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वर्ष-1 | अंक-41 | 25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

07 वॉश चैपियंस

स्वच्छता का सबक

स्कूली बच्चों ने सीखा स्वच्छता और स्वास्थ्य का सबक

21 जीवन शैली

मिसाल हैं बकरवाल कश्मीर के चरवाहों की साहसिक जीवन शैली

29 उत्सव

कुल्लू दशहरा लाइव

कुल्लू दशहरा मोबाइल और यू-ट्यूब पर लाइव

‘स्वच्छता दिवस’ के रूप में मना पीएम मोदी का जन्म दिन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 67वें जन्म दिवस पर सुलभ प्रणेता ने उन्हें एक विजनरी नेता के तौर पर तो याद किया ही, स्वच्छता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता को ऐतिहासिक बताया


02 आवरण कथा

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

एक नजर

डॉ. पाठक ने किया महालड्डू का अनावरण सुलभ ने आंबेडकर और गांधी के सपने को मूर्त रूप दिया

प्रधानमंत्री की मुहिम से सुलभ को मिला विश्व में सम्मान

‘स्वच्छता दिवस’ के रूप में मना पीएम मोदी का जन्म दिन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 67वें जन्म दिवस पर सुलभ प्रणेता ने उन्हें एक विजनरी नेता के तौर पर तो याद किया ही, स्वच्छता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता को ऐतिहासिक बताया

दे

प्रियंका तिवारी

श के ओजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 67वीं वर्षगांठ को सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया। इस शुभ अवसर पर दिल्ली के मावालंकर हॉल में ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, हरित भारत’ कार्यक्रम का आयोजन सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन द्वारा किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सिक्किम के पूर्व राज्यपाल वाल्मीकि प्रसाद सिंह (वीपी सिंह), राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष मनहर वालजी भाई जाला,

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य और उत्तराखंड भाजपा के सचिव स्वराज विद्वान, होंडा मोटर साइकिल के महानिदेशक हरभजन सिंह और देश के विभिन्न हिस्सों व अफगानिस्तान से आई विशेष छात्रा के साथ मिलकर सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 67वें जन्म दिवस के अवसर पर 567 किलो के महालड्डू का अनावरण किया। इस दौरान डॉ. पाठक ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी देश के पहले ऐसे पीएम हैं, जिन्होंने स्वच्छता और शौचालय को इतना महत्व दिया। इससे पहले सभी लोगों ने सिर्फ इस मुद्दे पर चर्चा मात्र की थी,

किसी ने इसे इतना महत्व नहीं दिया, लेकिन मोदी जी ने न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी स्वच्छता और शौचालय की बात की। उनके इस कदम से हमें देश ही नहीं विदेशों में भी प्रतिष्ठा मिली। इससे पहले लोग सुलभ के कार्यों को गंभीरता से नहीं लेते थे। हम जब भी किसी के पास जाते थे तो लोग हमारा मजाक उड़ाते थे कि ये तो शौचालय की बात करते हैं, लेकिन 2014 में लाल किले की प्राचीर से जब प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान की बात की तो लोगों को हमारी महत्ता समझ में आई। इसके लिए हम प्रधानमंत्री मोदी के बहुत आभारी हैं। हम उनके जन्म दिवस पर उन्हें हार्दिक बधाई देते हैं और

कामना करते हैं कि वह इसी तरह देश हित के कार्य देशभक्ति के साथ हजारों सालों तक करते रहें। हम सबसे जितना हो सकेगा, हम भी उनके इस मिशन में गिलहरी की भांति उनका सहयोग करते रहेंगे। सुलभ प्रणेता ने कहा कि स्वच्छता और शौचालय के क्षेत्र में हम पिछले 50 सालों से कार्य कर रहे हैं। यही नहीं, हमने मैला ढोने वालों को उनके काम से मुक्ति दिलाई। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर कहते थे कि जाति प्रथा गलत है, जन्म से किसी की जाति निश्चित नहीं हो सकती तो वहीं गांधी जी ने कहा कि वर्ण व्यवस्था तो ठीक है, लेकिन छूआछूत गलत है। हमने दोनों की बातों को


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बीच में ला दिया। हमने छूआछूत खत्म करके छोटी जाति वालों को उच्च जाति अपनाने की प्रथा प्रचलित कर दी। आज के समय में राजस्थान के अलवर और टोंक में मैला ढोने वाले लोग खुद को ब्राह्मण कहते हैं। सुलभ ने आंबेडकर और गांधी के सपने को मूर्त रूप दिया है। सुलभ देश भर में अब तक 15 लाख शौचालयों का निर्माण किया है, जिसका लोग इस्तेमाल भी कर रहे हैं। हम 95 कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हमने उन कंपनियों से कहा कि आप एक गांव या एक पंचायत गोद ले लीजिए। दूरसंचार कंपनी एयरटेल ने तो एक जिला ही गोद ले लिया है। हमने पिछले दिनों प्रधानमंत्री से हुई मुलाकात में उनसे सुलभ मॉडल अपनाने की बात कही, जिसके माध्यम से हम स्वच्छ भारत के उनके सपने को 2019 तक पूरा कर सकते हैं। डॉ. पाठक ने कहा कि आदमी हजारों साल तक नहीं जीता है, बल्कि उसका कार्य, उसकी कृति जिंदा रहती है। महात्मा गांधी के बाद इतिहास में अगर किसी का नाम आएगा तो वह प्रधानमंत्री मोदी का ही आएगा।

सुलभ प्रणेता ने किया स्वागत सम्मान

सुलभ प्रणेता विन्देश्वर पाठक और उनकी धर्मपत्नी अमोला पाठक ने कार्यक्रम में आए मुख्य अतिथियों का शॉल, पुष्प गुच्छ और मोमेंटो देकर स्वागत किया। इस दौरान डॉ. पाठक ने प्रधानमंत्री मोदी के अब तक के जीवन पर लिखी पुस्तक ‘द मेकिंग ऑफ लीजेंड’ को प्रिंट करने वाले एक्स्ट्रीम प्राइवेट लिमिटेड प्रिंटिग प्रेस के कार्मचारियों शैलेश कुमार मिश्रा, सुरेंद्र सिंह कटारिया, जगत बहादुर, संजय

पहले हम जब भी किसी के पास जाते थे तो लोग हमारा मजाक उड़ाते थे कि ये तो शौचालय की बात करते हैं, लेकिन 2014 में लाल किले की प्राचीर से जब प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान की बात की तो लोगों को हमारी महत्ता समझ में आई – डॉ. विन्देश्वर पाठक कुमार तिवारी, उत्तम शर्मा और सुलभ स्कूल के नन्हें कलाकारों आदर्श, अनुराग, इजराइल, अंकित उपाध्याय, आयुष, आलोक, कृतिका, तनीशा और अश्विन को भी सम्मानित किया।

इस मौके पर ‘कंट्रीब्यूशन ऑफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अ मेकिंग ऑफ स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ और ‘82-सीएसआर कंपनी वर्किंग विद सुलभ इंटरनेशनल’ नामक पुस्तकों का लोकार्पण मनहर वालजी भाई जाला, बीपी सिंह, स्वराज विद्वान और डॉ. विन्देश्वर पाठक द्वारा किया गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा सुलभ प्रणेता के नाम लिखे संदेश को सुलभ सेनिटेशन क्लब की छात्रा वैष्णवी तिवारी ने पढ़कर सुनाया।

सर्वोच्च सम्मान के हकदार हैं डॉ पाठक – वीपी सिंह

प्रधानमंत्री मोदी को उनके 67वें जन्म दिवस पर बधाई देते हुए सिक्किम के पूर्व राज्यपाल वीपी सिंह ने कहा कि हम सब चाहते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री जी दीर्घायु रहें और हमारे देश का मान-सम्मान यूं हीं बढ़ाते रहें। डॉ, पाठक ने मोदी जी के 67वें साल में 567 किलो का लड्डू बनवा कर उनके जीवन में 500 साल और जोड़ दिए हैं। आज प्रधानमंत्री मोदी ने सरदार सरोवर सिंचाई अभियान का उद्घाटन किया। इस अभियान की नींव पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1956 में रखी थी। प्रधानमंत्री ने अपने आप को नेहरू और सरदार पटेल दोनों के साथ जोड़ लिया और ये बड़ी बुद्धिमत्ता का काम है, लेकिन ये जो स्वच्छता और स्वस्थ्यता का अभियान है,

आवरण कथा

03

यह बापू का अभियान था। आज से 50 साल पहले जिसे डॉ. पाठक ने शुरू किया और अनेक बाधाएं आने के बावजूद अपने राह पर अडिग रहे और आज स्वच्छता के संदेश को देश ही नहीं, विदेशों में भी पहुंचा रहे हैं। डॉ. पाठक ने कभी अपने अंदर अहंकार को नहीं आने दिया। साल 2014 में देश में एक आभा फूटी, जिसने लाल किले की प्राचीर से कहा कि हमें देश को स्वच्छ करना है। वीपी सिंह ने कहा कि डॉ. पाठक की सबसे बड़ी उपलब्धि जनसेवा को विज्ञान और तकनीक से जोड़ना है। डॉ. पाठक देश के सर्वोच्च सम्मान के हकदार हैं, देश को इसके बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले देश में अस्थायित्व का वातावरण बना रहता था, युवाओं में असंतोष था, लेकिन 2014 के बाद से देश की तस्वीर बदल गई है। विश्व में 6 नेता ऐसे हैं, जो शक्तिशाली राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व कर रहें हैं। उनमें से पहले अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (71), दूसरे रूस के राष्ट्राध्यक्ष व्लादिमीर पुतिन (64), तीसरे जर्मनी के चांसलर अंजेला मार्केल (63), चौथे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (64), पांचवें जापान के पीएम शिंजो अबे (62) और छठवें नरेंद्र मोदी (67) हैं। यदि अमेरिका को छोड़ दिया जाए तो दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व 70 साल से कम के नेता कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि


04 आवरण कथा

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मोदी जी ने युवाओं के साथ बच्चों में भी ऊर्जा का संचार किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने सुलभ आंदोलन को भी ऊर्जा प्रदान की है। हम आज उन्हें शुभकामना देते हैं कि वह ऐसे ही आगे भी देशभक्ति की अलख जगाते रहें।

प्रधानमंत्री ने देश के सभी वर्गों का रखा ध्यान- स्वराज विद्वान

प्रधानमंत्री मोदी को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए डॉ. स्वराज विद्वान ने कहा कि देश ने आज ही के दिन एक ऐसे सपूत को जन्म दिया, जिसने देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में भारत के नाम को रोशन किया है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने देश के प्रत्येक वर्ग के लिए काम किया है। मोदी जी ने नौजवानों में सृजनात्मक ऊर्जा का संचार किया है, महिलाओं को स्वावलंबी बनाया है। इसके साथ ही उन्होंने स्वच्छ और स्वस्थ भारत का सपना साकार करने की तरफ कदम बढ़ाया है। उनके स्वच्छता के इस सपने को साकार करने में डॉ. पाठक 50 वर्ष पहले से ही लगे हुए हैं। डॉ. पाठक के बारे में बोलना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। हमने डॉ. पाठक के बारे में पढ़ा है कि वे एक ब्राह्मण परिवार से होते हुए भी हमारी स्कैंवेंजर्स बहनों को नया जीवन दिया और हमारी विधवा माताओं को नया जीवन जीने की राह दिखाई। ऐसे महान आत्मा को मैं हृदय से अभिनंदन

करती हूं। उन्होंने कहा कि जब देश अपने आप को नेतृत्व विहिन समझ रहा था। हर तरफ भय, भ्रष्टाचार का माहौल था, तब देश में ऐसे नेतृत्व का उदय हुआ, जो एक संकल्प के साथ सामने आया। प्रधानमंत्री बनने से पहले ही मोदी जी के मन में था कि देश को विश्व गुरु बनाना है। देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में जोड़ना है, उन्हें समृद्ध बनाना है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक योजनाएं देश के विकास के लिए चलाई हैं, जो देश की प्रगति में अपना योगदान दे रही हैं।

सुलभ परिवार जल्द बन जाएगा सुलभ संस्कार- हरभजन सिंह

होंडा मोटरसाइकिल के महानिदेशक हरभजन सिंह ने कहा कि स्वच्छता हम सबके लिए बहुत जरूरी है। इसका ध्यान हमें रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम भारतीयों की बहुत ही बुरी लत है, जब हम विदेश जाते हैं तो वहां कायदे-कानून का पालन करते हैं, लेकिन जैसे ही हम अपने देश में आते हैं तो सारे कायदे कानून भूल जाते हैं और कहीं भी कुछ भी फेंक देते हैं। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, ये बातें गलत हैं। हमारा जीवन कभी भी डंडे पर आधारित नहीं होना चाहिए। हमें अपने अंदर मौलिक परिवर्तन करने होंगे, तभी देश स्वच्छ और स्वस्थ बन सकेगा।

इस मौके पर ‘कंट्रीब्यूशन ऑफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अ मेकिंग ऑफ स्वच्छ भारत, स्वस्थ्य भारत’ और ‘82-सीएसआर कंपनी वर्किंग विद सुलभ इंटरनेशनल’ नामक पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया उन्होंने डॉ. पाठक का धन्यवाद करते हुए कहा कि सुलभ का स्वागत ही नहीं संबंध भी लंबा चलता है। पाठक जी जिससे जुड़ते हैं दिल से जुड़ते हैं, मैं उनका बहुत आभारी हूं। सुलभ ने जब अपना कार्य शुरू किया होगा, तब वह सुलभ परिवार था और अब सुलभ संसार हो गया है, लेकिन ये जज्बा यूं ही बना रहा तो जल्द ही सुलभ संस्कार हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मोदी जी अपने पौरुष और प्रारब्ध के कारण आज देश के प्रधानमंत्री हैं। यदि अच्छी सोच और कृतित्व वाला व्यक्ति उच्च पदों पर आसीन हो जाए तो समाज में बदलाव होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने देशहित में अनेक फैसले लिए और उसका अच्छा परिणाम भी हम सब के सामने है। आज देश प्रगति की राह पर निरंतर बढ़ रहा है।

स्वच्छता के लिए डॉ. पाठक ने समर्पित किया जीवन- वालजी भाई जाला

प्रधानमंत्री मोदी को उनके 67वें जन्म दिवस की बधाई देते हुए मनहर वालजी भाई जाला ने कहा कि मोदी जी सबका साथ सबका विकास मूल मंत्र के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के लिए काम किया है। आज हमारे पिछड़े और शोषित भाई-बहन समाज में अपनी एक पहचान के साथ सम्मान से जी रहें हैं। इतना ही नहीं,

उन्होंने उनके लिए रोजगार और माताओं के लिए एलपीजी गैस देकर सराहनीय कार्य किया है। आज देश मोदी जी के नेतृत्व में देश ही नहीं बल्कि विश्व में भी अपना परचम लहरा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हम डॉ. पाठक के बहुत आभारी हैं, जिन्होंने हमें इस कार्यक्रम में बुलाया। मोदी साहब ने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किए हैं, उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी देश के प्रखर राष्ट्रपुरुष हैं, इस युग में ऐसा व्यक्ति मिलना बहुत कठिन है। हम सब बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें देश के प्रत्येक वर्ग, विकास और सभी के बारे में सोचने वाला प्रधानमंत्री मिला है। स्वच्छता अभियान में डॉ. विन्देश्वर पाठक का सबसे बड़ा योगदान है, इसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं। गांधी जी के बाद स्वच्छता और अस्पृश्यता जैसी गंभीर समस्या को लोग भूल गए थे, लेकिन पाठक जी ने न सिर्फ उसे याद रखा, बल्कि उसे खत्म करने का बीड़ा भी उठाया। डॉ. पाठक ने अपना पूरा जीवन स्वच्छता और शौचालय के कार्य में समर्पित कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने मैला ढोने वाले हमारे भाई-बहनों को उनके कार्य से मुक्ति दिलाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा है, जो कि बहुत ही सराहनीय है।


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सुलभ

स्वच्छता के अग्रदूतों को सम्मान

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नेशनल वॉश चैंपियंस कॉनक्लेव

सु

नेशनल वॉश चैंपियंस कॉन्क्लेव में स्वच्छता के अग्रदूतों को सम्माति करने का मकसद यह था कि इससे बच्चों के मन मस्तिष्क में स्वच्छता के प्रति एक सकारात्मक सोच विकसित हो

प्रियंका तिवारी

लभ स्वच्छता व सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक द्वारा नेशनल वॉश चैंपियंस कॉन्क्लेव में स्वच्छता के अग्रदूतों को सम्मानित किया गया। इस सम्मान का मकसद बच्चों के मन मस्तिष्क में स्वच्छता के प्रति एक सकारात्मक सोच विकसित करना है, जिससे वह अपने घर-परिवार को भी स्वच्छता के प्रति जागरुक कर सकें और एक स्वच्छ और स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकें। बता दें कि दिल्ली के मावालंकर हॉल में आयोजित नेशनल वॉश चैंपियंस कॉनक्लेव के दूसरे दिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल, निकोलस ओसबर्ट चीफ आॅफ वॉश सेक्शन यूनिसेफ, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयक्त ु सचिव मनीष गर्ग, भारत सरकार में स्वास्थ्य विभाग की असिस्टेंट कमीश्नर जोया रिजवी, सेंट मा​िर्टनस यूनिवर्सिटी, कराकाव, कैरेबियन आयलैंड के चांसलर कालीचरण मिश्रा उपस्थित रहे। इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए सुलभ स्कूल के बच्चों ने अनुपयोगी वस्तुओं से बनी कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया और साथ ही उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। कला प्रदर्शनी में पहला पुरस्कार पूसा पब्लिक स्कूल, दिल्ली, दूसरा पुरस्कार होली चाइल्ड स्कूल, बर्धमान, पश्चिम बंगाल और तीसरा पुरस्कार ताशडिंग एंड लिमचांग स्कूल, वेस्ट सिक्किम को दिया गया। इसके साथ ही स्वच्छ भारत अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कैप्टन आदर्श जुनेजा को भी डॉ. पाठक द्वारा सम्मानित किया गया। वहीं विभिन्न राज्यों से आए सुलभ सेनिटेशन क्लब के सदस्यों को स्वच्छता के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया, जिसमें पहला पुरस्कार ताशडिंग एंड लिमचांग स्कूल, सिक्किम को 30

हजार रुपए की राशि, दूसरा पुरस्कार ओडिया गवर्मेंट हाईस्कूल, अदितापुर, झारखंड को 20 हजार रुपए व तीसरा पुरस्कार कार्मला स्कूल, फरीदाबाद, हरियाणा को 10 हजार रुपए देकर सम्मानित किया गया। सभी पुरस्कृत टीमों को मोमेंटो और सर्टि​िफकेट भी दिया गया। बच्चों से ज्यादा माता-पिता को जागरुक करने की आवश्यकता- जावड़ेकर इस अवसर पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि डॉ. विन्देश्वर पाठक देश में स्वच्छता के सेनानी हैं और ये बच्चे स्वच्छता के अग्रदूत हैं। यही तो नया भारत हैं, जो स्वच्छता के लिए जागरुक, उत्साहित और स्वच्छता के कार्य करने में आनंद महसूस कर रहे हैं। यही स्वच्छ और

स्वस्थ्य भारत के निर्माता हैं। जावडेकर ने कहा कि शिक्षा पुस्तकों में नहीं होती है, असली शिक्षा तो ऐसे स्कूलों में होती है, जहां स्वच्छता को प्रथमिकता दी जाती है। आज के बच्चे तो जागरुक हैं, लेकिन आवश्यकता उनके माता-पिता को जागरुक करने की, शिक्षित करने की है। पहले लोग कहते थे कि सावर्जनिक शौचालयों की साफ सफाई नहीं की जा सकती, लेकिन डॉ. पाठक ने सबको दिखाया कि कैसे सावर्जनिक शौचालयों को भी साफ रखा जा सकता है। डॉ. पाठक ने शौचालयों का इस्तेमाल करने और उसे स्वच्छ रखने के लिए लोगों में आदत डाली और आज लोग सावर्जनिक शौचालयों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। स्वच्छता और शौचालय के क्षेत्र में डॉ. पाठक पिछले 50 सालों से कार्य कर रहे हैं, इसके लिए मै उन्हें ढेरों शुभकामनाएं

डॉ. विन्देश्वर पाठक देश में स्वच्छता के सेनानी हैं और ये बच्चे स्वच्छता के अग्रदूत हैं। यही तो नया भारत हैं, जो स्वच्छता के लिए जागरुक, उत्साहित और स्वच्छता के कार्य करने में आनंद महसूस कर रहे हैं। यही स्वच्छ और स्वस्थ्य भारत के निर्माता हैं-प्रकाश जावडेकर, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री

देता हूं। जावडेकर ने कहा कि स्कूल की दीवारें भी बोलती हैं, उनका भी अपना व्यक्तित्व होता है। स्कूल की दीवारों को सजाने-सवांरने की जिम्मेदारी छात्रों को ही दे देनी चाहिए, ताकि वह अपनी अपनी कक्षाओं को सुंदर और स्वच्छ रखें। इससे कक्षा में एक अच्छा माहौल विकसित होगा। स्वच्छ व स्वस्थ्य वातावरण में पढाई करने से हमारे बच्चों में एक स्वस्थ्य उर्जा का संचार होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा चलाए गए स्वच्छता अभियान के तहत पूरे देश में साढ़े पांच लाख शौचालयों का निर्माण एक साल में कराया जा चुका है। इतन ही नहीं देश के 2 लाख 68 हजार सरकारी स्कूलों ने स्वच्छता की इस मुहिम में हिस्सा लिया है। आज देश बदल रहा है, लोग जागरुक हो रहे हैं और हमारा देश उन्नति की राह में आगे बढ़ रहा है। जावडेकर ने कहा कि गंदगी ही बीमारियों का मूल कारण है, जिस दिन ये गंदगी देश से साफ हो जाएगी उस दिन तमाम बीमारियों से हम छुटकारा पा लेंगे। आज देश के 2 लाख से ज्यादा गांव खुले में शौच मुक्त हो गए हैं। इससे पता चलता है कि देश में जागरुकता आई है। देश में 15 हजार टन कचरा इकट्ठा होता है, इसके लिए हमारी सरकार ने स्वच्छता अभियान चलाया है और यह अभियान सभी लोगों के साथ होने से ही


06 सुलभ

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यदि हम स्वच्छता को अपने जीवन का मूल मंत्र बन लें तो बीमारियों से काफी हद तक बचा जा सकता है-अनुप्रिया पटेल, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री पूरा हो सकेगा। स्वच्छता हम सभी का मुख्य दायित्व है। जितने पर्यटक पूरे देश में आते हैं उतने तो केवल पेरिस में आते हैं, क्योंकि वहां स्वच्छता है। हमारे ऐतिहासिक स्थल स्वच्छ नहीं है, जिसकी वजह से हमारे यहां पर्यटक कम आते हैं। हमें इन बातों का ध्यान रखना चाहिए और इसके साथ ही हमें अपने आस-पास भी स्वच्छता का विशेष वातावरण बनाना चाहिए। स्वच्छता से दूर होंगी कई बीमारियां- अनुप्रिया पटेल

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि सुलभ सेनिटेशन क्लब की तरफ से जो मुहिम चलाई जा रही है, वह प्रधानमंत्री मोदी के सपने को पूरा करने की दिशा में है। एक तरफ हम स्वच्छता पखवारा मना रहें है तो दूसरी तरफ सुलभ ने यह कॉन्क्लेव आयोजित कर सराहनीय कार्य किया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सुलभ ने समाज और देश में स्वच्छता के लिए जो अभूतपूर्व कार्य किए हैं, इसके लिए हम सुलभ परिवार और डॉ. पाठक को शुभकामनाएं देते हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी योजना बिना जन भागीदारी के सफल नहीं हो सकती है, इसीलिए स्वच्छता के इस मुहिम में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योगदान देना

