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वर्ष-1 | अंक-28 | 26 जून - 2 जुलाई 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

05 विकास

रेल कोचः स्मार्ट और सेफ रेल यात्रा सुखद बनाने हेतु मेगा प्रोजेक्ट लांच

20 विशेष

वन और जीवन

वन महोत्सव सप्ताह पर विशेष

28 मुहिम

पानी पर फिल्म

फिल्मों के जरिए पानी की समस्या को उठाने का बीड़ा

‘डॉ. पाठक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पायनियर्स में एक’ प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह सुलभ ग्राम पहुंचे और इस दौरान सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के सामने उच्च शिक्षा के लिए टेक्निकल एजुकेशन सेंटर खोलने का प्रस्ताव रखा


02 आवरण कथा

26 जून - 2 जुलाई 2017

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह सुलभ ग्राम में डॉ. विन्देश्वर पाठक के साथ

सु

प्रियंका तिवारी

लभ परिवार के एक सदस्य के रूप में हमें स्वीकार करने के लिए मैं डॉ पाठक और सुलभ परिवार का बहुत ही आभारी हूं। मुझे यहां आकर बहुत कुछ सीखने को मिला। ये बातें प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सुलभ ग्राम में आयोजित एक कार्यक्रम में कहीं। इस मौके पर उन्होंने बच्चों की उच्च शिक्षा और व्यवसाय के लिए एक टेक्निकल एजुकेशन सेंटर खोलने का प्रस्ताव भी सुलभ प्रणेता के सामने रखा। कार्यक्रम को संबोधित करने से पहले डॉ. जितेंद्र सिंह ने सुलभ ग्राम के विभिन्न विभागों का भ्रमण किया और साथ ही सुलभ स्कूल के बच्चों और स्किल ट्रेंनिग सेंटर के कार्यकर्ताओं व परीक्षार्थियों से मुलाकात की। इसके साथ ही उन्होंने ने मथुरा से आई विधवा माताओं और राजस्थान से आई पूर्व स्कैवजर्स ें से भी मुलाकात की। सुलभ स्कूल के बच्चों ने डॉ. जितेंद्र सिंह के समक्ष गायत्री मंत्र का पाठ किया और अपना परिचय दिया। डॉ. जितेंद्र सिंह छात्रों की लगन और प्रतिभा से बेहद प्रभावित दिखे। डॉ. जितेंद्र सिंह ने सुलभ ग्राम में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आप सबसे ज्यादा लाभार्थी तो मैं हूं, क्योंकि हमें आज यहां आकर बहुत कुछ सीखने को मिला। वास्तव में मुझे यहां पहले ही आना चाहिए था, लेकिन समय की व्यस्तता के चलते मैं नहीं आ पाया। यह अपने आप में एक अद्भुत चीज है, जो बहुत से लोगों के ध्यान में नहीं आती। इसके लिए समय-समय पर हमें डॉ. पाठक को सम्मानित करने का शुभ अवसर भी मिला। माननीय प्रधानमंत्री जी के हाथों से भी पाठक जी को सम्मानित किया गया है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि डॉ. पाठक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पायनियर्स में से एक हैं। मैं यह बात सिर्फ कहने के लिए नहीं कह रहा, यह प्रमाण आधारित बात है कि जिस समय बहुत कम लोगों को देश में इस क्षेत्र की चिंता थी, ऐसे समय में डॉ. पाठक ने एक सम्मानजनक शौच व्यवस्था की चिंता की, जो अपने आप में बहुत ही सराहनीय कार्य है। 1970-80 के

डॉ. जितेंद्र सिंह सुलभ ग्राम में डॉ. विन्देश्वर पाठक के साथ वृंदावन की विधवा माताओं से मिलते हुए

एक नजर

डॉ. पाठक ने ऐसे समय में काम किया जब देश में लाखों समस्याएं थीं प्रधानमंत्री के हाथों भी डॉ. पाठक हुए सम्मानित स्वच्छता का सरकारी अभियान पहली बार बना जन अभियान

डॉ. जितेंद्र सिंह को एक लीटर पानी से ही फ्लश हो जाने वाले टू-पिट टाॅयलेट के हिस्से दिखाते हुए डॉ. पाठक

दशक से इस क्षेत्र में डॉ. पाठक ने कार्य किया, वह भी ऐसे देश में जहां लाखों समस्याएं थी। उस समय एक युद्ध समाप्त हो चुका था, दूसरे युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, ऐसे समय में एक मूल विषय की डॉ. पाठक ने चिंता की, जिसे आप फंडामेंटल मुद्दा कह सकते हैं। कभी-कभी मूल विषय से हमारा ध्यान हट जाता है या वह प्राथमिकता से छूट जाता है। डॉ. पाठक द्वारा चलाई गई इस मुहिम के बाद लोगों के ध्यान में आया कि यह मुद्दा क्या है? इसके अलावा मुझे यहां आने पर इस बात का संतोष है कि पिछले तीन वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार ने डॉ. पाठक के कार्यों को आगे बढ़ाने का काम किया है। ऐसा बहुत ही कम होता है, जब किसी देश का प्रधान राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर शौच की बात करता है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद 2014 में पहले स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से अपने भाषण में मोदी जी ने देश से स्वच्छता और शौचालय की बात की। बहुत से लोगों को अचंभा भी हुआ था कि वह बड़ी-बड़ी योजनाओं और प्रस्तावों की घोषणा करेंगे। लेकिन उन्होंने प्राथमिकता से महिलाओं के शौचालयों की बात की थी, उनकी उस बात ने देश की जनता और तमाम संस्थाओं को इतना प्रेरित किया कि देखते ही देखते लगभग 4 लाख महिला शौचालयों का निर्माण देश में हो गया। कोई ऐसा स्कूल नहीं रह गया कि जहां बालिकाओं के लिए शौचालय न हो। उसी से प्रेरित होकर मैं गडकरी जी के पास पहुंचा, क्योंकि उस समय वह इस मंत्रालय को देख रहे थे। हमने उनसे कहा कि महिला शौचालयों का निर्माण सीमावर्ती इलाकों में भी होना चाहिए।

‘पाठक जी के विस्तृत व्यक्तित्व का पता इस पूरे परिसर को देखने के बाद चलता है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार इस सरकार में स्किल मंत्रालय अलग से बनाया गया है, जिसका कांसेप्ट भी यहां पर मौजूद है’

उन्होंने कहा कि आपका प्रस्ताव बहुत ही अच्छा है। उसके बाद एक ऐसा संयोग बना कि सुलभ के साथ हमारा सहयोग कार्य इस क्षेत्र में भी बढ़ा। इस प्रकार 2014-15 से ही लगभग हम एक रिश्ते में बंध गए और मैं आपके साथ इस बात को साझा करके गर्व महसूस कर रहा हूं। जैसे शौचालयों का निर्माण यहां किया गया है, वैसा ही मुझे अपने निजी संसदीय क्षेत्र में भी डॉ. पाठक और इस संस्था के माध्यम से हमें करना है। ऐसे बहुत ही कम अवसर होते हैं जब सरकार कोई अभियान शुरू करती है तो वह उसी तक सीमित रह जाता है। जनता जो अभियान शुरू करती है वह जन अभियान बन जाता है। चाहे वह आजादी का अभियान रहा हो या कोई और 70 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब कोई अभियान सरकार ने शुरू किया और वह जन अभियान बन गया। इसी माध्यम से देश में एक नई कार्य संस्कृति के अध्याय का निर्माण हुआ है। वर्तमान सरकार ने डॉ. पाठक के कार्य के महत्व को समझा और उसे प्राथमिकता से आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इस परिसर में यदि घूम कर के देखें तो यहां शिक्षा और सीखने के लिए बहुत कुछ है। डॉ. पाठक की पहचान विश्व के पायनियर्स में से एक में है। पाठक जी के विस्तृत व्यक्तित्व का पता इस पूरे परिसर को देखने के बाद चलता है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार इस सरकार में स्किल मंत्रालय अलग से बनाया गया है, जिसका कांसेप्ट भी यहां पर मौजूद है। इसके साथ ही बालक-बालिकाओं को बिना शुल्क के उनकी प्रतिभा को समझ कर उसके हिसाब से


26 जून - 2 जुलाई 2017

सुलभ टॉयलेट म्यूजियम में प्रदर्शित विभिन्न कलाकृतियों का जायजा लेते डॉ. जितेंद्र सिंह

डॉ

सुलभ पब्लिक स्कूल में बच्चों के साथ डॉ. जितेंद्र सिंह और डॉ. पाठक

एक अनुशासित राजनेता

जितेंद्र सिंह का नाम भारतीय राजनी​ित के ऐसे राजनेताओं में शामिल हैं, जो निजी और सार्वजनिक जीवन में काफी संयत और अनुशासनप्रिय स्वभाव के रहे हैं। वे पेशे से डॉक्टर हैं पर लोकहित के कार्यों में व्यापक दिलचस्पी के कारण राजनीति के क्षेत्र में आ गए। अपने इसी स्वभाव के कारण आज न सिर्फ वे नरेंद्र मोदी सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय सहित कई मंत्रालयों के मंत्री हैं, बल्कि प्रधानमंत्री के खासे विश्वस्त भी माने जाते हैं। देश और समाज के लिए कल्याणकारी कार्यों को लेकर वे आरंभ से दिलचस्पी दिखाते रहे हैं और इसके लिए हर संभव सहयोग के लिए भी तत्पर रहे हैं। जम्मू कश्मीर में भाजपा की लोकप्रियता बढ़ाने और उसे सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में जितेंद्र सिंह का काफी योगदान रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह 2014 में सोलहवीं लोकसभा में जम्मू और कश्मीर की उधमपुर लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गए। वे फिलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय के अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष मंत्रालय के राज्यमंत्री हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह का नाम भाजपा की पहली कतार के नेताओं में शामिल है और वे पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। भाजपा की तरफ से वे जम्मू कश्मीर के लिए मुख्य प्रवक्ता भी रह चुके हैं। राजनीति में आने से पहले वह मधुमेह तथा अंतःस्राविकी के प्रोफेसर, सलाहकार तथा चिकित्सक थे। उन्होंने कुल नौ पुस्तकों की रचना की है तथा समाचारपत्रों के लिए स्तंभ लेखन भी करते हैं। वे राष्ट्रीय महुमेह समिति के पूर्व अध्यक्ष भी हैं।

परिचयनामा

उधमपुर (जम्मू और कश्मीर)

जन्म तिथि

6 नवंबर, 1956

जन्म स्थान

जम्मू (जम्मू और कश्मीर)

पिता

स्वर्गीय श्री राजिंदर सिंह

माता

श्रीमती शांति देवी

पत्नी

श्रीमती मंजू सिंह

शिक्षा

जिन पदों पर कार्य किया

वोकेशनल ट्रेनिंग देना और उन्हें आगे बढ़ाने का काम यहां किया जा रहा है, जो कि बहुत ही सराहनीय कार्य है। आज सुलभ शौचालय के कार्य को पूरी दुनिया मानने लगी है और उसे मान्यता देने लगी है। उसी प्रकार यह भी अपने आप में एक मॉडल बन कर दुनिया के सामने जल्द ही आएगा। मैंने डॉ. पाठक के सामने एक प्रस्ताव रखा है कि इस परिसर में हम 5 बजे से 7 बजे तक टेक्निकल एजुकेशन सेंटर का प्रोग्राम चलाएं। हालांकि स्पेस और इसरो हमारे सीधे संपर्क में है तो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाएंगे कि ये जो बच्चे हैं, जिन्हें आप बिना शुल्क के 12वीं तक की शिक्षा दे रहे हैं। उन्हें हम बिना शुल्क के उच्च शिक्षा के लिए ट्रेनिंग देने का काम करेंगे, जिससे उन्हें बाद में व्यवसाय के लिए कहीं भटकना ना पड़े। अभी हम इसका प्रयोग कर रहे हैं, यदि यह प्रयोग सफल रहा तो गरीब बच्चे तो क्या यहां अमीर बच्चे भी शिक्षा लेने आएंगे। इस दौर में कोचिंग सेंटरों ने जो बाजार खोल रखा है और माता-पिता के करोड़ों रुपयों को बर्बाद किया जा रहा है, उससे उन्हें छुटकारा भी मिल जाएगा। महंगी कोचिंग के लिए बच्चों के साथ ही साथ

03

डॉ. जितेंद्र सिंह को टू-पिट टॉयलेट का मॉडल भेंट करते हुए डॉ. पाठक

लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र

• मई, 2014 में सोलहवीं लोक सभा के लिए निर्वाचित • 27 मई 2014 से प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री, कार्मिक लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में राज्य मंत्री, परमाणु उर्जा विभाग में राज्य मंत्री और अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री • 27 मई 2014 से 9 नवंबर 2014 तक विज्ञान और प्राैद्योगिकी मंत्रालय तथा पृथ्वी विज्ञान में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) • 09 नवंबर 2014 से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)

सुलभ ग्राम में लोगों को संबोधित करते डॉ. जितेंद्र सिंह

आवरण कथा

एम.बी.बी.एस., एम.डी. (मेडिसिन), फैलोशिप (डायबटीज) एमएनएएमएस (डायबिटीज़ और एंडोक्रोनोलॉजिस्ट) स्टेनले मेडिकल कॉलेज, चेन्नई, तमिलनाडु और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, नई दिल्ली

प्रकाशित पुस्तकें

• 6 पुस्तकों और मोनोग्राम के लेखक • स्नात्तकोत्तर पाठ्यक्रम (मेडिसिन) की लगभग एक दर्जन पाठ्य पुस्तकों में विभिन्न अध्यायों के लेखक

दिलचस्पी

• पठन-पाठन • लेखन, समाचारपत्रों में स्तंभ लेखन • पचास-साठ के दशक के पुराने हिंदी फिल्मी गाने सुनना अभिभावकों को भी गाइडेंस की जरूरत है। क्योंकि माता-पिता भी भेड़चाल में आकर गुमराह हो रहे हैं और अपनी मेहनत से कमाई हुई राशि भी कोचिंग में खर्च करते हैं। इसके साथ ही स्टार्ट अप में भी हम आपका सहयोग करेंगे, जिससे भविष्य में इन बच्चों को व्यवसाय के लिए कहीं भटकना ना पड़े। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में यह सुविधा भी है कि अगर कोई अपना व्यवसाय खोलना चाहता है तो उसे प्रारंभिक राशि सरकार की तरफ से दिए जाने की योजना है। ये बच्चे 12वीं के बाद दुनिया की इस भीड़ में गुमराह ना हो जाएं, इसीलिए इनके बेहतर भविष्य के लिए हमारी तरफ से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस परिसर के बारे में मेरी इतनी समझ पहले नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद हमें इसके महत्व का पता चला है। वहीं सुलभ परिवार की तरफ से पीएमओ मंत्री के प्रस्ताव पर विचार करने और जल्द ही उसे लागू करने का भरोसा जताया गया और कहा गया कि सुलभ परिवार लोगों के काम आने के लिए हर दिन प्रयासरत रहता है। इसके साथ ही हम आपके सहयोग से कदम दर कदम बढ़ते जाएंगे।


04 कार्यक्रम

26 जून - 2 जुलाई 2017

‘टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने देश’ उद्घाटन एपीजे टेक्निकल यूनिवर्सिटी

लखनऊ में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के नए परिसर के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री का युवाओं से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने का आह्वान

प्र

धानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओं पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया है। देश के नवनिर्माण में वे युवाओं की भूमिका को सर्वोपरि बताते रहे हैं और ऐसा वह देश के अंदर ही नहीं, बल्कि देश के बाहर भी कहते रहे हैं। लखनऊ में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के नए परिसर के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने फिर एक बार इसी तर्ज पर युवाओं से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सुरक्षा के क्षेत्र में आज भारत को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है और इसके लिए नौजवानों को आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी की दुनिया में प्रेरणा के

लिए डॉ. कलाम से बड़ा कोई नाम नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सुरक्षा के संसाधनों को आज हमें विदेश से लाने की आवश्यकता पड़ती है, इस स्थिति को बदलना होगा। हमें उस क्षमता को हासिल करना है, ताकि जरूरी टेक्नोलॉजी और उपकरण हम देश के भीतर ही विकसित कर सकें। उन्होंने कहा कि जब भी देश के युवाओं को कुछ कर दिखाने का मौका मिला है उन्होंने उसे पूरा करके दिखाया है। अपने पहले प्रयास में कोई भी देश मंगल ग्रह पर नहीं पहुंच पाया, लेकिन भारत ऐसा इकलौता देश बना। हॉलीवुड फिल्मों से भी कम बजट में इस उपलब्धि को हासिल कर भारत ने दुनिया को दंग कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी

योग दिवस

'विश्व को जोड़ रहा योग' तीसरे विश्व योग दिवस को प्रधानमंत्री ने गंगा-जमुनी तहजीब के शहर लखनऊ में आम लोगों के साथ मनाया

वि

श्व योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं और नहीं, बल्कि लोगों के बीच जाकर योगाभ्यास करना पसंद करते हैं। पहले योग दिवस पर प्रधानमंत्री ने जहां दिल्ली में आम लोगों के साथ योग किया, वहीं दूसरे योग दिवस पर वे चंडीगढ़ में जनता के बीच थे। तीसरे विश्व योग दिवस को उन्होंने गंगा जमुनी तहजीब के शहर लखनऊ में लोगों के साथ मनाया। इस अवसर पर दुनिया भर में योग कर रहे लोगों को प्रणाम करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि योग की विशेषता है कि यह मन को स्थिर रखने में मदद करता है। किसी भी प्रकार के उतारचढ़ाव के बीच स्वस्थ मन के साथ जीने की कला

योग सीखने से मिलती है। प्रधानमंत्री ने बारिश आने पर भी लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर स्टेडियम में लोगों के योग के लिए डटे रहने पर कहा कि जीवन में योग का क्या महत्व है ये तो सबको पता है, लेकिन बारिश आ जाए तो योग मैट का छतरी की तरह भी प्रयोग हो सकता है, ये भी लखनऊ वालों ने दिखा दिया। उन्होंने कहा कि विश्व के अनेक देश जो हमारी भाषा, परंपरा, संस्कृति से परिचित नहीं हैं, लेकिन योग के कारण आज पूरा विश्व भारत के साथ जुड़ने लगा है। योग विश्व को जोड़ने में अपनी बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।

युवा पीढ़ी और वैज्ञानिकों की काबिलियत यही है कि हम एक साथ 104 उपग्रहों को छोड़ने की क्षमता हासिल कर चुके हैं। इस मौके पर नरेंद्र मोदी ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नई-नई खोज में लगे वैज्ञानिकों का आभार जताते हुए कहा कि सस्ती, कारगर और साइड इफेक्ट के बिना त्वरित उपचार करने वाली दवाओं को तैयार करने के लिए वो अपनी पूरी जिंदगी लेबोरेट्री में गुजार रहे होते हैं। वैज्ञानिकों को आधुनिक ऋषि की संज्ञा देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि मानव को किस प्रकार पीड़ा से मुक्त किया जाए वो हमेशा उस दिशा में काम कर रहे होते हैं। उन्होंने कहा कि आज मेडिकल साइंस टेक्नोलॉजी पर पूरी तरह निर्भर है, आज डॉक्टर नहीं, बल्कि मशीन बताती है कि बीमारी क्या है? उन्होंने कहा कि हेल्थ से जुड़ी नई-नई खोज देश में ही किये जाने की जरूरत है और मेडिकल उपकरणों का देश में ही निर्माण हो, ये कोशिश होनी चाहिए।

‘2022 तक सबका हो घर अपना’

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर प्रधानमंत्री आवास योजना के कुछ लाभार्थियों को सांकेतिक तौर पर प्रमाण पत्र भी दिए। उन्होंने कहा कि आजादी के 75 साल पूरे होने के अवसर पर साल 2022 तक हर गरीब अपने घर में हो, यही उनका सपना है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि घर सिर्फ घर तक सीमित नहीं हो, बल्कि उसके साथ शौचालय, बिजली-पानी और पास में

एक नजर

रक्षा के क्षेत्र में भारत को बनना होगा आत्मनिर्भर

चिकित्सा क्षेत्र में नई-नई खोजों की सराहना 2022 तक हर गरीब को घर, पीएम का सपना

बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था ये सभी सुविधाएं भी जुड़ी हों, यह सपना तभी असल में पूरा होगा। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक लाभार्थी से हुई बातचीत का भी जिक्र किया,जिन्होंने प्रधानमंत्री को घर बनने के बाद अपने यहां होने वाली शादी में आने का निमंत्रण भी दे दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सपने जब सच होने लगते हैं तो लोगों में अपने आप कुछ कर गुजरने का भाव पैदा होता है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने योग से जुड़ी कई लाभकारी बातें भी बताईं। प्रधानमंत्री ने कहा कि फिटनेस से ज्यादा वेलनेस का महत्व है। इसीलिए वेलनेस को सहज प्राप्त करने के लिए योग एक बहुत बड़ा माध्यम है। योग पर कोई सवालिया निशान नहीं है। समयानुकूल परिवर्तन होते रहे हैं। योग में उत्तरोत्तर विकास और विस्तार होता रहा है। इसीलिए मैं विश्व से योग को जीवन का हिस्सा बनाने का आग्रह करता हूं। प्रधानमंत्री ने कहा कि योग करने से आप खुद महसूस करेंगे कि आपके सुस्त पड़े अंगों में चेतना पैदा हो रही है। जिस प्रकार नमक का शरीर के लिए महत्व है, वैसे ही योग को हम अपने जीवन में स्थान दे सकते हैं। वैसे भी जीरो कॉस्ट में स्वास्थ्य प्राप्ति का आश्वासन है योग।


26 जून - 2 जुलाई 2017

विकास

05

रेल कोच अब ज्यादा स्मार्ट और सेफ रेल योजना

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल यात्रा को और सुखद बनाने के लिए एक मेगा प्रोजेक्ट लांच किया

एक नजर

रेल कोचों के कायाकल्प के लिए नई योजना

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने हाल में ही की योजना की घोषणा कोच की सेफ्टी फीचर्स को बढ़ाने पर खास जोर

मिशन रेट्रो फिटमेंट वर्ष

भा

एसएसबी ब्यूरो

रतीय रेल आधुनिकता के साथ यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिहाज से बीते तीन सालों से तेजी से नई पटरी पर दौड़ रही है। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने हाल में ही आम जनता की रेल यात्रा को और सुखद बनाने के लिए एक मेगा प्रोजेक्ट लांच किया है। इसके तहत करीब 40 हजार पुराने कोचों का कायाकल्प किया जाएगा। सरकार के इस मिशन रेट्रो फिटमेंट प्रोजेक्ट के तहत भारतीय रेलवे अपनी रेल के कोचों का न सिर्फ इंटीरियर बदलेगी, बल्कि कई प्रकार की आवश्यक सुविधाएं और सेफ्टी फीचर्स भी प्रोवाइड करवाएगी।

साथ ही एलईडी लाइट्स, ब्रांडेड फिटिंग्स, धुएं से ही बज उठने वाले अलार्म इस मिशन के तहत लगाए जाएंगे। इसे रेलवे कोच को आधुनिक बनाने का यह अभी तक का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जा रहा है। दरअसल, भारतीय रेल 40 हजार कोचों के इंटीरियर को साल 2022- 23 तक अपग्रेड करने की योजना बना रही है। इस कार्ययोजना को लागू करने पर प्रति कोच 30 लाख रुपए का अनुमानित खर्च आएगा। रेलवे का कहना है कि कोच रिहेबिलिटेशन वर्कशॉप (भोपाल) के तहत 57 कोचों का पहले ही नवीनीकरण किया जा चुका है। ये नए कोच वाराणसी-नई दिल्ली महामना एक्सप्रेस में चल रहे

कोच रिहेबिलिटेशन वर्कशॉप (भोपाल) के तहत 57 कोचों का पहले ही नवीनीकरण किया जा चुका है। ये नए कोच वाराणसीनई दिल्ली महामना एक्सप्रेस में चल रहे हैं। इन्हें 22 जनवरी 2016 को ही इस ट्रेन में लगाया गया था

2017-18 2018-19 2019-20 2020-21 2021-22 2022-23 नए व अपग्रेडेड इंटीरियर के साथ निर्माण

(18-19 से 22-23)

कुल

कोचों की संख्या 1,000 3,000 5,000 5,500 5,500 5,000 15,000

40,000

हैं। इन्हें 22 जनवरी 2016 को ही इस ट्रेन में फिट कर दिया गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत मॉड्यूलर टॉयलेट और खिड़कियों की बेहतरीन झिल्लियां भी लगाए जाएंगे। सबसे ज्यादा ध्यान सेफ्टी फीचर्स को लेकर दिया गया है। वैसे बात करें धुएं और आग को 'सूंघ' लेने वाले उपकरण की तो ये केवल नए बनाए जाने वाले एसी कोच में होंगे। नवीनीकृत कोचों में बॉयो टॉयलेट होंगे, पैसेंजर्स का पता-सूचना सिस्टम होगा, ब्रेल लिपि में साइनबोर्ड होंगे, लैपटॉप और मोबाइल चार्जिंग के प्वाइंट बढ़ाए जाएंगे। कोचों के नवीनीकरण के लिए बेहतरीन कच्चे माल का प्रयोग किया जाएगा जैसे कि पॉली कार्बोनेट एबीएस, ग्लास फाइबर जिस पर प्लास्टिक और स्टेनलेस स्टील होगा। मिशन रेट्रो फिटमेंट प्रोजेक्ट ऐसे और भी कई फीचर्स होंगे, जिससे आने वाले वर्षों में भारतीय रेल कोच सचमुच वर्ल्ड क्लास हो जाएंगे।


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पर्यावरण

26 जून - 2 जुलाई 2017

लू के थपेड़ों से झुलसेगी दुनिया

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्रीन हाउस गैसों का अगर इसी तरह उत्सर्जन होता रहा तो सदी के अंत तक दुनिया की 74 प्रतिशत आबादी को गंभीर स्थितियों का सामना करना होगा

एसएसबी ब्यूरो

लवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण इंसान के भविष्य पर दिनोदिन और गहरे सवाल खड़े होते जा रहे हैं। विश्व की तीन-चौथाई आबादी को जल्द ही भयानक लू के थपेड़ों का सामना करना पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहता है, तो हम में से कई लोगों को अपने जीते-जी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। 1980 से लेकर अब तक दुनिया के 1,900 अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग लोग गर्मी और उमस के कारण मारे गए हैं। 2010 में मॉस्को में 10,800 लोगों की गर्मी के कारण मौत हुई। 2003 में पेरिस में करीब 4,900 लोग गर्मी और उमस के कारण मारे गए। 1995 में

जानलेवा गर्मी

• 10,800 लोग मॉस्को में साल 2010 में मरे • 4,900 लोगों की जान पेरिस में साल 2003 में गई • 740 लोगों की मौत शिकागो में गर्मी और उमस से 1995 में हुई • 1,900 जगहों पर 1980 से अब तक दुनिया में हजारों की जान गई

