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वर्ष-1 | अंक-45 | 23 - 29 अक्टूबर 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

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08 लाल बहादुर शास्त्री

सादगी और शुचिता

साधारण से असाधारण बना प्रेरक व्यक्तित्व

16 अभिमत

सामाजिक परिवर्तन के सूत्र परिवर्तन के लिए गांधीवादी सिद्धांतों पर अमल जरूरी

28 गुलजार

कविताएं हमारे आसपास

रचनात्मकता के लिए कवि का वास्तविकता से परिचय जरूरी

डॉ. पाठक को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमापूर्ण समारोह में डॉ. विन्देश्वर पाठक को लोक प्रशासन, शिक्षा और प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए 2017 का 18वां लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया


02 आवरण कथा

23 - 29 अक्टूबर 2017

डॉ. विन्देश्वर पाठक को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमापूर्ण समारोह में डॉ. विन्देश्वर पाठक को लोक प्रशासन, शिक्षा और प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए 2017 का 18वां लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया

भारत के राष्ट्रपति, श्री रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में डॉ. विन्देश्वर पाठक को वर्ष 2017 के 18वें लाल बहादुर शास्त्री लोक प्रशासन, शैक्षिक और प्रबंधन का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करते हुए

सु

प्रियंका तिवारी

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक को स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमापूर्ण समारोह में डॉ. विन्देश्वर पाठक को वर्ष 2017 का लोक प्रशासन, शिक्षा और प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए 2017 के 18वां लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक को पुरस्कार के तहत पांच लाख रुपए, स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति ने कहा कि इस अवसर पर हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की स्मृतियां ताजा हो गईं। वे एक असाधारण नेता थे

जो सादा जीवन में विश्वास करते थे और उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. विन्देश्वर पाठक शास्त्री के नाम पर रखे गए इस पुरस्कार के सबसे हकदार व्यक्ति हैं। क्योंकि उन्होंने मल ढोने की प्रथा को दूर करने की दिशा में असीम योगदान दिया है। राष्ट्रपति ने कहा कि डॉ. विन्देश्वर पाठक ने समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में योगदान दिया है और महात्मा गांधी, बाबा साहेब अांबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री के आदर्शों को व्यवहार में उतारा है। उन्होंने ऐसे बहुमूल्य योगदान करने वाले लोगोें के सम्मान के लिए लाल बहादुर

शास्त्री प्रबंधन संस्थान की भी सराहना की। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि जब इस पुरस्कार के लिए अ​िनल शास्त्री आए तो हमने कहा कि यदि आप यह पुरस्कार राष्ट्रपति भवन से डॉ. पाठक को दें तो इससे हमारा और राष्ट्रपति भवन दोनों का सम्मान बढ़ जाएगा। हम सब लोग जानते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री ने जब देश की बागडोर संभाली थी तब देश के सामने सबसे बड़ा संकट खाद्यान्न का आ गया था, जिससे उबरने के लिए शास्त्री जी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। शास्त्री जी के जीवन की सादगी से जुड़े अनेक वृतांत हैं। यह

‘डॉ. विन्देश्वर पाठक शास्त्री के नाम पर रखे गए इस पुरस्कार के सबसे हकदार व्यक्ति हैं। उन्होंने मल ढोने की प्रथा को दूर करने की दिशा में असीम योगदान दिया है’ रामनाथ कोविंद, राष्ट्रपति

खुशी की बात है कि उनके सुपुत्र- उनके प्रियजनों ने उनकी स्मृति को एक शिक्षण संस्थान के माध्यम से जीवित रखा है। सभी जानते हैं कि प्रशासनिक क्षेत्र में शिक्षा के लिए देश का सबसे बड़ा संस्थान मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर है। राष्ट्रपति ने कहा

एक नजर

डॉ. पाठक को 18वां लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार

लाल बहादुर शास्त्री प्रबंधन संस्थान देता है यह पुरस्कार इस पुरस्कार के लिए इस वर्ष 56 नामांकन आए थे


23 - 29 अक्टूबर 2017

राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के साथ डॉ. विन्देश्वर पाठक एवं अनिल शास्त्री

राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के साथ डॉ. विन्देश्वर पाठक

राष्ट्रपति, श्री रामनाथ कोविंद, 18वें लाल बहादुर शास्त्री लोक प्रशासन, शैक्षिक और प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए 2017 राष्ट्रपति भवन में संबोधित करते हुए कि यदि यह पुरस्कार भारत सरकार की ओर से डॉ ऐसे भारतीय को सम्मानित किया जाता है जो अपने पाठक को दिया जाता तो देश का सम्मान होता। डॉ. निरंतर व्यक्तिगत योगदान और उपलब्धियों के लिए पाठक उन व्यक्तियों में से हैं, जिन्होंने अपने कार्यों से एक असाधारण और विशिष्ट कारोबार अग्रणी प्रबंधन देश-समाज में निर्णायक परिवर्तन किए हैं। डॉ पाठक व्यवहारकर्ता, लोक प्रशासक, शिक्षाविद या संस्थान के योगदान से देश के सबसे निचले तबके के लोगों निर्माता रही है। पुरस्कार के लिए इस वर्ष 56 नामांकन को लाभ हुआ है। इसका परिणाम यह हुआ कि देश प्राप्त हुए, जबकि पिछले वर्ष 47 नामांकन प्राप्त हुए में स्वच्छता बढ़ी, बीमारी कम हुई और समाज स्वस्थ थे। इससे पहले यह पुरस्कार लाल बहादुर शास्त्री बन रहा है। डॉ. पाठक को यदि हम सही मायनों राष्ट्रीय पुरस्कार यशपाल, अरुणा राय, ई श्रीधरन, एन में कहें तो वह डॉ. अांबेडकर, महात्मा गांधी और आर नारायणमूर्ति, सैम पित्रोदा, एम एस स्वामीनाथन, लाल बहादुर शास्त्री के दिखाए रास्ते पर चलने वाले डॉ. नरेश त्रेहन आदि को मिल चुका है। व्यक्ति हैं। डॉ. पाठक के कार्यों से प्रभावित होकर मैं पुरस्कार के लिए डॉ. पाठक के नाम का चयन इन्हें थ्री इन वन कहता हूं, क्योंकि इन्होंने गांधी की ग्यारह सदस्यीय जूरी ने किया, जिनमें शिवराज स्वच्छता को अपनाया, अांबेडकर की तरह सामाजिक पाटिल, मोहसिना किदवई, न्यायमूर्ति एम. के. शर्मा, परिवर्तन लाने का कार्य किया और शास्त्री जी की अनिल राजदान, प्रो. डी. के बंद्योपाध्याय, डॉ. मीनाक्षी नैतिकता को अपनाया है। हम इन तीनों पुरोधाओं के गोपीनाथ, जस्टिस जी. बी पटनायक, सत्यानंद मिश्रा, बारे में सुना करते थे, लेकिन डॉ. पाठक ने इनके राजीव दुबे, आदर्श शास्त्री और अनिल शास्त्री शामिल आदर्शों को अपनाकर लोगों के लिए मिसाल कायम थे। इस अवसर पर लाल बहादुर शास्त्री प्रबंधन की है। राष्ट्रपति ने लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट को सस्थान के अध्यक्ष अनिल शास्त्री ने कहा कि पाठक इस पुरस्कार समारोह को आयोजित करने के लिए का कार्य स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अग्रणी बहुत बहुत बधाई दी और साथ ही डॉ. पाठक का भी माना जाता है। वर्ष 1999 में स्थापित यह प्रतिष्ठित अभिनंदन किया। पुरस्कार डॉ. पाठक के स्वच्छता में अहम योगदान के 1995 में दिल्ली में स्थापित लाल बहादुर शास्त्री लिए दिया जा रहा है। प्रबंधन संस्थान ने लोक प्रशासन, शिक्षा और प्रबंधन इस अवसर पर डॉ. पाठक ने सर्वप्रथम राष्ट्रपति में उत्कृष्टता के लिए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय राम नाथ कोविंद को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा पुरस्कार आरंभ किया है। प्रत्येक वर्ष इस पुरस्कार से कि मैं लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट का आभारी

डॉ. विन्देश्वर पाठक हूं। मैं यह पुरस्कार प्राप्त कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। इस पुरस्कार का गौरव तब और बढ़ गया जब राष्ट्रपति जी ने इसे मुझे प्रदान किया। डॉ. पाठक ने कहा कि माननीय राष्ट्रपति एक शानदार सरल और मानव गुणों से भरे एक महान व्यक्ति हैं, जो हमेशा मुस्कुराते हुए चेहरे और करुणामय दिल के साथ सभी लोगों की भलाई और कल्याण के लिए तैयार रहते हैं। राष्ट्रपति जी का स्वभाव आज भी वैसा ही है जैसा तब था जब वह एक सांसद थे। सांसद से राज्यपाल फिर राष्ट्रपति तक कद बढ़ा, लेकिन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैं राष्ट्रपति जी की तुलना अब्राहम लिंकन से करता हूं, क्योंकि राष्ट्रपति बनने के बाद भी लिंकन के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया था। डॉ. पाठक ने कहा कि जिन महापुरुष के नाम पर मुझे आज पुरस्कार मिला है, उनकी तुलना ईमानदारी के मामले में गांधी के बाद कोई करे यह संभव नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री ने देश के लिए कई कार्य किए हैं, जिसकी तुलना कोई कर सके यह आज के युग में संभव नहीं है। डॉ. पाठक ने ज्यूरी के माननीय सदस्यों और लाल बहादुर शास्त्री प्रबंधन संस्थान के अध्यक्ष अनिल कुमार शास्त्री को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए आभार व्यक्त किया। डॉ. पाठक ने अपने जीवन संघर्ष को याद किया और स्वर्गीय शास्त्रीजी को याद किया, जिन्होंने भी अपने बचपन में कई कठिनाइयों का सामना किया था और

आवरण कथा

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उन्होंने अपने जीवन में सच्चाई और ईमानदारी को कैसे बढ़ाया। डॉ. पाठक ने कहा कि यह पुरस्कार सभी उत्तम पुरस्कारों में से एक है, जो राजा विक्रमादित्य के परंपराओं में से एक है। राजा विक्रमादित्य के काल में विद्वानों को, कवियों, लेखकों को यह पुरस्कार दिया जाता था। इंस्टीट्यूट ने उस परंपरा की फिर से शुरुआत कर सराहनीय कार्य किया है। इस अवसर पर अनिल शास्त्री ने कहा कि गांधी जी के स्वच्छता पर विचार, जो आज भी सरकार का विचार है। यह पुरस्कार भारत के दूसरे प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति को जीवंत करता है। शौच और साफ-सफाई के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर काम करने के लिए प्रसिद्ध डॉ. पाठक ने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की और इसके जरिए वह देश में 'शौचालय क्रांति' लाए। यह संस्था मुख्यत: मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, स्वास्थ्य, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों, शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन आदि क्षेत्रों में कार्य करती है। डॉ. पाठक एक विश्व प्रसिद्ध समाज विज्ञानी भी हैं। डॉ. पाठक ने सुलभ शौचालय के द्वारा बिना दुर्गंध वाली बायोगैस के प्रयोग की खोज की। इस सुलभ तकनीक का प्रयोग भारत सहित अनेक विकाशसील राष्ट्रों में बहुतायत से होता है। सुलभ शौचालयों से निकलने वाले अपशिष्ट का खाद के रूप में प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया गया है।


04 आवरण कथा

स्वच्छता का सम्मान

ला

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लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट द्वारा ‘शांति और अंहिसा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन’ मुद्दे पर आयोजित व्याख्यान में सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने शास्त्री जी के प्रेरक आदर्शों के साथ स्वच्छता के क्षेत्र में अपने लंबे अनुभव के बारे में बताया एसएसबी ब्यूरो

ल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ने दिल्ली के नेहरु ऑडिटोरियम में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय अवार्ड व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में डॉ. पाठक ने ‘शांति और अंहिसा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन’ मुद्दे पर चर्चा की। वहीं सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 10 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय अवार्ड से राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया गया। डॉ. पाठक को यह अवार्ड उनके सामाजिक सुधार के क्षेत्र में किए गए विशिष्ट और उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया। इस दौरान अनिल शास्त्री बोर्ड ऑफ गवर्नर लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, शक्ति सिन्हा, डायरेक्टर ऑफ नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी और जी एल शर्मा, डायरेक्टर लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट उपस्थित रहे। इस मौके पर डॉ. पाठक ने ‘शांति और अंहिसा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन’ मुद्दे पर चर्चा की। डॉ. पाठक ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के करकमलों से 10 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय अवार्ड दिया गया। यह पुरस्कार मेरे जीवन के सबसे बहुमूल्य क्षणों में से एक था, जब राष्ट्रपति जी ने कहा कि डॉ. पाठक थ्री इन वन हैं, यानी गांधी, डॉ. आंबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री... इन तीनों को मिलाकर यदि कोई एक है तो वो डॉ. पाठक हैं। आज तक मुझे यह सम्मान नहीं मिला था। सम्मान और पुरस्कार तो बहुत मिले, लेकिन किसी ने कभी हमारे लिए ये शब्द नहीं कहे। यह हमारे लिए धरोहर की तरह पूरे जीवन भर रहेगा। इससे पहले जिन 17 लोगों को यह पुरस्कार मिला है, उन्हें कोई न कोई अधिकार प्राप्त रहा है, लेकिन मैं पहला व्यक्ति हूं, जिसे कोई अधिकार न पहले था और न ही अभी भी प्राप्त है। क्योंकि मैंने किसी भी सरकारी पद को धारण नहीं किया है। मैनेजमेंट के छात्रों को संबोधित करते हुए डॉ. पाठक ने कहा कि लाइफ को मैनेज कैसे किया जाए, वह महत्वपूर्ण है और जिस इंस्टीट्यूट में आप पढ़ रहे हैं, जिसके नाम पर यह इंस्टीट्यूट है, उन्होंने अपनी लाइफ को कैसे मैनेज किया था। वह आप लोगों के लिए सीखने की चीज है। शास्त्री जी एक कुशल राजनेता के साथ ही साथ गांधी के अनुयायी थे। उन्होंने अपने जीवन में सत्य और ईमानदारी को अपनाया। गांधी की कई महत्वपूर्ण बातें हैं, लेकिन

उनमें सबसे महत्वपूर्ण सत्य और अहिंसा है, जो भी व्यक्ति ईमानदारी और सत्य को ग्रहण करेगा तो वह अपने जीवन में कभी हार नहीं सकता। मेरी मां ने कहा था कि भूखे पेट सोना, लेकिन कभी किसी के साथ बेईमानी मत करना। गांधी, शास्त्री और आंबेडकर की तरह मैं भी सत्य और ईमानदारी से चल रहा हूं। भगवान ने जब सृष्टि की रचना की तो उसने एक जैसा संसार नहीं बनाया, बल्कि उसने अच्छे और बुरे दोनों तरह की चीजें बनाईं। वैसे ही उसने इंसान के भीतर भी अच्छे और बुरे दोनों गुण दिए। भगवान ने हर इंसान में दया, ईमानदारी के साथ ही साथ अहंकार, लोभ, वासना जैसे दुर्गुण भी दिए। अब इन दोनों गुणों को समन्वय करके कैसे ले चलेंगे, यही कला है। इन गुणों को संयमित कर बड़ी संजीदगी से चलना होता है। भगवान ने चार भाग बनाए, जिसमें पहला भाग संत का है, संत वह है जिसने अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लिया हो और जो प्राकृतिक संपदाओं का सबसे कम उपभोग करता है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम होती है। दूसरे साधु होते हैं, वह भी संत के आस-पास होते हैं। साधु लोग ब्रह्मचर्य रहते हैं, वह संसार की ही

‘यह पुरस्कार मेरे जीवन के सबसे बहुमूल्य क्षणों में से एक था, जब राष्ट्रपति जी ने कहा कि डॉ. पाठक थ्री इन वन हैं, यानी गांधी, डॉ. आंबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री... इन तीनों को मिलाकर यदि कोई एक है तो वो डॉ. पाठक हैं। आज तक मुझे यह सम्मान नहीं मिला था’ -डॉ. पाठक

सेवा में रत रहते हैं। उसके बाद आम इंसान होते हैं, जिनमें सभी लोभ, अहंकार, क्रोध, वासना कूट-कूट कर भरी होती है, लेकिन इसे आप कम करके और लोगों की मदद करते हुए जब जीवन यापन करते हैं तो आप एक इंसान कहलाते हैं। वहीं जो चौथे किस्म के लोग होते हैं, उनकी एक ही भावना सुबह-शाम होती है कि किसे लूटना है, किसको मारना, ठगना है। ऐसे लोगों के मन में कोई और भावना आती ही नहीं हैं। इसीलिए ऐसे लोगों को हैवान कहा जाता है। सभी को इंसान बनाना चाहिए, यदि सामर्थ्य हो तो व्यक्ति साधु और संत भी बन जाए। वह तो और भी अच्छा है। इंसान बनने के लिए आपको अपने सभी दुर्गुणों पर नियंत्रण कर जीवन यापन करना होता है, लेकिन इसका फल मरने के बाद ही मिलता है। आप लोग यहां शास्त्री जी को इसीलिए याद करते हैं, क्योंकि उन्होंने ईमानदारी और सादगी से अपना जीवन जिया। शास्त्री जी ने देशहित के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए और उन्होंने ही ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। हम कहते हैं जियो हजारों साल, लेकिन कोई व्यक्ति हजारों साल नहीं जीता है, बल्कि उसकी कीर्ति जीती है।


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डॉ. पाठक ने बताया कि सबसे पहले मैं एक आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जब किसी स्कूल में 5 रुपए की नौकरी करता था। उस समय व्यक्ति के लिए राष्ट्रपति स्वयं कोई बात कहे तो मेरे मन में विचार आया कि नौकरी छोड़ देनी चाहिए वह गंभीरता से ली जाती है। राष्ट्रपति जी ने कहा और मैंने नौकरी छोड़ दी, जिससे मां-पिता जी बहुत कि जो लाल बहादुर शास्त्री पुरस्कार डॉ. पाठक नाराज हुए, लेकिन हमने उन्हें मना लिया। इसके को राष्ट्रपति भवन में दिया गया, उससे यहां का बाद हमने गांधी से जुड़ कर मैला ढोने वालों और सम्मान बढ़ गया है। उनकी यह बात मेरे हृदय इस प्रथा को जड़ से समाप्त करने का काम शुरू को छू गई। इसके साथ ही राष्ट्रपति ने कहा कि किया। मैंने जब काम शुरू किया था तब मैं सिर्फ यदि यह पुरस्कार भारत सरकार दे तो देश का ग्रेजुएट था, हमने बाद में एमए और पीएचडी की सम्मान और बढ़ जाएगा। अनिल शास्त्री ने कहा पढ़ाई पूरी की। डॉ. विन्देश्वर पाठक ने बताया कि कि मैं डॉ. पाठक के बारे में पहले सुन रखा था, किस तरह उन्होंने मैला ढोने वाले भाई-बहनों के लेकिन मुलाकात पुरस्कार देते समय ही हुई। मैंने जीवन को बदल कर एक सामाजिक परिवर्तन डॉ. पाठक के कार्यों से काफी प्रभावित हुआ हूं। किया। उन्होंने कहा कि टू-​िपट कंपोस्ट शौचालय डॉ. पाठक ने समाज के लिए बहुत ही अभूतपूर्व प्रणाली का उनका आविष्कार एक उपकरण है, जो कार्य किए हैं। इससे हम सभी को सीख लेनी चाहिए देश और समाज में बड़े परिवर्तन के लिए एकमात्र और इनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए। साधन है। इसके बिना मानव अपशिष्ट की सफाई करने का संकट खत्म करना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी यात्रा एक ऐसा आंदोलन है, जो सुलभ संस्था के रूप में देश और समाज के लोगों को आगे ले जाने का संदेश दे रहा है। डॉ. पाठक ने बताया कि उन्होंने शौचालय के माध्यम से पूर्व स्कैवेंजर्स भाई-बहनों को मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति दिलाई और उन्हें व्यावसायिक बनाकर मुख्यधारा में लाने का कार्य किया है। डॉ. पाठक ने कहा कि यह सभी कार्य उन्होंने शांति और अहिंसा के माध्यम से पूरे किए हैं। उन्होंने कहा कि हम महात्मा गांधी के अनुयायी हैं। गांधी ने शांति- अहिंसा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। सुलभ भी गांधी के ही बताए रास्ते पर चल रहा है। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने कहा था कि जब तक ‘राष्ट्रपति जी ने कहा कि जो लाल मैला ढोने की प्रथा समाप्त नहीं होगी तब तक देश से छूआछूत खत्म नहीं होगा। बहादुर शास्त्री पुरस्कार डॉ. पाठक को हमने सुलभ के माध्यम से गांधी के सपने राष्ट्रपति भवन में दिया गया उससे यहां को पूरा करने का पूरा प्रयास किया है।

डॉ. पाठक के कार्यों से हुआ प्रभावित- अनिल शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के चेयरमैन अनिल शास्त्री ने इंस्टीट्यूट की तरफ से डॉ. पाठक का

का सम्मान बढ़ गया है। उनकी यह बात मेरे हृदय को छू गई। इसके साथ ही राष्ट्रपति जी ने कहा कि यदि यह पुरस्कार भारत सरकार दे तो देश का सम्मान और बढ़ जाएगा’ -अनिल शास्त्री

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होगा, जैसे डॉ. पाठक ने देश और समाज के लिए किया है। सुलभ आंदोलन ने देश को नई राह दिखाई है। यदि सुलभ नहीं होता तो आज परिस्थितियां बदतर होतीं। मैं इसके लिए डॉ. पाठक का अभिनंदन करता हूं।

डॉ. पाठक ने अर्जित किया है यह पुरस्कार- जी एल शर्मा

शास्त्री जी का नाम सुशासन से जुड़ा है- शक्ति सिन्हा

नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के निदेशक शक्ति सिन्हा ने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री का नाम हम लोगों के दिमाग में सुशासन से जुड़ा रहता है। 2017 में हम लोगों को पता नहीं है कि 1964-65 में देश की क्या स्थिति थी, क्या चुनौतियां थी। 1965 में देश की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हो चुकी थी। इसके साथ ही सीमा पर पाकिस्तान के साथ परेशानियां बढ़ गई थीं। सबने कहा कि अब कैसे देश चलेगा... उस स्थिति में सारे हिन्दुस्तानियों को याद दिलाना कि यदि हम किसी पर निर्भर हैं तो किसान और जवान पर निर्भर हैं। आज लोगों को ‘जय जवान, जय किसान’ सामान्य सा वाक्य लगता है, लेकिन उस समय की परिस्थि​ित में यह स्लोगन लाना और लोगों को समझाना, दुखों- परेशानियों से लड़ना सिखाना, ये महत्वपूर्ण कार्य शास्त्री जी ने किया। आज के दौर के नेता लोग तो सिर्फ कहानियां सुनाते हैं, समस्याओं से कैसे निपटना है, वह नहीं बताते हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने देश में सुशासन लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है, जिसके लिए वह हमेशा हम सभी के प्रेरणादायक रहेंगे। वहीं उन्होंने कहा कि हर कार्य सरकार नहीं कर सकती। कुछ कार्यों के लिए हमें आगे आना

लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के निदेशक जी एल शर्मा ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. पाठक ने अपने शब्दों में देश समाज से जुड़े सभी मुद्दों का चित्रण बड़ी ही कुशलता से किया है। मैं डॉ. पाठक की कही प्रत्येक बात का समर्थन करता हूं। हमने डॉ. पाठक को लाल बहादुर शास्त्री अवार्ड दिया नहीं है, बल्कि आपने

इस पुरस्कार को अर्जित किया है। डॉ. पाठक ने जो कार्य किया है, उसके बारे में कोई सोचता भी नहीं है। हम भी आपके इस बात से सहमत हैं कि अब वर्ण व्यवस्था को बदलना चाहिए। क्योंकि यह वर्ण व्यवस्था ब्राह्मणों द्वारा ही बनाई गई है। हम सभी को पाठक जी के दिखाए गए रास्ते पर चलना चाहिए। उनके इस कार्य में सभी को अपना योगदान देना होगा, लेकिन इनमें शिक्षक और छात्र अहम भूमिका निभा सकते हैं।


06 प्रेरक नेतृत्व

23 - 29 अक्टूबर 2017

सदा अविचल रहने वाले ‘बहादुर’