होगा तभी हम प्रधानमंत्री मोदी के सपने को 2019 तक पूरा कर सकेंगे। राज्य मंत्री ने कहा कि यदि हम स्वच्छता को अपने जीवन का मूल मंत्र बन लें तो बीमारियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। ज्यादातर बीमारियां गंदगी की वजह से ही फैलती हैं, इसीलिए हम सब को स्वच्छता का विशेष ध्यान देना चाहिए। स्कूलों में छात्र- शिक्षक मिल कर करें शौचालयों की सफाई- डॉ पाठक

के बाद स्वयं उसकी सफाई भी करें। इससे सभी में स्वच्छता के प्रति एक जागरुकता आएगी और साथ ही लोग स्वस्थ्य भी रहेंगे। उन्होंने कहा कि सुलभ स्कूल में बच्चियों के लिए सेनेटरी नैपकिन की भी व्यवस्था है, ताकि उनकी पढ़ाई किसी भी समय बाधित ना हो। हमारे यहां सेनिटरी नैपकिन बनाया भी जाता है और इसकी ट्रेनिंग भी छात्राओं को दी जाती है। उन्होंने कहा कि हमारे स्कूल में 60 प्रतिशत बच्चे गरीब तबके के पढ़ते हैं, जिनसे कोई फीस नहीं ली जाती है। वहीं 40 प्रतिशत बच्चे संपन्न घरों के पढ़ते हैं, जिनसे हम फीस लेते हैं। देश और विदेश में मिलाकर कुल 178 सुलभ सेनिटेशन क्लब और 1500 सुलभ पब्लिक स्कूल हैं, जहां पर उचित शिक्षा के साथ साथ हम उन्हें रोजगार परक शिक्षा भी देते हैं। डॉ. पाठक ने कहा कि हमारी मां ने हमें कभी पैसे कमाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। वे हमेशा कहती थीं, बेटा ज्ञान प्राप्त करों, शिक्षा ग्रहण करो। यदि अच्छी शिक्षा ले लोगे तो कभी पैसे कमाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, इसीलिए आज के समय में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

चलाया है, जिसके तहत देश के 172 स्कूलों को स्वच्छता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। हमारे इस अभियान से प्राइवेट स्कूल भी जुड़ सकते हैं, इसके लिए उन्हें ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना है। हम डॉ. पाठक से निवेदन करते हैं कि सुलभ से जुड़े जितने भी स्कूल हैं, वह हमारे इस अभियान में हिस्सा लें। इसके साथ ही देश के सभी स्कूल हमारी इस मुहिम में शामिल होकर प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में हमारी मदद करें। बच्चे होते हैं चेंज मेकर- जोया रिजवी

स्कूलों को स्वच्छ रखने के लिए चलाया स्वच्छ विद्यालय अभियान- मनीष गर्ग

इस अवसर पर डॉ. पाठक ने कहा कि हम लोग गांधी के अनुयायी हैं, उन्होंने कहा था कि जो करो सो कहो और जो कहो सो करो... इसके साथ ही उन्होंने बताया कि हमारी संस्था में किसी को बाहर से बुलाकर शौचालयों की सफाई नहीं कराई जाती है, बल्कि सुलभ स्कूल में पढ़ाई करने वाले छात्र और शिक्षिकाएं ही शौचालयों की सफाई करती हैं। यदि किसी बच्चे के माता पिता ये कहते हैं कि मेरा बच्चा शौचालय की सफाई नहीं करेगा तो हम उस बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं देते हैं। डॉ. पाठक ने कहा कि जिसने आज के समय में शौचालय की सफाई कर ली वह महान व्यक्ति हो गया। इसके साथ ही उन्होंने देश के सभी बच्चों से से अनुरोध किया कि वह अपने स्कूलों में शौचालय का इस्तेमाल करने

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव मनीष गर्ग ने कहा कि हमें पूरे देश के स्कूलों में फंक्शनल शौचालयों का निर्माण करवाना है, जिससे आने वाले समय में छात्रों को दिक्कतों का सामना ना करना पड़े। इसके साथ ही यह भी ध्यान देना है कि शौचालयों का रख रखाव कैसे हो? जब तक प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार नहीं बदलेगा तब तक स्वच्छता का यह अभियान सफल नहीं होगा। सरकार के साथ-साथ लोगो को भी इस अभियान से जुड़ने और कार्य करने की आवश्यकता है। हमने देश के स्कूलों को स्वच्छ रखने के लिए स्वच्छ विद्यालय अभियान

भारत सरकार में स्वास्थ्य विभाग की असिस्टेंट कमीश्नर जोया रिजवी ने कहा कि स्वच्छता की शुरुआत हमारे घर से होती है। उन्होंने कहा कि बच्चे किसी भी अभियान के लिए एक चेंज मेकर की तरह कार्य करते हैं। सिक्क्म और हरियाणा में बच्चों ने स्वास्थ्य को लेकर जो पहल की है, वैसी ही पहल पूरे देश में स्वच्छता को लेकर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मुझे यहां आकर बहुत खुशी हो रहा है, क्योंकि मैं जो स्वास्थ्य कार्यक्रम देख रही हूं वह किशोर-किशोरियों के लिए है। हमारे यहां पानी और गंदगी की बहुत ज्यादा समस्या है, यदि सभी को पीने के लिए स्वच्छ पानी मिले तो हम ज्यादातर बीमारियों से दूर रह सकते हैं। हमने एक कार्यक्रम किशोरों के लिए चलाया है, जिसे राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम कहते हैं। इसके तहत हम 10 से 19 साल तक की लड़कियों को सस्ते दामों में सेनिटरी नैपकीन प्रोवाइड कराते हैं। यह नैपकीन आशा दीदी के पास से आसानी से मिल जाता है। हम चाहते हैं कि मासिकधर्म हाइजीन के मामले में सभी राज्य जागरुक हों और वह इसके लिए वह बेहतर कार्य करें। आप सब स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं, इसके लिए आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं।


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सुलभ

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बच्चों ने सीखा स्वच्छता का सबक नेशनल वॉश चैपियंस कॉन्क्लेव का आयोजन

सुलभ द्वारा आयोजित नेशनल वॉश चैंपियंस कॉन्क्लेव में देश और विदेश के आए स्कूली बच्चों को स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में विस्तार से बताया गया

एक नजर

बच्चे हैं सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत

स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता जरूरी है घर घर जागरुकता फैलाने की जिम्मेदारी बच्चे उठाएं

सु

प्रियंका तिवारी

लभ सेनिटेशन क्लब की तरफ से दिल्ली के मावालंकर हॉल मे नेशनल वॉश चैंपियंस कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मानव संसाधन मंत्रालय में स्कूल एजुकेशन के एडवाइजर डॉ. एन के साहू, वाटर एड इंडिया के हेड वी आर रमन, पॉयनियर की वरिष्ठ संपादक विनीता पांडेय, मैजिक इंडिया फाउंडेशन की रिजनल डायरेक्टर ज्योति शर्मा और सुलभ स्वच्छता व सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक मौजूद रहे। सुलभ प्रणेता ने कॉनक्लेव में आए मुख्य अथितियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, शॉल और स्मृति चिन्ह देकर किया। इसके साथ ही अफगानिस्तान से आई सुलभ स्कूल की टीम ने डॉ. पाठक को स्मृति चिन्ह प्रदान किया। कार्यक्रम के दौरान बच्चों को संबोधित करते हुए डॉ. पाठक ने कहा कि आप लोग समाज में परिवर्तन

लाने वाले आग्रदूत हो। आप लोग ही इस समाज में कुछ अलग करके परिवर्तन ला सकते हो। हमें हमारा समाज या देश क्या दे रहा है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम अपने देश और समाज को क्या दे रहे हैं। आज पूरे विश्व में सामाजिक सुधार और विकास की बात हो रही है। हम सभी को इसके लिए जागरुक होने की आवश्यकता है। डॉ. पाठक ने कहा कि आज के दौर में स्वच्छता और शौचालय के मुद्दे पर बात करन जरूरी हो गया है। हमें देश व अपने समाज को स्वच्छ और स्वस्थ रखने के लिए अभी भी बहुत से शौचालयों के निर्माण की आवश्यकता है। आज हम स्वच्छता और शौचालय के मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक

विकास भी जरूरी है और यह तभी होग जब प्रत्येक लोग जागरुक हों। सामाजिक विकास सबसे अच्छा है इस पर सभी को चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने बच्चों से कहा कि हम आप सबसे उम्मीद करते हैं कि आप लोग इस मुहिम को घर-घर तक ले जाएंगे। आप लोग घर-घर जाइए और लोगों को स्वच्छता और शौचालय के विषय में जागरुक कीजिए, तभी समाज में परिवर्तन हो सकता है। समाज में परिवर्तन लाने का काम हम आप में से कोई भी कर सकता है, इसके लिए सिर्फ जज्बे की जरुरत है। हम सभी को अपने पड़ोसियों, गरीबों, दलितों और शोषित लोगों की मदद करनी चाहिए। यदि सभी लोग ऐसी भावना रखें तो देश से छूआछूत और गंदगी दोनों दूर

हम सभी को अपने पड़ोसियों, गरीबों, दलितों और शोषित लोगों की मदद करनी चाहिए। यदि सभी लोग ऐसी भावना रखें तो देश से छूआछूत और गंदगी दोनों दूर हो जाए - डॉ. पाठक

हो जाए। मानव संसाधन मंत्रालय में स्कूल एजुकेशन के एडवाइजर डॉ. एन के साहू ने कहा कि डॉ. पाठक बहुत ही अच्छा कार्य कर रहे हैं । उन्होंने आप बच्चों को एक अच्छा मौका दिया है। आप सबको इस मौके का सदुपयोग करना है और देश को स्वच्छ व स्वस्थ्य रखने में अपना योगदान देना है। उन्होंने कहा कि डॉ. पाठक 50 वर्षों से जिस कार्य को कर रहे हैं उसे प्रधानमंत्री मोदी ने गंभीरता से लिया है। स्वच्छता हम सब के लिए जरुरी है, इसके लिए हमें अपने आस-पास, मोहल्ले, गलियों, घर और गांव को साफ रखना चाहिए और इसके लिए लोगों को जागरुक भी करना चाहिए। वाटर एड इंडिया के हेड वी आर रमन ने कहा कि मैं स्वच्छता के भविष्य के लीडर से बात कर रहा हूं। हमने अपने सामाजिक करियर की शुरुआत ही स्वच्छता और स्वास्थ्य विषय से की। शुरुआत में हमने भारत के 8 शहरों में स्वच्छता व शौचालय में सफाई पर स्टडी की तो हमने पाया कि देश के कई शहर ऐसे हैं जहां 75 छात्र एक शौचालय और 67 छात्राएं एक शौचालय का इस्तेमाल करते थे। एक स्कूल में लड़के –लड़कियां मिलाकर कुल 1700 बच्चे पढ़ते हैं ओर उनमें से मात्र 142 बच्चे ही शौचालय का पूर्ण रूप से इस्तेमाल कर पाते थे। इस समस्या का समाधान कैसे निकले इस पर हमने विचार किया तो पाया कि यहां तो बहुत सी समस्याएं है। इससे निपटने के लिए मिनिस्ट्री और स्कूल प्रशासन को वहां के स्थानीय लोगों जैसे जिला पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पंचायत और ब्लॉक पंचायत स्तर पर बात करने, उन्हें शौचालय व स्वच्छता के प्रति जाकरुक करने की आवश्यकता है, तभी स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकता है। इस क्षेत्र में छात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, यदि आप लोग प्रण लें, तो देश को स्वच्छ और स्वस्थ होने में समय नहीं लगेगा। पॉयनियर की वरिष्ठ संपादक विनीता पांडेय ने कहा कि हमें स्वच्छता जन्म से ही सिखाई जाती है,


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लेकिन बड़े होते ही हम सब भूल जाते हैं। हम अक्सर छोटी छोटी बातों का ध्यान नहीं देते जैसे, मोबाइल चलाते हुए उसी हाथ से खाना खाना, खाना खाते समय टीवी के रिमोट का इस्तेमाल करना, न्यूजपेपर में अक्सर लोग ब्रेड या पकौड़े खाते हैं। ये सभी चीजें हमारे लिए बहुत ही हानिकारक हैं। हमें इनका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और इसके लिए आपको अपने घरों में और आस-पास के लोगों को जागरुक

करना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि लड़कियां माहवारी के दिनों में काफी परेशान रहती हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। माहवारी कोई बीमारी नहीं है, यह प्रकृति का नियम है। इसका सामना हर लड़की को करना पड़ता है। ऐसे समय में आप कांफिडेंट रहिए और साफ सफाई का विशेष ध्यान रखिए, जिससे संक्रमण नहीं होगा। उन्होंने कहा कि विदेशों में जो लोग शौचालयों का उपयोग करते हैं, वहीं

उसकी सफाई भी करते हैं। वहां इसके लिए अलग से कोई सफाई कर्मी नहीं रखा गया है। यहां भी ऐसी प्रथा विकसित होनी चाहिए। मैजिक इंडिया फाउंडेशन की रीजनल डायरेक्टर ज्योति शर्मा ने कहा कि हमें हर दिन साफ पानी और स्वच्छ वातावरण की आवश्यकता है। इसके लिए हमें स्वयं ही प्रयत्न करना होगा। अपने आसपास के क्षेत्रों को हमें स्वयं ही साफ रखना होगा

तभी हम अपने वातावरण को स्वच्छ बना सकते हैं। उन्होंने बताया कि मैजिक वर्ल्ड एनजीओ में काम करने वाले ज्यादातर लोग युवा हैं और सभी मिलकर अच्छा कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने वातावरण को स्वच्छ और स्वस्थ रखने के लिए बेसिक चीजों जैसे पीने के साफ पानी, स्वच्छ शौचालयों की आवश्यकता है। शहरों के अलावा हमारे ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में आज भी स्थिति दयनीय है। वहां शौचालय तो हैं, लेकिन उनमें साफ सफाई नहीं है या वह बंद पड़े हैं। स्वच्छता हम सब के लिए एक चैलेंज है और अपने वातावरण को साफ रखने के लिए हम सब को प्रयासरत रहने की आवश्यकता है। इसके साथ ही महाराष्ट्र और हरियाणा से आई सुलभ सेनिटेशन स्कूल की शिक्षिकाओं वसुधा और चित्रा ने कहा कि हम लोग आज जो कुछ भी हैं डॉ. पाठक की वजह से हैं। यदि पाठक जी नहीं होते तो हम कुछ नहीं कर पाते, हमें प्रोत्साहित कर समाज में सम्मान दिलाने का कार्य डॉ. पाठक जी ने किया है। हम सब उनके बहुत बहुत आभारी हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में हमें यहां आकर ही पता चला है। हमें तो पता ही नहीं था कि हमें यहां क्या करना है, लेकिन यहां आकर हमें बहुत अच्छा लगा।


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स्वच्छता

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स्वच्छता पखवाड़े से स्वच्छता अभियान को मिलेगा बल स्वच्छता मिशन

पू

स्वच्छ भारत अभियान की वास्तविक सफलता आम लोगों से जुड़ी है। आम लोगों को सामाजिक और व्यक्तिगत साफ-सफाई के प्रति अधिक संवदेनशील होने की जरूरत है। उम्मीद है कि सम्पूर्ण देश 2019 तक खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा एसएसबी ब्यूरो

रे देश में मनाये जा रहे स्वच्छता पखवाड़े से स्वच्छ भारत अभियान को नई गति मिली है। स्वच्छता और साफ-सफाई को विशेष बल देने वाले सरकारी कार्यक्रमों से आम लोगों की जागरुकता में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी पिछले तीन वर्षों में स्वच्छता और साफ-सफाई को लेकर ज्यादा जागरुक हुए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में गांधी जयंती के अवसर पर इस महत्वाकांक्षी अभियान का शुभारंभ किया था। इसके बाद से स्वच्छता को लेकर कई सुखद और सफल समाचार हमारे समक्ष आए हैं। सुरक्षित पेयजल और साफ-सुथरे शौचालय के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ी है और इससे स्वच्छता को एक नया अर्थ मिला है। अभियान के तहत बड़ी संख्या में शौचालयों का निर्माण हुआ है और पेयजल की व्यवस्था में सुधार हुआ है। साफ-सफाई के कार्यक्रम नियमित रूप से चलाए जा रहे है। अभियान के बढ़ते महत्त्व का अंदाजा नए शौचालयों की संख्या , सरकारी विभागों द्वारा दिए जाने वाले प्रोत्साहन, सामाजिक संस्थाओं व आम लोगों की भागीदारी से लगाया जा सकता है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वच्छता का एक निश्चित स्तर हासिल करने से 50 हजार रुपए प्रति वर्ष प्रति परिवार बचाए जा सकते है। पूरे भारत में चलने वाले इस अभियान के अंतर्गत बड़ी संख्या‍ में शौचालयों का निर्माण हुआ है और जहां से भी इस संबंध में शिकायतें आई हैं, उसका शीघ्र निदान करने की कोशिश की गई है। सार्वभौमिक स्वच्छता को गति प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ‍ भारत मिशन की शुरूआत की है। इसके अंतर्गत दो उप मिशन है :- एसबीएम (ग्रामीण) और एसबीएम (शहरी)। इस मिशन का उद्देश्य 2019 तक स्वच्छ भारत के लक्ष्य को प्राप्त करना है। यह महात्मा गांधी के 150वीं जयंती पर एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अधिकारियों के अनुसार एसबीएम की शुरुआत के समय देश में स्वच्छता कवरेज 39 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 67.5 प्रतिशत हो गई है। 2.38 लाख गांवों को ‘खुले में शौच से मुक्ति’ के अंतर्गत लाया जा चुका है और इस उपलब्धि को स्वतंत्र एजेंसियों ने भी अनुमोदित किया है। स्वच्छता से संबंधित समस्याओं के निदान के लिए स्वच्छता का आयोजन

एक नजर

सरकारी कार्यक्रमों से बढ़ी कई गुना जागरुकता 2.38 लाख गांवों हुए खुले में शौच से मुक्त सभी 4500 नमामि गंगे गांव हुए ओडीएफ

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वच्छता का एक निश्चित स्तर हासिल करने से 50 हजार रूपए प्रति वर्ष प्रति परिवार बचाए जा सकते हैं किया गया, ताकि लोगों के नए विचार सामने आ सकें। स्वच्छ भारत मिशन का लोगो भी लोगों द्वारा दिए गए विचार (क्राउड सोर्स) पर ही आधारित है। स्वच्छ भारत अभियान को नई ऊर्जा देने और इसे जनांदोलन बनाने के लिए ‘स्वच्छ‍ता ही सेवा’ नाम से इस पखवाड़े के दौरान स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत जन प्रतिनिधि और अन्य’ लोग श्रमदान करेंगे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस अभियान का कानपुर देहात से शुभारंभ किया। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कर्नाटक में इस अभियान को नेतृत्व प्रदान करेंगे। स्वच्छता पखवाड़े की समाप्ति गांधी जयंती के दिन होगी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य और विधानसभा सदस्य श्रमदान करेंगे। प्रधानमंत्री के जन्म दिन 17 सितंबर को ‘सेवा दिवस’ के रूप में मनाया गया। स्वच्छता मिशन के महत्व को बढ़ाने वाले इन कार्यक्रमों के कारण आम लोगों में भी इस कार्यक्रम के प्रति जागरुकता बढ़ी है। नीति निर्माताओं का कहना है कि जनप्रतिनिधियों, विख्यात व्यक्तियों और ब्रांड एम्बेसडरों की सहभागिता के द्वारा हम जनता को एक महत्त्वपूर्ण संदेश देना चाहते हैं। लोगों में जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य से ‘सेवा दिवस’ के अवसर पर ‘टॉयलेट-

एक प्रेम कथा’ का दूरदर्शन पर प्रसारण किया गया। ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान के तहत समाज के सभी क्षेत्रों के लोगों की श्रमदान के प्रति सहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। स्वच्छता, शौचालय निर्माण और खुले में शौच से मुक्ति को विशेष महत्त्व दिया जाएगा। सार्वजनिक स्थानों और पर्यटन स्थलों में सफाई अभियान चलाए जाएगें। इस कार्यक्रम की देखरेख पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय करेगा। कार्यक्रम के महत्त्व को बढ़ाने और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए प्रत्येक अवसर का उपयोग किया जा रहा है। इस मौके पर सार्वजनिक स्थानों जैसे पार्क, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशनों आदि पर स्वच्छता कार्यक्रम चलाए जाएंगे। गांधी जयंती के अवसर पर पर्यटन स्थलों पर स्वच्छता कार्यक्रम चलाए जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक पर्यटन स्थलों पर स्वच्छता की कमी के कारण प्रति वर्ष 500 करोड़ रुपए की हानि होती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक स्वच्छता की कमी के कारण भारत को प्रति वर्ष अपने जीडीपी के 6 प्रतिशत का नुकसान होता है। सरकार ने बड़ी संख्या‍में ऐसे स्थानों को चिन्हित किया है, जहां सफाई की आवश्यकता है। प्रत्येक मंत्रालय को स्वच्छता के लिए विशेष कार्यक्रम

चलाने का निर्देश दिया गया है। रक्षा मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक छावनी खुले में शौच से मुक्त हो। इसके बाद मंत्‍ रालय पहाड़ों पर स्थित ऊंचाई वाले स्थानों में स्वच्छता कार्यक्रम चलाएगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय स्वच्छता कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के लिए निजी समाचार चैनलों और एफएम रेडियो स्टेशनों का उपयोग कर रहा है। इसके अतिरिक्त मंत्रालय इस विषय पर लघु फिल्में भी बना रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार एसबीएम ने कई लक्ष्य हासिल कर लिए है। 29,79,945 घरेलू शौचालयों का निर्माण हुआ है। घर-घर जाकर कचरा एकत्र करने की व्यवस्था 5 44,650 वार्डों में शतप्रतिशत रूप से की गई है। स्वच्छ‍ भारत शहरी पोर्टल के मुताबिक 2,19,169 सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण हुआ है। कचरे से विद्युत निर्माण की क्षमता 94.2 मेगावाट हो गई है। 1286 शहर ‘खुले में शौच से मुक्ति’ के दायरे में आ चुके है। एसबीएम ग्रामीण पोर्टल के मुताबिक 2 अक्टूबर, 2014 से अब तक 4,80,80,707 घरेलू शौचालयों का निर्माण हुआ है और 2,38,539 गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच से मुक्ति) घोषित किया गया है। 196 जिलों को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। एसबीएम का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य ओडीएफ है। नीति आयोग के आकलन के मुताबिक 2019 तक ओडीएफ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 55 मिलियन घरेलू शौचालय और 1,15,000 सामुदायिक शौचालयों के निर्माण की आवश्यकता होगी। ‍सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, हरियाणा और उत्तराखंड ओडीएफ राज्य है। 2018 तक दस और राज्य ओडीएफ की श्रेणी में आ जाएंगे। सभी 4500 नमामि गंगे गांव ओडीएफ की श्रेणी में आ चुके हैं।


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स्वच्छता मीडिया

‘स्वच्छता ही सेवा’ पर मीडिया परामर्श सत्र का आयोजन

स्वच्छता अभियान

स्वतंत्र सर्वेक्षण के अनुसार शौचालय में निवेश से एक साल में एक परिवार 50,000 रुपए बचाता है, परिवार को शौचालय में निवेश से 430 प्रतिशत लाभ होता है

