोर को तैयार करने मे सहायक सिद्ध होती है सामान्य प्रसव की सम्भावनाएं बढ़ती हैं और मल निष्कासन के दौरान गर्भाशय में पल रहे शिशु पर प्रतिदिन पड़ने वाले दबावों से भी बचा जा सकता है। कमर दर्द के लिए भी स्क्वेटिंग को वैज्ञानिक बेहतर मानते हैं। एक अध्ययन ‘गिव योर स्पाइन ए बेनिफिशिअल स्ट्रेच’ में कहा गया है कि स्क्वेटिंग शैली से पीठ और कमर दर्द में आराम मिलता है। डेनिस बर्किट नामक चिकित्सक युगांडा में मेडिसिनल प्रैक्टिस करते थे। जब उन्होंने देखा कि वहां के लोग कोलोन कैंसर, कब्ज, डाइवरटीकुलोसिस, इरिटेबल बावेल सिन्ड्रोम आदि से पीड़ित नहीं होते हैं, तो उनका दिमाग ठनका। सूक्ष्म अध्ययन के बाद उन्हें दो बातें समझ में आईं, एक तो शौच के लिए स्क्वेटिंग पोजीशन और दूसरा भोजन में फायबर्स की अधिक मात्रा। डेनिस बर्किट मानते है कि स्क्वेटिंग पोजीशन कोलोन कैंसर से बचाती है।

स्वास्थ्य

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हर किसी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, तभी देश स्वच्छ हो सकेगा। हमारे प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत के लिए हम सभी का आह्वान किया है और मैं आपसे स्वस्थ शरीर तैयार करने की भी अपील करता हूं –सचिन तेंदुलकर


12 साक्षात्कार

13 - 19 नवंबर 2017

अगर सरकार के सहयोग या उसके बगैर आपके घर में पहले से सुलभ शौचालय है, तो यह आपको, आपके परिवार को स्वस्थ, प्रसन्न और खुश रखेगा। मां लक्ष्मी आपके घर में वास करेगी। यह महात्मा गांधी के साथ सम्मानीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खुले में शौच की प्रथा खत्म करने के स्वप्न को पूरा करेगा और इससे भारत एक सभ्य और सुसंस्कृत देश बनेगा।

डॉ. विन्देश्वर पाठक

बापू की प्रेरणा से बने ‘टॉयलेट मैन’

सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढ़ोने की मैली प्रथा को खत्म करने बीड़ा उठाया, वहीं वे देशभर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से आमलोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य कर रहे हैं

–डॉ. विन्देश्वर पाठक

खास बातें

वि

एसएसबी ब्यूरो

कास की तेजी के बीच स्वच्छता का मुद्दा भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में थोड़ा पीछे छूटा। अफ्रीका और एशिया के कई विकासशील देशों में तो स्वच्छता को नजरअंदाज करने का आलम यह रहा है कि वहां कुछ समुदाय के लोगों की स्थिति अत्यंत नारकीय हो गई। इसी स्थिति को देखते हुए स्वच्छता को सीधे-सीधे मानवाधिकार मानने की वकालत आज संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पर की जा रही है। बात करें भारत की तो स्वच्छता यहां राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से अहम मुद्दा रहा। खासतौर पर महात्मा गांधी कांग्रेसजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्ध होने की सीख देते थे। आजादी के बाद विकास के जोर के बीच स्वच्छता का मुद्दा जरूर थोड़ा कमजोर पड़ा। पर इस भीड़ के बीच से एक ऐसा शख्स निकलकर आया,

जिसने स्वच्छता और इसके लिए गांधी की प्रेरणा को अपनी जिंदगी का पथ और मंत्र दोनों बना लिया। हम बात कर रहे हैं सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक की। पूरी दुनिया आज उन्हें ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में जानती है। उन्होंने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढ़ोने की मैली प्रथा को खत्म करने बीड़ा उठाया, वहीं देशभर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से उन्होंने आमलोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया। बड़ी बात यह है कि डॉ. पाठक द्वारा शुरू किया गया स्वच्छता का सुलभ अभियान अब भी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू किए जाने के बाद डॉ. पाठक के मार्गदर्शन में सुलभ का स्वच्छता अभियान नई प्रेरणा और गति के साथ आगे बढ़ रहा है। शौचालय और स्वच्छता को पांच दशकों से अपनी समझ और विचार की धुरी बनाकर चल रहे डॉ. विन्देश्वर पाठक से हुई गहन बातचीत के कुछ अंश-

गांधी जी की प्रेरणा से स्वच्छता का कार्य शुरू क‌िया स‌िर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने का ल‌िया प्रण स्वच्छता के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय योगदान

सुलभ का आइडिया आपके जेहन में कैसे आया? मैं 1968 में गांधी जी के जन्मशती मनाने के लिए बनाई गई एक कमेटी में शामिल हुआ। इसके तहत कई स्थानों पर जाने का मौका मिला और समाज में व्याप्त छूआ-छूत को भी करीब से देखा। इसी


13 - 19 नवंबर 2017

साक्षात्कार

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देश को स्वच्छ और मैला ढोने वाले लोगों की जिंदगी सुधारने की दिशा में मोदी जी की अपील युगांतकारी साबित होने वाली है

दौरान बिहार के बेतिया जिले के एक अछूत कॉलोनी में जाने का अवसर मिला। वहां घटी एक घटना ने मेरा जीवन बदल कर रख दिया। एक युवा लड़के को एक सांड ने मारकर बुरी तरह घायल कर दिया था, लेकिन किसी ने भी उसे नहीं उठाया, क्योंकि वो अछूत था। मुझे बड़ी तकलीफ हुई। मैंने उस लड़के को उठाया और लाकर अस्पताल में भर्ती करवाया, लेकिन वो बच नहीं सका। इसके बाद मैंने गांधी जी का नाम लेकर कसम खाई कि जब तक मैला ढोने की प्रथा को समाप्त नहीं करुंगा, इन अछूतों का उद्धार नहीं होगा तब तक मैं तब तक शांत नहीं बैठूंगा। बस वहीं से उस आइडिया की शुरुआत हुई जो आगे चलकर सुलभ इंटरनेशनल नामक संस्था के रुप में सामने आया।

67 साल बाद जिस तरह पीएम मोदी के प्रयासों से स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन गया है, उसे लेकर आप कितने आशान्वित हैं?

देखिए, शौचालय की क्रांति की दिशा में इस देश में अब तक महात्मा गांधी और मैंने ही काम किया है। इसके बाद मोदी जी पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतनी संजीदगी से इस मुद्दे को उठाया है। ऐसा नहीं कि बाकी लोगों ने इस मुद्दे को नहीं उठाया। लेकिन बड़े पैमाने पर हम ही लोगों ने इस मुद्दे को उठाया है। गांधी जी तो इस मसले को इतना अधिक महत्व देते थे कि उन्होंने कहा कि हमें आजादी से पहले देश की सफाई चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश इस तरफ बाद में किसी ने संजीदगी से ध्यान नहीं दिया। देश में अंग्रेजों के आने के पहले आमतौर पर खुले में ही शौच की परंपरा थी, वह आज भी है। लेकिन अगर शौचालय का इंतजाम था भी तो वह इंसानों के जरिए सफाई वाली व्यवस्था पर था। गांधी जी ने सबसे पहले उनकी मुक्ति की दिशा में काम किया। हां, अंग्रेजों ने यह जरूर किया कि उन्होंने सीवर व्यवस्था पर आधारित शौचालय व्यवस्था का इंतजाम शुरू किया और कलकत्ता में सबसे पहले 1870 में सीवर शुरू किया। दुर्भाग्यवश तब से लेकर अब तक सिर्फ 160 शहरों में ही सीवर व्यवस्था शुरू हो पाई है। जाहिर है कि अब भी तमाम उपायों के बावजूद इंसानों द्वारा साफ किए जाने वाले शौचालय या खुले में शौच करने का इंतजाम ही ज्यादा है। इस हालत में मोदी जी की लाल किले से अपील का बड़ा असर होना है। हमारी आवाज को लोग उतनी गहराई से नहीं सुनते थे। अब लोग इसके प्रति जागरूक होंगे और इसकी तरफ उनका ध्यान गया है। इसीलिए मेरा तो मानना है कि देश को स्वच्छ और मैला ढोने वाले लोगों की जिंदगी सुधारने की दिशा में मोदी जी की यह अपील युगांतकारी साबित होने वाली है।

आपने कहा कि गांधी जी ने इसकी तरफ पहली बार ध्यान दिलाया। आखिर उनका सुझाव क्या था और क्यों नहीं उनकी बताई राह पर देश आगे चल पाया? गांधी जी ने अपने डरबन के आश्रम में सबसे पहले फैंस लैट्रिन यानी चारदीवारी के भीतर शौच का इंतजाम शुरू किया। उनकी व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपना शौचालय साफ करना होता था। आज भी पुराने गांधीवादियों में आप यह चलन देख सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उनका सुझाव था कि झाड़ी में जाइए और शौच कीजिए। शौच के बाद उस पर मिट्टी डालिए। दरअसल, शौचालय की सफाई के जरिए वे मैला साफ करनेवाले लोगों को समाज में बेहतर स्थान दिलाना चाहते थे। हमारे यहां परंपरा रही है कि घर के नजदीक शौच न करें। गांधी जी ने उसमें बदलाव का इंतजाम किया और चारदीवारी के भीतर शौच व्यवस्था की शुरूआत की। उनकी कोशिश इन लोगों को शौच सफाई के घिनौने काम से मुक्ति दिलानी थी। वे शौचालय को सामाजिक बदलाव के औजार के तौर पर देखते थे। गांधी शताब्दी के दौरान 1969 में मुझे लगा कि इस दिशा में काम किया जाना चाहिए। इसीलिए मैंने सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की और इसकी तरफ काम शुरू किया। प्रधानमंत्री ने लड़कियों के लिए शौचालय का इंतजाम करने के लिए कॉरपोरेट जगत से आगे आने की अपील की है। इसका क्या असर दिख रहा है? टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने 100 करोड़ रूपए से देश के दस हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय बनाने का ऐलान किया है। भारती-एयरटेल कंपनी ने भी 100 करोड़ से पंजाब के स्कूलों में शौचालय बनाने का फैसला किया है। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स भी दो करोड़ की लागत से शौचालय बनाने जा रहा है। साफ है कि देश में सफाई की दिशा में मोदी जी की अपील के बाद बड़ी क्रांति की शुरूआत हो चुकी है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब सांसदों और कंपनियों को अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड से शौचालय बनाना होगा। इससे देश की सफाई के प्रति लोगों का नजरिया जहां सकारात्मक होगा, वहीं हमारी माताओं,बहनों और बेटियों को खुले में जाने की शर्मिंदगी से मुक्ति मिलेगी। इससे बड़ा सामाजिक बदलाव होगा। पीएम की अपील के बाद आप पर क्या असर पड़ा और आप किस तरह के प्रयासों में जुटे हैं? हम तो करीब पांच दशक से यह काम कर रहे हैं... लोगों को स्वच्छता के जरिए स्वस्थ जीवन का संदेश

दे रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील के बाद बड़ा परिवर्तन आ रहा है। दुनियाभर से लोग हमें फोन कर रहे हैं कि हम कैसे मदद कर सकते हैं। कई कॉरपोरेट हमसे पूछ रहे हैं कि हम कैसे इस दिशा में प्रधानमंत्री की अपील के मुताबिक काम करें। सरकारी क्षेत्र की कंपनियां एनटीपीसी, गेल, आरईसी ने हमसे इस दिशा में सलाह और सहयोग मांगा है। इसके अलावा हम ब्रुनोई के सुल्तान जैसे दुनिया के बड़े धनी व्यक्तियों से आम भारतीयों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए प्रयास करने की दिशा में सहयोग मांगने जा रहे हैं। विदेशों में अपने संपर्क वाली संस्थाओं से भी मदद मांगने की हम सोच रहे हैं ताकि भारतीयों को स्वच्छ और स्वस्थ माहौल मुहैया कराया जा सके। सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए सुलभ किस तरह के प्रयास कर रहा है और इसके लिए आपकी कार्यनीति क्या है? मैंने टू-पिट स्कीम से टॉयलेट बनाने की पद्धति विकसित की, जो की सुलभ की दुनिया को देन है। केंद्र सरकार ने भी हमारी स्कीम को 2008 से मान्यता दी। राज्य सरकारों ने तो पहले से ही इस तकनीक को मान्यता दे दी थी। इस व्यवस्था में हाथ से मैला को साफ करने की जरुरत नहीं पड़ती। सुलभ ने आगे चलकर पहाड़ी और मुश्किल इलाकों में भी स्थानीय संसाधनों से टू-पिट टॉयलेट बनाने की तकनीक का इजाद किया है। बिहार के कुलीन ब्राह्मण परिवार से आना और परंपरावादी सामाजिक व्यवस्था के बीच आपके लिए ऐसी शुरुआत करना कितना मुश्किल था, जबकि उस वक्त लोग इसके बारे में बातचीत भी करना पसंद नहीं करते थे? ये एक हरक्यूलिन टास्क था... हिमालय में चढ़ने जितना मुश्किल भी कह सकते हैं, जिसमें कई लोग सफलता हासिल करते हैं और कुछ हार कर लौट जाते हैं। मैंने लौटने वाले मार्ग का चयन नहीं किया। मैं जानता था अगर मैं यह नहीं करुंगा तो मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा। महात्मा गांधी ने कहा है‘जब तक हरिजनों का उद्धार नहीं होगा सामाजिक विकास अधूरी रहेगी।’ उस दौर में उनकी बातें करने वाले कम ही लोग थे, लिहाजा कुछ खास हो नहीं पा रहा था। यहां तक कि मेरे ससुर ने मुझे बुलाकर कहा कि आपने मेरी बेटी का जीवन चौपट कर दिया। क्योंकि उस इलाके में उनकी ख्याति थी और लोगों में चर्चा का विषय था कि डॉक्टर साहब (डॉ पाठक के ससुर वैशाली जिले में डॉक्टर थे) का दामाद अछूतों के साथ उठते-बैठते और रहते हैं। लेकिन इन तमाम विरोधों के बावजूद मैंने कभी हार नहीं मानी। बस एक बात जो हमेशा मेरे साथ थी, वह थी मेरी हिम्मत। मैंने हिम्मत का दामन कभी नहीं छोड़ा। आप गांधी जी के अलावा पूर्व अमेरिकी

भारत ने साफ-सफाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए बहुत प्रगति की है। खुले में शौच को बंद करने की अपनी प्रतिबद्धता के साथ प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर साहसिक कदम उठा रहे हैं – बान की मून


