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अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस विशेष

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

वर्ष-1 | अंक-51 | 04 - 10 दिसंबर 2017

sulabhswachhbharat.com

10 पर्यावरण

पानीदार बना गांव

18 फोटो फीचर

30 कही अनकही

कमाल का हस्तशिल्प

दिलीप पर जुर्माना

ग्रामीणों ने 11 लाख लीटर लोक कला के नायाब बरसाती पानी बचाया नमूने दिखे शिल्प हाट में

बदल रही दिव्यांगों की दुनिया पिछले कुछ वर्षों में दिव्यांगजनों के प्रति दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है। भारत आज उन देशों की कतार में खड़ा है, जहां दिव्यांगों के लिए समन्वित आधार पर कई पहल किए जा रहे है

सिगरेट चुराने पर देविका रानी ने सौ रुपए का जुर्माना वसूला

खास बातें 2015 में विकलांगों के लिए एक्सेसिबल इंडिया अभियान शुरू प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विकलांगों को दिव्यांग कहने की अपील दिव्यांगो ने विभिन्न क्षेत्रों में गाड़े कामयाबी के झंडे अब दिव्यांग लोगों के अधिकार आधारित आर्थिक सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। भारत में 1995 के दिव्यांग व्यक्ति अधिनियम (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और संपूर्ण सहभागिता) लागू होने के साथ ही उनके अधिकार आधारित आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पहला कदम बढ़ाया गया है। भारत का दूसरा कदम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समझौता (यूएनसीआरपीडी) स्वीकार करना है। इसके अलावा भी सरकार ने दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए कई उपाय किए हैं।

सुगम्य भारत अभियान

कें

एसएसबी ब्यूरो

द्र सरकार द्वारा दिसंबर, 2015 में विकलांगों के लिए सुगम्य भारत (एक्सेसिबल इंडिया) अभियान शुरू करने से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांगों को ‘दिव्यांग’ कहने की अपील की थी, जिसके पीछे उनका तर्क था कि किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं। शुरुआत में इस अपील को लेकर कई तरह के सवाल भी उठे। पर धीरे-धीरे यह बात लोगों के समझ में आई कि विकलांगों के जीवन में बदलाव और उनके विकास के लिए अवसरों की सुलभता मुहैया कराने से पहले

हमें पहले उनके प्रति अपनी दृष्टि बदलनी होगी। खुशी की बात है कि आज की तारीख में भारत में सरकार के साथ समाज भी इस बदले दृष्टिकोण के साथ काम कर रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में ढाई करोड़ से कुछ अधिक लोग दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। वैसे कुछ अन्य अनुमानों के अनुसार वास्तविक संख्या इससे ज्यादा हमारी आबादी का 5 प्रतिशत अधिक हो सकती है। गैर सरकारी संस्था ‘स्वयं फाउंडेशन' ने देश के आठ शहरों में किए अपने सर्वे में पाया कि सार्वजानिक जगहों पर जो सुविधाएं दिव्यांगों के लिए होनी चाहिए, वे प्राय: नहीं हैं। ‘एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन' यानी ‘सुगम्य भारत

अभियान' के तहत किए गए इस सर्वे में मुंबई के 51 सार्वजानिक स्थानों की पड़ताल की गई। लगभग अस्सी फीसदी स्थानों पर रैंप नहीं पाया गया. इस सर्वे में शामिल किसी भी बिल्डिंग में विकलांगों के लिए अलग से पार्किंग की व्यवस्था नहीं थी। अधिकतर भवनों में निर्धारित मानकों के अनुसार विकलांगों के लिए शौचालय तक नहीं पाया गया। मुंबई के आलावा चंडीगढ़, दिल्ली, फरीदाबाद, देहरादून, गुरुग्राम, जयपुर और वाराणसी में भी इस तरह के सर्वे किए गए। स्वयं फाउंडेशन के अनुसार इन सभी शहरों में स्थिति लगभग एक जैसी ही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दिव्यांगजनों के प्रति दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है। सरकार

यह अभियान लगभग एक वर्ष पहले 15 दिसंबर को शुरू किया गया था। सरकार के इस प्रमुख कार्यक्रम का उद्देश्य सक्षम और बाधारहित वातावरण तैयार कर दिव्यांगजनों के लिए सुगम्यता उपलब्ध कराना है। इसे तीन उद्देश्यों- तैयार वातावरण में सुगम्यता, परिवहन प्रणाली में सुगम्यता और ज्ञान तथा आईसीटी पारिस्थितिकी तंत्र में पहुंच पर केंद्रित किया गया है। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अनुसार भवनों को पूरी तरह सुगम्य बनाने के लिए 31 शहरों के 1098 भवनों में से 1092 भवनों की जांच का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है।

सुगम्य पुस्तकालय

सरकार ने एक ऑनलाइन मंच के तौर पर सुगम्य पुस्तकालय का शुभारंभ किया है, जहां दिव्यांगजन बटन क्लिक करते ही पुस्तकालय की किताबें पा


02 आवरण कथा

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस विशेष

04 - 10 दिसंबर 2017

खेल के साथ खूबसूरती भी

स्वच्छता को समर्पित आठ वर्षीय दिव्यांग

‘मन की बात’ कार्यक्रम के 38वें संस्करण में देशवासियों से बात करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने तुषार को स्वच्छता के लिए बड़ी प्रेरणा बताया

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 नवंबर को अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आठ वर्षीय दिव्यांग (बोलने व सुनने में अक्षम) बालक तुषार द्वारा अपने गांव को खुले में शौच जाने से मुक्त कराने की पहल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, ‘ऐसे उदाहरण हम सब के लिए प्रेरणा हैं।’ ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 38वें संस्करण में देशवासियों से बात करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘स्वच्छता के लिए न कोई उम्र होती है, न कोई सीमा। बच्चा हो या बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष, स्वच्छता सभी के लिए जरूरी है और स्वच्छता के लिए हर किसी को कुछ-न-कुछ करने की भी जरूरत है। दिव्यांग भाई-बहन दृढ़-निश्चयी हैं, साहसिक और संकल्पवान हैं।’ पीएम मोदी ने तुषार के कार्य की सराहना करते हुए कहा, ‘तुषार ने अपने गांव को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा उठा लिया। इतने व्यापक स्तर का काम और इतना छोटा बालक! लेकिन जज्बा और संकल्प, उससे कई गुना बड़े थे, वृहत थे और ताकतवर थे।’ उन्होंने कहा कि आठ वर्षीय बालक बोल नहीं सकता, लेकिन उसने सीटी को अपना हथियार बनाया और सुबह पांच बजे उठ कर, अपने गाव में घर-घर जा कर लोगों को सीटी से जगा कर, हाथ के इशारे से खुले में शौच न करने के लिए शिक्षा देने लगा। हर दिन 30-40 घरों में जा कर स्वच्छता की सीख देने वाले इस बालक की बदौलत कुम्हारी गांव खुले में शौच जाने से मुक्त हो गया। सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में पढ़ने वाला तुषार खुले में शौच जाने के दुष्परिणाम समझ चुका था और मन ही मन संकल्प लेकर

हर दिन 30-40 घरों में जा कर स्वच्छता की सीख देने वाले इस बालक की बदौलत कुम्हारी गांव खुले में शौच जाने से मुक्त हो गया सकते हैं। दिव्यांग व्यक्ति अपनी पंसद के किसी भी उपकरण जैसे मोबाइल फोन, टैबलेट, कम्प्यूटर, डैजी प्लेयर यहां तक की ब्रेल डिस्पले पर ब्रेल लिपि में भी कोई प्रकाशन पड़ सकते हैं। ब्रेल प्रेस वाले संगठन के सदस्य के जरिए ब्रेल लिपि में भी प्रति के लिए अनुरोध किया जा सकता है। विश्व नेत्रहीन संघ के महासचिव और अखिल भारतीय नेत्रहीन परिसंघ के अध्यक्ष एके मित्तल का मानना है कि मूल लेखन सामग्री की उपलब्धता की स्थिति और नेत्रहीनों के लिए केन जैसे चलने में सहायक उपकरणों में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। ब्रेल लिपि में पुस्तकें तैयार करने के लिए उदार अनुदान

लोगों को जागरूक करने में जुट गया। तुषार जन्म से बोल और सुन नहीं सकता। इसके बावजूद उसने सोचा कि यह काम सीटी बजाकर कर सकता है। तुषार ने स्कूल जाने के पहले सुबह पांच बजे उठना शुरू किया। घर-घर जाकर और सीटी बजाकर इशारा कर खुले में शौच जाने से लोगों को मना किया। जब कोई कहना नहीं मानता तो वह लगातार सीटी बजाता। स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत होते ही अभियान से संबंधित बैठकों में वह शामिल होने के लिए उत्सुक रहता था। तुषार के शिक्षक रत्नेश त्रिपाठी बताते हैं कि वह इस अभियान के प्रति सामान्य बच्चों से ज्यादा जागरूक है। तुषार की इस पहल से गांव में चेतना जगी और लोगों ने भी अपना व्यवहार बदलना शुरू किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बालाघाट के कुम्हारी गांव के तुषार को उसकी सकारात्मक पहल के लिए शुभकामनाएं दी हैं। चौहान ने बालाघाट जिले के स्वच्छता मिशन के प्रशासनिक अमले और कुम्हारी ग्राम पंचायत के पदाधिकारियों को भी बधाई दी। जिला मुख्यालय से महज सात किलोमीटर दूर स्थित है कुम्हारी गांव। यहां की बस्ती में अधिकांश झोपड़ियां हैं। आय का जरिया खेती और मजदूरी है। (आईएएनएस) के संबंध में सरकार की पहल की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि अगर आधुनिकीकरण और नई ब्रेल प्रेस स्थापित करने के लिए यह योजना उचित तरीके से कार्यान्वित की जाती है तो इससे पुस्तकों का उत्पादन बढ़ेगा।

यूडीआईडी कार्ड

सरकार ने वेब आधारित असाधारण दिव्यांग पहचान (यूडीआईडी) कार्ड शुरू करने का प्रस्ताव किया है। इस पहल से दिव्यांग प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलेगी और अलगअलग कार्यों के लिए कई प्रमाण पत्र साथ रखने की

एमी कॉनरोय

एमी कॉनरोय का एक पैर खराब है। एमी एक 4.0 पॉइंट व्हीलचेयर बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं। बोन कैंसर के कारण उन्हें एक पैर गंवाना पड़ा, लेकिन एमी ने हार न मानते हुए बास्केटबॉल में अपना कैरियर चुना। इनकी चुस्ती और खेल के जज्बे के कारण एमी को इनके सहयोगी खिलाड़ियों ने टाइगर की उपाधि दी है। एमी कॉनरोय ने कई पैरालंम्पिक्स विश्व चैंपियनशिप में भाग लिया है। 2010 में एमी ने अपना प्रथम मैच समर पैरालंम्पिक्स लंदन में भाग लेकर खेला। इस मैच में वह ग्रेट ब्रिटेन की तरफ से उच्च स्कोर बनाने वाली महिला बन गईं थीं। एमी 2015 में चीन के बीजिंग में वीमेन व्हीलचेयर बास्केटबॉल में स्वर्ण पदक भी जीत चुकी हैं। इसके अलावा कई प्रतियोगिताओं में रजत एवम कांस्य पदक भी जीत चुकी हैं।

केली कैटराइट

केली कैटराइट ऑस्ट्रेलिया की धावक हैं। और अब तक कई पैरालंम्पिक्स चैंपियनशिप में भाग लेकर पदक जीत चुकी हैं। कैंसर की वजह से इनका दायां पैर हटा दिया गया था। केली में बहुत सी और प्रतिभाएं हैं, जैसे केली माउंट किलिमंजारो जैसी ऊंचे पहाड़ की चढ़ाई कर चुकी हैं। इसके अलावा केली का खूबसूरत खिलाड़ियों में भी नाम आता है।

नटालिया पार्टीका

पोलैंड की रहने वाली नटालिया टेबल टेनिस खिलाड़ी है। नटालिया 7 साल की उम्र ही टेबल टेनिस खेल रही हैं। अंतराष्ट्रीय पैरालंम्पिक्स खेलो में नटालिया स्वर्ण पदक के साथ रजत पदक भी जीत चुकी हैं। नटालिया की प्रतिभा ही है कि वो सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों एवं विकलांग श्रेणी के खिलाड़ियों दोनों के साथ खेलती हैं। परेशानी दूर होगी, क्योंकि दिव्यांग का प्रकार सहित विभिन्न विवरण ऑनलाइन उपलब्ध होगा।

छात्रवृत्ति योजना

सरकार इस बात को भली भांति समझती है कि दिव्यांगजनों के जीवन में बदलाव के लिए उनका पर्याप्त रूप से शिक्षित होना काफी जरूरी है। अपनी इसी सोच के तरहत भारत सरकार मैट्रिक के पहले (46000 स्लॉट्स), मैट्रिक के बाद (16650 स्लॉट्स) और उच्च स्तरीय शिक्षा (100 स्लॉट्स) पाने के इच्छुक दिव्यांग छात्रों के लिए भी योजना शुरू की है।

कौशल प्रशिक्षण

एनएसडीसी के सहयोग से दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ने तीन वर्षों में पांच लाख दिव्यांग व्यक्तियों को कौशल प्रशिक्षण देने का महत्वकांक्षी लक्ष्य तय करने की पहल की है। इसके तहत पहले वर्ष में एक लाख, दूसरे वर्ष में डेढ़ लाख और तीसरे वर्ष में ढ़ाई लाख दिव्यांगजनों को कुशल बनाया जाएगा। सरकार जिस कार्ययोजना के तहत यह कार्य कर रही है, उसका उद्देश्य 2022 के अंत तक 25 लाख दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण देना है। इसके अलावा सरकार की तरफ से दिव्यांगजनों


04 - 10 दिसंबर 2017

इन सितारों ने रचा इतिहास स्टीफन हॉकिंग

दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग चलने फिरने से लाचार हैं, वो कुछ बोल भी नहीं पाते लेकिन हॉकिंग ने दुनिया के निर्माण के सिद्धांत समेत कई ऐसी खोज कीं जिन्होंने विज्ञान की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।

अल्बर्ट आइंस्टीन

भौतिकी के क्षेत्र के सबसे चमकदार नाम अल्बर्ट आइंस्टीन एक समय मानसिक रूप से बेहद कमजोर माने जाते थे। इस कारण उनकी प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं हो पाई। बाद में आइंस्टीन दुनिया के महान वैज्ञानिक बने।

रुजवेल्ट

टॉम क्रूज

हॉलीवुड के टॉप हीरो टॉम क्रूज डॉयसेलेक्सिया से पीड़ित थे। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को कुछ भी सीखने में दिक्कत होती है। इसके बावजूद टॉम दुनिया के शीर्ष एक्टर में शुमार हैं।

अमेरिका के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति रुजवेल्ट एक एक्सीडेंट के कारण चलनेफिरने से लाचार हो गए। इसके बावजूद उनकी लीडरशीप और कामयाबी दुनिया के लिए मिसाल है।

सुधा चंद्रन

सुधा का एक पांव नकली है। इसके बावजूद उन्होंने अपनी नृत्य और अभिनय प्रतिभा से लाखों लोगों को मुरीद बनाया। उन्होंने अपनी जिंदगी पर बनी फिल्म ‘नाचे मयूरी’ में काफी सराहनीय अभिनय किया था।

रवीन्द्र जैन

आंखों की रौशनी न होने के बावजूद रवीन्द्र जैन संगीत की दुनिया के महान हस्ती थे। उनके गाए भजन घर-घर में सुने जाते हैं। कई यादगार फिल्मों में संगीत देने वाले रवीन्द्र जैन को रामानंद सागर के ‘रामायण’ धारावाहिक से उन्हें काफी लोकप्रियता मिली।

को सहायता और उपकरण वितरित करने के लिए शिविर आयोजित किए जाते हैं। प्रधानमंत्री ने बीते साल सितंबर में गुजरात में आयोजित ऐसे एक शिविर में 11 हजार से अधिक दिव्यांगजनों को सहायता और सहायक उपकरण वितरित किए। देश भर के दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले दिव्यांगजनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी इस प्रकार के शिविर आयोजित किए जा रहे हैं।

चुनौती और उम्मीद

दिव्यांगजनों के लिए पहले कानून के एक दशक से भी अधिक गुजर जाने और समय-समय

पर विशेष भर्ती अभियान के बावजूद सरकारी नौकरियों में तीन प्रतिशत आरक्षित सीटों में से लगभग एक प्रतिशत भर्तियां ही हो पाई हैं और यह बात सरकार ने स्वयं स्वीकार की है। 14,000 से अधिक चिन्हित पदों पर अभी भी भर्तियां होनी शेष है। लगभग 10,000 नेत्रहीनों के लिए आरक्षित सीटें भरी जानी है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की 2011 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अभी भी 73 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगजन श्रमशक्ति से बाहर हैं और मानसिक रूप से विकलांग, दिव्यांग महिलाएं और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांगजन सबसे अधिक उपेक्षित हैं।

इसी तरह, सरकार द्वारा दिव्यांग बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने के लिए कई कदम उठाने के बावजूद आधे से अधिक ऐसे बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। यदि शिक्षा के अधिकार को अक्षरक्षः कार्यान्वित किया जाता है तो स्थिति में सुधार हो सकता है। दिव्यांगजनों के लिए सरकार जिस तरह हाल के वर्षों में समन्वित और सुचिंतित कदम उठा रही है, उससे उम्मीद है कि आने वाले समय में देश में न सिर्फ दिव्यांगों की समस्याएं कम होंगी, बल्कि देश की मेधा और क्षमता में दिव्यांगजनों का विनियोग अलग से रेखांकित हो सकेगा।

आवरण कथा

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पहली व्हीलचेयर मॉडल

यूक्रेन की अलेक्जेंड्रा कुतास अन्य मॉडलों की अपेक्षा अलग हैं। वह दुनिया की सबसे पहली व्हीलचेयर मॉडल हैं

लेक्जेंड्रा कुतास अन्य मॉडलों की अपेक्षा अलग हैं। वह दुनिया की सबसे पहली व्हीलचेयर मॉडल हैं। अलेक्जेंड्रा जन्म से ही दिव्यांग हैं। अलेक्जेंड्रा यूक्रेन की सुपरमॉडल हैं। उन्होंने अपने पैर कभी जमीन पर नहीं रखें हैं, लेकिन जब वे व्हीलचेयर से रैंपवॉक करतीं हैं तो सबकी धड़कने रुक जाती हैं और निगाहें उन पर चली जाती हैं। वह कहती भी हैं, ‘जिंदगी में मैं अपने पैरों के बल खड़ी होकर उस पल का एहसास लेना चाहती हूं।’ 23 वर्षीय अलेक्जेंड्रा कुतास ने दिल्ली की एक मॉडलिंग एजेंसी के साथ एक करार साइन किया है। इसके अलावा हाल ही में उन्होंने इंडियन रनवे वीक 2017 में हिस्सा लिया। उन्होंने इंडियन रनवे वीक 2017 में डिजाइनर निखिल और रिवेंद्र के लिए शो में भाग लिया था। उस दौरान रैंप पर उतरी अलेक्जेंड्रा की अदाएं और खूबसूरती को देख सब दंग रह गए। उनकी आत्मविश्वास को देख अन्य सारी मॉडल दंग रह जाती हैं। अलेक्जेंड्रा को जन्म से ही स्पाइनल कोर्ड इंजरी है। इस कारण उनके कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त है। इनकी खूबसूरती को आप इंस्टाग्राम पर भी देख सकते हैं, यहां अलेक्जेंड्रा आए दिन अपनी तस्वीरें शेयर करती रहती हैं। उन्होंने इस मॉडलिंग की दुनिया में कदम रख कर यह साबित कर दिया कि खूबसूरती न केवल चेहरों से आती है, बल्कि खूबसूरती आपकी मेहनत, संघर्ष, जज्बात और जुनून को दर्शाती है। अलेक्जेंड्रा ने इस ग्लैमरस फील्ड में आकर न केवल मॉडल रोल बन रही हैं, बल्कि ऐसा कर उन्होंने अपने जैसे मॉडलों को एक पर दे दिया है, जो आए दिन सपने देखते रहती हैं।


04 आवरण कथा

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस विशेष

04 - 10 दिसंबर 2017

सबसे ऊंची सफलता का रिकॉर्ड

खास बातें अरुणिमा सिन्हा को कुछ बदमाशों ने चलती ट्रेन से फेंक दिया था अपने कृत्रिम पैर के दम पर माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया दुनिया के कई और पर्वत शिखरों को फतह कर चुकी हैं अरुणिमा

एक पैर खोने के बाद भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का कीर्तिमान रचने वाली अरुणिमा सिन्हा आज दुनिया भर के दिव्यांगों के लिए रोल मॉडल हैं

रुणिमा सिन्हा का जुनून केवल एक महिला के विश्व के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ाई करने कहानी नहीं है, बल्कि उनके अटूट विश्वास की दास्तां भी है, जिसके दम पर उन्होंने निराशा के हाथों मजबूर होने के बजाए बड़ी बाधाओं को पार कर अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को सबसे बड़ी ताकत बनाने की हिम्मत दिखाई। राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रहीं अरुणिमा सिन्हा को 2011 में कुछ बदमाशों ने चलती ट्रेन से फेंक दिया था। असहनीय पीड़ा में पूरी रात रेलवे ट्रैक पर गुजारने वाली अरुणिमा को इस घटना में अपना एक पैर गंवाना पड़ा और उनके दूसरे पैर में रॉड लगाई गई। ऐसे दर्दनाक हादसे के बाद जहां रिकवरी में लोग 4 से 5 साल लगा देते हैं, वहीं अरुणिमा ने एक खिलाड़ी के तौर पर अपने अंदर बसे जुनून को बरकरार रखते हुए घटना के महज दो साल के अंदर दुनिया की सबसे ऊंची जगह, माउंट एवरेस्ट फतह कर ली । दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर

चढ़ाई करने वाली पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही बनने का इतिहास उनके ही नाम लिखा जाएगा। अरुणिमा बगल के ट्रैक से गुजर रही ट्रेन से टकरा गई थी, जिसके बाद वह बुरी तरह से जमीन पर गिर गईं। इसके बाद क्या हुआ, उन्हें कुछ याद नहीं। वे केवल इतना जानती हैं कि होश आने के बाद उन्हें असहनीय दर्द का अहसास हुआ और इसका भी अहसास हुआ कि वह अपना एक पैर खो चुकी हैं और दूसरे पर गंभीर चोट लगी है। उन्होंने कहा, ‘मैं मदद के लिए चिल्ला रही थी, लेकिन आस-पास कोई नहीं था, जो मेरी मदद कर सकता। चूहे मेरे घायल पैर को कुतर रहे थे और सारी रात मैं दर्द से कराहती रही। मैंने गिना था, मेरे पास से 49 ट्रेन गुजरी थीं।’ सुबह कुछ गांव वालों ने अरुणिमा को देखा और उन्हें पास के अस्पताल में लेकर गए, जहां चिकित्सकों को उनके एक पैर को काटना पड़ा और दूसरे पैर में रॉड लगाई। अरुणिमा ने कहा, उनके पास एनीस्थीसिया नहीं था और मैंने

रु

कहा था कि मुझे बिना एनीस्थीसिया दिए ही मेरे घायल पैर को ठीक करें। मैंने पूरी रात असहनीय दर्द को झेला था और इसीलिए मैं जानती थी कि मैं ठीक होने के लिए कुछ और दर्द सह सकती हूं। इसके बाद अरुणिमा को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया जहां वह करीब चार महीने उनका इलाज चला। यहीं पर उन्होंने संकल्प लिया कि वह माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करेंगी। दुर्घटना के बाद जिस हालत में अरुणिमा थीं, उस हालत में हिल पाना भी मुश्किल होता है। लेकिन मजबूत इरादों वाली अरुणिमा की कहानी कभी धैर्य न हारने वाले जज्बे की कहानी साबित हुई। जहां एक ओर पूरी दुनिया उनके इरादों पर संदेह जता रही थी, उनके परिवार और खासकर उनके जीजा ओम प्रकाश ने उन्हें हौसला दिया। 42 साल के ओम प्रकाश ने अरुणिमा को उनके लक्ष्य की ओर प्रेरित करने के लिए अपनी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की नौकरी

से त्यागपत्र दे दिया। जिन हालात में अरुणिमा थीं, उसमें लोगों को खड़े होने के लिए सालों लग जाते हैं, वहीं अरुणिमा केवल चार माह में ही उठ कर खड़ी हो गईं। अगले दो साल उन्होंने एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल से प्रशिक्षण लिया। उन्हें स्पांसर मिले, उनकी यात्रा शुरू हुई और फिर वह दिन भी आया जब मंजिल फतह हुई। अरुणिमा ने कहा कि इस कोशिश के दौरान उनके पैरों से खून बहता रहता था और अकसर वह गिर भी जाती थीं। लोग उन्हें पागल कहते थे और उन्हें लगता था कि वह कभी अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो पाएंगी। हालांकि, वे सभी उनके इरादों की मजबूती से अनजान थे। अरुणिमा ने अपने कृत्रिम पैर के दम पर अब तक माउंट एवरेस्ट के अलावा, माउंट किलिमंजारो (अफ्रीका), माउंट कोजिअस्को (आस्ट्रेलिया), माउंट अकोंकागुआ (दक्षिण अमेरिका), कारस्टेन्ज पिरामिड (इंडोनेशिया) और माउंट एलब्रस (यूरोप) की चढ़ाई कर ली है। अरुणिमा दुनिया को सिर्फ यह बताना चाहती हैं कि अगर कोई शख्स लक्ष्य हासिल करने की ठान ले तो कोई बाधा उसे नहीं रोक सकती। अरुणिमा की इच्छा विकलांग लोगों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय खेल अकादमी की स्थापना करने की है। उन्होंने कहा, इसके लिए उन्होंने कानपुर के पास उन्नाव में जमीन खरीद ली है। भवन बनाने की जरूरत है जिस पर 55 करोड़ खर्च होंगे। उन्होंने लखनऊ में 120 दिव्यांग बच्चों को गोद लिया है और हर संभव तरीके से उनकी मदद कर रही हैं।

फोटोग्राफर जिसकी अंगुलियां नहीं हैं

रुसीदाह बदावी एक कामयाब फोटोग्राफर हैं, जबकि उनके पास न अंगुलियां हैं और न हथेलियां

सीदाह बदावी कोई सामान्य फोटोग्राफर नहीं हैं। उनके पास न अंगुलियां हैं, न हथेलियां, लेकिन वह फोटोग्राफी करती हैं। 1968 में जन्मीं बदावी को कोई विकलांगता रोक नहीं पाई। आज यह महिला इंडोनेशिया ही नहीं, पूरी दुनिया की महिलाओं के लिए एक मिसाल है। बदावी जब 12 साल की हुईं तो उनके साथ एक हादसा हुआ और इस हादसे ने उनसे उनके हाथ छीन लिए, लेकिन उनके आदर्श नहीं छीन पाया। वह आगे बढ़ती रहीं। हाई स्कूल पास करने के बाद बदावी सोलो शहर के

स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर में पढ़ने लगीं और तब फोटोग्राफी उनकी जिंदगी में आई, एक प्यार बनकर। यह प्यार आज बदावी के जीवन की पहचान तो है ही, उनकी लोकप्रियता का आधार भी है। पढ़ाई के बाद बदावी ने अपना सपना पूरा किया। वह फोटोग्राफर बन गईं। इसके लिए उनके कैमरे में कुछ बदलाव किए गए थे, ताकि वह बिना अंगलियों के उसे चला सकें। शुरुआत में सरकारी मदद भी मिली। बदावी हर तरह की फोटोग्राफी करती हैं। वह सरकारी कार्यक्रमों में जाती हैं, शादियों की एलबम

तैयार करती हैं और प्रोफाइल फोटो भी खींच सकती हैं। बदावी अब डिजिटल कैमरा इस्तेमाल करती हैं। बयान जिले के बोतोरेयो गांव में उनका छोटा सा स्टूडियो है। उनके पति बर्फ बेचते हैं और उनका भी सहयोग करते हैं। बदावी का एक बेटा है। वह उसे और घर के बाकी कामों को भी अच्छे से संभालती हैं। कोई काम छूटता नहीं है। बेटे के अलावा बदावी अपने भतीजे का भी ख्याल रखती हैं। भतीजा दया मानसिक रूप से विकलांग है और बदावी ही उसका ख्याल रखती हैं।


04 - 10 दिसंबर 2017

कहने को दिव्यांग पर क्रिकेटर महान!

टोनी ग्रेग इंग्लैंड

इंग्लैंड के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी टोनी ग्रेग मिर्गी की खतरनाक बीमारी के शिकार रहे। बचपन से मिर्गी जैसे गंभीर से पीड़ित रहने के बावजूद टोनी ग्रेग ने इंग्लैंड के लिए 58 मैचों में 40 से अधिक की औसत से 3599 रन बनाए। इस दौरान टोनी ने 8 शतक भी लगाए। वर्ष 1975 से 1977 के दौरान टोनी ग्रेग इंग्लैंड टीम के कप्तान भी रहे।

क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम बल्लेबाजों में से एक रहे लेन हटन का एक हाथ दूसरे हाथ से करीब 6 इंच छोटा था। क्रिकेट में करियर बनाने के लिए लेन हट्टन ने कड़ी मेहनत की और खुद को महानतम खिलाड़ियों में शुमार कराया। लेन ने इंग्लैंड के लिए 79 मैचो में 56 से अधिक की औसत से 6971 रन बनाए। इस दौरान लेन हटन ने 19 शतक और 33 अर्द्धशतक भी लगाए।

भागवत चंद्रशेखर भारत

लेन हटन इंग्लैंड

मंसूर अली खान पटौदी भारत

आवरण कथा

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पूर्व भारतीय कप्तान मंसूर अली खान पटौदी का वर्ष 1961 में एक एक्सीडेंट हो गया था, एक्सीडेंट में मंसूर अली खान की एक आंख की रोशनी चली गई थी। एक आंख की रोशनी चली जाने के बावजूद पटौदी ने क्रिकेट खेलना नहीं छोड़ा। उन्होंने भारत के लिए 46 टैस्ट मैचों में 35 की औसत से 2793 रन बनाए। इस दौरान पटौदी ने 6 शतक और 16 अर्द्धशतक भी लगाए।

न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज मार्टिन गुप्टिल आधुनिक युग के सबसे सफलतम बल्लेबाजों में से एक हैं। गुप्टिल की बल्लेबाजी को देखकर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि उन्हें किसी प्रकार की शारीरिक अक्षमता है। दरअसल जब गुप्टिल महज 13 वर्ष के थे, तब उनका एक पैर एक्सीडेंट में कुचल गया था, जिसके बाद सर्जरी के दौरान डॉक्टर उनके पैर की केवल 2 अंगुलियां ही बचाने में कामयाब रहे थे। पैर की केवल 2 अंगुलियां होने के बावजूद गुप्टिल विश्व क्रिकेट के सबसे आक्रामक बल्लेबाज और सर्वश्रेठ फील्डर माने गए। गुप्टिल वनडे क्रिकेट में दोहरा शतक लगाने वाले चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक हैं।

मार्टिन गुप्टिल न्यूजीलैंड

क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम स्पिनरों में शामिल भागवत चंद्रशेखर पोलियो की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। 1964 से 1979 के बीच में भारतीय क्रिकेट ने कई जीत और हार देखी, लेकिन ये दौर एक ऐसे व्यक्ति का भी गवाह है जो अपने पोलियो ग्रस्त हाथों से बॉलिंग करता था। दाहिने हाथ में पोलियो होने के बावजूद चंद्रशेखर अपनी मारक गेंदबाजी के तरीके के लिए जाने जाते थे। उनके इसी नायाब तरीके के लिए उन्हें न सिर्फ साथी खिलाड़ियों की भरपूर तारीफ मिली बल्कि चंद्रशेखर ने भारत को क्रिकेट के मैदान पर कई जीत भी दिलाई। चंद्रशेखर ने अपने टेस्ट करियर के दौरान 58 टेस्ट मैचों में 242 विकेट हासिल किए।

दृष्टिहीनता के बावजूद...