ला

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने देश को कई अनमोल रत्न दिए। इन्हीं रत्नों में एक थे लाल बहादुर शास्त्री जिन्होंने एक सामान्य परिवेश से उठकर जीवन में असाधारण ऊंचाई हासिल की

एसएसबी ब्यूरो

ल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे। वे 9 जून, 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने तक प्रधानमंत्री रहे। उनका जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश के एक सामान्य परिवार में हुआ था। लाल बहादुर शास्त्री के पिता एक शिक्षक थे। उनका वास्तविक नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था पर उन्होंने इसे बदल दिया, क्योंकि वह अपनी जाति को अंकित करना नहीं चाहते थे। उनकी जीवन यात्रा को देखें तो उनके व्यक्तित्व में असाधारण दृढता और विपरीत परिस्थितियों में अडिग बने रहने का साहस कूट-कूट कर भरा हुआ था । बचपन में शास्त्री जी को घर– परिवार में ‘नन्हे’ कहकर बुलाया जाता था। उनकी मां का नाम रामदुलारी देवी था। जिस समय नन्हे की अवस्था मात्र डेढ़ वर्ष की थी, उसी समय उनके पिता शारदा प्रसाद का प्लेग की बीमारी के कारण देहांत हो गया।

रोने लगी मां

1906 में पिता के देहांत के बाद नन्हे का पालनपोषण ननिहाल में हुआ था। जब नन्हे की उम्र 2 महीने की थी, उस समय वह इलाहाबाद में गंगा स्नान मेले में अपनी मां की गोद से छूटकर एक गड़रिए की टोकरी में जा गिरे थे। पुत्र के भीड़ में छिटककर गायब हो जाने से मां बुरी तरह से रोने लगी। किंतु शीघ्र ही पुलिस ने नन्हे को गड़रिये से लेकर उनकी माता को सौंपा तो घर में प्रसन्नता की सीमा ना रही।

‘शास्त्री’ की उपाधि

नन्हे की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उस दौर में अंग्रेजों ने सरकारी भाषा उर्दू को बदल दिया था। इसी कारण चार साल की उम्र तक शास्त्री जी को एक मौलवी ने पढ़ाया था। वो इतने मेधावी थे कि उन्होंने दस साल की उम्र में ही छठी कक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। मुगल सराय में अच्छे हाई स्कूल ना होने के कारण वे अपने परिवार के साथ बनारस चले गए और हरीशचंद्र हाई स्कूल में पढ़ने लगे। आगे की पढ़ाई उन्होंने काशी विद्यापीठ से की थी। आपने स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की तत्पश्चात उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। लाल बहादुर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के समय दसवीं कक्षा के छात्र थे, उसी समय वो भी असहयोग आंदोलन में कूद पड़े थे। 1925 में लाल बहादुर शास्त्री ने काशी विद्यापीठ से दर्शन शास्त्र की उच्च शिक्षा लेकर स्नातक की डिग्री प्राप्त की तथा तभी ‘शास्त्री’ सर्वदा के लिए उनके नाम के साथ

1925 में लाल बहादुर शास्त्री ने काशी विद्यापीठ से दर्शन शास्त्र की उच्च शिक्षा लेकर स्नातक की डिग्री प्राप्त की तथा तभी ‘शास्त्री’ सर्वदा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गया। उन्हें तभी से लाल बहादुर शास्त्री कहा जाने लगा जुड़ गया। उन्हें तभी से लाल बहादुर शास्त्री कहा जाने लगा। 1925 में शास्त्री जी का परिचय देश के दिग्गज नेताओं से हुआ, जिनमें बनारस के भारत रत्न डॉ. भगवानदास, आचार्य कृपलानी, श्री प्रकाश, डॉ. संपूर्णानंद, लाला लाजपत राय आदि थे।

हरिजन सेवा

लाला लाजपत राय ने ‘लोक सेवक समाज’ की स्थापना की थी। शास्त्री जी उसके नियमित सदस्य बन गए। शास्त्री जी को मेरठ के कुमार आश्रम में रहकर हरिजनों की सेवा का कार्य सौंपा गया। शास्त्री जी इस सेवा के कार्य के लिए प्राय: मेरठ और सहारनपुर आदि स्थानों पर आते-जाते रहते थे। इस

कार्य में वो पूर्ण मनोयोग से लगे रहे थे।

पत्नी ललिता का साथ

इसी दौरान यानी 1927 में शास्त्री जी का विवाह ललिता देवी से हुआ। ललिता देवी मिर्जापुर की थीं। उनकी शादी पारंपरिक थी और दहेज के नाम पर एक चरखा और हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। थ्बी शास्त्री जी सपरिवार इलाहाबाद में रहने लगे थे। 1928 में वो म्यूनिसिपल बोर्ड के सदस्य निर्वाचित हुए, तथा 4 वर्ष बाद वह इलाहाबाद इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के भी सदस्य रहे। लाल बहादुर शास्त्री के प्रथम राजनीतिक गुरु राजश्री पुरुषोत्तम टंडन थे। अपने सरल, ईमानदार व्यवहार के कारण शास्त्री जी टंडन

जी के अत्यंत प्रिय और विश्वासपात्र बन गए थे। 1930 में ललिता देवी ने भी राजनीति में पदार्पण किया, जबकि शास्त्री जी 1920–21 में ही कांग्रेस में शामिल होकर असहयोग आंदोलन में जेल यात्रा कर चुके थे। 1930–1945 तक शास्त्री जी अधिकतर कारागार में ही रहे। कारागार के दौरान उन्होंने अनेक राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विचारकों के ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया।

विनोबा के सत्याग्रह में शरीक

भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के एक कार्यकर्ता लाल बहादुर शास्त्री 1921 में जेल गए। गांधी के अनुयायी के रूप में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और 1937 और 1946 में शास्त्री प्रांत की विधायिका में निर्वाचित हुए। 1940 में जब विनोबा भावे ने सत्याग्रह शुरू किया तो, उस सत्याग्रह में भाग लेने के कारण शास्त्री जी भी बंदी हुए और उन्हें एक वर्ष का कारावास हुआ। 15 अगस्त सन् 1947 को देश स्वतंत्र हुआ तो शास्त्री जी को मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के


पुत्री की विदाई पर भी सिद्धांत अडिग

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ल बहादुर शास्त्री में नैतिकता का असाधारण गुण था, जो कई बार विभिन्न घटनाओं के बीच देखा गया। शास्त्री जी एक बार नैनी जेल में थे, उस समय घर से उनकी पुत्री की बीमारी के बारे में समाचार पहुंचा। जेल के अधिकारियों ने उन्हें पैरोल पर रिहा करना स्वीकार कर लिया और उन्हें 15 दिन

का अवकाश दिया गया। परंतु शास्त्री जी जब घर पहुंचे तो उससे पूर्व ही उनकी पुत्री चल बसी थी। दाहक्रिया आदि के बाद शास्त्री जी शीघ्र ही नैनी जेल के लिए रवाना हो गए। घर परिवार के सदस्य जब उन्हें रोकने लगे तो उन्होंने कहा, ‘जिस कार्य के लिए मुझे पैरोल पर रिहा किया गया था, वह काम तो समाप्त हो चुका है।’

1925 में शास्त्री जी का परिचय देश के दिग्गज नेताओं से हुआ, जिनमें बनारस के भारत रत्न डॉ. भगवानदास, आचार्य कृपलानी, श्री प्रकाश, डॉ. संपूर्णानंद, लाला लाजपत राय आदि थे मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। शास्त्री जी को पुलिस तथा परिवहन मंत्रालय के साथ-साथ प्रदेश का गृह मंत्री भी बनाया गया। परिवहन मंत्री के कार्यकाल में पहली बार किसी महिला को कंडक्टर के पद पर नियुक्त किया। 1949 में जब शास्त्री जी गृह मंत्री पद पर आसीन थे, तब छात्र – छात्राओं के एक आंदोलन में भीड़ को तितर बितर करने के लिए उन्होंने लाठी चार्ज का आदेश नहीं दिया, उसके स्थान पर उन्होंने पानी की बौछार का आदेश दिया, जिसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

त्यागपत्र की नैतिकता

1950 में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के बाद लाल बहादुर शास्त्री कांग्रेस के महामंत्री बने। 1952 के चुनाव में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा चुनाव के पश्चात वे राज्य सभा सदस्य बने, जहां केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें रेल और यातायात का कार्यभार सौंपा गया। अपने मंत्रित्व काल में एक रेल दुर्घटना होने पर उन्होंने नैतिकता के नाते अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।

आयुर्वेद के हिमायती

लाल बहादुर शास्त्री आयुर्वेद चिकित्सा के बड़े प्रबल पक्षधर थे और जब वो स्वयं भी बीमार पड़ते तो आयुर्वे​िदक औषधियों का प्रयोग करते थे। उन्होंने कहा था कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति एलोपैथिक चिकित्सा से भी अधिक कारगर पद्धति है तथा उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

पाक को करारी मात

27 मई 1964 को जवाहर लाल नेहरू के निधन के पश्चात कांग्रेस संसदीय दल ने शास्त्री जी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुना और वो भारत के

दूसरे प्रधानमंत्री बने। जिस समय शास्त्री जी ने देश की बागडोर संभाली, उस समय देश के समक्ष अनेक चुनौतियां थी, जिनका निराकरण शास्त्री जी ने बड़ी सूझ – बूझ के साथ किया। ऐसे संकट के समय 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। परंतु शास्त्री जी रत्ती भर विचलित नहीं हुए। उन्होंने भारतीय सेना को पाकिस्तान के आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब देने का आदेश दिया। शास्त्री जी ने ओजस्वी स्वर में कहा था, ‘इस बार युद्ध भारत की धरती पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान की धरती पर होगा।’

अंतिम यात्रा

इस युद्ध में भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना को पूरा सबक सिखाया। पाकिस्तान इस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ। सारे देश में विजय की खुशी मनाई गई। इस दौरान रूस के प्रधानमंत्री कोसिगन ने भारत– पाकिस्तान के बीच शांति समझौता कराने के लिए ताशकंद में वार्ता आयोजित की। 3 जनवरी 1966 से 10 जनवरी 1966 तक लगातार ताशकंद में बैठक चलती रही। आठ दिनों तक चली बैठक के बाद दोनों देशो में समझौता हुआ जिसे ताशकंद समझौता कहते हैं। संधि के तहत भारत युद्ध के दौरान कब्ज़ा किए गए सभी प्रांतों को पाकिस्तान को लौटने के लिए सहमत हुआ। 10 जनवरी 1966 को संयुक्त घोषणा पत्र हस्ताक्षरित हुआ और उसी रात को कथित तौर पर दिल का दौरा पड़ने से लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया।

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प्रेरणा के अनमोल मंत्र

स्त्री जी का जीवन एक साधारण पृष्ठभूमि से शुरू होकर देश के एक असाधारण नेता और प्रधानमंत्री तक पहुंचा। उन्होंने अपने जीवन में जहां एक तरफ सार्वजनिक जीवन की शुचिता का भरपूर ख्याल रखा, वहीं वे अपने उन आदर्शों पर आजीवन खरे उतरे, जिसके बीज महात्मा गांधी सरीखे नेताओं के संपर्क में आने के कारण बचपन में ही पड़ गए थे। आज जब जीवन के हर क्षेत्र में नैतिक स्फीति दिखलाई पड़ रही है, शास्त्री जी की कही बातें प्रेरक मंत्र की तरह हैं। उनके वक्तव्यों से नई पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है। • ‘हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व के लिए शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास रखते हैं’

• ‘जो शासन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। अंततः जनता ही मुखिया होती है’ • ‘मेरी समझ से प्रशासन का मूल विचार यह है कि समाज को एकजुट रखा जाए ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ सके’ • ‘यदि कोई एक व्यक्ति को भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सर शर्म से झुकाना पड़ेगा’

• ‘हम सभी को अपने-अपने क्षेत्रों में उसी समर्पण, उसी उत्साह, और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा, जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करता है और यह सिर्फ बोलना नहीं है, बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है’

• ‘भ्रष्टाचार को पकड़ना बहुत कठिन काम है, लेकिन मैं पूरे जोर के साथ कहता हूं कि यदि हम इस समस्या से गंभीरता और दृढ संकल्प के साथ नहीं निपटते तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में असफल होंगे’ •

‘देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है’

‘हमारी ताकत और मजबूती के लिए सबसे जरूरी काम है लोगों में एकता स्थापित करना’

• ‘आर्थिक मुद्दे हमारे लिए सबसे जरूरी हैं और यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी और बेरोजगारी से लड़ें’

• ‘लोगों को सच्चा लोकतंत्र और स्वराज कभी भी हिंसा और असत्य से प्राप्त नहीं हो सकता’

• ‘कानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और वह और मजबूत बने’ • ‘हम अपने देश के लिए आजादी चाहते हैं, पर दूसरों का शोषण करके नहीं, न ही दूसरे देशों को नीचा दिखाकर... मैं अपने देश की आजादी ऐसे चाहता हूं, क्योंकि अन्य देश मेरे आजाद देश से कुछ सीख सकें और मेरे देश के संसाधन मानवता के लाभ के लिए प्रयोग हो सकें’


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सादगी और शुचिता बनी जिंदगी की राह

साधारण जीवन को असाधारण ऊंचाई तक कैसे पहुंचाया जा सकता है, इसकी मिसाल लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कई घटनाओं में देखने को मिलती है। स्वाभिमान और दृढ़ निश्चय जैसे गुण तो उनके बचपन से ही देखने को मिलने लग गए थे। आगे चलकर ये सारे गुण जैसे पूरे देश के लिए प्रेरणा का एक वट वृक्ष बन गया

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एसएसबी ब्यूरो

ल बहादुर शास्त्री देश के उन नेताओं की कतार में शामिल हैं, जिन्होंने अभाव और चुनौती के बीच आदर्श और सफलता के असाधारण सुलेख लिखे। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे, जिनकी मृत्यु उसी समय हो गई थी जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे। बचपन में वे अक्सर कई मील की दूरी नंगे पांव तय कर विद्यालय जाते थे। यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें तप जाती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। वे जब थोड़े बड़े हुए तो उन्हें लगने लगा कि भारत को विदेशी दासता से मुक्ति मिलनी ही चाहिए। फलस्वरूप आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे और जब महात्मा गांधी ने भारत में रहने वाले उन राजाओं की निंदा की, जो कि भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे थे, तो लाल बहादुर शास्त्री गांधी जी से काफी प्रभावित हुए और मात्र 11 साल की उम्र में ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया। जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया, तो मात्र 16 साल की उम्र में गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ कर असहयोग आंदोलन में जोर-शोर से सहयोग दिया। पढाई छोड़ने के अपने निर्णय पर वे इतने अडिग थे कि उनके पूरे परिवार, सगे-संबंधियों व मित्रों के लाख समझाने के बावजूद उन्होंने किसी की बात नहीं मानी और पढ़ाई छोड़कर पूरे मन से असहयोग आंदोलन का समर्थन किया। इस घटना से उनके सभी करीबी लोगों को यह पता चल गया कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें, क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अंदर से चट्टान की तरह दृढ़ हैं।

मंत्री पद से इस्तीफा

शास्त्री जी ने न केवल आजादी से पहले बल्कि आजादी के बाद भी भारत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। शास्त्री जी जितना दृढ़ निश्चयी थे, उतना ही नरम दिल भी थे और इससे संबंधित एक

घटना का अक्सर उल्लेख भी किया जाता है, जिसके तहत कांग्रेस के शासन काल में जब वे रेल मंत्री थे, तब एक ट्रेन दुर्घटना हो गई थी और उस घटना से शास्त्री जी इतने आहत हुए कि उन्होंने यह कहकर अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया कि- मेरे रेलमंत्री रहते हुए रेल से संबंधित होने वाली किसी भी घटना के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की

काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसीलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं, बल्कि इसीलिए स्वीकार किया है, क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा- ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ़ नहीं हो पा रहा हूं। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं।’

साड़ी और सादगी

एक बार प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री कपड़े की एक दुकान में साड़ियां खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख बेहद प्रसन्न हुआ। उसने उनके आने को अपना सौभाग्य माना और उनका स्वागत-सत्कार किया। शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चार-पांच साड़ियां चाहिए। दुकान का मैनेजर शास्त्री जी को एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा। सभी साड़ियां काफी कीमती थीं। शास्त्री जी बोले- ‘भाई, मुझे इतनी महंगी साड़ियां नहीं चाहिए। कम कीमत वाली दिखाओ।’


23 - 29 अक्टूबर 2017 इस पर मैनेजर ने कहा- ‘सर, आप इन्हें अपना ही समझिए, दाम की तो कोई बात ही नहीं है। यह तो हम सबका सौभाग्य है कि आप पधारे।’ शास्त्री जी उसका आशय समझ गए। उन्होंने कहा- ‘मैं तो दाम देकर ही लूंगा। मैं जो तुम से कह रहा हूं उस पर ध्यान दो और मुझे कम कीमत की साड़ियां ही दिखाओ और उनकी कीमत बताते जाओ।’ तब मैनेजर ने शास्त्री जी को थोड़ी सस्ती साड़ियां दिखानी शुरू कीं। शास्त्री जी ने कहा- ‘ये भी मेरे लिए महंगी ही हैं। और कम कीमत की दिखाओ।’ मैनेजर को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए। उन्होंने कहा- ‘दुकान में जो सबसे सस्ती साड़ियां हों, वो दिखाओ। मुझे वही चाहिए।’ आखिरकार मैनेजर ने उनके मन मुताबिक साड़ियां निकालीं। शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदा कर चले गए। उनके जाने के बाद बड़ी देर तक दुकान के कर्मचारी और वहां मौजूद कुछ ग्राहक शास्त्री जी की सादगी की चर्चा करते रहे।

चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज

शास्त्री जी जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार

फर्स्ट क्लास का रेल सफर

शास्त्री जी को खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। एक बार जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे और बम्बई जा रहे थे। उनके लिए प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। गाड़ी चलने पर शास्त्री जी बोले‘डिब्बे में काफी ठंडक है, वैसे बाहर गर्मी है।’ उनके पी.ए. कैलाश बाबू ने कहा- ‘जी, इसमें कूलर लग गया है।’ शास्त्री जी ने पैनी निगाह से उन्हें

देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा- ‘कूलर लग गया है? बिना मुझे बताए? आप लोग कोई काम करने से पहले मुझ से पूछते क्यों नहीं? क्या और सारे लोग जो गाड़ी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी?’ शास्त्री जी ने कहा- ‘कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिए, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा- ‘बड़ा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहां भी रुके, पहले कूलर निकलवाइए।’ मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकी और कूलर निकलवाने के बाद ही गाड़ी आगे बढ़ी।

वाजिब किराए के लिए उलझे

ल बहादुर शास्त्री जी इतना सादगी भरा जीवन जीते थे कि वे देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी आम लोगों के बीच आम लोगों की तरह रच-बस जाते थे और लोगों को अंदाजा तक नहीं होता था कि उनके सामने देश का प्रधानमंत्री खड़ा है। ऐसी ही एक दिलचस्प घटना उन दिनों की है जब वे भारत के गृह मंत्री थे और जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर उनके प्रेस सचिव थे। कुलदीप नैयर याद करते हुए बताते हैं कि एक बार वे और शास्त्री जी महरौली से एक कार्यक्रम में भाग लेकर लौट रहे थे। एम्स के पास उन दिनों एक रेलवे क्रॉसिंग हुआ करती थी जो किसी ट्रेन के आने का समय होने की वजह से उस समय बंद थी। शास्त्री जी ने देखा कि बगल में गन्ने का

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मिली, जिसका उपयोग वह न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा- ‘कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई?’ जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया- ‘लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।’ शास्त्री जी यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।

कुलदीप नैयर का संस्मरण

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प्रेरक नेतृत्व

रस निकाला जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘जब तक फाटक खुलता है, क्यों न गन्ने का रस पिया जाए।’ इससे पहले कि कुलदीप नैयर कुछ कहते, वो खुद दुकान पर गए और अपने साथ-साथ कुलदीप, सुरक्षाकर्मी और ड्राइवर के लिए भी गन्ने के रस का ऑर्डर किया। दिलचस्प यह है कि किसी ने उन्हें पहचाना नहीं, यहां तक कि गन्ने का रस बेचनेवाले ने भी नहीं। इस घटना से हम समझ सकते हैं कि वे कितने सादगी भरा जीवन जीते थे। इतना ही नहीं, उनमें अपने प्रधानमंत्री होने का भी कोई अहंकार नहीं था, इसीलिए तो वे स्वयं ही न केवल अपने लिए बल्कि अपने सुरक्षाकर्मी के लिए भी गन्नेे के रस का ऑर्डर दे आए।

शास्त्री जी के जीने का तरीका आम आदमी जैसा ही था। वो मंत्री बने तो सरकारी वाहन तो मिला, लेकिन अपने निजी काम के लिए उन्होंने कभी भी उस वाहन का उपयोग नहीं किया। एक दिन शास्त्री जी अपने किसी निजी काम से घोड़ागाडी में बैठ कर कहीं जा रहे थे। जब वे नीचे उतरे तो घोड़ागाडी वाले ने उनसे दो रुपया मांगा। शास्त्री जी को मालूम था कि किराया केवल डेढ़ रुपया ही होता है, तो मात्र आठ आने के लिए वे उस घोडागाड़ी वाले से उलझ पड़े। दोनों के बीच चलती बहस को देखकर कुछ लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने पहचान लिया, कोई बोला- ‘ये तो लाल बहादुर शास्त्री हैं।’ यह बात सुनते ही घोड़ागाडी वाला शरमा गया। वह शास्त्री जी के पैर पड़ गया और पैसे लेने से इनकार करने लगा। लेकिन शास्त्री जी ने उसे डेढ रूपया दिया जो कि उसका वाजिब किराया होता था और चले गए।

फटे कुर्ते का रूमाल

एक बार शास्त्री जी की अलमारी साफ की गई और उसमें से अनेक फटे पुराने कुर्ते निकाल दिए गए, लेकिन शास्त्री जी ने वे कुर्ते वापस मांगे और कहा‘अब नवंबर आएगा, जाड़े के दिन होंगे, तब ये सब काम आएंगे। ऊपर से कोट पहन लूंगा ना।’

शास्त्री जी का खादी के प्रति अनुराग ही था कि उन्होंने फटे पुराने समझ हटा दिए गए कुर्तों को सहेजते हुए कहा- ‘ये सब खादी के कपड़े हैं। बड़ी मेहनत से बनाए हैं बीनने वालों ने। इसका एकएक सूत काम आना चाहिए।’ उनकी सादगी और किफायत का यह आलम था कि एक बार उन्होंने अपना फटा हुआ कुर्ता अपनी पत्नी को देते हुए कहा- ‘इनके रूमाल बना दो।’

बिन पैसे का मेला

शास्त्री जी के स्वाभिमान से जुड़ी कुछ घटनाएं पढ़ने-सुनने में आती हैं, जिनमें खासतौर पर गंगा नदी को तैरकर पार करने की घटना को प्रेरक घटनाओं के रूप में सर्वाधिक उल्लेख किया जाता है। घटना यह थी कि एक बार शास्त्री जी अपने कुछ मित्रों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गए। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो शास्त्री जी ने नाव के किराए के लिए जब अपनी जेब में हाथ डाला तो उनकी जेब में एक पाई भी नहीं थी, लेकिन शास्त्री जी ने ये बात अपने मित्रों से नहीं कही, बल्कि वे उनसे बोले कि वे थोड़ी देर और मेला देखेंगे और बाद में आएंगे। चूंकि शाम हो चुकी थी, इसीलिए उनके सभी मित्र उन्हें वहीं छोड़कर चले गए। जब उनके मित्रों की नाव उनकी आंखों से ओझल हो गई, तब उन्होंेने अपने कपड़े उतारकर अपने सिर पर लपेट लिया और नदी में उतर गए। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर रहा था। पास खड़े मल्लाहों ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन दृढ़ निश्चयी शास्त्री जी ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह किए बिना वे नदी में तैरने लगे। पानी का बहाव तेज था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उन्हें अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा, लेकिन शास्त्री जी ने उसकी बात भी नहीं सुनीं, वे नहीं रूके बल्कि तेज बहाव में भी तैरते रहे और थोडी देर बाद वे सकुशल


