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वर्ष-1 | अंक-32 | 24 - 30 जुलाई 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

04 नवाचार

बुके नहीं बुक

पीएम मोदी की भेंट में ‘बुके के बजाय बुक’ देने की अपील

06 ट्रंप सुलभ विलेज

ट्रंप विलेज में स्वच्छता

सुलभ ने मरोरा को स्वच्छ और स्वावलंबी बनाने का बीड़ा उठाया

सर्वे भवंतु सुखिन: बेदाग, निष्पक्ष और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी देश के नवनिर्वाचित महामहिम पुरानी महान लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करने के साथ एक नई इबारत लिखने की तैयारी में हैं

28 परंपरा

जल प्रबंधन के मंदिर कुंडों के साथ मंदिर निर्माण की परंपरा


02 आवरण कथा

24 - 30 जुलाई 2017

एक नजर

ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बेहतरी के लिए किए प्रयास

दलितों के उत्थान के लिए लगातार सक्रिय रहे बिहार के राज्यपाल के रूप में प्रशंसनीय कार्यकाल

एसएसबी ब्यूरो

मिट्टी के घर में पलकर और गरीबी से उठ कर आज यहां तक पहुंचा हूं। राष्ट्रपति भवन में ऐसे गरीबों का प्रतिनिधि बनकर जा रहा हूं। इस पद पर चुना जाना न कभी मैंने सोचा था और न कभी मेरा लक्ष्य था, लेकिन देश के लिए अथक सेवा भाव मुझे यहां तक ले आया। इस पद पर रहते हुए संविधान की रक्षा करना और उसकी मर्यादा बनाए रखना मेरा कर्तव्य है। राष्ट्रपति पद पर मेरा चयन भारतीय लोकतंत्र की महानता का प्रतीक है। मैं देश के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की तरह मैं भी बिना भेदभाव के देश की सेवा में लगा रहूंगा।’ देश के 14वें राष्ट्रपति चुने जाने के बाद रामनाथ कोविंद ने जब ये बातें कहीं, तो साफ

हो गया कि राष्ट्रपति भवन में बैठ कर वे गरीबों और वंचितों के हित में सदैव सक्रिय रहेंगे। बेदाग, निष्पक्ष और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी देश के नवनिर्वाचित महामहिम पुरानी महान लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करने के साथ एक नई इबारत लिखने की तैयारी में हैं, इसीलिए उन्होंने यह भी कहा, 'जिस पद का मान डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी जैसे महान विद्वानों ने बढ़ाया है, उस पद के लिए मेरा चयन मुझे बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास करा रहा है।' यह कोविंद के स्वभाव और छवि की ही देन है कि राष्ट्रपति के रूप में उनके निर्वाचित होने की खबर आते ही पूरे देश में खुशी की लहर फैल गई। सबसे ज्यादा हर्ष तो उन ग्रामीण अंचलों में देखने को मिला, जिनके बीच से निकल कर एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद

कोविंद से जुड़ी कुछ खास बातें

मकान को बारातशाला के रूप में किया दान

रामनाथ कोविंद तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं। परौंख गांव में कोविंद अपना पैतृक मकान बारातशाला के लिए दान कर चुके हैं। बड़े भाई प्यारेलाल हैं। एक भाई शिवबालक राम का निधन हो चुका है।

मंदिर में भक्तों के लिए पीने के पानी की समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने ही नलकूप लगवाया था। क्षेत्र के विकास के लिए हर समय सक्रिय रहने का ही परिणाम है कि उन्हें एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाए जाने की खबर पर क्षेत्र में खुशी का माहौल है।

रामनाथ कोविंद को भाजपा ने 1990 में घाटमपुर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। हालांकि, उनकी हार हुई। 2007 में उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय करने के लिए भोगनीपुर सीट से चुनाव लड़ाया गया, लेकिन वे फिर हार गए। घाटमपुर से चुनाव लड़ने के बाद कोविंद लगातार क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं से संपर्क में रहे। घाटमपुर के कुष्मांडा देवी

राज्यसभा सांसद रहते हुए कोविंद आदिवासी, होम अफेयर, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सामाजिक न्याय, कानून न्याय व्यवस्था और राज्यसभा हाउस कमेटी के चेयरमैन भी रहे। गवर्नर्स ऑफ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के भी वे सदस्य रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अक्टूबर 2002 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया।

घाटमपुर से रहा है गहरा नाता

कई उत्तरदायित्व

को सुशोभित करने जा रहा है। कोविंद इसे ही भारतीय लोकतंत्र की महानता कहते हैं। व्यवहार में बेहद सौम्य और शालीन रामनाथ कोविंद ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बेहतरी और दलितों के उत्थान के लिए काम करते रहे हैं। दलित नेता होने के साथ वे स्वभाव से काफी मिलनसार हैं और उनका हमेशा से ही संगठित होकर काम करने में विश्वास रहा है। राज्यसभा में सांसद रहते हुए रामनाथ कोविंद ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विकास और विस्तार के लिए सबसे ज्यादा कार्य किया। उनके 12 साल के सांसद निधि के रिकार्ड को जब देखा गया तो यह तथ्य सामने आया कि उन्होंने सांसद निधि का अधिकतर पैसा गांवों में शिक्षा के क्षेत्र पर खर्च किया है। देश के दलितों की भलाई के लिए वे हमेशा तत्पर रहने वाले नेताओं में रहे। उन्होंने ही एक बार 1000 के नोट पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर छापने की मांग की थी। भाजपा में होने के साथ वे पार्टी के दलित मोर्चा के प्रमुख भी रहे। जहां राजभवन हमेशा से ही राजनीतिक पार्टियों

कोविंदनामा

• जन्म-01 अक्तूबर 1945 • जन्मस्थान-परौंख, कानपुर देहात • शिक्षा-बीकॉम, एलएलबी • विवाह-30 मई 1974 • पत्नी-सविता कोविंद • संतान-प्रशांत और स्वाति •1977-1979 तक दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के वकील •1991 में बीजेपी में शामिल •1994 में राज्यसभा सदस्य निर्वाचित •2000 में यूपी से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित •12 साल तक लगातार राज्यसभा सदस्य • अगस्त 2015 में बिहार के राज्यपाल पद पर नियुक्ति

नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बधाई देते सुलभ प्रणेेता डॉ. विन्देश्वर पाठक

की लड़ाई का अखाड़ा बना रहता है, वहीं बिहार के राज्यपाल के तौर पर उनकी भूमिका की सराहना सभी ने की। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद को निष्पक्ष और सबसे बेहतरीन राज्यपाल की संज्ञा दी। रामनाथ कोविंद बहुत शांत स्वभाव के हैं, लेकिन जब कोई सार्वजनिक कार्यक्रम या फिर किसी निर्णय लेने की बात आती है तो वे हमेशा रुल बुक के मुताबिक ही निर्णय लेते हैं। उनके लिए नियम से ऊपर कोई नहीं है। बिहार के राज्पाल पद पर रहने के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर सुधार किया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2012-13 में उप-कुलपतियों की नियुक्ति


24 - 30 जुलाई 2017

आवरण कथा

पाटलिपुत्र में कोविंद

03

राज्यपाल के रूप में बिहार में रामनाथ कोविंद का कार्यकाल बेहतरीन माना गया

बि

ऐसा है हमारा राम

‘राम ने राजनीति में आने के बाद बहुत मेहनत की है और वह भाजपा का समर्पित नेता है, हमें उस पर गर्व है’ प्यारेलाल, रामनाथ कोविंद के बड़े भाई

रा

म काफी होनहार छात्र था, उसने कॉमर्स और कानून की पढ़ाई के लिए कानपुर का रुख किया था, वह सिविल सेवा की भी तैयारी कर रहा था, उसने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी के साथ भी काम किया है, उसने राजनीति में आने के बाद बहुत मेहनत की है और वह भाजपा का समर्पित नेता है, हमें उस पर गर्व है। हमारे रद्द होने के बाद राज्यपाल बने कोविंद ने नियुक्तियों में न सिर्फ पारदर्शिता बरती, बल्कि विश्वविद्यालयों के शैक्षिक कैलेंडर में भी सुधार किया और इसे सख्ती से लागू किया। वर्षांे से बंद दीक्षांत समारोह को उन्होंने अपनी देख-रेख में फिर से शुरू भी करवाया। शालीन और सौम्य व्यक्तित्व के रामनाथ कोविंद चार दशक से भी ज्यादा वक्त से राजनीति और सेवा कार्यों में लगातार सक्रिय हैं। कर्मठ, कर्मनिष्ठ, कर्तव्य पारायण और कृतसंकल्पित कोविंद व्यवहार कुशल भी हैं। कानपुर के परौंख गांव से रायसीना तक पहुंचना, एक साधारण व्यक्ति और समर्पित कार्यकर्ता की असाधारण उपलब्धियों और सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने की ऐसी कहानी है जो सभी के लिए प्रेरणादायक है। उनका बचपन गरीबी में गुजरा, पर इन सभी मुसीबतों को भेदते हुए वे आज उस मुकाम

पिता मैकूलाल परौंख गांव के चौधरी थे, वह एक वैद्य भी थे, जो गांव में ही परचून और कपड़े की दुकान चलाते थे। हमारा जीवन मध्यवर्गीय परिवार के रूप में बीता है, हालांकि किसी चीज की कमी नहीं थी, हम सभी पांचों भाई और दो बहनों ने पढ़ाई की थी। एक भाई मध्य प्रदेश में अकाउंट अधिकारी के पद से रिटायर हुआ है, दूसरा सरकारी शिक्षक था। रामनाथ वकील बन गया, बाकी भाई बिजनेस करने लगे। रामनाथ ने राजनीति में आने के बाद कोविंद सरनेम जोड़ा। यह सरनेम रामनाथ ने खुद ही जोड़ा था। मुझे नहीं पता कि उसने यह क्यों किया, लेकिन जब उसने राजनीति में जाने के बाद यह सरनेम जोड़ा तो सारे भाइयों ने भी इस सरनेम को अपना लिया। वे अखिरी बार दिसंबर 2016 में झिंझक और परौंख आए थे। पर खड़े हैं, जहां उनकी कलम से भारत की तकदीर लिखी जाएगी। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘मुझे ये जिम्मेदारी दिया जाना देश के ऐसे हर व्यक्ति के लिए संदेश है जो ईमानदारी और प्रमाणिकता के साथ अपना काम करता है। इस पद पर चुना जाना न ही मेरा लक्ष्य था और न ही मैंने सोचा था, लेकिन अपने समाज और देश के लिए अथक सेवा भाव मुझे यहां तक ले आया है, यही सेवा भाव का ही नतीजा है।’ साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले रामनाथ कोविंद समाज सेवी, वकील, राज्यसभा सांसद और राज्यपाल के तौर पर काम कर चुके हैं। कानपुर देहात की डेरापुर तहसील के गांव परौंख में जन्मे रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट में वकालत से अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने

हार के राज्यपाल के रूप में रामनाथ कोविंद विकास के तमाम प्रयासों में राज्य सरकार के साथ खड़े रहे। उनके पद संभालने के तीन माह बाद ही बिहार में विधानसभा का शांतिपूर्ण चुनाव हुआ। उन्होंने चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश कुमार तथा उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों को गांधी मैदान में शपथ दिलाई। उसके बाद से सरकार के सभी रचनात्मक विधेयक और अध्यादेश पर अपनी मुहर लगाई। कभी सरकार तथा राजभवन के बीच गतिरोध या टकराव की स्थिति नहीं दिखी। वहीं, चांसलर के रूप में भी कोविंद ने राज्य के विश्वविद्यालयों में कई कारगर हस्तक्षेप किए, जिनमें से कई हस्तक्षेपों के परिणाम भी सामने आने लगे हैं। वे बिहार सरकार के शराबबंदी के फैसले के साथ खड़े रहे। इसके लिए बने कानून पर मुहर लगाई। शराबबंदी को लेकर ऐतिहासिक मानव श्रृंखला की तारीफ की ऐसी हर बैठक में मौजूद रहे। तथा शराबबंदी को सामाजिक परिवर्तन की दिशा राज्यपाल रहते हुए रामनाथ कोविंद की में बिहार सरकार की दिनचर्या सुबह घंटेभर कारगर पहल करार राज्यपाल रहते हुए रामनाथ की सैर से शुरू होती दिया। राज्य सरकार के थी। फिर इतनी ही देर कोविं द की दिनचर्या अहले सु ब ह परामर्श से सर्च कमेटी वह विपश्यना और की अनुशंसा पर उन्होंने घंटेभर की सैर से शुरू होती थी। योग करते थे। इसके राज्य के विश्वविद्यालयों फिर इतनी ही देर वह विपश्यना बाद सहज-सुलभ में कुलपति और कोविंद आम लोगों से और योग करते थे प्रतिकुलपतियों की मिलते रहे हैं। उनसे नियुक्ति की और बिहार मिलने आने वालों में विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन को हरी राजनीतिक कार्यकर्ता, विद्वान, कलाकार, कवि, झंडी दी। इससे राज्य में पाटलिपुत्र और पूर्णिया साहित्यकार समेत विभिन्न सामाजिक संगठनों के विश्वविद्यालय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। लोग हैं। राजधानी पटना समेत राज्य के हर हिस्से इसके साथ ही राज्यपाल रहते हुए उन्होंने विकास में अधिकाधिक कार्यक्रमों में शामिल होना उनका पर चर्चा के लिए विधानमंडल सत्र के दौरान हर शगल था। उन्हें पढ़ने की भी खूब आदत है। सुबह एक-एक प्रमंडल के विधायकों से मिलने व्यक्तित्व केंद्रित किताबें उनकी टेबल पर हमेशा की परंपरा शुरू की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी रहती हैं।

वे देश के दलितों की भलाई के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले नेताओं में रहे। उन्होंने ही एक बार 1000 के नोट पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर छापने की मांग की थी के बाद वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव बने थे। उन्होंने जनता पार्टी की सरकार में सुप्रीम कोर्ट के जूनियर काउंसलर के पद पर भी कार्य किया। इसके बाद वे भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आए। वर्ष 1994 से 2006 के बीच दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके रामनाथ कोविंद दो बार भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राष्ट्रीय प्रवक्ता और उत्तर प्रदेश के महामंत्री भी रह चुके हैं। इससे पूर्व उन्होंने दिल्ली में रहकर आईएएस की परीक्षा पास की, मुख्य सेवा के बजाय एलायड सेवा में चयन होने पर नौकरी ठुकरा दी। इसी तरह अपनी राह में आए तमाम अवरोधों से पार पाते हुए रामनाथ कोविंद ने सबसे पहले गरीबी को पछाड़ते हुए वकालत की शिक्षा पूरी की। नामी वकील बने तो भी वे नेकदिल बने रहे।

गरीबी की वजह से बचपन में रामनाथ कोविंद 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे और फिर पैदल ही वापस घर लौटते थे। घास-फूस की झोपड़ी में उनका पूरा परिवार रहता था। जब कोविंद की उम्र 5-6 वर्ष की थी तो उनके घर में आग लग गई, जिसमें उनकी मां की मृत्यु हो गई। मां का साया छिनने के बाद पिता ने ही उनका लालन-पालन किया। देश के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बारिश के दिनों में टपकती अपनी फूस की छप्पर को कभी नहीं भूले। भीगने से बचने के लिए अपने भाई बहनों के साथ मिट्टी की दीवारों से चिपककर बारिश के खत्म होने का इंतजार करना उन्हें आज भी याद है। राष्ट्रपति भवन में बैठ कर जब अपनी कलम से वे देश का भविष्य रचेंगे, उनकी ये यादें हमेशा उनके साथ होंगी।


04 नवाचार

24 - 30 जुलाई 2017

प्रधानमंत्री बदल रहे हैं भेंट संस्कृति प्रेरक पहल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बुके के बजाय बुक’ देने की अपनी अपील पर खुद अमल करना शुरू कर दिया है

एक नजर

पीएम की ‘बुके के बजाय बुक’ भेंट करने की अपनी अपील

गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों को पत्र लिखकर बताया पीएम अपने निजी आचरण से पेश करते हैं कई नजीर

एसएसबी ब्यूरो

क व्यक्ति उठे, चले और उसके साथ पूरा देश चल पड़े तो उसे राष्ट्र नायक कहा और माना जाएगा। सवाल यह है कि ‘राष्ट्र नायक’ कैसा होना चाहिए? एक व्यक्ति में ऐसा क्या होना चाहिए कि वह नायक और फिर राष्ट्र नायक बन जाए? इस तरह के सवाल आज के संदर्भ में बड़े लगते हैं, लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व सामने होता है, तो नायक या फिर राष्ट्र नायक की खोज वहीं पूरी हो जाती है। अभय, साहसी, आत्मविश्वास से लबरेज, हर पल उत्साहित करने वाला, रचनात्मकता को बढ़ावा देने वाला, सकारात्मक और आशावादी सोच के साथ प्रेरित करने वाला व्यक्तित्व, ये कुछ खास गुण हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वास्तव में राष्ट्र नायक बनाते हैं। अपने करिश्माई व्यक्तित्व से इतर पीएम बहुत आसान और सामान्य तरीके से कुछ न कुछ ऐसा करते हैं, जो देश-समाज के लिए एक नजीर बन जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बुके के बजाय बुक’ देने की अपनी अपील पर खुद अमल करना शुरू कर दिया है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों से प्रधानमंत्री की इस इच्छा के अनुरूप ही उनका स्वागत करने का अनुरोध किया है। गृह मंत्रालय ने 12 जुलाई को सभी राज्य सरकारों को एक पत्र लिख कर कहा कि प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुरूप ही उनका स्वागत किया जाए। गृह मंत्रालय ने यह पत्र सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों और

संघ शासित क्षेत्र के प्रशासकों को लिखा है और इसका पालन सुनिश्चित कराने को कहा है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि देश के किसी भी राज्य के दौरे पर प्रधानमंत्री के स्वागत में राज्य सरकार के प्रतिनिधि उन्हें गुलदस्ता भेंट न करें। अच्छा तो यह होगा कि प्रधानमंत्री को गुलदस्ते के बजाय महज एक फूल ही भेंट किया जाए। इतना ही नहीं, मंत्रालय ने राज्य सरकारों से यह भी कहा है कि स्वागत के दौरान पीएम मोदी को फूल के साथ खादी का एक रुमाल या कोई एक पुस्तक भी अगर भेंट स्वरूप दी जाती है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं होगा। प्रधानमंत्री की 19 जून को केरल में की गई अपील के बावजूद उन्हें गुलदस्ता देने की परंपरा बंद न होने के कारण मंत्रालय को राज्यों को यह पत्र लिखना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल 19 जून को केरल में ‘पीएन पनिक्कर नेशनल रीडिंग डे’ समारोह के दौरान लोगों से तोहफे में ‘बुके के बजाय बुक’ देने का नया शिष्टाचार शुरू करने की अपील की थी। कोच्चि में हर साल एक महीने तक चलने वाले इस आयोजन में उन्होंने कहा था कि पढ़ने से बेहतर कोई दूसरा आनंददायक काम नहीं है और पढ़ने से मिले ज्ञान से बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी 19 जून की अपील पर स्वयं अमल करना शुरू कर दिया है।

अब प्रधानमंत्री मोदी जिस किसी भी राज्य के दौरे पर जाएंगे, वहां अपने स्वागत में कीमती फूलों के गुलदस्ते या अन्य उपहार लेने की जगह पुस्तक या खादी के रुमाल में लिपटा हुआ एक फूल स्वीकार करना पसंद करेंगे। गुलदस्ते के फूलों की कोमलता, रंग और महक से प्रसन्नता एवं सकारात्मकता का माहौल ही नहीं बनता, बल्कि किसी के प्रति सम्मान भी व्यक्त होता है, लेकिन गुलदस्ते के फूलों की एक समय-सीमा होती है। अगर जीवन में प्रसन्नता और सकारात्मकता के प्रभाव को लंबे समय तक बनाए रखना है, तो पुस्तकें ही इसे संभव कर सकती हैं। गुलदस्ते की जगह पुस्तकों का वही व्यक्ति चुनाव कर सकता है, जो जीवन में स्थायी रूप से प्रसन्नता और सकारात्मकता को बनाए रखना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं, बेहतर ही उपायों को अपनाते और लोगों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए पीएम ने इस तरह की परंपरा की शुरुआत की थी। माना जा रहा है कि पीएम मोदी की ये पहल एक बड़े बदलाव की नींव रखेगी। देश की कमान संभालने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शासन व्यवस्था के साथ सामाजिक जड़ता को समाप्त करने के लिए प्रयासरत हैं। वे हर पल सकारात्मक सोच को अपनाने के लिए भी कुछ न कुछ पहल करते आ रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव

गृह मंत्रालय ने पत्र में कहा है कि प्रधानमंत्री के स्वागत में राज्य सरकार के प्रतिनिधि उन्हें भेंट स्वरूप गुलदस्ता न दें

में मतदान के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। मतदान शुरू होने से कुछ समय पहले ही वे वहां पहुंच गए। प्रधानमंत्री के पहुंचते ही सारे अधिकारी हैरान रह गए। अधिकारियों की हैरानी देख खुद उन्होंने माहौल को हल्का किया और कहा, ‘मैं स्कूल भी जल्दी पहुंच जाता था।’ प्रधानमंत्री ने दस बजने का इंतजार किया और फिर मतदान किया। हालांकि यह घटना छोटी है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है। 2 अक्टूबर, 2014 की तारीख अधिकतर लोगों को अब भी याद है। वजह, पहली बार देश के प्रधानमंत्री हाथ में झाड़ू लेकर निकल पड़े और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की। ऐसा विरले ही होता है, जब देश का कोई बड़ा नेता इस तरह की पहल करता हो। लेकिन पीएम मोदी ने सफाई के प्रति लोगों में जागरुकता और सकारात्मक सोच लाने का प्रयास किया। इसका असर यह हुआ कि न केवल शहरों-कस्बों, बल्कि ग्रामीण जीवन पर भी स्वच्छता अभियान का असर पड़ा। एक सरकारी अभियान को पहली बार एक जन आंदोलन में तब्दील होते देश और दुनिया के लोगों ने देखा। आलम यह है कि देश के बड़े सितारों से लेकर नामी खिलाड़ी और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी स्वच्छता अभियान का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि देश में स्वच्छता का प्रतिशत तीन साल में ही 42 से बढ़कर 64 प्रतिशत हो गया है। 11 अप्रैल, 2017 को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की नाट्य-पुस्तक ‘मातोश्री’ का विमोचन हुआ। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसा किया कि लोग देर तक तालियां बजाते रहे। पीएम संसद की लाइब्रेरी बिल्डिंग के आॅडिटोरियम में पुस्तक विमोचन के बाद भी पैकिंग पेपर हाथ में ही पकड़े रहे। कुछ देर बाद उन्होंने पैकिंग पेपर को दोनों हाथों से मोड़ा और फिर अपनी हाफ जैकेट की बाईं जेब में रख लिया। महज 10 सेकंड में यह सब हुआ, लेकिन जैसे ही पीएम ने उस वेस्ट पैकिंग पेपर को खुद अपनी जेब में रखा, दर्शक दीर्घा में मौजूद लोग अपनी सीट से खड़े हो गए और जोरदार तालियां बजाने लगे। दरअसल, पीएम मोदी ने यह आदतन किया, लेकिन उनका यह आचरण नजीर बन गया।


