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वर्ष-1 | अंक-24 | 29 मई - 04 जून 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

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06 विशेष

रोशन हुआ पॉवर सेक्टर

सरकार की कारगर नीति से बदली ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर

08 स्वास्थ्य

एक कश का खतरा विश्व धूम्रपान निषेध दिवस पर विशेष

12 विज्ञान

आठवां महादेश चांद !

चांद और धरती के बीच अब और नजदीकी रिश्ता

गीता की भेंट और

प्रधानमंत्री बिहार की एक ग्रामीण महिला गीता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐसा उपहार दिया, जिसे देख प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल कर सुंदर उत्पाद बनाने का विचार अद्भुत है। यह ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के लिए उपयोगी है’

मृगांक देवम

क पुरानी कहावत है कि तोहफे की कीमत नहीं, बल्कि देने वाले की नीयत देखनी चाहिए। इस लिहाज से हाल में चर्चा में आया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया बिहार के समस्तीपुर की रहने वाली गीता देवी का तोहफा खास है। प्रधानमंत्री मोदी बिहार के समस्तीपुर की रहने वाली गीता देवी में लघु उद्योग स्थापित करने की विशाल क्षमता देखते हैं। दरअसल, गीता ने प्लास्टिक के कचरे से बनी एक टोकरी उपहार के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्सल की थी। उनको उम्मीद थी कि यह तोहफा देखकर प्रधानमंत्री उनको धन्यवाद पत्र तो जरूर लिखेंगे। लेकिन

प्रधानमंत्री ने न केवल उस 'अद्भुत' उपहार को स्वीकार किया, बल्कि उनकी इस शिल्पकला में 'लघु उद्योग स्थापित करने की विशाल क्षमता' पर भी ध्यान दिया। मोदी को वह 'अद्भुत' उपहार अपने विशेष अभियान 'स्वच्छ भारत' के लिए भी उपयोगी लगा। 50 वर्षीय गीता गुलदान, टोकरियां और ऐसी ही वस्तुएं बनाने के लिए रैपर्स और पॉली​िथन जैसे प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी को उपहार में टोकरी देने के लिए उनके बेटे मनोज कुमार झा ने उन्हें प्रोत्साहित किया था। गीता ने पिछले महीने इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) भेजा था। प्रधानमंत्री का जवाब मिलने के बाद उन्होंने बताया, 'मैं बहुत खुश हूं कि मोदी जी ने मुझे

जवाब भेजा है।' अशिक्षित होने के कारण यह पत्र उनके परिजनों ने उन्हें पढ़कर सुनाया। मोदी ने गीता को लिखे पत्र में कहा है, 'प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल कर सुंदर उत्पाद बनाने का विचार अद्भुत है। यह न केवल 'स्वच्छ भारत' अभियान के लिए उपयोगी है, बल्कि यह लघु उद्योग स्थापित करने की विशाल क्षमता भी रखता है।'

चर्चा में आईं बिहार की गीता

अपने तोहफे से रातोंरात राष्ट्रीय मीडिया की चर्चा में आईं गीता के लिए यह जान लेना दिलचस्प है कि वह एक गृहिणी हैं, और उनके पति रामचंद्र झा छोटी जोत के किसान हैं। कचरे से उपयोगी वस्तुएं बनाने का उनका प्रयोग भी सिर्फ शौक तक ही सीमित

एक नजर

बिहार की ग्रामीण महिला गीता ने पीएम को भेजा उपहार पीएम ने इसे स्वच्छता अभियान के लिए उपयोगी बताया प्रधानमंत्री तोहफों के चयन में रखते हैं खास ध्यान है। उन्होंने कभी भी इसे अपनी कमाई का जरिया बनाने की नहीं सोची। वैसे अब उनके पति कहते हैं, 'अब जबकि प्रधानमंत्री ने प्रोत्साहित किया है तो हमें लगता है कि यह किया जा सकता है, लेकिन कोई


02 आवरण कथा

29 मई - 04 जून 2017

प्रधानमंत्री को भेंट में गांधी के रंग

सुलभ प्रणेता डॉ. विंदेश्वर पाठक ने ‘महात्मा गांधी लाइफ इन कलर’ पुस्तक की पहली प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट की

पि

छले साल गांधी जयंती इस लिहाज से खास थी कि इस मौके पर सुलभ प्रणेता डॉ. विंदेश्वर पाठक ने ‘महात्मा गांधी लाइफ इन कलर’ पुस्तक की पहली प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट की। इस पुस्तक में गांधी की जीवन यात्रा को दुर्लभ तस्वीरों के जरिए बताने की कोशिश की गई है। इस किताब में शामिल सभी फोटो श्वेत-श्याम हैं, जिन्हें ग्राफिक डिजायनरों, विद्वानों, इतिहासकारों और फोटो विशेषज्ञों के सहयोग से रंगीन बनाया गया है। इस किताब को डॉ. पाठक के सहयोग से गांधी सर्व फाउंडेशन ने तैयार किया है। इस मौके पर डॉ. पाठक ने कहा कि गांधी का जीवन दर्शन, सत्य और अहिंसा का उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है और इसके जरिए आज भी दुनिया की तमाम समस्याओं का समाधान हासिल किया जा सकता है। गौरतलब है कि ‘महात्मा गांधीज लाइफ इन कलर’ पुस्तक गांधी जी के बेटे देवदास गांधी का सपना था, जो बीते साल जाकर पूरा हुआ। इस पुस्तक में गांधी जी की जिंदगी से जुड़े 1281 फोटो हैं। इसके जरिए गांधी की जीवन यात्रा को दिखाने की कोशिश की गई है। देवदास गांधी ने अपनी जिंदगी में गांधी जी से जुड़े फोटो को इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। लेकिन उनका काम अधूरा रह गया। इसके बाद गांधी सर्व इंडिया नामक संस्था ने गांधी जी से जुड़े इन फोटो को इकट्ठा करना शुरू किया। इस संस्था ने करीब

पांच हजार फोटो इकट्ठा किए हैं, जिनमें से 1281 को इस पुस्तक में स्थान दिया गया है। मूलत: यह कॉफी टेबल बुक है। इस किताब में दुर्लभ फोटो के साथ ही गांधी जी के 37 विषयों पर उद्धरण और विचार भी दिए गए हैं। इसके साथ ही इसमें गांधी जी पर डॉ. पाठक के महत्वपूर्ण लेखों को भी शामिल किया गया है। गांधी जी की ख्याति सादगी के प्रतीक के तौर पर रही है, लेकिन इस पुस्तक में एक फोटो ऐसा भी है, जिसमें वे चांदी की कुर्सी पर बैठे दिखाई दे रहे हैं। इस किताब में एक फोटो ऐसा भी है, जिसमें गांधी जी ट्रेन में हैं और बाहर हरिजन लोग रेल डिब्बे की खिड़की पर भीड़ लगाए हैं। गांधी जी का ऑपरेशन थियेटर का भी एक फोटो इस संकलन में है। एक कुष्ठ रोगी से बात करते हुए भी उनकी तस्वीर इस किताब में है। 692 पेज की इस किताब में मुंबई के जुहू चौपाटी का 1944 का वह मार्मिक फोटो भी है, जिसमें गांधी जी को एक बच्चा छड़ी पकड़कर ले जा रहा है। वह बच्चा उनके पौत्र कनु गांधी थे। पुस्तक में 1944 का वह फोटो भी है, जब कस्तूरबा गांधी का निधन हो गया है, गांधी जी उनकी निर्जीव देह के पास बैठे हैं। इसमें 1947 में बिहार में लिया गया एक और मार्मिक फोटो भी शामिल है, जिसमें गांधी जी से बिहार रिलीफ फंड के लिए दान देने के लिए एक अंधा व्यक्ति अर्ज कर रहा है।

भी कारोबार करने के लिए हमारे पास धन नहीं है। यदि हमें ऋण मिलता है, तो हम ऐसा कर सकते हैं।'

संदीप की गीता पर पीएम का ट्वीट

गीता देवी की कहानी सुनकर जिन लोगों को लगता होगा कि प्रधानमंत्री ने पहली बार किसी साधारण जन से कोई असाधारण उपहार पाकर अपनी खुशी का इजहार किया है तो एेसा नहीं है। पिछले साल ही एक गरीब बढ़ई की कला को प्रधानमंत्री ने न सिर्फ सराहा, बल्कि ट्वीट कर उसकी तारीफ भी की। यह लड़का है कानपुर के बर्रा इलाके में जरौली का रहने वाला संदीप सोनी। संदीप ने लकड़ी के 32 बोर्डों में लकड़ी के अक्षरों को काटकर उसमें गीता के 18 अध्याय के 706 श्लोक लिख डाले। उसने जिस दिन से इसे तैयार करना शुरू किया था, उस दिन से उसका एक ही सपना था कि वह कि वह इस लकड़ी की गीता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपे। इसके लिए उसने सबसे पहले उस दिन प्रयास किया, जिस दिन नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की शपथ ले रहे थे। संदीप इसके लिए दिल्ली गए लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो पाई। इसके बाद उन्होंने 26 जून 2014 को पीएमओ में पत्र लिखकर अपनी इच्छा जाहिर की और शहर लौट आए। काफी समय बाद 20 फरवरी 2016 को पीएमओ से उनके पास फोन आया और लकड़ी की गीता लेकर उन्हें पीएमओ बुलाया गया। इस पर संदीप अपनी मां सरस्वती के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए और प्रधानमंत्री से मिलकर उनको लकड़ी की गीता भेंट की। प्रधानमंत्री ने भी उनकी इस कला की सराहना करते हुए गीता भेंट करते हुए फोटो ट्वीट की और लिखा संदीप सोनी ने मुझे लकड़ी की गीता भेंट की। उनके इस प्रयास के लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं। इसकी जानकारी होते ही संदीप के परिजनों के बीच तो खुशी की लहर दौड़ ही गई, उसके पूरे मोहल्ले में भी खुशी का माहौल था। जो लोग संदीप को एक मामूली बढ़ई कहकर बुलाते थे, वह संदीप पर गर्व कर रहे थे। संदीप ने कारपेंटर ट्रेड से कोर्स किया है और सुबह उठकर घरों में अखबार

भी पहुंचाते हैं। प्रधानमंत्री की सराहना के बाद उसे अपने बढ़ईगिरी के काम को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली।

संबंध और सौहार्द का उपहार

बात तोहफे की चली है तो यहां एक बात और समझने की है कि संबंध और सौहार्द को बढ़ाने में उपहारों की भूमिका पारंपरिक तौर पर दुनिया के हर सामाजिक संस्कार में स्वीकार की जाती है। पर तोहफों को देश के भीतर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यू इंडिया के संदेश का जिस तरह माध्यम प्रधानमंत्री मोदी ने बनाया है, वह काबिले तारीफ है। यही नहीं, वे तोहफों के जरिए कूटनीतिक जटिलताओं को भी अपने हक में करने माहिर हैं और ऐसा कई मौकों पर उन्होंने करके दिखाया भी है। दिलचस्प यह कि ऐसा करते हुए वे तोहफे स्वीकार करने और उन्हें देने को संबंधों और संदेशों के नए रिबन से बांधते नजर आते हैं।

चीनी कलाकार पहुंचे काशी

पिछले साल चीन यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऑयल पेंटिंग भेंट करने वाले चीनी कलाकर इस साल भारत भ्रमण पर आए और इस दौरान उन्होंने खासतौर पर वाराणसी का भ्रमण किया। दिलचस्प है कि वाराणसी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र भी है। इन चित्रकारों ने यहां महात्मा गांधी के अलावा गंगा घाटों के जीवन पर आधारित चित्र बनाए। उन्होंने यह यात्रा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के आमंत्रण पर की थी। दिल्ली, आगरा, जयपुर के बाद चीनी कलाकारों का दल काशी पहुंचा था। इस दौरान रामछाटपार न्यास में करीब तीन घंटे की कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें चीन से आए कलाकारों ने 13 कलाकृतियां बनाई। इसमें गंगा घाटों, गंगा आरती एवं चीन की संस्कृति को दर्शाया गया। चित्रकला कार्यशाला में शेनशू भी शामिल थे, जिन्होंने चार

लकड़ी के 32 बोर्डों में लकड़ी के अक्षरों को काटकर उसमें गीता के 18 अध्याय के 706 श्लोक लिख डाले


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सितंबर, 2016 को चीन यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री को उनका ही तैल चित्र बनाकर भेंट की थी। उनके अलावा चीनी चित्रकारों के समूह में वाइमिन लू, गाउ योयून, हेशियांग, वाईही, गैंगवू, वायरन जेंड, निमेन यिन भी शामिल थे। उल्लेखनीय है कि मोदी को उनकी चीन यात्रा के दौरान पेंटिंग के अलावा श्रीभगवद्गीता और स्वामी विवेकानंद के निबंधों सहित प्राचीन भारतीय ग्रंथों का चीनी अनुवाद भी भेंट किया गया था। दरअसल, यह प्राचीन भारतीय ग्रंथों के 10 चीनी अनुवादों का एक सेट था, जो भारतीय जीवन एवं दर्शन से जुड़े प्रोफेसर वांग झिचेंग ने भारतीय प्रधानमंत्री को विशेष तौर पर भेंट किया था। प्रो. झिचेंग प्रतिष्ठित पेकिंग यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं। मोदी को उनके द्वारा भेंट किए गए अनुवादों में पतंजलि के योगसूत्र, नारद के भक्तिसूत्र, योग वशिष्ठ तथा अन्य शामिल हैं।

मंगोलिया में छोड़ आए घोड़ा

तोहफों के सात एक खास बात यह भी है कि कानूनी सीमा और मर्यादाओं के कारण हर तरह के तोहफे स्वीकार भी नहीं किए जा सकते। बात करें प्रधानमंत्री मोदी की तो उन्होंने इन सीमाओं और मर्यादाओं का पूरी तरह पालन किया है। दो साल पहले जब प्रधानमंत्री मंगोलिया की यात्रा पर थे तो उन्हें मंगोलिया के प्रधानमंत्री चिमेद सैखनबिलेग से रेस के घोड़े के तौर पर विशेष तोहफा मिला। ‘कंठक’ नामक घोड़ा ‘मिनी नादम’ वहां उन्हें एक खेल महोत्सव के दौरान भेंट किया गया। इस पर खुशी जताते हुए मोदी ने ट्वीट भी किया, ‘कंठक के रूप में, मंगोलिया से एक उपहार।’ पर मोदी कंठक को साथ लेकर भारत नहीं आए, बल्कि वहीं भारतीय दूतावास में छोड़ आए। दरअसल, भारत में किसी भी राजनयिक को किसी भी प्रकार का जीव-जंतु तोहफे में लेने या देने का प्रावधान नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय ने 2005 में ही इस प्रकार के किसी भी तोहफे के आदान प्रदान पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस प्रतिबंध के तहत विदेशी धरती से भी इस तरह के तोहफे के हस्तांतरण से पशुओं को उपहार देना भारत में प्रतिबंधित है। यह चिड़ियाघर के जानवरों के आदान-प्रदान के लिए भी है। यही वजह है कि मोदी ने तोहफे में मिले घोड़े को मंगोलिया में ही छोड़ आए।

तोहफे के साथ संदेश भी खास

विश्व नेताओं द्वारा अलग-अलग तरह के तोहफे

भेंट किए जाने को लेकर ही नहीं, बल्कि खुद भी प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह के तोहफे दूसरे राजनेताओं को भेंट किए हैं, उनके पीछे एक गहरा मकसद और संदेश रहा है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा विश्व की दो हस्तियों महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब 2014 में अमेरिका गए तो उनके लिए व्यक्तिगत रूप से उपहार चुने, जिनमें गांधीजी द्वारा लिखी गई गीता की व्याख्या खादी के आवरण के साथ और मार्टिन लूथर किंग की 1959 की भारत यात्रा के ऑडियोवीडियो क्लिप शामिल थे। तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इन तोहफों के बारे में बताया था कि गांधीजी द्वारा लिखे गए गीता के विशेष संस्करण की प्रति कई साल पहले प्रकाशित हुई थी। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से इस पुस्तक के विशेष संस्करण का आर्डर दिया था और उसकी प्रतियां विशेष रूप से तैयार की गईं। इसी तरह मोदी ने मार्टिन लूथर के उस समय के भाषण की रिकॉर्डिग ढूंढी, जो उन्होंने 1959 में भारत की यात्रा के दौरान दिए थे और आकाशवाणी से उसे उपलब्ध कराने को कहा। उन्होंने किंग की एक फोटो भी ओबामा को भेंट की, जिसमें वह महात्मा गांधी के समाधिस्थल राजघाट पर बैठे नजर आ रहे हैं। ये मोदी के ओबामा को व्यक्तिगत उपहार थे। मोदी ने ओबामा की दोनों बेटियों साशा और मालिया को भी उपहार भेंट किए। गौरतलब है कि मार्टिन लूथर किंग अमेरिका के एक पादरी, आंदोलनकारी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और अफ्रीकन-अमेरिकन नागरिक अधिकार आंदोलन के प्रमुख नेता थे। उन्हें अमेरिका का गांधी भी कहा जाता है। यह भी एक संयोग ही रहा कि अमेरिकी दौरे के दौरान एक तरफ जहां नरेंद्र मोदी भारत से उपहार के तौर पर गीता ले गए तो वहीं उन्हें भी वहां बतौर उपहार गीता भेंट की गई। अमेरिकी कांग्रेस में एकमात्र हिंदू सदस्य तुलसी गेबार्ड ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और गीता की एक निजी प्रति उन्हें भेंट करते हुए कहा कि यह भारत के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है। 33 वर्षीय गेबार्ड प्रधानमंत्री से होटल में मुलाकात करने आई थीं। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भी इसी गीता को लेकर उन्होंने सदस्यता की शपथ ली थी। मोदी से मिलने के बाद गेबार्ड ने ट्वीट किया, ‘गीता जो मैंने आपको भेंट की ,मेरे पास बचपन से थी, मध्य पूर्व वार जोन ड्यूटी के समय, कांग्रेस में शपथ ग्रहण के वक्त भी यह थी।’ आगे उन्होंने यह भी लिखा, ‘इस गीता का महत्व मेरे लिए कुछ खास और अमूल्य है क्योंकि यह मेरे पास बचपन से थी।’ गोबार्ड के लिए भारत के प्रधानमंत्री को गीता भेंट करने का महत्व कितना था, यह उनके ही शब्दों में, ‘कहा जाता है कि जब आप किसी को अपनी सबसे मूल्यवान चीज देते हैं तो वह सबसे बड़ा तोहफा होता है, क्योंकि आप अपनी बहुत ही प्यारी चीज का बलिदान देते हैं। इसीलिए, प्रधानमंत्री को मैं अपनी भगवद्गीता भेंट कर यह जताना चाहती हूं कि भारत, प्रधानमंत्री और भारत के लोगों, जिनका वह प्रतिनिधित्व करते हैं, उनसे मुझे कितना प्यार है।’ गौरतलब है कि अमेरिका में

आवरण कथा

उपहार संहिता

गृ

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कोई भी केंद्रीय या राज्य मंत्री अपने नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा किसी और से कीमती तोहफे नहीं ले सकता

ह मंत्रालय की ओर से जारी अचार संहिता स्पष्ट तौर पर कहती है कि कोई भी केंद्रीय या राज्य मंत्री अपने नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा किसी और से कीमती तोहफे नहीं ले सकता। इस संहिता की शर्त के मुताबिक मंत्री या उसके परिवार के किसी सदस्य को ऐसे किसी व्यक्ति से कोई तोहफा नहीं लेना चाहिए, जिससे उसकी आधिकारिक तौर पर कोई संबंध हो सकता है। केंद्र के मंत्रियों के मामले में यह जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है कि उनके मंत्री अचार संहिता का पालन करें। इस संहिता के अनुच्छेद 4.2 के मुताबिक कोई मंत्री

जब विदेश यात्रा पर जाता है या कोई विदेशी मेहमान भारत आता है तब विदेशियों से तोहफे ले सकता है। ऐसे तोहफे दो श्रेणियों में आते हैं। पहले वे, जो प्रतीकात्मक होते हैं, मसलन सम्मान में दी जाने वाली तलवार या शॉल आदि। इस तरह की चीजें मंत्री अपने पास रख सकते हैं, लेकिन दूसरी श्रेणी में गैर प्रतीकात्मक तोहफे हैं। अगर इन गैर प्रतीकात्मक तोहफों की कीमत 5000 रुपए से ज्यादा है तो उन्हें खजाने में जमा करना होता है। अगर कोई मंत्री इन्हें रखना चाहता है तो उसे इनकी कीमत खजाने को देनी होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिका गए तो बराक ओबामा के लिए उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उपहार चुने, जिनमें गांधीजी द्वारा लिखी गई गीता की व्याख्या खादी के आवरण के साथ और मार्टिन लूथर किंग की 1959 की भारत यात्रा के ऑडियो-वीडियो क्लिप शामिल थे भारतीय मूल के अमेरिकियों द्वारा नरेंद्र मोदी के लिए मेडिसन स्कवायर पर हुए स्वागत समारोह में गेबार्ड भी मौजूद थीं। नरेंद्र मोदी जब अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने व्हाइट हाउस पहुंचे तो उनके पास बराक ओबामा के लिए गीता के अलावा और भी कई चीजें थीं। इनमें जो एक उपहार खासतौर पर उल्लेखनीय है, वह है गुजरात की परंपरागत रोगन शैली में बनी पेंटिग। ये पेंटिंग कच्छ के गफूर भाई खत्री ने बनाई थी। इसी दौरान प्रधानमंत्री ने मिशेल ओबामा के लिए पशमीना का स्टोल भी भेंट किया था। बात करें रोगन कला और गफूर भाई की तो यह इस लिहाज से खास है कि गुजरात के कच्छ जिले का निरोना गांव भारत का एकमात्र इलाका है, जहां अब लुप्तप्राय रोगन कला आज भी जिंदा है। फारसी प्रभाव वाली रोगन कलाकारी में अरंडी के तेल को 12 घंटे से अधिक समय तक पकाने और रंगों के साथ मिलाकर इसके महीन तार और लकड़ी की कलम के सहारे चित्र बनाए जाते हैं। तीन सौ साल पुरानी इस कारीगरी को जिंदा रखने वाले गफूर भाई का परिवार पीढ़ियों से रोगन की कला को बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी गफूर भाई खत्री को उनकी कारीगरी के लिए सम्मानित भी कर चुके हैं। अलबत्ता, राष्ट्रपति बराक ओबामा के तोहफे ने भी प्रधानमंत्री मोदी को कम चकित नहीं किया। बराक ओबामा ने खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी को उनकी अमेरिका यात्रा के दौरान 1893 में विश्व धर्मसंसद के उन भाषणों का संकलन भेंट किया,

जिसमें स्वामी विवेकानंद के संबोधन ने भारतीय धर्म और दर्शन को नई पहचान दी थी। प्रधानमंत्री मोदी स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते हैं और 1984 में प्रकाशित 1200 पन्नों की इस दुर्लभ पुस्तक को पाने के बाद उन्होंने खासी खुशी का इजहार भी किया। नरेंद्र मोदी ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा कि राष्ट्रपति ओबामा के इस मूल्यवान तोहफे को मैं जीवनभर खुशी के साथ याद रखूंगा। मोदी ने इस पुस्तक के पन्नों से विवेकानंद का भाषण और उनकी एक तस्वीर भी ट्विटर पर साझा की। इस पुस्तक के साथ भेजे संदेश में राष्ट्रपति ओबामा ने इस बात का भी उल्लेख किया कि विवेकानंद ने भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों का पुल बनाने में अहम भूमिका अदा की।

लेने और देने को बस गीता ही: मोदी

गीता को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का प्रेम तब भी दिखा जब वे जापान दौरे पर गए। 2014 में ही की गई अपनी इस यात्रा में उन्होंने जापानी सम्राट को गीता भेंट की और इसे सर्वोत्तम उपहार बताया। साथ ही उन्होंने इस मौके पर भारतीय युवाओं की भी खूब तारीफ की। टोक्यो में मोदी ने भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जो काम अरबों का बजट नहीं कर सकता था, वो 20-22 साल के युवाओं ने कर दिखाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सूचना तकनीक के जरिए भारतीय युवाओं ने दुनिया में भारत की छवि को बदला है। उन्होंने अपने भाषण में ताइवान के अपने एक दौरे का जिक्र


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29 मई - 04 जून 2017

बराक ओबामा ने खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका यात्रा के दौरान 1893 में विश्व धर्मसंसद के उन भाषणों का संकलन भेंट किया, जिसमें स्वामी विवेकानंद के संबोधन ने भारतीय धर्म और दर्शन को नई पहचान दी थी किया और कहा, ‘एक इंटरप्रेटर ने पूछा कि क्या भारत में अब भी जादू टोना, काला जादू चलता है और लोग सांपों से खेलते हैं, मैंने कहा कि अब हम सांप से नहीं, बल्कि माउस से खेलते हैं।’ प्रधानमंत्री ने वहां मौजूद भारतीय मूल के लोगों से कहा कि वो अपने बच्चों में भारतीय संस्कृति के बीज रोपें। मोदी ने बताया कि उन्होंने जापान के सम्राट को भगवतगीता उपहार में दी है। उनके ही शब्दों में, ‘मेरे पास इससे बढ़कर देने को कुछ नहीं है। दुनिया के पास भी इससे बढ़कर पाने को कुछ नहीं है।’

पवित्र कुरान की दुर्लभ प्रामाणिक पांडलिपि ु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ईरान दौरे पर जहां ईरान-भारत संबंधों को नई ऊंचाईयां प्रदान की

अलावा वाराणसी, अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु तथा चेन्नई की यात्रा की थी। प्रधानमंत्री ने महारानी एलीजाबेथ को फोटोग्राफ के अलावा दार्जिलिंग का मशहूर मकाईबारी चाय, जम्मू कश्मीर का उत्तम गुणवत्ता वाला शहद तथा वाराणसी की लोकप्रिय ताणचोई स्टॉल्स उपहार स्वरूप भेंट की। महारानी को भेंट किए गए फोटो में महात्मा गांधी की 13वीं पुण्यतिथि के एक दिन बाद 31 जनवरी 1961 को साबरमती आश्रम में उनके आगमन पर ली गई फोटो भी है। साथ ही एक तस्वीर 19 फरवरी 1961 चेन्नई में उनके सम्मान में मद्रास स्टेट स्वागत समारोह की भी है, जिसमें उन्हें केक भेंट किया गया था। तीसरी तस्वीर 25 फरवरी 1961 में वाराणसी के बलुआ घाट में हाथी की सवारी की है। इसके अलावा अन्य तस्वीरें 24 फरवरी 1961 को ट्रॉमे परमाणु ऊर्जा केंद्र में महारानी के आगमन की है। कह सकते हैं कि ब्रिटेन और भारत को लेकर प्रधानमंत्री ने उपहारों के जरिए एक साथ संबंध, संवेदना और स्मृति के तार छेड़े। भारत-ब्रिटेन के मौजूदा सौहार्दपूर्ण संबंधों में इस तार की झंकार को आज कोई भी महसूस कर सकता है।

जुमा मस्जिद की स्वर्ण अलंकृत प्रतिकृति वहीं, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी को पवित्र कुरान की दुर्लभ प्रामाणिक पांडुलिपि की प्रतिकृति भेंट स्वरूप दी। यह पांडुलिपी प्रतिलिपि सातवीं शताब्दी की है, जो उत्तर प्रदेश के रामपुर रजा लाइब्रेरी में संग्रहित है। इस संबंध में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी निजी वेबसाइट में लिखा, ‘कुफिक लिपि में लिखी यह पांडुलिपि संस्कृति मंत्रालय के रामपुर राजा लाइब्रेरी में है।’ कुफिक लिपि के बारे में ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इराक के कुफा में सातवीं सदी के आखिर में यह लिपि विकसित हुई थी। यह तमाम अरबी लिपियों में सबसे पुरानी कै​िलग्राफिक लिपि है। इसी दौरे में मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी को मिर्जा गालिब की फारसी में लिखी शायरी के संग्रह ‘कुल्लीयत-ए-फारसी -ए-गालिब’ और सुमेरचंद द्वारा फारसी में अनुदित रामायण की अधिकृत प्रतिकृति भेंट की। पहली बार 1863 में प्रकाशित गालिब की इस कृति में 11 हजार शेर हैं।

महारानी एलिजाबेथ द्वितीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान महारानी एलिजाबेथ द्वितीय को उनकी पहली भारत यात्रा के दौरान लिए गए फोटोग्राफ उपहार स्वरूप भेंट किए। महारानी एलिजाबेथ वर्ष 1961 में नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थीं। इस दौरान उन्होंने दिल्ली के