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एसएसबी ब्यूरो

जधानी में स्वच्छ भारत मिशन पर आयोजित राष्ट्रीय मीडिया परामर्श सत्र में 100 से अधिक पत्रकारों, विकास एजेंसियों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। सत्र की अध्यक्षता पेयजल तथा स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परमेश्वरन अय्यर ने की। उन्होंने प्रधानमंत्री के आह्वान पर प्रारंभ ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान में लोगों की सक्रियता का ब्यौरा दिया। 2 अक्टूबर को मनाई जाने वाली वाली स्वच्छ भारत मिशन की तीसरी वर्षगांठ से पहले ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में समाज के सभी वर्गों के लोग बड़ी संख्या में भागीदारी कर रहे हैं, स्वच्छता तथा शौचालय निर्माण और सार्वजनिक तथा पर्यटक स्थलों की साफ-सफाई में श्रमदान कर रहे हैं। भारत के राष्ट्रपति से लेकर देश का सामान्य नागरिक, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधायक, जानी-मानी हस्तियां, विभिन्न मतों के अग्रणी लोग और उद्योग जगत के नेता अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में अभियान चला रहे हैं। उन्होंने स्कूली बच्चों, केंद्रीय पुलिस बलों तथा रक्षा कर्मियों के प्रयासों की विशेष रूप से सराहना की। सचिव ने अब तक स्वच्छ भारत मिशन में हुई प्रगति की जानकारी दी और बताया कि 5 राज्यों, लगभग 200 जिलों और 2.4 लाख गांवों ने स्वयं को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया है। उन्होंने भारतीय गुणवत्ता परिषद द्वारा 140,000 घरों में किए गए स्वतंत्र सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि इस सर्वेक्षण के अनुसार घरों में शौचालय का उपयोग 91 प्रतिशत हो गया है। उन्होंने स्वच्छता अभियान के दौरान स्वच्छता के संदेश को

प्रसारित करने का आग्रह मीडिया से किया। यूनिसेफ इंडिया के वाश (डब्ल्यूएएसएच) के सचिव निकोलास ऑसबर्ट ने अपने स्वागत भाषण में स्वच्छता के अभाव के कारण छोटे बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि स्वच्छ भारत मिशन से और प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत नेतृत्व से पुरानी आदतों को बदलने का काम ठोस रूप से जमीनी स्तर पर किया जा रहा है। उन्होंने घरेलू स्तर पर स्वच्छता के स्तर को मापने के लिए देश के 12 राज्यों में 10,000 घरों में यूनिसेफ के स्वतंत्र सर्वेक्षण को मीडिया कर्मियों से साझा किया और कहा कि इस सर्वेक्षण में समुदायों में चिकित्सा खर्च घटाने, मृत्यु दर कम करने और समय की बचत के मूल्य पर विचार करते हुए यह पाया गया कि एक शौचालय पर निवेश करने वाला औसत परिवार एक वर्ष में 50,000 रुपए की बचत करता है। पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त समुदायों में परिवारों का लागत लाभ अनुपात 430 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ यह है कि यदि एक परिवार स्वच्छता पर यदि एक रुपया निवेश करता है तो वह 4.30 रुपए की बचत करता है। उन्होंने कहा कि समुदाय के सबसे गरीब वर्ग में यह लाभ बहुत अधिक है। यह प्रोत्साहन देने वाले लाभ हैं, क्योंकि यह सही रूप से स्थापित होता है कि स्वच्छता से निर्धनतम व्यक्ति को सबसे अधिक सहायता मिलती है। जमीनी स्तर से स्वच्छ भारत चैम्पियन बने मधु चौहान (सरपंच, बिजनौर जिला, उत्तर प्रदेश), रजनीश शर्मा (प्राइमरी स्कूल प्रिंसिपल, मेरठ जिला, उत्तर प्रदेश) तथा दीपा जोशी (एएनएम सुपरवाइजर, उधम सिंह नगर, उत्तराखंड) ने मीडिया से अपने-अपने अनुभवों को साझा किया। (आईएएनएस)

अनुष्का को स्वच्छता अभियान से जुड़ने का न्योता

प्रधानमंत्री ने फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा को स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ने का न्योता देते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति अन्य लोगों को इस अभियान से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी

त्री नरेंद्र मोदी ने अभिनेत्री-फिल्म प्रधानमं निर्माता अनुष्का शर्मा और मलयालम

फिल्मों के अभिनेता मोहनलाल को सरकार के 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान से जुड़ने का निमंत्रण भेजा है। प्रधानमंत्री ने अनुष्का के लिए कहा कि उनकी उपस्थिति अन्य लोगों को भी इस अभियान से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी। अनुष्का 'स्वच्छ भारत अभियान' का भी हिस्सा हैं। उन्होंने मोदी को उनके 67वें जन्मदिन पर बधाई दी और लिखा, ‘जन्मदिन मुबारक हो पीएम मोदी जी। 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान से जुड़ने का निमंत्रण देने के लिए धन्यवाद सर।’ अनुष्का ने प्रधानमंत्री से मिले एक पत्र को साझा भी किया जिसमें लिखा गया है, ‘आने वाले दिनों में, हम गांधी जयंती मनाएंगे। पीढ़ियों और सीमाओं के पार अरबों लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत महात्मा गांधी ने पहचाना की स्वच्छता के प्रति हमारा रवैया, समाज के प्रति हमारे रवैये को दर्शता है। बापू सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से स्वच्छता

को प्राप्त करने में विश्वास रखते थे।’ पत्र में लिखा गया है, ‘बापू मानते थे कि हर किसी को 'स्वच्छता' बनाए रखनी चाहिए। महान विचारों से प्रेरणा 125 करोड़ भारतीयों के विश्वास के लेकर आइए हम स्वच्छता का संकल्प लें। आइए हम यह सुनिश्चित करें कि आने वाला समय 'स्वच्छता ही सेवा' के बारे में होगा।’ पत्र में आगे लिखा गया है, ‘स्वच्छ भारत गरीब, दलित और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए की जाने वाली सबसे बड़ी सेवा है।’ पत्र में यह भी लिखा कि सिनेमा बड़े स्तर पर बदलाव लाने का सबसे 'प्रभावी' माध्यम है। अनुष्का ने ट्वीट भी किया, ‘मैं स्वच्छ भारत अभियान से जुड़कर काफी सम्मानित महसूस कर रही हूं और स्वच्छता ही सेवा अभियान के लिए बेहतरीन काम करना चाहूंगी।’ अनुष्का के अलावा मोदी ने स्वच्छता ही सेवा अभियान से जुड़ने के लिए मलयालम फिल्मों के अभिनेता मोहनलाल को भी आमंत्रित किया है। (आईएएनएस)


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पहल

बुजुर्गों का क्लब

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वरिष्ठ नागरिक

अकेलेपन से बुजुर्गों को बचाने के लिए के लिए दिल्ली में वरिष्ठ नागरिक विकास मंच की स्थापना की गई है। इस मंच से जुड़े बुजुर्गों में एक सकारात्मक बदलाव आया है

एक नजर

वरिष्ठ नागरिक विकास मंच से अब तक जुड़े हैं 125 बुजुर्ग

सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा भी ले रहे हैं बुजुर्ग

मंच से जुड़ने के लिए 1100 रुपए है आजीवन सदस्यता शुल्क

ते

सत्यम

जी से बदलते जीवन-मूल्यों का बुजुर्गों पर सबसे बड़ा असर पड़ा है। वे अपने ही घर में अपनों के लिए बोझ बन गए हैं। दम तोड़ती मानवीय संवेदना की पीड़ा उन्हें अतत: वृद्धाश्रम में शरण लेने को मजबूर करती है। इन वृद्धाश्रमों में बुजुर्गो को सारी सुख सुविधाएं मिलती तो हैं, पर उस पीड़ा को वे भुला नहीं पाते जो उन्हें अंदर ही अंदर सालती रहती है। राजधानी के पूर्वी दिल्ली में बुजुर्गों के लिए एक केंद्र स्थापित किया गया है। केंद्र का नाम दिया गया है- ‘वरिष्ठ नागरिक विकास मंच’। वृद्धाश्रम और इस केंद्र में अंतर इतना ही है कि यहां आने वाले बुजुर्ग अपनों से दूर नहीं हैं। ये अपनों के साथ रहकर अपनी जिंदगी के बचे समय का सदुपयोग करने के तरीके सीखते हैं। मदर डेयरी मुख्यालय के सामने पांडव नगर में स्थापित यह मंच इन दिनों आसपास के रहने वाले बुजुर्गो के लिए एक जरूरी स्थल बन गया है। मंच की स्थापना का उद्देश्य साफ है कि बुजुर्ग अवांछित नहीं हो गए हैं। वे उपेक्षित भी नहीं हैं। उन्हें भले ही घर में रहने में संकोच हो रहा हो पर वे यहां आकर खुद को आजाद मान रहे हैं। वे मजबूरी में यहां नहीं आते, बल्कि मनोरंजन के लिए अपना रास्ता तलाश करने आते हैं। अपने मन से और अपनी इच्छा के मुताबिक काम करने की आजादी दिलाने के उद्देश्य से स्थापित वरिष्ठ नागरिक विकास मंच में इस समय कुल 125 सदस्य हैं। दिल्ली सरकार के सोसायटी एक्ट के तहत

रजिस्टर्ड और 60 साल से उपर के महिला-पुरुषों के लिए बने केंद्र की सदस्यता शुल्क 11 सौ रुपए है। यह शुल्क आजीवन है। सुबह के 11 बजे हैं और संस्था के उप प्रधान सतीश गुप्ता एक मोटी फाईल लेकर पहुंच चुके हैं। इस महीने किस-किस का जन्मदिन है। इसकी सूची बनाई जा रही है। देखते ही देखते 25 से 30 बुजुर्ग यहां पहुंच जाते हैं। वे ऐसे आते हैं जैसे उनका दफ्तर शुरू होने वाला है। अंतर इतना ही है कि वे जब दफ्तर जाते थे तो तनाव में होते थे, लेकिन यहां हंसते हुए एक-दूसरे का अभिवादन कर रहे हैं। हां इस मंच की एक खास विशेषता यह भी है कि यहां सभी श्रेणियों के लोगों का जमघट है। कोई सरकारी सेवा से रिटायर अधिकारी है तो कोई व्यापारिक घराने से ताल्लुकात रखने वाला। किसी ने सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से अपनी पहचान बनाई है तो कोई देश के दूरदराज के इलाके से अपने बच्चे के साथ रहने के लिए दिल्ली आए हैं। कुछ बुजुर्ग ऐसे सदस्य हैं जो घर में ही अपने बाल बच्चों के साथ रह कर सुकुन के कुछ पल हमउम्र लोगों के साथ व्यतीत करना चाहते हैं। सदस्यता की शर्त मात्र इतनी है कि दिल्ली में उनके घर का पता होना चाहिए। कोई मत, किसी संप्रदाय विशेष या किसी खास समुदाय से यहां की सदस्यता लेने की कोई पाबंदी या शर्त नहीं

है। संस्था के संचालकों में प्रधान भवानी शंकर गुप्ता, सचिव सुशील गोयल, कोषाध्यक्ष रमेश गुप्ता और उप प्रधान सतीश गुप्ता प्रमुख रूप से शामिल हैं। मंच के सदस्य पूरे दिन ऐसे ही समय बर्बाद नहीं करते। देश-दुनिया की बातों के अलावा उन्हें अपने सामाजिक दायित्यों का भी बखूबी ज्ञान है। लिहाजा वे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती के अलावा सभी राष्ट्रीय पर्वों पर एक साथ जमा होते हैं और खुशियां मनाते हैं। अपने सदस्यों में किसी का जन्मदिन हो तो उसकी तैयारी सब लोग मिल बैठ कर करते हैं। उनके लिए यह दिन भी पर्व की भांति ही है। पंजाब नेशनल बैंक से रिटायर सचिव और कोषाध्यक्ष का जिम्मा लेनेवाले दोनों बुजुर्गों सुशील गोयल और रमेश शर्मा का भी मानना है कि बुजुर्ग समाज पर बोझ नहीं है, बल्कि समाज की जरूरत हैं, इसी बात को आत्मसात कर संस्था की नींव रखी गई है। संस्था के प्रधान 85 साल के भवानी शंकर गुप्ता कहते हैं कि जिंदगी अकेले गुजारनी हो तो फिर वृद्धाश्रम चले जाते, पर परिवार से अलग रहने का कोई औचित्य है क्या? परिवार के बीच रहकर परिवार के साथ दुख सुख में शामिल होकर जब अपने लिए अलग रास्ते की तलाश होती है, तब इस प्रकार की संस्था की नींव पड़ती है। वे कहते हैं कि हमें कभी भी यह महसूस नहीं होता

मंच के सदस्य पूरे दिन ऐसे ही समय बर्बाद नहीं करते। देश-दुनिया की बातों के अलावा उन्हें अपने सामाजिक दायित्वों का भी बखूबी ज्ञान है

कि परिवार हमारे बिना सुकून से रह सकता है। घर का अभिभावक दुख में हो तो वह परिवार कभी भी सुख से नहीं रह सकता। हां नई सोच आई है तो कुछ व्यक्तिगत कारणों से और कुछ निजी कारणों से आपस में तारतम्यता का अभाव जरूर दिखता है, जिसके लिए रास्ते की तलाश जरूरी है। यही रास्ता इस मंच की नींव का कारण माना जा सकता है। हमारे मन में शुरू से यह बात थी कि इसे रजिस्टर्ड कराया जाए और सरकार को इसकी सूचना हो कि हम लोग कुछ सामाजिक कार्यों में हिस्सेदारी चाहते हैं। यही कारण है कि हम वृक्षारोपण कर रिकार्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं। दिल्ली सरकार ने स्थापना के समय भी संस्था को 75 हजार रुपए का अनुदान दिया था। फिर जरूरत पड़ी तो 20 हजार फर्नीचर खरीदने के लिए दिया गया। इसी प्रकार के सकारात्मक प्रयास का नजीता है कि पूर्वी दिल्ली का हमारा यह मंच आज अपने तरीके से काम करते हुए आगे बढ़ता जा रहा है। भविष्य में हमारी योजना है कि सरकार से हमें जगह उपलब्ध कराया जाए। अभी सुबोध जैन संरक्षक के रूप में काफी सहायता करते हैं। उन्होंने ढ़ाई सौ गज की पार्किंग मुफ्त उपलब्ध कराई है। सौ कुर्सियां, टेबल और पंखे मिले हुए हैं। कंप्यूटर, टेलीविजन और फोन के अलावा हर महीने बुजुर्गों के बीच सामूहिक भोज का आयोजन होता है। उप प्रधान सतीश गुप्ता कहते हैं कि भविष्य में हमारी योजना ऐसे और केंद्रों को खोलने के साथ सरकार से मिलकर कुछ जनोपयोगी कार्य करने की भी है। मध्य प्रदेश सरकार ने जिस प्रकार वृद्ध जन पंचायत का आयोजन किया और उनके दुख-दर्द, इरादों और सपनों को जानने के लिए प्रदेश के हर हिस्से में पहुंचे ऐसी कोई योजना दिल्ली में शुरू हो जाए तो फिर हमारे जैसे बुजुर्गों को अच्छा काम मिल जाएगा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुजुर्गों के जीवन का सुनहरा सपना तीर्थ यात्रा करने के लिए तीर्थाटन योजना का ऐलान किया, मेरी इच्छा है कि ऐसी ही योजना राजधानी दिल्ली में भी बने।


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स्वच्छता के लिए एआईसीटीई की बड़ी पहल एआईसीटीई पहल

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ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन ने हर जगह थूकने के आचरण को हतोत्साहित करने के लिए अभियान शुरू किया है

आईएसएम, धनबाद का अभियान

च्छ भारत अभियान सिर्फ एक कार्यक्रम मात्र नहीं है, यह तो एक तरह का आचरण परिवर्तन का मिशन है। जन सहभागिता से चलने वाले इस अभियान का दायरा 2014 के 42 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 62 प्रतिशत हो गया है। जन जागरूकता का ये अभियान अब कॉलेजों के कैंपस में भी चलाने की पहल की गई है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन यानी एआईसीटीई ने अपने संस्थानों को यत्र-तत्र-सर्वत्र थूकने के आचरण को हतोत्साहित करने के लिए अभियान शुरू किया है।

पिछले साल से ही आईएसएम, धनबाद स्वच्छ भारत मिशन को आगे बढ़ाने में लगा है। आईएसएम धनबाद के छात्रों ने धनबाद की गंदगी साफ करने का भी बीड़ा उठाया। 1926 में स्थापित इस संस्थान के छात्रों की ये पहल वाकई काबिले तारीफ रही।

बच्चे कहेंगे-‘स्वच्छ भारत’

यत्र-तत्र-सर्वत्र न थूकें

जहां-तहां थूकना एक बुरी आदत तो है ही, ये कई बीमारियों के फैलने का कारण भी बनता है। इसी आदत को बदलने के उद्देश्य से एआईसीटीई ने ये पहल की है। एआईसीटीई ने 10,000 से अधिक संस्थानों को पत्र लिखकर इसके लिए अभियान चलाने को कहा है। एआईसीटीई अध्यक्ष अनिल सहस्रबुद्धे के मुताबिक सभी तकनीकी संस्थानों से इस अभियान को भारी समर्थन प्राप्त हुआ है। दरअसल एआईसीटीई अनुमोदित संस्थानों में करीब 20 लाख छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। जाहिर है कॉलेज कैंपसों में चलाए जाने से स्वच्छ भारत अभियान को एक बड़ा फलक मिलेगा।

एनएसएस और एनसीसी भी साथ

दरअसल खुले में थूकने की आदत बहुत प्रचलित है। इसे जनजागरुकता के माध्यम से ही खत्म किया जा सकता है। ऐसे में इस पर रोक लगाने के साथ मानसिकता में बदलाव लाने की भी पहल की जा रही है। एआईसीटीई ने इसके लिए राष्ट्रीय सेवा योजना यानी एनएसएस और राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी एनसीसी जैसे स्वैच्छिक समूहों को भी जोड़ने की पहल की है।

एक दिन का वेतन दान

2014 में महात्मा गांधी की जयंती पर सरकार द्वारा शुरू की गई स्वच्छ भारत अभियान को जनता और सरकारी अधिकारियों और कर्मियों से व्यापक समर्थन मिला है। हाल ही में नई दिल्ली में आयकर विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों ने एक दिन का वेतन दे कर योगदान दिया। 52 लाख 75 हजार 183 रुपए की भारी राशि ने इस अभियान को एक नई गति दी।

गुजरात का राजकोट अनोखे तरीके से प्रधानमंत्री मोदी के शुरू किए गए स्वच्छता अभियान से जुड़ गया है। राजकोट नगर निगम ने देश के सामने नया आदर्श रखते हुए तय किया कि स्कूलों में बच्चे हाजिरी के वक्त प्रजेंट सर या प्रेजेंट मैडम नहीं बोलेंगे। बच्चे कहेंगे-‘स्वच्छ भारत’। राजकोट नगर निगम ने शहर के सभी 81 स्कूलों में लागू किया। ये पहल इसलिए ताकि शहर के स्कूलों में बच्चों की जुबान पर ‘स्वच्छ भारत’ हो। इसके पीछे की सोच यह है कि बच्चे ही कल का भविष्य हैं। अगर उनके दिमाग में ‘स्वच्छ भारत’ की बात बैठ गयी, तो न सिर्फ आज के समाज पर वो अपना असर दिखाएगी, बल्कि आने वाले समय में भी ‘स्वच्छ भारत’ आम लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाएगा।

स्वच्छता छत्तीसगढ़

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन को छत्तीसगढ़ में शानदार सफलता मिल रही है। राज्य के लगभग 20 हजार गांवों में से विगत करीब तीन साल में 15 हजार 295 गांव खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित हो चुके हैं। इन गांवों के साथ ही राज्य के 13 जिलों, 104 विकास खंडों और 8 हजार 725 ग्राम पंचायतों को भी ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी ने संपूर्ण भारत को 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच मुक्त राष्ट्र बनाने का लक्ष्य दिया है, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उनके इस लक्ष्य को

छत्तीसगढ़ में स्वच्छता कवरेज 90 प्रतिशत तक पहुंचा राज्य के लगभग 20 हजार गांवों में से 15 हजार 295 गांव खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित हो चुके हैं

छत्तीसगढ़ में एक वर्ष पहले यानी 2 अक्टूबर 2018 तक पूर्ण करने का संकल्प लिया है। पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने अधिकारियों को मुख्यमंत्री के संकल्प के अनुरूप प्रदेश को तय समय से पहले स्वच्छ प्रदेश बनाने के लिए साप्ताहिक कार्ययोजना बनाकर कार्य के निर्देश दिए हैं। जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को शौचालय के उपयोग के लिए प्रेरित भी किया जा रहा है। प्रदेश में वर्तमान में स्वच्छता

कवरेज 90 प्रतिशत हो चुका है और लगभग 67 प्रतिशत गांवों में जियो टैगिंग का कार्य भी पूर्ण कर लिया गया है। राज्य स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अधिकारियों ने आज यहां बताया कि प्रदेश में 27 जिलों में 13 जिले धमतरी, मुंगेली, राजनांदगांव, सरगुजा, दुर्ग, कवर्धा(कबीरधाम), बलरामपुररामानुजगंज, जशपुर, दंतेवाड़ा, बालोद, सूरजपुर, बेमेतरा, महासमुंद जिले में स्वच्छता कवरेज (नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर) शत प्रतिशत

हो चुका है। आगामी माह के दो अक्टूबर को गांधी जयंती पर गरियाबंद, कांकेर सहित तीन और दूरस्थ वनांचल जिले में स्वच्छता कवरेज अंतिम लक्ष्य पर है। अधिकारियों ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत पूरे प्रदेश में 15 सितंबर से दो अक्टूबर 2017 तक ‘स्वच्छता ही सेवा’ कार्यक्रम चलाया जाएगा। इस अभियान में लोगों को सार्वजनिक उपयोग करने वाले स्थानों, तालाबों, नालियों, शासकीय भवनों में के साफ-सफाई के सहभागी बनाये जाएंगे। इस अभियान में प्रदेश के जनप्रतिनिधियों और नवरत्नों का भी सहयोग लिया जाएगा।


25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

छत्तीसगढ़ में पक्षियों का प्रदेशव्यापी सर्वेक्षण पक्षी सर्वेक्षण

प्रवासी पक्षियों को वैज्ञानिक तरीके से चि​न्हित और सूचीबद्ध करने और उन्हें संरक्षण देने के छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग ने व्यापक सर्वेक्षण की योजना बनाई है

त्तीसगढ़ में देश-विदेश से आने वाले प्रवासी पक्षियों को वैज्ञानिक तरीके से चिह्नंकित और सूचीबद्ध करने और उन्हें संरक्षण देने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग ने व्यापक सर्वेक्षण की योजना बनाई है। वन विभाग द्वारा यह सर्वेक्षण मार्च 2018 तक पूर्ण करने का लक्ष्य है। पक्षियों का यह राज्यव्यापी सर्वेक्षण वन विभाग द्वारा पक्षी गणना के लिए कार्यरत बेंगलुरू (कर्नाटक) की संस्था बर्ड काउंट इंडिया के सहयोग से किया जाएगा। बर्ड काउंट विभिन्न संस्थाओं का एक संघ है। भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी तथा सलीम अली सेंटर फॉर नेचुरल हिस्ट्री जैसी संस्थाएं बर्ड काउंट संघ की सदस्य हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि

छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जिसने अपने यहां के हरे-भरे वनों, बाग-बगीचों, तालाबों, सिंचाई जलाशयों, खेतों और बंजर भूमि सहित घास के मैदानों में स्वच्छंद विचरण करने वाले पक्षियों का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे करने और उनकी सूची बनाने का निर्णय लिया है। इससे पक्षियों की स्थानीय और प्रवासी प्रजातियों सहित कई विलुप्तप्राय पक्षियों की भी पहचान की जा सकेगी। सर्वेक्षण के लिए ग्राम पंचायतों, जनपद और जिला स्तर पर पक्षी प्रेमी नागरिकों का समूह बनाकर एक राज्यव्यापी नेटवर्क विकसित किया जाएगा। राजधानी रायपुर स्थित अपने निवास परिसर के वृक्षों में रोज सवेरे पक्षियों को देखना और उन्हें दाना खिलाना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह दिनचर्या में शामिल हैं। वे इन पक्षियों को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि पक्षियों के सर्वेक्षण और