10 प्रेरक नेतृत्व

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दूसरी ओर पहुंच गए। शास्त्री जी चाहते तो नदी पार करने के लिए अपने दोस्तों से किराया उधार ले सकते थे अथवा नदी में तैरते समय जो नाव नदी में थी, उसमें चढ़ने के लिए स्वयं नाव वाले ने कहा, लेकिन उनका स्वाभिमान न तो उन्हें अपने मित्रों से उधार लेने की अनुमति नहीं दे रहा था न ही बिना पैसा दिए नाम में चढ़ने की।

माली की सीख

शास्त्री जी के जीवन की एक और दिलचस्प घटना का उल्लेेख मिलता है, जब वे अपने दोस्तों के साथ एक बगीचे में आम तोड़ने के लिए घुस गए। उनके दोस्तों ने बहुत सारे आम तोड़कर अपनी झोलियां भर लीं, लेकिन शास्त्री जी उन सभी में सबसे छोटे और कमजोर थे, सो वे पेड़ के नीचे खड़े रहे। घटना भी ऐसी हुई कि जैसे ही उन्होंने उस बगीचे से पहला फल तोड़ा, बगीचे का माली आ पहुंचा। दूसरे लड़के तो भागने में सफल हो गए, लेकिन शास्त्री जी सबसे छोटे व कमजोर होने की वजह से माली के हत्थे चढ़ गए। बहुत सारे फलों के टूट जाने और दूसरे लड़कों के भाग जाने के कारण माली बहुत गुस्से में था। उसने अपना सारा क्रोध उस छोटे से छह साल के शास्त्री जी पर निकाला और उसे पीट दिया। मासूम से शास्त्री जी ने माली से कहा– ‘आप मुझे इसीलिए पीट रहे हैं क्योंकि मेरे पिता नहीं हैं!’ यह सुनकर माली का क्रोध जाता रहा। वह बोला– ‘बेटे, पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है कि तुम बेहतर आचरण सीखो।’ माली की मार खाने पर तो बालक शास्त्री जी ने एक आंसू भी नहीं बहाया था, लेकिन यह माली की ये बात सुनकर वे बिलखकर रो पड़े। यह बात उसके दिल में घर कर गई और उसने इसे जीवन भर नहीं भुलाया। उसी दिन से बालक शास्त्री जी ने अपने हृदय में यह निश्चय कर लिया कि वे कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे किसी का कोई नुकसान हो।

पैसे लौटाए

लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बनने वाले ऐसे सरल और साधारण व्यक्ति थे जिनके जीवन का आदर्श प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वही रहा। भारत में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने समाज के बेहद साधारण वर्ग से अपना जीवन शुरू कर देश के सबसे पड़े पद को प्राप्त किया। शास्त्री जी को अपने देशवासियों से बहुत प्रेम था और उनके इसी देशप्रेम से संबंधित उनके जीवन से जुड़ी हुई एक और प्रेरक घटना है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपत राय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता प्रदान करवाना था। आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे। उनको घर का खर्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए प्रति माह दिए जाते थे। एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा- ‘क्या उन्हें ये 50 रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं?’ ललिता शास्त्री ने तुरंत जवाब दिया- ‘ये राशि उनके लिए काफी है। वो तो सिर्फ 40 रुपये खर्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपए बचा रही हैं।’ लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा- ‘उनके परिवार का गुजारा 40 रुपए में हो जा रहा है, इसीलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और बाकी के 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएं।’

बच्चे के छुए पांव

शास्त्री जी के जीवन में कभी भी किसी बात का कोई अहंकार नहीं रहा और इस बात को शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री ने बयां किया है। वे बताते हैं कि एक बार रात के भोजन के बाद उनके पिता ने उन्हें बुलाकर कहा- ‘मैं देख रहा हूं कि आप अपने से बड़ों के पैर ढंग से नहीं छू रहे हैं। आप के हाथ उनके घुटनों तक जाते हैं और पैरों को नहीं छूते।

अनिल शास्त्री ने अपनी गलती नहीं मानी और कहा- ‘आपने शायद मेरे भाइयों को ऐसा करते हुए देखा होगा।’ इस पर शास्त्री जी झुके और अपने 13 साल के बेटे के पैर छूकर बोले कि- इस तरह से बड़ों के पैर छुए जाते हैं। उनका ये करना था कि अनिल रोने लगे। वे कहते हैं, ‘तब का दिन है और आज का दिन, मैं अपने बड़ों के पैर उसी तरह से छूता हूं जैसे उन्होंने सिखाया था।’ एक बच्चे के पैर छू लेने में भी जिस व्यक्ति को कोई हीनता महसूस न होती हो, वही अहंकार रहित माना जा सकता है और यह घटना साबित करती है कि शास्त्री जी केवल बड़े पदों पर ही नहीं पहुंचे थे, बल्कि वे वास्तव में हृदय से भी काफी बड़े थे, जिनके लिए पद व उम्र में छोटे व बड़े दोनों एक समान थे।

लोन से खरीदी फिएट कार

शास्त्री जी के सादे और ईमानदारी भरे जीवन से संबंधित एक और घटना का जिक्र मिलता है कि शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक उनका अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। एक बार उनके बच्चों ने उन्हें उलाहना दिया, ‘अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। कम से कम अब आपके पास अपनी एक कार तो होनी ही चाहिए।’ उस जमाने में एक फिएट कार 12,000 रुपए में आती थी। उन्होंने अपने एक सचिव से कहा- ‘जरा देखें मेरे बैंक खाते में कितने रुपए हैं?’ सचिव ने बताया कि उनका बैंक बैलेंस मात्र 7,000 रुपए था। जब शास्त्री जी के बच्चों को पता चला कि शास्त्री जी के पास कार खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि कार मत खरीदिए, लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि- बाकी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटा लेंगे। इस तरह उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार खरीदने के लिए 5,000 रुपए का लोन लिया। हालांकि एक साल बाद लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया, जिसे बाद में उनकी पत्नी ने चार साल बाद तक अपनी पेंशन से चुकाया। शास्‍त्री जी की यह कार आज भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है और दूर- दूर से लोग इसे देखने आते हैं।

पहुंच गए बेटे के स्कूल

शास्त्री जी प्रधानमंत्री बनने से पहले जैसे थे, प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके स्वभाव या विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था और इसका उल्लेख स्वयं शास्त्री जी ने एक घटना के दौरान किया था। बात साल 1964 की है, जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे। उस जमाने में आज की तरह पैरेंट्स-टीचर मीटिंग नहीं हुआ करती थी, लेकिन अभिभावकों को छात्र का रिपोर्ट कार्ड लेने के लिए जरूर बुलाया जाता था। शास्त्री ने भी तय किया कि एक अभिभावक की तरह वे भी अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने स्वयं उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वे स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि वे कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। शास्त्री जी के बेटे की कक्षा पहली मंजिल पर थी। शास्त्री जी खुद चलकर उनकी कक्षा में गए, जहां क्लास टीचर रेवेरेंड टाइनन उन्हें वहां देखकर हतप्रभ रह गए और बोले- ‘सर’ आपको रिपोर्ट कार्ड लेने यहां आने की जरूरत नहीं थी। आप किसी को भी भेज देते।’ शास्त्री का जवाब था- ‘मैं वही कर रहा हूं जो मैं पिछले कई सालों से करता आया हूं और आगे भी करता रहूंगा।’ टाइनन ने कहा- ‘लेकिन अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं।’ शास्त्री जी मुस्कराए और बोले- ‘ब्रदर टाइनन’ मैं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला, लेकिन लगता है आप बदल गए हैं।’ यह घटना स्वयं बताती है कि शास्त्री जी प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अपने घरेलू कर्तव्योंे को स्वयं ही निभाया करते थे। यानी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे वैसे ही थे, जैसे प्रधानमंत्री बनने से पहले थे। शास्त्री जी, गांधी जी से केवल प्रभावित ही नहीं थे, बल्कि वे उनके आदर्शों का पूरी तरह से अनुसरण भी करते थे और सादा जीवन उच्च विचार उन्हीं में से एक ऐसा आदर्श है, जो शास्त्री जी के संपूर्ण जीवन में झलकता है। यदि गांधी जी के सादा जीवन उच्च विचार को मूर्त रूप में समझना हो, तो शास्त्री जी के जीवन से समझा जा सकता है।


प्रेरक नेतृत्व

शास्त्री जी की सलाह पर भारत कुमार का ‘उपकार’ 23 - 29 अक्टूबर 2017

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‘शहीद’ फिल्म देखने के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने अभिनेता मनोज कुमार से अपने नारे 'जय जवान जय किसान' को लेकर फिल्म बनाने को कहा था

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एसएसबी ब्यूरो

त मनोज कुमार की करें तो उनकी जिंदगी और फिल्मी करियर पर लाल बहादुर शास्त्री का गहरा असर पड़ा। देश में देशभक्ति की फिल्मों की बात जब भी होगी तो उनका नाम सबसे पहले जेहन में आएगा। यही कराण है कि लोग उन्हें भारत कुमार के नाम से भी जानते हैं, पुकारते हैं। मनोज कुमार से जब शास्त्री जी के बारे में बात करते हैं तो वे एक साथ कई बातें बताते हैं। इन्हीं बातों में उनकी जिंदगी का अपना संघर्ष भी छिपा है। अविभाजित भारत के अबोटाबाद प्रांत में 24 जुलाई, 1937 के दिन हरिकिशन गिरि गोस्वामी का जन्म एक पढ़े-लिखे गोसाईं परिवार में हुआ था, जिसने बाद में दिलीप कुमार की फिल्म ‘शबनम’ के नायक के नाम से प्रभावित होकर अपना नाम ‘मनोज कुमार’ रखा। मनोज की यादों में दिल्ली का किंग्सवे कैंप और हडसन लेन आज भी जीवंत हैं, जहां उनका बचपन गुजरा। दिल्ली में उन्होंने अपने दो महीने के भाई को मरते देखा। डॉक्टरों पर हाथ उठाए और फिर तमाम उम्र किसी पर हाथ नहीं उठाने की कसम खा ली। दिल्ली, जहां उन्होंने प्रेम किया। दिल्ली, जहां उन्होंने फिल्में देखते हुए हीरो बनने के सपने पाले। दिल्ली, जिन्हें उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए छोड़ दिया। मनोज कुमार मुंबई आ गए और संघर्षों का दौर शुरू हो गया। फिल्म स्टूडियो के चक्कर काटना, बार-बार इंकार, लानत-मलानत आदि सभी दौर से वो गुजरे। 1957 में पहली फिल्म मिली – ‘फैशन’ जिसके एक सीन में 19 साल के मनोज कुमार ने 90 साल के बुजुर्ग भिखारी का किरदार निभाया। मगर मनोज कुमार का औपचारिक प्रवेश मीना कुमारी की फिल्म ‘सहारा’ से हुआ। यह फिल्म मनोज के रिश्तेदार और तब के नामचीन फिल्मी लेखक लेखराज भाखरी द्वारा लिखी गई थी। इस फिल्म में मनोज कुमार ने छोटी मगर असरदार भूमिका निभाई। इसके बाद भी मनोज का फिल्मों में संघर्ष जारी रहा। विजय भट्ट ने उन्हें देखा और परखा। उनकी फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ आई। फिल्म चली भी मगर तब भी मनोज कुमार को छिटपुट फिल्में ही मिलती रहीं। उन्हीं दिनों राज खोसला की नजर

मनोज कुमार पर गई। राज साहब अपनी फिल्म ‘वो कौन थी’ के लिए ऐसे ही किसी चेहरे की तलाश में थे और लेखराज साहब से पहचान के कारण मनोज को भी जानते थे। यह फिल्म आई और मील का पत्थर साबित हुई। इसके बाद मनोज कुमार ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। साठ का दशक मनोज कुमार के नाम रहा। उन्होंने ‘पत्थर के सनम’, ‘दो बदन’, 'वो कौन थी', 'गृहस्थी', 'गुमनाम' जैसी लगातार हिट फिल्में दीं। वह उस दौर के सभ्य नायक के किरदार में पसंद किए जाने लगे। 1965 में आई फिल्म ‘शहीद’ में मनोज की अदाकारी के चर्चे फिल्मी गलियारों से लेकर लोगों की जुबान तक खूब हुए। कहा गया कि दूसरा कोई अदाकार इस भूमिका को इस खूबसूरती से नहीं निभा सकता था। 1965 में देशभक्ति के जज्बे से भरी एक अहम

फिल्म रिलीज हुई। यह फिल्म शहीद भगत सिंह की जिंदगी पर बनी थी और इसमें भगत सिंह का किरदार निभाया था मनोज कुमार ने। फिल्म का नाम था- ‘शहीद’। इस फिल्म को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री रो पड़े थे। इस फिल्म में सुखदेव का किरदार निभाने वाले प्रेम चोपड़ा बताते हैं, ‘हमारे आमंत्रण पर लाल बहादुर शास्त्री जी ‘शहीद’ देखने आए। उनके पास वक्त बहुत कम था, लेकिन जब उन्होंने ‘शहीद’ देखनी शुरू की तो अपनी सीट से उठ भी नहीं पाए। फिल्म देखते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए।’ फिल्म खत्म होने के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने फिल्म में भगत सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता मनोज कुमार से अपने नारे 'जय जवान जय किसान' को लेकर किसान और सैनिकों पर आधारित कोई फिल्म बनाने को कहा। आलम यह रहा कि साल 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद

मनोज कुमार ने लेखक, निर्देशक और अभिनेता की तीनों जिम्मेदारियां संभालते हुए फिल्म ‘उपकार’ बनाई। यह फिल्म 1967 की सर्वाधिक सफल फिल्मों में से रही। मनोज को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला

देश का मनोबल बढ़ाने के लिए खुद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें ‘जय जवान जय किसान’ के नारे को सार्थक करती हुई एक फिल्म बनाने को कहा। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज के पढ़े और शिक्षित पारिवारिक बैकग्राउंड के मनोज के लिए इतना बहुत था। इस तरह ‘विशाल पिक्चर्स’ की नींव पड़ी। अभिनेता मनोज कुमार ने लेखक, निर्देशक और अभिनेता की तीनों जिम्मेदारियां संभालते हुए फिल्म ‘उपकार’ बनाई। यह फिल्म साल 1967 की सर्वाधिक सफल फिल्मों में से रही। मनोज कुमार को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। 1992 में भारत सरकार ने मनोज कुमार को उनकी सेवाओं के लिए ‘पद्म श्री’ दिया। इसके अलावा 2016 में उन्हें सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान ‘दादा साहब फाल्के अवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया। शास्त्री जी का जिक्र आने और लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र आने पर मनोज बताते हैं, ‘मैंने तो खैर उनके कहने पर फिल्म बनाई। पर उनकी शख्सियत थी ही ऐसी कि उनसे मिलकर कोई भी प्रभावित हो जाता।’ फिल्म ‘उपकार’ के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, ‘शास्त्री जी ने उन्हें ‘जय जवान, जय किसान’ की थीम दी थी। इसी थीम पर मुझे पूरा कथानक बुनना था। संतोष कि बात यह है कि यह काम न सिर्फ अच्छे से हुआ, बल्कि ‘उपकार’ देखने के बाद इसकी सराहना भी खूब हुई। यह फिल्म आज भी भारतीय फिल्मों की क्लासिक्स में शामिल है। इसके गीत तो आज भी लोगों के होठों पर हैं।’ शास्त्री जी का जिक्र आने पर मनोज यह भी जोड़ते हैं कि खुद उन्होंने अपनी जिंदगी में काफी संघर्ष देखे हैं। फिल्मी दुनिया में जगह बनाना उनके लिए आसान नहीं था। ऐसे में देश का शीर्ष नेतृत्व जब ऐसा हो, जो संघर्ष और सादगी की मिसाल हो तो रचनात्मक प्रवृति के किसी आदमी के लिए वह स्वाभाविक रूप से प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत होता है।


12 प्रेरक नेतृत्व

23 - 29 अक्टूबर 2017

‘जय जवान जय किसान’ पाकिस्तान के साथ 1965 में युद्ध के मैदान में दो-दो हाथ करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की निडरता से देश-दुनिया उनके एक व्यक्तित्व और नेतृत्व के ऐसे पहलू से परिचित हुई, जिससे इससे पहले सभी नितांत अनजान थे

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एसएसबी ब्यूरो

रत मां के महान सपूत लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र हो और 1965 के भारत-पाक युद्ध की चर्चा न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यह वह दौर था, जब पाकिस्तान ने 3-3 बार भारत की सीमा को लांघने की कोशिश की। उस समय लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री थे। शास्त्री जी ने दो बार पाकिस्तान की गलती को नजरअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन तीसरी बार जब भारतीय सेना आगे बढ़ी तो पाकिस्तान के लिए लाहौर को बचाना मुश्किल हो गया।

मुगालते में था पाक

गौरतलब है कि लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बने तब एक साल ही हुआ था। देश अकाल और आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। शास्त्री जी के सामने कई बड़ी राजनीतिक चुनौतियां भी थीं। पाकिस्तान भारत के इस माहौल का फायदा उठाना चाहता था। क्योंकि उससे पहले 1962 में चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ था और पाकिस्तान को लगा कि चीन के साथ युद्ध के बाद भारत कमजोर हो गया है। इसी सोच के साथ उस वक्त पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भारत के खिलाफ एक बड़ी साजिश रच रहे थे।

शुरू में युद्ध टालना चाहते थे शास्त्री

कश्मीर पर घात लगाए बैठे पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ पहली कोशिश 1965 के मई महीने में की। गुजरात के कच्छ के रण में पाकिस्तान कुछ समय से गोलीबारी कर रहा था। भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण वहां सीजफायर करना पड़ा। उस वक्त लाल बहादुर शास्त्री पर पाकिस्तान से युद्ध का दबाव बन रहा था, लेकिन शास्त्री जी युद्ध को टालना चाहते थे। दरअसल, कच्छ पर हमला पाकिस्तान की एक बड़ी साजिश का हिस्सा था, इस हमले के बहाने वो

भारतीय फौज की तैयारियों का जायजा लेना चाहता था। कश्मीर हमेशा से पाकिस्तान के लिए एक ऐसा रत्न रहा है, जिसे वह हासिल करना चाहता है। इसके लिए उन्होंने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ चलाया था। इस ऑपरेशन के असफल होने के बाद युद्ध शुरू हो गया। शास्त्री जी ने पाकिस्तान को धमकी दी और कहा अयूब खान और जुल्फिकार अली भुट्टो ने दो बार मुंह की खाने के बाद भी सबक नहीं सीखा। एक सितंबर 1965 को पाकिस्तान ने तीसरी गलती की। यह गलती पाकिस्तान नें ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ के नाम से की थी।

ताकत छंब में झोंक दी, पाकिस्तान ने अमेरिका से मिले पैटन टैंकों को युद्ध के मैदान में उतार दिया। पाकिस्तानी फौज को खदेड़ने के लिए भारत को नई रणनीति की जरूरत थी। भारत के सेनाध्यक्ष जनरल जेएन चौधरी ने अचानक आधी रात को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मुलाकात का समय मांगा। आधी रात को ही शास्त्री जी और आर्मी चीफ चौधरी की मुलाकात हुई। शास्त्री जी ने लड़ाई को बढ़ाने का फैसला कर लिया था। जम्मू कश्मीर ही नहीं, उन्होंने सेना को राजस्थान से लेकर पंजाब तक पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोलने की आजादी दे दी।

‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ के तहत पाकिस्तानी फौज ने जम्मू-कश्मीर के छंब में भारतीय सेना पर तोपों से जबरदस्त हमला कर दिया। छंब पर कब्जे का मतलब था भारत से जम्मू कश्मीर का अलग हो जाना। इसे रोकने के लिए एयर फोर्स का इस्तेमाल जरूरी था। हालात को देखते हुए सेनाध्यक्ष जनरल जेएन चौधरी ने एयर मार्शल अर्जन सिंह से एयरफोर्स की मांग की। इसके बाद अर्जन सिंह ने रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण से पाकिस्तान के खिलाफ एयर फोर्स के इस्तेमाल की इजाजत मांगी। यह एक बड़ा फैसला था, क्योंकि इसका मतलब था युद्ध को आगे बढ़ाना, लेकिन रक्षामंत्री ने इसकी इजाजत दे दी।

पंजाब और राजस्थान की सीमा से पाकिस्तान में दाखिल होने के फैसले ने लड़ाई की दिशा को बदल दी। कश्मीर पर कब्जा करने का ख्वाब देखने वाली पाकिस्तानी फौज के लिए लाहौर और सियालकोट को बचाना मुश्किल हो गया। पाकिस्तान को दांव उलटा पड़ गया था। इस लड़ाई में पाकिस्तान को जबरदस्त नुकसान हुआ, उसके करीब 400 टैंक नष्ट हो गए और सबसे बड़ी बात भारत ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर हमला किया था, लिहाजा भारत के लिए उससे वीरता के साथ चतुर रणनीति से निपटना जरूरी हो गया था।

वायु सेना का साहस

आधी रात को बड़ा फैसला

भारतीय एयर फोर्स के विमानों के एक्शन में आते ही जमीन पर लड़ रही भारतीय सेना को बड़ी मदद मिली, लेकिन पाकिस्तान ने भी अपनी पूरी

400 टैंक नष्ट किए

प्रोत्साहन का नारा

वह देश के लिए बहुत अधिक कठिनाई का समय था और सभी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे थे। देश अनाज की समस्या से जूझ रहा था और उसी समय पर पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

पंजाब और राजस्थान की सीमा से पाकिस्तान में दाखिल होने के फैसले ने लड़ाई की दिशा को बदल दी। कश्मीर पर कब्जा करने का ख्वाब देखने वाली पाकिस्तानी फौज के लिए लाहौर और सियालकोट को बचाना मुश्किल हो गया

एक नजर

पाकिस्तान ने 3-3 बार भारत की सीमा को लांघने की कोशिश की थी जनरल जेएन चौधरी के कहने पर आधी रात को जंग का फैसला

पाकिस्तान को जबरदस्त नुकसान हुआ। उसके 400 टैंक नष्ट हुए

शास्त्री जी महान वीर और दृढ इच्छाशक्ति के व्यक्ति थे और उस समय देश में युद्ध के दौरान देशवासियों का समर्थन इकट्ठा करने के लिए उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। उनके नेतृत्व की पूरे विश्व में प्रशंसा हुई। वह अपना जीवन बहुत सादगी और सच्चाई के साथ जीते थे और भारतीयों के प्रोत्साहन के महान स्रोत थे।

आदर्श की मिसाल

पाकिस्तान से जीत के पीछे खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का बड़ा योगदान है। लाल बहादुर शास्त्री ने जहां लोगों से सप्ताह में एक बार व्रत रखने की अपील की, वहीं खुद सबसे पहले व्रत रखना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने वाले ट्यूटर को भी आने से मना कर दिया। उस वक्त जब ट्यूटर ने कहा कि आपका बच्चा अंग्रेजी में फेल हो जाएगा तो उन्होंने कहा कि देश के हजारों बच्चे अंग्रेजी में ही फेल होते हैं तो इसी भी होने दो। अगर अंग्रेज हिंदी में फेल हो सकते है तो भारतीय अंग्रेजी में फेल हो सकते हैं। यह तो स्वाभाविक है, क्योंकि अंग्रेजी अपनी भाषा नहीं है। समझा जा सकता है कि देशप्रेम के किस जज्बे से भरा था देश का यह लाल। यही नहीं, सामान्य कदकाठी के बावजूद उनके अंदर कितना साहस भरा था, यह पाकिस्तान के खिलाफ उनके कड़े रुख से जाहिर हुआ।


23 - 29 अक्टूबर 2017

स्किल इंडिया मिशन को बढ़ावा देंगे 'संकल्प' और 'स्ट्राइव' दोनों योजनाएं निष्कर्ष आधारित हैं, जिसमें व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में सरकार की कार्यान्वयन रणनीति को परिणामों से जोड़ा गया है