बात अरब के सुल्तान की हो तो उनके लिए भी तोहफे का चुनाव भी कुछ खास तरीके से करना होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बीते साल सउदी अरब के दौरे पर गए तो शाह सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सौद को भारत के केरल की चेरामन जुमा मस्जिद की स्वर्ण अलंकृत प्रतिकृति उपहार स्वरूप भेंट की। केरल के थिरूस्सर जिले में स्थित इस मस्जिद के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह भारत में बनी पहली मस्जिद है। इस मस्जिद का निर्माण 629 सदी के आसपास अरब व्यापारियों ने कराया था। इस दौरान इस बारे में विदेश मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति भी जारी की, जिसके अनुसार, ‘ऐसा कहा जाता है कि पैगम्बर के समकालीन चेर राजा चेरामन पेरूमल ने अपनी अरब यात्रा के दौरान मक्का में पवित्र पैगंबर से हुई भेंट के बाद इस्लाम अपना लिया था। कुछ वर्षों बाद उन्होंने अपने मित्रों मलिक बिन दीनार और मलिक बिन हबीब के माध्यम से अपने परिजनों और मालाबार के सत्तारूढ़ सामंतों को पत्र भेजे और इसके बाद कोंडूगल्लूर में स्थानीय शासकों द्वारा वहां मस्जिद के निर्माण की अनुमति दे दी गई। इस मस्जिद में एक प्राचीन दीपक है और ऐसा माना जाता है कि यह दीपक हजारों वर्षों से रोशन है। आज भी सभी धर्मों के लोग अपनी भेंट के रूप में इस पवित्र दीपक में डालने के लिए तेल लेकर आते हैं।

किसानों की बढ़ेगी ‘संपदा’ योजना विकास

संपदा योजना से हर साल न सिर्फ 334 लाख टन खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाया जाएगा, बल्कि इससे किसान भी मालामाल होंगे

सम में ढोला-सदिया पुल ‍ का उद्घाटन करने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘संपदा’ योजना का एलान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि एक नई योजना के बारे में मैं बताना चाहता हूं। इसका नाम है संपदा (फूड प्रोसेसिंग योजना)। मोदी सरकार ने समुद्री एवं विभिन्न कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग को गति देने के लिए लगभग 6000 करोड़ रुपए की एक नई फूड प्रोसेसिंग योजना ‘संपदा’ को अपनी मंजूरी दी है, जिसे 2016 से 2020 की अवधि में पूरी तरह लागू किया जाना है। इस योजना के तहत मिनिस्ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज के अंतर्गत एग्रो मैराइन प्रोसेसिंग एंड डेवलपमेंट ऑफ एग्रो क्लस्ट‍र्स की योजनाओं को साल 2019-20 तक पूरा किया जाना है। मेगा एग्रो प्रोसेसिंग योजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद इनमें लगभग 31400 करोड़ रुपए का निवेश होने की संभावना है। सरकार को यह उम्मीद है कि इससे करीब 334 लाख टन खाद्य पदार्थों को खराब होने से पूरी तरह बचाया जा सकेगा और इसके एवज में लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त बचत हर साल की जा सकेगी। इन योजनाओं से करीब 20 लाख किसानों को सीधा फायदा होगा और 5,305,00

लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी मिल सकेगा। 3 मई, 2017 को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा नई केंद्रीय क्षेत्र योजना ‘संपदा’ के तहत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की योजनाओं के पुनर्गठन को मंजूरी प्रदान की गयी। यह मंजूरी 14वें वित्त आयोग चक्र के साथ वर्ष 2016-2020 की अवधि के लिए दी गई है। संपदा योजना के बारे में केंद्रीय फूड प्रोसेसिंग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि नई योजना से फूड प्रोसेसिंग को और बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के समग्र विकास के लिए यह एकीकृत या शीर्ष योजना है।

ऐसी है ‘संपदा’

• इस नई योजना हेतु 6000 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन किया गया है।

• इसमें 31,400 करोड़ रुपए का निवेश होगा जिससे 334 लाख मिट्रिक टन (मूल्य 1,04,125 करोड़ रुपए) कृषि उत्पादन होगा।

• इससे वर्ष 2019-20 के दौरान प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से देशभर में 5,30,500 रोजगार सृजित होंगे और 20 लाख किसान लाभान्वित होंगे।

• संपदा योजना का उद्देश्य कृषि को पूरक बनाना, प्रसंस्करण का आधुनिकीकरण करना और कृषि अपशिष्ट को कम करना है।

• ‘संपदा’ एक ऐसी योजना है, जिसमें मंत्रालय की चल रही योजनाओं जैसे मेगा फूड पार्क्स, एकीकृत कोल्ड चेन और वैल्यू एडिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड सेफ्टी एंड क्वालिटी एश्योरेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि योजनाओं को शामिल किया गया है। इसके अलावा इसमें नवीन योजनाएं जैसे एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर के लिए बुनियादी ढांचा, पिछड़े और अग्रेषण निर्माण संबंधी, खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षण की क्षमता का निर्माण और विस्तार शामिल हैं। • ‘संपदा’ एक व्यापक पैकेज है, जिससे खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को एक नया आयाम मिलेगा।

• ‘संपदा’ के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप कुशल आपूर्ति प्रबंधन शृंखला के प्रबंधन के साथ आधुनिक बुनियादी ढांचे का सृजन होगा, जिससे कृषि उत्पादों को खेत से सीधे रिटेल आउटलेट तथा पहुंचाया जा सकेगा।

• यह न केवल देश में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देगा, अपितु किसानों को बेहतर कीमत प्रदान करने में भी मददगार होगा। • यह कृषि उत्पाद के अपव्यय को कम करने, प्रसंस्करण के स्तर को बढ़ाने, उपभोक्ताओं को सस्ती कीमत पर सुरक्षित और सुविधाजनक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और संसाधित खाद्य पदार्थों के निर्यात को बढ़ाने में भी सहायक होगा।


29 मई - 04 जून 2017

उखराल में कौशल विकास का सुलभ अध्याय उखराल कौशल विकास

जम्मू के रामवन स्थित उखराल गांव में ‘सुलभ कौशल विकास केंद्र’ कौशल प्रशिक्षण के बाद केंद्र छात्रों को रोजगार उपलब्ध कराने में भी मदद करता है

स्वरोजगार

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एक नजर

एक अगस्त, 2014 को हुई थी केंद्र की स्थापना

टेलरिंग और कंप्यूटर तकनीक के क्षेत्र में प्रशिक्षण

कौशल विकास के साथ छात्रों का व्यक्तित्व निर्माण भी

की ठंड पड़ती है और इस दौरान केंद्र को बच्चों को अवकाश देना पड़ता है।

कश्मीर हाट का भ्रमण

सुलभ कौशल विकास केंद्र प्रशिक्षण ले रहे किशोरकिशोरियों को 17 सितंबर 2015 को एक खास शैक्षिक यात्रा पर ले गया । इस यात्रा में बच्चों को श्रीनगर का कश्मीर हाट घूमने का अवसर मिला। यह यात्रा इस लिहाज से उनके लिए खासा उपयोगी रही, क्योंकि इससे उन्हें हुनर और बाजार के बीच का संबंध समझ में आया। वे इस बात को व्यावहारिक रूप से सीख पाए कि कैसे आगे चलकर उन्हें अपनेअपने क्षेत्र में स्वरोजगार के लिए कदम बढ़ाना है तथा किन-किन बातों पर उन्हें अभी से ध्यान देना होगा। श्रीनगर का कश्मीर हाट के भ्रमण के दौरान छात्रों में अपेक्षित रूप से काफी खुशी और संतोष का भाव देखा गया। उन्हें इस दौरान खासतौर पर हस्तशिल्प की निर्माण प्रक्रिया और उन्हें बेचने के लिए अपनाई जाने वाली प्रबंधकीय रणनीति का व्यावहारिक ज्ञान मिला।

‘सु

एसएसबी ब्यूरो / जम्मू

लभ इंटरनेशनल समाज सेवा संस्थान’ के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने जब एक अगस्त, 2014 को जब जम्मू के रामवन स्थित उखराल गांव में ‘सुलभ कौशल विकास केंद्र’ की स्थापना की थी, तो उसके पीछे एक बड़ा विजन और लक्ष्य था। केंद्र की स्थापना के पीछे सोच यह थी कि रामवन के सुदूर गांव उखराल में वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर द्वारा स्थानीय किशोर-किशोरियों को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण के जरिए खुद से आजीविका कमाने के योग्य बनाया जा सके। इस कार्य को व्यवस्थित रूप से करने के लिए सुलभ की टीम ने इलाके में पहले तो एक सर्वे किया, जिसमें यह जानकारी ली गई कि स्थानीय बच्चों की पसंद के कार्य कौन-कौन से हैं और वे क्या चाहते हैं, जिसके जरिए उन्हें आजीविका के लिए अपनी पसंद का कार्य चुनने और करने में आसानी हो। सर्वे के बाद बच्चों के प्रशिक्षण के लिए जब पाठ्यक्रम तय किए जाने लगा तो इस बात का खास ध्यान रखा गया कि इससे उन्हें इस तरह से हुनरमंद बनाया जाए, ताकि आगे चलकर उन्हें स्वरोजगार में मदद मिले। बात करें इस केंद्र में चलने वाले कौशल विकास कार्यक्रमों की दिनचर्या की तो इसे भी कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि छात्रों को रुचिपूर्ण परिवेश और अनुभव मिले। इस केंद्र में बच्चों के दिन की शुरुआत सुबह की प्रार्थना से होती है। प्रार्थना के बाद वे अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते हैं।

शैक्षिक यात्राओं के लाभ स्वरोजगार में सफलता

सुलभ कौशल विकास केंद्र ने अब तक 175 बच्चों को टेलरिंग से लेकर कंप्यूटर तकनीक के क्षेत्र में कौशल बढ़ाने का अवसर दिया है। इनमें कम से कम 50 लड़कियां ऐसी हैं, जो आज हर दिन 200 से लेकर 400 रुपए कमा रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस केंद्र का कौशल विकास प्रशिक्षण के बाद बच्चों से रिश्ता समाप्त हो जाता है, बल्कि केंद्र अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इन्हें प्रशिक्षण के बाद नौकरी तलाशने में भी मदद करता है। सुलभ की टीम खासतौर पर टेलरिंग और कंप्यूटर के काम में प्रशिक्षण लेने वालों बच्चों को स्थानीय संस्थाओं की मदद से रोजगार दिलाने में मदद करती है।

जागरुकता शिविर

चूंकि सुलभ कौशल विकास प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना का एक बड़ा लक्ष्य इस इलाके को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है, लिहाजा वह कौशल प्रशिक्षण के अलावा भी कई कार्यक्रम वहां चला रहा है। सुलभ की टीम यहां स्वास्थ्य और स्वच्छता के मुद्दे से जुड़े कई जागरुकता शिविर भी लगा रही है। दरअसल, ये ऐसे विषय हैं जो लोगों की रोजमर्रा

के जीवन से जुड़े हैं और उनके लिए हर लिहाज से काफी अहम हैं। सुलभ कौशल विकास केंद्र का लक्ष्य महज बच्चों को विभिन्न क्षेत्रों में कौशल विकास का अवसर और उन्हें स्वरोजगार में मदद करना भर नहीं है। दरअसल, यह केंद्र इलाके के बच्चों के व्यक्तित्व विकास को लक्ष्य में रखकर काम कर रहा है। ऐसा करते हुए वह किशोरों-किशोरियों की पसंद-नापसंद के साथ क्षेत्रीय अनुकूलता और आवश्यकता का भी ध्यान रखता है। इस तरह जिस तरह के कार्यक्रम केंद्र की तरफ से अबी तक चलाए जा रहे हैं, उनमें ये सर्व प्रमुख हैं• कटिंग-टेलरिंग का प्रशिक्षण • कंपयूटर सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन के क्षेत्र में प्रशिक्षण • स्वास्थ्य और स्वच्छता के मुद्दे पर जागरुकता कार्यक्रम • व्यक्तित्व विकास • शैक्षिक और प्रेरक यात्रा

कोर्स की अवधि

आमतौर पर हर कोर्स की अवधि एक साल की है, पर इसे पूरा करने में तकरीबन डेढ़ साल का समय लग जाता है। ऐसा जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट मौसमी परिस्थिति के कारण होता है। यहां चार महीने कड़ाके

कौशल विकास कार्यक्रमों की दिनचर्या को कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि छात्रों को रुचिपूर्ण परिवेश और अनुभव मिले

वैसे भी शैक्षिक यात्राओं का छात्रों के सामाजिकसांस्कृतिक विकास की दृष्टि से काफी महत्व हैं। वे यात्राओं के दौरान कई ऐसी बातों को आसानी से सीख लेते हैं, जिन्हें आमतौर पर कक्षाओं के भीतर आसानी से नहीं बताया-सिखाया जा सकता है। इस तरह समवेत रूप से देखें तो ऐसी यात्राओं को छात्रों के लिए आयोजित करने के पीछे मुख्य उद्देश्य होता है• बाजार के स्वरूप के साथ उपभोक्ताओं की जरूरत की विश्लेषणात्मक समझ • छात्रों के बीच सामूहिकता के साथ कार्य करने की भावना का विकास • प्रभावशाली तरीके से संवाद करने की क्षमता का विकास

न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर का दौरा

नौ अक्टूबर, 2016 को तत्कालीन चीफ जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर सुलभ कौशल विकास केंद्र के दौरे पर गए तो वे वहां चल रही गतिविधियों को देखकर काफी संतुष्ट हुए। इससे पहले केंद्र में उनके आगमन पर उनका स्वागत सुलभ टीम की तरफ से काफी परंपरागत तरीके से किया गया। इस मौके पर केंद्र की कंट्रोलर ज्योति चोपड़ा ने न्यायमूर्ति ठाकुर का परिचय वहां प्रशिक्षण ले रहे छात्र-छात्राओं से करवाया। चोपड़ा ने उन्हें केंद्र द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों के बारे में विस्तार से बताया। बाचतीत के दौरान न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने छात्रों का हौसला बढ़ाया और केंद्र की गतिविधियों को प्रति यह कहते हुए संतोष जताया- ‘मैं बहुत प्रसन्न हूं। आप अपने अच्छे कार्यों को इसी तरह आगे जारी रखें। ’


06 विकास की आशा

29 मई - 04 जून 2017

रोशन हुआ पॉवर सेक्टर विकास की आशा

तीन साल पहले तक देश में पॉवर सेक्टर का हाल बेहाल था, लेकिन सरकार की कारगर नीति और ​ क्रियान्वयन की बेहतर योजना के सहारे इस सेक्टर की तस्वीर बदल गई है

एसएसबी ब्यूरो

कोयले की कमी थी और न दूसरे संसाधनों की, लेकिन देश लंबे समय तक बिजली की कमी महसूस करता रहा। समस्या कहीं थी, जिस वजह से कृषि से लेकर उद्योग तक संकट ही संकट था। यह कमी थी, एकीकृत सोच की। तीन साल पहले देश में बिजली, कोयला और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय का काम एक ही मंत्री को दिया गया। नतीजा सामने है। तीन साल पहले तक बिजली संकट से जूझने वाला देश आज बिजली का निर्यातक बन गया है।

बिजली निर्यातक बना देश

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत ने पहली बार वर्ष 2016-17 ( फरवरी 2017 तक) के दौरान नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार को 579.8 करोड़ यूनिट बिजली निर्यात की, जो भूटान से आयात की जाने वाली करीब 558.5 करोड़ यूनिटों की तुलना में 21.3 करोड़ यूनिट अधिक है। 2016 में 400 केवी

लाइन क्षमता (132 केवी क्षमता के साथ संचालित) मुजफ्फरपुर – धालखेबर (नेपाल) के चालू हो जाने के बाद नेपाल को बिजली निर्यात में करीब 145 मेगावाट की बढ़ोत्तरी हुई है।

पॉवर सेक्टर की बदली तस्वीर

सरकार की नीतियों के चलते तीन साल से कम समय में भी आज पारंपरिक और गैर-पारंपरिक ऊर्जा का भी भरपूर उत्पादन होने लगा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत अब तक इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं बना, बल्कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बाजार के रूप में उभर कर सामने आया है। ऊर्जा क्षेत्र में हुए इस कायाकल्प के पीछे उन योजनाओं के क्रियान्यवन की भूमिका

रही, जिसे सरकार ने तीन साल पहले लागू किया। ऊर्जा क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने के लिए लागू की गई इन योजनाओं के बड़े और बेहतर नतीजे देश के सामने आए। सरकार ने 2022 तक हर घर को चौबीसों घंटे बिजली देने का लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन काम जिस गति से किया जा रहा है, उससे इस बात के संकेत मिलने लगे हैं कि सरकार अपने लक्ष्य को आसानी से हासिल करेगी।

हर गांव होगा रोशन

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2018 तक देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का वादा किया है। ‘ दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ के तहत जिस गति से ग्रामीण विद्युतीकरण का काम हो रहा है

ऊर्जा क्षेत्र में हुए इस कायापलट के पीछे उन योजनाओं के क्रियान्यवन की भूमिका रही, जिसे सरकार ने तीन साल पहले लागू किया। ऊर्जा क्षेत्र की हर किस्म की समस्याओं को दूर करने के लिए लागू की गई इन योजनाओं के बड़े और बेहतर नतीजे देश के सामने आए

एक नजर

तीन साल में बिजली निर्यातक बना देश

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ से दूर हुआ गांवों का अंधेरा

सौर ऊर्जा से देश की तस्वीर ओर तकदीर बदलने की तैयारी

उससे यह असंभव सा लगने वाला काम अब संभव लगने लगा है। तीन साल पहले मोदी सरकार के गठन के समय देश के 18,452 गांव बिजली से वंचित थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हजार दिन के भीतर इन गांवों के हर घर तक बिजली पहुंचाने का वायदा किया था। योजना लागू करने होने से लेकर अब तक वंचित गांवों में से 13,523 गांवों में बिजली पहुंच चुकी है और शेष 3,985 गांवों में तय समय से पहले बिजली पहुंचने वाली है। ‘ दीन


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विकास की आशा

बिजली चालित वाहनों को प्रोत्साहन

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त्री नरेंद्र तीनमोदीसालने पहलेजब सत्‍ता26 जूसंन भकोालीप्रधानमं थी तो उनके

सरकार की असरदार नीतियों की वजह से देश में बिजली उत्पादन का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है, तो इसकी दो बड़ी वजहें हैं। जहां एक तरफ वितरण में होने वाला नुकसान कम हुआ है, वहीं दूसरी तरफ सफल कोयला नीति से उत्पादन बढ़ा है दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाय जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ छह गांव बचे हैं, जहां बिजली नहीं पहुंची है और बिहार के महज 319 गांवों का रोशन किया जाना बाकी है।

उत्पादन बढ़ा, बर्बादी रुकी

सरकार की असरदार नीतियों की वजह से देश में लगातार बिजली उत्पादन का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है, तो इसकी दो बड़ी वजहें हैं। जहां एक तरफ वितरण में होने वाला नुकसान कम हुआ है, वहीं दूसरी तरफ सफल कोयला नीति से उत्पादन बढ़ा है। 2013-14 में बिजली उत्पादन 96,700 करोड़ यूनिट हुआ था, जो 2014-15 में बढ़कर 1,04,800 करोड़ यूनिट हो गया। यह सिलसिला आगे भी जारी रहा और 2015-16 में बिजली उत्पादन 1,10,700 करोड़ यूनिट हो गया, जिसकी वजह ऊर्जा नुकसान में 2.1 प्रतिशत की कमी रही। ऊर्जा नुकसान 201516 में जहां 2.1 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 0.7 प्रतिशत (अप्रैल-अक्टूबर, 2016) रह गई है। 201516 की तुलना में अब राष्ट्रीय पीक पावर डिफिसिट घटकर 1.6 प्रतिशत रह गया है।

एनटीपीसी बना सबसे बड़ा उत्पादक

इस वर्ष एनटीपीसी ने अब तक का सबसे अधिक 263.95 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन किया,है जो पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ उत्पादन 263.42 अरब यूनिट से अधिक है। इस तरह इस वर्ष एनटीपीसी ने पिछले वर्ष की तुलना में 4.71 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की। एनटीपीसी की कुल स्थापित क्षमता 48,188 मेगा वॉट है, जिसमें 19 कोयला आधारित, 7 गैस आधारित, 10 सौर ऊर्जा आधारित और 1 जल बिजली संयत्रं शामिल हैं। इनके अलावा 9 सहायक

/संयक्त ु उपक्रम वाले बिजली घर भी मौजूद हैं।

नई कोयला नीति

इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार की कोयला नीति करगर रही। इस नीति की वजह से देश अब ऊर्जा संकट से एक हद तक उबर चुका है । सरकार ने हाल ही में ‘शक्ति’ नाम से एक नई कोल लिंकेज पॉलिसी को मंजूरी दी है जो नए ताप बिजली घरों को आसानी से कोयला ब्लॉक उपलब्ध कराएगा। साथ ही पुराने एवं अटके पड़े बिजली घरों को भी कोयला उपलब्ध हो सकेगा। इससे कम से कम 30 हजार मेगावॉट क्षमता का अतिरिक्त उत्पादन शुरू हो सकेगा। मतलब कि अगर उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी तो बिजली की दरों में भी कटौती की संभावना रहेगी।

परमाणु बिजली आत्मनिर्भरता

उत्पादन

में

मोदी सरकार 10 नए हेवी वाटर रिएक्टर के निर्माण करने जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि ये रिएक्टर पूर्ण रूप से स्वदेशी होंगे। इन दस नए स्वदेशी न्यूक्लियर पॉवर प्लांट से 7,000 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकेगी। इस फैसले का सबसे बड़ा असर यह होगा कि भारत भी विश्व के अन्य देशों को हेवी वाटर रिएक्टर की तकनीक देने वाला देश बन जाएगा, जो मेक इन इंडिया योजना को बल प्रदान करेगा। इसके अलावा 2021-22 तक 6,700 मेगावाट परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए अन्य न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के निर्माण का भी काम चल रहा है।

‘उदय’ से भाग्योदय

देश की बिजली वितरण कंपनियों की खराब वित्तीय स्थिति सुधारने और उन्हें पटरी पर लाने के लिए

सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं। इन चुनौतियों में सबसे अहम था सड़कों पर दौड़ते वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना। इसके लिए सबसे बड़ी दरकार थी इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को सरकारी प्रोत्साहन। आज आलम यह है कि सार्वजनिक से लेकर निजी वाहनों के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों का प्रचलन तेज हुआ है। हालांकि अभी इस दिशा में आगे बढ़ने में कुछ समस्याएं भी हैं। बिजली से चलने वाले वाहनों को प्रोत्साहन देने से तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। इससे मध्यम अवधि में व्यापक प्रभाव पड़ेगा। दरअसल, भारत अब ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि जीवाश्म ईंधनों के बगैर भी वह अन्य स्रोतों से अपनी जरूरत की बिजली पैदा कर सकता है। ऐसे में अगर सभी गाड़ियों को बिजली से ही चलाया जाने लगे तो जीवाश्म ईंधन की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। यह ग्लोबल वार्मिंग के दीर्घावधि नजरिए से बेहद वांछित परिणाम होगा। रेलवे अपने डीजल इंजनों को सिलसिलेवार तरीके से हटाकर बिजली से चलने वाले इंजनों का इस्तेमाल बढ़ा सकता है। ऐसा करने से रेलवे को काफी बचत होगी। रेलवे के भीतर बनी जड़ता को दूर करने के लिए बिजली इंजनों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की जरूरत है। ई-रिक्शा पहले से ही बाजार में बढ़त बना रहे हैं। शहरों में चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए ‘उदय’ लागू किया गया है। सभी घरों को 24 घंटे किफायती एवं सुविधाजनक बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करना ही इस योजना का मूल उद्देश्य है। यह योजना 20 नवंबर, 2015 से शुरू की गई। इससे विरासत में मिली 4.3 लाख करोड़ रुपए के कर्ज की समस्या का मोदी सरकार ने स्थायी समाधान निकाल लिया। आज देश के सभी राज्य इस योजना से जुड़ चुके हैं।

फैल रहा है ‘उजाला’

प्रधानमंत्री मोदी ने 5 जनवरी 2015 को 100 शहरों में पारंपरिक स्ट्रीट और घरेलू लाइट के स्थान पर एलईडी लाइट लगाने के कार्यक्रम की शुरूआत की थी। इस राष्ट्रीय स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम का उद्देश्य 1.34 करोड़ स्ट्रीट लाइट के स्थान पर एलईडी लाइट लगाना है। अब तक देशभर में पुरानी लाइट्स बदलकर 21 लाख नए एलईडी लाइट लगाई जा चुकी हैं। इससे 29.5 करोड़ इकाई बिजली की बचत हुई है। यही नहीं इसके चलते 2.3 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आई है। सबसे बड़ी बात है कि इसके चलते खर्च और बिजली की तो बचत हो ही रही है, प्रकाश भी पहले से काफी बढ़ गया है। यही नहीं भारी मात्रा में एलईडी बल्बों की खरीद होने के चलते उसकी कीमत भी 135

सार्वजनिक निवेश बढ़ाने और बिजली चालित वाहनों की कीमतें तर्कसंगत होने के साथ ही कई तरह के प्रोत्साहन मिलने से भविष्य में बस, मिनी बस, टैक्सी और तिपहिया जैसे सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों को इलेक्ट्रॉनिक वाहन में तब्दील किया जा सकता है। वित्तीय अनुदान और एक साल बाद परमिट का नवीनीकरण किए जाने को केवल इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के लिए लागू किया जा सकता है। इसे शुरुआत में महानगरों और पर्यटक स्थलों में आजमाया जा सकता है। अगर इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को थोक में खरीदा जाए तो उनकी कीमतें भी नीचे आ जाएंगी। जब तक इस तरह के वाहन वाणिज्यिक रूप से सक्षम न हो जाएं, सरकार की तरफ से सार्वजनिक परिवहन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों की खरीद पर वित्तीय अनुदान दिया जाए। अगर चार्जिंग में इस्तेमाल होने वाली बिजली और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की खरीद में सब्सिडी दी जाए तो इन वाहनों की परिचालन लागत भी आम वाहनों जैसी ही होगी। इससे शहरों में मौजूद प्रदूषण के ऊंचे स्तर को भी कम करने में मदद मिलेगी। रुपए के बजाय 80 रुपये प्रति बल्ब बैठ रही है। अगर सिर्फ अकेले उत्तर प्रदेश के वाराणसी की बात करें तो वहां 1000 स्ट्रीट लाइट को एलईडी से बदल दिया गया है और बाकी 4000 एलईडी भी जल्द लगा दिए जाएंगे।

सौर ऊर्जा से बदलेगी तकदीर

मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से उत्पन्न हुई जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए भी मोदी सरकार कदम उठा रही है। ताकि ऊर्जा की जरूरतें भी पूरी हों और प्रकृति का संरक्षण भी साथ-साथ जारी रहे। माना जा रहा है एलईडी बल्ब का इस्तेमाल इस दिशा में अपने-आप में बहुत बड़ा कदम है। इसके प्रयोग से सालाना 8 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन को रोका जा सकता है। इसके साथ-साथ 4 हजार करोड़ रुपए की सालाना बिजली की बचत भी होगी। इसके साथ-साथ केंद्र सरकार नवीकरणीय ऊर्जा पर भी जोर दे रही है। इसके तहत सौर ऊर्जा का उत्पादन मौजूदा 20 गीगावॉट से बढ़ाकर साल 2022 तक 100 गीगावॉट करने का लक्ष्य है। सबसे बड़ी बात है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए सरकार 2030 तक देश के सभी वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदल देने का लक्ष्य लेकर काम में जुटी है।


08 विशेष

29 मई - 04 जून 2017

31 मई- विश्व धूम्रपान निषेध दिवस

एक कश यानी जिंदगी के पांच मिनट कम धूम्रपान हमारे आसपास सघन तौर पर पसरा एक ऐसा खतरा है, जिसकी गंभीरता को समझते हुए भी हम अक्सर उसकी अनदेखी कर जाते हैं

ध्रू

एसएसबी ब्यूरो

मपान निषेध के लिए जब भी कोई जागरुकता रैली निकाली जाती है, तो प्रदर्शनकारियों के हाथों में धूम्रपान के खतरनाक नतीजों को लेकर चेतावनी देती तख्तियां होती हैं। इन्हीं तख्तियों के बीच एक संदेश वाली तख्ती जो अक्सर दिखती है, उसमें पॉल डुडली व्हाइट की वह मशहूर उक्ति लिखी होती है, जिसमें उन्होंने कहा है, ‘सिगरेट वह पाइप है, जिसके एक सिरे पर आग है और दूसरे पर एक मूर्ख व्यक्ति।’ इस बार भी जब पूरी दुनिया भर में 31 मई को विश्व धूम्रपान निषेध दिवस पर तो व्हाइट के इस बयान को सामने रखकर तंबाकू का सेवन करने वालों को चेतावनी दी जाएगी। दरअसल, यह हमारे आसपास सघन तौर पर पसरा एक ऐसा खतरा है, जिसकी गंभीरता को समझते हुए भी हम अक्सर उसकी अनदेखी कर जाते हैं। तंबाकू और धूम्रपान से हर साल लाखों जिंदगियां तबाह हो रही हैं। साथ ही तंबाकू सेवन के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले

दुष्परिणाम और उनसे होने वाली जानलेवा बीमारियों पर लोगों के करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, 5 से 10 सिगरेट रोज पीने वाले व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने की आशंका दोगुना ज्यादा बढ़ जाती है और सिगरेट का एक कश जिंदगी के 5 मिनट कम कर देता है। जानकारों का मानना है कि सिगरेट पीने की आदत पड़ने का सबसे बड़ा कारण है, 'पीयर प्रेशर' यानी दोस्तों का दबाव होता है। भारत में हर साल तकरीबन 8 लाख लोग धूम्रपान के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। अनुमानत: 90 प्रतिशत फेफड़े के कैंसर, 30 प्रतिशत अन्य प्रकार के कैंसर, 80

प्रतिशत ब्रोंकाइटिस, इन्फिसिमा एवं 20 से 25 प्रतिशत घातक हृदय रोगों का कारण धूम्रपान है। दो-तीन दशक पहले तक महिलाओं में धूम्रपान की लत पुरुषों के मुकाबले काफी कम थी, पर इस बुराई को लेकर यह लैंगिक खाई भी लगातार पटती जा रही है। जबकि इसका खतरा महिलाओं के लिए इस लिहाज से ज्यादा है कि इससे उनके गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी खासा दुष्प्रभाव पड़ता है। यही नहीं, इससे स्वत: गर्भपात, मृत शिशु का प्रसव, गर्भावस्था में ही शिशु की मृत्यु तथा कम वजन के कमजोर बच्चे के जन्म लेने की आशंका भी बढ़ जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि सिगरेट के

धूम्रपान करने वालों को खतरनाक मित्र समझना चाहिए। धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वालों को फेफड़े के कैंसर एवं गंभीर हृदय रोग हो सकते हैं

एक नजर

दुनिया में प्रतिवर्ष 60 लाख लोगों की मौत तंबाकू सेवन से

भारत में होने वाली मौतों की संख्या 8 लाख से अधिक 5-10 सिगरेट रोज पीने वालों को दिल का दौरा पड़ने का खतरा ज्यादा

धुएं से केवल धूम्रपान करने वालों को ही नुकसान नहीं होता, बल्कि उनके संपर्क में रहने वाले दोस्तों, बच्चों एवं परिवार वालों को भी इसका खामियाजा भुगतना होता है। इसीलिए धूम्रपान करने वालों को खतरनाक मित्र समझना चाहिए। धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वालों को आंख, गले और नाक में जलन की तकलीफ तथा फेफड़े के कैंसर एवं हृदय रोग हो सकते हैं। धूम्रपान के क्रम में छोड़े गए धुएं के


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2020 तक धूम्रपान से सालाना एक करोड़ मौत!