विंस्टन चर्चिल ने हेलेन केलर को अपने युग की सर्वाधिक महान स्त्री की संज्ञा दी थी

तिहास में विकलांगता के बावजूद अनुपम उपलब्धियां हासिल करने वाली महान विभूतियों की कमी नहीं, परंतु दृष्टिहीनता एवं बधिरता जैसी

दोहरी विकलांगता के बावजूद न केवल अपना जीवन सफल बनाया, बल्कि अपने जैसे लाखों लोगों के लिए भी कार्य कर सबके लिए प्रेरक मिसाल बन जाने वाले व्यक्तियों के उदाहरण के रूप में हेलन केलर का नाम प्रमुखता से आता है। ‘दृष्टिहीनों की प्रगति में मुख्य बाधा दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि दृष्टिहीनों के प्रति समाज की नकारात्मक सोच है’- यह वक्तव्य उसी महान स्त्री हेलेन केलर के हैं, जिन्होंने दृष्टिहीन एवं बधिर होने के बावजूद अध्ययन, लेखन एंव रचनाशीलता से अन्य क्षेत्रों में अद्भुत मिसाल कायम की। हेलेन के शब्दों में यूनानी कहावत को कहेंगे तो कहना होगा कि दृष्टिहीन होने से ज्यादा खतरनाक है, लक्ष्यहीन होना। दिव्यांगता के बावजूद उनकी विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर विंस्टन चर्चिल ने हेलेन को अपने युग की सर्वाधिक महान स्त्री की संज्ञा दी थी। हेलन

केलर का पूरा नाम हेलेन एडम्स केलर है। उनका जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित अलबामा प्रांत के उत्तर-पश्चिमी इलाके के छोटे से कस्बे टसकम्बिया में 27 जून 1880 को हुआ था। मात्र 19 माह की आयु में उन्हें एक ऐसी बीमारी ने जकड़ लिया, जिसका इलाज उन दिनों संभव नहीं था और जिसके परिणाम स्वरूप एक दिन उनकी मां को यह अहसास हुआ कि उनकी नन्ही बच्ची की दृष्टि एवं श्रव्य-शक्ति जा चुकी है। उनकी बीमारी इस हद तक गंभीर हो चुकी थी कि उनके माता-पिता को हेलेन का बचना असंभव लगता था। दृष्टि एवं श्रव्य-शक्ति खोने के बाद हेलेन का बचपन न केवल संघर्षपूर्ण, बल्कि कष्टमय भी हो गया था। एक अच्छे विशेषज्ञ डॉक्टर ने हेलेन को कुछ दिनों तक देखने पर पाया कि वे अपने रसोइए के इशारों को आसानी से समझ लेती थी। डॉक्टर ने हेलेन को मूक-बधिर बच्चों के

विशेषज्ञ एक स्थानीय व्यक्ति से मिलने की सलाह दी। ये विशेषज्ञ थे- अलेक्जेंडर ग्राहम-बेल, जिन्होंने टेलीफोन का आविष्कार किया था। बेल ने उन्हें पर्किन्स इंस्टीट्यूट फॉर द ब्लाइंड जाने की सलाह दी। हेलेन केलर की लिखी कुल 12 पुस्तकें एवं कई आलेख प्रकाशित हुए। उन्होंने दृष्टिहीनों के लिए समर्पित संस्था के लिए 44 वर्षों तक काम किया। विकलांगों की सहायता के लिए उन्होंने विश्व के 39 देशों की यात्रा की। उनके मित्रों एवं प्रशंसकों की सूची में मार्क ट्वेन, विंस्टन चर्चिल, चार्ली चैपलिन जैसे विश्वविख्यात नाम शामिल हैं। हेलेन केलर से एक बार पूछा गया कि दृष्टिहीन होने से भी बुरा क्या हो सकता है, तब उन्होंने कहा था, ‘लक्ष्यहीन होना दृष्टिहीन होने से भी बुरा है। यदि आपको अपने लक्ष्य का पता नहीं है तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं।’


06 आवरण कथा

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस विशेष

04 - 10 दिसंबर 2017

दिव्यांगजनों के लिए सरकार की कल्याणकारी नीतियां

भा

थावरचंद गहलोत

12 मई, 2012 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में से दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को अलग विभाग बनाया गया

सरकार ने भारतीय संकेत भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (आईएसएलआरटीसी), ओखला, दिल्ली की स्थापना की है। इसका मुख्य उद्देश्य श्रवण बाधित व्यक्तियों के लाभ के लिए शिक्षण एवं भारतीय संकेत भाषा अनुसंधान कार्य के आयोजन के लिए श्रमशक्ति का विकास करना है। 6000 शब्दों का संकेत भाषा शब्दकोश तैयार करने का कार्य चल रहा है।

रतीय संविधान दिव्यांगजनों सहित सभी नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता और न्याय के संबंध में स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। पर वास्तविकता में, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारणों की वजह से दिव्यांगजन भेदभाव और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। आम सार्वजनिक अनुभूति और पूर्वधारणा के कारण दिव्यांगजनों के कौशल और क्षमता को काफी हद तक कम आंका गया है, जिसके कारण कम उपलब्धियों का दोषपूर्ण भ्रम उत्पन्न होता है। इसके कारण उनमें हीन भावना उत्पन्न होती है और उनका विकास अवरुद्ध होता है। दिव्यांगता के अर्थ को रहस्यपूर्ण नहीं रखने और दिव्यांगता के मिथकों और गलतफहमियों का मुकाबला करने के लिए हम सब ने स्वयं को शिक्षित करने में एक लंबी समयावधि ली है। हमें प्रतिदिन इन नवीन अवधारणाओं को क्रियाशील बनाए रखने की जरूरत है ताकि वे पुराने नकारात्मक मनोभाव और अनुभूतियां प्रकट न हो सकें।

निःशक्त व्यक्ति अधिकार अधिनियम

स्वतंत्रता के बाद से लेकर निःशक्त व्यक्ति अधिकार (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के अधिनियमित होने तक दिव्यांगजनों के अधिकारों पर अधिक ध्यान केंद्रित नहीं किया गया। इसीलिए उनके कल्याण और पुनर्वास के लिए निरंतर कार्य करने के उपाय उपलब्ध कराने के लिए एक वैधानिक तंत्र की जरूरत थी। यह अधिनियम सुगम्यता, नौकरियों में आरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्वास पर केंद्रित रहा है।

2012 में बना अलग विभाग

नीतिगत मामलों और क्रिया-कलापों के सार्थक रूझानों पर ध्यान केंद्रित करने और दिव्यांगजनों के कल्याण और सशक्तिकरण के उद्देश्य से 12 मई, 2012 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में से दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को अलग विभाग बनाया गया। विभाग स्थापना के पीछे की कल्पना है- एक समस्त समावेशी समाज का निर्माण करना जिसमें दिव्यांगजनों की उन्नति और विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि वे सृजनात्मक, सुरक्षित और प्रतिष्ठित जीवन जी सकें।

7 राष्ट्रीय संस्थान स्थापित

विशिष्ठ दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को पूरा करने के के लिए भारत सरकार ने विभाग के तहत विशिष्ठ दिव्यांगताओं में 7 राष्ट्रीय संस्थान (एनआई) स्थापित किए हैं। ये मानव संसाधन विकास में संलग्न हैं और दिव्यांगजनों के लिए पुनर्वास एवं अनुसंधान तथा विकास सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। राजनंदगांव (छत्तीसगढ़), नैल्लोर (आंध्र प्रदेश), देवानगीर (कर्नाटक) और नागपुर (महाराष्ट्र) में 4 नए संयुक्त क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए गए हैं। आईजोल में 1 दिव्यांगता अध्ययन केंद्र स्थापित किया जा रहा है।

एलिम्को का आधुनिकीकरण

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम

निःशक्त व्यक्ति अधिकार (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के प्रावधानों के अनुरूप दोहरे उद्देश्यों सहित, उसके सही कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए भी केंद्र सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 को अधिनियमित किया, जो 19 अप्रैल 2017 से प्रभाव में आया है। यह अधिनियम समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने, पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और पुनर्वास के माध्यम से दिव्यांगजन के पूर्ण और प्रभावी समावेश को सुनिश्चित करने के उपाय उपलब्ध कराता है।

465.85 करोड़ रूपए का अनुदान

सहायक यंत्रों-उपकरणों की खरीद-फिटिंग के लिए दिव्यांगजनों को सहायता (एडिप) स्कीम के तहत तीन वर्ष के दौरान 5624 कैंपों के माध्यम से 7.60 लाख लाभार्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए 465.85 करोड़ रूपए की अनुदान सहायता का उपयोग किया जा चुका है। योजना के अंतर्गत देशभर में सुपात्र दिव्यांगजनों को 3730 मोटरयुक्त तिपहिया साइकिलें वितरित की गई। 248 मैगा कैंपों का आयोजन किया

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने, पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और पुनर्वास में दिव्यांगजनों की मदद करता है

गया, जिनमें एडिप योजना के अंतर्गत सहायक यंत्रों-उपकरणों के वितरण के लिए 27 राज्यों को कवर किया गया। बच्चों की श्रवण दिव्यांगता पर काबू करने के लिए कोकलियर इंप्लांट सर्जरियों के उद्देश्य से देशभर में 172 अस्पतालों को पैनलबद्ध किया गया। 839 से ज्याद कोकलियर इंप्लांट सर्जरियां सफलतापूर्वक पूरी की गई हैं और उनके पुनर्वास का कार्य चल रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में मदद

शैक्षिक सशक्तिकरण के अंतर्गत कक्षा नौ से एमफिल-पीएचडी स्तर के छात्रों सहित और विदेशों में अध्ययन हेतु सरकार कई छात्रवृत्ति योजनाएं (प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, उच्च श्रेणी छात्रवृत्ति योजना, राष्ट्रीय फैलोशिप और राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना और समुद्रपारीय छात्रवृत्ति योजना) कार्यान्वित चलाई जा रही हैं।

आईएसएलआरटीसी की स्थापना

सरकार ने भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को), कानपुर के आधुनिकीकरण के लिए आधुनिक सहायक उपकरणों के उत्पादन और निगम द्वारा देश भर में इस समय लाभान्वित किए जा रहे 1.57 लाख लाभान्वितों के विरूद्ध लगभग 6.00 लाख लाभान्वितों के लाभ के लिए कुल 286.00 करोड़ रुपए की लागत को मंजूरी दी है।

स्पाइनल इंजूरी केंद्र

नई पहलों में सरकार राज्य स्पाइनल इंजूरी केंद्रों की स्थापना की सुविधा प्रदान करने के लिए राज्य स्तर पर स्पाइनल इंजूरी के समेकित प्रबंधन हेतु ध्यान केंद्रित कर रही है। योजना के अंतर्गत राज्य राजधानी/ संघ राज्य क्षेत्रों के जिला अस्पताल से संबद्ध 12 बेड वाले समर्पित व्यापक पुनर्वास केंद्र स्थापित किए जाएंगे। सरकार दिव्यांगता खेलों के लिए तीन केंद्रों को जीरकपुर (पंजाब), विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश) और ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में स्थापित करने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है।

सबकी भागीदारी जरूरी

सरकार का मानना है कि दिव्यांगजनों के कल्याण कार्यक्रमों में राज्य सरकारों, गैर सरकारी संगठनों और सिविल सोसाइटी की भागीदारी भी होनी चाहिए, ताकि विभाग द्वारा चलाए जा रही कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा देने तथा दिव्यांगजनों को समाज में स्वतंत्र और प्रतिष्ठित ढंग से जीवन जीने के अवसर प्रदान किए जा सकें। (लेखक केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री हैं)


04 - 10 दिसंबर 2017

स्वच्छता

07

मैं स्कूल नहीं जाऊंगी...

यवतमाल में स्कूल के स्वच्छता अभियान में पूछे गए एक सवाल से आहत नौ साल की श्वेता ने जिद करके बनवाया घर में शौचालय

हां सोच वहां शौचालय ... स्वच्छता अभियान के विज्ञापन वाले इस वाक्य को यवतमाल में चौथी क्लास में पढ़ने वाली एक छोटी बच्ची ने चरितार्थ कर दिखाया है। स्कूल के स्वच्छता अभियान में पूछे गए एक सवाल ने उसे इतना आहात किया कि उसने पिता से कह दिया कि जब तक घर में शौचालय नहीं बनेगा वो स्कूल नहीं जाएगी। मजबूरन पिता को शौचालय बनवाना पड़ा। अब श्वेता न सिर्फ वापस स्कूल जाने लगी है, बल्कि जिले में स्वच्छता अभियान का चेहरा बनकर सामने आई है। 10 साल की श्वेता रंगारी यवतमाल के जिला परिषद के स्कूल में कक्षा चौथी की छात्रा है। स्कूल में स्वच्छता अभियान के तहत सभी बच्चों

से कुछ सवालों के जवाब पूछे गए थे... इनमें हाथ धोने से लेकर, उबला पानी पीने और शौचालय में जाने जैसे सवाल शामिल थे। श्वेता ने शौचालय के इस्तेमाल वाला कॉलम खाली रखा था। स्कूल के शिक्षक भूषण तम्बाखे के मुताबिक जब उन्होंने इसकी वजह पूछी तो श्वेता ने बताया कि उसके घर में शौचालय नहीं है। मास्टरजी के मुताबिक इसके बाद अचानक श्वेता ने तीन दिन की छुट्टी मांगी। श्वेता स्कूल से तो छुट्टी लेकर गई, लेकिन घर

में पिता को बताया कि जब तक अपना शौचालय नहीं होगा, वह स्कूल नहीं जाएगी। स्कूल के शिक्षकों ने भी उसे समझाने की कोशिश की लेकिन उसने एक न सुनी। मजबूरन पिता को शौचालय बनवाना ही पड़ा।

चार हजार शहरों में शुरू होगा सफाई सर्वेक्षण देश के सभी शहरों में स्वच्छता सर्वे का काम जनवरी से होगा शुरू

चार हजार शहरों में जनवरीदेशफरवरीभर केमें सफाई सर्वेक्षण किया जाएगा।

इसके बाद ही सबसे साफ-सुथरे टॉप 10 शहरों के नाम की घोषणा की जाएगी। बाद के शहरों को भी क्रम दिया जाएगा। महाराष्ट्र के कई शहर खुद को टॉप 10 में पहुंचने की होड़ में शामिल है। इनमें मुंबई, नवी मुम्बई, नागपुर, ठाणे, नागपुर से लेकर औरंगाबाद और पनवेल के नाम सबसे ऊपर हैं। इन शहरों को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए भी अभियान चलाया जा

साल देश गांधी जी की डेढ़ सौवीं जन्मदिवस मनाएगा। सरकार गांधी जी के स्वच्छता के सपने को पूरा करने के लिए संकल्पबद्ध है। स्वच्छता मुहिम को कुछ टीका टिप्पणियों के बावजूद शुरू से ही अच्छा रेस्पांस मिला और आम नागरिकों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी निभाई। छोटे-छोटे शहरों ने भी देश को उम्मीद दिखाई कि वह खुद को गंदगी से मुक्त करेगा। पिछले दिनों महाराष्ट्र में राज्य की टीमें इसकी जांच के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची कि लक्ष्य

जाएगा, इनमें 74 बड़े शहर भी शामिल हैं। महाराष्ट्र के छोटे-बड़े शहरों की संख्या चार सौ से भी ज्यादा है। तब सरकार ने अनुदान देकर शौचालयों के निर्माण का अभियान चलाया। खुले में शौचालय जाने वालों के बीच मानसिक जागरूकता पर बल दिया। शहर साफ हैं या नहीं, कहां कहां गंदगी है, सार्वजनिक स्थानों, गलीमोहल्लों की क्या स्थिति है, इसकी सूचना के लिए केंद्र ने एक सफाई एप तैयार कराया है। (मुंबई ब्यूरो)

हाइटेक शौचालय

उत्तराखंड के दुग बाजार में हाइटेक शौचालय का निर्माण किया गया है

रहा है। केंद्र सरकार ने पूरे देश को साफ रखने और खुले में शौच से मुक्त करने का जो अभियान वर्ष 2016 से चलाया हुआ है, वह 2019 में गांधी जयंती पर पूर्णता की स्थिति में होगा। इस

बहुत करीब है। इसके बाद केंद्रीय टीमें जनवरी-फरवरी में सर्वेक्षण को अंजाम देंगी। उल्लेखनीय है कि यह सर्वे देश के चार हजार इकतालीस शहरों में किया

गर के दुग बाजार वार्ड में स्थित राधाकृष्ण मंदिर के पास हाइटेक शौचालय का निर्माण कार्य पूरा हो गया है। नगर पालिका अध्यक्ष गीता रावल और अधिशासी अधिकारी राजदेव जायसी ने इसका उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि इस शौचालय के बनने से व्यापारियों, बाहर से आने वाले लोगों के साथ ही पर्यटकों को सुविधा मिल सकेगी। शौचालय के निर्माण से खुले में शौच की समस्या भी नहीं रहेगी। अध्यक्ष ने बताया कि दुग बाजार वार्ड में इस हाइटेक शौचालय का निर्माण अवस्थापना मद से 5.56 लाख की लागत से किया गया है।

यवतमाल के छोटे से गांव इंद्रठांण में रहने वाले गरीब पिता के लिए तकरीबन 10 हजार रुपए खर्च कर शौचालय बनवाना आसान नहीं था, लेकिन बेटी की पढ़ाई न छूटे इसीलिए उन्होंने कर्ज लेकर आदर्श पिता का फर्ज निभाया। (एजेंसी)

शौचालय के लिए बेची बाइक

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान का एक मुस्लिम मुनव्वर पर ऐसा असर हुआ कि उसने शौचालय बनवाने के लिए सरकारी सहायता का इंतजार नहीं किया। उसने अपने घर में शौचालय बनवाने के लिए सरकारी मदद का इंतजार किए बिना बाइक बेचकर शौचालय बनवा लिया। जब डीएम जेबी सिंह को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने बीडीओ को योजना के तहत धनराशि देने का निर्देश दिया है। इटियाथोक ब्लाक अंतर्गत तेलियानी कानूनगो के जगदीशपुर संपत मजरे को ओडीएफ के लिए चयनित किया गया है। यहां के निवासी मुनव्वर का परिवार बाहर खुले में शौच के लिए जाता

है। मुनव्वर ने भी दूसरों की तरह अपने घर पर शौचालय बनवाने की ठान ली। समस्या पैसों की आई क्योंकि अनुदान की रकम 12 हजार रुपए की राशि शौचालय पूर्ण होने पर मिलती है,और इतने पैसे में बेहतर शौचालय बनता भी नहीं। यह सोचकर मुनव्वर ने अपनी बाइक बेच दी और मिले पैसे से घर परिवार के लिए शौचालय बनवा लिया। जब इनके यहां ब्लाक के खंड प्रेरक पहुंचे और शौचालय का जायजा लिया। उन्होंने जल्द ही अनुदान राशि दिलवाने का आश्वाशन भी दिया। इटियाथोक एडीओ पंचायत फूल चंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि ये अत्यंत सराहनीय कार्य है। उन्हें जल्द ही अनुदान चेक दिलाया जाएगा। (एजेंसी)


08 स्वास्थ्य

04 - 10 दिसंबर 2017

महिला सशक्तिकरण का दूसरा पक्ष

आंध्र प्रदेश के बीसमपुर गांव की महिलाएं काफी सशक्त हैं। इनमें से कई अपने बूते अपना घर चलाती हैं पर कुछ मामले में यहां स्थिति अच्छी नहीं है

विटामिन डी की कमी से डिमेंशिया का खतरा

भारत में धूप की कोई कमी नहीं होती, फिर भी लगभग 65 से 70 प्रतिशत भारतीय लोगों में इस सबसे जरूरी विटामिन की कमी है

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रीतू तोमर

ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम की अनंतगिरि पहाड़ियों से घिरा एक आदिवासी गांव बीसपुरम महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल बना हुआ है, लेकिन सशक्तिकरण की मिसाल बन रहीं ये महिलाएं माहवारी के दिनों में ताड़ के पत्ते इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। यहां की महिलाएं गरीबी, अशिक्षा और अस्वच्छता के बीच पूरे गांव की बागडोर संभाली हुई हैं। 400 की आबादी वाले इस गांव के बीचोंबीच एक चबूतरे पर ग्राम पंचायत लगती है, जिसका आगाज महिलाएं ही करती हैं। गांव के मामले निपटाने से लेकर खेतों में काम करने तक यहां महिलाएं हमेशा ही पुरुषों से आगे रहती हैं। गांव की ज्यादातर महिलाएं आसपास के कॉफी के बागानों में दिनभर काम करती हैं। यहां के कॉफी बागान महिलाओं के दम पर ही चल रहे हैं।

यहां की महिलाएं गरीबी, अशिक्षा और अस्वच्छता के बीच पूरे गांव की बागडोर संभाली हुई हैं। 400 की आबादी वाले इस गांव के बीचों-बीच एक चबूतरे पर ग्राम पंचायत लगती है, जिसका आगाज महिलाएं ही करती हैं

महिला स्वच्छता जैसी पहल के शोरशराबे के बीच यहां की महिलाएं माहवारी के दिनों में ताड़ के पत्तों का इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण महिला चिगन्ना

कहती हैं, ‘माहवारी के वे मुश्किल भरे दिन शुरू होने से एक सप्ताह पहले ही हम खेतों से ताड़ के पत्ते चुनना शुरू कर देते हैं। इतना कपड़ा नहीं है कि कपड़े का इस्तेमाल करें। ऐसे ही चलता है।’ यह सिर्फ चिगन्ना की आपबीती नहीं है, बल्कि बीसपुरम के अलावा आसपास के कई आदिवासी गांवों में महिलाओं का यही हाल है। यह गांव विशाखापट्टनम के लोकप्रिय हिल स्टेशन अराकू वैली से ज्यादा दूर नहीं है। अमूमन, अराकू घूमने आने वाले सैलानी इस गांव का रुख करते हैं और यहां की दरिद्रता एवं महिलाओं के संबल को अपने कैमरे में कैद करके चले जाते हैं। बीसपुरम के गांव की महिलाओं के हालात यकीनन बदतर हैं, लेकिन उनके हौसले चौंका देते हैं। कई महिलाएं अपने दम पर परिवार चला रही हैं, तो कुछ पति के निकम्मेपन की वजह से काम करने को मजबूर हैं। वहीं, करुणान्नन थुंबा जैसी महिला भी है, जो खुद को पुरुषों से कमतर नहीं समझती। थुंबा ने बताया, ‘मैं कॉफी बागान में काम करती हूं। पति के सहारे की जरूरत नहीं है। जब शादी हुई थी, तो ठान लिया था कि किसी पर बोझ नहीं बनूंगी। मेरा घर मेरी कमाई से चलता है।’ मौजूदा समय में आंध्र प्रदेश में 35 आदिवासी समुदाय हैं, जिनकी संस्कृति एक-दूसरे से बहुत अलग है। बीसपुरम में हिंदू बहुल आबादी है, गांव के बीच में प्राचीन शिव मंदिर है। गांव की महिलाएं पारंपरिक तरीके से साड़ी पहनकर यहां पूजा-अर्चना करने आती हैं। यहां की महिलाओं के आभूषण भी कम आकर्षक नहीं हैं! मसलन, नाक में तीन बालियां पहनने का अनूठा रिवाज है। चिगन्ना कहती हैं, ‘हमें आभूषणों का बहुत शौक है। गांव की हर महिला के पास ढेरों गहने हैं। हम इनके जरिए अपने संस्कारों को जिंदा रखे हुए हैं।’

आईएएनएस

भिन्न अध्ययनों से साबित हो चुका है कि विटामिन डी से हृदय रोग, स्कलेरोसिस और यहां तक कि गठिया जैसे रोगों के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि विटामिन डी की कमी से डिमेंशिया या मनोभ्रंश होने का जोखिम बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार, विटामिन डी की अधिक कमी वाले लोगों में डिमेंशिया होने की संभावना 122 प्रतिशत अधिक थी। भारत में धूप की कोई कमी नहीं होती, फिर भी लगभग 65 से 70 प्रतिशत भारतीय लोगों में इस सबसे जरूरी विटामिन की कमी है। विटामिन डी शरीर की लगभग हर कोशिका को प्रभावित करता है। यह सूर्य के प्रकाश में रहने पर त्वचा में उत्पन्न होता है और कैल्शियम के अवशोषण तथा हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। विटामिन डी का लेवल कम होने पर हड्डियों को नुकसान पहुंचता है। हालांकि, यह विटामिन दिल,

विटामिन डी के स्रोत कॉड लिवर ऑयल यह तेल कॉड मछली के जिगर से प्राप्त होता है और सेहत के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। इससे जोड़ों के दर्द को कम करने में मदद मिलती है और इसे कैप्सूल या तेल के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। मशरूम यदि आपको मशरूम पसंद हैं, तो आपको विटामिन डी भरपूर मिल सकता है। सूखे शिटेक मशरूम विटामिन डी 3 के साथ-साथ विटामिन बी के भी शानदार स्रोत हैं। इनमें कम कैलोरी होती है और इन्हें जब चाहे खाया जा सकता है। सामन इसमें डी 3, ओमेगा 3 और प्रोटीन अधिक होता है। सूरजमुखी के बीज इनमें न केवल विटामिन डी 3, बल्कि मोनोअनसैचुरेटेड वसा और प्रोटीन भी भरपूर होता है।

मस्तिष्क और प्रतिरक्षा तंत्र के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल के मुताबिक, ‘विटामिन डी की कमी मैटाबोलिक सिंड्रोम, हृदय रोगों और प्रजनन क्षमता से जुड़ी हुई है। अनुसंधान से पता चला है कि इसकी कमी से मनोभ्रंश भी हो सकता है। भारत में, विभिन्न त्योहारों पर सूर्य की पूजा की जाती है। माघ, वैशाख और कार्तिक माह में शाही स्नान का महत्व है, जब सुबह-सुबह सूरज की पूजाअर्चना करने और कैल्शियम से समृद्ध भोजन करने का प्रावधान है, जिसमें उड़द की दाल और तिल प्रमुख हैं।’ अग्रवाल ने कहा, ‘दीपावली के तुरंत बाद छठ की पूजा में भी सूर्य आराधना प्रमुख है। कार्तिक के महीने के बाद मार्गशीर्ष में भी सूर्य की पूजा की जाती है। कार्तिक पूर्णिमा और वैशाख पूर्णिमा विशेष रूप से सूरज की पूजा के लिए ही जानी जाती है। वर्तमान में विटामिन डी का मंत्र यह है कि वर्ष में कम से कम 40 दिन 40 मिनट रोज सूर्य की रोशनी में रहना चाहिए। इसका सही लाभ तब मिलता है जब शरीर का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा सूर्य की रोशनी के संपर्क में आए, भले ही प्रात:काल या शाम के समय।’ विटामिन डी 2 एर्गोकैल्सीफेरॉल हमें खाद्य पदार्थो से मिलता है, जबकि विटामिन डी 3 कोलेकैल्सीफेरॉल सूर्य की रोशनी पड़ने पर हमारे शरीर में उत्पन्न होता है। दोनों विटामिन हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। डी 2 जहां भोजन से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन डी 3 का उत्पादन सूर्य के प्रकाश में ही होता है। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि विटामिन डी की कमी के कई कारण हैं। कई बार सामाजिक कारणों से व्यक्ति धूप में कम निकलता है। भारत में प्रचुर मात्रा में धूप उपलब्ध रहती है, फिर भी बहुत से लोग अनजान हैं कि उन्हें विटामिन डी की कमी हो सकती है। (एजेंसी)


04 - 10 दिसंबर 2017

बराक महोत्सव में घोषणाओं की बरसात

प्रदेश

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बराक नदी के ऊपर तीन नए पुल, करीमगंज में हेलीपोर्ट और सूतरकंडी ट्रेड सेंटर का पुनरुद्धार किया गया

राज कश्यप /गुवाहाटी

सम के करीमगंज में नमामि बराक महोत्सव का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल ने राज्य के इस हिस्से के विकास के लिए कई परियोजनाओं की घोषणा की। घाटी में सड़क संचार में सुधार के लिए बराक नदी के ऊपर तीन नए पुलों का निर्माण करने की घोषणा करते हुए सीएम सरबानंद सोनोवाल ने कहा कि तीन जिलों में एक-एक पुल बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए लोक निर्माण विभाग को पहले से ही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के निर्देश दे दिए गए हैं। उन्होंने करीमगंज में एक हेलिपैड का निर्माण और व्यापार के विकास के लिए सुतरकंडी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र को पुनर्जीवित करने की घोषणा भी की। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक कौशल विकास केंद्र भी करीमगंज में खोला जाएगा और सरकार सक्रिय रूप से जिले में एक मेडिकल कॉलेज स्थापित करने पर भी विचार कर रही है। जिले में खेल के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए राज्य सरकार करीमगंज में एक अत्याधुनिक स्टेडियम स्थापित करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंचग्राम पेपर मिल, जो इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उसे अगले छह