24 - 30 जुलाई 2017

विरासत

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पुराता​ित्वक विरासतों की स्वदेश वापसी धरोहर वापसी

प्रधानमंत्री तीन साल में 136 मूर्तियों और कलाकृतियों को स्वदेश लाने में सफल रहे

एक नजर

अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने लौटाए कई अहम ऐतिहासिक विरासतें विदेश यात्राओं के दौरान पीएम ने इसके लिए किए विशेष प्रयास

कागजी कार्रवाई के बाद अभी और धरोहरों की होगी स्वदेश वापसी

भा

एसएसबी ब्यूरो

रत की सांस्कृतिक संपन्नता को लेकर दुनिया भर में आकर्षण है। यहां उत्खनन से प्राप्त पुरानी मूर्तियों, पुरावशेष, देवालयों और राजामहाराजाओं के खजानों में रखी धरोहरों का बाजार मूल्य काफी ज्यादा है। इसके संरक्षण को लेकर जितनी कोशिशें होनी चाहिए, वे लंबे समय तक नहीं हुई हैं, पर बीते तीन सालों में स्थिति काफी बदली है। देश की सांस्कृतिक विरासत और संपदा की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी तौर पर ही नहीं, निजी तौर पर भी काफी दिलचस्पी दिखाई है। भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के आंकड़ो के अनुसार, देश में इस समय 3,650 संरक्षित ऐतिहासिक विरासतों के अतिरिक्त लगभग 5 लाख असंरक्षित विरासतें हैं। इन प्राचीन पुराता​ित्वक और ऐतिहासिक स्थलों पर देवीदेवताओं की मूर्तियां और अनमोल कलाकृतियां हैं, लेकिन आजादी के बाद से हर दशक में लगभग दस हजार देवी-देवताओं की मूर्तियों और कलाकृतियों को चुराकर विदेशों में बेचा जाता रहा है। यह देश की संस्कृति और छवि, दोनों के लिए काफी खराब

स्थिति रही है। प्राचीन काल के मंदिर, मठ और भवन भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा को हमारे सामने जीवंत करते हैं। इन अमूल्य धरोहरों से ही हम अपनी पुरातन संस्कृति को बचाए रख सके हैं, इसीलिए इनके संरक्षण पर निश्चित रूप से विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

2000 साल पुरानी इन मूर्तियों और कलाकृतियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा। इसके पहले शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक विरासतों को संरक्षित करने के लिए इस मनोयोग से काम किया हो। प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका से अपने साथ 11 मूर्तियों और कलाकृतियों को वापस लेकर आए, शेष कागजी कार्रवाई के बाद देश में वापस आईं। 17 मई 2017 को 126 मूर्तियां और कलाकृतियां वापस आईं। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से 2016 में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने अमरावती के मंदिर से चोरी की गई 900 साल पुरानी देवी प्रत्यंगिरा की मूर्ति और मथुरा की ध्यानस्थ बुद्ध की मूर्ति वापस कर दी हैं।

गौरव वापस दिलाया

1976 से 2014 के बीच विदेशों में बेची गई हजारों देवी-देवताओं की मूर्तियों और कलाकृतियों में से केवल 13 को ही वापस लाने में सफलता मिली, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ तीन साल में ही 136 मूर्तियों और कलाकृतियों की स्वदेश वापसी सुनिश्चित की। इन प्राचीन विरासतों का वापस आना आज भी जारी है। प्रधानमंत्री जब भी अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों की यात्रा पर गए हैं, उन्होंने देश की सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने का विशेष प्रयास भी किया है।

विदेश यात्राओं का प्रतिफल

प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में अमेरिका से 200 देवीदेवाताओं की मूर्तियों और कलाकृतियों को वापस लाने का विशेष प्रयास किया, जिसमें वो सफल रहे। 7 जून 2016 को वाशिंगटन में एक समारोह में अमेरिका की अटार्नी जनरल लोरेटा लिंच ने

वापस लाई जा चुकी मूर्तियां

अब तक जिन मूर्तियों को स्वदेश वापस लाने में नरेंद्र मोदी सरकार खासतौर पर सफल रही है, उनमें तीसरी सदी की गौतम बुद्ध के उपासक रूप की मूर्ति, कुषाण काल की विशाल प्रभामंडलयुक्त गौतम बुद्ध की मूर्ति और 13 वीं सदी में बनी देवी प्रत्यंगिरा की मूर्ति शामिल है। इन सभी प्रतिमाओं को राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित किया गया है।


06 सुलभ

24 - 30 जुलाई 2017

एक नजर

मरोरा गांव का नया नाम अब ‘ट्रंप विलेज’ नाम बदलने का मकसद प्रतीकात्मक संदेश देना

इस मौके पर पांच नवनिर्मित शौचालय ग्रामीणों को भेंट

ट्रंप विलेज में स्वच्छता का सुलभ सर्ग सुलभ इंटरनेशनल ने हरियाणा के पिछड़े गांव मरोरा को स्वच्छ और स्वावलंबी बनाने का बीड़ा उठाया

ट्रं

प्रियंका तिवारी

प गांव में शौचालय का उद्घाटन करने आए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक ने कहा कि खाना तो बाद में भी खाया जा सकता है, लेकिन शौच को रोका नहीं जा सकता। यहां इतने लोग बैठे हैं यदि किसी को शौच लग जाएगा तो वह यहां एक मिनट भी नहीं रुकेगा, इसीलिए शौचालय सभी के लिए आवश्यक है। इस काम के लिए हमें पुनीत अहलूवालिया का पूरा सहयोग मिल रहा है, जिससे हम कई गांवों का विकास कर सकते हैं। हमारे पास अभी बयासी कंपनियां हैं जिनके सहयोग से हम काम कर रहे हैं। अब अहलूवालिया के सहयोग से और कंपनियां हमसे जुड़ेंगी। हम ऐसे ही कई सारे गांवों को गोद लेंगे, उसका विकास करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी के सपने को 2 अक्टूबर 2019 तक पूरा करेंगे। बता दें कि यह हरियाणा के मेवात जिले का वही मरोरा गांव है, जिसको डॉ. पाठक ने गोद लिया है और इसका नाम अमोरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नाम पर रखा है। उद्घाटन समारोह के दौरान डॉ. पाठक का गांव के लोगों ने पगड़ी बांध कर स्वागत किया। डॉ. पाठक ने भी इस गांव के सरपंचो का पुष्प गुच्छ और शाल देकर सम्मानित किया। इस मौके पर पुनीत अहलूवालिया, उनकी मां हरजीत अहलूवालिया, उनके बहनोई अमर गुलाटी, उनकी बहन परमिता गुलाटी, बीजेपी जिला उपाध्यक्ष, नरेंद्र पटेल, मरोरा पंचायत के सरपंच हाजी इब्राहिम, धाधूंका के सरपंच जाकीर और बीजेपी के जिला महामंत्री कुलदीप मौजूद रहे। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने कहा

कि पुनीत अहलूवालिया अमेरिका से आए हैं और रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य हैं। इन्होंने हमें अमेरिका बुलाया था, तभी हमने कहा था कि हम भारत के एक गांव का विकास डोनाल्ड ट्रंप के नाम पर करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी का सपना पूरा करेंगे। मैं किसी बात का इंतजार नहीं करता हूं, मुझे जो करना होता है उसे कर देता हूं, क्योंकि इंतजार करने में बहुत समय बर्बाद होता है। 23 जून को मैंने यहां पर जिन 95 शौचालयों के निर्माण की बात कह कर गया था, उनमें से 90 शौचालयों पर काम हो रहा है और 5 शौचालयों का कार्य पूरा हो चुका है। एक से डेढ़ महीने के अंदर यहां के सभी

घरों में शौचालय होंगे। पूरे देश में इतनी तेज गति से काम करने वाली संस्था सुलभ ही है। इस गांव के विकास का कार्य आज से शुरू हो गया है और यह निरंतर चलता रहेगा। हमारी माताओं और बहनों के लिए यह अति आवश्यक है, इसके लिए हमने 1968 में सुलभ शौचालय का आविष्कार किया। शुरुआत में लोग कहते थे कि इसका क्या महत्व है। आज देखिए हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने इसके महत्व को सभी को बताया इतना ही नहीं, इस बात के लिए उन्होंने 15 अगस्त 2014 को लाल किले से अपने संबोधन में देश की सवा सौ करोड़ जनता का आह्वान किया

कि सभी लोग अपने घरों में शौचालय बनवाएं और देश को स्वच्छ रखने में अपना योगदान दें। उनका सपना है कि 2019 तक देश के सभी घरों में शौचालय होने चाहिए, ताकि महात्मा गांधी के 150 वीं वर्षगांठ पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके। हम लोग दोनों का सपना पूरा कर रहे हैं। मैं तो इस काम में 50 वर्षों से लगा हुआ हूं, लेकिन मैं बहुत छोटा आदमी हूं, जिसे कोई पहचानता भी नहीं है। मेरे पास कोई राजनीतिक या सरकारी पावर नहीं है, इसके बावजूद हमने एक अलग तरह का संसार बसा दिया है, जिसे ‘सुलभ सुखद संसार’ कहते हैं। इस संसार में सभी धर्मों, जातियों के लोग एक साथ, समान भावना और प्यार-स्नेह से रहते हैं। हम स्वच्छता के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार के लिए भी कार्य करते हैं। यह सभी कार्य हम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नाम पर इस गांव में करेंगे। एक से डेढ़ महीने के अंदर ही इस गांव की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। पुनीत अहलूवालिया ने कहा कि डॉ. पाठक महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री मोदी के सपने को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, जो बहुत ही सराहनीय कार्य है। हमें यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि पच्चीस दिनों के अंदर इस गांव में 5 शौचालय बन गए हैं और बाकी 90 शौचालयों पर कार्य चल रहा है। यह सब डॉ. पाठक की मेहनत और लगन का ही प्रतिफल है। भारत के हर घर में शौचालय का होना बहुत ही आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी का सपना है, भारत को 2019 तक स्वच्छ और स्वस्थ करना है। उसके लिए सभी को प्रयत्न करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी कहते थे कि जहां पर स्वच्छता है वहां भगवान निवास करते हैं और मैं चाहता हूं कि जब मैं अगली बार इस गांव में आऊं तो हमें ये गांव पूरा स्वच्छ दिखना चाहिए। ये जिम्मेदारी हमारी नई पीढ़ी पर है कि वह जहां पर भी कचरा देखें या किसी को थूकते

‘मैं महात्मा गांधी के सपने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के मुताबिक गांवों को ओडीएफ बनाने के काम में शरीक होने को अपना सौभाग्य मानता हूं।’ -पुनीत अहलूवालिया एशिया-प्रशांत सलाहकार समिति-2016 के सदस्य


24 - 30 जुलाई 2017

सुलभ

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‘सुलभ के प्रयासों से इस गांव के लोगों को जहां एक तरफ बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा, वहीं इस पहल से भारत-अमेरिकी रिश्ते में भी सुदृढ़ता आएगी’ – डॉ. विन्देश्वर पाठक

थाईलैंड की राजकुमारी ने किया सुलभ ग्राम का दर्शन थाईलैंड की राजकुमारी दूसरी बार सुलभ ग्राम में पधारीं और सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के योगदान और कार्यों की सराहना की

था

ईलैंड की राजकुमारी महाचक्री सिरिनधोनी अपने 100 कर्मचारियों के साथ दूसरी बार सुलभ ग्राम आईं। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने माला, गुलदस्ते, स्कार्फ और अन्य उपहार के साथ राजकुमारी का स्वागत किया। डॉ. पाठक ने राजकुमारी को सुलभ के उद्देश्यों और कार्यों के बारे में विस्तार से बताया। इसके बाद राजकुमारी ने सुलभ संग्रहालय में रखे सुलभ तकनीक से बने टूपिट पोर फ्लश शौचालयों के मॉडल का मुआयना किया। उन्हें सुलभ शौचालय के संग्रहालय में रखे मॉडल बहुत ही आकर्षक लगे। उन्होंने 2500 ईसापूर्व के शौचालय की तकनीक की भी तारीफ की। इसके साथ ही राजकुमारी ने सुलभ बायोगैस प्लांट,

रसोई और स्वच्छ घर को भी देखा। राजकुमारी सुलभ स्कूल के बच्चों से पूरे उत्साह के साथ मिलीं। उन्होंने डॉ. पाठक के इस सराहनीय कार्य की तारीफ की और कहा कि डॉ. पाठक भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में शौचालय और स्वच्छता के महत्व को बढ़ावा दे रहे हैं, यह बहुत ही सराहनीय कदम है। इसके बाद उन्होंने डॉ. पाठक के साथ स्वच्छता के मुद्दे पर चर्चा की।

देखें तो उन्हें रोकें। क्योंकि यह आपका घर है, इसे स्वच्छ और स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी आपकी है। मेरी सबसे यही प्रार्थना है कि आप सब मिल कर काम करें। हमें मिलकर भारत को फिर से सोने जैसा बनाना है। मैं भारत और भारत के बाहर रहने वाले समुदायों से अनुरोध करता हूं कि वह कम से कम एक घर में शौचालय जरूर बनवाएं, जिससे प्रत्येक परिवार का मान-सम्मान बढ़े। इस अवसर पर भाजपा जिला उपाध्यक्ष नरेंद्र पटेल ने कहा कि मैं डॉ. पाठक, पुनीत अहलूवालिया और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हृदय की गहराइयों से स्वागत और अभिनंदन करता हूं। आपने हमारे इस गांव को गोद लिया और आज यहां पर 5 शौचालय और एक सिलाई सेंटर का उद्घाटन किया। पांच शौचालय बन कर तैयार हो चुके हैं। सिलाई सेंटर में बच्चियों को सिलाई, बुनाई के कार्य सिखाए जाएंगे, जिससे वह अपना भविष्य संवार सकें। नरेंद्र पटेल ने कहा कि महिलाओं और बच्चियों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। वह एक नहीं, बल्कि दो घरों को संभालती हैं। उनको सक्षम बनाने की जो पहल डॉ. पाठक ने की है, हम इसके लिए उनका

हम अभिनंदन करते हैं। यह हमारे लिए बहुत ही गौरव की बात है कि आपने हमारे मरोरा गांव को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए हम सब डॉ. पाठक और सुलभ परिवार के बहुत आभारी हैं। आपके इस कार्य में हमारे गांव और पार्टी के लोग तन, मन और धन से सहयोग करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। यह हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी कि हम आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मरोरा गांव के सरपंच हाजी इब्राहिम ने कहा कि सबसे पहले तो मैं पाठक जी का अभिनंदन करता हूं। उन्होंने हमारे गांव को गोद लेकर हम सब पर उपकार किया है। अब हमारे गांव में बिजली आ रही है, शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है। इस गांव में 90 शौचालयों पर काम चल रहा है, जबकि इसका उद्घाटन 26 जून को किया गया था। यह सब डॉ. पाठक के शुभ विचारों की ही देन है, जिससे आज हमारा गांव बदल रहा है। डॉ. पाठक बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। उन्हें देखकर लोगों को सीखना और देशहित में कार्य करना चाहिए।


08 स्वच्छता

24 - 30 जुलाई 2017

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

रक्षाबंधन पर बहनों को गिफ्ट करें शौचालय, मिलेगा सम्मान

‘स्वच्छ भारत मिशन’ को बढ़ावा देने के लिए रक्षाबंधन को ध्यान में रखकर अलीगढ़ जिला प्रशासन की अनूठी पहल

स्वच्छता बिहार

महिलाएं किचेन तोड़ बनवा रहीं शौचालय बि

स्व

च्छ भारत मिशन को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ प्रशासन ने अनूठी पहल की है। प्रशासन की तरफ से घोषणा की गई है कि जो लोग रक्षाबंधन पर अपनी बहनों को उपहार में शौचालय देंगे, उन्हें सम्मानित किया जाएगा। इस तरह की घोषणा करने वालों की प्रशासन टीम भी बनाएगा, जो दूसरे लोगों को जागरूक कर ब्रांड एंबेसडर का काम करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अक्टूबर 2014 को ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की शुरुआत की थी, पर अलीगढ़ में शुरू से ही अभियान सुस्त चल रहा है। अभी तक 10 गांव ही खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) घोषित हो पाए हैं। अभियान को धार देने के लिए अलीगढ़ प्रशासन ने यह पहल शुरू की है और रक्षाबंधन पर्व को इसके लिए चुना गया है।

सम्मान के साथ उपहार भी

अलीगढ़ प्रशासन युवाओं से रक्षाबंधन पर बहनों को उपहार में शौचालय देने की अपील कर रहा है। रक्षाबंधन से पहले शौचालय बनवाकर बहनों को देने वाले भाइयों को प्रशासन सम्मानित करेगा और उपहार भी देगा। शौचालय निर्माण शुरू करने व बनने पर जानकारी पंचायत सचिव को देनी होगी। अगर

कोई भाई शादी में बहन को दहेज में उसकी ससुराल में शौचालय बनवाकर देता है तो वह भी सम्मान की श्रेणी में आएगा। इस पहल में गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) का भी सहारा लिया जाएगा।

पहल का स्वागत

सीडीओ दिनेश चंद्र के मुताबिक, ‘अगर कोई भाई रक्षाबंधन से पहले बहन को गिफ्ट के तौर पर शौचालय बनवाकर देता है तो वह‘स्वच्छ भारत मिशन’ में अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणादायी होगा। ऐसे लोगों को जनजागरण टीम में शामिल कर दूसरे लोगों को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।’ प्रशासन की पहल का जिले की बेटियों ने स्वागत किया है। अलीगढ़ की आरती कुमारी ने इस बारे में बताया, ‘हर लड़की चाहती है कि रक्षाबंधन पर उसका भाई कोई ऐसा गिफ्ट दे, जो याद रहे। रक्षाबंधन पर गिफ्ट के तौर पर भाई बहन के लिए शौचालय बनवाता है तो यह बड़ा उपहार होगा।’ कुछ ऐसी ही बात मालती कुमारी की भी थी। उसने कहा, ‘कोई लड़की खुले में शौच नहीं जाना चाहती, लेकिन कई बार परिवार की स्थिति ऐसी नहीं होती कि शौचालय बनवा सके। प्रशासन को भी इस काम में मदद करनी चाहिए।’

बिहार के सीतामढ़ी में महिलाओं ने रसोईघर और कमरे तुड़वा कर शौचालय बनवाने की मिसाल पेश की है

हार में शौचालय निर्माण को लेकर महिलाओं ने अनूठी पहल की है। सीतामढ़ी जिले की एक पंचायत में महिलाएं घरों में शौचालय निर्माण को लेकर जागरुकता की मिसाल बन गई हैं। आलम यह है कि बिहार के इस जिले में महिलाएं शौचालय निर्माण को लेकर इतनी प्रतिबद्ध हैं कि उन्होंने कई मामलों में घर की रसोई तक को तोड़कर शौचालय निर्माण की पहल की है। ने जमीन कम होने की बात कह पल्ला झाड़ना गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री चाहा, लेकिन सोनी नहीं मानी। हालांकि मिट्टी नीतीश कुमार के सात निश्चय में एक है, सभी लेपकर तैयार फूस की झोपड़ी तोड़ने का गम उसे के लिए शौचालय निर्माण। इसके तहत चलाए भी था, क्योंकि उसके ही एक कोने में रसोई का जा रहे जागरुकता अभियान का असर ही है काम होता था। आखिरकार झोपड़ी को तोड़कर कि सीतामढ़ी के चोरौत उत्तरी पंचायत में कई शौचालय बनाने का काम शुरू हो गया है। महिलाओं ने रसोईघर ऐसे कई उदाहरण विधवा पेंशन से गुजर-बसर हैं। चोरौत पूर्वी पंचायत और कमरे तुड़वा कर शौचालय बनवाने की के वार्ड आठ में विधवा करने वाली शीला देवी ने पहल की है। उन्होंने पेंशन से गुजर-बसर पिछले महीने दो कमरे के शौचालय बगैर घरों में करने वाली शीला देवी खपरैल घर को तुड़वाकर रहने से इनकार कर ने पिछले महीने दो शौचालय बनवाया दिया है। बिहार की इन कमरे के खपरैल घर महिलाओं की पहल की को तुड़वाकर शौचालय हर तरफ सराहना हो रही है। बनवाया। दीपलाल दास की बहु नीलम देवी ने चरौत के वार्ड सात में हरि मंडल का दो कमरे मिट्टी एवं खपरैल के घर को तोड़कर शौचालय का घर और रसोईघर था। ईंट से निर्मित 15 इंच को प्राथमिकता दी। मोटी दीवार के ऊपर खपरैल थी। शौचालय की चोरौत उत्तरी पंचायत की मुखिया सीमा कमी खल रही थी। पत्नी रेखा देवी को जानकारी देवी कहती हैं कि इन महिलाओं की पहल से मिली कि अभी शौचालय निर्माण कराने पर उन लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए, जो अब भी सरकार की ओर से 12 हजार रुपए की सहायता शौच के लिए खुले में जाते हैं। चोरौत के प्रखंड मिल रही है। उन्होंने शौचालय निर्माण के लिए विकास पदाधिकारी नीलकमल कहते हैं कि जब जिद ठान ली। पति ने जगह की कमी का रोना पूरा प्रखंड खुले में शौच मुक्त घोषित हो जाएगा रोया तो वह रसोई तोड़ शौचालय के लिए जगह तो इन महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा। निकालने पर अडिग हो गईं। अब रसोईघर के एक पड़ोसी देश नेपाल में बगैर शौचालय वाले परिवार हिस्से में शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। के बच्चे का नामांकन सरकारी विद्यालयों में नहीं इसी तरह वार्ड आठ में सोनी देवी ने घर होता है। हो सकता है कि भविष्य में अपने यहां में शौचालय पर जोर दिया तो पति सुरेंद्र मंडल भी सरकार ऐसा नियम लागू कर दे।


24 - 30 जुलाई 2017

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

खुद शौचालय बनवाते हैं ग्रामीण

अलीगढ़ के नगलिया गौरोला गांव के लोग बिना सरकारी मदद के शौचालय बनवाते हैं

चालय निर्माण को लेकर देश में जागरुकता शौ तो काफी आ चुकी है, पर आर्थिक साधन की तंगी के कारण अब भी लोग इस संकल्प