वर्ष 2030 में तंबाकू की वजह से होने वाली अनुमानित मौतों में से लगभग 80 प्रतिशत मौतें कम और मध्य आय वाले देशों में ही होंगी

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श्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार धूम्रपान की वजह से हर साल लगभग 60 लाख लोग मारे जा रहे हैं और इनमें से अधिकतर मौतें कम तथा मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं। पनामा में एक सम्मेलन में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वर्ष 2030 में प्रति वर्ष धूम्रपान की वजह से मारे जाने लोगों की संख्या बढ़कर 80 लाख हो जाएगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 92 देशों के 2.3 अरब लोगों को धूम्रपान पर किसी न किसी तरह लगाए गए प्रतिबंधों से लाभ हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक तंबाकू की वजह से होने वाली अनुमानित मौतों में से लगभग 80 प्रतिशत मौतें कम और मध्य आय वाले देशों में ही होंगी। साफ है कि आने वाले समय में इनमें से सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही होने जा रहा है। इसी तरह एक सर्वेक्षण में यह आशंका जताई गई है कि अगर हालात पर निर्णायक तरीके से काबू नहीं पाया गया और यही स्थिति जारी रही तो 2020 तक धूम्रपान के कारण मरने वालों की संख्या एक करोड़ सालाना हो जाएगी। धूम्रपान दरअसल एक लत है, जिससे जब तक व्यक्ति दूर रहता है तब तक तो वह ठीक

रहता है, लेकिन एक बार यदि इसे प्रारम्भ कर दिया जाए तो इंसान को इस नशे में मजा आने लगता है। कुछ कहने-सुनने से पहले यह जान लें की धूम्रपान हर दृष्टि से हानिकारक है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में हर साल पचास अरब रुपए धूम्रपान पर खर्च किए जाते हैं। विकसित देशों में धूम्रपान की लत अब महिलाओं और लड़कियों में भी तेजी फैल रही है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल के अनुसार, ‘विश्व में लगभग एक अरब लोग धूम्रपान करते हैं, जिनमें से करीब पांच करोड़ महिलाएं हैं।’

फिलीपींस में डॉक्टरों के धूम्रपान करने पर रोक है। वहां की मेडिकल एसोसिएशन ने इसीलिए यह फैसला किया है, ताकि लोगों के सामने एक अच्छी मिसाल पेश की जा सके कारण वातावरण में पड़ने वाले प्रभाव की वजह से अनेक प्रकार के दुष्परिणाम हो सकते हैं। इनमें बाल अवस्था में श्वसन संबंधी गंभीर रोग, खांसी, कफ, बलगम, छींक, घबराहट, कान बहना, फेफड़ों का कम विकास एवं उनकी कमजोरी, आंख, नाक और गले में जलन, फेफड़े के कैंसर, कम वजन तथा कम लंबाई के बच्चे का जन्म, जन्मजात अपंगता तथा हृदय रोग प्रमुख हैं। अगर फैशन से जुड़े लोगों और मॉडल्स की सुनें तो वे अपने वजन पर काबू रखने के लिए सिगरेट पीते हैं। कुछ महिलाएं तो ऐसा भी मानती हैं कि जिंदगी में कुछ नया करने के लिए उन्होंने पहली सिगरेट सुलगाई और वो कब लत बन गई पता ही नहीं चला। भारत में ‘एडवोकेसी फोरम फॉर टोबेको

कंट्रोल’ की डॉ. मीरा आगी का कहना है कि सिगरेट पीना महिलाओं के लिए भी उतना ही हानिकारक है, जितना पुरुषों के लिए, लेकिन महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए ये अधिक नुकसानदेह इसीलिए है क्योंकि तंबाकू का असर पैदा होने वाले बच्चों पर काफी बुरा हो सकता है। फेफड़े का कैंसर भी सिगरेट पीने वाले पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा देखा गया है। भारत में सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने पर पाबंदी है, लेकिन इसका बहुत सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा है। आलम यह है कि अदालत की सख्ती के बाद देश में तंबाकू के बुरे असर को दर्शाने के लिए सिगरेट की डिब्बियों पर खतरनाक तस्वीरें छापी जाने लगी हैं, लेकिन इससे भी धूम्रपान करने

विशेष

आगाह करने वाले तथ्य

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सर्वप्रथम तो इससे सबसे अधिक फेफड़ों का कैंसर होता है। धूम्रपान करने वालों में इस तरह के कैंसर की आशंका, एेसा न करने वालों की अपेक्षा 10 गुना होते हैं। चूंकि इसका पता काफी देर से लगता है इसलिए एेसे मामलों में 95 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है।

मुख का कैंसर, ओसोफेजेअल कैंसर और पेट का कैंसर भी धूम्रपान से होता है।

ब्रॉन्काईटिस, डेंटल केरीस, मसूड़ों के इन्फेक्शन इस लत के कारण अधिक होते हैं।

धूम्रपान से रक्तचाप में वृद्धि होती है, रक्तवाहिनियों में रक्त का थक्का बन जाता है। यह कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है।

धूम्रपान से टीबी होता है। कई ऐसे हॉलिवुड गायक हैं, जिन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि अधिक धूम्रपान करने से उनकी आवाज खराब हुई।

इससे प्रजनन शक्ति कम हो जाती है। यदि कोई गर्भवती महिला धूम्रपान करती है तो या तो शिशु की मृत्यु हो जाती है या फिर कोई विकृति उत्पन्न हो जाती है।

लंदन के मेडिकल जर्नल द्वारा किये गये ‘पैसिव स्मोकिंग: ए साइलेंट किलर’ के नए अध्ययन में पाया गया कि धूम्रपान करने वाले लोगों के आसपास रहने से भी गर्भ में पल रहे बच्चे में विकृतियां उत्पन्न हो जाती हैं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. जोनाथन विनिकॉफ के अनुसार, ‘गर्भावस्था के दौरान माता-पिता दोनों को स्मोकिंग से दूर रहना चाहिए। गर्भवती महिलाएं पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में जितना ज्यादा रहेंगी, बच्चे में जन्म दोष का खतरा उतना ही ज्यादा बढ़ जाएगा।

धूम्रपान करने वालों में जागरुकता व सोचने समझने की शक्ति कम हो जाती है।

जो पुरुष धूम्रपान करते हैं उनकी पत्नियों को सर्वाइकल कैंसर का खतरा अधिक होता है।

धूम्रपान करने वाला व्यक्ति भले ही फिल्टर से छनता हुआ धुआं अंदर ले रहा हो, लेकिन जो लोग उसके आसपास हैं, वे बिना छने धुएं को फेफड़ों में खींचने के लिए विवश हैं। सिगरेट से निकले धुएं में 3 गुना निकोटीन, 3 गुना टार और पचास गुना अधिक अमोनिया होता है, जो अत्यंत नुकसानदेह होता है।

अमेरिकी कंपनियां हर साल 6 हजार अरब से अधिक सिगरेट का उत्पादन करती हैं जिसका लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा निर्धन एवं विकासशील देशों में निर्यात किया जाता है, जिससे अमेरिका को हर साल 3 अरब डॉलर का फायदा होता है।

वालों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई है। एक बात और यह है कि सरकार निस्संदेह देश में बढ़ते तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने के लिए कई कदम उठा रही है, लेकिन इस अभियान में महिलाओं और तंबाकू के सेवन से उन्हें होने वाले खतरों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। तंबाकू सेवन के खिलाफ काम कर रहे लोगों की मांग है कि न सिर्फ तंबाकू सेवन पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, बल्कि इसकी वजह से महिलाओं को होने वाली स्वास्थ्य संबंधी विषयों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एक बात जो यहां खासतौर पर उल्लेखनीय है, वह यह कि न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर की सरकारें इसकी भयावहता से भलीभांति अवगत हैं, लेकिन इससे होने वाली राजस्व प्राप्ति

का वैकल्पिक समाधान न खोज पाने के कारण वे इन पर पूरी तरह रोक लगाने का साहस नहीं दिखा पाती हैं। धूम्रपान से स्वास्थ्य पर जानलेवा कुप्रभाव तो पड़ता ही है, वहीं इससे राष्ट्र की प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसा देखा गया है कि धूम्रपान करने वाला व्यक्ति अपने कार्य के प्रति उदासीन होता है, जिससे उसकी कार्यक्षमता घटती है और इससे उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धूम्रपान करने वाले कर्मचारी गंभीर रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं, और समय पूर्व मौत का शिकार हो सकते हैं, जिससे नियोक्ता कंपनी तथा कारखाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। तंबाकू से मुंह और जीभ का कैंसर हो सकता है। अनेक प्रकार के पेट से


10 विशेष

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योग और प्राकृतिक उपचार की लें मदद

• खुद पर विश्वास रखें और योजना बनाएं। सिगरेट की इच्छा को दबाने के लिए व्यायाम करें। स्वयं की कल्पना नॉन स्मोकर के रूप में करें। दोस्त और परिवार से मदद मांगें। तनाव पर नियंत्रण करें, बेकिंग सोडा कॉकटेल का प्रयोग करें। फल और सब्जियां अधिक मात्रा में लें। • विटमिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थ खाएं। दालचीनी चबाएं। नमकीन खाद्य पदार्थ लें। मेवों का सेवन करें। ऐसे व्यक्तियों के साथ दोस्ती करें जो सिगरेट नहीं पीते हैं। • इसका सबसे अच्छा उपचार खुद पर कंट्रोल करना ही है। स्पष्ट उपचार है व्यक्ति की इच्छा शक्ति। धूम्रपान को स्टेटस सिंबल समझने की गलती न करें। यह एक ऐसी परेशानी है जो व्यक्ति स्वयं अपने ऊपर लाता है। स्वयं जागरूक बनें। धूम्रपान से सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि आपके परिजनों को भी जान का खतरा है। l ध्यान के जरिये इससे छुटकारा पाया जा सकता है। एक अध्ययन के अनुसार, मेडिटेशन धूम्रपान की आदत को छुड़ाने का बहुत अच्छा तरीका हो सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन्होंने माइंडफुलनेस मेडिटेशन में महारत हासिल की हुई थी उन्होंने 60 फीसदी कम धूम्रपान किया। ध्यान की इस प्रक्रिया को एकीकृत शारीरिक मन प्रशिक्षण (आइबीएमटी) भी कहा जाता है। • शोध में उन लोगों को शामिल किया गया जो या तो धूम्रपान छोड़ना चाहते थे अथवा उसकी मात्रा कम करना चाहते थे। शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग में ऐसे लोगों को शामिल किया जो तनाव कम करना और अपनी क्षमता को बढ़ाना चाहते थे। इसमें देखा गया कि जिन लोगों ने इस

ट्रेनिंग में भाग लिया, उनकी सिगरेट पीने की इच्छा में काफी कमी देखी गयी। आईबीएमटी पूरे शरीर को आराम पहुंचाती है। इसके साथ ही मानसिक रूप से भी शांति प्रदान करती है। • जिसने ईमानदारी से धूम्रपान छोड़ दिया है वे अपना खोया हुआ समय तो वापस नहीं पा सकते पर सेहत ज़रूर वापस पा सकते हैं। इसीलिए सरकार से हमारा आग्रह है कि सार्वजनिक स्थालों पर धूम्रपान को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। • याद रखिए कि फिल्मों में दिखाए जा रहे धूम्रपान के दृश्यों की नक़ल करने से आप हीरो नहीं बन जाते। तम्बाकू और सिगरेट किसी भी हाल में बच्चों और नवयुवकों को नहीं बेची जानी चाहिए। • आधुनिक शोधों के अनुसार धूम्रपान छोड़ने की ख्वाहिश रखने वालों के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट यानी ई-सिगरेट मददगार साबित हो सकती है। ई सिगरेट धूम्रपान छोड़ने में निकोटीन पैच जितनी ही प्रभावी हो सकती हैं। हाल ही में हुए शोधों के अनुसार तेजी से लोकप्रिय हो रहा यह उपकरण निकोटीन वाली भाप पैदा करता है। • ‘लांसटे ’ पत्रिका में प्रकाशित परिणामों के अनुसार ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वाले 7.3 प्रतिशत लोगों ने छह महीने बाद इसे छोड़ दिया जबकि धूम्रपान को अलविदा कहने के लिए पैच का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5.8 प्रतिशत रही। • सभी प्रयासों के बावजूद स्थिति में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद तब तक नहीं की जा सकती जब तक जागरूकता अभियान के साथ तंबाकू से तैयार होने वाली वस्तु के उत्पादन और बिक्री पर पूरी तरह से रोक न लगाई जाए।

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

अोडीएफ को लेकर अभियान तेज

इस साल आखिर तक मुरादाबाद होगा खुले में शौच से मुक्त संबंधित रोग भी हो सकते हैं। सिगरेट की तलब लगने पर सौंफ, इलायची, लौंग, टॉफी एवं ज्यादा से ज्यादा पेय पदार्थो का सेवन करना चाहिए। साथ ही व्यक्ति को अधिक से अधिक टहलना चाहिए, व्यायाम एवं प्राणायाम करना चाहिए। इससे शरीर में शुद्ध ऑक्सीजन जाती है जो नशे की तलब को दूर करने में सहायक होती है। इसके अलावा, अपना एकाकीपन दूर करने के लिए किसी कार्य में व्यस्त रहना चाहिए या खाली समय संगीत सुनकर बिताना चाहिए। भारत के साथ दुनिया भर में अब कई ऐसी आरोग्यशालाएं हैं, जहां बीड़ी-सिगरेट से लेकर शराब आदि का सेवन करने वाले लोगों का उपचार किया जाता है। इस दौरान उन्हें कुछ दवाओं के नियमित सेवन के साथ उनकी काउंसलिंग भी की जाती है। इन प्रयासों के काफी अच्छे नतीजे सामने आए हैं।

फिलीपींस में डॉक्टरों पर सख्ती

मु

ख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्रामीण इलाकों के साथ ही शहरों को भी ओडीएफ योजना से जोड़कर लक्ष्य पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इस सिलसिले में उन्होंने खासतौर पर सूबे के ग्रामीण इलाकों के साथ ही शहरों को भी ओडीएफ योजना से जोड़कर लक्ष्य पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसी सिलसिले में मुरादाबाद के कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी राकेश कुमार सिंह ने एक बैठक का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने दो अक्टूबर 2018 तक शहरों को ओडीएफ घोषित करने का लक्ष्य रखा है। जनपद में इस योजना के तहत तेजी के साथ काम होना चाहिए। जनपद के सभी निकाय और निगम में लक्ष्य को पूरा करने के लिए 31 दिसंबर 2017 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया। नगर निकाय में सर्वे का कार्य चल रहा है, जिसमें वार्ड में शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है।

फिलीपींस में डॉक्टरों के धूम्रपान करने पर रोक है। वहां की मेडिकल एसोसिएशन ने यह फैसला इसीलिए किया है, ताकि लोगों के सामने एक अच्छी मिसाल पेश की जा सके। एसोसिएशन के अध्यक्ष ऑस्कर टिनियो के मुताबिक, ‘सेहत के मामले में डॉक्टर लोगों के आदर्श होने चाहिए। समाज के सभी क्षेत्रों में उनके जीने के तरीके और व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव होता है। इसीलिए अगर वे धूम्रपान करते नजर आते हैं तो यह बिल्कुल सही नहीं है।’ सरकारी आंकड़ो के मुताबिक फिलीपींस में एक करोड़ 73 लाख लोग धूम्रपान करते हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का 28 फीसदी है। इनमें ज्यादातर लोग 15 साल से ज्यादा उम्र के हैं।

जापान का अनुभव

माना जाता है कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा सिगरेट की लत जापानियों में होती है। यही कारण है कि जापान को ध्रूमपान करने वालों का स्वर्ग कहा जाता है। इस पर काबू पाने के लिए वहां की सरकार ने कई तरह की पहल की है, इनमें सबसे अहम है तंबाकू और सिगरेट के दामों में भारी बढ़ोत्तरी। वहां बीते एक दशक में सिगरेट के कई ब्रांडों के दाम तो 90-40 फीसदी तक बढ़ गए हैं। अलबत्ता ये कदम जापान में इस उम्मीद में उठाए गए हैं कि कीमत ज्यादा होने से बहुत से लोग सिगरेट को अलविदा कहेंगे, लेकिन इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आकंड़ो के मुताबिक देश में हर साल फेंफड़े के कैंसर और दिल की बीमारी से 6,800 लोगों की मौत होती है, चिंता की बात यह है कि ये बीमारियां सीधे स्मोकिंग के बजाय पैसिव स्मोकिंग से भी हो रही हैं।

कुंदरकी नगर पंचायत में 6325, भोजपुर में 4500, भोजपुर में 550 शौचालयों का निर्माण हो चुका है। कांठ में 597 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया है, यहा पर आठ वार्डों में सर्वे के बाद 150 शौचालयों का निर्माण कार्य चल रहा है। जिलाधिकारी ने कहा कि शौचालयों की गुणवत्ता के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। अगर शौचालयों के निर्माण में कमियां मिलती है,तो ऐसे लोगों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई तय की जाएगी। अपर जिलाधिकारी प्रशासन संजय कुमार राय, एसडीएम सदर विजय कुमार के साथ अन्य अफसर मौजूद रहे।


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स्वच्छता

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अब इंद्रायणी नदी पर गया सबका ध्यान नदी संरक्षण

इंद्रायणी पुणे के निकट बहने वाली महाराष्ट्र की प्रसिद्ध नदी है, जिसे कचरामुक्त करने का फैसला स्थानीय प्रशासन और नागरिकों ने मिलकर किया है

एक नजर

इंद्रायणी नदी का संबंध संत तुकाराम से है

प्रदूषित नदियों की जारी सूची में यह नदी भी

नदी की स्वच्छता को लेकर आगे आईं कई संस्थाएं

मुं

आनंद भारती

बई के मीरा रोड उपनगर में है जांगिड़ कांप्लेक्स। यह परिसर अन्य के मुकाबले काफी साफ-सुथरा है। इसमें दो दर्जन बिल्डिंग हैं, जो किसी न किसी नदी के नाम पर हैं। गंगा-यमुना से शुरू होकर रावी-चिनाब पर खत्म होती है। एक नई ऊंची बिल्डिंग बन रही हैइंद्रायणी। यह महाराष्ट्र की एक पवित्र नदी के नाम पर है। एक दिन कुछ बारकर (तीर्थ यात्री) गुजर रहे थे, वे विट्ठल मंदिर से लौटे थे। उन्होंने उस बिल्डिंग का नाम पढ़ा और वहीं रुक गए। मैंने कारण पूछा तो बुझे स्वर में कहने लगे, ‘कितनी सुंदर बिल्डिंग बन रही है, लेकिन जिस नदी के नाम पर है, वह तो प्रदूषित हो गई है। उसका पानी नहाने के लायक भी नहीं है, पीने की बात कौन करे।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर जब गंगा को शुद्ध करने की घोषणा की गई तब यह भी उम्मीद जगी कि देश की बाकी नदियां भी उसी कतार में खड़ी होंगी। वैसा ही हुआ। स्वच्छता अभियान के बाद तो न केवल सड़कों, सार्वजनिक स्थानों और शहरों को साफ-सुथरा करने का अभियान चला, बल्कि सरकार और लोगों का ध्यान नदियों, झीलों पर भी गया। आज देश के हर कोने में नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की सोच आम लोगों में आ गई है। सरकार के साथ-साथ दर्जनों स्वयंसेवी संगठन इस दिशा में रात-दिन सक्रिय हैं। नदियों के साथ मुश्किल यह है कि वे सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों के कचरों और फैक्ट्रियों से निकलने वाली गाद और केमिकल के कारण होती

हैं। देश के अधिकतर शहर नदियों के किनारे ही हैं, जो पहले नावों के माध्यम से व्यापार को सुगम बनाती थीं, लेकिन वही शहर अब उन्हें गर्त में मिला रहे हैं। शहरों ने नागरिक-जीवन ही नहीं, अन्य प्राणियों को भी जल-संकट में डाल दिया है। इसके साथ ही पर्यावरण की समस्या पैदा हुई है। प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बनाने के कारण नदियां सूख रही हैं। इस कारण सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। एक हैरान करने वाली बात यह है कि कुछ साल पहले जब देश की डेढ़ सौ नदियों को प्रदूषित घोषित किया गया था तो सबसे अधिक प्रदूषित नदियां महाराष्ट्र में ही पाई गई थीं। उनमें भीमा, गोदावरी, पंचगंगा, कुंडालिका, तापी, कृष्णा, पूर्णा, वाणगंगा, चंद्रभागा, मीठी, भत्सा आदि के साथ साथ इंद्रायणी नदी का भी नाम था। यह नदी अपनी धार्मिक पवित्रता के लिए जानी जाती है। तत्कालीन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह भरोसा दिया था कि सारी प्रदूषित नदियों को केंद्र-राज्य के सहयोग से साफ किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया था कि महाराष्ट्र की कृष्णा, गोदावरी, तापी और पंचगंगा नदियों के शुद्धिकरण के लिए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण कार्यक्रम के अंतर्गत केंद्र ने राज्य को 2011 से 2014 की अवधि में 27149 करोड़ की राशि उपलब्ध कराई थी। उस काल में केंद्र और राज्य ने मिलकर अपनेअपने हिस्से से कुल 120 करोड़ रुपए खर्च किए थे। लेकिन इसके बावजूद नदियों को पूरी तरह शुद्ध नहीं किया जा सका। इंद्रायणी जैसी नदियों पर तो ध्यान जाना बाकी है। मगर यह सुखद बात है कि इसकी

सफाई का जिम्मा आम लोगों ने ही उठा लिया है। इस नदी का संबंध संत तुकाराम से है। इसीलिए लोग इस नदी के प्रति संवेदनशील हैं। पंढरपुर की यात्रा भी इसी नदी के पास से होती है। अन्य स्वयंसेवी संगठनों के साथ ही यहां आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवक भी सक्रिय हैं। वे उस मार्ग और इंद्रायणी नदी को पवित्र और साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए स्वच्छता अभियान लगातार चला रहे हैं। स्थानीय लोग भी अपने-अपने स्तर से इस मुहिम में शामिल हैं। इसके साथ ही लोग अब बोतलबंद

सैकड़ों बच्चे रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर नदी पार कर स्कूल जाते हैं। प्रधानमंत्री जब पुणे गए थे तो इन बच्चों ने अपील की थी कि ‘क्या प्रधानमंत्री जी इंद्रायणी नदी पर पुल बनवाकर उनकी मदद कर सकते हैं?

पानी की कंपनी (बिसलरी) के खिलाफ भी खड़े हो रहे हैं। इसी नदी का पानी इसमें इस्तेमाल किया जा रहा है। इस वजह से भी नदी सूखती जा रही है। इस नदी की लंबाई चालीस किलोमीटर है। लोगों का कहना है कि इसके आसपास खेती नहीं हो पा रही है। इस प्लांट के पास एक गांव है पाथरगांव, वहां के पूर्व सरपंच बाबू राव केदारी ने तहसील, जिलाधिकारी और पुणे मेट्रोपॉलिटन रीजनल डेवेलपमेंट अथॉरिटी (पीएमआरडीए) के सामने न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है कि साल 2011 में बिसलरी इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड ने कामशेट नदी के पास प्लांट लगाया था, यह मुंबई-पुणे हाइवे पर इंद्रायणी ब्रिज के पास है। कंपनी ने गांव के नजदीक बांध बनाकर इंद्रायणी नदी से गैरकानूनी तरीके से पानी लेना शुरू कर दिया। कादरी ने बताया, 'गांव मावल बेल्ट में पड़ता है और यह पुणे जिले की ऐसी बेल्ट है जहां अच्छी खेती होती है। पहले हमें कभी पानी की किल्लत नहीं हुई, लेकिन 2011 में प्लांट लगाए जाने के बाद से गांव वालों को पानी से जुड़ी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। अपनी फसल को बचाए रखने के लिए सिंचाई के लिए किसानों को ऊंची दर से पानी खरीदना पड़ रहा है। यह गांव जीविका के लिए पूरी तरह से खेती पर निर्भर है।' इसे देखने के लिए पत्रकारों की एक टीम भी गई थी, जिसने शिकायत को सही पाया था। यह नदी इसीलिए भी चर्चा में आई थी कि पुणे जिले के एक गांव के सैकड़ों बच्चे रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर नदी पार कर स्कूल जाते हैं। प्रधानमंत्री जब पुणे गए थे तब इन बच्चों ने एक सार्वजनिक अपील की थी कि ‘क्या प्रधान मंत्री जी इंद्रायणी नदी पर पुल बनवाकर उनकी मदद कर सकते हैं? इससे हम लोग जो रोज अपनी जान पर खेलते हैं, वह नहीं होगा। अगर प्रधानमंत्री निर्देश देते हैं तो हमें भरोसा है कि पुल एक रात में ही बन जाएगा। हमारा सफर आसान हो जाएगा।’ कई छात्रों की इच्छा थी कि पीएम उनके गांव थोड़ी देर के लिए आएं और देखें कि उनकी जिंदगी कितनी कठिन है।


12 साइंस एंड टेक्नोलॉजी

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अंतरिक्ष अनुसंधान

चांद होगा धरती का आठवां महादेश

चांद और अंतरिक्ष को लेकर अभी सारी वैज्ञानिक गुत्थियां भले न सुलझी हों, पर इस बीच कई ऐसी तैयारियां शुरू हो गई हैं जिसमें चांद और धरती की दूरी तो कम होगी ही, इनके बीच व्यावसायिक रिश्ता भी कायम हो सकेगा

एक नजर

चांद पर पानी की खोज में जुटे वैज्ञानिक और निजी कंपनियां

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एसएसबी ब्यूरो

द और अंतरिक्ष को लेकर वैज्ञानिक खोज अब दिलचस्प दिशा की तरफ मुड़ गई है। अब इसमें कई ऐसी संभावनाओं को स्थान मिल रहा है, जिससे चांद और अंतरिक्ष को लेकर लोगों की सैकड़ों सालों से रही फैंटेसी को सच कर दिखाया जाए। ऐसी ही एक संभावना है चांद पर मानवीय जीवन के लिए अनुकूलताओं की खोज। इससे जुड़े कई अनुसंधान तो चल ही रहे हैं, साथ में कई ऐसे विकल्पों को लेकर भी कार्य शुरू हो गए हैं, जिससे चांद और मनुष्य के बीच की दूरी कम हो। इन्हीं कोशिशों के बीच चांद को दुनिया का आठवां महादेश बनाने की तैयारी भी की जा रही

है। इस तरह की तैयारी में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा तो अपने तरह से जुटी ही है, विकसित देशों की कई निजी कंपनियां भी ऐसी योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रही हैं। खासौतर पर निजी कंपनियां चांद पर पानी से लेकर हीलियम तक तलाशने का काम शुरू करने वाली हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद पर मौजूद हीलियम को धरती पर लाने में सफलता मिलती है तो विश्व में आने वाले एक हजार साल तक की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