महीनों के भीतर केंद्र सरकार के समर्थन से फिर से शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि खेल के लिए एक आधुनिक स्टेडियम हैलाकंडी में बनाया जाएगा और एक कौशल विकास केंद्र भी युवाओं को रोजगार में सक्षम बनाने के लिए जिले में स्थापित किया जाएगा। सोनोवाल ने इस मौके पर चार स्टील सतही ड्राफ्ट नौकाओं का उद्घाटन किया और सिल्चरगुवाहाटी-त्रिवेंद्रम एक्सप्रेस ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई। इस मौके पर केंद्रीय एमओएस होम किरण रिजिजू और केंद्रीय एमओएस रेलवे राजेन गोहेन भी मौजूद रहे। सिल्चर में नमा​िम बराक फेस्टिवल के कार्यक्रम में सोनोवाल ने कहा कि बराक और ब्रह्मपुत्र नदियों की एक ही भाषा है और वह भाषा एकता और सामंजस्य की है। उन्होंने यह भी कहा कि नमामि बराक न केवल एक त्योहार है, लेकिन यह असम के इन हिस्सों का पता लगाने की एक नई यात्रा है। यह त्योहार मानवतावादी मूल्यों को पुनर्जीवित करने के लिए आयोजित की गई है ताकि संसाधनों की संभावनाएं तलाशी जा सकें। सोनोवाल ने कहा कि नमामि बराक राज्य की अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को बढ़ावा देगा और हर किसी को असम में बढ़ोत्तरी लाने के लिए नए सिरे से प्रेरित करेगा। नमामि बराक फेस्टिवल इस घाटी के लोगों को राज्य के बाकी हिस्सों की

तरह आगे बढ़ने में मदद करेगा। सोनोवाल ने कहा कि नमामि ब्रह्मपुत्र का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया था और हम भाग्यशाली हैं कि नमामि बराक का उद्घाटन राष्ट्रपति कोविंद ने किया। इतना ही नहीं उन्होंने इस मौके पर यह भी कहा कि राज्य की शांति और विकास के लिए सभी को एकजुट होकर कार्य करना चाहिए ताकि राज्य के मैदानों और पहाड़ियों, बराक और ब्रह्मपुत्र घाटियों में रहने वाले लोगों का विकास किया जा सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार पूरे उत्तर-पूर्व के साथ बराक घाटी को विकसित करने के लिए बहुत महत्व दे रही है। रेल मंत्रालय ने बराक घाटी से कई नई ट्रेनें शुरू की हैं और आज भी सिल्चर-डिब्रूगढ़-त्रिवेंद्रम को जोड़ने वाली एक नई ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई है। उन्होंने यह भी बताया कि डिब्रूगढ़ और सिल्चर को वायु संपर्क से जोड़ने की भी तैयारी शुरु हो गई है। मुख्यमंत्री सोनोवाल ने केंद्रीय एमओएस रेलवे

राजेन गोहाई से सौराष्ट्र से डिब्रूगढ़ और सिल्चर तक एक नई ट्रेन की शुरुआत करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सिल्चर में मिनी सचिवालय का निर्माण जल्द शुरू होगा और विवेकानंद सांस्कृतिक और अनुसंधान संस्थान भी यहां स्थापित होने जा रहा है। सिल्चर में एक राष्ट्रीय स्तरीय पुस्तकालय भी बनाया जाएगा और एक कौशल विकास केंद्र भी सिल्चर में दो बराक घाटी के अन्य जिलों के साथ स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने अपनी घोषणाओं के साथ ही यहां काम शुरू कर दिया है और इससे पहले ही बराक नदी के खनन का बादा भी सरकार ने पूरा किया है। हालांकि अब यहां दो ड्रेजर कार्य कर रहे हैं और आने वाले समय में तीन और ड्रेजर जोड़े जाएंगे। सिल्चर से बंगाल की खाड़ी तक बांग्लादेश के माध्यम से नदी रास्ते की शुरूआत की जाएगी और इस क्षेत्र में व्यापार और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

विदेशियों को पसंद आ रहा सोनपुर मेला अब तक 29 विदेशी पर्यटक पहुंच चुके हैं। विदेशी पर्यटकों को यहां सुसज्जित पर्यटक ग्राम में बने स्विस कॉटेजों में ठहराया गया

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आईएएनएस

हार के सारण और वैशाली जिले की सीमा पर 'मोक्षदायिनी' गंगा और 'नारायणी' गंडक नदी के संगम पर ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला न केवल देशी पर्यटकों को, बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहा है। यह दीगर बात है कि इस वर्ष चिड़िया बाजार और घुड़दौड़ व हाथी स्नान नहीं होने के कारण कुछ पर्यटक निराश भी लौट गए। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है कि इस विश्व

प्रसिद्ध मेले का आकर्षण सिर्फ राज्य और देश के सैलानियों को ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार दूसरे देशों के भी सैलानियों में ही है। मेले में इस वर्ष अब तक 29 विदेशी पर्यटक पहुंचकर आनंद ले चुके हैं। वर्तमान समय में कनाडा के दो पर्यटक मेले में आनंद ले रहे हैं। पिछले वर्ष करीब 32 विदेशी पर्यटक इस मेले को देखने पहुंचे थे, जिसमें अधितकर इटली और जापान के रहने वाले थे। अपने गौरवशाली अतीत को संजोए हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले में पर्यटन विभाग भी विदेशी सैलानियों को लुभाने के लिए कोई कोर कसर

नहीं छोड़ना चाहती। विदेशी पर्यटकों को सुसज्जित पर्यटक ग्राम में बनी स्विस कॉटेजों में ठहराया गया। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाले इसे मेले में इस वर्ष अब तक 29 विदेशी पर्यटक पहुंचे हैं। इन विदेशी सैलानियों को ठहरने के लिए मेला परिसर में बनाए गए 'पर्यटक ग्राम' में आधुनिक सुख-सुविधा वाले ग्रामीण परिवेश से लगने वाले 20 स्विस कॉटेजों का निर्माण कराया गया है। स्विस कटेज के प्रबंधक अमित प्रकाश ने बताया, ‘अब तक 29 विदेशी सैलानी मेले का लुत्फ उठा चुके हैं। इनमें सबसे अधिक 16 सैलानी जापान से आए हैं, जबकि इटली से 5, फ्रांस से 4 तथा कनाडा व हॉलैंड के 2-2 सैलानी शामिल हैं।’ बिहार पर्यटन विकास निगम का दावा है कि इसके अलावे कई विदेशी सैलानी पटना और हाजीपुर के विभिन्न होटलों में रहकर मेला का आनंद उठाने भी यहां पहुंच रहे हैं। अमित ने बताया कि ग्रामीण परिवेश में तैयार किए गए इन कॉटेजों में आधुनिक सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। वे कहते हैं

कि आधुनिक रूप से बनाया गया शौचालय तो है ही, कॉटेज में ही पर्यटन ग्राम में ही रेस्टोरेंट और पार्किंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने बताया कि पर्यटक ग्राम में स्विस कॉटेज अब तक किसी दिन खाली नहीं है, पर आगे के विषय में नहीं कहा जा सकता। वे कहते हैं कि इस वर्ष विदेशी सैलानियों के मामले में पिछले वर्ष से ज्यादा सैलानियों के पहुंचने की संभावना है। उन्होंने कहा कि स्विस कॉटेज में सूप और टोकरी से बनी 'फर्स्ट लाइटिंग' और 'ग्लोब लाइटिंग' को विदेशी सैलानी काफी पसंद कर रहे हैं। करीब एक महीने तक चलने वाले इस मेले में आए विदेशी सैलानी भी मेले के बाजारों को देखकर आश्चर्यचकित हैं। कनाडा से अपनी पत्नी के साथ सोनपुर मेला देखने आए जेम्स ब्रेडबुरी ने कहा, ‘वंडरफुल (अद्भुत) है। सोनपुर मेले के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है, मैं यहां 'चिड़िया बाजार' के भी विषय में सुन रखा था, लेकिन वह इस साल नहीं लगा है। हालांकि अन्य चीजें भी हैं। वंडरफुल सोनपुर मेला।’


10 पर्यावरण

04 - 10 दिसंबर 2017

दान और श्रमदान से पानीदार बना गांव उत्तराखंड के लुठियाग गांव के ग्रामीणों ने एक झील को श्रमदान से बनाकर और उसमें 11 लाख लीटर बरसाती पानी का संग्रहण कर एक मिसाल पेश की है

खास बातें तीन वर्ष लुठियाग गांव बूंद-बूद पानी के लिए मोहताज था ग्रामीणों ने खुद ही जल संकट को दूर करने का निर्णय लिया 40 मीटर लंबी और 18 मीटर चौड़ी झील का किया निर्माण

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एसएसबी ब्यूरो

स तरह से लुठियाग गांव के ग्रामीणों ने 40 मीटर लंबी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया इसी तरह ही लोग चाल-खाल का निर्माण करते थे। इस निर्माण में कहीं पर भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है। इस चाल को जमीन के अंदर खोदा गया है। बस इसी में बरसात का पानी एकत्रित होता है, जो निचले स्थानों के प्राकृतिक जलस्रोतों को तरोताजा रखने का यह अद्भुत तरीका लोक ज्ञान में ही मिलता है। जिसे लुठियाग गांव के लोगों ने इतनी बड़ी चाल का निर्माण करके बता दिया कि जल संरक्षण में लोक ज्ञान ही महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड में पानी के संरक्षण के लिए जलागम परियोजना, कृषि विकास कार्यक्रम, वन विभाग, पेयजल एवं सिंचाई विभाग, स्वजल आदि तमाम अन्य कार्यक्रम एवं विभाग हैं जिन्होंने जल संरक्षण की कोई खास तस्वीर इसीलिए प्रस्तुत नहीं कर पाई कि उनके कार्यक्रम लोक सहभागिता के कम और व्यावसायिक अधिक थे। आज तक जल संरक्षण, पेयजल संकट का निवारण जैसी जो भी खबरें सामने आ रही हैं वे सभी लोक सहभागिता और लोक ज्ञान को मद्देनजर रखते हुए क्रियान्वित हुई है। जबकि बरसाती पानी के संग्रहण को सरकार की रेनवाटर हार्वेस्टिंग योजना आज तक परवान नहीं चढ़ पा रही है। जल संरक्षण के जो भी उपादान सामने आ रहे हैं, वे सभी बिना बजट के तो हैं ही मगर इन कार्यों में बखूबी से लोकसहभागिता और लोक ज्ञान का भरपूर उपयोग स्पष्ट नजर आ रहा है। लोग दानचंदा एवं श्रमदान से जल संरक्षण के कामों को क्रियान्वित कर रहे हैं। रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लाक अन्तर्गत लूठियाग गांव के ग्रामीणों ने ऐसा

कर दिखाया। बिना सरकारी मदद के पानी का संरक्षण कर सरकारी योजनाओं को आईना दिखाने का यह सफल प्रयास कर डाला। यह कोई अजूबा नहीं, बल्कि लुठियाग गांव के ग्रामीणों ने एक झील को श्रमदान से बनाकर और उसमें 11 लाख लीटर बरसाती पानी का संग्रहण कर एक मिसाल पेश की है। झील लोग इस मायने में कह रहे हैं कि यह थोड़ी बड़ी है। मगर यह ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग पॉण्ड’ की कल्पना को साकार करती है। जबकि पहले लोग इसी लोक ज्ञान के अनुरूप जल संरक्षण करते थे। जिस तरह से लुठियाग गांव के ग्रामीणों ने 40 मीटर लंबी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया, इसी तरह यहां के लोग चाल-खाल का भी निर्माण करते थे। इस निर्माण में कहीं पर भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है। इस चाल को जमीन के अन्दर खोदा गया है। बस इसी में बरसात का पानी एकत्रित होता है, जो निचले स्थानों के प्राकृतिक जलस्रोतों को तरोताजा रखने का यह अद्भुत तरीका लोक ज्ञान में ही मिलता है। जिसे लुठियाग गांव के लोगों ने इतनी बड़ी चाल का निर्माण करके बता दिया कि जल संरक्षण में लोक ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण है। तीन वर्ष पहले उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जनपद का लुठियाग गांव बूंद-बूद पानी के लिए मोहताज था, आज वहां हर घर को पूरे दिन पर्याप्त पानी ही नहीं मिल रहा है, बल्कि साग-सब्जी की भी खूब

पैदावार हो रही है। जो ग्रामीणों की आजीविका का भी जरिया बन गई है। लोग पहले सरकारी योजनाओं के भरोसे थे कि उनके गांव में कोई स्वजल या अन्य पेयजल योजना बनेगी तो उनकी पेयजल की यह समस्या स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। गांव में सरकारी स्तर पर पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए कई कार्य हुए हैं, परंतु लुठियाग गांव में पेयजल की समस्या तभी दूर हुई जब लोगों ने खुद ही जल संकट को दूर करने का निर्णय लिया है। उन्होंने अपने पूर्वजों के लोक ज्ञान को महत्त्व दिया और तीन वर्ष पहले गांव से थोड़ा दूर यानि जहां से गांव का जलागम क्षेत्र बनता है की जगह पर एक विशाल चाल का निर्माण कर डाला। टिहरी और रुद्रप्रयाग जिले की सीमा पर बसा चिरबिटिया-लूठियाग गांव सबसे अधिक ऊंचाई वाला गांव है। समुद्र तल से 2170 मीटर की ऊंचाई पर होने से गांव में पानी का मुख्य स्रोत वर्ष 1991 के भूकंप में ध्वस्त हो गया था। 104 परिवारों वाले इस गांव में एक स्रोत ही बचा था, जो बरसात के चार माह को छोड़कर अन्य महीनों में सूख जाता था। ऐसे में ग्रामीण ढाई से तीन किमी दूर से अपने लिए पानी जुटा रहे थे। 2014 में ग्रामीणों ने राज राजेश्वरी ग्राम कृषक समिति का गठन कर गांव के हर घर के लिए पर्याप्त पानी जुटाने का संकल्प लिया। संकल्प के तहत विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2014) पर

2014 में ग्रामीणों ने ग्राम कृषक समिति का गठन कर गांव के हर घर के लिए नी जुटाने का संकल्प लिया। संकल्प के तहत 104 परिवारों की महिलाओं के साथ अन्य ग्रामीणों ने चाल और खाल (छोटी झील) बनाने का कार्य शुरू किया

104 परिवारों की महिलाओं के साथ अन्य ग्रामीण गैती, फावड़ा, कुदाल, सब्बल लेकर पेयजल स्रोत से लगभग सवा किमी ऊपर जंगल क्षेत्र में पहुंचे। यहां चाल, खाल (छोटी झील) बनाने का कार्य शुरू किया गया। लगभग एक माह की कड़ी मेहनत के बाद ग्रामीणों ने 40 मीटर लंबी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया। तब खूब बारिश होने से चाल-खाल में काफी पानी एकत्रित हुआ, तो लोगों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई कि उनकी मेहनत रंग लाई है। उन्हें विश्वास था कि जब यह चाल एक बार पानी से भर जाएगी उसके बाद तो उनके गांव के प्राकृतिक जल धारे पुनर्जीवित हो उठेंगे। आज इस पूरे क्षेत्र में इस चाल के निर्माण से खेती की जमीन में अच्छी नमी मिल रही है साथ ही पेयजल स्रोतों के सुर खुल गए हैं। वर्ष 2015 में झील में लगभग पांच लाख लीटर पानी जमा होने से गांव के पेयजल स्रोत भी रिचार्ज होने शुरू हो गए। स्रोत से सटे अन्य नम स्थलों पर भी स्रोत फूटने लगे और वर्ष 2016 में झील में आठ लाख लीटर पानी एकत्रित हो गया। इसके बाद रिलायंस फाउंडेशन की मदद से ग्रामीणों ने स्रोत के समीप 50 हजार और 22 हजार लीटर क्षमता के दो स्टोरेज टैंक का निर्माण कराया। टैंक से गांव के 104 घरों तक 5340 मीटर पाइप लाइन बिछाई गई, जिससे सभी घरों को पानी मिलने लगा। लाइन की देखरेख के लिए भी ग्रामीणों ने अपने खर्चे पर व्यवस्था की है। झील में इस वक्त 11 लाख लीटर पानी संग्रहित है, जिससे गांव के सभी परिवारों को पर्याप्त पानी मिल रहा है। साथ ही स्टोरेज टैंक भी ओवरफ्लो हो रहे हैं। समिति के अध्यक्ष कुंवर सिंह कैंतुरा, रूप सिंह कैंतुरा, खजानी देवी, अनीता देवी, बसंती देवी ने बताया कि 2014 तक उन्हें बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ता था, लेकिन आज उनके घरों में पर्याप्त पानी है। घरों में साग-भाजी की खूब पैदावार हो रही है, जो ग्रामीणों की आजीविका का भी जरिया बन गई है।


04 - 10 दिसंबर 2017

‘लखपति किसान, स्मार्ट विलेज’

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झारखंड के लोग, खासकर स्त्रियां, यह साबित कर रही हैं कि वे श्रम के साथी हैं और किसी के बहकावे में आए बगैर खुद के साथ-साथ समाज को खुशहाल करना चाहती हैं

खास बातें मोरहू प्रखंड की महिलाएं बना रही हैं स्मार्ट गांव

आनंद भारती

ल, जंगल और जमीन के मालिक आदिवासी आज भी व्यवस्था से अपने संसाधनों के लिए लड़ रहे हैं। हजारों साल पहले भी वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं। उसी में से वे अपना रास्ता भी ढूंढते रहे हैं। ऐसा ही रास्ता झारखंड के खूंटी जिले के मोरहू प्रखंड के लोग खोज चुके हैं और बाकी आदिवासी अंचलों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। समाजशास्त्रियों ने माना है कि हजारों वर्ष पूर्व आदिवासियों ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की गुफाओं में जीवन सुरक्षित करते हुए ‘विकास’ की नींव रखी थी। जंगलों को साफ किया और खेती करने की पद्धति इजाद कर एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुआत की। यही वजह है कि वे जल, जंगल और जमीन से अलग नहीं रह पाए। आज मोरहू प्रखंड के पांच पंचायतों में 41 गांव के लोग, खासकर स्त्रियां, यह साबित कर रही हैं कि वे श्रम के साथी हैं और किसी के बहकावे में आए बगैर खुद के साथ-साथ समाज को खुशहाल करना चाहती हैं। यह नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भी खुशी की खबर है कि आदिवासी महिलाएं उनके स्मार्ट गांव के सपने और संकल्प को साकार कर रही हैं। खूंटी मुंडा आदिवासियों का इलाका है। मुंडा लोगों का जमीन से जुड़ाव है। हमेशा से वे इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं। बिरसा मुंडा ने तो इसके लिए लंबा संघर्ष किया

था। उनके आंदोलन के सामने अंग्रेज सरकार को झुकना पडा था। जमीन को लेकर उन्हें कानून बनाना पड़ा जिसे ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट’ का नाम दिया गया। लेकिन दुर्भाग्य कि खूंटी की जमीन किसी का पालन नहीं कर पा रही है। पठारी अंचल के कारण खेती करना मुश्किल है। इस कारण वहां से लोगों का शहरों की ओर पलायन करना एक रूटीन बन गया। लेकिन तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस स्मार्ट गांव की परिकल्पना की, उसे आज बखूबी जमीन पर उतारने का काम मोरहू प्रखंड की महिलाएं कर रही हैं। ढाई हजार आदिवासी परिवार राज्य प्रदत्त सुविधाओं को व्यवस्थित कर एक मुकाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसके पीछे की ताकत बना रतन टाटा ट्रस्ट और उसे अंजाम पर पहुंचाने का जिम्मा लिया उस इलाके में सक्रिय संगठन नवजागृति केंद्र ने। महिलाओं को ही आधार बनाकर उसमें महिला-समूहों को जोड़ा गया। उन्हें कृषि के अत्याधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों से अवगत कराया गया। मिट्टी रहित पौधा तैयार कर उसे रोपने का सिलसिला शुरू किया गया। ऐसा इसीलिए क्योंकि मिट्टी में बीज से पौधा तैयार करने में मिट्टी की बहुत सारी बीमारियां आ जाती हैं। मिट्टी के बदले नारियल के छिलके का डस्ट डालकर पौधा उगाया जाता है। अनुभव में आया कि इससे उत्पादन भी ज्यादा हुआ। टमाटर, हरी मिर्च,गोभी आदि का ऑफ सीजन खेती हो रही है और कीमत भी ज्यादा मिल रही है। पहले यहां तरबूज की खेती नहीं होती थी, लेकिन अब भारी मात्रा में तरबूज, ककड़ी, कद्दू

हजारों वर्ष पूर्व आदिवासियों ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की गुफाओं में जीवन सुरक्षित करते हुए ‘विकास’ की नींव रखी थी। जंगलों को साफ किया और खेती करने की पद्धति इजाद कर एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुआत की

आदि की फसल उगाई जा रही है। आर्थिक दृष्टि से यह वरदान साबित हो रही है। महिलाएं फलदार वृक्ष की ओर भी उन्मुख हुई हैं जो मुनाफे का बाजार कायम करेगी। सिंचाई की व्यवस्था आधुनिक कर दी गई है। पांडु गांव में तो सोलर सिस्टम से सिंचाई की जा रही है। कुआं श्रमदान से बनाया गया है। उस इलाके में पारंपरिक लाह के उत्पादन को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई। लाह का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पेंट बनाने में होता है। उससे बटन भी बनते हैं। लाह की खरीद-बिक्री में पहले बिचौलिए की मन-मर्जी चलती थी, लेकिन अब आदिवासियों ने कृषक उत्पाद संगठन (फार्मर्स प्रोड्यूसर्स ओर्गेनाजेशन) बनाकर अपनी व्यवस्था बना ली है। इसमें विभिन्न महिला समितियों की प्रतिनिधि शामिल हैं। अब लाह बेचने किसी को भी बाजार नहीं जाना पड़ता है, महाजन ही गांव आने लगे हैं। इंटरनेट पर सक्रियता के कारण महिलाओं को हर चीज का बाजार-भाव मालूम रहता है, इसीलिए ठगी से बच जाती हैं और इन्हें अच्छी कीमत मिल जाती है। नवजागृति केंद्र के संस्थापक सतीश गिरिजा बताते हैं कि ‘आदिवासियों का जमीन के प्रति लगाव तो शरू से ही रहा है, लेकिन तकनीकी जानकारियों के अभाव में कृषि इनके जीवन का आधार नहीं बन पाया था, अब उसमें बदलाव हो रहा है। कृषि को बेहतर रूप देने की कोशिश चल रही है।’ एक प्रमुख महिला जिनित मिंज का खाना है कि ‘सरकार ने हमें सुविधाएं उपलब्ध कराई और हमने उसमें अपना श्रम लगाया। अब हमलोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। हमारी सफलता अब दूसरे क्षेत्रों को प्रेरित कर रही है।’ पहले इस क्षेत्र में कृषि के लिए बैंकों से कर्ज लेने की मंशा और परंपरा नहीं थी, लेकिन जानकारियों के बाद यह समझ में आ गई है कि कर्ज लेकर खेती को समुन्नत किया जा सकता है। लोग पंचायत से प्राप्त संसाधनों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। मनरेगा

रतन टाटा ट्रस्ट और संगठन नवजागृति केंद्र कर रहा है मदद महिलाओं की वजह से खूंटी में कम हुआ पलायन भी मददगार बन रहा है। सुअर पालन पहले पारंपरिक तरीके से होता था, अब अच्छे नस्ल के सुअर को बेहतर रख रखाव के साथ पाला जा रहा है। उसके लिए अलग से घर बनाए गए हैं और उसे बाहर नहीं छोड़ा जा रहा है। सुअरों को भूसे और साग तथा सब्जी के छिलके खिलाए जा रहे हैं। एक परिवार को दो सुअर, नर और मादा, उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साल में दो बार उसके 12 से 16 बच्चे होते हैं। एक बच्चा ढाई हजार रुपए में बिकता है। यह किसानों की नकदी आमदनी (कैश क्रॉप) है। इन गांवों की सबसे खास बात यह है कि अपनी आमदनी का हिसाबकिताब महिला समूह ही रखता है। इन गांवों को इंटरनेट से जोड़ दिया गया है। इसके लिए ‘इंटरनेट मित्र’ का आरंभ किया गया है। हर महिला न केवल इसका इस्तेमाल कर रही है, बल्कि देश-दुनिया से अपनी तरह से परिचित हो रही है। मनोरंजन के भी पर्याप्त साधन प्राप्त हो गए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आधुनिक तकनीक ने उन्हें अपनी परंपरा से काट दिया है, बल्कि उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को आधुनिक नजरिए से देखना शुरू कर दिया है। सबसे खुशी की बात यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की हैदराबाद स्थित एक विंग राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान झारखंड के इन गांवों में दिलचस्पी दिखाई है। वह इसका डाक्यूमेंटेशन कर रहा है, ताकि पूरा देश देख सके कि कैसे बदल रहा है गांव।


12 साइंस

04 - 10 दिसंबर 2017

ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में कमी आकाशगंगा के सबसे पुराने तारों की खोज ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने वाले देशों की सूची में भारत के दर्जे में इस साल सुधार हुआ है

ग्रीकीनहाउससूचीगैमेंस भारतउत्सर्जनके दर्जेकममेंकरनेइस सालवाले सुदेशोंधार

हुआ है। पर्यावरण संगठन, जर्मनवाच की ओर से तैयार किए गए जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (सीसीपीआई) 2018 में शामिल 56 देशों व यूरोपीय संघ की सूची में भारत इस साल 14 वें पायदान पर है, जबकि पिछले साल इस सूची में उसका स्थान 20वां था। यह उपलब्धि बिजली उत्पादन के क्षेत्र में हरित प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से मिली है। इस मामले में भारत चीन और अमेरिका से काफी आगे है। इस सूची में चीन का स्थान अभी भी 41वां है। पिछले पांच साल से ज्यादा समय से चीन में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन काफी ज्यादा हुआ है और ऊर्जा की खपत में भी इजाफा हुआ है। बॉन में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन वार्ता के अवसर पर यह रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 56 देश व यूरापीय संघ 90 फीसदी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया

में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत की तरफ झुकाव में तेजी आई है, लेकिन कोई भी देश इसका इस्तेमाल बहुत ज्यादा नहीं कर रहा है। जर्मनी के न्यू क्लाइमेट इंस्टीट्यूट और सीसीपीआई के सह-लेखक निक्लास होन ने कहा कि जिन देशों का मूल्यांकन किया गया है उनकी मध्य व दीर्घकालीन आकांक्षाओं में बहुत बड़ा फासला है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में हम भारत या नार्वे में 2030 के लक्ष्य को ज्यादा बेहतर पाते हैं।उनका कहना था कि किसी भी देश के पास खासतौर से बेहतर ऊर्जा सक्षमता लक्ष्य नहीं है। सऊदी अरब और अमेरिका 2030 तक अपनी ऊर्जा आकांक्षाओं को बढ़ाएंगे ही। जर्मनवाच में सीसीपीआई के सह-लेखक जेन बुर्क ने कहा कि जलवायु को लेकर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में पेरिस समझौते में तय किए गए वैश्विक जलवायु लक्ष्य के प्रति हम जबरदस्त प्रतिबद्धता देखते हैं। अब इस प्रतिबद्धता पर क्षेत्रवार अमल की जरूरत है। अमेरिका की ओर से 2015 के पेरिस समझौते से बाहर निकलने और अपनी ही पूर्ववर्ती सरकारों के प्रमुख जलवायु विधायनों को समाप्त करने के बाद अमेरिका सीसीपीआई की सूची में नीचे से पांच देशों में शामिल है और इसका दर्जा 56वां है। सूची में निचले स्तर पर कोरिया 58वें, ईरान 59वें और सउदी अरब 60वें स्थान पर हैं। बॉन में जलवायु परिवर्तन वार्ता छह नवंबर से जारी है और यह 17 नवंबर तक चलेगी। (एजेंसी)

खगोलविदों ने हमारी सौर प्रणाली के पड़ोस में तारों की गणना की कि वहां कितने अल्पवयस्क, जवान और बूढ़े तारे हैं

गोलविदों ने तारों के स्थान और गति का निर्धारण करते हुए हमारी आकाशगंगा के कुछ सबसे पुराने तारों की खोज की है। मानव की तरह तारों का भी जीवन चक्र होता है। वह पैदा लेते हैं, जवान होते हैं, बुजुर्ग होते हैं और फिर खत्म हो जाते हैं। अमेरिका की जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 'बूढ़े' तारों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन तारों को कूल सब-ड्वार्फ्स के नाम से भी जाना जाता है और ये सूर्य के मुकाबले ज्यादा उम्र वाले और ठंडे होते हैं। द एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में खगोलविदों ने हमारी सौर प्रणाली के पड़ोस में तारों की गणना की कि वहां कितने अल्पवयस्क, जवान और बूढ़े तारे हैं। वैज्ञानिकों का लक्ष्य मुख्य रूप से 200 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित तारों पर था जिनके बारे में समझा जाता है कि वे 1,00,000 प्रकाश वर्ष में फैली आकाशगंगा में अपेक्षाकृत निकट हैं। एक साल में प्रकाश द्वारा तय की गई कुल दूरी को एक प्रकाश वर्ष कहा जाता है। इस अध्ययन के मुख्य लेखक

वेइ-चुन जाओ ने कहा कि हमारी सौर प्रणाली के पड़ोस में बहुत बड़ी संख्या में वयस्क तारे हैं, लेकिन उतनी संख्या में बूढ़े तारे नहीं हैं। इसी लिए हमें उन्हें खोजने के लिए आकाशगंगा में और दूर जाना होगा। वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले महीने हमारे सौरमंडल से होकर गुजरे गहरे, लाल रंग और सिगार के आकार वाले पिंड जैसे किसी भी ब्रह्मांडीय पिंड को इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। वैज्ञानिकों ने इसे तारों के बीच मौजूद रहने वाले क्षुद्रग्रह की श्रेणी में रखा है। पिछले महीने हवाई में पैन..एसटीएआरआरएस 1 टेलिस्कोप ने आकाश से गुजरते हुए प्रकाश बिंदु को कैद किया था। शुरुआत में यह एक तेज गति से गुजरने वाले छोटे क्षुद्रग्रह की तरह प्रतीत हुआ था, लेकिन बाद में कई दिनों तक गौर करने पर इसके कक्ष का करीब और सही हिसाब मिल पाया। कक्ष के आकलन से खुलासा हुआ कि यह पिंड अन्य क्षुद्रग्रहों और पुच्छलतारों की तरह सौर मंडल के भीतर से नहीं उभरा है बल्कि तारों के बीच से आया है। शुरुआत में धूमकेतू के तौर पर इसकी पहचान हुई, हालांकि सितंबर में सूर्य के करीब आने पर किए गए अवलोकनों से पता चला कि इसमें धूमकेतू जैसी किसी भी गतिविधि के संकेत नहीं मिलते हैं। इस पिंड को फिर से वर्गीकृत करते हुए अंतर ताराकीय क्षुद्रग्रह की श्रेणी में रखा गया और इसे “ओउमुआमुआ” नाम दिया गया। (एजेंसी)

नासा का नक्शा बताएगा 20 सालों में कितनी बदली पृथ्वी

20 वर्षों के बाद इस सप्ताह जारी तस्वीरों व वीडियो के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि पृथ्वी ऋतुओं के साथ कैसे बदल रही है