14 साक्षात्कार

13 - 19 नवंबर 2017

महात्मा गांधी श्राम की गरिमा में विश्वास करते थे। स्वच्छता के क्षेत्र में किए जा रहे विभिन्न कार्यों से मेहनतकश लोगों का आर्थिक विकास होगा और उनके जीवन स्तर में सुधार होगा – रामनाथ कोविंद

न्यूयार्क में ‘डॉ. विन्देश्वर पाठक डे’

न्यूयार्क के मेयर ब्लासियो ने 14 अप्रैल, 2016 को 'डॉ. विन्देश्वर पाठक दिवस’ घोषित किया

बसे अमानवीय स्थिति में काम करने वाले लोगों के जीवन को सुधारने की दिशा में डॉ. विन्देश्वर पाठक के अद्भुत योगदान के लिए न्यूयॉर्क के मेयर ने वर्ष 2016, 14 अप्रैल को 'डॉ. विन्देश्वर पाठक दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की। पिछले पांच दशक से स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने वाले सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक इस सम्मान से सम्मानित होने वाले प्रथम भारतीय हैं। इस वर्ष इस सम्मान की पहली वर्षगांठ मनाई गई और इसकी खुशी न्यूयार्क से लेकर भारत तक देखी गई। इस बीच, डॉ. पाठक के सम्मानों की फेहरिस्त में कई और सम्मान भी जुड़ गए हैं, जो उनके अतुलनीय कामों के लिए

राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी से भी खासे प्रभावित हैं। क्या कहेंगे इस बारे में आप? आपने सही कहा। यह सच है कि मेरे ऊपर गांधी जी के अलावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी का भी प्रभाव है। मैं उनके उस वक्तव्य से खासा प्रभावित हूं, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘यह मत पूछो कि देश ने तुम्हारे लिए क्या किया है, बल्कि खुद से यह पूछो कि तुमने अपने देश के लिए क्या किया।’ मोदी सरकार ने स्वच्छता को लेकर राष्ट्रीय अभियान छेड़ा है। सरकार के अभियान के बाद क्या फर्क आया है? स्वच्छता अभियान से फर्क यह आया है कि कई सारे बैंक, पीएसयूज और प्राइवेट कंपनियों ने सुलभ इंटरनेशनल से पब्लिक टॉयलेट बनाने के लिए संपर्क साधा है। अगर देश का टॉप लीडरशीप कुछ कहता है तो उसका फर्क तो वैसी भी पड़ता है, लेकिन अगर मोदी जी कुछ कहते हैं तो उसका और ज्यादा फर्क पड़ता है, क्योंकि लोग मोदी जी की बातों को सुनते हैं और अमल करते हैं। सो उनकी स्वच्छता योजना की भी काफी चर्चाएं हो रही है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर और निजी दफ्तरों में भी स्वच्छता को लेकर काफी चर्चाएं हो रही है, जिससे जागरुकता का स्तर काफी बढ़ गया है। बच्चों और युवाओं के बीच ये अभियान काफी लोकप्रिय हो रहा है और ये लोग इसे आगे लेकर जाएंगे। 2019 तक देश के हर गांव में टॉयलेट बनाने की पीएम के मिशन में सुलभ कदम दर कदम मिलाकर चलना चाहता है और हमारे पास इसकी पूरी विस्तृत योजना है कि कैसे असंभव सा दिखने वाला ये मिशन संभव है। अब तक सुलभ इंटरनेशनल का नाम और काम किन-किन देशों में पहुंच चुका है? सुलभ का नाम तो दुनिया के करीब-करीब सभी देशों में पहुंच गया है, लेकिन काम कि अगर बात करें तो अफ्रीकी, एशियाई और मिडिल-ईस्ट के देशों की

प्रदान किए गए हैं। मेयर ब्लासियो ने 14 अप्रैल, 2016 को 'डॉ. विन्देश्वर पाठक दिवस’ घोषित करने से जुड़ा उद्घोषणा पत्र भी डॉ. पाठक को भेंट किया। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार-पत्र 'द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने डॉ. पाठक के बेहतरीन कामों पर 'अनटचेबल्स गेन द हेल्प ऑफ ए ब्राह्मण’ शीर्षक नाम से एक फीचर प्रकाशित किया, जिसमें उन्हें छूआछूत के अपमान के खिलाफ समर्पित योद्धा बताया गया था। डॉ. पाठक को इससे पहले अमेरिका में 'न्यूयार्क ग्लोबल लीडर्स डायलॉग ह्यूमेनिटेरियन अवार्ड’ और प्रतिष्ठित 'हार्वर्ड क्लब’ ने भी सम्मानित किया था।

सरकारें और लोकर बॉडीज ने सुलभ की कंस्लटेंसी ली है। इसके इलावे हमारी संस्था ने कई देशों में ट्रेनिंग देने और उन्हें कम कीमतों में बेहतर टॉलेट बनाने की योजना दी है। इनके अलावा सुलभ और क्या अलग कर रहा है? स्टार्टअप के तौर पर हमने पश्चिम बंगाल के आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में वाटरमैनेजमेंट का काम अपने हाथों में लिया है और वहां हम पीने का पानी 50 पैसे प्रति लीटर मुहैया करा रहे हैं। इन इलाकों में बड़ी संख्या में लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। इसी तरह सोशल स्टार्टअप के तौर पर हमारी संस्था ने राजस्थान के टोंक और अलवर जिले में स्कैवेंजर्स की फैमिली के साथ मिलकर उन्हें लाइवलीहुड प्रदान करने का काम सुलभ की सहयोगी संस्था ‘नई दिशा’ कर रही है। वहां पापड़ और अचार बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। इतना ही नहीं, सुलभ के दिल्ली कैंपस में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल भी चलता है, जहां बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दी जाती है। इस स्कूल में स्कैवेंजर्स और मेनस्ट्रीम के बच्चे साथ-साथ पढ़ते हैं। यहां ब्यूटिशियन, सिलाईकढ़ाई की ट्रेनिंग भी दी जाती है। गाजियाबाद में भी हम ऐसी योजनाओं पर काम कर रहे हैं। वृंदावन और वाराणसी की विधवाओं के कल्याण के लिए भी सुलभ काम कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्टार्टअप इंडिया को लांच किया है। आप सोशल स्टार्टअप में कितनी संभावनाए देखते हैं? मैंने आपको पहले ही कहा है कि मोदी जी की बातों को लोग सुनते हैं और उस पर अमल करते हैं। उनके आह्वान पर काफी युवा इस चैलेंज को अपने हाथों में लेंगे। इस क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं। सैनिटेशन, वेस्ट मैनेजमेंट, वाटर-मैनेजमेंट के क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं। सोशल स्टार्टअप करने वाले युवाओं के लिए सुलभ के दरवाजे हमेशा खुले हैं। हमने कई

युवाओं को ट्रेनिंग और इंटर्नशिप भी दी है। सुलभ की तकनीक पेटेंट कानून के दायरे में नहीं है सो कोई भी इस तकनीक को लेकर आगे बढ़ सकता है, व्यापार कर सकता है। लेकिन उन युवाओं से मेरी गुजारिश होगी कि जब आप अपने उद्यम से कमाई करते हैं उसका लाभ समाज के जरुरतमंदों को भी मिलना चाहिए, कमाई का एक हिस्सा समाज के कमजोर वर्ग पर खर्च हो, जिससे उनके बच्चे भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। तभी जाकर विकास की सही परिभाषा सामने आएगी और तभी जाकर उनका स्टार्टअप एक सोशल स्टार्टअप बन पाएगा। ऐसे युवा उद्यमियों को मेरी असीम शुभकामनाएं। आखिर में, एक सवाल यह कि आपने कम से कम दो पीढ़ी के लोगों के साथ काम किया है। सरकार और समाज के स्तर पर कई तरह के बदलावों के गवाह रहे हैं। ऐसे में आप अब तक अपनी यात्रा को कैसे देखते हैं? 1974 में पहली बार पटना में सार्वजनिक शौचालय का निर्माण किया। पटना नगर निगम ने जमीन दी और कहा- पब्लिक से पैसा लीजिए और शौचालय चलाइए। डॉ. पाठक कहते हैं, उस समय शौचालय के लिए पैसा देने की बात कहने पर लोग मजाक उड़ाते थे। आज उसी सुलभ शौचालय के कांसेप्ट पर पूरी दुनिया में शौचालय बन रहे हैं। आज करीब 1.5 करोड़ लोग सुलभ शौचालय की सेवा ले रहे हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बाद आज भी अगर कोई कहता है कि पाठक जी आपका सुलभ शौचालय इस्तेमाल किया, बहुत गंदा था तो लगता है जैसे मेरे शरीर पर कोई स्क्रैच लग गया हो। बहुत तकलीफ होती है। सुलभ इंटरनेशनल से मेरा लगाव इस हद तक है। मैं अपनी पत्नी, परिवार और बच्चों से भी ज्यादा प्यार सुलभ को करता हूं। मैं तो पत्नी को कह भी चुका हूं कि सुलभ सिर्फ मेरा काम या सपना नहीं है, मेरी प्रेमिका है। ठीक वैसे ही, जैसे भगवान कृष्ण की प्रेमिका राधा थी। सुलभ और स्वच्छता का साझा मेरी जिंदगी का अर्थ तो है ही, यही मेरी जिंदगी की यात्रा और उसकी सार्थकता है।


13 - 19 नवंबर 2017

बात ‘सम्मान’ की

स्वच्छता

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शौचालय को महिलाओं के सम्मान से जोड़ा गया तो लोगों ने लोन लेकर निर्माण कार्य पूरा करवाया

खास बातें

महिलाओं ने संभाली अपने प्रखंड में स्वच्छता की कमान लोक गायक विभेद पासवान गा रहे हैं स्वच्छता के गीत केंद्र व राज्य की योजना की मदद से चल रहा स्वच्छता अभियान

कि

एसएसबी ब्यूरो

सी लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसी की सहायता की जरूरत नहीं होती, जरूरत होती है लक्ष्य को पाने की जिद और जज्बे की। कुछ ऐसा ही बिहार के रोहतास जिले के विक्रमगंज अनुमंडल के संझौली प्रखंड ने कर दिखाया है। संझौली ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है उदयपुर। गांव में तालाब के बीच सूर्य मंदिर है, जहां आस-पास के गांव की महिलाएं हर साल छठ पूजा करने आती हैं, लेकिन इस बार यहां का पूरा नजारा ही बदल गया। सड़कें एकदम साफ, गंदगी का दूर तक कोई निशान नहीं। अचानक यह सब हुआ कैसे। गंदगी और बदबू से भरा रास्ता अचानक साफ कैसे हुआ। सबके लिए इस सम्मान घर की व्यवस्था । इस गांव में शौचालय को ‘सम्मान घर’ कहा जाता है । इस ‘सम्मान घर’ की वजह से उदयपुर का सम्मान पूरे जिले में बढ़ गया है। उदय पुर स्वच्छता का मानक गांव बन चुका है। यानी खुले में शौच से मुक्त गांव। छह पंचायत और 64 गांवों वाले संझौली ब्लॉक ने जन-भागीदारी, प्रशासन और यूनिसेफ के सहयोग से बहुत ही कम समय में स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाया है। महज 55 दिन में खुले में शौच से मुक्‍त होने वाला संझौली बिहार का पहला ब्लाॅक है। अब तक बिहार में रोहतास का संझौली और पश्चिम चंपारण का पिपरासी प्रखंड पूरी तरह से शौच से मुक्त हो चुके हैं। 55 दिनों की इस अवधि में इस प्रखंड में लगभग 7000 शौचालय बनाए गए। संझौली प्रखंड के लिए प्रेरण-स्रोत बनीं बाराखाना की ‘मिड-डे मील योजना’ की रसोईया फूल कुमारी, जिन्होंने बड़ी पहल करते हुए अपना मंगलसूत्र गिरवी रखकर शौचालय बनवाया था। फूल कुमारी की पहल से शौचालय को लेकर यहां के लोगों में एक नई सोच विकसित हुई है। रोहतास के डीएम अनिमेष कुमार पराशर ने खुले में शौच से मुक्ति के संकल्प के साथ मिशन प्रतिष्‍ठा

की शुरुआत की थी। इसका मकसद शौचालय को बहू-बेटियों के सम्मान से जोड़कर लोगों को उसका महत्व समझाना था। संझौली के एसडीएम राजीव कुमार कहते हैं, ‘इससे पहले के कैपेंनों के दौरान सारा ध्यान शौचालय बनाने पर होता था, उनके वास्तविक इस्तेमाल की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। पुरानी कमियों से सीख लेते हुए इस बार हमारा पूरा फोकस लोगों के व्यवहार में बदलाव लाकर लोगों में शौचालय प्रयोग की आदत विकसित करने में है। शौच की गुणात्मक गणना, शुभ 11, सम्मान घर, राखी में शौचालय का तोहफा जैसी छोटी-छोटी अनेक पहलों के जरिए से इस कैंपेन को एक जन आंदोलन का रूप दिया गया।’ उदयपुर पंचायत के पूर्व मुखिया वशिष्ठ पासवान बताते हैं, ‘प्रशासन और फीडबैक फाउंडेशन के लोग आते थे और पूरे गांव का चित्र बनावाते थे फिर वो अपने तरीके से समझाते थे कि एक आदमी अगर एक दिन में इतना शौच करता हैं तो पूरे गांव की और पूरे साल की अगर हम गणना करेंगे तो वो कितना होगा। तब हमें समझ में आया कि कैसे घर से बाहर शौच के लिए जाना हमारे और हमारे बच्चों के स्वास्‍थ्य के लिए खतरनाक है। यही वजह है कि किसी को भी सरकारी अनुदान नहीं दिया गया है। बावजूद सबने अपने पैसे से या एसएफजी से लोन लेकर शौचालय बनवाया।’ संझौली के उदयपुर पंचायत को खुले में शौच मुक्त बनाने का सफर आसान नहीं था । लोग बताते हैं कि सुबह 4 बजे से एसडीएम, डीएसपी समेत अन्य अधिकारी और गांव के प्रेरक खुले में शौच जाने वालों पर नजर रखते थे और उन्हें खुले में शौच जाने से रोककर शौचालय का उपयोग करने को प्रेरित करते थे। हर पंचायत के लिए एक जिला स्तर के पदाधिकारी को नोडल पदा‌धिकारी बनाया गया। उदयपुर पंचायत के नोडल अधिकारी विक्रमगंज अनुमंडल के एसडीएम राजीव कुमार थे। जिले में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग है। सुबहसुबह अधिकारी ग्रामीण अंचलों में पहुंच कर खुले में शौच जाने वालों पर निगरानी रख रहे है। साथ ही