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आईएएनएस

धानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति द्वारा हाल ही में विश्व बैंक समर्थित दो नई योजनाओं-आजीविका संवर्धन हेतु दक्षता हासिल करने और ज्ञान बढ़ाने (संकल्प) तथा औद्योगिक मूल्य संवर्धन हेतु दक्षता सुदृढ़ीकरण (स्ट्राइव) योजनाओं को मंजूरी प्रदान की गई। 4,455 करोड़ रुपए की केंद्रीय प्रायोजित संकल्प योजना में विश्व बैंक द्वारा 3,300 करोड़ रुपए ऋण की सहायता शामिल है, जबकि 2,200 करोड़ रुपए की केंद्रीय प्रायोजित स्ट्राइव योजना में विश्व बैंक से इस योजना की आधी राशि ऋण सहायता के रूप में दी जाएगी। संकल्प और स्ट्राइव योजनाएं निष्कर्ष आधारित हैं, जिसमें व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में सरकार की कार्यान्वयन रणनीति को परिणामों से जोड़ा गया है। दक्षता प्रशिक्षण के प्रभावी सुशासन और विनियमन शुरू करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा में औद्योगिक प्रयासों को चिन्हित करने के लिए काफी लंबे समय से एक राष्ट्रीय रूपरेखा की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय कौशल प्रशिक्षण में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए इस तरह की कई पहलें शुरू कर चुका है, जैसे स्मार्ट पोर्टल के माध्यम से मान्यता, केंद्रीकृत मूल्यांकन एवं प्रमाणीकरण प्रणाली, आईटीआई का आईएसओ प्रमाणीकरण, कुछ राज्यों में ऑनलाईन परीक्षणों की ओर संक्रमण आदि। ऐसे में संकल्प और स्ट्राइव जैसी परियोजनाएं जिला स्तर तक देश में सुधार लाने में मदद करेंगी। संकल्प मान्यता और प्रमाणीकरण के लिए राष्ट्रीय निकायों की संस्थापना द्वारा इस आवश्यकता को पूरा करेगी। मान्यता एवं प्रमाणीकरण के लिए निकाय दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक दोनों

एक नजर

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति दोनों योजनाओं को मंजूरी दे चुकी है संकल्प और स्ट्राइव योजनाएं विश्व बैंक दवारा समर्थित हैं दोनों परियोजनाएं संस्थागत स्तर पर अहम सुधार लाएंगी

गुड न्यूज

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माइग्रेनग्रस्त महिलाओं के लिए हार्मोन थेरेपी

एक अध्ययन से पता चला है कि हार्मोन थेरेपी माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं के लिए सुरक्षित है

दक्षता प्रशिक्षण के प्रभावी सुशासन और विनियमन शुरू करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा में औद्योगिक प्रयासों को चिन्हित करने के लिए काफी लंबे समय से एक राष्ट्रीय रूपरेखा की आवश्यकता महसूस की जा रही थी ही व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण (वीईटी) की मान्यता और प्रमाणनन का कार्य करेगा। यह संरचना भारत में व्यवसायिक इतिहास में पहली बार विभिन्न केंद्रीय, राज्य और प्राइवेट क्षेत्र के संस्थानों पर ध्यान देगा। जिसके फलस्वरूप गतिविधियों के दोहराव का परिहार होगा और व्यावसायिक प्रशिक्षण में एकरूपता आएगी और इस प्रकार इसका बेहतर प्रभाव होगा। ये दोनों परियोजनाएं संस्थागत स्तर पर सुधार लाएंगी तथा दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक रूप से कौशल विकास प्रशिक्षण प्रोग्रामों की गुणवत्ता एवं प्रासंगिकता को बेहतर बनाएगी। स्ट्राइव परिणाम एवं सुधार लिंक्ड वित्तपोषण के जरिए 500 से अधिक आईटीआई का आधुनिकीकरण करेगी। यह 100 से अधिक चुनिंदा आईटीआई को विश्वस्तरीय मानकों के अनुरूप भी बनाएगी। यह 100 उद्योग चैंबर्स / क्लस्टर्स को प्रोत्साहित कर प्रशिक्षुता के लिए संस्थागत क्षमता निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करेगी। ये योजनाएं राष्ट्रीय दक्षता विकास मिशन 2015, और इसके विभिन्न उप-मिशनों को अपेक्षित महत्व प्रदान करेंगी। ये इस निमित्त 700 औद्योगिक संस्थानों

को लाखों महत्वकांक्षा रखने वाले लोगों को रोजगार उन्मुख दक्षता प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जा रहे है। चुने हुए क्षेत्रों एवं भौगोलिक स्थानों पर ऐसे संस्थानों की स्थापना के लिए प्रस्तावों का चयन करने के लिए एक नवाचार चुनौती निधि मॉडल को लागू किया गया है। संकल्प में प्रशिक्षकों एवं मूल्यांकनकर्ता अकादमियों के स्वत: प्रसूत मॉडलों की स्थापना पर विचार किया गया है। प्राथमिकता क्षेत्रों में 50 से ज्यादा ऐसी अकादमियों की स्थापना की जा जानी है। डीजीटी, एमएसडीई ने सरकारी एवं निजी क्षेत्र में 35 से ज्यादा ट्रेडों में प्रशिक्षण का प्रस्ताव लेकर प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण (आईटीओटी) के लिए अनेक संस्थाओं की स्थापना हेतु इस दिशा में पहले ही उल्लेखनीय प्रगति की है। ये योजनाएं दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक वीईटी दोनों में ही प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए ऐसे संस्थानों को गति प्रदान करेंगी, जिससे अपेक्षित बदलाव आ सकेंगे। चुने हुए क्षेत्र एवं भौगोलिक अंतर के आधार पर अतिरिक्त प्रशिक्षक अकादमियों की स्थापना की जाएगी।

हा

र्मोन थेरेपी रजोनिवृत्ति के लक्षणों का इलाज कराने वाली माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं के लिए सुरक्षित है। माइग्रेन अलगअलग तीव्रता का सिरदर्द होता है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को अक्सर मितली और प्रकाश और ध्वनि के प्रति संवेदनशीलता की शिकायत रहती है। एक्सोजीनस एस्ट्रोजन का एक साथ उपयोग और माइग्रेन पीड़ित महिलाओं में स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ने के कारण माइग्रेन से ग्रस्त मरीजों को हार्मोन थेरेपी के सेवन की सलाह नहीं दी जाती है। अमेरिका में थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी से पीटर एफ. शैंटैज ने कहा कि यह अध्ययन हार्मोन थेरेपी के सुरक्षित उपयोग के बारे में जानकारी को स्पष्ट करता है, खासकर 60 साल की कम उम्र की महिलाओं में जो रजनोनिवृत्ति के आसपास की उम्र की हैं। न्यूयार्क के एल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन से जेलेना पावलोविक का कहना है कि चूंकि माइग्रेन प्रत्येक चार महिलाओं में से एक महिला को प्रभावित करता है और इन्हें अक्सर हार्मोन थेरेपी से बचने की सलाह दी जाती है, इसीलिए यह नए निष्कर्ष सार्वजनिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। इस शोध के लिए अध्ययनकर्ताओं ने 67,903 प्रतिभागियों का आकलन किया था, जिनका माइग्रेन, हृदय रोग के लक्षणों के बीच संबंध और हार्मोन थेरेपी के इस्तेमाल का जुड़ाव रहा था। (एजेंसी)


14 स्वास्थ्य समय पूर्व जन्मे बच्चे ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते 23 - 29 अक्टूबर 2017

60,000 बच्चों के बीच किए गए अध्ययन से पता चला है कि समय पूर्व जन्मे बच्चों को कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है

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-टर्म यानी समय से पहले जन्मे शिशुओं को बाद में चीजों को पहचानने, निर्णय लेने और कई तरह की अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों के जोखिम से गुजरना पड़ सकता है। यहां तक कि समय पूर्व जन्मे शिशुओं को ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत हो सकती है। इस समस्या को अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) कहा जाता है। ऐसे बच्चों को स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करने में कठिनाई आ सकती है। यह अध्ययन 60,000 बच्चों के बीच किया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) का अनुमान है कि हर साल लगभग 1.5 करोड़ प्रीटर्म बच्चे दुनिया भर में जन्म लेते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विश्व में हर दस में से एक बच्चा प्रीटर्म जन्म लेता है। 184 देशों में प्रीटर्म जन्म की दर 5 प्रतिशत से लेकर 18 प्रतिशत तक है। भारत में, हर साल पैदा होने वाले 2.7 करोड़ बच्चों में से 35 लाख बच्चे प्रीटर्म श्रेणी के होते हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि समयपूर्व जन्म उसे कहा जाता है, जो गर्भावस्था के 37 सप्ताह से पहले ही हो जाता है। सामान्य गर्भावस्था आमतौर पर लगभग 40 सप्ताह की होती है। जन्म से पहले बच्चे को गर्भ में विकसित होने के लिए कम समय मिल पाता है, इसीलिए अक्सर चिकित्सा समस्याएं जटिल होती जाती हैं। ऐसे कई शिशुओं को दिमागी लकवा यानी सेरीब्रल पाल्सी, सीखने में कठिनाई और सांस संबंधी बीमारियों जैसे विभिन्न रोग होने का डर रहता है। ऐसे बच्चे आगे के जीवन में कई शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कठिनाइयों का कारण बनते हैं। प्रीटर्म शिशु आकार में छोटा, बड़े सिर वाला होता है। ये तेज दिखते हैं। इनके शरीर पर बाल अधिक होते हैं। इनके शरीर का तापमान भी कम रहता है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि हालांकि समय से पहले जन्म के पीछे कोई एक कारण बताना मुश्किल होगा। फिर भी, गर्भवती महिला की कम आयु, पहले भी प्रीटर्म केस होना, मधुमेह और उच्च रक्तचाप कुछ सामान्य कारण हैं। यह आनुवंशिक कारणों से भी हो सकता है। गर्भवती महिला की प्रसव से पहले अच्छे से देखभाल और जागरुकता से इस स्थिति के प्रबंधन में आसानी हो सकती है। (आईएएनएस)

भारत में 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार पोषण की कमी से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं कुपोषण के शिकार

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रत में पांच वर्ष से कम आयु के 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। देश में बाल कुपोषण 1998-2002 के बीच 17.1 प्रतिशत था, जो 2012-16 के बीच बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया। दुनिया के पैमाने पर यह काफी ऊपर है। एक रपट के मुताबिक, पिछले 25 सालों से भारत ने इस आंकड़े पर ध्यान नहीं दिया और न ही इस स्थिति को ठीक करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीआई) 2017 में शामिल जिबूती, श्रीलंका और दक्षिण सूडान ऐसे देश हैं, जहां बाल कुपोषण का आंकड़ा 20 प्रतिशत से अधिक है। इस सूचकांक के चार प्रमुख मानकों में से कुपोषण भी एक है। आंकड़े बताते हैं कि पोषण की कमी का नतीजा होता है बाल कुपोषण और ऐसे बच्चे संक्रमण के आसानी से शिकार हो जाते हैं, इनका वजन तेजी से कम होने लगता है और इन्हें स्वस्थ होने में बहुत समय लगता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

(आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि कुपोषण का एक मतलब यह भी है कि ऐसे बच्चे अपनी लंबाई के अनुपात में हल्के होते हैं। एक स्वस्थ बच्चे का वजन हर साल आम तौर पर दो-तीन किलोग्राम बढ़ना चाहिए। समस्या तब गंभीर मानी जा सकती है, जब एक बच्चे का वजन व ऊंचाई का माप विश्वस्तर पर स्वीकृत आदर्श माप से कम होता है। वजन कम होना और स्टंटिंग दो अलग समस्याएं हैं, जो ऐसे बच्चों में पाई जाती हैं। कुपोषण के कुछ लक्षणों में शरीर में वसा की कमी, सांस लेने में कठिनाई, शरीर का कम तापमान, कमजोर प्रतिरक्षा, ठंड लगना, सेंसिटिव त्वचा, घाव भरने में अधिक समय लगना, मांसपेशियों में कमजोरी, थकान और चिड़चिड़ापन शामिल हैं। डॉ अग्रवाल ने कहा कि गंभीर कुपोषण वाले बच्चों को कुछ भी नया सीखने में बहुत अधिक समय लगता है। इनका बौद्धिक विकास कम होता है। इन्हें मानसिक कार्य करने में कठिनाई होती है और पाचन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति जीवन में लंबे समय तक बनी रहती है। कुपोषण की रोकथाम में जिस एक बात पर सर्वाधिक जोर होना चाहिए, वह है - स्वस्थ व संतुलित आहार। चार प्रमुख खाद्य समूह हैं, जो बच्चों के आहार में शामिल होने चाहिए। (आईएएनएस)

स्वच्छता के लिए बुजुर्ग महिला ने किया लंबा संघर्ष अफसरों की अनसुनी पर कोर्ट तक लड़ाई लड़कर आखिर घर में शौचालय बनवाने में सफलता हासिल की 60 वर्षीय महिला ने

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च्छता मिशन और स्वच्छता ही सेवा जैसे अभियान में कानपुर के सरवनखेड़ा ब्लाक के कीरतपुर की रूपरानी ने नई इबारत लिखी है। प्रशासनिक अफसरों की अनसुनी पर कोर्ट तक लड़ाई लड़कर आखिर घर में शौचालय बनवाने में सफलता हासिल कर वह मिसाल बन गई हैं। कीरतपुर की 60 वर्षीय रूपरानी के पति का निधन काफी पहले हो चुका है। घर में

शौचालय बनवाने के लिए ग्राम पंचायत में मांग उठाई। यहां हल नहीं निकला तो डीएम को पत्र लिखकर गुहार लगायी। प्रशासनिक अमले में अनसुनी पर उन्होंने स्थाई कोर्ट में अर्जी लगाई और पक्ष में फैसला आया। हालांकि कोर्ट के आदेश पर तीन माह में शौचालय नहीं बना तो रूपरानी ने मीडिया की मदद ली। इसके बाद प्रशासन की तंद्रा टूटी तो

उसके घर में शौचालय बनवाया गया। सीडीओ केदारनाथ की पहल पर डीसी विमल कुमार ने निजी खर्च से शौचालय में टाइल्स लगवाए। कोर्ट के आदेश बाद प्रशासनिक अड़चनों को पार कर शौचालय की लड़ाई जीतने वाली रूपरानी अब खुश हैं। समाजिक कार्यकर्ता कंचन मिश्रा ने रूपरानी का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया है।


23 - 29 अक्टूबर 2017

स्वास्थ्य

विटामिन डी सप्लीमेंट से अस्थमा पर काबू संभव

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विटामिन डी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करके ऊपरी श्वसन संक्रमण को नियंत्रित करता है, जिससे गले की सूजन कम हो जाती है

क अध्ययन के अनुसार, अस्थमा की स्टैंडर्ड दवाइयां लेने के अलावा विटामिन डी की अतिरिक्त खुराक लेने से इस रोग के जोखिम को आधा किया जा सकता है। विटामिन डी का सप्लीमेंट लेने वाले लोगों में अस्थमा के एक दौरे के बाद इसका खतरा 50 फीसदी तक कम पाया गया। विटामिन डी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करके ऊपरी श्वसन संक्रमण को नियंत्रित करता है, जिससे गले की सूजन कम हो जाती है। भारत में अस्थमा से लगभग 1.5 से दो करोड़ लोग प्रभावित हैं। अस्थमा फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी है, जो सांस लेने की नली को संकरा कर देती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और खांसी आती है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, ‘अस्थमा को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि पहले श्वसन नली के काम को

समझ लिया जाए। यह वह नली होती है, जिसके जरिए आपके फेफड़ों में हवा जाती है और बाहर आती है। अस्थमा के लोगों में, इसी वायुमार्ग में सूजन आ जाती है, जिससे उनका गला बहुत अधिक संवेदनशील हो जाता है। इस वजह से, कुछ

पदार्थों के प्रति वायुमार्ग तीव्र प्रतिक्रिया करता है।’ डॉ. अग्रवाल ने कहा कि ऐसा होने पर आसपास की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। नतीजतन, वायुमार्ग संकरा हो जाता है, जिससे फेफड़ों में बहने वाली हवा कम हो जाती है। इस प्रकार, वायुमार्ग की कोशिकाएं सामान्य से अधिक बलगम बनाने लगती हैं। ये सभी अस्थमा के लक्षण हो सकते हैं। वायुमार्ग में सूजन हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी के कुछ सबसे आम लक्षण हैंरात में, व्यायाम के दौरान या हंसते समय सांस

लेने में कठिनाई, छाती में जकड़न, सांस की कमी और घरघराहट (विशेषकर सांस छोड़ते समय)। यदि उपचार न किया जाए तो अस्थमा के लक्षण खतरनाक हो सकते हैं। अस्थमा के प्रचार और इसके उपचार को लेकर डॉ. अग्रवाल ने कहा, ‘ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में सांस की नली में संवेदनशीलता बढ़ रही है, क्योंकि लोग कई तरह के ट्रिगर्स वाले संपर्क में अधिक रहते हैं। अस्थमा के मरीज को निरंतर चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है और मध्यम से गंभीर अस्थमा वाले रोगियों को लंबे समय तक दवाइयां लेनी पड़ सकती हैं। इनमें सूजन कम करने वाली दवाएं प्रमुख हैं। लक्षणों और हमलों को रोकने के लिए दवाएं हर दिन ली जानी चाहिए। तकलीफ से आराम दिलाने के लिए शॉर्ट-एक्टिंग बीटा 2-एगोनिस्ट जैसी इन्हेलर दवा ली जा सकती है।’ (आईएएनएस)

एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया की पहचान अब 30 मिनट में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने एंटीबायोटिक दवा को बेअसर करने वाले बैक्टीरिया का पता लगाने का विकसित तरीका खोज निकाला है

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ज्ञानिकों ने मूत्रमार्ग में संक्रमण को खत्म करने के लिए दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवा को बेअसर करने वाले बैक्टीरिया का पता महज 30 मिनट

से भी कम समय में लगाने का एक तरीका खोज निकाला है। इस जांच के लिए मरीजों को सिर्फ एक बार क्लीनिक जाने की जरूरत होगी और उन्हें उसी

दौरान निदान और प्रभावी उपचार दिया जा सकेगा। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में विकसित नए टेस्ट में एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया की पहचान की गई है, जो 3 दिनों के समय के इंतजार को 30 मिनट से भी कम समय में परिवर्तित कर सकता है और इससे सुपरबग बैक्टीरिया के प्रसार को भी कम करने में मदद मिल सकती है। शोधपत्र के सहलेखक नाथन शूप ने कहा, ‘अभी हम निर्धारित से अधिक प्रसार कर रहे हैं, इसीलिए हम बहुत जल्दी प्रतिरोध देख रहे हैं और बहुत ज्यादा एंटीबायोटिक दवाइयों को इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि हम अधिक गंभीर परिस्थितियों के लिए उन्हें संरक्षित कर सकें।’ टीम के मुताबिक, बैक्टीरिया के संक्रमण का इलाज करते समय चिकित्सकों को मैथिसिलिन या एमोक्सिसिलिन जैसी दवाओं से पहले एंटीबायोटिक दवाओं को नजरअंदाज करना पड़ता है, क्योंकि उनके बैक्टीरिया प्रतिरोधी होने की संभावना रहती है। जेकब्स इंस्टीट्यूट फॉर मॉलेकल्युलर इंजीनियरिंग फॉर मेडिसीन के कैमिस्ट्री एंड केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर रस्टेम इस्माइलिकोव, कैलटेक विल्सन

एक नजर

मरीजों को सिर्फ एक बार क्लीनिक जाने की जरूरत होगी

तकनीक सुपरबग बैक्टीरिया के प्रसार को भी कम करने में मददगार इससे एंटीबायोटिक दवा निर्धारित करने के तरीके भी बदल जाएंगे

बाउल्स और निदेशक रॉबर्ट बाउल्स का कहना है, ‘परीक्षण के बहुत धीमा होने के कारण और वास्तव में रोगी को जाने बिना कि वह किस मर्ज से पीड़ित है, चिकित्सकों को विश्व स्वास्थ्य संगठन या रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए संगठनों द्वारा जारी दिशानिर्देशों से प्रेरित किया जाता है। हम इस तरह के परीक्षण के सहारे दुनिया को तेजी से बदल सकते हैं। हम एंटीबायोटिक दवा निर्धारित करने के तरीके भी बदल सकते हैं।’ (आईएएनएस)


16 खुला मंच

23 - 29 अक्टूबर 2017

‘यदि कोई एक व्यक्ति भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सिर शर्म से झुकाना पड़ेगा’

- लाल बहादुर शास्त्री

‘स्वच्छ संवाद’ सर्वे

पीएम मोदी के एप्प पर हुए सर्वे के मुताबिक 94 फीसदी लोग मानते हैं कि स्वच्छ भारत का बापू का सपना पूरा होकर रहेगा

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन ने देश में स्वच्छता को लेकर एक नई संस्कृति को तो जन्म दिया ही है, यह मिशन आज की तारीख में देश में एक बड़े जन-आंदोलन का भी नाम है। इस अभियान ने स्वच्छता को महज सरकारी कार्यक्रम भर नहीं रहने दिया, बल्कि इस अभियान से पैदा हुई जागरूकता के कारण देश-समाज के तमाम तबकों के लोगों ने स्वच्छता को लेकर अपना पुरुषार्थ दिखाया है। इस तरह से इस मिशन ने देश में लोक स्वाभिमान और लोक पुरुषार्थ के भी अनंत प्रेरक सुलेख लिखे हैं और यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एप्प पर हुए एक हालिया सर्वे में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि देश की जनता इस अभियान को लेकर काफी संतोषजनक और आशावादी नजरिया रखती है। सर्वे में हिस्सा लेने वालों ने स्वच्छ भारत अभियान को हाई रेटिंग दिया है। इस सर्वे में शरीक होने वालों में से 61 फीसदी लोगों ने सरकार के स्वच्छ भारत अभियान को शानदार बताया है, जबकि 20 फीसदी लोगों ने इसे अच्छा कहा है। 11 फीसदी लोगों ने अभियान को औसत बताया है। इस सर्वे के मुताबिक 94 फीसदी लोग अभियान को लेकर इस कदर आशावादी हैं कि वे मानते हैं कि स्वच्छ भारत के महात्मा गांधी के सपने को पूरा किया जा सकता है। 79 फीसदी लोगों ने कहा है कि सफाई को लेकर पिछले तीन साल में उन्होंने लोगों के स्वभाव में व्यवहारिक बदलाव देखे हैं। 90 फीसदी लोगों का कहना है कि सफाई कायम रखने के लिए अब वे जागरूक प्रयास करते हैं। जाहिर है कि ‘स्वच्छ संवाद’ नाम से हुए सर्वे ने एक बार फिर यह दिखाया है कि स्वच्छता की शपथ देश न सिर्फ पूरी करने जा रहा है, बल्कि यह मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

अभिमत

डॉ. विन्देश्वर पाठक

अहिंसा से सामाजिक परिवर्तन यदि आप गांवों, शहरों, राष्ट्रों एवं दुनिया में परिवर्तन लाना चाहते हैं तो आपसे मेरा अनुरोध है कि आप गांधीवादी सिद्धांतों का पालन करें

जै

सा कि सभी जानते हैं, गांधी जी की दृष्टि महज ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को भारत से बाहर निकालने तक ही सीमित नहीं थी, वह एक अहिंसावादी, शोषण-मुक्त एवं समावेशी समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें समाज के अंतिम पायदान पर रहने वाला व्यक्ति भी महत्वपूर्ण हो। ऐसे सुधारात्मक विचारों के साथ गांधी जी यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि सर्वाधिक निर्धन व्यक्ति के जीवन की भी जरूरतें पूरी हों। गांधी जी ने भौतिकतावाद के बढ़ते संकट और साथ-साथ बढ़ती लालच एवं स्वार्थ की प्रवृत्ति को पहले ही भांप लिया था और इस कारण वे इन सबसे विरूद्ध एक जोरदार अभियान भी चलाते रहे। गांधी जी को विश्वास था कि उनके विचारों के अनुसरण एवं सुझावों के कार्यान्वयन से हिंसा, शोषण, गरीबी, बेरोजगारी एवं पारिस्थितिकी के मोर्चों पर एक साथ लड़े। उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत अथवा सैन्य शक्ति के बल पर युद्ध नहीं किया, बल्कि उन्होंने एक आदर्श जीवन एवं नैतिकता के बल पर जीवन-निर्वहण करते हुए संघर्ष किया। भारत की पारंपरिक संस्कृति एवं धर्म से गहराई से जुड़े गांधी जी ने नैतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्तर पर योजनाएं बनाई, जिसने जीवन के लगभग हर पहलू को स्पर्श किया। यद्यपि उन्होंने अपनी योजनाओं के समर्थन में बड़े पैमाने पर लिखा एवं कहा, किंतु अपने सुझावों को धरातल पर लाने के लिए उनके पास कोई व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक विकल्प नहीं थे। गांधी के इस स्वप्न से हम सभी परिचित हैं कि वह अस्पृश्यों का उद्धार तथा सामाजिक एवं पर्यावरण की स्वच्छता की सुनिश्चितता चाहते थे। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान गांधी ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है स्वच्छता। वह खुले में शौच करने के गंभीर खतरों को लेकर अत्यधिक चिंतित थे, जिससे जानलेवा बीमारियां होती हैं, यहां तक कि मृत्यु भी। खुले में शौच अत्यधिक असुविधाजनक भी है, विशेषकर महिलाओं के लिए, जो दिन के उजाले में शौच नहीं जा सकती हैं। वह स्कैवेंजिंग को समाप्त करने के लिए भी अत्यधिक इच्छुक थे, जिसके तहत मानव ही दूसरे मानव के मल की अपने हाथों से सफाई करता है। उन्होंने कहा था, ‘कोई भी मानव दूसरे मानव मल की सफाई नहीं करेगा। मानव अपशिष्ट के निपटान हेतु एक वैज्ञानिक पद्धति अवश्य होनी चाहिए।’ गांधी जी ने यह महान स्वप्न तो देखा था, लेकिन उनके पास ऐसी कोई तकनीक नहीं थी, जिससे वह स्कैवेंजिंग का उन्मूलन कर अस्पृश्यों को इस निंदनीय कार्य से मुक्त कर सके। मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया तथा अहिंसावादी मार्ग के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने हेतु अपना जीवन समर्पित कर दिया, जैसा कि गांधी जी की इच्छा थी। इसे समझाने के लिए मैं अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन करना चाहता हूं। पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद सन 1968-69 के दौरान मैंने बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति में एक स्वयंसेवक के