गुड न्यूज

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स्वास्थ्य शोध

लंबी आयु के लिए वसायुक्त भोजन जरूरी

संरक्षण से छत्तीसगढ़ में पक्षी आधारित इको टूरिज्म को भी बढ़ावा मिल सकता है। इससे बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं। वन मंत्री महेश गागड़ा ने विभागीय अधिकारियों को यह सर्वेक्षण कार्य जल्द शुरू करने और मार्च 2018 तक पूर्ण करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों ने बताया कि राजधानी रायपुर में पिछले महीने की 13 तारीख को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के मुख्य आतिथ्य में वन मड़ई 2017 के अंतर्गत वन प्रबंधन समितियों और लघु वनोपज समितियों का महासम्मेलन भी रखा गया था, जहां हजारों की संख्या में आए इन समितियों के सदस्यों

एक नए अध्ययन से पता चला है कि वसायुक्त भोजन लेने वालों की उम्र ज्यादा होती है

वन विभाग द्वारा यह सर्वेक्षण मार्च 2018 तक पूर्ण करने का लक्ष्य है। पक्षियों का यह राज्यव्यापी सर्वेक्षण वन विभाग द्वारा पक्षी गणना के लिए कार्यरत बेंगलुरू (कर्नाटक) की संस्था बर्ड काउंट इंडिया के सहयोग से किया जाएगा

म वसा और अधिक कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार लेने वालों की उम्र पनीर और मक्खन जैसे समृद्ध वसा वाले खाद्य पदार्थ लेने वालों की तुलना में कम होती है। यह अध्ययन उस प्रचलित अवधारणा के उलट बताता है कि वसा की उच्च मात्रा (ऊर्जा का 35 प्रतिशत) मृत्यु के जोखिम को कम करती है। वहीं, कार्बोहाइड्रेट का उच्च सेवन (ऊर्जा का 60 प्रतिशत) मृत्यु दर के उच्च जोखिम से संबंधित है। कनाडा के मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के प्रमुख महशीद दहघान ने कहा, ‘वसा के सेवन में कमी से कार्बोहाइड्रेट की खपत में वृद्धि हो जाती है और हमारे निष्कर्ष यह बताते हैं कि दक्षिण एशियाई जैसे इलाके के लोगों (जो बहुत अधिक वसा का उपभोग नहीं करते, बल्कि कार्बोहाइड्रेट का उपभोग अधिक करते हैं) में मृत्यु दर अधिक क्यों होती है।’ इस शोध के लिए पांच महाद्वीपों के 1,35,000 लोगों पर सर्वेक्षण किया गया था। यह शोध 'लैंसेट' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। (आईएएनएस)

को पक्षी सर्वेक्षण की राज्यव्यापी कार्य-योजना की जानकारी दी गई और उनसे इस कार्य में सहयोग का आह्वान किया गया। राज्य में संयुक्त वन प्रबंधन योजना के तहत सात हजार 888 वन प्रबंधन समितियों में 27 लाख 63 हजार ग्रामीण सदस्य हैं, जिन्हें पक्षी सर्वेक्षण कार्य से भी जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसी तरह प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों में 13 लाख से ज्यादा सदस्य हैं, उनसे भी इस कार्य में सहभागी बनने का अनुरोध किया गया है। (आईएएनएस)

राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं शिक्षक : सोनोवाल मु

ख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने कहा है कि प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक ऐसा माध्यम हैं, जो बच्चों को एक बेहतर विद्यार्थी बनाकर समाज को बदलने का काम करते

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने 6172 हजार शिक्षकों को नियुक्ति पत्र दिया हैं और शिक्षकों को चाहिए कि बच्चों को एक बेहतर नागरिक बनाकर समाज के निर्माण में अपनी महत्ती भूमिका निभाएं। खानापाड़ा स्थित पशु चिकित्सा मैदान में 6172 टीईटी शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देते हुए सोनोवाल ने यह बात कही। सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्राथमिक स्कूलों के लिए नियुक्त इस शिक्षकों से मुख्यमंत्री ने

आग्रह किया कि वे शिक्षा की रोशनी को प्रदेश के उन सुदूरवर्ती इलाकों तक पहुंचाने का कार्य करें, जहां के लोग आज भी शिक्षा से वंचित हैं। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि शिक्षक का काम पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा है। उन्हें अपने कर्तव्य, भक्ति और वैराग्य के साथ राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार सुविधाएं और

वातावरण तैयार करने में लगी है ताकि योग्य और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को रोजगार और बेहतर जीवन के लिए बाहर जाना न पड़े। उन्होंने बताया कि सरकार गुवाहाटी में इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर की स्थापना की योजना के साथ गुवाहाटी के विस्तार की योजना पर काम कर रही है ताकि गुवाहाटी को दक्षिण एशिया का व्यापार केंद्र बनाया जा सके। (गुवाहाटी ब्यूरो)


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25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

जी हां, हम आपके दाग धोते हैं दिल्ली इतिहास

दिल्ली के हेली लेन में बसा धोबी घाट का इतिहास अनूठा है। उनके श्रम के सौंदर्य को रेखांकित करने वाली एक जरूरी रिपोर्ट

एक नजर

कनॉट प्लेस इलाके में बसा है धोबी घाट

परंपरागत तरीके से आज भी धुलते हैं कपड़े कपड़ों की सफाई में पूरे परिवार का योगदान

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श्वेता राकेश

ग अच्छे उनको लगते होंगे, जिनके कपड़े वाशिंग मशीन में धुलकर-सूखकर बाहर आ जाते हैं, लेकिन उसी दाग को जब हाथ से धोना पड़े तो मायने बदल जाएंगे। एक कसरत के समान है कपड़ा धोना, तभी तो ‘धोबिया पाठ’ शब्द चलन में आया। और जब एक दो कपड़े नहीं, दर्जनों कपड़ों को हाथ से धोना पड़े तो कमर सीधी नहीं कर पाएंगे आप, लेकिन हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा है जो सुबह से शाम तक हमारे कपड़े चमकाने में लगा रहता है। जी हां, वह है हमारा धोबी समाज। शहरों, खासकर महानगरों में धोबी शब्द कपड़ों पर आयरन करने वालों तक सीमित रह गया है, लेकिन ऐसा नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली में भी दर्जन भर धोबी घाट ऐसे हैं, जहां सैकड़ों की संख्या में धोबी अब भी हाथों से हमारा कपड़ा धो रहे हैं। सुबह चार बजे इन धोबी घाटों से साइकिल स्कूटर का एक जत्था शहरों के होटलों, विधायक-सांसद के घरों और रेलवे स्टेशनों के लिए निकलता है और वहां से सुबह 10 बजे तक कपड़ा लेकर लौटता है और लगभग वही समय होता है जब इन धोबी बस्तियों के कुछ धोबी कपड़ों को पानी में भिगोने, उसे सोडा और वाशिंग पाउडर से रगड़-रगड़ कर

दाग छुड़ाने और फिर उसे पत्थर पर पीटकर धोने का काम करते हैं। पूरा दृश्य श्रम का सौंदर्य है। एक ताल एक सुर और बीच-बीच में जोश बढ़ाने के लिए गीतों के स्वर भी फूट रहे होते हैं। ऐसा दृश्य मेरी आंखों में पहली बार था। राहत इंदौरी के शब्द में कहें तो चादर वादर, बिस्तर विस्तर, तकिया वकिया सब। यानी कपड़ों का ढेर। कहीं एक बड़े से पत्थर के हौदे में कपड़े भिगोएं जा रहे हैं तो कहीं कोई उसे रगड़-रगड़ कर साफ कर रहा हैं। तो कोई उसी कपड़े को धोबिया पाठ पढ़ा रहा था। एक स्थान ऐसा भी जहां ये धोबी अपने पसीने के साथ बांस की बनी बल्लियां पर कपड़े सुखा रहे हैं। वहीं एक कोने में कुछ स्त्रियां आयरन कर रही हैं और उसे तह लगाकर उसपर निशान लगा रही हैं कि यह कपड़ा किसके घर या होटल या रेलवे स्टेशन जाएगा। यह नजारा है नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के साथ लगे हेली लेन के धोबी घाट का। 1971 में दिल्ली के महादेव रोड, गोल मार्केट और बिड़ला मंदिर स्थित धोबी घाटों और वहां के निवास स्थलों को तोड़ने के बाद इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत

इन्हें हेली लेन, जहां अग्रसेन की बावड़ी भी है के पास जगह दी गई। इस घाट का नाम है देवी प्रसाद सदन धोबी घाट। देवी प्रसाद धोबी समाज के नेता थे, जिनके योगदान से इन्हें यह जगह मिल सकी। इसीलिए उनके सम्मान में इस घाट का नाम देवी प्रसाद सदन धोबी घाट रखा गया। अगर छोटे शहरों गांव की बात करें तो वहां धोबी समाज छोटी-छोटी नदियों और तालाबों के तट पर जाकर कपड़े धोने का काम करते हैं, क्योंकि वहां पानी सरलता से उपलब्ध है, लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह संभव नहीं है। यमुना नदी की जो स्थिति है उसमें कपड़े साफ नहीं और गंदे हो जाएंगे। इसीलिए कपड़ों को धोने के लिए बोरवेल के पानी, सीमेंट के टब, हौदे आदि पर निर्भर होना पड़ता है। कुछ ऐसा ही दृश्य इस घाट का भी था। यहां की गतिविधियां देखकर यह लगा ही नहीं कि यह जगह कभी कब्रिस्तान और जंगल के लिए जानी जाती थी। कभी वीरान सा रहा यह इलाका अब हर सुबह गुलजार होता है, कपड़े धोने की आवाजों के साथ। यहां कपड़े धोने की पारंपरिक पद्धति तो प्रचलन में थी ही साथ ही आधुनिक तकनीकों की

1971 में दिल्ली के महादेव रोड, गोल मार्केट और बिड़ला मंदिर स्थित धोबी घाटों को हेली लेन मे बसाया गया

कमी भी नहीं थी। कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन भी उपलब्ध हैं और सुखाने के लिए ड्रायर भी। ये सभी साजो- सामान धोबियों के श्रम को व्यक्त कर रहे थे। यहां मेरी मुलाकात होती है किरण देवी एवं उनके बेटे जयचंद से। 78 वर्षीया किरण देवी उम्र के इस पड़ाव में भी धोबियों को उनके काम में सहयोग देती हैं और कपड़ों को इस्तरी करने का कार्य करती हैं। बातचीत करते हुए हम एक मंदिर के चबूतरे पर बैठते हैं। नीम के वृक्ष के नीचे यह मंदिर उनके इष्ट देवता नगर सैन बाबा का है। सुबह सबसे पहले ये अपने इष्ट देवता की पूजा करने के बाद ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कुछ खास अवसरों पर ये लाल किला से लेकर बस अड्डे तक अपने इष्ट देव का जुलूस भी निकालते हैं। किरण देवी बताती हैं कि यहां 64 धोबियों का परिवार रहता है। हेली लेन के सभी धोबी कनौजिया उपजाति के हैं। मूलतः ये सभी उत्तर-प्रदेश और दिल्ली के रहने वाले हैं। लगभग सभी परिवार इसी पेशे से अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं। खुद किरण देवी के पति, बड़ा बेटा जयचंद और उनके दोनों पोते इसी पुश्तैनी कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। हां, उनका छोटा बेटा इस पेशे से बहुत दूर है और वह इसीलिए क्योंकि वह कंप्यूटर इंजीनियर है तथा सपरिवार अमेरिका में रहता है। वह भी करीब छह वर्ष अपने बेटे के पास अमेरिका रहकर आईं हैं। वह कहती हैं कि हमारे बच्चे भी पढ़कर अन्य व्यवसायों में किस्मत आजमाना चाहते हैं। वे इस काम को आगे बढ़ाने को इच्छुक नहीं हैं और वैसे भी इस पेशे में श्रम बहुत अधिक है और पैसा बहुत कम।’ जयचंद कहते हैं कि मैं अपने बेटे के लिए एक अच्छे रोजगार की तलाश में हूं, लेकिन एक बेहतर नौकरी के अभाव में मजबूरीवश बेटे को इस काम में लगा रखा है। हम शिक्षा के महत्त्व को समझते हैं, इसीलिए हम अपने सभी बच्चों को स्कूल भेजते हैं। कुछ सरकारी स्कूल में जाते हैं तो कुछ प्राइवेट स्कूलों में भी पढ़ाई करते हैं।’ हमारे समाज का हर वर्ग अब बेहतर शिक्षा को अहमियत देकर देश-विदेश में अच्छी नौकरी कर रहा है और अपने वंशानुगत पेशे के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी कदम बढ़ा रहा है।


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सबसे पहले कपड़ों को चिलमची में डिटर्जेंट पाउडर के साथ डाला जाता है। ‘चिलमची’ यानी सीमेंट का बना एक टब, बिल्कुल बाथिंग टब जैसा

इस वर्ग की कोई नियमित आय नहीं है। एक दिन में 200 से लेकर 1000 रुपए तक की भी कमाई हो जाती है। कभी-कभी जब कलफ करने के लिए कुर्ते आ जाते हैं तो कुछ अधिक कमाई हो जाती है। कुर्ते अधिकतर नेताओं के ही होते हैं। यूं तो रेलवे, अस्पतालों तथा बड़े बड़े होटलों के भी कपड़े आते हैं, लेकिन सबसे अधिक कपड़े होटलों से यहां आते हैं। होटलों के कपड़े यहां सस्ते चार्ज में धोए जाते हैं, क्योंकि ये इनके नियमित ग्राहक भी हैं। इसी इलाके में जजों की बड़ी-बड़ी कोठियां भी हैं, जहां इनका आना-जाना है। सुबह कपड़ों को धोने से लेकर घरघर पहुंचाने का सिलसिला शाम तक चलता रहता

है। सबसे पहले कपड़ों को चिलमची में डिटर्जेंट पाउडर के साथ डाला जाता है। ‘चिलमची’ यानी सीमेंट का बना एक टब, बिल्कुल बाथिंग टब जैसा। फिर कपड़ों को हौद में डालकर कुछ देर के बाद ठंडे पानी से धोया जाता है। कपड़ों को धोने के लिए सालभर ठंडे पानी का ही प्रयोग किया जाता है। बड़ेबड़े और भारी कपड़ों जैसे कंबल आदि को नादी में डालकर धोया जाता है। अब वॉशिंग मशीनों से भी कपड़े धोने का काम किया जाता है। मशीन के आने से अब पहले की तरह जी तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ रही है। इसमें 60 कपड़े एक बार में धोए जा सकते हैं। जिनके पास मशीन नहीं हैं वो हाथ से ही

कपड़े धोते हैं। उसके बाद हाइड्रो या ड्रायर मशीन से कपड़ों के पानी को निचोड़ा जाता है और फिर उन्हें बांस की बल्ली पर सुखाया जाता है। बारिश के मौसम से टमलर नामक मशीन की मदद से कपड़े सुखाए जाते हैं। कपड़ों पर आयरन करने का काम मुख्यतः महिलाओं का होता है। महिलाएं घर संभालने के साथ ही इस काम में भी अपना सहयोग देती हैं। कपड़ों में चुन्नट डालना यदि हो तो इसके लिए इमली की बड़ी गुठली चियां का प्रयोग होता है और अंत में कपड़ों को उनके संबंधित पतों पर पहुंचाने का सिलसिला आरंभ होता है। कपड़ों की पहचान के लिए उनकी नंबरिंग की जाती है। पहले नंबरिंग का काम बिलावा से किया जाता था, जो परचून की दुकान पर उपलब्ध होता था, लेकिन अब मार्कर का उपयोग होता है। कुछ कपड़ों में ए.बी.सी. पहचान होती है तो किसी में मकान या कोठी संख्या दर्ज की जाती है। कपड़ों की डिलिवरी के लिए पहले जहां बैलगाड़ी, हाथगाड़ी और साइकिल का प्रयोग होता था, वहीं अब स्कूटर

और मोटरसाइकिल की सुविधा हो गई है। डिलिवरी का काम देर रात तक चलता है। हफ्ते में एक-दो बार जैन कॉलोनी, वसंत विहार, वसंत कुंज, मालवीय नगर, महरौली, मयूर विहार, यहां तक कि नोएडा के चक्कर लग ही जाते हैं और वो भी मोटरसाइकिल से। इन इलाकों के कई घर इनके नियमित ग्राहक हैं। पहले गुड़गांव भी आना-जाना होता था, लेकिन अब इतनी लंबी दूरी तय करना छोड़ दिया है। शाम होने के साथ ही धीरे-धीरे धोबी अपने दो कमरों के घरों में लौट आते हैं, जो उन्हें अनुसूचित जाति के कोटे के तहत दिया गया है। इन घरों का किराया 50 रुपए है। ये सभी फ्लैट नई दिल्ली नगर पालिका के अंतर्गत आते हैं। काफी पॉश और वीआईपी इलाका होने के बावजूद यहां कई मूलभूत सुविधाओं की कमी है। दूध-सब्जी वगैरह के लिए काफी दूर जाना पड़ता है। 1970 के दशक में हेली लेन में इतनी चहल-पहल नहीं थी। अब अग्रसेन की बावड़ी देखने वालों की वजह से यहां थोड़ी चहलपहल बढ़ी है।

महिला सशक्तिकरण

बाल विवाह और दहेज प्रथा रोकेगा ‘बंधन तोड़’ ऐप जेंडर एलायंस द्वारा तैयार किए गए इस ऐप को बिहार के डिप्टी सीएम ने जनता को समर्पित किया

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ल विवाह दहेज प्रथा को रोकने तथा डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए ‘बंधन तोड़’ ऐप को बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में जनता को समर्पित किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शामिल सुशील मोदी ने भी माना कि दहेज संबंधित कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत में बीते समय में बालविवाह, दहेज प्रथा, घूंघट प्रथा समेत कई अन्य प्रथा दिखाई दी है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि दहेज प्रथा पर और ज्यादा डिबेट की जरूरत है। ‘बंधन तोड़’ एप की बात पर उन्होंने कहा कि हमें पश्चिम के अनुकरण की जरुरत नहीं है। हमें इस मुद्दे पर अपना खुद का रोडमैप बनाना होगा, मतलब हमें अपनी संस्कृति को

बचाते हुए इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है। जेंडर एलायंस द्वारा आयोजित बाल विवाह और दहेज प्रथा उन्मूलन के लिए बनाए गए ‘बंधन तोड़’ मोबाइल ऐप से राज्य के दूरदराज के लोगों को जागरूक करने में मदद मिलेगी। इस ऐप के जरिए लोगों को सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी के साथ दहेज प्रथा और बाल विवाह से संबंधित कानूनी जानकारी मुहैया कराई जाएगी। इसके माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की योजना की भी बात कही जा रही है। इस मोबाइल ऐप में एक ऐसे फीचर का प्रयोग किया गया है, जिसके माध्यम से बाल विवाह रोकने और पीड़ितों को तुरंत मदद पहुंचाने में सहायता प्रदान करेगा। इस फीचर के माध्यम से जैसे ही मदद की मांग की जाएगी, वैसे ही एक अलर्ट मैसेज जेंडर एलायंस के मुख्यालय और संबंधित इलाके के सिविल सोसाइटी या एनजीओ समेत कई लोगों को चला जाएगा। बाल विवाह के प्रमुख कारणों में लोगों पर शिक्षा का अभाव सबसे महत्वपूर्ण है। कई जगह

एक नजर

दहेज व बाल विवाह से संबंधित कानूनों की जानकारी मिलेगी

ऐप से मदद की मांग करने पर एक अलर्ट मैसेज भेजा जाएगा ऐप के जरिए बालिका शिक्षा को भी मिलेगा बढ़ावा

पर 7वीं कक्षा के बाद स्कूल न होने के कारण लोगों की पढ़ाई बंद करा दी जाती है, इनके लिए राज्य सरकार इस एप्लीकेशन के माध्यम से लोगों को सातवीं से बारहवीं तक की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा निशुल्क मुहैया कराएगी। इस बंधन तोड़ ऐप के माध्यम से बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम के अनुसार विभिन्न विषयों के ऑनलाइन वीडियो लेक्चर भी मौजूद रहेंगे, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध शिक्षक पढ़ाते हुए दिखेंगे। गूगल प्ले स्टोर से इस ऐप को इंस्टॉल करने पर यूजर को सौ रुपए का डिजिटल अमाउंट भी उसके मूवीक्यूक वॉलेट में मिलेगा। साथ ही जो भी इस ऐप को दूसरे को इंस्टॉल करने के लिए रेफर करेगा उसे 50 रुपए मिलेंगे। इस ऐप के जरिए लोगों को बिजली का बिल भुगतान करने में भी मदद मिलेगी। (आईएएनएस)


16 खुला मंच

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

‘हम सभी के पास एक समान प्रतिभा नहीं होती, लेकिन हम सभी के पास अपनी प्रतिभा को विकसित करने समान अवसर होते हैं’

अभिमत

अरविंद कुमार सिंह लेखक वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय रेलवे के पूर्व सलाहकार हैं

बुलेट युग में भारत

- एपीजे अब्दुल कलाम

आजादी के 75वें वर्ष में देश बुलेट युग में प्रवेश कर जाएगा और उन देशों में उसकी गिनती होने लगेगी जहां बुलेट ट्रेनें दौड़ती हैं

नमो का नेतृत्व

हाल में जब देश ने पीएम मोदी का 67वां जन्मदिन मनाया तो इस मौके पर जहां स्वच्छता के लिए संकल्प लिए गए, तो वहीं नए विकास कार्यों का शुभारंभ किया गया

भा

रतीय व्यापारिक उद्यम की आधुनिक परंपरा की जिन लोगों ने नींव डाली, उनमें टाटा परिवार का नाम सबसे ऊपर माना जाता है। इस नींव की सबसे बड़ी खासियत रही प्रतिबद्ध राष्ट्रीयता के संकल्प के साथ देश को प्रगति और कल्याण की राह पर आगे बढ़ाना। इस परिवार के मुखिया के तौर पर आज रतन टाटा हमारे बीच हैं। रतन टाटा ने एक बार फिर आगे बढ़कर यह कहा है कि साहसिक फैसला लेने में पीएम मोदी का कोई जवाब नहीं है। उन्होंने पीएम के नजरिए की तारीफ करते हुए कहा कि वे अक्सर कहते हैं कि एक ही चीज को देखने के कई नजरिये हो सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि गिलास पानी से आधा भरा है तो कुछ कहते हैं यह आधा खाली है, लेकिन मेरा तीसरा दृष्टिकोण है, गिलास आधा पानी और आधा हवा से भरा है। प्रधानमंत्री के इसी दृष्टिकोण की तारीफ करते हुए रतन टाटा ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘देश को नए सिरे से गढ़ने के लिए वो पर्याप्त योग्य, सक्षम और इनोवेटिव हैं और मैं आशावादी हूं कि उनके नेतृत्व में नए भारत का निर्माण होगा, जैसा कि उन्होंने वादा किया है।हमें उनका सहयोग करना चाहिए।’ गौरतलब है कि हाल में पूरे देश ने पीएम मोदी का 67वां जन्मदिन मनाया तो इस मौके पर जहां स्वच्छता मिशन में तेजी लाने के लिए नए सिरे से संकल्प लिए गए, तो वहीं कई विकास कार्यों का भी आरंभ किया गया। बीते 50 सालों से स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रहे डॉ. विन्देश्वर पाठक भी मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के रूप में देश को एक ऐसा नेता मिला है, जिसके मन में देश की तरक्की के लिए अटूट लगन है। एक देश, जिसे भविष्य में कल्याण और प्रगति के कई सुलेख एक साथ लिखने हैं, उसके लिए वाकई ऐसे करिश्माई नेतृत्व को पाना संतोष और गौरव की बात है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