उन्हें रोक भी रहे है। एसडीएम राजीव कुमार कहते हैं, ‘लोगों को जागरूक करने के बाद यह तय किया गया कि एक नियमित समय पर शौचालय निर्माण का काम शुरू किया जाए। ऐसे में यह तय हुआ कि हर महीने की 11 तारीख को हर गांव में 11 गड्ढे की खुदाई करके शौचालय निर्माण करवाया जाए। ‘सम्मान घर’ सुनने में अच्छा लगता था और इससे महिलाएं अपनापन महसूस करती थीं, क्योंकि यह मामला था भी महिलाओं के मान-सम्मान का। संझौली को ओडीएफ बनाने के बाद नोखा, सूर्यपुरा व तिलौथू प्रखंड में यह प्रयास जोरों पर है। हम इस अनुमंडल को खुले में शौच से मु‌क्त करने की अपनी पहल में सफल होंगे।’ गंदगी के खिलाफ इस जंग की कहानी फूल कुमारी, सरोज कुमारी, अवधेश और विभेद पासवान जैसे लोगों के बिना अधूरी है। शौचालय के लिए अपना मंगल सूत्र गिरवी रखने वाली फूल कुमारी को रोहतास के जिलाधिकारी ने स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया। उदयपुर पंचायत की सरोज कुमारी ने बाहर शौच करने के दौरान सांप काटने से अपने पति की मृत्यु के बाद शौचालय निर्माण के लिए लोगों को प्रेरित करना जीवन का ध्येय बना लिया। वे अपनी कहानी बता कर लोगों से शौचालय बनावाने का आग्रह करतीं और उन्हें समझाती है कि अगर वो अपने पति और बच्‍चों की सलामती चाहती हैं तो अपने घरों में शौचालय बनावाएं। इन नायकों के अतिरिक्त विभेद पासवान जैसे लोक गायक इस मुहिम को जन आंदोलन का रूप देने में महती भूमिका निभा रहे हैं। पासवान, शौचालय निर्माण के महत्व पर गीत लिखकर लोगों के बीच उसे गाते हैं और उन्हें अपने गीत और संगीत के माध्यम से प्रेरित करते हैं। सूबे को खुले में शौच से मुक्त करना बिहार सरकार की भी प्राथमिकताओं में शामिल है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चयों में हर घर में शौचालय का निर्माण भी है। यह योजना केंद्र प्रायोजित स्वच्छ भारत मिशन और ग्रामीण और राज्य पोषित लोहिया स्वच्छता मिशन के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।

ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के प्रतीक हमारे सम्मानीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को एक स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। –डॉ. विन्देश्वर पाठक


16 खुला मंच

13 - 19 नवंबर 2017

‘आंतरिक स्वच्छता पहली वस्तु है, जिसे पढ़ाया जाना चाहिए। बाकी बातें इसे पढ़ाने के बाद ही लागू की जानी चाहिए’

अभिमत

-महात्मा गांधी

स्वच्छता के साथ सामाजिक बदलाव

दुनिया की कोई भी संस्कृति बिना स्वच्छता और सफाई के आगे बढ़ ही नहीं सकती। भारत तो वैसे भी देवी-देवताओं में आस्था रखने वाला समाज और देश है

स्वच्छाग्रह

आज देश कई राष्ट्रीय घटनाअों और प्रतीकों का नए सिरे से स्मरण कर रहा है

कु

छ माह पहले नरेंद्र मोदी ऐप ने स्वच्छता मिशन को लेकर एक सर्वे किया था। सर्वे में हिस्सा लेने वालों में से 61 प्रतिशत लोगों ने सरकार के स्वच्छ भारत अभियान को शानदार बताया, जबकि 20 प्रतिशत लोगों ने इसे अच्छा कहा है और 11 प्रतिशत ने औसत बताया। इसके साथ ही 94 प्रतिशत लोगों ने माना कि स्वच्छ भारत के महात्मा गांधी के सपने को पूरा किया जा सकता है। दरअसल, नरेंद्र मोदी एक एेसे दौर में देश का नेतृत्व संभाल रहे हैं, जब देश राष्ट्रीय आंदोलन की कई घटनाअों और प्रतीकों का नए सिरे से स्मरण कर रहा है। चंपारण सत्याग्रह और गांधी जी के चरखे को देश जहां सौ वर्ष पूरे होने पर याद कर रहा है, तो वहीं भारत छोड़ो आंदोलन के भी इसी वर्ष 75 वर्ष पूरे हुए हैं। बात करें राष्ट्रपिता की तो वे महज भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सर्वमान्य नायक भर नहीं थे, बल्कि उन्होंने देश के भविष्य को लेकर भी कई गंभीर शुरुआत की थी। स्वच्छता का मंत्र तो उन्होंने भारत आने से पहले दक्षिण अफ्रीका के अपने प्रवास के दौरान ही दे दिया था। जब वे भारत आए भी और चंपारण में निलहे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया तब भी उन्होंने स्वच्छता के इस मंत्र को याद रखा। प्रधानमंत्री खुद उस प्रदेश से हैं, जहां गांधी जी का जन्म हुआ। चंपारण सत्याग्रह के सौ वर्ष पूरे होने पर उन्होंने जहां ‘स्वच्छाग्रह’ की अपील देशवासियों से की तो, वहीं ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के 75 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने ‘भारत जोड़ो’ का भावुक आह्वान लाल किले के प्राचीर से किया। साबरमती आश्रम के सौ साल पूरे होने पर उन्होंने आश्रम पहुंचकर चरखा काता और कहा कि देश कुटीर या लघु उपक्रमों के बूते ही स्वावलंबी बन सकता है। दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी की यह खासियत रही है कि देशवासियों के मनोबल को ऊंचा बनाए रखने और उन्हें राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए पुरुषार्थ दिखाते हुए आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहते हैं। यही नहीं, वे हमेशा ‘टीम इंडिया’ की भी बात करते हैं यानी ‘सबका साथ, सबका विकास’।

टॉवर

डॉ. विन्देश्वर पाठक

(उत्तर प्रदेश)

रीब चार दशक पहले की बात है। बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते मैं भी जुड़ा था। उसी दौरान मैंने देखा कि सिर पर मैला ढोने वाले दलित समाज के लोगों के साथ संभ्रांत लोग कैसा व्यवहार करते हैं। तब सिर पर मैला ढोने वाले लोगों से उस दौर का संभ्रांत समाज इतना अत्याचार करता था कि मेरा मन भर गया। तभी मैंने सिर से मैला उठाने वाले लोगों की मुक्ति के लिए काम करने की ठान ली। चूंकि मैं ब्राह्मण परिवार से था, लिहाजा अपने समाज में मेरा विरोध भी हुआ। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। इसी दौरान मैं सिर पर मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने के बारे में सोचने लगा। इसी सोच से विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। इसकी तकनीक चूंकि सस्ती है और आसान भी, इसीलिए हमने नाम दिया सुलभ शौचालय। इस तकनीक के तहत जब एक गड्ढा भर जाता है तो दूसरा गड्ढे से शौचालय को जोड़ दिया जाता है। इस बीच पहले गड्ढे में जमा शौच खाद में बदल जाता है। हमने तो इस शौचालय के जरिए गैस बनाने और उसे बिजली तक बनाने के कामयाब प्रयोग किए हैं। दुनिया की कोई भी संस्कृति बिना स्वच्छता और सफाई के आगे बढ़ ही नहीं सकती। भारत तो वैसे भी देवी-देवताओं में आस्था रखने वाला समाज और देश है। बिना साफ-सफाई के देवता भी नहीं आ सकते। इसीलिए सफाई का यहां विशेष महत्व रहा है। हालांकि, दुर्भाग्यवश कालांतर में हमारे समाज में कुछ कुरीतियां घर कर गईं और हम स्वच्छता-सफाई की दुनिया से दूर होते चले गए। लेकिन आधुनिक भारत को स्वच्छता और सफाई का पहला संदेश महात्मा गांधी ने दिया था। 1901 के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी जब शामिल हुए तो उन्होंने देखा कि वहां शौचालयों को कांग्रेस कार्यकर्ता साफ

नहीं करते हैं, बल्कि सिर पर मैला ढोने वाले लोग साफ करते हैं तो उन्होंने इसका विरोध किया। हालांकि, प्रतिनिधियों ने गांधी जी की इस विचारधारा का विरोध किया। लेकिन गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उनके मन में यह बात घर कर गई थी। वहां स्थापित फिनिक्स आश्रम में गांधी जी ने शौचालय की साफ-सफाई खुद करने पर जोर दिया। गांधी जी का मानना था कि स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी सफाई है। गांधी जी का मानना था कि स्वच्छता और नागरिक मूल्य ही राष्ट्रवाद की नींव हैं, इसीलिए उन्होंने ताजिंदगी साफ-सफाई और स्वच्छता पर ना सिर्फ जोर दिया, बल्कि कांग्रेस के कार्यक्रमों के साथ ही अपने आश्रमों में स्वच्छता और उसमें हर व्यक्ति की भागीदारी पर जोर दिया। यहां तक कि उन्होंने 1937 में बुनियादी शिक्षा के लिए वर्धा में जो सम्मेलन बुलाया, उसमें भी उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम में स्वच्छता पर जोर दिया। उनका मानना था कि बच्चे को शुरुआत से ही सफाई के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। गांधी जी के विचार से प्रभावित होकर ही बिहार के मंत्री शत्रुघ्न शरण सिंह के सुझाव पर मैंने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की। आज शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए इसकी दुनिया भर में पहचान है। हमने अब तक डेढ़ करोड़ घरों में दो गड्ढों वाले सस्ते शौचालयों का निर्माण

गांधी जी का मानना था कि स्वच्छता और नागरिक मूल्य ही राष्ट्रवाद की नींव हैं, इसीलिए उन्होंने साफ-सफाई और स्वच्छता पर जोर दिया


13 - 19 नवंबर 2017 किया है। इसके साथ ही हमारी संस्था ने देशभर में करीब 8500 से ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों का न सिर्फ निर्माण किया है, बल्कि वह उन्हें संचालित भी कर रही है। ‘सुलभ’ के जरिए सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता का नया संदेश हमने देने का प्रयास किया है। गांधी जी के बाद अगर इस देश में स्वच्छता के महत्व को किसी ने गहराई से समझा है तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। उन्होंने लाल किले की प्राचीर से 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने का ऐलान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने दूरदर्शी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनका ध्यान स्कूलों में शौचालय की कमी की वजह से पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की ओर गया। उन्होंने हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने के अभियान को स्वीकृति दी है। इस दिशा में सुलभ भी काम कर रहा है। सुलभ इंटरनेशनल ने भारती फाउंडेशन के सहयोग से पंजाब के लुधियाना जिले के तकरीबन हर गांव में शौचालय बनाए हैं। इससे वहां स्कूल जाने वाली लड़कियों और महिलाओं के जीवन में ना सिर्फ सुरक्षा बोध बढ़ा है, बल्कि उनकी जिंदगी में गुणात्मक बदलाव भी आया है। ‘सुलभ’ ने ना सिर्फ शौचालय तकनीक के जरिए सिर पर मैला ढोने वाले लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने की कोशिश की है, बल्कि सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस आॅर्गनाइजेशन की संस्था ‘नई दिशा’ के जरिए अब तक अछूत समझी जाती रही अनेकानेक महिलाओं की जिंदगी में नया सवेरा लाने की कोशिश भी की है। 2003 से ‘नई दिशा’ राजस्थान के टोंक जिला मुख्यालय के हुजूरी गेट इलाके में काम कर रही है। यहां की सैकड़ों महिलाओं को सिर पर ना सिर्फ मैला ढोने की कुप्रथा से मुक्त कराया जा चुका है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सिलाई-कढ़ाई से लेकर अचार-पापड़ बनाने आदि के कामों से भी जोड़ा गया है, जिसके जरिए उन्हें रोजगार भी हासिल है। अब टोंक के संभ्रांत परिवारों में उनके बनाए अचार और पापड़ बिकते हैं। उनके द्वारा सिले कपड़े उच्चवर्गीय परिवारों के लोग भी पहनते हैं। ‘सुलभ’ ने इस कार्यक्रम की प्रेरक उषा चौमड़ को बनाया है। उषा चौमड़ अब सुलभ के स्क्वैंजर मुक्ति अभियान का प्रतीक बन चुकी हैं। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण दे चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने लंदन में बुद्धिजीवियों के बीच भारतीय नारी और स्क्वैंजर मुक्ति पर भाषण दिया है। वह रैंप पर चल चुकी हैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। ‘सुलभ’ अपने सामाजिक दायित्व को निभाते हुए वर्ष 2012 से वृंदावन, काशी और उत्तराखंड की विधवाओं एवं उन पर आश्रित 2000 लोगों की देखभाल कर रहा है। उन्हें अब भोजन के लिए किसी आसरे का इंतजार नहीं रहता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना सामाजिक और नैतिक दायित्व निभाएं और कम से कम किसी एक व्यक्ति को आत्मविश्वास दें, ताकि वह अपने जीवन में आत्म निर्भर हो सके। सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में हम सभी सक्षम हैं, लेकिन आवश्यकता बस एक पहल की है।

ल​ीक से परे

डॉ. जॉन चेल्लादुरई

खुला मंच

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लेखक वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता और विचारक हैं

स्वच्छता, स्वाधीनता और महात्मा

हमारे रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बाजार और तो और मंदिरों के परिसर तक जंक यार्ड जैसे दिखते हैं। गांधी जी ने इन्हें ‘बदबूदार मांद’ करार दिया था