दरअसल, धरती पर तेजी से खत्म हो रहे प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए कुछ लोग इसकी वैकल्पिक तलाश में जुटे हैं और इस लिहाज से चांद उन्हें काफी आकर्षित करता है। ऐसे ही एक प्रयास में जुटी है ‘मून एक्सप्रेस’ कंपनी। यह अमेरिकी कंपनी चांद पर खुदाई का काम शुरू करने वाली है, ताकि वहां पर मौजूद संसाधनों का उपयोग पृथ्वी पर किया जा सके। इस कंपनी के मालिक रिचर्ड बताते हैं, ‘चांद पृथ्वी के आठवें महादेश की तरह है। अभी पूरी तरह

चीनी वैज्ञानिक सलाहकार प्रो ओयांग जियुन का मानना हैं कि अगर चांद पर मौजूद हीलियम-3 का इस्तेमाल ऊर्जा के रूप में किया जाए, तो पृथ्वी पर 10000 साल तक की ऊर्जा की जरूरतें पूरी हो सकती है

ऊर्जा संकट दूर करने के लिए चांद पर हीलियम की खोज अंतरिक्ष में कॉलोनियां बसाने की भी चल रही है तैयारी

से इसके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है। मैं और मेरे जैसे कुछ साहसी लोग उन शुरुआती अग्रदूतों की तरह हैं जो पूरी तरह से एक नयी दुनिया की तलाश में चांद पर जा रहे हैं।’ चांद पर मौजूद ध्यानाकर्षण वाले संसाधनों में प्लेटिनम और हीलियम-3 है। कुछ लोगों का मानना है कि चांद पर पानी का भंडार भी है। इसके अलावा इरेडियम व पैलेडियम को लेकर भी लोग आशान्वित हैं। इन धातुओं में एक विशेष गुण होता है, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए काफी


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पृथ्वी के चारों ओर मानव निर्मित बुलबुले

एक खास तरह के कम्युनिकेशंस अंतरिक्ष में मौजूद कणों के साथ प्रतिक्रिया करते पाए गए हैं, जिससे उनकी गति प्रभावित हो रही है

मा

नवीय गतिविधियां पृथ्वी के भू-दृश्य को लंबे समय से प्रभावित करती रही हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हम रेडियो कम्युनिकेशंस के माध्यम से हमारे अंतरिक्ष के पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहे हैं। पृथ्वी के निकट पर्यावरण में इलेक्ट्रॉन व आयन का अध्ययन करने वाले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वान एलेन प्रोब्स के मुताबिक, इस तरह के कम्युनिकेशंस का प्रभाव हमारे वायुमड ं ल के बाहरी क्षेत्र में भी हो रहा है, जिसके कारण पृथ्वी के चारों ओर बुलबुलों का निर्माण हो रहा है। एक खास तरह के कम्युनिकेशंस (बेहद कम आवृत्ति या वीएलएफ या रेडियो कम्युनिकेशंस) अंतरिक्ष में मौजूद कणों के साथ प्रतिक्रिया करते पाए गए हैं, जिससे उनकी गति (कण कैसे और कहां जा रहे हैं) प्रभावित हो रही है। वेस्टफोर्ड मैसाचुसेट्स में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ

टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के सहायक निदेशक फिल एरिक्सन ने कहा, ‘कई तरह के परीक्षण व अवलोकन से यह स्पष्ट हुआ है कि सही हालात में वीएलएफ फ्रीक्वेंसी रेंज में रेडियो कम्युनिकेशंस सिग्नल वस्तुत: पृथ्वी के चारों ओर उच्च-ऊर्जा विकिरण के गुणों को प्रभावित करता है।’ नासा के वान एलेन प्रोब्स ने भी पृथ्वी की काफी ऊंचाई से अंतरिक्ष में इन बुलबुलों को देखा है।

अंतरिक्ष में विशालकाय संरचनाओं का निर्माण ठीक उसी प्रकार से किया जा सकेगा, जैसा कि साइंस फिक्शन फिल्मों में देखने को मिलता है। इस निर्माण में चांद व क्षुद्र ग्रह से मिलने वाले धातु और पानी की सहायता ली जाएगी उपयोगी होता है। ऐसे तत्व पृथ्वी पर काफी कम मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन, संभव है कि चांद पर यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। रिचर्ड को उम्मीद है कि बहुत जल्द चांद पर बहुमूल्य संसाधनों की मौजूदगी के बारे में सबको खबर होगी। यह अलग बात है वहां मिलने वाला कौन सा संसाधन सबसे अधिक उपयोगी होगा, यह भविष्य बताएगा। मून एक्सप्रेस अकेली ऐसी कंपनी नहीं है, जिसने चांद पर मौजूद संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने का मन बनाया है। इस दौड़ में विश्व के कई देश और वहां की निजी कंपनियां शामिल हैं। मून एक्सप्रेस के रिचर्ड एक बात को लेकर और भी दावा करते हैं कि सूर्य के चारों ओर एक घेरे के रूप में मौजूद क्षुद्र ग्रह पर बर्फ के रूप में पानी मौजूद है। इन क्षुद्र ग्रहों से अंतरिक्ष में पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है।

चांद पर पानी

‘आइस्पेस’ एक जापानी कंपनी है और वह चांद पर पानी की तलाश शुरू करने वाली है। 2016 के आखिर में आइस्पेस ने जापान नेशनल स्पेस एजेंसी के साथ चांद पर माइनिंग, ट्रांसपोर्ट और चांद के संसाधनों के उपयोग को लेकर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया है। शुरुआती चरण में 2018 से 2023 के बीच यह कंपनी चांद का पूर्वेक्षण करेगी। इसके तहत चांद पर खोजी रोबोट उतारे जाएंगे, जो

वहां की सतह पर पानी की तलाश करेंगे। कंपनी का चांद पर व्यावसायिक काम 2024 में शुरू होगा।

क्षुद्र ग्रह पर रोबोट

अमेरिका की दो कंपनियां ‘प्लेनेटरी रिसोर्सेस’ और ‘डीप स्पेस इंडस्ट्री’ क्षुद्र ग्रह पर खुदाई के काम को लेकर योजना बना रही है। डीप स्पेस के चेयरमैन रिक टिमलिसन कहते हैं कि उनकी कंपनी की योजना 2020 तक पहले किसी क्षुद्र ग्रह पर एक पूर्वेक्षण रोबोट उतारने का है। यह क्षुद्र ग्रह पर संभावित जल संसाधनों का अध्ययन व खोज करेगा। इसके बाद वह वहां से एक टुकड़ा लेकर आएगा। इस टुकड़े को सौर शक्ति से उसका वाष्पीकरण कर पानी के रूप में परिवर्तित किया जाएगा, क्योंकि क्षुद्र ग्रहों से पानी का दोहन करना काफी आसान है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक होता है तो 21वीं सदी के मध्य तक संसाधनों का बड़ी मात्रा में उत्पादन संभव हो सकेगा। प्लेनेटरी रिसोर्स कंपनी की योजना भी जल की खोज पर केंद्रित है। इसके सीइओ क्रिस लेविकी कहते हैं कि सौर ऊर्जा से क्षुद्र ग्रह की सतह को गर्म कर वहां से पानी उत्सर्जित किया जा सकता है।

‘रिटर्न टू द मून’

जापान के अलावा चीन भी चांद को उम्मीद भरी

नजरों से देख रहा है। खासकर चीन की दिलचस्पी चांद पर मौजूद हीलियम-3 में है। हीलियम-3 का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में आसानी से किया जा सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि सूर्य से जारी होने वाले आइसोटॉप सौर हवाओं में तैरते हुए पृथ्वी की ओर जरूर आते हैं, लेकिन यहां के वायुमंडल के कारण यह सतह तक नहीं पहुंच पाते हैं। वहीं इसे चांद पर पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होती है। इसीलिए चांद की सतह पर यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। दरअसल, हीलियम-3 एक नान रेडियोएक्टिव एजेंट है। यह कोई भी खतरनाक तत्व उत्सर्जित नहीं करता है। चीनी वैज्ञानिक सलाहकार प्रो ओयांग जियुन का मानना हैं कि अगर चांद पर मौजूद हीलियम-3 का इस्तेमाल ऊर्जा के रूप में किया जाए, तो पृथ्वी पर 10000 साल तक की ऊर्जा की जरूरत पूरी हो सकती है। चांद पर हीलियम 3 की खुदाई की वकालत हैरीसन स्मिथ ने भी की है। हैरीसन एक भूविज्ञानी हैं और नासा के अपोलो-17 मिशन के दौरान चांद पर जा चुके हैं। उन्होंने इस बात का जिक्र 2006 में लिखी अपनी किताब ‘रिटर्न टू द मून’ में किया है। वह कहते हैं कि हीलियम-3 का ऊर्जा में रूपांतरण संलयन प्रौद्योगिकी से संभव है,लेकिन इसे शोधकर्ता लंबे समय से टालते आए हैं।

स्पेस में कॉलोनियां

प्लेनेटरी रिसोर्स और डीप स्पेस जैसी कंपनियां अंतरिक्ष में भवन निर्माण सामग्री ले जाने की भी योजना बना रही हैं। इससे अंतरिक्ष में तैरने वाली संरचना का निर्माण किया जा सकेगा। इसे पृथ्वी से लांच करने की आवश्यकता नहीं होगी। अंतरिक्ष में विशालकाय संरचनाओं का निर्माण ठीक उसी प्रकार से किया जा सकेगा, जैसा कि साइंस फिक्शन फिल्मों में देखने को मिलता है। इस निर्माण में चांद व क्षुद्र ग्रह से मिलने वाले धातु और पानी की सहायता ली जाएगी। साथ ही थ्रीडी प्रींटिंग जैसे तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इन तकनीकों का इस्तेमाल आज तक पृथ्वी पर इस पैमाने पर नहीं हो सका है। इसी तरह एलेन मुस्क और जेफ बिजोस जैसे बड़े कारोबारी भी अंतिरक्ष में और मंगल पर कॉलोनी बनाने की योजना पर विचार कर रहे हैं। वे इसके लिए अंतरिक्ष में माइनिंग की वकालत कर रहे हैं। इसी माइनिंग से कॉलोनी निर्माण में पानी, ईंधन व कच्चे माल की आपूर्ति होगी।

भारी निवेश

जाहिर है कि अंतरिक्ष से जुड़ी इन तमाम योजनाओं पर काफी खर्च आएगा। स्पेस वेंचर्स को लेकर 2015 में करीब 1.8 बिलियन डॉलर निवेश किया गया। करीब 50 से ज्यादा वेंचर्स ने अंतरिक्ष से जुड़े सौदों के लिए निवेश कर दिया है। एक छोटे से यूरोपीय देश लग्जमबर्ग ने भी इन मामलों में 25 मिलियन यूरो प्लेनेटरी रिसोर्स के साथ मिलकर प्रोस्पेक्टर एक्स के लिए निवेश किया है। साफ है कि चांद और अंतरिक्ष को लेकर खोज और वैकल्पिक योजनाओं के लिए कहीं से भी वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं दिख रही है।

साइंस एंड टेक्नोलॉजी 'अर्थ 2.0' की खोज

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अमेरिकी वैज्ञानिकों को एक ऐसे ग्रह का पता चला है जो धरती से काफी मिलता जुलता है। जीवन की संभावनाएं जगाने वाला यह ग्रह सूर्य जैसे ही एक सूदूर तारे की परिक्रमा कर रहा है। धरती से आकार में करीब 60 फीसदी बड़ा यह ग्रह उससे करीब 1,400 प्रकाशवर्ष दूर स्थित ‘साइग्नस’ नाम के एक तारा समूह में स्थित है। खगोलविदों ने नासा के केपलर के स्पेस टेलिस्कोप से इसकी खोज की है। यह ग्रह एक ऐसे तारे के चारों ओर चक्कर लगाता दिखा है, जो आकार और तापमान में धरती के सूर्य जैसा ही है, लेकिन उम्र से उससे भी बड़ा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के एमीज रिसर्च सेंटर के खगोलविद जोन जेंकिंस ने बताया, ‘मेरे विचार में, हमंत धरती के समान एक ग्रह जैसी सबसे नजदीकी चीज मिली है।’ इस ग्रह का नाम केपलर-452बी रखा गया है और यह जिस सूर्य जैसे तारे के चारों ओर घूम रहा है, वह करीब छह अरब साल पुराना है। हमारी धरती के सूर्य की उम्र लगभग 4.6 अरब साल आंकी गई है। जेंकिंस कहते हैं, ‘यह जानना एक अद्भुत अनुभव है कि कि इस ग्रह ने छह अरब साल इस तारे के आसपास हैबिटेबल जोन में बिताए हैं।’ हैबिटेबल जोन किसी तारे के चारों ओर के उस क्षेत्र को माना जाता है, जिसमें परिक्रमा कर रहे ग्रह पर जीवन के आधार पानी के द्रव्य रूप में होने की संभावना हो। इस ग्रह पर जीवन होने की संभावना पर जेंकिंस कहते हैं, ‘उसकी सतह या सागरों में जीवन की उत्पत्ति के लिए इतना समय और अवसर काफी होना चाहिए, अगर धरती की तरह वहां जीवन के लिए बाकी जरूरी सामग्री और परिस्थिति भी मिले।’ केपलर-452बी की अपने सूर्य से दूरी लगभग उतनी ही है जितनी धरती की हमारे सूर्य से। वह अपने सूर्य का एक चक्कर 385 दिनों में लगाता है, जबकि धरती को 365 दिन लगते हैं। केंद्रीय तारे से इतनी दूरी पर ग्रह का तापमान पानी के लिक्विड रूप में रखने लायक माना जा रहा है। पहले भी वैज्ञानिक कुछ और धरती जैसे ग्रहों की पहचान कर चुके हैं, लेकिन उनके तारों का तापमान और आकार इससे कम पाया गया। नासा ने 2009 में केपलर टेलिस्कोप को इसी मकसद से भेजा था कि धरती के सबसे नकदीकी तारों का पता लगा सके। केपलर को ऐसे ग्रहों का पता लगाना था कि क्या आकाशगंगा में धरती जैसे ग्रह होना आम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अर्थ 2.0 कहा जा रहा यह नया ग्रह धरती की ही तरह चट्टानी हो सकता है। यह धारणा सांख्यिकीय गणनाओं और कंप्यूटर मॉडलिंग पर आधारित है और इसका अभी कोई सीधा साक्ष्य नहीं मिला है। 'दि एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल' में प्रकाशित इस रिसर्च में कहा गया है कि यह ग्रह धरती से पांच गुना भारी और दोगुने गुरुत्व बल वाला ग्रह हो सकता है। वैझानिकों को लगता है कि इसका अपना वायुमंडल, बादलों वाला आकाश और सक्रिय ज्वालामुखी हो सकते हैं। इसके वायुमंडल के बारे में पता लगाने के लिए केपलर से भी अधिक संवेदनशील स्पेस टेलिस्कोप की जरूरत होगी। केपलर टेलिस्कोप से अब तक 1,000 से भी ज्यादा ग्रहों की पहचान की जा चुकी है और 4,700 ग्रह जैसी चीजें इस कतार में हैं। इस लंबी सूची में ऐसे 11 अन्य ग्रह हैं जो धरती जैसे हो सकते हैं।


14 गुड न्यूज

29 मई - 04 जून 2017

स्वास्थ्य उत्तर प्रदेश

मुहिम मुंबई

‘प्रोटेक्ट द प्लानेट’ के पक्ष में इलियाना

अभिनेत्री इलियाना डिक्रूज की चिंता पृथ्वी, जल, पर्यावरण और ग्रहों को बचाने की है

मिल और तेलुगू फिल्मों के बाद हिन्दी में आयी अभिनेत्री इलियाना डिक्रूज ने दुनिया के विकास संबंधी एक प्रोजेक्ट ‘प्रोटेक्ट द प्लानेट’ के समर्थन में आगे आने का फैसला किया है। यह यूनाइटेड नेशन का एक कार्यक्रम है। इलियाना पृथ्वी, जल, पर्यावरण और ग्रहों को लेकर चिंतित हैं और चाहती हैं कि इनकी रक्षा की जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो दुनिया को बर्बाद होने से नहीं रोका जा सकेगा। इलियाना ने लोगों के बीच जागरुकता पैदा करने के लिए कुछ सरल सुझाव दिए हैं, जिन्हें विभिन्न स्तरों पर प्रयोग में लाया जा सकता। पहला यह कि कागज पर बैंक स्टेटमेंट बंद हो और लोग अपने बिलों का ऑनलाइन या मोबाइल के माध्यम से भुगतान करें। इससे कागज का इस्तेमाल नहीं होगा और वन विनाश में कमी आ जाएगी। दूसरा, गीले कपड़ों को मशीन के बजाए सूरज की रोशनी में सुखाने की आदत डालें। इससे ऊर्जा की बचत होगी और धरती पर तपन कम होगी। और तीसरा, अच्छे

टीकाकरण अभियान की शुरुआत

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाटीकाकरण अभियान की शुरुआत की। इस अभियान में 88 लाख बच्चों को टीका लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है

पड़ोसी बनें और एक-दुसरे के प्रति प्यार का भाव रखें। इससे से सकारात्मक माहौल बनेगा। इलियाना कहती हैं, ‘ मेरा मानना है कि धरती और ग्रह के भविष्य हमारे हाथ में है। हमें पारिस्थितिकी प्रणालियों और मानव-स्वास्थ्य के भावी खतरे को समझना होगा। मुझे नहीं लगता कि हम अपने ग्रह को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं। अगर हर व्यक्ति सजग हो जाए और पर्यावरण तथा ग्रह संरक्षण के बारे में सोचना शुरू कर दे तो सुखी होने का सुख हमें ही हासिल होगा। हम जिस पृथ्वी पर रह रहे है हमें उसके प्रति और ज्यादा उत्तरदायी होना चाहिए।’ (मुंबई ब्यूरो)

त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुशीनगर में अब तक के सबसे बड़े इंसेफलाइटिस टीकाकरण अभियान की शुरुआत कर दी है। मुख्यमंत्री योगी ने मुसहर बस्ती में पांच बच्चों को टीका लगाकर अस अभियान की शुरुआत की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इंसेफलाइटिस पूर्वाचल के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। उन्होंने कहा कि टीकाकरण से इंसेफलाइटिस का समूल उन्मूलन होगा। केंद्र के सहयोग शुरू हुए इस महा अभियान एक से 15 वर्ष तक के बच्चों का टीकाकरण होगा। उप्र के 38 जिलों में 10 जून तक ये विशेष अभियान चलाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंसेफलाइटिस के मुद्दे पर बेहद गंभीर हैं। उन्होंने जनता से इंसेफलाइटिस को लेकर जागरुकता फैलाने की अपील की। साथ ही उन्होंने सफाई पर जोर देते हुए कहा कि गांव को साफ रखें और पानी उबाल कर पिएं। योगी ने कहा कि केंद्र और राज्य की लोक कल्याण योजनाएं गरीबों तक पहुंचे इसके लिए उन्होंने मुसहर, मलिन और अल्पसंख्यक बस्तियों

बैंकिग बिहार

स्वच्छता महाराष्ट्र

बिहार में खुलेंगे नए केंद्रीय सहकारी बैंक

श्रमदान से शुरुआत

ग्राम स्वच्छता और जल संरक्षण के प्रति समर्पित जोड़े को श्रमदान का आशीर्वाद मिला

हाराष्ट्र के माण तालुका अंतर्गत गांव लोधवडे में नव वर-वधू ने श्रमदान कर अपने जीवन की शुरुआत की। इस गांव को जल-संरक्षण के लिए सरकार ने कई पुरस्कार दिए हैं। इसे स्मार्ट गांव का भी दर्जा हासिल हुआ है। 23 मई को कोमल माने और तुषार की शादी थी। दोनों अपनी सेवा के लिए जाने जाते हैं। धरती और जल संरक्षण, ग्राम स्वच्छता आदि में इनकी भागीदारी हमेशा से रही है। इन्होंने शादी मंडप पर बैठने के पूर्व यह तय किया कि वे गांव की खुशहाली के लिए श्रमदान करेंगे। उनके इस फैसले का लोगों ने स्वागत किया। यह पूरा क्षेत्र दुष्काल से पीड़ित है। लोग अपनी कोशिशों

बि

से इस समस्या से लड़ रहे हैं। उस दिन जब यह जोड़ा खेत में पहुंचा तो पूरा गांव इकट्ठा हो गया। सबने मिलकर श्रमदान में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। बुजुर्गों ने वहीं कोमल और तुषार को आशीर्वाद दिया और मंगल कामना की। (मुंबई ब्यूरो)

में अभियान चलाने की अपील की। यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा इंसेफ्लाइटिस एक बड़ी समस्या है। इस मुद्दे को सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी ने लोकसभा में उठाया था। पूरे प्रदेश में 88 लाख बच्चों को टीका लगाए जाने का लक्ष्य रखा गया है। इस टीकाकरण अभियान के साथ जन जागरुकता की शुरुआत भी की गई है। उन्होंने कहा कि बीमारी की मुख्य वजह गंदगी है। कई कैबिनेट मंत्री भी विभिन्न जिलों से इस अभियान की शुरुआत करेंगे। इंसेफ्लाइटिस प्रभावित जिलों के डॉक्टर्स को कोई छुट्टी नहीं मिलेगी।

तीन नए जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को स्थापित करने की योजना है

हार में सहकारिता को बढ़ावा देने के लिए तीन जिलों में नये जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों की स्थापना की जाएगी। इन बैंकों के माध्यम से विभिन्न सहकारी समितियों के लोग राशि का आदान-प्रदान कर सकेंगे। साथ ही पुराने छह जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों के उत्थान के लिए सरकार प्रयास करेगी। राज्य के सहकारिता मंत्री आलोक मेहता ने बताया कि राज्य में 22 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक कार्यरत हैं। इसके अलावा तीन नए जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को स्थापित करने की योजना है।

जिन जिलों में बैंकों की स्थापना की जा रही है, उनमें सारण जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, दरभंगा जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और सुपौल जिला केंद्रीय सहरकारी बैंक शामिल हैं। उन्होंने बताया कि हाल में सभी जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों के गतिविधियों की समीक्षा की गई, जिसमें पाया गया कि 17 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक बंद होने के कगार पर हैं। ये बैंकों मानकों पर खरा नहीं पाये गए, उनका सभी का अंकेक्षण व अन्य गतिविधियां बैंकों के अनुरूप नहीं पाई गई।


29 मई - 04 जून 2017

स्वच्छता मुंबई

गुड न्यूज

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शिक्षा मुंबई

कचरे पर मुंबई मनपा सख्त स्कूली छात्रों को ऐतिहासिक कचरा निस्तारण केंद्र स्थापित कराने के आदेश पर स्थल दिखाएं मनपा की सख्ती बरकरार

क्षिण मुंबई महानगरपालिका ने बड़े होटलों, रेस्तरां, सिनेमा घरों, हाउसिंग सोसाइटियों, स्पोर्ट्स क्लबों सहित 227 संस्थानों को चेतावनी दी वे अगर अपने यहां कचरा निस्तारण केंद्र स्थापना संबंधी आदेश को अमल करने में देरी की तो पहली जून से पालिका कचरा उठाना बंद कर देगी। मनपा प्रशासन ने इसके पहले एक नोटिस दी थी कि ये संस्थान अपने यहां कचरा प्रक्रिया केंद्र की स्थापना यथाशीघ्र करे, ताकि डंपिंग ग्राउंड पर दवाब कम हो सके। उल्लेखनीय है कि इन संस्थानों में प्रत्येक से प्रतिदिन लगभग सौ किलो कचरा निकलता है। इसे डंपिंग ग्राउंड में ले जाना और इसके लिए जगह बनाना मुश्किल हो गया है। इसीलिए प्रशासन ने कहा था कि वे खुद इस दिशा में पहल करें। लेकिन मनपा इस बात से नाराज है कि इस आदेश को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। उस आदेश में यह भी स्पष्ट

तौर पर कहा गया था कि सूखे और गीले कचरे का वर्गीकरण भी अवश्य करें। इन संस्थानों को वर्मी कम्पोस्टिंग, वाचोमिथिनेशन जैसे कचरे की प्रक्रिया के सुझाव भी दिए गए थे। मनपा के सहायक आयुक्त किरण दिघावकर के अनुसार, अगर ये संस्थान अपने परिसर में कचरे को निपटाने संबंधी योजना को लागू करते हैं तो इसका फायदा संस्थान को भी होगा और शहर को भी। डंपिंग ग्राउंड पर बढ़ रहा भार भी कम हो जाएगा। अगर आदेश को मानने में अब कोताही की गयी तो प्रशासन कचरा उठवाना बंद कर देगा। (मुंबई ब्यूरो)

जागरुकता मुंबई

अंधविश्वास के खिलाफ प्रशिक्षण

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति गर्मी की छुट्टियों में कई कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर लगाएगी

हाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने गर्मी की छुट्टियों में जगह-जगह कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर लगाने का फैसला किया है। इसकी शुरुआत 28 मई को अंबरनाथ से हो रही है। इस शिविर का उद्देश्य है कि अंधविश्वास को ख़त्म करने के लिए लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित किया जाए। खासकर इसके लिए तरुणों से आह्वान किया जा रहा है कि वे खुद को वैचारिक दृष्टि से संपन्न करें। जहां भी अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहाँ वे सक्रिय होकर लोगों को न केवल सावधान करें बल्कि गलत ताकतों को बेनकाब भी करें। यह शिविर एक दिवसीय होगा और इसमें विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से लोगों को प्रशिक्षित किया जाएगा। ‘चमत्कार’, ‘तंत्र-मन्त्र’ आदि पर

भरोसा न कर आत्मशक्ति को परिभाषित करने के लिए समाज शास्त्री, वैज्ञानिक दृष्टि वाले प्रमुख वक्ता शामिल होंगे। शिविर में प्रश्नोत्तर का ख़ास सेशन रखा जाएगा ताकि वहां आने वाले कार्यकर्ता और बाकी लोग अपने मन की दुविधा पर विचार-विमर्श कर सकें। (मुंबई ब्यूरो)

महाराष्ट्र में स्कूली बच्चों को गर्मी की छुट्टियों में एेतिहासिक स्थल का दर्शन कराने का आदेश

हाराष्ट्र के शिक्षा विभाग ने स्कूलों को एक सुझाव या आदेश जारी किया है कि वे अपने बच्चों को ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन कराएं ताकि उन्हें इतिहास, भूगोल और संस्कृति की जानकारी हासिल हो सके। शिक्षा विभाग और पर्यटन विभाग की आपसी बातचीत के बाद यह सुझाव सामने लाया गया है। कहा जा रहा है कि यह पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीति है जो सरकारी खजाने को भरने में मददगार होगी। राज्य के ख़ास तौर पर शहरी स्कूलों में छात्रछात्राओं को वाटर पार्क, रिसॉर्ट, बड़े उद्यानों में पिकनिक पर ले जाने की मानो एक परंपरा ही बन गयी है। इसे अलग-अलग ग्रुपों में ले जाया जाता है। यह पूरे दिन का कार्यक्रम होता है। अमूमन इसमें सभी छात्र-छात्राओं को जाना होता है। उस दिन वे पढाई के बोझ से मुक्त होते हैं और जमकर मस्ती करते हैं। हालांकि इसमें अभिभावकों को मन मारकर अपनी जेबें खाली करनी पड़ती हैं। माना जाता है कि इसमें स्कूलों की भी अच्छी कमाई हो जाती है। लेकिन शिक्षा विभाग के नए आदेश के बाद एक सवाल खड़ा कर दिया गया है कि पर्यटन स्थल पर जाने के लिए एक दिन से ज्यादा वक्त लगेगा। दूर-दूर जाना होगा। अभिवावक राजी होंगे कि नहीं, इस पर उनसे राय लेनी होगी। दूसरी जो अहम् बात है, उन

स्थलों पर सुरक्षा की गारंटी कौन देगा। शिक्षा विभाग का विश्वास है कि अगर बच्चों को वाटर पार्क और रिसॉर्ट के साथ-साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ख्यातिप्राप्त स्थानों की सैर कराई जाए तो बच्चों का मानसिक विकास तो होगा ही, उनका ऐतिहासिक ज्ञान भी बढेगा। ऐसा देखा गया है कि बच्चों को इतिहास की जानकारी उतनी ही है जितनी किताब में लिखी गयी है। अगर उन्हें उन स्थानों पर ले जाया जाए तो वे न केवल घूमने का मजा लेंगे बल्कि इतिहास को अपनी आँखों से देख पाएंगे। उन्हें अपने इतिहास पर गर्व का अहसास भी होगा। यह साल में एक बार किया जा सकता है। हालांकि विभाग ने यह भी कहा है कि इसमें सख्ती बिलकुल न की जाए। (मुंबई ब्यूरो)

ऊर्जा भविष्यवाणी

5 सालों में 30 रुपए से कम में मिलेगा पेट्रोल

पेट्रोल पर कम होती निर्भरता की वजह से आने वाले सालों में पेट्रोल की कीमत में बड़ी कमी की भविष्यवाणी की गई है