शिकागो में गर्मी और उमस ने लगभग 740 लोगों की जान ली। शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु इतनी तेजी से बदल रही है कि इतने कम समय में बढ़े हुए तापमान के प्रति इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर नहीं हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, साल 2000 में दुनियाभर में बड़ी तादाद में लोग 20 दिन या इससे भी ज्यादा समय तक गर्मी के कारण बेहद जानलेवा स्थिति के शिकार हुए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन इसी तरह होता रहा, तो इस सदी के अंत तक विश्व के 74 फीसद लोगों को बढ़े हुए तापमान के कारण बेहद गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ेगा। सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने की हरसंभव कोशिश करने पर भी दुनिया की 47 फीसदी से ज्यादा आबादी 2100 तक घातक व जानलेवा लू का शिकार हो जाएगी। एक शोध में पाया गया कि प्राकृतिक कारणों के मुकाबले इंसानों की गतिविधियां इस दुनिया को 170 गुना तेजी से गर्म कर रही हैं। इस बढ़ती गर्मी के कारण पेड़-पौधों और जीवों की कई प्रजातियों

नासा के केपलर ने अभी तक पृथ्वी के आकार के बराबर और जीवन की संभावना से भरे जिन संभावित ग्रहों को खोजा है, उनमें से 30 की तो पुष्टि भी हो चुकी है

यही संभावना है कि ये सभी खगोलीय पिंड ग्रह ही हैं। इनमें से 10 ऐसे भी ग्रह हैं, जो बिल्कुल धरती की तरह हैं। इन दसों ग्रहों की परिस्थितियां भी धरती जैसी होने की उम्मीद जताई जा रही है। जिस तरह पृथ्वी अपने सौर मंडल में सूर्य के न ज्यादा पास है

को बहुत गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। ‘नेचर’ एक पत्रिका में छपे एक शोधपत्र का कहना है कि इस जलवायु परिवर्तन के कारण इंसानों के अस्तित्व पर खतरा गहराने लगा है। इस शोधपत्र को लिखने वाले प्रमुख वैज्ञानिक केमिलो मोरा ने कहा, 'भविष्य के लिए हमारे विकल्प तेजी से खत्म होते जा रहे हैं।' उन्होंने कहा, 'गर्म हवा के थपेड़ों से बचने के लिए हमारे पास जो विकल्प हैं, वे बेहद खराब हैं। दुनिया में अभी से ही लोगों को इन गर्म हवाओं का खामियाजा उठाना पड़ रहा है। संभावना है कि ये गर्म हवाएं जारी रहेंगी। अगर कार्बन उत्सर्जन को प्रभावी स्तर तक कम नहीं किया गया, तो स्थितियां और बदतर हो जाएंगी।' इंसानी शरीर 37 डिग्री सेल्सियस के जिस्मानी तापमान या फिर इससे थोड़े आगे-पीछे के टेंपरेचर को सहन कर सकता है। गर्म हवा के थपेड़े इंसान के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। ज्यादा उमस होने से यह स्थिति और घातक हो जाती है।

दुनिया में अभी से ही लोगों को इन गर्म हवाओं का खामियाजा उठाना पड़ रहा है। संभावना है कि ये गर्म हवाएं जारी रहेंगी। अगर कार्बन उत्सर्जन को प्रभावी स्तर तक कम नहीं किया गया, तो स्थितियां और बदतर हो सकती हैं

सौर मंडल के बाहर मिले धरती जैसे 10 नए ग्रह

मंडल के बाहर 219 स्पेसनएएजेंग्रहोंसी कोनासाखोजने सौरनिकाला है। फिलहाल

एक नजर

और न ज्यादा दूर, ऐसी ही स्थिति इन ग्रहों की भी है। सूर्य से बहुत दूर होने से ग्रह पर तापमान बहुत ज्यादा होता है, वहीं सूर्य के बहुत पास होने पर वहां बहुत ठंड होती है जिसकी वजह से पानी के तरल रूप में मौजूद होने की संभावना खत्म हो जाती है। पानी की मौजूदगी के कारण इन ग्रहों में जीवन मौजूद होने की मजबूत संभावना नजर आ रही है।

नासा ने अपने एक ट्वीट में लिखा, 'वैज्ञानिकों ने 219 नई संभावित दुनियां खोज निकाली हैं।' इन नए ग्रहों की खोज के साथ ही हमारे सौर मंडल से बाहर स्थित संभावित ग्रहों की कुल संख्या 4,000 तक पहुंच गई है। इन सभी को केपलर अंतरिक्ष दूरबीन की मदद से खोजा गया है। अपने एक बयान में नासा ने कहा, 'केपलर ने अब तक ऐसे 4,034 खगोलीय पिंडों की तलाश की है, जो ग्रह कहलाने की दावेदारी रखते हैं। इनमें से 2,335 पिंड हमारे सौर मंडल के बाहर हैं। केपलर ने अभी तक पृथ्वी के आकार के बराबर और जीवन की संभावना से भरे जिन संभावित ग्रहों को खोजा है, उनमें से 30 की तो

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से बिगड़े हालात

बढ़ती गर्मी से पेड़-पौधों और जीवों की कई प्रजातियां संकट में बढ़े हुए तापमान के प्रति इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावी नहीं

खतरे का खतरा

• 74 फीसदी आबादी सदी के अंत तक गंभीर स्थितियों का सामना करेगी • 47 प्रतिशत दुनिया की आबदी 2100 तक लू की चपेट में • 170 गुना तेजी से गर्म हो रही है दुनिया इससे इंसान के शरीर का तापमान बढ़ सकता है और उसकी जान भी जा सकती है। 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान में इंसान के शरीर का तापमान अगर घटता है, तो वह बच सकता है। पसीना बाहर निकलने से शरीर की गर्मी कम होती है, लेकिन जब उमस बढ़ जाती है तब हवा में नमी की अधिकता हो जाती है। ऐसी स्थिति में चूंकि पसीना हवा में वाष्पीकृत नहीं हो पाता, तो यह प्रक्रिया भी कारगर साबित नहीं होती। पुष्टि भी हो चुकी है।' बयान में आगे कहा गया है, 'इसके अलावा, केपलर के आंकड़ो से जुड़े नतीजों को देखने से हमें छोटे-छोटे ग्रहों के दो बड़े जमावड़े भी मिले हैं। इन दोनों खोजों का जीवन की तलाश में काफी अहम योगदान हो सकता है।' सौर मंडल के बाहर जीवन के संकेतों की तलाश में जुटे एसईटीआई संस्थान की एक वैज्ञानिक सुसेन थॉम्पसन ने बताया, 'नासा द्वारा बेहद सचेत रहकर तैयार की गई यह लिस्ट खगोलशास्त्र के एक सबसे बड़े सवाल से सीधे-सीधे जुड़ी है। और वह सवाल है कि ब्रह्मांड में हमारी धरती जैसे कितने ग्रह हैं।' (एजेंसी)


26 जून - 2 जुलाई 2017

स्टेट न्यूज

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तराजू नहीं, भरोसे से तोला जाता है सामान

गुजरात दिलचस्प

अहमदाबाद के कनुभाई पापड़ी वाले की दुकान पर बिकने वाली पापड़ी में है भरोसे का नमक

प जब भी कोई सामान खरीदते हैं तो आपकी निगाहें कहां सबसे ज्यादा टिकी होती हैं? जाहिर है आप कहेगे तराजू। क्योंकि घटतौली से बचने के लिए आज हर किसी की नजर तराजू के पलड़ों पर ही टिकी होती है। लेकिन इस देश में एक ऐसी भी दुकान है, जहां एक भी तराजू नहीं है। इस दुकान में सामान तौल कर बेचा ही नहीं जाता, बल्कि ग्राहक सामान दुकानदार के भरोसे ही खरीदते हैं। अहमदाबाद के कनुभाई पिछले करीब छह दशक से पालदी के फुटपाथ पर पापड़ी बेच रहे हैं। दूसरी दुकानों की तरह कनुभाई की भी दुकान है। लेकिन इस दुकान की सबसे खास बात यह है कि यहां अभी तक वजन तौलने के लिए तराजू का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दिलचस्प यह है कि

ग्राहकों को भी तराजू नहीं होने से कोई परेशानी नहीं है और न ही कोई शिकायत। इस दुकान से खरीदारी करने वाले ग्राहकों को कनुभाई पर पूरा भरोस है। ग्राहक यह मान कर चलते हैं कि कनुभाई उन्हें कभी धोखा नहीं दे सकते। इसीलिए ग्राहक बिना तौले ही पापड़ी खरीद लेते हैं। इस बारे में कनुभाई कहते हैं कि मेरे अंकल धरमचंद मूलचंद पालनपुरवाला काफी समय पहले एक होटल में काम करते थे। जब होटल बंद हो गया तो अंकल ने अपना कारोबार करने का फैसला लिया। उन्होंने अपनी दुकान पर तराजू नहीं रखा। मैं बस उन्हीं की इस विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं। इलाके में कनुभाई की यह दुकान इतनी लोकप्रिय है कि हर वक्त यहां ग्राहकों की कतार

देखी जा सकती है। कनुभाई के निमित ग्राहकों का कहना है कि वे इस दुकान पर सालों से पापड़ी खाने या खरीदने आते हैं, लेकिन उन्होंने कभी कनुभाई को तराजू का इस्तेमाल करते हुए नहीं देखा। दरअस्ल यहां की पापड़ी में भरोसे और विश्वास का नमक है जो इसे सबसे खास बनाती है। आपको दुकान के बाहर कोई बड़ा सा बोर्ड भी लगा नजर नहीं आएगा लेकिन यह छोटी सी

दुकान पूरे इलाके में कनुभाई पापड़ीवाला के नाम से जानी जाती है। दुकान में सामान की गुणवत्ता पर भी बहुत ध्यान दिया जाता है। खाने में बेकिंग सोडा या किसी भी दूसरे तरह के केमिकल्स का इस्तेमाल न करने की कोशिश होती है। दुकान में रोजाना तकरीबन 30 से 40 किलोग्राम पापड़ी बिकती है और अब तक उन्हें एक भी शिकायत नहीं मिली है। (एजेंसी)

गांव की ‘लाडली’

बिहार मिसाल

बिहार की लाडली बानो ने अपने दम पर परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे गांव की तस्वीर बदली

कि

संजीव कुमार

सी बड़ी पहचान या किसी बड़ी हैसियत से ही समाज या देश की सूरत नहीं बदली जाती , या कह लें महज पैसे या बड़े प्रोफाईल से ही किसी बड़े मकसद में कामयाबी हासिल करना मुश्किल है। क्योंकि एक गरीब महिला जिसने पर्दा और पाबंदियों के बीच रह कर जिस मुकाम को हासिल किया है, वहां तक पहुंचना बड़ी हैसियत वालों के लिए आसान नहीं है। परिवार और समाज की तमाम बंदिशों के बीच लाडली बानो की उड़ान आज आकाश की बुलंदियों तक पहुंच चुकी है। पटना से 35 किलोमीटर दूर मसौढ़ी की गलियां जहां वंचितों की जिंदगी कुछ साल पहले तक घिसटघिसट कर चलती थी। पर कहते हैं न कि सितम की उम्र लंबी नहीं होती। ठीक वैसे ही मुफलिसी के दौर में यहां के एक घर में लाडली बानो दुल्हन बनकर आई। तीस सालों पहले की लाडली आज यहां किसी फिल्मी हस्ती से कम चर्चित नहीं है। वजह यह है कि उससे अपनी और इलाके की दुनिया को बेहद

खूबसूरत बना दिया है। इस काम में सिर्फ उसके दो हाथ नहीं, बल्कि हजारों हाथ सहभागी हैं। गरीबी और मुफलिसी की जिंदगी जीने को मजबूर यहां के सैकड़ो परिवार को दो शाम की रोटी भी मयस्सर नहीं थी। गरीबी का रंग देख लाडली टूटी नहीं , न ही उसने बेचैनी और परेशानी से खुद को घिरने नहीं दिया। उसने हिम्मत से काम लिया। घर में फूटी कौड़ी नहीं थी ,दो शाम का निवाला कैसे जुटे यह सोचना मुश्किल भी था। लाडली ने जिंदगी से लड़ने की ठानी। उसने बांस की तीलियों से अपनी ही नहीं,बल्कि पूरे गांव की जिंदगी को संवार दी। 1983 में जब लाडली दुल्हन बनकर ससुराल आई थी तो घर पर छप्पड़ तक नहीं था। आज लाडली पक्के घर में रहती है। खुद से कभी स्लेट पेंसिल नहीं छूने वाली लाडली की चारों बेटियां स्कूल में पढ़ाई कर रही हैं। तीस साल पहले

लाडली ने पहली बार तीन रुपए का बांस खरीदा और सीक बनाने का कारोबार शुरू किया था। सीक का उपयोग कई प्रोडक्ट जैसे अगरबत्ती, कुल्फी, आइस क्रीम आदि में होता है। तीन रुपए से कारोबार शुरू करने वाली लाडली आज तीस हजार रुपए महीने में कमा रही है। लाडली ने सीक का कारोबार करने की सलाह गांव के लोगों को भी दी। लाडली

की राह पर चल कर गांव के लोग आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं। लाडली ने अपने परिवार और समाज के लिए जो कुछ किया उसकी बदौलत आज लाडली सबकी चहेती बन ही गई है। लाडली कहती हैं कि आज तक करीब तीस हजार से ज्यादा लड़कियां और महिलाएं सीक काटने और बनाने का हुनर सीख चुकी है।


08 स्वच्छता

26 जून - 2 जुलाई 2017

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

नौ माह में बनेंगे 88 हजार शौचालय

बांदा जिले में अगले नौ महीने में 88 हजार शौचालयों का निर्माण कराए जाने की तैयारी

त्तर प्रदेश के बांदा जिले में अगले नौ माह में 88 हजार शौचालयों का निर्माण कराया जाएगा। इसके अलावा प्रत्येक पंचायत सचिव को 31 जुलाई तक हर हाल में एक-एक ग्राम पंचायत को ओडीएफ करना होगा। इसके लिए सचिव, रोजगार सेवक व सफाई कर्मचारियों को प्रोत्साहन लक्ष्य भी दिया गया है। विकास भवन सभागार में शौचालय निर्माण से संबंधित बैठक डीएम की अध्यक्षता में संपन्न हुई। जिलाधिकारी डॉ.सरोज कुमार ने पंचायत सचिवों को निर्देश दिए कि प्रत्येक सचिव 31 जुलाई तक एक-एक ग्राम पंचायत को ओडीएफ कराएं। उन्होंने सचिवों, रोजगार सेवकों व सफाई कर्मचारियों को प्रोत्साहन के अंतर्गत 25-25 शौचालय निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया। निर्माण होने पर संबधि ं त कर्मचारी को डेढ़ सौ रुपए बतौर

पुरस्कार प्रति शौचालय दिया जाएगा। जिसमें निर्माण के बाद 75 रुपए व फिर छह माह बाद शेष इतनी ही धनराशि दी जाएगी। इसके अलावा 9 माह में 88 हजार शौचालय निर्माण का लक्ष्य भी निर्धारित करते हुए सचिवों से इसकी कार्य योजना तैयार मांगी गई है। मुख्य विकास अधिकारी आरके सिंह ने कहा कि जो लक्ष्य निर्धारित हुआ है उसे समय से मानक व गुणवत्ता के साथ पूरा कराया जाए। जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी और जिला समाज कल्याण अधिकारी आरडी यादव ने बताया कि बैठक में सचिवों को वृद्धावस्था व अन्य पेंशन योजना की सूची दी गई है। ताकि लाभार्थियों के आधार नंबर लिंक कराए जा सकें। इसके अलावा शौचालय की जियो टैगिंग के लिए एप डाउन लोड करने के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी दिया गया। (भाषा)

स्वच्छता की ब्रांड एंबेसडर बनेगी दिव्यांग पुनीता

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की दिव्यांग पुनीता को जिले का ब्रांड एंबेसडर बनाने का फैसला किया गया है

सुराल में शौचालय बनने पर ही पिया के घर जाने वाली पुनीता अब जिला प्रशासन की ब्रांड एंबेसडर होंगी। जिलाधिकारी ने इसको लेकर अधिकारियों को निर्देश भी दे दिया है। अब पुलिस स्वच्छता को लेकर लोगों को जागरूक करते हुए नजर आएगी। फिलहाल पुनिता अपने गांव में शौचालय बनवाने के लिए महिलाओं को जागरूक कर रही हैं। दिव्यांग पुनीता के इस कदम का स्वागत करते हुए उन्हें सम्मानित करने का भी जिला प्रशासन ने निर्णय लिया है। सलेमपुर विकास खंड के ग्राम श्रीराम कोड़रा निवासी मुसाफिर पीआरडी जवान हैं। पत्नी के निधन के बाद जुलाई 2016 में पथरदेवा विकास

स्वच्छता झारखंड

डीसी व एसपी ने थामी झाड़ू स्वच्छता के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए गुमला के डीसी और एसपी ने की समाहरणालय और सड़क की सफाई

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

50,194 घरों में बनेंगे शौचालय उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के पचास हजार से ज्यादा घरों में शौचालय बनवाने की तैयारी

री जिले के हर घर में वर्ष 2019 तक मैनपुशौचालय बनाने का लक्ष्य है। खुले में कोई भी

शौच न करे इसके लिए कार्ययोजना तैयार की गई है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में 50,194 घरों में शौचालय बनाए जाएंगे। विभाग को इसके लिए धन का आवंटन होते ही ही शौचालय बनवाने का काम शुरू कर दिया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन के तहत दो अक्तूबर 2019 तक जिले को खुले में शौच से मुक्त कराया जाना है। इसके लिए हर घर में शौचालय बनवाने का प्रस्ताव है। इसी के तहत जिले में भी इसी समय सीमा के अंदर हर घर में शौचालय बनवाए जाएंगे। इसके लिए पंचायत राज विभाग ने पहल भी शुरू कर दी है। ग्राम प्रधानों से प्रस्ताव मांगने के साथ ही विभाग द्वारा भी सर्वे भी कराया गया है। 50,194 घरों में शौचालय

बनाए जाने की पूरी कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। जिले के चिन्हित 50,194 घरों में शौचालय बनाए जाने के लिए विभाग ने केंद्र सरकार से 60 करोड़ 23 लाख 28 हजार रुपये की मांग की है। इसके लिए केंद्र सरकार को मांग पत्र भेजा गया है। मैनपुरी जिले में करीब तीन लाख परिवार हैं। इनमें से डेढ़ लाख परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। इनको चिन्हित करने के बाद इन घरों में शौचालय बनाने की योजना है। सरकारी धन से शौचालय बनवाने की योजना के बाद भी जागरुकता काम आ रही है। कई परिवारों ने जागरुकता के चलते सरकारी योजना का लाभ लेने की जगह खुद ही शौचालय बनवाए हैं। ग्राम ललूपुर में 50, अजीतगंज में 75 और परिगवां में 60 परिवारों ने खुद शौचालय बना लिए हैं। (भाषा)

खंड के बघड़ा महुआरी निवासी दिव्यांग पुनीता से उसने शादी रचा ली और नवंबर में गौना कराने के लिए दिन भेजा, लेकिन पुनीता ने ससुराल में शौचालय न होने के चलते ससुराल जाने से इंकार कर दिया। अब ससुराल में शौचालय बना है, तब दिव्यांग पुनीता अपने ससुराल गई हैं। इस खबर के बाद जिलाधिकारी सुजीत कुमार ने पुनीता को स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर बनाने व दिव्यांग पुनीता के इस कदम का स्वागत करते हुए उन्हें सम्मानित करने का भी निर्णय लिया है। पंचायत राज अधिकारी पीके यादव ने कहा कि इससे संबधि ं त आदेश खंड विकास अधिकारी को दिया गया है। (भाषा)

झा

रखंड के गुमला जिले में समाहरणालय जाने वाले मार्ग का नजारा कुछ और ही था। जिले के उपायुक्त श्रवण साय व एसपी चंदन झा हाथों में झाड़ू लिए परिसर और सड़क की सफाई में जुटे थे। इस सफाई अभियान में जिला और पुलिस प्रशासन के कई अधिकारी, कर्मचारी व पुलिस के जवान भी शामिल हुए। केंद्र सरकार के स्वच्छता अभियान के शिथिल पड़े कार्य को उपायुक्त व एसपी ने सफाई अभियान में शामिल होकर गति प्रदान करने का काम किया। समाहरणालय परिसर, समाहारणालय जाने

वाला मार्ग व उपायुक्त के आवासीय परिसर की साफ-सफाई की गई। इस दौरान कचरे को एक जगह जमा किया गया। उपायुक्त ने कहा कि अपने आसपास के वातावरण को साफ व स्वच्छ रखना हम सबकी जिम्मेवारी है। साफ-सफाई से तन और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं तथा दिनचर्या खुशनुमा होती है। उन्होंने लोगों से अपने आवासीय परिसर के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी नहीं फेंकने एवं परिसर की सफाई में अपना भी योगदान देने की बात कही। एसपी चंदन झा ने इस दौरान कहा कि साफ-सफाई से आसपास का वातावरण शुद्ध होता है। वहीं इस तरह के कार्य से एक प्रकार का व्यायाम भी होता है जो मनुष्य के शरीर को चुस्ती प्रदान करता है। उन्होंने सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए सभी से सफाई अभियान में भाग लेने एवं इसके लिए एकदूसरे को जागरूक करने का काम करने की बात कही। (भाषा)


26 जून - 2 जुलाई 2017

स्वच्छता मिसाल

दे

स्वच्छता का सिपाही

उत्तर प्रदेश के मेरठ में जितेंद्र गुप्ता स्वच्छता के सिपाही के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने जिले में अब तक करीब डेढ़ हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है

देश को स्वच्छ बनाने के लिए भारत भ्रमण पर निकले हुगली के जयदेव राउत आठ राज्यों का सफर पूरा कर दिल्ली पहुंचे

सड़कों और सार्वजनिक स्थलों को भी साफ-सुथरा रखें। कूड़ा-कचरा कूड़ेदान में ही डालें, पान-गुटका थूककर गंदगी न करें तथा जहां -तहां मल-मूत्र न करें। स्वच्छता के इस सिपाही का कहना था कि यदि देश का हर नागरिक अपनी छोटी-छोटी आदतें सुधार लेगा तो हमारा देश भी पश्चिमी देशों की तरह चमचमाने लगेगा। राव ने बताया कि उनके इस अभियान का कोई प्रायोजक नहीं है। उनके मिशन से खुश होकर रास्ते में लोग उन्हें खाना खिला देते हैं। रात वह धार्मिक स्थलों पर गुजार लेते हैं। अगली सुबह वे फिर साइकिल से आगे की यात्रा पर निकल जाते हैं। रोजाना 50 से 60 किलोमीटर की दूरी तय करके वह ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और राजस्थान होते हुए दिल्ली पहुंचे। यात्रा में आने वाली कठिनाइयों पर राव ने कहा कि देश सेवा के इस महान यज्ञ में वह छोटी सी आहूति दे रहे हैं। यदि उनके इस अभियान से चंद लोग भी साफसफाई के लिए प्रेरित होते हैं तो वह अपना अभियान सफल मानेंगे। (एजेंसी)

राकेश ओमप्रकाश मेहरा की नई मुहिम झोपड़ियों में शौचालय बना रहे हैं जहां वह शूटिंग कर रहे हैं। राकेश अपनी अगली फिल्म 'मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर' को घाटकोपर की एक झुग्गी बस्ती में फिल्मा रहे हैं। ऐसे में जिन झुग्गियों को बृहन मुंबई नगर निगम (बीएमसी) से एनओसी मिल गई है, वहां वे शौचालयों का निर्माण करने जा रहे हैं। राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अब अगले 4 सालों में 800 टॉयलेट बनाने का टारगेट रखा है। 'रंग दे

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रत सरकार स्वच्छता मिशन को लेकर तमाम योजनाएं चला रही है। लेकिन मेरठ में सरकारी योजना से ज्यादा एक अकेले व्यक्ति ने कर दिखाया। मेरठ में इस मिशन को आगे बढ़ाने में उद्यमी जितेंद्र गुप्ता भी अपने बूते जुटे हैं। जितेंद्र पिछले दो साल में जनपद के नौ गांवों में 1500 से ज्यादा शौचालय बनवा चुके हैं। जितेंद्र केवल शौचालय ही नहीं बनवाते हैं, बल्कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरुकता लाने के प्रयास में भी जुटे हैं। साकेत निवासी जितेंद्र गुप्ता ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद स्वच्छ भारत मिशन की घोषणा की तो दिल में आया कि इस दिशा में काम किया जा सकता है। 2015 में उनके पिता स्व. शारदा प्रसाद की जन्मशताब्दी थी। ऐसे में उन्होंने अपने पिता और माता के नाम पर बनाए शारदा प्रसाद शकुंतला देवी मेमोरियल फाउंडेशन के जरिए इस दिशा में काम करने की सोची। इस दौरान पता चला कि मवाना रोड स्थित ग्राम भूड़पुर में स्वच्छ शौचालय की आवश्यकता है। ग्राम भूड़पुर में

2015 में जितेंद्र कुमार गुप्ता ने 96 शौचालयों का निर्माण कराया। इसके बाद यह सफर लगातार जारी है। अब तक वह खिर्वा नौआबाद, माछरा, नंगली अब्दुला, कासमपुर, सुरानी, खासपुर, रजपुरा और सिखैड़ा में शौचालय निर्माण करा चुके हैं। सिखैड़ा में 200 शौचालय बन चुके हैं और 200 का निर्माण चल रहा है। इसके अलावा जितेंद्र कुमार ने भूड़पुर गांव में दो आरओ वॉटर प्लांट भी लगवाए हैं। जबकि कस्तला और औरंगाबाद में इन पर काम हो रहा है। स्वच्छता अभियान मिशन में जुटे जितेंद्र गुप्ता के मन में एक टीस भी है। उनका कहना है कि सरकार चाहे कितना भी प्रयास कर ले, लेकिन जब तक जनता खुद नहीं चाहेगी, तब कि स्वच्छता मिशन पूरा नहीं हो सकता है। जितेंद्र गुप्ता कहते हैं कि उनके द्वारा अब तक करीब 1500 शौचालय बनवाए गए हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे लोगों के भी बने हैं, जो स्वयं इतना खर्च उठाकर शौचालय बना सकते थे। इसके साथ ही कई परिवार ऐसे भी सामने आये, जिनके यहां शौचालय बनने के बाद भी वह उनका प्रयोग नहीं कर रहे हैं, इससे दुख होता है। (एजेंसी)

स्वच्छता मिसाल

फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा अगले चार सालों में आठ सौ शौचालयों का निर्माण कराएंगे