ध्य महाराष्ट्र के एक नवयुवक ने गांधी जी का आशीर्वाद लेने के लिए उनके सेवाग्राम आश्रम में जाकर उनसे भेंट की। उस नवयुवक ने आईसीएस की प्रारंभिक परीक्षा पास की थी। गांधी जी ने उस नवयुवक से पूछा, तुम आईसीएस क्यों बनना चाहते हो? नवयुवक ने उत्तर दिया, भारत की सेवा करने के लिए। गांधी जी ने उसे सलाह दी, गांव में जाना और साफ-सफाई करना भारत की सबसे उत्कृष्ट सेवा है। इसके बाद आईसीएस बनने के इच्छुक अप्पा पटवर्धन ‘सफाई’ की कला में विशेषज्ञता हासिल कर देश के बेहतरीन स्वाधीनता सेनानियों में शुमार हो गए। स्वाधीनता संग्राम के विद्यालय में ‘सफाई’ और ‘स्वच्छता’ की पहली शर्त थी। विनोबा भावे, ठक्कर बाबा, जे.सी. कुमारप्पा और बेहद प्रतिभाशाली असंख्य नौजवान स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े और उन्होंने सफाई एवं स्वच्छता को स्वाधीनता की बुनियाद मान लिया। सत्य के अन्वेषक के रूप में गांधी जी ने बहुत सतर्क जीवनशैली अपनाई और स्वच्छता को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की। राष्ट्रपिता होने के नाते उन्होंने महसूस किया कि सफाई का राष्ट्र निर्माण में अपरिहार्य स्थान है और कहा, ‘स्वच्छता का स्थान ईश्वर के करीब है।’ विकास मानव सभ्यता का वफादार साथी रहा है। प्रागैतिहासिक आदि मानव से लेकर अत्याधुनिक शहरी मानव तक, हमने जीवन को काफी हद तक तात्कालिक बनाया है। विकास को उन्नति के रूप में देखा गया है, जो नवाचार जीवन के किसी भी पहलू में लाता है। मानव विकास का दृष्टिकोण वैयक्तिक कल्याण के समस्त पहलुओं को समाहित किए हुए है- खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ एवं ताजी हवा, सुरक्षित पेयजल, स्वास्थ्य एवं सफाई, साधन तक पहुंच, इन सभी की निश्चितता के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं चयन की आजादी। इनमें से विकास के अधिकांश घटकों को दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वालों के रूप में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है, जैसा कि अब्राहम मैसलॉ ने कहा है। विकासशील समुदाय होने के नाते, हमने ऐसी व्यवस्थाएं तैयार करने में काफी मशक्कत की है, जिससे हमने शारीरिक आवश्यकता की महज आपूर्ति पक्ष का ध्यान रखा है। दूसरे पक्ष, निपटान को सरासर नजरअंदाज किया है। निपटान विरले ही कभी विकास के एजेंडे की योजना में होता है। मानव जाति जो पाक कला, विकास के उपकरण बनाने में माहिर है, उसे उसके गौण उत्पादों को निपटाने में भी महारत हासिल होनी चाहिए। नतीजतन, हमारे रेलवे स्टेशन, बस अड्डे,

बाजार और तो और मंदिरों के परिसर तक मक्खियों, मच्छरों और चूहों से भरपूर जंक यार्ड जैसे दिखते हैं। गांधी जी ने इन्हें ‘बदबूदार मांद’ करार दिया था। हमने तो पवित्र गंगा को भी विशाल सीवर में परिवर्तित कर डाला है। सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति शहर के लोगों के बेरुखी भरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए गांधी जी ने कहा था, ‘यह सोच सुविधाजनक नहीं है कि लोग सड़कों पर निरंतर इस खौफ के साए में चलते हैं कि बहुमंजिली इमारतों के बाशिन्दे उन पर थूक सकते हैं।’ वे खुले में शौच करने को ‘असभ्यता’ के समान मानते थे, जिसके कारण अगर कोई ऐसे समय में गुजर रहा होता है, तो हम नजर फेर लेते हैं। गांधी जी के लिए, स्वच्छता सिर्फ एक जैविक आवश्यकता भर नहीं, बल्कि जीवनशैली, सत्य की अनुभूति का अभिन्न अंग थी। साफ-सफाई की उनकी समझ सत्य की सार्वभौमिक एकात्मकता के अहसास से उपजी थी। गांधी जी जिन्होंने सत्य की ईश्वर के समान स्तुति की, उन्होंने पूर्ण, सर्वव्यापी सत्य को ऐसा शुद्ध पाया और इसीलिए ‘स्वच्छता की बराबरी ईश्वर’ से कर डाली। उन्होंने ‘स्वच्छता’ को रचनात्मक कार्यक्रम की सूची में शामिल करते हुए उसे स्वाधीनता के अनिवार्य कदम का दर्जा दिया। सत्य के इस अन्वेषक ने जीवन को सत्य की करीबी अभिव्यक्ति के रूप में देखा, इसीलिए उन्होंने जीवन की सत्य अथवा ईश्वर के साथ बराबरी की। वे सभी प्रक्रियाएं जो जीवन और उसके आचरण का अंग हैं, वे सत्य की अनुभूति का अंग भी हैं। इस अर्थ में, गांधी जी का मानना था कि आंतरिक और बाहरी साफ-सफाई, स्वच्छता ईश्वर की अनुभूति के साधन हैं। गांधी जी का मानना था कि आंतरिक और बाहरी साफ-सफाई, स्वच्छता ईश्वर की अनुभूति के साधन हैं। ‘मैले शरीर और उस पर अशुद्ध मस्तिष्क के साथ हम ईश्वर का आशीर्वाद नहीं पा सकते। स्वच्छ शरीर किसी गंदे शहर में वास नहीं कर सकता।’ भारत की आजादी के बारे में गांधी जी के समग्र दृष्टिकोण ने उन्हें स्वराज प्राप्ति की भारत की कोशिशों में स्वच्छता के अनोखे स्थान का बोध

कराया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने उस गंदगी का उल्लेख किया जिसने इस पवित्र शहर को ढंक रखा है। ‘कोई भी भाषण हमें स्वशासन (स्वतंत्रता) के लिए उपयुक्त नहीं बना सकता। सिर्फ हमारा आचरण है, जो हमें इसके उपयुक्त बनाता है।’ स्वच्छता उनके लिए ‘स्वराज्य योजना’ थी। स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करते हुए उन्होंने स्वाधीनता के पहलुओं की व्याख्या की और ‘स्वच्छ आचरण’ के महत्व पर प्रकाश डाला। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि इससे पहले कि हम स्वशासन के बारे में सोचे, हमें कुछ आवश्यक परिश्रम करना होगा। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से गांधी जी ने गांवों की हालत को गंभीर करार दिया। ‘हमारी गरीबी का एक प्रमुख कारण स्वच्छता की अनिवार्य जानकारी उपलब्ध न होना है। यदि गांवों की साफ-सफाई में सुधार लाया जाए, तो लाखों रुपए आसानी से बचाए जा सकेंगे और लोगों की दशा में कुछ हद तक सुधार लाया जा सकेगा। बीमार किसान, स्वस्थ किसान जितनी मेहनत नहीं कर सकता।’ इस आशय में उन्होंने कहा, ‘स्वराज सिर्फ अंग्रेजी दासता से मुक्ति नहीं, बल्कि समस्त प्रकार की दासता से मुक्ति है।’ गांधी जी ने अहिंसात्मक जीवन को ईश्वर की अराधना, सत्य के सबसे बेहतर साधन के रूप में देखा। उन्होंने जीवन की सेवा के प्रत्येक कार्य को ईश्वर के मार्ग के रूप में देखा। उन्होंने स्वच्छता को शुद्धता के कार्य के रूप में देखा और अपार आनंद प्राप्त किया।


18 फोटो फीचर

13 - 19 नवंबर 2017

अनोखा टॉयलेट म्यूजियम

सुलभ ग्राम नई दिल्ली में स्थित 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स', 2500 ई.पूर्व से लेकर अब तक हुए टॉयलेट के विकास को दर्शाने वाला अनोखा संग्रहालय है। यह विश्व का एकमात्र टॉयलेट म्यूजियम है। अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर 'द टाइम' पत्रिका ने इस पर विशेष फीचर प्रकाशित किया था

फोटोः मोंटू

1920 में अमेरिका में बना दो मंजिला टॉयलेट कांप्लेक्स, जिसमें पहली मंजिल प्रबंधकीय वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित है और दूसरी मंजिल का इस्तेमाल श्रमिक करते हैं

सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स का भीतरी दृश्य

वैशाली में दूसरी सदी का टैराकोटा से बने टॉयलेट का अवशेष

19वीं सदी के उत्तरार्ध में बने टॉयलेट का मॉडल सुलभ म्यूजियम का भीतरी दृश्य


19 विक्टोरियन पीरियड का अलंकृत सिरामिक टॉयलेट

सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक द्वारा आविष्कृत टू पिट पोर फ्लश टॉयलेट का मॉडल

पुष्पाकृति से सज्जित 19वीं सदी का चैंबर पॉट

महारानी एलिजाबेथ-प्रथम के दरबारी जॉन हेरिंगटन ने वर्ष 1596 में पहले आधुनिक फ्लश टॉयलेट का आविष्कार किया

लकड़ी का बना मोबाइल टॉयलेट

लेदर चेयर के रूप में बना लग्जरी टॉयलेट

क्लासिक इंग्लिश टॉयलेट के तौर पर बुक शेल्फ की आकृति वाला फ्रांसीसी टॉयलेट

इंसिनोलेट- अमेरिका में बना इलेक्ट्रिक टॉयलेट, जिसमें मल को तत्काल नष्ट करने की व्यवस्था है

सुलभ मोबाइल टॉयलेट वैन का मॉडल

पोर्टेबल टेंट टॉयलेट। यह टॉयलेट इस्तेमाल में तो आसान है ही, यह खुले मेें शौच की समस्या से निपटने में भी कारगर हैं


20 पहल

13 - 19 नवंबर 2017

ट्रंप विलेज में बदलाव की बयार

मरोड़ा गांव और ट्रंप विलेज में फर्क बस इतना है कि मरोड़ा गांव की जिंदगी बीमारियों और मुश्किलों से भरी थी, लेकिन इसके ट्रंप विलेज बनते ही बदलाव की ऐसी बयार बही कि लोगों के जीने के मायने बदल गए

खास बातें स्वछता बहुत ही आवश्यक है। अगर आप अपने बच्चों को कीचन में गंद फैला कर चले जाने देते हैं तो आप शायद उन्हें कुछ भी नहीं सिखा रहे हैं - एमरिल लेगासे

कुछ महीने मराेड़ा गांव को कोई नहीं जानता था लेकिन इसके ट्रंप विलेज बनते ही यहां सब कुछ बदल गया

सुलभ ने यहां अब तक 95 टॉयलेट बना दिए हैं

प्रियंका तिवारी

हले हमें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता था, जिसकी वजह से हमारे काम समय से पूरे नहीं हो पाते थे, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे। इतना ही नहीं बरसात के दिनों में हमें कीड़े-मकोड़े का डर तो रहता ही था, कीचड़ से भरे रास्तों की वजह से हमें शौच जाने के लिए सौ बार सोचना पड़ता था... लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। दुख भरे पुराने दिनों की अब सिर्फ बुरी यादें ही बची हैं। गांव में सुलभ शौचालय बन जाने से हमें इन समस्याओं से मुक्ति मिल गई है। हम इस काम के लिए डॉ. पाठक और सुलभ के बहुत आभारी हैं। हमें नहीं पता था कि खुले में शौच करने से हमें तमाम बीमारियों का सामना करना पड़ता है। आज हमारे गांव से ज्यादातर बीमारियां दूर हो गई हैं, जो सिर्फ खुले में शौच करने की वजह से होती थीं। आज हमारे गांव को लोग जानने पहचानने लगे हैं। पहले हमारे गांव में कोई नहीं आता था, लेकिन जब से हमारे गांव में डॉ. पाठक के कदम पड़े हैं, हमारे तो भाग्य ही बदल गए। यह बातें मेवात जिले के मरोड़ा यानी ट्रंप गांव के जमींदार मुकेश कुमार ने कहीं।

मसीहा हैं डॉ. पाठक

मुकेश कहते हैं कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद इस गांव को उनके दादा जी ने बसाया था। शिक्षा की कमी के कारण यहां के लोग मेहनत मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करते हैं। हमारे गांव में पहले शौचालय नाममात्र के थे, जिनका कोई उपयोग नहीं करता था। एक दिन हमारे गांव में डॉ. पाठक मसीहा बनकर आए। डॉ. पाठक ने गांव वालों को शौचालय के उपयोग और इससे होने वाले फायदे के बारे में बताया। इतना ही नहीं उन्होंने हमारे गांव के

प्रत्येक घर में सुलभ शौचालय का निर्माण करवाया, जिसके लिए हम उनके बहुत आभारी हैं। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में सुलभ ने हमारे गांव में 95 शौचालयों का निर्माण करवाया और 15 शौचालय अभी बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज हमें और हमारे गांव को लोग ट्रंप गांव के नाम से जानने लगे हैं। हमारे गांव में समस्याएं तो बहुत हैं, लेकिन हमारी प्राथमिक समस्या थी गांव की बहू-बेटियों का शौच क्रिया के लिए घंटों इंतजार करना और बरसात व जाड़े के दिनों में सांप और बिच्छू से बचना.... जिसे सुलभ शौचालय ने दूर कर दिया। डॉ. पाठक और सुलभ ने हमारे गांव के साथ-साथ हमारी बहू-बेटियों की भी इज्जत बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि डॉ. पाठक का आभार व्यक्त करने के लिए हमारे पास शब्द ही नहीं है। हम कम पढ़े-लिखे लोग हैं, हमें नहीं मामूल की कैसे बात की जाती है। हम तो बस इतना ही जानते हैं कि आज हमारे रहन-सहन में जो बदलाव आया है, यह सब डॉ. पाठक की देन है।

बदली गांव की दशा

बता दें कि कुछ महीने पहले हरियाणा के मेवात जिले के इस छोटे से गांव मराेड़ा को कोई नहीं जानता था। इस गांव के लोगों ने कभी सोचा नहीं था कि इनके भी दिन बहुरेंगे। कभी इनके भी गांव में बिजली, पानी, चिकित्सा और रोजगार के अलावा इनकी रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली समस्याओं के बारे में कोई इनकी सुध लेने आएगा। इस बदलती दुनिया से दूर यह गांव अपनी ही धुन में मगन रहता था, लेकिन सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के कदम इस गांव में पड़ते ही यहां कि दशा बदल गई। यहां की महिलाएं आज खुशी से उनका गुणगान करते नहीं थकती हैं।

हमारे गांव में कोई नहीं आता था, लेकिन जब से यहां डॉ. पाठक के कदम पड़े हैं, हमारे तो भाग्य ही बदल गए - मुकेश कुमार, ग्रामीण

डॉ पाठक ने बनाया वैश्विक गांव

डॉ. पाठक ने इस गांव में सुलभ शौचालय ही नहीं बनवाए, बल्कि इस गांव का नाम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नाम पर रखकर इसे वैश्विक बना दिया है। आज देश ही नहीं दुनिया में भी लोग इस छोटे से गांव को ‘ट्रंप विलेज’ के नाम से जानने लगे हैं। कभी शौच क्रिया के लिए घंटों इंतजार करने वाली महिलाएं आज डॉ. पाठक और सुलभ को धन्यवाद देते नहीं थकतीं। इस गांव से बाहर भी कोई दुनिया है शायद यहां के बच्चों को पता नहीं था, लेकिन आज ये बच्चे देश दुनिया को जानने के लिए उत्सुक दिख रहे हैं तो इसका श्रेय डॉ. पाठक को जाता है। सुलभ के कार्यकर्ताओं ने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर इस गांव की आबो-हवा बदल दी।