पृ

आईएएनएस

थ्वी पर जीवन की निगरानी के 20 सालों के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा जारी एक नए नक्शे में महाद्वीपों और महासागरों के बेसिन (पानी से ढका समुद्र के नीचे का भाग) में हुए दीर्घकालिक परिवर्तन को दर्शाया गया है। नासा ने एक बयान में कहा, ‘विभिन्न तकनीकों के माध्यम से अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरें वैज्ञानिकों को दुनिया भर में फसलों, वनों और मत्स्यपालन की निगरानी की सुविधा देती हैं।’ उपग्रहों द्वारा भूमि और समुद्रीय जीवन मापन वर्ष 1970 के दशक के अंत से ही शुरू हो गया था,

लेकिन वर्ष 1997 में सी-व्यूइड फील्ड ऑफ व्यू सेंसर (सीडबइएफएस) के प्रक्षेपण के बाद ही भूमि और सागर दोनों की सतत निगरानी की सुविधा मिल पाई है। 20 सालों के बाद इस सप्ताह जारी तस्वीरों व वीडियो के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि पृथ्वी ऋतुओं के साथ कैसे बदल रही है। मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट में नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के समुद्र वैज्ञानिक जीन कार्ल फील्डमैन ने कहा, ‘ये हमारे ग्रह के अविश्वसनीय रूप से ऐसे

दृश्य हैं, जो हमें सोचने-समझने के लिए प्रेरित करते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘यह पृथ्वी है, वह हर दिन सांस ले रही है। मौसम के साथ बदल रही है, सूरज की किरणों, बदलती हवाओं, समुद्र की लहरों और तापमान पर प्रतिक्रिया दे रही है।’ नासा के वैश्विक महासागर और भूमि मापन के तीसरे दशक के शुरू होने के साथ ही इन खोजों

अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरें वैज्ञानिकों को दुनिया भर में फसलों वनों और मत्स्यपालन की निगरानी की सुविधा देती हैं

से महत्वपूर्ण सवाल उभरकर आते हैं कि बदलते वातावरण और भूमि के साथ मानव संपर्क में आए व्यापक परिवर्तनों पर पारिस्थितिकी प्रणाली कैसे प्रतिक्रिया करेगी। वैज्ञानिक ने कहा, ‘उपग्रहों के मापन में यह पता चला है कि आर्कटिक में हरियाली बढ़ी है, क्योंकि झाड़ियां अपनी सीमा का विस्तार करती हैं और गर्म तापमान में पनपने लगती हैं।’ वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता बढ़ती जा रही है और जलवायु गर्म हो रही है। ऐसे में नासा की यह जानकारी वातावरण में कार्बन की निगरानी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


04 - 10 दिसंबर 2017

मिथिलांचल की पहचान 'मखाना' को बाजार की दरकार

सेवा क्षेत्र में गुणवत्ता क्रांति पर जोर

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हार के मिथिलांचल की पहचान के बारे में कहा जाता है- 'पग-पग पोखरि माछ मखान' यानी इस क्षेत्र की पहचान पोखर (तालाब), मछली और मखाना से जुड़ी हुई है। वैज्ञानिक मखाना को लेकर नए-नए शोध कर नई प्रजाति तो विकसित कर रहे हैं, लेकिन मखाना को सही ढंग से बाजार उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण इसके किसानों के सामने परेशानियां भी खड़ी हो रही हैं। बिहार के दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया सहित 10 जिलों में मखाना की खेती होती है। देश में बिहार के अलावा असम, पश्चिम बंगाल और मणिपुर में भी मखाने का उत्पादन होता है, मगर देशभर में मखाने के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है।

बिहार के अलावा असम, पश्चिम बंगाल और मणिपुर में भी मखाने का उत्पादन होता है, मगर देशभर में मखाने के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है आंकड़ो के मुताबिक, बिहार की 13 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना की खेती होती है। बिहार के दरभंगा क्षेत्र में मखाना उत्पादन को देखते हुए मखाना अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। इस केंद्र के स्थापित होने के बाद मखाना की खेती में बदलाव जरूर आया है। मखाना अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. राजवीर शर्मा ने बताया कि नई तकनीक से मखाना की पैदावार बढ़ी है। उनका कहना है कि आमतौर पर यहां के तालाबों में गहराई अधिक होती है, जिस कारण काफी बीज तालाब में ही रह जाता है। उन्होंने बताया कि मिथिलांचल और इसके आसपास के इलाकों में प्रतिवर्ष 13 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना की खेती होती है, इसमें 90 हजार टन बीज का उत्पादन होता है। इतने बीज से किसान लगभग 35 हजार टन लावा तैयार करते हैं। डॉ. शर्मा ने बताया कि मखाना की खेती पारंपरिक रूप से तालाबों में की जाती है, लेकिन हाल के दिनों में अनुसंधान

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सेवा क्षेत्र किसी अन्य क्षेत्र की अपेक्षा कहीं ज्यादा नौकरियां प्रदान करता है- सुरेश प्रभु

बिहार के मिथिला क्षेत्र में हजारों परिवार की आय का साधन मखाना है, लेकिन इन लोगों के विकास के लिए बेहतर नीति और बाजार की जरूरत है केंद्र के वैज्ञानिकों ने एक नई प्रजाति 'स्वर्ण वैदेही' विकसित किया है, जिसकी खेती खेतों में भी की जा सकेगी। उन्होंने बताया कि कृषि वैज्ञानिक डॉ. लोकेंद्र कुमार और डॉ. विनोद कुमार ने शोध में इस प्रजाति की खोज की है। उनका कहना है कि अब खेतों में ही एक फीट जलभराव कर मखाना उत्पादन किया जा सकता है। आमतौर पर मखाना की फसल तैयार होने में 10 महीने का समय लगाता है, लेकिन इस विधि से फसल भी जल्द तैयार होगी और उत्पादन में भी वृद्धि होगी। आमतौर पर तालाब में मखाना की रोपाई नवंबर-दिसंबर में होती है। स्वर्ण वैदेही की रोपाई दिसंबर में होगी और फसल अगस्त महीने में तैयार हो जाएगी। इन वैज्ञानिकों का दावा है कि इस विधि से मखाना उत्पादन में खर्च भी कम आएगा और उत्पादन अधिक होगा। वैसे, मिथिलांचल के लोग भी मानते हैं कि मिथिलांचल के आर्थिक उन्नति में जलीय उत्पादों की अहम भूमिका है, लेकिन यहां के लोग इसे लेकर कई समस्याएं भी बताते हैं। दरभंगा स्थित एमआरएम कॉलेज के प्राचार्य प्रो. विद्यानाथ झा ने कहा कि मिथिला के जलीय उत्पादों को अनुसंधान कर और बेहतर बनाया जाना चाहिए। स्वरोजगार के इच्छुक युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ा जाए। जलीय उत्पादों की बदौलत यह क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध बनेगा। उन्होंने कहा कि मिथिला की पहचान में शुमार पान, मखाना और मछली तीनों का उत्पादन प्रभावित हो चुका है। मिथिलांचल का मुख्य उद्योग यहां के जलीय उत्पाद हैं। इनके उत्पादन में कमी का मुख्य कारण मार्केटिंग में आनेवाली बाधाएं हैं। अगर यहां के मखाना-मछली, सिंघारा आदि की बेहतर ढंग से मार्केटिंग की जाए तो मिथिला भी समृद्धशाली बन सकती है। मखाना के प्रसिद्ध व्यवसायी राजकुमार सहनी ने बताया कि मिथिलांचल का मखाना देश से निर्यात होता है, लेकिन उसका लाभ यहां के किसानों को नहीं मिलता। उनका कहना है कि मखाना के निर्यात से देश को प्रतिवर्ष 22 से 25 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। उन्होंने बताया कि यहां के व्यापारी मखाना दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश भेजते हैं। एक अन्य व्यापारी भरत सहनी की मानें, तो मखाना से लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। मखाना की प्रोसेसिंग के अलावा पैकिंग कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दरभंगा के बाजार में इस जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के किसान आकर अपना मखाना बेच देते हैं। ऐसे में उन्हें कम लाभ होता है। उनका मानना है कि अगर इस क्षेत्र में बड़े निवेशक आ जाएं, तो किसानों को आर्थिक राहत मिलेगी। बहरहाल, यहां के किसान तो किसी तरह मखाना का उत्पादन कर मिथिलांचल को मखाना के क्षेत्र में प्रसिद्धि दिला रहे हैं, लेकिन इनकी समस्याओं पर भी विचार करने की जरूरत है। (आईएएनएस)

गुड न्यूज

से

वा क्षेत्र जहां अर्थव्यवस्था को संचालित कर रहा है, वहीं केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने इस प्रमुख क्षेत्र में गुणवत्ता क्रांति पर जोर दिया है, क्योंकि यह क्षेत्र ज्यादा नौकरियां प्रदान करता है। भारतीय उद्योग के 25वें राष्ट्रीय गुणवत्ता सम्मेलन को यहां वीडियो से संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘सेवा क्षेत्र में गुणवत्ता क्रांति हमारी प्राथमिकता है, क्योंकि यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था को संचालित करता है। यह किसी अन्य क्षेत्र की अपेक्षा कहीं ज्यादा नौकरियां प्रदान करता है।’

भारतीय उद्योग प र ि सं घ ( स ी आ ई आ ई ) और वैश्विक ऑडिट सेवा मुहैया करानेवाली कंपनी केपीएमजी की एक संयुक्त रपट के मुताबिक, भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान सेवा क्षेत्र का योगदान 61 फीसदी था। प्रभु ने कहा, ‘गुणवत्ता आंदोलन भारत की अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा का आधार है। सेवा और विनिर्माण क्षेत्र के व्यवसायों को उनके प्रदर्शन को दुनिया में सबसे बेहतर से बेंचमार्क करना चाहिए और घरेलू और वैश्विक बाजारों की सेवा करनी चाहिए।’ सेवा क्षेत्र के साथ विनिर्माण क्षेत्र में उनके आह्वान को आगे बढ़ाते हुए कर्नाटक के आईटी और बॉयोटेक मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा कि कौशल विकास गुणवत्ता और नवीनता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (एजेंसी)

गेहूं की पैदावार तीन गुना बढ़ी 2016-17 में गेहूं का उत्पादन प्रति एकड़ तीन से चार गुना बढ़ गया

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से गेहूं के उत्पादन में यूरिया के इस्तेमाल में आधी कटौती करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उचित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने के रबी सीजन 2016-17 में गेहूं का उत्पादन प्रति एकड़ तीन से चार गुना बढ़ गया। रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात ' के 38वें संस्करण में मोदी ने कहा, ‘किसान पहले अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते थे जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति घटती गई और इस तरह उपज घट गई और परिणामस्वरूप किसानों की आय कम होती चली गई।’ प्रधानमंत्री ने कहा, ‘रबी सीजन 2016-17 में गेहूं

की पैदावार में प्रति एकड़ तीन से चार गुनी बढ़ोतरी हो गई और किसानों की आय में भी 4,000 से 6,000 रुपये प्रति एकड़ का इजाफा दर्ज किया गया। इसके अलावा मृदा की गुणवत्ता में सुधार आया। उर्वरकों के उपयोग में कटौती से पैसे की बचत होती है।’ उन्होंने किसानों से नाइट्रोजन युक्त उर्वरक यूरिया के उपयोग में कटौती करने की अपील की। आमतौर पर यूरिया का इस्तेमाल किसान व्यापक स्तर पर करते रहे हैं। मोदी ने कहा, ‘हमारे किसान, जोकि धरतीपुत्र हैं, यह संकल्प लेंगे कि 2022 तक, जब हम आजादी की 75वीं साल गिरह मना रहे होंगे, वे यूरिया का इस्तेमाल आज जितना कर रहे हैं उसमें आधी कटौती करेंगे।’ प्रधानमंत्री ने आगे कहा, ‘अगर हमारे किसान भाई ऐसा संकल्प लेंगे तो हम धरती माता के स्वास्थ्य में सुधार पाएंगे और इससे पैदावार में भी बढ़ोत्तरी होगी।’ (आईएएनएस)


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04 - 10 दिसंबर 2017

फ्रांस में लगेगी बिल्ली की प्रतिमा

पशु-पक्षी भी करते हैं तर्क शक्ति का प्रयोग वैज्ञानिकों द्वारा किए एक अध्ययन में अब ये सामने आया है कि कौआ समेत हाथी, चिंपांजी और शेर में तार्किक शक्ति होती है

पने बचपन में वो कहानी तो जरूर पढ़ी होगी, जिसमें एक प्यासा कौआ पानी पीने के लिए भटकते हुए एक घड़े के पास पहुंचता है। वह घड़े में पत्थर डालता है, जिससे पानी ऊपर आ जाता है। उस समय तो हमें ये केवल एक कहानी लगी, लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा किए एक अध्ययन में अब ये सामने आया है कि कौआ समेत हाथी, चिंपांजी और शेर में तार्किक शक्ति होती है। इसका प्रयोग वे निर्णय लेने और परेशानी की

स्थिति से निकलने के लिए करते हैं। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन के शोधकर्ताओं के मुताबिक, फैसला लेने, किसी लक्ष्य को पाने या उसे प्राप्त करने से पहले के क्रियाकलाप से पहले ये जानवर ‘कार्यकारी नियंत्रण’ का प्रयोग करते हैं। पहले के अध्ययनों में ये सामने आ चुका है कि किस प्रकार पशु- पक्षी किसी विशेष घटना को किस प्रकार याद रखते हैं और किसी परेशानी को हल करने के लिए कैसे टूल्स का प्रयोग करते हैं। (एजेंसी)

आईओएस डिवाइस में वाट्सएप्प पर चलेगा यूट्यूब

इस अपडेट से यूजर्स वीडियो देखते हुए अन्य के साथ चैट भी कर सकेंगे

ईओएस डिवाइसों के लिए एक नया अपडेट जारी किया गया है, जिससे अब यूजर्स यूट्यूब विडियो को सीधे मैसेंजिंग एप्प वाट्सएप्प में चला सकेंगे। इस अपडेट से यूजर्स विडियो देखते हुए अन्य के साथ चैट भी कर सकेंगे। यह जानकारी एप्पस्टोर पर प्रकाशित की गई थी। एप्पस्टोर पर नए अपडेट के बारे में बताया गया,

‘जब आपको यूट्यूब विडियो का कोई लिंक मिलता है, तब आप सीधे वाट्स एप्प के अंदर ही प्ले कर सकते हैं। यह पिक्चर इन पिक्चर को सपोर्ट करता है, जिससे आप विडियो देखते हुए अन्य लोगों से चैट भी कर सकते हैं।’ इससे पहले, जब यूजर किसी लिंक पर क्लिक करता था, तो यूट्यूब विडियो स्मार्टफोन में इंस्टाल यूट्यूब एप्प में खुलता था। इसके साथ ही अब नए अपडेट के बाद लंबी अवधि के वॉयस मैसेज भी रिकार्ड किए जा सकेंगे। विवरण में कहा गया है, ‘क्या आप आसानी से लंबे वॉयस मैसेज रिकार्ड करना चाहते हैं? अब एक स्वाइप से रिकार्डिग को लॉक किया जा सकता है, जिसके बाद ऊंगली हटाने के बाद भी रिकार्डिग होती रहेगी।’ इसके अलावा वाट्स एप्प एक नए फीचर पर भी काम कर रहा है, जो वॉयस कॉल के दौरान विडियो कॉल पर जल्दी से जाने में सक्षम करेगा। हालांकि प्राप्तकर्ता अगर विडियो कॉल पर नहीं आना चाहे तो उसे अस्वीकार करने की सुविधा मिलेगी। भारत में वाट्सएप्प के 20 करोड़ से ज्यादा मासिक सक्रिय यूजर्स हैं और दुनिया में 1.2 अरब से ज्यादा यूजर्स हैं। (आईएएनएस)

समय पर शौचालय नहीं बने, तो एफआईआर

त्तर प्रदेश के मैनपुरी में अगर समय सीमा में शौचालय नहीं बने तो संबंधित के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ ही रिपोर्ट दर्ज होगी। शौचालय निर्माण नहीं होने पर धनराशि की रिकवरी भी की जाएगी। यह बातें जिला परियोजना समन्वयक नीरज शर्मा ने कहीं। विकास भवन के डीपीआरओ कक्ष में हुई स्वच्छ शौचालय निर्माण की समीक्षा बैठक

में जिला परियोजना समन्वयक ने कहा स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण शासन की वरीयता का कार्यक्रम है। शौचालय बनवाने के लिए एडीओ पंचायत, पंचायत सचिव, खंड प्रेरक, रोजगार सेवक के साथ ही स्वच्छाग्रही को भी जिम्मेदारी के साथ ही लक्ष्य भी दिया गया है। दो अक्तूबर 2019 तक जिले को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जाना है। (एजेंसी)

अं

अंतरिक्ष में यात्रा करने वाली विश्‍व की पहली बिल्‍ली फैलिकेट की कांस्‍य की प्रतिमा जल्‍द ही फ्रांस में नजर आएगी

तरिक्ष में यात्रा करने वाली इस बिल्‍ली की यादों को सहेजने के लिए एक फंड अभियान चलाया गया। 18 अक्‍टूबर 1963 को फैलिकेट को एक रॉकेट में बैठाकर अंतरिक्ष में भेजा गया था। यह रॉकेट पृथ्‍वी से 157 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया था। यहां बिल्‍ली को भारहीनता का अनुभव कराया गया। 15 मिनट बाद उसे सुरक्षित तरीके से स्‍पेस कैप्‍सूल की मदद से वापस धरती पर लाया गया। नीचे आने पर वह सही सलामत थी। इसके बाद उसी दशक में क्रमवार रूप से बंदर, चिंपाजी, कुत्‍ता आदि जानवरों को भी स्‍पेस में भेजा गया। फंड जुटाने वाली वेबसाइट के क्रिएटिव डायरेक्‍टर मैथ्‍यू सर्ज ने बताया कि छह महीने पहले हमें इस बिल्‍ली की अंतरिक्ष यात्रा की पचासवीं सालगिरह के बारे में पता चला। हालांकि जिस माध्‍यम से यह पता चला उसमें बिल्‍ली के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। फिर इसके बारे में गूगल पर जानकारी जुटाई गई और हमें पूरी कहानी के बारे में पता चला। यही समय है कि अब हम कुछ अच्‍छा और बड़ा करें ताकि

फैलीकेट को सच्‍ची श्रद्धांजलि दी जा सके। स्‍पेसयान के शुरुआती दिनों में अक्‍सर प्रयोग के लिए जानवरों को भेजा जाता था ताकि ग्रेविटी के प्रभावों को जाना जा सके। फैलीकैट का चयन 14 बिल्लियों के बाद किया गया था। इसके लिए उसे ट्रेनिंग भी दी गई थी। इस मिशन के लिए सभी बिल्लियों को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा था। आखिरकार फैलीकेट ने अपना जीवन इस मिशन में दे दिया। उसकी यादों को संजोने के लिए अब उसकी प्रतिमा लगाई जाने वाली है। इसके लिए अभी तक 24 हजार पाउंड की धनराशि जुटा ली गई है। (एजेंसी)

गदहा और खच्चर की अलग-अलग गिनती 20वीं पशुगणना में गदहा गिनती से गायब नहीं होंगे। 2012 में हुई 19वीं पंचवर्षीय पशुगणना में गदहा की अलग से गिनती नहीं की गई

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हार में 20वींपशुगणना में गदहे गिनती से गायब नहीं होंगे। 2012 में हुई 19वीं पंचवर्षीय पशुगणना में गदहे की अलग से गिनती नहीं की गई थी। पिछली गलती को इस साल पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग नहीं दोहराएगा। पिछली पशुगणना में गदहा का अलग से कॉलम नहीं दिया गया था, बल्कि खच्चर के साथ ही इसकी गिनती कर ली गई थी। इस कारण राज्य में कितने गदहे हैं, यह पता नहीं चल सका था। इस साल गदहा सहित सभी महत्वपूर्ण पशुओं का कॉलम होगा। जुलाई से शुरू हुई पशुगणना दिसंबर के अंत तक पूरा होने वाला है। 2012 की पशुगणना रिपोर्ट में कुल पशुओं में दुधारू पशुओं की संख्या 60 प्रतिशत है,

बिहार में पशुओं की संख्या

कुल पशु : 329.39 लाख गाय : 122.22 लाख भैंस : 75.67 लाख बकरा-बकरी : 1.15 करोड़ भेड़ : 2.38 लाख मुर्गा-मुर्गी : 83.87 लाख सूअर : 5.50 लाख बत्तक : 2.40 लाख घोड़ा : 36 हजार खरगोश : 15.5 हजार खच्चर : 12.5 हजार हाथी : 101

जबकि जोत वाले पशु बैलों की संख्या कम हुई है। हर पांच साल पर पूरे देश में पशुगणना होती है। केंद्र ही पशुगणना के लिए आवश्यक राशि भी उपलब्ध कराती है। पशुगणना में करीब 7 हजार लोग शामिल हैं। इसमें टैब का उपयोग किया जा रहा है। पशुपालन निदेशालय ने केंद्र को पशुगणना संबंधी प्रोजेक्ट पहले ही भेज दिया था। ग्रामीण क्षेत्र में 4500 घरों और पहाड़ी क्षेत्र में पशुओं की गिनती के लिए एक प्रगणक नियुक्त किया गया है। 2012 की पशुगणना के अनुसार खगड़िया के लोग घोड़े के शौकीन हैं। अररिया में सबसे अधिक गाय हैं, जबकि शिवहर में गाय और कुत्ते दोनों ही सबसे कम हैं। मोतिहारी में सबसे ज्यादा बकरी है। (एजेंसी)


04 - 10 दिसंबर 2017

जेंडर

बेटियां सुधार रहीं छवि

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लिंगानुपात में पिछड़े हरियाणा की बेटियां कई क्षेत्रों में कामयाबी का परचम लहरा रही हैं

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जयदीप सरीन

नेमा में सफलता, अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में मेडल जीतने, माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने और अब विश्व सुंदरी का ताज जीतने के बाद देश में सबसे ज्यादा खराब लिंगानुपात के साथ 'लड़कियों की हत्या' करने के लिए कुख्यात राज्य हरियाणा अब राज्य की बदनामी से आगे बढ़कर नई कहानी लिख रहा है। रोहतक में जन्मी और प्रभावशाली व रूढ़िवादी जाट समुदाय से तालुक रखने वाली 21 वर्षीय मानुषी छिल्लर ने 2017 का विश्व सुंदरी का खिताब जीता, जिससे राज्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर

परचम फैलाने में महिलाओं के उल्लेखनीय योगदान की ओर दोबारा ध्यान केंद्रित हुआ। हरियाणा में महिलाओं को किस तरह की परेशानी झेलनी पड़ती है, यह सभी जानते हैं। पिछले वर्ष तक, राज्य में पूरे भारत में सबसे कम लिंगानुपात दर्ज किया गया था। यहां प्रति 1000 पुरुषों पर केवल 850 महिलाएं थीं। राज्य में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार अब यहां लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 930 महिलाएं होने का दावा कर रही है। इस वर्ष की शुरुआत में, सरकार की एक आधिकारिक पत्रिका ने महिलाओं को घूंघट लिए हुए दिखाया

तालीम की राह पर लड़कियां

था, जिसका राज्य की सफल महिलाओं व संगठनों ने जोरदार विरोध किया था और कहा था कि राज्य अभी भी महिलाओं को पुराने ढंग से पेश कर रहा है। मानुषी की सफलता केवल विश्व सुंदरी या इससे पहले फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीतने तक निर्भर नहीं है। वह सोनीपत जिले के ग्रामीण क्षेत्र में सरकारी कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं और हृदय संबंधी सर्जन बनना चाहती हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, मानुषी एक कवयित्री, पेंटर व डांसर भी हैं। उनकी फैशन व ब्यूटी क्षेत्र में भी रुचि है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वाली पहलवान बहनें गीता और बबीता फोगाट की कहानी व संघर्ष को आमिर खान की फिल्म 'दंगल' में सही तरीके से दिखाया गया। इस फिल्म ने देश में ही नहीं, हांगकांग और चीन में भी जबरदस्त कमाई की। एक और महिला पहलवान साक्षी मलिक ने भी वर्ष 2016 रियो ओलंपिक में कास्य पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया था। पर्वतारोही संतोष यादव माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला थीं। वह कठिन

कांगशुंग फेस पर भी चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला थीं। भारतीय हॉकी महिला टीम में भी हरियाणा की खिलाड़ी अधिक संख्या में मौजूद हैं। कप्तान ममता खरब और सुमन बाला, जसजीत कौर, सुरिंदर कौर, प्रीतम रानी व सीता गुसैन जैसी खिलाड़ी हरियाणा से ही हैं। पूर्व मिस इंडिया व बॉलीवुड अभिनेत्री जुही चावला, परिणीति चोपड़ा व मल्लिका शेहरावत का जन्म भी हरियाणा में हुआ है, ऐसे राज्य में जहां बच्ची के भ्रूण की हत्या मां के पेट में करना आम बात है। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सायना नेहवाल के परिवार की जड़ें भी हरियाणा से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1997 में नासा अंतरिक्ष मिशन पर जाकर कल्पना चावला ने राज्य को गौरव का क्षण प्रदान किया था। लेकिन 2003 में दोबारा इस मिशन को पूरा कर वापस लौटते वक्त वह दुर्घटना का शिकार हो गई थीं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी हरियाणा के अंबाला से हैं। इन महिलाओं की उपलब्धियों से राज्य में बहुत समय से स्थापित रुढ़िवादी वर्जनाओं को तोड़ने में मदद मिली है।

आबिदी कहती हैं, ‘1990 के दशक की शुरुआत में जब वह मुंबई विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थीं, तब विश्वविद्यालय में वह अकेली लड़की थी जो हिजाब पहनती थी, लेकिन आज कई संस्थानों में हिजाब पहने बहुत सारी लड़कियां दिखती हैं।’ उन्होंने बताया कि जब वह पढ़ती थी तो उसी कॉलेज में लड़कों के चार डिवीजन थे, जबकि लड़कियों का एक डिवीजन। आज स्थिति ठीक विपरीत है। लड़कियों के चार डिवीजन हैं जबकि लड़कों का एक। उधर, ताइवान स्थित नेशनल चुंग सिंग यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय संबंध में पीएचडी कर रहीं सादिया रहमान का मानना है कि गरीबी और वित्तीय संकट जैसी समस्याएं मुस्लिम समाज की लड़कियों की शिक्षा की राह में बाधक है, जिसके चलते वे आधुनिक शिक्षा महरूम रह जाती हैं। इस्लामिक

शिक्षा प्रणाली में छात्र व छात्राओं के लिए अलगअलग कक्षाएं लगनी चाहिए और कई लोगों का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं की निम्न साक्षरता दर की एक वजह यह भी है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में एक कॉलेज के संचालक नियाज अहमद दाउदी कहते हैं कि उन्होंने लड़कियों के लिए गांव में कॉलेज इसलिए खोला है क्योंकि लड़के दूर जा सकते हैं वे दूर नहीं जा सकती हैं। उनका मानना है कि आसपास में स्कूलों व कॉलेजों का नहीं होना भी एक बड़ा मसला है जिसके कारण लड़कियां पढ़ नहीं पाती हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुस्लिम महिला साक्षरता दर आजमगढ़ जिले में 73.01 फीसदी है, लेकिन छोटी जगह होने के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करना यहां की लड़कियों के लिए कठिन हो जाता है।

लड़कियों को पढ़ाने के प्रति मुस्लिम समाज का रुझान बढ़ा है। मुस्लिम लड़कियों ने अपनी कामयाबी से अपने समाज के लोगों को प्रेरित किया

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आईएएनएस

हार के कटिहार जिले की गृहिणी और दो बेटों की मां गजाला तस्नीम के लिए 31 अक्टूबर का दिन खास था क्योंकि इस दिन उसका सपना साकार हुआ था। तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद वह बिहार न्यायिक सेवा प्रतियोगिता परीक्षा में 65वें स्थान के साथ उसका चयनित हुई थीं। जज की कुर्सी पर बैठने का उसका ख्वाब पूरा था। गजाला अपनी इस कामयाबी के लिए खुद को अल्लाह का शुक्रगुजार मानती हैं। वह कहती हैं, पति और परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से मिले सहयोग और प्रेरणा की बदौलत आखिरकार वह मनचाही कामयाबी हासिल कर सकीं। आज भी यह धारण बनी हुई है कि मुस्लिम महिलाएं विरले ही उच्च शिक्षा या प्रतियोगिता परीक्षा के प्रति मुखातिब होती है। शादी और बच्चे होने के बाद महिलाओं के लिए सामाजिक समस्याएं और भी बढ़ जाती हैं। लेकिन तस्नीम जैसी महिलाएं इस रूढ़िवादी धारणा को तोड़ रही हैं। इंडोनेशिया के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान भारत में ही बसते हैं। देश की कुल आबादी एक अरब 34 करोड़ में 14.2 फीसदी मुसलमान हैं और 2011 की जनगणना के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं की आधी आबादी निरक्षर है।

लेकिन तस्नीम जैसी महिलाओं का मानना है कि स्थिति तेजी से बदल रही है और शिक्षा के प्रति समाज की बालिकाएं अब ज्यादा उत्साहित दिखने लगी हैं। तस्नीम कहती हैं, ‘कानून व न्याय के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं व लड़कियों की संख्या अभी भी बहुत कम है। लेकिन हालात बदल रहे हैं और अब भारी तादाद में मुस्लिम समाज की लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं।’ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर जेबुन निसा खान का कहना है कि स्थिति में बदलाव आ चुका है। उन्होंने कहा, ‘चलन नहीं बदल रहा, बल्कि यह बदल चुका है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों में मुस्लिम समाज की लड़कियों की संख्या काफी बढ़ी है।’ उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर में वृद्धि हो रही है, लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में और सुधार की जरूरत है। मुंबई स्थित महाराष्ट्र कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स में फिजिक्स यानी भौतिकी पढ़ाने वाली मूनिशा बुशरा आबिदी कहती हैं कि लड़कियों को पढ़ाने के प्रति मुस्लिम समाज का रुझान बढ़ा है, इसका एक कारण है कि समाज की लड़कियों ने अपनी कामयाबी से समाज के लोगों को प्रेरित किया है और अब माता-पिता अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाने के प्रति उत्साहित दिखने लगे हैं।


16 खुला मंच

04 - 10 दिसंबर 2017

प्रियंका तिवारी

‘हमारी गलतियां हमारे अनुभव हैं। हमें इनका भविष्य में लाभ लेना सीखना चाहिए’ - सी. राजगोपालाचारी

अभिमत

डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति दिवस, 6 दिसंबर

दलितों का अर्थ उद्यम बीते दो-तीन दशकों में समाज और बाजार ने जो नई स्थिति बनाई है उसमें दलितों ने भी अपनी अनुकूलता तलाश ली है