की कमी पर फिल्म बना रहे निर्देशक शौचालय राकेश ओमप्रकाश मेहरा वास्तव में उन

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स्वच्छता पहल

स्वच्छता के लिए साइकिल से भारत भ्रमण श को स्वच्छ बनाकर विश्व में नई पहचान दिलाने के लिए गली-गली, कूचे-कूचे में साफ-सफाई को लेकर जागरुकता पैदा करने के मकसद से एक व्यक्ति साइकिल से भारत-भ्रमण मिशन पर निकला है। पश्चिम बंगाल के हुगली की चाम्पदानी जूट मिल में काम करने वाले 47 वर्षीय जयदेव राउत राव देश को साफ-सुथरा करने का मिशन लेकर 26 फरवरी को हुगली से रवाना हुए। तपती गर्मी में रात-दिन साइकिल का पैडल चलाते हुए वह आठ राज्यों की यात्रा पूरी करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंचे। उनकी साइकिल में तिरंगे के साथ एक बैनर लगा है जिस पर लिखा है, ऑल इंडिया एक्सप्लोरेशन पैडल फोर स्वच्छ भारत। उनकी टी शर्ट पर भी स्वच्छ भारत मिशन लिखा है। राव ने बताया कि उनका एक ही मिशन है। वह साफ-सुथरे देश के रूप में भारत को विश्व में नयी पहचान दिलाना चाहते हैं। राव चाय की दुकान या ढाबे पर रुककर लोगों से आग्रह करते हैं कि वे अपने घर की तरह गलियों,

स्वच्छता

बसंती' और 'भाग मिल्खा भाग' जैसी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध राकेश ओम प्रकाश मेहरा, पिछले चार सालों से एनजीओ ‘युवा अनस्टॉपबल’ के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका योगदान ‘सागर में एक बूंद’ की तरह भी नहीं है। उन्होंने कहा, ' हम सिर्फ शौचालय का निर्माण कर वहां से चले नहीं जाते, बल्कि हम यह भी ध्यान रखते हैं कि स्थानीय लोग सही से उसकी देख-रेख भी करें। हम क्षेत्र के झुग्गीझोपड़ियों और नगरसेवकों के साथ बैठक कर रहे

हैं, जिसमें हम उन्हें एक रुपया दान देने के लिए कह रहे हैं, ताकि समुदाय के कर्मचारियों को उनके बकाया दे सकें। साबरमती आश्रम में गांधी के आदर्श शौचालयों से प्रेरित हो कर 4 सालों में 800 शौचालयों का निर्माण करने का मन बना चुके मेहरा ने कहा कि नए शौचालय प्राइवेट इमारतों जितने अच्छे हैं। उचित पाइपलाइन और एक्सटेंशन नल के साथ लोग स्वच्छ पेयजल भी प्राप्त कर सकते हैं। झुग्गी निवासियों के पास टीवी सेट और मोबाइल फोन तो हैं, लेकिन कोई शौचालय नहीं है और ऐसे में मॉनसून के दौरान रेलवे ट्रैक पर शौच करने पर लोग मजबूर हो जाते हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा इन दिनों पवई झील के पीछे एक झुग्गी बस्ती में शूटिंग कर रहे हैं। उनकी फिल्म मुंबई की झोपड़ी में रह रहे चार बच्चों के चारों ओर घूमती है। उनमें से एक बच्चा

अपनी मां के लिए शौचालय बनाना चाहता है और इसके लिए प्रधानमंत्री से अपील करता है। मेहरा के लिए सबसे बड़ी बाधा यह थी कि शहर की झोपड़ियां बीएमसी के स्वामित्व वाली अनधिकृत भूमि पर बनाई गई हैं और इसीलिए वे कानूनी रूप से वहां शौचालय नहीं बना सकते थे, क्योंाकि वहां न तो पाइपलाइन थी और न ही पानी। (एजेंसी)


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26 जून - 2 जुलाई 2017

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

'टॉयलेट' एक विवाह कथा बुलंदशहर की युवती ससुराल में शौचालय बनने के बाद ही शादी के लिए तैयार हुई

त्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गांव वेदरामपुर की एक युवती ने अपने होने वाले पति के सामने शौचालय बनवाने की शर्त रख दी। युवती ने साफ कह दिया कि शौचालय नहीं तो शादी नहीं। लड़के के पिता की गुहार पर ग्राम प्रधान ने शौचालय बनवा दिया, जिसके बाद लड़की शादी के लिए तैयार हुई। 19 जून को दोनों की शादी हो गई। स्वच्छ भारत अभियान में अब ग्रामीण बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। एक जून को पहासू क्षेत्र के गांव वेदरामपुर निवासी दिनेश पाल के बेटे का रिश्ता अतरौली क्षेत्र के एक गांव की युवती के साथ तय हो गया था। इस दौरान शादी 19 जून को होनी तय हुई थी। शादी से एक सप्ताह पूर्व लड़की को पता चला कि उसकी ससुराल में शौचालय नहीं है। इस पर लड़की ने लड़के के सामने घर में शौचालय होने पर ही शादी करने की शर्त रख दी। कह दिया कि अगर शौचालय नहीं बना तो वह शादी नहीं करेगी। यह बात लड़के ने अपने पिता को बताई। आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होने के कारण

लड़के के पिता ने ग्राम प्रधान से शौचालय बनवाने की गुहार लगाई। इसके बाद ग्राम प्रधान मनु प्रताप ने प्रस्ताव पारित कराकर दिनेशपाल के घर शौचालय बनवाने की स्वीकृति दे दी और शादी की नियत तिथि से पांच दिन पहले ही शौचालय बनवा गया। जब लड़के ने शौचालय बनने की बात लड़की को बताई तो वह शादी के लिए तैयार हो गई। यह बात क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। याद रखें कि इसी विषय पर अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म टायलेट एक प्रेम कथा जल्दी ही रिलीज होने वाली है। (भाषा)

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

बहुओं को मिलेगा शौचालय का उपहार

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

मौजूद रहे। पंचायत में यह तय किया गया कि गांव में किन-किन युवकों की शादी तय हो चुकी है और शादी की तारीख क्या है इसका पूरा ब्योरा जुटाया जाएगा। इसके बाद यह देखा जाएगा कि इसमें से कितने लोग हैं जो खुद शौचालय बनवाने में सक्षम हैं। ग्राम पंचायत उनके घर जाकर शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करेगी। खुले में शौच जाने से महिलाओं, बेटियों को होने वाली दिक्कतों और फैलने वाली बीमारियों के बारे में बताएगी। प्रधान ने बताया कि घर की महिलाओं को शामिल करके घर में शादी से पहले शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसके अलावा जो लोग शौचालय बनवाने में सक्षम नहीं हैं उनके घरों में पंचायत शौचालय बनवाएगी। जिससे आने वाली बहू को बाहर शौच न जाना पड़े। (भाषा)

स्वच्छ भारत अभियान में दिव्यांग भी बढ़-चढ़ कर सहयोग कर रहे हैं

त्तर प्रदेश के ऐटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन को लेकर लोगों में जागरुकता बढ़ने लगी है। घर में अगर शौचालय नहीं है तो महिलाएं भी शौचालय निर्माण की जिद करने लगी हैं। ऐसा ही मामला जिले के मारहरा ब्लाक के गांव रामई में सामने आया। घर में शौचालय नहीं था तो बहू ने शौचालय के लिए बाहर जाने से इंकार कर दिया। इस पर ससुर सुरेश ने बहू की बात को सही मानते हुए पैसे न होने के बाद बावजूद बकरियां बेचकर घर में ही शौचालय बनवा दिया। नेत्रहीन सुरेश की इस पहल को प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक कार्यक्रम के दौरान भी मंच से सराहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले को ओडीएफ करने की कवायद चल रही है। जहां एक ओर प्रशासन गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक कर रहा है, वहीं दूसरी ओर खुले में शौच के प्रभावों को जानकर लोग खुद ही पहल कर रहे हैं। मारहरा ब्लॉक के गांव रामई निवासी नेत्रहीन बुजुर्ग 60 वर्षीय सुरेश के घर में शौचालय नहीं था। सुरेश के साथ सेवा के लिए उनका भतीजा रहता है। दोनों लोग खुले में ही शौच जाते थे। करीब एक साल पहले सुरेश के भतीजे की शादी गांव धुआई की शिवानी से हुई। शिवानी जब ससुराल आई, तो पहले उसने अपने पति से खुले में शौच जाने से मना किया।

पति ने बात को अनसुना किया, तो उसने अपने नेत्रहीन ससुर सुरेश को पीड़ा बताई। पहले तो सुरेश ने भी आर्थिक समस्या होने के कारण मना कर दिया। मगर एक दिन सुरेश ने टीवी पर अमिताभ बच्चन का स्वच्छ भारत मिशन का दरवाजा बंद विज्ञापन सुना तो उनकी सोच बदली। उन्होंने अपनी दो बकरियों को बेचा और घर में शौचालय बनवाया। पिछले दिनों गांव में ट्रिगरिंग करने पहुंची स्वच्छ भारत मिशन की टीम को जब यह जानकारी हुई, तो उन्होंने सुरेश से बात की। सकीट ब्लॉक के गांव फफोतू निवासी दिव्यांग छोटेलाल ने कर्ज लेकर शौचालय बनवाया। घर की महिलाओं को खुले में शौच जाने में दिक्कत होती थी। पिछले दिनों टीम गांव पहुंची, तो समन्वयक बृजमोहन ने छोटेलाल को समझाया। इसके बाद उन्होंने गांव के लोगों से कर्ज लेकर शौचालय का निर्माण कराया। छोटेलाल का भी उप मुख्यमंत्री अभिनंदन किया एवं उन्हें प्रशस्ति पत्र भी दिया। (भाषा)

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

लखीमपुर खीरी की पंचायत का फैसला दूसरे गांवों और पंचायतों के लिए एक मिसाल है

त्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बिजुआ ब्लॉक की ग्राम पंचायत असाढ़ी गांव में आने वाली हर नई बहू को नेग में शौचालय देगी। गांव में हुई पंचायत की बैठक में पंचायत ने इसका निर्णय लिया है। गांव में कितने युवकों की शादी कब है इसका ब्योरा पंचायत एकत्र करेगी। शादी आने से पहले जिस घर में नई बहू आनी है उस घर में शौचालय बनवाया जाएगा। पंचायत की तरफ से नई बहुओं को शौचालय का उपहार दिया जाएगा। असाढ़ी गांव में ग्राम प्रधान जसवंत कौर की अध्यक्षता में पंचायत आयोजित की गई। इस पंचायत में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया कि अब गांव में जिन घरों में नई बहुएं आएंगी उन घरों में बहू के आने से पहले शौचालय बनवाया जाएगा। बैठक में ग्राम विकास अधिकारी ज्ञानेन्द्र सिंह भी

बहू की जिद से बनवाया शौचालय

हर पंचायत में एक मॉडल शौचालय

बांदा जिले के हर पंचायत में एक टू पिट पोर-फ्लश मॉडल शौचालय बनाए जाएंगे

त्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्वच्छता कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अब ग्राम पंचायतों में टू पिट पोर-फ्लश मॉडल शौचालय बनाए जाएंगे। साथ ही प्रशिक्षित 50 मास्टर राजमिस्त्रियों को प्रशिक्षण के लिए मास्टर मेसन के रूप में नामित किया जाएगा। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ (ग्रामीण) के अंतर्गत टू पिट शौचालय तकनीक को प्रदर्शित किया जाना है। ताकि राज्य मिस्त्रियों को बेहतर ढंग से प्रशिक्षित किया जा सके। इस संबंध में मिशन निदेशक ने डीएम, सीडीओ व डीपीआरओ को पत्र भी जारी किया है। जिसमें कहा गया है कि जनपदों में पूर्व में प्रशिक्षित 50 मास्टर राज मिस्त्रियों को प्रशिक्षण के लिए मास्टर मेसन के रूप में नामित किया जाएगा जिनकी देखरेख में चिन्हित ग्राम पंचायतों में कम से

कम एक टू पिट पोर-फ्लश मॉडल शौचालय का निर्माण कराया जाना है। अन्य राजमिस्त्रियों को भी इस तकनीक से दक्ष बनाया जाएगा जो गांव में निवास करते हैं। इसके अलावा 50 मास्टर मेसन को दो-दो बैच में विभाजित कर कम से कम 25 टीमें बनेंगी। टू पिट पोर-फ्लश मॉडल शौचालय का निर्माण ग्राम पंचायतों में इसके लिए उपलब्ध धनराशि से होगा। प्रदर्शन में इस बात पर बल दिया जाएगा कि सेप्टिक टैंक शौचालय की तुलना में दो गड्ढे वाला टू पिट पोर-फ्लश शौचालय सुरक्षित एवं सस्ता है। प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखने एवं मास्टर मेसन्स व राज्य मिस्त्रियों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए प्रत्येक बैच में एक तकनीकी अधिकारी और कर्मचारी को पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया जाएगा। (भाषा)


26 जून - 2 जुलाई 2017

स्वच्छता भारतीय रेल

मस्तीपुर रेल मंडल के विभिन्न स्टेशनों से सफर करनेवाले यात्रियों के लिए अच्छी खबर है। रेल मंत्रालय ने मंडल के समस्तीपुर मुख्यालय समेत 15 स्टेशनों के प्लेटफॉर्म पर अतिरिक्त शौचालय के निर्माण की स्वीकृति प्रदान कर दी है। इस योजना पर करीब एक करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। मुख्यालय से हरी झंडी मिलते ही मंडल प्रशासन ने शौचालय निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। शौचालय स्टेशन के प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर बनाए जाएंगे ताकि, स्टेशन पर रात गुजारने वाले यात्रियों को परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े। योजना के तहत समस्तीपुर जंक्शन के सातों प्लेटफार्म पर दोनों तरफ कुल 14 शौचालायों का निर्माण कराया जाएगा। बता दें कि वर्तमान स्थिति में स्टेशन पर सिर्फ एक पे एंड यूज टायलेट है, जहां सभी यात्री

प्लेटफार्म पर सामान छोड़कर नहीं पहुंच पाते हैं। प्लेटफार्म पर शौचालय बन जाने से यात्री सामान की सुरक्षा के साथ शौचालय का उपयोग कर पाएंगे। बताया जा रहा है कि दरभंगा स्टेशन के तीनों प्लेटफार्मों पर छह शौचालयों का निर्माण कराया जाएगा। रेलवे सूत्रों ने बताया कि मंडल के ए वन दरभंगा स्टेशन के अलावा ए क्लास स्टेशनों में समस्तीपुर के अलावा सहरसा, मधुबनी, मोतिहारी, जयनगर, रक्सौल, सुगौली, बेतिया व नरकटियागंज तथा बी क्लास स्टेशनों में बगहा, चकिया, सकरी और सीतामढ़ी स्टेशन के विभिन्न प्लेटफार्मों पर अतिरिक्त शौचालयों का निर्माण कराया जाएगा। (भाषा)

स्वच्छता बिहार

2019 तक बनेंगे चार लाख शौचालय

स्वच्छ भारत मिशन व लोहिया योजना के तहत बिहार के बांका जिले में चार लाख शौचालय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है

स्व च्छलोहियाभारत मिशनस्वच्छताव

योजना के तहत जिले में करीब चार लाख शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य तय किया गया है। जारी वित्तीय वर्ष में करीब 25 फीसदी लक्ष्य पूरा कर लिया गया है। योजना को गति देने के लिए प्रतिदिन दिशा-निर्देश जारी किया जा रहा है। जिला से लेकर प्रखंड समन्वयक तक की टीम को शौचालय निर्माण में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने का डीडीसी ने कड़ा निर्देश दिया है। पूर्व में कई पंचायत पूर्ण रूप से खुले में शौच मुक्त हो चुके

हैं। जिला प्रशासन का लक्ष्य है कि 2019 तक जिले को पूर्ण रूप से खुले में शौच से मुक्त करा दिया जाए। इसके लिए खास-तौर से ग्रामीण इलाकों में जन-जागरुकता लाकर योजना को अमली-जामा पहनाया जा रहा है। जिले के डीएम ने सभी सरकारी कर्मियों को जून तक अपने-अपने घरों में शौचालय निर्माण के निर्देश दिए हैं और साथ ही यह भी कहा है कि शौचालय निर्माण नहीं करने की स्थिति में उनके वेतन पर रोक लगा दी जाएगी। (भाषा)

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स्वच्छता मध्य प्रदेश

स्टेशनों पर बनेंगे अतिरिक्त शौचालय

रेल मंत्रालय ने समस्तीपुर मंडल के ए और बी क्लास स्टेशनों पर यात्रियों की सुविधा के लिए अतिरिक्त शौचालयों के निर्माण को मंजूरी दी है

स्वच्छता

हर गांव में बनेंगे सामुदायिक शौचालय

मध्य प्रदेश के गांवों में नगर निगम की तर्ज पर सामुदायिक शौचालयों का निर्माण किया जाएगा

ध्य प्रदेश के गांवों में अब नगर निगम की तर्ज पर बने सामुदायिक शौचालय नजर आएंगे, इसकी शुरुआत प्रदेश के 9 जिलों से की जा रही है। इन जिलों में 148 सामुदायिक शौचालयों का निर्माण किया जाएगा, जिसकी अनुमानित लागत 2 करोड़ 96 लाख आंकी जा रही है। प्रदेश के जबलपुर संभाग से सिर्फ नरसिंहपुर-सिवनी जिले को शामिल किया गया जिसकी 6 पंचायतों में सामुदायिक शौचालय

निर्माण के निर्देश

• सामुदायिक शौचालय पर्यावरण सुरक्षा, स्वच्छता के तहत बनाए जा रहे हैं • नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान प्रथम प्राथमिकता के आधार पर मिली स्वीकृति • सामुदायिक स्वच्छता परिसर का निर्माण बाढ़ प्रभावित/जल भराव वाले क्षेत्रों में नहीं होगा। • केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश के अनुरूप होगा निर्माण कार्य • शौचालय से निकलने वाला अपशिष्ट नदी या खुले में प्रभावित न हो इसका ध्यान रखना होगा • गर्भवती महिलाएं और बच्चे आदि शौचालय का उपयोग सुगमता से करें इसे ध्यान में रखकर करना होगा निर्माण

बनाएं जाएंगे। 9 जिलों में सफल प्रयोग के बाद और अन्य जिलों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण शुरू किया जाएगा। हालांकि इसके लिए जिलों को प्रस्ताव भेजना होगा। केंद्र सरकार के निर्देश पर तैयार हुए प्रस्ताव के तहत सामुदायिक शौचालय में महिला-पुरुष के लिए अलग-अलग प्रसाधन कक्ष, स्रान, मूत्रालय, हाथ धोने के लिए वॉश बेसिन का निर्माण किया जाएगा। भोपाल में आयोजित हुई राज्य स्तरीय योजना समिति की बैठक में टीकमगढ़, सीहोर, मुरैना, सिवनी, रीवा, मंदसौर, अलीराजपुरा, रायसेन और नरसिंहपुर जिले से सामुदायिक शौचालय निर्माण के लिए प्रस्ताव भेजा है। बताया जा रहा है कि सामुदायिक शौचालय निर्माण उन्हीं जिलों में संभव हो सकेगा जहां के प्रस्ताव ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को प्राप्त होंगे। प्रस्ताव भेजने वाले जिलों में सबसे पहले सामुदायिक शौचालय का निर्माण का खाका तैयार कर निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा। (भाषा)

स्वच्छता राजस्थान

बच्चों की कॉपी में लगेंगी स्वच्छता की मुहर

राजस्थान के कोटा में शौचालय निर्माण के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए बच्चों की कॉपी का इस्तेमाल किया जाएगा

और स्वच्छता के कोटालिएमें प्ररितशौचालयकरने बनवाने के उद्देश्य से बच्चों की

कॉपियों में शौचालय रहित और कंचन घर की मुहर लगाई जाएगी। शौचालय बनवाने के लिए जिला परिषद अब शिक्षा विभाग के माध्यम से स्कूलों में बच्चों को प्रेरित कर स्कूलों में यह अभियान शुरू करेंगी। इस अभियान के तहत जिन बच्चों

के घरों में टॉयलेट बने हुए हैं उनकी कॉपियों पर कंचन घर और जिनके नहीं बने हैं उनकी कॉपियों पर शौचालय रहित की मुहर लगाई जाएगी। जिला परिषद सीईओ जुगल किशोर मीणा का कहना है कि नए सेशन से स्कूल में 19 जून से इस संबंध में शौचालय को लेकर जागरुकता का संदेश दिया जाएगा। (भाषा)


12 जंेडर

26 जून - 2 जुलाई 2017

शौचालय की कमी से संक्रमण का खतरा महिला स्वास्थ्य

शौचालय की कमी और उसकी गंदगी से महिलाओं को यूटीआई संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा होता है

र घर शौचालय हो और हर कोई इसका इस्तेमाल भी करे। केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें ही नहीं, बल्कि स्वच्छता के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं से लेकर समाज का एक बड़ा तबका इसके लिए प्रयासरत है। क्योंकि इससे न सिर्फ विकास का रास्ता आसान होगा, बल्कि इससे लोगों की सेहत भी बेहतर होगी। हाल ही में जारी हुई फिल्म टॉयलेट एक प्रेमकथा के प्रोमो में भी इस बात को दिखाया गया है कि महिलाओं को खुले में शौच जाने पर किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शौचालय का न होना और गंदा होना दोनों ही कई बीमारियों को न्योता देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों व शहरों में काम करने वाली शौचालय की सुविधा से वंचित महिलाएं यूटीआई से पीड़ित होती हैं। शहरी और खासकर कामकाजी महिलाएं गंदे सार्वजनिक शौचालयों के कारण इस समस्या से ग्रस्त हो रही हैं। यूटीआई यानि युरिनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन होने के कई कारण हैं जिनमें शौच के बाद सही तरीके से सफाई न करने और पेशाब लगने के बावजूद बहुत देर तक शौचालय न जाना भी है। इस बारे में कोलंबिया एशिया अस्पताल के चिकित्सकों और विशेषज्ञों के आकलन के बाद यह भी कहा गया है कि यूटीआई महिलाओं और पुरुषों में देखा गया है,

लेकिन पुरुषों की तुलना में महिलाएं इसकी ज्यादा शिकार हैं। यूटीआई को महिलाओं में सबसे आम बैक्टीरियल इंफेक्शन माना जाता है। लगभग 50 से 60 प्रतिशत महिलाएं अपने जीवन में कम-से-कम एक बार यूटीआई से पीड़ित पाई गई हैं। हर वर्ष विश्व के लगभग 15 करोड़ लोगों में यूटीआई के मामले पाए जाते हैं। लखनऊ से लगभग 30 किमी उत्तर दिशा में अर्जुनपुर गांव की रहने वाली देवनंदनी देवी बताती हैं, ‘गांव में शौचालय तो बने नहीं हैं दिन में बड़ी

दिक्कत हो जाती है, पानी वतपिब, ज्यादा नहीं पीते कि बार-बार बाथरूम न जाना पड़े।’ लखनऊ में एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाली सरिता वर्मा कहती हैं, ‘मेरा काम ज्यादातर फील्डवर्क का है ऐसे में जब मैं बाहर होती हूं तो शौचालय दिखते नहीं हैं और सार्वजनिक शौचालय इतने गंदे हैं कि उनका इस्तेमाल करने से पहले सोचना पड़ता है।’ स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों का अभाव और कार्यस्थलों पर भी ऐसे टॉयलेट का अभाव एक बड़ी समस्या है। इससे होने वाली बीमारियों के

बारे में लखनऊ की महिला रोग विशेषज्ञ डॉ पुष्पा जायसवाल बताती हैं, ‘ऐसी बीमारियों में व्यक्तिगत साफ-सफाई तथा जागरुकता बहुत जरूरी मानी जाती है। यूटीआई बहुत आम समस्या होती जा रही है। अक्सर ऐसे केस आते हैं जो महिलाएं ऑफिस में काम करती हैं या ज्यादा यात्रा करती हैं उन्हें यूरिन लगने पर तुंरत टॉयलेट का न मिलना बीमारी की तरफ भेजता है। यूरिन लगने पर रोकना पथरी का भी कारण बन सकता है। वहीं दूसरी तरफ गंदे शौचालय कई तरह के इंफेक्शन को बढ़ावा देते हैं।’ लखनऊ की इंदिरा नगर निवासी प्रियंका सिंह बताती हैं, ‘मैं अगर कभी बस से सफर कर रहीं हूं तो टॉयलेट की सुविधा कम ही होती है हाईवे वगैरह पर और वैसे भी महिलाएं कहां गाड़ी रोक कर कहेंगी टॉयलेट जाने को। इसके साथ ही ट्रेन में टॉयलेट इतने गंदे होते हैं कि उनसे बचने की कोशिश करती हूं।’

यूटीआई के लक्षण

बार-बार पेशाब लगना, पेशाब करने के दौरान जलन, बुखार, बदबूदार पेशाब होना और पेशाब का रंग धुंधला या फिर हल्का लाल होना और पेट के निचले हिस्से में दबाव महसूस होना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं। यूटीआई के साथ मुख्य समस्या यह होती है कि एक बार ठीक होने के बाद इस संक्रमण के दोबारा होने की आशंका काफी ज्यादा होती है। अमूमन 50 प्रतिशत महिलाओं को एक साल के भीतर दोबारा यह संक्रमण हो जाता है। इसीलिए यूटीआई होने पर एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा करना जरूरी होता है। साथ ही दवा बंद करने के एक सप्ताह बाद फिर से यूरिन टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है, ताकि दोबारा संक्रमण होने की आशंका को दूर किया जा सके।


26 जून - 2 जुलाई 2017

मुहिम

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ऑपरेशन मिलाप

बिछड़ों को मिलाने की मुहिम गुमशुदा बच्चों को खोज कर घर पहुंचाने के लिए दिल्ली पुलिस का अभियान ऑपरेशन मिलाप कामयाबी की नई इबारत लिख रहा है

दि

सत्यम

ल्ली पुलिस ने एक नई यूनिट तैयार की है जिसका काम खोए या भटके हुए बच्चों को ढूंढ़ कर उनके अभिभावकों के पास पहुंचाना है। इस यूनिट का नाम है-‘आपरेशन मिलाप’। इस ऑपरेशन के तहत गुमशुदा बच्चों की तलाशी के काम को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। दिल्ली पुलिस की इस पहल से सैकड़ों परिवारों के चेहरों पर चमक लौट आई है। लापता बच्चों की निरंतर बढ़ती संख्या भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की समस्या बनती जा रही है। इस समस्या के निदान के लिए न केवल हर देश की पुलिस, बल्कि विभिन्न स्वैच्छिक संस्थाएं और गैर सरकारी संगठन भी गंभीरता से काम कर रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा भी खोए-पाए बच्चों को उनके परिजनों से पुनर्मिलाप कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है। ऑपरेशन मिलाप की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ महीनों में ही डेढ़ सौ से ज्यादा गुमशुदा और लापता बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने में कामयाब हो चुकी है। अपराध शाखा के तत्कालीन विशेष पुलिस आयुक्त ताज हसन से प्रेरित होकर शाखा की मानव तस्कर निरोधक इकाई द्वारा 16 दिंसबर 2014 को शुरू किए गए ऑपरेशन मिलाप एक मानवीय एवं सराहनीय कार्य को अंजाम दे रहा है। तब के संयुक्त पुलिस आयुक्त रवींद्र यादव के मार्गदर्शन में निरंतर सफलता की ओर अग्रसर शाखा का ऑपरेशन मिलाप अभियान गुमशुदा बच्चों और पीड़ित परिवारों के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। पुलिस की इस सार्थक पहल को नागरिकों ने भी खूब सराहा है। उपायुक्त दिनेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में एसीपी रणवीर सिंह, इंसपेक्टर विपिन कुमार भाटिया, एसआई अशोक कुमार व मुकेश कुमार, रमेश, हेड कांस्टेबल राजेश,