सुलभ के प्रयासों से आई जागरुकता

सुबह होते ही पानी भरना, खाना बनाना और तो और मवेशियों के लिए खेतों-जंगलों से चारा लाना, यहीं तक सिमट के रह गई थी इनकी जिंदगी। आज के बदलते परिवेश से अनजान ये महिलाएं इसे ही अपनी दुनिया मान बैठी थीं, लेकिन इनके जीवन में परिवर्तन की अलख सुलभ ने जगाई। आज ये महिलाएं सुलभ शौचालय में शौच के लिए जाती हैं और अपने स्वास्थ के प्रति जागरुक भी हो रही हैं। इतना ही नहीं आज इस गांव की लड़कियां सुलभ सिलाई सेंटर के माध्यम से सिलाई-कताई सीख रही हैं और वह इसे लेकर काफी उत्साहित भी दिख रही हैं।

शिक्षा की तरफ बढ़े कदम

सुलभ के ही प्रयासों से आज यहां कि महिलाएं पढ़ना लिखना सीख रही हैं। 50 की उम्र पार चुकी यहां की महिलाएं कंप्यूटर के माध्यम से लिखने-पढ़ने की कोशिश कर रही हैं। वह भी इस पढ़े-लिखे समाज का हिस्सा बनना चाहती हैं। कहते हैं कि कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो उम्र आड़े नहीं आती और


13 - 19 नवंबर 2017

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मात्र डेढ़ महीने में सुलभ ने यहां 95 शौचालयों का निर्माण करावा दिया। शौचालय बन जाने से हमारे गांव की आधे से ज्यादा समस्याएं दूर हो गई हैं - अब्दुल जब्बार, सरपंच बहुत शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमारे गांव में शौचालय का निर्माण करवाया, जिससे हमें आए दिन होने वाली परेशानियों से निजात मिली है। हम सुलभ के इस नेक काम में उनका पूरा सहयोग करते हैं और सुलभ के लोगों का आभार व्यक्त करते हैं।

प्रगति पथ पर गांव

इसी बात को आज ट्रंप विलेज की महिलाएं चरितार्थ कर रही हैं। शिक्षा के अभाव के कारण यहां के लोग मेहनत मजदूरी करके ही अपना जीवन जीते आ रहे हैं, लेकिन अब उनमें भी पढ़ने लिखने की ललक दिख रही हैं, गांव में कोई उच्च शिक्षा का माध्यम नहीं होने के बावजूद घर से कई मील दूर जाकर यहां के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा ये बच्चे अपने घर और आस-पास के लोगों को भी जागरुक कर रहे हैं।

महिलाओं का बदला जीवन

सुलभ शौचालय बनने से हमें बहुत फायदा हुआ है, हम इसके लिए डॉ. पाठक के बहुत शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमारी बहू-बेटियों को होने वाली समस्याओं से निजात दिलाई। इस्लाम ने कहा कि पहले खुले में शौच जाने से तमाम तरह की बीमारियां होती थीं, बच्चे स्कूल लेट से जाते थे। महिलाओं को सूरज निकलने के बाद अंधेरे का इंतजार करना पड़ता था, जिससे उन्हें पेट दर्द, उल्टी व चक्कर आना, हैजा, डायरिया जैसी बीमारियों का आए दिन सामना करना पड़ता था, लेकिन जब से डॉ. पाठक ने हमारे गांव में सुलभ शौचालय बनवाया है तब से हमारे गांव से कई बीमारियां जैसे छू-मंतर हो गई हैं।

क्या कहती हैं रुबीना

रुबीना कहती हैं कि खुले में शौच क्रिया के लिए जाना गांव की सबसे बड़ी समस्या थी, जो अब सुलभ शौचालय बनने से दूर हो गई है। पहले जब बरसात के मौसम में रात में शौच महसूस होती तो घर से बाहर जाने के लिए सौ बार सोचना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। रुबीना कहती हैं कि मैं इस गांव की बेटी हूं और बचपन से अपने गांव को देखती

आ रही हूं। पहले हमें घर से दूर शौच क्रिया के लिए जाना पड़ता था। बरसात के दिनों में जब बच्चों को शौच क्रिया महसूस होती थी, तो उसे हमें घर के बाहर ले जाना पड़ता था। जंगल दूर होने की वजह से बच्चों को खेतों में बैठा देते थे तो खेत के मालिक बोलते थे कि यहां अनाज पैदा होता है और तुमने बच्चे को शौच के लिए यहां बैठा दिया, जिससे बहुत शर्म महसूस होती थी, लेकिन अब शौचालय बन जाने से हमें इन दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है। हम डॉ. पाठक को इसके लिए धन्यवाद देते हैं।

शिक्षा की आरती

आरती गांव की महिलाओं और बच्चियों को कंप्यूटर के माध्यम से पढ़ना-लिखना सिखाती हैं। आरती कहती हैं कि वह बच्चों को पढ़ने के लिए आंगनबाड़ी छोड़ने जाती थी, तो एक दिन वहां उन्हें ‘नई दिशा’ और ‘पीपल टू पीपल इंडिया’ कंपनी के बारे में पता चला। यह दोनों संस्था मिलकर हरियाणा के 21 जिले में महिलाओं और लड़कियों को साक्षर बनाने का काम कर रही है। आरती बताती हैं कि आंगनबाड़ी में ही इस संस्था के मैनेजर से उनकी मुलाकात हुई थी। उन्होंने आरती से पूछा कि क्या तुम अपने गांव की महिलाओं को पढ़ा-लिखा सकती हो तो आरती ने कहा कि जी हां हमने कक्षा 10 तक पढ़ाई की है और हम अपने गांव की महिलाओं और बच्चियों को पढ़ा सकते हैं। आरती कहती हैं कि उन्होंने हमें सबसे पहले कंप्यूटर की ट्रेनिंग दी। उसके बाद उन्होंने हमें 50 महिलाओं को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी। इसके बाद से हमने भी ठान लिया है कि हम अपने गांव की महिलाओं को साक्षर बना कर ही रहेंगे और उन्हें उनके खिलाफ होने वाले अन्याय के लिए जागरुक भी करेंगे। इसके साथ ही हम सुलभ के

ट्रंप गांव के पूर्व सरपंच अब्दुल जब्बार कहते हैं कि सुलभ ने हमारे गांव में 95 शौचालयों का निर्माण करवाया है, जिसके लिए हम सुलभ और डॉ. पाठक जी का धन्यवाद करते हैं। अब्दुल बताते हैं कि मेवात जिले के गांव धांधुका में सुलभ शौचालय बनवाने का काम कर रही थी, जिसके बारे में हमें पता चला तो हम वहां गए और मैडम मोनिका जैन से संपर्क किया। हमने मैडम मोनिका से अपने गांव में भी शौचालय बनवाने की बात कही तो उन्होंने हमारी बात को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसके बाद हमारे गांव में भी शौचालय निर्माण का कार्य शुरू किया गया और मात्र डेढ़ महीने में सुलभ ने यहां शौचालयों का निर्माण करावा दिया। शौचालय बन जाने से हमारे गांव की आधे से ज्यादा समस्याएं दूर हो गई हैं। पहले हमारे गांव की बहू-बेटियों को शौच क्रिया के लिए बाहर जाना पड़ता था, जहां उन्हें लोग बुरी नजर से देखते थे, उनके साथ छेड़छाड़ करते थे, उल्टे-सीधे कमेंट करते थे और जब तक हम लोग पहुंचते वह लोग वहां से भाग जाते थे। इसके साथ ही बच्चों को भी इससे बहुत परेशानियां होती थी। अक्सर सड़क पार करते समय बच्चों का एक्सीडेंट हो जाता था, लेकिन जब से सुलभ शौचालय बना है, हमारे गांव से ये सभी परेशानियां समाप्त हो गई हैं। अब हमारे गांव की बहू-बेटियों को शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ता है। डॉ. पाठक और सुलभ के प्रयासों से आज हमारे गांव को लोग जानने लगे हैं। पहले हमारे गांव में कोई नहीं आता था और ना ही कभी कोई हमारी समस्याओं के बारे में पूछने आता था, लेकिन आज दूर-दूर से लोग हमारे गांव को देखने आते हैं, जिसका श्रेय डॉ. पाठक को जाता है। डॉ. पाठक और सुलभ ने हमारे गांव की तस्वीर ही बदल दी है, जिसके लिए हम सुलभ और डॉ. पाठक के बहुत आभारी हैं। बड़ी-बड़ी बातें तो सभी करते हैं, लेकिन किसी कार्य को धरातल पर चरितार्थ कैसे किया जाता है यह सुलभ ने हरियाणा के इस छोटे से गांव में कर दिखाया है। कभी देश-दुनिया के बारे में अनभिज्ञ रहने वाला यह गांव आज प्रगति की नई इबारत लिख रहा है। सुलभ ने अपनी कार्य निष्ठा के बल पर सबसे कम समय में इस गांव को खुले में शौच मुक्त कर दिया है। हालांकि इसके लिए सुलभ को कई तरह की समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। शौचालयस्वच्छता से अनभिज्ञ इस गांव के लोगों को समझाना इतना आसान नहीं था, लेकिन सुलभ के कार्यकर्ताओं ने अपने कार्यकुशलता से इसे चरितार्थ किया।

साफ-सफाई सही मानकों की पहचान है और अच्छी गुणवत्ता निरीक्षक अंतरात्मा की आवाज है – जेआरडी टाटा


22 प्रेरक

13 - 19 नवंबर 2017

शौचालय, सफाई और सेवाग्राम गांधी जी ने सेवाग्राम आश्रम में रहने की जो संहिता तय की थी, उसमें खुद से शौचालय की सफाई करना पहली शर्त थी

अगर आप बिना नहाए ज्यादा दिन तक रहेंगे तो, मक्खियां भी आपका साथ छोड़ देंगी - एर्नी पाइल

खास बातें

गां

एसएसबी ब्यूरो

धी जी जब नमक सत्याग्रह के बाद साबरमती आश्रम नहीं लौटे और महाराष्ट्र में वर्धा में सेवाग्राम नाम से नया आश्रम बनाया तो, इस आश्रम की रहने की संहिता भी उन्होंने तय की। इस संहिता में खुद से शौचालय की सफाई करना पहली शर्त थी। खुद बापू भी यह काम करते थे। सेवाग्राम आश्रम भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित दूसरा महत्वपूर्ण आश्रम है। 1930 में उन्हें नमक सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था। जेल से वापस लौटने पर उन्होंने महाराष्ट्र के नागपुर से 80 किलोमीटर की दूरी पर साबरमती आश्रम स्थापित किया था। आश्रम के लिए जमनालाल बजाज ने जमीन उपलब्ध कराई थी। महात्मा गांधी ने यहां स्वच्छता और बुनियादी तालीम से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए। सेवाग्राम आश्रम से बापू ने देश को स्वच्छता को राष्ट्रीय एजेंडा के रूप में लेने का सबक दिया। दिलचस्प है कि चरखा कातना, हरिजन सेवा से लेकर शौचालय की सफाई जैसे कार्य

को गांधी जी ने रचनात्मक कार्य की श्रेणी में रखा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अक्टूबर 2014 को जब स्वच्छ भारत मिशन की बात कही तो इसके पीछे उन्होंने गांधी को अपनी प्रेरणा और आदर्श बताया। आज जब स्वच्छता अभियान देश में एक जनांदोलन की शक्ल ले चुका है, तो इस बात को रेखांकित करना ऐतिहासिक तौर पर जरूरी है कि राष्ट्रपिता ने प्रमुखता के साथ स्वच्छता का सार्वजनिक आह्वान सबसे पहले 14 फरवरी 1916 को किया था। यानी गांधी जी द्वारा दिए गए स्वच्छता के सबक ने भी एक शती से अधिक लंबी यात्रा पूरी कर ली है। कमाल की बात यह है कि ग्रामोत्थान और ग्रामस्वराज की बात करने वाले इस महापुरुष ने स्वच्छता को लेकर अपने संबोधन में भी गांव को याद किया और कहा कि गांवों की स्वच्छता के सवाल को बहुत पहले हल कर लिया जाना चाहिए था। श्रेय देना होगा प्रधानमंत्री मोदी को स्वच्छता जैसे बुनियादी सवाल को उन्होंने न सिर्फ अपनी सरकार, बल्कि भारतीय समाज का एक कोर एजेंडा बना दिया और इसका असर हर तरफ दिखाई दे रहा है।

चरखा कातना, हरिजन सेवा से लेकर शौचालय की सफाई जैसे कार्य को गांधी जी ने रचनात्मक कार्य की श्रेणी में रखा था

आश्रम के लिए जमनालाल बजाज ने जमीन उपलब्ध कराई थी गांधी जी ने यहां स्वच्छता और शिक्षा से जुड़े कई प्रयोग किए राष्ट्रपिता की प्रेरणा से ही पीएम ने स्वच्छता अभियान शुरू किया स्वच्छता के संकल्प के साथ गांवों के स्वावलंबन का एक नया अध्याय देश में शुरू हो गया है। यहां एक बात और जो बेहद मह्तवूर्ण है, वह यह कि दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के दो दशक लंबे प्रवास को जिन वजहों से खासतौर पर याद किया जाता है, उसमें साम्राज्यवादी अंग्रेजों के द्वारा भारतीय समुदाय के बहुस्तरीय दमन-उत्पीड़न के खिलाफ अहिंसक तरीके से संघर्ष को आगे बढ़ाना सर्वप्रमुख है, पर बात दक्षिण अफ्रीका की हो या भारत लौटने के बाद चंपारण सत्याग्रह की, रचनात्मक कार्यक्रम गांधी जी के हर अभियान का अभिन्न हिस्सा रहा है। इस लिहाज से स्वच्छता की बात उन्होंने हर मौके पर न सिर्फ कही है, बल्कि इसके लिए खुद झाड़ू उठाकर सामने आए हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने दो अक्टूबर, 2019 तक