अब सपना नहीं सबको घर 2

लेखिका युवा पत्रकार हैं और देश-समाज से जुड़े मुद्दों पर प्रखरता से अपने विचार रखती हैं

शहरी गरीबों के लिए 1,12,083 अतिरिक्त किफायती घरों के निर्माण को सरकारी मंजूरी

022 तक सभी के लिए मकान सुनिश्चित करने के लक्ष्य को लेकर जून, 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के लागू हुए दो साल हो गए। इस योजना के तहत शहरी क्षेत्रों में करीब 1.2 करोड़ आवास मंजूर किया जाना है। हाल में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत शहरी गरीबों के लिए 1,12,083 अतिरिक्त किफायती घरों के निर्माण को मंजूरी दे दी गई है। इस पर 1,681 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता के साथ कुल 8,105 करोड़ रुपए का खर्च होगा। यह मंजूरी केंद्रीय अनुमोदन और निगरानी समिति (सीएसएमसी) की 28वीं बैठक में दी गई। दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में एक साल में रिकॉर्ड दस लाख घरों का निर्माण किया गया है। इस योजना के तहत 31 मार्च 2019 तक एक करोड़ नए घरों का निर्माण सुनिश्चित किया जाना है। इनमें से 31 मार्च 2018 तक 51 लाख मकान बनाए जाने हैं। इस चुनौती को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत 51 लाख आवास मार्च 2018 तक बनाने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ मिलकर कई कदम उठा रहा है। इसके लिए मासिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है, ताकि आवासों का निर्माण किया जा सके। नवंबर, 2017 तक 10 लाख घर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लक्ष्य की अंतिम तिथि से पहले ही 29 नवंबर, 2017 को यह लक्ष्य पूरा कर लिया गया। आशा व्यक्त की जा रही है कि 31 दिसंबर, 2017 तक 15 लाख घरों का निर्माण हो जाएगा। 31 जनवरी, 2018 तक 25 लाख, 28 फरवरी, 2018 तक 35 लाख और 31 मार्च, 2018 तक 51 लाख घरों के निर्माण हो जाने की आशा व्यक्त की जा रही है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

डॉ

. आंबेडकर बराबर दलितों को शिक्षित और संगठित होने पर जोर देते थे। उनके निधन के छह दशक बाद स्थिति यह है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से दबे-कुचले दलित अब व्यवसाय की दुनिया में भी मुक्कमल जगह बना रहे हैं। दलित उद्यमियों ने फिक्की, एसोचैम और सीआईआई की तर्ज पर अपना संगठन बना लिया है- दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री यानी डिक्की। डिक्की के संस्थापक मिलिंद कांबले अगले एक दशक में दलित उद्यमियों की सफलता को कुबेरी आंकड़े में देखते हैं और फख्र के साथ कहते हैं कि वो दिन अब लदने वाला है, जब अरबपतियों की सूची में दलित नाम ढूंढे नहीं मिलते थे। जो शुरुआत डिक्की और देश के कुछ महत्वाकांक्षी दलित कारोबारियों के साथ हुई है, भविष्य में वह देश के जीडीपी के आंकड़े को ऊपर-नीचे करने की ताकत बनेगा, यह यकीन आज कुछ अर्थ पंडितों को ही नहीं, कई गंभीर समाज विज्ञानियों को भी है। दलित यदि उद्यमिता की तरफ मुड़े हैं तो तो इसकी एक बड़ी वजह सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के मौकों में लगातार कमी आना और आरक्षण के रास्ते एक सीमा से से ज्यादा आगे बढ़ने की सच्चाई का रेखांकित होना है। 1997 में सार्वजनिक क्षेत्र में जहां 197 लाख रोजगार थे,

वहीं गिरावट के साथ 2007 में यह आंकड़ा 180 लाख पर आ गया। रोजगार न होने की स्थिति में अब दलित युवक भी अपने बूते कुछ करने की ठान उद्यमी बन रहे हैं। सरकार के कुछ सुधारवादी कदमों ने दलित उद्यमशीलता के लिए नई अनुकूलताएं बढ़ाई हैं। खुदरा बाजार में एफडीआई का भारत में दलित उद्यमियों की नई खेप पर सकारात्मक असर हो रहा है। आम अनुभव यही है कि पारंपरिक खुदरा क्षेत्र दलित उद्यमियों के लिए ज्यादा अवसर मुहैया नहीं कराता है। एफडीआई अपने गठन में तो उदार और आधुनिक आधुनिक है ही, यह पूरी तरह जाति निरपेक्ष भी है। डॉ. आंबेडकर इस बात की शिकायत हमेशा करते रहे कि सामाजिक बेड़ियां दलितों को किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोकती हैं। नव-उदारवाद को तो यह श्रेय दिया ही जाता है कि इसने सामाजिक विभाजन की लकीरों को किसी सामाजिक आंदोलन से भी ज्यादा प्रभावी तरीके से मिटाया है। यह बात कई शोधों से भी जाहिर हुई है। दलित चिंतक डा. चंद्रभान प्रसाद ने भी अपने एक शोध में पाया कि आर्थिक उदारीकरण का दौर दलितों और खास तौर से दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद रहा है। इस दौर में उन्हें तमाम क्षेत्रो में अपने लिए जगह बनाने का मौका मिल रहा है। नब्बे के दशक में देश में सामाजिक न्याय की जिस राजनीति ने जोर पकड़ा, उसने दलितों के अस्मितावादी संघर्ष को तो जरूर एक अंजाम तक पहुंचाया, पर इससे दलित उद्यम को किसी तरह का कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। आलम यह रहा है कि दलितों के आगे आजादी के पूर्व और उसके बाद भी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक नेतृत्व का संकट कतई नहीं रहा। हां, व्यापारिक नेतृत्व का संकट जरूर वे लंबे समय से झेल रहे हैं। डिक्की स्थापना इस संकट को काफी हद तक समाप्त करता है। डिक्की के अब तक कई राज्यों में चैप्टर खुल चुके हैं और पूरे देश में कई हजार सदस्य बन चुके हैं। डिक्की की स्थापना का ब्लूप्रिंट तैयार

सरकार के कुछ सुधारवादी कदमों ने दलित उद्यमशीलता के लिए नई अनुकूलताएं बढ़ाई हैं। खुदरा बाजार में एफडीआई का भारत में दलित उद्यमियों की नई खेप पर सकारात्मक असर हो रहा है


04 - 10 दिसंबर 2017 करने वालों मंथ आगे रहे चंद्रभान प्रसाद कहते भी हैं- ‘हम भी बाबा साहब आंबेडकर की तरह सूट पहनते हैं। अंग्रेजी बोलते हैं। हम अपने दम पर आगे बढ़ना चाहते हैं। इतिहास की जड़ें चूंकि गहरी होती हैं, सो इसकी शाखाएं-प्रशाखाएं सदियों पार तक विस्तार पाती जाती हैं। भारत में दलित संघर्ष का सबसे ज्यादा जोर शुरू से महाराष्ट्र में रहा है। इसलिए नई बनी सूरत में भी महाराष्ट्र में ही दलित उद्यमी सबसे ज्यादा तेजी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। वहां एक दलित उद्यमी निर्माण क्षेत्र की कंपनी के मालिक हैं, जिसका सालाना कारोबार सौ करोड़ के करीब है। इस तरह की और भी कई मिसालें हैं। एक अच्छी बात इन दलित उद्यमियों के साथ यह भी है कि वे महज अपने कारोबार को कुबेरी कामयाबी में तब्दील होते नहीं देखना चाहते, बल्कि वे इसके साथ अपने समाज के लोगों को रोजगार भी देना चाहते हैं। कोई अपने साथ 250 कर्मचारियों की टीम लेकर चल रहा है तो कोई अपनी कारोबारी सफलता से हजारों दलित उद्यमियों का आइकन बन रहा है। डिक्की की स्थापना के बाद से नए स्टार्ट अप आइडिया के साथ कई ऐसे दलित युवक सामने आए हैं, जिन्होंने तेजी से सफलता के डग भरने शुरू कर दिए हैं। तीन सौ दलित कारोबारियों से मिलकर बनी डिक्की का सालाना टर्नओवर पांच हजार करोड़ रुपए की सीमा तीन साल पहले ही पार कर गया था। इसके साथ देशभर के दलित उद्यमी लगातार जुड़ रहे हैं। डिक्की कई ऐसे बिजनस एक्सपो भी कर रहा है जो दलित उद्यमियों को बड़े स्तर पर अपने कौशल को सोकेश करने का मौका देता है। देश में बदली यह फिजा बहुत कुछ कहती है। महज छह दशक तक इसी देश में दलितों के सबसे बड़े मसीहा डॉ. आंबेडकर चीख-चीखकर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। कह रहे थे कि लोकतंत्र और संविधान इस भेदभाव को कम जरूर करेगा, पर इसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए दलितों को शिक्षित होना होगा, संगठित होना होगा और देश-समाज में अपनी जगह बनाने के लिए भरोसे के साथ आगे बढ़ना होगा। यह सपना महज बाबा साहेब का नहीं, बल्कि देश की स्वाधीनता से भी जुड़ा था, क्योंकि देश में दलित चेतना की अलख तो स्वाधीनता संघर्ष के साथ ही शुरू हो गई थी। आज आजादी के सात दशक बाद देश में यह स्थिति है कि देश के 20 करोड़ दलित अपने उत्थान के लिए चेतना के एक नए राजमार्ग पर तेजी से आगे बढ़ते जा रहे हैं। जिस दौर में विकास को समावेशी होने की दरकार सबसे प्रबल है, उसमें दलितों के लिहाज से अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है। देश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी छठे हिस्से के बराबर है, पर उनके पास देश की संपत्ति का सिर्फ एक फीसद हिस्सा है। संतोषप्रद बस यही है कि बीते दो-तीन दशकों में समाज और बाजार ने जो नई स्थित बनाई है, उसमें दलितों ने भी अपनी अनुकूलता तालाश ली है। यह अलग बात कि इस अनुकूलता को बदलाव का तारीखी हर्फ बनने में अभी कुछ समय और लगेगा। भविष्य में जैसे-जैसे सामाजिक गैरबराबरी की दीवारें टूटेंगी, दलित उद्यम का सफर और तेजी से आगे बढ़ेगा।

ल​ीक से परे

खुला मंच

डॉ. भीमराव आंबेडकर

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संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष और देश के पहले विधि मंत्री

संविधान निर्माण का असाधारण कार्य

सं

संविधान सभा के समापन भाषण में डॉ. आंबेडकर ने इस कार्य के असाधारण महत्व को रेखांकित किया

विधान सभा के कार्य पर नजर डालते हुए 9 दिसंबर,1946 को हुई उसकी पहली बैठक के बाद अब दो वर्ष, ग्यारह महीने और सत्रह दिन हो जाएंगे। इस अवधि के दौरान संविधान सभा की कुल मिलाकर 11 बैठकें हुई हैं। इन 11 सत्रों में से छह उद्देश्य प्रस्ताव पास करने तथा मूलभूत अधिकारों पर, संघीय संविधान पर, संघ की शक्तियों पर, राज्यों के संविधान पर, अल्पसंख्यकों पर, अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों पर बनी समितियों की रिपोर्टों पर विचार करने में व्यतीत हुए। सातवें, आठवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें सत्र प्रारूप संविधान पर विचार करने के लिए उपयोग किए गए। संविधान सभा के इन 11 सत्रों में 165 दिन कार्य हुआ। इनमें से 114 दिन प्रारूप संविधान के विचारार्थ लगाए गए। प्रारूप समिति की बात करें तो वह 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा द्वारा चुनी गई थी। उसकी पहली बैठक 30 अगस्त को हुई थी। 30 अगस्त से 141 दिनों तक वह प्रारूप संविधान तैयार करने में जुटी रही। प्रारूप समिति द्वारा आधार रूप में इस्तेमाल किए जाने के लिए संवैधानिक सलाहकार द्वारा बनाए गए प्रारूप संविधान में 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं। प्रारूप समिति द्वारा संविधान सभा को पेश किए गए पहले प्रारूप संविधान में 315 अनुच्छेद और आठ अनुसूचियां थीं। उस पर विचार किए जाने की अवधि के अंत तक प्रारूप संविधान में अनुच्छेदों की संख्या बढ़कर 386 हो गई थी। अपने अंतिम स्वरूप में प्रारूप संविधान में 395 अनुच्छेद और आठ अनुसूचियां हैं। प्रारूप संविधान में कुल मिलाकर लगभग 7,635 संशोधन प्रस्तावित किए गए थे। इनमें से कुल मिलाकर 2,473 संशोधन वास्तव में

सदन के विचारार्थ प्रस्तुत किए गए। मैं इन तथ्यों का उल्लेख इसीलिए कर रहा हूं कि एक समय यह कहा जा रहा था कि अपना काम पूरा करने के लिए सभा ने बहुत लंबा समय लिया है और यह कि वह आराम से कार्य करते हुए सार्वजनिक धन का अपव्यय कर रही है। उसकी तुलना नीरो से की जा रही थी, जो रोम के जलने के समय वंशी बजा रहा था। क्या इस शिकायत का कोई औचित्य है? जरा देखें कि अन्य देशों की संविधान सभाओं ने, जिन्हें उनका संविधान बनाने के लिए नियुक्त किया गया था, कितना समय लिया। कुछ उदाहरण लें तो अमेरिकन कन्वेंशन ने 25 मई, 1787 को पहली बैठक की और अपना कार्य 17 सितंबर, 1787 अर्थात चार महीनों के भीतर पूरा कर लिया। कनाडा की संविधान सभा की पहली बैठक 10 अक्टूबर, 1864 को हुई और दो वर्ष पांच महीने का समय लेकर मार्च 1867 में संविधान कानून बनकर तैयार हो गया। ऑस्ट्रेलिया की संविधान सभा मार्च 1891 में बैठी और नौ वर्ष लगाने के बाद नौ जुलाई, 1900 को संविधान कानून बन गया। दक्षिण अफ्रीका की सभा की बैठक अक्टूबर 1908 में हुई और एक वर्ष के श्रम के बाद 20 सितंबर, 1909 को संविधान कानून बन गया। यह सच है कि हमने अमेरिकन

अच्छा करने प्रेरणा

‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को पढ़कर सिर्फ स्वच्छता के लिए ही नहीं, बल्कि इस समाज के लिए भी बहुत कुछ करने की प्रेरणा मिलती है। इस बात का अहसास मुझे ही नहीं, बहुत से लोगों को अखबार पढ़ने के बाद हुआ है। यही इस अखबार की सबसे बड़ी कामयाबी है। जो सामाजिक जागरूकता सुलभ ने फैलाई है, वैसे उदहारण बहुत कम देखने को मिलते हैं। मैं चाहता हूं कि ऐसे ही सुलभ की टीम हर तबके के लोगों तक पहुंचती रहे और बिना किसी भेद-भाव के हर छोटी-बड़ी खबर सब तक पहुंचाती रहे। क्योंकि सबका विकास ही स्वच्छ और बुलंद भारत की नींव है। ध्वजा प्रसाद, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

या दक्षिण अफ्रीकी सभाओं की तुलना में अधिक समय लिया। परंतु हमने कनाडियन सभा से अधिक समय नहीं लिया और ऑस्ट्रेलियन सभा से तो बहुत ही कम। संविधान-निर्माण में समयावधियों की तुलना करते समय दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। एक तो यह कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के संविधान हमारे संविधान के मुकाबले बहुत छोटे आकार के हैं। जैसा मैंने बताया, हमारे संविधान में 395 अनुच्छेद हैं, जबकि अमेरिकी संविधान में केवल 7 अनुच्छेद हैं, जिनमें से पहले चार सब मिलकर 21 धाराओं में विभाजित हैं। कनाडा के संविधान में 147, आस्ट्रेलियाई में 128 और दक्षिण अफ्रीकी में 153 धाराएं हैं। याद रखने लायक दूसरी बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माताओं को संशोधनों की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। वे जिस रूप में प्रस्तुत किए गए, वैसे ही पास हो गए। इसकी तुलना में इस संविधान सभा को 2,473 संशोधनों का निपटारा करना पड़ा। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विलंब के आरोप मुझे बिलकुल निराधार लगते हैं और इतने दुर्गम कार्य को इतने कम समय में पूरा करने के लिए यह सभा स्वयं को बधाई तक दे सकती है।

खबरें सबसे अलग

अखबारों की दुनिया में का समंदर है, लेकिन बेहतर जिंदगी जीने और दूसरों के लिए कुछ बेहतर करने की प्रेरणा सिर्फ ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को पढ़ने से मिलती है। जिंदगी की मूलभूत समस्याओं को उठाने के साथसाथ उनसे निपटने के आसान तरीके सुलभ के हर पन्ने पर होते हैं। खबरों की दुनिया में सुलभ की खबरों का रंग शायद इसीलिए अलग है, क्योंकि यह हम सब से सीधे तौर पर जुड़ी होती हैं। अबकी बार का फोटो फीचर मुझे बेहद पसंद आया। एक गांव में स्वच्छता को लेकर इतना बड़ा उत्सव होना अपने आप में बड़ी प्रेरक कामयाबी है। नरेश सिन्हा, जयपुर, राजस्थान


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04 - 10 दिसंबर 2017

कमाल का हस्तशिल्प

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से शिल्प हाट के तौर पर देश के विभिन्न हिस्सों में हस्तशिल्प मेले का आयोजन किया जाता है। शिल्प हाट जब दिल्ली में लगा तो हमारे फोटोग्राफर ने वहां अपने कैमरे से कई दिलचस्प तस्वीरें लीं फोटो ःजयराम


04 - 10 दिसंबर 2017

शिल्पकारों की बनाई वस्तुएं तो हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं, इसके पीछे की सोच भी हमें प्रभावित करते हैं। शिल्प हाट में बुद्ध की प्रतिमा से लेकर गांधी के चरखे तक और ताड़ से लेकर घास से बनी वस्तुएं दिखाती हैं कि हमारी लोक कला की परंपरा हर लिहाज से कितनी समृद्ध है

फोटो फीचर

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04 - 10 दिसंबर 2017

हैदराबाद हवाईअड्डे पर अपशिष्ट निस्तारण मशीनें स्थापित

रा

आदिवासी महिला ने गहने गिरवी रख बनवाया शौचालय

आरजीआईए देश का पहला हवाई अड्डा है, जिसका खुद का कंपोस्टिंग संयंत्र है

जीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा (आरजीआईए), हैदराबाद पायलट परियोजना के तहत अपशिष्ट निस्तारण मशीनें स्थापित करने वाला देश का पहला हवाईअड्डा बन गया है। इस हवाईअड्डे का संचालन करनेवाली जीएमआर हैदराबाद अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा लिमिटेड (जीएसआईएएल) ने बताया कि यह मशीन पीईटी (पोलीथाइलेन टेरेफाथालेट) बोतलों, इस्पात/ अल्युमिनियम कैन्स और प्लास्टिक बैंग्स को पर्यावरण हितैषी तरीके से पीसेगी। यहां वाइल्ड वेस्ट मीडिया ने दो मशीनें मुहैया कराई हैं, जिसे हवाईअड्डे पर रणनीतिक स्थान को चुनकर लगाया गया है। इन

मशीनों में अपनी बोतलें डालने पर यात्रियों को दान देने या अपना डिस्काउंट कूपन का दावा करने का विकल्प दिया गया है। जीएचआईएएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एसजीके किशोर ने कहा, ‘हम आशावादी हैं कि लोग इस मशीनों का इस्तेमाल करने तथा पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के लिए प्रेरित महसूस करेंगे। कचरे का जिम्मेदारी से प्रबंधन हमें हरित और सुरक्षित भारत के निर्माण में मदद कर सकता है।’ आरजीआईए देश का पहला हवाईअड्डा है, जिसका खुद का कंपोस्टिंग संयंत्र है, जो हवाईअड्डे पर उत्पन्न खाद्य कचरे को संसाधित करता है। (आईएएनएस)

मंगलसूत्र बेच कर बनवाया शौचालय

मध्यप्रदेश के देवास जिले की आदिवासी अन्नपूर्णा बाई ने अपने शौचालय के लिए अपने गहने गिरवी रख दिए

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देश के अलग-अलग हिस्सों से स्वच्छ भारत अभियान को व्यापक समर्थन मिल रहा है। मध्य प्रदेश के देवास जिले की आदिवासी महिला अन्नपूर्णा बाई के दिल व दिमाग पर इस अभियान का संदेश कुछ ऐसा बैठा कि उन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर शौचालय बनवा डाला। इतना ही नहीं वह गांव के अन्य परिवारों को भी शौचालय बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

कैसा लगा शौचालय? खुलकर दे सकेंगे फीडबैक

बिहार की राजधानी के पटना के नजदीकी वरुना गांव की दलित महिला रुनकी देवी ने सबके सामने नजीर पेश की है

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नकी देवी राजधानी पटना के नजदीकी वरुना गांव की रहने वाली हैं। उनके घर में शौचालय न होने से उन्हें भी अन्य महिलाओं की तरह असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। वे अक्सर पति परसुराम पासवान से कहती कि घर में शौचालय बनवा लेना चाहिए, लेकिन परसुराम ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। इसी बीच उन्हें खुले में शौच से मुक्ति (ओडीएफ) की सरकारी योजना का पता चला। रुनकी देवी ने इस योजना के तहत अपने स्तर पर ही घर में शौचालय बनवाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने पहले अपना मंगलसूत्र बेचा, लेकिन इससे उन्हें सिर्फ 9,000 रुपए ही मिले।

जबकि जरूरत इससे कुछ ज्यादा पैसों की थी, इसीलिए उन्हें बिना किसी अफसोस के अपने सोने के झुमके भी बेच दिए। इस तरह उन्हें 4,000 रुपए और हासिल हो गए और इन पैसों की मदद से उन्होंने घर में एक बेहतर शौचालय बनवा लिया। बातचीत के दौरान रुनकी बताती हैं, ‘मेरे पति ने जब घर में मजदूरों को ईंट, सीमेंट लाते देखा तो वह एकदम चौंक गए। फिर जब उन्हें पता चला कि शौचालय बनवाने के लिए मैंने मंगलसूत्र बेच दिया है तो वे बहुत नाराज भी हुए, लेकिन हम सबकी इच्छा और खुशी देखकर जल्द ही उनका गुस्सा शांत हो गया और वे भी शौचालय बनवाने में मदद करने लगे। मेरी दोनों बेटियां भी घर में शौचालय बनने से बेहद खुश हैं।’ रुनकी देवी के इस कारनामे को गांव वालों और सरकारी अधिकारियों की भी भरपूर प्रशंसा मिल रही है। विश्व शौचालय दिवस के मौके पर फतुहा ब्लॉक (रुनकी देवी का गांव इसी ब्लॉक के तहत आता है) के विकास अधिकारी (बीडीओ) ने शॉल ओढ़ाकर रुनकी देवी का सार्वजनिक अभिनंदन किया है। राज्य स्तरीय पुरस्कार के लिए भी उनका नाम जिला प्रशासन को भेजा गया है। (एजेंसी)

देवास जिले की दूरस्थ पंचायत बरोली व उसका भील आदिवासी बाहुल्य गांव अमोदिया की आबादी 630 लोगों की है। इस गांव में अन्नपूर्णा बाई नाम की भील आदिवासी महिला अपने परिवार के साथ रहती हैं, उसके चार बच्चे हैं, जिनमें दो बेटी और दो बेटे हैं। अन्नापूर्णा के पति मजदूरी करते हैं। अन्नपूर्णा बाई बताती हैं कि उन्हें खुले में शौच जाना अच्छा नहीं लगता था। उसने शौचालय निर्माण के लिए मिलने वाली राशि का भी इंतजार नहीं किया और अपनी लज्जा तथा परिवार की सुरक्षा के लिए अपने गहनों को गिरवी रख उससे मिले पैसे से शौचालय का निर्माण कराया। अन्नपूर्णा को देखकर गांव के अन्य परिवार भी अब शौचालय का निर्माण करा रहे हैं। वहीं, इसी गांव की कालीबाई का कहना है कि उन्होंने भी अपने घर में शौचालय का निर्माण कराया है, ताकि बहू-बेटियों का सम्मान बना रहे। (एजेंसी)

केंद्रीय आवास और शहरी मंत्रालय एक ऐसे उपकरण का निर्माण करवा रही है, जिसके सहारे आप शौचालयों की गुणवत्ता पर अपना फीडबैक दे पाएंगे

सा

र्वजनिक शौचालयों में फैली गंदगी देखकर अक्सर लोगों को गुस्सा आने लगता है, लेकिन समस्या तब आती है जब लोग इसकी शिकायत कहीं नहीं कर पाते, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। आम लोग शौचालयों पर भी फीडबैक दे पाएंगे। केंद्रीय आवास और शहरी मंत्रालय ने ऐसे उपकरणों के लिए निगम ने इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री ज (आईटीआई) को चुना है। वहीं आईटीआई को ऐसे

उपकरण बनाने के लिए ऑर्डर भी दे दिया गया है। ये उपकरण सार्वजनिक शौचालयों में लगाए जाएंगे और लोग इन उपकरणों पर लगे बटनों को दबाकर शौचालयों के बारे में फीडबैक दे पाएंगे। इस योजना के तहत काम करने के लिए दक्षिणी दिल्ली नगर निगम ने अपने शौचालयों में सिटिजन फीडबैक उपकरण लगाने का फैसला किया है। इन उपकरणों के माध्यम से न केवल लोग फीडबैक दे पाएंगे, बल्कि निगम को भी इसकी जानकारी मिल सकेगी कि शौचालयों की हालत कैसी है। शौचालयों में सबसे बड़ी समस्या क्या आती है। निगम ने इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज (आईटीआई) से चार सौ फीडबैक उपकरण लेने का फैसला किया है। ये उपकरण शौचालयों को पूरी तरह साफ और स्वच्छ रखने को लेकर निगम तक पूरी जानकारी पहुंचाएंगे। बता दें कि केंद्रीय आवास और शहरी मंत्रालय ने ऐसे उपकरणों की आपूर्ति के लिए आईटीआई को चुना है। (एजेंसी)


04 - 10 दिसंबर 2017

शौचालय के लिए बैंक देंगे कर्ज ग्रामीण बैंक अब शौचालय के साथ सोलर चरखे के लिए भी कर्ज देंगे

सु

सत्यम

लभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक की यह राय काफी पहले से रही है कि अगर शौचालय बनाने के लिए बैंकों से कर्ज मिले तो स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी। उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न सिर्फ पत्र लिखा, बल्कि जब वे प्रधानमंत्री से मिले तब भी इस बारे में उन्होंने चर्चा की। खुशी की बात है कि डॉ. पाठक की राय पर अब सरकारी स्तर पर अमल किया जा रहा है। बिहार में ग्रामीण बैंक अब लोगों को शौचालय बनाने के लिए कर्ज देंगे। राज्य सरकार ने इन बैंकों से सोलर चरखे के लिए भी ऋण मुहैया कराने को कहा है। इस बाबत राज्य के उप-मुख्यमंत्री व वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा, 'मध्य बिहार ग्रामीण बैंक की राज्य के 11 जिलों में करीब 700 शाखाएं हैं। इनसे जीविका के 86,000 स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं। हर समूह में औसतन 15 सदस्य हैं, जिस हिसाब से कुल मिलाकर 13 लाख की लोगों तक बैंक की सीधी पहुंच है। हमने बैंक को सभी सदस्यों को अपने-अपने घरों में शौचालय बनाने के लिए 12,000 रुपए का कर्ज देने का आदेश दिया है। राज्य सरकार से शौचालय निर्माण के लिए प्रोत्साहन राशि मिलने के बाद लाभार्थी बैंकों को पैसा वापस कर सकेंगे।' बैंक ने इस बारे में काम भी शुरू कर दिया है। राज्य सरकार के मुताबिक अब तक बैंक की ओर से करीब 1,100 शौचालयों का निर्माण कर्ज देकर कराया भी जा चुका है। मध्य बिहार ग्रामीण बैंक का प्रवर्तक पंजाब नेशनल बैंक है। सूत्रों के मुताबिक राज्य में शौचालय निर्माण की सुस्त निर्माण की रफ्तार को देखते हुए बिहार सरकार ने यह फैसला लिया। राज्य सरकार के मुताबिक बिहार में इस वक्त करीब 13 लाख शौचालय निर्माण की जरूरत है, लेकिन हर साल महज 3-4 हजार ही शौचालयों का निर्माण हो पा रहा है। इसके पीछे प्रोत्साहन राशि के देर से पहुंचने को एक बड़ी रुकावट माना जा रहा है, इसीलिए राज्य सरकार ने बैंकों से इस बारे में आगे आने को कहा है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने सोलर चरखे से जुड़ी प्रायोगिक परियोजना में भी लाभान्वितों को कर्ज देने को कहा है। मोदी ने कहा, 'यह पायलय परियोजना इस वक्त राज्य के नवादा जिले में चल रही है। इसके तहत हमने बैंक से लाभान्वित परिवार को 40,000 रुपए प्रति इकाई की दर से दो चरखों के लिए कर्ज देने को कहा है।

मक्खी खतरनाक जीवाणुओं का संवाहक

'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' पत्रिका में प्रकाशित शोध ने मक्खियों के खतरे के प्रति किया आगाह

क्खियां किसी जलसे का जायका बिगाड़कर उसे कष्टदायी बनाने से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि मक्खियां मानव के लिए खतरनाक सैकड़ों जीवाणुओं का संवाहक बन सकती हैं और रोगों को फैलाने में अपनी भूमिका निभा सकती हैं। जाहिर है कि मक्खियां हमेशा मानव के संपर्क में रहती हैं। इसीलिए वैज्ञानिकों को काफी समय से यह संदेह रहा है कि रोगों को फैलाने में इनकी भूमिका होती है। लेकिन 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' नामक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध के बाद खतरे की यह बात साबित भी हो गई है। अमेरिका के पेंसिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डोनाल्ड ब्रायेंट ने कहा, ‘हमारा विश्वास है

कि यह रोगाणुओं के संचरण की एक प्रक्रिया को प्रदर्शित कर सकता है, जिसकी जन-स्वास्थ्य सेवकों ने अनदेखी की है। महामारी की स्थिति में मक्खियों से रोगाणुओं का संचरण तेजी से हो सकता है।’ अनुसंधानकर्ताओं ने तीन अलग-अलग महादेशों से 116 मक्खियों के माइक्रोबायोम का परीक्षण किया। कुछ मामलों में उन्होंने पाया कि ये मक्खियां सैकड़ों अलग-अलग प्रजातियों के रोगाणुओं का संवहन करती हैं, जोकि मानव के लिए खतरनाक हैं। सिंगापुर के नान्यांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के स्टीफन शूटर ने कहा कि मक्खी के शरीर में पैर और डैने से सबसे ज्यादा सूक्ष्मजीवीय विविधता प्रदर्शित होती है। उनके मुताबिक जीवाणु मक्खियों का इस्तेमाल वायुयान की तरह करते हैं। (एजेंसी)