कृष्ण और रमेश जैसे अनुभवी पुलिसकर्मियों की टीम ने समय-समय पर दिल्ली के बाल गृहों का दौरा कर ऐसे गुमशुदा बच्चों पर ध्यान केंद्रित किया जिनका अधूरा पता होता है। इसके अलावा लापता, अपहृत तथा बाल सुधार गृहों और बाल पनाह गृहों में रह रहे बच्चों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मुख्य राजमार्गों और धार्मिक स्थलों पर लावारिश घूमते पाए गए बच्चों से स्नेहपूर्ण व्यवहार से उनका विश्वास प्राप्त कर उनके निवास स्थान और परिजनों की जानकारी एकत्रित करके उनके अभिभावकों को संपर्क किया जाता है। शाखा के अधिकारी ऑपरेशन मिलाप में बिछुड़े बच्चों को मिलाने के इस परोपकारी कार्य को अंजाम देकर न केवल अपना फर्ज निभा रहे हैं, बल्कि आम जनता व पुलिस के बीच परस्पर विश्वास और सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। शाखा इस अभियान के तहत गुमशुदा बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने मे मदद करने के लिए आम जनता को भी विज्ञापनों के माध्यम से आग्रह करती रहती है। विज्ञापनों में जनता से अनुरोध किया जाता है कि यदि कोई बच्चा किसी मुसीबत में है या लावारिस दिखाई देता है तो उसके बारे में फोन नंबर—011-23241210, 1291 या 1094 पर काल कर पुलिस को सूचित करें और इस महाअभियान का हिस्सा बनें। इस संबंध में दिल्ली पुलिस ने विशेष किशोर इकाई बनाने के साथ-साथ ऐसे बच्चों की सुरक्षा व आम जरुरतों के लिए प्रत्येक स्थान पर दो किशोर या बाल अधिकारी तैनात किए हैं। ऐसे अधिकारियों के बारे में जानकारी विशेष किशोर पुलिस शाखा की वेबसाइट-डब्लूडब्लूडब्लू डाट डीपीजेजेयू डाट कॉम पर उपलब्ध कराई गई है,

एक नजर

बिछड़ों को मिलाने का दिल्ली पुलिस का अभियान

ऑपरेशन मिलाप को मिली बड़ी कामयाबी

ताकि आम जनता भी संपर्क कर सके। मानव तस्कर निरोधक ईकाई (एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट) की टीम ने तीसहजारी स्थित दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के सलाम बालक ट्रस्ट, जहांगीरपुरी स्थित प्रयास तथा सेक्टर-16 रोहिणी स्थित सुभिक्षा चिल्ड्रेन होम में रह रहे बहुत से गुमशुदा और लावारिस बच्चों को उनके परिजनो से मिलाकर दिल्ली पुलिस ने अपनी गरिमा को बढ़ाया है। जून महीने के मध्य में ही ऑपरेशन मिलाप के तहत अपराध शाखा की टीम ने दिल्ली में संचालित प्रयास, सुभिक्षा और सलाम बालक ट्रस्ट जैसे बालगृह में रह रहे बच्चों की पहचान सुनिश्चित कर उनके परिजनों से मिलवा कर सराहनीय काम किया। दो जून 2015 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा भी गुमशुदा और पाए गए बच्चों की जानकारी के आदान प्रदान के लिए -डब्लूडब्लूडब्लू डाट खोया पाया डॉट गौव डॉट इन नाम से वेबसाइट की शुरूआत की है। अभी पिछले दिनों 77 लापता बच्चों को खोजने में अहम भूमिका निभाने वाले तीन पुलिस वालों को दिल्ली पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक ने असाधारण कार्य पुरस्कार से सम्मानित किया। 11 अप्रैल 2017 को पुलिस आयुक्त पटनायक ने रोहिणी जिला के थाना विजय विहार के थानाध्यक्ष अभिनेंद्र जैन, एसआई दिव्यामान तथा एसआई अनुज को उनके जनकल्याण से जुड़े अविस्मरणीय कार्य को पूरा करने में दिखाई गई उच्च स्तर की पेशेवर निपुणता, अतिरिक्त उत्साह व काम के प्रति सच्ची निष्ठा के लिए असाधारण कार्य पुरस्कार से सम्मानित किया। इंसपेक्टर जैन, मान व अनुज ने साल 2011से 15 के दौरान थाना

ऑपरेशन मिलाप के तहत गुमशुदा बच्चों की तलाशी के काम को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। दिल्ली पुलिस की इस पहल से सैकड़ों परिवारों के चेहरों पर चमक लौट आई है

दिसंबर 2014 से शुरू किया गया ऑपरेशन मिलाप

विजय विहार इलाके से लापता व अपहृत हुए 82 बच्चों में से 77 बच्चों को सकुशल बरामद कर सभी पीड़ित परिवारों के चेहरे पर खुशी की चमक लाने में अहम भूमिका निभाई है। पुलिस मुख्यालय में आयोजित एक संक्षिप्त समारोह में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों व मीडियाकर्मियों के अलावा बरामद 77 बच्चों के परिजन भी इस खुशी का हिस्सा बने। हालांकि इससे पहले से भी अपराध शाखा के तहत पुलिस को गुमशुदा तलाश केंद्र पिछले कई दशकों से गुमशुदा व्यक्तियों की तलाश में सार्थक और अहम भूमिका निभा रहा है। सालों तक गुमशुदा व्यक्तियों की तस्वीर एवं उनका विवरण दिल्ली दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित प्रचारित कराने वाले गुमशुदा तलाश केंद्र की कार्यशैली मे बदलती परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है। संयुक्त पुलिस आयुक्त के नेतृत्व और उपायुक्त पुलिस सीआरओ के मार्गदर्शन में कार्यरत गुमशुदा तलाश केंद्र में खोए-पाए व्यक्तियों और बच्चों व अज्ञात शवों संबंधी जानकारियों का आदान प्रदान करने में अन्य राज्यों की पुलिस के साथ भी बेहतर संबंध और सामंजस्य स्थापित किया है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और दिल्ली सहित आठ राज्यों को जिपनेट के माध्यम से जोड़कर ऐसी सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है। खोए-पाए व्यक्तियों और बच्चों के बारे में पुलिस नियंत्रण कक्ष एवं सभी पुलिस स्टेशनों के माध्यम से गुमशुदा तलाश केंद्र में प्रतिदिन सौ के करीब कॉल्स प्राप्त होती हैं। इसमें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के साथ समन्वय बनाते हुए खोए पाए बच्चों की खोजकर उन्हें दिल्ली में स्थित छह बाल गृहों में भेजा जाता है। फिलहाल इस अभियान में और तेजी लाने के लिए दिल्ली पुलिस कई अन्य प्रयोग कर रही है, ताकि इसकी सफलता आगे बढ़ सके।


14 स्वास्थ्य

26 जून - 2 जुलाई 2017

संक्षेप में

स्वास्थ्य रिपोर्ट

मधुमेह की चपेट में देश के गरीब

ब्लड टेस्ट से प्रोस्टेट कैंसर की पहचान

शहरी इलाके में रहने वाले गरीबों के मधुमेह से पीड़ित होने की आशंका ज्यादा है

वैज्ञानिकों ने एक नया ब्लड टेस्ट विकसित किया है जिससे प्रोस्टेट कैंसर की पहचान आसान हुई

वै

ज्ञानिकों ने एक ऐसे ब्लड टेस्ट की खोज की है, जो गंभीर प्रोस्टेट कैंसर को तुरंत पहचान लेगा। कैंसर की अवस्था की पहचान के बाद इससे बचना भी ज्यादा आसान हो जाएगा। इस बीमारी की भयावहता को देखते हुए वैज्ञानिकों ने एक नया ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो समय रहते प्रोस्टेट कैंसर के गंभीर रूप को पहचान लेगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह दस गुना ज्यादा गंभीर प्रोस्टेट कैंसर को पहचान सकता है। यह परीक्षण शरीर में उन्मुक्त घूम रही कैंसर कोशिकाओं की पहचान करता है। यूके में हर साल 40 हजार से ज्यादा लोग जिनमें से प्रोस्टेट कैंसर की चपेट में आते हैं और 11 हजार लोगों की मौत हो जाती है। समय से इसका इलाज न होने पर कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैलने लगता है। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि 92 फीसदी तक फैल चुके प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों के रक्त के नमूने लेने के बाद परीक्षण किया गया तो उसमें 81 फीसदी तक कैंसर की सटीकता का पता चला। (एजेंसी)

भा

रत में मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या के बीच चिंताजनक बात यह है कि गरीब तबके के लोग भी तेजी से इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं। हाल में हुए एक अध्ययन में कहा गया है कि देश के विकसित राज्यों के शहरी इलाकों में रहने वाले सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की दूसरों के मुकाबले मधुमेह से पीड़ित होने की आशंका अधिक है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत तबके से ताल्लुक रखते हैं। ‘लांसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रनालॉजी’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि इसके नतीजे भारत के लिए चिंताजनक हैं, जहां लोगों को इलाज पर अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करना पड़ता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य शोध विभाग की मदद से किए गए इस अध्ययन में 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 57,000 लोगों को शामिल किया गया। रिपोर्ट में

प्लास्टिक की बोतल में दवाएं कितनी असरदार

स्वास्थ्य सुरक्षा

केंद्र सरकार ने प्लास्टिक की बोतल में दवा रखे जाने को लेकर विस्तृत रिपोर्ट देने का आदेश है कि ये दवाएं सुरक्षित हैं या नहीं

प्ला

स्टिक की बोतल में दवा सेफ है या नहीं, इस मामले को लेकर केंद्र सरकार ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) से विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है। इस स्टडी में यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी

कहा गया है कि आर्थिक रूप से अधिक संपन्न माने जाने वाले सात राज्यों के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति वाले तबके के मुकाबले सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर तबके में मधुमेह के रोगियों की संख्या अधिक है। उदाहरण के लिए, चंडीगढ़ के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के बीच मधुमेह की दर 26.9 फीसदी पाई गई जो अच्छी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच 12.9 प्रतिशत की दर से कहीं अधिक है। एम्स के एंडोक्रनालॉजी और मेटाबॉलिज्म विभाग के प्रमुख डॉ. निखिल टंडन के अनुसार शहरों में तनावपूर्ण माहौल में रहना, खाने-पीने की आदतें और वजन बढ़ने तथा शरीर की चर्बी के साथ अधिक देर तक बैठना एवं व्यायाम ना करने से मधुमेह का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘यहां तक कि कम आय वाले वर्गों के लोग भी जंक फूड खा रहे हैं’। (एजेंसी)

कि प्लास्टिक की बॉटल में लिक्विड मेडिसिन रखने से क्या उसमें किसी प्रकार की लीचिंग हो रही है या नहीं। लीचिंग वह प्रक्रिया है जिसमें बॉटल के घुलनशील तत्व बाहर आ जाते हैं और उसमें रखी सामग्री से मिल जाते हैं। आईसीएमआर ने हैदराबाद

के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन से स्टडी की प्लानिंग और स्टडी करने के लिए कहा है। करीब दो साल पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से निर्देश दिए गए थे, जिसमें दवाओं को प्लास्टिक और पॉलिथीन टेरिफ्थेलेट (पीईटी) की बॉटल की बजाय कांच की बॉटल में रखने की बात कही गई थी। प्लास्टिक की बॉटल में लीचिंग का खतरा रहता

संक्षेप में

नींद पर भारी है जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन के कारण रात का तापमान बढ़ता जा रहा है। इस वजह से लोग पूरी नींद नहीं ले पाते हैं

लवायु परिवर्तन के कारण रात में तापमान सामान्य से अधिक रहने का मनुष्य की नींद पर महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। एक नए अध्ययन में कहा गया है कि सदी के अंत तक संभवत: पृथ्वी पर लोग नींद की कमी से जूझ रहे होंगे। नासा अर्थ एक्सचेंज की ओर से जारी 2050 और 2099 के जलवायु पूर्वानुमानों का प्रयोग कर अनुसंधानकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि यदि रातें गर्म हो गईं और उससे नींद की कमी जारी रही तो भविष्य बहुत धूमिल सा है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्नियासैन डिएगो (यूसीएसडी) के अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि तापमान बढ़ने के कारण 2050 तक प्रत्येक 100 लोग कम से कम छह दिन पूरी नींद नहीं ले सकेंगे। 2099 तक यह संख्या प्रति 100 पर बढ़कर 14 रातें हो जाएंगी। उन्होंने पाया कि रात के तापमान में एक डिग्री वृद्धि होने पर 100 लोग एक महीने में तीन दिन ठीक से नहीं सो पाते हैं। यह अनुसंधान साइंस एडवांस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। (एजेंसी) है। एक्सपर्ट के अनुसार, लीचिंग में बॉटल के घुलनशील तत्व उसमें मौजूद दवा में मिल जाते हैं। पिछले साल सरकारी स्टडी में यह सामने आया था कि प्लास्टिक की बॉटल्स में रखी गई खांसी की दवा और दूसरी लिक्विड दवाओं में लेड सहित कई विषाक्त सामग्री हैं। इसमें कहा गया था कि ऐसी बॉटल्स से खतरनाक सामग्री निकलती है और ऐसी बॉटल्स में दवाइयों के रखने पर रोक लगाने की बात भी कही गई थी। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, स्टडी में सामने आई बातों का दवाओं के लिए मानक वैधानिक प्राधिकरण-दवा तकनीक सलाहकार बोर्ड ने भी समर्थन किया था। (एजेंसी)


26 जून - 2 जुलाई 2017

स्वास्थ्य प​हल

गर आप घर बैठे यह जानना चाहते हैं कि कैंसर से पीड़ित हैं या नहीं और अगर कैंसर है भी तो किस अवस्था में हैं तो इस बात का पता आपको महज 24 घंटे के भीतर लगा सकते हैं। मुंबई के टाटा कैंसर हॉस्पिटल ने नव्या विशेषज्ञ सलाह नाम से यह सेवा शुरू की है जिससे आप ऑनलाइन जानकारी हासिल कर सकते हैं। इसके लिए बस आपको अपनी सारी रिपोर्ट ऑनलाइन हॉस्पिटल को भेजनी होगी। रिपोर्ट मिलते ही अस्पताल एक दिन के भीतर सारी जानकारी दे देगा। मरीजों को जो रिपोर्ट अस्पताल से भेजी जाएगी वह सरल भाषा में होगी जिसे आम आदमी भी समझ सके या स्थानीय डॉक्टर से दिखा कर समझ ले। गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों के लिए यह सेवा मुफ्त है। अस्पताल का दावा है कि कैंसर मरीजों के लिए दुनिया में इस तरह की पहली बार सेवा शुरू की गई है।

व्हाट्सएप से भेज सकते हैं रिपोर्ट

इस सेवा की संस्थापिका गीतिका श्रीवास्तव के मुताबिक मरीज को डब्लूडब्लूडब्लू.नव्या. केयर पर खुद को पंजीकृत करना होगा। फिर

अस्पताल के प्रतिनिधि मरीज से बात करके उन्हें अपनी रिपोर्ट अपलोड करने या मेल से भेजने के लिए कहेंगे। मरीज अपनी रिपोर्ट व्हाट्सएप से भी भेज सकते हैं। रिपोर्ट प्राप्त होने के 24 घंटे के अंदर मरीज को अस्पताल की ओर से रिपोर्ट और सुझाव भेज दिए जाएंगे। उन्हें यह बताया जाएगा कि वे किस तरह का इलाज कराएं और यह इलाज किस अस्पताल में संभव है या किस जगह इसकी सुविधा है।

सेवा शुरू करने का मकसद

इस सेवा को शुरू करने का मकसद उन मरीजों को सुविधा देना है जो देश के दूर-दराज इलाके में रहते हैं और वे किसी अच्छे डॉक्टर या अस्पताल से संपर्क नहीं कर पाते। साथ ही उनका दूसरे शहर में जाकर रिपोर्ट दिखाने में ज्यादा पैसा खर्च हो जाता है क्योंकि उन्हें आने-जाने और ठहरने में काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। गौरतलब है कि हर माह करीब 500 मरीज ऑनलाइन रिपोर्ट अस्पताल को भेज रहे हैं। (मुंबई ब्यूरो)

हा

अल्जाइमर में भी मददगार पार्किंसन का इलाज

ल ही हुए एक शोध कहा गया है कि पार्किंसन के लिए इस्तेमाल होने वाला इलाज अल्जाइमर और हंटिंगटन जैसी बीमारियों में भी मददगार हो सकता है। अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि इन सभी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों में असामान्य प्रोटीन पाया जाता है और इन सभी में मस्तिष्क की कोशिकाओं को नष्ट करने की एकसमान क्षमता होती है। अध्ययन में पता की गई ये जानकारी उन तंत्र की प्रभावी रूप से व्याख्या कर सकती है जो अल्जाइमर, पार्किंसन, हंटिंगटन और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के मस्तिष्क में फैलने के साथ मस्तिष्क के साधारण हिस्सों के काम करने में रुकावट डालते हैं। अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और शिकागो विश्वविद्यालय लोयोला के एडवर्ड कैंपबेल ने कहा, ‘ मस्तिष्क की कोशिकाओं की क्षमता में अगर वृद्धि कर उन्हें प्रोटीन समूहों (गुच्छों) और क्षतिग्रस्त वेसिकल पर रोकथाम लगाने में सक्षम किया जा सके, तो इन बीमारियों का संभावित इलाज खोजा जा सकता है।’ कैंपबेल ने कहा, ‘अगर हम किसी एक बीमारी के इलाज में ऐसा करने में सफल रहते हैं तो पूरी संभावना है कि यह इलाज अन्य बीमारियों में भी प्रभावी हो।’ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का प्रमुख कारण मस्तिष्क में न्यूरॉन्स और अन्य कोशिकाओं के नष्ट होने के साथ अन्य बीमारियों का मस्तिष्क के अलग अलग हिस्सों को प्रभावित करना होता है। अल्जाइमर याददाश्त को नष्ट करती है जबकि पार्किंसन और हटिंगटन बीमारियां

स्वास्थ्य अध्ययन

दूध पीजिए, लेकिन मलाई मार के लंबे समय तक मलाईरहित दूध पीने से पार्किंसन का खतरा उत्पन्न होता है, जबकि मलाईदार दूध पीने से यह खतरा कम हो जाता है

से

हत का खयाल करके मलाईरहित दूध पीने से लंबे समय में लाभ की बजाय नुकसान हो सकता है। एक नए अध्ययन से पता चला है कि मलाईरहित दूध का नियमित सेवन करने से पार्किंसन की संभावना बढ़ जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, कम वसा वाले डेयरी उत्पादों के नियमित सेवन और मस्तिष्क की सेहत या तंत्रिका संबंधी स्थिति के बीच एक अहम जुड़ाव है। डेयरी उत्पाद से उनका आशय दही, दूध और पनीर से था। शोधकर्ताओं ने 1.30 लाख लोगों के आंकड़ो का

विश्लेषण करके यह नतीजा निकाला। ये आंकड़े इन लोगों की 25 साल तक निगरानी करके जुटाए गए थे। आंकड़ो ने दिखाया कि जो लोग नियमित रूप से दिन में एक बार मलाईरहित या अर्ध-मलाईरहित दूध पीते थे, उनमें पार्किंसन बीमारी होने की संभावना उन लोगों के मुकाबले 39 फीसदी अधिक थी, जो हफ्ते में एक बार से भी कम ऐसा दूध पीते थे। शोधकर्ताओं ने कहा, लेकिन जो लोग नियमित रूप से पूरी मलाईवाला दूध पीते थे उनमें यह जोखिम नजर नहीं आया। उन्होंने कम वसा वाले दही, पनीर आदि अन्य डेयरी उत्पादों का नियमित सेवन करने वाले

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स्वास्थ्य अध्ययन

घर बैठे जानें कैंसर है या नहीं मुंबई के टाटा कैंसर हॉस्पिटल ने नव्या विशेषज्ञ सलाह नाम से यह सेवा शुरू की

स्वास्थ्य

लोगों का भी विश्लेषण किया। वास्तव में उन्होंने कम वसा वाले डेयरी उत्पादों के तमाम रूपों के नियमित इस्तेमाल और उसके संभावित नतीजों पर गौर किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग कम मलाई वाले डेयरी उत्पाद का दिन में कम से कम तीन बार सेवन करते थे उनमें पार्किंसन बीमारी होने का जोखिम 34 फीसदी अधिक था। शोधकर्ताओं ने कहा कि संभवत: तमाम डेयरी उत्पादों में पार्किंसन का जोखिम बढ़ाने की क्षमता है। उनका अनुमान है कि इनके सेवन से

मस्तिष्क की क्रियाओं पर प्रभाव डालती हैं। ये तीनों बीमारियां तेजी से बढ़ने वालीं, कमजोर करने वाली और कभी नष्ट नहीं होने वाली हैं। पिछले अध्ययनों में पाया गया है कि इन तीनों बीमारियों में असामान्य तरीके से मुड़ी हुई संरचना वाले प्रोटीन मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर गुच्छे बना लते हैं। प्रोटीन के ये समूह (गुच्छे) एक कोशिका से दूसरी कोशिकाओं तक फैलते हैं और अंत में कोशिकाओं की मौत का कारण बनते हैं। यह अध्ययन जर्नल एक्टा न्यूरोपेथोलोजिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें पाया गया है कि कैसे ये प्रोटीन के असंगठित गुच्छे मस्तिष्क की स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर उन्हें नष्ट कर सकते हैं। अध्ययनकर्ताओं ने ध्यान दिया कि एक बार प्रोटीन कोशिकाओं के अंदर आने के बाद, वे वेसिकल में पहुंच जाती हैं और उनकी झिल्लियों पर अपनी पकड़ बना लेती हैं। ये प्रोटीन वेसिकल की झिल्लियों को नष्ट कर देती हैं और प्रोटीन को कोशिका प्लाज्म को नष्ट करने और अन्य कार्यो को प्रभावित करने में मदद करती हैं। (एजेंसी) शरीर में सुरक्षात्मक रसायनों (यूरेट) के स्तर में कमी आती है, जिससे पार्किंसन का जोखिम बढ़ जाता है। लेकिन पूर्ण मलाईदार डेयरी उत्पादों के सेवन से यह जोखिम कम किया जा सकता है। क्योंकि उनमें मौजूद संतृप्त वसा संभवत: सुरक्षात्मक रसायनों के स्तर में कमी लाने की प्रक्रिया को उलट देती है। यह अध्ययन मेडिकल जर्नल ‘न्यूरोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने कहा, इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि पार्किंसन से बचाव में यूरेट अहम साबित हो सकता है। जहां तक डेयरी उत्पादों के सेवन की बात है तो लोगों को फिलहाल आदत बदलने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, इस अध्ययन से पार्किंसन के कारण के बारे में एक अहम साक्ष्य मिला है, लेकिन इस संबंध में और अधिक अध्ययन की जरूरत है। (एजेंसी)


16 खुला मंच

26 जून - 2 जुलाई 2017

राजीव रंजन गिरि

‘ऐसे जियो जैसे कि तुम कल मरने वाले हो, ऐसे सीखो की तुम हमेशा के लिए जीने वाले हो’

लेखक गांधीवादी लेखक-विचारक और दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्याता हैं

-महात्मा गांधी

नायक से जननायक चु

जिसका आह्वान जन अभियान बन जाए जननायक वही होता है

नाव प्रचार के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय समुदाय की एक सभा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें महान जननायक करार दिया था। तब ट्रंप की इन बातों पर किसी ने खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन ट्रंप ने जो कुछ तब कहा था आज उसकी तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही है। एक राजनीतिक नायक से जननायक बनने के सफर को सिर्फ प्रचार और सत्ता के सहारे नहीं पूरा किया जा सकता। नरेंद्र मोदी की यह खासियत रही है कि उन्होंने जनता के साथ सीधे और दो टूक संवाद किया। फैसला नोटबंदी का हो या फिर जीएसटी का, फैसला जनधन का हो या मेक इन इंडिया का, मोदी अपने सभी बड़े फैसले जनता से अपने अंदाज में संवाद करने के बाद ही करते हैं। मोदी की यही अदा जनता की नजरों में उन्हें नायक से जननायक बनाती है। चुनावी समर जीत कर नायक तो कोई भी बन सकता है, लेकिन जिसकी आवाज, जिसकी अपील और जिसका आह्वान जन अभियान बन जाए, जननायक वही होता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ महज नारा नहीं, पीएम मोदी की वह सोच है जो सीधे जनता को उनसे जोड़ती है। इसीलिए जब वे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाअो’ की बात करते हैं और बेटियों के साथ सेल्फी लेने को कहते हैं, तो देश के हर घर में सेल्फी की होड़ मचती है। स्वच्छता अभियान महज सरकारी खानापूर्ति बन कर रह जाता, अगर पीएम मोदी इससे जनता को सीधे जुड़ने को नहीं कहते। उन्होंने कहा तो शौचालय के लिए कोई अपनी बकड़ियां बेचने लगा तो कोई मंगलसूत्र, तो किसी ने अपना पक्का घर महज शौचालय के लिए तुड़वा डाला। आजादी के बाद देश में ऐसा होता हुआ देखना और सुनना बेहद रोमांचक है। वह भी ऐसे दौर में जब हर तरफ राजनीतिक स्फीति की स्थिति हो और सामाजिक वैमनस्यता का पारा चरम पर हो। खादी से आयुर्वेद और फिर योग को बेहद कम वक्त में विश्वव्यापी पहचान दिलाने के साथ सामज से देश और देश से दुनिया को जोड़ने का कारनामा कोई जननायक ही कर सकता है। तीसरे विश्व योग दिवस पर तीन पीढ़ियों के साथ देश को करते करते हुए देखना भर पीएम का सपना नहीं था। वे इसी बहाने पूरे परिवार को एक साथ जोड़ना चाहते हैं। इस मकसद में भी उन्हें बड़ी कामयाबी मिलेगी। सामाजिक बदलाव की दिशा में स्वच्छता से लेकर योग तक की भूमिका उन्होंने तय कर दी है और लोग इस रास्ते पर चलने भी लगे हैं।

कोल्डप्ले नहीं योग है भारत की छवि

पांच हजार साल से अगर संस्कृति का सनातन यश कायम है, तो वह महज किसी सस्ती लोकप्रियता के कारण कतई नहीं