भा

रत भी अब दुनिया के उन 15 देशों में शामिल होने की राह पर अग्रसर है, जहां हाईस्पीड कॉरिडोर बनेगा और बुलेट ट्रेन चलेगी। दशकों से देखा जा रहा यह सपना भारत की आजादी के 75वें ऐतिहासिक साल में जमीन पर उतर आएगा। इस ऐतिहासिक मौके पर लोग बुलेट ट्रेन से यात्रा करना आरंभ कर देंगे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने इस बहुप्रतीक्षित परियोजना को भूमि पूजन रेलवे रेलवे स्टेडियम परिसर में किया। इस मौके पर तमाम दिग्गज मौजूद थे। मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर के चयन के पीछे कई कारण हैं। मुंबई और अहमदाबाद देश के व्यापारिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र हैं। हाल में अहमदाबाद विश्व धरोहर नगरों की बेहद प्रतिष्ठित सूची में भी शामिल हुआ है। इस नाते बड़ी संख्या में कारोबारियों के साथ देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए बुलेट ट्रेन नए मौके सुलभ कराएगी। यह परियोजना जापान की शिन्कान्सेन तकनीक पर आधारित है, जिसकी अधिकतम गति 350 किमी है। हमारे हाईस्पीड कॉरिडोर पर इसकी संचालन गति 320 किमी तक होगी। जापानी तकनीक की गति, विश्वसनीयता और सुरक्षा का अनूठा और बेजोड़ इतिहास रहा है। इसी नाते जापान की मदद से यह परियोजना साकार हो रही है। इस पर भारत और जापान के प्रधानमंत्री के बीच 12 दिसंबर, 2015 को विस्तृत चर्चा के बाद सहमति बनी थी। इस परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए कई स्तर पर कोशिशें पहले से ही आरंभ हो गई थी। परियोजना क्रियान्वयन के लिए फरवरी 2016 में नेशनल हाई स्पीरड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएचआरसीएल) का गठन एक विशेष प्रयोजन

वाहन (एसपीवी) के रूप में किया गया था। दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की तर्ज पर रेल मंत्रालय, गुजरात और महाराष्ट्र सरकार को इसमें सहभागी बनाया गया है। परियोजना के लिए प्रबंध निदेशक समेत जरूरी नियुक्तियां की जा चुकी हैं। रेल मंत्री पीयूष गोयल इस परियोजना के भविष्य के प्रति बहुत आशान्वित हैं और उनको भरोसा है कि भविष्य में भारतीय रेल गति में भी एक नया इतिहास रचेगी। केंद्र में एनडीए सरकार के गठन के साथ ही 2014-15 के अपने पहले रेल बजट में तत्कालीन रेल मंत्री डी.वी.सदानंद गौड़ा ने भारतीय रेल को बुलेट युग में ले जाने का सपना दिखाया था। दुनिया के प्रमुख देशों में भारत ही ऐसा देश माना जाता है जहां अब तक हाईस्पीड कॉरिडोर नहीं था, लेकिन अब यह जापान, अमेरिका, रूस, चीन,फ्रांस, जर्मनी, इटली, ताईवान, तुर्की, दक्षिण कोरिया और स्पेन जैसे देशों की सूची में शामिल होने की ओर अग्रसर है, जहां बुलेट ट्रेन उनके प्रमुख नगरों के बीच संचालित होगी। अंतराष्ट्रीय मानकों के तहत हाई स्पीड में कमसे कम 250 किमी प्रति घंटा की गति होनी चाहिए। बुलेट ट्रेन विशेष तौर पर स्थापित लाइनों पर चलती है, लेकिन अगर पहले से बने ट्रैक को उन्नत कर गति 200 किमी प्रति घंटा तक बढ़ाई जाए तो उसे भी हाईस्पीड माना जाता है, लेकिन बुलेट ट्रेनों के लिए एलीवेटेड कॉरिडोर बनाने होते हैं। ऐसे कॉरीडोर भारी लागत के होते हैं, लेकिन इनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ बहुत अधिक हैं। बुलेट ट्रेनें प्रति यात्री किमी के लिहाज से निजी कारों से तीन गुना और हवाई जहाजों से पांच गुना किफायती हैं। यह हवाई जहाजों से 7.7 गुना कम और कारों से 4.5 गुना कम कार्बन उत्सर्जन करती हैं। इसमें भूमि की जरूरत भी एक्सप्रेसवे

बुलेट ट्रेनें प्रति यात्री किमी के लिहाज से निजी कारों से तीन गुना और हवाई जहाजों से पांच गुना किफायती हैं। यह हवाई जहाजों से 7.7 गुना कम और कारों से 4.5 गुना कम कार्बन उत्सर्जन करती हैं


की तुलना में बहुत कम होती है। साथ ही गति के साथ कई दूसरे लाभ भी हैं। यह ध्यान रखने की बात है कि भारत में पहली बार किसी बड़ी आधारभूत ढांचे की परियोजना को ऐसे उदार ऋण व्य़वस्था से वित्तपोषित किया जा रहा है। इस परियोजना पर कुल व्यय 1,08,000 करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि व्यय होगी। जापान इस परियोजना पर 88,000 करोड़ रुपए यानि करीब 81 फीसदी का ऋण नाममात्र के 0.1 फीसदी ब्याज पर दे रहा है, जिसे पांच दशकों में वापस करना है। ऋण लौटाने का सिलसिला भी 15 साल बाद आरंभ होगा और ब्याज प्रतिमाह सात से आठ करोड़ रुपए के करीब बैठेगा। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि विश्व बैंक या दूसरी एजेंसियों से बड़े कर्ज पांच से सात फीसदी ब्याज पर मिलते हैं जिनको चुकाने की मियाद 25 से 35 साल तक होती है। इस लिहाज से देखें तो भारत को जापानी कर्ज एक तरह से ब्याज रहित मिल रहा है। इससे रेलवे की मौजूदा परियोजनाओं पर भी बोझ नहीं पड़ेगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा, ‘लोगों को ऐसा बैंक नहीं मिलता, लेकिन भारत को ऐसा दोस्त मिला है जिसने बुलेट ट्रेन के लिए 88 हजार करोड़ रुपए सिर्फ 0.1 फीसदी ब्याज पर बुलेट ट्रेन के लिए पैसा देना का फैसला किया है।’ बुलेट ट्रेन परियोजना की एक अहम खूबी यह भी है कि इससे मेक इन इंडिया को भी गति मिलेगी। जापान से समझौते के दौरान पहले ही इस तथ्य पर भारत का जोर था। इसी के तहत प्रौद्योगिकी स्थानांतरण के साथ कई ऐसे पक्षों पर ध्यान दिया गया जिसका दूरगामी असर होगा। इस नयी प्रौद्योगिकी के चलते भारतीय उद्योगों में काफी रोजगार पैदा होने की संभावनाएं हैं। परियोजना का अधिकतम धन भारत में ही निवेशित होगा और निर्माण उद्योग को गति मिलने के साथ करीब 20 हजार श्रमिकों को निर्माण अवधि के दौरान काम मिलेगा। इन श्रमिकों को भारत में खास तौर पर प्रशिक्षित किया जाना है। रेल पथ और अवसंरचना के साथ समुद्र के भीतर सुरंग बनाने जैसे काम पहली बार हो रहे हैं। इससे भारतीय इंजीनियरों और श्रमिकों को नया ज्ञान और कुशलता हासिल होगी। इस परियोजना के तहत वडोदरा में एक समर्पित हाई स्पीड रेल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी विकसित किया जा रहा है जो 2020 तक पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा। जापान की तरह ही यह सिमुलेटर और सारे जरूरी उपकरणों और साजो सामान से लैस होगा। यह तीन सालों के भीतर जरूरी चार हजार कर्मचारियों को प्रशिक्षित करेगा। इससे देश में ही बुलेट ट्रेन के संचालन और मरम्मत जैसी सुविधाओं का विकास सहजता से होगा और विदेशी निर्भरता नही रहेगी। भविष्य के लिए भी इस संस्था की मदद से हाईस्पीड तकनीक के लिए प्रतिभाओं को निखारा जा सकेगा। अभी तक भारतीय रेल के करीब तीन सौ युवा कर्मचारियो को जापान में प्रशिक्षण दिया गया है। यह बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए नींव के पत्थर की तरह साबित होंगे। जापान के विश्वविद्यालयों में भारतीय रेल के अधिकारियों के लिए मास्टर डिग्री में सीटें आफर की गयी हैं। यह कार्यक्रम पूरी तरह जापान सरकार द्वारा वित्त पोषित है।

शिवराज सिंह चौहान

ल​ीक से परे

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

खुला मंच

लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं

17

समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास ही प्रगति का पैमाना

'हम किसी विशेष समुदाय या वर्ग की नहीं संपूर्ण देश की सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, हम तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे, जब तक कि हम हर एक को गर्व का यह बोध दे सकें कि वे भारत मां की संतान हैं'

हते हैं पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। महापुरुषों में बचपन से ही कुछ विलक्षणता होती है। पंडितजी के बचपन का एक बड़ा प्रेरक प्रसंग हैं। वह सब्जी लेने बाजार गए और सब्जी बेचने वाली वृद्धा को चवन्नी का भुगतान कर दिया। घर लौटते समय उन्होंने जेब टटोली तो, देखा कि वह वृद्धा को खोटी चवन्नी दे आए हैं। उनका मन इतना दुःखी और द्रवित हो गया कि वह दौड़ते हुए उस वृद्धा के पास गए और क्षमा प्रार्थना के साथ खरी चवन्नी दे दी। महापुरुष ऐसे ही होते हैं। वे स्वयं कितने भी कष्ट उठा लें, लेकिन अपने कारण दूसरों को कष्ट नहीं होने देते। जीवनभर सादगी की प्रतिमूर्ति रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सर्वप्रिय वैसे ही नहीं बने। पंडितजी की बुद्धि विलक्षण रूप से कुशाग्र थी, लेकिन कुशाग्र बुद्धि से कोई महापुरुष नहीं बनता। चित्त की निर्मलता का मेल होने पर ही वह जनकल्याणकारी सोच की ओर अग्रसर होता है। बहुत व्यापक अध्ययन करने वाले पंडित उपाध्याय सिर्फ किताबी ज्ञान से संपन्न नहीं थे। जिस व्यक्ति के पास स्वयं की अंतःप्रज्ञा नहीं होती, उसके लिए शास्त्रों के अध्ययन का कोई अर्थ नहीं। पंडितजी के पास अंतःप्रज्ञा थी। इसी कारण वे मौलिक रूप से चिंतन कर सके। उन्होंने धर्म, अर्थशास्त्र, अध्यात्म, समाज, व्यक्ति सहित सभी विषयों पर मौलिक चिन्तन कर सार्थक निष्कर्ष हमारे सामने रखे। पंडितजी की जितनी गति एक आदर्श मूलक राजनीति में थी, उतनी ही साहित्य में भी, एक ही बैठक में चंद्रगुप्त नाटक लिख लेना उनकी साहित्याभिरुचि का प्रमाण ही नहीं था, बल्कि इस बात का भी कि सरहदों को सुरक्षित रखने और देश के राजनीति एकीकरण के लक्ष्य

सुलभ का अभियान

- 24 ससतंबर 2017 ्वर्व-1 | अंक-40 | 18 आरएनआई नंबर-DELHIN

/2016/71597

harat.com

sulabhswachhb

27 प्रेरक

17 खुला मंच

08 सुलभ

्व

सुलभ ग्राम में राजू श्री्वासत डॉ. पाठक के मुररीद बन स्वखयात हासय कलाकार

गए

नए भारत की जरी्वनरेखा

ंधों पर

जापान और भारत के संब प्धानमंत्ररी के स्वचार

बांस की साइसकल

रे के सलए ग्रामरीणों को रोजगार दरेन का प्योग बांस सरे साइसकल बनानरे

च्छता समग्र स्वच्छता, स्व्वत्र स्व

राष्ट्रपसत रामनाथ कोस्वंद

ह जनपद कानपुर में सकया

नरे उत्तर प्दरेश के अपनरे गृ

राष्ट्रवयापरी ‘स्वच्छता हरी

उनकी नजर में कितने जरूरी थे। पंडितजी भारत के विकास के लिए भारतीय चिंतन को ही आधार बनाना चाहते थे। वे कहते थे कि हम लोगों ने अंग्रेज शासन में अंग्रेजी वस्तुओं का विरोध कर हर्ष महसूस किया था, लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजों के जाने के बाद हम उन्हीं का अनुसरण कर रहे हैं। पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन दो अलग-अलग चीजें हैं। पश्चिमी विज्ञान बहुत सार्वभौमिक है और अगर हमें आगे बढ़ना है तो इसे जरूर अपनाना चाहिए, लेकिन जीवन मूल्य हमारे ही होने चाहिए। स्वतंत्रता को लेकर उनका मानना था कि यह तभी सार्थक होती है, जब यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बन जाए। भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि यह जीवन को एक विशाल और समग्र रूप में देखती है। पंडितजी अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति की भारतीय सोच को निरंतर

भ सरे्वा’ असभयान का शुभारं

आगे बढ़ाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि मानव के मन, बुद्धि और मस्तिष्क का समन्वित रूप से विकास होना चाहिए। इनमें से किसी एक ही पक्ष के विकास पर ज्यादा बल देने से मनुष्य का समग्र विकास संभव नहीं है। दीनदयालजी ने कहा था, 'हम किसी विशेष समुदाय या वर्ग की नहीं संपूर्ण देश की सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, हर देशवासी हमारे रक्त का रक्त और हमारी मज्जा की मज्जा है, हम तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे, जब तक कि हम हर एक को गर्व का यह बोध दे सकें कि वे भारत मां की संतान हैं।' मुझे इस बात पर संतोष हैं कि मध्यप्रदेश में हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को आधार बनाकर अपनी योजनाएं निर्मित और क्रियान्वित कर रहे हैं। पंडितजी कहते थे कि हमारी प्रगति का आकलन सामाजिक सीढ़ी के सर्वोच्च पायदान पहुंचे व्यक्ति से नहीं, बल्कि सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की स्थिति से होगा। हमने पंडितजी के इसी चिंतन को आधार बनाकर समाज के निचले से निचले स्तर तक लोगों की बेहतरी के लिए काम किया। आयुर्वेदिक औषधालयों में काम करने वाले कम्पाउंडर हों या घरों में काम करने वाली बहनें, स्कूल के अंशकालिक लिपिक हों या सफाई कर्मचारी, भूमिहीन कोटवार, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, होमगार्ड, मजदूर, हम्माल, तुलावटी, रोजनदार मजदूर, बुजुर्ग श्रमिक, बोझा ढोने वाले मजदूर, गुमटी वाले, खेतीहर मजदूर सहित समाज के सबसे कमजोर वर्गों के जीवन में खुशहाली लाने का हमने पूरा प्रयास किया है। पंडितजी की प्रेरणाओं को योजनाओं में बदलने का हमारा यह प्रयास लगातार जारी रहेगा।

सुलभ स्वच्छ भारत का पिछले कुछ अंकों से नियमित पाठक हूं। मैं खुद भी सामाजिक अभिरुचि का व्यक्ति हूं, इसलिए यह पढ़-जानकर अच्छा लगता है देश में आज भी कई लोग लगातार अपने तरीके से बदलाव की लकीरें खींचने में लगे हैं। स्वच्छता जैसे कार्यक्रम को जो लोग सरकार के एक मिशन के तौर पर ही देखते-समझते हैं, उन्हें सुलभ के कार्यों से परिचित होना चाहिए, जिसने देश में बीते पचास सालों से लगातार इस दिशा में काम किया है। यह अच्छी बात है कि सुलभ का शुरू किया गया अभियान आज देश में एक जन-आंदोलन का नाम है। मैं प्रधानमंत्री मोदी और सुलभ प्रणेता दोनों को इसका बराबर का श्रेय देना चाहूंगा। संजय कुमार, पटना, बिहार

परिवार का अखबार

मैं

ने सुलभ स्वच्छ भारत को पढ़कर पहले भी अपनी प्रतिक्रिया भेज चुका हूं। सच कहूं तो यह अखबार अब मेरे परिवार के एक सदस्य की तरह है। मेरा बेटा स्कूल में पढ़ता है और वह सबसे पहले अखबार में छपी कहानी निकालकर पढ़ता है, जो आमतौर पर प्रेरक और दिलचस्प होती हैं। मेरी पत्नी को महिला सशक्तिकरण से जुड़ी खबरें और आलेख पसंद आते हैं, तो मेरी निगाह सबसे पहले संपादकीय पन्नों पर जाती है। दोहराने की जरूरत नहीं कि सुलभ स्वच्छ भारत मेरे पूरे परिवार का एक अभिन्न अंग बन चुका है। सुशील सिंह, देहरादून, उत्तराखंड


18 फोटो फीचर

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

जन्म दिन का जश्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री के 67वें जन्मदिन का उत्सव सुलभ परिवार ने 567 किलो के महालड्डू ओर स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ मनाया फोटो ः जयराम

डॉ. विन्देश्वर पाठक के साथ मनहर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्म दिन पर

वलजीभाई जाला, बीपी सिंह, हरभजन

महालड्डू अर्पित किया गया

सिंह और श्रीमती अमोला पाठक

रों की प्रदर्शनी का जायजा लेते डॉ. पाठक

अतिथियों के साथ प्रधानमंत्री मोदी के तस्वी

डॉ. पाठक अतिथियों के साथ नई दिशा, अलवर

बीपी सिंह और ह

रभजन सिंह को स

ुलभ द्वारा संशोधि

की प्रदर्शनी देखते हुए

बीपी सिंह और म

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नहर वलजीभाई ज

ॉ. पाठक

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को शुभकामना संदेश लिखते जन्म दिन के अवसर पर प्रधानमंत्री बीपी सिंह, मनहर वलजी भाई जाला

ी कार्यप्रणाली क

े बारे में बताते हुए

ेश लिखते त्री को शुभकामना संद मं ान प्रध पर र वस अ े जन्म दिन क टर्जी डॉ. पाठक और एस च


फोटो फीचर

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

टू पिट पोर फ्लश तकनीक के बारे में

डॉ. विन्देश्वर पाठक

के साथ मनहर

सिंह, हरभजन सिंह वलजीभाई जाला, बीपी

अतिथियों को बताते डॉ. पाठक

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और श्रीमती अमोला पा

डू खिलाते डॉ. पाठक प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर को महालड्

डॉ. पाठक और बीपी सि

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गीत की प्रस्तुति

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20 जेंडर

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

महिला स्वास्थ्य

जीवनशैली में बदलाव से बढ़ा स्तन कैंसर का खतरा

भारतीय महिलाओं में छोटी उम्र में ही स्तन कैंसर होने लगा है। जागरूकता की कमी और रोग की पहचान में देरी के चलते इसके उपचार में काफी कठिनाई आती है

एक नजर

पर्यावरण और दोषपूर्ण जीवनशैली से बढ़ा स्तन कैंसर का खतरा

भा

आईएएनएस

रत में महिलाओं में कैंसर के मामलों में 27 प्रतिशत मामले स्तन कैंसर के हैं। इस तरह की परेशानी 30 वर्ष की उम्र के शुरुआती वर्षों में होती है, जो आगे चलकर 50 से 64 वर्ष की उम्र में भी हो सकती है। स्तन कैंसर के कुछ लक्षणों में स्तन या बगल में गांठ बन जाना, स्तन के निप्पल से खून आना, स्तन की त्वचा पर नारंगी धब्बे पड़ना, स्तन में दर्द होना, गले या बगल में लिम्फ नोड्स के कारण सूजन होना आदि प्रमुख हैं। आंकड़ो के मुताबिक, 28 में से एक महिला

बचाव के कुछ उपाय

शराब का सेवन कम करें शराब से स्तन कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। धूम्रपान से बचें अनुसंधान बताता है कि धूम्रपान और स्तन कैंसर के बीच एक संबंध है। इसीलिए, यह आदत छोड़ने में ही भलाई है। शरीर का वजन काबू में रखें सक्रिय जीवन जीएं। अधिक वजन या मोटापे से

को जीवनकाल में कभी न कभी स्तन कैंसर होने का अंदेशा रहता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के मुताबिक, भारतीय महिलाओं में छोटी उम्र में ही स्तन कैंसर होने लगा है। जागरूकता की कमी और रोग की पहचान में देरी के चलते उपचार में कठिनाई भी आती है। स्तन कैंसर के मामले में इस रोग के ऊतक या टिश्यू स्तन के अंदर विकसित होते हैं। इस रोग के जो कारक हैं, उनमें प्रमुख हैं- जीन की बनावट, पर्यावरण और दोषपूर्ण जीवनशैली। बचाव के लिए जरूरी है कि 30 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं की स्क्रीनिंग आवश्यक रूप से की जाए। साथ ही स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। रोजाना लगभग 30 मिनट व्यायाम अवश्य करें। स्तनपान स्तनपान कराने से स्तन कैंसर की रोकथाम होती है। हार्मोन थेरेपी को कम करें हार्मोन थेरेपी की अवधि तीन से पांच साल तक होने पर स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। सबसे कम खुराक का प्रयोग करें जो आपके लिए प्रभावी है।

जीवनशैली में भी कुछ बदलाव किए जाएं तो इस रोग की आशंका कम की जा सकती है। आईएमए के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया, ‘यह ज्ञात हो चुका है कि डीएनए में अचानक होने वाले परिवर्तनों के कारण सामान्य स्तन कोशिकाओं में कैंसर हो जाता है। यद्यपि इनमें से कुछ परिवर्तन तो माता-पिता से मिलते हैं, लेकिन बाकी ऐसे परिवर्तन जीवन में खुद ही प्राप्त होते हैं। प्रोटोओंकोजीन्स की मदद से ये कोशिकाएं बढ़ती जाती हैं। जब इन कोशिकाओं में म्यूटेशन या उत्परिवर्तन होता है, तब ये कैंसर कोशिकाएं बेरोकटोक बढ़ती जाती हैं।’ उन्होंने आगे बताया, आप कितना हारमोन लेते हैं इसकी निगरानी डॉक्टर खुद करे तो बेहतर होगा। स्वस्थ आहार लें फलों और सब्जियों से समृद्ध, संपूर्ण अनाज और कम वसा वाला आहार लें। तनाव से बचें यह प्रतिरक्षा को कमजोर करता है और शरीर के रक्षा तंत्र को बिगाड़ता है। योग अभ्यास, गहरी सांस लेने और व्यायाम करने से लाभ होता है।

जीवनशैली में बदलाव से बचा जा सकता है इस खतरे से महिलाओं में कैंसर के मामलों में 27 प्रतिशत मामले स्तन कैंसर के

‘ऐसे उत्परिवर्तन को ओंकोजीन के रूप में जाना जाता है। एक अनियंत्रित कोशिका वृद्धि कैंसर का कारण बन सकती है। बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन में उत्परिवर्तन होते हैं। माता-पिता से उत्परिवर्तित जीन से स्तन कैंसर का जोखिम अधिक होता है। उच्च जोखिम वाली महिलाओं को हर साल एमआरआई और मैमोग्राम कराना चाहिए।’ डॉ. अग्रवाल ने कहा, ‘एस्ट्रोजेन स्तन ग्रंथियों के ऊतकों के विभाजन को तीव्र करता है। किसी महिला में यदि लंबे समय तक एस्ट्रोजेन अधिक रहता है, तो स्तन कैंसर का खतरा बढ़ा रहता है। यदि 11 वर्ष की आयु या उससे पहले ही मासिक धर्म शुरू हो जाए या 55 वर्ष या उससे अधिक उम्र में रजोनिवृत्ति हो तो माना जाता है कि एस्ट्रोजेन का एक्सपोजर अधिक है। महिलाओं को 45 वर्ष से 54 वर्ष की उम्र तक हर साल एक बार स्क्रीनिंग मैमोग्राम करा लेना चाहिए। 55 वर्ष या अधिक उम्र की महिलाओं को सालाना स्क्रीनिंग करानी चाहिए।’


25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

प्रदेश

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चरवाहा जीवनशैली

अस्तित्व और धीरज की मिसाल 'बकरवाल' जम्मू एवं कश्मीर के चरवाहे ठंड का मौसम शुरू होने से पहले ही अपनी भेड़, बकरियों के साथ पहाड़ी चारागाहों के सफर के लिए निकल पड़ते हैं। इनका जीवन साहस और धीरज की अनूठी मिसाल है