से पीछे हट जाते हैं। कई लोग तो एेसे हैं जो सरकारी-गैरसरकारी मदद के बाद भी शौचालय नहीं बनवाते। अगर बनवा भी लें तो प्रयोग नहीं करते। उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के टप्पल गांव नगलिया गौरोला ने इससे उलट केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान में मिसाल पेश की है। यहां के लोग बिना सरकारी मदद के शौचालय बनवाते हैं। 10 साल में 80 से अधिक शौचालय बनवा लिए गए हैं। बाकी लोगों को भी प्रेरित किया जा रहा है। इस गांव को 2007 में ‘निर्मल भारत अभियान’ के तहत चिह्नित किया गया था। उस दौरान नगलिया गौरोला की आबादी दो हजार थी। गांव में 300 घर थे। 230 लोगों ने खुद शौचालय बनवाए। 30 के पास पहले से शौचालय थे। 40 लोगों के यहां ग्राम पंचायत निधि से शौचालय बनवाए गए थे। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने गांव को ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ से नवाजा। आज इस गांव की आबादी बढ़कर 2,500

ग्वा

तक पहुंच गई है। 10 साल में करीब 100 घर नए बढ़ गए हैं, लेकिन स्वच्छता के प्रति लोगों का जज्बा बरकरार है। नए घरों में 80 लोगों ने अपने पैसे से शौचालय बनवाए हैं। 20 घर ऐसे हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। इनमें से 10 घरों के लोगों ने खुद शौचालय बनवाने का एेलान कर दिया है। 10 के लिए सरकारी सहायता दिलाने की कोशिश हो रही है। टप्पल के प्रखंड विकास अधिकारी मनीष शर्मा व स्वच्छ भारत मिशन के जिला समन्वयक जिया अहमद खान ने सत्यापन के लिए गांव का निरीक्षण किया तो चौंकाने वाली स्थिति मिली। गांव के लोग खुले में शौच जाने वालों को टोकते हैं और उन्हें तत्काल शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करते हैं। नगलिया गौरोला गांव के लोग साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं। ज्यादातर लोग खुद घर के बाहर सफाई करते हैं। 2007 से पहले बने शौचालयों का भी अच्छी तरह उपयोग होता है। गांव में दो दर्जन से अधिक शौचालय ऐसे हैं, जिन पर छत नहीं है, पर एेसा उन लोगों ने जानबूझकर किया है ताकि आर्थिक साधन के अभाव में शौचालय निर्माण की पूरी प्रक्रिया ही न रूक जाए। (भाषा)

स्वच्छता के लिए सम्मान

लियर में चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान में अहम योगदान देने वाले सिटी सेंटर निवासी पवन दीक्षित का सम्मान किया गया। पवन दीक्षित इस क्षेत्र में कई लोगों के प्रेरणा स्रोत बन चुके हैं। उन्हें महापौर विवेक नारायण शेजवलकर ने सम्मान

प्रदान किया। पवन ने स्वच्छता अभियान में अहम भूमिका निभाने के साथ-साथ छात्रों के जरिए मुरार में 500 डस्टबिन का वितरण कराया और लोगों से शहर को स्वच्छ रखने की अपील भी की थी। इसका प्रभाव दिखने लगा है। (भाषा)

स्वच्छता

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स्वच्छता उत्तर प्रदेश

ओडीएफ में बना रिकॉर्ड, बनाए 20 हजार से ज्यादा इज्जत घर

‘सात दिन स्वच्छता के संग’ अभियान के तहत बिजनौर की 155 ग्राम पंचायतों में 20,800 इज्जत घरों का निर्माण हुआ

त्तर प्रदेश के बिजनौर जिले ने ओडीएफ में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। ‘सात दिन स्वच्छता के संग’ अभियान के तहत जिले की 155 ग्राम पंचायतों में 20,800 इज्जत घरों का निर्माण करा कर जिला प्रशासन ने आंध्र प्रदेश में 100 घंटे में बने 10 हजार शौचालयों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। सीडीओ ने इस अभियान में लगे कर्मचारियों, ग्राम प्रधान, शिक्षकों, राज मिस्त्री और मजदूरों के कार्यों की सराहना की है। बिजनौर जिले में यह अभियान सीडीओ इंद्रमणि त्रिपाठी की देखरेख में 10 जुलाई को शुरू किया गया था। अभियान के तहत सात दिन के भीतर 20 हजार इज्जत घर बनाने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए प्रशासन ने जिले की 155 ग्राम पंचायतों को चिह्नित किया था। जिन पंचायतों का चिह्नित किया गया था, उनके प्रधानों और ग्राम विकास अधिकारियों को अभियान शुरू होने से पूर्व कार्यक्रम की गंभीरता से अवगत करा दिया गया था। सात दिन चले अभियान में सुबह और शाम को गांव में सीटी बजा कर जागरुकता की जिम्मेदारी सभी विकास क्षेत्रों के खंड शिक्षा अधिकारियों को दी गई थी।

साथ ही पहली बार जिले के इंटर कॉलेज के शिक्षकों को भी इस अभियान में लगाया गया था। लक्ष्य पूरा करने के लिए अभियान के दो दिन बढ़ा दिए गए थे। जिला प्रशासन ने लक्ष्य को पूरा कर लिया है। सीडीओ डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी के अनुसार 155 ग्राम पंचायतों में 20800 शौचालयों का निर्माण काम पूरा कर लिया गया। बताया कि मेहनत के साथ काम होने पर ही लक्ष्य को पार किया जा सका है। इज्जत घर लक्ष्य से भी 800 अधिक बन गए हैं।

आंध्र प्रदेश के रिकॉर्ड को छोड़ा पीछे

ओडीएफ में प्रशासन एक के बाद एक रिकाॅर्ड बनाता जा रहा है। ‘सात दिन स्वच्छता के संग’ अभियान में बने रिकॉर्ड से प्रशासन खुश है। प्रशासन ने अभियान के तहत 20800 शौचालय बनवाए हैं। साथ ही जिले ने आंध्र प्रदेश में 100 घंटे में 10 हजार शौचालय बनाने के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। नया कीर्तिमान बनाने के लिए ग्राम पंचायतों में कई टीम लगी थी। काम पर निगरानी रखने के लिए भी कई विभाग के अधिकारी लगाए गए थे। (भाषा)

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

धूम्रपान बंद कर घर में शौचालय बनवाने की अपील खु

ले में शौच करने से तमाम तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं, ऐसे में हर घर में शौचालय होना जरूरी है। सरकार द्वारा लगातार शौचालय बनवाए जा रहे हैं। इसके अलावा अगर आप सब धूम्रपान बंद करने का संकल्प लें तो घर में आसानी से शौचालय बन सकता है। यह बात कानपुर के डीएम सुरेंद्र सिंह ने स्थानीय कुरिया गांव में चौपाल लगाकर ग्रामीणों से कही। उन्होंने अपने संबोधन

में कहा कि ग्राम प्रधान, सचिव व गांववासी संकल्प लें कि हर घर में शौचालय हो। मक्खी खुले में शौच पर बैठती है, गंदगी से बीमारी पैदा होती है, नतीजतन अस्पताल मरीजों से भरे रहते हैं। अगर लोग बीड़ी-सिगरेट पीना छोड़ दें तो उस बचत से शौचालय बन जाएगा। इससे एक फायदा यह भी होगा कि ओडीएफ होने पर 15 लाख रुपए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के अंतर्गत गांव को मिलेंगे। (भाषा)


10 स्वच्छता

24 - 30 जुलाई 2017

कचरा प्रबंधन

कचरे से निपटने की नीति

देश को स्वच्छ और हरित बनाने के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के साथ ही नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित एजेंडा सही अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक प्रभावी कदम है

एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

हाड़नुमा कचरे का ढेर देखते ही इस बात का पता लग जाता है कि कोई शहर करीब है। यह दृश्य देश के अधिकांश शहरों का है जहां आने वालों का स्वागत कचरे के ढेर करते हैं। गांवों में जिस घर के सामने कचरे का जितना बड़ा ढेर होता है, उसकी समृद्धि का आकलन उसी हिसाब से किया जाता है। लेकिन इस सबका परिणाम यह हुआ कि शहरों में कूड़े के ढेर स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गए हैं। इनमें वे शहर भी शामिल हैं जो कचरे के निपटान के प्रभावी तरीके विकसित नहीं कर पाए हैं। इस समस्या पर काबू पाने के लिए भारत सरकार ने क्षेत्र-आधारित विकास और शहर स्तर के स्मार्ट समाधान के माध्यम से जीवन में सुधार के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ (एसबीए) और ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ (एससीएम) शुरू किए हैं। तीन साल की कार्य योजना तैयार करने में आयोग ने नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) प्रबंधन की समस्या से निपटने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया है। वास्तविक में बदलाव के साथ विकास की रणनीति से तालमेल के लिए आयोग को तीन वर्ष की अवधि के भीतर नीतिगत परिवर्तनों को प्रभावित करने के साधन और दृष्टिकोण विकसित करने के कार्य सौंपे गए हैं। यह अपने तीन वर्ष के एजेंडे के तार्किक निष्कर्ष के लिए सात साल की रणनीति और पंद्रह वर्ष की दूरदर्शिता के साथ कार्य करेगा। विशालता को देखते हुए इस एजेंडे में नगरपालिका के ठोस कचरे के प्रबंधन के लिए तेजी से कार्रवाई करने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया है। 7,935 शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 377 मिलियन निवासियों के कारण प्रतिदिन 170,000 टन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है। इस तथ्य को देखते हुए समयसीमा में कार्य पूरा करने के लिए नीति आयोग ने यह एजेंडा सही समय पर विकसित किया है, क्योंकि 2030 तक शहरों में 590 मिलियन निवासी हो जाने के कारण शहरों की सीमाएं समाप्त होने से प्रकृति और शहरी अपशिष्ट का प्रबंधन मुश्किल होगा। सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं के चलते इस समस्या का शीघ्र तकनीकी समाधान आवश्यक है और नीति आयोग का एजेंडा इस समस्या को हल करने का प्रयास है। इसमें सुझाए गए समाधान दो तरह के हैं-बड़ी नगरपालिकाओं के लिए अपशिष्ट पदार्थ से ऊर्जा पैदा करना और छोटे कस्बों तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों

प्रतिदिन 1,70,000 टन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है

शहरी अपशिष्ट के 80 प्रतिशत पदार्थ जैविक होते हैं अपशिष्ट प्रबंधन पर 500 से 1,500 रुपए प्रति टन का खर्च

समाधान का प्रस्ताव करते हुए नीति आयोग ने थर्मल पाइरोलिसिस और प्लाज्मा गैसीकरण प्रौद्योगिकियों के लाभ-लागत अनुपात का भी मूल्यांकन किया है। ये दोनों महंगे विकल्प हैं के लिए अपशिष्ट का निपटान कर उनसे खाद तैयार करने की विधि। इसमें नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट साफ करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिये संयंत्र लगाने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी हेतु भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के समान ही नया वेस्ट टू एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (डब्ल्यूईसीआई) स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। स्थापना के बाद प्रस्तावित निगम 2019 तक 100 स्मार्ट शहरों में तेजी से अपशिष्ट से ऊर्जा तैयार करने के संयंत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पर गठित मुख्यमंत्रियों के उप-समूह ने पहले ही 2015 की अपनी रिपोर्ट में ऐसे संयंत्रों की स्थापना की सिफारिश की है। इस उच्च तकनीक समाधान को व्यापक रूप से समर्थन मिला है, क्योंकि कचरे की मात्रा कम कर 2018

तक 330 मेगावाट और 2019 तक 511 मेगावाट बिजली उत्पन्न होगी। समाधान का प्रस्ताव करते हुए आयोग ने थर्मल पाइरोलिसिस और प्लाज्मा गैसीकरण प्रौद्योगिकियों के लाभ-लागत अनुपात का भी मूल्यांकन किया है। ये दोनों महंगे विकल्प हैं। गौरतलब है कि आयोग का प्रस्तावित एजेंडा सुझाव देने का है और राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इन पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन मुख्यमंत्रियों द्वारा प्रस्तावित विकल्प पर ज्यादातर राज्यों का समर्थन मिलने की संभावना है। हालांकि तकनीकी और पर्यावरणीय आधार पर देश में कार्यरत मौजूदा अपशिष्ट से ऊर्जा तैयार करने के संयंत्र पर मिली-जुली रिपोर्ट है। समस्या की जड़ देश में शहरी अपशिष्ट की प्रकृति है जिसमें ऐसे पदार्थों का मिश्रण होता है जो पूरी

तरह से दहन के लिए उपयुक्त नहीं होता है। चूंकि शहरी अपशिष्ट का 80 प्रतिशत पदार्थ सड़ा-गला भोजन, रद्दी-कतरन जैसे जैविक पदार्थ होते हैं, इसीलिए निर्धारित वायु गुणवत्ता मानक पर खरे उतरने में लगे मौजूदा संयंत्र को काम करने में कठिनाई आती है। हालांकि मौजूदा अपशिष्ट के निपटान की विधियां बहुत अच्छी नहीं हैं। शहरी नगर निगम अपशिष्ट प्रबंधन पर 500 से 1500 रुपए प्रति टन खर्च करता है। इसमें से 60 से 70 प्रतिशत कूड़ा एकत्रित करने में शेष 20 से 30 प्रतिशत एकत्रित कचरे को ले जाने में खर्च होता है, जिसके बाद कचरे के प्रबंधन और निपटान पर खर्च करने के लिए कुछ भी राशि नहीं बचती। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कूड़े के मैदान बनाना एक बड़ी चुनौती है। एजेंडा में अपशिष्ट से बड़े पैमाने पर कंपोस्ट खाद और बायो गैस उत्पन्न करने के लिए जगह की कमी को भी रेखांकित किया गया है। हालांकि वास्तविकता यह है कि कूड़े के कई स्थानों पर बिना दक्षता के कम्पोस्ट तैयार करने की कोशिश की जा रही है। सरकार एक विकल्प के रूप में वनस्पति खाद बनाने की व्यवहार्यता पर दोबारा विचार कर अशिक्षित युवाओं के लिए रोजगार का वैकल्पिक स्रोत पैदा करने के लिए इसे ‘राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन’ में शामिल कर सकती है। सहमति पर पहुंचने के लिए ये शुरुआती समय है। हालांकि यह स्पष्ट है कि देश में विविध सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं के लिए एक समान विकल्प नहीं हो सकता। लेकिन सामाजिक और पर्यावरणीय समस्या पर समय रहते चर्चा शुरू करने के लिए सरकार को श्रेय जाना चाहिए। देश को स्वच्छ और हरित बनाने के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के साथ ही नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित एजेंडा सही अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक कदम है।


24 - 30 जुलाई 2017

उत्तराखंड का साहूकार गांव उत्तराखंड गंगी गांव

गंगी गांव के लोग सिर्फ भगवान की कसम दिलवाकर लोन दे देते हैं। यह काम इस गांव के कोई एक-दो नहीं, बल्कि कई साहूकार करते हैं

भा

एसएसबी ब्यूरो

रत का ग्रामीण चरित्र इस देश की विलक्षणता को सबसे मौलिक तरीके से पेश करता रहा है। अच्छी बात यह है कि आज शहरीकरण के बढ़े जोर के बीच भी ग्रामीण भारत अपनी परंपराओं और लोक व्यवहारों से बड़ा आकर्षण पैदा करता है। ऐसा ही एक गांव है उत्तराखंड का गंगी। इस गांव के लोग सिर्फ भगवान की कसम दिलवाकर कर्ज दे देते हैं। दिलचस्प है कि लोन की अर्जी देने पर बैंक कुछ न कुछ जरूरी दस्तावेजों की गारंटी मांगता है। साहूकार से कर्ज लें तो उसके पास सोना गिरवी रखना पड़ता है, लेकिन इस गांव में लोग भगवान के भरोसे कर्ज दे देते हैं। तारीफ की बात यह भी है कि लोगों का यह भरोसा आज तक डिगा नहीं, बल्कि पूरी तरह बना हुआ है। दरअसल, इस गांव के लोगों के लिए भगवान सोमेश्वर की कसम से बड़ी कोई गारंटी नहीं है। खास बात यह है कि गांव में कोई एकदो नहीं, बल्कि कई साहूकार हैं, तभी तो इस गांव को साहूकार गांव या ‘लोन विलेज’ कहा जाता है। उत्तराखंड का यह साहूकार गांव गंगी

टिहरी गढ़वाल में है। गंगी गांव के बीचों-बीच भगवान सोमेश्वर का प्राचीन मंदिर है। उधार देने से पहले इसी मंदिर के प्रांगण में एक दीया जलाकर भगवान सोमेश्वर को साक्षी माना जाता है। गंगी गांव के लोगों ने सबसे अधिक धनराशि लोन के रूप में केदार घाटी में दी है। केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड, सोनप्रयाग, त्रिजुगीनारायण, सीतापुर और गुप्तकाशी जैसे बाजारों में सैकड़ों होटल, ढाबे, घोड़े-खच्चर और छोटे-बडे़ व्यवसायी गंगी गांव से उधार लेते आए हैं। कह सकते हैं कि केदार घाटी के बाजार की रौनक इस गांव के भरोसे ही है। वैसे केदार घाटी ही नहीं, बल्कि गंगोत्री और भिलंगना घाटी में भी इस गांव के लोगों ने काफी उधार दे रखा है। गढ़वाल के पूर्व आयुक्त एसएस पांगती कहते हैं, 'पहाड़ के सीमांत इलाकों में दर्जनों गांव ऐसे हैं, जो घरों में रुपए रखते हैं और पैसा उधार देते हैं।' वे बताते हैं कि गंगी गांव के लोग अपराधी नहीं हैं, टैक्स चोरी कर उन्होंने

कालाधन एकत्रित नहीं किया है, बल्कि अपनी मेहनत से कमाया है, जिसे वे उधार देते आए हैं। गंगी में उधार या कर्ज देने की इस परंपरा की जड़ में जाएं तो पता चलेगा कि गांव के पूर्वज पहले से कम धनराशि में अपना जीवनयापन करते थे। बचत के कारण उनके पास जो धनराशि जमा होती गई, उसे धीरे-धीरे दो प्रतिशत ब्याज पर देना शुरू कर दिया यानी एक लाख रुपए पर प्रतिवर्ष 24 हजार ब्याज लेते रहे हैं। इसी तरह धीरे-धीरे यह गांव साहूकार गांव के रूप में विकसित होता गया। पांगती बताते हैं कि गंगी गांव की अपनी अर्थव्यवस्था है। टिहरी जिले के इस गांव के लोग एक जमाने में केदार घाटी, गंगोत्री और तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। गंगी गांव के प्रधान नैन सिंह कहते हैं कि वे भेड़ पालन, आलू, चौलाई और राजमा को बेचने के बाद जो धनराशि बचाते हैं, उसे ही दो प्रतिशत ब्याज पर लोन दे देते हैं। आप गंगी

केदार घाटी के बाजार की रौनक इस गांव के भरोसे ही है। वैसे केदार घाटी ही नहीं, बल्कि गंगोत्री और भिलंगना घाटी में भी इस गांव के लोगों ने काफी उधार दे रखे हैं

दिलचस्प

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एक नजर

भगवान सोमेश्वर की कसम ही सबसे बड़ी गारंटी है

कर्ज लेने के लिए इस कसम के अलावा और कुछ आवश्यक नहीं सबसे अधिक धनराशि लोन के रूप में केदार घाटी में दी गई है

लोन लेने न सही, बल्कि इसे देखने भी आ सकते हैं। घनसाली से करीब 30 किमी की दूरी पर बसा है है यह गांव। यहां का घुत्तू कस्बा बेहद खूबसूरत है। घुत्तू से एक पैदल मार्ग पंवालीकांठा बुग्याल के लिए जाता है। दूसरा मार्ग भिलंगना घाटी में स्थित देश के अंतिम गांव गंगी के लिए निकलता है। प्राचीन समय में जब सड़कें नहीं थीं तब गंगोत्री से पैदल चलकर कर घुत्तू होते हुए केदारनाथ की यात्रा की जाती थी। उस दौर में घुत्तू पैदल यात्रा का केंद्रबिंदु हुआ करता था। घुत्तू से लगभग दस किलोमीटर कच्ची सड़क पर चलने के बाद रीहतोक पड़ता है। रीहतोक भी गंगी गांव का हिस्सा है। यहां से करीब दस किलोमीटर पैदल सफर कर गंगी गांव पहुचा जाता है। समुद्रतल से करीब 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगी को प्रकृति ने भी अनमोल खजाने से नवाजा है। गंगी गांव साहूकारी, खेती और पशुपालन के लिए जाना जाता है। गांव में भेड़-बकरी हर घर में पाली जाती है। पूरी भिलंगना घाटी में गंगी ऐसा गांव है, जहां सबसे अधिक खेती योग्य जमीन है। गांव की अधिकतर महिलाएं और पुरुष अनपढ़ हैं। नौनिहालों के लिए गांव में स्कूल तो हैं, लेकिन केवल खानापूर्ति के लिए ही बच्चे स्कूल जाते हैं। गंगी में पढ़ा रहे शिक्षक अजय पाल सिंह कहते हैं कि साक्षरता की दर यहां काफी कम है। गांव की आबादी इस समय 700 से अधिक है और करीब 140 परिवार इस गांव में रहते हैं। सर्दियों के मौसम में गांव के लोगों को खाने-पीने की चीजें पहले रखनी पड़ती हैं, क्योंकि बर्फबारी होने के बाद हालात काफी मुश्किल हो जाते हैं। दरअसल, पशुपालन और खेती ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बनाया है। बाजारों से दूर प्रकृति की गोद में रहने के कारण यहां स्थानीय लोगों का जीने का खर्च काफी कम होता है। यही वजह है कि स्थानीय लोगों के पास बचत में थोड़ा पैसा जमा होता रहता है। इसी पैसे को केदार घाटी और गंगी घाटी के लोगों को गंगी के लोग ब्याज पर देते रहे हैं। यहां के किसी भी व्यक्ति को अगर अचानक पैसे की जरूरत पड़ जाए तो लोगों को गंगी गांव की याद आती है। सोमेश्वर भगवान लेन-देन में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं तो देर-सबेर पैसा वापस आ ही जाता है। स्थानीय स्तर पर गंगी एक तरह से माइक्रो फाइनेंसिंग की भूमिका निभाता आ रहा है।


12 गुड न्यूज

24 - 30 जुलाई 2017

श्रावणी मेला

कांव​िड़यों की मदद के लिए एप्प

इस एप्प को देवघर जाने वाले 10 हजार शिवभक्त डाउनलोड कर चुके हैं। इसे 5 स्टार में से 4.7 रेटिंग मिली है करने के लिए कुछ अनुमति मांगेगा। आपको इसकी इजाजत देनी होगी इसके बाद एप्प आपके मोबाइल पर काम करने लगेगा। इसमें मेले से जुड़ी वह सारी जानकारियां हैं।