स साल भारत के साथ दुनिया के 200 से ज्यादा देशों ने एक साथ मिलकर तृतीय विश्व योग दिवस मनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में बरसात में भींगते हुए लोगों के साथ योग किया। इस मौके पर उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि एक ऐसे दौर में जब दुनिया में तनाव और हिंसा काफी बढ़ गई है, योग विश्व को भारत की तरफ से दिया गया अनुपम भेंट है। दरअसल, योग को मिली नई वैश्विक स्वीकृति उस भारतीय संस्कृति का भी अखिल अनुमोदन है, जिसमें सबके लिए स्थान है, सबके लिए समाधान है। वैसे भी भारत सिर्फ ग्लोब के एक हिस्से में दिखने वाला देश भर नहीं, जिसकी उत्तरी सीमा को पर्वतीय विशालता घेरती है तो दक्षिण की तरफ का बड़ा हिस्सा सागर की लहरों से टकराता है। बीते ढाई दशक में तो वाकई भारत की ध्वजा और शिनाख्त 'ग्लोबल’ हो गई है। दुनिया की हर ठंडी-गर्म हवा भारत को छूकर गुजरने के लिए मजबूर है। ऐसे में भारतीय बाजार के साथ यहां के लोगों, यहां की बहुरंगी संस्कृति और यहां के जीवन में घुले नए-पुराने रंगों के प्रति पूरी दुनिया में दिलचस्पी बढ़ी है। जिन्हें सिर्फ अर्थ और बाजार समझ में आता है, वे इसे भारत के नए और बड़े इकोनॉमिक पावर के उभार के रूप में देखते हैं, तो बाकी लोगों के लिए यहां का सिनेमा, संगीत, उत्सव और लोग सभी दिलचस्पी की मोहक वजहें हैं। ऐसी ही एक मोहकता बीते साल इन्हीं दिनों खासे विवादों में घिर गई थी। ब्रिटिश रॉक बैंड ‘कोल्डप्ले’ का अंतरराष्ट्रीय पॉप स्टार बेयोंस नोल्स अभिनीत विडियो 'हिम फॉर द वीकेंड’ भारतीय संस्कृति को चलताऊ अर्थों में दर्शाने के कारण कई तरह के विवादों में फंस गया था। एक बार फिर विवाद के लिए मंच बना था सोशल मीडिया। वैसे भारतीय मुख्यधारा का मीडिया भी इस विवाद विमर्श से पूरी तरह कटा रहा, ऐसा नहीं था। बिलबोर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ लोगों ने इस विडियो की भारतीय सांस्कृतिक के इस्तेमाल के लिए निंदा की है, तो कुछ अन्य ने इसे

विदेशी संस्कृति का बखान बताया। आलोचकों ने कोल्डप्ले के बैंड और बेयोंस दोनों को ही आड़े हाथों लिया। विडियो में बेयोंस एक बॉलीवुड स्टार के रूप में नजर आती हैं। उन्हें एक ऐसी भारतीय रानी की तरह दिखाया गया, जो पारंपरिक के साथ आधुनिक लिबास भी पहनती है। दिलचस्प है कि इस विडियो में कुछ क्षणों के लिए बॉलीवुड बाला सोनम कपूर भी दिखती हैं। वैसे यह पहली बार नहीं था, जब कोल्डप्ले ने अपने विडियो में एशियाई संस्कृति का इस्तेमाल किया हो। इस विडियो में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की झलक से लेकर कोल्डप्ले के सदस्य मार्टिन को काली-पीली टैक्सी में भारत दर्शन करते, घाट पर नौका में और मुंबई में होली खेलते दिखाया गया है। इसे लेकर ट्विटर पर भी कई दिन तक कई हैशटैग ट्रेंड करते रहे। विभिन्न समझ के लोगों ने विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं दीं। एक टिप्पणी में कहा गया, 'वह बेयोंसे है, केवल इसीलिए वह सही नहीं हो सकतीं। वह हमारी संस्कृति का इस्तेमाल कर रही हैं और उसका अपमान कर रही हैं।’ इस विडियो को भारत में ही फिल्माया भी गया। इसका जो दृश्य सबसे ज्यादा चर्चा में रहा और जिसकी क्लि​िपंग लोगों ने आपस में खूब शेयर किए, उसमें बेयोंस अपने हाथों में मेहंदी रचाए और पारंपरिक परिधान और जेवर पहने दिखाई देती हैं। कुछ आलोचकों की नजर में यह विडियो एक और 'स्लमडॉग मिलियनेयर’ की तरह है। इस तरह की धारणा रखने वाले लोग गुस्से से भड़ककर यहां तक लिख गए, 'कोल्डप्ले हमें अलग और अद्भुत दिखाने की कोशिश

बीते साल ब्रिटिश रॉक बैंड ‘कोल्डप्ले’ का अंतरराष्ट्रीय पॉप स्टार बेयोंस नोल्स अभिनीत विडियो 'हिम फॉर द वीकेंड’ भारतीय संस्कृति को चलताऊ अर्थों में दर्शाने के कारण विवादों में फंस गया था


राकेश कुमार मत करो। तुम क्लबों जैसी सभी जगहों पर जाते रहे हो। तुम यह क्यों दिखाना चाहते हो कि हम केवल सड़कों पर नाचते रहते हैं।’ बहरहाल, लगभग सवा चार मिनट के इस विडियो में होली के उत्सव के साथ भारत के प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों और भीड़भाड़ वाली गलियों को कैमरे के कलात्मक एंगलों से दिखाया गया है। पूरे विडियो को देखकर सीधे तौर पर कहीं से यह जाहिर नहीं होता कि इसके पीछे कुत्सित मंशा रही होगी, बल्कि कई ऐसे प्रशंसक भी रहे जिन्हें लगा कि विडियो में दिखाई गई भारत की रंगारंग यात्रा मन को कहीं न कहीं छूती ही है। अलबत्ता यह कहने की जरूरत नहीं कि यह यह सब व्यावसायिक नजरिए से ही किया गया। विदेशी साइटों, वहां के लोगों और उनकी जीवनशैली को भारतीय फिल्मकार भी मनमाने तरीके से दिखाते रहे हैं। इसलिए बड़ा सवाल यह नहीं कि ‘कोल्डप्ले’ ने भारत को कैसे देखा-समझा। बड़ा सवाल तो यह है कि हम अपने राष्ट्र और उससे जुड़ी संस्कृति की स्वीकृति या परीक्षा को लेकर क्या सोचते हैं। यह किसी भी भारतवासी के लिए एक भावनात्मक मुद्दा जरूर हो सकता है, पर क्या हम यह भूल सकते हैं पांच हजार साल से अगर संस्कृति का सनातन यश कायम है, तो क्या वह महज किसी हल्की लोकप्रियता के कारण ? दरअसल, भारत और भारत की संस्कृति की कद्र दुनिया में तब तक होती रहेगी, जब प्रेम और करुणा मानवता के लिए सर्वोपरि बने रहेंगे। फिर बात योग की हो या महात्मा गांधी की, भारतीय संस्कृति की अखिल कृति और अनंत स्वीकृति के लिए अलग से किसी मुहिम को चलाने की जरूरत नहीं। संयोग से भारत के पास आज इस तरह का नेतृत्व है, जो भारतीय दर्शन और संस्कृति को एक जागरूक आह्वन के तौर पर देख रहा है। यह आह्वान सिर्फ दूसरों के लिए है, ऐसा भी नहीं है। यह विश्व कल्याण का आह्वान है, जिसमें प्रेम और करुणा के स्वर को हर स्तर पर उभारना होगा। भारत के साथ पूरी दुनिया में नफरत और हिंसा ने बीते कुछ दशकों में जो एक अनचाहा विस्तार पाया है, यह आह्वान उसको लेकर भी है। भारत के प्रधानमंत्री, यहां के सोशल-कल्चरल दुनिया के मंचों पर जाकर जब यह बात करते हैं कि 21वीं सदी में संकट चाहे आतंकवाद को हो या आर्थिक, इसका समाधान सिर्फ यही है कि हम विकास और सहअस्तित्व के साझे को समझें। लालच और निज विकास के मोह में पड़कर विकास का वर्टिकल ग्रोथ तो पाया जा सकता है, पर इससे हॉरिंजेंटल लेवल पर हम बहुत कुछ खोते भी जाते हैं। भारत के पक्ष में यह अच्छी बात है कि विकास के नए भटकाव में हमने पारंपरिक जीवनमूल्यों से ज्यादा नहीं कटे हैं। यही कारण है कि अर्थ, समाज से लेकर संस्कृति तक हम दुनिया के आगे एक ऐसे मॉडल की तरह हैं, जिसके पास वर्तमान संकट का समाधान तो है ही, भविष्य की राह भी है। फिर से बात करें योग की तो यह ऐसा ही एक दिशासूचक है, जिस पर सहर्ष दुनिया के तमाम देशों ने बढ़ना स्वीकार किया है।

26 जून - 2 जुलाई 2017

खुला मंच

लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट के डिप्टी डायरेक्टर हैं और कई सामाजिक-सांस्कृतिक अभिक्रमों से लंबे समय से जुड़े हैं

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जल संकट और चैतन्य

विश्व अगर एक समझदार सहमति विकसित नहीं कर पाया तो अगला विश्व युद्ध किसी और मुद्दे पर छिड़े न छिड़े पानी के मुद्दे पर जरूर छिड़ जाएगा

दोकेविश्वलिएयुद्धकतईदेखतैयचुारकनहींी दुनियहोगी।ा तीसरेएक-दोविश्वयुदशकद्ध

पहले तक जब यह कामना कोई व्यक्त करता था तो यकीन होता था कि विश्व विवेक अब इतना प्रौढ़ हो गया है कि वह हिंसा के नाम पर इतनी बड़ी तबाही की नौबत नहीं आने देगा। इसी तरह शीतयुद्ध के बाद से लेकर अब तक कई कूटनीतिक विशेषज्ञ इस धारणा के हैं कि अर्थ और बाजार के आधार पर दुनिया जिस तरह एक ग्लोबल छतरी के नीचे आ गई है, उसमें सबके हित एक-दूसरे से जुड़े हैं। ऐसे में मुश्किल है कि कोई एकतरफा किसी पर हावी हो और एक हिंसक विश्व संकट पैदा हो जाए। अलबत्ता, इस बीच दुनिया में निश्चित तौर पर हथियारों की होड़ बढ़ी है। एक देश की सेना दूसरे देश में जाकर अलग-अलग वजहों से लड़ भी रही हैं। आतंक के कारण तो हिंसा की एक अलग ही चुनौती पैदा हो गई है, जिसकी तपिश अमेरिका से लेकर भारत तक और रूस से लेकर फ्रांस तक हर जगह महसूस की जा रही है। पर हिंसा के इन संकटों से बड़ा एक और संकट है और वह है पर्यावरण असंतुलन का संकट। दुनिया इस संकट को भांप भी रही है, पर दुर्भाग्य से इस पर पहल के लिए अब तक देशों के बीच कोई सामूहिक सहमति नहीं बन पाई है, उलटे विवाद के हजार मुद्दे जरूर पैदा हो गए हैं। पर्यावरण की जब हम बात करते हैं तो उसमें सबसे अहम है पानी की उपलब्धता। दुनिया का तीन चौथाई हिस्सा जरूर जलमग्न है, पर सबसे ज्यादा रोना पानी को लेकर ही है। स्वच्छ और मीठे जल का अभाव सर्वाधिक है। दुनिया के जिन शहरों की इंच-

इंच जमीन की कीमत हजारों-लाखों रुपए हैं, वहां भी पानी का रोना है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग बार-बार इस बात की चेतावनी दे रहा है कि अगर हम अपनी जीवनशैली और विकास के रास्ते को नहीं बदलते हैं तो एक-एक बूंद पानी के तरस जाएंगे। दुनियाभर के पर्यावरणविद भी पानी को भविष्य का सबसे बड़ा संकट बता रहे हैं और आगाह कर रहे हैं कि पानी के मुद्दे पर विश्व अगर एक समझदर सहमति विकसित नहीं कर पाया तो अगला विश्वयुद्ध किसी और मुद्दे पर छिड़े न छिड़े पानी के मुद्दे पर जरूर छिड़ जाएगा। पानी से जुड़े संकट में सबसे अहम है पेयजल संकट। भविष्य की पीढ़ियां प्यासी न दम तोड़ें इसके लिए बहुत बड़े न सही पर उम्मीद पैदा करने वाले कुछ आविष्कार और प्रयोग दुनियाभर में जरूर हो रहे हैं। ऐसा ही एक सफल प्रयोग किया है भारतीय मूल के अमेरिकी छात्र चैतन्य करमचेदू ने। चैतन्य ने खारे पानी को पीने लायक बनाने का एक सस्ता और आसान तरीका खोज निकाला है।

योग विशेषांक सराहनीय

भारत को कोई संयोग योगभरसेसेजुहाथड़ी उपलब्धि लग गई हो, एेसा नहीं है। योग

भारतीय संस्कृति के बीज तत्वों में शामिल तो रहा ही है, भारतीयों ने अपनी परंपरा में इसे हमेशा जीवित भी रखा। दरअसल, नए समय में यह भारत के लिए भी अपनी यशस्वी संस्कृति के साथ आत्म-साक्षात्कार भी है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ का योग विशेषांक हर दृष्टि से सराहनीय है। हमें योग की वैश्विक लोकप्रियता के साथ यह भी जानने को मिला कि देश की गुरु-परंपरा ने बहुत जतन से योग की परंपरा को जीवंत बनाए रखा। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को पढ़कर यह भी समझ में आया कि नए दौर की तकनीक के बीच

उसके इस शोध ने कई बड़ी तकनीकी कंपनियों और विश्वविद्यालयों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। चैतन्य ने सोखने की उच्च स्तरीय क्षमता वाले एक पॉलीमर के जरिए समुद्री पानी में घुले नमक को उससे अलग करने में सफलता पाई है। उसके द्वारा किए गए प्रयोग में नमक हटने के बाद बचा पानी लायक हो गया था। चैतन्य ने इस पर गौर किया कि समुद्री पानी के दस फीसदी अणु नमक के अणु के साथ जुड़े रहते हैं, जबकि नब्बे फीसदी अणु नमक के अणु से जुड़े नहीं होते। ज्यादातर शोधकर्ता पूरे समुद्री पानी को लेकर सोचते रहे हैं, लेकिन चैतन्य ने नया नजरिया अपनाया। उसने नमक के अणुओं से जुड़े 10 फीसदी समुद्री पानी के बजाए उससे नहीं जुड़े नब्बे फीसदी समुद्री पानी को पेयजल में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया और सफल रहा। चैतन्य के सफल प्रयोग ने कहीं न कहीं इस सवाल को भी खड़ा किया दुनिया भर की कंपनियां और वैज्ञानिक शोध संस्थाएं हर दूसरे हफ्ते आईटी सॉफ्टवेयर से लेकर उपग्रहीय शोध और आयुध निर्माण के क्षेत्र में नई जमीन तोड़ने का दावा करती हैं, पर पानी जैसे बुनियादी सवाल पर उनकी मुट्ठियां बंधी हैं। वे पानी के संकट का वैज्ञानिक हल निकालने में उस तरह दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, जिस तरहकी जरूरत है। जबकि चैतन्य जैसे युवा इस बार को अब और पहले भी साफ कर चुके हैं कि इस दिशा में न सिर्फ सफलता पाई जा सकती है, बल्कि दुनिया के आगे पानी को लेकर आसान विकल्प मुहैया कराया जा सकता है।

भी योग ने अपनी दरकार और पहचान विकसित की है। योग के लिए जहां कई वेबसाइटें हैं तो वहीं लोग अपने स्मार्ट फोन के जरिए भी इसे सीख रहे हैं। इसी तरह भारत के लिए यह संतोष और गौरव की बात है कि देश का मौजूदा नेतृत्व योग सहित कई एेसी बातों को अपनी नीतिगत समझ का हिस्सा बना रही है, जिसमें हमारा सदियों का सांस्कृतिक विवेक तो जाहिर होता ही है, उसकी महत्ता भी रेखांकित होती है। राकेश कुमार का योग और बांग्लादेश के अनुभव को जोड़कर लिखा गया आलेख भी अच्छा लगा। हिंसा और तनाव से जूझ रही दुनिया के लिए योग वाकई एक समाधानकारी राह है। प्रणव पुष्प, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली


18 फोटो फीचर

26 जून - 2 जुलाई 2017

हैरान करता हैदराबाद

साढ़े छह सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ निजामों का शहर अंतहीन जादूगरी समेटे हुए है। चाहे वो निजाम के महल में रखी अनगिनत कलाकृतियां हों या सैकड़ों घड़ियां, जिनके घड़ियाल की टन-टन लोग पैसा खर्च कर सुनने आते हैं, या फिर चारमीनार से लेकर लजीज बिरयानी और हलीम की दुकानें, हैदराबाद के पास बहुत कुछ ऐसा है जो हैरान करता है

फोटा​ेः शिप्रा दास

संरक्षण का काम जारी होने के बावजूद चारमीनार की शान और खूबसूरती ज्यों की त्यों बरकरार है। अनार और तरबूज इस खूबसूरती के स्वाद को बढ़ाते हैं। महिलाओं और खासतौर पर बुर्कानशीं औरतों की पसंद के कांच के गहनों की तो बात ही क्या है


फोटो फीचर

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मोबाइल ऐप्स के जमाने में खिलौनों का जादू अभी भी बरकरार है। फिर गहनों और मुंह में पानी लाने वाले स्वादिष्ट पकवानों से सजी दुकानें भी आपको खींचती हैं। यहां हैदराबादी बिरयानी से लेकर कबाब और हलीम, जिसका अब पेटेंट हो चुका है, सभी कुछ आपके लिए हाजिर है


20 विशेष

26 जून - 2 जुलाई 2017

वन और जीवन का बिगड़ा नाता वन महोत्सव सप्ताह (1-7 जुलाई) पर विशेष

वन केवल पेड़ों का सघन संयोजन नहीं, बल्कि उसके अंदर एक भरा-पूरा वन्यजीव संसार होता है, जिसका उजड़ना मानव जीवन के लिए गंभीर संकट है

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एसएसबी ब्यूरो

ते दो दशकों में पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर जो बहस तेज हुई है, उसका नतीजा है कि एक तरफ जहां तमाम देशों की सरकारें इस बात को समझने के लिए बाध्य हुई हैं कि पर्यावण की कीमत पर वह विकास का ऊंचा मीनार भले खड़ा कर लें, पर टिकाऊ विकास को लेकर वे आश्वस्त नहीं हो सकते। ऐसा इसीलिए क्योंकि प्रकृति के साथ व्यापक स्तर पर हुए खिलवाड़ के खतरनाक नतीजे अब दिखने लगे हैं। विश्व के कई ऐसे मुल्क हैं जो लगता है मानो हिमयुग की तरफ बढ़ रहे हैं, तो वहीं दुनिया के कई हिस्सों में प्यासी धरती की दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो इसमें सबसे जरूरी है वन संपदा की सुरक्षा। शहरीकरण का जोर आज हर तरफ है। इसी तरह विकास और उपभोग के बढ़ते जा रहे

रकबे के कारण भी जंगल हमसे दूर होते जा रहे हैं। जनसंख्या के बढ़े दबाव के बीच वनों की सुरक्षा की चुनौती कोई आसान बात नहीं है। बात करें भारत की तो यहां 1.73 लाख गांव ऐसे हैं, जो वनों के अंदर या उनके आसपास रहते हैं और इन गांवों में रहने वाली आबादी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वनों पर निर्भर है। आदिवासी जीवन की कल्पना तो बिना वनों के की ही नहीं जा सकती। जीवन का आधार माने जाने वाले जगलों का आज जिस तरह विनाश हो रहा है, उसे रोका नहीं गया तो मानव विनाश अवश्वंभावी है।

दरअसल, वन केवल पेड़ों का बेतरतीब संयोजन नहीं, बल्कि उसके अंदर एक भरा पूरा वन्यजीव संसार होता है, जिसे मनुष्य बेरहमी से उजाड़ने पर तुला है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 1901 से लेकर 1950 तक भारत में 14 मिलियन हेक्टेयर यानी कि एक करोड़ चालीस लाख हेक्टेयर भूमि पर से वनों का नामोनिशन मिट गया था। उसके बाद 1950 से लेकर 1980 तक वन क्षेत्र में 75.8 मिलियन हेक्टेयर की गिरावट आई। उसके बाद चिपको आंदोलन

1950 से लेकर 1980 तक वन क्षेत्र में 7.58 करोड़ हेक्टेयर की कमी आई। उसके बाद चिपको आंदोलन के प्रयासों से सरकार और आम जनता का ध्यान वृक्षों की सुरक्षा की ओर जाने से वनों के विनाश की गति में काफी कमी दर्ज की गई

एक नजर

भारत में 1.73 लाख गांव वनों के अंदर या उनके आसपास शहरीकरण के बढ़े वैश्विक जोर ने बढ़ाया पर्यावरण संकट

भारत दुनिया के 17 मेगा बायोडाइवर्सिटी वाले देशों में शामिल

के प्रयासों से सरकार और आम जनता का ध्यान वृक्षों की सुरक्षा की ओर जाने से वनों के विनाश की गति में काफी कमी दर्ज की गई। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग द्वारा हर दो साल में जारी होने वाली वनस्थिति रिपोर्ट में 2013 के सर्वेक्षण के मुकाबले


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विशेष

उत्तराखंड में दावानल की विनाश लीला

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प्रचुर वन संपदा और जैव विविधता वाले राज्य उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने कोहराम मचा रखा है

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वन स्थिति रिपोर्ट में देश के 16 राज्यों में वनावरण में गिरावट का झुकाव बताया गया है। इन राज्यों में दो साल के अंदर ही 1180 वर्ग किलोमीटर वनावरण गायब हो गया है 2015 में 5081 वर्ग किलोमीटर वनावरण की वृद्धि दिखाई गई। इस रिपोर्ट में देश का वनावरण 21.34 प्रतिशत दिखाया गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की 1999 के बाद की तमाम रिपोर्टों पर गौर करें तो उनमें वनावरण में निरंतर वृद्धि नजर आती है। 1999 की वन स्थिति रिपोर्ट में जहां वनावरण 19.39 प्रतिशत दिखाया गया था, वहीं 2015 की रिपोर्ट में वनावरण बढ़ कर 21.34 प्रतिशत हो गया। जिसमें 2.61 प्रतिशत घनघोर वन और 9.59 घने वनों के साथ ही 9.14 प्रतिशत खुले वन बताए गए हैं। विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 1972 से 1978 के बीच भारत में वनावरण 17.19 प्रतिशत था। इस प्रकार हर दो साल बाद आने वाली इन रिपोर्टों में वनावरण में निरंतर वृद्धि तो नजर आती है मगर जब इन रिपोर्टों को गौर से देखा जाता है तो इनमें जंगलों की असली तस्वीर नजर आती है। अगर 1999 की रिपोर्ट में देश में सघन वन 11.48 प्रतिशत दिखाए गए हैं, जबकि 2015 तक पहुंचतेपहुंचते ऐसे घनघोर जंगल सिकुड़ कर 2.61 प्रतिशत ही रह गए। विभाग के पैमाने के अनुसार सघन वन

वे होते हैं, जिनमें सत्तर प्रतिशत से अधिक वृक्षछत्र या कैनोपी होती है। चालीस से लेकर सत्तर प्रतिशत तक वृक्षछत्र वाले वन मामूली घने वनों में और दस से लेकर चालीस प्रतिशत तक छत्र वाले वन खुले या छितरे वनों की श्रेणी में आते हैं। दरअसल, यही घनघोर जंगल वन्यजीवन के असली आश्रयदाता हैं। इन घने वृक्षछत्रों के नीचे ही एक भरा-पूरा वन्यजीव संसार फलता-फूलता है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष और इन संघर्षों में होने वाली मौतों में वृद्धि का असली कारण भी इन सघन वनों में निरंतर ह्रास होना ही है। घनघोर या सघन वनों के बारे में भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्टों को अगर ध्यान से देखें तो 1999 की रिपोर्ट में जहां इस तरह के वन 11.48 प्रतिशत बताए गए हैं, वहीं इनका आकार 2001 में 12.68 फीसद, 2003 में 1.23 फीसद 2009 में 2.54 फीसद और 2011 की वन स्थिति रिपोर्ट में 2.54 फीसद बताया गया है। 1999 से लेकर 2015 तक सघन वनों में भारी गिरावट साफ नजर आ रही है। इससे भी चिंता का विषय यह है कि उत्तराखंड

व विविधता की दृष्टि से विश्व के संपन्न निरीह सरीसृपों और कीट-पतंगों का क्या हाल क्षेत्रों में गिने जाने वाले उत्तराखंड में के हुआ होगा जो कि दावानल की गति से भाग ही जंगलों में लगी आग ने कोहराम मचा दिया है। नहीं सकते। इसी तरह तमाम वनस्पतियां और केंद्र और राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन बलों वन्यजीव एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। कुछ के साथ ही सेना को भी दावानल का मुकाबला पादप या जीव भी नष्ट हो जाएं तो एक दूसरे करने के लिए तैनात किया गया। कीट-पतंगों से पर पराश्रय की वह श्रृंखला ही टूट जाती है। लेकर स्तनपायी जीवों तक की हजारों प्रजातियों यहां तो सवाल एक दो जीवों या पादपों के लुप्त के करोड़ों जीवों के जल-भुन जाने के महासंकट होने का नहीं, बल्कि जंगलों के जीवन विहीन ने स्थिति भयावह कर दी है। होने का है। बीते साल ही तराई से लेकर तिब्बत सीमा उत्तराखंड का दो-तिहाई भूभाग वन क्षेत्र से लगे नंदादेवी बायोस्फीयर रिजर्व तक और है। इसकी सत्तर प्रतिशत आबादी वनों के अंदर काली-टोंस नदियों के बीच स्थित अस्कोट या वनों के नजदीक चारों ओर बसी हुई है। से लेकर आरोकोट तक के इसीलिए उत्तराखंड में जंगल उत्तराखंड के जंगल धधक जीवन को अलगउत्तराखंड की सत्तर और उठे। राज्य प्रशासन की अलग नजरिए से नहीं देखा तंद्रा तब टूटी जब राष्ट्रीय प्रतिशत आबादी वनों जा सकता। अगर जंगल राजमार्गों पर चल रहे लोग के अंदर या वनों के कष्ट में है तो समझिए कि भी आग की चपेट में आने उत्तराखंड का जनजीवन भी नजदीक चारों ओर कष्ट में ही होगा। हर साल लगे। वनाग्नि की लंबी अग्नि रेखा सब कुछ भस्म कर वनाग्नि और वन्यजीवों द्वारा बसी हुई है आगे बढ़ती है तो अपने पीछे भारी संख्या में लोगों का मारा केवल राख छोड़ती चली जाना उत्तराखंड के लोगों का जाती है। वनाग्नि बड़े वृक्षों को छोड़ कर उसके वनों से अटूट रिश्ते का खुलासा करता है। इस आगे आने वाली हर वनस्पति और हर एक वन प्रदेश के भरपूर वन्यजीव संसार की सुरक्षा जीव का अस्तित्व राख में बदल कर चलती तो केवल कानून के तालों और डंडों के सहारे जाती है। इस आग की चपेट में अब तक हजारों चल रही है। अलबत्ता वनों के असली रखवाले हेक्टेयर वनक्षेत्र आ चुका है, जिसमें वन्य जीवों तो वनवासी हैं, जिनके जीवन का आंगन हैं वन। के लिए संरक्षित राष्ट्रीय पार्क, वन्यजीव विहार इन लोगों की समस्या के बारे में भी अलग से और कर्न्वेशन रिजर्व भी शामिल हैं। बाघ और विचार करने और नीति बनाने की जरूरत है। हिरन जैसे स्तनधारी वन्यजीव तो जान बचाकर इसके लिए पर्यावरण प्रेमी सरकार पर लगातार सुरक्षित क्षेत्र की ओर भाग सकते हैं, मगर उन दबाव भी बना रहे हैं।