सालों में पेट्रोल की संभवकीमतहै 30कि रुपएअगलेप्रति3 लीटर से भी कम हो

सकता है। विकसित हो रही तकनीक से लोगों की ईंधन के लिए पेट्रोल पर निर्भरता को कम करने की कोशिश की जा रही है। इसके जरिए पेट्रोल की कीमत में भारी गिरावट देखने को मिलेगी। इस बात की भविष्यवाणी की है अमेरिका के दूरदर्शी टोनी सेबा ने। सेबा ने कहा था कि सोलर पावर में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। उस वक्त सोलर तकनीक की कीमत आज से 10 गुना ज्यादा थी। सेबा सिलिकॉन वैली में उद्यमपति हैं। इसके अलावा वो एनर्जी पर भी शोध करते हैं। सोलर पावर पर सेबा की भविष्यवाणी सच हो गई थी, मगर पेट्रोल पर उनकी बात किनती सच होती है, यह तो

आने वाला वक्त ही बताएगा। सीएनबीसी से बात करते हुए सेबा ने कहा, ‘2020-21 में तेल की डिमांड अपने चरम पर होगी। इसके बाद 10 सालों में यह 100 बैरल से गिर कर 70 बैरल ही रह जाएगी। इस हिसाब से कीमत 25 डॉलर प्रति बैरल ही रह जाएगी।’ सेबा के अनुसार, आने वाले वक्त में स्वत: चलने वाली गाड़ियों के आने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 25 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती है। सेबा ने बताया कि लोग पुरानी गाड़ियां चलाना नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने कहा कि 2030 तक, 95 फीसदी लोगों के पास निजी गाड़ियां नहीं होंगी, जिसकी वजह से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री खत्म हो जाएगी। (मुंबई ब्यूरो)


16 खुला मंच

29 मई - 04 जून 2017

रॉबिन केशव

‘मानव का मानव होना ही उसकी जीत है, दानव होना हार है और महामानव होना चमत्कार है’ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

विकास का सेतु

देश के सबसे बड़े पुल का नाम लोकगायक भूपेन हजारिका के नाम पर रखा गया

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कतंत्र की खूबी और सफलता ही यह है कि जनता को लगे कि सरकार न सिर्फ उसकी है, बल्कि उसके कल्याण के लिए ईमानदारी से चिंता भी करती है। इसीलिए प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जब यह कहा कि वे देश की जनता के ‘प्रधानसेवक’ हैं, तो इस भावना ने जनता के हृदय को काफी गहरे से स्पर्श किया। यही नहीं, प्रधानमंत्री को जब भी मौका मिलता है तो वे आगे बढ़कर आमजन से सीधे जुड़ने की कोशिश करते हैं। हाल में उन्होंने असम में देश के सबसे बड़े ढोला-सदिया पुल का उद्घाटन किया। पुल का उद्घाटन करने के बाद हुई जनसभा में उन्होंने इस पुल का नाम असम के मशहूर लोकगायक भूपेन हजारिका के नाम पर रखने का एलान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि हजारिका पूरी जिंदगी ब्रह्मपुत्र नदी का गुणगान करते रहे। इसीलिए आने वाली पीढ़ियों को उनके योगदान के बारे में याद दिलाते रहने के लिए केंद्र सरकार ने यह फैसला किया है। गौरतलब है कि भूपेन हजारिका सिर्फ बेहतरीन गायक ही नहीं, बल्कि संगीतकार, गीतकार, कवि और फिल्मकार भी थे। उनके योगदान के लिए उन्हें दादा साहब फाल्के से लेकर पद्म विभूषण जैसे सम्मान दिए गए थे। ऐसी महान शख्सियत को देश के विकास से जोड़ना एक बड़ी और सराहनीय पहल है। हजारिका का एक प्रसिद्ध लोकगीत भी है, जिसमें वे गंगा को संबोधित करते हुए भारत कल्याण की कामना करते हैं। गीत के शुरुआती बोल हैं- ‘विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार। निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूं...।’ आज भले हजारिका हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका गाया यह गीत आज भी सुना जाता है। असम की धरती पर देश का सबसे बड़ा सेतु बना है और इसका उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने दोहराया है कि वे पूर्वोत्तर भारत को देश के विकास के नक्शे पर अपेक्षित तरीके से चिन्हित करना चाहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि भूपेन हजारिका के नाम से पूर्वोत्तर को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का एक बड़ा संकल्प पूरा हुआ है। उम्मीद है कि विकास का यह सेतु पूर्वोत्तर और शेष भारत को और करीब लाएगा।

लेखक प्रवासी मजदूरों के बच्चों के शैक्षणिक उत्थान को केंद्र में रखकर कार्य कर रहे हैं

‘मेरा नाम मुकेश है’

धूम्रपान प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीके से जानलेवा है। हमारे लिए अच्छी बात यह है कि पिछले एक दशक में धूम्रपान करने वालों की संख्या में गुणोत्तर कमी आई है

मु

केश हराने का एक विज्ञापन आज भी प्रत्येक सिनेमा घरों की याद में अंकित है। विज्ञापन में मुकेश ने तंबाकू की अपनी आदत को बहुत पीछे छोड़ दिया और पश्चाताप के संकेत दिखाए। फिर भी वह 24 साल की एक छोटी उम्र में ही मर गए। मुंह के कैंसर से जूझ रहे मरीजों की भयानक छवियां कई लोगों को हतोत्साहित कर देती हैं। भारत में तंबाकू के उपयोग को रोकने के लिए दर्शकों को ध्यान में रखकर दृश्य कल्पना और पारंपरिक ट्रेनिंग के अनगिनत अभियान शुरू किए गए हैं। फिर भी भारत में तंबाकू के उपयोग से संबंधित आंकड़े भयावह हैं। 2015 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ो के अनुसार, लगभग 47% भारतीय पुरुष तंबाकू का उपयोग करते हैं। हालांकि यह आंकड़े 2005-06 की अपेक्षा 50 प्रतिशत घट गए हैं, लेकिन इनकी सुनिश्चित संख्या बढ़ रही है, यह चिंता का बड़ा कारण है। अकेले धूम्रपान से भारत में एक लाख से अधिक लोगों की मृत्यु होती है। अगर हम आंकड़ो को बढ़ा कर देखें तो तंबाकू के खर्च का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव अधिक भयानक है। वित्तीय मुद्दों, निष्क्रिय धूम्रपान, घरेलू हिंसा, सार्वजनिक स्थान की कमी, आदि तंबाकू के उपयोग के खतरनाक नतीजे हैं। इस मुद्दे से निपटने के लिए भारत सरकार बहुत गंभीर है। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मई, 2003 में तंबाकू नियंत्रण पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन (एफसीटीसी) अपनाया, तो भारत पहला ऐसा देश था जिसने कन्वेंशन संधि पर हस्ताक्षर किए। डब्ल्यूएचओ एफसीटीसी पर हस्ताक्षर करने के बाद, भारत में कई सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों पर धूम्रपान पूरी तरह से प्रतिबंधिक कर दिया गया। वहीं नए कानून के साथ रेस्तरां, हवाई अड्डों और होटलों में धूम्रपान क्षेत्र बनाने के लिए 30 से अधिक कमरे होने की अनुमति दी गई। भारत तंबाकू की खपत को बढ़ावा देने के मामले में बड़ी मुश्किल से नीचे आया है। इसके साथ ही अधिनियम 2003 (सीओटीपीए) के तहत सिगरेट्स और अन्य तंबाकू उत्पाद ( विज्ञापन का निषेध, व्यापार और वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण) के विज्ञापन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। तंबाकू उद्योग के मजबूत प्रतिरोध के बावजूद, भारत ने सिगरेट के पैकेट पर 85 प्रतिशत सचित्र चेतावनियों को लागू किया है। किशोर न्याय अधिनियम में एक ऐसा प्रावधान है, जिसमें कम उम्र के लोगों या बच्चों द्वारा तंबाकू बेचने पर

7 साल के कारावास प्रावधान है। चूंकि तम्बाकू के उपयोगकर्ता निरपेक्ष शर्तो पर बढ़ रहे हैं, यह न केवल मौजूदा कानूनों के विनियमन ढांचे को मजबूत करते हैं, बल्कि समाज में नए व्यवस्थित और व्यवहारिक बदलाव भी पेश कर रहे है। ग्लोबल प्रौढ़ तम्बाकू सर्वेक्षण (जीएटीएस) डब्लूएचओ एफसीटीसी के सदस्य देशों में तंबाकू के उपयोग और उसके पैटर्न की निगरानी करने के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा की गई एक पहल है। यह सही तरीके से ही अपनी दृष्टि को आगे बढ़ाता है – ‘यदि आप इसे माप नहीं सकते हैं, तो आप इसे प्रबंधित भी नहीं कर सकते’। जीएटीएस तंबाकू उपयोग पर रोक लगाने के लिए एक सरल फार्मूला लेकर आया है, जो कि एमपावर के रूप में सक्रिय है। तंबाकू के इस्तेमाल और रोकथाम नीतियों पर निगरानी रखने, तंबाकू के सेवन से लोगों की रक्षा करने, तम्बाकू के प्रयोग से बाहर निकलने में मदद करने, तंबाकू के खतरों के बारे में चेतावनी देने, तंबाकू के विज्ञापनों पर रोक लगाने, प्रोत्साहन, प्रायोजन और तम्बाकू पर करों को बढ़ाए जाने, ये 6 आवश्यक नुस्खे हैं जो तंबाकू की खपत को कम करते है। तंबाकू उपभोग में भारत अपनी भागीदारी के बाद से जीएटीएस का एक सक्रिय भागीदार रहा है। इस परिवार के स्वास्थ्य सर्वेक्षणों से नियमित आधार पर तंबाकू की खपत का पता चलता है। हालांकि तंबाकू के ज्यादातर अप्रत्यक्ष रूप जैसे कि खैनी, बीड़ी आदि, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक जुड़ाव के कारण इन सर्वेक्षणों के दायरे से बाहर रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन स्टेज से ही बेहतर ट्रैकिंग की आवश्यकता होती है। निष्क्रिय धूम्रपान एक छिपी हुई डरावनी वस्तु है, जिसने

निष्क्रिय धूम्रपान एक छिपी हुई डरावनी वस्तु है, जिसने नीति निर्माताओं को लंबे समय तक के लिए चकमा दिया है


नीति निर्माताओं को लंबे समय तक के लिए चकमा दिया है। भारत में, हर चार व्यक्ति में से एक व्यक्ति अपने कार्यस्थल पर दूसरे हाथ से धूम्रपान करता हुआ दिख जाता है। यह धूम्रपान काफी घातक है, क्योंकि इसमें 4,000 से अधिक रसायन शामिल हैं, जिनमें कई विषाक्त पदार्थ और कुछ कैंसरजनक भी हैं। वैश्विक स्तर पर, धूम्रपान से प्रतिवर्ष 6 लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है, जिनमें 1.65 लाख पांच साल से कम आयु के बच्चे शामिल हैं। सरकार के हस्तक्षेप से ज्यादा, इस निष्क्रिय धूम्रपान को रोकने के लिए सामाजिक प्रयासों की आवश्यकता है। निष्क्रिय धूम्रपान से बचने का एक सरल उपाय यह है कि निकट के लोगों और प्रियजनों को धूम्रपान छोड़ने के लिए बार बार प्रेरित किया जाए। अध्ययनों से पता चला है कि धूम्रपान और तंबाकू के इस्तेमाल को छुड़ाने में बच्चे सबसे बड़े मोटिवेटर रहे हैं। हमारे स्कूल के सिस्टम को न केवल तंबाकू की खपत और उसके खतरों से संबधि ं त ज्ञान देने पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि युवा दिमाग को लोगों को तम्बाकू छोड़ने के लिए मदद देने में भी प्रशिक्षण देना चाहिए। सिगरेट के पैकटे पर स्वास्थ्य चेतावनी के कारण 22 जीएटीएस देशों में लगभग 241 मिलियन लोगों ने तंबाकू के सेवन को छोड़ने पर विचार किया है।

तंबाकू उद्योग के मजबूत प्रतिरोध के बावजूद, भारत ने सिगरेट के पैकेट पर 85 प्रतिशत सचित्र चेतावनियों को लागू किया है। किशोर न्याय अधिनियम में एक ऐसा प्रावधान है, जिसमें कम उम्र के लोगों या बच्चों द्वारा तंबाकू बेचने पर 7 साल के कारावास का प्रावधान है यह स्पष्ट प्रमाण है कि चेतावनी के लिए बनाए गए स्मार्ट लक्ष्य लोगों के माइंडसेट को कैसे प्रभावित कर सकती हैं? हमें इसके लिए अधिक आक्रामक अभियानों की आवश्यकता है, जहां सार्वजनिक स्थान एंटी टोबैको होर्डिंग्स और पोस्टर से भर दिए जाते है। सरकार के तम्बाकू विरोधी अभियान ने भारत में आईटीसी की सबसे बड़ी तम्बाकू कंपनी को नीचे ला दिया है। तंबाकू के अलावा दूसरे क्षेत्र जैसे खाद्य पदार्थ और कपड़ा उद्योग में कमाई करने और उसमें विविधता लाने के लिए फोर्स किया जा रहा है। बता दें कि वर्ल्ड नो टोबैको डे 31 मई को है। सरकारी एजेंसियों, कार्यकर्ताओं और आम आदमी को इस खतरनाक तंबाकू से लड़ने की जरूरत है। हमें हमारे बच्चों को स्वस्थ्य सांस लेने के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने की जरूरत है,। क्योंकि हम कम उम्र के मुकेशों को मरने की इजाजत नहीं दे सकते हैं।

शशांक गौतम

29 मई-04 जून 2017

खुला मंच

लेखक विधिक एवं सामाजिक मामलों के जानकार हैं और एक दशक से विभिन्न सामाजिक संस्थाअों से संबद्ध हैं

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गांव से शुरू हुई विकास की कहानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ग्रामीण विकास के क्षेत्र में किसी किस्म की कोताही बरते जाने को लेकर एकदम सख्त हैं

ई 18 की तारीख कई मामलों में भारत के लिए तारीखी संयोग और संतोष वाला रहा। इस दिन एक तरफ हेग के अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) में भारत के पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान में दी गई फांसी की सजा के खिलाफ भारत की अपील के पक्ष में फैसला आया, तो वहीं जम्मू कश्मीर के सुलगते हालात के बीच भारत सरकार ने श्रीनगर में जीएसटी काउंसिल की दो दिवसीय बैठक बुलाई। जीएसटी काउंसिल की यह 14वीं बैठक थी। यही नहीं, इसी दिन श्रीनगर में पुलिस स्टेशन पर आतंकियों ने हमला भी किया। हमले की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि इस दौरान देश के रक्षा और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत सारे राज्यों के वित्तमंत्री और कई वरिष्ठ अधिकारी शहर में हो रही जीएसटी काउंसिल की बैठक में हिस्सा लेने के लिए मौजूद थे। दरअसल, यह पहली बार है कि जम्मू-कश्मीर में जीएसटी के मुद्दे पर बैठक बुलाई गई है। साफ है कि भारत सरकार जीएसटी के बहाने देश और दुनिया को यह संदेश देना चाहती है कि कश्मीर की वादी में पाकिस्तानी हिमाकत के कारण थोड़ी अस्थिरता और आतंकी गतिविधियां जरूर बढ़ी हैं, पर हालात काबू से बाहर नहीं हैं और न ही सरकार ऐसा सोचती है कि जम्मू कश्मीर सुरक्षा के लिहाज से देश का ऐसा सूबा है, जिसे पूरी तरह आपवादिक या देश की मुख्यधारा से अलग माना जाए। यह संदेश पाकिस्तान के लिए भी है, जो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अपनी पूरी रणनीति को उस मोड में ले आई है।

बात करें जीएसटी कौंसिल की श्रीनगर में बैठक बुलाने के मकसद की तो इस बहाने सरकार एक बार फिर से ‘एक देश, एक कर’ का संदेश देना चाहती है। जाहिर है कि यह संदेश अपनी व्याख्या में आर्थिक से लेकर कूटनीतिक तक कई अर्थ अपने में समेटे है। तारीफ करनी होगी नरेंद्र मोदी सरकार की जिसने एक ऐसे समय में कश्मीर के सवाल को देश के आर्थिक हित के साथ जोड़ने की सूझबूझ दिखाई है, जिस वक्त हर दूसरे-तीसरे दिन पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा है और वादी के भीतर पत्थरबाजी के बीच बारूदी धमाके एक साथ सुने जा रहे हैं। गौरतलब है कि जीएसटी के मुद्दे पर महबूबा मुफ्ती सरकार भी केंद्र के साथ खड़ी है। इससे पहले मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती यह कह भी चुकी हैं कि वादी के सुलगते हालात के बीच उन्हें सबसे ज्यादा भरोसा पीएम नरेंद्र मोदी पर है। इस लिहाज से जब श्रीनगर में जीएसटी काउंसिल की बैठक शुरू हुई तो सूबे के वित्त मंत्री डॉ. हसीब द्राबू ने जो बातें कहीं

भारत को स्वच्छ बनाने का संक ल्प

स्वच्छ भारत अभियान को लेकर छपी खबरें पढ़ कर मुझे बेहद खुशी हुई। प्रधानमंत्री देश को स्वच्छ बनाने के लिए अच्छा कदम उठा रहे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा कि, जब किसी सरकार ने स्वच्छता को प्राइम एजेंडा माना हो। मोदी सरकार साफ-सफाई के साथ-साथ और कई लक्ष्यों को भी पूरा करने की पहल कर रही है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ में ऐसे आलेख छपते हैं, जिसे पढ़कर न सिर्फ प्रेरणा मिलती है, बल्कि देश को स्वच्छ बनाने के लिए प्रोत्साहन भी मिलता है। इसीलिए मैं हमेशा इसे बहुत दिलचस्पी से पढ़ती हूं। मैं ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को शुक्रिया कहना चाहती हूं जो इस तरह के विषय को प्रकाशित करते हैं। साधना वर्मा, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

वो गौर से सुनने लायक हैं। उन्होंने कहा, ‘जीएसटी हमारे राज्य के लिए बहुत फायदेमंद है। हम इस व्यवस्था का हिस्सा जरूर बनेंगे।’ जीएसटी को लेकर स्थानीय हल्कों और कुछ अलगाववादी समूहों द्वारा व्यक्त आशंकाओं को निराधार बताते हुए सूबे के वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य में आम लोगों के लिए यह कर व्यवस्था बहुत फायदेमंद होगी। उनके अनुमान के मुताबिक जीएसटी व्यवस्था का हिस्सा बनने के बाद जम्मू कश्मीर हर साल कर वसूली की मद में 1500 से दो हजार करोड़ तक का लाभ होगा और इससे इससे राज्य में महंगाई भी अगले तीन साल में कम हो जाएगी। जीएसटी काउंसिल की बैठक में भी देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यकीन दिलाया कि वे जम्मू-कश्मीर को जीएसटी के पुनर्गठन और क्रियान्वन में केंद्र सरकार की ओर से हर प्रकार की मदद दिलाएंगे। इस तरह देखें तो एक तरफ तो जहां अब कोई सूरत नहीं बची है, जिससे एक जुलाई से जीएसटी न लागू हो, वहीं यह भी साफ हो गया है कि देश में कश्मीर मुद्दे पर एकल सहमति है कि उसे विकास की मुख्यधारा में साथ लेकर चलना है। रही बात वादी में बढ़ी अशांति को तो निश्चित रूप से भारत सरकार के इस कदम का एक साकारात्मक संदेश जाएगा। यह संदेश सरहद पार के उन मंसूबों के लिए भी है, जिनके नापाक इरादे न तो कश्मीर में चल रही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पटरी से उतार पा रहे हैं और न ही इससे वादी में कोई बड़ी अलगाववादी खाई पैदा हो रही है।

हर घर पर होगा जल

‘सुलभ स्वच्छ भारत’ में हर घर तक जल पहुंचाने वाला आलेख पढ़ने के बाद बहुत अच्छा लगा। जिसमें सरकार ने हर घर निर्मल जल पहुंचाने का वादा किया है। साल 2017 तक देश के कम से कम 80 प्रतिशत घरों तक नल की सुविधा पहुंचाई जाएगी। सरकार पानी की खराब गुणवत्ता से निपटने के लिए भी काम कर रही है। इस आलेख को पढ़ने के बाद लगा की सरकार देश में पानी की समस्या से निपटने के लिए बहुत का कर रही है। बात स्वच्छता की हो या घर घर जल पहुंचाने की, सरकार इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अच्छी कोशिश कर रही हैं। सरकार जिस तरह से इस कार्य को पूरा करने में लगी हुई है, वह प्रशंसनीय है। संतोष भरतीया, कोटा, राजस्थान


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29 मई - 04 जून 2017

भारत- फिलिस्तीन

रिश्तों में गर्माहट

फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के हालिया संपन्न भारत दौरे से एक बार फिर दोनों देशों के रिश्तों में नई गर्माहट दिखी। साथ ही यह भी साफ हुआ कि भारत फिलिस्तीन के मुद्दे और उसके विकास को लेकर पहले की तरह प्रतिबद्ध है

फोटा​ेः शिप्रा दास

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1. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अभिवादन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2. फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के आगमन की प्रतीक्षा में प्रधानमंत्री मोदी 3,4,5. दोनों देशों के राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मोदी 6. भारत के राष्ट्रगान के समय

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7. सलामी गारद का निरीक्षण करते फिलिस्तीन के

राष्ट्रपति महमूद अब्बास 8. प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर प्रधानमंत्री मोदी और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति 9. संयुक्त बयान जारी करने के दौरान फिलिस्तीन के राष्ट्रपति अब्बास की मदद करते प्रधानमंत्री मोदी 10. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनके फिलिस्तीनी समकक्ष आपस में समझौते के दस्तावेज का आदान-प्रदान करते 11. संयुक्त बयान जारी करते प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अब्बास 12. दोनों देशों के नेताअों की मौजूदगी में कुछ और समझौतों के दस्तावेज का आदान-प्रदान करते मंत्री 13. दोनों देशों के नेता गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए


20 पहल ब्लाइंड विथ कैमरा

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पहल

ब्लाइंड विथ कैमरा

जब लेंस बना आंखें

‘बियांड साइट फाउंडेशन’ फोटोग्राफी की कला में भारत के नेत्रहीनों के लिए काम कर रही है

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इंदिरा सील

काश पर कब्जा करने की कला होने की वजह से क्या फोटोग्राफी का अर्थ उन लाखों लोगों के लिए कुछ भी है, जो पूरी तरह से अंधेरे में रहते हैं। पार्थ भौमिक यहां तक कहते हैं कि हमारे बीच सबसे ज्यादा आशावादी हमारा संदेह नहीं होना चाहिए। उनकी नॉन-फॉर-प्रॉफिट संगठन, ‘ बियांड साइट फाउंडेशन’, फोटोग्राफी की कला को भारत के दृष्टिहीन लोगों की तरफ ले जाती है। भौमिक कहते हैं कि एक दृष्टिहीन व्यक्ति कप को छूता है, वह उसे अपने दिमाग की आंखों से देखता है। बता दें कि भौमिक ने ‘ब्लांइड विद कैमरा’ की शुरुआत की थी। कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाले भौमिक को 1999 में उनके गृहराज्य कोलकाता से मुंबई में स्थानांतरित कर दिया गया,‘ मैं पेशेवर कारणों से मुंबई आया था, लेकिन बॉम्बे में एक जबरदस्त क्षमता है, वह किसी भी व्यक्ति को उसके घर में

होने जैसा महसूस कराती है। धीरे-धीरे मैं मुंबई के सामाजिक मंडलों में शामिल होने लगा। फोटोग्राफी करना हमेशा से मेरा जुनून रहा है, इसलिए मैंने भारत की फोटोग्राफिक सोसायटी का दौरा करना शुरू कर दिया और एक दिन मेरे किताब विक्रेता ने मुझे बुलाया कि यहां एक नई किताब है, जिसे मुझे देखना चाहिए।’ हालांकि पार्थो ने उस पुस्तक को नहीं खरीदा, लेकिन उन्होंने ‘टाइम्स जर्नल ऑफ फोटोग्राफी’ के एक पुराने अंक पर हाथ रखा था, जिसमें दुनिया के सबसे प्रसिद्ध दृष्टिहीन फोटोग्राफर एवगेन बावकार पर एक कहानी लिखी थी। एक फोटोग्राफर के तौर पर मेरी तस्वीरों के प्रतिबिंब को भी प्रदर्शित किया गया था, लेकिन यह असाधारण था। इस तरह की

फोटोग्राफी के बारे में और अधिक जानने में मेरी काफी दिलचस्पी थी। यह इस कला के बारे में नई समझ को जानने के एक लंबे चरण की शुरुआत थी। इसके बाद भौमिक बावकार और दूसरे दृष्टिहीन फोटोग्राफरों के साथ संपर्क में आए ताकि वे यह जान सकें कि वे फोटो कैसे लेते हैं। ‘कैमरा के साथ दृष्टिहीन’ परियोजना ने भौमिक के मन में आकार लेना शुरू किया - उन्होंने एक कार्यशाला शुरू करने और दृष्टिहीन लोगों की आंखों से दुनिया को देखने की कल्पना करने लगे थे। जाहिर है कि उन्हें अंतहीन सवालों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे तैयार थे। यहां तक कि उनके मन में शुरुआती संदेह था तो यह स्वाभाविक है कि दूसरों के पास भी जरूर होगा।

दृष्टिहीनों की तस्वीरें फोटोग्राफर की ‘इनर गैलरी’ का एक अनोखा परिदृश्य प्रस्तुत करती हैं और एक चेतावनी के तौर पर काम करती हैं, जो स्पर्श और ध्वनि दुनिया को समझने के प्रभावी तरीके हैं

एक नजर

पार्थ भौमिक ने ‘ब्लांइड विद कैमरा’ की शुरुआत की

पार्थ भौमिक ने बनाई ‘कैमरा के साथ दृष्टिहीन’ परियोजना ‘राष्ट्रीय कर्मवीर पुरस्कार’ से सम्मानित हुए पार्थ

इसके कुछ महीने बाद उन्हें विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल से दृष्टिहीनों के लिए बुलाया गया। स्कूल ने अपने यहां पढ़ने वाले छात्रों और बुनियादी तौर पर इस्तेमाल होने वाला सामान दिए, कोडेक ने कैमरा और फिल्म रोल्स दिए। इसके बाद वह एक नई चुनौती को लेने के लिए तैयार थे। भौमिक मानते हैं कि यह काफी चुनौतीपूर्ण है। इसका मतलब सृजन की प्रक्रिया को संवाद करने


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आंखों से जितनी तस्वीरें ली जाती हैं, उतनी ही दिमाग से भी ली जा सकती है। उनकी तस्वीरें, उनके दृष्टिकोण, वास्तविकता के उनके अनुभव का एक प्रतिबिंब है

के तरीके के लिए अनुकूल बनाना है। यह विचार साबित करना था कि आंखों से जितनी तस्वीरें ली जाती हैं, उतनी ही दिमाग से भी ली जा सकती है। उनकी तस्वीरें, उनके दृष्टिकोण, वास्तविकता के उनके अनुभव का एक प्रतिबिंब है। मैंने खुद को शून्य से पढ़ाना शुरू किया.....इसके परिणाम आश्चर्यजनक थे। शुरुआत में हमारे साथ सिर्फ एक छात्र महेश उमरानिया था, लेकिन अब 80 छात्र हैं। भौमिक याद करते हुए कहते हैं कि मेरी पहली प्रदर्शनी में छात्रों के परिवार से शायद ही कोई आया हो। जब मैंने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि उन्हें यह आश्चर्यजनक नहीं लगा। एक दृष्टिहीन परिवार के लिए बोझ माना जाता है और समाज द्वारा फेंक दिया जाता है। माता-पिता या प्रियजनों द्वारा की गई सिर्फ एक टिप्पणी जैसे कि दृष्टिहीन व्यक्ति चित्रों को कैसे ले सकता है, छात्र को कक्षा से दूर कर सकता है। कुछ छात्रों ने इसका अनुभव किया, लेकिन कुछ अंतर के बाद वे लौट आए, लेकिन यह हमेशा की रुकावट है। कार्यशाला में प्रतिभागी एसएलआर कैमरा या 35 एमएम में प्वांइट और सूट का उपयोग करने की मूलभूत बातें सीखते हैं। वे उभरती छवियों, ब्रेल नोट्स, विजुअल एड्स और चित्रों के ऑडियो विवरण जैसे उपकरण का उपयोग करते हैं, ताकि वे शूट से पहले विषय को महसूस कर सकें। इनडोर शूटिंग के दौरान वे पहले विषय को महसूस करते

हैं और इसके बाद वे इसे कैप्चर करने से पहले अपने मन में तस्वीर बनाते हैं। भौमिक कहते हैं कि उन्हें भारतीय परिसंघ एनजीओ द्वारा इस सामाजिक न्याय और कार्य के लिए ‘राष्ट्रीय कर्मवीर पुरस्कार 2009’ से सम्मानित किया गया। बाहर के लिए वे ध्वनि, प्रकाश की गर्मी और मित्रों से मदद लेते हैं। जिनके पास कुछ समय के लिए दृष्टि थी, वे विषय के दृश्य यादों पर भरोसा करते हैं। मजबूत प्रेरणा से प्रेरित ये लोग कैमरे को वस्तु की सीध में रखते हैं और स्थान, प्रकाश को मैनज े करने के बाद फोटो क्लिक करते हैं। अंतिम रचना विचारपूर्वक अलग अलग फोटो, उनके जीवन के अनुभव, अंधेपन की सीमा, दृश्य यादों की स्पष्टता, सोचने, न्याय करने की क्षमता और विषय के साथ उनकी भागीदारी पर निर्भर करती है। भौमिक कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को कुछ सिखाने का प्रयास करने से पहले उसके बारे में समझ होना बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे प्रत्येक छात्र की वर्तमान दृष्टि की स्थिति, पुराने समय की यादें जब वे देख सकते थे (यदि वे दृष्टिहीन पैदा नहीं हुए थे) और उनकी दैनिक दिनचर्या अत्यादि के बारे में जानना। मैं उनसे उनके घर का वर्णन करने के लिए कहता हूं, उसमें रखी वस्तुओं के लेआउट और घर में उनकी सबसे पसंदीदा जगह के बारे में, माता-पिता या किसी प्रियजनों के बारे में उनसे पूछता हूं। इतना ही नहीं मैं उनसे यह भी पूछता हूं कि वह आखिरी बार किस नई जगह गए थे।