क्या-क्या सुविधाएं

श्रा

वण मेले में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बिहार में भागलपुर जिला प्रशासन ने एक एप्प लाॅन्च किया है। इस एप्प को अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों ने डाउनलोड किया है। वे इस एप्प की मदद से अपनी कांवड़ यात्रा सफल बना रहे हैं। इस एप्प के माध्यम से श्रद्धालु भागलपुर और सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा के दौरान ठहरने के लिए होटल और लॉज की तलाश आसानी से कर सकते हैं। लाइव कैमरे की मदद से ताजा तस्वीरें, तबीयत खराब होने पर इलाज के लिए

नजदीकी सुविधा केंद्र सहित कई आवश्यक जानकारी अपने मोबाइल पर प्राप्त कर सकते हैं।

कैसे करें डाउनलोड

इस एप्प को अपने मोबाइल फोन में डाउनलोड के लिए आपको प्ले स्टोर में जाकर श्रावणी मेले के एप्प को अपने मोबाइल पर डाउनलोड करना होगा। एप्प डाउनलोड करने के बाद जैसे ही आप इसे ओपन करेंगे, एप्प आपसे आपके मोबाइल को एक्सेस

इस एप्प को खोलते ही आपको सावन मेले की जानकारी मिलेगी। मेला कब से कब तक होगा, यह एप्प आपको किसकी पहल से मिल रहा है। इसके अलावा आप क्या करें और क्या न करें, इसकी पूरी जानकारी विस्तार से दी गई है। एप्प में पहला विकल्प सुरक्षित घाट का है। इसमें टैब करते ही आपके सामने एक मानचित्र आएगा, जिसमें सारी अहम जानकारी है। दूसरा विकल्प सूचना एवं संपर्क का है, इस विकल्प को टैब करते ही सारे संबंधित अधिकारियों

इस एप्प के माध्यम से श्रद्धालु भागलपुर और सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा के दौरान ठहरने के लिए होटल, लॉज की तलाश आसानी से कर सकते हैं

के फोन नंबर, थाना प्रभारी के मोबाइल नंबर कार्यालय और मोबाइल नंबर दोनों साझा किए गए हैं।

अपना लोकेशन देख सकते हैं

इस एप्प में आप अपना लोकेशन भी देख सकते हैं कि फिलहाल आप कहां हैं और आपको कितनी दूरी तय करनी है। एप्प में रहने के लिए सुविधाओं का भी एक विकल्प दिया गया है, जिसमें होटल और लॉज की पूरी जानकारी है। स्वास्थ्य केंद्र की भी जानकारी इसमें दी गई है। सुरक्षा के लिहाज से पुलिस थाने की पूरी जानकारी है। नियंत्रण कक्ष की जानकारी के साथ फोन नंबर भी साझा किया गया है। इसके अलावा अन्य टैब भी है, जिसमें कई और सुविधाओं को जोड़ा गया है।

रेटिंग

इस एप्प को 10 हजार से ज्यादा लोगों ने डाउनलोड किया है। इसे 5 स्टार में से 4.7 रेटिंग मिली है। कई लोगों ने एप्प सेंटर में अपना फीडबैक भी लिखा है। अलख रंजन लिखते हैं, ‘सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह शानदार एप्प है।’ विकास पांडेय लिखते हैं, ‘बहुत अच्छा और सरल एप्प है। इसके अलावा कई लोगों ने अच्छे और बेहतर जैसे विचार दिए हैं।

वन्य जीव संरक्षण

गैंडों की सुरक्षा के लिए दो वाच टॉवर

प. बंगाल के गोरूमारा नेशनल पार्क में रहने वाले गैंडों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने दो वाच टॉवरों का निर्माण किया है

कई देशस्तरोंमें परगैंडपहलों की कीसुरक्षाजा रहीके लिएहै। पश्लगातार चिम बंगाल

के गोरूमारा नेशनल पार्क में रहने वाले गैंडों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने दो वाच टॉवरों का निर्माण किया है। इन टॉवरों के जरिए वनकर्मी 24 घंटे गैंडों और अन्य वन्य प्राणियों पर निगरानी रख सकते हैं। गौरतलब है कि विगत 19 अप्रैल को गोरूमारा जंगल के गरातीबीच इलाके में दो सींग कटे गैंडे मृत मिले थे। इस घटना के बाद से ही वन्य प्राणियों की निगरानी तेज कर दी गई है। दरअसल, गैंडे मृत मिलने की घटना के बाद प्रदेश के वन मंत्री विनय कृष्ण बर्मन गोरूमारा पहुंचे थे। उनके निर्देश के मुताबिक ही गैंडों समेत वन्य प्राणियों की निगरानी बढ़ा दी गई है।

गैंडों की मौत के मामले की जांच से पता चला है कि उक्त घटना में असम के पशु तस्करों का हाथ था। इसके अलावा जिस रूट से गैंडों का शिकार करने के लिए तस्कर आए थे, उसका भी पता लगा लिया गया है। उल्लेखनीय है कि लातागुड़ी से चालसा जानेवाले 31 नंबर के राष्ट्रीय राजमार्ग के दाहिनी ओर गोरूमारा चेकपोस्ट तक और मूर्ति ब्रिज से शुरू होकर एनएच-31 के किनारे जलढाका ब्रिज तक के जंगल गोरूमारा नेशनल पार्क अंतर्गत आते हैं। गोरूमारा नेशनल पार्क 78.45 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। जानकारों की मानें तो गोरूमारा नेशनल पार्क के विपरीत दिशा में जलढाका नदी है, इसीलिए उस पर चौकस निगरानी रखना वनकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं

होता था। इसी खामी का शिकारियों के गिरोह ने भरपूर लाभ लिया। अब से जलढाका नदी की तरफ ही निगरानी तेज कर दी गई है। गोरूमारा वन्य प्राणी डिवीजन के सहायक वनाधिकारी राजू सरकार ने बताया कि वर्तमान में गोरूमारा नेशनल पार्क में छोटे-बड़े मिलाकर 52 गैंडे हैं। इन गैंडों का नामकरण इनकी शारीरिक बनावट के आधार पर किया गया है,

जैसे कानहेला, हारा सींग आदि। इसी के आधार पर वनकर्मियों को इन गैंडों से परिचित कराया जा रहा है, ताकि उन पर नजर रख सकें। वन मंत्री विनय कृष्ण बर्मन ने चेताया कि गोरूमारा के गैंडों की सुरक्षा में कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मंत्री ने गैंडों समेत अन्य वन्य प्राणियों की सुरक्षा को लेकर भी अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए हैं।


24 - 30 जुलाई 2017

खगोल

स्वास्थ्य शिक्षा

बनेगा नया मेडिकल काॅलेज

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खोज

मुख्यमंत्री ने नगालैंड मेडिकल कॉलेज की परियोजना संचालन समिति को काम तेजी से पूरा करने के लिए कहा

गालैंड में पहला मेडिकल कॉलेज खोलने को केंद्र ने अपनी मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री डॉ. शुरहोजिली लाइजेत्सु ने फ्रीबगाई में कॉलेज भवन के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए नगालैंड मेडिकल कॉलेज की परियोजना संचालन समिति को काम तेजी से पूरा करने के लिए कहा है। मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 200 से अधिक बिस्तर होंगे। इसके निर्माण में 189 करोड़ रुपए की लागत आएगी। यहां अकादमिक सत्र 2017-18 से शुरू होने की संभावना है। मेडिकल कॉलेज का क्षेत्रफल 130 एकड़ में होगा, लेकिन 40 एकड़ के बराबर भूमि मालिकों

के पास चली जाएगी। मुख्यमंत्री ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद को भी इस कार्य के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि परियोजना से प्रत्येक नगावासी का स्वप्न पूरा होने जा रहा है। (भाषा)

स्वच्छता मुंबई

गणपति पंडालों में बजेंगे स्वच्छता के गीत

मुंबई के गणपति पंडालों में स्वच्छता के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए स्वच्छता के गीत बजाए जाएंगे

गुड न्यूज

आनंद भारती

स बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान की गूंज गणेश पंडालों में भी सुनाई देगी। वहां कोई भाषण नहीं देगा और न दीवारों पर पोस्टर लगा कर उसे गंदा करेगा, बल्कि गीत के सहारे जागरुकता फैलाने का प्रयास किया जाएगा। दरअसल मुंबई महानगरपालिका ने गणेशोत्सव के लिए ऐसा गीत तैयार कराया है जो हर जगह बजेगा और लोगों को गुनगुनाने के लिए विवश कर देगा। पालिका को भरोसा है कि उस सुमधुर और प्रेरक गीत को सुनकर लोग स्वयं अपनी जिम्मेदारी महसूस करने लगेंगे। इस तरह की पहल मनपा के एक अधिकारी उदय शिरुरकर ने की है। गीत के माध्यम से मंुबई वासियों को प्लास्टिक थैलियों का प्रयोग न करने, घर, सड़क तथा आसपास को साफ़-सुथरा रखने के साथ-साथ कचरों का वर्गीकरण करने आदि का संदेश दिया

जाएगा। इस गीत की सीडी सभी गणेश पंडालों तक पहुंचाई जाएगी, ताकि गणपति का दर्शन करने आने वाले भक्त इसे सुनकर जागरूक हो सकें। इसके अलावा इसे एफएम पर भी बजाया जाएगा। गणपति समारोह 25 अगस्त को शुरू होगा जो 10 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाएगा।

भारत ने खोजा ‘सरस्वती’ नामक सुपरक्लस्टर

भारतीय खगोलविदों के दल ने सुदूर ब्रह्मांड में उपस्थित ‘सरस्वती’ नामक सुपरक्लस्टर की खोज की है

भा

रतीय खगोलविदों ने अब तक दुनिया के खगोलविदों की वैज्ञानिकों की आंखों से ओझल छोटी आकाशगंगाओं के एक समूह को खोज निकाला है। इसका नाम ‘सरस्वती’ रखा गया है। सरस्वती में तारामंडलों का अंबार है, इसीलिए इसे ‘सुपरक्लस्टर’ कहा जाता है, लेकिन खगोलविद इसे ‘छोटी आकाशगंगाओं का व्यापक समूह’ कहते हैं। पहली बार भारतीय खगोलविदों के दल ने सुदूर ब्रह्मांड में उपस्थित इस रहस्य की जानकारी दी है। ‘सरस्वती’ एक तरह से आकाशगंगाओं के महासागर की तरह है। यहां सभी दिशाओं में अरबों तारों के भंडार हैं। इनमें 43 आकाशगंगाएं हैं। इन्हीं का समूह ‘सरस्वती’ कहा जा रहा है। ‘सरस्वती’ ब्रह्मांड के नजदीक अब तक ज्ञात सबसे बड़ी संरचनाओं में से एक है। यह पृथ्वी से 4 अरब प्रकाश वर्ष दूर है। अनुमान है कि ‘सरस्वती’ के भीतर 2 करोड़ अरब से ज्यादा सूर्य जैसे विशाल पिंड हो सकते हैं। महाराष्ट्र के पुणे स्थित इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स-आईयूसीएए नामक स्वायत्त संस्थान के विशेषज्ञों ने इसका पता लगाया। ‘सरस्वती’ में आकाशगंगाओं और छोटे तारामंडलों के समूहों की श्रृंखला है। इसकी संख्या लाखों में है और इस समूचे क्षेत्र की फैलाव करोड़ों किलोमीटर में हो सकता है। ‘सरस्वती’ 600 मिलियन प्रकाश वर्ष के दायरे में फैला है।

क्या है सरस्वती सुपरक्लस्टर

भारत के खगोल‌विदों के विशि‌ष्ट समूह इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स ने सरस्वती को खोज निकाला। पुणे स्थित विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान के विशेषज्ञों ने भी इस खोज

अभियान में हिस्सा लिया। इस कार्य में अन्य दो भारतीय विश्वविद्यालयों का योगदान सामने आया है। आईयूसीएए भारत द्वारा स्थापित सूक्ष्म परमाणु तत्वों पर निरंतर गहन शोध के कार्य करता है। यह जानकारी हाल में प्रकाशित अमेरिका की अग्रणी पत्रिका ‘द एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल’ से मिली है। पत्रिका नवीनतम अनुसंधान और खोज आधारित लेखों, चित्रों और संबंधित आंकड़ो के लिए जानी जाती है। सरस्वती सुपरक्लस्टर के बारे में पता चला है कि यह लगभग 10 अरब वर्ष पुराना है। खगोलविद् बताते हैं कि दीर्घकालिक लोकप्रिय ‘कोल्ड डार्क मैटर’ का नमूना ब्रह्मांड के विकास को समझने में सहायक है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि ब्रह्मांड में मौजूद तारामंडलों जैसी छोटी संरचनाएं मिलकर बेहद व्यापक संरचना के रूप में दिखती हैं, लेकिन इस नमूने के अधिकांश प्रारूप मौजूदा ब्रह्मांड की मौजूदा आयु को लेकर सरस्वती सुपरक्लस्टर जैसे बेहद बड़ी संरचनाओं की सटीक भविष्यवाणी नहीं करते। इस तरह की निहायत व्यापक संरचनाओं की खोज के बाद खगोलविदों काे मान्यता देनी पड़ रही है कि ब्रह्मांड के बारे में अब तक सामने आए सिद्धांतों पर फिर से ध्यान देने की आवश्यकता है। बिग बैंग की उत्पत्ति के बाद ऊर्जा के एक समान कम या ज्यादा छितराव हुआ होगा। रोचक पहलू यह है कि आईयूसीएए के वर्तमान निदेशक सोमक रे चौधरी और शोधपत्र के सहलेखक, दोनों वैज्ञानिकों ने भी इतने बड़े पैमाने पर पहली बार व्यापक तारामंडलों का समूह खोजा है। इस अनोखे कार्य को कई दशक पूर्व कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अपने पीएचडी से जुड़े अनुसंधान कार्य को वैज्ञानिक भाषा में ‘स्टैपली कंसेंट्रेशन’ नाम दिया गया है। (भाषा)


14 गुड न्यूज

24 - 30 जुलाई 2017

जन-धन

रिकॉर्ड

जन-धन खातों में रिकॉर्ड रुपए

प्रधानमंत्री जन-धन योजना के अंतर्गत खुले खातों में अब तक रिकॉर्ड 64 हजार करोड़ हुए जमा

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी ‘प्रधानमंत्री जन-धन योजना’ सफलता की नई इबारत लिख रही है। जन-धन खातों में जमा पैसों का एक नया रिकॉर्ड बना है। एक आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि जन-धन खातों में

जमा पैसों का आंकड़ा 64,564 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो अब तक का रिकॉर्ड है। इनमें से 300 करोड़ रुपए नोटबंदी के पहले सात महीने में ही जमा हुए। प्रधानमंत्री मोदी की प्रमुख योजनाओं में एक

‘प्रधानमंत्री जन-धन योजना’ का उद्देश्य अब तक बैंकिंग सेवाओं से वंचित लोगों को बैंकिंग प्रणाली के दायरे में लाना है। इस योजना के तहत जीरो बैलेंस सुविधा वाले खाते खोले जाते हैं। वित्त मंत्रालय ने एक आरटीआई आवेदन पर यह जानकारी दी है। इसके अनुसार 14 जून, 2017 तक 28.9 करोड़ जन-धन खाते थे। इनमें से 23.27 करोड़ खाते सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जबकि 4.7 करोड़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में और 92.7 लाख

डिजिटल पंचायत

ढाई लाख पंचायतें ऑप्टिकल फाइबर से जुड़ेंगी

देश के 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को 2018 के मध्य तक ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने का लक्ष्य है

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द्र सरकार देश के सभी ग्राम पंचायतों को इंटरनेट सेवा से जोड़ने जा रही है। इसके लिए ‘भारत नेट योजना’ के तहत सभी ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। इस योजना के तहत देश के 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को 2018 के मध्य तक ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ देने का लक्ष्य है। जुलाई 2017 तक इस योजना के तहत एक लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जा चुका है। केंद्रीय कानून और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कहा कि केंद्र सरकार देश के सभी ग्राम पंचायत में इंटरनेट सेवा पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस योजना के तहत 2018 के मध्य तक देश

में 1.5 लाख ग्राम पंचायतों में ब्रॉडबैंड सेवा पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है इन गांवों को ऑप्टिकल फाइबर के माध्यम से जोड़ने की प्रक्रिया पर तेजी से काम चल रहा है। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इसे केंद्र सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय फाइबर ऑप्टिक्स कार्यक्रम के अंतर्गत पूरा किया जायेगा। अब तक एक लाख गांवों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है। इसके तहत करीब ढाई लाख ग्राम पंचायतों को जोड़ा जायेगा। उन्होंने कहा कि डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम के तहत आनेवाले तीन वर्षों में देश के छह करोड़ परिवारों को डिजिटल साक्षरता में सक्षम बनाया जाएगा। देश को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने की दिशा में मोदी सरकार किस तेज रफ्तार से काम कर रही है, इसका अंदाजा आपको इससे होगा कि 2011 में शुरू हुई। ‘भारत नेट योजना’ के तहत 2014 तक यूपीए शासनकाल के दौरान सिर्फ 358 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाया गया था, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले तीन वर्षों में 2,10,000 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर का जाल फैल चुका है। (एजेंसी)

निजी बैंकों में हैं। मंत्रालय का कहना है कि इन खातों में कुल 6,456 करोड़ रुपए जमा हैं। उनमें 50,800 करोड़ रुपए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जन-धन खातों में हैं, जबकि 11,663.42 करोड़ रुपए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और 2,080.62 करोड़ रुपए निजी बैंकों में हैं। 15 जुलाई तक के ताजा आंकड़ो के मुताबिक देश में 29.4 करोड़ जन-धन खाते खुल चुके हैं। (एजेंसी)

स्वच्छता हिमाचल प्रदेश

स्वच्छता अभियान को बल दे रहे होमगार्ड जवान

हिमाचल प्रदेश के नाहन में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में होमगार्ड के जवान सहयोग कर रहे हैं

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माचल प्रदेश के नाहन में गृह रक्षा विभाग (होमगार्ड) ने अनूठी पहल शुरू की है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में हाथ बढ़ाते हुए होमगार्ड के जवानों ने स्वच्छता का बीड़ा उठाया है। नाहन स्थित गृह रक्षा चतुर्थ वाहिनी के करीब 50 जवान सफाई अभियान में जुटे हैं। खास बात यह है कि ये जवान खुद तो सफाई कर ही रहे हैं, साथ ही आम लोगों को भी स्वच्छता का पाठ भी पढ़ा रहे हैं। होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट गुमान सिंह ठाकुर ने बताया कि होमगार्ड ने ऐतिहासिक सैरगाह विला राउंड व रानीताल पार्क को गोद ले लिया है और जवान इन स्थानों की समय-समय पर सफाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इन स्थानों को विशेष तौर पर विभाग द्वारा चुना गया है। उन्होंने बताया कि अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी समय-समय पर होम गार्ड के जवान सफाई कर रहे हैं साथ ही लोगों को भी स्वच्छता के बारे

में जागरूक भी करते हैं। ठाकुर ने इस पहल की सफलता को लेकर कहा कि महिला हो या पुरुष, सभी होमगार्ड जवान सफाई कार्यों में रुचि ले रहे हैं। होमगार्ड के जवानों का कहना है कि आला अधिकारियों के निर्देशानुसार वे समय-समय पर विभिन्न स्थानों की सफाई करते हैं और उन्हें यह कार्य बेहद अच्छा लगता है। जवानों का कहना है कि सफाई करके उन्हें खुद भी सुकून मिलता है। (एजेंसी)


24 - 30 जुलाई 2017

जैविक से बदला जीवन

कृषि

कंपोस्ट तकनीक

बुंदेलखंड के एक किसान ने कंपोस्ट बनाने की नई तकनीक सीखी तो उसके साथ कई जिलों के किसान खुशहाल हो गए

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एक नजर

लगातार असफलता से सीखा सफलता का मंत्र

कुछ सालों में बना जैविक खाद का बड़ा सप्लायर आज युवाओं को सिखाते हैं कंपोस्ट बनाने का तरीका

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श्रवण शुक्ला /लखनऊ

र-बार फसल में होने वाली खराबी ने उन्हें खेती छोड़ने पर मजबूर कर दिया। एक अनपढ़, ग्यासी अहिरवार के अस्तित्व का कोई मतलब नहीं था। उन्होंने जैविक खाद कंपोस्ट बनाने की नई तकनीक सीखी। एक साल में उन्होंने लाखों की कमाई करने वाला एक संयंत्र स्थापित किया। साथ ही इटली और जर्मनी के कृषि विशेषज्ञों के साथ स्वदेशी तकनीक भी साझा की। उनकी यह कहानी वास्तव में उन किसानों के लिए है, जो हमेशा अपनी फसल की पैदावार को लेकर चिंतित रहते हैं। यह कहानी यह भी दर्शाती है कि किस तरह कम समय में एक किसान करोड़ों रुपए कमा सकता है। बता दें कि बुंदेलखंड के ललितपुर जिले से 20 किलोमीटर दूर अलापुर गांव है, जहां के निवासी अहिरवार अब इस क्षेत्र में जैविक खाद के सबसे बड़े सप्लायर है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने उन्हें उनके संयंत्र में उच्च गुणवत्ता वाली खाद बनाने के लिए अग्रिम भुगतान किया है, जो एक एकड़ जमीन में फैली है। अपने व्यवसाय के विस्तार के साथ ही उन्होंने खेती को फिर से शुरू करने के लिए अतिरिक्त भूमि खरीदी। आज उनके पास 20 एकड़ जमीन है।

अधिक लाभ अर्जित करने के लिए वह जैविक सब्जी और अन्य फसलें भी उगाते हैं। उन्होंने देश में अपने जैविक उत्पादों के लिए विशेष जगह बनाई है। उनके द्वारा उगाई गई जैविक सब्जी की दिल्ली, उत्तराखंड, यूपी और मध्य प्रदेश में अत्यधिक मांग है। कुछ होटलांे ने जैविक सब्जियों की नियमित आपूर्ति के लिए किसानों के साथ करार किया है। अहिरवार कहते हैं कि ये सब्जियां आकार में बड़ी होती हैं और इनमें मीठे स्वाद के साथ ही अन्य प्राकृतिक अवयव भी शामिल होते हैं, जो आम तौर पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से खत्म हो जाते हैं। बता दें कि अहिरवार के लिए बुंदेलखंड में खेती करना आसान नहीं था। उद्योगों और नौकरी के अवसरों की कमी के कारण ही इस क्षेत्र की कुल आबादी का 80 प्रतिशत खेती पर निर्भर है। इस क्षेत्र में पीने के पानी और सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है। अधिकांश किसानों को सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अहिरवार भी दूसरे लोगों से अलग नहीं हैं, उन्हें भी फसल बोने और उस​की उपज के लिए ऋण लेना पड़ा था। तीन साल तक लगातार वह असफल