22 विशेष

26 जून - 2 जुलाई 2017

प्रेरक मुहिम

हिमाचल को और नयन का इंतजार सिरमौर जिले के नयन सिंह ने अपनी उपजाऊ जमीन पर देवदार के दस हजार पेड़ तैयार करके पेश की मिसाल

प्रदेश देश का एक ऐसा हिमाचल राज्य है, जिसके हिस्से पर्वतीय

नहीं बनी रह सकती। वन संरक्षण की ऐसी ही एक मिसाल पेश की है सिरमौर क्षेत्र के साथ वन क्षेत्र भी सबसे ज्यादा जिले के नयन सिंह ने। उन्होंने अपनी आता है। हिमाचल और हिमालय का उपजाऊ जमीन पर देवदार के दस हजार रिश्ता सदियों पुराना है, पर दुर्भाग्य से पेड़ तैयार कर दिए हैं। 1958 में पंजाब इस संबंघ के तार अब एक-एक करके यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद टूटते जा रहे हैं, कमजोर होते जा रहे हैं। नयन सिंह ने खेतीबाड़ी को अपना पेशा हिमाचल में गलोबल वार्मिंग का खतरा बनाया। एक-एक पेड़ लगाते रहे। बाद बढ़ रहा है, जिसके कारण वन संपदा में अपनी इस मुहिम से उन्होंने अपने पूरे व कृषि पर संकट पैदा हो गया है और परिवार को भी जोड़ा। पिछले 60 वर्षों यह बात कोई औऱ नहीं बल्कि भारतीय में उन्होंने एक भी पेड़ नहीं काटा। आज वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद नयन सिंह की 560 बीघा भूमि पर 10 कह रहा है। परिषद के अध्ययन के हजार से अधिक देवदार के पेड़ हैं। मुताबिक हिमाचल में ग्लोबल वार्मिंग के दिलचस्प है कि पर्यावरण प्रेमी कारण प्रतिवर्ष तापमान बढ़ता जा रहा नयन सिंह को अपनी इस मुहिम के लिए है। जो तापमान भूमि के नीचे था, वही किसी सरकारी प्रोत्साहन या आर्थिक तापमान अब भूमि के काफी ऊपर चला सहायता का मोहताज नहीं होना पड़ा। गया है। आलम यह है कि यहां तापमान उन्होंने अपने बूते ही वन संरक्षण का 1 हजार फुट पर 1 डिग्री बढ़ जाता है काम हाथ में लिया। पर यह कोई आसान और अभी तक 4 डिग्री तापमान बढ़ा पर्यावरण प्रेमी नयन सिंह को अपनी इस मुहिम काम नहीं है। कम ही लोग होंगे जो नयन है, जिससे कि वन संपदा व कृषि पर ह की तरह पर्यावरण प्रेम का जज्बा के लिए किसी सरकारी सहायता का मोहताज सिं इसका काफी प्रभाव पड़ रहा है। ग्लोबल रखते हों। 1958 में पंजाब यूनिवर्सिटी नहीं होना पड़ा। उन्होंने अपने बूते ही वन वार्मिंग के कारण ही यहां वनों में आए से स्नातक करने के बाद नयन सिंह दिन आग भी लग रही है। गर्मी बढ़ती जा चाहते तो आराम से नौकरी पा सकते थे, संरक्षण का काम हाथ में लिया रही है और जल स्रोत सूखते जा रहे हैं। लेकिन उन्होंने खेतीबाड़ी को चुना और हिमाचल की वन संपदा में मुख्य पौधे लगाने में लग गए। उनके दो बेटे के जंगल फैल गए हैं। पर हिमाचल में इन्हीं रूप से देवदार के पेड़ हैं, पर अब उनमें भी संकटों के बीच कुछ अच्छी पहलों ने भी आकार राजेंद्र और वीरेंद्र और पोते-पोतियां भी इस मुहिम बीमारी लग रही है। नतीजतन यहां लगातार लेनी शुरू ​िकया है। ऐसा इसीलिए क्योंकि यहां में जुड़े हैं। देवदार के जंगल के अलावा सिंह देवदार के पेड़ खत्म होते जा रहे हैं। यही नहीं, के लोग वनों को होने वाले नुकसान के खतरे चीड़ का जंगल भी तैयार कर रहे हैं। इसके लिए शहरीकरण के बढ़े जोर के कारण जहां पहले को समझते हैं और उन्हें लगता है कि वनों की उन्होंने खुद अपनी नर्सरी लगाई हुई है। हिमाचल देवदार के घने जंगल होते थे, वहां अब कंक्रीट हरियाली को खोकर उनके जीवन की खुशहाली को आज ऐसे ही और वनपुत्रों का इंतजार है। और मिजोरम जैसे राज्यों में न केवल सघन वन, बल्कि संपूर्ण वनावरण घट रहा है। यह सरकारी रिपोर्ट बताती है कि 2013 से लेकर 2015 के बीच मिजोरम में 306 वर्ग किलोमीटर, उत्तराखंड में 268 वर्ग किलोमीटर, तेलंगाना में 168 वर्ग किलोमीटर, नगालैंड में 78 वर्ग किलोमीटर और अरुणाचल में 73 वर्ग किलोमीटर वनावरण घट गया। कुल मिलाकर वन स्थिति रिपोर्ट में देश के 16 राज्यों में वनावरण में गिरावट का झुकाव बताया गया है। इन राज्यों में दो साल के अंदर ही 1180 वर्ग किलोमीटर वनावरण गायब हो गया है। वनावरण घटने वाले राज्यों में अरुणाचल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, पंजाब, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड और दादर नागर हवेली शामिल हैं। इनके अलावा ऐसे भी राज्य हैं जहां कुल मिलाकर वनावरण तो बढ़ा है मगर सघन या घनघोर जंगल घट गए हैं। ऐसे राज्यों में जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश भी शामिल हैं। कह सकते हैं केवल दो साल के अंदर देश के देश के अस्सी जिलों में वनावरण घट गया। आलम यह है कि जनसंख्या

एफआरआई की एक रिपोर्ट के अनुसार 1951 से लेकर 2007 तक देश में कुल तीन करोड़ 98 लाख हेक्टेयर में वृक्षारापेण हुआ

दबाव के चलते देश में जहां घने वन लगातार सिकुड़ रहे हैं वहीं खुले वनों का विस्तार हो रहा है, पर यह वन संपदा की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। इसका मतलब कहीं न कहीं यह है कि जिन राज्यों में कुल वनावरण नहीं घटा मगर सघन वन घट गए हैं तो वहां वनों के विनाश की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। वन सर्वेक्षण के लिए उपग्रहों के जरिए धरती के चित्र लेता है जिसमें लैंटाना की तेजी से फैल रही झाड़ियां भी ग्रीन कवर के रूप में शामिल हो जाती है। जाहिर है इससे वनों के फैलाव को लेकर भ्रांति पैदा होती है। भारत दुनिया के 17 मेगा बायोडाइवर्सिटी यानी वृहद् जैव विविधता वाले राष्ट्रों में से एक गिना गया है। भारत में भी जैव विधिता के चार हॉटस्पॉट हैं जिनमें पूर्वी हिमालय एक है। इस पूर्वी हिमालय में उत्तर पूर्व के राज्य शामिल हैं जहां झूम खेती या ‘शिफ्टिंग कल्टीवेशन’ और विकास की दूसरी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर वनों का विनाश हो रहा है। 2013 से लेकर 2015 तक की दो साल की अवधि में ही उत्तर पूर्व के आठ राज्यों में 628 वर्ग किलोमीटर वनावरण गायब हो गया है। उत्तर पूर्व में सैकड़ों की संख्या में जनजातियां और उनकी उपजातियां निवास करती हैं, जिनका जीवन पूरी तरह वनों पर ही निर्भर होता है। इसलिए वनों को बचाना इस दुर्लभ होती जा रही जनजातीय सांस्कृतिक विविधता और विलक्षण धरोहर को बचाने के लिए भी जरूरी है। इसी तरह पहाड़ी जिलों में भी वनावरण घटने की प्रवृत्ति निरंतर जारी है। 1988 की वन नीति के अनुसार पर्यावरण के सही संतुलन के लिए मैदानी क्षेत्रों में कुल भूभाग का एक तिहाई यानी कि तैंतीस प्रतिशत और पहाड़ी क्षेत्रों में दो तिहाई भूभाग वनाच्छादित होना चाहिए, लेकिन देश में 11 राज्य ऐसे हैं, जहां का वनावरण निर्धारित मानकों से काफी कम है। आश्चर्य की बात तो यह है कि जैविक विविधता के लिहाज से गरीब राज्य विकास के मामले में सबसे समृद्ध हैं। इनमें गुजरात भी शामिल है जिसका वनावरण महज चौदह प्रतिशत रह गया है। इसी तरह राजस्थान और उत्तर प्रदेश का वनावरण 16 फीसद और महाराष्ट्र का इक्कीस प्रतिशत ही रह गया है। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार 1951 से लेकर 2007 तक देश में कुल तीन करोड़ 98 लाख हेक्टेयर में वृक्षारापेण हुआ। अगर सचमुच इतना वृक्षारोपण हुआ होता तो आज भारत में प्रतिव्यक्ति वनावरण में इतनी कमी नहीं होती। विश्व में प्रति व्यक्ति वनक्षेत्र उपलब्धता 0.64 हेक्टेयर है, जबकि भारत में प्रतिव्यक्ति वनक्षेत्र उपलब्धता मात्र 0.08 ही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रिपोर्ट (1990) के अनुसार भारत में वृक्षारोपण की सफलता बहुत कम है। यहां रोपे गए पौधों में से औसतन 65 प्रतिशत ही जीवित रह पाते हैं।


26 जून - 2 जुलाई 2017

रांची में रात्रि का खादी बाजार झारखंड रात्रि बाजार

शहर की हृदयस्थली अलबर्ट एक्का चौक है और यहीं खादी रात्रि बाजार की शुरुआत हुई। प्रत्येक शनिवार को लगने वाले इस बाजार का उदघाटन जस्टिस डॉ. एसएन पाठक ने किया

रां

अपनी दुकानें सजाईं। बांबे चौपाटी की चाट, गोला चुस्की, लिट्टी चोखा सहित अन्य खाद्य पदार्थें की भी खूब बिक्री हुई। सर्जना चौक के पास छोटे बच्चों के लिए झूले भी लगे थे। हर शनिवार लगने वाले इस रात्रि बाजार में खादी बोर्ड और झारक्राफ्ट के 22-20 स्टॉल रहेंगे। बाजार में बिजली की आकर्षक सज्जा हर बार की जाएगी। जो फुटपाथ दुकानदार और छोटे व्यवसायी दिन में मुख्य सड़क पर दुकान नहीं लगा पाते हैं, रात में उन्हें बाजार लगाने का मौका मिलेगा। रात्रि बाजार में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। ‘धइन-धइन रे धइन हमर’ छोटानागपुरी गीत की धुन जब बांसुरी से निकली, तो लोगों के पांव थिरकने लगे। चुमकी रॉय ने अपनी सुरीली आवाज में ‘ये समां, समां है ये प्यार का’, ‘अच्छा चलना दुआओं में याद रखना...’ सहित अन्य गीत पेश किए। इस दौरान महिला सशक्तीकरण पर आधारित ‘खामोशी कब तक’ नाटक का भी मंचन हुआ। झारखंड खादी बोर्ड की पहल पर शुरू हुई इस पहल के तहत अब हर शनिवार को अलबर्ट एक्का चौक से लेकर सर्जना चौक तक रात्रि बाजार लगेगा। इसमें फुटपाथ दुकानदारों और छोटे व्यवसायियों की भी भागीदारी होगी। यह बाजार शनिवार की रात नौ

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एक नजर

रांची के अलबर्ट एक्का चौ​क पर खादी रात्रि बाजार शुरू

सब के लिए देर रात तक खुलता है ये खादी बाजार इस बाजार की सुरक्षा के लिए किए गए खास इंतजाम

बजे से 12 बजे तक लगेगा। इस दौरान संत जेवियर्स कॉलेज रोड पर पार्किंग की व्यवस्था होगी। इसके अलावा चडरी तालाब रोड, शास्त्री मार्केट के पास भी पार्किंग की व्यवस्था होगी। ई-रिक्शा वालों से भी अपील की गई है कि वे रात्रि बाजार के समय अपनी सेवाएं दें।

करने के लिए नाइट साइकिलिंग भी कर रहे हैं। ऑफिस, स्कूल, कॉलेज से दिन भर समय नहीं मिल पाता है, जिससे शहर के लोग अब नाइट लाइफ को एंज्वॉय कर रहे हैं।

रात्रि बाजार में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया जा रहा है। खादी बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ ने बताया कि इस संबंध में सिटी एसपी, ट्रैफिक एसपी, बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और नगर निगम के वरीय अधिकारियों से बात की गई है और उनसे सहयोग मिल भी रहा है। बाजार के समय शहर में सुरक्षा की खास व्यवस्था होगी। हर चौक-चौराहों पर पीसीआर वैन, मोटरसाइकिल दस्ता रहेगा। महिला पुलिस बल की भी तैनाती रहेगी। जरूरत पड़ने पर किसी परिवार को पुलिस स्कॉट कर उसे घर तक भी पहुंचाएगी। रात्रि बाजार घूमने आए लोगों के लिए एंबुलेंस और चिकित्सा की भी अलग से व्यवस्था की गई है।

रांची ट्रैफिक पुलिस और नगर निगम के संयुक्त प्रयास से रांची की सड़कों पर नाइट लाइफ को बढ़ावा देने के लिए नाइट साइकिलिंग का आयोजन किया जा रहा है। इसमें शहर के सभी एज ग्रुप के लोग हिस्सा ले रहे हैं। नाइट लाइफ को बढ़ावा देने और लोगों में सुरक्षा की भावना जगाने को लेकर शुरू किए गए इस कार्यक्रम में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया है। जिन लोगों के पास साइकिल नहीं है, वैसे लोगों को नगर निगम साइकिल मुहैया करा रही है, जबकि कई लोग अपनी साइकिल ले कर आते हैं। ट्रैफिक से बचने के लिए लोग अब साइकिलिंग को पसंद कर रहे हैं। सभी एज ग्रुप के लोगों को साइकिलिंग करते देखा जा सकता है। इस मुहिम में राइज अप नाम के एनजीओ के लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं और लोगों को जागरूक बना रहे हैं।

सुरक्षा पर खास ध्यान

ची अब पहले की तरह थके-हारे पुराने शहर का नाम नहीं है। न ही वहां के बाजारों का शक्ल पहले की तरह रही और न ही लोगों की मानसिकता। रांची अब एक जिंदादिल शहर का नाम है। इस शहर के पास बाकी महानगरों की तरह अपनी नाइट लाइफ भी है। नाइट लाइफ को लेकर हाल में वहां एक बड़ी कोशिश भी हुई। इसके तहत झारखंड खादी बोर्ड ने रांची के मेन रोड पर खादी रात्रि बाजार शुरू किया। यह बाजार हर शनिवार रात 9:00 बजे से रात 12:00 बजे तक चलेगा। यह मेला राजधानी में नाइट लाइफ की शुरुआत माना जा रहा है। शहर की हृदयस्थली अलबर्ट एक्का चौक है और यहीं खादी रात्रि बाजार की शुरुआत हुई। प्रत्येक शनिवार को लगने वाले इस बाजार का उद्घाटन जस्टिस डॉ. एसएन पाठक ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि यह बाजार झारखंड की जनता की जागरुकता दर्शाता है। यह भी कि खादी सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि आंदोलन है। खादी बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ ने कहा कि रात्रि बाजार का कंसेप्ट रांची को जिंदादिल बनाए रखने के लिए है। ‘खादी नाइट लाइफ’ के दौरान बाजार में खादी बोर्ड के स्टॉलों में खादी के शर्ट, साड़ियां, साबुन, मधु और अन्य उत्पाद उपलब्ध थे। इन उत्पादों की खरीदारी पर 20 प्रतिशत की छूट दी जा रही थी। झारक्राफ्ट के स्टॉलों में भी लोगों की खूब भीड़ देखी गई। छोटे दुकानदारों और विक्रेताओं ने भी

जीवन शैली

महानगरीय शक्ल

झारखंड की राजधानी अब वाकई पहले जैसा नहीं रहा। वहां का शहरी जीवन अब हर लिहाज से महानगरीय शक्ल ले रहा है। जबकि कुछ साल पहले तक रात में आठ बजे के बाद पूरा शहर सुनसान हो जाता था, कहीं आने-जाने के लिए सवारी ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती थी, रास्तों पर सन्नाटा पसर जाता था। सुरक्षा कारणों से लोग रात में घरों से नहीं निकलते थे। समय के बदलाव ने शहर को तो बदला ही है, शहरवासियों के लाइफ स्टाइल में भी बदलाव लाया है। मेट्रो सिटीज की तर्ज पर लोग अब नाइट लाइफ के कल्चर को यहां भी अपने रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं। एक तरह से यहां इसकी शुरुआत हो भी गई है। बीते एक-दो साल से शहर को बदलते देख लोग अब खुद को महफूज महसूस करने लगे हैं। वे बेखौफ होकर रात में दोस्तों, परिवार के लोगों के साथ घूमने-फिरने निकलने लगे हैं। लेट नाइट मूवी, रेस्तरां का कल्चर अलग जोर पकड़ रहा है। लोग अपने दिन भर के बिजी और हेक्टिक शेड्यूल से खुद को बाहर निकाल कर अपने-आप को रिफ्रेश

‘खादी नाइट लाइफ’ के दौरान बाजार में खादी बोर्ड के स्टॉलों में खादी के शर्ट, साड़ियां, साबुन, मधु और अन्य उत्पाद उपलब्ध थे। इन उत्पादों की खरीदारी पर 20 प्रतिशत की छूट दी जा रही थी

ट्रैफिक पुलिस और नगर निगम

बदला फैमिली कल्चर

अब यहां लोग रिश्तेदारों से मिलने के लिए छुट्टी का इंतजार नहीं करते, बल्कि रात में अपने दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं। लोग छुट्टियां मनाने या फिर मन बहलाने के लिए रात के सफर को पसंद करने लगे हैं। बर्थडे सेलिब्रेट करना हो या परिवार वालों के साथ डिनर का प्लान, लोग बेखौफ होकर देर रात को निकलते हैं। रामगढ़ रोड, गुमला रोड में रात भर कई ढाबे और रेस्टोरेंट खुले रहते है, जिसमें फैमिली वालों को देखा जा सकता है। एक चलन जो रांची में और बढ़ा है वह है लेट नाइट मूवी देखना। दिन भर के हेक्टिक शेड्यूल से खुद को रिफ्रेश करने के लिए लोग फैमिली, दोस्तों के साथ मल्टीप्लेक्स में लेट-नाइट मूवी देखने जाते हैं। इसमें सभी एज ग्रुप के लोगों को मूवी-मस्ती करते देखा जा सकता है। इससे देर रात तक चहलपहल दिखाई देती है। पहले सेफ्टी रीजन के कारण लोग खास कर फैमिली वाले रात में मूवी देखने से बचते थे, लेकिन मल्टीप्लेक्स कल्चर के आने से लोग बेधड़क नाइट शो का मजा लेते हैं। आखिरी शो रात साढ़े दस बजे शुरू होता है, जो एक- डेढ़ बजे तक चलता है। वीकेंड में दो बजे रात तक फैमिली घूमती नजर आती है।


24 जेंडर

26 जून - 2 जुलाई 2017

कानपुर की सोलर दीदी सौर ऊर्जा

सोलर दीदी बनने के लिए गुड़िया ने काफी संघर्ष किया। वह भी उस क्षेत्र में संघर्ष, जिसमें हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है

एक नजर

कानपुर से लगे इलाके में खासी लोकप्रिय है सोलर दीदी

सोलर से जुड़ी चीजें रिपेयर करती है सोलर दीदी

बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए बनीं सोलर मैकेनिक

सं

एसएसबी ब्यूरो

घर्ष में लोग अक्सर टूट जाते हैं, पर जो लोग इन दिनों में प्रेरणा के साथ आगे बढ़ते हैं, वे मिसाल बन जाते हैं। यह मिसाल तब तो और भी चमकदार बन जाती है, जब इसके साथ सामयिक जागरुकता का संदेश भी जुड़ जाता है। कानपुर के पास के गांव में एक विधवा ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया, जिसकी आज हर तरफ चर्चा है। गुड़िया, जी हां यही नाम है उनका। वैसे अपने काम के कारण लोग अब उसे ‘सोलर दीदी’ के नाम से ज्यादा जानते हैं। गुड़िया को यह लोकप्रियता रातोंरात हासिल नहीं हुई है। सोलर दीदी बनने के लिए गुड़िया ने काफी संघर्ष किया। वह भी उस क्षेत्र में संघर्ष, जिसमें हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है। गुड़िया से सोलर दीदी बनने की कहानी प्रेरक तो है ही, खासी दिलचस्प भी है। गुड़िया का पूरा नाम गुड़िया राठौड़ है। वह कानपुर के विधानु इलाके के हड़हा गांव की रहने वाली थी। उनकी फतेहफुर में शादी हुई। शादी के बाद स्थिति बहुत अच्छी थी,

ऐसा नहीं कहा जा सकता। कहते हैं कि मुसीबत अक्सर एक ही साथ हर तरफ से आती है। करीब चार साल पहले उनके पति की मृत्यु हो गई। पति की मौत के बाद अपने दो बच्चों के साथ गुड़िया का ससुराल में रहना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा था। इसी दौरान गुड़िया ने फैसला किया कि वह अपने बच्चों की अच्छी परवरिश ससुराल में रहकर नहीं दे पाएंगी। ऐसे में रास्ता एक ही था मायके का। गुड़िया अपने बच्चों को लेकर मायके आ गईं। मायके आकर उन्होंने एक और फैसला किया। यह फैसला था आत्मनिर्भर बनने का। बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए गुड़िया ने घर से बाहर कदम रखा और सामाजिक संस्था ‘श्रमिक भारती’ के साथ जुड़ गईं। यह संस्था केंद्र सरकार की योजना के तहत गांवों में

सोलर लाइट का कार्यक्रम चलाती है। अपने शुरुआती दिनों के बारे में गुड़िया बताती हैं, ‘मैंने पहले ‘श्रमिक भारती’ संस्था ज्वाइन की और उसके सोलर लाइट लगाने के कार्यक्रम से जुड़ गई। आज मैं सोलर लाइट से जुड़ा हर काम कर लेती हूं। शुरू में मुझे लगता था कि ऐसा क्या है इस काम में कि इसे सिर्फ पुरुष कर सकते हैं। महिलाएं किसी काम में पुरुषों से कम नहीं हैं। बस इसी धुन में यह सोलर लाइट का काम मैंने शुरू कर दिया।’

चार साल से लगातार अटूट लगन और मेहनत का नतीजा है कि गांवों के लोगों ने गुड़िया को ‘सोलर दीदी’ के नाम से बुलाना शुरू कर दिया। गुड़िया कहती हैं, ‘पहले जब जब लोग मुझे सोलर दीदी कहते थे तो अजीब लगता था, लेकिन धीरे-धीरे यह नाम मुझे अच्छा लगने लगा।’

इस तरह, गुड़िया ने गांव-गांव जाकर सोलर लाइट, सोलर चूल्हे और सोलर पंखे लगाने का काम शुरू कर दिया। चार साल तक लगातार अटूट लगन और मेहनत का नतीजा है कि गांवों के लोगों ने गुड़िया को ‘सोलर दीदी’ के नाम से बुलाना शुरू कर दिया। गुड़िया कहती हैं, ‘पहले जब जब लोग मुझे सोलर दीदी कहते थे तो अजीब लगता था, लेकिन धीरे-धीरे यह नाम मुझे अच्छा लगने लगा।’ सोलर दीदी न सिर्फ लगन से काम करती हैं, बल्कि काम भी बहुत बढ़िया करती हैं। यही कारण है कि आज विधानु इलाके के गांव बनपुरा, कठारा, उजियारा, तिवारीपुर जैसे दर्जनों गांवो में सोलर मैकेनिक में सिर्फ और सिर्फ ‘सोलर दीदी’ का नाम चलता है। सोलर दीदी की इस लोकप्रियता की वजह के बारे में ग्रामीण भारती बताती हैं, ‘गांव में सोलर लाइट खराब हो, पंखा खराब हो या कुछ भी खराब


26 जून - 2 जुलाई 2017

नूरजहां का सौर प्रकाश नूरजहां पहली बार चर्चा में तब आईं जब प्रधानमंत्री मोदी ने इनका जिक्र नवंबर 2015 में अपनी ‘मन की बात’ में किया

श्रवण शुक्ला / लखनऊ

ह कहानी है नूरजहां की। ‘नूरजहां’ नाम का अर्थ ही है दुनिया को रोशन करना। इसी को चरितार्थ करते हुए कानपुर की नूरजहां नाम की एक महिला सौर ऊर्जा का प्रयोग कर पूरे गांव को रौशन कर रही है। नूरजहां पहली बार चर्चा में तब आईं जब प्रधानमंत्री मोदी ने इनका जिक्र नवंबर 2015 में अपनी ‘मन की बात’ में किया। प्रधानमंत्री अपने रेडियो आधारित कार्यक्रम ‘मन की बात’ में जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर बात कर रहे थे और उन तमाम लोगों को नूरजहां के बारे में बताकर उदाहरण दे रहे थे। मोदी ने तब कहा था कि कानपुर में नूरजहां नाम की एक महिला हैं। टीवी पर देखने से नहीं लगता है कि उन्हें ज्यादा पढ़ने का सौभाग्य मिला है। हालांकि, वह ऐसा काम कर रही हैं, जो शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन के लिए विश्व के बड़े-बड़े लोग क्या-क्या करते होंगे, लेकिन नूरजहां शायद हर किसी को प्रेरणा देने का काम कर रही हैं। नूरजहां करीब 500 घरों में रोशनी फैला रही हैं। उन्होंने महिलाओं की एक समिति बनाई है और सौर ऊर्जा का प्लांट लगाया है। जहां हो गया हो। बस, हम सोलर दीदी को फोन मिलाते हैं। सोलर दीदी अपने बैग में पेंचकस, प्लास और सोलर उपकरण लिए अपनी स्कूटी पर दौड़ी चली आती हैं।’ कहते हैं समय सबको मौका देता है, नई राह दिखाता है। अगर सामने वाला उस संकेत को समझ लेता है तो उसकी स्थिति बदलनी तय है। गुड़िया ने ऐसा ही किया। उन्होंने अपनी पुरानी परेशानियों को नई दिशा दी और उसे साकारात्मक