13 - 19 नवंबर 2017 यानी महात्मा गांधी 150वीं जन्मशती के अवसर तक खुले में शौच से मुक्त भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। सुखद यह है इस दिशा में मिलती पर्याप्त सफलता दिखने भी लगी है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत दो अक्टूबर 2014 तक 4.90 करोड़ शौचालय बन चुके थे। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार 24 सितंबर 2017 तक 2.44 लाख गांव और 203 जिले खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिए गए हैं। इस कार्यक्रम की विशेषता यह है कि बहुत से सार्वजनिक क्षेत्रों के साथ-साथ निजी संस्थानों ने भी सरकार की इस अहम योजना में मिलकर काम किया है और इसे सफल बनाया है। कई औद्योगिक घरानों ने कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत कई गांवों को गोद लिया है और वहां शौचालय बनाने की जिम्मेदारी ली है। 2012 में केवल 38 प्रतिशत क्षेत्र स्वच्छता कवरेज से जुड़े थे। अब यह बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है। साफ है कि स्वच्छता की घोषित मंजिल से अब हम ज्यादा दूर नहीं हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक पखवाड़े के लिए ‘स्वच्छता ही सेवा’ (क्लीनलीनेस इज सर्विस) अभियान आरंभ किया। इस अभियान के तहत देश भर में स्वच्छता मुहिम को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए। इसका उद्देश्य तीन वर्ष पहले राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में आरंभ किए गए स्वच्छ भारत अभियान को बल देना है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने इस अभियान का प्रचार प्रसार के लिए काफी मेहनत की है। इस अभियान में अन्य मंत्रालय, सरकारी विभाग, गैरसरकारी संगठन भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के कार्य में जुटे। दरअसल, गांधी जयंती और स्वच्छता कार्यक्रम के साझे को जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने रखा, उससे महात्मा गांधी को उनके कार्यक्रमों और आदर्शों को याद रखने का एख नया मंत्र देश को मिला है। इस लिहाज से दो अक्टूबर, 2014 का तारीखी महत्व है। इस दिन प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में स्वच्छता के लिए खुद झाड़ू लगाई थी। प्रधानमंत्री ने स्वच्छता का बिगुल बजाया और लोगों ने इस महत्वपूर्ण कार्य में उनका साथ दिया, क्योंकि यही महात्मा गांधी को सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि है। महात्मा गांधी एक शती पूर्व ही भारत के लिए स्वच्छता को पहली प्राथमिकता देना चाहते थे। इस अभियान का उद्देश्य स्वच्छता के अन्य लक्ष्यों के साथ खुले में शौच की आदत को समाप्त करना है और अधिक शौचालयों का निर्माण एवं कूड़े-कचरे के प्रबंधन में सुधार लाना है। स्वच्छता के महत्व पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने कई बार कहा है कि स्वच्छ भारत के विचार का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। यह देशभक्ति से प्रेरित है। हमें स्मरण होना चाहिए कि गांधी जी ने कहा था कि स्वच्छता, स्वाधीनता से अधिक महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपिता ने अपनी स्वच्छता खुद करने को कहा था। वे चाहते थे कि हम अपनी सफाई स्वयं करें और छूआछूत की इस घृणित परिपाटी को समाप्त कर दें। यह आंदोलन स्वाधीनता के बाद धीमा पड़ गया। हालांकि विभिन्न सरकारों ने इस दिशा में कई कार्यक्रम चलाए, लेकिन यह दुखद है कि स्वच्छता और अस्पृश्यता, दोनों विषय बापू के निधन के सात दशक बाद भी देश में विद्यमान हैं।

प्रेरक

गांधी प्रेरणा का सुलभ मार्ग

करीब चार दशक पहले बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते गांधी विचार और कार्यक्रमों के करीब आए डॉ. विन्देश्वर पाठक तब से पूरी दुनिया में स्वच्छता का अलख जगा रहे हैं

ज देश में स्वच्छता को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक। करीब चार दशक पहले बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते गांधी विचार और कार्यक्रमों के करीब आए डॉ. पाठक ने तब से न सिर्फ पूरे देश में, बल्कि अखिल विश्व में स्वच्छता का अलख जगा रहे हैं। सिर पर मैला ढोने की प्रथा को लेकर सुलभ ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। सिर से मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने की सोच की ही देन है सुलभ द्वारा विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। आज यह तकनीक पूरी दुनिया में ‘सुलभ शौचालय’ के रूप में जानी जाती है। इस तकनीक में पहले गड्ढे में जमा शौच खाद में

अपर्याप्त स्वच्छता स्वास्थ्य संबंधी कई बीमारियों और असमय मृत्यु का कारण बनती है। अनुमान लगाया गया है कि देश में हर साल स्वच्छता की दयनीय स्थिति के कारण बीमारियों और असमय मृत्यु से देश अपनी जीडीपी का 6.4 प्रतिशत खो देता है। अब स्थिति बदल रही है और विभिन्न सरकारी एजेंसियां स्वच्छता की चुनौती का सामना करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा है कि पूर्व में स्वच्छता और निजी स्वच्छता की कमी के कारण भारत में अनुमानतः प्रति व्यक्ति साढ़े छह हजार रुपए बर्बाद होते हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान जन-स्वास्थ्य पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ेगा। इससे निर्धनों की आय की बचत होगी और अंततः राष्ट्र की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। उन्होंने कहा कि स्वच्छता को राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे राष्ट्रभक्ति और जन-स्वास्थ्य की प्रतिबद्धता से जोड़ा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने एक सर्वेक्षण किया है, जिसमें स्वच्छ भारत मिशन के लाभों के बारे में एक अनुमान लगाया गया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छता के सुधार के कार्य में निवेश किए गए एक रुपए से साढ़े चार रुपए की बचत होगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि खुले में शौच से मुक्त समाज

बदल जाता है। सुलभ ने शौचालय के जरिए गैस बनाने और उसे बिजली तक बनाने के कामयाब प्रयोग किए हैं। 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना हुई और आज शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए इसकी दुनियाभर में पहचान है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक भी मानते हैं कि गांधी जी के बाद अगर इस देश में स्वच्छता के महत्व को किसी ने गहराई से समझा है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। का निर्माण होता है तो चिकित्सा खर्च कम होगा, समय की बचत होगी और जलजनित रोगों से होने वाली मृत्यु दर को रोका जा सकेगा, जिससे प्रति वर्ष हर घर में लगभग 50,000 रुपए की बचत हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इससे निर्धनतम लोगों को सर्वाधिक फायदे होंगे, लेकिन इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए स्थानीय निकायों और राज्य सरकारों को दोगुने प्रयत्न करने होंगे और जागरूकता के प्रसार तथा निजी स्वच्छता और शुद्धता के बारे में लोगों के पुरातन दृष्टिकोण को बदलना होगा। सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद कई स्थानों पर बड़ी संख्या में आज भी लोगों का मिथक है कि घर में शौचालय का इस्तेमाल करना उस स्थान को अशुद्ध करना है। सरकार और औद्योगिक घराने शौचालय का निर्माण करवा सकते हैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि लोगों को खुले स्थानों में शौच के नुकसान के प्रति जागरूक करके शौचालयों की परिधि में लाया जाए। उन्हें स्वच्छता के स्वास्थ्य संबंधी और आर्थिक लाभों के बारे में जानकारी दी जाए और यह एहसास दिलाया जाए कि स्वच्छता उनके लिए कितनी आवश्यक है। इस कार्यक्रम की सफलता जनभागीदारी पर निर्भर है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि स्वच्छ और स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए सरकार के साथ समाज की जागरुकता और बढ़े और यह एक स्थायी राष्ट्रीय प्रवृति की शक्ल ले।

दुनिया को गंदा मत कहो, क्योंकि आप अपना चश्मा साफ करना भूल गए हो - एरॉन हिल

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24 रोचक

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टॉप क्लास टॉयलेट

वो जमाना गया जब शौचालय की जरूरत को लोग महज जैसे-तैसे पूरा कर लेते थे। आज तो टॉयलेट भी ऐसे-ऐसे आ गए हैं कि लोग उनकी कीमत और उनसे जुड़ी सुविधाओं के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं

–बैंजामिन डिजराइली

हैंग फंग गोल्डन टॉयलेट

हांगकांग में बने इस टॉयलेट का दाम कुछ हजार नहीं, बल्कि 5 मिलियन डॉलर है। भारत में इसकी कीमत करोड़ों में हो जाती है। 2008 में आए इस टॉयलेट के दाम सुनकर किसी का भी सिर चकरा सकता है। इस टॉयलेट का निर्माण उस वक्त हुआ,

रूस की एक कंपनी द्वारा बनाया गया ‘स्पेस टॉयलेट’ दुनिया का सबसे महंगा टॉयलेट है। यह कोई आम टॉयलेट नहीं है। यह नासा के वैज्ञानिकों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इस टॉयलेट की कीमत है 19 मिलियन डॉलर है। यह कोई मजाक नहीं है, इस टॉयलेट का दाम सच में इतना है। अब आप सोचेंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या खास है। यह सोने का बना हुआ भी नहीं है, फिर इतना ज्यादा दाम क्यों है? दरअसल, इस टॉयलेट की खासियत है कि यह मूत्र को पानी में तब्दील कर देता है।

‘डगोबर्ट’ टॉयलेट

यह टॉयलेट सीट आपको राजाओं वाला एहसास करवाती है। इसका दाम 1200 डॉलर है। यह टॉयलेट पूरी तरह से लकड़ी से बनाया जाता है। यह पुराने समय की जीवनशैली पर बना टॉयलेट है। इस वजह से इसमें अन्य बहुत सी सुविधाएं उसी जमाने के हिसाब से मिलती हैं। इसमें मोमबत्ती रखने का स्टैंड, राखदानी आदि के लिए जगह दी गई है। इसमें काम पूरा होने पर जब आप खड़े होंगे तो घंटी बजने की सुविधा भी है। एक बात और यह कि भले ही यह टॉयलेट पुराने समय जैसा दिखता हो, पर इसको बनाने में आधुनिक जमाने की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसे ‘क्लासिक’ टॉयलेट की सूची में भी शामिल किया गया है।

हैंग फंग गोल्डन टॉयलेट जब बाजार में सोने का दाम कम था। इसको ‘हैंग फंग’ नामक एक कंपनी ने बनाया था।

स्पेस टॉयलेट

स्पेस टॉयलेट

‘डगोबर्ट’ टॉयलेट

क्रिस्टल टॉयलेट

128,000 डॉलर का यह टॉयलेट पूरी तरह ‘स्वारोस्की’ क्रिस्टल से बना है, जिसे एक प्रकार से हीरे का टुकड़ा माना जाता है। इसमें ‘स्वारोस्की’ क्रिस्टल के 72,000 टुकड़ों का यूज किया गया है। इस टॉयलेट को बनाने में लगभग एक महीने का समय लगा था। यह उस वक्त दुनिया के सामने लाया गया, जब जापान सुनामी और भूकंप से हुई त्रासद से उबर रहा था। कंपनी के मालिक का दावा था कि उनकी यह ‘टॉयलेट सीट’ सबसे अलग होगी, जो सच भी साबित हुई। यह सीट लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी।

न्यूयार्क म्यूजियम का टॉयलेट

18 कैरेट सोने से बना यह टॉयलेट एक दिन के लिए अमेरिका की आम जनता के लिए

खोला गया था। न्यूयॉर्क के एक संग्रहालय में यह टॉयलेट सीट लगाई गई थी, ताकि एक दिन के लिए आम जनता भी इसका अनुभव ले सकें। खबरों की मानें तो लोग कतारों में खड़े होकर इस पर एक बार बैठने का इंतजार करते देखे गए थे। इस टॉयलेट सीट की कीमत 1,474,592 से 2,527,872 डॉलर के करीब है। इस टॉयलेट सीट को संग्राहलय की चौथी मंजिल के बाथरूम में लगा दिया गया था, ताकि आम लोग वहां जा सकें। इस टॉयलेट को इटली के आर्टिस्ट मौरिजियो कैटिलेन ने बनाया है।

मून रीवर पार्क टॉयलेट सीट

750,000 डॉलर की लगत से शंघाई में बने इस टॉयलेट को 2005 में जब पहली बार जनता के लिए खोला गया था, तो लोग लंबी कतारों में इसके दीदार के लिए पहुंचे थे। जहां इस टॉयलेट को लांच किया गया, वह एक पर्यटक स्थल जैसा बन गया है। यहां प्रवेश-शुल्क देकर आप टॉयलेट का इस्तेमाल कर सकते हैं

क्रिस्टल टॉयलेट

साफ-सफाई और व्यवस्था वृत्ति का मामला नहीं है, यह शिक्षा का मामला है दूसरे महान चीजों की तरह, आपको स्वयं विकसित करना होगा इसके स्वाद को चखने के लिए

स मॉर्डन लाइफ में अगर लोगों से पूछा जाए कि उन्हें किस चीज का क्रेज है, तो कुछ लोग कहेंगे भाई हमें ब्रांडेड कपड़े पंसद हैं, वहीं कुछ लोग कहेंगे कि हमें महंगे जूते और लक्जरी गाडियां पसंद हैं। इस तरह की कुछ और दूसरी पसंद हो सकती है। पर क्या आपने किसी को यह कहते सुना है कि उसे टॉयलेट सीट्स का क्रेज है। चौंकिए मत, यह सच है। तेजी से बदलते वक्त में अन्य चीजों के साथ टॉयलेट सीट्स के लिए भी लोगों की दीवानगी बढ़ी है। दुकानों पर महंगी से महंगी सीट खरीदने की होड़ सी मचने लगी है। आइए जानते हैं कि दुनिया की कुछ टॉप क्लास टॉयलेट सीट्स के बारे में


13 - 19 नवंबर 2017

मून रीवर पार्क टॉयलेट सीट

आईनैक्स टॉयलेट सीट

6000 डॉलर की लागत से बनी इस टॉयलेट की सीट गजब की है। इसको यूज करते समय आपको कोई भी काम खुद से नहीं करना पड़ता। मसलन, यह अपने आप खुल जाता है और टॉयलेट में समय व्यतीत करते हुए आप चाहें तो अपना कोई मनपसंद गीत सुन सकते हैं। बाथरूम की लाइट को भी आप अपने अनुसार ढाल सकते हैं। यही नहीं, सर्दियों में तो इस टॉयलेट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह सीट को गरम रखता है, जिससे इस पर बैठने पर ठंड का अहसास न हो।

टोटो मियाबी टॉयलेट सीट

है, जिसकी आप कल्पना करते हैं। 6000 डॉलर वाली इस टॉयलेट सीट में आपको एयर ड्रायर, रूम फ्रेशनर, गरम होने वाली सीट, पैर गरम रखने की मशीन और संगीत जैसे सारे इंतजाम किए गए हैं।