भारत को मिला पहला 'वी केयर' प्रोजेक्ट वी केयर प्रोजेक्ट स्वच्छता के लिए आईपीसीए की स्वैच्छिक पहल है

ईपीसीए ने भारत में अनोखा वीई सीएआरई (वी केयर-वेस्ट एफीशिएंट कलेक्शन एंड री-साइक्लिंग) प्रोजेक्ट शुरू किया है। आईपीसीए को रीसाइकिल न किए जाने वाले प्लास्टिक वेस्ट के नियंत्रण और मल्टी लेयर्ड प्लास्टिक (एमएलपी) के प्रसंस्करण के निर्देश मिले थे। आईपीसीए ने यह प्रोजेक्ट सीपीसीबी के अतिरिक्त निदेशक एस. के, निगम और दिल्ली स्थित में गाजीपुर में वेस्ट टु एनर्जी प्लांट के ईडीएम रणबीर सिंह की मौजूदगी में शुरू किया। इस अवसर पर ईडीएमसी के कमिश्नर रणबीर सिंह ने कहा कि हर स्थानीय प्रशासन प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट (पीडब्ल्यूएम) नियम 2016 के तहत कूड़े का वैज्ञानिक प्रबंधन और प्लास्टिक वेस्ट को ठिकाने लगाना सुनिश्चित कर रहा है। ईडीएमसी ने जीएनसीटीडी को पूर्वी दिल्ली नगर निगम के उपनियम 2017 को लागू करने का प्रस्ताव दिया है। इस कार्य को पूरा करने के लिए ईडीएमसी ने भारतीय प्रदूषण

नियंत्रण संगठन के साथ मिलकर वी केयर प्रोजेक्ट को लॉन्च किया है। वी केयर प्रोजेक्ट आईपीसीए की स्वैच्छिक पहल है और ईडीएमसी पर कोई वित्तीय भार नहीं डालती। यह प्लास्टिक मुक्त माहौल बनाना तो सुनिश्चित करती ही है, साथ ही इससे गाजीपुर में प्लास्टिक वेस्ट को री-साइकिल कर उपयोगी पदार्थ बनाए जा सकते हैं। सीपीसीबी में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट के निदेशक और नोडल ऑफिसर एस. के. निगम ने कहा कि प्लास्टिक की कई परतों में पैकेजिंग (एमएलपी) को एकत्र करना, उसे अलग करना, उसका ट्रीटमेंट करना और उसका डिस्पोजल करना काफी मुश्किल है। अब तक किसी संस्था को इस दिशा में सफलता नहीं मिली है। सीपीसीबी ने आईपीसीए से विचारविमर्श के बाद एमएलपी उपभोक्ताओं, ब्रांड ओनर्स और ईडीएमसी की सहायता से एक पायलट स्टडी प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। (एजेंसी)

स्वास्थ्य

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3.2 करोड़ साल पुराने पेड़ का जीवाश्म

पहली बार ओलिगोसीन युग का जीवाश्म पूर्वी एशिया में पाया गया है

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ज्ञानिकों की एक टीम ने चीन के युनान प्रांत में एक डिपटेरोनिया पेड़ का 3.2 करोड़ साल पुराना जीवाश्म खोज निकाला है। ऐसा पहली बार है जब शुरुआती आदिनूतन युग (ओलिगोसीन युग) का जीवाश्म पूर्वी एशिया में पाया गया है। डिपटेरोनिया, पलेयिओजीन दौर में उत्तरी गोलार्ध में व्यापक रूप से पाया जाता था, लेकिन प्रारंभिक आदिनूतन युग में यह उत्तर अमेरिका में लुप्त हो गया था। डिपटेरोनिया पर्णपाती फूलों की झाड़ियां या छोटे पेड़ होते थे। शीशुहांगबाना उष्णकटिबंधीय बॉटेनिकल गार्डन के शोधकर्ता और लेख के लेखकों में से एक झॉ झेकुन ने कहा कि वैज्ञानिकों ने पाया कि युनान में पाया गया डिपटेरोनिया जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाए गए जीवाश्म जैसा ही था, जिसका मतलब है कि करीब 3.2 करोड़ वर्ष पहले पूर्वी एशिया और उत्तरी अमेरिका की वनस्पतियां तकरीबन समरूप थीं। शीशुहांगबाना उष्णकटिबंधीय बॉटेनिकल गार्डन, चीन की विज्ञान अकादमी का हिस्सा है। (एजेंसी) वर्गीकृत विज्ञापन


22 अंतरराष्ट्रीय

04 - 10 दिसंबर 2017

चीन को 'शौचालय क्रांति' को बढ़ावा देना चाहिए

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का कहना है कि सार्वजनिक शौचालयों का उन्नयन करना जारी रखा जाना चाहिए

न के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का कहना है कि देश को 'शौचालय क्रांति' के अभियान के तहत सार्वजनिक शौचालयों का उन्नयन करना जारी रखना चाहिए ताकि घरेलू पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने शी के हवाले से बताया कि स्वच्छ शौचालयों का निर्माण शहरी और ग्रामीण सभ्यता को बढ़ावा देने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सार्वजनिक शौचालयों के उन्नयन हेतु शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रयास किए जाने चाहिए ताकि लोगों के जीवन में सुधार हो सके। राष्ट्रपति ने कहा कि चीन को 'शौचालय क्रांति' के साथ बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं और सेवाएं मुहैया करानी चाहिए ताकि पर्यटन उद्योग को बढ़ावा दिया जा सके। चीन के राष्ट्रीय पर्यटन प्रशासन ने 2018 से 2020 तक देशभर के पर्यटन स्थलों पर 64,000 शौचालयों के निर्माण और उन्नयन के लिए पिछले

महीने एक कार्ययोजना शुरू की थी। चीन में 2015 में 'शौचालय क्रांति' शुरू की गई थी और तब से चीन के पर्यटन उद्योग ने 68,000 शौचालयों का उन्नयन किया है। चीन के पर्यटन स्थलों के सार्वजनिक शौचालयों की छवि सैलानियों के बीच काफी खराब है। यहां पर्यटक अक्सर अपर्याप्त एवं गंदे शौचालयों और सफाई कर्मियों की कमी की शिकायत करते हैं। (आईएएनएस)

अब कॉफी से चलेंगी लंदन की बसें कॉफी के कचरे से निकाले गए तेल को डीजल में मिलाकर जैव ईंधन तैयार किया गया है और इसका इस्तेमाल सार्वजनिक परिवहन के लिए ईंधन के रूप में किया जा रहा है

कॉ

फी से निकाले गए कचरे के तेल का इस्तेमाल कर लंदन की बसों को ऊर्जा दी जाने लगी है। परिवहन अधिकारियों ने यह जानकारी दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉफी के कचरे से निकाले गए तेल को डीजल में मिलाकर जैव ईंधन तैयार किया गया है और इसका इस्तेमाल सार्वजनिक परिवहन के लिए ईंधन के रूप में किया जा रहा है। ऐसा अभी प्रयोग के तौर पर किया गया है। प्रयोग सफल रहा तो इस जैव ईंधन का इस्तेमाल

धड़ल्ले से होने लगेगा। लंदन स्थित टेक्नॉलजी फर्म बायोबीन लिमिटेड ने कहा है कि एक साल में एक बस को ऊर्जा प्रदान करने के लिए पर्याप्त कॉफी का उत्पादन किया गया है। ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन (टीएफएल) परिवहन के दौरान धुआं उत्सर्जन को कम करने के लिए तेजी से जैव ईंधन के उपयोग की तरफ बढ़ा है। बायो-बीन के अनुसार, लंदन के लोग कॉफी से एक साल में 2 लाख टन कचरा निकालते हैं। कंपनी कॉफी की दुकानों और तत्काल कॉफी फैक्ट्रियों से कॉफी का कचरा लेती है, और अपने कारखाने में इससे तेल निकालती है, जिसे बाद में मिश्रित बी20 जैव ईंधन में संसाधित किया जाता है। बायो-बीन के संस्थापक ऑर्थर केय ने कहा, 'यह इसका बेहतरीन उदाहरण है कि हम कचरे को एक संसाधन रूप में इस्तमाल कर सकते हैं।' (आईएएनएस)

समुद्री जीवन की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय उद्यान

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इस इलाके में अब मछली पकड़ने की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगेगा और क्षेत्र में नौसेना द्वारा गश्त लगाया जाएगा

क्सिको सरकार ने द्वीपों के समूह के आसपास समुद्री जीवों के लिए एक विशाल रिजर्व बनाया है। इन द्वीपों पर रे मछली, व्हेल और समुद्री कछुए की सैकड़ों प्रजातियां रहती हैं। रिविलागिगेडो आर्किपेलागो, देश के दक्षिण-पूर्वी तट पर ज्वालामुखीय द्वीपों का एक समूह है। 150,000 किलोमीटर के संरक्षण क्षेत्र के साथ, यह उत्तरी अमेरिका में सबसे बड़ा समुंद्री रिजर्व बन गया है। इस इलाके में अब मछली पकड़ने की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगेगा और क्षेत्र में नौसेना द्वारा गश्त लगाया जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि इस कदम से इलाके में मछली पकड़ने के वाणिज्यिक अभियानों से प्रभावित आबादी को राहत मिलेगी। इस उद्यान को मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरिक पेना नीटो द्वारा हस्ताक्षरित आज्ञप्ति द्वारा नामित किया गया। इस भूमि से प्रकृतिक संसाधनों के अवतरण और भूमी पर नए होटल के निर्माण की अनुमती नहीं है। देश के बाजा कैलिफोर्निया प्रायद्वीप के 400 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित इस क्षेत्र को इसकी

ज्वालामुखीय प्रकृति और अद्वितीय पारिस्थितिकी के कारण उत्तरी अमेरिका के गालापागोस के रूप में वर्णित किया जाता है। दो महासाव्यों के अभिसरण पर स्थित यह द्वीप खुले पानी और प्रवासी प्रजातियों का केंद्र हैं। पिछले साल प्रशांत महासागर पर स्थित इस क्षेत्र को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया था। स्थानीय मीडिया के अनुसार, मेक्सिको में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ संरक्षण के निदेशक मारिया जोस विलानुएवा ने इस कदम बाकी दुनिया के लिए एक 'महत्वपूर्ण मिसाल' बताया है। (आईएएनएस)

किंघाई झील इलाके में 'शौचालय क्रांति'

ची

चीन के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल किंघाई झील इलाके में 'शौचालय क्रांति' की शुरुआत की गई है

न की किंघाई प्रांत के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल किंघाई झील इलाके में 'शौचालय क्रांति' की शुरुआत हो गई है जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र और आसपास के क्षेत्र में शौचालयों का निर्माण और उनका उन्न्यन करना है। इस वर्ष अब तक इस पर्यटन क्षेत्र को परियोजना के हिस्से के रूप में 1.19 युआन करोड़ (10 लाख डॉलर) प्राप्त हुआ है। क्षेत्र के पर्यटन निवेश और विकास की प्रभारी किंघाई झील पर्यटन कंपनी के व्यवसाय प्रबंधन विभाग के प्रमुख झांग शेंगजियांग ने कहा कि झील के आसपास के 32 शौचालयों के उन्नयन के लिए 12.8 लाख युआन के निवेश का एक हिस्सा इस्तेमाल किया गया है और बाकी का धन 13 पर्यावरण अनुकूल शौचालयों

और 11 यूनिसेक्स शौचालयों को स्थापिन करने के लिए उपयोग किया जा रहा है। किंघाई झील चीन में स्थित सबसे बड़ी झील है और साथ ही सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। मई में सरकार ने इस क्षेत्र की शौचालय समस्या के लिए आलोचना की थी। अब हालात हालांकि सुधरने लगे हैं। (आईएएनएस)


गरीबों के लिए घर बनाने का जुनून गरीबों की सेवा करते हुए पिछले 11 वर्षों में 57 वर्षीया सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. सुनील ने 78 गरीबों के लिए नए घर बनाए हैं

04 - 10 दिसंबर 2017

पहल

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खास बातें डॉ. सुनील ने इस परोपकारी कार्य की शुरुआत 2006 में की अपने गृह जिले पथानमथिट्टा में 77 घरों का निर्माण किया इन दिनों 8 घरों का निर्माण कार्य प्रगति पर है

जी

सानू जॉर्ज

व विज्ञान की 57 वर्षीया सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एमएस सुनील समाज की भलाई के लिए एक अनूठा काम कर रही हैं। गरीबों की सेवा के तहत पिछले 11 वर्षों में उन्होंने 78 गरीबों के लिए नए घर बनाए हैं। यह उस इलाके में समाज सेवा का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां खाड़ी के देशों में काम करने वालों के पैसों से ग्रामीण इलाकों में आलीशान घर खड़े हैं। उनके इस परोपकारी काम की शुरुआत 2006 में उस समय हुई थी, जब उन्हें पता चला कि उनके कुछ गरीब छात्र टूटे-फूटे, असुरक्षित घर में रहते हैं। तब उन्होंने इसमें सुधार करने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। उन्होंने अपने गृह जिले पथानमथिट्टा में 77 घरों का निर्माण कराया और एक घर पास के जिले कोल्लम में बनवाया है, जहां विदेशों में काम कर रहे केरल के निवासी अधिकतर घरों के निर्माण में पैसा लगाते हैं।

11 साल पुराना जज्बा

वह एक अलग रास्ते पर चल रही हैं, जो तेजी से उनके जुनून को वास्तविकता में बदलने की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह अचानक ही हुआ कि उन्होंने गरीबों के लिए आशियाना बसाने का काम

पिछले साल कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद मैं अपने इस काम में जुट गईं। फिलहाल, आठ घरों को लेकर काम चल रहा है, जिसमें छह लगभग तैयार हैं- डॉ. सुनील शुरू किया। सुनील के शब्दों में, ‘साल 2006 में मुझे पता चला कि मेरा एक छात्र असुरक्षित घर में मुश्किल में जीवन व्यतीत कर रहा है। मैं उस समय राष्ट्रीय सेवा योजना (जो सामुदायिक सेवा के जरिए छात्रों के व्यक्तित्व के विकास पर केंद्रित है) से जुड़ी हुई थी। हमने छात्र के लिए एक घर बनाने का फैसला किया। हमने इसके लिए 60,000 रुपए जुटाए और और नया घर तैयार किया।’ इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वह सामूहिक अभियान से जुड़ी नहीं रह सकतीं क्योंकि यह थकाऊ था और उन्होंने एकल प्रायोजक की तलाश शुरू करने का फैसला किया। जल्द ही अमीर लोगों ने उनसे संपर्क करना शुरू कर दिया और उन्हें बेघरों के आश्रयों के निर्माण के लिए पैसे देने शुरू कर दिए। उन्होंने पिछले महीने 78वां घर बनाकर पूरा किया है।

आठ घरों को लेकर काम चल रहा है, जिसमें छह लगभग तैयार हैं।’ जिन लोगों को घरों की जरूरत है, ऐसे लोगों के चुनाव की प्रक्रिया को विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि वह लगभग 12 वर्षों से घर बना रही हैं, कई गरीब लोगों ने उनसे संपर्क किया और मदद करने का आग्रह किया है। सुनील ने कहा, ‘जो पहली चीज मैं देखती हूं वह यह है कि क्या जरूरतमंद शख्स ऐसे परिवार से ताल्लुक रखता है, जहां महिलाएं हैं। इसके बाद मैं अपने स्तर पर परिवार के बारे में जानकारी जुटाती हूं कि क्या उन्हें घर की जरूरत है। जिन 78 घरों का मैंने निर्माण कार्य पूरा किया है, उनमें से जमीन सिर्फ दो घरों के लिए खरीदी गई। अन्य मामलों में या तो लाभार्थी शख्स के पास जमीन थी या स्थानीय ग्रामीण परिषदों ने जमीन दी।’

सुनील बताती हैं, ‘पिछले साल कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद मैं अपने इस काम में जुट गई। फिलहाल,

उन्होंने पूंजी के बारे में बताते हुए कहा कि पहले घर के निर्माण की लागत 60,000 रुपए थी और जो

सुनील के शब्दों में, ‘जब मैं कॉलेज में कार्यरत थी तो दोपहर 3.30 बजे के बाद निर्माण स्थल पर जाती थी। अब सेवानिवृत्त हो गई हूं तो अपने जुनून को साधने का पूरा समय मेरे पास है।’ उनके कारोबारी पति ने भी एक घर के निर्माण में निवेश किया है, जबकि उनका इकलौता बेटा, जो आयरलैंड में पढ़ाई कर रहा है, उन्हें फोन कर उनके पैशन के बारे में पूछता रहता है। सुनील ने कहा कि उदार प्रायोजकों के बिना उनका जुनून वास्तविकता नहीं बन पाता जिनमें से अधिकांश विदेश में हैं। उनका कहना है कि अपने रिकॉर्ड को देखते हुए वह आश्वस्त हैं कि वह और भी घर बना पाएंगी क्योंकि ऐसे कई बेघर परिवार हैं, जो उनका इंतजार कर रहे हैं और वह प्रायोजकों का इंतजार कर रही हैं।

डीएम सी रविशंकर ने बताया कि नगर निकायों को 31 दिसंबर तक खुले में शौच की प्रथा से मुक्त किया जाना है। इस संबंध में कलक्ट्रेट में हुई बैठक में जानकारी दी गई कि डीडीहाट नगर में 100 निजी शौचालय बनाने के लिए धनराशि मिली थी। इनमें से 50 का निर्माण हो गया है और 50 पर काम चल रहा है। डीडीहाट नगर से घरेलू शौचालयों के कुल 250 आवेदन प्राप्त हुए थे। धारचूला नगर में घरेलू शौचालयों के 227 आवेदन प्राप्त हुए, इनमें से 44 परिवारों को धनराशि दे दी गई है। गंगोलीहाट नगर में 259 आवेदन पत्र

प्राप्त हुए, इनमें से 135 लोगों को शौचालय बनाने के लिए धनराशि दे दी गई है। बेड़ीनाग नगर में 143 परिवारों के पास शौचालय नहीं है। इन सभी को धनराशि दे दी गई है। डीएम ने कहा कि नगरों को खुले में शौच की प्रथा से मुक्त कर दिया जाएगा। 15 दिसंबर तक सभी को लक्ष्य पूरा करना है और रोजाना की रिपोर्ट शाम छह बजे तक उपलब्ध करानी होगी। बैठक में अपर जिलाधिकारी मोहम्मद नासिर समेत सभी निकायों के अधिशासी अधिकारी मौजूद थे। (एजेंसी)

फिलहाल बन रहे हैं 8 घर

नगर में 418 घरेलू शौचालय बनेंगे

उत्तराखंड के नगर निकायों को 31 दिसंबर तक खुले में शौच की प्रथा से मुक्त किया जाना है

गरीय क्षेत्रों को खुले में शौच की प्रथा से मुक्त कराने के अभियान के तहत उत्तराखंड के पिथौरागढ़ नगर में 418 घरेलू शौचालय निर्माण के आवेदन पत्र नगरपालिका को प्राप्त हुए हैं। इनमें से 316 आवेदनों का सत्यापन नगरपालिका ने

आखिरी घर सुपुर्द किया गया, उसकी कीमत 2.50 लाख रुपए से अधिक थी। सुनील कहती हैं, ‘मेरे ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए कई लोगों ने मुझसे संपर्क साधा और मुझे पैसे दिए। मैंने एक नियम बनाया है कि मैं एक घर बनाने के लिए एक से अधिक शख्स से पैसे नहीं लेती हूं। लेकिन, ऐसा भी हुआ, जब उदार लोगों ने मुझे फोन कर कहा कि वे इतना ही दे सकते हैं। यदि मैं इस काम के लिए खुद के लगाए गए पैसों को गिनूं तो मुझे हार्ट अटैक आ जाएगा। मैं केवल तभी अपनी धनराशि का निवेश करती हूं, जब पैसे की कमी होती है।’ छह नए घरों में से चार के निर्माण के लिए अमेरिका स्थित एक परिवार ने पैसा लगाया है। उन्होंने कहा कि वह अपने जिले के आसपास ही काम करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि जब भी काम शुरू हो, वह वहां मौजूद हों।

कर दिया है। सत्यापन के बाद 233 परिवारों को शौचालय बनाने के लिए धनराशि दे दी गई है। 102 परिवारों के सत्यापन का काम चल रहा है। नगर क्षेत्र में छह सार्वजनिक शौचालय बनाने संबंधी आवेदन भी प्राप्त हुए हैं।

आर्थिक मदद के लिए आए लोग

सेवा के लिए अब पूरा समय


24 गुड न्यूज

04 - 10 दिसंबर 2017

खादी की रिकॉड तोड़ बिक्री

अप्रैल 2017 से सितंबर 2017 की तिमाही के दौरान ही खादी उत्पादों की बिक्री में लगभग 90 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है

खास बातें गांधी जी ने अपना जन्मदिन ‘खादी जयंती’ के रूप में मनाने को कहा था कनॉट प्लेस के शो रूम में 1.2 करोड़ रुपए की खादी बिकी खादी उत्पादों की बिक्री में बीती तिमाही में 90 प्रतिशत की बढ़त दर्ज बावजूद खादी को आवश्यकता है, सामान्य वर्ग के सामान्य जीवन की निरंतरता से जुड़ने की। यह और बात है कि पिछली सरकारों के शासनकाल में ऐसा कुछ नहीं हुआ और खादी अपनी दुर्दशा के चरम पर पहुंच गई।

एसएसबी ब्यूरो

हात्मा गांधी ने अपने नाम पर जन्मदिन मनाने पर अप्रसन्नता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा करना ही है तो इस दिन लोग खादी जयंती के रूप में मनाएं। उन्हीं के शब्दों में ‘खादी एक वस्त्र नहीं, विचार है।’ इस विचार ने स्वाधीनता पूर्व से लेकर आज तक देश में स्वावलंबन की दिशा में बड़ी भूमिका निभाई है। मोदी सरकार ने पहले दिन से खादी के महत्व को समझा और इसकी तरक्की के लिए एक साथ कई कदम उठाए।

आसमान छूती बिक्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपने जीवन में खादी को अपनाकर और अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में खादी-उत्पादों की ओर देश का ध्यान आकर्षित करते हुए, उसे अपनी नियमित जीवनचर्या में अपनाने के लिए, देश का आह्वान किया था। उसका क्या परिणाम निकला, इसे हम वर्तमान के ताजा आंकड़ों से समझ सकते हैं। इसी वर्ष अप्रैल 2017 से सितंबर 2017 की तिमाही के दौरान ही खादी उत्पादों की बिक्री में लगभग 90 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। इस साल केवल धनतेरस के दिन अकेले राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी के शोरूम पर ही खादी के उत्पादों की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज हुई। यह बिक्री थी1.2 करोड़ रुपए, जो कि पिछले वर्ष 1.11 करोड़ की तुलना में बहुत उत्साहजनक है।

मन के साथ खादी की बात

2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के मंच से पहली बार देशवासियों से खादी को अपने जीवन में, चाहे छोटा सा ही सही, स्थान देने का आह्वान किया था। उन्होंने देशवासियों को इस बात के लिए प्ररित किया कि वे खादी का कोई न कोई उत्पाद जरूर खरीदें। चाहे वह कपड़े, बैग, कुशन कवर, पर्दे, यहां तक कि एक रूमाल ही क्यों न हो। उनके इस आह्वान का नतीजा यह निकला कि देश का ध्यान तेजी से इस ओर आकर्षित हुआ। साथ ही इन व्यावहारिक आंकड़ो पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि 2014 से पहले खादी की बिक्री 2.7 प्रतिशत थी, जो मोदी सरकार के के कार्यकाल में बढ़कर 35 प्रतिशत पर पहुंच गई।

देशप्रेम का प्रतीक

भारत के लिए खादी का क्या महत्व है, यह बात किसी भी देशवासी को बताने की आवश्यकता नहीं है। महात्मा गांधी ने पहली बार वर्ष 1920 में खादी के रूप में स्वदेशी अपनाने के आह्वान के साथ ही देश को इससे जोड़ दिया था और उनकी प्रेरणा से खादी अपनाने को देशवासियों ने एक अहिंसक हथियार के रूप में प्रयोग किया। समय के साथ खादी

‘खादी फॉर ट्रांसफॉर्मेशन’ एक ‘विशिष्ट’ वर्ग से जुड़ी भी और फिर उन्हीं तक सीमित भी हो गई। कालांतर में खादी जहां सत्ता की पोशाक बनी, वहीं इसके साथ जुड़े चारित्रिक तेज में कुछ कमी भी आई। पर देश में आमो-खास तक खादी को लेकर एख बार फिर से नई ललक जगी है। यह ललक बाजार में तो दिख ही रही है, चरखा और करघा चला रहे चेहरों पर पढ़ी जा सकती है।

औद्योगिकरण से बदली स्थिति

वास्तव में खादी उस भारत का प्रतिनिधित्व करती है, जो आज भी गांवों में ही बसता है। खादी-उद्योग की स्थापना के लिए बहुत कम संसाधन, मगर बहुत कठिन श्रम की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण से यह गरीब ग्रामवासियों के लिए रोजगार का उत्तम विकल्प है, जो कि कोई बड़ा व्यवसाय आरंभ कर पाने में सक्षम नहीं होते। औद्योगिकरण के कारण सभी इकाइयों के तेजी से हो रहे मशीनीकरण के चलते ग्रामोद्योग की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि खादी उत्पादन से जुड़ा वर्ग आज भी गांवों में बसा एक गरीब-गुरबा ही है। गांवों का चेहरा होने के बावजूद खादी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शहरी खरीदारों पर आश्रित है। विशिष्ट वर्ग का प्रतिनिधि होने के

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में खादीउत्पादों की ओर देश का ध्यान आकर्षित करते हुए, उसे अपनी नियमित जीवनचर्या में अपनाने के लिए, देश का आह्वान किया था

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही ग्रामीण इकाइयों के उत्थान की दिशा में प्रयास तेज कर दिए। इन लघु इकाइयों को अनेक योजनाओं की सहायता से हर जरूरी साधन-संसाधन उपलब्ध कराए, इकाई आरंभ करने के लिए ऋण उपलब्ध कराया। प्रशिक्षण उपलब्ध कराया और यह सब करने के लिए नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले स्वयं अपने नियमित जीवन से खादी को जोड़ा। आज ‘मोदी कट’ कुर्ता नया फैशन स्टाइल है, जिसकी खादी के शोरूमों पर भारी मांग रहती है। प्रधानमंत्री ने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आवश्यकताओं और परेशानियों को समझा। उसे दूर करने के लिए आवश्यक प्रावधान किए। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन योजनाओं का लक्ष्य है, खादी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त भारतीय ब्रांड बनाना। प्रधानमंत्री का यह कथन उनके इन प्रयासों की पुष्टि भी करता है- पहले ‘खादी फॉर नेशन’ से ‘खादी फॉर फैशन’ थी और अब यह ‘खादी फॉर ट्रांसफॉर्मेशन’ है।


प्रेसीडेंसी का इतिहास हुआ जीवंत

04 - 10 दिसंबर 2017

प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी एशिया के पहले स्नातक महाविद्यालय के रूप में अपना 200 वां वर्षगांठ मना रहा है

प्रसंता पॉल / कोलकाता

ह साल पुरानी प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी ने दुनिया भर में विश्वविद्यालयों की शानदार लीग में प्रवेश किया है और यह एशिया के पहले स्नातक महाविद्यालय के रूप में अपना 200 वां वर्षगांठ मना रहा है। इसके साथ ही संस्थान की वास्तविक पहुंच बनाने के लिए गूगल कला और संस्कृति के साथ गठजोड़ भी किया गया है। कुछ महीने पहले शुरू की गई पहल प्रेसीडेंसी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तक पहुंचने में ई-ट्रैवेलर्स को काफी मदद करती है। अगर कोई इसे देखता है तो यात्रियों को स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस, बंकिम चंद्र चटर्जी, प्रतिष्ठित सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस, सत्यजीत राय जैसे नामों के बारे में विस्मय से जानने को मिलेगा। यह एक विशाल आकाशगंगा की तरह है, जो कि पूर्व और बाद के स्वतंत्र भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में बताता है। हालांकि यहां ई-संग्रहालय का विस्तार स्वतंत्रता आंदोलन पर किया गया है। "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वराजप्रत्यावर्तन की ओर" शीर्षक से, आभासी प्रदर्शनी ने बड़ी संख्या में दुर्लभ दस्तावेजों को प्रदर्शित किया, जो अतीत में देश के विविध शोधार्थियों को प्रभावित करने के लिए काफी हैं। इस प्रदर्शनी को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रेसीडेंसी से जुड़े इतिहास को दिखाने के लिए समर्पित किया गया है। प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी की कुलपति अनुराधा लोहिया ने कहा कि प्रदर्शनी को कई भागों में विभाजित किया गया है और कॉलेज ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का आकार देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदर्शनी

में व्यक्तियों, दस्तावेजों, पांडुलिपियां और तस्वीरें हैं, जो कि ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं। प्रेसीडेंसी अधिकारियों ने प्रदर्शनी में लगने वाले दुर्लभ दस्तावेजों की फोटो खिंची है, ताकि उसे आभासी संग्रहालय में लगाया जा सके। कुछ ऐसी दुर्लभ वस्तुओं का नाम देने के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज के आसपास की स्थिति पर ब्रिटिश सरकार के सार्वजनिक निर्देश (डीपीआई) के निदेशक को एक्शन डे पत्र प्रिंसिपल पी सी महालनोबिस द्वारा भेजे गए। जिसमें पहले स्वतंत्रता दिवस समारोह का नोटिस, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के जन्मदिन की घोषणा भी शामिल था। एक और दिलचस्प दस्तावेज का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि डीपीआई द्वारा कॉलेज की प्रिंसिपल को भेजे गए एक नोटिस में खतरनाक रसायनों के बारे में निर्देशित किया गया था, जो प्रयोगशाला में था। डीपीआई ने प्रिंसिपल को कट्टरपंथी छात्रों के बारे में बताया और कहा कि उन खतरनाक रसायनों को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए, क्योंकि उनके द्वारा रसायन विस्फोटक तैयार किया जा सकता है। इसीलिए उन्हें हमेशा के लिए बंद रखने की चेतावनी दी। एक अन्य दिलचस्प हॉलिडे नोटिस है, जिसे परिसर में उस समय रखा गया था, जब मित्र देशों ने द्वितीय विश्व युद्ध जीता था। यह भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है। इस दौरान हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ने 'ब्लड फॉर ब्लड' की मांग की थी, जो छात्रों के बीच वितरित की गई और बाद में जिसे पुलिस ने कैंपस से जब्त किया था। इतना ही नहीं इस दौरान भगत सिंह के भाई ने विद्यार्थियों के बीच पत्रिकाओं को भी वितरित किया।

प्रदर्शनी को कई भागों में विभाजित किया गया है और कॉलेज ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का आकार देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदर्शनी में व्यक्तियों, दस्तावेजों, पांडुलिपियां और तस्वीरें हैं, जो कि ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं

संयोग से प्रेसीडेंसी के प्रारंभिक इतिहास से संबंधित कुछ दुर्लभ दस्तावेज लंदन में ब्रिटिश लाइब्रेरी और कलकत्ता के सामाजिक विज्ञान केंद्र के कब्जे में हैं। अधिकारियों ने ब्रिटिश पुस्तकालय और सामाजिक विज्ञान से संपर्क किया है, ताकि ई-संग्रहालय में उनको शामिल करने की अनुमति मिल सके। इसके अलावा कुछ आधुनिक समाचार पत्रों जैसे अमृता बाजार पत्रिका, युगांतर और आनंद बाजार पत्रिका ने प्रेसीडेंसी पर कुछ समाचार किए थे। उन्हें भी इस प्रदर्शनी में शामिल किया गया है। कुलपति ने कहा कि हम पहले ही प्रत्यक्ष क्रिया दिवस पर अमृता बाजार पत्रिका से रिपोर्ट प्राप्त कर चुके हैं, जो कई सीरीज में प्रकाशित हुईं थी। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी की घोषणा करते हुए अमृत बाजार पत्रिका संस्करण के पहले पृष्ठ को आभासी प्रदर्शनी में पहला स्थान मिला है। लोगों को आकर्षित करने के लिए अधिकारियों ने विभिन्न विषयों पर चार प्रदर्शनी लगाई है, जिसमें राजनीति में महिलाओं का योगदान, सर्गेई ईसेंस्टीन (रूसी क्रांति के 100 वर्षों को चिह्नित करने के लिए), चित्रकला, सोमनाथ की कलाकृतियों और चित्रों को दिखाया जा रहा है। एक अधिकारी ने बताया कि ऐसे प्रदर्शनियों के जरिए ऐतिहासिक महत्व के प्रासंगिक मुद्दों के बारे में छात्रों को संवेदित करके हम प्रेसीडेंसी के झंडे को ऊंचा उठाना चाहते हैं। यह एक नए विश्वविद्यालयों के लिए कठिन है, जो अपने पहले चक्र में ही शीर्ष रेटिंग प्राप्त करने के बारे में सोचते हैं। क्योंकि एनएएसी ने पीएचडी छात्रों की संख्या के आधार पर शीर्ष रेटिंग रखी है। कानून व्यवस्था की वजह से प्रेसीडेंसी 2014 में ही डॉक्टरेट कोर्स शुरू कर सकती थी, लेकिन प्रशासन और बुनियादी ढांचे में उच्चतम अंक हासिल करने के लिए विश्वविद्यालय ने इसे बनाया है। लोहिया ने कहा कि हम सभी बहुत खुश हैं। पहले ही चक्र में हमने इस उपलब्धि को हासिल कर लिया। हमने केवल पीएचडी पुरस्कार विजेताओं के ही क्षेत्र में स्कोर नहीं किया है, क्योंकि हमें पीएचडी पूरा करने में 4-5 साल लगेंगे। एक विश्वविद्यालय अधिकारी ने बताया कि एनएएसी रेटिंग हमें और अधिक विदेशी सहयोग करने के लिए प्रेरित करेगी। इसके साथ ही हमारा विश्वविद्यालय केंद्रीय वित्त पोषण के लिए भी पात्र बन जाएगा और अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करेगा। इसके अलावा प्रसिद्ध संस्थानों के संकाय भी हमसे जुड़ने में दिलचस्पी लेंगे। उन्होंने कहा कि यह सच है कि हम अभी अपने पीएचडी छात्रों को इसमें शामिल नहीं कर रहे हैं, लेकिन अनुसंधान उत्पादन, बुनियादी ढांचा, प्रशासन, अद्यतन पाठ्यक्रम, अपर्याप्त शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया ने हमें इसे हासिल करने में काफी मदद की है।

इतिहास

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स्माइल फेस्ट में सौ से अधिक फिल्में समारोह में उभरते नए फिल्म निर्माताओं की प्रतिभा को सम्मानित किया जाएगा

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इल अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के तीसरे संस्करण में बच्चों और युवाओं के लिए 100 से भी ज्यादा फिल्मों को प्रदर्शित किया जाएगा। स्माइल फाउंडेशन द्वारा गठित स्माइल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एसआईएफएफसीवाई) बच्चों और युवाओं के लिए है। इसमें खासकर बच्चों और युवाओं के लिए ही फिल्में दिखाई जाती हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य युवाओं को विभिन्न मुद्दों और चर्चाओं के बारे में संवेदनशील बनाना और प्रोत्साहित करना है। इस समारोह में फिल्म प्रदर्शन के अलावा उभरते नए फिल्म निर्माताओं के प्रतिभा को सम्मानित कर प्रोत्साहित भी किया जाएगा। इस वर्ष एसआईएफएफसीवाई ने 100 से भी अधिक देशों से 2000 प्रविष्टियां प्राप्त की हैं।महोत्सव निदेशक एवं एसआईएफएफसीवाई के फेस्टिवल निदेशक जीतेंद्र मिश्रा ने कहा, ‘हम हर साल फिल्म स्क्रीनिंग के अलावा बच्चों और युवाओं को शिक्षित और सशक्त बनाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की फिल्म-निर्माण कार्यशालाओं का भी आयोजन करते हैं। एसआईएफएफसीवाई विभिन्न प्रकार की कार्यशालाओं की मेजबानी में 'टेक वन' नामक एक विशेष कार्यक्रम का भी आयोजन करता है। इस साल इसका आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित ब्रिटिश आधारित संगठन 'फिल्म्स वीदाउट बॉर्डर्स' द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जिसका मकसद बच्चों को फिल्म निर्माण के बारे में शिक्षित और अवगत कराना है।’ स्माइल फाउंडेशन के कार्यकारी ट्रस्टी और एसआईएफएफसीवाई के अध्यक्ष शांतनु मिश्रा ने कहा, ‘बच्चे और युवा किसी भी देश का भविष्य होते हैं और अगर इन्हें शुरुआत से ही संवेदनशील बनाया जाए तो वह समाज की सोच में बदलाव के प्रतिनिधि बन कर उभर सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश, आज की दुनिया में युवाओं के प्रकृति में सहानुभूति की प्रवृत्तियां उदासीन होती जा रही है। हमारा उद्देश्य यह है की बच्चों और युवाओं को ज्ञानयुक्त सम्मलेन के माध्यम से संवेदनशील बनाया जाए, ताकि उनके मन में स्थाई प्रभाव का भी संचार हो सके।’ (आईएएनएस)


26 गुड न्यूज

04 - 10 दिसंबर 2017

13 वर्षीय उद्यमी हमीश आकर्षण का केंद्र

स्कूलों में गूंजेगा 'जय हिंद सर' मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह ने की घोषणा

ध्यप्रदेश के सरकारी और निजी विद्यालयों में आने वाले दिनों में उपस्थिति दर्ज कराने के दौरान ‘यस सर’ या ‘यस मैडम’ की जगह ‘जय हिंद सर’ व ‘जय हिंद मैडम’ सुनाई देगा। भोपाल में

राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह ने कहा कि अब छात्र यस सर, यस मैडम के स्थान पर जय हिंद सर व जय हिंद मैडम बोलेंगे। उन्होंने कहा कि प्राइवेट स्कूलों को भी इस संबंध में एडवाइजरी जारी की जाएगी। विद्यालय में उपस्थिति दर्ज किए जाने के समय छात्र-छात्राएं अभी तक यस सर-यस मैडम बोलते आए हैं। अभी तक चली आ रही परंपरा में यह बदलाव कब से लागू होगा इसका ऐलान मंत्री शाह ने नहीं किया है। शाह के मुताबिक, ‘प्रदेश के सभी एक लाख 22 हजार शासकीय स्कूल में यह व्यवस्था लागू होगी। उसके बाद निजी स्कूलों में यह व्यवस्था लागू की जाएगी।’ (एजेंसी)

गांधीवादी सुब्बाराव बच्चों संग मना रहे हैं आनंद महोत्सव डॉ. एस एन. सुब्बाराव (भाई जी) ने गीत और खेल के माध्यम से बच्चों को अपना साथी बना लिया

ध्य प्रदेश में मुरैना जिले के जौरा में गांधीवादी एसएन सुब्बाराव बाल आनंद महोत्सव में जुटे देश भर के बच्चों को खुशहाली का संदेश दे रहे हैं। इस महोत्सव के दूसरे दिन बच्चों ने आकर्षक कलाकृतियां और रंगोली बनाई। बाल आनंद महोत्सव के दूसरे दिन ध्वजारोहण के साथ कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। इस मौके पर महोत्सव के संस्थापक डॉ. एसएन सुब्बाराव (भाई जी) ने गीत और खेल के माध्यम से बच्चों को अपना साथी बना लिया। यही कारण रहा कि बच्चे भी उनके साथ समूह स्वर में गीत गाने लगे। उन्होंने बच्चों से कहा कि पूरी दूनिया में सुख, शांति एवं खुशहाली लानी है तो हमको जाति, धर्म, प्रांतीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर मानवीयता का रिश्ता बनाना होगा। यहां शामिल हजारों बच्चों के मन और दिल एक जैसे हैं उनके दिल में विभाजन की कोई लकीरें नहीं हैं, लेकिन बड़े होते-होते बच्चों के सुकोमल दिलों में विभाजन के अंकुर डाल दिए जाते हैं। इसलिए बाल आनंद महोत्सव में ऐसे संस्कारों से बच्चों को संस्कारित करना है ताकि बच्चों का दिल बड़ा बन

सके तभी हम कह सकते हैं कि सारा जगत हमारा है। बाल महोत्सव में बच्चों ने विविध कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी कला का प्रदर्शन किया। एक तरफ कागज के ऊपर बच्चों ने चित्र बनाए, वहीं दूसरी तरफ कुछ बच्चे मिट्टी की मूर्तियां बनाने में व्यस्त रहें। पांच हजार वर्गफीट की जगह में बालक-बालिकाओं ने अद्भूत रंगोलियां बनाईं तो गायन, भाषण प्रतियोगिता, योगासन, संगीत में भी बच्चे पीछे नहीं रहे। इस महोत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चे हिस्सा ले रहे हैं। इस अवसर पर राष्ट्रीय युवा योजना के राष्ट्रीय सचिव करियल सुकुमारन ने बताया कि देश में यह

देश में यह एकमात्र आयोजन है जिसे राष्ट्रीय युवा योजना प्रतिवर्ष आयोजित करता है और देश भर के बच्चे स्वेच्छानुसार उत्साहपूर्ण तरीके से भाग लेते हैं

एकमात्र आयोजन है जिसे राष्ट्रीय युवा योजना प्रतिवर्ष आयोजित करता है और देश भर के बच्चे स्वेच्छानुसार उत्साहपूर्ण तरीके से भाग लेते हैं। महात्मा गांधी सेवा आश्रम के सचिव रण सिंह परमार ने बताया कि बाल महोत्सव के1200 बालक-बालिकाएं हिस्सा ले रहे हैं। इस मौके पर महाराष्ट्र से आए बाल विजय भाई तथा 24 राज्यों से आए शिक्षक एवं शिक्षिकाएं भी मौजूद रहीं। (आईएएनएस)

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आस्ट्रेलिया का एप्प डेवलपर हमीश फिनलेसन जीईएस में सबसे कम उम्र का कारोबारी है

श्विक उद्यमिता सम्मेलन (जीईएस) में हैदराबाद पहुंचे कारोबार जगत के 1,500 नुमाइंदों के बीच महज 13 साल का एक कारोबारी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आस्ट्रेलिया का एप्प डेवलपर हमीश फिनलेसन इस सम्मेलन में सबसे कम उम्र का कारोबारी है। वह स्वलीन (ऑटिस्टिक) है, मतलब ऐसे रोग से ग्रसित है, जिसमें बच्चा अपने आप में खोया रहता है। लेकिन इससे उसके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है और उसने पांच एप्स बनाए हैं, जिनमें एक एप ऐसा है, जो ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (एएसडी) से पीड़ित मरीजों की मदद करने में सहायक है। हमीश ने बताया कि उसने ट्रिपल टी एंड एएसडी एप्प लाया है, जिसमें डे-टु-डे टिप्स हैं, जिनसे ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को मदद मिलती है और ऑटिज्म की जानकारी के इच्छुक लोग भी इससे फायदा उठा सकते हैं। क्वींसलैंड से आया सातवीं कक्षा का छात्र पर्यावरण की रक्षा की आवश्यकताओं को लेकर काफी जोश में है और

वह पर्यावरण पर चार एप्स बना चुका है। वह जब 10 साल का था, तभी उसने अपना पहला एप 'लिटरबगस्माश' बनाया था। यह एक मल्टीमीडिया, मल्टीचैनल एजुकेशनल टूल है। यह महासागरों और कछुओं की रक्षा के लिए डिजाइन किया गया एक गेम व चंदा इकट्ठा करने की एक पहल है। हमीश दूसरी बार जीईएस में शामिल हो रहा है। इससे पहले वह 2016 में सिलिकॉन वैली में आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया था। उसने कहा कि हैदराबाद में वह फलदायी वस्तुस्थिति (वर्चुअल रियलिटी) के बारे में जानना चाहता है और लोगों से कौशल में बारे में बातचीत करने को इच्छुक है। उसने भारत में आकर खुशी जाहिर की और कहा कि वह इस देश, यहां के उद्यमियों और इकोसिस्टम के बारे में जानने को उत्सुक है। हमीश के पिता ग्रीन फिनलेसन ने बताया कि उनका बेटा हमेशा प्रौद्योगिकी, गणित और कोडिंग पसंद करता है। वह जब आठ साल का था तभी से उसने कोडिंग करनी शुरू कर दी थी। (एजेंसी)

अक्षय पात्र को राष्ट्रीय पुरस्कार अक्षय पात्रा फाउंडेशन के उपाध्यक्ष चंचलपाथि दत्ता ने ग्रहण किया पुरस्कार

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ष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अक्षय पात्रा फाउंडेशन को बाल कल्याण 2017 के राष्ट्रीय बाल पुरस्कार सम्मान से नवाजा। पुरस्कार अक्षय पात्रा फाउंडेशन के उपाध्यक्ष चंचलपाथि दत्ता ने ग्रहण किया। यह पुरस्कार महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार की उपस्थिति में प्रदान किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार प्राप्त करने के बाद चंचलपाथि दत्ता ने

कहा, ‘यह अक्षय पात्र फाउंडेशन के लिए गर्व की बात है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा बाल कल्याण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए अक्षय पात्र फाउंडेशन को सम्मानित किया गया है। मैं इस पुरस्कार के लिए और प्रत्येक व्यक्ति को एक संगठन के रूप में अक्षय पात्र को मान्यता देने के लिए धन्यवाद करता हूं, जो स्कूली बच्चों के बीच भूख से जुड़ी चिंताओं को कम करने और एक बेहतर भविष्य के लिए उनकी सामाजिक आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करने की पहल की है।’ बाल कल्याण 2017 के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार बच्चों की असाधारण उपलब्धियों के लिए दिया जाता है। इसके साथ ही बाल कल्याण के लिए काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को दिया जाता है। पुरस्कार स्वरूप तीन लाख रुपये का नकद राशि और प्रत्येक संस्थान के लिए एक उद्धरण दिया जाता है। (एजेंसी)


04 - 10 दिसंबर 2017

स्वास्थ्य

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पॉलीयूरिया की परेशानी, डायबिटीज की निशानी

जिन मरीजों का ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है वे अक्सर पॉलीयूरिया से परेशान रहते हैं और एेसे ही लोग डायबिटीज के भी शिकार बनते हैं

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आईएएनएस

यबिटीज, मेटाबोलिक बीमारियों का एक समूह है, जिसमें व्यक्ति के खून में ग्लूकोज (ब्लड शुगर) का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। ऐसा तब होता है, जब शरीर में इंसुलिन ठीक से न बने या शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के लिए ठीक से प्रतिक्रिया न दें। जिन मरीजों का ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है वे अक्सर पॉलीयूरिया (बार-बार पेशाब आना) से परेशान रहते हैं। उन्हें प्यास (पॉलीडिप्सिया) और भूख (पॉलिफेजिया) ज्यादा लगती है। जेपी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के चिकित्सक डॉ. मनोज कुमार के अनुसार, टाइप 1 डायबिटीज में शरीर में इंसुलिन नहीं बनता। डायबिटीज के तकरीबन 10 फीसदी मामले इसी प्रकार के होते हैं। जबकि टाइप 2 डायबिटीज में शरीर में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। दुनिया भर में डायबिटीज के 90 फीसदी मामले इसी प्रकार के हैं। डायबिटीज का तीसरा प्रकार है गैस्टेशनल

डायबिटीज से लड़ने के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं : मोदी

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व डायबिटीज दिवस के अवसर पर लोगों से इस रोग से उबरने के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का आग्रह किया है। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ‘बीते महीने 'मन की बात' के दौरान युवाओं में बढ़ते डायबिटीज के रोग के बारे में बात की थी।’ उन्होंने अपने 29 अक्टूबर को राष्ट्र को किए गए संबोधन का चार मिनट का ऑडियो क्लिप भी संलग्न किया। डायबिटीज, जो गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को होता है। उन्होंने कहा, ‘उचित व्यायाम, आहार और शरीर के वजन पर नियन्त्रण बनाए रखकर डायबिटीज को नियंत्रित रखा जा सकता है। अगर डायबिटीज पर ठीक से नियन्त्रण न रखा जाए तो मरीज में दिल, गुर्दे, आंखें, पैर एवं तंत्रिका संबंधी कई तरह की बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है।’

• जीवनशैली: गतिहीन जीवनशैली, अधिक मात्रा में जंक फूड, फिजी पेय पदार्थो का सेवन और खाने-पीने की गलत आदतें डायबिटीज का कारण बन सकती हैं। घंटों तक लगातार बैठे रहने से भी डायबिटीज की संभावना बढ़ती है। • सामान्य से अधिक वजन: अगर व्यक्ति शारीरिक रूप से ज्यादा सक्रिय न हो अथवा मोटापे का शिकार हो, उसका वजन सामान्य से अधिक हो तो भी डायबिटीज की सम्भावना बढ़ जाती है। ज्यादा वजन इंसुलिन के निर्माण में बाधा पैदा करता है। शरीर में वसा की लोकेशन भी इसे प्रभावित

करती है। पेट पर अधिक वसा का जमाव होने से इंसुलिन उत्पादन में बाधा आती है, जिसका परिणाम टाइप 2 डायबिटीज, दिल एवं रक्त वाहिकाओं की बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है। ऐसे में व्यक्ति को अपने बीएमआई (शरीर वजन सूचकांक) पर निगरानी बनाए रखते हुए अपने वजन पर नियन्त्रण रखना चाहिए। • जीन एवं पारिवारिक इतिहास: कुछ विशेष जीन डायबिटीज की संभावना बढ़ा सकते हैं। जिन लोगों के परिवार में डायबिटीज का इतिहास होता है, उनमें इस रोग की सम्भावना अधिक होती है।

बचाव के कारगर तरीके

• नियमित व्यायाम करें: गतिहीन जीवनशैली डायबिटीज के मुख्य कारणों में से एक है। रोजाना कम से कम 30-45 मिनट व्यायाम डायबिटीज से बचने के लिए आवश्यक है। • संतुलित आहार: सही समय पर सही आहार जैसे फलों, सब्जियों और अनाज का सेवन बेहद फायदेमंद है। लम्बे समय तक खाली पेट न रहें। • वजन पर नियंत्रण रखें: उचित आहार और नियमित व्यायाम द्वारा वजन पर नियंत्रण रखें। कम वजन और उचित आहार से डायबिटीज के लक्षणों को ठीक कर सकते हैं।

• अच्छी नींद : रोजना सात-आठ घंटे की नींद महत्वपूर्ण है। नींद के दौरान हमारा शरीर विषैले पदार्थों को बाहर निकाल कर शरीर में टूट-फूट की मरम्मत करता है। देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने से डायबिटीज और उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ती है। • तनाव से बचें : तनाव आज हर किसी के जीवन का जरूरी हिस्सा बन गया है। मनोरंजक एवं सामाजिक गतिविधियों द्वारा अपने आप को तनाव से दूर रखने की कोशिश करें। साथ ही तनाव के दौरान सिगरेट का सेवन करने से डायबिटीज की सम्भावना और अधिक बढ़ जाती है।

जन-जन तक पहुंची जन औषधि

देशभर में 2,700 से ज्यादा जन औषधि केंद्र काम कर रहे हैं और यह सरकार की सफलतम योजनाओं में शुमार हो रही है

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एसएसबी ब्यूरो

पीए सरकार ने 80 स्टोर्स खोलकर भारतीय जन औषधि स्कीम की शुरुआत की थी, लेकिन यह योजना उसी सरकार में दम तोड़ने लगी थी। लेकिन, मोदी सरकार ने योजना का नाम बदलकर इसमें नई जान फूंक दी। अब देशभर में 2,700 से ज्यादा जन औषधि केंद्र काम कर रहे हैं और यह मोदी सरकार की सफलतम योजनाओं में शुमार हो रही है। इस योजना में लोगों को कम कीमत पर अच्छी क्वालिटी की जेनेरिक दवाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं। मसलन, बाजार में लगभग 54 रुपए में मिलनेवाली डायबीटीज

की दवा सरकार जन औषधि केंद्र पर महज 4 रुपए में दे रही है। आइए जानते हैं, सरकार ने इस योजना को कैसे सफल बनाया। यूपीए सरकार के दौरान जन औषधि केंद्र में मिलने वाले दवाइयों एवं सर्जिकल उपकरणों की संख्या 100 के आस-पास थी, जबकि आज इसमें अब 636 दवाएं और 132 मेडिकल और सर्जरी से जुड़ी चीजें कम कीमत पर बेची जा रही हैं। इस योजना में विशेष बीमारियों वाली कैटेगरी की दवाइयों की लिस्ट पहले अधूरी थी। अब विशेष रोगों के इलाज की सभी 23 बड़ी श्रेणियों, मसलन ऐंटीइनफेक्टिव, ऐंटी-डायबिटिक, कार्डियोवॉस्क्युलर,

ऐंटी-कैंसर और गैस्ट्रो-इंटेंस्टिनल आदि की दवाइयां इस लिस्ट में आ चुकी हैं। पहले जन औषधि स्टोर्स में केवल सरकारी विभाग ही दवा सप्लाइ का काम करते थे, लेकिन अब इसमें मान्यता प्राप्त कमसे-कम 125 निजी सप्लायर्स दवा की आपूर्ति कर रहे हैं। ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयूज ऑफ इंडिया (बीपीपीआई) जन औषधि स्टोर्स में आपूर्ति की जा रही दवाओं की क्वॉलिटी पर नजर रखता है। जन औषधि केंद्र का सालाना टर्नओवर भी लगतार बढ़ रहा है। इस वित्त वर्ष में अक्टूबर तक इनका टर्नओवर 73 करोड़ पहुंच चुका है। जबकि 2016-17 में इसका टर्नओवर 33 करोड़ और 2015-16 में केवल 12

करोड़ था। केंद्र सरकार ने जन औषधि स्टोर शुरू करने के लिए प्रोत्साहन राशि को बढ़ाकर 2.5 लाख रुपए कर दिया है। पहले यह राशि केवल 1.5 लाख थी। सरकार ने रिटेलर्स और डिस्ट्रिब्यूटर्स के मार्जिन को भी बढ़ा दिया है। इन सस्ती दवाईयों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इसके स्टोर्स 1000 रेलवे स्टेशनों पर खोले जाएंगे, साथ इन्हें पेट्रोल पंपों पर भी खोलने की योजना है।


28 स्वास्थ्य कैंसर मरीजों को है धन की कमी 04 - 10 दिसंबर 2017

एक अध्ययन से पता चला है कि 69 प्रतिशत कैंसर मरीजों के पास इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं

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प्रदूषण से बचाव के उपाय

ष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर है और बड़े पैमाने पर लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो रही हैं। अस्पतालों में मरीजों की तादाद बढ़ने लगी है। प्रदूषण चूंकि हवा में है इसीलिए इससे बचा भी नहीं जा सकता। योग औषधि संस्थान के निदेशक योगी

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ऐसे करें बचाव

फेस मास्क का प्रयोग करें, और यदि मास्क उपलब्ध नहीं है तो मुहं को ढक कर रखें आंखों में जलन हो तो बार-बार पानी से धोएं सुबह पार्क में न टहलें, क्योंकि सुबह नमी के कारण धुआं नीचे रहता है पानी ज्यादा पीएं, जिससे टॉक्सिंस शरीर से बाहर निकल जाए

दीपक डडवाल ने कहा है कि प्रदूषण चूंकि हवा में है और हवा के बिना कोई रह नहीं सकता, ऐसे में सावधानी ही सबसे बड़ा उपाय है। उन्होंने कहा कि जागरूकता से ही इस स्थिति का मुकाबला किया जा सकता है। (आईएएनएस)

5. 5 शरीर से टॉक्सिंस को बाहर निकालने के लिए ऐलोवेरा जूस, त्रिफला पाऊडर, गुड़, च्यवनप्राश का सेवन करें 6 सांस लेने में तकलीफ हो तो चाय की 6. भाप लें, इसके लिए स्टीमर में एक टी बैग डालें, फिर भाप लें 7 बंद कमरों में रूम फ्रेशनेर का प्रयोग 7. न करें 8. 8 सुबह और शाम को खिड़कियां और दरवाजे बंद रखें, क्योंकि इस समय प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ होता है

अब दवा नहीं ली, तो पकड़े जाएंगे

सेंसर ट्रैकिंग से युक्त ऐसी दवा विकसित की गई है, जिसको खाने के बाद अगर आपने वक्त पर दवा नहीं ली तो डॉक्टर को इसका पता चल जाएगा

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आईएएनएस

सर से जूझने के लिए 69 प्रतिशत लोगों के पास किसी प्रकार की वित्तीय तैयारी या सहायता या बीमा कवर नहीं होता है। कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार, मुश्किल से 21 प्रतिशत लोगों के पास विशिष्ट 'कैंसर' बीमा कवर होता है, जिससे उनका मेडिकल खर्च निकलता है। 26 प्रतिशत लोग इलाज के खर्च के लिए कर्ज लेते हैं। फ्यूचर जनरली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस (एफजीआईएलआई) द्वारा शोध कंपनी आईपीएसओएस के साथ मिलकर देश भर में किए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 63 प्रतिशत कैंसर रोगियों ने इलाज और इससे जुड़े अन्य खर्चो को कवर करने के लिए कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेने की बात कबूली है। 31 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कैंसर से लड़ने के लिए वित्तीय योजना की जरूरत पर विचार-विमर्श भी नहीं किया है। यह आंकड़ा खतरे की घंटी है। कैंसर विशेषज्ञ मानते हैं कि तीन में से दो कैंसर मरीजों में बीमारी का पता तीसरे या चौथे चरण में ही चल पाता है, इस तरह इलाज का खर्च बहुत अधिक आता है। ज्यादातर लोग इलाज के खर्च को पूरा करने के लिए या तो निजी बचत की ओर देखते हैं या फिर पर्सनल लोन लेते हैं। यह सर्वेक्षण 11 बड़े शहरों में 25 वर्ष और इससे ज्यादा आयु-वर्ग के नागरिकों के बीच और मेट्रो शहरों में 40 अनुभवी कैंसर विशेषज्ञों के बीच किया गया। इस अनुसंधान का मुख्य मकसद जागरूकतास्तर का मूल्यांकन करना, वित्तीय तैयारी पर नजर

रखना और कैंसर के विषय में प्रतिभागियों की धारणा और वित्तीय जटिलता की वास्तविकता के बीच के अंतर का पता लगाना था। फ्यूचर जनरली के 'कैंसर फाइनेंशियल प्रीपेयर्डनेस सर्वे' के नतीजे इस तथ्य को उजागर करते हैं कि आम लोगों के बीच कैंसर के मामलों, चरण, प्रकार, इलाज के खचरें को लेकर जागरूकता कम है। सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार, 56 प्रतिशत लोग अपने परिवार और दोस्तों के बीच कैंसर के होने को लेकर अनभिज्ञ थे। यह खतरे की घंटी है, खास कर इसको देखते हुए कि कैंसर चिकित्सकों ने अनुमान लगाया है कि साल 2020 तक हर 10 भारतीयों में से तीन लोग कैंसर से पीड़ित हो सकते हैं। सर्वे में सामने आया है कि 65.7 प्रतिशत (हर तीन में से दो) कैंसर मरीजों में बीमारी का पता तीसरे या चौथे चरण में होता है। करीब 42 फीसदी लोगों ने कैंसर के विभिन्न चरणों के बारे में 'कुछ न कुछ' जानकारी होने का दावा किया, वहीं 28 प्रतिशत यह सोचते हैं कि वे कैंसर को लेकर 'पूरी तरह जागरूक' हैं। इसके ठीक विपरीत कैंसर विशेषज्ञों के सर्वे से पता चलता है कि सिर्फ सात प्रतिशत मरीज कैंसर के विभिन्न चरणों के बारे में 'पूरी तरह से जागरूक' हैं, जबकि 30 प्रतिशत इसके बारे में 'ठीकठाक जानकारी' रखते हैं। कैंसर के चरण, मरीज की अस्थिरता और जरूरी दवाइयां संबंधी सुविधाओं के स्तर को देखते हुए, कैंसर का इलाज पांच लाख रुपये से 20 लाख रुपए के बीच चला जाता है।

मय पर दवाई नहीं ले पाना एक आम समस्या है, अक्सर आपने परिजनों को भी यह कहते सुना होगा कि आज मैं दवाई लेना भूल गया या भूल गई। कुछ लोग तो दवाई भूलने के बाद अपने परिजनों और डॉक्टर से झूठ बोल देते हैं कि उन्होंने समय पर दवाई ली है। लेकिन अब यह झूठ छिपाया नहीं जा सकेगा। जी हां, अमेरिकन फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने ऐसी दवाई को मंजूरी दी है, जिसमें सेंसर लगे हुए हैं। यह दवाई मरीज का झूठ आसानी से पकड़ लेगी। इस दवा को लेने के बाद चिकित्सक को आसानी से पता चल जाएगा कि आपने दवा ली है या नहीं, या आपने दवा का सेवन कब किया है। दरअसल किसी भी रोग में डॉक्टर की तरफ से मरीज की बीमारी के हिसाब से उसकी दवा की डोज तय की जाती है, लेकिन यदि दवा, सही समय पर नहीं ली जाती तो ऐसे में मुश्किल बढ़ जाती है। एफडीए की तरफ से बताया गया कि एंटीसाइकाटिक ड्रग एबिलिफी मायसाइट पहली ऐसी मेडिसन है, जिसमें डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लगा