दृष्टिहीनों की तस्वीरें फोटोग्राफर की ‘इनर गैलरी’ का एक अनोखा परिदृश्य प्रस्तुत करती हैं और एक चेतावनी के तौर पर काम करती हैं, जो स्पर्श और ध्वनि दुनिया को समझने के प्रभावी तरीके हैं। वहां तस्वीरों को दर्शकों के हिसाब से नहीं, बल्कि अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, उस दुनिया की अभिव्यक्ति को समझने के लिए सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए, जो कि प्रारंभिक स्तर पर बहुत ही अलग तरह से अनुभव किया जाता है। लेकिन एक दृष्टिहीन व्यक्ति को फोटोग्राफर ही क्यों होना चाहिए? भौमिक बताते हैं कि सभी कला रूपों की तरह फोटोग्राफी एक व्यक्ति का विस्तार है। एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही एक नेत्रहीन व्यक्ति भी रचनात्मक और संचार को महसूस करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह संतोष की भावना रखता है। समाज हमेशा एक अक्षम व्यक्ति को स्वतंत्र और मुख्य रूप से आर्थिक तौर पर मजबूत बनाना चाहता है, लेकिन यह लोगों के ऊपर से बोझ को खत्म करने का भी एक तरीका है। भौमिक कहते हैं कि लेकिन स्वतंत्रता का मतलब केवल यही नहीं है, इसका मतलब यह भी है कि शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के कला और संस्कृति में योगदान से समाज को समृद्ध किया जा रहा है और इसके साथ ही वह अपने आत्म-सम्मान को भी जन्म दे रहे है। अब तो लोग खुद चाहते हैं कि उनके छात्रों को फोटोग्राफी का व्यवसाय करना चाहिए। इसके लिए कई पेशेवर फोटोग्राफर हमारी मदद करने के लिए उत्सुक हैं। मैं इसके लिए एक योजना बना रहा हूं, जिसमें मेरे कुछ परिपक्व छात्र उनके साथ काम करेंगे। फिर हम एक प्रदर्शनी करेंगे इससे उन्हें आर्थिक तौर पर मदद मिलेगी और उन्हें बेहतर फोटोग्राफर बनने में भी मदद मिलेगी। आज भौमिक अपने छात्रों को फोटोग्राफर के रूप में पैसे कमाए जाने की अपनी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहे हैं और इसके साथ ही भारत के युवाओं को दृष्टिहीन

व्यक्तियों को सहानुभूति दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उनका सहयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। भौमिक कहते हैं कि अधिकतर छात्र हमारे समाज के वंचित वर्गों से आते हैं। वे फोटोग्राफी को अपने शौक के तौर पर नहीं ले सकते हैं, क्योंकि उनके पास कोई वित्तीय सहायता नहीं होती है। जब भी छात्रों का समूह प्रभावित लोगों के घर पर जाता है तो उनके लिए लोगों के बीच बहुत सहानुभूति होती है। लेकिन ऐसा नहीं है और यह आखिरी में करियर और भौतिकवादी दुनिया के दलदल में खो जाता है। इसीलिए भौमिक कार्यशालाओं का आयोजन कर रहे हैं और इसके साथ ही वह न केवल युवाओं, बल्कि भावी कारोबारी लोगों को संवेदनशील बनाने की भी कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा एक ऐसी प्रक्रिया का विकास भी कर रहे हैं, जहां वे दृष्टिहीन लोगों की मदद के लिए पैसे इकठ्ठे कर सकें। इन कार्यशालाओं में प्रतिभागियों के आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और कुछ घंटों के लिए उन्हें अंधेरे की दुनिया में ले जाया जाता है फिर वह सीखना शुरू करते हैं। जहां वे दृष्टिहीन शिक्षकों और छात्रों को दिमाग की आंख से फोटो क्लिक करते हुए देखते हैं। इन कार्यशालाओं ने न केवल रुचि पैदा की है बल्कि ‘बियांड साइट फाउंडेशन’ के सदस्यों के लिए एक नए रास्ते का निर्माण भी किया है। वे विश्वास करना शुरू किया कि उनके लिए एक ऐसी जगह है जहां वे बिना सहानुभूति के सामान्य लोगों के साथ समान शर्तों पर रहते हैं। वहीं भौमिक कहते हैं कि हमने पूरे भारत में अलग-अलग स्कूलों और बिजनेस कॉलेजों में इस तरह की कई कार्यशालाएं आयोजित की हैं। इन कार्यशालाओं से न केवल हमने अपने छात्रों के लिए कुछ आय अर्जित की है बल्कि उन्हें इससे यह भी विश्वास दिलाने में मदद मिली है कि वे समाज में अपने जीवन के समझ को लोगो से साझा करने में योगदान भी दे रहे हैं, जो उन्हें अपने साथी नागरिकों के लिए भी अमीर बनाते हैं।


22 अध्यात्म

29 मई - 04 जून 2017

अध्यात्म युवा

युवा आध्यात्मिकता सूचना लंबे समय से युवा दिमाग पर कब्जा कर रही है, क्योंकि हम लगातार शोरगुल में डूबते जा रहे हैं। शांति के लिए की गई खोज युवाओं को आध्यात्मिकता के नए क्षेत्रों में ले जा रही है

मै

रॉबिन केशव

क्लॉडगंज में धौलाधार रेंज पर स्थित, कांगड़ा घाटी की तरफ दलाई लामा मंदिर है। यह परम पावन 14 वें दलाई लामा यानी तिब्बती बौद्धों के सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्गदर्शक का आसन है। इसके प्रार्थना कक्ष के बाहर 13 महाविद्यालय के छात्रों का एक समूह है, जो बौद्ध भिक्षुओं के साथ बातचीत में तल्लीन थे। वे आपस में 'सांसार‌िक मोहमुक्ति' के विषय पर चर्चा कर रहे थे, जो बौद्ध दर्शन के केंद्रीय विचारों में से एक है। इन युवाओं को देखना मेरे लिए चकित कर देने वाला अनुभव था, वे एक ऐसे मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे, ‌िजसके बारे में आमतौर पर भिक्षुओं के बीच विमर्श होता है। एक बार उनकी चर्चा खत्म हुई तो मैंने उनकी प्रेरणा को समझने के लिए उनसे जुड़ने का फैसला किया। उनकी कहानी मुझे आश्चर्यचकित कर गई कि वे सभी छात्र एनसीआर, जयपुर और

चंडीगढ़ के विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेजों से थे। वे भौगोलिक क्षेत्रों से भले अलग-अलग थे, लेकिन एक समान विषय-वस्तु यानी आध्यात्मिकता की खोज को लेकर वे आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उन्होंने एक-दूसरे को फेसबुक के माध्यम से जाना और देखते-देखते आपस में एक-दूसरे के प्रति पर्याप्त आत्मविश्वास पैदा हो गया, तो उन्होंने आध्यात्मिकता की खोज के लिए यात्रा पर जाने का फैसला किया। उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से अपनी यात्रा की शुरुआत की। यह उनका दूसरा विराम स्थल है, इसके बाद वे वैष्णो देवी की ओर रुख करेंगे। वे दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर अपनी यात्रा समाप्त करने जा रहे हैं। मेरा अगला सवाल उनसे इस यात्रा के प्रयोजन

के बारे में था, जिसके लिए एमएनआईटी जयपुर के सिविल इंजीनियर स्नेहांशु ने विद्वतापूर्वक उत्तर दिया। आप देखते हैं कि दुनिया में बहुत सारी अराजकता और भ्रम फैले हुए हैं। हमारे चारों ओर हर जगह, सड़कों, बाजारों, घरों में, हम सभी इस शोर से घिरे हुए हैं। यह शोर धीरे-धीरे हमें अपने उप-विवेक से दूर खींच रहा है और इसीलिए हमने अजीब तरह से व्यवहार करना शुरू कर दिया है। हम इन सबका मूल कारण समझना चाहते थे। हमें पता था कि इन जवाबों में सभी धर्म का अलग-अलग जवाब है और हम खुद को अलग-अलग विचारों से उजागर करना चाहते हैं और फिर एक सूचित विकल्प बनाते हैं। इस समूह के साथ हमारी डेढ़ घंटे की चर्चा हुई, जिसने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। हालांकि हमारे

हमारे समाज में कुछ युवा इस उम्र में आध्यात्मिकता की बात कर रहे हैं, जब पब, ड्रिंक, बाइक और खेल सबसे अधिक आकर्षक लगते हैं

एक नजर

युवाओं में बढ़ी धर्म और अध्यात्म की ललक

युवा आध्यात्मिकता आत्म-जागरुकता की दिशा में एक कदम

वक्त के साथ बदला धर्म और आध्यात्मिकता को देखने का तरीका

समाज में कुछ युवा इस उम्र में आध्यात्मिकता की बात कर रहे हैं, जब पब, ड्रिंक, बाइक और खेल सबसे अधिक आकर्षक लगते हैं। वे अपनी खुद की विश्वदृष्टि पर सवाल उठा रहे हैं और अधिक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए दूसरों से सीखने को तैयार हैं।


29 मई - 04 जून 2017

हम लंबे समय तक एक निष्ठावान धार्मिक समाज रहे हैं, लेकिन पीढ़ियों में, धर्म को देखने के तरीके में उल्लेखनीय बदलाव हुआ है धार्मिक या आध्यात्मिक

हम हमेशा एक धार्मिक समाज में रहे हैं। हमारे देश में धार्मिक स्थलों की संख्या धर्म में हमारे विश्वास की साक्षी है। धार्मिक प्रथाओं की अधिकता, रीतिरिवाजों और त्योहारों का हम अपने देश में पालन करते हैं, यह पर्याप्त सबूत है कि हम लंबे समय तक एक निष्ठावान धार्मिक समाज रहे हैं, लेकिन पीढ़ियों में, धर्म को देखने के तरीके में उल्लेखनीय बदलाव हुआ है। अभिषेक आनंद गुड़गांव में बिजनेस कंसल्टेंट हैं। वह बताते हैं कि मैं एक अत्यंत धार्मिक परिवार में बड़ा हुआ हूं। जैसे-जैसे मैं बढ़ रहा था, मेरे मन में कई सवाल थे,जिनके जवाब धर्म में उपलब्ध नहीं थे। वैसे, आज धर्म का अभ्यास किया जा रहा है, मैं इसे देख कर भी भय और अंधकार के लिए मना कर रहा हूं। वहां लोग धार्मिक अनुष्ठानों के पीछे अंधे है, जहां धार्मिक ग्रंथों की एक संकीर्ण और आत्मनिर्धारित व्याख्याएं और प्रथाओं के प्राचीन सेट होते हैं, जो व्यक्तिगत स्थान को सीमित कर देते हैं। दूसरी ओर, आध्यात्मिकता आत्म-जागरुकता और स्वतंत्रता का पता लगाने के बारे में है। यह हमें हमारे विवेक के माध्यम से अप्रतिबंधित और आसानी से मार्गनिर्देशित करने की अनुमति देता है। पहले की पीढ़ियों में स्वयं का प्रश्न सुरक्षा और स्थिरता की खोज से प्रेरित था। उस मायने में हमारे माता-पिता और दादा-दादी के लिए धर्म के तहत शरण लेना और वहां अपने उत्तरों की तलाश करना काफी सामान्य था। बेशक वहां ऐसे विद्रोही भी थे, जिन्होंने उन विचारों पर सवाल उठाए, लेकिन उनकी संख्या बहुत सीमित थी। इसके परिणाम स्वरूप धर्म और आध्यात्मिकता को अलग करने के लिए मुख्यधारा में पर्याप्त संभव नहीं हुआ। हमारे माता-पिता की कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप ही हमारी पीढ़ी बहुत सुरक्षित है। जैसे- जैसे हम बड़े होते गए वैसे-वैसे हमारे जीवन

के हर पहलू में हमें कैरियर, रिश्तों और आत्मखोज के लिए पर्याप्त अवसर और विकल्प मिले। इतना ही नहीं जैसे-जैसे युवा पीढ़ी ने स्वयं की जागरुकता की तलाश शुरू की, उन्हें महसूस हुआ कि स्वयं जागरुकता के प्रति मौजूदा धार्मिक प्रतिमान का सीधा दृष्टिकोण है। यह एक ऐतिहासिक बोझ है, जहां प्रत्येक धार्मिक ढांचा एक दूसरे से ऊपर अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने में लगा हुआ है और लोगों के प्रयोग के लिए बहुत ही छोटा कमरा छोड़ देता है और खुद को मजबूत बनाता है। धर्म और आध्यात्मिकता के बीच अनबन बढ़नी शुरू हो गई और युवा पीढ़ी के पास आगे बढ़ने के लिए बहुत ही स्पष्ट विकल्प था।

सांस्कृतिक प्रभाव

कई बार हमने अपने बड़े-बुजुर्गों को यह कहते सुना है कि हमारे समय में हम यह करते थे। यह रिक्त स्थान अक्सर उनके बचपन के दिनों में कई उदाहरणों से भरा होता है। हालांकि इन उदाहरणों को उनके जीवन शैली के विभिन्न पहलुओं से उठाया जाएगा। एक बात जो कि उनमें से ज्यादातर के लिए हमेशा सामान्य रही, उन दिनों में ऐसे काम के लिए मुफ्त समय उपलब्ध होता था। इस समय के विपरीत 90 के दशक या हजारवें दशक के बच्चे को स्वयं के लिए अधिक समय मिलता था। इस कट-थ्रोट कंप्टीशन के समय में ट्यूशन सिस्टम ने हमारे स्कूल के साथ साथ शिक्षण प्रणाली को ऐसा विकृत कर दिया है कि युवाओं के पास खुद के लिए समय ही नहीं है। इस दु्ष्चक्र ने युवाओं को इतनी बुरी तरह से जकड़ा है कि उनके पास स्वयं के बारे में सोचने के लिए शायद ही कोई समय हो। उन्हें जो थोड़ा बहुत खाली समय मिलता है, उसे टीवी, मोबाइल गेम, वॉट्सएप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों द्वारा उपयोग किया जाता है। अपोलो हॉस्पिटल, हैदराबाद की एक

मनोचिकित्सक श्रुति नाइक की एक बहुत ही दिलचस्प जानकारी पेश करने के लिए है। दैनिक आधार पर एक निश्चित मात्रा में जानकारी की प्रक्रिया के लिए मानव दिमाग को तैयार किया गया है। मस्तिष्क को निजी, शांतिपूर्ण समय की आवश्यकता होती है, ताकि वह कामकाज के लिए पुनः सक्रिय हो सके। लेकिन कई दिनों और हफ्तों के बाद इसे पर्याप्त समय दिए बिना काम करने के लिए दबाव बनाया जाता है। उस समय तक एक युवा सिर्फ 22-23 साल का होता है, फिर उनके पास केवल दो ही विकल्प बचे होते हैं । वह घबराहट की वजह से टूटने लगते हैं या एकांत की तलाश करते हैं। ऐसा लगता है कि सहज ज्ञान युक्त जानकारी का अधिभार, एक तरह से आध्यात्मिकता के लिए अग्रदूत के रूप में कार्य करता है। यद्यपि, स्वभाव से बाहर निकलने में सक्षम युवाओं की संख्या काफी कम है,इन सालों में उनकी संख्या बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, एमएनआईटी जयपुर के स्नेहांशु का उनके सेकेंड ईयर की परीक्षा से पहले ही वह अवसाद की वजह से टूटने लगे थे, लेकिन इसे बढ़ाने के बजाय उन्होंने चिकित्सा सहायता ली और एक सचेतन दौर की स्थिति का पालन किया, जिसने उन्हें अपनी अवसाद खत्म करने में मदद की। उसने उन्हें उनके दिमाग के क्षेत्र में गहराई से जानने और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

एक वायरल प्रवृत्ति

बहुत से लोग मानते हैं कि अध्यात्म की यह तलाश युवाओं के बीच सिर्फ एक सनक है और समय के उपयुक्त कार्य प्रणाली की असफलता के कारण स्वयं ही बाहर आ जाएगा। युवा मस्तिष्क में हमेशा खुद से कुछ बड़ा करने का अचिंतनीय विचार काफी आते हैं। ‘टेक फार इंडिया’ के साथ काम करने वाले विग्नेश कृष्णन अलग हैं। वह मानवीय दिमाग की क्षमताओं को बहुत मूल्यवान समझते हैं। हालांकि मैं मानता हूं कि बहुत से युवा हैं, जिनके लिए आध्यात्मिकता की तलाश केवल एक विषय

अध्यात्म

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है, लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस बारे में ईमानदार हैं। अपने काम के तौर पर विग्नेश दैनिक आधार पर कई लड़कियों और लड़कों के साथ बातचीत करते हैं। उन्होंने कहा कि देखो, आध्यात्मिकता को समझना और उसका अभ्यास करना एक सतत यात्रा है। इसके साथ अंतिम परिणाम संलग्न नहीं है। ऐसे कई लोग होंगे जो आध्यात्मिकता की खोज में खो गए हैं, लेकिन ये बिल्कुल ठीक है। बुद्ध ने अपनी खोज में कई वर्षों का अनुभव किया। इसीलिए मुझे इस बात पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि युवाओं की आध्यात्मिकता के लिए खोज जल्दबाजी में हो रहा है। आध्यात्मिकता के चारो तरफ के विस्तृत कारक किसी भी समय जल्द से कम या दूर नहीं हो सकते हैं। सूचना बमबारी में लगातार वृद्धि जारी रहेगी, मस्तिष्क का निरंतर कब्जा बढ़ता रहेगा और धर्म व आध्यात्मिकता के बीच अनबन बढ़ती रहेगी। यह आध्यात्मिकता के अभ्यास के लाभ के साथ ही साथ, युवाओं को आध्यात्मिकता की दिशा में आगे बढ़ाने वाला है और यह आध्यात्मिकता चाहने वालों को आत्मनिर्भर बनाएगा, जिसके लिए किसी भी बाहरी संरक्षण की आवश्यकता नहीं होगी। भारतीय समाज जनसांख्यिकीय क्रांति के शिखर पर है। जनसांख्यिकीय भाग, जिसे हम आने वाले वर्षों में बनावटी रूप से काटना चाहते हैं, क्योंकि हम जादुई तौर पर प्रकट नहीं होने जा रहे हैं। हमें उन व्यक्तियों की एक पीढ़ी बनाने की जरूरत है जो स्वस्थ और शिक्षित होने के साथ-साथ स्वयंजागरूक भी हो। इस नई खोज- आत्म-जागरुकता की लहर का प्रभाव बहुत बाद में किक करने जा रहा है। तब तक हमें उन युवाओं का समर्थन करने की जरूरत है, जो आंतरिक रुप से अध्यात्म की ओर झुके हुए हैं। हमें अध्यात्म के प्रति अधिक युवाओं को आकर्षित करने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में प्रणालीगत हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। एक दुर्घटना से एक समाज एक आदर्श व्यक्ति नहीं बनता है। इसे बदलने के लिए लगातार, बड़े पैमाने पर प्रयास किए जाने चाहिए।


24 स्टेट न्यूज

29 मई - 04 जून 2017

हरियाणा

सम्मान

ऊर्जा

11 वैज्ञानिकों को हरियाणा विज्ञान रत्न अवार्ड

हरियाणा में वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने के लिए सम्मानित किया गया और साथ ही मुरथल में साइंस सिटी बनाने का एलान भी किया गया

रियाणा के 11 वैज्ञानिकों को 'हरियाणा विज्ञान रत्न अवार्ड' तथा 'हरियाणा युवा विज्ञान रत्न अवार्ड' से सम्मानित किया गया। राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने यह पुरस्कार प्रदान किए और इस मौके पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल और विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री अनिल विज भी मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर 'हरियाणा विज्ञान रत्न अवार्ड' की राशि दो लाख से बढ़ाकर चार लाख रुपए करने तथा भविष्य में 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' को हर साल 28 फरवरी को वैज्ञानिकों को अवार्ड देने का कार्यक्रम आयोजित करने की भी घोषणा की। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने इस मौके पर मुरथल में साइंस सिटी खोलने का भी एलान किया। साइंस सिटी 44 एकड़ इलाके में खुलेगी, जबकि अंबाला में साइंस सेंटर भी खुलेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि विज्ञान के विषय की तरफ युवाओं का दिलचस्पी बढ़ाने के लिए राज्य सरकार कई कदम उठा रही है। राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो नई दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. केसी बंसल को साल 2012-13 के लिए तथा sजैव कोशिका प्रजनन प्रयोगशाला राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान नई दिल्ली के पूर्व उपनिदेशक डॉ. सतीश कुमार गुप्ता को वर्ष 2013-14 के लिए 'हरियाणा विज्ञान रत्न

अवार्ड' से सम्मानित किया गया। उनको अवार्ड के रूप में दो लाख रुपए,एक प्रशस्ती पत्र व शॉल भेंट किया। इनके अलावा 'हरियाणा युवा विज्ञान रत्न अवार्ड' कैटेगरी में वर्ष 2012-13 के लिए अभिनीत कौशिक व प्रदीप कुमार को,वर्ष 2013-14 के लिए डॉ. दीपक शर्मा व प्रवीण कुमार को,वर्ष 201415 के लिए डॉ. सविता चौधरी व डॉ. अभिनव ग्रोवर को,वर्ष 2015-16 के लिए डॉ. संदीप कुमार व डॉ. विनोद कुमार को,वर्ष 2016-17 के लिए डॉ. अनुराग कुहाड़ को सम्मानित किया गया। इन सभी युवा वैज्ञानिकों को अवार्ड के रूप में एक लाख रुपए,एक प्रशस्ती पत्र व शॉल भेंट किए गए। (भाषा)

खोज उत्तराखंड

वैज्ञानिकों ने खोजी नीम यूकेलिप्टस की नई प्रजातियां

नीम और यूकेलिप्टस की नई प्रजातियों से किसानों के मालामाल होने की संभावना बढ़ी है

त्तराखंड में पौधारोपण करने के वाले किसानों के लिए यह एक अच्छी खबर है। इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च ऐंड एजुकेशन (आईसीएफआरई) ने ज्यादा प्रॉडक्टिविटी वाले 20 पौधों को विकसित किया है। आईसीएफआरई के वैज्ञानिकों ने एक दशक से ज्यादा के परिश्रम और शोध के बाद मीलिया डूबिया की 10 और यूकेलिप्टस की 3 नई प्रजातियां खोजी हैं। मीलिया डूबिया को आम बोलचाल की भाषा में गोरा नीम भी कहा जाता है। इसे ड्रेक या मालाबार नीम के नाम से भी जाना जाता है। इन पौधों की लकड़ियों की भारी डिमांड है। ये पौधे ज्यादा उत्पादन क्षमता वाले हैं। प्रति वर्ष/प्रति हेक्टेयर औसतन 34.57 क्यूबिक मीटर लकड़ियां पैदा होती हैं। इन लकड़ियों की प्लाई इंडस्ट्री में जबरदस्त मांग है। इसी तरह यूकेलिप्टस की प्रति वर्ष/प्रति हेक्टेयर प्रॉडक्टिविटी 19.44 क्यूबिक मीटर दर्ज की गई है।

पहले उत्पादन 5-7 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर/प्रति वर्ष दर्ज की जाती थी। नई प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमताएं भी विकसित की गई हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस मुहिम के तहत गोरा नीम की 10 और यूकलि े प्टस की 3 प्रजातियां विकसित कर उनका रोपण हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में किया गया। नतीजे बेहद उत्साहजनक आए। (भाषा)

रेलवे

बिजली बचाने के लिए रेलवे कर रहा है नए उपाय बिजली की बचत के लिए गुजरात में रेलवे नए तरीकों को आजमा रहा है

की तरफ देशसे मेंतमामऊर्जाउपायबचत किएके लिएजासरकार रहे हैं। भारतीय

रेलवे भी बिजली की बचत के लिए नए-नए तरीके खोज रहा है। पश्चिमी रेलवे कुछ स्टेशनों पर सिग्नल को प्लेटफॉर्म से जोड़कर बिजली की बचत कर रहा है। इस सिस्टम से ट्रेन के आने पर ही सिग्नल में लाइट जलेगी। रेलवे को अंदाजा है कि इससे 70 फीसदी बिजली की बचत होगी। अभी प्रयोग के तौर पर अहमदाबाद डिविजन में अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के साथसाथ साबरमती और मणिनगर स्टेशन पर इस सिस्टम की शुरुआत की गई है और साल के अंत तक कई और स्टेशनों पर इसे लागू किया जाएगा। इससे सिग्नलों को सीधे प्लेटफॉर्म से जोड़ दिया जाएगा और सिग्नल की लाइट तभी जलेगी जब ट्रेन को आना होगा। ट्रेन के जाते ही सिग्नल दोबारा ऑफ हो जाएगा। इसके अलावा रेलवे सोलर पैनल और

सामान्य लाइट की जगह एलईडी लाइट लगाने पर जोर दिया जा रहा है। प्रयोग के तौर पर कई ट्रेनों की छत पर भी सोलर पैनल लगाया जा रहा है। अहमदाबाद डिविजन के पीआरओ प्रदीप शर्मा ने कहा, 'रेलवे पिछले दस साल से बिजली बचाने के तरीकों पर जोर दे रहा है। हमारे प्रयासों के अच्छे परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। खासकर छोटे स्टेशनों पर ऐसे प्रयोग काफी सफल रहे हैं।' (भाषा)

जल संरक्षण मध्य प्रदेश

वॉटर प्रोजेक्ट से आई खुशहाली

मध्य प्रदेश का पटना गांव कुछ साल पहले तक पानी के लिए परेशान था, लेकिन एक चेक डैम से इस गांव के अच्छे दिन आ गए

चा

र साल पहले मध्य प्रदेश के छतरपुर में पटना गांव के लोग पानी लेने के लिए दर्जनों किलोमीटर जाया करते थे, लेकिन अब यह बीती बात हो गई है। यहां बने एक चेक डैम ने इन समस्याओं से निजात दिला दी है। यह गांव खुजराहो से 80 किलोमीटर की दूरी पर है। इस प्रोजेक्ट के तहत एक चेक डैम, 15 सोलर लाइट्स, 1,300 मीटर की पक्की सड़क और पीने के पानी के लिए एक तालाब के सुधार का काम किया गया है। एक ग्रामीण गोविंद सिंह ने बताया कि लगभग चार साल पहले वहां मक्का की फसल उगानी संभव नहीं थी। यह सूखा क्षेत्र है। उन्होंने कहा, 'चेक डैम के बनने और तालाब के सुधार के बाद हम गर्मियों में भी फसल ले पाते हैं।' एक अन्य ग्रामीण ने कहा कि पहले गांवे के लोगों को रोजगार की तलाश में बाहर जाना पड़ता था। गांव में खेती के लिए संसाधन नहीं थे, लेकिन इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद वे साल में 80,000 रुपए तक कमा लेते हैं। ‘हरितिका’ स्वयं सेवी संगठन जो इस क्षेत्र में कार्यरत है उसकी मुख्य कार्यकारी अधिकारी अवनि मोहन सिंह ने बताया कि वहां 100 एकड़

जमीन में एक बगीचा भी लगाया गया है। बगीचे में आम, अमरूद और करौंदे का उत्पादन होता है। यहां दशहरी आम भी होते हैं, इस आम की खासी मांग भी रहती है। ये फल पास की मंडी में बेचे जाते हैं और इससे गांव के लोगों को फायदा होता है। सिंचाई के लिए पानी सोलर पंप से खींचा जाता है। गांव की रहने वाली सावित्री ने बताया कि अब वह खेती में अपने पति का सहयोग करती हैं। उनके पति को काम की तलाश में गांव से बाहर नहीं जाना पड़ता है। (भाषा)


29 मई - 04 जून 2017

सौर

स्टेट न्यूज

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सोशल मीडिया

ऊर्जा

इंस्टाग्राम युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक

वाराणसी में सोलर रूफटॉप से बिजली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सोलर रूफटॉप पैनल से 676 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है

युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के पड़ते प्रभाव के मद्देनजर ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में ‘इंस्टाग्राम’ को सबसे खराब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म करार दिया गया

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी ने अकेले सोलर रूफटॉप पैनल से 676 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। हालांकि पुराने ग्रिड और लाइन लॉस एक बड़ी चुनौती है। इस बात की जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी द्वारा यहां जारी पर्यावरण और ऊर्जा विकास केंद्र (सीईईडी) की रिपोर्ट 'वाइब्रेंट वाराणसी, ट्रांसफोरमेशन थ्रू सोलर रूफटॉप' में इस ऐतिहासिक शहर के लिए साल 2025 तक 300 मेगावॉट बिजली उत्पादन का रोडमैप प्रस्तुत किया गया। सीईईडी के कार्यक्रम निदेशक और रिपोर्ट