टोटो मियाबी टॉयलेट सीट

ओडिसी वर्टीब्रे टॉयलेट सीट

जापानियों की यह टॉयलेट सीट लोगों को खासा पसंद आती है। इसमें आपको जापानी संस्कृति की झलक दिखेगी, जो किसी का भी दिल मोह लेने में माहिर मानी जाती है। यह टॉयलेट सीट सुंदरता से भरी हुई है। इस पर की गई सजावट तो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। इस जापानी संस्कृति वाले टॉयलेट सीट का दाम है 7000 डॉलर, जो वैसे तो एक टॉयलेट सीट के लिए ज्यादा है। पर अगर आपका कला के प्रति रुझान है, तो यह टॉयलेट सीट आपको खूब पसंद आएगी।

कोहलर नूमी हाईटेक टॉयलेट सीट

कोहलर का बाथरूम से जुड़ी चीजें बनाने में बहुत नाम है। उनकी बनाई इस टॉयलेट सीट को पाने की तमन्ना हर किसी को होगी। इस टॉयलेट सीट में तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। इसमें आपके लिए हर उस चीज का प्रबंध किया गया

वर्टीब्रे टॉयलेट सीट

जिन लोगों को एक साथ बहुत सारे काम एक साथ करने की आदत होती है, उनके लिए 15000 डॉलर की यह टॉयलेट सीट पंसदीदा हो सकती है। इसको पूरा बाथरूम भी बोला जा सकता है। दरअसल यह कई खांचों में बंटी हुई है, इसमें एक समय में आप टॉयलेट इस्तेमाल कर सकते हैं, दांत साफ सकते हैं व साथ ही साथ शॉवर का भी आनंद ले सकते हैं। यह खांचों वाला टॉयलेट उन लोगों को तो बहुत पसंद आएगा जो आलसी हैं, क्योंकि इसमें ज्यादातर काम आप बैठे-बैठे ही कर सकते हैं।

टोटो इंटेलिजेंस-2 टॉयलेट सीट

यह खासतौर पर महिलाओं के लिए तैयार की गई है। यह टॉयलेट सीट किसी डॉक्टर से कम नहीं है। इसकी तकनीक कुछ ऐसी है कि यह आपका रोजाना चेकअप करती है। यह आपके टॉयलेट इस्तेमाल के बाद उसके सैंपल बचा के यह सारी जानकारी कंप्यूटर पर भेजता है। इसमें ब्लड शूगर, ब्लड प्रेशर और शरीर का तापमान आदि आता है। यही नहीं, यह टॉयलेट यह बताने में भी सक्षम है कि कहीं आप गर्भवती तो नहीं हैं। डॉक्टर की खूबी वाले इस टॉयलेट की कीमत 6100 डॉलर है।

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सबसे खतरनाक टॉयलेट

हवा में 8, 500 फीट की ऊंचाई पर है दुनिया का सबसे खतरनाक टॉयलेट। यहां जाना आम इंसानों के वश की बात नहीं है

जुलिएन बेंच टॉयलेट सीट

इस टॉयलेट सीट की खासियत है कि जब यह इस्तेमाल में न हो, तो आप इसके कवर को लगाकर एक बेंच के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी यह खासियत बाथरूम को सुंदर बनाती है। इसकी कीमत 11000 डॉलर रखी गई है। ऐसे में जिन लोगों को अपना बाथरूम सजाने का शौक है और साथ में थोड़ी जेब ढीली करने में कोई हिचक नहीं, उनके लिए तो यह टॉयलेट सीट बहुत ही बढ़िया विकल्प हो सकती है।

रोचक

पना घर और घर का टॉयलेट, इसकी कल्पना करते ही साफ-स्वच्छ टॉयलेट की तस्वीर आंखों के सामने होती है। मगर हर जगह के टॉयलेट एक जैसे नहीं होते। मसलन, ट्रेन के टॉयलेट को ही लीजिए। नाम भर लेने से हम नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं। वैसे ज्यादातर सार्वजनिक जगहों के टॉयलेट का कमोबेश यही हाल है। मगर मजबूरी में जाने से कम से कम डरते तो नहीं। जिस टॉयलेट के बारे में आपको बताने जा रहे हैं, उसके बारे में जानकर ही आप डरने लग जाएंगे। दरअसल, हम बात कर रहे हैं हवा में 8, 500 फीट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया के सबसे खतरनाक टॉयलेट की। जाहिर है कि यहां जाना आम इंसानों के लिए आसान नहीं है। इसे यूं ही दुनिया का सबसे खतरनाक टॉयलेट नहीं कहा जाता। जरा सोचिए, लकड़ी का बना एक ऐसा टॉयलेट जो हवा में 8, 500 फीट की ऊंचाई पर है, वहां का मंजर कैसा होगा। उस पर -50 डिग्री सेंटीग्रेट का तापमान, जिसमें खून भी बर्फ बन जाए तो ऐसे में इंसान टॉयलेट कैसे कर सकता है। मगर साइबेरिया में अल्ताई की पहाड़ियों के चोटी पर वैज्ञानिकों ने अपने इस्तेमाल के लिए ऐसा टॉयलेट बनवाया है, जिसे दुनिया का सबसे खतरनाक टॉयलेट कहा जाता है। अल्ताई की पहाड़ियों पर साइबेरिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित वेदर स्टेशन है, वहीं पर अपनी तरह का अनोखा टॉयलेट स्थित है, जो वहां काम करने वाले लोगों के लिए बनाया गया है। यह वहां काम करने वाले वैज्ञानिकों को एक अलग तरह का ही अहसास दिलाता है। आम लोगों के लिए भले इस टॉयलेट के इस्तेमाल के बारे में भी सोचना खौफ भरा होगा, पर अगर इतनी ऊंचाई पर पहुंचने वाले और काम करने वाले लोगों के अनुभव के बारे में हम सोचेंगे तो खतरनाक कहे जाने वाले इस टॉयलेट के निर्माण के बारे में समझ सकते हैं।

मैं न तो सिगरेट पीता हूं और न ही शराब, क्योंकि मेरे स्कूल के शिक्षक ने हम लोगों को तीन गुणों से काफी प्रभावित किया था। ये गुण हैंव्यक्ति में साफ-सफाई, मन में साफ-सफाई और संयम –जॉन बर्न्स


26 इतिहास

13 - 19 नवंबर 2017

सबसे प्राचीन सार्वजनिक शौचालय

अर्जेंटीना में पुरातात्विक खुदाई के दौरान 24 करोड़ साल पुराने सामूहिक शौचालय का पता चला है। इसे दुनिया का सबसे पुराना सार्वजनिक शौचालय माना जा रहा हैं

साफ-सफाई की परिभाषा है, मन की पवित्रता –जोसफ एडिशन

एसएसबी ब्यूरो

ब से दुनिया को डायनासोर का पता चला है, तब से हमारी जिज्ञासा जीवों के इतिहास से जुड़े रहस्यों को वैज्ञानिक तरीके से जानने की बढ़ गई है। हाल की कुछ पुरातात्विक खुदाइयों से कई दिलचस्प जानकारियां भी सामने आई हैं। वैज्ञानिक पूरी गंभीरता के साथ अपने काम में जुटे हुए हैं, ताकि और नए रहस्यों का पता चल सके। नए पुरातात्विक खुदाई से खासतौर पर डायनासोर के जमाने में कौन -कौन से जीव रहते थे, उनका आकार और व्यवहार कैसा था, इन सबके बारे में कई ऐसे रोचक तथ्य सामने आए हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है। इसी हैरानी से जुड़ा है सामूहिक शौचालय से जुड़े इतिहास का पुरातात्विक साक्ष्य। यह भी कम रोचक नहीं है कि है कि इस बारे में कुछ ऐसी बातों का पता चला है जो आज के जमाने से बिल्कुल मेल खाती हैं।

नए पुरातात्विक अध्ययनों में अर्जेंटीना में एक विशाल ‘सामूहिक शौचालय’ का पता चला है, जो उस जमाने का है जब डायनासोर इस धरती पर नजर आने लगे थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां खुदाई के दौरान एक-दूसरे में गुथे मल के हजारों जीवाश्म मिले हैं, जो गैंडे जैसे किसी जानवर के हैं। 24 करोड़ साल पुरानी इस जगह को ‘दुनिया का सबसे प्राचीन सार्वजनिक शौचालय’ कहा जा रहा है, जो इस बात का पहला सुबूत है कि प्राचीन जीव शौच के लिए किसी एक ही जगह का इस्तेमाल करते थे।

सबसे पुराने शौचालय का रिकॉर्ड टूटा

आहार, बीमारी और वनस्पति को आधार बनाकर किए गए मल के विश्लेषण से पता चला है कि इसका संबंध प्रागैतिहासिक काल से है। अर्जेंटीना में मिले इस विशाल ‘सामूहिक शौचालय’ ने 22 करोड़ वर्ष पुराने एक अन्य ‘सबसे पुराने’ शौचालय का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। अर्जेंटीना के ला रियोजा प्रांत में मिले मल के ये जीवाश्म आकार में 40 सेंटीमीटर चौड़े और वजन में कई किलो भारी हैं, जो भूरे और गहरे भूरे रंग के हैं।

डायनोडोन्टोसोरस

इस खुदाई से जुड़े डॉ. लुकास फाइरोली कहते हैं, ‘इतने बड़े आकार का मल केवल एक प्रजाति देती है, जिसकी हड्डियां यहां पूरे इलाके में बिखरी मिली हैं।’ उनका इशारा शिकारी जानवर ‘डायनोडोन्टोसोरस’ की ओर है जो आठ फीट लंबा जीव है, जिसकी तुलना आधुनिक गैंडे से की जा सकती है। डायनोडोन्टोसोरस बड़े और स्तनधारी रेंगने वाले जीवों की तरह थे, जो समय के उस युग में थे जब डायनासोर पहली बार आकार ले रहे थे।

अर्जेंटीना में खोज

प्रागैतिहासिक काल के किसी जीव का मल मिलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतना पुराना और इतने बड़े पैमाने पर एक ही जगह पर मल मिलना बड़ी बात है


13 - 19 नवंबर 2017

त्रिधारा शौचालय

सुरक्षा के लिए समूह

जेंडर

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पश्चिम बंगाल के 21 वर्षीय साेभन मुखर्जी ने किन्नरों के लिए ‘त्रिधारा’ नाम से शौचालय निर्माण की पहल की हैं

डॉ. लुकास का कहना है कि शौचालय साझा करने की प्रवृत्ति से संकेत मिलता है कि ये स्वभाव से मिलनसार और झुंड में रहते थे। वे कहते हैं, ‘परजीवियों को दूर करने के लिए ऐसा करना जरूरी था, जैसा कि कहते भी हैं कि आप वहां शौच नहीं कर सकते जहां आप भोजन करते हैं।’ हिरण, हाथी और घोड़े उन आधुनिक जीवों में शामिल हैं, जो अपने इलाके की पहचान और परजीवियों को रोकने के लिए आमतौर पर किसी एक ही जगह पर अपना मल विसर्जित करते हैं।

आप गंदे वातावरण में कैसे देव शक्तियों का आवाहन कर सकते हो

94 मल-पिंड मिले

यहां शोधकर्ताओं ने विभिन्न आकार के लीद के बारे में जानकारी इकट्ठा की है। यहां प्रति वर्ग मीटर में 94 मल-पिंड मिले हैं, जो 900 वर्ग मीटर तक के इलाके में फैले हैं। प्रागैतिहासिक काल के किसी जीव का मल मिलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतना पुराना और इतने बड़े पैमाने पर एक ही जगह पर मल मिलना बड़ी बात है। डॉ. लुकास फाइरोली कहते हैं कि ज्वालामुखी से निकली राख ने इस मल को परत में ढककर सुरक्षित रखने में मदद की।

टाइम कैप्सूल जैसा महत्व

इन मल पिंडों का महत्व किसी ‘टाइम कैप्सूल’ की तरह बताया जा रहा है। शोधकर्ता मार्टिन कहते हैं, ‘जब हमने इसकी बाहरी सतह तोड़ी तो इसमें से उस जमाने के परजीवियों, पौधौं और कवक की महक निकली। मल का हर टुकड़ा तब के इको-सिस्टम का उदाहरण है।’ वे ये भी कहते हैं कि इस खोज से उस पर्यावरण की झलक पाई जा सकती है, जिसने डायनासोर को जन्म दिया था।

कि

एसएसबी ब्यूरो

न्नरों का जीवन हर लिहाज से काफी मुश्किलों भरा होता है। उन्हें हमेशा शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सेवाओं आदि जैसे क्षेत्रों में भेदभाव और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शौचालय की बुनियादी पहुंच किन्नर समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली कई समस्याओं में से एक है। किन्नरों के लिए अक्सर सार्वजनिक शौचालयों में प्रवेश करना मुश्किल होता है और अक्सर उन्हें इन शौचालयों में शौच करने से रोक दिया जाता है। हालांकि अप्रैल 2017 में इस समुदाय को केंद्र के एक निर्देश के साथ राहत मिली कि किन्नरों को अपनी पसंद के अनुसार पुरुषों या महिलाओं किसी का शौचालय उपयोग करने की अनुमति है। अब किन्नर समुदाय के लिए अलग शौचालय शुरू करने की एक नई और महान पहल की शुरुआत के लिए 21 वर्षीय एक युवा उनके साथ आया है। किन्नर समुदाय के प्रति समाज का यह रवैया वास्तव में उदासीन था, जिसने पश्चिम बंगाल के 21 वर्षीय सोभन मुखर्जी को किन्नरों के लिए कुछ सकारात्मक कार्य करने हेतु प्रेरित किया था। शौचालयों में प्रवेश न कर पाने के बारे में किन्नर समुदाय द्वारा सामना की जा रही समस्याओं के बारे में सोभन को पता चला, तो उसने एक पहल पर प्रकाश डाला और कहा कि किन्नर समुदाय के लिए स्वयं के शौचालय हों। सोभन ने स्थानीय नगरपालिका पार्षद अनीता कर से संपर्क किया, जिसमें ये विचार किया गया कि दक्षिण कोलकाता के बंसड्रोनी इलाके में स्थित चार पे एंड यूज शौचालयों में से दो को ‘अन्य’ (अदर) के लिए निर्धारित कर दिया जाए। उसने स्थानीय नगर पालिका पार्षद से इस

मामले में आगे आने और इन वॉशरूम (शौचालयों) के संचालन को आगे बढ़ाने को कहा था।

‘त्रिधारा’