रूप में मेरी सामाजिक यात्रा का आरंभ हुआ। गांधी जी को श्रद्धांजलि देने हेतु इस समिति ने एक उपसमिति का गठन किया, जिसका उद्देश्य था अस्पृश्य स्कैवेंजरों को मानवमल ढोने के अमानवीय कार्य से मुक्त करना। समिति ने मुझे एक बेहतर एवं स्वच्छ, विशेषतः सुरक्षित एवं लागत-प्रभावी शौचालय तकनीक के अन्वेषण और साथ ही वाल्मीकि समुदाय को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के मार्ग तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी। मेरे जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब मैं बिहार के बेतिया शहर में तीन माह वाल्मीकि समुदाय के बीच रहने गया। इन तीन महीनों में ऐसे दो हृदयविदारक घटनाएं हुईं, जिसने जातिगत सामाजिक क्रूरताओं के प्रति मेरी आंखें खोल दीं। पहली घटना उस वाल्मीकि परिवार में घटति हुई,जिनके साथ मैं रहता था। मैंने देखा कि एक नव-विवाहिता महिला को उसके पति एवं सास दूसरे घरों में जाकर मानव-मल की सफाई करने हेतु बाध्य कर रहे थे। यह नवविवाहिता रोते हुए इसका विरोध कर रही थी, किंतु उसके पास कोई विकल्प नहीं था। अंततः उसने गंदी बाल्टी और झाड़ू अपने हाथों में थाम लिया। एक सप्ताह के भीतर ही दूसरी घटना हुई। बाजार में एक सांड युवक को खदेड़ने लगा। कई लोग उसे बचाने के लिए आगे बढ़े, तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, ‘यह लड़का भंगी है।’ मैं अपने एक मित्र के साथ उधर से गुजर रहा था, हम दोनों ने उसे बचाने का प्रयास किया। सड़क पर पड़े कुछ रोड़े-पत्थरों की सहायता से हमने सांड को भगाया। वह बालक गंभीर रूप से घायल था और अस्पताल ले जाने के क्रम में ही उसकी मृत्यु हो गई। इन नृशंस घटनाओं ने मुझे झकझोर दिया। तब मैंने अपना जीवन इन तथाकथित अस्पृश्यों की भलाई के लिए समर्पित करने की ठानी। यहां मुझे दो कठिन प्रश्नों का सामना करना पड़ाः प्रथम यह कि किस प्रकार अहिंसावादी मार्गों के माध्यम से जातिगत हिंसा को दूर किया जा सकता है और दूसरा यह कि किस प्रकार एक कारगर एवं लागत-प्रभावी शौचालय पद्धति का आविष्कार किया जा सकता है, महंगी पश्चिमी शैली के फ्लश टॉयलेट एवं केंद्रीकृत जल पर आधारित सीवेज प्रणाली के विकल्प के तौर पर, जिससे मानव स्कैवेंजिंग का उन्मूलन हो सके तथा इस वाल्मीकि समुदाय को पुनर्वासित कर लाभप्रद व्यवसायों में दक्ष किया जा सके। शीघ्र ही मुझे यह एहसास हो गया कि समाज और स्वच्छता संबंधी समस्याएं आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इस दृष्टि के साथ, मैं स्कैवेंजरों की मुक्ति के लिए गांधी जी के स्वप्न को साकार करने में जी-जान से जुट गया, साथ ही मैंने एक आंदोलन की शुरूआत कर पर्यावरण की स्वच्छता को भी सुनिश्चित किया, जो बाद में सुलभ आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कालांतर में बीबीसी होराइजंस ने इसे विश्व के पांच अद्भुत आविष्कारों में से एक के रूप में मान्यता दी है तथा संयुक्त राष्ट्र ने इसे वैश्विक स्तर पर प्रयोग के लिए सर्वोत्तम तकनीकों में से एक घोषित किया है। यह टेक्नोलॉजी


23 - 29 अक्टूबर 2017 स्कैवेंजिंग की समाप्ति में एक सक्षम औजार साबित हुआ और इससे पर्यावरण की स्वच्छता भी सुनिश्चित हुई। इस प्रकार हमने दोनों ही स्तरों पर सफलता अर्जित की है। हमारे प्रयासों के फलस्वरूप एक लाख से भी अधिक स्कैवेंजर इस पेशे से मुक्त किए और समाज की मुख्यधारा में स्थान पा सके तथा हमारे प्रयासों में 640 शहर स्कैवेंजिंग फ्री हुए। पिछले कुछ वर्षों में सुलभ ने 15 लाख शुष्क शौचालयों को जल-प्रवाही शौचालयों में परिवर्तित किया है। हमने 8,500 सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया है और संस्था द्वारा उनका रख-रखाव भी किया जाता है। देशभर में ये शौचालय ‘भुगतान एवं उपयोग’ के आधार पर चलाए जा रहे हैं। प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ लोग इन शौचालयों का उपयोग करते हैं। आज 50,000 से अधिक साहचर्य सदस्यों के साथ सुलभ विश्व के 10 बड़े गैर-सरकारी संगठनों में से एक है और स्वच्छता के क्षेत्र में सबसे बड़ा संगठन। अपने जीवन की सीख और गांधी जी की शिक्षा के परिणामस्वरूप सुलभ की यह अद्भुत उपलब्धि है कि उसने लोगों के अंतःकरण को झकझोरा और पूर्वअस्पृश्यों की सामाजिक स्थिति एवं गरिमा के उन्नयन हेतु जातिग्रस्त मानसिकता को परिवर्तित किया। हमने अपने व्यावहारिक एवं समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से यह उपलब्धि अर्जित की, जिसमें तकनीकों तथा नए आविष्कारों के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता और सुधारों का समावेश था। हमारा दृष्टिकोण अस्पृश्यों की मुक्ति एवं शेष समाज को जातिगत पूर्वग्रह से मुक्त करने की गांधीवादी प्रतिबद्धता पर आधारित है, जो अन्य सामाजिक समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है। स्वच्छता संबधी कार्यों के साथ हमने तथाकथित अस्पृश्य महिलाओं एवं बच्चों के लिए पब्लिक स्कूल एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की और इस प्रकार उन्हें वैकल्पिक और बेहतर रोजगार प्राप्ति के लिए सक्षम बनाया। उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए हमारे सामाजिक धार्मिक पहल भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके लिए हमने उन्हें मंदिरों में प्रवेश दिलवाया, ऊंची जाति के साथ उनका मेल-मिलाप कराया, जातिगत बंधनों को तोड़ने के लिए ऊंची जाति के परिवार के लोगों ने उन अस्पृश्य परिवारों को सामाजिक तौर पर अपनाया और उन्हें शिक्षित तथा सशक्त करने में अपना हर संभव मदद भी प्रदान किया। यह सब गांधी जी के जीवन से शिक्षा ग्रहण किए बिना संभव नहीं था। गांधी जी से मैंने जो सबसे महत्वपूर्ण सबक सीखा, वह था भारतीय सांस्कृतिक बनावट पर उनकी बारीक समझ, समस्याओं के प्रति उनका आदर्शवादी तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण, कट्टपंथी विचारों को सुधारवादी सोच में परिवर्तित करने की क्षमता, जिसमें समाज के सभी वर्गों को जोड़ने की शक्ति है। मैंने गांधी जी से उन परंपराओं को सम्मान देना सीखा है, जो हमारी मानवता का आवर्धन करते हैं तथा उन परंपराओं से दूर रहना, जो हमें पथभ्रष्ट और विभाजित करते हैं। मैंने गांधी जी से सीखा है कि प्राचीन अथवा आधुनिक अच्छाइयों को आत्मसात करने के लिए अपने घर की खिड़की और दरवाज खुले रखने चाहिए। गांधी जी के प्रति श्रद्धाभाव रखने और उनके अनुसरण करने के लिए मेरे पास और भी कई कारण

हैं। मैं आज जो कुछ भी हूं और मैंने समाज तथा पर्यावरण के लिए जो कुछ भी किया है, वह बिना गांधी-दर्शन के संभव नहीं था। जब मैंने 1970 में सुलभ की स्थापना की, तब महात्मा गांधी के संघर्षों तथा सपनों को पूरा करने पर ध्यान देने का निर्णय लिया, न कि गांधीवादी प्रचलित सिद्धांतों का प्रचारप्रसार करने पर। दो गड्ढ़ा​ेंवाली शौचालय तकनीक का आविष्कार तथा मानवीय संवेदनाएं अस्पृश्यों के मानवाधिकार तथा गरिमा की वापसी में सहायक सिद्ध हुईं और इनकी मदद से इन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सका। महात्मा गांधी ने स्वयं लिखा है कि जब तक ये तथाकथित अस्पृश्य मैला ढोएंगे, तब तक कोई भी व्यक्ति उनके साथ भोजन नहीं करेगा। सन 1934 में भुवनेश्वर में गांधी जी ने ऊंची जाति के लोगों को अस्पृश्यों के साथ भोजन करने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने आमंत्रण स्वीकार किया, लेकिन अस्पृश्यों के साथ भोजन करने से इंकार कर

स्कैवेंजर लोग अपने हाथों से मानव-मल की सफाई करते थे और उसे सर पर उठा कर दूर फेंकते थे। इस प्रकार शुष्क शौचालयों के मालिक भी फ्लश शौचालय पाकर संतुष्ट हो गए और कोई आपत्ति नहीं जताई। अलवर में मैंने ‘नई दिशा’ नामक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना कर अपना दूसरा कदम बढ़ाया। इसके तहत हमने सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा से मुक्त स्कैवेंजरों को शिक्षित करने की ठानी, क्योंकि वे बिल्कुल निरक्षर थे। शक्षा मानव विकास की कुंजी है। इसी उद्देश्य से सर्वप्रथम हमने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया और बैंक से चेक की धनराशि निकालने हेतु हस्ताक्षर करना भी सिखाया। चूंकि वे निरक्षर थे, अतः तीन माह हमने उन्हें स्टाइपेंड(वजीफा) के तौर पर नकद राशि दी, लेकिन जब उन्होंने पढ़ना-लिखना सीख लिया तो हमने उन्हें चेक के माध्यम से स्टाइपेंड देना आरंभ किया, ताकि वे हस्ताक्षर कर बैंक से पैसे निकाल सकें। तीसरा, हमने उन्हें आचार, पापड़, नुडल्स इत्यादि खाद्य पदार्थ बनाने के व्यावसायिक

हमें यह तय करना होगा कि सामाजिक परिवर्तन हेतु हम किस प्रकार गांधी दर्शन को कार्यान्वित करते हैं और महात्मा गांधी की शिक्षाओं को समाज किस प्रकार स्वीकार करेगा दिय ा । इस घटना ने गांधी जी को यह कहने पर विवश कर दिया कि ‘भारतीय जनता अंग्रेजों की गोली खा सकती है, लेकिन वे अस्पृश्यों के साथ भोजन नहीं कर सके,क्योंकि वे ब्राह्मणों से डरते हैं।’ इसीलिए मैंने टू पिट पोर फ्लश कंपोस्ट पारिस्थितिक शौचालय का आविष्कार किया और यह ‘सुलभ शौचालय’ के नाम से लोकप्रिय हुआ। इस तकनीक की मदद से खुले में शौच की कुप्रथा तो समाप्त हुई ही, साथ ही अस्पृश्यों द्वारा सर पर मैला ढोने की प्रथा का भी अंत हुआ। स्कैवेंजरों के जीवन स्तर में सुधार करने और उनकी स्थिति बदलने के उद्देश्य से मैंने राजस्थान के दो शहरों-अलवर एवं टोंक को चुना और वहां के स्कैवेंजरों को समाज की मुख्यधारा में लाने तथा उनके मानवाधिकार की रक्षा के लिए पांच सूत्री कार्यक्रम आरंभ किया। सर्वप्रथम मैंने उन सभी शुष्क शौचालयों को सुलभ शौचालयों में परिवर्तित कर दिया, जहां ये

प्रशिक्षण के साथ-साथ बाजारोन्मुखी व्यवसायों, जैसे सिलाई-कढ़ाई, फैशन डिजाइनिंग, सौंदर्य प्रसाधन इत्यादि का भी प्रशिक्षण दिया। ये प्रशिक्षित वर्ग अब अपनी आजीविका अर्जित करने में सक्षम हैं,और अब इन्हें आर्थिक समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है। इसके बाद मैंने द्विज की उस अवधारणा को तोड़ा, जिसके अनुसार व्यक्ति एक जन्म में अपनी जाति नहीं बदल सकता। मैंने उनसे ब्राह्मणों एवं सवर्णों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान करवाए। आरंभ में सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों ने इसका विरोध किया, क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा इन अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति प्रदान नहीं की गई थी। अतः मैं इन ‘अस्पृश्यों’ के साथ अलवर के एक मंदिर में गया। शुरू में ब्राह्मण परिवारों ने इसका विरोध किया, किंतु काफी समझाने-बुझाने के पश्चात वे मान गए और अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति प्रदान की। आज वही ब्राह्मण परिवार इन अस्पृश्यों के साथ

खुला मंच

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चाय पीते हैं, इन्हें अपने विवाह-समारोह एवं घर के अन्य उत्सवों में आमंत्रित करते हैं। यह लोगों की मानसिकता एवं मनोभाव में परिवर्तन दर्शाता है। अब ये पूर्व अस्पृश्य महिलाएं भी ऊंची जाति की तरह पूजा पाठक तथा धार्मिक अनुष्ठान आदि करती हैं। हम उन्हें वाराणसी ले गए, जहां उन्होंने पावन गंगा नदी में डुबकी लगाई और वहां के बाबा विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव की पूजा आराधना की। भगवान के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्ति के पश्चात उन्होंने 200 ब्राह्मण परिवारों के साथ भोजन भी किया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। सामाजिक एकता भारत के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, इस उद्देश्य के साथ हम उन्हें पवित्र धार्मिक स्थलों, जैसे अजमेर शरीफ, दिल्ली के गिरजाघर तथा गुरूद्वारा भी ले गए, जहां सभी ने पूजा अर्चना की। ऐसा करने से विभिन्न आस्था एवं धर्म के प्रति उनका भावनात्मक संबंध बढ़ा और दूसरे धर्म के लोगों ने भी इन्हें अंगीकार किया। भारत के विकास के लिए सामाजिक अखंडता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस प्रकार अब ये स्कैवेंजर सवर्णों के साथ खुलकर मिलते हैं, विशेषकर उन परिवारों से, जहां कभी ये शौचालय साफ करते थे और सर पर मानव मल ढोते थे। हम उन्हें इलाहाबाद कुंभ मेले में भी ले गए, जहां उन्हांेने पवित्र संगम में स्नान किया। पिछले वर्ष उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ मेले में भी वे हमारे साथ थीं और वहां की पवित्र शिप्रा नदी में स्नान किया। सन 2008 में, हमारे साथ कुछ स्कैवेंजर महिलाओं ने संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की। वहां वे न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में प्रसिद्ध मॉडलों के साथ रैंप पर भी उतरीं। इन्होंने स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी भी देखा, जो स्वतंत्रता का प्रतीक है, इसे देखकर वे इतनी प्रसन्न हुई कि उन्होंने यह घोषित कर दिया कि अब वे ‘अछूत’ नहीं है। गांधी जी के सपनों को साकार करने के क्रम में मैंने समाज की कई समस्याओं का हल निकाला। हाल के वर्षों में सुलभ ने समाज के अन्य पीड़ित वर्गों जैसे विधवाओं के हित एवं उनके खुशहाल जीवन के लिए भी प्रयास किया है। हमने वृंदावन एवं वाराणसी की हजारों विधवाओं के अंधकारमय जीवन को सुधार कर एवं उन्हें पुनर्वासित कर उनके जीवन में आशा की किरण जगाई है। इस तरह अस्पृश्यों, स्कैवेंजरों एवं विधवाओं की मुक्ति के क्षेत्र में हमारा यह पांच दशक से चला आ रहा आंदोलन आधुनिक इतिहास में अद्वितीय है और साथ ही मानवीय संवेदनाओं तथा रचनाशीलता के माध्यम से बड़ी से बड़ी बाधाओं पर विजय प्राप्त करना तथा संघर्षरत विश्व में न्याय, शांति तथा सामंजस्य का मार्ग प्रशस्त करने की प्रेरणा भी प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में हमें यह तय करना होगा कि सामाजिक परिवर्तन हेतु हम किस प्रकार गांधी दर्शन को कार्यान्वित करते हैं और महात्मा गांधी की शिक्षाओं को समाज किस प्रकार स्वीकार करेगा। इसके लिए मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि गांधी जी के बुनियादी सिद्धांतों तथा गांधी जी के प्रचलित सिद्धांतों को पृथक कर कर देखना चाहिए, विशेषकर युवा पीढ़ी को गांधी जी के सच्चे सिद्धांतों को समझना और अपनाना चाहिए न कि प्रचलित सिद्धांतों को। यदि आप गांवों, शहरों, राष्ट्रों एवं दुनिया में परिवर्तन लाना चाहते हैं तो आपसे मेरा अनुरोध है कि आप गांधीवादी सिद्धांतों का पालन करें।


18 फोटो फीचर

23 - 29 अक्टूबर 2017

शौर्य की उड़ान

रक्षा के क्षेत्र में हमारी वायु सेना की सामरिक ताकत कितनी आगे बढ़ी है, यह वायु सेना दिवस पर आयाेजित एयर शो में देखने को मिलती है। यह वायु सेना की तकनीकी कुशलता को आंकने का भी अवसर होता है फोटो ः शिप्रा दास


23 - 29 अक्टूबर 2017

फोटो फीचर

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वायु सेना के लिए यह अवसर इसीलिए भी खास होता है, क्योंकि इस अवसर पर एयर चीफ खुद मौजूद रहते हैं और वे विमानों के करतब के साथ पारा-जंपिंग, हैंड ग्लाइडिंग और मार्च पास्ट सरीखी दूसरी गतिविधियों का भी निरीक्षण करते हैं। एयर शो का ग्लैमर और रोमांच कितना ज्यादा होता है, यह तस्वीरों में देखा जा सकता है


20 स्वास्थ्य

23 - 29 अक्टूबर 2017

स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता समय की मांग

गलत जीवनशैली और जागरूकता की कमी के चलते भारत में स्तन कैंसर रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है

एक नजर

भारत में 2012 में 1,44,937 स्तन कैंसर रोगी महिलाओं ने कराया इलाज इस साल 70,218 स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं ने दम तोड़ दिया

2025 तक भारत में यह मृत्यु दर सात लाख तक पहुंच जा सकती है

मुकाबले भारत में कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या सर्वाधिक है। ऐसे में जरूरी है कि महिलाएं स्वयं स्तन परिक्षण करें, 40 की उम्र के बाद मैमोग्राफी टेस्ट करवाएं। स्तन कैंसर की प्रारंभिक अवस्था मंू उपचार की शुरुआत से अब स्तन को हटाए बगैर उपचार कर रोगी को कैंसर मुक्त किया जा सकता है।’

आधुनिक चिकित्सा से बढ़ते सरवाइवर

वि

एसएसबी ब्यूरो

श्व स्वास्थ्य संगठन के अुनसार, भारत में हर साल पांच लाख लोग कैंसर से अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। कैंसर रोगियों की संख्या इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो 2025 तक यह मृत्यु दर सात लाख तक पहुंच जाएगी। पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री (पीबीसीआर) के अनुसार, भारत में एक साल में करीब 1,44,000 नए स्तन कैंसर के रोगी सामने आ रहे हैं। गलत जीवनशैली और जागरूकता की कमी के चलते भारत में स्तन कैंसर रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विश्वभर में अक्टूबर माह स्तन कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर स्तन कैंसर रोग विशेषज्ञों ने रोग की स्थिति, कारण, बचाव और उपचार के बारे में बताया है। अच्छा तो यही होगा कि महिलाएं कैंसर के इस खतरे में पड़ने के बजाय इससे बचाव के प्रति जागरूक हों।

स्वस्थ जीवनशैली

बढ़ती उम्र, मोटापा, रजोस्त्राव का उम्र के साथ जल्दी आना और देर तक रहना, पहला बच्चा 30 की उम्र के बाद होना, स्तनपान कम या नहीं करवाना और अनुवांशिकता स्तन कैंसर की संभावना को बढ़ाता है। इसके साथ ही पिल्स या हार्मोस रिप्लेसमेंट थैरेपी (एचआरटी) का लंबे समय तक प्रयोग भी इसके

लिए उत्तरदायी हो सकता है। स्वस्थ जीवनशैली को अपनाकर इस रोग की संभावनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। सही उम्र में वैवाहिक जीवन की शुरुआत, गर्भनिरोधक गोलियों से दूरी, स्तनपान करवाने, शारीरिक रूप से स्वस्थ रहकर और शराब से दूरी बनाकर स्तन कैंसर की संभावनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

स्वयं परीक्षण

बीएमसीएचआरसी रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभागाध्यक्ष, सीनियर कंसल्टेंट डॉ. निधि पाटनी का कहना है कि स्तन कैंसर की पहचान महिलाएं स्वयं स्तन परिक्षण (सेल्फ ब्रेस्ट एग्जामिन) के साथ भी कर सकती है। स्तन में गांठ का उभरना, स्तन के हिस्से में सूजन आना, इसके चारों ओर की त्वचा में परिवर्तन होना, स्तन में दर्द होना, इसका मोटा होना या इसमें किसी तरल पदार्थ का निकलना, यह सभी स्तन कैंसर रोग के लक्षण हैं। उन्होंने कहा, ‘हाथ की उंगलियों का पैड बनाकर

स्तन की गांठ, त्वचा का लचीलापन या आकार में परिवर्तन होने की पहचान की जा सकती है। यदि महिला, स्तन में परिवर्तनों में से कोई भी परिवर्तन देखती है तो उसे कैंसर चिकित्सक से परामर्श करने में देरी नहीं करनी चाहिए। स्तन कैंसर की पहचान के लिए मैमोग्राफी सबसे महत्वपूर्ण जांच है, जिसके जरिए स्तन का एक्स-रे किया जाता है।’

समय पर उपचार

बीएमसीएचआरसी सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभागाध्यक्ष एंव सीनियर कंसल्टेंट डॉ. संजीव पाटनी ने बताया, ‘कैंसर की मुख्य रूप से चार अवस्थाएं होती हैं। प्रथम और दूसरी अवस्था में रोग की पहचान और उपचार की शुरुआत हो जाने पर रोगी को कैंसर मुक्त करना संभव होता है, वहीं तीसरी या अंतिम अवस्था में उपचार की शुरुआत से रोगी की मृत्यु दर बढ़ जाती है। जागरूकता की कमी के कारण देश में अधिकांश रोगियों में रोग की पहचान तीसरी या अंतिम अवस्था में होती है।’ पाटनी ने कहा, ‘यही कारण है कि अन्य देशों के