एक नजर

जम्मू एवं कश्मीर के साहसी चरवाहों को 'बकरवाल' कहा जाता है हर साल ये बकरवाल 700 किमी से ज्यादा का सफर तय करते हैं

छोटे बच्चों को माताएं अपनी पीठ पर लादकर ले जाती हैं

के कारण, ज्यादातर चरवाहे रात में कम यातायात होने के दौरान यात्रा करना पसंद करते हैं।

बिना अस्पताल के प्रसव

उत्तरी कश्मीर के गांदेरबल जिले में गंगाबल चारागाह में अपने परिवार और पशुओं के साथ पहुंचे 45 वर्षीय शराफत हुसैन ने कहा, ‘हमारे परिवारों में गर्भवती महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाने के मामले बेहद कम होते हैं। अल्लाह की कृपा हम पर हमेशा बनी रहती है। परिवार में किसी का जन्म होने पर हम एक रात रुकते हैं और इसके बाद हमारा सफर फिर शुरू हो जाता है।’

रक्षा के लिए कुत्ते

आईएएनएस

रद ऋतु की शुरुआत के साथ ही घाटी के पहाड़ों के चारागाहों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। जम्मू एवं कश्मीर के साहसी चरवाहों को 'बकरवाल' कहा जाता है। हर साल ये बकरवाल घाटी की पहाड़ी चारागाहों तक पहुंचने के लिए अपनी भेड़, बकरियों, घोड़ों, महिलाओं और बच्चों तथा न्यूनतम घरेलू सामानों के साथ हिमालय की पीर पंजाल रेंज को पार कर पैदल ही 700 किमी से ज्यादा का सफर तय करते हैं। बकरवाल परिवारों का यह सफर सहनशक्ति और दृढ़ संकल्प की एक बेमिसाल गाथा है।

पुरुषों से कम नहीं महिलाएं

चरवाहे परिवार प्रत्येक वसंत के मध्य में घाटी में आते हैं और सितंबर के मध्य तक चारागाह में रहते हैं। ये परिवार अधिकतर जम्मू क्षेत्र के राजौरी, पुंछ और रियासी जिलों से आते हैं, जहां गर्मियों में घास के मैदान सूखने लगते हैं, जिसके कारण चरवाहों को पशुओं के अस्तित्व को बचाने के लिए इस क्षेत्र छोड़ना पड़ता है। इन परिवारों की

महिलाएं, पुरुषों की तरह ही मजबूत होती हैं। छोटे बच्चों को माताएं अपनी पीठ पर लादकर ले जाती हैं, जबकि वृद्ध पुरुष और महिलाएं घोड़े पर सवार होकर सफर करते हैं। इस तरह की यात्रा के दौरान प्रसव भी होता है और परिवार की सबसे बड़ी महिला सड़क पर होने वाले प्रसव में मिडवाइफ का काम करती है।

शरीर और स्वास्थ्य

बकरवाल के स्वास्थ्य का रहस्य उनकी जीवनशैली में निहित है। मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और कथित आधुनिक रोगों से जुड़ी अन्य बीमारियां इनके बीच दुर्लभ हैं। श्रीनगर के डॉ. जावेद ने कहा, ‘ये लोग मक्खन, घी, पूर्ण वसा वाला दूध और मटन सहित वसा युक्त आहार खाते हैं, इसके बावजूद इनमें बीमारियां कम पाई जाती हैं।’ उन्होंने आगे बताया, ‘औसतन, बकरवाल परिवार का

प्रत्येक सदस्य सर्दियों में अपने घरों से लेकर उच्च ऊंचाई वाले चारागाह वाले मैदान तक लगभग 700 किलोमीटर की यात्रा करता है। ये लोग ज्यादातर शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं और इनकी जीवन शैली के कारण इन लोगों में रोगों का जोखिम कम होता है।’

पूरे परिवार के साथ सफर

दिलचस्प है कि ये खानाबदोश अपने और बच्चों के साथ यात्रा करते हैं, इसीलिए राज्य सरकार ने उनके लिए मोबाइल स्कूल स्थापित किए हैं। इन स्कूलों के अधिकांश पुरुष शिक्षक खुद बकरवाल परिवार से संबंध रखते हैं जो बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्वतीय चरागाहों में जाते हैं। हालांकि ऐसे स्कूल बहुत कम हैं। अतीत में, चरवाहों की यात्रा सूर्योदय से शुरू होती थी और सूर्यास्त होने पर रोक दी जाती थी, लेकिन अब जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारी यातायात होने

बकरवाल के स्वास्थ्य का रहस्य उनकी जीवन शैली में निहित है। मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और कथित आधुनिक रोगों से जुड़ी अन्य बीमारियां इनके बीच दुर्लभ हैं

चरवाहा परिवार का सबसे मूल्यवान साथी कुत्ता होता है, जो चारागाह तक जाने के दौरान भेंड़ और बकरियों के झुंड की रक्षा करता है। ये चरवाहे कुत्ते भेड़ियों और तेंदुओं तक से मुकाबले की हिम्मत और ताकत रखते हैं। 'दुश्मन' की जरा सी आहट पर भी यह भौंक कर परिवार के लोगों को जगा देते हैं। दिन भर चारागाह में चरने के बाद भेड़ और बकरियों के झुंड को परिवार के तंबू या पत्थर और लकड़ी के बने झोपड़ों के करीब रखा जाता है।

कमांडो जैसी जीवनशैली

एक परिवार पीढ़ियों से एक ही चरागाह का उपयोग करता है, इसीलिए चरवाहों ने चारागाहों के अंदर मिट्टी की छत का निर्माण किया है। चरवाहों के परिवारों की महिलाएं गैर विषैली जड़ी-बूटियां और सब्जियों की पहचान करने में विशेषज्ञ होती हैं, जो कश्मीर के घास के मैदानों में स्वाभाविक रूप से उगती हैं। मौसम की अनियमितता का सामना करने और बेहद कठिन हालात में अस्तित्व को बचाने वाले पेशेवर कमांडो जैसी जीवनशैली जैसा जीवन जीने वाले इन चरवाहों के अस्तित्व की गाथा की तुलना मानव जाति के इन जैसे ही कुछ अन्य सदस्यों की गाथाओं से की जा सकती है।


22 स्वास्थ्य

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

स्वास्थ्य योग

मातृत्व योजना

तंदुरुस्ती और ऊर्जा के लिए करें हठ योग

डॉक्सऐप महिलाओं को मुफ्त परामर्श देगा

एक नए शोध के मुताबिक रोजाना थोड़ी देर हठ योग करने से मस्तिष्क तंत्र के क्रियान्वयन व ऊर्जा स्तर में सुधार हो सकता है

वल 25 मिनट के लिए माइंडफुलनेस मेडिटेशन के साथ रोजाना हठ योग के (आसन, प्राणायाम और ध्यान का एक संयोजन)

करने से मस्तिष्क तंत्र के क्रियान्वयन व ऊर्जा स्तर में काफी सुधार हो सकता है। एक शोध में पता चला है कि नियमित तौर पर हठ योग और माइंडफुलनेस मेडिटेशन (ध्यान की एक स्थिति) मस्तिष्क तंत्र के क्रियान्वयन, लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार से जुड़ी संज्ञानात्मक व भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने की क्षमताओं, स्वाभाविक सोच की प्रक्रियाएं और क्रियाएं को बढ़ावा दे सकता है। कनाडा की ओंटारियो स्थिति यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू में सहायक प्राध्यापक पीटर हॉल ने कहा, ‘हठ योग और माइंडफुलनेस मेडिटेशन

दोनों ही ध्यान सत्र के बाद कुछ सकारात्मक प्रभाव देते हैं, जिससे लोग जो रोजमर्रा की जिंदगी में करना चाहते हैं, उस पर अधिक आसानी से ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।’ हठ योग पश्चिमी देशों में प्रचलित योगों की सबसे आम शैलियों में से एक है, जिसमें ध्यान को शारीरिक आसनों और सांस लेने के व्यायाम से जोड़ा जाता है। माइंडफुलनेस मेडिटेशन में विचारों, भावनाओं और शरीर की उत्तेजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। माइंडफुलनेस मेडिटेशन और हठ योग दोनों ऊर्जा स्तर में सुधार के लिए प्रभावी पाए गए हैं, लेकिन केवल ध्यान करने की तुलना में हठ योग व ध्यान दोनों एक साथ में काफी अधिक शक्तिशाली प्रभाव देते हैं। यह शोध 'माइंडफुलनेस' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। (आईएएनएस)

चैट आधारित हेल्थकेयर प्लेटफार्म ‘डॉक्सएप’ अब हर महीने की 9 तारीख को नियमित सेवा देगा

पि

छले महीने की 9 तारीख को महिलाओं को दी गई मुफ्त सेवा की सफलता के बाद मरीजों को विशेषज्ञ चिकित्सकों से जोड़ने वाले चैट आधारित हेल्थकेयर प्लेटफार्म ‘डॉक्सएप’ ने अब हर महीने की 9 तारीख को नियमित रूप से यह सेवा देने का निर्णय लिया है। इसके तहत पूरे भारत में महिलाएं अब हर महीने की 9 तारीख को सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक डॉक्सएप के माध्यम से मुफ्त में चिकित्सक से परामर्श ले सकती हैं। यह सेवा देश में मातृ व नवजात मृत्यु की संख्या को कम करने के लिए स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के ध्येय को ध्यान में रखकर इसे

शुरू किया गया है। बीते महीने इस सेवा का इस्तेमाल लखनऊ, कोलकाता, चंडीगढ़, दिल्ली, पुणे, सिक्किम, जयपुर, अहमदाबाद, चेन्नई व हैदराबाद जैसे शहरों की महिलाओं ने किया। इसमें यौन स्वास्थ्य, अनियमित माहवारी, बांझपन व गर्भावस्था की समस्याएं शामिल रहीं। सेवाओं पर टिप्पणी करते हुए डॉक्सएप के सीईओ व सह संस्थापक सतीश कानन ने कहा, ‘महिलाओं को केवल खुद का ध्यान रखने के लिए कह देना बस पर्याप्त नहीं है, हम उन्हें ऐसा करने में भी मदद करना चाहते हैं। इसके लिए हमने महिलाओं को मुफ्त परामर्श दिया, जिसकी बेहतरीन प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। अब हमने यह काम हर महीने करने का फैसला लिया है।’ (आईएएनएस)

किसी ने खुद के घर में सौर ऊर्जा ईकाई और रेन वाटर हार्वेस्टिंग, दोनों की व्यवस्था की है उन्हें दस प्रतिशत तक की रियायत मिलेगी। संपत्ति कर विभाग के एक सर्वे के अनुसार, ढाई सौ से भी ज्यादा लोगों

ने सौर ऊर्जा की ईकाई स्थापित की है। पचास से भी अधिक लोगों ने एन वाटर हार्वेस्टिंग शुरू की है तथा एक दर्जन लोगों ने केंचुए से खाद बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। एक खबर के अनुसार, बिजली बचत में सौर ऊर्जा ईकाई बहुत कारगर साबित हो रही है। सौर वाटर हीटर का प्रचलन भी काफी बढ़ा है। संपत्ति कर विभाग का कहना प्रयावरण संवर्धन की दृष्टि से संपत्ति कर में रियायत काफी असरकारी साबित हो रही है। इसे लेकर पहले लोगों में ढीलापन था लेकिन अब जागरुकता आ गयी है। इससे शहर के विकास (मुंबई ब्यूरो) में मदद भी मिल रही है।

पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण की रक्षा के लिए रियायत पर्यावरण संरक्षण के उपायों को अपनाने वालों को संपत्ति कर में रियायत दे रही है नागपुर महानगर पालिका

ना

गपुर महानगर पालिका ने पर्यावरण संरक्षण के उपायों को अपनाने वालों को संपत्ति कर में रियायत देने का अभियान चलाया है। उल्लेखनीय है कि नागपुर तथा आसपास में भू-जल तेजी से गिर रहा है। यहां बारिश भी कम होती है। गर्मियों में हालत भयावह हो जाती है। इसी उद्देश्य से मनपा वर्ष 2008 से ही संपत्ति धारकों को छूट दे रही है, ताकि

लोग जागरूक होकर अपने यहां सौर ऊर्जा युनिट स्थापित करें, रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाएं, दूषित पानी को रिसाइक्लिंग कर उसे सिंचाई में इस्तेमाल करे। इससे न केवल लोगों को निजी फायदे होंगे, बल्कि पर्यावरण की भी रक्षा होगी। मनपा ने कहा है कि जो लोग इस काम में सक्रियता दिखाएंगे उन्हें सम्पत्ति कर में पांच प्रतिशत की छूट मिलेगी। अगर


25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

स्वास्थ्य शोध

एक शोध के मुताबिक गन्ने में पाए जाने तत्व तनाव को खत्म कर नींद बढ़ा देते हैं

नीति आयोग का राष्ट्रीय पोषण रणनीति जारी नी

कम कर देता है और नींद को वापस सामान्य स्तर पर ले आता है। यह यौगिक पदार्थ विभिन्न दैनिक खाद्य पदार्थो, जैसे कि गन्ना, चावल की भूसी, गेहूं के बीज का तेल, मधुमक्खी मोम आदि में प्रचुर मात्रा में मौजूद है। पत्रिका 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित शोध के मुताबिक, खून के प्लाज्मा में कोर्टिकोस्टेरोन का स्तर बढ़ने से मानव में तनाव बढ़ता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऑक्टाकोसैनल एक यौगिक पदार्थ है, जो गन्ने के रस में पाया जाता है। यह तनाव के कारण अनिंद्रा के उपचार के लिए उपयोगी हो सकता है।

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पोषण नीति आयोग

गन्ना तनाव कम कर बढ़ाता है नींद

न लोगों के लिए एक अच्छी खबर है, जिनकी तनाव के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पाया कि गन्ने और अन्य प्राकृतिक उत्पादों में पाए जाने वाला एक सक्रिय तत्व तनाव को खत्म कर नींद बढ़ा देता है। शोध में पाया गया कि वर्तमान में उपलब्ध नींद की गोलियां तनाव पर कोई असर नहीं करतीं और उनके काफी दुष्प्रभाव भी होते हैं। महेश कौशिक और जापान के त्सुकूबा विश्वविद्यालय के योशिहिरो उरादे के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पाया कि ऑक्टाकोसोनॉल तनाव को

स्वास्थ्य

नीति आयोग का लक्ष्य राष्ट्रीय विकास कार्यसूची में पोषण को लाना है

ति आयोग ने राष्ट्रीय पोषण रणनीति जारी किया है, जिसका लक्ष्य राष्ट्रीय विकास कार्यसूची के केंद्र में पोषण को लाना है। नीति आयोग ने एक बयान में कहा कि हमारे पोषण उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए इस योजना में कार्यान्वयनकर्ताओं और चिकित्सकों के बीच प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि रणनीति बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘भारत में तीन बच्चों में से एक कुपोषित है।’ इस रणनीति दस्तावेज को जारी करते हुए, हरित क्रांति के जनक और प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने कहा, ‘जीवन-चक्र दृष्टिकोण के आधार पर एक पोषण रणनीति होना जरूरी है, जो जन्म से मृत्यु तक पोषण की जरूरतों को ध्यान में रखे।’ उन्होंने तीन प्रकार की पोषण की कमी के बारे में बताया, जिसमें

पोषण, कुपोषण और प्रोटीन की भूख शामिल है। तीनों को एक साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कृषि और पोषण को जोड़ने की सिफारिश की। स्वामीनाथन ने कहा, ‘कृषि पोषण संबंधी अधिकांश समस्याओं का जवाब प्रदान करती है.. चुनौती यह है कि आप दोनों को कैसे जोड़ते हैं।’ नीति आयोग ने कहा कि पोषण रणनीति में एक ढांचे की परिकल्पना की गई है, जिसमें पोषण के चार आसन्न निर्धारक -स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन, पेयजल व स्वच्छता और आय व आजीविका- को मिलाकर देश में पोषण की कमी को दूर करने के लिए काम करने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि पोषण संबंधी रणनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्यों को स्थानीय जरूरतों और चुनौतियों का समाधान करने के लिए अपने-अपने हिसाब से राज्यस्तरीय और जिलास्तरीय योजनाएं बनानी चाहिए। (आईएएनएस)

स्वास्थ्य शोध

बाल मनोविकृति को लेकर आगाह करने वाला शोध जो

मनोविकृति के शिकार बच्चों में आत्मघाती विचार पांच से छह गुना अधिक होता है

बच्चे ऐसी आवाजें सुनते हैं या ऐसी चीजें देखते हैं, जो अन्य लोग नहीं देख सकते, उनमें आत्महत्या करने का खतरा सामान्य बच्चों से पांच गुना अधिक होता है। शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया है। इस शोध के निष्कर्षों से पता चलता है कि अन्य लोग भी जो सामान्यत: स्वस्थ हैं, लेकिन उन्हें कभी कभार मतिभ्रम या भ्रम हो जाता है, उनमें

भी आत्महत्या करने की प्रवृत्ति दो गुना तक अधिक होती है। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के प्रोफेसर जॉन मैक्ग्रेथ ने बताया, ‘12 साल से कम उम्र के उन बच्चों में आत्मघाती विचार पांच से छह गुना अधिक होता है, जो मनोविकृति के शिकार होते हैं।’ मैक्ग्रेथ कहते हैं, ‘मानसिक मनोवैज्ञानिक अनुभव

सामान्य मनोवैज्ञानिक संकट के निशान हैं।’ यह शोध जेएएमए साइकैट्री पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। शोध दल ने सामान्य आबादी में मनोवैज्ञानिक अनुभव और आत्महत्या के जोखिम के बीच के संबंधों की जांच की और इसमें 19 देशों के 33,000 लोगों को शामिल किया। मैक्ग्रेथ ने बताया, ‘इस शोध में अवसाद, चिंता और सिजोफ्रेनिया से ग्रसित लोगों को शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक विकार अपेक्षा से कही अधिक आम पाया गया। 20 में से एक व्यक्ति ने अपने जीवन के किसी न किसी मोड़

पर मनोवैज्ञानिक विकार का अनुभव किया है।’ शोधकर्ताओं ने कहा कि इन नतीजों का आत्महत्या जोखिम की जांच करने वाले डॉक्टरों के लिए जारी किए जानेवाले सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशानिर्देशों पर महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। क्योंकि वे दुर्लभ हैं और उनकी भविष्यवाणी करना मुश्किल है। (आईएएनएस)


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25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

गुजराती िफल्म

मैं नरेंद्र मोदी बनना चाहता हूं

फिल्म निर्देशक अनिल नरयानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन पर गुजराती में फिल्म बना रहे हैं

पर्यावरण आयोजन

वृक्षारोपण सम्मेलन में सचिन और विवेक मुंबई में आयोजित वृक्षारोपण सम्मेलन में 2019 तक पूरे राज्य में 50 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया गया

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन पर आधारित एक गुजराती फिल्म आ रही है, जिसका नाम ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ है, यानी मैं नरेंद्र मोदी बनना चाहता हूं। फिल्म को अनिल नरयानी डायरेक्ट कर रहे हैं। मूलत: जयपुर राजस्थान के अनिल नरयाणी ने अपनी सिनेमाई सफर की शुरूआत 1998 में राजस्थानी अलबम से की थी। उनकी पहली फिल्म ‘नथ, एक प्रथा’ हिंदी में थी, मगर उसका बेस राजस्थानी था। अनिल नरयानी ने बताया कि नरेंद्र मोदी के जीवन से प्रेेरणा पाकर इस फिल्म का मुख्य किरदार एक चाय बेचने वाला बच्चा जिसका नरेंद्र है। इसे खास कर बच्चों और युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इस फिल्म में उनकी कहानी को इस तरह से प्रेजेंट किया जा रहा, ताकि फिल्म को देखने और समझने वाले दर्शक मोटिवेट हो सकें। उन्हें ये भी समझ में आए कि नरेंद्र मोदी देश की भलाई के लिए क्या। चाहते हैं, क्योंे चाहते हैं और कैसे चाहते हैं। मुझे लगता है कि आज देश का हर बच्चा नरेंद्र मोदी बनना चाहता है।’ अनिल का कहना है, ‘जो रियल है, फिल्म में

वही दिखाने की कोशिश हो रही है। नरेंद्र मोदी फिल्म के नहीं, पूरे देश के हीरो हैं। वे अभी देश के लिए बहुत अच्छा कर रहे हैं। इसीलिए मुझे लगा कि उनके जीवन-संघर्ष को सांकेतिक रूप में पर्दे पर लाना चाहिए। इसमें मुझे कोई परेशानी या डर जैसा कुछ नहीं लगा। ‘इसमें 11 से 13 साल के बच्चे नजर आएंगे, लेकिन फिल्म में चाय बेचने वाले बच्चे नरेंद्र के पिता का किरदार ओमकार दास माणिकपुरी कर रहे हैं, जो आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म ‘पीपली लाइव’ में नत्था का रोल कर चर्चित हुए हैं। इसके अलावा नरेंद्र की मां की भूमिका में अनाशा सैयद हैं। अनाशा लोकप्रिय टीवी शो सीआईडी में इंस्पेंक्टर पूर्वा की भूमिका में नजर आती हैं। नरेंद्र की भूमिका में करण पटेल हैं, जिन्होंने अब तक 13 गुजराती फिल्मों में काम किया है। लोगों का मानना है कि करण ठीक वैसे ही लगते हैं, जैसे नरेंद्र मोदी बचपन में लगते थे। नरेंद्र की बहन के रोल में जो बच्ची नजर आ रही हैं, वो फुटपाथ से आती हैं। इसके अलावा टीवी के एक बड़े कलाकार ऋषि पंचाल भी नजर आएंगे।

इस फिल्म में तीन गाने हैं, जो मोटिवेशनल हैं। इसमें म्यूजिक आर बी कमल और भरत कमल ने दिए हैं, जो राज कमल जी के बेटे हैं। इन्होंेने कई गुजराती टीवी शो में संगीत दिया है। मशहूर सिंगर सुखविंदर से एक गाने के लिए बातचीत हो रही है। एक कव्वाली भी होगी, इसे फरीद साबरी गाएंगे। फिल्मे के दो शेड्यूल की शूटिंग खत्म हो चुकी है। गुजरात के सूरत, राज पीपला, दमन के पास पार्डी गांव, आमर गांव और उद्यवारा जैसे लोकेशंस पर इसकी शूटिंग की गई है, तीसरा शिड्यूल बाकी है। निर्देशक ने बताया, ‘ यह फिल्म फिलहाल गुजरात के दर्शकों के लिए बना रहा हूं। इसका किसी राजनीतिक दल से कोई वास्ता नहीं है। हम चाहते हैं नरेंद्र मोदी की इंस्पायरिंग कहानी देश भर में जाए। इसे 17 नंवबर को गुजरात में रिलीज करने की योजना है। बाद में इसे अन्य भाषाओं में डब करने की कोशिश होगी।‘ फिल्म के टाइटल के सवाल पर कहा कि प्रधानमंत्री के कार्यालय की सहमति मिल गई है, उसके बाद ही इम्पा ने फिल्म की स्वीकृति दी है। (मुंबई ब्यूरो)

हाराष्ट्र सरकार ने राज भवन में वृक्षारोपण सम्मेलन का आयोजन किया। इस मौके पर महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. विद्यासागर राव, महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार, ईशा फाउंडेशन के सद्गुरु जग्गी वासुदेव, क्रिकेट दिग्गज सचिन तेंदुलकर और अभिनेता विवेक ओबेरॉय मौजूद थे। सम्मेलन में 2019 तक 50 करोड़ पौधे लगाए जाने और नदियों के संरक्षण के मिशन का एलान किया गया। राज्य के वन विभाग के अनुसार, यह देश में इस तरह का पहला वृक्षारोपण सम्मेलन था। गौरतलब है कि, 1 जुलाई 2017 को वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत राज्य में 5.43 करोड़ पौधे लगाए गए थे। इस कार्यक्रम में अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने हिस्सा लिया था। इन्हें फिर से आमंत्रित किया गया। उल्लेखनीय है कि सरकार ने वर्ष 2019 तक पूरे राज्य में 50 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया है। इस योजना को गैरसरकारी संगठनों और कई निजी कंपनियों के अतिरिक्त जानी मानी हस्तियों का समर्थन हासिल है। वन विभाग का दावा है कि राजभवन में बुलाया गया सम्मलेन पर्यावरण संरक्षण में काफी मददगार साबित होगा। विवेक ओबेरॉय कहते हैं, ‘यह सम्मलेन अपने आप में अनूठा है जो प्रेरक बनेगा। हमने वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत हाल ही में करीब पांच करोड़ से भी अधिक पौधे लगाए थे।‘ (मुंबई ब्यूरो)