सोभन ने किन्नरों के लिए टॉयलेट का नाम ‘त्रिधारा’ रखा है। सोभन ने महसूस किया कि किन्नर एक तीसरा समुदाय है, इसीलिए यह नाम सोभन के द्वारा चुना गया था। शौचालय वर्तमान में कोलकाता और पश्चिम बंगाल की राजधानी के शहर तक ही सीमित हैं। वार्ड 112 से शुरू करते हुए शौचालयों को अन्य वार्डों जैसे 97, 100, 111 और 114 में दोहराया जाएगा। अनीता कर इन वार्डों में उनके समकक्षों के साथ बात कर रही है ताकि सार्वजनिक शौचालयों में अलग-अलग किन्नर इकाइयां हों। इस बीच, सोभन का पश्चिम बंगाल के पूरे राज्य में इस अवधारणा का प्रसार करने का लक्ष्य है और इसके लिए उसने विभिन्न एजेंसियों से संपर्क किया है। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही यह संभव हुआ है, क्योंकि उनके द्वारा की गई पूछताछ में इनकी शुरूआत हुई है।

सोभन मुखर्जी की प्रशंसा

संभवतः देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किन्नरों को एक अलग शौचालय देने के प्रयास किए गए हैं। सोभन मुखर्जी, किन्नर समुदाय के लिए कुछ उल्लेखनीय करने के अपने प्रयासों के कारण प्रशंसा लूट रहे हैं। सोभन मुखर्जी ने एक ऐसे क्षेत्र में काम किया है, जहां अभी तक किसी ने कुछ भी नहीं किया, इस तरह के एक महान विचार के साथ आने के लिए, उन्हें स्थानीय नगरपालिका पार्षद अनीता कर से प्रशंसा मिली है। किन्नर समुदाय ने भी उनके इस कदम का स्वागत किया है और इस समुदाय के कुछ सदस्यों ने अपनी प्रशंसा जाहिर करने के लिए सोभन की कलाई पर राखी भी बांधी।

- स्वामी रामतीर्थ


28 आह्वान

13 - 19 नवंबर 2017

नमो वाणी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन को शुरू किया है, बल्कि वे हर तरह से इस मिशन को 2019 तक मुकाम तक पहुंचाना चाहता है। इसके लिए योजनागत और रणनीतिक पहलों के साथ प्रधानमंत्री देशवासियों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए किछ अभिनव प्रयोग भी कर रहे हैं। इन्हीं प्रयोगों में एक है प्रधानमंत्री मोदी का स्वच्छता को लेकर समय-समय पर किया गया प्रेरक आह्वान। इन आह्वानों को नरेंद्रमोदी डॉट कॉम ने ग्रीटिंग कार्ड की शक्ल में उपलब्ध कराया है, जिसे रोज हजारों लोग डाउनलोड कर स्वच्छता मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं


13 - 19 नवंबर 2017

आह्वान

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30 स्वच्छता

13 - 19 नवंबर 2017

जर्मनी में करें टॉयलेट्स की सैर

विगत 50 वर्षों से स्वच्छता सुलभ का धर्म है। स्वच्छता सुलभ का मूलमंत्र है। स्वच्छता नहीं तो कुछ भी नहीं। –डॉ. विन्देश्वर पाठक

अना हासे बर्लिन घूमने आए सैलानियों को अनोखे टॉलेट्स की सैर कराती हैं। हासे का प्रयोग सैलानियों को काफी पसंद आ रहा है

र्लिन घूमने आया कोई सैलानी क्या टॉयलेट्स की सैर करना चाहेगा? आप अपनी तरफ से भले न कहें, पर ऐसा हो रहा है। बर्लिन में एक टूर टॉयलेट्स की सैर के लिए होता है और यह खूब पसंद किया जा रहा है, क्योंकि अनोखे टॉयलेट्स की सैर भी अनोखी है। आपको कैसा टॉयलेट पसंद है? एक ऐसा टॉयलेट जो 19वीं सदी में बनाया गया। उसकी तकनीक और उसके साफ सफाई का तरीका भी पुराना है, लेकिन आज भी चल रहा है... या फिर जापान में बना एक ऐसा आधुनिक और ऑटोमेटिक टॉयलेट जिसकी कीमत एक छोटी कार जितनी है? बर्लिन में आप सब देख सकते हैं। बर्लिन घूमने आने वाले जो सैलानी मशहूर जगहों के साथ साथ कुछ अलग देखना चाहते हैं, उनके लिए एक टूर गाइड ने अनोखा आइडिया निकाला है। यह गाइड उन्हें बर्लिन के टॉयलेट दिखाने ले जाएगा। गाइड अना हासे बताती हैं कि वह लोगों को अलग तरह के बर्लिन की सैर कराना चाहती हैं।

वह सैलानियों को उन जगहों पर ले जाना चाहती हैं, जहां आमतौर पर लोग नहीं जाते। इसके लिए उन्होंने बर्लिन के सबसे मशहूर टॉयलेट्स को चुना है। इसके लिए उन्होंने काफी रिसर्च के बाद एक टूर तैयार किया है। वह सैलानियों के एक ग्रुप को शहर के सबसे चर्चित टॉयलेट्स दिखाने ले जाती हैं, उन्हें टॉयलेट्स का इतिहास बताती हैं और उनसे जुड़े दिलचस्प किस्से भी सुनाती हैं।

इस सैर में दशकों पुराने टॉयलेट्स से लेकर एकदम आधुनिक और तकनीकी टॉयलेट्स शामिल हैं। आधुनिक बर्लिन की पहचान बन रहे पोट्सडैमरप्लात्स स्क्वेयर पर मौजूद वह टॉयलेट भी इस टूर का हिस्सा है, जो सबसे आधुनिक तकनीकों पर काम करता है। हासे को यह आइडिया 2005 में सालाना इंटरनेशनल टूरिस्ट गाइड डे के मौके पर आया। इस दिन की थीम उन जगहों को बनाया गया जो भीड़भाड़ से हटकर हों और लोगों को राहत पहुंचाए। हासे कहती हैं, ‘मुझे लगा कि मेरे ज्यादातर साथी लोगों को पार्कों और चर्चों में लेकर जाएंगे, लेकिन मैं कुछ अलग करना चाहती हूं। मैं लोगों को बर्लिन में साफ सफाई के इतिहास और टॉयलेट संस्कृति के बारे में बताना चाहती हूं।’ अपने इस अनोखे टूर के जरिए हासे सैलानियों के लिए टॉयलेट्स की कमी की ओर भी ध्यान दिलाना चाहती हैं। उनका यह टूर काफी पसंद किया जा रहा है। वह कहती हैं, ‘पहले तो लोग नाक चढ़ाते हैं, लेकिन जब मैं उन्हें टॉयलेट्स से जुड़ीं अनोखी बातें बताती हूं तो वे हैरान रह जाते हैं।’

पेट्रोल पंपों के शौचालय हुए सार्वजनिक

स्व

नवी मुंबई महानगरपालिका ने सभी पेट्रोल पंपों को निर्देश दिया है कि उनके शौचालयों का सार्वजनिक इस्तेमाल किया जाएगा

च्छता पर गंभीर रुख अपनाते हुए नवी मुंबई महानगरपालिका ने एक अनिवार्य और सख्त कदम उठाने का फैसला किया। मनपा ने कहा है कि उस क्षेत्र के सभी पेट्रोल पम्पों पर मौजूद शौचालय का उपयोग आम लोग भी कर पाएंगे। मनपा ने सभी पम्प मालिकों को इस सम्बंध में आवश्यक निर्देश देते हुए कहा है कि वे शौचालय अब सार्वजनिक शौचालय की तरह इस्तेमाल किए जाएंगे। समझा जाता है कि इस फैसले से आम लोगों को राहत मिलेगी। राह चलते लोग जो टॉयलेट की खोज में परेशान रहते थे, उन्हें ज्यादा भटकना नहीं पड़ेगा। मनपा ने यह निर्णय स्वच्छ भारत अभियान को मजबूत करने के लिए लिया। वैसे इस संबंध में पेट्रोलियम मंत्रालय ने देश भर के पेट्रोल पम्पों को यह आदेश जारी किया है। इसके तहत अब सारे पंपों के शौचालय सार्वजनिक शौचालयों का रूप लेंगें। नवी मुंबई महानगरपालिका में 29 पेट्रोल पंप कार्यरत हैं। इन सभी को मनपा ने हिदायत दी है कि वे अपने परिसर

साफ-सुथरे शहरों में नंबर एक पर और देश में आठवें स्थान पर था। इस साल उसकी कोशिश है कि पूरे देश की सूची में भी वह प्रथम स्थान पर पहुंच जाए। नवी मुंबई मनपा की स्थापना 1 जनवरी, 1992 में हुई थी, तब से वह अपने क्षेत्र की बेहतरी के लिए सक्रिय भूमिका अदा कर रही है। (मुंबई ब्यूरो) वर्गीकृत विज्ञापन

में स्थित शौचालयों पर आम नागरिकों को जाने दें। इस संबंध में वहां सार्वजनिक शौचालय के बोर्ड भी लगाने के लिए कहा है। मनपा को उम्मीद है कि इस फैसले से आम लोगों की परेशानी खत्म होगी और शहर भी स्वच्छ बनेगा। आम जनता से भी कहा जा रहा है कि वे पंपों पर बने शौचालयों का बेधड़क इस्तेमाल करें। उल्लेखनीय है की पिछले वर्ष स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत किए गए सर्वेक्षण की सूची में नवी मुंबई महाराष्ट्र के


13 - 19 नवंबर 2017

टॉयलेट कैफे

रोचक

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टॉयलेट अगर एक थीम बन जाए तो इसका इस्तेमाल दूसरे रूप में भी हो सकता है। इंडोनेशिया में तो बजाप्ता टॉयलेट कैफे ही चलाया जा रहा है

पने अजीबोगरीब थीम पर एक से बढ़कर एक रेस्टोरेंट देखे होंगे लेकिन क्या आपने कभी ऐसा रेस्टोरेंट देखा है जिसका नाम टॉयलेट कैफे हो? नाम ही क्यों, इस रेस्टोरेंट में एक अनोखा फूड कैफे है जिसमें खाना टॉयलेट सीट जैसे बर्तनों में परोसा जाता है। यह रेस्टोरेंट इंडोनेशिया के सेमरांग में स्थित है। कमाल की बात तो यह है कि रेस्टोरेंट की यह थीम किसी फन के लिए नहीं, बल्कि एक खास मुहिम को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इस कैफे के मालिक बुडी लाकसोनो का कहना है कि वह अपने समाज की खातिर ऐसा कर रहे हैं। लाकसोनो एक डॉक्टर भी हैं। वह चाहते हैं कि उनकी इस मुहिम

अमेरिकी रेस्तरां में टॉयलेट सीट

अमेरिका के लॉस एंजिलिस में एक ऐसा रेस्तरां हैं, जहां टेबल के साथ बैठने के लिए कुर्सियां नहीं, बल्कि टॉयलेट सीट लगी है। मेजों पर लगे लैंप शावर के आकार के हैं

से इंडोनेशिया में लोगों का ध्यान साफ टॉयलेट्स की ओर जाए। बुडी की शिकायत है कि देश में लगभग ढाई करोड़ घरों में अब भी टॉयलेट नहीं हैं। सफाई की यह कमी लोगों को बीमार रखती है और देश को पीछे ले जाती है। भारत और इंडोनेशिया जैसे तीसरी दुनिया के देशों में टॉयलेट की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक 2014 में इंडोनेशिया में लगभग साढ़े छह करोड़ लोग खुले में शौच जा रहे थे। मुस्लिम बहुल ये देश इस थीम्ड कैफे को बिलकुल पसंद नहीं करता। उनके हिसाब से यह कैफे इस्लामिक लॉ के खिलाफ है। हालांकि की बुडी इस कैफे की सफाई और खाने की गुणवत्ता का खास ध्यान रखते हैं।

जीबो-गरीब चीजें और आयडिया पसंद करने वालों की दुनिया में कमी नहीं है। ऐसे ही दीवाने अमेरिका के ‘मैजिक रूम रेस्तरां’ को बहुत पसंद कर रहे हैं। यहां लोग सिरामिक से बने बाथरूम बाउल पर बैठते हैं और टॉयलेट के आकार वाली थालियों में ही खाते हैं। रेस्तरां के वेटर डैनियल चियेन ने कहा, ‘पिछले कुछ समय से बिजनेस बहुत बढ़िया हो रहा है। यहां अभी इतने ग्राहक आ रहे हैं कि लोगों को इंतजार करना पड़ता है। जो खाना हम यहां परोसते हैं वह बिलकुल सामान्य ताइवानी खाना है।’ डैनियल ने बताया कि इस रेस्तरां का आयडिया ताइवान से आया है। टॉयलेट थीम साज सज्जा से लेकर मेनूकार्ड तक हर जगह है। खाने के नाम भी बिल्कुल अलग तरह के रखे गए हैं, चॉकलेट आइसक्रीम का नाम ब्लैक पूप है, तो वैनिला स्ट्रॉबेरी आइस का नाम ब्लडी नंबर टू है। एक ग्राहक डेनिस एलियास ने बताया कि उनके लिए चिकन और झींगे टॉयलेट के आकार वाली ही थालियों में आए। इस तरह के आकार में खाना पहली बार तो

अजीब लगा, लेकिन खाना इतना लजीज था कि बाद में बर्तनों पर ध्यान ही नहीं गया। वहीं दूसरी ग्राहक तानिया मूर ने कहा, ‘मैंने पहले कहा, मैजिक रेस्टरूम कैफे, वो क्या है। जब हम अंदर गए तो वहां हर जगह सिर्फ टॉयलेट्स थे. यह बहुत ही रोचक था, कूल था एकदम।’ फ्रांस जहां आतिथ्य के मानक बहुत ऊंचे हैं, वहां की मार्जोरी डेसरीम ने कहा, ‘खाना बहुत अच्छे से पेश किया गया। यह छोटे टॉयलेट में रखा था, जो बहुत ही मजेदार था। आपको ध्यान से खाना चुनना चाहिए क्योंकि कुछ बहुत ही लजीज हैं, लेकिन कुल मिला कर खाना बढ़िया है। मैं अपने दोस्तों के साथ यहां फिर आउंगी, ये जगह अच्छी है।’


32 रोचक

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

13 - 19 नवंबर 2017

किसिम-किसिम के टॉयलेट स्वच्छता के प्रति बढ़ी जागरुकता ने टॉयलेट के डिजाइन को जहां समय और परिस्थिति के मुताबिक बदला है, वहीं इसे कुछ लोगों ने अपनी कलात्मकता दिखाते हुए इनोवेटिव थीम से भी जोड़ा है

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 48

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 48)  
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