आईसएमआर ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान में कैंसर के एक साल में 14.5 लाख नए मामले दर्ज हो रहे हैं। ऐसे में 2020 में इन मामलों की संख्या 17.3 लाख तक पहुंच जाएगी

भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमसीएचआरसी) जयपुर के कीमोथैरेपी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय बापना ने बताया, ‘आधुनिक चिकित्सा ने स्तन कैंसर के सफल इलाज की प्रतिशतता काफी बढ़ा दी है, जिसके चलते आज स्तन कैंसर सरवाइवर्स की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है। आज बहुआयामी चिकित्सा पद्धति (मल्टीमोडयूलिटी ट्रीटमेंट प्रोसिजर) के कारण रोगी का उपचार उसकी स्थिति को देखते हुए सर्जरी, कीमोथैरेपी, हार्मोस थैरेपी और रेडिएशन थैरेपी के साथ तय किया जाता है। उपचार की पद्धती रोगी के रोग के आधार पर तय की जाती है।’

आंकड़ो की भयावहता

कैंसर रिसर्च की इंटरनेशनल रिसर्च एजेंसी ग्लोबेकेन में सामने आया है कि इंडिया में 2012 में 1,44,937 स्तन कैंसर रोगी महिलाएं इलाज के लिए सामने आईं। वहीं इस साल 70,218 स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं ने दम तोड़ दिया। इस रिपोर्ट में सामने आया कि देश में स्तन कैंसर से पीड़ित हर दूसरे रोगी की मृत्यु हो रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसएमआर) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान में कैंसर के एक साल में 14.5 लाख नए मामले दर्ज हो रहे हैं। ऐसे में 2020 में इन मामलों की संख्या 17.3 लाख तक पहुंच जाएगी। आईसीएमआर ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।


घर में शौचालय नहीं तो नहीं मिलेगा वेतन

23 - 29 अक्टूबर 2017

उत्तर प्रदेश के गोंडा में सरकारी कर्मचारियों को साफ कहा गया है कि अगर उनके घर में शौचालय नहीं है, तो वेतन नहीं दिया जाएगा

गर आप किसी सरकारी विभाग में नौकरी कर रहे हैं और आपके घर में शौचालय नहीं बना है तो आपका वेतन रुक सकता है। इसीलिए बिना हीलाहवाली किए 15 दिनों के भीतर अपने घर में शौचालय का निर्माण करा लें और उसके उपयोग का प्रमाण पत्र अपने विभाग के आला अफसर को उपलब्ध करा दें अन्यथा आपका वेतन रोक दिया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन को बढ़ावा देने के लिए डीएम ने सभी सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को अपने खुद के संसाधन से शौचालय का निर्माण कराए जाने के निर्देश दिए हैं। डीएम ने सभी कर्मचारियों से 30 अक्तूबर तक शौचालय निर्माण का प्रमाणपत्र भी मांगा है। जिलाधिकारी जेबी सिंह ने बताया कि संज्ञान में आया है कि सरकारी विभागों में कार्यरत अधिकतर शासकीय, अर्धशासकीय, संविदा व आउटसोर्सिंग कर्मियों के घरों में शौचालय निर्मित नहीं है। इनमें से ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकतर कर्मचारियों के घरों में या तो शौचालय बने ही नहीं है या फिर उनके परिवार के सभी सदस्य इसका प्रयोग नहीं कर रहे हैं। कर्मचारियों के इस रवैये से भारत सरकार व प्रदेश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली स्वच्छ भारत मिशन जैसी सामाजिक महत्व की योजना को लागू किए जाने में कठिनाई आ रही है।

स्वच्छता

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मदरसों में बनेंगे एक लाख शौचालय

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने मदरसों में एक लाख शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है

डीएम ने सभी विभागों के अधिकारियों को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को 15 दिनों के भीतर अपने घरों में शौचालय का निर्माण कराए जाने का निर्देश दिया है। शौचालय का निर्माण कर्मचारी को अपने खुद के पैसे से कराना होगा। डीएम ने 30 अक्तूबर तक सभी के घरों में

शौचालय होने का प्रमाण पत्र भी मांगा हैं। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर कोई कर्मचारी शौचालय का निर्माण नहीं कराता है तो उसका वेतन रोका जा सकता है। उन्होंने शौचालय निर्माण की फोटो व रिपोर्ट जिला पंचायत राज अधिकारी के कार्यालय में जमा कराए जाने के निर्देश दिए हैं। (एजेंसी)

स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत देश के मदरसों में एक लाख शौचालयों के निर्माण के लिए प्रक्रिया आखिरी चरण में है और जमीनी स्तर पर काम जल्द शुरू हो जाएगा। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने इसी साल मार्च में मदरसों के विकास के लिए ‘3टी’ (टीचर, टिफिन एवं टायलेट) कार्यक्रम का फैसला किया था। मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था ‘मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन’ (एम.ए.ई.एफ.) मदरसों में शौचालयों के निर्माण का काम देख रही है। एम.ए.ई.एफ. ने वित्त वर्ष 2017-18 में मदरसों में शौचालयों के निर्माण के लिए गैर-सरकारी संगठनों से आवेदन मंगवाए थे। (एजेंसी)

यूपी में हर दिन बन रहे 20 हजार शौचालय

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उत्तर प्रदेश में पिछले एक महीने से प्रतिदिन बीस हजार शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है

ले में शौच सभी के लिए हानिकारक है। इसी को ध्यान में रखते हुए देश को अक्टूबर 2018 तक खुले में शौच से मुक्त करने के लिए सरकार तेजी से काम कर रही है। इसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश में पिछले एक महीने से रोजाना 20 हजार शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है। उत्तर प्रदेश प्रतिदिन शौचालय निर्माण के मामले में सबसे आगे है, हालांकि शुरुआत में शौचालय बनने की रफ्तार धीमी थी। वित्तीय वर्ष 2017-18 में प्रदेश में अब तक 16 लाख शौचालय बन चुके हैं और छह जिलों को पूर्णरूप से ओडीएफ घोषित किया गया है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा शौचालय बने हैं। प्रतिदिन शौचालय

बनवाने के मामले में दूसरे नम्बर पर मध्य प्रदेश और तीसरे नम्बर पर राजस्थान है। पंचायती राज विभाग ने प्रदेश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए करीब 80 हजार राज मिस्त्रियों

को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से 40-45 हजार राजमिस्त्री विभिन्न जनपदों में शौचालय बनाने में मदद कर रहे हैं। वहीं करीब 28 हजार स्वच्छग्राहियों को भी प्रशिक्षित किया गया है जो ग्राम पंचायतों में तैनात रहकर पंचायत को खुले में शौच मुक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह स्वच्छाग्रही गांवों में लोगों को खुले में शौच नहीं जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अभी तक वित्तीय वर्ष 2017-18 में छह जिलों के 12 हजार गांवों को ओडीएफ किया जा चुका है। किसी भी गांव के ओडीएफ होने के बाद जिलास्तरीय टीम सत्यता की जांच करती है। उसके बाद मंडलस्तरीय टीम जांच करती है कि वाकई में गांव ओडीएफ हुआ या नहीं।

उत्तर प्रदेश तेजी से ओडीएफ हो रहा है। अभी तक छह जिलों को ओडीएफ घोषित किया गया है। शुरुआत में दो-तीन हजार शौचालय ही बन रहे थे, लेकिन पिछले एक महीने से हर दिन प्रदेश में 20 हजार शौचालय बने रहे हैं। अभी तक इस वित्तीय वर्ष में करीब 16 लाख शौचालय अभी तक बन चुके हैं। प्रदेश अक्टूबर 2018 तक पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त होगा। उत्तराखंड और हरियाणा देश के खुले में शौच मुक्त राज्यों की सूची में शामिल हो गए हैं। इनसे पहले सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और केरल खुले में शौच मुक्त राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं। (एजेंसी)


22 गुड न्यूज

23 - 29 अक्टूबर 2017

देश का पहला अखिल भारतीय आर्युवेद संस्थान राष्ट्र को समर्पित अखिल भारतीय आर्युवेद संस्थान का निर्माण एम्स की तर्ज पर किया गया है

एक नजर

अखिल भारतीय संस्थान का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया दिल्ली के सरिता विहार में बनाया गया है यह संस्थान

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में देश के पहले अखिल भारतीय आर्युवेद संस्थान को राष्ट्र को समर्पित किया। इस मौके पर पीएम मोदी ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े छात्रों को संबोधित करते हुए योग और आर्युवेद के फायदे भी गिनाए। उन्होंने बताया कि कैसे आर्युवेद हमारे जीवन को तनाव से दूर ले जा सकता है। दिल्ली के सरिता विहार में बने देश के पहले अखिल भारतीय आर्युवेद

इस आर्युवेद संस्थान को बनाने में 157 करोड़ रुपए की लागत आई है

संस्थान को एम्स की तर्ज पर बनाया गया है। इस आर्युवेद संस्थान को बनाने में 157 करोड़ रुपए की लागत आई है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘कोई भी देश विकास के लिए कितना प्रयत्न करे, लेकिन अपने इतिहास को कभी नहीं भूलना चाहिए। अपनी विरासत छोड़ कर आगे बढ़ने वालों की पहचान खत्म हो जाती है।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा, ‘पहले

भारत काफी समृद्ध था, हमारे पास जो कुछ भी श्रेष्ठ था उसको बाहरी लोग ध्वस्त करने में जुट गए। जब हमें गुलामी से मुक्ति मिली तो उसके बाद हम अपने इतिहास को सरंक्षित नहीं कर पाए। पिछले 3 साल में हमारी सरकार अपनी पुरानी विरासत को संजोने का काम कर रही है। हम चाहते हैं कि हमारा देश चिकित्सा में भी अग्रिम पंक्ति में खड़ा नजर आए और सरकार इसी दिशा

में काम कर रही है। जैसा आर्युवेद संस्थान है वैसा ही देश के हर जिले में आर्युवेद से जुड़ा अस्पताल हो।’ अगर बात करें अखिल भारतीय आर्युवेद संस्थान के बारे में तो यह कुल 10 एकड़ के क्षेत्र में फैला है जिसे एनएबीएच से मान्यता प्राप्त है। यह आयुष मंत्रालय की बहुत ही महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत स्थापित की गई है। (एजेंसी)

जलस्तर देगा भूकंप की चेतावनी

चैपमैन विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के प्रो. रमेश सिंह और और चीन के तीन भूकंप विशेषज्ञों के शोध अध्ययन से मिली अहम जानकारी

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मालय की तलहटी में पानी के स्तर की अगर निगरानी की जाए, तो उससे क्षेत्र में भूकंप के बारे में चेतावनी या पूर्व सूचना मिल सकती है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को यह जानकारी कैलिफोर्निया के चैपमैन विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर रमेश सिंह ने भेजी है, जो अमेरिकी भूवैज्ञानिक संघ में प्राकृतिक खतरे के समूह के अध्यक्ष भी हैं। सिंह ने कहा कि 25 अप्रैल, 2015 को नेपाल के गोरखा जिले को हिलाकर रख देने वाले भूकंप के दौरान एकत्र हुए बोरहोल में जल स्तर के आंकड़ो के विश्लेषण से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में भूकंप का खतरा रहता है, उन क्षेत्रों में भूकंप की भविष्यवाणी के लिए भूमिगत जल के पानी के स्तर की निगरानी

की उपयोगिता होती है। सिंह और चीन के तीन भूकंप विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष हाल ही में ‘टेकटन फिजिक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। नेपाल में सबसे घातक गोरखा भूकंप में मुख्य रूप से करीब 5000 लोग मारे गए थे, जबकि भारतीय सीमा से सटे इलाकों में भी कुछ लोग, बांग्लादेश में दो और चीन में एक शख्स की मौत हुई थी और 9,200 लोग घायल हो गए थे। प्रो. सिंह ने बताया कि जब भी भूकंप आते हैं तो पृथ्वी की सतह पर व्यापक दरारें और विकृतियां आम तौर पर दिखाई देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भूजल स्तर में बदलाव भी होता है। चीन में आने वाले भूकंप से पहले किसी भी संकेत का पता लगाने के लिए कुएं के पानी, पानी का तापमान, और जल राडान सांद्रता समेत कई चीजों की निगरानी की जा रही है। गोरखा भूकंप के मामले

में, वैज्ञानिकों ने भूकंप के केंद्र से 2,769 किलोमीटर की दूरी पर चीन के शांक्सी प्रांत में एक कुएं के जल स्तर के ऊपरी भाग, एक बोरवेल में पानी के स्तर को मापा, जिसे जिगल कहते हैं। नेपाल भूकंप के तुरंत बाद डेटा का विश्लेषण किया गया था। इसके अलावा, विश्लेषण में वास्तविक घटना से लगभग 6.5 घंटे पहले 'जिंगल' वेल पर संभावित आने वाली लहर का खुलासा हुआ था। सिंह ने कहा कि भूजल में सह-भूकंपी परिवर्तन का अध्ययन एक महत्वपूर्ण अनुसंधान क्षेत्र के रूप में उभरा है, जो भूकंप प्रक्रियाओं की बेहतर समझ प्रदान कर सकता है। साथ ही सतह और उपसतह मानदंडों में इसी प्रकार के परिवर्तनों को प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि आने वाले भूकंप की शुरुआती चेतावनी के संकेत मिलने में जमीनी स्तर के पास पानी के स्तर के आंकड़ों को काफी महत्व दिया जा सकता है। चीन और अमेरिका नियमित रूप से 15 मिनट के अंतराल पर जल स्तर की निगरानी करते हैं। सिंह ने कहा कि भारत का पृथ्वी विज्ञान

एक नजर

अध्ययन के निष्कर्ष ‘टेकटन फिजिक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुए जब भी भूकंप आता है तो भूजल स्तर में बदलाव होता है नेपाल में गोरखा भूकंप में करीब 5000 लोग मारे गए थे

मंत्रालय हिमालय की तलहटी इलाकों में पानी के स्तर पर निगरानी के लिए सेंसर लगाने पर विचार कर सकता है, जो हिमालय क्षेत्र में आने वाले भूकंप के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकता है, जो एक बड़े भूकंप का कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के डेटा से भारतीय प्लेट की गतिशील प्रकृति को समझने में भी मदद मिल सकती है। (एजेंसी)


23 - 29 अक्टूबर 2017

पहल

बुनी जा रही बुनकरों की तकदीर

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देश के 421 हथकरघा-हस्तशिल्प क्लस्टरों में इस समय चल रहे हस्तकला सहयोग शिविरों से 1.20 लाख बुनकरों और कारीगरों को होगा फायदा

भा

एसएसबी ब्यूरो

रत हस्त निर्मित वस्त्रों और हस्तशिल्प के मामले में खासा समृद्ध है, जिसको लेकर उसे देश से ही नहीं, बल्कि विदेश से भी सराहना मिलती रही है और खरीदार भी इनकी ओर आकर्षित होते रहे हैं। भारत में आंध्र प्रदेश और ओडिशा की जटिलता से बुनी गई इकात साड़ी, गुजरात की पाटन पटोला, उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी, मध्य प्रदेश की महीन माहेश्वरी बुनाई या तमिलनाडु की काष्ठ या पत्थर से बनी मूर्तिकारी के अलावा भी काफी कुछ मौजूद है, जिन्हें दुनिया में हथकरघा और हस्तशिल्प के मामले में अलग पहचान मिली हुई है। भारत में बुनकरों और कारीगरों को वस्त्र और हथकरघा की समृद्ध विविधता के निर्माण के लिए कड़ी मशक्कत करनी होती है। कपड़ों की बुनकरी और हस्तशिल्प के माध्यम से उन्हें होने वाली कमाई उनकी मेहनत, कौशल और कच्चे माल की लागत के अनुरूप नहीं होती है। मुख्य रूप से ग्रामीण भारत पर आधारित बुनकरों और कारीगरों के लिए अपने उत्पादों को बाजार में सही जगह दिलाना भी मुश्किल होता है। इस क्रम में वे अपने उत्पादों को बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर हो जाते हैं, जो अच्छा खासा लाभ कमाते हैं और बुनकरों व कारीगरों के हाथ में उचित कीमत के बजाय मामूली पारिश्रमिक ही आ पाता है। बुनकरों और कारीगरों के सामने मौजूद तमाम चुनौतियों को दूर करने के क्रम में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने उन्हें सहयोग देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इन उपायों के तहत मंत्रालय वर्तमान में 11 दिवसीय ‘हस्तकला सहयोग शिविर’ का आयोजन कर रहा है। यह पहल पंडित दीन दयाल के जन्म शताब्दी के मौके पर आयोजित पंडित दीन दयाल उपाध्याय गरीब कल्याण वर्ष के लिए समर्पित है। इन शिविरों का आयोजन देश के 200 से ज्यादा हथकरघा क्लस्टरों और बुनकर सेवा केंद्रों के साथ ही 200 हस्तशिल्प क्लस्टरों में भी किया जा रहा है। बड़ी संख्या में बुनकरों और कारीगरों तक पहुंच बनाने के लिए इनका आयोजन 228 जिलों के 372 स्थानों पर हो रहा है। केंद्रीय वस्त्र मंत्री स्मृति ईरानी ने पिछले महीने एक ट्वीट में कहा था, ‘हस्तकला सहयोग शिविरों के माध्यम से 1.20 लाख से ज्यादा बुनकरों/कारीगरों को फायदा होगा, जो देश के 421 हथकरघाहस्तशिल्प क्लस्टरों में होंगे।’ जिन राज्यों में शिविरों का आयोजन किया जा रहा है, वे असम, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब,

एक नजर

काफी समृद्ध है भारत का हस्तशिल्प उद्योग

दुनिया में भारतीय बुनकरों की खास पहचान

हथकरघा और हस्तशिल्प है ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र

राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं। बुनकरों और कारीगरों को कर्ज जुटाने के लिए खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जो उत्पादों के लिए कच्चे माल की खरीद और उदाहरण के लिए करघों की तकनीक को अपग्रेड करने के वास्ते जरूरी है। इसे देखते हुए वस्त्र मंत्रालय ने इन शिविरों में कर्ज सुविधाओं पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया है। इस क्रम में शिविरों में बुनकरों और कारीगरों को सरकार की मुद्रा (माइक्रो यूनिट डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी) योजना के माध्यम से कर्ज सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे सूक्ष्म उपक्रमों को वित्तीय सहायता मिलती है। इसके अलावा इन शिविरों में भाग लेने वालों को हथकरघा संवर्द्धन सहायता के अंतर्गत तकनीक में सुधार और आधुनिक औजार व उपकरण खरीदने में सहायता दी जाएगी। हथकरघा योजना के अंतर्गत सरकार 90 प्रतिशत लागत का बोझ उठाकर बुनकरों को नए करघे खरीदने में सहायता करती है। एक अहम बात यह भी है कि शिविरों में बुनकरों और कारीगरों को पहचान कार्ड भी जारी किए जाएंगे। बुनकरों और कारीगरों की उत्पादों को बाजार तक

पहुंचाने में आने वाली दिक्कतों को देखते हुए कुछ शिविरों में निर्यात/शिल्प बाजार/बायर-सेलर्स मीट भी कराई जा रही हैं। इन शिविरों की एक और अहम बात यह है कि बुनकरों को यार्न (धागा या सूत) पासबुक भी जारी की जा रही है, क्योंकि बुनकरों के लिए यार्न एक अहम कच्चा माल है। इसके अलावा बुनकरों और कारीगरों के बच्चों के लिए शिक्षा की अहमियत को देखते हुए शिविरों में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) और इग्नू द्वारा चलाए जा रहे पाठ्यक्रमों में नामांकन कराने में सहयोग दिया जाएगा। बिचौलियों की भूमिका समाप्त करने के प्रयासों के तहत वस्त्र मंत्रालय बुनकरों और कारीगरों को अपने उत्पाद सीधे बेचने के लिए भारत और विदेश के कार्यक्रमों में भाग लेने में मदद कर रहा है। ऐसा राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत फंडिंग के माध्यम से किया जा रहा है। इसके लिए बीते तीन साल के दौरान वस्त्र मंत्रालय देश में 849 विपणन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए 151.90 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता उपलब्ध करा चुका है। इससे देश के 8,46,900 बुनकरों को फायदा हुआ है।

‘हस्तकला सहयोग शिविरों के माध्यम से 1.20 लाख से ज्यादा बुनकरों/ कारीगरों को फायदा होगा, जो देश के 421 हथकरघा-हस्तशिल्प क्लस्टरों में होंगे’ -स्मृति इरानी

‘हस्तकला सहयोग शिविर’ वस्त्र मंत्रालय के बुनकरों और कारीगरों की स्थिति में सुधार के प्रयासों का हिस्सा है, जिससे निश्चित तौर पर इन क्षेत्रों को भी बढ़ावा मिलेगा। उदाहरण के लिए, सरकार ने ई-धागा ऐप पेश किया है, जिससे बुनकरों को ऑर्डर देने और यार्न की शिपिंग पर नजर रखने में मदद मिलती है। इसके साथ ही बुनकरों के लिए ‘बुनकर मित्र’ हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। देश की अर्थव्यवस्था में हथकरघों और हस्तशिल्प क्षेत्र के योगदान को मानते हुए इन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है। इन दोनों क्षेत्रों से देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी मिलती है। हथकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 अगस्त, 2015 को पहले राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के तौर पर मनाने का एलान किया था। हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र देश के सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्रों में शामिल हैं और इनसे सिर्फ कृषि क्षेत्र ही आता है। वस्त्र मंत्रालय की वित्त वर्ष 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्रों ने क्रमशः 43.31 लाख और 68.86 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध राया। इन दोनों क्षेत्रों से देश को गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के निर्यात के माध्यम से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आय भी होती है। इसके साथ ही हथकरघा और हस्तशिल्प भारत की विरासत का मूल्यवान और अभिन्न अंग है, जिसे सुरक्षित रखना और प्रोत्साहन देने की जरूरत है।


24 स्टेट न्यूज

23 - 29 अक्टूबर 2017

एचआईवी को पराजित करने का जज्बा

मणिपुर के प्रदीप कुमार को जब पता चला कि वे एचआईवी संक्रमित हैं, तो वे टूटे नहीं, बल्कि साहस से काम लेते हुए अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने का प्रण कर लिया

न्होंने अपने आप को घर में कैद कर लिया। लगभग तीन साल तक दिन के उजाले को देखने में असमर्थ रहे और दुर्गम बाधाओं से लड़ते रहे। के. प्रदीप कुमार सिंह ने सामाजिक कलंक और भेदभाव पर विजय प्राप्त कर दुनिया को यह दिखा दिया है कि एक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति जीवन में क्या कुछ कर सकता है। अपनी जवानी के दिनों में वह मणिपुर के अपने हमउम्र युवाओं की तरह नशे और ड्रग्स की चपेट में थे। वर्ष 2000 में प्रदीप कुमार को पता चला कि वह इस वायरस से संक्रमित हैं। राजधानी इंफाल से तीन किलोमीटर दूर एक गांव में पैदा हुए प्रदीप कुमार राज्य में एचआईवी और एड्स से संक्रमित अकेले व्यक्ति नहीं हैं। मणिपुर राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी के मुताबिक एचआईवी और एड्स राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती है। एक समय में मणिपुर में देश के करीब आठ फीसदी एचआईवी पीड़ित थे, जबकि यहां देश की आबादी का केवल 0.2 फीसदी हिस्सा रहता है। इसे ‘धीमा जहर’ कहा जाता है और यह मरीज को अत्यंत दुर्बल बना देता है और इससे होनेवाली दर्दनाक मौत के लिए पीड़ित की ही निंदा की जा सकती है। लेकिन कुमार ने अपने भाग्य को स्वीकार करने के बदले साहस जुटाया और सामाजिक मानदंडों को चुनौती देते हुए अपनी कमजोरी को 'सकारात्मक' जीवन में बदल दिया। प्रदीप कुमार ने निर्णायक दृढ़संकल्प के साथ

भारत में एड्स का खतरा

सं

एक नजर

आईएएनएस-एफआईएफ

युक्त राष्ट्र की एड्स रिपोर्ट 2017 के आंकड़ों से पता चलता है कि 2016 के अंत तक भारत में 21 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित हैं, जो कि दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया के बाद दुनिया में तीसरी सबसे ऊंची संख्या है। देश में 2015 में एचआईवी के नए संक्रमण की संख्या 1,50,000 थी, जो 2016 में घटकर 80,000 हो चुकी है।