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स्वास्थ्य जागरूकता

स्वास्थ्य वाराणसी

कैंसर के इलाज के लिए सबसे बड़ा हब बनेगा वाराणसी

गुड न्यूज

स्क्रब टाइफस के बारे में जागरूकता जरूरी

स्क्रब टाइफस एक जीवाणुजनित संक्रमण है जो अनेक लोगों की मृत्यु का कारण बनता है और इसके लक्षण चिकनगुनिया जैसे ही होते हैं

मुंबई के बाद वाराणसी अब कैंसर के बेहतर इलाज का दूसरा सबसे बड़ा हब बनने जा रहा है

त्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी को कैंसर हब के रूप में विकसित करने की कवायद रेलवे ने शुरू कर दी है। इसकी कमान नए रेल मंत्री पीयूष गोयल के हाथों में है। डीजल रेल इंजन कारखाना (डीएलडब्ल्यू) से जुड़े सूत्रों की मानें तो मुंबई के बाद वाराणसी अब कैंसर के बेहतर इलाज का दूसरा सबसे बड़ा हब बनने जा रहा है। इससे पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों के कैंसर पीड़ित मरीजों को इलाज में मदद मिलेगी। डीएलडब्ल्यू से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) यहां एक नहीं, दो कैंसर अस्पताल संचालित करेगा। इसके बाद पूर्वोत्तर भारत में पंडित महामना मदन मोहन मालवीय कैंसर सेंटर के बाद कैंसर का यह दूसरा अस्पताल होगा। बकौल रेलवे अधिकारी, ‘रेलवे कैंसर संस्थान को भी टाटा मेमोरियल को सौंपने का खाका लगभग तैयार हो चुका है। वाराणसी चूंकि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, इसलिए उनकी दिलचस्पी तो इसमें है ही, रेलमंत्री खुद इस पूरे कार्य की प्रगति पर नजर रख रहे हैं।

एक नजर

पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों के मरीजों को मदद मिलेगी योजना की कमान नए रेल मंत्री पीयूष गोयल के हाथों में

टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) दो कैंसर अस्पताल संचालित करेगा

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते वर्ष 20 दिसंबर को अपने संसदीय क्षेत्र में 500 करोड़ रुपए की लागत से वाराणसी को महामना कैंसर अस्पताल की सौगात दी थी। इसका संचालन पूरी तरह से टीएमसी को सौंपा गया है। बीएचयू में बन रहा कैंसर अस्पताल टाटा कैंसर संस्थान से भी बेहतर बनने का दावा अधिकारियों की ओर से किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि वाराणसी में लहरतारा इलाके में रेलवे कैंसर संस्थान की सौगात वर्ष 1980 में कांग्रेस के कद्दावर नेता और तत्कालीन रेल मंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी ने दी थी। हावड़ा के बाद देश का यह रेलवे का दूसरा कैंसर संस्थान था। हालांकि इसकी खराब हालत के चलते ही इसे टाटा मेमोरियल को सौंपने का फैसला किया गया है। डीएलडब्ल्यू के सूत्रों के मुताबिक, रेलवे बोर्ड की ओर से 14 सितंबर को एक आदेश जारी हुआ है। इस आदेश में रेलवे कैंसर संस्थान के 130 डॉक्टरों, अधिकारियों व कर्मचारियों को समायोजित करने की बात कही गई है। समायोजन के लिए सभी के सामने चार विकल्प रखे गए हैं। टीएमसी भी अपने स्तर पर चुनिंदा कर्मचारियों की स्थायी नियुक्ति करेगा। बचे हुए स्टाफ को रेलवे की ओर से समायोजित किया जाएगा। अधिकारियों की मानें तो टीएमसी ने वाराणसी में कैंसर का इलाज शुरू होने से पहले कम्युनिटी बेस कैंसर रजिस्ट्री की योजना तैयार की है। इसके तहत बीएचयू में एक डाटा बेस कलेक्शन सेंटर खोलने पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत टीएमसी की टीमें पूर्वाचल के हर जिले में घर-घर जाकर कैंसर के पुराने मरीजों और संभावित मरीजों का एक आंकड़ा तैयार करेंगी। (आईएएनएस)

मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का इंडियन कहना है कि प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल

के स्तर पर काम करने वाले चिकित्सकों के लिए स्क्रब टायफस को लेकर अधिक जागरूक होने की जरूरत है। साथ ही, स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में इस रोग की पहचान करने की सुविधाएं होना भी नितांत आवश्यक है। स्क्रब टाइफस एक जीवाणु जनित संक्रमण है, जो अनेक लोगों की मृत्यु का कारण बनता है और इसके लक्षण चिकनगुनिया जैसे ही होते हैं। बीते वर्ष 150 व्यक्ति संक्रमित पाए गए, जिनमें से 33 को यह रोग था। यदि इस रोग का इलाज न किया जाए तो 35 से 40 प्रतिशत मामलों में मृत्यु की आशंका रहती है। आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल के मुताबिक, ‘स्क्रब टाइफस की शुरुआत सिरदर्द और ठंड के साथ बुखार से हो सकती है। रोग बिगड़ने पर बुखार तेज हो जाता है और सिरदर्द भी असहनीय होने लगता है। यह रोग हल्के फुल्के लक्षणों से

स्क्रब टायफस की रोकथाम के उपाय l

उन जगहों पर जाने से बचें, जहां पिस्सू बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं। l ऐसे स्थानों पर जाना ही पड़े तो सुरक्षात्मक कपड़े पहनें। लंबी आस्तीन वाले कपड़े उपयोगी साबित हो सकते हैं। l खुली त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए माइट रिपेलेंट क्रीम लगा लें। l जो लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते या काम करते हैं, उन्हें डॉक्सीसाइक्लिन की एक साप्ताहिक खुराक दी जा सकती है।

एक नजर

बीते वर्ष 150 संक्रमित लोगों में से 33 को यह रोग था स्क्रब टाइफस की शुरुआत सिरदर्द और ठंड के साथ हो सकती है रोग बढ़ने पर बुखार तेज हो जाता है और सिरदर्द भी असहनीय

लेकर अंगों की विफलता तक का भी कारण बन सकता है। कुछ मरीजों में पेट से शुरू हुई खुजली या चकत्ता अन्य अंगों तक फैलने लगता है। कई बार तो यह चेहरे पर भी हो जाता है। स्क्रब टायफस के लक्षणों की जांच करते समय मलेरिया, डेंगू, लेप्टोस्पायरोसिस आदि रोगों से भी तुलना की जाती है।’ यह बीमारी छह से 21 दिनों तक सुप्तावस्था में रहती है, फिर दो से तीन सप्ताह तक रहती है। शुरुआत में बुखार, सिरदर्द और खांसी संबंधी लक्षण होते हैं। हल्के संक्रमण वाले मरीज बिना किसी अन्य लक्षण के ठीक हो सकते हैं। डॉ. अग्रवाल ने बताया, ‘कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि इस रोग के इलाज में टेट्रासाइक्लिन के साथ कीमोप्रोफिलेक्सिस बेहद प्रभावशाली रहती है। जिन इलाकों में पिस्सू अधिक पाए जाते हों, वहां के लोगों को त्वचा व कपड़ों पर कीट भगाने वाली क्रीम या स्प्रे का प्रयोग करना चाहिए। कपड़ों व बिस्तर आदि पर परमेथ्रिन एवं बेंजिल बेंजोलेट का छिड़काव उपयोगी रहता है।’ (आईएएनएस)


26 स्वास्थ्य

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

स्वास्थ्य जागरुकता

स्वास्थ्य मिसाल

सिजोफ्रेनिया, एक पुराना और गंभीर मानसिक विकार है। इसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है

सार्वजनिक स्थलों पर नशाबंदी

सिजोफ्रेनिया को लेकर रहना होगा सचेत

गोवा में सार्वजनिक स्थानों पर शराब के सेवन पर पाबंदी लगाने की कवायद शुरू

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एक नजर

भारत में 13.7 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हैं मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का इंडियन मानना है कि देश में मानसिक रोगों को अभी

भी उचित महत्व नहीं दिया जा रहा। देशभर में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की सामान्य जनसंख्या का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है। इसके अलावा, इनमें से लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों को तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है। भारत में पहले एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था, लेकिन उस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई। ऐसा ही एक मानसिक विकार है सिजोफ्रेनिया, जो एक पुराना और गंभीर मानसिक विकार है और

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जिसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है। आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया, ‘सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है। पुरुषों में इस रोग के लक्षण महिलाओं की तुलना में कम उम्र में दिखने शुरू हो सकते हैं। बहुत से लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उन्हें यह रोग हो गया है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत लंबे समय बाद सामने आते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘ऐसे लोग दूसरों से दूर रहने लगते हैं और अकेले होते जाते हैं। वे अटपटे तरीके से सोचते हैं और हर बात पर संदेह करते हैं। ऐसे लोगों के परिवार में अक्सर पहले

बचाव के लिए कुछ उपयोगी उपाय

उपचार कराएं। इलाज को बीच में बंद न करें। ऐसे रोगियों को यही लगता है कि वे जो सोच रहे हैं, वही सच है। ऐसे रोगियों को बताएं कि हर किसी को अपने तरीके से सोचने का अधिकार है। खतरनाक या अनुचित व्यवहार को बर्दाश्त किए बिना ऐसे मरीजों से सम्मान के साथ पेश आएं और उनकी मदद करें। यह पता लगाने की कोशिश करें कि क्या आपके क्षेत्र में कोई सहायता समूह सक्रिय है।

10.6 प्रतिशत लोगों को तत्काल चिकित्सा देखभाल की जरूरत

सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है

से मनोविकृति की समस्या चली आ रही होती है। युवाओं में ऐसी स्थिति को प्रोड्रोमल पीरियड कहा जाता है। रोग का पता लगाना इसीलिए भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें ऐसा कुछ है ही नहीं। जागरूकता का अभाव एक बड़ा मुद्दा है।’ डॉ. अग्रवाल ने आगे बताया , ‘कभी-कभी सिजोफ्रेनिया वाले मरीजों को अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं, जैसे कि किसी मादक पदार्थ की लत, तनाव, जुनून और अवसाद। अनुसंधानकर्ताओं का यह भी सुझाव है कि इस स्थिति के लिए भ्रूणावस्था में न्यूरोनल विकास भी जिम्मेदार हो सकता है।’ उन्होंने इस संबंध में और जानकारी देते हुए बताया, ‘सिजोफ्रेनिया रोगियों का उपचार आमतौर पर दवा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और स्वयं-सहायता की मदद से होता है। उचित उपचार के साथ, ज्यादातर लोग सामान्य और उत्पादक जीवन जीने लगते हैं। ठीक हो जाने के बाद भी दवाएं लेते रहना चाहिए, ताकि लक्षण वापस न लौट आएं।’ (आईएएनएस)

वा अपने खुलेपन और खाने-पीने की आजादी के लिए जाना जाता है। गोवा इसी वजह से टूरिस्टों का फेवरेट प्लेस है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से राज्य और केंद्र सरकार के मंत्रियों द्वारा दिए जा रहे बयानों से यह लग रहा है कि गोवा की यह तस्वीर जल्द ही बदलने वाली है। गोवा में आने वाले दिनों में सार्वजनिक स्थानों पर शराब के सेवन पर पाबंदी लगाने की कवायद शुरू कर दी गई है। गोवा के सीएम मनोहर पर्रिकर ने कहा है कि सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर शराब के सेवन पर रोक लगाने का फैसला किया गया है। सीएम ने कहा कि इस बारे में अगले महीने तक नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा। सीएम पर्रिकर ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर शराब के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों के साथ अगले 15 दिनों के भीतर बैठक की जाएगी। सीएम ने कहा कि शराब की दुकानों के आसपास भी सार्वजनिक रूप से शराब पीने पर पाबंदी होगी और ऐसा करने की अनुमति देने वाले शराब विक्रेताओं पर भी कार्रवाई की जाएगी। पर्रिकर ने कहा कि देखा गया है कि लोग सड़क के किनारे शराब पीते हैं और उसकी बोतलों को वहीं तोड़ देते हैं, जिसके कारण आम लोगों को परेशानी होती है। गोवा सरकार ने एक्साइज ड्यूटी ऐक्ट, 1964 में संशोधन किया था। इसके तहत राज्य के कुछ स्थानों को 'नो एल्कोहॉल कंस्पशन' जोन बनाया गया था। सरकार द्वारा 'नो एल्कोहॉल कंजंप्शन जोन' के रूप में चिन्हित इन स्थानों पर शराब के सेवन पर जुर्माने का प्रावधान किया गया था। इसके साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर शराब के सेवन पर रोक के लिए पुलिस द्वारा विशेष अभियान शुरू किया गया, जिसके तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। (आईएएनएस)


25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

संक्षेप में

23 देशों की आबादी का नक्शा बनाया

फेसबुक ने सरकारी जनसंख्या आंकड़ो के संयोजन के साथ उपग्रहों से मिली जानकारी को जुटाकर 23 देशों की मानव आबादी का एक डाटा नक्शा तैयार किया है

दु

निया के हर कोने में इंटरनेट का विस्तार करने के लिए फेसबुक ने कहा है कि उसने सरकार के जनसंख्या के आंकड़ो के संयोजन के साथ उपग्रहों से मिली जानकारी को जुटाकर 23 देशों की मानव आबादी का एक डाटा नक्शा तैयार किया है। फेसबुक के रणनीतिक नवाचार साझेदारी और सोर्सिंग के प्रमुख जेना लेविस ने कहा कि मैपिंग तकनीक पृथ्वी के किसी भी देश के पांच मीटर के दायरे के किसी भी मानव निर्मित संरचनाओं का पता लगा सकती है। फेसबुक इस डाटा का इस्तेमाल मानव आबादी को समझने के लिए करेगी जो यह निधार्रित करने में मदद करेगा कि इंटरनेट सेवा किस तरीके की हो--जमीन पर आधारित हो, या हवा में या फिर अंतरिक्ष में-इसके इस्तेमाल से उन ग्राहकों तक पहुंच बनाई जा सकती है जिनके पास इंटरनेट नहीं (या फिर बेहद ही कम गुणवत्ता वाला) है। ‘उपग्रह हम सभी को उत्तेजित करने वाले हैं। हमारा डाटा आसमान में इंटरनेट के जरिए शहरों को जोड़ने का सबसे बेहतर तरीका दिखाता है।’ लुईस ने यह बातें स्पेस टेकनोलॉजी एंड इन्वेस्टमेंट फोरम में कही जिसे स्पेस फांउडेशन ने इस हफ्ते सैन फ्रांसिस्को में प्रायोजित किया। उन्होंने कहा, ‘हम लोगों को पृथ्वी आधारित नेटवर्क के जरिए अंतरिक्ष से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।’ फेसबुक ने कहा कि इस मानचित्रण तकनीक को उसने खुद विकसित किया है। (आईएएनएस)

जल

गुड न्यूज

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प्रबंधन

प्लास्टिक से शहरों में बाढ़

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में बाढ़ मानव निर्मित समस्या है

हरी बाढ़ पूरी तरह से मानव निर्मित है। भारी बारिश के बाद सड़कों पर पानी के भरने की वजह जल निकासी व्यवस्था में कमी, प्लास्टिक की थैलियां, खुले जगह की कमी और जलवायु परिवर्तन है। बारिश के पानी का संग्रहण, प्लास्टिक थैलों पर प्रतिबंध, बेहतर मौसम संबंधी भविष्यवाणी ऐसे उपाय हैं जिससे भारी बारिश के बाद शहरों में जलभराव की समस्या समाप्त हो सकती है। भारत में अधिकतर मेट्रो शहरों में भारी बारिश के बाद सामान्य जनजीवन प्रभावित हो जाता है। पिछले महीने मुंबई में भारी बारिश के बाद छह लोगों की मौत हो गई थी। विशेषज्ञों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में लगातार पलायन, निगम अधिकारियों के निराशाजनक रवैये की वजह से भारी बारिश के बाद शहर ठहर जाते

हैं। भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) में आपदा प्रबंधन के वरिष्ठ प्रोफेसर वी. के. शर्मा ने कहा कि शहरों में कूड़े के निस्तारण की समुचित प्रणाली, नालियों की नियमित सफाई और मैला निपटाने की समुचित व्यवस्था की जरूरत है। शर्मा ने कहा, ‘यह सही है कि नालों और सीवेज की समुचित सफाई न होने से शहरी बाढ़ आती है। इसका एक वजह शहरों की ओर पलायन भी है जिससे जमीन अतिक्रमण की घटना के फलस्वरूप मौजूदा आधारभूत संरचना पर भारी दबाव बन जाता

है।’ उन्होंने कहा कि शहरी नियोजन एक दीर्घकालिक दृष्टि से किया जाना चाहिए और जनसंख्या के बढ़ते दबाव के हिसाब से आधारभूत ढांचे का विकास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाए जाने की जरूरत है। इसके साथ सरकारी अधिकारियों, म्यूनिसिपैलिटी अधिकारियों को नालों-नालियों की सफाई नहीं होने पर जिम्मेदार ठहराए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जो लोग कूड़ा खुले में फेंकते हैं उन पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए। (आईएएनएस)

वन्य जीव

कजाकिस्तान में 70 साल बाद दिखेंगे जंगली बाघ रूस में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के निदेशक इगोर चेस्टिन ने कजाकिस्तान और रूस के संरक्षण विशेषज्ञों के बीच इतने साल तक किए गए काम को सलाम किया

जाकिस्तान में करीब 70 साल बाद जंगली बाघ फिर नजर आएंगे। कुछ समय पहले ये विलुप्त हो गए थे। 'द गार्जियन' की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की ओर से मिले समर्थन के तहत काम करने वाली

परियोजना के अनुसार, इली-बलखश क्षेत्र में इन जंगली बाघों को फिर देखा जाएगा। इस परियोजना में एक नए प्राकृतिक रिजर्व क्षेत्र विकसित करने और वन को पूर्वावस्था में लाने की योजना भी शामिल है। यह वनक्षेत्र पशुओं का

ऐतिहासिक पनाहगाह रहा है। अगर यह परियोजना सफल रही, तो कजाकिस्तान वनक्षेत्र मं जंगली बाघों को वापस लाने में सफलता हासिल करने वाला ऐसा पहला देश बन जाएगा। शिकार और आवासीय क्षेत्र प्रभावित होने के कारण मध्य एशिया और इसके आस-पास के क्षेत्रों से कई वन्यजीवों की प्रजातियां विलुप्त हो गई थीं। इनमें जंगली बाघों के साथ-साथ कुल्कन या जंगली गधे और बैक्ट्रियन हिरण भी शामिल थे। इस परियोजना पर काम करने में कई साल लगे। बाघों के लिए आवासीय क्षेत्र का निर्माण किया गया। वर्ष 2025 में यहां पहला रिजर्व तैयार किया जाएगा। समाचारपत्र 'द गार्जियन' को दिए एक बयान में रूस में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के निदेशक इगोर चेस्टिन ने कहा, "कजाकिस्तान और रूस के संरक्षण विशेषज्ञों के बीच इतने साल तक किए गए काम को सलाम। हम इली-बलखश में जंगली बाघों की आबादी को बनाए रखने के लिए सर्वोत्तम क्षेत्र की पहचान कर पाए हैं।" उन्होंने कहा कि इस साझेदारी से आने वाले समय में एक सफल रिजर्व का निर्माण होगा। (आईएएनएस)


28 उत्सव

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

दशहरा उत्सव

विभिन्न रंगों में दिखने वाली मां दुर्गा कोलकाता में दुर्गा पूजा का अपना अलग अंदाज है। भव्य और शानदार पंडाल मां की पूजा का एक खास आकर्षण है। इस बार किस तरह के पंडाल बने हैं, प्रस्तुत है एक रिपोर्ट

बं

प्रसंता पॉल

गाल में दुर्गा पूजा का अर्थ रचनात्मकता को श्रेष्ठता के साथ प्रस्तुत करना है। इसीलिए शहर भर में लगे विभिन्न समुदाय के पूजा पंडालों ने इसकी बढ़िया तैयारी भी कर रखी है, तो कुछ आयोजकों ने इसे पंरपराओं से अलग एक बिंदु बना दिया है। भवानीपुर 75 पल्ली शहर के केंद्र में लंदन जैसा सेट तैयार किया गया है। इस पंडाल के गेट को लंदन के बिग बेन की तरह तैयार किया गया है और जिस मंच पर देवताओं को सजाया जाना है, उसके पास लंदन ब्रिज और वेस्टमिंस्टर बनाया गया है। पंडाल के अंत में पंडाल हॉपर बनाया गया है। इसके साथ ही स्ट्रीट लाइट को लंदन की सड़कों के समान लगाया गया है। बीमन साहा कहते हैं कि पुराने कलकत्ता में कुछ जगहें ऐसी हैं जो देखने में बिल्कुल लंदन की तरह हैं। इसीलिए उन्होंने इस साल पूजा पंडाल को लंदन का स्वरूप दिया है, ताकि लोगों को आकर्षित किया जा सके। वह पंडाल को लोगों की सुविधा के हिसाब से बनवाया है। एक आयोजक ने कहा कि मां दुर्गा को महोगनी लकड़ी, ब्रास और डोकारा कला के एक जटिल काम के साथ एक अद्भुत तरीके से सजाया गया है।

गोरखा समुदाय के कुछ सदस्यों ने मूर्ति को बनाने में मदद की है। आयोजक ने कहा कि हमारे बीच राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जब देवी की पूजा करने की बात आती है, तो हम भेदभाव नहीं करते हैं। एक तरफ भवानीपुर में माता के पंडाल को लंदन का स्वरुप दिया गया है, तो वहीं दक्षिणी कोलकाता के बोसेपुर में मां दुर्गा दो करोड़ टूटी हुई पीवीसी पाइपों के बने एक द्वीप में निवास करने वाली हैं। गोविंद गिरी ने कहा कि हमने इस बार कुछ तरीके से माता की मूर्ति और पंडाल बनाने का विचार किया। इसके लिए हमने पीवीसी पाइपों का इस्तेमाल किया। हम प्रदूषण के बारे में जानते हैं, इसीलिए हमने पीवीसी पाइपों के कटे टुकड़े से ही माता की मूर्ति बनाई है और इसके बाद जो टुकड़े बच गए हैं उसे हम आस-पास के झुग्गी वासियों को बांट दिया है, जिससे प्रदूषण ना फैले। बल्लागंज सांस्कृतिक क्लब के आयोजकों ने पंडाल को तहखाने की तरह बनाया है, जिसमें राम और हनुमान की मूर्तियां 1,11,111 घंटियांे के साथ