होते रहे। अहिरवार कहते हैं कि मुझे नहीं पता था कि क्या करना है, मैंने खेती करने का विचार छोड़ दिया। परिवार का भरण-पोषण उस समय मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल था। इसके साथ ही जिनसे हमने पैसे लिए थे वो अपने पैसे मांगने लगे और उनका ब्याज भी बढ़ता जा रहा था। इन सबके बावजूद मैंने हार नहीं मानी और वर्मीकंपोस्ट बनाने के लिए विभिन्न स्थानों से प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण लेने के बाद मैं अपने गांव लौट आया। गांव आकर हमने जैविक खाद बनाना शुरू किया और तीन महीने के अंदर ही हमने एक उच्च गुणवत्तायुक्त खाद तैयार की। उनके इस उपक्रम पर सबसे पहले घर वालों ने ही सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह जैविक खाद कौन खरीदेगा, लेकिन अहिरवार इसके लिए पहले से ही उत्तर प्रदेश के अलग अलग गांवों में जाकर मार्केटिंग योजना बना चुके थे। उन्होंने बाजार से कम कीमत पर बुंदेलखंड के बाहर किसानों को स्वदेशी-विकसित जैविक खाद बेचना शुरू किया। तीन महीनों के अंदर ही उनके पास इसके लिए नए आॅर्डर मिलने लगे। नए आॅर्डरों को बनाने के लिए उन्हें अपने उत्पादन में वृद्धि करनी पड़ी। अपनी सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने

अहिरवार की यह कहानी दर्शाती है कि किस तरह कम समय में एक किसान करोड़ों रुपए कमा सकता है

एक बैंक से 10 लाख रुपए का ऋण लिया, जिससे जैविक उर्वरक संयंत्र स्थापित किया, जैविक उर्वरक का उत्पादन कई गुना बढ़ गया। आज वह सभी प्रमुख सरकारी एजेंसियों, बड़े, छोटे किसानों और गैर-सरकारी संगठनों को खाद प्रदान करते हैं, जो रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के उपयोग को रोकने के लिए वर्मीकंपोस्ट को बढ़ावा दे रहे हैं। अहिरवार ने दावा किया कि उनके जैविक खाद में कीटनाशकों के रूप में कार्य करने के लिए सभी प्राकृतिक तत्व हैं। बता दें कि जो लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती। यह खाद फसलों को विभिन्न रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है। आज अहिरवार की वार्षिक आय 5 करोड़ रुपए से कम नहीं है। मध्य प्रदेश के लगभग 14 जिलों के किसान उनके नियमित ग्राहक हैं। अहिरवार कहते हैं कि लोग स्वाभाविक रूप से सब्जियों और फसलों का स्वाद खो चुके हैं, जो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थे। मैं उस स्वाद को वापस लाने के लिए जैविक उर्वरक विकसित करता हूं। मैं दूसरों को पारंपरिक खेती के लिए प्रोत्साहित करता हूं और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग को रोकता हूं, जो बढ़ती फसल के प्राकृतिक जायके को ही नहीं खत्म करते, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी कम कर देते हैं। जैविक उर्वरक संयंत्र और खेत-घर में काम करने के अलावा अहिरवार ने किसानों और गांव के युवाओं को जैविक खाद बनाने का भी प्रशिक्षण दिया है। 15 दिन के प्रशिक्षण के लिए वह केवल 500 रुपए शुल्क लेते हैं।


16 खुला मंच

24 - 30 जुलाई 2017

राजीव रंजन गिरि

‘जब तक कष्ट सहने की तैयारी नहीं होती, तब तक लाभ दिखाई नहीं देता। लाभ की इमारत कष्ट की धूप में ही बनती है’

लेखक गांधीवादी लेखक-विचारक और दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्याता हैं

कलम के सिपाही का विमर्श

-आचार्य विनोबा भावे

कोविंद का राष्ट्रपति चुना जाना

राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद के चयन से जुड़े हैं कई प्रेरक प्रतीकार्थ

देशबादकेसभी14वें काेराष्ट्रपतिधन्यवादचुने देजानेते हुएके

रामनाथ कोविंद ने कहा, 'राष्ट्रपति के पद पर मेरा चयन भारतीय लोकतंत्र की महानता का प्रतीक है।’ राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें 65.65 फीसदी मत हासिल हुए। जाहिर है राष्ट्रपति के तौर पर उनके नाम को लेकर देशभर के जन प्रतिनिधियों के बीच व्यापक समर्थन की स्थिति रही। चुनाव नतीजे आने पर कोविंद ने कहा, 'जिस पद का मान डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी जैसे महान विद्वानों ने बढ़ाया है, उस पद के लिए मेरा चयन मुझे बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास करा रहा है।' साफ है कि देश के अगले राष्ट्रपति उस श्रेष्ठ परंपरा से भलीभांति तो अवगत हैं ही वे विनम्रता के साथ कह भी रहे हैं कि वे इस उच्च परंपरा का भरसक निर्वाह करेंगे। वैसे कोविंद का राष्ट्रपति भवन पहुंचना इस लिहाज से भी अहम है कि उन्होंने एक अत्यंत सामान्य पृष्ठभूमि से देश के सबसे उच्च संवैधानिक पद की यात्रा पूरी की है। अपने निर्वाचन पर दिल्ली की बारिश और अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'दिल्ली में सुबह से बारिश हो रही है। बारिश का यह मौसम मुझे बचपन के उन दिनों की याद दिलाता है, जब मैं अपने पैतृक गांव में रहा करता था। घर कच्चा था, मिट्टी की दीवारें थीं, तेज बारिश के समय फूस की बनी छत पानी रोक नहीं पाती थी। हम सब भाई-बहन कमरे की दीवार के सहारे खड़े होकर इंतजार करते थे कि बारिश कब समाप्त हो। आज देश में ऐसे कितने ही रामनाथ कोविंद होंगे, जो इस समय बारिश में भीग रहे होंगे, कहीं खेती कर रहे होंगे, कहीं मजदूरी कर रहे होंगे। शाम को भोजन मिल जाए, इसके लिए पसीना बहा रहे होंगे। आज मुझे उनसे कहना है कि परौंख गांव का रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति भवन में उन्हीं का प्रतिनिधि बनकर जा रहा है।' निस्संदेह यह भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की ही देन है, जिसमें सामान्य से सामान्य व्यक्ति के लिए भी अवसरों के महाद्वार खुलते हैं।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

प्रेमचंद की कथासम्राट की छवि बड़ी है, पर इससे आगे वे बीसवीं सदी के ऐसे विमर्श पुरुष थे, जिनकी बातें आज भी गौर से सुनी जानी चाहिए

प्रे

मचंद को लेकर जब यह कहा जाता है कि वे ‘कलम के सिपाही’ या ‘कथासम्राट’ थे, तो उनके जीवन और अवदान का एक बड़ा पक्ष सामने आने से रह जाता है। निस्संदेह वे बड़े कथाकार थे, पर इससे आगे वे बीसवीं सदी के ऐसे विमर्श पुरुष थे, जिनकी बातें आज भी गौर से सुनी जानी चाहिए। तुलनात्मक तरीके से भले न सही, पर उनके जीवन और अवदान को समझने के लिए हम गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का उदाहरण सामने रख सकते हैं। प्रेमचंद की प्रासंगिकता को चिन्हित करते हुए उनके कथा संसार से बाहर उनके सामाजिकसांस्कृतिक विमर्शों को भी रेखांकित करने की जरूरत है। यह दरकार इसीलिए प्रेमचंद जयंती (31 भी जरूरी है, क्योंकि जिस प्रगतिशील चिंतन और लेखन धारा से उन्हें जोड़कर या उसके सूत्रधार के तौर पर हम देखते हैं, वह धारा अब काफी क्षीण हो गई है। निश्चित तौर पर प्रेमचंद का देशकाल आज बदल गया है, पर अन्याय और शोषण से जुड़े जिन बुनियादी मानवीय सरोकारों पर उन्होंने अपना विमर्शी स्वर बुलंद किया था, वह आज भी सुनी जानी चाहिए। उन्होंने 19वीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक भारत में फैली तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलाई। देश की स्वतंत्रता के प्रति उनमें अगाध प्रेम था। चौरीचौरा कांड के ठीक चार दिन बाद 16 फरवरी 1921 को प्रेमचंद ने भी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दिया था। इसी तरह 11 अगस्त 1908 को जब 15 वर्षीय क्रांतिकारी खुदीराम बोस को अंग्रेज सरकार ने निर्ममता से फांसी पर लटका दिया तो प्रेमचंद के अंदर का देश प्रेम हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाए और कमरे की दीवार पर टांग दी। खुदीराम बोस को फांसी दिए जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी पहली कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून की वह आखिरी बूंद जो देश की आजादी के लिए गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’ प्रेमचंद की इस मुखरता को समझने के लिए तब के

साहित्यिक परिदृश्य को भी समझना जरूरी है। कलम के इस सिपाही ने जब अपनी रचनात्मक सक्रियता बढ़ाई तो वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे साहित्यशिल्पी उस समय चरम पर थे। प्रेमचंद का इन लोगों की रचनाधर्मिता से कोई सीधा विरोध नहीं था, पर उन्हें लगा कि जो हालात हैं, उनमें छायावादी नहीं, बल्कि अभिधावादी तरीके से बात करनी जरूरी है। नतीजतन उन्होंने तब के समाज में व्याप्त छुआछूत, सांप्रदायिकता, हिंदू-मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत मुद्दों से खुद को जोड़ा। एक लेखक से परे भी उनकी चिंताएं थीं जो उनकी जुलाई) पर विशेष रचनाओं में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। अपने जीवन संघर्षों से प्रेमचंद ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था कि प्रेमचंद ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अंदर से उतने ही विचलित। वस्तुत: प्रेमचंद ऐसे राष्ट्र-राज्य की कल्पना करते थे, जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का। प्रेमचंद का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और सांप्रदायिक-वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जिसमें समता सर्वोपरि हो। यही कारण है कि 1933 में जब संयुक्त प्रांत के गवर्नर मालकम हेली ने कहा, ‘जहां तक भारत की मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिए जवाबदेह हो।’ प्रेमचंद ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा, ‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुजरा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’ प्रेमचंद ने अस्पृश्यता की समस्या को दूर करना सामाजिक समता के लिए अहम बताया। परंपरागत वर्णाश्रम व्यवस्था के संबंध में उन्होंने लिखा, ‘भारतीय राष्ट्र का आदर्श मानव शरीर है जिसके मुख, हाथ, पेट और पांव- ये चार अंग हैं। इनमें से

अपने जीवन संघर्षों से प्रेमचंद ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं और हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता


24 - 30 जुलाई 2017

शशांक गौतम

किसी भी अंग के अभाव या विच्छेदन से देह का अस्तित्व निर्जीव हो जाएगा।’ प्रेमचंद अपने समय के सबसे बड़े नायक के सामाजिक सुधार के साथ भी लगातार कदमताल करते दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने 1932 में महात्मा गांधी द्वारा मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन के विरोध में किए गए आमरण अनशन का समर्थन किया और गांधी जी के इन विचारों का भी समर्थन किया कि हिंदू समाज के लिए निर्वाचन की चाहे जितनी कड़ी शर्तें लगा दी जाएं, पर दलितों के लिए शिक्षा और जायदाद की कोई शर्त न रखी जाए और हरेक दलित को निर्वाचन का अधिकार हो। इसे वह प्रगतिशील समाज रचना में एक बड़ी बाधा मानते थे कि समाज के एक तबके को हर तरह के शोषण और अन्याय का शिकार बनाया जाए। उन्होंने दलितों के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के पट नहीं खोलने पर कहा, ‘विश्वनाथ किसी एक जाति या संप्रदाय के देवता नहीं हैं, वह तो प्राणी मात्र के नाथ हैं। उन पर सबका हक बराबर-बराबर का है।’ शास्त्रों की आड़ में दलितों के मंदिर प्रवेश को पाप ठहराने वालों को जवाब देते हुए प्रेमचंद ने ऐसे लोगों की बुद्धि व विवेक पर सवाल उठाया और कहा, ‘विद्या अगर व्यक्ति को उदार बनाती है, सत्य व न्याय के ज्ञान को जगाती है और इंसानियत पैदा करती है तो वह विद्या है और यदि वह स्वार्थपरता व अभिमान को बढ़ावा देती है, तो वह अविद्या से भी बदतर है।’ राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक देश में हिंदूमुस्लिम एका की नींव गहरी और मजबूत नहीं होगी। प्रेमचंद इस बात को बहुत पहले समझ चुके थे। वे इस बात से तो संतुष्ट दिख रहे थे कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में दोनों धर्मों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर सड़कों पर निकले और आत्मोत्सर्ग की बड़ी मिसालें पेश कीं। पर वे यह भी देख रहे थे कि समाज में इन दोनों धर्मों के लोगों के बीच दूरियां भी हैं, जिन्हें समय रहते पाटने की जरूरत है। ऐसा कहते हुए वे एक-दूसरे की संस्कृति और परंपरा को भी पर्याप्त आदर देने की वकालत कर रहे थे। उन्होंने एक दूसरे के धर्म का परस्पर आदर करने पर जोर देते हुए कहा, ‘हिंदू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न होंगे और न होने चाहिए। दोनों की पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी।’ दरअसल, साहित्य से इतर सामाजिक विमर्शों में प्रेमचंद के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिंदा हैं। प्रेमचंद जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चित रूप से इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद में सोए इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है, जिन्हें प्रेमचंद ने काफी पहले मुखरता से रेखांकित किया था। समता और सौहार्द के साथ उच्च सामाजिक परंपरा का निर्माण और निर्वाह उनके सपनों के भारत में रंग भरते थे। इन रंगों की कमी आज भी भारतीय समाज के बीच कलम के इस दुर्धष योद्धा को सबसे जरूरी विमर्शी पुरुष के तौर पर चिह्नित करती है।

खुला मंच

लेखक विधिक एवं सामाजिक मामलों के जानकार हैं और एक दशक से विभिन्न सामाजिक संस्थाअों से संबद्ध हैं

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जीत फेडरर की, संन्यास बार्तोली का

28 साल की उम्र में फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली के रिटायरमेंट की घोषणा ने सबको चौंकाया

स बार विंबलडन टाइटल जीता है स्विटजरलैंड के रोजर फेडरर ने, लेकिन मीडिया में यह खबर महज इस तरह नहीं आई। दरअसल, फेडरर के विंबलडन जीतने के साथ ज्यादा दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने आठवीं बार विंबलडन टाइटल जीता और वह भी 36 साल की रिकाॅर्ड उम्र में। पर यह फेडरर की जिजीविषा ही थी, जिसने कोर्ट पर उनकी वापसी करवाई और उन्हें बना दिया चैंपियंस का भी चैंपियन। फेडरर का यह 19वां ग्रैंडस्लैम खिताब है। अलबत्ता खेल और उससे जुड़े करियर में एक अहम एंगल जेंडर का भी है। इस बात को समझने के लिए चार साल पहले एक करामाती महिला विंबलडन खिलाड़ी के अचानक संन्यास की घोषणा से जुड़ी कुछ बातों को याद करना जरूरी है। दरअसल हम बात कर रहे हैं फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली की, जिसने 28 साल की उम्र में संन्यास की घोषणा करके सबको चौंका दिया था। एक बड़ी सफलता पाना और फिर पूरी होड़ से बाहर हो जाना, यह अस्वाभाविकता किसी के गले नहीं उतर रही थी। फ्रांस की इस टेनिस स्टार ने भी संन्यास से पहले विंबलडन में महिला एकल का खिताब अपने नाम किया था। लोगों की निगाहें उसकी इस जीत के बाद इस बात पर थी कि क्या बार्तोली यूएस ओपन में भी अपनी जीत का सिलसिला बनाए रख पाएंगी? लोग अभी इस बारे में कयासबाजी में ही लगे थे कि बार्तोली ने खेल से संन्यास लेने का फैसला कर सबको चौंका दिया। यूरोपियन मीडिया में इस पर काफी कुछ लिखा-कहा गया, पर बार्तोली ने इस बारे में सिर्फ इतना कहा है,'मैंने यह फैसला आसानी से नहीं लिया है।’ फैसला लेने की जो बड़ी वजह बार्तोली ने बताई,

वह चोट और दर्द से बढ़ी परेशानी थी, पर लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि वजह इतनी भर होगी। कुछ और बातें भी इस दौरान चर्चा में आईं। विंबलडन में बार्तोली के मैदान में उतरने से करीब घंटे भर पहले बीबीसी के कमेंटेटर जॉन इनवरडेल ने एक भद्दी टिप्पणी की। इनवरडेल ने कहा, 'वह कम से कम अपनी सुंदरता के लिए तो नहीं जानी जाएंगी।’ बाद में इस मामले में बीबीसी को बार्तोली से माफी मांगनी पड़ी। एक 28 साल की महिला के खेल जीवन की सार्वजनिक प्रताड़ना और मानसिक रूप से ठेस पहुंचाने के मौके कितने आते होंगे, यह इस प्रकरण से जाहिर है। फ्रांस की इस स्टार टेनिस खिलाड़ी ने जरूर कहा कि उसने शरीर पर कई चोट और दर्द से आजिज आकर टेनिस रैकेट रखा है। पर मुमकिन है कि उसके मन पर और भी कई घाव हों। खेल और ग्लैमर का साझा आज के दौर में जरूरी हो गया है। इसकी अवहेलना करके कोई आगे बढ़ना चाहेगा

सबसे ऊपर राष्ट्रवाद

सुलभ स्वच्छ भारत’ के 17-23 जुलाई, 2017 के अंक में लेख शीर्षक ‘भारतीय भाल पर चमकता तिलक’ प्रेरणास्पद आलेख है। स्वतंत्रता के लिए आंदोलनरत तिकड़ी के रूप में ‌लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल की चर्चा भारतीय समाज में होती ही रहती है। इन तीन विभूतियों से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार खौफ खाती थी। इन तीनों ने अपने दौर में समाज को एकसूत्र में बांधे रखने का जिस तरह प्रयास किया, लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव, विपिन पाल ने दुर्गा पूजा और लाला लाजपत राय ने रामलीला के आयोजन के सहारे उस दौर के भारतीय समाज को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए गतिशील बनाया। कमल पंत, पौड़ी, उत्तराखंड

तो शायद वह उसी हश्र तक पहुंचेगा जहां बार्तोली पहुंची हैं। हालांकि ऐसे किसी निष्कर्ष पर बार्तोली खामोश रहीं। आम महिला टेनिस खिलाड़ियों के मुकाबले थोड़े ठिगने कद की बार्तोली का जन्म दो अक्टूबर 1984 को हुआ। 16 साल की उम्र में उसने यह तय कर लिया कि उसकी जिंदगी का मैदान टेनिस कोर्ट ही होगा। इससे पहले उसके पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे। बाद में पिता को भी बार्तोली का फैसला सही लगा। पिता ही उसके टेनिस कोच बने। पिता और बेटी का गुरु-शिष्या का संबंध बेटी के खेल जीवन को अलविदा कहने तक जारी रहा। इस शिखर आरोहण में जिस एक बात से बार्तोली हमेशा दूर रही, वह थी ग्लैमर और गॉसिप की दुनिया। उनसे जब इनवरडेल की टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उसने न चाहते हुए भी कह दिया कि वह मॉडल अगर बन नहीं सकतीं तो बनना चाहती भी नहीं। उसे चैंपियन बनना था और वह उसने बनकर दिखा दिया। गौरतलब है कि इनवरडेल ने अमर्यादित तरीके से बार्तोली के चेहरे और कद के साथ पैरों तक पर अमर्यादित टिप्पणी की थी। कहना न होगा कि इस स्टार टेनिस खिलाड़ी के संन्यास ने खेल और पुरुष मानसिकता के बीच महिला अस्मिता की सुरक्षा के मुद्दे को कुछ समय के लिए जरूर चर्चा में ला दिया, पर बदला कुछ नहीं। फेडरर की जीत और उसकी बढ़ी उम्र को जो लोग साझी कामयाबी के तौर पर देखते हैं, उन्हें फेडरर के संन्यास से ज्यादा बार्तोली के संन्यास में दिलचस्पी लेनी होगी, क्योंकि इस दिलचस्पी के सरोकार हमारे समय में जारी लैंगिक दुराग्रह और गैरबराबरी से जुड़े हैं।

खिलाड़ियों को मिले श्रेष्ठ वातावरण

सुलभ स्वच्छ भारत’ के 17-23 जुलाई, 2017 के अंक में अनेक लेख पढ़ने को मिले। इस बार न्यूजमेकर में पीवी सिंधू और जोबा मुर्मू पर प्रेरक सामग्री थी। रियो ओलंपिक खेलों में रजत पदक से विभूषित सिंधू का साल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में चयन संकेत देता है कि भारत में लड़कियों की खेल प्रतिभा को अगर और तराशा जाए, तो ये बेहतर कर सकती हैं। ओलंपिक, एशियाई या राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के सितारों को विशिष्ट माहौल में लगातार रखा जाना चाहिए, तभी खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पाएंगे। संजय कुमार मिश्र, भोजपुर, बिहार


18 फोटो फीचर

24 - 30 जुलाई 2017

मेगा टेक्सटाइल ट्रेड फेयर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा मंदिर, गांधीनगर में भारत के पहले मेगा टेक्सटाइल ट्रेड फेयर - टेक्सटाइल इंडिया 2017 का उद्घाटन किया

फोटा​ेः शिप्रा दास

मेले में यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, तुर्की और आस्ट्रेलिया आदि देशों के अलावा भारत के विभिन्न राज्यों असम, कर्नाटक, झारखंड और आंध्र प्रदेश पर केंद्रित और क्षेत्र विशेष पर आधारित थीम पैवेलियन बनाए गए थे


24 - 30 जुलाई 2017

फोटो फीचर

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केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने अपने संबोधन में ऐसे कार्यक्रमों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा व्यापार मेला, वस्त्रों, परंपराओं और तकनीक को एक छत के नीचे लाता है। इस तरह के व्यापार मेले प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ स्वप्न को पंख लगा देते हैं


20 पर्यावरण

24 - 30 जुलाई 2017

विश्व बैंक रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भारत सबसे आगे वि

विश्व बैंक ने जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध भारत के प्रयासों की जमकर तारीफ की है