कुमार को अपने एचआईवी संक्रमण के बारे में वर्ष 2000 में पता चला एक समय में मणिपुर में देश के आठ फीसदी एचआईवी पीड़ित थे नाको मान्यता न मिलने से बॉडी बल्डिंग में आगे नहीं बढ़ पाए

‘मैंने उचित आहार का पालन शुरू किया, पौष्टिक भोजन लिया और हर तरह का नशा छोड़ दिया। मैं दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि एक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति अपने जीवन में क्या कर सकता है’ – प्रदीप कुमार उन्होंने बॉडी बिल्डिंग में करियर बनाया और मिस्टर मणिपुर, मिस्टर इंडिया और मिस्टर दक्षिण एशिया खिताब जीतने के अलावा मिस्टर वर्ल्ड प्रतियोगिता में कांस्य पदक हासिल किया है। दो दशकों तक एचआईवी के साथ जीने के बाद कुमार अब 46 साल के हैं और सक्रिय रूप से एचआईवी एड्स संबंधित जागरूकता अभियान चलाते हैं। हालांकि अब वह पेशेवर प्रतियोगिताओं में भाग नहीं लेते, बल्कि मणिपुर सरकार के खेल और युवा मामलों विभाग में फिजिकल ट्रेनर के रूप में काम करते हैं और उनकी योजना बॉडी बिल्डिंग अकादमी खोलने की है। बातचीत में कुमार ने बताया, ‘पूर्वोत्तर में इतनी प्रतिभा है और बॉडी बिल्डिंग का इतना क्रेज है, लेकिन सब बेकार हो जाता है। न तो राज्य सरकार और न ही खेल अकादमी इसे बढ़ावा देने में कोई

रुचि लेती है।’ जब एचआईवी संक्रमण का पता चला, तो वह याद करते हुए कहते हैं, ‘मैं शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो गया था। यह मुझ पर एक मनोवैज्ञानिक हमले से कहीं अधिक था। सबसे बुरा मेरे सबसे करीबी दोस्तों का मुझसे दूर जाना था। लोग मेरा मजाक उड़ाते थे कि मैं एचआईवी पीड़ित व्यक्ति हूं।’ न सिर्फ समाज ने, बल्कि अस्पताल के कर्मियों और डॉक्टरों ने भी उनसे दुर्व्यवहार किया। कुमार बताते हैं, ‘वे मुझे अस्पृश्य महसूस कराते थे। मणिपुर राज्य सरकारी अस्पताल में मुझे कोने में ऐसा बेड दिया गया, जिस पर कोई मैट्रेस या बेडशीट तक नहीं थी। पूरे दिन मुझे कोई चिकित्सक या सहायक चिकित्सक देखने नहीं आता था।’ यह समय प्रदीप कुमार की जिंदगी के सबसे क​िठन दिन थे। इस बारे में बातचीत करते हुए वे काफी भावुक हो जाते हैं। उनके ही शब्दों में, ‘एक

ऐसा समय भी था, जब मैं अपना जीवन खत्म करने की सोच रहा था, लेकिन आज मैं यहां हूं, यह सिर्फ और सिर्फ मेरे परिवार और उसके प्यार के कारण हूं।’ उनकी भाभी भानु देवी का उनके जीवन में बहुत योगदान है। भानु देवी ने बताया, ‘उस वक्त एचआईवी के बारे में ज्यादा लोग जागरूक नहीं थे। यह देखना वाकई दुखद था कि कुछ रिश्तेदार भी उनसे दूरी बना रहे थे। लेकिन हमारा लक्ष्य किसी भी कीमत पर प्रदीप को बचाना था। हमने उनका ध्यान ऐसी चीज की तरफ लगाने की कोशिश की, जो उन्हें खुशी दे सके या जो उनके चेहरे पर मुस्कान ला सके।’ उस दौरान प्रदीप कुमार ने बॉडी बिल्डिंग को अपना करियर बनाने का फैसला किया। लेकिन कोई सिखाने वाला नहीं था, तो उन्होंने किताबें पढ़कर इसे सीखने की शुरुआत की। कुमार कहते हैं, ‘एचआईवी की दवाएं काफी शक्तिशाली होती हैं, जिसने मुझे बहुत कमजोर कर दिया था। लेकिन धीरे-धीरे मैं अपने स्वास्थ्य की देखभाल करने लगा। मैंने उचित आहार का पालन शुरू किया, पौष्टिक भोजन लिया और हर तरह का नशा छोड़ दिया। मैं दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि एक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति अपने जीवन में क्या कर सकता है।’ अपने शरीर पर कुमार अब भी ध्यान देते हैं और कइयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। हालांकि उन्होंने इतनी सफलता प्राप्त की है, लेकिन उन्हें मलाल है कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) से कोई मान्यता नहीं मिली। कुमार कहते हैं, ‘नाको ने मुझे कभी भी मान्यता नहीं दी। मुझे उनसे कोई मदद नहीं मिली। एचआईवी का इलाज बहुत महंगा है। अगर मैं मणिपुर जैसी किसी छोटी जगह के बजाए किसी महानगर में रहता तो लोग निश्चित रूप से मुझे याद करते।’


23 - 29 अक्टूबर 2017

जेंडर

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बिना पिता 'अबला' नहीं हैं बेटियां

देश में ऐसी असंख्य लड़कियां हैं, जो बिना पिता के साए के बड़ी हुईं और अपनी जिंदगी को कामयाब बना सकीं

एक नजर

ज्यो

आईएएनएस

ति जब नौ साल की थी, तभी उसके पिता दिल का दौरा पड़ने से चल बसे। मां ने बड़ी जद्दोजहद से ज्योति और उसकी बहनों की परवरिश की। बचपन से किशोरावस्था और फिर यौवन की दहलीज पर पहुंचने तक इन बहनों का सफर पिता के बिना आसान नहीं रहा, लेकिन संघर्षो से जूझती हुई ज्योति आज अपने पैरों पर खड़ी है। एक बारगी सोचकर देखिए कि बिना पिता के साए के जिंदगी कैसे होती होगी? एक स्कूली बच्ची के लिए वह दौर कितना भावनात्मक आलोड़न-विलोड़न भरा रहा होगा, जब वह हम उम्र बच्चों को उनके माता-पिता के साथ देखती होगी? ज्योति कहती हैं, ‘मैं जब छोटी थी, तो यही सोचती थी कि काश मेरे भी पापा होते। समाज यही समझता है कि बेटियों की सही परवरिश तभी हो सकती है, जब उसके सिर पर पिता का हाथ हो। हां, मुझे अपने पिता की कमी हमेशा खलती है, लेकिन मेरी मां ने हमारी परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी।’

ज्योति की दो छोटी बहनें और हैं, जिनकी जिम्मेदारी अब ज्योति पर ही है। वह समाज की मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए कहती हैं, ‘समाज में ओछी सोच के लोगों की कमी नहीं है। लोगों को जब पता चलता है कि हम अकेली मां की तीन बेटियां हैं और घर में कोई मर्द नहीं है तो उनके चेहरे पर एक अलग भाव होता है। ऐसा भी कई बार हुआ है कि लड़के पीछा करते हैं और वे यकीनन सोच रहे होते होंगे कि ये तो अबला हैं, किससे शिकायत करेंगी। ऐसा लगता है कि हर कोई हमारा शोषण करने की ताक में बैठा है।’ ज्योति की मां कहती हैं, ‘बिना पति के सहारे के तीन बेटियों को पाल-पोसकर बड़ा करना किसी चुनौती से कम नहीं रहा। बहुत कुछ झेला है इनके लिए। अब सबसे बड़ी चिंता इनकी शादी की है।’ ज्योति 27 साल की है, इच्छा तो उसकी डॉक्टर बनने की थी, लेकिन पैसे की तंगी और परिवार की जिम्मेदारी ने उसे पैर पीछे खींचने को मजबूर कर दिया। दो छोटी बहनों को पढ़ाना और घर के खर्च में मां का हाथ बंटाना ज्योति की प्राथमिकता बन गई, जिसके आगे उन्हें अपना डॉक्टर बनने का सपना

‘जिन बच्चों का बचपन बिना पिता के गुजरा है, वह भावनात्मक रूप से कमजोर नहीं, ज्यादा सशक्त होते हैं, क्योंकि उनके अंदर जिम्मेदारी का बोध होता है। वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना चाहते हैं’ - डॉ. प्रतिमा ठाकुर, मनोविज्ञान विभाग, एम्स

छोटा लगने लगा। ज्योति ने पास के सिलाई कोचिंग सेंटर से सिलाई सीखी है और वह गांव के ही एक बुटिक में पांच हजार रुपए महीने के मेहनताने पर कपड़े सिलने का काम करती है। बुटिक की संचालिका मनीषा कहती हैं, ‘ज्योति की मां को मैं अच्छे से जानती हूं और यह भी कि उन्होंने बड़े दुख झेलकर इन लड़कियों को बड़ा किया है, मैंने यही सोचकर इसे सिलाई के काम के लिए रखा था, लेकिन इसके काम शुरू करने के बाद पता चला कि इसके हाथ में सफाई है, हुनर है और मेरे यहां जितनी भी लड़कियां काम करती हैं, उनमें ज्योति सबसे काबिल है।’ यह सिर्फ ज्योति और उनकी बहनों की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे देश में ऐसी असंख्य लड़कियां हैं, जो बिना पिता के साए के बड़ी हुईं और अपनी जिंदगी को कामयाब बना सकीं। इन्हीं में से एक हैं 12वीं में पढ़ने वाली दीक्षा सभरवाल। दिल्ली के बुद्धविहार की रहने वाली दीक्षा अपने पिता को नहीं देख पाईं। वह कहती हैं, ‘बहुत छोटी थी, जब पिता का देहांत हुआ। मां बताती है कि ढाई साल की थी। पिता के प्यार से अछूती रही हूं और अक्सर सोचती हूं कि अगर वह होते तो आज जिंदगी और बेहतर होती।’ दीक्षा की मां कांति सभरवाल खुद एक अध्यापिका हैं और उन्होंने अपनी एकलौती संतान की अच्छी परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह कहती हैं, ‘बच्चे के जीवन में मां और पिता दोनों की

पिता न होने के बावजूद जिंदगी में आगे बढ़ रही हैं बेटियां

शिक्षा और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण से खुद को बना रही हैं सशक्त परिवार की जिम्मेदारियां उठाने में भी पीछे नहीं ऐसी लड़कियां

अलग जगह होती है। दीक्षा जब छोटी थी, तो पूछती थी कि पापा कहां हैं। अब समझदार हो गई है। समय के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व में बदलाव आ रहा है और वह जिम्मेदार बन रही है।’ कांति कहती हैं, ‘मैंने अपनी बेटी की इस तरीके से परवरिश की है कि वह खुद को असुरक्षित न समझे, क्योंकि मैंने अक्सर देखा है कि इस तरह की परिस्थति में बच्चे, विशेषकर लड़कियां खुद को काफी असुरक्षित और दबी-कुचली महसूस करती हैं और मैं नहीं चाहती थी कि दीक्षा भी ऐसा महसूस करे।’ बिना पिता के बच्चे क्या भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं? इस बारे में पूछे जाने पर एम्स के मनोविज्ञान विभाग की डॉ. प्रतिमा ठाकुर कहती हैं, ‘जिन बच्चों का बचपन बिना पिता के गुजरा है, वह भावनात्मक रूप से कमजोर नहीं, ज्यादा सशक्त होते हैं, क्योंकि उनके अंदर जिम्मेदारी का बोध होता है। वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना चाहते हैं। कई मायनों में ऐसी लड़कियां एक्सट्रा बोल्ड तक हो जाती हैं, जिसका मतलब यही है कि पिता नहीं हैं तो हमें कमजोर नहीं समझना।’


26 गुड न्यूज

23 - 29 अक्टूबर 2017

फसल प्रबंधन में जुटी हरियाणा सरकार फसल के अवशेषों के प्रबंधन पर हरियाणा सरकार 12 करोड़ खर्च करेगी

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सानों द्वारा गेहूं और धान की बची फसलों को जलाने के कारण हो रहे पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का सामना कर रही हरियाणा सरकार ने राज्य में फसल के अवशेष के प्रबंधन के लिए 12 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) की राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति की बैठक की अध्यक्षता करने वाले मुख्य सचिव डी.एस. ढेसी ने गुरुवार को कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन की विभिन्न गतिविधियों के लिए 12 करोड़ रुपए मंजूर किए गए हैं। ढेसी ने कहा कि इसमें हैप्पी सीडर्स, स्ट्रॉ बाइलर्स और स्ट्रॉ रिपर्स की खरीद के लिए सब्सिडी शामिल होगी। उन्होंने कहा कि 2016 17 के दौरान, 1462 स्ट्रॉ रिपर्स और 68 हैप्पी सीडर्स की खरीद आरकेवीवाई के तहत सब्सिडी में हुई थी। 2017-18

मेरिका के 'मेट्रोपालिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट' ने घोषणा की है कि मुकेश अंबानी और नीता अंबानी के स्वामित्व वाला भारतीय परोपकारी संगठन रिलायंस फाउंडेशन ने भारतीय कला की पहुंच व्यापक करने और उन्हें मंच प्रदान करने के लिए प्रदर्शनियों को सहयोग देने का वादा किया है। इस कला संग्रहालय के अध्यक्ष व सीईओ डेनियल एच. वाइस ने कहा कि यह एक शानदार

के दौरान 2433 स्ट्रॉ रिपर्स, 231 हैप्पी सीडर्स और 38 स्ट्रॉ बैलर्स की खरीद के लिए प्रावधान किया गया है। कृषि क्षेत्र हरियाणा और पंजाब में इस खरीफ सत्र में भरपूर धान की फसल होने की उम्मीद है - इसके 2.25 करोड़ टन से अधिक होने की संभावना है - फसल के अवशेषों पर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं जो अगले फसल की बुआई के लिए अपनी जमीन तैयार करने के लिए किसानों द्वारा जलाई

जाएंगी। पंजाब, जो कि राष्ट्रीय कृषि में खाद्य अनाज का 50 फीसदी योगदान करता है, इस सत्र में 1.8 करोड़ टन धान की पैदावार की उम्मीद कर रहा है। हाल के वर्षों में केंद्रीय और राज्य सरकार ने किसानों को चेतावनी देने, उनके खिलाफ मामला दर्ज करने और जबरन फसल जलाने को लेकर जागरूकता पैदा करने जैसे कई कदम उठाने की कोशिश की है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। यहां तक कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) भी पंजाब और हरियाणा में अवशेषों को जलाने के खिलाफ उतर आया, लेकिन दोनों राज्यों के किसानों का कहना है कि अवशेषों को जलाने से बचने के लिए उनके पास कुछ विकल्प उपलब्ध हैं। (आईएएनएस)

वंचित बच्चों के लिए 'हैप्पी कॉन्सर्ट'

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‘दि आर्टिस्ट फाउंडेशन’ ने वंचित बच्चों के लिए म्यूजिक कॉन्सर्ट का आयोजन किया

चित एवं गरीब तबकों के बच्चों के लिए 'हैप्पी कॉन्सर्ट' का आयोजन यहां किया गया, जिसमें कलाकारों ने संगीत के जरिए बच्चों के बीच खुशिया बांटने का प्रयास किया। गैर लाभकारी संस्था 'दि आर्टिस्ट फाउंडेशन' की ओर से भाटी माइंस के स्कूल, नया प्रयास में आयोजित कॉन्सर्ट में टीएएफ की टीम और म्यूजिकल ड्रीम्स के युवा कलाकार श्रुति धस्माना (गायिका) और राम नेपाली (गिटारवादक) ने अपनी गायकी और संगीत से विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध किया। दि आर्टिस्ट फाउंडेशन की संस्थापक मीता नागपाल ने कहा कि त्योहार के मौकों पर बच्चों के बीच खुशियां बांटने का यह अच्छा समय है। इसीलिए हमने इन बच्चों के लिए एक हैप्पी कॉन्सर्ट आयोजित किया। इस कार्यक्रम का मकसद पूरी तरह से हर उन बच्चों को खुशियां देना है, जो इनसे वंचित हैं। हम समाज को

भी यह संदेश देना चाहेंगे कि अपनी खुशियों का कुछ हिस्सा ऐसे लोगों के साथ बांटे, जिन्हें सचमुच उसकी जरूरत होती है। गायिका श्रुति धस्माना ने कहा कि मैंने विभिन्न दर्शकों के सामने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगीत समारोहों में प्रस्तुति दी है। यह पहली बार है, जब मैंने वंचित बच्चों के सामने प्रस्तुति दी और मुझे कहना होगा कि यह मेरी एक सबसे यादगार प्रस्तुति है। यहां प्रस्तुति देने के बाद मुझे एहसास हो गया है कि पैसे से खुशियां नहीं खरीद सकते हैं और इन बच्चों से जो प्यार मैंने प्राप्त किया है, वह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। (आईएएनएस)

भारतीय कला को रिलायंस फाउंडेशन का साथ

अमेरिका के 'मेट्रोपालिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट' में भारतीय कला प्रर्दशनियों में रिलायंस फउंडेशन मदद करेगा

प्रतिबद्धता है, जिसका सीधा प्रभाव संग्रहालय और जिन प्रदर्शनियों को वह अपने साल भर आने वाले लाखों आगंतुकों के लिए पेश करता है, उन पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एक वैश्विक संस्थान के रूप में हम दुनिया के हर कोने की कला के स्वरूप को जानने और उसे प्रदर्शित करने के लिए समर्पित हैं, जो सिर्फ हमारे दोस्तों की उदारता के जरिए ही

संभव है। नीता और मुकेश अंबानी वास्तव में दूरदर्शी हितकारी हैं और इस अर्थपूर्ण उपहार के लिए हम उनके बहुत आभारी हैं। पहली प्रदर्शनी में फोटोग्राफर रघुबीर सिंह की तस्वीरों के जरिए गंगा के किनारे आधुनिकतावाद को दर्शाया जाएगा, बाकी प्रदशर्नियों में पहली सदी ईसा पूर्व की बुद्ध काल की कला से लेकर चौथी सदी ईसवी और 17वीं सदी की मुगल कला और समकालीन कला को दर्शाया जाएगा।

रिलायंस फाउंडेशन की संस्थापक व अध्यक्ष नीता अंबानी ने कहा कि भारत के पास एक समृद्ध कला की विरासत और संस्कृति है जो तीसरी-चौथी सदी ईसवी पूर्व में पाया जा सकता है। रिलायंस फाउंडेशन का मिशन दुनिया भर के विभिन्न संस्थानों में और भारत में स्थानीय भारतीय कला को उभरने का मौका देकर और मंच प्रदान कर इन मूल्यवान परंपराओं को पहचान और बढ़ावा देना है। (आईएएनएस)


23 - 29 अक्टूबर 2017

जनधन से बढ़ी बचत की आदत प्र

गुड न्यूज

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इकॉनमिक रिसर्च विंग ने दावा किया है कि जनधन खातों की वजह से ग्रामीण क्षेत्र के लोग अब ज्यादा बचत कर रहे हैं

धानमंत्री जनधन योजना के तहत अपने बैंक खाते खोलने वाले लोग अब ज्यादा बचत कर रहे हैं। यह दावा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इकॉनमिक रिसर्च विंग ने किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खाता खोलने वाले लोगों ने शराब और तंबाकू जैसी चीजों की खरीद पर भी कमी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे ग्रामीण इलाकों में मुद्रास्फीति भी धीमी हो सकती है। जिस समय प्रधानमंत्री जनधन योजना लांच की गई थी, उस समय आशंका जताई गई थी कि पैसे का ज्यादा मात्रा में सर्कुलेशन होने से मुद्रास्फीति प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में खुदरा मुद्रास्फीति के डेटा का हवाला देते हुए बताया गया है कि जिन राज्यों में ग्रामीण इलाकों में 50 प्रतिशत से ज्यादा जनधन खाते हैं, उन राज्यों में मुद्रास्फीति पर सकारात्मक असर पड़ा है। कुल मिलाकर 30 करोड़ जनधन खातों में से काफी खाते नोटबंदी के फैसले के बाद खोले गए हैं।

देश भर के सिर्फ 10 राज्यों में कुल खातों की 75 प्रतिशत (करीब 23 करोड़ खाते) संख्या है। इनमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 4.7 करोड़ खाते हैं। इसके बाद बिहार और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है।

एसबीआई की स्टडी में ग्रामीण और शहरी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर जनधन खाते खुलने के प्रभाव को राज्य वार बताया गया है। यह रिसर्च का हिस्सा है, जिसे इस साल के आखिर तक जारी किया जाना है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'यह

विश्लेषण इस बात की पुष्टि करता है कि अर्थव्यवस्था की औपचारिकता के अतिरिक्त, वित्तीय समावेशन में ठोस फायदे हैं, जिन्हें मुद्रास्फीति के आंकड़ो से समझा जा सकता है।' ग्रामीण लोगों को बचत के लिए प्रेरित करने के अलावा, जनधन खातों ने उन्हें कई बुरी आदतों से भी दूर रखा है। एसबीआई की ग्रुप चीफ इकॉनमिक अडवाजर सौम्या कांति घोष ने यह रिपोर्ट तैयार की है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जिन इलाकों में जनधन खाते बड़ी संख्या में खोले गए हैं, उनमें शराब और तंबाकू जैसी चीजों की बिक्री में कमी आई है। इसमें कहा गया है, 'इसे लोगों को पैसा खर्च करने के व्यवहार में बदलाव के तौर पर देखा जा सकता है। लोग नोटबंदी के बाद बचत की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं।' रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे इलाकों में लोगों ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी खर्च बढ़ाया है। (एजेंसी)

बिना पैसे घूमा पूरा देश पै

बगैर एक पैसा खर्च किए अंश मिश्रा ने पूरी की 250 दिनों में पूरे देश की यात्रा

सा ही सब कुछ नहीं होता। इस बात को सिद्ध करने के लिए इलाहबाद तकनीकी महाविद्यालय से एमसीए एवं एमबीए की शिक्षा प्राप्त 28 वर्षीय युवा अंश मिश्रा बिना पैसे देश के 29 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों का भ्रमण 250 दिनों में कर अपने अंतिम पड़ाव जगदलपुर पहुंचा। अंश ने स्थानीय बस्तर बाजार परिसर में पत्रकारों से अनुभव साझा किया। अंश मिश्रा ने कहा कि उन्होंने तीन फरवरी को बिना पैसे के यात्रा शुरू की और राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलने वाले वाहनों से लिफ्ट लेते हुए और चालकों और लोगों के सहयोग से बिना पैसे के सफर और भोजन किया। कई लोगों ने इस दौरान पैसों से सहयोग करना चाहा, पर उसने स्वीकार नहीं किया। साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलने वाले ट्रक चालकों की डॉक्यूमेंट्री तैयार की।

उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान 18 हजार ट्रक चालकों ने उन्हें लिफ्ट दी। साथ ही उनके साथ खाना बनाकर ट्रक के नीचे सोकर रात बिताई। किसी ने भी उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया। यात्रा के दौरान होने वाली समस्याओं के सवाल पर उन्होंने कहा कि गुजरात के सूरत में काफी परेशानी हुई। नौ घंटे तक इंतजार करना पड़ा, उसके बाद लिफ्ट मिली। 26 घंटे तक भोजन भी नहीं मिला। तबीयत भी खराब हो गई। सूरत में उन्हें कहीं भी मेहमाननवाजी नजर नहीं आई। इसी तरह केरल में भी अजनबी को लोग स्वीकार नहीं करते हैं। किसी परिचित के यहां रुके मेहमान के विषय में भी जानकारी हासिल करते हैं। यह उनकी सुरक्षा के लिए हालांकि अच्छी बात है। अंश ने कहा कि यात्रा के दौरान उन्हें चार बार चिकन पॉक्स भी हुआ। पारिवारिक भावुकता को

त्यागते हुए वह अपने परिजन और मित्रों के चार विवाहों में शामिल नहीं हो पाए। उन्होंने कहा कि बस्तर बहुत ही सुंदर जगह है। यहां कई लुभावने पर्यटन स्थल हैं, लेकिन बस्तर के साथ जुड़ी माओवाद की समस्या के चलते देश के लोग बस्तर आना नहीं चाहते। अंश ने कहा कि मुझे भी परिवार वालों ने बस्तर नहीं जाने की सलाह दी थी, मगर बस्तर आकर किसी तरह की परेशानी या