हुआ है। इस डिजीटल पिल को सिलिकॉन वैली की प्रोटीयस डिजिटल हेल्थ और जापानी फार्मा कंपनी ने मिलकर तैयार किया है। यह पिल सिजोफ्रेनिया, बायपोलर आई डिसऑर्डर के साथ उम्रदराज लोगों में डिप्रेशन के उपचार में काम आती है। इस पिल से खर्च बचने की भी बात कही जा रही है। हर उम्र वर्ग के लोगों में समय पर दवाई लेना भूलने की समस्या आम है। लाखों रोगियों के साथ यह परेशानी रहती है कि वे समय पर दवाएं लेना भूल जाते हैं।

ऐसे करेगी काम

यह डि​िजटल पिल एक इंटरनल सेंसर से इंफारमेशन लेकर वियरेबल पैच तक पहुंचाती है। इसके बाद दवा लेने से जुड़ा डाटा स्मार्टफोन एप, देख-रेख करने वाले व्यक्ति और मरीज की स्थिति पर नजर रख रहे डॉक्टर तक पहुंचाया जाता है। रोगी के लेने के बाद जब यह पिल पेट में पाए जाने वाले एसिड के साथ मिलती है तो इससे इलेक्ट्रिकल सिग्नल जेनरेट होते हैं। इस गोली में कॉपर, मैगनीशियम और सिलिकॉन होते हैं, जो पूरी तरह सेफ हैं। इस पिल से जेनरेट होने वाले डाटा को साझा करने से पहले मरीजों को एक सहमति पत्र पर दस्तखत करने होते हैं। डिजिटल निगरानी के लिए यदि मरीज सहमति जताता है तो डॉक्टर के अलावा परिवार के चार अन्य लोगों के पास यह इलेक्ट्रॉनिक डाटा खुद ब खुद पहुंच जाएगा। इससे साफ पता चल जाएगा कि मरीज ने समय पर दवाई ली या नहीं। (एजेंसी)


04 - 10 दिसंबर 2017

हर्निया की सर्जरी की नई तकनीक ईजाद

स्वास्थ्य

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सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. मनीष कुमार ने हर्निया के ऑपरेशन की नई और आसान तकनीक विकसित की है

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आईएएनएस

ष्ट्रीय राजधानी स्थित सर गंगाराम अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक मनीष कुमार गुप्ता ने हर्निया की सर्जरी के लिए नई तकनीक ढूंढ़ निकाली है। यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि केवल 5 एमएम के 3 की-होल बनाकर यह सर्जरी की जा सकती है। अब तक इस तकनीक की मदद से 100 से ज्यादा सर्जरियां की जा चुकी हैं। डॉ. मनीष ने सर्जरी की इस नई तकनीक को '555 मनीष टेक्निक' नाम दिया है। उन्होंने बताया कि ग्रोइन हर्निया की सर्जरी के लिए पहले ओपन सर्जरी की जाती थी।

दु

बाद में लेप्रोस्कोपी, यानी दूरबीन की मदद से सर्जरी की जाने लगी। अब तक की जाने वाली सर्जरी में चौड़े हसन ट्रोकार का इस्तेमाल करते हुए हर्निया तक पहुंचा जाता था। हसन ट्रोकार के लिए नाभि के नीचे 1.5 से 2 सेंटीमीटर का कट लगाया जाता था। डॉ. मनीष ने कहा कि बड़े चीरे की वजह से उत्तकों को ज्यादा नुकसान होता है। साथ ही चीरा बड़ा होने के कारण संक्रमण की आशंका अधिक होती है। बड़े चीरे के कारण मरीज को दर्द अधिक होता है और नाभि के नीचे बड़ा निशान आ जाता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सक मनीष ने 2 एमएम की सीरींज से र्रिटेक्टर बनाया है, जिसकी मदद से

5 एमएम के चीरे से 5 एमएम के ट्रोकार को पेट की सतह में डालना संभव हुआ है। सर्जन केवल दो मिनट में सर्जरी पॉइंट तक पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि इस नई तकनीक से 3 पांच एमएम के छिद्रों से ग्रोइन हर्निया का सफल ऑपरेशन किया जाता है। मनीष ने साथ ही 5 एमएम के ट्रोकार से मेश (जाली) डालने की तकनीक भी इजाद की है, जिससे हर्निया दोबारा होने की संभावना एक फीसदी

करोड़ो बच्चे हेपेटाइटिस से पीड़ित 80 फीसदी हेपेटाइटिस-सी संक्रमण के लिए 21 देश हैं जिम्मेदार

नियाभर में पांच करोड़ से ज्यादा बच्चे हेपेटाइटिस से पीड़ित बताए जा रहे हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि वर्ष 2016 में पांच करोड़ 20 लाख बच्चे पीड़ित थे, जिनमें 21 लाख बच्चे एचआईवीएड्स से पीड़ित थे। हालांकि, अध्ययन में वर्ष 2016 के दौरान पूरी दुनिया में वायरल हेपेटाइटिस के मरीजों की तादाद बताई गई है। इनमें 19 साल से कम उम्र के 40 लाख बच्चे व किशोर हेपेटाइटिससी और 18 साल से कम उम्र के 48 लाख बच्चे व किशोर हेपेटाइटिसबी से पीड़ित थे। ब्राजील में आयोजित वर्ल्ड हेपेटाइटिस समिट-2017 में प्रस्तुत अध्ययन के नतीजों में बताया गया है कि दोनों वायरस से यकृत संबंधी रोग, यकृत कैंसर और उससे मौत भी हो सकती है। बगैर लाभ के मकसद से काम करने वाली लंदन स्थित संस्था वर्ल्ड हेपेटाइटिस एलायंस के सीईओ रकेल पेक ने कहा कि दुनियाभर में बच्चों को हेपेटाइटिस का भारी खतरा बना रहता है। जाहिर है कि इसके लिए सार्वजनिक

स्वास्थ्य सेवाओं के प्रचूर निहितार्थ होते हैं। मिस्र स्थित शम्स युनिवर्सिटी के प्रोफेसर मनाल अल-सईद ने बताया कि बच्चों में 80 फीसदी हेपेटाइटिस-सी संक्रमण के लिए महज 21 देश जिम्मेदार हैं और इनमें भी इसकी दर सबसे ज्यादा विकासशील देशों में देखी जाती है। बच्चों में मुख्य रूप से हेपेटाइटिस-सी का संरचरण उनकी मां से ही होता है। फिर भी कैंसर पैदा करने वाली इस बीमारी के इलाज के लिए अत्यधिक प्रभावी डायरेक्ट एक्टिंग एंटीवायरल (डीडीए) का इस्तेमाल न तो गर्भवती महिलाओं

पर और न ही छोटे बच्चों पर किया जा सकता है, क्योंकि विशेषज्ञों ने अभी तक बच्चों में इस टीके की अनुसंशा नहीं की है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि हेपेटाइटिस-सी के मुकाबले बच्चों में नए हेपेटाइटिसबी संक्रमण के मामलों में कमी आ रही है। अध्ययन के मुताबिक टीके आने के पूर्व 1980 के दशक में प्रचलित दर 4.7 फीसदी से घटकर अब 1.3 फीसदी रह गई है। जाहिर है कि मां से बच्चों में संक्रमण की रोकथाम के लिए उठाय गए कदम और हेपेटाइटिस-बी के टीकों की तीन खुराक के वैश्विक स्तर पर फैलाने के फलस्वरूप इसके मामलों में कमी आई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, आज दुनिया के 84 फीसदी देशों में हेपेटाइटिस-बी के टीके लगवाए जाते हैं। हालांकि नवजात को दी जाने वाली प्रारंभिक खुराक के मामले में यह आंकड़ा अभी सिर्फ 39 फीसदी है। (आईएएनएस)

से भी कम हो जाती है। इस प्रक्रिया में पेट की दीवार में टांके नहीं लगाने पड़ते, जबकि पुरानी प्रक्रिया में हसन ट्रोकार के चैड़े कोन डालने के कारण पेट की भीतरी दीवार में टांके लगाने पड़ते हैं। इस नई तकनीक में छोटे चीरे लगाने से दर्द कम होता है। संक्रमण की आशंका कम होती है और निशान भी बहुत छोटा आता है, जोकि महिलाओं के लिए उपयुक्त है।

दस्त से मरते हैं हजारों बच्चे

स्त से हर दिन पूरे अफगानिस्तान में कम से कम 26 बच्चों की मौत होती है, जबकि हर वर्ष इससे मरने वाले बच्चों की संख्या 9,500 पहुंच गई है। यह जानकारी यूनिसेफ ने दी। यूनिसेफ ने एक बयान में कहा कि दस्त के कारण मरने वाले बच्चों की कुल संख्या 9,500 हो गई है, जोकि अफगानिस्तान में सालाना पांच वर्ष से कम उम्र के मरने वाले बच्चों की संख्या 80,000 का 12 प्रतिशत है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने अफगानिस्तान में यूनीसेफ के प्रतिनिधि एडेल खोर्ड के हवाले से बताया कि शौचालय का प्रयोग करना और अपने हाथों को धोना सचमुच जिंदगी या मौत का मामला है और दस्त से मृत्यु विशेष रूप से दुखद है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में इससे आसानी से बचा जा सकता है। खोज के मुताबिक, दस्त संक्रमण से जुड़ा जोखिम अफगानिस्तान में बढ़ गया है, जहां 12 लाख बच्चे पहले से कुपोषित हैं और 41 प्रतिशत बच्चे अविकसित हैं। (आईएएनएस)


30 कही अनकही

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दिलीप कुमार पर लगा जुर्माना

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सिगरेट चुराने की गलती की सजा के तौर पर देविका रानी ने दिलीप कुमार से सौ रुपए का जुर्माना वसूला

आनंद भारती/मुंबई

रतीय सवाक फिल्मों की पहली नायिका देविका रानी को माना जाता है़, जबकि खुद देविका ने अपने बजाए साधना बोस को पहली नायिका माना। जिनके नाम से इतिहास बन रहा हो, उसे ईमानदारी से अस्वीकार कर देने का साहस देविका रानी ने किया। यह वही देविका हैं जिनमें आदमी को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। इसी क्षमता के कारण उन्होंने जब युसुफ खान को सिनेमा में काम करने का ऑफर दिया तो वे चकरा गए। दोनों की पहली मुलाकात नैनीताल में हुई थी। युसुफ अपने फल के व्यापार के सिलसिले में वहां

गए थे और देविका रानी अपनी एक फिल्म का लोकेशन देखने गई थीं। तब उनकी जोड़ी अशोक कुमार के साथ बन गई थी। लेकिन देविका किसी और हीरो की तलाश में थीं और वह संभावना युसुफ खान में दिखाई दे गई थी। ऑफर के बाद युसुफ को लगा कि शायद किस्मत उनके साथ मजाक कर रही है। वही युसुफ जब दिलीप कुमार बन कर अपनी प्रतिभा से दुनिया को परिचित कराने लगे तो इसका सेहरा देविका को मिला कि उन्होंने सिनेमा को एक महान एक्टर दिया। वह हमेशा इस कोशिश में रहीं कि दिलीप कुमार सिनेमा का एक बड़ा चेहरा बन जाए। दिलीप कुमार को भी देविका रानी की इस इच्छा में अपना भविष्य दिखाई दे गया। तब बॉम्बे टाकीज में अशोक कुमार और दिलीप कुमार की आपस में खूब बनती थी और दोनों जमकर मस्ती भी करते थे। लेकिन वे देविका रानी से डरते भी थे। दरअसल, देविका रानी अनुशासन के मामले में काफी सख्त थीं। वह हर चीज को सलीके से देखने और रखने की पक्षधर थी। स्टूडियो हो या सेट, उनके रहते

माला सिन्हा का डर

मर्यादा का किसी में उल्लंघन करने का साहस नहीं था। उस समय की एक घटना बहुत चर्चित हुई थी। अशोक कुमार को सिगरेट पीने की जबरदस्त आदत थी। एक दिन उनकी सिगरेट खत्म हो गई। तलब ऐसी महसूस हुई कि रहा नहीं गया। उन्होंने दिलीप कुमार से मनुहार की कि वह देविका रानी के बैग से किसी तरह एक सिगरेट ला दे। इसीलिए कि युसुफ पर देविका मेहरबान थीं। युसुफ खान ने पहले आनाकानी की लेकिन अशोक कुमार के बहुत आग्रह करने पर लाने चले गए। मगर दुर्भाग्य कि उसी समय देविका रानी अपने ऑफिस में आ गईं। उन्होंने युसुफ को सिगरेट निकालते देख लिया। उन्हें बहुत दुःख हुआ। लेकिन उन्होंने सोचा कि अगर इस चोरी की सजा नहीं दी गई तो भविष्य में यह आदत बनी रह जाएगी। उन्होंने अपना इमोशनल रिलेशन को एक किनारे रखते हुए सबके सामने सौ रुपए जुर्माने की सजा सुना दी। ना-ना करते हुए भी दिलीप कुमार को वह जुर्माना भरना पड़ा था।

घर से लेकर फिल्मों के सेट तक पर डरी डरी रहने वाली माला सिन्हा के डर को राज कपूर ने मिनटों में किया छू मंतर

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आनंद भारती/मुंबई

पाली मूल की हीरोइन माला सिन्हा हमेशा डर-डर कर रहती थीं। यह डर सिनेमा को अलविदा कहने और अपनी बेटी प्रतिभा के भविष्य संवारने तक बना रहा। यह डर बचपन से ही था या बाद में किसी परिस्थिति के कारण आया, इसका कहीं कोई संकेत उपलब्ध नहीं है। लेकिन उनके नजदीकी लोग कहा करते थे कि माला सिन्हा जब बड़ी अभिनेत्री बन गई थीं, तब भी अपने पिता से डर कर रहा करती थीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों में वह बाहर बिंदास होकर रहतीं, लेकिन घर आते ही एक घरेलू लड़की बन जाती थीं। पिता का कहा उनके लिए पत्थर की लकीर की तरह था। उनकी हर बात वे मानती थीं। बचपन में उन्हें फिल्में देखने का बहुत शौक था। फिल्में बहुत देखती थीं और परदे पर देखे हुए डांस पर घर आते ही पिता की अनुपस्थिति में धमाल मचाने लगती थीं। नरगिस जैसी खूबसूरत नैन-नक्श वाली माला को

कभी बंबई में संघर्ष के दौरान बहुत कुछ सुनने को मिलता था। कोई उन्हें चपटी नाक वाली कहकर तो कोई हिंदी ठीक से नहीं बोल पाने के कारण मजाक उड़ाता था। लोग सावधान भी करते कि नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला जैसी हीरोइनों के युग में अपनी कामयाबी की कल्पना भी मत करो। इस तरह की बातें माला सिन्हा को परेशान करने लगी थीं। उनके अंदर अपनी विफलता का डर समा गया था। शुरू की कुछ फिल्में जब चल नहीं पाईं तो वह डर पक्का होता चला गया। हालांकि गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ ने उन्हें तब उस भय से बाहर निकाला, जब उनकी एक्टिंग की जमकर तारीफ़ हुई। ‘प्यासा’ की शूटिंग के दौरान भी माला सिन्हा डरी-डरी सी रहती थी। इसका खुलासा खुद उन्होंने ही किया था, ‘मैं गुरुदत्त का आदर करती, लेकिन उनसे डरती थी। यदि वे मुझे सेट पर नौ बजे आने के लिए कहते तो मैं सुबह छः बजे ही पहुंच जाती थी। इसीलिए कि वे अनुशासन के मामले में काफी सख्त थे। किसी से भी फालतू बातें नहीं करते थे।’ एक मजेदार बात

यह है कि माला सिन्हा की तुलना जब भी लोग नरगिस से करते तो वह राज कपूर के सपनों में खो जाती थी। सोचने लगती कि कब उनसे मिलने का मौका मिलेगा? वह सपना पूरा हुआ फिल्म ‘परवरिश’ में, जब राज कपूर के साथ काम करने का चांस मिला। उस फिल्म की शूटिंग से एक रात पहले वह सो नहीं पाईं। रात भर सीन का रिहर्सल करती रहीं। तब माला सिन्हा की हिंदी भी बहुत कमजोर थी, बोलने में अटक जाया करती थीं। अगले दिन डरती हुई सेट पर पहुंचीं। राज कपूर से मिलने की घबराहट में उनके हाथ-पांव कांपने लगे थे। राज कपूर ने दूर से ही देखकर इसे भांप लिया। तब वे अपनी जगह से उठे और माला सिन्हा के पास आ गए। हाय-हेलो किया, प्यार से अपने बगल में बिठाया और वे उनसे बांग्ला में घर-परिवार की बातें करने लगे। इसका तुरंत असर हुआ। उनके मन की घबराहट तो दूर हुई ही, सेट पर सबके साथ अपनापे का संबंध भी बन गया।


04 - 10 दिसंबर 2017

लोक कथा

मध्य पूर्व की लोक कथा

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अच्छा और बुरा गुलाम

क बादशाह ने दो गुलाम सस्ते दाम में खरीदे। उसने पहले से बातचीत की तो वह गुलाम बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ। बादशाह जब इस गुलाम की परीक्षा कर चुका तो उसने दूसरे को पास बुलाकर देखा तो पाया कि यह बहुत बदसूरत और गंदा है। बादशाह इसके चेहरे को देखकर खुश नहीं हुआ, परन्तु उसकी योग्यता और गुणों की जांच करने लगा। पहले गुलाम को उसने नहाधोकर आने के लिए कह दिया और दूसरे से कहा – ‘तुम अपने बारे में कुछ बताओ। तुम अकेले ही सौ गुलामों के बराबर हो। तुम्हें देखकर उन बातों पर यकीन नहीं होता जो तुम्हारे साथी ने

तुम्हारे पीठपीछे कही हैं।’ गंदे गुलाम ने जवाब दिया – ‘उसने यदि मेरे बारे में कुछ कहा है तो सच ही कहा होगा। यह बड़ा सच्चा आदमी है। इससे ज्यादा भला आदमी मैंने और कोई नहीं देखा। यह हमेशा सच बोलता है। यह स्वभाव से ही सत्यवादी है, इसीलिए इसने जो मेरे संबंध में कहा है यदि वैसा ही मैं इसके बारे में कहूं तो झूठा दोष लगाना होगा। मैं इस भले आदमी की बुराई नहीं करुंगा। इससे तो यही अच्छा है कि मैं खुद को दोषी मान लूं। बादशाह सलामत, हो सकता है कि वह मुझमें जो ऐब देखता हैं वह मुझे खुद न ​िदखते हों।’ बादशाह ने कहा – ‘मैं तो चाहता हूं कि तुम

मृत्यु की उत्पत्ति

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निया नई-नई बनी थी और एक बूढ़ा आदमी अपनी बुढ़िया पत्नी के साथ टहल रहा था। बूढ़े ने बुढ़िया से कहा – ‘चलो, हम यह तय करते हैं कि यह दुनिया कैसे चले।’ ‘ठीक है’ – बुढ़िया ने कहा – ‘यह कैसे होगा?’ ‘हम्म’– बूढ़े ने कहा – ‘चूंकि यह बात मेरे मन में पहले आई है इसलिए किसी भी मामले में मेरी बात पहले मानी जाएगी।’ ठीक है – बुढ़िया बोली – ‘फिर तुम्हारे बाद मैं जो भी कहूं उसे मान लिया जाएगा।’ बूढ़ा इससे सहमत हो गया। वे अपने आसपास देखते हुए घूमते-फिरते रहे। बूढ़े ने कहा – ‘मैं शिकार के तरीके के बारे में सोच रहा हूं। आदमी शिकार किया करेंगे। जब भी वे किसी जानवर को पकड़ना चाहेंगे तो उसे इशारा करके अपने पास बुला लिया करेंगे। जानवर के पास आ जाने पर उसका शिकार कर लेंगे।’ ‘मैं यह बात तो मानती हूं कि आदमी शिकार करेंगे’ – बुढ़िया ने कहा – ‘लेकिन यदि जानवर इस तरह इशारा करने पर ही पास आने लगेंगे तो लोगों का जीवन बहुत आसान हो जाएगा। मैं चाहती हूं कि मनुष्यों को देखकर जानवर डर के भाग जाएं। इस तरह उनका शिकार करना मुश्किल हो जाएगा और आदमी हमेशा मजबूत

और होशियार बने रहेंगे।’ “जैसा हम तय कर चुके हैं, ‘तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी’ – बूढ़े ने कहा। कुछ समय बाद बूढ़े ने कहा – ‘मैं लोगों के नाक-नक्श के बारे में सोच रहा हूं। उनके ​िसर के एक ओर आंखें होंगी और दूसरी ओर मुंह। उनके हर हाथ में दस उंगलियां होनी चाहिए।’ ‘मैं भी यह मानती हूं कि लोगों के सर में आंखें और मुंह होना चाहिए’ – बुढ़िया ने कहा – ‘लेकिन उनकी आंखें एक ओर ऊपर की तरफ होंगी और उनका मुंह उसी ओर कुछ नीचे होना चाहिए। उनके हांथों में उंगलियां होनी चाहिए पर हर हाथ में दस उंगलियां होने से कामकाज में अड़चन होगी, इसीलिए हर हाथ में पांच उंगलियां होना ठीक रहेगा।’ ‘तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी’ – बूढ़ा बोला। चलते-चलते वे नदी के पास आ गए। ‘चलो अब जिंदगी और मौत के बारे में भी तय कर लेते हैं’ – बूढ़े ने कहा – ‘इसके लिए मैं इस नदी में भैंस की खाल फेंकूंगा। यदि यह तैरती रहेगी तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिंदा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे।’ बूढ़े ने नदी में खाल फेंक दी। एक डुबकी लगाने के बाद खाल नदी की सतह पर आ गई।

भी इसकी कमियों का वैसा ही बखान करो जैसा इसने तुम्हारी कमियों का किया है, जिससे मुझे इस बात का यकीन हो जाए कि तुम मेरी खुशी और सलामती चाहते हो और मुल्क को चलाने में मेरे काम आ सकते हो।’ गुलाम बोला – ‘बादशाह सलामत, इस गुलाम में सादगी और सच्चाई है। बहादुरी और बड़प्पन भी ऐसा है कि मौका पड़ने पर जान तक न्योछावर कर सकता है। वह घमंडी नहीं है और अपनी गलतियों को खुद ही जाहिर कर देता है। अपनी गलतियों को सामने लाना और ऐब ढूंढना हालांकि बुरा है तो भी वह दूसरे लोगों के लिए तो अच्छा ही है।’ बादशाह ने कहा – ‘अपने साथी की तारीफ में अति न करो और दूसरे की तारीफ करके खुद को तारीफ के काबिल नहीं बनाओ क्योंकि यदि मैंने तुम्हारा इम्तिहान लेने के लिए इसे बुला लिया तो तुम्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा।’ गुलाम ने कहा – ‘नहीं, मेरे साथी की अच्छाइयां इससे भी सौ गुना हैं। जो कुछ मैं अपने दोस्त के बारे के संबंध में जानता हूं यदि आपको उसपर यकीन नहीं तो मैं और क्या अरज करूं!’ इस तरह बहुत सी बातें करके बादशाह ने उस बदसूरत गुलाम की अच्छी तरह परीक्षा कर ली और जब पहला गुलाम स्नान करके बाहर आया

तो उसको अपने पास बुलाया। बदसूरत गुलाम को वहां से विदा कर दिया। उस सुंदर गुलाम के रूप और गुणों की प्रशंसा करके कहा – ‘पता नहीं, तुम्हारे साथी को क्या हो गया था कि इसने पीठपीछे तेरी खूब बुराई की!’ सुंदर गुलाम ने चिढ़कर कहा – ‘बादशाह सलामत, इस नामुराद ने मेरे बारे में जो कुछ कहा उसे जरा तफसील से मुझे बताइए।’ बादशाह ने कहा – ‘सबसे पहले इसने तुम्हारे दोगलेपन का जिक्र किया कि तुम सामने तो दवा हो, लेकिन पीठ-पीछे दर्द हो।’ जब इसने बादशाह के मुंह से ये शब्द सुने तो इसका पारा चढ़ गया, चेहरा तमतमाने लगा और अपने साथी बारे में उसके मुंह में जो आया वह बकने लगा। वह बदसूरत गुलाम की बुराइयां करता ही चला गया तो बादशाह ने इसके होंठों पर हाथ रख दिया और कहा – ‘बस करो, हद हो गई। उसका तो सिर्फ बदन ही गंदा है, लेकिन तुम्हारी तो रूह भी गंदी है। तुम्हारे लिए तो यही मुनासिब है कि तुम उसकी गुलामी करो।’ (याद रखो, सुंदर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं तो उसका मान नहीं हो सकता। और यदि रूप बुरा पर चरित्र अच्छा है तो उस मनुष्य के चरणों में बैठकर प्राण विसर्जन कर देना भी श्रेष्ठ है।)

बुढ़िया ने कहा –‘मैं इस तरीके से सहमत हूं पर मुझे लगता है कि इस काम के लिए भैंस की खाल का उपयोग ठीक नहीं है। उसके बजाय मैं यह पत्थर नदी में फेंकूंगी। यदि यह तैरता रहेगा तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिंदा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे, लेकिन यदि यह डूब जाएगा तो लोग मरने के बाद कभी वापस नहीं आएंगे।’ बुढ़िया ने पत्थर नदी में फेंक दिया और वह डूब गया। ‘तो ऐसा ही होगा’ – बुढ़िया ने कहा – ‘यदि लोग हमेशा जीवित रहेंगे तो दुनिया में बहुत भीड़ हो जाएगी और खाने की कमी भी पड़ जाएगी। जब लोग मरने के बाद कभी भी वापस नहीं आएंगे

तो लोगों को उनकी कमी खलेगी और दुनिया में सहानुभूति का अभाव नहीं होगा।’ बूढ़े ने कुछ नहीं कहा। कुछ समय बीत गया। बुढ़िया ने एक बच्चे को जन्म दिया। बूढ़ा और बुढ़िया अपने बच्चे पर जान छिड़कते थे। वे बहुत खुश थे। फिर एक दिन बच्चा बहुत बीमार पड़ गया और उसकी मौत हो गई। बुढ़िया अपने पति के पास गई और उससे बोली – ‘चलो हम जिंदगी और मौत के बारे में फिर से तय कर लेते हैं।’ बूढ़े ने बहुत नाउम्मीदी से कहा – ‘अब कुछ नहीं हो सकता। हम सबसे पहले यह तय कर चुके हैं कि बाद में तुम्हारी बात ही मानी जाएगी।’


32 अनाम हीरो

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

04 - 10 दिसंबर 2017

अनाम हीरो

रेहान कामालोवा

ऊर्जा की बेटी

सबसे कम उम्र की महिला उद्यमी रेहान ने इवांका ट्रंप का भी ध्यान खींचा

ब आप हवा से ऊर्जा पैदा कर सकते हैं तो फिर वर्षा के पानी से क्यों नहीं? अपने पिता के इस सवाल से अजरबैजान की 15 वर्षीय लड़की रेहान कामालोवा इस कदर प्रेरित हुई कि उन्होंने इसे हकीकत रूप देने के लिए कंपनी खोल दी। वह हैदराबाद में आयोजित आठवें वैश्विक उद्यमिता सम्मेलन (जीईएस) में हिस्सा लेने वाली सबसे कम उम्र की महिला उद्यमी थी। इस सम्मेलन का थीम 'वूमेन फ‌र्स्ट, प्रॉस्पेरिटी फॉर ऑल' था। नौवीं की छात्रा रेहान उन तीन उद्यमियों में हैं जिनका जिक्र इवांका ट्रंप ने जीईएस के उद्घाटन सत्र में अपने संबोधन में किया था। इवांका ने कहा, 'रेहान महज 15 साल की हैं, लेकिन उनकी कम उम्र बारिश के पानी से ऊर्जा पैदा करने के लिए कंपनी खोलने से रोक नहीं पाई। हम सभी आपकी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से प्रभावित हैं।' रेहान पहली बार जीईएस में हिस्सा ले रही हैं और उन्हें अपने स्टार्टअप रैनर्जी के लिए निवेशकों की तलाश है। सम्मेलन से इतर रैनर्जी की संस्थापक और सीईओ रेहान ने कहा, 'मैं एनर्जी डिवाइस बनाने के लिए निवेश के इंतजार में हूं।' मध्य वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस किशोरी को विनिर्माण यूनिट लगाने और वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने के लिए 20 हजार डॉलर (करीब 13 लाख रुपए) की जरूरत है।

न्यूजमेकर

पहली किन्नर सिपाही

गंगा कुमारी राजस्थान पुलिस में शामिल होने वाली पहली किन्नर कांस्टेबल बनी

गंगा कुमारी

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जस्थान के जालौर की रहने वाली गंगा कुमारी की मेहनत आखिरकार रंग लाई। लंबे संघर्ष के बाद राजस्थान हाई कोर्ट के निर्देश पर गंगा कुमारी को राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया है। वह राज्य की पहली ऐसी किन्नर हैं, जिन्होंने पुलिस फोर्स ज्वाइन किया है। साल तक केस लड़ना पड़ा, तब जाकर सफलता मिली। हाई कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस विभाग ने गंगा कुमारी को कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया। पुलिस विभाग ने उनके जेंडर के कारण उन्हें

नौकरी पर रखने से इनकार कर दिया था। जस्टिस दिनेश मेहता ने इस मामले को 'लैंगिक भेदभाव' करार देते हुए छह सप्ताह के अंदर नियुक्ति देने का आदेश दिया था। राजस्थान के जालौर जिले के रानीवारा इलाके की रहने वाली गंगा ने वर्ष 2013 में पुलिस भर्ती परीक्षा पास किया था। हालांकि, मेडिकल जांच के बाद उनकी नियुक्ति को रोक दिया गया था। जांच में पता चला कि गंगा कुमारी किन्नर हैं। इसके बाद गंगा कुमारी ने हाई कोर्ट की शरण ली और दो साल के संघर्ष के बाद उन्हें सफलता मिली।

चानू की सुनहरी चमक

वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सैखोम चानू ने अपने वजन से चार गुना भार उठा कर स्वर्ण पदक जीता

मेरिका के अनाहाइम शहर में चल रही वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भारत की सैखोम मीराबाई चानू ने स्वर्णिम सफलता हासिल की है। महिलाओं के 48 किलो भार वर्ग में हिस्सा लेते हुए चानू ने रिकॉर्ड कुल 194 किग्रा का भार उठाया है। वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भारत को 22 साल बाद स्वर्ण पदक हासिल हुआ है। इससे पहले इस चैंपियनशिप में भारत की ओर से ओलंपिक पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 51

सैखोम मीराबाई चानू ने 1994 और 1995 में स्वर्णिम सफलता हासिल की थी। मीराबाई की इस सफलता पर उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, खेल मंत्री और कई दिग्गजों ने बधाई दी है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक ट्वीट में लिखा, ‘वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने के लिए बधाई। भारत को आप पर गर्व है। साथ ही मणिपुर को भी बधाई जिसने देश को ऐसी कई चैंपियन महिला खिलाड़ी दी हैं।’

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 51)  
सुलभ स्वच्छ भारत (अंक 51)  
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