‘मैंने सोलर लैंप से पांच गांवों की रोशन किया है। जो गांव अंधेरे में रहते थे, उन घरों में अब रोशनी पहुंच रही है। पढ़ने वाले सोलर लैंप शाम को ले जाते हैं और रात में उसी लैंप में पढाई करते हैं’ –नूरजहां से गांव के लोग रोजाना शाम को लालटेन ले जाते हैं और सुबह चार्ज करने के लिए दे जाते हैं। एक लालटेन की कीमत है 100 रुपए और चार्ज करने में 3-4 रुपए का खर्च आता है। 75 साल की नूहजहां कानपुर देहात के शिवली थाना अंतर्गत बेरी दरियावां गांव में रहती है। गरीबी ने उन्हें इस काम को शुरू करने की प्रेरणा दी। वह बताती हैं, ‘पति की मौत के बाद मैं खूब रोई। इसीलिए नहीं कि मैं अकेली हो गई बल्कि इसलिए कि अब 7 बच्चों का पेट कैसे भरूंगी। मुश्किल से एक टाइम खाना खिला पाती थी। न पैसा था, न जमीन और न ही सिर पर छत। आर्थिक तंगी के बना दिया। इस राह पर मेहनत तो है पर आत्मनिर्भर बनने का सुकून भी है। आज यही सुकून सोलर दीदी को भी है। वह कहती हैं, ‘एक समय मुझे ऐसा लगा जीवन में अब क्या होगा, लेकिन हर मुश्किल से निकलने का रास्ता होता है। बस जरूरी है उससे निकलने आना चाहिए। मैं जो कर रही हूं, उससे मुझे सुकून मिलता है।’ स्थानीय ग्रामवासी कल्लू का कहना

कारण बच्चों को पढ़ा भी नहीं पाई।’ आज नूरजहां के पांचों लड़के दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। सबसे छोटे बेटे को छोड़कर सबकी शादी हो गई है और सब अपने-अपने परिवार के साथ पास के ही गांव में रहते हैं। नूरजहां को सौर ऊर्जा से लालटेन जलाने का काम को शुरू करने में ‘श्रमिक भारती’ संस्था ने मदद की थी। ‘श्रमिक भारती’ की राधा शुक्ला ने नूरजहां की गरीबी और उम्र को देखते हुए न केवल सोलर पैनल का इंतजाम करवाया, बल्कि पचास ऐसे लालटेन दिलवाए जो कि सौर ऊर्जा से चार्ज हो जाते थे। इसके बाद नूरजहां ने सबसे पहले अपने घर के छत पर पांच सोलर पैनल लगाए। कमरे में सभी लैंप को चार्ज करने के लिए तार से लेकर बैटरी तक लगाए गए। नूरजहां बताती हैं, ‘इस पूरे सेटअप में ‘श्रमिक भारती’ ने एक रुपया भी नहीं लिया, लेकिन मैं लालटेन से होने वाली कमाई का पचास फीसदी हिस्सा ‘श्रमिक भारती’ को देती हूं। शुरुआत में केवल 5-6 लोग ही लालटेन लेने आते थे। 3-4 महीने तक ऐसा ही चला। इसके बाद बेटों ने इसके लिए प्रचार करना शुरू किया। इसका असर भी हुआ और एक साल में 45 और लोग लालटेन ले गए।’ एक लालटेन के लिए एक महीने है, ‘सोलर दीदी को हम गांव वाले जब भी फोन करते हैं। वह तुरंत अपना बैग लेकर आती हैं। घर में सोलर से जुड़ी हर समस्या का एक ही समाधान है और वह हैं सोलर दीदी।’ वैसे अपने दम पर अकेले एक महिला का इस तरह से दर्जन भर गांवों में काम करना किसी पर्वत पर चढ़ने से कम नहीं है। शहरों में चाहे जितनी सुविधाएं हों, फिर भी

जेंडर

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का किराया 100 रुपए है। इस तरह 45 लालटेन से 4500 रुपए की कमाई हुई। इसमें से 2000 रुपए वह संस्थान को देती हैं और 2500 रुपए अपने पास रखती हैं। नूरजहां पांच साल से सोलर लैंप चार्ज कर गांवों तक पहुंचाने का काम कर रही हैं। उनके ही शब्दों में, ‘मैंने सोलर लैंप से पांच गांवों की रोशन किया है। जो गांव अंधेरे में रहते थे, उन घरों में अब रोशनी पहुंच रही है। पढ़ने वाले सोलर लैंप शाम को ले जाते है और रात में उसी लैंप में पढ़ाई करते हैं। सुबह होते ही यह लैंप मुझे दे जाते हैं। मैं उन्हें फिर चार्जिंग पर लगा देती हूं। इसके साथ ही दुकानदार भी सोलर लैंप ले जाते है। जरूरत पड़ने पर लोग शादी-विवाह और दूसरे घरेलू कार्यक्रमों के लिए भी ग्रामीण सोलर लैंप ले जाते हैं।’ उन्होंने बताया, ‘हमारा मकसद है कि इस तरह जनपद के सभी ब्लाक में सेंटर बनाए जाएं। इन सेंटरों में सोलर प्लांट लगाकर सोलर लैंप को चार्ज किया जाए, इसके बाद जरूरतमंदों तक पंहुचा जाए। लेकिन हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि हम अपनी मुहिम को आगे बढ़ा सके। बड़ी मुश्किल से ही हमारी दाल रोटी चल पा रही है।’ नूरजहां के बेटे शादाब अली ने बताया कि पहले गांव तक मैं खुद सोलर लैंप देने जाता था और फिर लेने जाता था। इसके लिए मैं उनसे 10 रुपए लेता था। लेकिन अब ग्रामीण खुद ही सोलर लैंप ले जाते हैं, लेकिन इस काम से हमारा परिवार नहीं चल पा रहा है। गरीबी की वजह से हम सभी भाई-बहन पढ़ लिख नहीं सके। यदि यही हाल रहा तो हमारे बच्चे भी शिक्षा के आभाव में रह जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मन की बात’ में नूरजहां की तारीफ की तो उनके घर अधिकारियो और मीडिया का जमावड़ा लग गया था। यह सब देखकर उनके एक उम्मीद जगी थी कि उनके लिए मदद के कई हाथ बढ़ेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनको एक लाख रुपए की मदद दी । दुखद है कि नूरजहां का परिवार इतनी मेहनत और संघर्ष के बाद आज आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। पैसे के अभाव में नूरजहां का सपना कहीं न कहीं टूट भी रहा कि आसपास के सारे गांव सोलर लाइट से जगमगा उठेंगे। अलबत्ता नूरजहां ने हिम्मत आज भी नहीं हारी है। वह मानती हैं कि सौर ऊर्जा वक्त की मांग है, इसीलिए मुसीबतें बढ़ने के बावजूद वह सौर्य प्रकाश फैलाने के काम को नहीं छोड़ेंगी। आप ने नहीं देखा होगा कि कोई महिला घरघर जाकर बिजली या सोलर से जुड़ी समस्याओं को दूर करती हो। गुड़िया उर्फ सोलर दीदी की हिम्मत सिर्फ तारीफ के लायक ही नहीं, बल्कि प्रेरणादायक भी है। सोलर दीदी का संघर्ष और उसके बाद उन्हें मिली सफलता आज कानपुर और उसे लगे क्षेत्र के साथ देश की कई महिलाओं का आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरणास्रोत है।


26 गुड न्यूज

26 जून - 2 जुलाई 2017

सरकार फैसला

अनूठा कीर्तिमान

नौ साल की धनश्री ने माउंट एलब्रस किया फतह जि

गुजरात की धनश्री मेहता सबसे कम उम्र में 18 हजार 510 फीट ऊंची पर्वत श्रृंखला के शिखर पर पहुंची

स नौ साल की उम्र में जब दूसरे बच्चे खेलने में व्यस्त रहते है, उसी उम्र में गुजरात की धनश्री मेहता यूरोप की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला माउंट एलब्रेस को फतह कर करने का जज्बा दिखाती है। 18 हजार 510 फीट ऊंची पर्वत श्रृंखला धनश्री ने अपनी मां सारिका, 13 साल के भाई जनम और पिता जिगनेश के साथ फतह की। पूरे परिवार ने 13 जून को चढ़ाई शुरू की थी और 18 जून को इस परिवार ने माउंट एलब्रेस फतह कर लिया। पेशे से डॉक्टर, पर्वतारोही और बाइकर धनश्री की मां सारिका का कहना है कि चढ़ाई के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब हम वापस लौटने

की तैयारी करने लगे। क्योंकि तूफान की वजह से आगे बढ़ पाना संभव नहीं हो पा रहा था, लेकिन बच्चों ने दृढ़ता दिखाई और हम डटे रहे। बच्चों ने कहा कि जब हमने तीन चौथाई चढ़ाई पूरी कर ली है तो शिखर तक पहुंचेंगे ही। चढ़ाई का आखिरी दिन सबसे ज्यादा कठिन था क्योंकि उन्हें 10 से 12 किलो वजन पीठ पर लादकर शिखर तक पहुंचने में 11 घंटे लगे। धनश्री और जनम का उत्साह बढ़ाने में दूसरे पर्वतारोहियों ने भी मदद की। धनश्री का कहना है कि मेरी मां ने कभी माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई नहीं की, लेकिन मैं वहां जाना चाहती हूं। हम एक बार परिवार के साथ माउंट एवरेस्ट फतह करने जरूर जाएंगे। (एजेंसी)

ऊर्जा बचत

ओपन मोड पर रहेंगे दिल्ली मेट्रो के नए गेट

ऊर्जा की बचत के लिए दिल्ली मेट्रो ने ऐसे फेयर कलेक्शन गेट लगाए हैं जो हमेशा ओपन मोड में रहेंगे

ने दिल्ली मेट्रो के चार स्टेशनों पर डी एमआरसी नए ऑटोमेटिक फेयर कलेक्शन गेट इंस्टॉल

किए हैं, जो हमेशा खुले रहते हैं, यानी ओपन मोड में रहते हैं। यह गेट तभी बंद होता है जब एंट्री या एग्जिट करने वाले का कार्ड या टोकन इनवैलिड हो। मेट्रो ने यह पहल एनर्जी बचाने और बेहतर सर्विस मुहयै ा कराने के मकसद से की है। आनेवाले दिनों में इसका ज्यादा इस्तेमाल करने पर विचार किया जा सकता है। अभी यह ट्रायल बेसिस पर है और पैसेंजर्स का अनुभव लिया जा रहा है। आमतौर पर ऑटोमेटिक फेयर कलेक्शन गेट क्लोज मोड में रहता है। यह तभी खुलता है जब कोई पैसेंजर एंट्री या एग्जिट करने के लिए स्मार्ट कार्ड

या टोकन शो करता है। हर एंट्री और हर एग्जिट में गेट का फ्लैप खुलता है। औसतन दिल्ली में रोजाना 30 लाख लोग सफर करते हैं तो 30 लाख बार गेट खुलते और बंद होते हैं। इसमें काफी एनर्जी वेस्ट होती है। अब इसी एनर्जी को बचाने के लिए मेट्रो ने ट्रायल बेसिस पर वॉयलेट लाइन पर दिल्ली गेट, जामा मस्जिद, लाल किला और कश्मीरी गेट पर ओपन मोड वाले एएफसी गेट इंस्टॉल किए हैं। इन चार स्टेशनों पर एएफसी गेट हमेशा खुले रहते हैं। वैलिड टोकन या कार्ड वाले जब पंच करते हैं तो उनकी एंट्री या एग्जिट हो जाती है, लेकिन जैसे ही कोई इनवैलिड कार्ड या टोकन यूज करता है गेट का फ्लैप बंद हो जाता है, ताकि अनऑथराइज्ड एंट्री या एग्जिट नहीं हो सके। मेट्रो का कहना है कि इस मैकनि े ज्म से गेट्स की मोटर का कम इस्तेमाल होगा। इससे एनर्जी की बचत होगी। लोगों को इसके इस्तेमाल के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, इसलिए छोटे लेवल पर इसकी शुरुआत की गई है। किसी को दिक्कत नहीं हो, इसके लिए गेट के पास साइनेज और स्टिकर लगाया गया है। अभी तक हेरिटेज लाइन के अलावा किसी भी ऑपरेशनल फेज में इस गेट का इस्तेमाल नहीं किया गया है। (भाषा)

पासपोर्ट के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा

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डाकघरों के साथ मिल कर पासपोर्ट सेवा केंद्र खुलने से लोगों को पासपोर्ट के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना होगा

सपोर्ट बनवाने के लिए देश में किसी भी नागरिक को 50 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी न तय करनी पड़े। केंद्र सरकार ने यह लक्ष्य तय किया है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि जब मैंने मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी,तब देश में 77 पासपोर्ट सेवा केंद्र थे। विदेश मंत्री ने कहा कि दूरी की समस्या को देखते हुए हमने इसे कम करने के लिए हमने 16 और पासपोर्ट सेवा केंद्र खोलने की शुरुआत की। इसके तहत 14 केंद्र खुल गए हैं, बाकी दो भी खुलने वाले हैं। फिर भी लगा कि यह कम है तो हमने और डाक विभाग ने मिलकर डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्र खोलने का फैसला किया। प्रमुख पासपोर्ट अधिकारी अरुण कुमार चटर्जी ने बताया कि डाकघरों के साथ पासपोर्ट सेवा शुरू करने की 25 जनवरी को घोषणा की गई। पहले चरण में हमने 86 डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्र खोलने का

कार्यक्रम बनाया है। अब तक 53 केंद्र खुल चुके हैं। हर रोज 50 से 100 अप्वांइंटमेंट इन केंद्रों पर दिए जा रहे हैं। 22 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में यह काम शुरू किया गया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बताया कि दूसरे चरण में 149 डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्रों का चयन किया गया है। इसके बाद तीसरे चरण के तहत 50 किलोमीटर की अधिकतम दूरी का लक्ष्य तय किया गया है। डाक विभाग के तहत 810 मुख्य डाकघर हैं। मैंने कहा है कि इनकी मैपिंग करा ली जाए, ताकि लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। (भाषा)

जल संचयन

जल अभियान से बदली अजमेर की किस्मत

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जल संकट से मुक्ति पाने के लिए राजस्थान में मुख्यमंत्री जल स्वाबलंबन अभियान की वजह से अजमेर की तस्वीर बदली

नी की कमी से जूझ रहे राजस्थान को जल संकट से उबारने के लिए चलाए जा रहे मुख्यमंत्री जल स्वाबलंबन अभियान का लाभ अजमेर को भी मिला है। अभियान के दूसरे चरण में अजमेर जिले की 9 पंचायत समितियों की 45 ग्राम पंचायतों के 108 गांवों का चयन किया गया है। परियोजना पर काम तेजी से चल रहा है। मुख्यमंत्री जल स्वाबलंबन परियोजना से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि परियोजना के तहत अजमेर जिले में 3753 कार्यों को मंजूरी दी गई है। इन कार्यक्रमों पर करीब 49 करोड़ 4 लाख रुपए खर्च होंगे। मंजूर किए गए कार्यों में से 432 कार्य पूरे हो चुके हैं, जबकि शेष प्रगति पर हैं। उन्होंने बताया कि अजमेर शहर में अभियान के दूसरे चरण में दो निकायों में 81 लाख 64 हजार रुपए की लागत के 43 कार्य मंजूर किए गए हैं। इनमे से 36 कार्य पूरे हो चुके हैं और शेष कार्य चल रहे हैं। अभियान के तहत शहरी क्षेत्र की 7 बावड़ियों का चयन किया गया है और 10 सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर बनाए गए हैं। संकलित किए गए वर्षा

के पानी का उपयोग बगीचों की सिंचाई के लिए किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री जल स्वाबलंबन अभियान के दूसरे चरण में अजमेर शहर की 7 बावड़ियों का जीर्णोद्धार कराया गया है। इनमें तालाब बावड़ी, आम का तालाब, चांद बावड़ी, भांग बावड़ी, कातन बावड़ी, जवाहर की नाड़ी बावड़ी, केला बावड़ी और मलूसर बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया गया है। सूत्रों ने दावा किया कि मुख्यमंत्री जल स्वाबलंबन अभियान में जिन इलाकों में कार्य हुए हैं वहां भूजलस्तर बढा है और इलाकों में हरियाली नजर आ रही है। (भाषा)


26 जून - 2 जुलाई 2017

संक्षेप में

संस्थान सम्मान

5 रुपए में सैनिटरी नैपकिन ज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे ने राज्य की स्कूली छात्राओं को 5 रुपए में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि राज्य में अस्मिता योजना के तहत यह सैनिटरी नैपकिन छात्राओं को उपलब्ध कराई जाएगी। गांवों में यह महिला बचत गुट के माध्यम से दिया जाएगा। इससे बचत गुटों को व्यवसाय भी उपलब्ध होगा। नैपकिन देने के लिए सरकार जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को अस्तिमा कार्ड देगी। ग्राम विकास एवं पंचायती विभाग के सचिव असीम गुप्ता का कहना है कि आज के दौर में महिलाएं नैपकिन के इस्तेमाल से वंचित हैं। सरकार की पहल के बाद उम्मीद है कि 50 प्रतिशत महिलाएं नैपकिन का इस्तेमाल कर पाएंगी। अस्मिता योजना के तहत छात्रों व महिलाओं को रियायती कीमतों पर सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने 25 करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में किया है। (भाषा)

के लिए राममणि अयंगर मेमोरियल योग संस्थान, पुणे को पहले प्रधानमंत्री योग अवॉर्ड के लिए चुना गया है। यह चयन 85 नामांकनों में से किया गया है। अवार्ड के लिए गठित स्क्रिनिंग कमेटी ने 15 से ज्यादा सिफारिश की थी। कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सचिव और विदेश सचिव, सचिव (आयुष) वाली निर्णायक समिति ने स्क्रिनिंग कमेटी के सिफारिशों की जांच की। इसमें सदस्य के तौर पर वीरेंद्र हेगड़े भी शामिल थे। वहीं आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सभी विचारनीय तथ्यों पर ध्यान रखते हुए निर्णायक

दिल्ली के घिटोरिनी में 240 एकड़ भूमि को स्मार्ट सिटी की तर्ज पर विकसित किया जाएगा

समिति ने राममणि अय्यंगर मेमोरियल योग संस्थान को इस साल का अवॉर्ड देने की सिफारिश की है। बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल चंडीगढ़ में आयोजित दूसरे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस उत्सव पर प्राचीन भारतीय अध्यात्मिक शिक्षा के प्रचार के लिए इस अवॉर्ड की घोषणा की थी। इस अवॉर्ड के लिए नामांकन की प्रक्रिया खुले विज्ञापन द्वारा आमंत्रित की गई थी। राममणि अयंगर मेमोरियल योग संस्थान ने योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने के लिए काम किया है। इस संस्थान ने योग पर कई किताबें प्रकाशित की हैं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी किया है। (भाषा)

मुंबई लोकल

विकसित करने की योजना बनाई है। इस परियोजना में करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत आने की संभावना है। वहीं सूत्रों ने बताया कि शहरी विकास मंत्रालय में इससे संबंधित प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। गौरतलब है कि शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की 240 एकड़ भूमि वर्ष 1971 से खाली है। (भाषा)

सबसे लंबी योग चेन

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज होने के लिए कर्नाटक के बच्चों ने बनाई सबसे लंबी योग चेन

बोरिवली से चर्चगेट के बीच सितंबर से पहली एसी लोकल चलाई जाएगी

क्टूबर की उमस से पहले मुंबईकर वातानुकूलित लोकल में सफर कर सकेंगे। पश्चिम रेलवे पर सभी ट्रायल्स सफल होने की जानकारी रोलिंग स्टॉक सदस्य रवींद्र गुप्ता ने दी। साथ ही, 2018 में मुंबई डिविजन में 9 और एसी रैक भेल से आएंगे। मुंबईकर पिछले 5 सालों से एसी लोकल का इंतजार कर रहे थे, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा

ने दक्षिणी दिल्ली के घिटोरिनी जिले कें द्रमें सरकार 240 एकड़ भूमि को स्मार्ट सिटी के तर्ज पर

योग कीर्तिमान

सितंबर से चलेगी एसी वाली लोकल था। अब बोरिवली से चर्चगेट के बीच सितंबर से पहली एसी लोकल चलाई जाएगी। रेलवे बोर्ड से मिली जानकारी के अनुसार, एसी लोकल की ऊंचाई के कारण आ रही दिक्कत को दूर कर लिया गया है। रेलवे बोर्ड के चेयरमेन अशोक कुमार मित्तल ने बताया, 'एसी लोकल सेवा में देरी मुंबई के ब्रिजों के कारण हुई। इस वजह से इनके चलने में 5 साल का समय लग गया।'मित्तल ने बताया, 'भेल अगले साल मुंबई मंडल के लिए 9 और एसी रैक डिलिवर करेगा। ये रैक इस तरह बने हैं कि किसी भी ब्रिज की ऊंचाई का इन पर असर नहीं पड़ेगा। इनमें से आधे रैक पश्चिम रेलवे पर और बाकी सेंट्रल रेलवे पर चलेंगे। (भाषा)

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घिटोरिनी बनेगी स्मार्ट ​िसटी

पुणे स्थित अयंगर योग संस्थान को प्रधानमंत्री योग अवार्ड से नवाजा जाएगा

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संक्षेप में

अयंगर योग संस्थान को पीएम अवार्ड और योगप्रचारके मेंविकास दिए योगदान

गुड न्यूज

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नीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में नाम दर्ज करवाने के इरादे से विश्व प्रसिद्ध मैसूर पैलेस के सामने 8 हजार 387 स्कूली बच्चों ने सबसे लंबी योग चेन बनाया। ये बच्चे गिनीज रेकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करने में कामयाब हुए हैं या नहीं इसका नतीजा दो हफ्ते बाद आएगा। इससे पहले सबसे लंबी योग चेन बनाने का रेकॉर्ड 3 साल पहले 14 नवंबर 2014 को तमिलनाडु के श्रीपेरुमबुदुर में बना था जब 3 हजार 849 छात्रों ने 3 आसन करते हुए सबसे लंबी योग चेन बनाया था। लेकिन इस बार मैसूर में करीब 44 स्कूलों के 8 हजार से भी ज्यादा बच्चों ने मिलकर सबसे लंबी योग

चेन बनाया। लिहाजा मैसूर के आयोजकों को उम्मीद है कि यह रेकॉर्ड वह अपने नाम कर लेंगे। योग इंस्ट्रक्टर्स के निर्देश के हिसाब से स्कूली बच्चे मैसूर पैलेस के प्रांगण में इकट्ठा हुए और गोलाकार पोजिशन में खड़े हो गए। गिनीज रेकॉर्ड के प्रोटोकॉल के हिसाब से रिहर्सल के बाद सबसे लंबी योग चेन बनाने की 2 बार कोशिश की गई। इस रेकॉर्ड में हिस्से लेने वाले बच्चों ने 4 तरह के आसन किए जिसमें वीरभद्रासन, त्रिकोणासन, वीरभद्रासन (टाइप 2) और प्रसारित पदोत्तनासन शामिल है। इस पूरे इवेंट की एरियल तस्वीरें लेने के लिए ड्रोन कैमरे लगाए गए थे। साथ ही ऑफिशल टाइम कीपर्स भी रखे गए थे जिन्होंने इस पूरे इवेंट और कार्यक्रम की निगरानी की। रेकॉर्ड में हिस्सा ले रहे प्रतिभागियों ने एक आसन को करने में 10 सेकंड का वक्त लगाया और 40 सेकंड के अंदर ही चारों आसन संपन्न हो गए। चारों आसन करते हुए सबसे लंबी योग चेन बनाने में ढाई मिनट का वक्त लगा। (एजेंसी)


28 मुहिम

26 जून - 2 जुलाई 2017

पानी को लेकर अनूठी फिल्मी मुहिम अनूठी पहल

फिल्म ‘द लॉस्ट बहुरूपिया’ के लिए 61वें राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड से नवाजे गए श्रीराम डाल्टन ने फिल्मों के जरिए पानी की समस्या को उठाने का बीड़ा उठाया है। वे अब तक दस लघु फिल्में बना चुके हैं

एक नजर

मूल रूप से झारखंड के रहने वाले हैं श्रीराम डाल्टन कई फिल्म निर्देशकों के साथ मिलकर कर रहे काम

उनकी अब तक की फिल्मों में लेविस लुईस का संगीत

दु

डॉ. स्वाति सोनल

निया में सबसे ज्यादा फिल्में भारत में बनती हैं, उसमें भी हिंदी फिल्मों का सालाना औसत सबसे ज्यादा है। अलबत्ता भारतीय फिल्म उद्योग के सामने विविधतापूर्ण पटकथाओं का रोना हमेशा से रहा है। खासतौर पर रचनात्मक प्रतिभा के धनी और समाज को फिल्मों से सार्थक संदश े का हौसला रखने वाले फिल्मकारों की यह शिकायत रही है कि अपने यहां पटकथा लेखन की कोई वैकल्पिक लीक बन ही नहीं पाई। ऐसी शिकायत करने वाले फिल्मकारों में सत्यजीत रे से लेकर अनुराग बसु तक कई लोग शामिल हैं। सुखद यह है कि अब यह नई लीक गढ़ी जा रही है। पिछले एक दशक में कई ऐसी फिल्में आई हैं, जिनके भारत में निर्माण के बारे में पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। ‘स्माइल पिंकी’, ‘पीपली लाइव’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘पिंक’ जैसी कई ऐसी फिल्में आई हैं, जिसे देखकर इस दिशा में

फिल्में जब तैयार हुईं, तो उनका प्रदर्शन कई फिल्मोत्सवों में हुआ। यही नहीं, नेतरहाट के सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में भी ये फिल्में दिखाई गईं, जिन्हें लोगों ने खूब सराहा। इन फिल्मों को यू-ट्यूब पर रिलीज किया जा रहा है कुछ अनूठा और सार्थक करने वालों का हौसला बढ़ा है। इस हौसले का ही नतीजा है कि पर्यावरण जैसी जरूरी पर नीरस माने जाने वाले मुद्दों पर भी फिल्में बननी शुरू हो गई हैं। इसके साथ ही ऐसी फिल्में बनाने में दिलचस्पी रखने वाले फिल्मकारों की भी लोकप्रियता बढ़ी है। सोशल मीडिया पर तो इनके बारे में बहुत कुछ लिखा ही जा रहा है, मुख्यधारा की मीडिया में भी इनके बारे में लिखा-दिखाया जा रहा है। ऐसे ही एक फिल्मकार हैं श्रीराम डाल्टन। डाल्टन इन दिनों पानी को लेकर कई फिल्में बना रहे हैं। मूलरूप से झारखंड के रहने वाले श्रीराम डाल्टन की