श्व बैंक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत अग्रणी देश बनकर उभर रहा है। उसने कहा कि एशियाई देशों में ऊर्जा स्रोत के तौर पर सौर ऊर्जा धीरे-धीरे कोयले का स्थान ले रही है। विश्व बैंक ने हाल ही में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में कहा, ‘अपने लोगों को 2030 तक चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराने के लिए सौर ऊर्जा की ओर प्रतिबद्धता, नवोन्मेषी समाधान और ऊर्जा दक्षता पहलों के साथ भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अग्रणी बनकर उभर रहा है।’ विश्व बैंक के अनुसार, अपनी वृद्धि को बढ़ाने के लिए और अधिक स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल करने की पसंद के साथ ही भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से धरती को बचाने के वैश्विक प्रयासों में योगदान दे रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ सप्ताह पहले देश ने कोयले से चलने वाले 14 गीगावॉट क्षमता वाले बिजली संयंत्र स्थापित करने की योजना से कदम पीछे खींच लिए, क्योंकि अब सौर ऊर्जा से बिजली पैदा करने में वहन करने योग्य लागत आती है। रिपोर्ट में इस संबंध में भारत के प्रयासों की प्रशंसा की गई है। बैंक ने कहा कि भारत में ऊर्जा के स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा कोयले की जगह ले रही है। उसने कहा कि सौर फोटोवॉल्टेक (पीवी) से बिजली पैदा करने की लागत वर्ष 2009 के मुकाबले एक-चौथाई कम है और वर्ष 2040 तक इसके 66 फीसदी तक और

महाराष्ट्र विकास

महाराष्ट्र को मिली पर्यावरण संबंधी मंजूरी

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने महाराष्ट्र को इस बात की छूट दी है कि उसे डेढ़ लाख वर्गमीटर में विकास कार्यों के लिए अलग से मंजूरी लेने की जरूरी नहीं है

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कम होने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में एक साल में करीब 300 दिन धूप निकलती है, इसीलिए भारत में सौर ऊर्जा का लाभ उठाने और इसका इस्तेमाल करने के लिए दुनिया में सबसे अच्छी परिस्थितियां हैं। विश्व बैंक ने कहा कि भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी परियोजनाएं बनाई हैं जिसमें वर्ष 2022 तक पवन चक्की और सौर ऊर्जा से 160 गीगावॉट तक बिजली पैदा करने का लक्ष्य शामिल है। इससे न केवल लाखों लोगों के घरों में रोशनी होगी, बल्कि बच्चे रात को पढ़ाई भी कर पाएंगे। लोग अपने खाने को रेफ्रीजिरेटर में संरक्षित कर पाएंगे या टीवी पर अपना मनोरंजन कर पाएंगे। बैंक ने कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत के सौर बाजार में निवेश करने का भी अच्छा मौका है। (एजेंसी)

द्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने महाराष्ट्र के विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। इसके अनुसार अब डेढ़ लाख वर्ग मीटर तक बनने वाले क्षेत्र के निर्माण कार्यों के लिए उसे केंद्र से अलग से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। इस फैसले के मुताबिक पुणे और कोंकण क्षेत्र में होने वाले डेढ़ लाख वर्ग मीटर तक के निर्माण कार्यों को पर्यावरण अनुमति डीसीआर नियमों के तहत महानगरपालिकाएं, नगरपालिकाएं और विशेष नियोजन प्राधिकरण से ही मिल सकेगी। केंद्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने यह फैसला महाराष्ट्र के शहरी विकास मंत्रालय द्वारा भेजे गए एक प्रस्ताव पर लिया है। इस प्रस्ताव में केंद्रीय अनुशंसा न मिलने के कारण अटके पड़े निर्माण कार्यों की बाधाएं दूर करने के लिए एक मसौदा और दिशा-निर्देश

नदी

प्रस्तावित थे। मंत्रालय ने इस प्रस्ताव का अध्ययन करने के बाद यह यह महत्वपूर्ण फैसला लिया है। केंद्र ने इस फैसले के साथ ही अनिवार्य शर्तें भी लगाई हैं, जिनका पालन स्थानीय निकायों को पर्यावरण से संबंधित अनुशंसा के समय करना होगा। इसमें सबसे प्रमुख शर्त यह है कि पर्यावरण से पहले स्थानीय निकायों, जिनमें महानगरपालिकाएं, नगरपालिकाएं और विशेष नियोजन प्राधिकरण शामिल हैं, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी पर्यावरण संरक्षण के दिशा निर्देशों का पालन और निगरानी सुनिश्चित करेंगे। इसके लिए महाराष्ट्र सरकार को महाराष्ट्र रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एक्ट (एमआरटीपी) और डेवलपमेंट कंट्रोल रेग्यूलेशन (डीसीआर) के साथ-साथ पर्यावरण अनुशंसा की शर्तों को जोड़ना होगा। (भाषा)

संरक्षण

नदियों को बचाने आगे आए फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मुंबई की नदियों को नया जीवन देने के लिए कदम उठाने का फैसला किया है

आनंद भारती

के बीचों-बीच मौजूद चार नदियों मुबईकों नयाशहर जीवन देने के प्रयासों को मुख्यमंत्री

देवेंद्र फडणवीस ने और भी गति देने की अपील की है। पिछले तीन-चार वर्षों से कुछ निजी संगठनों ने अपने स्तर से उनके पुनरुज्जीवन की दिशा

में ठोस काम शुरू किया है। स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भी उनका साथ दिया है। जागरुकता के लिए ‘रिवर मार्च’ भी किया गया, जिसका अच्छा परिणाम मिला है। अब स्वयं मुख्यमंत्री ने पहल करते हुए अपने आवास पर बैठक बुलाई। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मुंबई की चारों नदियों-मिठी, दहिसर, पोईसर और ओशिवारा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाने

की योजना शीघ्र तैयार कर उसे अमल में लाया जाए। बैठक में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई कि इन नदियों के उद्गम स्थल के पास गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण, धोबी घाट और तबेले के कारण नदियां ज्यादा गंदी हुई हैं। नदियों में फेंके जाने वाले कचरे, फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकल, प्लास्टिक की थैलियों की भरमार, खुले में शौच और शहर के नालों ने नदियों को बदरंग और दूषित कर दिया है। इसके साथ ही नदियों के किनारे हुए अतिक्रमण ने उनकी चौड़ाई को छोटा कर दिया है। कहा गया कि पहले कभी इन्हीं नदियों से मुम्बई

को पीने का पानी मिलता था। नदियों को स्वच्छ करने के रास्ते में आने वाली कठिनाइयों पर भी विस्तार से बातचीत हुई। उम्मीद की जा रही है कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप और उनके सकारात्मक पहल से नदियों को एक बार फिर पुनरुज्जीवन में सफलता मिलेगी। बैठक में विधायक योगेश सागर, अतुल भाताखलकर, मनीषा चौधरी, मनपा आयुक्त अजय मेहता, वन संरक्षक एन. वासुदेवन, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण महामंडल के सचिव डॉ. पी. एन. अनबलगन सहित कई महत्वपूर्ण अ​िधकारी शामिल थे।


24 - 30 जुलाई 2017

फ्रांस पर्यावरण

पर्यावरण

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उज्ज्वला योजना

फ्रांस की सड़कों पर चलेंगी इलेक्ट्रिक गाड़ियां

पेरिस जलवायु समझौते के तहत फ्रांस ने फैसला किया है कि 2040 के बाद वहां डीजल और पेट्रोल वाली गाड़ियां नहीं चलेंगी

फ्रां स2040दुनियातककाडीजलऐसा औरपहलापेदेट्रोशल हैसे, जिसने चलने

वाली गाड़ियों पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। पर्यावरण मंत्री निकोलस ह्यूलट ने पेरिस जलवायु समझौते के तहत अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए यह ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसके साथ ही निकोलस ने वर्ष 2050 तक फ्रांस को कार्बन मुक्त बनाने की घोषणा भी की है। निकोलस ह्यूलट ने कहा कि यह निर्णय लेना और इस पर अमला करना इतना आसान नहीं है। इस फैसले से कंपनियों को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा, लेकिन मुल्क के भले के लिए यह जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह ऐलान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के उस संकल्प के बाद लिया गया है, जिसमें उन्होंने ‘मेक द प्लैनेट ग्रेट अगेन’ की बात कही थी। इससे पहले भी कई देश ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने लक्ष्य निर्धारित करते हुए पेट्रोल, डीजल

और गैस से चलने वाली गाड़ियों के उत्पादन और बिक्री पर रोक लगा चुके हैं। यहां की सरकारें बैट्री से चलने वाली इलेक्ट्रिक कारों को बढ़ावा दे रही हैं। चीन में वोल्वो का स्वामित्व वाली गिली ने भी ऐलान किया है कि 2021 तक पांच इलेक्ट्रॉनिक कारें लाॅन्च करेगा। भारत में भी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय समय समय पर ऐतिहासिक फैसले देता रहा है। मार्च में उच्चतम न्यायालय ने बीएस-3 वाहनों की बिक्री पर रोक लगाने का महत्वपूर्ण आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सड़क पर आने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती। इससे पहले जुलाई, 2016 में भी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 साल पुरानी डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध के आदेश दिए थे। इस आदेश पर अब सख्ती से अमल हो गया है। (एजेंसी)

पर्यावरण अभियान

पर्यावरण के लिए वनकर्मियों का अभियान

त्तर प्रदेश के वन कर्मचारी लोगों को पर्यावरण को बचाने के लिए प्रेरित करेंगे। इसके लिए कर्मचारियों ने स्वयं प्रयास भी शुरू कर दिया है। संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि वृक्ष विकास में बाधक नहीं हैं, बल्कि उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियों के तहत प्राकृतिक संसाधनों की लूट बाधक है। भौतिक सुखों के लिए हम संपूर्ण

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यावरण को बिगाड़ कर अपने लिए समस्याएं पैदा कर रहे हैं। विभाग के कर्मचारी नेता जोगेंद्र करौंथा ने कहा कि वे लोग जन जागरण अभियान चलाकर आम जनता से प्राणी जगत को बचाने और वनों तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए अपील करेंगे। (भाषा)

उज्ज्वला योजना पर्यावरण संरक्षण में कारगर

कम वोल्टेज रहने पर भी इनके द्वारा सही ढंग से प्रकाश का उत्सर्जन किया जाता है। इनके दाम बाजार में भी कम हैं। इनके खराब होने की स्थिति में तीन वर्ष की मुफ्त प्रतिस्थापन वारंटी भी दी जाती है

त्तीसगढ़ में ‘उज्ज्वला योजना’ के मोदी ने की। अंतर्गत वितरित किए जा रहे एलईडी योजना के अंतर्गत कम कीमत पर एलईडी लैंप, ट्यूबलाइट एवं पंखे से बिजली बचत का बल्ब, ट्यूबलाइट एवं पंखे उपलब्ध कराए जा बड़ा लाभ बिजली उपभोक्ताओं को मिल रहा रहे हैं। पूरे देश में अब तक लगभग 25 करोड़ है। यह योजना पर्यावरण एवं बिजली बचाने बल्ब वितरण किये जा चुके हैं। में भी कारगर सिद्ध हो रही है। इसे देखते हुए एलईडी लैंप, ट्यूबलाइट और फैन विभिन्न शहरों में पुरानी स्ट्रीट लाइट को नई को विद्युत उपभोक्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर एलईडी स्ट्रीट लाइट में परिवर्तित करने की स्वीकार किए जा रहे हैं। डीजीएम मिश्रा के अभिनव पहल की गई है। मुताबिक, कम वोल्टेज इसका क्रियान्वयन छत्तीसगढ़ में 80 लाख से रहने पर भी इनके द्वारा छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर अधिक एलईडी लैंप, 20 सही ढंग से प्रकाश डिस्टीब्यूशन कंपनी एवं उपलब्ध होता है। साथ हजार से अधिक पं ख े एवं ईईएसएल के माध्यम से ही, इनके दाम बाजार 80 हजार तक ट्यूबलाइट में बिक रहे उपकरणों प्रदेश भर में युद्ध स्तर पर किया जा रहा है। इस वितरित किए जा चुके हैं की तुलना में कम हैं। बात की जानकारी पॉवर इन बल्बों के खराब कंपनी के उपमहाप्रबंधक होने की स्थिति में तीन (जनसंपर्क) विजय मिश्रा ने दी। श्री मिश्रा ने वर्ष की मुफ्त प्रतिस्थापन वारंटी भी दी जाती बताया कि देशभर में उज्ज्वला योजना के है। ये उपकरण पर्यावरण संरक्षण में भी दक्ष क्रियान्वयन का भार ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड है। एलईडी उपकरण के उपयोग से प्रदेश में (एनर्जी एफिशिएंसी सर्विस लिमिटेड) को सौंपा प्रतिवर्ष 8 लाख 44 हजार टन से अधिक कार्बन गया है। डाइ आॅक्साइड उत्सर्जन में कमी का आकलन इस संस्था द्वारा पॉवर वितरण कंपनी के किया गया है। रायपुर में विभिन्न उपकेंद्रों, साथ मिलकर अब तक छत्तीसगढ़ में 80 लाख एटीपी मशीन सेंटर सहित पॉवर वितरण कंपनी से अधिक एलईडी लैंप, 20 हजार से अधिक मुख्यालय के मेन गेट पर एलईडी बल्ब, पंखे एवं 80 हजार तक ट्यूबलाइट वितरित ट्यूबलाइट और पंखे का बेचे जा रहे हैं। इन्हें किए जा चुके हैं। यह भारत सरकार की योजना खरीदने के लिए उपभोक्ताओं में भारी उत्साह है। इसकी शुरुआत 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र देखा जा रहा है। (भाषा)


22 गुड न्यूज

24 - 30 जुलाई 2017

बीमार बच्चों की दुनिया में शीतल मुस्कान प्रेरक पहल

अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे बीमार बच्चों की जिंदगी में खुशी और उम्मीद का रंग बिखेर रही क्लाउनसेलर्स की टीम

एक नजर

जेएनयू और डीयू से उच्च शिक्षा लेने वाली शीतल ने की शुरुआत

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एसएसबी ब्यूरो

सी कवि-नाटककार ब्रेख्त ने जीवन के कई मर्मस्पर्शी चित्र अपने शब्दों में बयां किए हैं। वे पूरी दुनिया में पढ़े और सराहे भी जाते हैं। पर अपनी लेखन और संवेदना से जुड़ी उनकी एक बात बहुत दिलचस्प है। उन्होंने एक जगह लिखा है कि बीमार आदमी और विशेष रूप से रुग्ण बच्चे के बारे में बताना, उनकी शारीरिक-मानसिक स्थिति को शब्द देना किसी भी साहित्यकार के लिए बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि विश्व साहित्य में ऐसे पात्र बहुत कम हैं। दरअसल, ब्रेख्त जो बात कह रहे हैं, वह समझी जा सकती है। विशेष रूप से जब कोई बच्चा बीमार होकर घर से अस्पताल भर्ती होता है तो उसके लिए तो पूरी दुनिया ही बदल जाती है। उसके साथ के लोगों के लिए भी यह एक मर्मांतक अनुभव होता

शीतल की शुरुआत ने आगे चलकर क्लाउनसेलर्स टीम की शक्ल ली है। आज के दौर में एक तरफ तो अस्पतालों को पांच सितारा होटलों जैसा बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीमारियों और बीमारों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। निजी अस्पतालों में इलाज और सुविधाएं तो अच्छी हैं, पर वे खासी महंगी भी हैं। देश की बड़ी जनसंख्या आज भी सरकारी अस्पतालों के भरोसे है। सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक ने लगातार प्रयास किए हैं, पर कई क्षेत्रों में स्थिति आज भी अच्छी नहीं है। ऐसे में कुछ लोग और संस्थाएं अपनी तरफ से पहल

करके अस्पतालों में पहुंचने वाले बच्चों की दुनिया में भरोसा और खुशी बढ़ाने के प्रयास में लगी हैं। ऐसी ही एक रोचक पहल में जुटी है ‘क्लाउनसेलर्स टीम’। इस टीम का प्रयास है अस्पतालों में पहुंच कर बच्चों की उदास दुनिया में खुशी भरना। यह प्रयास कितना अनिवार्य है, इसका अनुमान किसी भी आम अस्पताल का नजारा देखकर लगाया जा सकता है। ऐसा ही एक अस्पताल है दिल्ली की गीता कॉलोनी में अवस्थित चाचा नेहरु बाल चिकित्सालय। यहां लोगों की आंखों में नींद नहीं है।

‘क्लाउनिंग के बाद बच्चों के हालात में तेजी से सुधार देखने के बाद डॉक्टर भी अब मदद कर रहे हैं। अब हम और अस्पतालों तक पहुंचना चाह रहे हैं’ -शीतल

आज क्लाउनसेलर्स की टीम में हैं 15 सदस्य

रात-रातभर का जागना है। मिन्नतें हैं। गिड़गिड़ाना है। ढांढस है। आंचल की आड़ में रोना है। यहां मूकब​िधर होकर उम्मीदों में बाट जोह रही आंखें हैं। जो कभी पिता, तो कभी मां बन जा रही हैं। सूजी हुई आंखों में जमकर पत्थर हो गई पुतलियां हैं। यहां कुछ भी ठीक नहीं है, पर सब ठीक हो जाने की आस आवश्यक है। उजले कपड़ों में टहलते फरिश्ते हैं। जो जाने-अनजाने कई बार अपना ओहदा भूल जा रहे हैं। यहां होने के नाम पर सिर्फ लंबी कतारें हैं। अपनी बारी की प्रतीक्षा है। सैकड़ों ऑक्सीजन के सिलेंडर हैं। जिंदगी के लिए लड़ाई कर रही नन्हीं सांसें हैं। कहीं निमोनिया, कहीं टायफाइड, तो कहीं बीमारी


24 - 30 जुलाई 2017

गुड न्यूज

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बिहार शिक्षा

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड से लैपटॉप खरीद सकेंगे छात्र इस क्रेडिट कार्ड से अब प्रदेश के 12वीं पास छात्र-छात्राएं आगे की पढ़ाई के लिए लैपटॉप भी खरीद सकेंगे

जिस तरह की सराहना क्लाउनसेलर्स को मिल रही है, उससे संभव है कि कुछ और समूह सामने आएं और उदासी का दूसरा और कोई नाम है। यहां दूरदूर तक हंसी नहीं है, पर इंतजार है हर मां-बाप को, अपने बच्चों के हंसने का। पर बीमार बच्चों की इस दुनिया में दुख और अफसोस के रंग के साथ एक रंग उम्मीद का भी है। यह रंग इन बच्चों की जिंदगी में घोलने का काम कर रही है क्लाउनसेलर्स टीम। सामान्य नाक-नक्श की साधारण-सी लड़की शीतल अग्रवाल इसी दल की सदस्य है। अस्पताल के बच्चों और डॉक्टरों के लिए शीतल लाॅफ्टर गर्ल (क्लाउन गर्ल) है। शीतल को अपना यह परिचय अच्छा लगता है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. और दिल्ली विश्वविद्यालय से एंथ्रोपॉलोजी में एम.फिल. करने के बाद कुछ विश्वविद्यालयों में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में काम कर चुकीं शीतल हर शनिवार तय समय पर अस्पताल पहुंचकर रोते और उदास चेहरों पर हंसी लाने में जुट जाती हैं। दिनभर सभी वार्ड में पहुंचकर वह हंसी परोसती और हंसी समेटकर बाहर आ जाती हैं। अपने अनुभव के बारे में शीतल बताती हैं, ‘मैं इन बच्चों के लिए हमेशा से क्लाउनिंग करना चाहती थी। इनके चेहरों पर हंसी देखना चाहती थी। यह ऐसी जगह है, जहां हंसी बड़ी मुश्किल से आपको ढूंढने पर मिलेगी, इसीलिए मैंने काम करने के लिए सरकारी बाल चिकित्सालय का चुनाव किया। आज यह करते महीनों बीत चुके हैं। बहुत से नए साथी भी जुड़ रहे हैं। पूरा अस्पताल खुश है। क्लाउनिंग के बाद बच्चों के हालात में तेजी से सुधार देखने के बाद डॉक्टर भी अब उनकी मदद कर रहे हैं। अब हम दूसरे अस्पतालों तक पहुंचना चाह रहे हैं।’ शीतल ने जो प्रयास पहले अपने बूते किया, वह आज एक सामूहिक इरादा और जज्बा बन चुका है। शीतल के साथ आज दस-पंद्रह लोगों की एक छोटी-सी टीम है। यह टीम ‘क्लाउनसेलर्स’ के नाम से आपको सोशल मीडिया पर मिल जाएगी। हर शनिवार इच्छुक युवा अपने-अपने काम और छुट्टियों से वक्त निकालकर हंसी कमाने के लिए शीतल के साथ हो लेते हैं। सुबह नौ बजे अस्पताल के सभाकक्ष में मिलने के बाद का एक घंटा बैलून फुलाने और चेहरे को कलर करने से लेकर नए

लोगों को कुछ सुझाव देने में चला जाता है। फिर इनकी टीम अलग-अलग हिस्सों में बंटकर बारीबारी से सभी वार्डों में घूमकर अपनी क्लाउनिंग से उदास चेहरों को हंसी में तब्दील करने में जुट जाती हैं। अपनी इस कोशिश में कभी-कभी इन्हें उदासी भी मिलती है, जब वे लाख जतन करने के बावजूद कुछ चेहरों पर हंसी नहीं ला पाते। क्लाउनसेलर्स के साथ जुड़ी ऋषिका ऐसा ही एक अनुभव साझा करती है। उसके शब्दों में, ‘एक बार हम लाख कोशिशों के बावजूद एक बच्चे को हंसा नहीं पा रहे थे, तभी अचानक से मेरा क्लाउन नोज मेरे नाक से निकलकर नीचे गिर गया। इतना देखते ही वह बच्चा खिलखिलाकर हंसने लगा। यह देखकर सारे नर्स और डॉक्टर बहुत खुश थे। बच्चे की मां खुशी से रोने लगी। मैं आज भी उस दिन को याद करती हूं तो धन्य हो जाती हूं। यह ऐसा सौदा है, जिसमें आप अपनी हंसी के बदले हजारों हंसी अपने साथ ले जाते हैं। यह दिन बहुत खूबसूरत होता है मेरे लिए।’ क्लाउनसेलर्स टीम के सदस्यों के प्रयास कितने सार्थक और अहम हैं, इसकी गवाही वे बच्चे तो देते ही हैं, जिनके उदास जीवन में इनके प्रयास से खुशी के कुछ पल आते हैं, वे मां-बाप भी इनकी कोशिशों के शुक्रगुजार हैं, जो अपने बच्चों के उदास चेहरे लगातार देख-देखकर निराश हो जाते थे, टूट जाते थे। नौ साल की सुहानी की अम्मी तो यहां तक कहती हैं, ‘जब मैं अपनी बच्ची को इन लोगों के साथ खेलते देखती हूं तो मैं भूल जाती हूं कि मेरी बच्ची का हाथ नहीं उठता है। मुझे लगता ही नहीं कि मेरी बच्ची बीमार है। अब तो हर शनिवार यहां के बच्चों को इनकी प्रतीक्षा रहने लगी है। अल्लाह इन नेक काम करने वालों को लंबी आयु।’ क्लाउनसेलर्स के सदस्य अभी सिर्फ चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय तक ही पहुंच पाए हैं, पर उनके हौसले और इरादे देखकर लगता है कि अगले कुछ सालों में कम से कम दिल्ली और इसके आसपास के कई इलाकों के बच्चों के अस्पतालों में खुशियां बांटने पहुंचेगे। जिस तरह की सराहना क्लाउनसेलर्स को मिल रही है, उससे यह भी संभव है कि इस तर्ज पर कुछ और समूह सामने आएं।