जकल युवा हों या बच्चे सब सोशल मीडिया को लेकर हमेशा व्यस्त रहते हैं। इसके चलते शारीरिक सक्रियता कम होने लगती है, जिसके कारण कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों का खतरा बन जाता है। युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के पड़ते प्रभाव के मद्देनजर ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में ‘इंस्टाग्राम’ को सबसे खराब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म करार दिया गया है। रॉयल सोसाइटी ऑफ पब्लिक हेल्थ (आरसीपीएच) द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में 14-24 के बीच के आयुवर्ग के 1,479 लोगों से यूट्यूब, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, फेसबुक और ट्विटर का उनके स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव से संबंधित कई सवाल पूछे गए। प्रतिभागियों से 14 स्वास्थ्य मुद्दों और हितों के मद्देनजर हर प्लेटफॉर्म को अंक देने के लिए कहा गया। मूल्यांकन के आधार पर यूट्यूब को मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा सकारात्मक प्रभाव डालने वाला माना गया, वहीं ट्विटर और फेसबुक क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान

के मुख्य लेखक अभिषेक प्रताप ने बताया, ‘वाराणसी की मान्य क्षमता 676 मेगावॉट पैदा करने की है जिसे कुल उपलब्ध छतों के केवल 8.7 फीसदी के इस्तेमाल से ही यह क्षमता हासिल की जा सकती है। हालांकि यहां वितरण हानि 40-42 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 24 फीसदी है। इसीलिए पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के अप्रभावी ग्रिड अपनी पूर्ण क्षमता के उपयोग साल 2032 तक कर पाएगी।’ प्रताप ने कहा कि वाराणसी का वर्तमान में बिजली की सालाना मांग 861 मेगावॉट है, जो शहर के विस्तार के कारण साल 2025 तक 1700 मेगावॉट हो जाएगी। (आईएएनएस)

ट्राई

ओडिशा विज्ञान

छात्रों के लिए मोबाइल लैब शुरू

ओडिशा सरकार ने टीसीएस फाउंडेशन और टाटा ट्रस्ट के सहयोग से यह पहल की गई है

डिशा सरकार ने छात्रों के घर तक व्यावहारिक विज्ञान की कक्षा पहुंचाने के लिए दक्षिण ओडिशा के पांच पिछड़े प्रखंडों के लिए एक मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला योजना शुरू की। राज्य के मुख्य सचिव ए पी पाधी ने सचल विद्यालय एवं सामुदायिक विज्ञान प्रयोगशालाओं को रवाना करते हुए कहा, 'राज्य सरकार ने टीसीएस फाउंडेशन और टाटा ट्रस्ट के सहयोग से यह पहल की गई है।' उन्होंने कहा कि पहल का उद्देश्य समुदाय, विद्यालय, शिक्षकों एवं छात्रों सहित बहु हितधारकों को जोड़कर दक्षिण ओडिशा में उत्कृष्ट शिक्षा के माहौल का निर्माण करना है। टाटा ट्रस्ट के क्षेत्रीय प्रबंधक जितेंद्र नायक ने कहा कि ये वाहन मुनिगुडा, बिस्सम कटक, थुआमुल रामपुर, लंजीगढ़ और कोठगढ़ प्रखंडों में जाएंगे। इन वाहनों को बहुउद्देश्यीय मोबाइल प्रयोगशालाओं के रूप में डिजाइन किया

गया है और इनके दायरे में इन प्रखंडों की सभी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय आएंगे। इस अवसर पर मुख्य सचिव ने कहा कि 250 स्कूलों के करीब 25,000 छात्र इन सचल प्रयोगशालाओं से लाभान्वित होंगे जो टीवी, प्रॉजेक्टर, ऑडियो ऐम्प्लीफायर, जीपीएस ट्रैकर आदि से लैस हैं। (भाषा)

पर रहे। स्नैपचैट और इंस्टाग्राम को सबसे कम अंक मिले। बीबीसी के अनुसार, आरएसपीएच की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि सोशल मीडिया युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर और बुरा असर डाल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका इस्तेमाल एक उपकरण के रूप में अच्छे काम के लिए भी किया जा सकता है और इस प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखने के लिए कंपनियों को पूरी कोशिश करनी चाहिए। सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी अन्य आयु वर्ग के मुकाबले 90 फीसदी युवा करते हैं, इसलिए विशेष रूप से युवाओं पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है। (आईएएनएस)

रिपोर्ट

टेलीकॉम यूजर्स की संख्या बढ़कर 119 करोड़

मार्च में टेलीकॉम यूजर्स की संख्या में आधे फीसदी का इजाफा

स साल मार्च में टेलीकॉम यूजर्स की संख्या 0.5 फीसदी बढ़कर 119.45 करोड़ हो गई। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने अपनी मासिक ग्राहक रिपोर्ट में कहा, भारत में टेलीफोन ग्राहकों की संख्या फरवरी, 2017 के आखिर के 118.85 करोड़ से बढ़कर मार्च, 2017 के आखिर में 119.45 करोड़ हो गई। यह 0.51 फीसदी मासिक वृद्धि को दर्शाता है। इस वृद्धि में वायरलेस क्षेत्र का बड़ा योगदान रहा, जिसमें यूजर्स की संख्या आधी फीसदी बढ़कर 117.01 करोड़ हो गई। वायरलेस क्षेत्र में 59.8 लाख शुद्ध मोबाइल ग्राहक जुड़े। फिक्स्डलाइन कनेक्शन

में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वायरलाइन ग्राहकों की संख्या फरवरी, 2017 के आखिर में 2.43 करोड़ से बढ़कर मार्च, 2017 के आखिर में 2.44 करोड़ हो गई। (आईएएनएस)


26 स्टेट न्यूज

29 मई - 04 जून 2017

सड़क सुरक्षा

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस का रोड सेफ्टी समर कैंप- 2017 समर कैंप में रोचक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सड़क सुरक्षा के बारे में किया जाएगा प्रशिक्षित

सत्यम

ड़क सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए होंडा मोटरसाइकल एंड स्कूटर इंडिया प्रा. लिमिटेड ने दिल्ली यातायात पुलिस के सहयोग से दिल्ली में रोड सेफ्टी समर कैंप 2017 के तीसरे संस्करण का आयोजन किया। स्कूली बच्चों को रोचक तरीके से सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूक बनाना इस पहल का मुख्य उद्देश्य था। नई दिल्ली में बाबा खड्ग सिंह मार्ग स्थित होंडा ट्रैफिक ट्रेनिंग पार्क में आयोजित रोड सेफ्टी समर कैंप के उद्घाटन समारोह में 200 से ज्यादा बच्चों ने हिस्सा लिया। कैंप का उद्घाटन दिल्ली के पुलिस आयुक्त अमूल्य कुमार पटनायक तथा होंडा मोटरसाइकल एंड स्कूटर इंडिया के जनरल मैनेजर पी राजगोपी के द्वारा किया गया। इस मौके पर कई अन्य दिग्गजों एवं वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी मौजूदगी के साथ कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस कैंप के लिए 1000 से अधिक बच्चे पहले से रोड सेफ्टी समर कैंप के लिए पंजीकरण कर चुके हैं। यह

कैंप 9 जून 2017 तक जारी रहेगा। इस मौके पर होंडा के सेल्स एंड मार्केटिंग के सीनियर वाईस प्रेसीडेंच यदविंदर सिंह गुलेरिया ने कहा, ‘इन गर्मियों में होंडा एक बार फिर से दिल्ली यातायात पुलिस के सहयोग से दिल्ली में रोड सेफ्टी समर कैंप का आयोजन करने जा रहा है। ‘सेफ्टी विद फन’ यानी रोचक तरीकों से सुरक्षा पर जोर देना हमारी प्राथमिकता है, हमारी इस पहल के तहत बच्चों को नए रोचक शैक्षणिक खेलों के माध्यम से सड़क सुरक्षा के बारे में जानने का मौका मिलेगा। कैंप में हिस्सा लेने के बाद ये बच्चे आज अपने परिवारों को प्रभावित करेंगे और आने वाले कल में ऐसे व्यस्क के रूप में विकसित होंगे जो पूरी जिम्मेदारी के साथ सड़क का इस्तेमाल करेंगे।’ होंडा के रोड सेफ्टी कैंप में बच्चों को कई प्रकार

से सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक ज्ञान दिया जाएगा। विशेष रूप से तैयार किए गए गेम्स जैसे रोड सेफ्टी पजल्स, क्रॉसवर्ड, मैच द फॉलोइंग, स्पिन द व्हील आदि के जरिए खेल-खेल में बच्चों को कैंप में सड़क सुरक्षा के बारे में जानकारी दी जाएगी। कैंप में एक खास सेल्फी जोन भी स्थापित की गई है जो हेलमेट के इस्तेमाल के बारे में जागरुकता बढ़ाएगी। हाई स्कूल के छात्रों को होंडा की थ्री-डी राइडिंग ट्रेनर पर प्रशिक्षित किया जा रहा हैं। यह एक वर्चुअल राइडिंग सिमुलेटर है, जो 13 साल से अधिक उम्र के बच्चों को वास्तविक राइडिंग से पहले सड़क पर मौजूद 100 संभावित खतरों का अनुभव देता है। 9-12 आयुवर्ग के बच्चों को होंडा की सीआरएफ 50 मॉडल पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। जापान से विशेष रूप से आयात किया गया यह मॉडल उन्हें सुरक्षित

छात्रों को होंडा की थ्री-डी राइडिंग ट्रेनर पर प्रशिक्षित किया जा रहा हैं। यह एक वर्चुअल राइडिंग सिमुलेटर है जो बच्चों को वास्तविक राइडिंग से पहले 100 संभावित खतरों का अनुभव देता है

एक नजर

तीसरी बार आयोजित हो रहा इस तरह का कार्यक्रम छठी से बारहवीं तक के छात्र लेंगे कैप में हिस्सा

1000 से ज़्यादा छात्रों का हो चुका है पंजीकरण

सवारी के गुर सिखाने में मदद करेगा। कैंप के अंत में विद्यार्थियों को सर्टिफिकेशन ऑफ कम्प्लीशन दिया जाएगा। होंडा के लिए सड़क सुरक्षा 1970 से ही दुनिया भर में पहली प्राथमिकता रही है। भारत में होंडा 2 व्हीलर्स 2001 में अपनी शुरूआत से ही सड़क सुरक्षा जागरुकता को बढ़ावा दे रहा है। अब तक कंपनी सभी आयुवर्गों के 11 लाख से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित राइडिंग का प्रशिक्षण प्रदान कर चुकी है।


29 मई - 04 जून 2017

कायाकल्प

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दिल्ली मिसाल

कायाकल्प प्रगति मैदान

प्रगति मैदान में दिखेगा जल्द खत्म हो जाएगी इंसानी खून की किल्लत ‘नया इंडिया’ वैज्ञानिक जल्द ही स्वस्थ और प्रामाणिक इंसानी रक्त बनाने की तैयारी में हैं

प्रगति मैदान का कायाकल्प जल्द होने वाला है। इसमें बनने वाला कनवेंशन सेटर दुनिया की श्रेष्ठ इमारत होगी

सत्यम

तहत 32.4 मीटर ऊंचा कन्वेंशन सेंटर, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ऊंची इमारत बनेगी। इसमें ई हजार करोड़ रुपए की लागत से विभिन्न आकार और क्षमता के 30 बैठक बनने वाले इंटरग्रेटेड एक्सिबिशन कम कक्ष होंगे और पूरी संरचना लाल पत्थर और कन्वेंशन सेंटर (आईईसीसी) के निर्माण कार्य धौलपुर सफेद पत्थर और जीएफआरसी के की आधिकारिक घोषणा कर दी है। वर्तमान मिश्रण के साथ बनाई जाएगी। यह संरचना प्रगति मैदान कॉम्प्लेक्स, जो राष्ट्रीय और अनूठे स्लोपिंग फेस्ड के साथ एक ऊंचे मंच अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों को आयोजित करने पर दिल्ली के समृद्ध वास्तुशिल्प विरासत में और विभिन्न अन्य आयोजनों को आयोजित शामिल होगी। इसमें सात नए आधुनिक प्रदर्शनी हॉल करने के लिए उपयोग किया जाता है, इसे नए पुनर्विकास नए परिसर में प्रगति मैदान भी बनेंगे,जिनमें एफ एंड के साथ एक विश्व स्तर मेट्रो स्टेशन के साथ पैदल बी सुविधा शामिल होगी। यही नहीं दो रंगीन फव्वारा के अत्याधुनिक एकीकृत प्र द र्श न ी - स ह - क न ्व ें श न मार्ग , छत और स्काईवॉक क्षेत्रों के साथ प्रदर्शनी खुले क्षेत्र (15 एकड़) में होगी। बनाया जाएगा। कनेक्टिविटी भी शामिल होगी परिसर में प्रगति मैदान मेट्रो उल्लेखनीय है कि विश्व स्टेशन के साथ भी पैदल स्तर की इस परियोजना को लेकर इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइजेशन यानि मार्ग , छत और स्काईवॉक कनेक्टिविटी भी आईटीपीओ के सीएमडी एलसी गोयल और शामिल होगी। इसके अलावा 4800 वाहनों नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लि. के लिए बेसमेंट पार्किंग के सहज यातायात (एनबीसीसी) के सीएमडी डॉ. एके मित्तल ने प्रवाह के लिए प्रवेश और निकासी की सुविधा इसकी रुपरेखा से अवगत कराया। पुनर्विकास भी रहेगी। आईईसीसी तक बेहतर पहुंच और के बाद आईईसीसी दिल्ली में एक ऐतिहासिक सामान्य जनता के लाभ के लिए ट्रैफिक दिशा स्थान होगा और प्रधान मंत्री के 'नए भारत' के निर्देशों के महत्वपूर्ण प्रावधानों और यातायात के दौरान आने वाले व्य वधानों का ख्याल विचारों का प्रतीक होगा। एनबीसीसी द्वारा एआरसीओपी रखा जाएगा। यह सुविधा प्रगति मैदान में 6 एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और एईडीएएस लेन से विभाजित सुरंग काटने के माध्यम से पीटीई लि. आफ सिंगापुर के साथ मिलकर रिंग रोड के मथुरा रोड / पुराना किला रोड आईईसीसी को नवीनतम वास्तुशिल्प डिजाइन से भी कनेक्ट हो जाएगी, जिससे मथुरा रोड के साथ बनाया जाएगा। इस परियोजना के सिग्नल फ्री बन सकती है।

ढा

एसएसबी ब्यूरो

शोधकर्ताओं की एक टीम को अलग-अलग तरह की कोशिकाओं को मिलाने में सफलता ज्ञानिकों की मानें, तो आने वाले दिनों मिली है। इनमें रक्त की मूल कोशिकाएं भी में किसी भी मरीज के इलाज में खून शामिल हैं। जब इन कोशिकाओं को चूहे की कमी नहीं होगी। वैज्ञानिकों का कहना के शरीर में डाला गया, तो उन्होंने अलगहै कि जल्द ही वे इलाज में जरूरत पड़ने अलग तरह की इंसानी रक्त कोशिकाओं का वाले खून की बेशुमार मात्रा सप्लाइ कर निर्माण किया। अमेरिका के बॉस्टन चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल पाएंगे। मौजूदा समय में लोगों को चिकित्सा में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता डॉक्टर योइचि कारणों से जब खून की जरूरत पड़ती है, तो ब्लड की किल्लत के कारण उन्हें काफी सुगिमुरा ने बताया, 'इस शोध की मदद से परेशानी उठानी पड़ती है। ब्लड डिसऑर्डर्स हम खून की वंशानुगत बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की कोशिकाएं और कई अन्य बीमारियों में लोगों को बड़ी मात्रा जीन एडिटिंग की मदद ले सकते हैं और जीन एडिटिंग की मदद से उनके में खून चढ़ाना पड़ता है। से उनके डिसऑर्डर डिसऑर्डर को ठीक करके लंबे शोध के बाद वैज्ञानिक वयस्क कोशिकाओं को को ठीक करके स्वस्थ स्वस्थ रक्त कोशिकाएं तैयार कर सकते हैं। साथ मूल कोशिकाओं में बदलने रक्त कोशिकाएं ही, इसके कारण रक्त में कामयाब हुए हैं। ये मूल तै य ार कर सकते हैं की मूल कोशिकाओं की कोशिकाएं की भी तरह की अबाध आपूर्ति भी संभव रक्त कोशिकाएं बनाने में हो सकती है । ' हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के सक्षम होंगी। पिछले करीब 20 साल से वैज्ञानिक प्रमुख और सुगिमुरा के साथी शोधकर्ता यह पता करने की कोशिश कर रहे थे कि डॉक्टर जॉर्ड डेली ने कहा, 'हम शायद क्या इंसान के खून में कृत्रिम तौर पर मूल जल्द ही स्वस्थ और प्रामाणिक इंसानी रक्त कोशिकाओं का निर्माण किया जा सकता तैयार करने में कामयाब हो जाएंगे। 20 है। मूल कोशिकाएं शरीर में किसी भी सालों की मेहनत के बाद हम इस मकाम तरह की कोशिकाएं बना सकती हैं। अब तक पहुंचे हैं।'

वै


28 जेंडर

29 मई - 04 जून 2017

सपनों को लगे मिसाल उत्तर प्रदेश

रिक्शा ट्रॉली के पंख

जैनपुर की महिलाओं ने छोटी बचत से बड़ा काम किया है। इससे उनके सपने अब उड़ान भरने लगे हैं

श्रवण शुक्ला / लखनऊ

भी-कभी एक छोटा विचार भी लोगों के जीवन में बड़ा अंतर पैदा कर देता है। ऐसा उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक अवर्गीकृत गांव में हुआ है, जहां कि अनपढ़ महिलाओं ने अपने जीवन में एक नई शुरुआत करने और दूसरों के लिए एक उदाहरण पेश करने के लिए हाथ मिलाया है। जौनपुर जिले से 60 किमी दूर मुगराबादशाहपुर ब्लॉक के कैथापुर गांव की महिलाएं अपनी छोटी बचत से अपने सपने को बदलने और भाग्य को सही साबित करने के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने 20 रुपए प्रतिदिन बचाए और चार महीने की बचत के बाद 7200 रूपए में एक रिक्शा ट्रॉली खरीदा। लेकिन रिक्शा ट्रॉली ही क्यों खरीदा? सेल्फ हेल्प ग्रुप की सबसे बड़ी सदस्य दुर्गावती देवी ने

कहती हैं कि हम अपने छोटे से काम के लिए 100 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से पड़ोसी गांव से रिक्शा ट्रॉली किराए पर लेते थे। फिर हमने सोचा कि क्यों ना हम रोज के खर्चे में कटौती करके अपनी ट्रॉली खरीद लें और इससे ज्यादा पैसा कमाएं। उन्होंने ट्रॉली खरीदने के लिए समूह के सदस्यों को बड़ी रियायत देने का फैसला किया। समूह के सदस्यों के लिए 50 रुपए और दूसरों के लिए 100 रुपए प्रतिदिन किराया तय किया गया। स्व-सहायता समूह के सदस्यों का दावा है कि वे फसलों की कटाई के दौरान प्रति दिन 100 रुपए या आठ किलोग्राम गेहूं प्रतिदिन के हिसाब से प्राप्त कर रही थीं। दुर्गावाती ने कहा कि हमारे पास कोई नियमित आय का साधन नहीं था, लेकिन अब हमारे पास आय और बचत का एक और स्रोत है। रिक्शा ट्रॉली ने न सिर्फ इनके जीवन को आसान बना दिया है, बल्कि कैथापुर के दूसरे गांवों के लोगों

स्वच्छता झारखंड

प्लास्टिक की बोतलों से शौचालय जमशेदपुर में प्लास्टिक की बोतलों से शौचालय बनाने की तैयारी है

मशेदपुर के टेल्को स्थित मानव विकास स्कूल में प्लास्टिक की अनुपयोगी खाली पानी की बोतलों की मदद से शौचालय निर्माण की योजना बनाई गई है। पांच जून तक निर्माण पूरा करने की योजना है। इस स्कूल को क्षेत्र के कई सेवानिवृत्त बुजुर्ग संचालित करते हैं। इस स्कूल में सिर्फ एक टॉयलेट है, जबकि बच्चे अधिक हैं। इस योजना को मूर्त रूप देने में जो वित्तीय भार पड़ेगा उसे हिलटॉप स्कूल की छात्रा मौन्द्रिता चटर्जी एवं

एक नजर

हर दिन बीस रुपए बचाए महिलाओं ने

रिक्शा ट्रॉली से जिंदगी ने पकड़ी रफ्तार अब ट्रैक्टर और ई रिक्शा का सपना होगा साकार

के लिए भी रास्ते बना दिए हैं। हर छोटे से छोटे काम के लिए ग्रामीणों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए परिवहन की आवश्यकता होती है। अब बीमार परिवार के सदस्यों को पीएचसी या खाद को अपने खेतों में ले जाने के लिए उनके पास एक ट्रॉली है। इसका किराया भी कम हैं और किसी भी आपातकालीन स्थिति में आसानी से गांव में उपलब्ध हो जाती है। बाबू लाल कहते हैं कि मेरी बहू गर्भवती थी और उसे डिलीवरी दर्द शुरू हुआ तो कुछ ही मिनटों में समूह के लोगों ने रिक्शा ट्रॉली से उसे पीएचसी पहुंचा दिया, जहां उसने एक स्वस्थ्य बच्चे को जन्म दिया। उन्होंने बताया कि पहले बहुत से बीमार लोगों की परिवहन असुविधा के कारण मृत्यु हो जाती थी। महिला समख्या क्लस्टर की हेड मंजू देवी ने दावा किया कि रिक्शा ट्रॉली ने ग्रामीण लोगों के जीवन को काफी आसान बना दिया है। वे बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को इस ट्रॉली के माध्यम से जल्दी अस्पताल पहुंचा देते हैं, जिससे उनका सही समय पर इलाज हो जाता है। गांवों में अचानक से रिक्शा ट्रॉली की डिमांड बढ़ गई है। मिड डे मील की स्कूलों में सप्लाई हो या कटे हुए फसल को घर तक ले आना हो, ट्रॉली सबके लिए कम कीमत पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है। हमने कभी नहीं सोचा था कि यह छोटी सी पहल हमारे गांव के लोगों की जीवन शैली को बदल देगी। चंद्रकली दावा करती हैं कि ग्रुप में ट्रॉली के लिए पहले से ही एडवांस बुकिंग हो रही है। इस छोटी पहल की सफलता के बाद, स्वयं सहायता समूह अब बड़ा सपना देख रहा है। महिला

समख्या की सामुदायिक बचत योजना के तहत, वे एक ट्रैक्टर और ई-रिक्शा खरीदने के लिए थोड़ा अतिरिक्त बचत कर रहा हैं। इस समूह में अब 30 महिलाएं है, जिनमें से तीन युवा और उत्साही सदस्यों को चुना गया है, जिन्हें स्वचालित मशीनों को चलाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। दुर्गावती कहती हैं कि इससे ग्रामीणों की लाइफ स्टाइल पूरी तरह से बदल जाएगी। ज्यादातर ग्रामीण किसान हैं और वे अपने परिवार के भरण पोषण के लिए खेतों में फसल उगाने के लिए पसीना बहाते हैं। रोजमर्रा की नौकरी के लिए महिलाओं के पास बहुत कम विकल्प है। हमारे पास ट्रैक्टर होने से यह खेतों में काम करने वाले लोगों की समय और ऊर्जा दोनों को बचाएगा। उन्हें किराया देने पर भी हमें अच्छा लाभ मिलेगा। खेतों की तैयारी में आम तौर पर दस दिन का समय लगता है, उसके बाद वे ट्रैक्टर को घंटे के हिसाब से किराए पर दे सकते हैं । एक बार फसल बोने के बाद वे अपनी पत्नियों के साथ या दूसरे रोजगार के लिए गांव के बाहर जा कर अधिक पैसा भी कमा सकते हैं। अब बछड़े की गाड़ियों और बैल से खेती करने के दिन चले गए। कैथापुर की ये बहादुर महिलाएं बदलती हुई इस दुनिया के साथ तालमेल रखने का एक और प्रयास करने के लिए तैयार हैं। वह दिन ज्यादा दूर नहीं है, जब वे अपने सपनों को पूरा करने का एहसास करेंगी। चंद्रकली दावा करती हैं कि हमारा मुख्य मकसद अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और खुद पर गर्व महसूस कराना है। इसके लिए ही हम इतनी मेहनत कर रहे हैं।

परिजनों ने खर्च करने की पहल की है। उल्लेखनीय है कि कक्षा सात की मौन्द्रिता पहले भी अपने खर्च पर कुछ शौचालय बनवा चुकी हैं, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। सीएम कैंप कार्यालय के उपसमाहर्ता संजय कुमार की पहल पर इस योजना की शुरुआत की गई है। संजय कुमार ने गरुड़बासा पहुंचकर स्कूल के शिक्षकों के अलावा मौन्द्रिता चटर्जी एवं परिजनों से इस पर्यावरणीय पहल को मूर्त रूप देने के लिए आगे आने को कहा। प्रस्ताव को सभी ने स्वीकार किया। संजय कुमार ने कहा जमशेदपुर में प्लास्टिक बोतलों की भरमार है। इनका उपयोग होने से शहर की स्वच्छता बढ़ेगी। ईंट के विकल्प के रूप में इन बोतलों का प्रयोग करना भी पर्यावरणीय हित में है। उन्होंने कहा कि यह शौचालय सिर्फ प्रायोगिक

दृष्टिकोण से बनाया जा रहा है, अगर परिणाम अच्छा रहा तो इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। शौचालय बनाने में लगभग तीन हजार खाली बोतलों की जरूरत होगी। इनमें से कुछ बोतलें समीप स्थित रिवर व्यू कॉलोनी के घरों से इकट्ठा की जाएंगी, जबकि बड़ी मात्रा में अनुपयोगी खाली बोतलें स्कूल के छात्र एवं अभिभावक अपने घरों से जमा करेंगे। प्लास्टिक की एक लीटर मिनरल वाटर वाली खाली बोतल में बालू या लौह अयस्क का अवशिष्ट राख (स्टील प्लांट से निकला स्लज जिसे फेंक दिया जाता है) को भरकर ईंटों के विकल्प के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा। पायलट योजना में खुद को शामिल करने पर 13 वर्षीय छात्रा मौन्द्रिता उत्साहित थी। उसने कहा कि नई पहल में शामिल होकर वह गौरव महसूस कर रही है।


29 मई - 04 जून 2017

योजना छत्तीसगढ़

उपभोक्ताओं को दिए गए 73 लाख एलईडी बल्ब

छत्तीसगढ़ में एलईडी बल्ब वितरण के शानदार नतीजे सामने आ रहे हैं। इससे अब तक 379 करोड़ रुपए की बचत की जा रही है

त्तीसगढ़ में विद्युत उपभोक्ताओं को अब तक लगभग 73 लाख एलईडी बल्ब दिए गए हैं। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि ‘राष्ट्रीय उजाला योजना’ के अंतर्गत राज्य में बीपीएल उपभोक्ताओं को तीन एलईडी बल्ब नि:शुल्क और एपीएल श्रेणी के उपभोक्ताओं को 65 रुपए प्रति बल्ब की दर से अधिकतम 10 एलईडी बल्ब दिए जा रहे हैं। राज्य में विद्युत उपभोक्ताओं को अब तक 72 लाख 90 हजार एलईडी बल्ब दिए जा चुके हैं। अधिकारियों ने बताया कि योजना के अंतर्गत इस वर्ष दो अक्टूबर तक बीपीएल श्रेणी के विद्युत उपभोक्ताओं को शतप्रतिशत एलईडी बल्ब का नि:शुल्क वितरण किया जाएगा। वहीं नगरीय निकायों में भी इस वर्ष दिसंबर माह तक एलईडी स्ट्रीट लाइट लगाई जाएगी। उन्होंने बताया कि राज्य में एलईडी बल्ब वितरण के उत्साहजनक नतीजे मिलने लगे हैं। लोगों के घरों में बिजली की अच्छी बचत होने लगी है। प्रतिदिन सबसे ज्यादा मांग (पीक डिमांड) के समय राज्य में इन बल्बों के कारण बिजली की खपत में लगभग 190 मेगावाट की कमी आई है। इससे सालाना 379 करोड़ रुपए की बचत हो रही है। अधिकारियों ने बताया कि नौ वाट के एक