पहचान फिल्म डायरेक्टर व प्रोड्यूसर के रूप में है। फिल्म ‘द लॉस्ट बहुरूपिया’ के लिए 61वें राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड में उन्हें पुरस्कार भी मिल चुका है।

लातूर से हुए प्रभावित

डाल्टन को झारखंड में पानी

की किल्लत का तो उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव था ही, 2015 में महाराष्ट्र के लातूर समेत कई इलाकों में पेयजल के लिए मचे कोहराम ने श्रीराम डाल्टन को पानी पर काम करने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने डाल्टनगंज के ही रहने वाले विशारद विसनत से यह आइडिया शेयर किया और इसी का परिणाम आज पानी पर बनी 10 लघु फिल्मों के रूप में हमारे सामने है। बमुश्किल 10-10 मिनटों की इन फिल्मों में पानी के महत्व व इसके संरक्षण की जरूरत को असरदार तरीके से सामने लाया गया है। फिल्मों में यह अपने तरह का पहला और अनूठा प्रयोग तो है ही, इसे लोग अलग-अलग माध्यमों के जरिए देख भी रहे हैं। पानी की किल्लत को महसूस करने और इस पर फिल्में बनाने के बीच की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। यह कहानी बेहद सामान्य तरीके से एक मुहिम शुरू करने की प्रक्रिया के मजबूती से एक बड़े मुकाम पर पहुंचने की है, जिसमें कई स्पीड ब्रेकर, कई गड्ढे आए। एक स्पीड ब्रेकर तो तब आया, जब उन्हें लगा कि कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो नहीं चाहते हैं इसमें ऐसा कुछ भी दिखाया जाए, क्योंकि इससे सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है। अपने इस अनुभव के बारे में 37 वर्षीय श्रीराम डाल्टन बताते हैं, ‘हमारा लक्ष्य किसी के खिलाफ लड़ना नहीं था, बल्कि आम लोगों व सरकार का ध्यान इस समस्या की ओर दिलाना था। इसीलिए हमने तय किया कि हम अपनी फिल्मों में नकारात्मक की जगह सकारात्मक पक्ष दिखाएंगे। हमने ‘गो ग्रीन का नारा’ बुलंद किया, जिसे तात्कालिक झारखंड सरकार ने मुहिम हरियाली का नाम दिया। लोगों ने भी अपने आसपास ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने का संकल्प लिया।’


‘दुपट्टा’ लेकर आए उमर

26 जून - 2 जुलाई 2017

मुहिम

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उमर फारुख श्रीराम डाल्टन की तरह झारखंड के हैं। वे मानते हैं कि साहित्य की तरह सिनेमा का भी लोगों पर गहरा असर होता है

’ फिल्म के निर्देशक उमर फारुख मानते ‘दु पट्टा हैं कि साहित्य की तरह ही सिनेमा का भी

समाज पर गहरा असर पड़ता है। वे कहते हैं, ‘जब हम कोई फिल्म देखते हैं, तो इमोशनल होकर रो देते हैं। इसका मतलब है कि सिनेमा हमें प्रभावित करता है। मेरी फिल्म ‘दुपट्टा’ ने भी लोगों को प्रभावित किया है। पलामू जिले के दरबा के लोगों ने इस फिल्म से प्रेरित होकर पौधा लगाना शुरू कर दिया है।’ श्रीराम डाल्टन से उमर फारुख का संपर्क तीन साल पहले सोशल मीडिया पर हुआ था। उमर फारुख बताते हैं, ‘मैं श्रीराम डाल्टन के काम से बेहद प्रभावित था, क्योंकि वह बुनियादी मुद्दों को लेकर फिल्में बनाते थे।’ उमर फारुख भी झारखंड के ऐसे इलाके से आते हैं, जहां पानी एक बड़ी समस्या है। वह भी पानी, जंगल, खदान के मजदूरों के जीवन जैसे विषयों पर फिल्म बनाना पसंद करते

फिल्म से पहले वर्कशॉप

डाल्टन पानी के संकट पर फिल्म बनाने के लिए पहले वर्कशॉप करते हैं, ताकि फिल्म के सही प्लॉट का तो चयन हो ही, लोगों को भी हर तरह से पानी को लेकर जिम्मेदार रवैया अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सके। डाल्टन के ही शब्दों में, ‘महीने भर की कैंपेनिंग के बाद जब हम वर्कशॉप करने के लिए झारखंड पहुंचे, तो हमारे पास कुल 6070 हजार रुपए थे, जबकि वर्कशॉप पर अनुमानित 10 लाख रुपए खर्च होने वाला था। यहां पहुंचकर समझ में आया कि सहयोग का जो आश्वासन हमें पहले मिला था, वो हवाई था। हम एक झटके में जमीन पर आ गए थे। लेकिन, वर्कशॉप करनी थी, सो हमने घर-घर जाकर लोगों से सहयोग मांगना शुरू किया। उम्मीद की एक बेहद चमकदार किरण हमें तब दिखी, जब एक किसान मित्र ने एक बोरी चावल हमें मुहैया कराया। किसान मित्र से सहयोग मिलने से कई और लोग भी प्रेरित हुए व इस तरह

‘फिल्म ‘दुपट्टा’ का मुख्य किरदार जो पागल है, उसके मेकअप के लिए सामान तक नहीं था, तो हमने कोयला, माड़ (भात का पानी) और राख से उसका मेकअप किया’- उमर फारुख मेरे शुभचिंतकों की संख्या बढ़ती गई। फिर डिप्टी कमिश्नर से लेकर दूसरे ग्रामीण, झारखंड सरकार, आईपीआरडी, ग्रामीण विकास विभाग, नेतारहाट आवासीय विद्यालय, जंगल वारफेटर समेत तमाम संगठन व स्थानीय लोगों का साथ मिला।’ दरअसल, पानी पर जो 10 लघु फिल्में बनीं, उनकी नींव इसी वर्कशॉप में पड़ी। पानी की किल्लत को महसूस करते हुए श्रीराम डाल्टन ने सबसे पहले एक वर्कशॉप करने की योजना बनाई। इस वर्कशॉप में स्थानीय लोगों व अन्य साझेदारों को शामिल किया गया। डाल्टन कहते हैं, ‘पानी की किल्लत ने जब मेरे दरवाजे पर दस्तक दी तो मुझे महसूस हुआ कि कुछ किया जाना चाहिए। सामान्य-सी एक रात को मैंने वर्कशॉप करने का फैसला ले लिया। जगह के चुनाव की बारी आई, तो मैंने मुंबई की जगह झारखंड को चुना क्योंकि वहां अपनी मिट्टी है।’ वे आगे बताते हैं, जल सकंट ने समाज में भीतर तक अपना असर डाला था, लेकिन यह संकट बाहर नहीं आ रहा था। लोग निहत्थे किसी तरह इस संकट से मुठभेड़ कर

हैं। यही वजह थी कि दोनों के बीच संबंध मजबूत हो गए। श्रीराम डाल्टन से उमर फारुख की आमनेसामने मुलाकात 2016 में मुंबई में हुई। दो-तीन घंटे की इस मुलाकात में दोनों में कई मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके बाद फारुख अपने गांव लौट आए। एक दिन अचानक श्रीराम डाल्टन को फोन आता है कि पानी पर वर्कशॉप में हिस्सा लेना है। फारुख ने उस वर्कशॉप में हिस्सा लिया और वहीं उन्हें ‘दुपट्टा’ फिल्म मिल गई। ‘दुपट्टा’ को महज ढाई घंटे में शूट किया गया है। वे कहते हैं, ‘मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि यह फिल्म इतनी अच्छी बन जाएगी, जबकि हमारे पास संसाधनों का घोर अभाव था। फिल्म का मुख्य किरदार जो पागल है, उसके मेकअप के लिए सामान तक नहीं था, तो हमने कोयला, माड़ (भात का पानी) और राख से उसका मेकअप किया।’ रहे थे। मेरा वर्कशॉप करने का उद्देश्य भीतर के संकट को सतह पर लाना था, ताकि इसका समाधान किया जा सके।

नेतरहाट से दस फिल्में

जून 2016 में नेतारहाट फिल्म इंस्टीट्यूट के बैनर तले श्रीराम डाल्टन की पहल पर वर्कशॉप का आयोजन किया गया जो 5-6 दिनों तक चला। इस वर्कशॉप में 180 से 185 लोगों ने हिस्सा लिया। खास बात यह थी कि इसमें आमलोगों की भागीदारी सबसे अधिक थी। इसी वर्कशॉप से कहानियां निकलीं,जिन्हें सिल्वर स्क्रीन पर उतारा गया। डाल्टन के मुताबिक, ‘नेतारहाट में रुककर ही 10 चयनित कहानियों पर फिल्में बनाई गईं। फिल्में पूरी करने में झारखंड सरकार के वन विभाग ने आर्थिक सहयोग दिया जबकि पूरी टीम के लिये खाने का इंतजाम स्थानीय लोगों ने किया।’ यही नहीं तब उन्हें फिल्मों के जरिए शुरू की गई मुहिम को लेकर पहली बार यह संतोष भी हुआ कि वे सही दिशा में बढ़ रहे हैं। उनके ही शब्दों में, ‘नेताहराट में रहते मैंने मजबूती के साथ महसूस किया कि हम सार्थक काम कर रहे हैं।’ फिल्में जब तैयार हुईं, तो उनका प्रदर्शन कई फिल्मोत्सवों में हुआ। यही नहीं, नेतारहाट के सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में भी ये फिल्में दिखाई गईं, जिन्हें लोगों ने खूब सराहा। इन फिल्मों को यू-ट्यूब पर रिलीज किया जा रहा है। प्रख्यात म्यूजिक कंपोजर लेविस लुईस ने सभी 10 फिल्मों में म्यूजिक दिया है। पहली फिल्म 4 मई 2017 को रिलीज हुई। नाम है- ‘दुपट्टा’। महज 7 मिनट 29 सेकेंड की इस फिल्म में पानी के लिए पेड़ बचाने की जरूरत को जोरदार तरीके से दिखाया गया है। इस फिल्म का निर्देशन उमर फारुख ने किया है। फिल्म में ‘दुपट्टा’

को बिंब बनाकर पानी व हरियाली बचाने का संदश े दिया गया है। दूसरी फिल्म ‘वाटर हंटर’ के निर्देशक हैं चैतन्य प्रकाश। वाटर हंटर ऐसे लोगों की कहानी है, जिनके पास पानी नहीं है। ये लोग पानी के लिए हत्याएं तक कर देते हैं। ‘डब्ल्यू टर्न’ का निर्देशन पेंटर व लेखिका इरा टाक ने किया है। इरा टाक ने दुपट्टा फिल्म में अभिनय भी किया है। उसी तरह ‘लोटा-पानी’, ‘प्याऊ’, ‘नीर’, ‘माय लिटिल फ्रैंड’ और ‘ड्राई हार्ट’ अलग-अलग तरीके से पानी की समस्याओं को उजागर करती हैं। ‘नीर’ फिल्म को निर्देशित करने वाले विशारद विसनत का भी पर्यावरण से बेहद लगाव रहा है, लेकिन इस वर्कशॉप में वह किसी और उद्देश्य से आए थे। विशारद बताते हैं, ‘मैं बच्चों को पढ़ाने के लिए वहां गया था। एक दिन अचानक मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैंने यह आइडिया श्रीराम को सुनाया, तो उसे भी पसंद आ गया और नीर फिल्म बन गई।’ विशारद व उनके जैसे फिल्म निर्देशकों का नजरिया बिल्कुल साफ है। विशारद बताते हैं, ‘हम भी अगर स्वार्थी लोगों की तरह घर में बैठे रहें, तो मुझे लगता है कि जीवन व्यर्थ है। हमारी जिंदगी में 12 महीने होते हैं। इनमें कम से कम एक महीना हमें सोसाइटी के लिए देना चाहिए। नाम, शोहरत और पैसा हो, लेकिन जल, जंगल और जमीन न हो, तो इनकी कोई वैल्यू नहीं।’ विशारद कहते हैं, ‘ऐसा सोचना गलत है कि इस तरह की फिल्मों का कोई बाजार नहीं है। बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस एक चीज है, लेकिन जिस तरह की फिल्में हमने बनाई हैं, उनका भी एक अपना बहुत बड़ा बाजार है।’ वाटर हंटर’ के डायरेक्टर चैतन्य प्रकाश का कहना है, हमलोग प्रयोगधर्मी व सार्थक सिनेमा बनाना चाहते हैं। हम सामाजिक आदमी हैं। हम वैसी फिल्में बनना चाहते हैं जिससे समाज को फायदा हो। लटके-झटके वाली फिल्मों से हमारा कोई सरोकार नहीं है।

पानी के बाद जमीन

श्रीराम डाल्टन की टीम जल, जंगल व जमीन को लेकर आगे भी इसी तरह काम करना चाहती है। अगला वर्कशॉप जंगल पर आयोजित होने जा रहा है। यह वर्कशॉप अगले माह शुरू होगा। इसमें भी जंगल के मुद्दे पर 10 लघु फिल्में बनाई जाएंगी। पानी के बाद डाल्टन जंगल पर फोकस कर करके फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। कह सकते हैं कि उनकी मुहिम के साथ मुद्दे भी खासे जमीनी और जरूरी हैं। (लेखिका वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान में हिंदी विभाग में असिसटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं )


30 लोक कथा

26 जून - 2 जुलाई 2017

दानव का अंत

घमंडी राजा की हार

हुत प्राचीन समय की बात है। एक राजा था। उसका नाम उदय सिंह था। वह बहुत अत्याचारी और क्रूर राजा था। उसका एक रसोइया था। जिसका नाम रामू था। रामू का अस्त्र-शस्त्र चलाने में कोई जोड़ नहीं था। अक्सर राजा युद्ध में उसे अपने साथ ले जाते थे। एक दिन रसोइया रामू से भोजन परोसने में देर हो गई। जिसके कारण राजा उदय सिंह ने क्रोध में आकर रामू के दोनों हाथ कटवा दिए। रसोइया रामू ने सोचा मेरी इतनी सी गलती के लिए इतनी बड़ी सजा। उसने राजा को सबक सीखने की प्रतिज्ञा ली। वह राज्य के गरीब बच्चों को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान देने लगा। एक दिन जब रामू बच्चों को शस्त्र सीखा रहा था। इस दौरान वह राजा द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के बारे में भी उन बच्चों को बताता था। एक दिन सैनिकों ने उसकी बात सुन ली। उसने जाकर सारी बातें राजा को बताई। क्रोध में आकर राजा ने रामू और उसके शिष्यों पर आक्रमण कर दिया।

रामू के शिष्यों ने राजा उदय सिंह के अनेक योद्धाओं को मार डाला। इस प्रकार राजा के बहुत कम सैनिक बचे। इससे पूरे राज्य में हाहाकार मच चुका था। अपनी हार को देखते हुए राजा खुद युद्ध करने आए। किंतु रसोइया रामू के सैनिकों ने क्षणभर में ही राजा उदय सिंह को बंधक बना कर रामू के सामने खड़ा कर दिया। रामू ने राजा से पूछा - महाराज मेरी एक गलती के लिए आपने मुझ कमजोर, बेबस और गरीब के हाथ कटवा दिए, आज आप उसी रसोइया रामू के सामने बंदी बन कर खड़े हैं। यदि मैं चाहूं, तो आपके प्राण भी ले सकता हूं। पर मैंने आपका नमक खाया है, इसीलिए प्राण नहीं लूंगा। लेकिन इतना अवश्य कहूंगा की किसी को भी गरीब और कमजोर समझ कर सताना अच्छी बात नहीं, इसे सदा ध्यान में रखिएगा। इतना कह कर रामू ने राजा को कैद से मुक्त कर दिया। राजा शर्म से सिर झुका कर महल की ओर चल पड़ा।

जं

गल के पास एक गांव था। गांव के किनारे से एक नदी बहती थी। नदी पर एक पुल था। उस पूल के नीचे एक दानव रहता था। जंगल में तीन बकरे चर रहे थे। सबसे बड़े बकरे ने सबसे छोटे बकरे से कहा - नदी के पार गांव के खेतों में खूब फल-सब्जी उगे हुए हैं। उनकी महक यहां तक आ रही है। जा पुल पर से नदी पार करके उन्हें खा आ। छोटा बकरा पुल पार करने लगा। तभी दानव पुल के ऊपर चढ़ आया और अपने बड़े-बड़े दांत और नाखून दिखा कर नन्हें बकरे को डराते हुए बोला - मुझे बड़ी भूख लगी है। डर से कांपते हुए नन्हा बकरा बोला मुझे मत खाओ दानव, मैं तो बहुत छोटा हूं। मेरे दो बड़े दोस्त हैं। वे अभी इसी ओर आनेवाले हैं। उन्हें खा लो। दानव बड़े बकरों को खाने के लालच में आ गया। बोला - अच्छा तू जा। मैं बड़े

असली अपराधी कौन

क दिन राजा कृष्णदेव के दरबार में एक चरवाहा आया और बोला - महाराज, मेरे साथ न्याय कीजिए। तुम्हारे साथ क्या हुआ है? राजा ने पूछा। महाराज, पड़ोस में एक कंजूस आदमी रहता है। उसका घर बहुत पुराना हो गया है, परंतु वह मरम्मत नहीं करता, कल उसके घर की एक दीवार गिर गई और मेरी बकरी दबकर मर गई। पड़ोसी से बकरी का हर्जाना दिलवाने में मदद कीजिए। महाराज तेनालीराम की तरफ देखने लगे। तब तेनालीराम बोले - महाराज, मेरे विचार से दीवार टूटने के लिए केवल पड़ोसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। तो फिर तुम्हारे विचार में दोषी कौन है? राजा ने पूछा। महाराज, यदि आप मुझे थोड़ा समय दें, तो मैं जांच कर असली अपराधी को प्रस्तुत कर दूंगा, तेनालीराम ने कहा। तेनाली ने चरवाहे के पड़ोसी को बुलाया और उसे मरी बकरी का हर्जाना देने को कहा। पड़ोसी बोला - इसके लिए मैं दोषी नहीं हूं। वह दीवार तो मैंने मिस्त्री से बनवाई थी। अतः असली अपराधी तो वही

बकरों का इंतजार करूंगा। नन्हा बकरा वहां से भागा और गांव के खेत में पहुंच कर ताजा फलसब्जी खाने लगा। दूसरा बकरा भी यही कह कर बच निकला। अब बड़ा बकरा पुल पार करने लगा। वह खूब मोटा और तगड़ा था। उसके सींग लंबे और खूब नुकीले थे। जब वह पुल के बीच पहुंचा, तो दानव एक बार फिर पुल के ऊपर चढ़ आया और उसे डराते हुए बोला - मुझे बड़ी भूख लगी है। मैं तुझे अभी खा जाऊंगा, पर बड़ा बकरा जरा भी नहीं डरा। उसने अपने अगले पांवों से जमीन कुरेदते हुए हुंकार भरी और सिर नीचा करके दानव के पेट पर अपने सींगों से जोर से प्रहार किया। दानव दूर नदी में जा गिरा। अब बड़ा बकरा इत्मीनान से पुल पार कर गया और अपने दोनों साथियों के पास पहुंच कर मनपसंद भोजन करने लगा।

है। मिस्त्री को बुलाया गया। मिस्त्री ने भी अपना दोष मानने से इंकार करते हुए बोला, अन्नदाता, अलसी दोष तो उन मजदूरों का है, जिन्होंने गारे में अधिक पानी मिलाकर मिश्रण को खराब बनाया, जिससे ईंटें चिपक नहीं सकीं और दीवार गिर गई। अब राजा ने मजदूरों को बुलवाया। मजदूर बोले, महाराज, इसके लिए हम दोषी नहीं, वह पानीवाले व्यक्ति है, जिसने गारे में अधिक पानी मिलाया। फिर पानी मिलाने वाले व्यक्ति को बुलाया गया। वह बोला, महाराज, वह बर्तन बहुत बड़ा था जिसमें जरूरत से अधिक पानी भर गया। अतः उस व्यक्ति को पकड़ें जिसने मुझे वह बर्तन दिया था। उसने बताया कि पानी वाला बड़ा बर्तन उसे चरवाहे ने दिया था। तब तेनालीराम ने चरवाहे से कहा - देखो, यह सब तुम्हारा ही दोष है। तुम्हारी एक गलती ने तुम्हारी ही बकरी की जान ले ली। चरवाहा लज्जित हो कर दरबार से चला गया। सभी तेनालीराम के बुद्धिमतापूर्ण न्याय की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे थे।


32 अनाम हीरो

26 जून - 2 जुलाई 2017

अनाम हीरो नीरू चड्ढा

आईएलओएस पहुंची पहली भारतीय महिला

अंतरराष्ट्रीय लॉ एक्सपर्ट नीरू चड्ढा आईएलओएस की पहली भारतीय महिला सदस्य के रूप में चुनी गई हैं

भा

रतीय महिलाओं की सबलता और सफलता आज पूरी दुनिया में देखी जा सकती है। उन्होंने हर क्षेत्र में अपने उद्यम और प्रतिबद्धता को साबित किया है। ऐसी ही उपलब्धि हासिल करने वालों में नीरू चड्ढा का नाम जुड़ गया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत को एक बड़ी उपलब्धि हासिल कराते हुए अंतरराष्ट्रीय लॉ एक्सपर्ट नीरू चड्ढा को इंटरनेशनल ट्रिब्यूकनल फॉर द लॉ ऑफ द सी

(आईएलओएस) की पहली भारतीय महिला सदस्य के रूप में चुना गया है। संयुक्त राष्ट्र की यह न्यायिक इकाई समुद्र से जुड़े कानूनों पर फैसला करती है। वह 21 सदस्यीय अदालत में स्थान पाने वाली पहली भारतीय महिला न्यायाधीश हैं। नीरू चड्ढा प्रख्यात वकील हैं और विदेश मंत्रालय की चीफ लीगल एडवाइजर बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं। आईएलओएस में उनका चयन नौ सालों

के लिए किया गया है। आईएलओएस का गठन 1996 में किया गया था और इसका केंद्र जर्मनी के हैमबर्ग में हैं। नीरू चड्ढा एशिया प्रशांत समूह से एकमात्र उम्मीदवार थीं, जिन्हें पहले दौर के मतदान में चुना गया। इस दौरान 168 देशों ने मतदान किया। चड्ढा को 120 वोट

न्यूजमेकर

मिले, जो एशिया प्रशांत समूह में सबसे ज्यादा है। यह सफलता अंतरराष्ट्रीय कानून के मामलों में भारत की वैश्विक स्थिति की सराहना एवं समुद्र संबंधी कानून से जुड़े समकालीन मामलों में वार्ताकार एवं वकील के तौर पर नीरू की विशेषज्ञता को दर्शाता है।

गुरुकुल के गुरु रहमान

पटना में चलने वाला यह गुरुकुल सिर्फ ग्यारह रुपए गुरु दक्षिणा लेकर छात्रों को दारोगा से लेकर आईएएसआईपीएस बनाता है

खुशबू के मोती

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खुशबू आकाश दावड़ा

गुजरात की 24 साल की खुशबू ने मोतियों से बना दुनिया का सबसे बड़ा आर्ट वर्क प्रधानमंत्री को किया भेंट

धानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसकों की संख्या तो काफी है ही, इनमें कई भिन्न प्रतिभाओं के लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री की एक प्रशंसक खुशबू आकाश दावड़ा ने उन्हें एक नायाब तोहफा दिया है। खुशबू ने उन्हें भारत के नक्शे पर मोतियों से बना उनका पोर्ट्रेट भेंट किया है। गुजरात के राजकोट की रहने वाली 24 साल की खुशबू का दावा है कि मोतियों से बना यह दुनिया का सबसे बड़ा आर्ट वर्क है। इस आर्टवर्क पोर्ट्रेट को सिर्फ मोतियों और धागे से बनाया गया है। खुशबू का कहना है कि इसे बनाने में पांच लाख से ज्यादा मोती और करीब

10 किलोमीटर लंबा धागा लगा है। इस आर्टवर्क में 11 रंग के मोती लगाए गए हैं। यह सात फीट लंबा और सात फीट चौड़ा है। इसे बनाने में खुशबू को करीब 850 घंटे लगे हैं और यह करीब 350 किलो वजनी है। खुशबू का कहना है कि मैं गर्व महसूस कर रही हूं कि मैं पीएम मोदी को यह उपहार दे पाई। इसे बनाने में मैंने 950 सुइयों का उपयोग किया है। खुशबी को इस आर्ट वर्क के लिए लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से प्रमाण पत्र भी मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आर्टवर्क के लिए खुशबू की तारीफ की है।

धुनिकता के इस दौर में आज भी गुरुकुल की परंपरा कायम है। जहां प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थान लाखों की फीस वसूलते हैं, वहीं पटना का एक संस्थान सिर्फ ग्यारह रुपए गुरु दक्षिणा लेकर छात्रों को दारोगा से लेकर आईएएस-आईपीएस बनाता है। हर साल यहां जब यूपीएससी और बीपीएससी से लेकर स्टेट स्टॉफ सलेक्शन का रिजल्ट आता है तो इस गुरुकुल में जश्न का माहौल होता है। यहां सिर्फ बिहार और झारखंड से ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, उतराखंड और मध्य प्रदेश से भी छात्र-छात्राएं पढ़ाई करने आते हैं। इस गुरुकुल के प्रधान हैं रहमान, जिन्हें सभी गुरु रहमान के नाम से जानते हैं। दिलचस्प है कि रहमान वेदों के ज्ञाता भी हैं। उनके गुरुकुल में वेदों की पढ़ाई भी होती है। पटना के नया टोला मोहल्ले

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 28

एम रहमान में चलता है अदम्य अदिति गुरुकुल। यह संस्थान 1994 से चल रहा है। 1994 में जब बिहार में 4 हजार दारोगा की बहाली निकली थी, तो इस संस्थान में पढ़ने वाले करीब ग्यारह सौ लड़कों ने सफलता प्राप्त की थी। यही नहीं, बाद में अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं में भी यहां के लड़कों ने काफी अच्छा किया। गुरु रहमान के अनुसार गरीबी का मतलब लाचारी नहीं, बल्कि गरीबी का मतलब कामयाबी होता है। यह जिद और जूनून से हासिल किया जा सकता है जो उनके गुरुकुल में लड़के करते हैं। गुरु रहमान का कहना है कि आज की तारीख में छात्र सनातन संस्कृति से विमुख हो गए हैं अगर सही मायने में उन्हें सनातन संस्कृति के बारे में बताया जाए, शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दी जाएं तो उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 28)