एसएसबी ब्यूरो

निर्देश दिए गए, ताकि बैंक स्तर की शिकायतों का निपटारा वहीं हो सके। साथ हार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना ही, बैंक भी सरकार और विभाग की तरह को अब और उपयोगी बनाया इस योजना के प्रचार-प्रसार में योगदान दें। जा रहा है। इस क्रेडिट कार्ड से अब इस पर बैंकों ने भी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड प्रदेश के 12वीं पास छात्र-छात्राएं आगे योजना के प्रचार-प्रसार की बात कही। की पढ़ाई के लिए लैपटॉप भी खरीद विभाग के सचिव ने बैंक अधिकारियों सकेंगे। शिक्षा विभाग ने बैंकों के प्रतिनिधियों के तबादले की वजह से सभी जनपदों में के साथ बैठक में इस बात का निर्णय लिया। प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के भी अब तक 12वीं के बाद पढ़ाई के लिए निर्देश दिए, ताकि उन्हें इस योजना की पाठ्यक्रम के नामांकन शुल्क, छात्रावास जानकारी मिल सके। इसके अलावा जिन शुल्क के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना बैंकों की शाखा में ऑनलाइन सुविधा नहीं से राशि दी जाती थी लेकिन इस योजना के है और वहां स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड को लेकर लिए छात्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो जो आवेदन पत्र भरवाए गए हैं, उन्हें जल्द से जल्द ऑनलाइन सेवा शुरू करने का पा रही थी। निर्देश दिया गया है। सरकार के नए निर्णय लैपटॉप खरीदने के के अनुसार, चार लाख शिक्षा सचिव रॉबर्ट रुपए तक मिलने वाले लिए उन्हें कोटेशन देना चोंगथू ने बैंकों को शिक्षा ऋण में अभ्यर्थी होगा। उसी के आधार समय पर छात्र-छात्राओं एक तय राशि तक लैपटॉप को स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड खरीद सकेंगे। लैपटॉप पर पूरे शिक्षा ऋण में उपलब्ध कराने के निर्देश खरीदने के लिए उन्हें से राशि स्वीकृत की दिए, ताकि बच्चों को कोटेशन देना होगा। उसी शिक्षा ऋण मिल सके जाएगी के आधार पर पूरे शिक्षा और वे आगे की पढ़ाई ऋण में से राशि स्वीकृत की जाएगी। छात्रों जारी रख सकें। विभाग ने स्पष्ट किया द्वारा लैपटॉप खरीद संबंधी अंतिम सहमति कि बैंकों को ऐसे छात्र-छात्राओं को मंत्रिमंडल की बैठक में किया जाएगा। कोई परेशानी न हो, इसके लिए शिक्षा बिहार के शिक्षा सचिव रॉबर्ट चोंगथू विभाग के एक नामित अधिकारी को हर की अध्यक्षता में हुई बैठक में बैंकों को जनपद में लगाया गया है, जो उनका अपने यहां प्रकोष्ठ गठित करने के भी सहयोग करेंगे।

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24 अंतरराष्ट्रीय

24 - 30 जुलाई 2017

कनाडा @ 150 वर्ष कनाडा स्थापना दिवस

सुंदरता और संपन्नता में दुनिया के अनूठे देश कनाडा ने अपनी स्थापना के 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं

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एसएसबी ब्यूरो

त्रफल के नजरिए से रूस के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश कनाडा ने अपनी स्थापना के 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं। कनाडा समृद्ध देश तो है ही, साथ ही काफी खूबसूरत और शांतिप्रिय भी है। यहां एक ओर लाखों मील में फैला बर्फीला संसार है तो दूसरी ओर हैं लंबे-चौड़े समुद्री तट। बीच में कहीं हरे-भरे घास के मैदान हैं तो कहीं सदाबहार जंगल, मरुस्थल, लंबी-चौड़ी नदियां और झीलें भी हैं। कुल मिलाकर कनाडा ऐसा

समृद्ध, खूबसूरत और शांतिप्रिय देश है जहां आप बार-बार जाना पसंद करेंगे। ध्यान रखने लायक यह है कि कनाडा जाकर ही आप विश्व के सबसे बड़े जलप्रपात नियाग्रा के अद्भुत, अलौकिक और विकराल रूप को देख पाएंगे। भारत से कनाडा का एक खास रिश्ता है।

कनाडा में पंजाब की झलक साफ दिखती है। भारत और कनाडा का यह रिश्ता काफी पुराना है। हर साल भारत से करीब 30,000 लोग यहां जाकर बसते हैं। वैसे कनाडा बहु संस्कृतियों वाला देश है। यही कारण है कि शताब्दियों से लोग यहां रह रहे हैं और उनकी अलग संस्कृति की झलक साफ तौर

कनाडा आने के बाद यहां का संसद भवन अवश्य देखना चाहिए। यहां से आप नियाग्रा के रास्ते में वाइन के लिए मशहूर वाइनयार्ड होते हुए विख्यात नियाग्रा जलप्रपात देखने जा सकते हैं

एक नजर

कनाडा की खोज 1867 में हुई, जब ब्रिटिश व फ्रांसीसी यहां आए

कनाडा में पंजाब की झलक साफसाफ दिखती है हर साल भारत से करीब 30,000 लोग यहां जाकर बसते हैं


24 - 30 जुलाई 2017

अंतरराष्ट्रीय

कनाडा के बारे में दिलचस्प तथ्य पर अनेक जगहों पर देखी जा सकती है। इसके बावजूद कनाडा इतिहास की दृष्टि से नया देश है, क्योंकि इसकी खोज 1867 में हुई थी, जब यूरोप से ब्रिटिश और फ्रांसीसी यहां आए। इसके बाद ही यहां का उत्थान आरंभ हुआ। इन दोनों ने मिल-जुलकर कनाडा को नया स्वरूप दिया और तब से इसने तेजी से तरक्की की राह पकड़ी। देश के ज्यादातर भू-भाग अब भी विकसित नहीं हैं और आबादी नाममात्र है। जो आबादी है वह कुछ ही हिस्सों में सिमटी हुई है। इसका बड़ा कारण देश के एक बड़े हिस्से का पूरी तरह हिमाच्छादित रहना है। यहां लंबे समय तक सर्दियां होती हैं और यही हिमाच्छादित भूभाग इस देश को ‘विंटर टूरिज्म’ के लिए स्वर्ग के रूप में सामने लाता है। पूरा कनाडा घूमना और उसका लुत्फ उठा पाना संभव नहीं है, इसीलिए ज्यादातर लोग पूर्वी कनाडा की सैर पर जाते हैं। पूर्वी कनाडा को मैरीटाइम और अटलांटिक प्रदेश दोनों नामों से जाना जाता है। न्यू ब‌र्न्सविक, प्रिंस एडवर्ड आईलैंड, नोवा स्कोटिया और न्यूफाउंडलैंड इसी में आते हैं। यहां एक से बढ़कर एक समुद्र तट हैं, जहां आप खुशगवार समय बिता सकते हैं। ये तट दुनिया के सर्वाधिक खूबसूरत समुद्र तटों में शुमार हैं। इसके साथ ही यहां आप सेल्टिक संगीत और कला का आनंद ले सकते हैं और मनपसंद समुद्री भोजन का लुत्फ भी। इसी हिस्से में आकर्षक बंदरगाह शहर हेलीफैक्स है जो विश्व का सबसे सुंदर प्राकृतिक बंदरगाह है। जब आप क्यूबेक पहुंचेंगे तो आपको हर तरफ फ्रांसीसी संस्कृति की झलक स्पष्ट रूप से दिखेगी। इस प्रांत को सेंट लाॅरेंस नदी दो हिस्सों में बांटती है। इस नदी से क्यूबेक शहर का सुंदर दृश्य दिखता है। यह नदी अपने आप में पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। नदी की स्वच्छ जलधारा के बीच आप नौकायन का आनंद ले सकते हैं। क्यूबेक का प्रसिद्ध शहर मांट्रियल है जहां आप सालभर होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होकर उनका लुत्फ उठा सकते हैं। पूरब से बढ़ते हुए आप केंद्रीय कनाडा में स्थित ओंटारियो जा सकते हैं, जो कनाडा के संघीय सरकार का मुख्यालय है। यह कनाडा के अर्थतंत्र को भी नियंत्रित करता है और काफी हद तक कनाडा की संस्कृति का केंद्रबिंदु भी है। कनाडा के इसी भाग में वहां के सर्वाधिक उद्योग धंधे हैं और आबादी के लिहाज से भी यह सर्वाधिक घना है। देश का सबसे बड़ा और दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक टोरंटो ओंटारियो में ही स्थित है। शहर में सीएन टावर देखने लायक है जिसमें लिफ्ट की मदद से आप 58 सेकेंड में टावर के ऊपर जा सकते

हैं। टावर के ऊपरी भाग से समुद्र और शहर को देखना अलग अनुभव है जो दिल में रच-बस जाता है। टोरंटो, अंग्रेजी के माध्यम से मनोरंजन चाहने वालों के लिए लंदन और न्यूयाॅर्क के बाद तीसरा सबसे बड़ा केंद्र है। कनाडा की राजधानी ओटावा भी इसी प्रांत में है, जहां संसद भवन अपनी आभा से सबको मोह लेता है। कनाडा आने के बाद संसद भवन अवश्य देखना चाहिए। यहां से आप नियाग्रा के रास्ते में वाइन के लिए मशहूर वाइनयार्ड होते हुए विख्यात नियाग्रा जलप्रपात देखने जा सकते हैं। बात नियाग्रा की करें तो कनाडा और अमेरिका को अलग करने वाले नियाग्रा को देखे बिना पर्यटन अधूरा है, जहां हर साल 1 करोड़ 20 लाख लोग सबसे बड़े जलप्रपात देखने आते हैं। नियाग्रा नदी पर स्थित यह जलप्रपात अमेरिका से होकर ओंटारियो के इस भाग की ओर मुखातिब होकर गिरता है। लगभग 12,000 साल पुरानी इस नदी पर स्थित यह जलप्रपात कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि इसकी एक जलधारा 1,060 फुट के दायरे में 176 फीट की ऊंचाई से गिरती है। इससे एक सेकेंड के भीतर डेढ़ लाख गैलन पानी गिरता है। इसी की एक और जलधारा 2,600 फुट के दायरे में 167 फुट की ऊंचाई से गिरती है जिसे हॉर्स के नाम से जाना जाता है। इस जलधारा में प्रति सेकेंड 6 लाख गैलन पानी गिरता है जो इसकी विशालता का परिचय देता है। नियाग्रा की लोकप्रियता और यहां के पर्यटकों की संख्या ने आज यहां नियाग्रा शहर बसा दिया है, जहां आपको हर तरह के मनोरंजन के साधन मिल जाएंगे। शहर में ठहरने से लेकर जरूरी सभी आवश्यक सुविधाएं और अत्याधुनिक संचार व्यवस्था मुहैया है। आप चाहें तो जहां पर यह जलप्रपात गिरता है उससे आगे फेरी में बैठकर सैर भी कर सकते हैं।

इस तरह मना 150 साल का जश्न

बारिश की फुहारों के बीच कनाडा के लोगों ने एक जुलाई को देश का 150वां स्थापना दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने देशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि विभिन्नताओं की वजह से आज कनाडा मजबूत बना है। विभिन्नता ही इसकी असली पहचान है। इस मौके पर देशभर में योग एवं एरोबिक के माध्यम से अनूठे अंदाज में जश्न मनाया गया। कई स्थानों पर आतिशबाजी एवं रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जिसमें देशवासियों का उत्साह देखते ही बना। आयरिश रॉक बैंड ‘यू2’ के बोनो के गीत ‘जब दूसरे दीवार बनवाते हैं तो आप अपने

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कनाडा नाम गलती से पड़ा था, इसका अर्थ होता है- ‘गांव’। क्षेत्रफल की दृष्टि से कनाडा, रूस के बाद दुनिया का सबसे बड़ा देश है। कनाडा को दुनिया का सबसे पढ़ा-लिखा देश भी माना जाता है। यहां आधे से ज्यादा लोगो के पास कॉलेज की डिग्री है। दुनिया में सबसे ज्यादा मैकरोनी और पनीर कनाडा में ही खाया जाता है द मॉल ऑफ अमेरिका का मालिक एक कैनेडियन हैं। अमेरिका ने कनाडा पर दो बार हमले किए 1775 में और 1812 में। दोनों ही बार अमेरिका हार गया। दुनिया के आधे अखबार केवल अमेरिका और कनाडा में प्रकाशित होते हैं। कनाडा में चूहे का मालिक बनना आसान नहीं है। इसके लिए आपको इजाजत लेनी पड़ेगी। आप जिंदा चूहे को बेच और खरीद भी नहीं सकते। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा झीलें कनाडा में हैं। दुनिया की सबसे बड़ा बीच कनाडा में है। अमेरिका-कनाडा बॉर्डर दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। कनाडा में जापान की राजधानी टोक्यो से भी कम लोग हैं। दुनिया का 20 प्रतिशत साफ पानी कनाडा की झीलों में हैं। बास्केटबॉल का आविष्कार एक कैनेडियन ने ही किया था। दुनिया में कुल 25,000 ध्रुवीय भालू हैं, इनमें से 15,500 कनाडा में हैं। कनाडा का नेशनल पार्क पूरे स्विट‍्जरलैंड से बड़ा है। कनाडा के जंगलों में जापान, इटली, कंबोडिया, फ्रांस, जर्मनी, कैमरून, दक्षिण कोरिया, उरूग्वे और इंग्लैंड ये सब समा सकते हैं।

दरवाजे खोलते हैं, जब कोई लोगों को बांटने की बातें करता है तो आप अपने हाथ आगे बढ़ाते हैं,जब आप आगे चलते हैं तो लोग आपका अनुसरण करते हैं’, ने इस मौके को यादगार बना दिया। इस अवसर पर ब्रिटेन के शाही परिवार की ओर से प्रिंस चार्ल्स और उनकी पत्नी कैमिला पार्कर ने कनाडा पहुंचकर वहां के लोगों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी। चार्ल्स इस मौके पर ट्रूडो के साथ मंच पर मौजूद थे। प्रिंस चार्ल्स ने कहा, ‘विश्वभर में कनाडा मानवाधिकार के चैम्पियन, शांतिदूत,

पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदार और विभिन्नता में एकता के एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित हुआ है।’ इस मौके पर ट्रूडो ने कहा, हमें इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि आप कहां से हैं, आपका धर्म क्या है अथवा आप किसे प्यार करते हैं? कनाडा में आप सभी का स्वागत है। कनाडा विभिन्नताओं के बावजूद नहीं बल्कि विभिन्नताओं के कारण मजबूत बना है। इसको ऐसे ही और मजबूती प्रदान करते रहिए।


26 पहल

24 - 30 जुलाई 2017

सूखे राजस्थान में पानी-पानी जल संरक्षण

बीते साल राजस्थान में शुरू किए गए 'मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान' की सफलता से वहां बरसों से सूखे कुओं-बावड़ियों में भरा पानी

ब्रिक्स सम्मेलन में भी वाहवाही

- वसुंधरा राजे, मुख्यमंत्री, राजस्थान

एक नजर

रा

एसएसबी ब्यूरो

जस्थान बीते कुछ दशकों से लगातार सूखे की मार झेल रहा है। इससे वहां का कृषि जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। वैसे मरूप्रदेश कहे जाने वाले इस राज्य में इस तरह की स्थितियां हमेशा से रही, ऐसा नहीं है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने अपनी किताब ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ में राजस्थान की कई ऐसी परंपराओं का जिक्र किया है, जिससे जाहिर होता है कि वहां के लोग जल संरक्षण के महत्व और अमल से लंबे समय से अवगत रहे हैं। गांवों में वर्षा का पानी बहकर बाहर जाने के बजाय गांवों के ही निवासियों, पशुओं और खेतों के काम आए। इसी सोच के साथ 27 जनवरी 2016 से राजस्थान सरकार ने 'मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान' योजना शुरू की, जिसके सकारात्मक नतीजे अब सामने आ रहे हैं। हाल ही में जयपुर के एक गांव कांट में जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विकास विभाग द्वारा निर्मित एनीकट में दो दिनों में हुई मॉनसून पूर्व की बारिश से

काफी मात्रा में पानी जमा हो गया। बरसात से एनीकट में पानी भराव से क्षेत्र के निवासियों के चेहरे खिल गए हैं। इस अभियान के दूसरे चरण के तहत प्रदेश के 4200 गांवों और 66 शहरों तथा कस्बों में जल संरक्षण के करीब एक लाख 35 हजार योजनाओं पर अमल होना है। ये काम तय समयावधि में पूरे हों, इसके लिए हर महीने का रोडमैप तैयार किया गया है। अभियान के दूसरे चरण में पौधरोपण कार्यक्रम के तहत जल संरचनाओं के साथ एक करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। दरअसल, राजस्थान ऐसा राज्य है, जहां पानी की कमी है और पड़ोसी राज्यों से मिलने वाला पानी अपर्याप्त है। बारिश के पानी की हर बूंद को सहेजकर गांवों को जल आत्मनिर्भरता की ओर

27 जनवरी 2016 को शुरू हुआ 'मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान' इस अभियान का अब दूसरा चरण चल रहा है इस चरण में एक करोड़ पौधे लगाए जाने हैं

बढ़ाना मुख्यमंत्री द्वारा शुरू किए गए अभियान का मूल उद्देश्य है। राजस्थान में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के पहले चरण के बाद भूजल स्तर में काफी सुधार हुआ है। इस अभियान से 25 ब्लॉक में भूजल का स्तर ऊपर आया है, वहीं कुल 50 ब्लॉक में भूजल

अभियान के दूसरे चरण के तहत प्रदेश के 4,200 गांवों और 66 शहरों तथा कस्बों में जल संरक्षण के करीब एक लाख 35 हजार काम होंगे। ये काम तय समयावधि में पूरे हों, इसके लिए हर महीने का रोडमैप तैयार किया गया है

रू प्रदेश राजस्थान अब देश और दुनिया में जलक्रांति के अग्रदूत के रूप में जाना जा रहा है। राजस्थान की जनता ने अपने दम पर इस मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान को सफल बनाकर पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। राजस्थान को जलभरा बनाने का यह अभियान इस कदर कामयाब हुआ कि ब्रिक्स सम्मेलन सहित पूरी दुनिया में इसकी गूंज सुनाई दी। साथ ही दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा नामीबिया जैसे देशों ने इसकी सराहना की है और कई देश इस मॉडल को अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्य राजस्थान से प्रेरणा ले रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अभियान के पूर्ण होने तक 295 ब्लॉक में से करीब 250 ब्लॉक अवश्य सुरक्षित जोन में होंगे। पहले चरण की ऐतिहासिक सफलता से जल स्वावलंबन का सवेरा हो गया है। अब हम जलक्रांति के दूसरे अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं। राजस्थान में जल सहेजने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शहरों और गांवों के पुराने जल स्रोतों को संवारने के लिए लोग स्वतः आगे आएंगे तो इससे प्रदेश में जल संकट दूर होगा और प्रदेश को जल स्वावलंबी बनाने के सरकार के प्रयास सफल होंगे। हम खेतों को हरा-भरा बनाना चाहते हैं और हर गांव में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना चाहते है। हमारा प्रयास है कि बरसात की एक-एक बूंद राजस्थान की धरती में समाए और यहां के लोगों की प्यास बुझाने के काम आए। जल स्वावलंबन अभियान इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जब प्रदेश के 21 हजार गांवों में यह अभियान पूरा होगा तो राजस्थान की तस्वीर ही बदल जाएगी।


पर्यावरण

24 - 30 जुलाई 2017

27

अंटार्कटिका महाद्वीप

अंटार्कटिका से टूटा सबसे बड़ा हिमखंड

अंटार्कटिका से अलग होने वाला यह हिमशैल खंड वहां मौजूद चौथे सबसे बड़े हिम चट्टान लार्सेन सी का एक बड़ा हिस्सा है

एक नजर अंटार्कटिका महाद्वीप का परिदृश्य हमेशा के लिए बदल गया

अलग हुए इस हिमखंड का आकार 5 हजार 80 वर्ग किलोमीटर समुद्री जल स्तर में 10 सेंटीमीटर तक वृद्धि की आशंका

सुरक्षित स्तर तक आ पहुंचा है। इस योजना के अंतर्गत पेयजल का स्तर बढ़ाने के साथ-साथ राज्य के तालाबों के चारों और पेड़-पौधे भी लगाए जा रहे हैं। अभी तक 28 लाख पौधे लगाए जा चुके हैं और एक करोड़ और पौधे लगाए जाएंगे। पहले चरण की 94 हजार से अधिक जल संरचनाओं में से 95 प्रतिशत पानी से लबालब भर गईं। इन जल संरचनाओं में वर्षाकाल के दौरान 11 हजार 170 मिलियन क्यूबिक फीट पानी का संग्रहण हुआ, जिससे करीब 41 लाख लोग और 45 लाख पशु लाभान्वित हुए। साथ ही करीब 28 लाख पौधे लगाए गए, जिनमें से अधिकतर आज भी हरे-भरे हैं। संभवतः यह पहला मौका था कि किसी सरकारी अभियान में 53 करोड़ रुपए की राशि जन सहयोग से प्राप्त हुई। पहला चरण पूरा होने के बाद कई इलाकों में 15 फीट तक भूजल स्तर बढ़ गया, जिससे उन कुओं और बावड़ियों में भी पानी आ गया, जो बरसों से सूखे थे। गैर-मरुस्थलीय 23 जिलों के उन क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ा है जो इस अभियान के प्रथम चरण का हिस्सा रहे। कई जगहों पर पुराने कुंओं में पानी आया है। मांडलगढ़ में तो 265 सूखे कुओं में फिर से पानी आ गया है। अभियान के प्रथम चरण की सफलता