लगी हैं। क्लब के सचिव अंजन बेरा ने कहा कि पीतल की घंटियां पूजा का हिस्सा हैं; इसीलिए हमने इसबार घंटियों के माध्यम से एक अलग स्वरूप तैयार किया है। उन्होंने कहा कि पूजा के बाद पीतल की घंटियां दुकानों को वापस कर दी जाएंगी। प्रतिष्ठित फैशन डिजाइनर अग्निमित्रा पॉल ने मां दुर्गा के लिए 24 किलोग्राम शुद्ध सोने से पोशाक तैयार की है। अग्निमित्रा कहते हैं कि जब हमने पहले स्वर्ण साड़ी के साथ मां दुर्गा को तैयार करने के बारे में बतलाया तो लोगों ने सोचा कि हम साड़ी पर खुद सोने की कढ़ाई करेंगे, लेकिन वे वास्तव में नहीं जानते थे कि पूरी साड़ी सोने से बनी रहेगी। पॉल ने कहा कि असंभव को संभव कैसे किया जाता है, उसको करके हमने दिखाया है। इसके लिए सबसे पहले देवी की लगभग 9 फुट लंबी मूर्ति पर एक सांचे को डाला गया उसपर डिजाइन का लेआउट तैयार किया गया। उसके बाद सुनारों ने उन डिजाइनों के हिसाब से सोने की चादरें बनाई। इस तरह माता रानी की साड़ी शुद्ध सोने से तैयार की गई। ऐसा पहली बार है कि मां दुर्गा को सोने का लिबास पहनाया जा रहा है। पॉल कहते हैं जब संतोष मित्र स्क्वायर के आयोजक अरजीत मित्रा कुछ महीने पहले पॉल के पास मूर्तियों के लिए डिजाइनर पोशाक बनाने का

बल्लागंज सांस्कृतिक क्लब के आयोजकों ने पंडाल को तहखाने की तरह बनाया है, जिसमें राम और हनुमान की मूर्तियां 1,11,111 घंटों के साथ लगी हैं

एक नजर

भवानीपुर में लंदन जैसे पंडाल मंे विराजेंगी मां बोसेपुर में पीवीसी पाइपों के बने द्वीप पर दिखेंगी मां अग्निमित्रा पॉल ने मां के लिए बनाई सोने की साड़ी

प्रस्ताव लेकर आए थे, तब हमने नहीं सोचा था कि हम ऐसे पोशाक का निर्माण भी कर पाएंगे, लेकिन माता रानी की कृपा से हमने इस नए तरीके के काम को करना शुरु किया और उसे पूरा कर दिया। मैं खुद काफी धार्मिक हूं; इसीलिए जब मां दुर्गा के लिए एक सोने की साड़ी बनाने का प्रस्ताव आया, तो मैं इस प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पाया और इस काम में लग गया। पॉल पहले से ही फैशन की दुनिया में अपना स्थान बना चुके हैं। उन्होंने मां दुर्गा के लिए सोने की साड़ी बनाई। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस साड़ी के लिए 24 किलोग्राम सोना एक प्रसिद्ध ज्वेलरी हाउस ने दान किया। हालांकि, देवी लक्ष्मी और सरस्वती को क्रमशः ढाकाई और कांजीवरम में दर्शाया गया, जबकि गणेश और कार्तिक को बालछी धोती और धोती को कांटे के साथ टांका गया। इस बार महिषासुर की मूर्ति को बिना सोने के तैयार किया गया है। महिषासुर को इस बार सिर्फ एक धोती के साथ संतुष्ट रहना होगा।


25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

कुल्लू दशहरा उत्सव इस बार लाइव दशहरा उत्सव

इस साल कुल्लू दशहरा उत्सव मोबाइल हैंडसेट और यू-ट्यूब पर लाइव दिखाने की तैयारी

उत्सव

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संक्षेप में

भारत बनेगा आर्थिक सुपरपॉवर

भारत उन मुट्ठीभर दक्षिण एशियाई देशों में से एक है जो जनसांख्यिकीय रूप से सोने की खान पर बैठा है

एसएसबी ब्यूरो

शहरा भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से तो एक है ही, यह भारत का सबसे बड़ा पारंपरिक उत्सव भी है। दिलचस्प है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में मानाए जाने वाले दशहरा उत्सवों में जहां एक तरफ पारंपरिकता का रंग अब भी बरकरार है, वहीं आधुनिकता ने भी इन उत्सवों को अपने तरीके से निखारा है। इस निखार का खास रंग इस बार विशेष तौर पर अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में देखने को मिलेगा। इस बार कुल्लू दशहरा उत्सव मोबाइल हैंडसेट और यू-ट्यूब पर लाइव देखा जा सकेगा।

कलाकारों का जमावड़ा

कुल्लू दशहरा उत्सव की तैयारियां इन दिनों जोरों पर हैं। उत्सव के दौरान इस बार हर साल की तरह ट्रैफिक जाम की समस्या नहीं रहेगी। इस बार सर्कुलर रोड दशहरा उत्सव में ट्रैफिक को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाएगा। लालड़ी नृत्य दशहरा उत्सव में आकर्षण का केंद्र रहेगा और वहीं देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले कलाकार लोगों का मनोरंजन करेंगे। स्टार नाइट में आने वाले कलाकारों को अभी फाइनल नहीं किया गया है। शहीदों के परिजनों को सम्मानित करने का भी इस दशहरा उत्सव से नया दौर शुरू हो जाएगा।

स्वच्छता पर जोर

दशहरा उत्सव के लिए कुल्लू शहर का सौंदर्यीकरण

करने के साथ-साथ तमाम शहर में मेले के दौरान स्वच्छता बनी रहे, इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया जा रहा है। इन दिनों शहर में जगह-जगह ढालपुर मैदान और शहर की अनेक जगहों पर साफ-सफाई के साथ-साथ खस्ताहाल नालियों और सड़कों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। उत्सव के दौरान ढालपुर स्थित लाइब्रेरी के ऊपर से छोटे वाहनों को गुजारा जाएगा तथा इस दौरान बड़े वाहनों को क्षेत्रीय अस्पताल की तरफ से गुजारा जाएगा, ताकि यातायात सुचारू रूप से चल सके।

कुल्लवी शैली में निमंत्रण पत्र

इस बार दशहरा उत्सव का 5 पन्नों वाला निमंत्रण पत्र कुल्लवी शैली में बनेगा, जिसे देखते ही कुल्लवी संस्कृति का अहसास होगा। इस निमंत्रण पत्र में कुल्लवी शैली के अलावा देवी-देवताओं की झलक भी देखने को मिलेगी। इसके अलावा शहर में मेले के दौरान लोगों को दिक्कत न हो, इसके लिए कुछ रूट बढ़ाने के बारे में बात की जा रही है। दशहरा उत्सव के दौरान लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए रात के 12 बजे तक बस सेवा मिलती रहेगी।

मेले में ज्यादा सीटें

मेले के दौरान कला केंद्र के अंदर भी कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों के लिए सीटें बढ़ाई जाएंगी। इसके अलावा कला केंद्र के अंदर नहीं जा पाने दर्शकों के लिए ढालपुर में अलग-अलग जगहों पर बड़ी-बड़ी स्क्रीनें लगाई जाएंगी, ताकि वे कला केंद्र के सभी कार्यक्रम लाइव देख सकें। व्यवस्था को सुचारू रूप

इस बार दशहरा उत्सव का 5 पन्नों वाला निमंत्रण पत्र कुल्लवी शैली में बनेगा। निमंत्रण पत्र में कुल्लवी शैली के अलावा देवी-देवताओं की झलक भी देखने को मिलेगी

एक नजर

उत्सव के दौरान स्वच्छता पर खास जोर देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकार करेंगे मनोरंजन

शहीदों के परिजनों को भी किया जाएगा सम्मानित

से चलाने के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं। कुल्लू के डी.सी. यूनुस खान ने कहा कि तमाम व्यवस्थाओं को देखने व उनके अनुसार कार्य करने के लिए अधिकारियों को निर्देश जारी किए गए हैं।

कोर्ट का काम रहेगा बाधित

30 सितंबर से 6 अक्टूबर तक मनाए जा रहे दशहरा उत्सव के दौरान ढालपुर स्थित कुल्लू कोर्ट का कार्य 24 सितम्बर से लेकर 2 अक्टूबर तक अवकाश होने के कारण बाधित रहेगा। हालांकि 3 ड्यूटी मजिस्ट्रेट अवकाश के दौरान 2-2 दिन अपनी सेवाएं देंगे। 3 अक्टूबर के बाद कुल्लू कोर्ट में फिर से अदालती कार्य सुचारू रूप से चलने लगेगा। कुल्लू बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सुधीर भटनागर के अनुसार दशहरा उत्सव के दौरान सर्कुलर रोड बनाया जा रहा है मगर कोर्ट के आसपास बहुत ही शोर-शराबा रहता है। जिस कारण कोर्ट परिसर में कार्य कर रहे सभी वकीलों और अधिकारियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसीलिए एस.पी. कार्यालय से लेकर क्षेत्रीय अस्पताल तक साइलेंस जोन घोषित किया जाना चाहिए, ताकि कोर्ट में कार्य कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को परेशानी न हो।

भा

रत एक आर्थिक सुपरपॉवर के रूप में उभर रहा है, जो आने वाले सालों में एशिया के संभावित कार्यबल के आधे से ज्यादा हिस्से की आपूर्ति करेगा, जहां जनसांख्यिकी एशिया में सत्ता के संतुलन को बदल रही है। डेलॉइट की 'वॉयस ऑफ एशिया' रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। ब्रिटेन की बहुराष्ट्रीय वित्तीय सेवा कंपनी की भारतीय इकाई ने एक बयान में कहा, "भारत उन मुट्ठीभर दक्षिण एशियाई देशों में से एक है जो जनसांख्यिकीय रूप से सोने की खान पर बैठा है। भारत की औसत आयु 27.3 वर्ष है, जबकि चीन की 35 वर्ष और जापान की 47 वर्ष है।" इसमें कहा गया, "जनसांख्यिकीय विकास महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आर्थिक विकास के साथ आंतरिक रूप से जुड़ा है, इसीलिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।"भारत में हर साल 1.2 करोड़ कामकाजी आबादी जनसंख्या में शामिल होती है। जापान और चीन के बाद भारत एशिया में विकास की लहर को आगे ले जाएगा। भारत का संभावित कार्यबल अगले 12 सालों में वर्तमान के 88.5 करोड़ से बढ़कर 1.08 अरब हो जाएगा। डेलॉयट इंडिया के प्रमुख अर्थशास्त्री अनीस चक्रवर्ती ने कहा, "आने वाले दशक में एशिया के कार्यबल में आधे से भी ज्यादा वृद्धि भारत में होगी।" साल 2042 तक एशिया में 65 साल की उम्र से अधिक की आबादी तब की यूरोप और उत्तरी अमेरिका की आबादी से अधिक होगी। डेलॉइट ने कहा कि एशिया में 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग इस शताब्दी के मध्य तक यहां 1 अरब होंगे। बयान में कहा गया है, "निजी क्षेत्र के अवसरों में तेज बढ़ोत्तरी होगी, क्योंकि आने वाले दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च में कटौती होगी।" (आईएएनएस)


30 लोक कथा

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

क गरीब आदमी था। एक दिन वह राजा के पास गया और बोला- 'महाराज, मैं आपसे कर्ज मांगने आया हूं। कृपा कर आप मुझे पांच हजार रुपए दें। मैं पांच वर्ष के अंदर आपके रुपए वापस कर दूंगा।' राजा ने उसकी बात पर विश्वास कर उसे पांच हजार रुपए दे दिए। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी जब उस व्यक्ति ने राजा के पांच हजार रुपए नहीं लौटाए तब राजा को मजबूरन उसके घर जाना पड़ा। लेकिन वहां वह व्यक्ति नहीं मिला। जब भी राजा वहां जाता बहाना बना कर उसे वापस भेज दिया जाता। एक दिन फिर राजा उस व्यक्ति के घर गया। वहां और कोई तो नहीं दिखा, एक छोटी लड़की बैठी थी। राजा ने उसी से पूछा'तुम्हारे पिता जी कहा हैं ?' लड़की बोली- 'पि‍ताजी स्वर्ग का पानी रोकने गए हैं।' राजा ने फिर पूछा- 'तुम्हारा भाई कहां है ?' लड़की बोली- 'बिना झगड़ा के झगड़ा करने गए हैं।' राजा के समझ में एक भी बात नहीं आ रही थी। इसलिए वह फिर पूछता है- 'तुम्हारी माँ कहां है ?' लड़की बोली- 'मां एक से दो करने गई है।' राजा उसके इन ऊल-जुलूल जवाब से खीझ गया। वह गुस्से' में पूछता है- 'और तुम यहां बैठी क्या कर रही हो ?' लड़की हंसकर बोली- 'मैं घर बैठी संसार देख रही हूं।' राजा समझ गया कि लड़की उसकी किसी भी

बात का सीधा जवाब नहीं देगी। इसीलिए उसे अब इससे इन बातों का मतलब जानने के लिए प्यार से बतियाना पड़ेगा। राजा ने चेहरे पर प्यार से मुस्कान लाकर पूछा- 'बेटी, तुमने जो अभी-अभी मेरे सवालों के जवाब दिए, उनका मतलब क्या है ? मैं तुम्हारी एक भी बात का मतलब नहीं समझ सका। तुम मुझे सीधे-सीधे उनका मतलब समझाओ।' लड़की ने भी मुस्करा कर पूछा - 'अगर मैं सभी बातों का मतलब समझा दूं तो आप मुझे क्या देंगे ?' राजा के मन में सारी बातों को जानने की तीव्र उत्कंठा थी। वह बोला- 'जो मांगोगी, वही दूंगा।' तब लड़की बोली- 'आप मेरे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर देंगे तो मैं आपको सारी बातों का अर्थ बता दूंगी।' राजा ने कहा- 'ठीक है, मैं तुम्हारे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा। अब तो सारी बातों का अर्थ समझा दो।' लड़की बोली- 'महाराज, आज मैं आपको सारी बातों का अर्थ नहीं समझा सकती। कृपा कर आप कल आएं। कल मैं जरूर बता दूंगी।' राजा अगले दिन फिर उस व्यक्ति के घर गया। आज वहां सभी लोग मौजूद थे। वह आदमी, उसकी पत्नी, बेटा और उसकी बेटी भी। राजा को देखते ही लड़की पूछी- 'महाराज, आपको अपना वचन याद है ना ? ' राजा बोला- 'हां मुझे याद है। तुम अगर सारी बातों का अर्थ बता दो तो मैं तुम्हारे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा।'

चतुर लड़की

लड़की बोली- 'सबसे पहले मैंने यह कहा था कि पिताजी स्वर्ग का पानी रोकने गए हैं, इसका मतलब था कि वर्षा हो रही थी और हमारे घर की छत से पानी टपक रहा था। पिताजी पानी रोकने के लिए छत को छा (बना) रहे थे। यानी वर्षा का पानी आसमान से ही गिरता है और हम लोग तो यही मानते हैं कि आसमान में ही स्वर्ग है। बस, पहली बात का अर्थ यही है। दूसरी बात मैंने कही थी कि भइया बिना झगड़ा के झगड़ा करने गए हैं। इसका मतलब था कि वे रेंगनी के कांटे को काटने गए थे। अगर कोई भी रेंगनी के कांटे को काटेगा तो उसके शरीर में जहांतहां कांटा चुभ ही जाएगा, यानी झगड़ा नहीं करने पर भी झगड़ा होगा और शरीर पर खरोंचें आएंगी। ' राजा उसकी बातों से सहमत हो गया। वह मनही-मन उसकी चतुराई की प्रशंसा करने लगा। उसने उत्सुकता के साथ पूछा- 'और तीसरी-चौथी बात का मतलब बेटी ? ' लड़की बोली- 'महाराज, तीसरी बात मैंने कही थी कि मां एक से दो करने गई है। इसका मतलब था कि मां अरहर दाल को पीसने यानी उसे एक का दो करने गई है। अगर साबुत दाल को पीसा जाए तो एक दाना का दो भाग हो जाता है। यही था एक का दो करना। रही चौथी बात तो उस समय मैं भात बना रही थी और उसमे से एक चावल निकाल कर देख रही थी कि भात पूरी तरह पका है कि नहीं। इसका मतलब है कि मैं एक चावल देखकर ही जान जाती कि पूरा चावल पका है कि नहीं । अर्थात चावल के संसार को मैं घर बैठी देख रही थी।' यह कहकर

लड़की चुप हो गई। राजा सारी बातों का अर्थ जान चुका था। उसे लड़की की बुद्धिमानी भरी बातों ने आश्चर्य में डाल दिया था। फिर राजा ने कहा- 'बेटी, तुम तो बहुत चतुर हो। पर एक बात समझ में नहीं आई कि यह सारी बातें तो तुम मुझे कल भी बता सकती थी, फिर तुमने मुझे आज क्यों बुलाया ?' लड़की हंसकर बोली- ' मैं तो बता ही चुकी हूं कि कल जब आप आए थे तो मैं भात बना रही थी। अगर मैं आपको अपनी बातों का मतलब समझाने लगती तो भात गीला हो जाता या जल जाता, तो मां मुझे जरूर पीटती। फिर घर में कल कोई भी नही था। अगर मैं इनको बताती कि आपने कर्ज माफ कर दिया है तो ये मेरी बात का विश्वास नहीं करते। आज स्वयं आपके मुंह से सुनकर कि आपने कर्ज माफ कर दिया है, जहां इन्हें इसका विश्वास हो जाएगा, वहीं खुशी भी होगी। ' राजा लड़की की बात सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ। उसने अपने गले से मोतियों की माला निकाल उसे देते हुए कहा- 'बेटी, यह लो अपनी चतुराई का पुरस्कार! तुम्हारे पिताजी का कर्ज तो मैं माफ कर ही चुका हूं। अब तुम्हें या तुम्हारे घरवालों को मुझसे बहाना नहीं बनाना पड़ेगा। अब तुम लोग निश्चित होकर रहो। अगर फिर कभी किसी चीज की जरूरत हो तो बेझिझक होकर मुझसे कहना।' इतना कहकर राजा लड़की को आशीर्वाद देकर चला गया। लड़की के परिवारवालों ने उसे खुशी से गले लगा लिया।


32 अनाम हीरो

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

25 सितंबर - 01 अक्टूबर 2017

अनाम हीरो साईं कौस्तुभ दासगुप्ता

विवशता को बार-बार मात दु

ऑटोस्यिटियो-जेनेसिस इंपर्फेक्टा से पीड़ित कौस्तुभ पहले सफल गायक, फिर बड़े ग्राफिक डिजायनर बनकर उभरे

निया में कई लोग ऐसे हैं, जो अपनी छोटी सी हार को पूरे जीवन पर भारी बना लेते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में अंधकार और निराशा के सिवाय कुछ नहीं होता है। पर कुछ ऐसे भी जीवट होते हैं जो हारकर बैठते नहीं, बल्कि नई राह और नई सफलता का सुलेख लिख जाते हैं। इसी तरह की एख शख्सियत हैं साईं कौस्तुभ दासगुप्ता। प. बंगाल के सिलीगुड़ी में जन्मे कौस्तुभ ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कौस्तुभ बचपन से ही ऑटोस्यिटियो-जेनेसिस इंपर्फेक्टा नामक रोग से पीड़ित रहे। इस बीमारी में शरीर की हड्डियां इतनी कमजोर हो जाती हैं कि वे टूटने लगती हैं और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। कौस्तुभ छह साल की उम्र में ही समझ गए थे कि वे विशेष हैं। लिहाजा, उन्होंने तय किया कि वे कुछ ऐसा करेंगे, जो उनके लिए सुरक्षित तो हो ही, उसके जरिए वे खुद को बेहतर

तरीके से व्यक्त भी कर सकें। यहीं से कौस्तुभ के एक बेहतरीन गायक के तौर पर उभरने का सफर शुरू हो गया। उनकी मां चूंकि खुद एक गायिका थीं, सो उन्हें गायन के क्षेत्र में आगे बढ़ने में काफी मदद मिली। मात्र 10 साल की उम्र में ही कौस्तुभ ने बेस्ट सिंगर ऑफ वेस्ट बंगाल का खिताब जीतकर लोगों के बीच चर्चा में आ गए। 12 वर्ष की उम्र होते-होते वे देश के जाने-माने गायकों के साथ गा जा चुके थे। पर एक बार फिर से कौस्तुभ की मुश्किल तब बढ़ गई जब एक दुर्घटना में उनके दोनों घुटनों की हड्डी टूट गई। पर उनका हौसला कम नहीं हुआ और उन्होंने अपने एक मित्र की सलाह पर ग्राफिक डिजायनिंग का काम शुरू किया। आज वे न सिर्फ एक सफल ग्राफिक डिजायनर हैं, बल्कि देशदुनिया के बड़े-बड़े संस्थानों में उन्हें प्रेरक उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया जाता है।

न्यूजमेकर

नमो की तस्वीरों का रिकार्ड पीएम नरेंद्र मोदी के फैन मनमोहन अग्रवाल ने उनकी दो लाख तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई

मनमोहन अग्रवाल

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन पूरे देश में मनाया गया। पर जयपुर में इस मौके पर न केवल पीएम का जन्मदिन मनाया गया, बल्कि साथसाथ एक विश्व कीर्तिमान भी बनाया गया। इस मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी को चाहने वाले एक शख्स मनमोहन अग्रवाल ने उनकी दो लाख तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई। ये प्रदर्शनी लोगों के लिए आकर्षण का विशेष तौर पर चर्चा के केंद्र रही। दिलचस्प है कि एक साथ दो लाख तस्वीरों की यह अनोखी प्रदर्शनी को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में भी दर्ज हो गया है। मनमोहन से पहले यह रिकॉर्ड 1 लाख 44 हजार तस्वीरों के साथ हांगकांग के किसी शख्स

के नाम दर्ज था। प्रदर्शनी के दौरान मनमोहन की हौसला अफजाई करने के लिए मशहूर कालबेलिया डांसर गुलाबो और राजस्थानी सिनेमा के कलाकार भी पहुंचे थे। इन तस्वीरों की खास बात यह थी कि इनमें कोई भी तस्वीर एक-दूसरे से मिलती-जुलती नहीं है। दरअसल, मनमोहन अग्रवाल को गिनीज बुक के रिकॉर्ड बनाना का शौक है। वे अब तक छह विश्व रिकार्ड्स बना चुके हैं। वे 1999 में एक अंतहीन कैलेंडर बनाकर पहली बार चर्चा में आए थे। मनमोहन का कहना है कि हर 700 वर्ष में कैलेंडर के दिन-तारीख रिपीट होते हैं। इस कैलेंडर को बनाने में मनमोहन को छह माह का समय लगा था।

असम की आयरन लेडी असम की बहादुर आईपीएस अफसर संयुक्ता ने 15 महीने में ही 16 आतंकियों को मार गिराया और 64 से ज्यादा को हिरासत में ले लिया

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की वर्दी के साथ देशसेवा का जज्बा दिखाने वाले पुलिस अधिकारियों में अब सिर्फ पुरुष शामिल नहीं हैं। हाल के दौर में कई ऐसी महिला पुलिस अधिकारी उभर कर सामने आई हैं, अपनी बहादुरी और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर नकेल कस रखी है। ऐसी बहादुर और ईमानदार महिला पुलिस अधिकारी हैं संयुक्ता पराशर। उन्होंने असम में पिछले कई सालों से आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा संभाल रखा है। जिन्हें असम की पहली महिला आईपीएस अधिकारी होने का गौरव भी प्राप्त है। संयुक्ता को बचपन से ही खेल-कूद में बेहद दिलचस्पी थी। संयुक्ता स्कूली दिनों से ही अपने राज्य में आतंवादियों व भ्रष्टाचारियों

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 41

संयुक्ता पराशर

के कहर से बेहद चिंतित थी। इसलिए उन्होंने अच्छी रैंक लाने के बावजूद भी असम में ही काम कर अपने राज्य की तस्वीर सुधारने का फैसला किया। 2008 में संयुक्ता की पहली पोस्टिंग माकुम में असिस्टेंट कमांडेंट के तौर पर हुई, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद उन्हें उदालगिरी में हुई बोडो और बांग्लादेशियों के बीच की जातीय हिंसा को काबू करने के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। अपने ऑपरेशन के महज 15 महीने में ही इन्होंने 16 आतंकियों को मार गिराया और 64 से ज्यादा आतंकियों को अपनी हिरासत में ले लिया। संयुक्ता चार वर्षीय बच्चे की मां हैं, लेकिन इसके बावजूद आतंकियों के छक्के छुड़ाने में माहिर हैं।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 41)  

स्वच्छता दिवस के रूप में मना पीएम मोदी का जन्म दिन