एलईडी बल्ब से एक सौ वाट के बराबर रोशनी होती है। बिजली का मीटर भी कम रफ्तार से घूमता है और बिजली का बिल कम आता है। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 13 मार्च 2016 को राजनंदगांव में इस योजना का शुभारंभ किया था। उन्होंने बताया कि राज्य के छह शहरी क्षेत्रों में बिजली के खम्भों में एलईडी लाइट लगाई जा रही हैं। इन शहरों में बिलासपुर, रा ज न ां द ग ां व , कोरबा, धमतरी नगर निगम क्षेत्रों में एलईडी स्ट्रीट लाइट का कार्य प्रगति पर है। शेष दो शहरों रायपुर और भिलाई में भी एलईडी स्ट्रीट लाइट का कार्य जल्द ही प्रारंभ होने जा रहा है। इन सभी शहरों में इस वर्ष दिसम्बर माह तक अनिवार्य रूप से कार्य एलईडी स्ट्रीट लाइट लगाने का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इन सभी शहरों में एलइडी स्ट्रीट लाइट के लिए सेन्ट्रल कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग सिस्टम भी लगाया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि राज्य में एलईडी बल्बों के उपयोग से वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा में भी प्रति वर्ष लगभग सात लाख 67 हजार टन की कमी आ रही है। इसके फलस्वरूप अगले 10 वर्षों में 17 लाख से अधिक पेड़ बचाए जा सकेंगे। भाषा

स्वच्छता महाराष्ट्र

श्रमदान कर नए जीवन की शुरुआत

ग्राम स्वच्छता और जल संरक्षण के प्रति समर्पित जोड़े को श्रमदान का आशीर्वाद मिला

हाराष्ट्र के माण तालुका अंतर्गत गांव लोधवडे में नव वर-वधू ने श्रमदान कर अपने जीवन की शुरुआत की। इस गांव को जल-संरक्षण के लिए सरकार ने कई पुरस्कार दिए हैं। इसे स्मार्ट गांव का भी दर्जा हासिल हुआ है। 23 मई को कोमल माने और तुषार की शादी थी। दोनों समाज सेवा के लिए जाने जाते हैं। धरती और जल संरक्षण, ग्राम स्वच्छता आदि में इनकी भागीदारी हमेशा से रही है। इन्होंने शादी मंडप पर बैठने

के पूर्व यह तय किया कि वे गांव की खुशहाली के लिए श्रमदान करेंगे। उनके इस फैसले का लोगों ने स्वागत किया। यह पूरा क्षेत्र दुष्काल से पीड़ित है। लोग अपनी कोशिशों से इस समस्या से लड़ रहे हैं। उस दिन जब यह जोड़ा खेत में पहुंचा तो पूरा गांव इकट्ठा हो गया। सबने मिलकर श्रमदान में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। बुजुर्गों ने वहीं कोमल और तुषार को आशीर्वाद दिया और मंगल कामना की। (मुंबई ब्यूरो)

गुड न्यूज

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पहल गुजरात

पुरोहित की दक्षिणा भी चेक से गु

गुजरात में आयोजित सामूहिक कैशलेस विवाह में शगुन भी चेक से दिए गए

जरात के अरावली जिले के बयाड में एक सामूहिक विवाह का आयोजन किया गया। इसमें 9 जोड़ियां शामिल हुईं। इस आयोजन की खास बात यह रही है कि इसमें एक पैसे का भी नकद लेन-देन नहीं हुआ। आमतौर पर गुजरात में शादी-विवाह के मौके पर शगुन (कैश में) जमा कराने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगती हैं, लेकिन इस बार यहां शगुन के लिए स्वाइप मशीनें लगई थीं। इस कार्यक्रम का आयोजन ‘वीरमाया वनकार समाज सुधारक समिति’ ने किया था। समिति के संयोजक हंसमुख सक्सेना ने बताया, 'कार्यक्रम में हर तरह के भुगतान या तो चेक से किए गए या आटीजीएस से। सामूहिक विवाह में कपल के लिए खरीदे गए गिफ्ट, कैटरर, मंडप बनाने वाले के भुगतान चेक या आटीजीएस से किए गए। यहां तक पुरोहित की दक्षिणा भी चेक से दी गई।' इस सामूहिक विवाह में सबसे बड़ी चुनौती 'दापु' प्रथा को लेकर थी। इस प्रथा में होने वाली बहू को दूल्हे के माता-पिता नकद शगुन देते हैं। सक्सेना ने बताया कि देश को कैशलेस की दिशा में बढ़ाने के लिए इस प्रथा के तहत दी जाने वाली नकद राशि का भुगतान भी चेक से किया गया। सक्सेना ने बताया कि हमारी प्राथमिकता भ्रष्टाचार

मुक्त भारत का निर्माण है। कैशलेस व्यवस्था से पारदर्शिता आएगी। सामूहिक विवाह में भाग लेने वाले नाथाभाई चौहान ने कहा, 'शुरू में मैं इस विचार के खिलाफ था। मुझे लगता था कि यह बेहद मुश्किल है, लेकिन, एक बार जब हमने सीख लिया की एटीएम कार्ड को कैसे स्वाइप करते हैं तो यह बेहद आसान लगने लगा। हमने फैसला लिया कि मीना को 707 रुपए का 'दापु' चेक में देना है।' नाथाभाई ने कहा कि इस बदलाव का हिस्सा बनकर हमें बेहद खुशी हुई। इस सामूहिक विवाह में नाथाभाई के बेटे रमेश की शादी मीना से हुई। भाषा

योजना महाराष्ट्र

हरियाली के लिए रेलवे ट्रैक के नजदीक लगाए जाएंगे पौधे

रा

महाराष्ट्र में हरियाली बढ़ाने के लिए रेलवे के साथ एक समझौता किया गया है

ज्य में हरियाली बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने रेलवे के साथ एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया है। इसके तहत रेलवे ट्रैक के नजदीक खाली पड़ी भूमि पर पेड़ लगाए जाएंगे। राज्य में वन विभाग संभाल रहे वित्त मंत्री सुधीर मुगंतीवार ने बताया, 'राज्य में वन को 20 फीसदी से 33 फीसदी करने के लिए बड़े पैमाने पर वन और गैर वन वृक्षारोपण की आवश्यकता है। इस पर विचार करते हुए हमने रेल मंत्री सुरेश प्रभु से रेलवे लाइन के नजदीक भूमि पर पौधे लगाने की अनुमति मांगी थी।' इस पर एक साल के बाद सरकार और रेलवे के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया है। मुगंतीवार ने बताया, 'हरे-भरे महाराष्ट्र की अवधारणा को प्राप्त करने के लिए यह एमओयू महत्वपूर्ण है। पिछले साल रिकॉर्ड तोड़ पौधे लगाने के बाद हम लोग इस साल एक जुलाई तक चार करोड़ पौधे लगाने के लिए प्रतिबद्ध

हैं।' पिछले साल राज्य सरकार के वन विभाग ने दो करोड़ 83 लाख पौधे लगाए थे। इसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड में भी शामिल किया गया था। भाषा


30 ​गतिविधि

29 मई - 04 जून 2017

साहित्य गतिवि​िध

हिंदी को मानक रूप देने में महावीर प्रसाद द्विवेदी की बड़ी भूमिका

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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 153 वीं जयंती के अवसर पर कई लेखकों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हस्तियां हुईं सम्मानित

मचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे, उन्हें हिंदी के संस्कार सिखाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ही थे। हिंदी भाषा को मानक रूप देने में आचार्य द्विवेदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा और उन्होंने ही प्रेमचंद के ‘बलिदान’ और ‘पंच परमेश्वर’ का संशोधन किया था। आचार्य द्विवेदी ने एक-एक पंक्ति में बारह से चौदह तक संशोधन किए और कई वाक्यों में क्रिया समेत पूरा विशेषण ही बदल दिया। कहा जा सकता है कि आचार्य द्विवेदी ने उर्दू से हिंदी में आ रहे लेखक प्रेमचंद को हिंदी के संस्कार देने में बहुत बड़ा योगदान दिया।’ ये बातें केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष डॉ. कमल किशोर गोयनका के जो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 153 वीं जयंती के उपलक्ष्य में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित सम्मान समारोह में कही। राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन (वाजा) दिल्ली और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात लेखक दिनेश कुमार शुक्ल ने की। जाने माने लेखक प्रेमपाल शर्मा विशिष्ट अतिथि थे। इस अवसर पर प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि आज देश में अपनी भाषा, अपने साहित्य को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सुगठित पुस्तकालय आंदोलन की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि कमल किशोर गोयनका ने कहा कि प्रेमचंद के निर्माण में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का बहुत बड़ा योगदान था। प्रेमचंद ने उन पर दो संस्मरण भी लिखे हैं। प्रेमचंद ने ‘पंचों में ईश्वर’ शीर्षक के साथ जो कहानी आचार्य द्विवेदी को प्रकाशित करने को भेजी थी, वह ‘पंच परमेश्वर’ नाम से छपी। द्विवेदी जी ने नाम बदल कर कहानी में जो चमक पैदा की वो अद्भुत था। भोपाल से पधारे प्रख्यात पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने मौजूदा दौर में पत्रकारिता की दुर्दशा के लिए कुछ हद तक पाठकों को भी जिम्मेदार बताया। उनका कहना था कि बाजार हर दौर में समाज का

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आचार्य द्विवेदी ने ही प्रेमचंद के ‘बलिदान’ और ‘पंच परमेश्वर’ का संशोधन किया था। आचार्य द्विवेदी ने एक-एक पंक्ति में बारह से चौदह तक संशोधन किए और कई वाक्यों में क्रिया समेत पूरा विशेषण ही बदल दिया हिस्सा रहा है, लेकिन बाजार को सहायक या सेवक रहना चाहिए न कि शासक। कार्यक्रम में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार से ‘सप्रे संग्रहालय’, भोपाल के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर को सम्मानित किया गया। उनके द्वारा स्थापित और संचालित ‘सप्रे संग्रहालय’ विश्व का अपने तरीके का अनूठा प्रयोग है। वहीं ‘मामा बालेश्वर स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित हापुड़ के समाजिक कार्यकर्ता कर्मवीर लंबे समय से किसानों और जमीनी मुद्दों पर संघर्षरत हैं। अनुपम मिश्र स्मृति पर्यावरण पुरस्कार पाने वाले दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी बीते तीन दशकों से जल, विशेष तौर पर पारंपरिक तालाबों के लिए

काम कर रहे हैं और उनके प्रयासों से उत्तर प्रदेश में तालाब विकास प्राधिकरण का गठन होने जा रहा है। अरविंद घोष स्मृति पुरस्कार से सम्मानित दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता संजय सिंह करीब ढाई दशकों से सामजिक सरोकारों के साथ परिवहन क्षेत्र पर बेहतरीन काम लिए जाने जाते हैं। आज पटरियों पर दौड़ रही ‘गरीब रथ’ ट्रेन के चलने में भी उनका योगदान रहा है। वहीं सामाजिक सरोकारो के साथ तेजाब पीड़ित लड़कियों के लिए सतत लेखन करने वाली सुश्री प्रतिभा ज्योति को कंचना स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिंदी और अंग्रेजी दोनों पत्रकारिता में अपने सकारात्मक रुख और निष्पक्ष नजरिए के लिए विवेक शुक्ल को देवेन्द्र उपाध्याय

स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। रमई काका सम्मान अवधी के प्रख्यात कवि आचार्य सूर्यप्रकाश शर्मा ‘निशिहर’ को दिया गया। इस अवसर पर दिनेश कुमार शुक्ल ने कहा कि आचार्य जी केवल हिंदी ही नहीं , भारतीय साहित्य के मार्गदर्शक थे और उस दौर के कई लेखकों को उनका मार्गदर्शन मिला। भावी योजना पर प्रकाश डालने के साथ समारोह का संचालन राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन दिल्ली के अध्यक्ष अरविन्द कुमार सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन वाजा के महासचिव शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ने किया। समारोह में वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, सदानंद पांडेय, गोपाल गोयल, टिल्लन रिछारिया, अरुण तिवारी, राकेश पांडेय, अरविंद विद्रोही, फजल इमाम मलिक, नलिन चौहान, आशुतोष कुमार सिंह, बरखा शर्मा,एसएस डोगरा,चित्रा फुलोरिया, सविता आनंद, अलका सिंह, देवेंद्र सिंह राजपूत, जाने माने किसान नेता नरेश सिरोही, वेक्टस समूह की निदेशक सारिका बाहेती, कृषि वैज्ञानिक प्रो.एन.के. सिंह और विभिन्न क्षेत्रों के जाने माने लोग मौजूद थे।

‘राग’ के गीतों में है समय का यथार्थ

सृजन संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में युवा कवि राम चरण ‘राग’ के गीत संग्रह ‘समय कठिन है’ का लोकार्पण हुआ

पने समय की चुनौतियों और सराकारों को गीत जैसी विधा में कहना एक कठिन काम है लेकिन राम चरण ‘राग’ ने यह काम पूरी सच्चाई व ईमानदारी के साथ किया है। उनके गीतों में अपने समय का यथार्थ तो है ही उनके अपने मन की वे बैचेनियां भी मौजूद हैं, जिनको अनुभति ू के स्तर पर प्रकट करना एक चुनौतीपूर्ण काम है और राम चरण ‘राग’ ने इस चुनौती को इन गीतों के जरिए पूरी ताकत से किया है।’ शहर के युवा कवि राम चरण ‘राग’ ने इस चुनौती को इन गीतों के जरिए पूरी ताकत से उजागर किया है।’ शहर के युवा कवि राम चरण ‘राग’ के पहले गीत संग्रह ‘समय कठिन है’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते

हुए वरिष्ठ जनधर्मी, चिंतक और कवि रामकुमार कृषक ने उक्त विचार रखे। मुख्य अतिथि के रूप में बनारस से आए वरिष्ठ कवि व संस्कृतिकर्मी परमानंद आनंद ने इस अवसर पर कहा कि ‘राम चरण ‘राग’ के गीतों में गरीबों के साथ हमदर्दी है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश है और अपने समय से दो-दो हाथ करने का माद्दा है।’ विशिष्ठ अतिथि के रूप में दिल्ली से पधारी साहित्यिक पत्रिका ‘कविकुंभ’ की संपादक श्रीमती रंजीता सिंह ‘फलक’ ने इस संग्रह को अपने समय और समाज का जीवंत दस्तावेज बताया और कहा, ‘भविष्य में उनके गीतों का फलक और विस्तृत होगा।’ विशिष्ठ अतिथि के रूप में देहरादून से पधारे पत्रकार एवं मीडियाकर्मी

जयप्रकाश त्रिपाठी ने कहा, ‘राम चरण ‘राग’ के गीत सत्ता के चरित्र का प्रतिवाद करते हैं और उसे चेतावनी भी देते हैं।’ समारोह के मुख्य वक्ता डॉ. जीवन सिंह मानवी ने गीत को आमजन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाला सशक्त माध्यम बताया और कहा कि राम चरण ‘राग’ अपने समय की विसंगतियों से पूरी तरह परिचित हैं और तभी इनके गीतों में अपने समय की कठिनाइयों को बेबाकी से चित्रण हो पाया है।’ युवा कवि डॉ. विनय मिश्र ने राम चरण राग के गीत बड़ी निडरता, ईमानदारी व सच्चाई के साथ डटकर उसका मुकाबला करते हैं, इसीलिए इनको सच के साथ खड़ा रहने वाला कवि कहा जाना चाहिए।’ इस अवसर पर दिल्ली

से पधारे भाषाविद डॉ. परमानंद झा ने राम चरण राग के गीतों की भाषा को आमजन से संवाद करती भाषा बताते हुए उन्हें एक जनधर्मी गीतकार के रूप में संबोधित किया। इस अवसर पर शहर के सभी वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकार, कलाधर्मी, समाजकर्मी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे जिनमें पद्मश्री सूर्यदेव बारेठ, महेंद्र शास्त्री, डॉ. आर सी खंडूरी, डॉ. वी के अग्रवाल, इंद्रकुमार तोलानी, डॉ. कैलाश पुरोहित, डॉ. एस.सी.मित्तल, भागीरथ मीणा, श्रीनिवास अग्रवाल, डॉ. अशोक शुक्ला, डॉ. छंगाराम मीणा, एडवोकेट हरिशंकर गोयल, मा. प्यारे सिंह, डॉ. अंशु वाजपेयी और डॉ. स्मिता मिश्रा, आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।


29 मई - 04 जून 2017

मलेशिया की लोककथा

किनारे से। उस किनारे मांस पकाया जानेवाला था। दूसरे किनारे वाली दावत में मछली। ‘मैं दावत में जा रहा हूं।’ क्लॉडपोल ने बड़ी शेखी से अपनी पत्नी से कहा। पत्नी ने पूछा, ‘जाने से पहले कुछ खाओगे नहीं?’ ‘नहीं। तुम खा लो। वह ठंडा भात तुम्हें ही मुबारक हो।’ और वह बड़ी ऐंठ के साथ नाव की तरफ चला। ‘पहले नदी के बहाव की तरफ चलता हूं। खाना कम स्वादिष्ट होगा।’ उसने अपनी तोंद पर हाथ मलते हुए, मन ही मन कहा। खाने के बारे में सोच कर उसके मुंह में पानी भर आया। जब वह नाव खोलने लगा तो देखा उस तरफ का बहाव खत्म हो गया। पानी छिछला हो गया था। वह बहाव की उल्टी तरफ जा रहा था, इसीलिए नाव खेने में उसको बड़ी मुश्किल पड़ी। वह दावत में पहुंचा तो उसकी सांस फूल रही थी। वह पहुंचा तो दूसरे मेहमान वापस जा रहे थे। दावत खत्म हो चुकी थी। घर का मालिक जल्दी-जल्दी क्लॉडपोल की ओर आया, और बहुत क्षमा मांगते हुए बोला, ‘ओह,क्लॉडपोल, मुझको क्षमा करो। हमने जितने लोगों को बुलाया था उससे ज्यादा आ गए। सारा खाना खत्म हो गया।’ वह बार-बार क्षमा मांगता रहा और अफसोस करता रहा। दुखी मन से क्लॉडपोल ने कहा, ‘कोई बात नहीं। फिर किसी दिन सही। अब मैं घर जाता हूं।’ अब क्लॉडपोल नदी के बहाव की दूसरी दिशा में चला। ‘मेरी किस्मत खराब है। खैर, दूसरी दावत में चलता हूं। मछली भी स्वादिष्ट होती है।’ फिर वह अपनी सारी ताकत लगा कर जल्दी-जल्दी नाव खेने लगा।

उस समय नदी के बहाव की दिशा बदल गई थी। उसको फिर से बहाव की उल्टी दिशा में खेना पड़ रहा था। भूख के मारे उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। इस हालत में बहाव की उल्टी तरफ नाव खेना बहुत कठिन था। उसमें जैसे कोई ताकत ही नहीं रह गई थी। जैसे-तैसे वह दावत वाले घर में पहुंचा। नाव से उतर कर वह उस घर की तरफ भागा। ‘लगता है इस बार किस्मत मेरे साथ है। लगता है मेहमान अभी हैं। खुश-खुश उसने सोचा।’ मेहमानों के साथ घर का मालिक भी बाहर आया तो क्लॉडपोल को सीढ़ियों के पास खोया-सा खड़ा पाया। वह उसकी तरफ गया और बोला, ‘मुझको बहुत अफसोस है, क्लॉडपोल। दावत खत्म हो गई। बहुत से लोग आ गए थे। सारा खाना खत्म हो गया।’ दुखी क्लॉडपोल ने पूछा, ‘थोड़ा-सा भी नहीं बचा?’ उसको इतनी ज्यादा भूख लगी थी कि उसने शर्म छोड़ कर पूछ ही लिया। भूख उससे सही नहीं जा रही थी। ‘बर्तन जैसे चाट लिए गए हैं। अफसोस के साथ सिर हिलाते हुए घर के मालिक ने कहा।’ कमजोर आवाज में क्लॉडपोल बोला, ‘कोई बात नहीं। मेरा भाग्य ही खराब है।’ क्लॉडपोल घर पहुंचा। वह थककर चूर हो गया था। कमजोरी के कारण गिरा जा रहा था। उसने अपनी पत्नी से पूछा, ‘ठंडा भात बचा है?’ थकान और भूख से बेहोश जैसे हालत हो रही थी उसकी। उसकी पत्नी ने ताना दिया, ‘मेरा ख्याल था तुम बढ़िया-बढ़िया चीजें खाकर आए हो।’ ‘हां, सुनने में बहुत बढ़िया था। लेकिन मैंने तो सिर्फ हवा खाई। जो भी हो, प्रिये, तुम्हारे जैसा खाना कोई नहीं बना सकता।’ उसकी पत्नी ठंडा भात और सूखी नमकीन मछली रसोईघर से लाई तो मुस्करा रही थी।

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जापान की लोककथा

बदकिस्मत क्लॉडपोल

को दो जगहों से न्योता आया थाक्लॉडपोल एक नदी के उस किनारे से, एक इस

लोककथा

चीनी गौरैया

क बार एक व्यापारी को छह चीनी गौरैया मिल गईं। ‘राजा के लिए यह बहुत बढ़िया सौगात होगी।’ उसने सोचा। वह जानता था कि राजा बहुत अंधविश्वासी है और हमेशा शकुनअपशकुन की चिंता में रहता है। हो सकता है छह चिड़िया देना वह अशुभ समझे। उसने एक जापानी गौरैया भी उनमें मिला दी, ताकि उनकी संख्या सात हो जाए, क्योंकि सात की संख्या शुभ है।

निमंत्रण

राजा इस असाधारण सौगात से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने चिड़ियों की बहुत प्रशंसा की और हर एक को ध्यान से देखने लगा। ‘बड़ी अजीब बात है।’ राजा ने कहा, ‘इनमें एक जापानी लगती है।’ व्यापारी को समझ में नहीं आया कि क्या कहे। वह डर गया और सिर झुका लिया, लेकिन जापानी गौरैया अपनी चोंच खोलकर बोल पड़ी, ‘महाराज, मैं दुभाषिया हूं।’

ईरान की लोककथा

क बार एक गरीब बूढ़े को एक अमीर आदमी ने दावत दी। गरीब आदमी अपने फटे-पुराने कपड़े पहन कर गया था। किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं। उसको सिर्फ बचा-खुचा खाने को दिया गया। एक सप्ताह बाद बूढ़े को उसी घर से फिर खाने का बुलावा आया। उसने किसी से बढ़िया कपड़े उधार मांगे और उन्हें पहनकर दावत में गया। वह पहुंचा तो सब मेहमानों ने उसकी बड़ी आवभगत की, मानों वह कोई बहुत बड़ा आदमी हो। भोजन के समय उसको सबसे ज्यादा सम्मान की जगह बैठाया गया। बूढ़े ने थोड़ा चावल लेकर अपने कोट की एक बांह में डाल दिया। दूसरी बांह में भुनी मुर्गी का बड़ा टुकड़ा डाला। फिर मेहमानों की तरफ देखे बिना उसने कोट की फूली हुई बांहों से कहा, ‘खाओ। मुझको जो इज्जत आज यहां मिल रही है वह तुम्हारे कारण।’


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29 मई - 04 जून 2017

अनाम हीरो रवि कृष्ण

सेवा की खाकी

डेढ़ लाख लोगों को नेत्रदान की प्रेरणा देने वाले आईपीएस अफसर रवि कृष्ण ने अब एक ऐसे गांव को गोद लिया है, जिसे लोग अपराधियों का गांव कहते हैं

खा

की वर्दी से जुड़ी छवि आमतौर पर धौंस-पट्टी या डर की मानी जाती है। पर कई ऐसे पुलिस अफसर भी हैं, जिन्होंने सुरक्षा के संकल्प के साथ जन सेवा का भी अहम कार्य किया है। रवि कृष्ण ऐसे ही एक आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्हें देखकर लोगों को डर नहीं लगता, बल्कि सेवा और सहयोग की प्रेरणा मिलती है। इन दिनों वे आंध्र प्रदेश के रायलसीमा मंडल में आने वाले कुरनूल जिले में तैनात हैं। उन्होंने वहां एक ऐसे गांव को गोद ले रखा है, जो अपनी अपराध गाथाओं के लिए कुख्यात रहा है। यह गांव है कपाटराला, जहां कुछ समय पहले तक दिन-दहाड़े लोगों की हत्या हो जाना आम बात थी। दिलचस्प है कि इस गांव के 21 लोग अब भी उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। अब रवि कृष्ण ने जरायम की इस धरती को अपराध से मुक्ति दिलाने की ठानी है। वे अपने प्रण में काफी हद तक कामयाब भी हो

रहे हैं। उनके प्रयास से जिला कलेक्टर ने 60 लाख रुपए का अनुदान स्थानीय स्कूल की इमारत बनाने के लिए दिया है। उनकी कोशिशों से गांव की सड़कें भी बनाई जा रही हैं। गांव में साक्षरता दर सुधारने के लिए भी वे दिन-रात एक कर रहे हैं। इससे पहले रवि कृष्ण नेत्रदान करने की मुहिम में जुटे थे। पिछले साल उन्होंने खुद नेत्रदान करने की शपथ ली थी। रवि कृष्ण की मुहिम के चलते अब तक करीब डेढ़ लाख लोग नेत्रदान कर चुके हैं। इस मुहिम से वे भावनात्मक तौर पर इतना जुड़े थे कि लोगों को जागरूक करने के लिए खुद ही लिखकर गाना तक गाते थे। उनका ‘कल्लनू दानम चेयी, नी चूपनू दानम चेयी’ गाना यू-ट्यूब पर वायरल है। इसका मतलब है कि ‘आंखें दान करें, रोशनी दान करें।’ कुरनूल के ब्लाइंड स्कूलों में नियमित आने-जाने के कारण रवि कृष्ण को यह गाना लिखने की प्रेरणा मिली थी।

न्यूजमेकर

भारत की बेटी ब्रिटेन में पार्षद 43 वर्षीय ब्रिटिश उद्यमी रेहाना ब्रिटेन में किसी नगर निगम वार्ड की पार्षद बनने वाली भारत में पैदा हुई पहली महिला हैं

वि

देश जाकर कामयाबी पाना भारतीयों के लिए नई बात नहीं है। इसमें जो नई और अच्छी बात है, वह यह कि भारतीय मूल के लोग अब दुनिया भर में महज कारोबारी उद्यम के क्षेत्र में ही नाम नहीं कमा रहे हैं, बल्कि वहां की व्यवस्था और प्रशासन में भी अहम स्थान बना रहे हैं। अमेरिका, अफ्रीका से लेकर

रेहाना अमीर

यूरोप के कई देशों में भारतीय मूल के लोग बजाप्ता चुनकर संसद और स्थानीय निकायों में पहुंच रहे हैं। ऐसी ही एक महिला हैं, रेहाना अमीर। 43 वर्षीय ब्रिटिश उद्यमी रेहाना ब्रिटेन में किसी नगर निगम वार्ड की पार्षद बनने वाली भारत में पैदा हुई पहली महिला बन गई हैं। चेन्नई में पैदा हुईं और पली-बढ़ी रेहाना अमीर ने सिटी ऑफ लंदन काउंटी के विंटरी वार्ड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। स्थानीय स्तर पर अपनी लोकप्रियता के कारण वह चुनाव जीत गईं और इस तरह वह सिटी ऑफ लंदन कॉरपोरेशन में चुनाव जीतने वाली भारत में पैदा हुई पहली महिला बन गईं। रेहाना ने अपनी इस कामयाबी पर कहा, ‘निर्वाचित पार्षद के रूप में मेरा फोकस सड़क, हवा की गुणवत्ता में सुधार, मानसिक स्वास्थ्य और ब्रेक्जिट वार्ता के हिस्से के रूप में तमाम तरह के कारोबारों में बेहतर प्रतिनिधित्व पर है।’ रेहाना अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लंदन के कारोबारों को बढ़ावा देना चाहती हैं।

दु

हफ्ते में दो बार एवरेस्ट विजय अरुणाचल प्रदेश की 37 वर्षीय अंशु जमसेनपा ने एक ही हफ्ते में दो बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर नया कीर्तिमान रचा है

निया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर फतह अब भारतीय महिलाओं के लिए असाधारण बात नहीं रही। पर जिस तरह उसने एक ही हफ्ते में दो बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर नया कीर्तिमान रचा है, वह वाकई दंग कर देने वाली कामयाबी है। अब तक दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर कोई महिला इतनी जल्दी दोबारा नहीं पहुंची है। अरुणाचल प्रदेश की 37 वर्षीय अंशु जमसेनपा ने 16 और 21 मई को माउंट एवरेस्ट पर पहुंचीं। इससे पहले किसी महिला का माउंट एवरेस्ट पर दोबारा पहुंचने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड सात दिनों का था। अंशु को इस बात का भी श्रेय है कि उन्होंने रेकॉर्ड 5वीं बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर फतह हासिल की। गौरतलब है कि इन दिनों हिमालय क्षेत्र में मौसम काफी खराब है और महज एक हफ्ते के अंदर माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान तीन पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी। अंशु ने इन प्रतिकूलताओं के बावजूद अगर कामयाबी पाई है, तो यह निस्संदेह बड़ी बात है। अंशु के बारे में दिलचस्प है कि वह दो बच्चों की मां हैं। नेपाल के पर्यटन मंत्रालय से सर्टिफिकेट मिलने के बाद अंशु गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड वालों से संपर्क करेंगी। ऐसा नहीं है कि अंशु

को यह कामयाबी आसानी से मिल गई। इससे पहले उन्होंने 2011 में यही रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की थी, लेकिन इसमें उन्हें तब 10 दिन लग गए थे। मौजूदा रिकॉर्डधारी चूरियम शेरपा नेपाली पर्वतारोही हैं और उन्होंने 2012 में यह उपलब्धि अपने नाम की थी।

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयक्त ु पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 24

अंशु जमसेनपा

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 24)  
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