डर का अनुभव नहीं हो रहा है। जो सुना था, उस पर यकीन भी नहीं हो रहा है। बस्तर में पर्यटन उद्योग की अपार संभावनाएं हैं। अंश ने कहा कि उनकी देश-यात्रा के अनुभव को वह न तो बेच सकते हैं और न ही कोई खरीद सकता है। वह अब जगदलपुर से इलाहाबाद भी बगैर पैसे के ही यात्रा पर निकलेंगे। (आईएएनएस)


28 गुड न्यूज

23 - 29 अक्टूबर 2017

कविताएं हमारे आसपास तैरती हैं : गुलजार

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कवि के दिमाग को कविता को रचनात्मक विचार के तौर पर उभार देने के लिए वास्तविकता से भली-भांति परिचित होना चाहिए

हे चांद का उदाहरण देते हुए अपना विचार जाहिर करना हो या कंक्रीट के जंगल में एक खिड़की को लेकर कहानियां गढ़नी हो, मशहूर गीतकार व कवि गुलजार उन सबको एक काव्यात्मक स्वरूप में ले आते हैं। उनका कहना है कि कवि के दिमाग को कविता को रचनात्मक विचार के तौर पर उभार देने के लिए वास्तविकता से भली-भांति परिचित होना चाहिए। पाकिस्तान के झेलम में जन्मे गुलजार का 1947 में देश विभाजन के बाद मुंबई के कंक्रीट के जंगल से परिचय हुआ। शहर के जीवन के अपने अनुभव को उन्होंने फिल्म 'घरौंदा' (1977) के गीत 'दो दीवाने शहर में' उतारा। उन्होंने लिखा, 'इन भूलभुलैया गलियों में, अपना भी घर होगा, अंबर पे खुलेगी खिड़की या, खिड़की पे खुला अंबर होगा।' उन्होंने बताया कि इस तरह की कल्पनाएं मुंबई शहर में मौजूदा दौर में भी काफी प्रासंगिक हैं, हैं न? दरअसल, आपको कविता लिखने के लिए कल्पना की तलाश करने को लेकर कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। कल्पनाएं हमारे आसपास तैर रही हैं,

बस इन पर नजर डालने की जरूरत है। जहां तक गुलजार के हालिया काम की बात है, तो उन्होंने अल्बम 'दिल पीर है' के लिए आठ गीत लिखे हैं, जिसे मशहूर गायक व संगीतकार भूपिंदर सिंह ने अपनी धुनों से सजाया है। उनके मुताबिक,

चेन्नई विज्ञान मेले में नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

सिंह के साथ लंबे समय से उनके जुड़ाव की परिणति एक अच्छी साझेदारी के रूप में हुई। दोनों ने साथ मिलकर 'दो दीवाने शहर में', 'बीते ना बिताए रैना' जैसे लोकप्रिय गीत दिए हैं। गुलजार ने बताया कि भूपिंदर के साथ उन्होंने न सिर्फ फिल्मी

गीतों पर काम किया है, बल्कि एल्बम के लिए भी काम किया है। गीतकार ने कहा कि अक्सर वे सबसे पहले वह गाना लिखते हैं और फिर भूपिंदर उसे धुनों से सजाते हैं, लेकिन इस एल्बम के शीर्षक गीत की धुनों को उन्होंने खुद रचा और फिर गायक ने उन्हें धुन में सुनाया और इस तरह गीत के बोल पांच मिनट में तैयार हो गए। उन्होंने आगे कहा, 'कभी-कभी ऐसा तुक्का काम कर जाता है।' 'दिल पीर है' भूपिंदर और मिताली के संगीत लेबल भूमिताल म्यूजिक का पहला एल्बम है। गुलजार अपनी आकर्षक आवाज में कविता सुनाने के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने यहां तक कि अपने दो ऑडियोबुक 'रंगीला गीदड़' और 'परवाज' भी प्रकाशित किए हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कर से सम्मानित गुलजार ने अपनी कविता का पाठ खुद करने के अनुभव को साझा करते हुए बताया, 'मैं अपनी सभी कविताओं की मां हूं। वे मेरी कल्पनाओं से जन्मी हैं।' उन्होंने कहा कि कविताओं को सुनाते समय उससे जुड़ी भावना स्वभाविक रूप से आती है, यह सभी रचनात्मक लोगों के साथ होता है। (आईएएनएस)

चेन्नई स्थित अन्ना विश्वविद्यालय में 1049 छात्रों ने रिकॉर्ड तोड़ने वाले सत्र में भाग लिया

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न्नई स्थित अन्ना विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) के दूसरे दिन सबसे बड़े जीवविज्ञान पाठ के लिए एक नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बना। 1049 छात्रों ने रिकॉर्ड तोड़ने वाले इस सत्र में भाग लिया। सबसे बड़े जीवविज्ञान पाठ (बायलॉजी लेसन) का शुभारंभ करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और

पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजन देश में विज्ञान को प्रोत्साहित करना और इस क्षेत्र में तरक्की करना है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने इस विजन को ध्यान में रखते हुए कई प्रमुख कार्यक्रम शुरू किए हैं। उन्होंने इस अवसर पर सी वी रमन को भी स्मरण किया और बताया कि कैसे उन्हें

नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए प्रयास वर्ष 2015 से ही भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसके परिणामस्वरूप जन भागीदारी के जरिए विज्ञान को काफी प्रोत्साहन मिलता है और इसका भरपूर प्रचार-प्रसार भी होता है। आईआईएसएफ चेन्नई 2017 में बनाए गए विश्व रिकॉर्ड में कक्षा

9 और कक्षा 10 के छात्रों ने भाग लिया। इस आयोजन में 20 स्थानीय स्कूलों के छात्रों ने भाग लिया। शंकर सीनियर सेकेंडरी स्कूल की लक्ष्मी प्रभु द्वारा जीवविज्ञान का यह पाठ दिया गया। पपीते के फल से डीएनए को अलग करने की प्रक्रिया पर किया गया एक लाइव प्रयोग या प्रदर्शन भी इस आयोजन का हिस्सा था। (आईएएनएस)


23 - 29 अक्टूबर 2017

2018 तक 53 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स

गुड न्यूज

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2018 तक सबसे ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स चीन में होंगे। इसके बाद भारत में स्मार्टफोन रखने वाले 53 करोड़ लोग होंगे

सूखा प्रभावित क्षेत्र में बह रही दूध की नदी

मदर डेयरी ने मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में किसानों से एक लाख लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहण का आंकड़ा पार कर लिया है

दु

निया में स्मार्टफोन रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है और 2018 तक सबसे ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स चीन में होंगे, जिनकी संख्या करीब 1.3 अरब होगी। इसके बाद भारत में स्मार्टफोन रखने वाले 53 करोड़ लोग होंगे। अमेरिका का नंबर तीसरा होगा जहां कुल 22.9 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स होंगे। अमेरिका की मीडिया एजेंसी जेनिथ द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक स्मार्टफोन रखनेवालों की संख्या में साल 2018 में विस्तार होगा। 2018 में 52 देशों के 66 फीसदी लोगों के पास स्मार्टफोन होगा, जबकि 2017 में यह आंकड़ा 63 फीसदी था। ब्राडकास्टिंगकेबल डॉट कॉम की रिपोर्ट में इस अध्ययन के हवाले से बताया गया, ‘स्मार्टफोन और अन्य मोबाइल डिवाइसों का प्रयोग बढ़ने का मतलब है कि ब्रांड्स और उपभोक्ताओं के बीच ज्यादा से ज्यादा संपर्क बढ़ेगा। यह उपभोक्ताओं को कहीं भी और किसी भी वक्त मीडिया सामग्री से अधिक से अधिक जुड़ने का अवसर प्रदान करेगा।’ जेनिथ ने अनुमान लगाया है कि 2017 में सभी इंटरनेट विज्ञापन का 59 फीसदी हिस्सा मोबाइल डिवाइस पर देखे जानेवाले विज्ञापन का होगा। इस अनुमान में इंटरनेट विज्ञापन के 2018 तक 59 फीसदी तथा 2019 तक 62 फीसदी

रा

बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। जेनिथ के प्रमुख (अनुमान) और निदेशक (ग्लोबल इंटेलीजेंस) जोनाथ बनार्ड के हवाले से कहा गया, ‘ज्यादातर ग्राहकों और

जेनिथ ने अनुमान लगाया है कि 2019 तक कुल इंटरनेट इस्तेमाल का 76 फीसदी हिस्सा मोबाइल पर होगा। देश में फिलहाल 30-40 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स हैं विज्ञापनदाताओं के लिए मोबाइल इंटरनेट ही अब सामान्य इंटरनेट है।’ अध्ययन में कहा गया कि 2018 तक लोगों द्वारा इंटरनेट पर बिताए गए कुल समय का 73 फीसदी समय मोबाइल डिवाइस पर बिताया जाएगा, जो कि 2017 की तुलना में 70 फीसदी अधिक है। जेनिथ ने अनुमान लगाया है कि 2019 तक कुल इंटरनेट इस्तेमाल का 76 फीसदी हिस्सा मोबाइल पर होगा। देश में फिलहाल 30-40 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स हैं। (एजेंसी)

ष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की सहयोगी कंपनी मदर डेयरी ने सूखा प्रभावित मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र के सात जिलों में दूध खरीद की व्यवस्था करने के साथ एक साल की अवधि में किसानों से एक लाख लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहण का आंकड़ा पार कर लिया है। मदर डेयरी ने एक बयान में कहा कि आज 600 से अधिक दूध उत्पादक संस्थानों से जुड़े 970 गांवों के 15,000 से ज्यादा किसान प्रतिदिन एक लाख लीटर से अधिक दूध एकत्रित कर रहे हैं। इस पहल के तहत अमरावती, वर्धा, नागपुर, चंद्रपुर, बुलढाना, नांदेड़ और ओस्मानाबाद जिले को कवर किया जा रहा है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष दिलीप रथ ने कहा, ‘विदर्भ और मराठवाड़ा राज्य के बहुत अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र हैं, जिसने यहां की कृषि को आपदाग्रस्त बना दिया है, इसलिए यहां डेयरी ही किसानों के लिए अतिरिक्त आजीविका संसाधन पैदा कर सकती है। इस

एनडीडीबी ने अपनी सहयोगी कंपनी मदर डेयरी के जरिए दूध खरीद के बुनियादी ढांचे की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र के किसानों को बेहतर पारिश्रमिक प्रदान करना है

एक नजर

दूध खरीद कर किसानों की मदद कर रही है मदर डेयरी 970 गांवों के 15,000 किसान प्रतिदिन दूध एकत्रित कर रहे हैं

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में डेयरी ही किसानों की अतिरिक्त आजीविका का साधन

संदर्भ में, एनडीडीबी ने अपनी सहयोगी कंपनी मदर डेयरी के जरिए दूध खरीद के बुनियादी ढांचे की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र के किसानों को बेहतर पारिश्रमिक प्रदान कर ग्रामीण समृद्धि लाना है।’ उन्होंने कहा, ‘दूध की खरीद प्रतिदिन एक लाख लीटर तक पहुंचने के साथ ही, इस पहल से किसानों ने अब तक 45 करोड़ रुपए से अधिक का लाभ अर्जित किया गया है। भविष्य में हम ने क्षेत्र के 11 जिलों के 3,000 से अधिक गांवों में अपने परिचालन का विस्तार कर 60,000 से अधिक किसानों को इसके अंतर्गत लाने की योजना बनाई है।’ दिलीप ने इस पहल को सफल बनाने में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का आभार जताया और इस पहल में उनकी व्यक्तिगत भागीदारी की प्रशंसा की। (आईएएनएस)


30 लोक कथा

23 - 29 अक्टूबर 2017

चंपा और बांस

हुत दिनों पहले एक राजा रहता था। उनकी दो रानियां थीं। दोनों रानियां नि:संतान थीं। राजा सभी मन्दिरों में जा - जाकर पूजा-पाठ करते, घर में पूजा-पाठ करवाते फिर भी दोनों रानियां मां नहीं बन पाई। एक बार एक संन्यासी उस राज्य से गुजर रहे थे। राजा के दरबार में सभी लोग कहने लगे कि वे संन्यासी बहुत ही महात्मा है। क्यों न उन्हें राज दरबार में बुलाकर इस समस्या को हल करने की विनती की जाए? राजा ने संन्यासी को आदर से महल में बुलाया। राजा ने दोनों रानियों को बुलाकर कहा, "महात्मा का सत्कार बड़े आदर के साथ होना चाहिए।" बड़ी रानी उसी वक्त तैयार हो गई और महात्मा को आदर के साथ खिलाने लगी। छोटी रानी ने महात्मा के फटे कपड़ों को देख उनकी सेवा करने से इंकार कर दिया। छोटी रानी को अपने रूप और धन का बड़ा घमंड था। जाने से पहले महात्मा ने बड़ी रानी को खूब आशीर्वाद दिया और कहा, "बहुत जल्द ही इस महल में बच्चों की आवाज सुनाई देगी" - बड़ी रानी कुछ ही दिनों के भीतर वह गर्भवती हो गई। यह खबर राजा के पास पहुंचते ही वे बहुत खुश हुए। प्रजा तक उसी वक्त खबर पहुंच गई कि राजा अब पिता बनने वाले हैं। पूरे राज्य में लोग खुशियां मनाने लगे। उधर छोटी रानी को ईर्ष्या होने लगी। रात दिन

वह ईर्ष्या से जलने लगी। वो सोचने लगी कि अभी से बड़ी रानी का इतना आदर - न जाने बच्चे के पैदा होने के बाद कितना ज्यादा आदर होगा? उसने राजमहल की दाई को ढेर सारा धन देकर अपने साथ शामिल कर लिया। समय पर रानी ने दो बच्चों को जन्म दिया - एक बेटी, एक बेटा। दाई ने तुरन्त बच्चों को एक टोकरी में रखकर छोटी रानी के पास ले गई। और उसके बाद बड़ी रानी के पास दो पत्थर रख दिए। बड़ी रानी ने जब पत्थरों को देखा उसे बहुत हैरानी हुई। ये कैसे हो सकता है। उधर राजा खुशी से झूमते हुए बड़ी रानी के पास पहुंचे और जब उन्होंने देखा बड़ी रानी दो पत्थरों को को देख दाई से पूछने लगे क्या बात है। दाई ने कहा - बच्चे नहीं, पत्थर निकले - राजा को बहुत गुस्सा आया। बड़ी रानी को उसी वक्त बंदी गृह में कैद कर दिया, पूरे राजमहल में ये बात फैल गई कि बड़ी रानी ने ईट पत्थर को जन्म दिया है। उधर छोटी रानी अपने दो चौकिदारों को बुलाकर वह टोकरी दी और कहा कि इसमें दो बच्चे हैं, दोनों को ले जाओ और मार डालो" - दोनों चौकीदार टोकरी लेकर जंगल में गए। टोकरी खोल उन्होंने जब बच्चों को देखा, तब दोनों ने निश्चय किया कि बच्चों को वहीं छोड़ देगें। भगवान बच्चों की रक्षा करेंगे। यह सोचकर वे वहीं टोकरी रखकर महल वापस आ गए। कुछ समय बाद राजा ने बड़ी रानी को फिर से

महल में रहने दिया। बड़ी रानी सुबह से शाम तक पूजा करती रहती। पूजा करने के लिए फूल लाने सिपाही को भेजती। एक दिन आसपास कोई फूल नहीं मिले। सिपाही जंगल से फूल लाने गया। जंगल में सिपाही ने देखा बड़े सुंदर चंपा के फूल लगे हुए थे। चंपा और बांस के झाड़ पास-पास उगे हुए थे। सिपाही फूल तोड़ने के लिए जैसे ही नजदीक आया, चंपा के झाड़ ने कहा - ए भैया बांस बांस झाड़ ने कहा- काय बहिनी चंपा? चंपा ने कहा - राजा के सिपाही फूलवा तोड़े बर आए दे बांस ने कहा - लग जा बहिनी आकाश - जैसे ही बांस ने कहा, वैसे ही चंपा का झाड़ उपर की ओर बढ़ने लगा, बढ़ते बढ़ते वह इतना बढ़ गया की सैनिक फूल तक नहीं पहुंच पाए। सैनिक आश्चर्यचकित होकर देखते रहे। सैनिक दौड़ते हुए सेनापति के पास पहुंचे और उन्हें सारी बात बताई। सेनापति ने विश्वास ही नहीं किया - ये सब क्या कह रहे हो? सैनिकों ने कहा - आप एक बार हमारे साथ जंगल चलिए और बार खुद देख लीजिए सेनापति चल पड़े सैनिको के संग - जैसे ही सेनापति चंपा और बांस के पास पहुंचे, चंपा ने कहा - ए भैया बांस - बांस ने कहा - काय बहिनी चंपा? चंपा ने कहा - राजा के सेनापति फूल तोड़े बर आए हे- बांस ने कहा- लग जा बहिनी आकाश- चंपा का झाड़ बढ़ते बढ़ते और भी ऊंचे तक पहुंच गया।

सेनापति बहुत ही डर गए। दौड़ते दौड़ते मंत्री के पास आए- अब मंत्री चल पड़े देखने के लिए। चंपा को ऊपर से दूर तक दिखाई दे रहा था, उसने दूर से ही देख लिया कि मंत्री जी आ रहे हैं। ए भैया बांस - बांस ने कहा - काय बहिनी चंपा, चंपा ने कहा - राजा के मंत्री फूल तोड़े बर आए हे - लग जा बहिनी आकाश- मंत्री जी जैसे ही पेड़ तक पहुंचे, पेड़ और ऊपर और भी ऊपर तक उठ गया। मंत्री जी सीधे राजा के दरबार में पहुंचे। राजा ने कहा - इतना घबराए क्यों हो? मंत्री ने कहा - आप इसी वक्त मेरे साथ चलिए राजा जी सारी बात सुनकर राजा ने कहा - मेरी छोटी रानी भी मेरे साथ चलेगी। ये तो उन्हें भी देखना चाहिए। छोटी रानी को खबर देने वही दो सिपाही पहुंचे, जिन्होंने उन बच्चों को वहां फेंका था। छोटी रानी भी डर गई थी। वे जल्दी से तैयार होकर राजा के साथ चल पड़ीं। उधर बड़ी रानी फूल के लिए व्याकुल हो रही थीं और सैनिकों को बुलावा भेजा कि वे अब तक फूल क्यों नहीं लाए। बड़ी रानी, छोटी रानी के महल के पास से गुजर रही थी, उन्हे छोटी रानी और दो सिपाहियों की बात सुनाई दी। राजा और छोटी रानी जब जाने लगे, उनकी सवारी के पीछे-पीछे बड़ी रानी पैदल ही चलने लगी - बहुत व्याकुल होकर वह चली जा रही थी। चंपा के झाड़ को ऊपर से सब कुछ दिखाई दे रहा था - जैसे ही वे सब पास पहुंचे ए भैया बांस - बांस ने कहा - काय बहिनी चंपा, चंपा ने कहा - छोटी रानी संग राजा फूल तोड़े बर आए हे - लग जा बहिनी आकाश- चंपा का झाड़ और भी ऊंचा हो गया। राजा दोनों पेड़ों के पास पहुंचकर पूछने लगे क्या बात है - तुम दोनों भाई बहिन हो - कैसे चंपा और बांस बन गए?" उसी वक्त बड़ी रानी वहां तक पहुंची। चंपा ने जोर से कहा - "ए भैया बांस" बांस ने कहा - काय बहिनी चंपा, चंपा ने कहा हमर महतारी, दुखियारी बड़े रानी ह फुलवा तोड़े बर आवथे- परो बहिनी पांव - चंपा जमीन में झुक गई और बड़ी रानी के पैरों के पास झूमने लगी। साथ-साथ बांस का झाड़ भी झुककर बड़ी रानी के पैरों को छूने लगा। इसके बाद चंपा और बांस ने राजा को सारी बात बताई। राजा ने उसी वक्त छोटी रानी को कैद करने को कहा और बड़ी रानी से माफी मांगने लगे। बड़ी रानी बड़े दुख से चंपा और बांस को देख रही थीं। ये दोनों मनुष्य कैसे बनेंगे? बड़ी रानी दोनों के करीब पहुंचकर दोनों से लिपटकर रोने लगीं। जैसे ही उनके आंसुओं ने चंपा और बांस को छुआ, चंपा और बांस मनुष्य बन गए। बेटा, बेटी को बड़ी रानी ने गले से लगा लिया और जाकर रथ में बैठ गई। राजा रानी दोनों बच्चों के साथ राजमहल की ओर चल पड़े, साथ में बाजा, गाजा बजने लगे। पूरे देश में खुशियां फैल गई।


32 नमन

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

23 - 29 अक्टूबर 2017

देश के लाल को काव्यांजलि

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन पर आधारित प्रसिद्ध कवि मदनलाल वर्मा 'क्रांत' का प्रबंध काव्य ‘ललिता के 'आंसू’ पहली बार 1978 में किंवा प्रकाशन, मुरादाबाद से छपा था। बाद में इसे 2005 में अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली ने छापा। शास्त्री जी को समर्पित इस काव्यांजलि में जहां देश के इस महान लाल के जीवन के कई पक्ष सामने आए हैं, वहीं यह भी दिखा है कि देश अपने इस अमर सपूत का स्मरण किस तरह हृदय की अतल गहराइयों से करता है। शास्त्री जी को समर्पित मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' की इस प्रसिद्ध काव्यांजलि का अंशतुमने केवल पाया न अकेले ललिता का ही ललित प्यार, तुमको जीवन पर्यंत मिला, मां रामदुलारी का दुलार। तुमने शासन का रथ हांका पर मंजिल तक पहुंचा न सके, तुम हाय! अधर में डूब गए, जीवित स्वदेश फिर आ न सके। तुम मरे नहीं हो गए अमर, इतना है दृढ विश्वास मगर रह गया अधूरा ‘जय किसान’, इसकी अब लेगा कौन खबर? हे मर्यादा के शुचि प्रतीक! ओ मानवता के पुण्य धाम! हे अद्वितीय इतिहास पुरुष! शास्त्री! तुमको शत-शत प्रणाम!! तुमने स्वदेश का कल देखा, अपने जीवन का आज नहीं, तुमने मानव-मन की पुकार को किया नजर अंदाज नहीं। तुमने तारों की प्रभा लखी, सूना आकाश नहीं देखा, तुमने पतझड़ की झाड़ सही, कोरा मधुमास नहीं देखा। तुमने प्रतिभा की पूजा की, प्रतिमा को किया न नमस्कार, तुम सिद्धांतों के लिए लड़े, धर्मों का किया न तिरस्कार। तुमने जलते अंगारों पर, नंगे पैरों चलना सीखा, तुमने अभाव के आंगन में भी, भली-भांति पलना सीखा। तुमने निर्धनता को सच्चा वरदान कहा, अभिशाप नहीं, तुमने बौद्धिक विराटता का, माना कोई परिमाप नहीं। तुमने आदर्शवाद माना, माना कोई अपवाद नहीं, तुमने झोंपड़ियां भी देखीं, देखे केवल प्रासाद नहीं। तुम वैज्ञानिक बन आए थे, खोजने सत्य विश्वास शांति, तुमने आवरण नहीं देखा, खोजी अंतस की छुपी कांति।

तुम थे गुलाब के फूल मगर दोपहरी में ही सूख गए, तुमने था लक्ष्य सही साधा पर अंतिम क्षण में चूक गए जो युद्ध-क्षेत्र में नहीं छूटा, पथ शांति-क्षेत्र में छूट गया, जो हृदय रहा संकल्प-निष्ठ, क्यों अनायास ही टूट गया? यह प्रश्न आज सबके उर में शंका की तरह उभरता है, पर है वेवश इतिहास मौन, कोई टिप्पणी न करता है? जो कठिन समस्या राष्ट्र अठारह वर्षों में सुलझा न सका, भारत का कोई भी दुश्मन तुमको भ्रम में उलझा न सका। वह कठिन समस्या मात्र अठारह महीने में सुलझा दी थी, चढ़ चली जवानी अरि-दल पर तुमने वह आग लगा दी थी। अत्यल्प समय के शासन में संपूर्ण राष्ट्र हुंकार उठा, उठ गई तुम्हारी जिधर दृष्टि, उस ओर लहू ललकार उठा। तुम गए आंसुओं से आंचल मां वसुंधरा का भींग गया, जन-जन की श्रद्धांजलियों से पावन इतिहास पसीज गया। शब्द संकेत : ललिता (शास्त्री जी की पत्नी का नाम) रामदुलारी (शास्त्री जी की मां का नाम)

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 45

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 45)  
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