का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह अभियान चलाया गया, वहां टैंकरों के माध्यम से पेयजल आपूर्ति में करीब 57 प्रतिशत की कमी आई है। 2016 की गर्मियों में जिन गांवों में 1,551 टैंकर्स से जलापूर्ति की गई, इस बार गर्मी के मौसम में उन गांवों में सिर्फ 674 टैंकर्स की ही जरूरत पड़ी। अभियान के दूसरे चरण के तहत प्रदेश के 4200 गांवों और 66 शहरों तथा कस्बों में जल संरक्षण के करीब एक लाख 35 हजार काम होंगे। ये काम तय समयावधि में पूरे हों, इसके लिए हर महीने का रोडमैप तैयार किया गया है। पहले चरण में इस साल 27 जनवरी से यह अभियान 3529 गांवों में चलाया गया था। इसकी सफलता के बाद अब अभियान के दूसरे चरण में शहरी क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। अपने कदम से उत्साहित मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लगातार इस प्रयास में लगी है कि राजस्थान में जलक्रांति लाने वाला यह अभियान जनक्रांति भी बने। इस दिशा में उन्होंने स्वयं पहल करते हुए अभियान के दूसरे चरण के लिए अपना एक माह का वेतन देने की घोषणा की। उनकी इस पहल के बाद राज्य मंत्रिपरिषद के सदस्यों और संसदीय सचिवों ने भी अपना एक माह का वेतन देने की घोषणा की है।

वि

श्व के दक्षिण में स्थित ध्रुव पर ​िस्थत अंटार्कटिका से भारत की राजधानी दिल्ली के आकार से भी चार गुना बड़ा हिमखंड टूट गया है, जो अपने साथ तबाही का मंजर लेकर आ रहा है। वैज्ञानिकों ने कहा कि करीब एक खरब टन का हिमशैल (अब तक के दर्ज आंकड़ो में सबसे बड़ा) कई महीनों के पूर्वानुमान के बाद अंटार्कटिका से टूटकर अलग हो गया है। अब दक्षिणी ध्रुव के आसपास जहाजों के लिए ये गंभीर खतरा बन सकता है। लार्सन सी बर्फ की चट्टान में से 5,800 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा अलग हो जाने से इसका आकार 12 फीसदी से ज्यादा घट गया है और अंटार्कटिका का परिदृश्य हमेशा के लिए बदल चुका है। बताया जा रहा है कि इसका असर भारत के अंडमान-निकोबार और सुंदरबन डेल्टा पर भी पड़ सकता है। अंटार्कटिका में हमेशा हिमशैल खंड अलग होते रहते हैं, लेकिन यह खास तौर पर बड़ा है, ऐसे में महासागर में सामने के इसके रास्ते पर निगरानी की जरूरत है। इसका कारण यह है कि यह नौवहन यातायात के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। बरसों से पश्चिमी अंटार्कटिका हिम चट्टान में बढ़ती दरार को देख रहे शोधकर्ताओं ने कहा कि यह घटना 10 जुलाई के बाद किसी समय हुई है। इस हिमशैल को ए-68 नाम दिए जाने की संभावना है। एक खरब टन से ज्यादा वजनी इस हिमशैल का विस्तार सबसे बड़ी लहरों में से एक लेक इरी के विस्तार से दो गुना है। अंटार्कटिका से अलग होने वाला यह हिमशैल खंड वहां मौजूद चौथे सबसे बड़े हिम चट्टान लार्सेन सी से भी बहुत बड़ा है। इस

हिमखंड का वजन खरबों टन बताया जा रहा है और यह संभवतः अब तक का सबसे बड़ा टुकड़ा है जो हिम चट्टान से अलग हुआ है। इस हिमखंड का आकार 5 हजार 80 वर्ग किलोमीटर है। यह गोवा के आकार से डेढ़ गुना बड़ा और अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर से सात गुना बड़ा है। वैज्ञानिकों की मानें, तो लार्सेन सी के अलग हो जाने से वैश्विक समुद्री स्तर में 10 सेंटीमीटर की वृद्धि हो जाएगी। महाद्वीप के पास से गुजर​ ते जहाजों के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वे के मुताबिक, यह हिमखंड 10 और 12 जुलाई के बीच टूटकर अलग हुआ। वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र स्तर पर इस हिमखंड के अलग होने से तत्काल असर नहीं आएगा, लेकिन यह लार्सेन सी हिम चट्टान के फैलाव को 12 प्रतिशत तक कम कर देगा। लार्सेन ए और लार्सेन बी हिम चट्टान साल 1995 और 2002 में ही ढहकर खत्म है।

भारत पर असर

वैज्ञानिकों ने इस हिमखंड के अलग होने के पीछे कार्बन उत्सर्जन को सबसे बड़ी वजह बताया है। उनके मुताबिक कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे ग्लेशियर जल्दी पिघलते जा रहे हैं। समुद्री स्तर में बढ़ोतरी होने से अंडमान और निकोबार के कई द्वीप और बंगाल की खाड़ी में सुंदरवन के कई हिस्से डूब सकते हैं। अरब सागर की तरफ इसका असर कम होगा, लेकिन यह लंबे समय में वहां भी दिखेगा। भारत की 7 हजार 500 किलोमीटर लंबी समुद्र तटीय रेखा को इससे खतरा बताया जा रहा है। (एजेंसी)


28 विशेष

24 - 30 जुलाई 2017

जल प्रबंधन सिखाते मंदिर जल परंपरा

कुंडों, कुओं और तालाबों के साथ मंदिर निर्माण की परंपरा काफी पुरानी है। ज्यादातर मंदिरों में पूजा की पारंपरिक पद्धति भी उससे जुड़े जल-स्रोत से जुड़ी है

एक नजर

कई राजाओं ने मंदिरों के साथ कुंडों का निर्माण करवाया

असम का जॉयसागर टैंक देश के सबसे बड़े मंदिर कुंडों में से एक 318 एकड़ में फैला है असम का जॉयसागर टैंक

सीता कुंड

कई स्थानों पर प्राकृतिक कुंड भी देखने को मिलते हैं, जो गर्म पानी के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं प्राकृतिक कुंडों में से एक है बिहार के मुंगेर जिले का सीता कुंड। मान्यता है कि सीता ने अग्नि परीक्षा के बाद इस कुंड में स्नान किया था। तभी से इस कुंड का पानी गर्म हो गया। इसके आस-पास सीता मंदिर है और बाद में चारों भाइयों के नाम से राम कुंड, लक्ष्मण कुंड, भरत कुंड और शत्रुघ्न कुंड बनवाए गए।

दक्षिण भारत की मिसाल

एसएसबी ब्यूरो

नरेंद्र सरोवर

गर कोई कहे कि मंदिरों का धार्मिक महत्व तो है ही, उससे ज्यादा इसका जल संरक्षण की दृष्टि से ज्यादा महत्व है, तो अच्छा आशय प्रकट होने के बावजूद पहली नजर में यह बात कुछ समझ नहीं आती है। दरअसल, इसे समझने के लिए मंदिरों से जुड़ी देशज परंपरा का गहन अध्ययन जरूरी है। जल कुंडों, कुओं और तालाबों के साथ मंदिर निर्माण की भारतीय परंपरा कोई आज की नहीं है। ज्यादातर मंदिर में पूजा की पारंपरिक पद्धति भी यही है कि उससे जुड़े जलस्रोत से मंदिरों में स्थापित देवी-देवता का जलाभिषेक किया जाए।

थे। लोगों की मान्यता है कि मंदिरों के कुंड में स्नान करने से आप अंदर तक पवित्र हो जाएंगे और दूसरा यह कि भारत के अधिकांश क्षेत्र पानी के लिए बारिश पर निर्भर होते हैं। ऐसे में बारिश के मौसम में इन कुंडों पानी में संग्रहित होता है और जरूरत के वक्त लोगों की पानी की मूलभूत जरूरतों को पूरा करते हैं। असम का जॉयसागर टैंक इसका उदाहरण है, जिसका निर्माण अहोम राजा रुद्र सिंह ने अपनी मां जायमति की स्मृति में करवाया था। इस टैंक को देश के सबसे बड़े मंदिर कुंड के रूप में जाना जाता है। यह 318 एकड़ में फैला है और इसके किनारों पर जयदोल मंदिर, शिव मंदिर, देवी घर और नाटी गोसाईं के मंदिर हैं।

ऐेतिहासिक तौर पर भी देखें तो देश के विभिन्न हिस्सों में राजाओं ने मंदिरों के साथ के कुंडों का निर्माण करवाया है। इनके निर्माण के दो प्रयोजन

विजयनगर राज्य के बाद सबसे ज्यादा जमीन पर मंदिरों का ही आधिपत्य था। सिंचाई के अलावा मंदिरों के संचालक नई जमीन पर खेती कराने और उनसे प्राप्त आमदनी से मंदिरों को चलाने में खर्च करते थे

जॉयसागर टैंक

पुरी में स्थित नरेंद्र सरोवर को ओडिशा का सबसे पवित्र सरोवर माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर के उत्तर-पूर्व में स्थित इस सरोवर का फैलाव 3.24 एकड़ में है। तमिलनाडु के कंुभकाेणम शहर में स्थित महामहम सरोवर 6.2 एकड़ क्षेत्र में फैला है और 16 छोटे मंडपों और नव कन्निका मंदिर से घिरा है। ऐसी मान्यता है कि महामहम उत्सव के दौरान भारत की सभी प्रमुख नदियां इस सरोवर में मिलती हैं। इनके अलावा भी देश में सैकड़ों मंदिर मौजूद हैं, जो क्षेत्र विशेष की जल आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं। हिन्दुओं की इस परम्परा को सिख समुदाय ने भी अपनाया। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का ‘अमृत सरोवर’ इसी का एक उदाहरण है।

दक्षिण भारत में खेतों की सिंचाई पारंपरिक रूप में पानी के छोटे-छोटे स्रोतों से की जाती थी। सिंचाई के संसाधनों के संचालन में मंदिरों का महत्वपूर्ण योगदान होता था। हालांकि चोल (9वीं से 12वीं सदी) और विजयनगर दोनों ही साम्राज्यों ने कृषि को बढ़ावा दिया, फिर भी इनमें से किसी ने भी सिंचाई और सार्वजनिक कार्यों के लिए अलग से विभाग नहीं बनाया। इन कार्यों को सामान्य लोगों, गांवों के संगठनों और मंदिरों पर छोड़ दिया गया था, क्योंकि ये भी जरूरी संसाधनों को राज्य की तरह ही आसानी से जुटा सकते थे। उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश के तिरुपति के पास स्थित कालहस्ती में बना शैव मंदिर चढ़ावों का उपयोग सिंचाई के लिए नहरों की खुदाई और मंदिरों की अधिकृत जमीनों पर फिर अधिकार प्राप्त करने के लिए करता था। 1540 के कालहस्ती अभिलेख के अनुसार, ‘वीराप्पनार अय्यर ने भगवान के खजाने में 1306 पोन (मुद्रा) जमा किए, जिसका उपयोग मुत्तयामान समुद्रम के पास के नए क्षेत्रों को खरीदने में किया जाना था, जिससे इस जमीन को खेती के काम में लाया जा सके। इसके अलावा, लक्कुसेतिपुरम झील से पानी निकालने का भी प्रयोजन था। इस झील की मरम्मत और रखरखाव के लिए जमा किए गए धन में से 1006 पोन खर्च किए जाने थे।’


24 - 30 जुलाई 2017

तालाब निर्माण और सुरक्षा की मिसाल

भा

1496 में एक मंदिर के प्रबंधक ने कर्नाटक के कोलार जिले में स्थित जगह पर एक व्यक्ति से समझौता किया, जिसने गांव में तालाब की खुदाई की

रत में मंदिरों की अधिकृत जमीन पर सिंचाई का काम काफी योजनाबद्ध ढंग से करने की प्रेरक परंपरा रही है। 1496 में एक मंदिर के प्रबंधक ने कर्नाटक के कोलार जिले में स्थित किसी जगह पर एक व्यक्ति से समझौता किया, जिसने गांव में तालाब की खुदाई की। तालाब की खूबियों के बदले उसे दासवंडा अनुदान के अंतर्गत सिंचाई युक्त जमीन दी गई। इस अभिलेख के अनुसार, अल्पा के बेटे, नरसिंह देव को, जो नरसिंह मंदिर में पुजारी हैं और कोन्डापा तिमन्ना के बेटे एवापा के बीच ऐसा समझौता हुआ। जिसके

अनुसार ‘भगवान नरसिंह के चढ़ावे से खरीदे गए गांव गुंडाल्लाहल्ली में तालाब की जरूरत है, ताकि गांव वालों का जीवन यापन हो सके। यह तालाब बहुत मजबूत होना चाहिए, इसके बांधों पर खूब मिट्टी होनी चाहिए। इसका फाटक पत्थरों का होना चाहिए। इसके जलमार्ग ईंट और गारे से बनने चाहिए। इसके बदले हम तुम्हें सिंचित होने वाले धान के खेत देंगे। तालाब के पास ही सिंचित दस हिस्सों में तीन हिस्सा जमीन तुम्हें मिलेगी। अगर इस तालाब में कुछ गड़बड़ी आई, तो हम धान उगाने वाले समूचे खेतों पर

तुम्हारी जमीन के साथ कर लगा देंगे। तुम अपनी जमीन पर नारियल और अन्य प्रकार की फसलों को उगा सकते हो। इन तक पहुंचने वाला पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। तुम्हारे धान के खेतों में काम करने वाले श्रमिकों को रहने का घर बनाना हो तो स्थल का चयन हम करेंगे। ये धान के खेत तुम्हें तब तक के लिए दिए जाते हैं जब तक चांद और सूरज रहेंगे। इसके अतिरिक्त तुम्हारी आने वाली पीढ़ी का भी इस पर अधिकार होगा। तुम इसे बेच भी सकते हो।’

विशेष

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तमिलनाडु के कंुभकाेणम स्थित महामहम सरोवर 6.2 एकड़ क्षेत्र में फैला है और 16 छोटे मंडपों और नव कन्निका मंदिर से घिरा है। मान्यता है कि महामहम उत्सव के दौरान भारत की सभी प्रमुख नदियां इस सरोवर में मिलती हैं

साल मंदिर का कार्यालय (जिसे तिरुप्पनभण्डारम कहा जाता था) गांवों से प्राप्त होने वाली आय का एक हिस्सा मंदिरों में भेंट चढ़ाने के लिए अलग से बचाकर रखता था। कंडडायी रामानुज आयंगर नामक व्यक्ति ने अपने दान किए गए 6500 पणम (मुद्रा) में से 1300 पणम को विक्रमादित्यमंगला में सिंचाई मार्गों के निर्माण के लिए रखा। इस सिंचाई से प्राप्त आमदनी मंदिरों को मिलने वाली थी। इस तरह विक्रमादित्यमंगला गांव की स्थायी आमदनी बढ़ी और यह दो दानों से ही संभव हो सकी। मंदिरों के कोष से गांवों में सिंचाई के अलगअलग स्रोतों का निर्माण किया जाता था। इससे इन गांवों से प्राप्त आमदनी में बढ़ोत्तरी होती थी, जिसे धार्मिक कार्यों में खर्च किया जाता था। इस व्यवस्था से कृषि संरचना पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि गांवों की जमीन और सिंचाई के संसाधनों का प्रबंध खेतिहर मजदूर ही करते थे।

विजयनगर साम्राज्य

मंदिर और सिंचाई

दक्षिण भारत में मंदिरों के जरिए चलाई जाने वाली सिंचाई परियोजनाओं के और भी उदाहरण मिलते हैं। 1584 में एक शैव और वैष्णव मंदिर के न्यासियों का कुछ अन्य लोगों की सहायता से एक मंदिर की अधिकृत जमीन पर स्थानीय नदी से निकाले गए नालों की खुदाई करने जैसा उदाहरण भी मिलता है। इन नालों से पानी दूसरे मंदिर की जमीन पर बने तालाब में ले जाया जाता था। जिस मंदिर की जमीन पर नालों की खुदाई हुई थी, उसे मुआवजे के तौर पर एक एकड़ जमीन प्रदान की गई थी। एक अन्य घटना में किसी मंदिर की अधिकृत अनुपजाऊ जमीन को 1952 में कर मुक्त कर दिया गया था, जिसके बाद मंदिर के संचालकों ने उसे उपजाने और सुधार के लिए ठेके पर दे दिया।

अभिलेखों में वर्णन

विजयनगर के पुराने अभिलेख से पता चलता है कि राज्य और किसी एक मंदिर के संचालकों ने उस जमीन को कर मुक्त कर दिया था, जिसकी मंदिर के

तालाब से सिंचाई होती थी और जिसके लिए एक स्थानीय व्यापारी ने कोष दिया था। इस व्यापारी को इस जमीन से प्राप्त आय दो साल तक दी गई, जिसके बाद जमीन और तालाब, दोनों मंदिर को वापस मिल गए। इसका एक छोटा भाग दासवंडा अनुदान के तौर पर व्यापारी को दिया गया, क्योंकि उसने तालाब का निर्माण करवाया था। 1410 के मैसूर के अभिलेखों में गांवों के संगठनों और मंदिरों के बीच सिंचाई के साधनों के निर्माण में सहयोगी होने का उदाहरण मिलता है। गांव वालों ने एक नदी पर बांध बनाया, जिसे उन्होंने अपनी जमीनों पर खोदे गए जलमार्गों से मंदिर तक जोड़ा। ऐसा तय किया गया था कि दो-तिहाई पानी का इस्तेमाल मंदिर की अधिकृत जमीन पर किया जाएगा और शेष एक-तिहाई गांव की जमीन पर। इसके खर्च का अनुपात भी इसी तरह बांटा गया। सन‍् 1424 के एक अभिलेख के अनुसार, 1410 में गांव वालों की ओर से तैयार किया गया बांध टूट गया था। एक सैन्य अधिकारी की सहायता से इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। दक्षिण भारत में मंदिरों द्वारा सिंचाई के विकास में योगदान के ये

कुछ उदाहरण हैं। उन्हें कभी राज्य के प्रशासकों से सहायता मिलती थी तो कभी लोगों से। विजयनगर राज्य के बाद सबसे ज्यादा जमीन पर मंदिरों का ही आधिपत्य था। सिंचाई के अलावा, मंदिरों के संचालक नई जमीन पर खेती कराने और उनसे प्राप्त आमदनी मंदिरों को चलाने में खर्च करते थे। इनका प्रयोग त्योहारों और देवताओं के चढ़ावे में सबसे अधिक किया जाता था।

चढ़ावे से कृषि विकास

नौंवी शताब्दी में बना तिरुपति मंदिर अनुयायियों के चढ़ावे के धन का कृषि के विकास में उपयोग करने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। मंदिर ने विजयनगर इलाके में छोटे सिंचाई साधनों को बढ़ावा दिया। सोलहवीं सदी तक लगभग 150 गांवों को इस नीति से सहायता मिली। इस व्यवस्था से कार्य करने का एक उदाहरण 1429 में राजा देवराय द्वितीय (14231446) द्वारा एक स्थानीय मंदिर को तीन करमुक्त गांव दान देने में मिलता है। इसमें एक ब्राह्मण गांव विक्रमादित्यमंगला भी शामिल था। इन गांवों की आय को त्योहारों में इस्तेमाल किया जाता था। हर

तिरुपति क्षेत्र में किसी एकाधिकारी के न होने के कारण विजयनगर साम्राज्य के शुरू के दिनों में मंदिर ने 1390 के आस-पास न्यासियों को स्वतंत्र संचालक संगठन बनाने में सफलता हासिल की, जिसे स्थानों के नाम से जाना जाता था। संगठन के पास बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां थीं। इसका स्थापित होना इस क्षेत्र के विकास के लिए पहला बड़ा कदम था। 15वीं शताब्दी के मध्य तक तिरुपति मंदिर वैष्णवों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। चूंकि इस समय तक तिरुपति में धार्मिक काम बढ़ गए थे, इसीलिए राज्य की ओर से दी गई जमीन और धन में भी बराबर बढ़ोत्तरी हुई। चढ़ावे और दान में प्राप्त धन का इस्तेमाल करीब सौ गांवों में सिंचाई के कार्यों के विकास में किया जाता था। सोलहवीं सदी में मंदिर को प्रदान किए गए गांवों में से करीब नब्बे प्रतिशत राज्य दान में मिले थे।

राज्य संरक्षण

मंदिर के महत्व को स्थापित करने में राज्य का संरक्षण बहुत जरूरी था, लेकिन मंदिर में धार्मिक कार्यों को चलाने के लिए उसके जमीन और धन सुरक्षित आमदनी के स्रोत बने रहें, इस बात का आश्वासन मंदिर द्वारा गांवों में सिंचाई की व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु खर्च किए गए धन से मिलता था। इससे छोटे न्यासी भी आश्वस्त रहते थे।


30 लोक कथा

24 - 30 जुलाई 2017

चालाकी का फल

क बूढ़ी महिला थी। उसकी उम्र करीब नब्बे साल थी। वह बहुत परेशान थी, क्योंकि एक तो उसे ठीक से दिखाई नहीं पड़ता था, ऊपर से उसकी मुर्गियों की देखभाल करने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर चली गई थी। बेचारी बुढ़िया सुबह मुर्गियों को चराने के लिए दड़बे का दरवाजा खोलती तो पंख फड़फड़ाती हुई सारी की सारी बुढि़या के घर की चारदीवारी फांद कर पड़ोस के घरों में भाग जातीं और ‘सारे मोहल्ले में शोर मचाती हुई घूमतीं। कभी वे पड़ोसियों की सब्जियां खा जातीं, तो कभी पड़ोसी काट कर उन्हीं की सब्जी बना डालते।’ दोनों ही हालात में नुकसान बेचारी बुढ़िया का ही होता था। जिसकी सब्जी बर्बाद होती, वह बुढ़िया को भला बुरा कहता और जिसके घर में मुर्गी पकती उससे उसकी दुश्मनी हो जाती। हार कर बुढ़िया ने सोचा कि बिना नौकर के मुर्गियां पालना उस जैसी कमजोर महिला के वश की बात नहीं। भला वो कहां तक डंडा लेकर एक-एक मुर्गी हांकती फिरेगी ? जरा सा काम करने में ही तो उसका दम फूल जाता था। इसीलिए बुढ़िया निकल पड़ी लाठी टेकती नौकर की तलाश में। पहले तो उसने अपनी पुरानी मुर्गियां चराने वाली लड़की को ढूंढा। लेकिन उसका कहीं पता नहीं लगा। यहां तक कि उसके मां-बाप को भी नहीं मालूम था कि लड़की आखिर गई तो गई कहां? ‘नालायक और दुष्ट लड़की, कहीं ऐसे भी भागा जाता है? न अता न पता, सबको परेशान करके रख दिया।’ बुढ़िया बड़बड़ाती हुई आगे बढ़ती गई। थोड़ी दूर पर एक भालू ने बुढ़िया को बड़बड़ाते हुए सुना तो वह घूम कर सड़क पर आ गया और बुढ़िया को रोक कर बोला, ‘बुढ़िया नानी! नमस्कार, आज सुबह, सुबह कहां जा रही हो? सुना है तुम्हारी मुर्गियां चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गई है। न हो तो मुझे ही नौकर रख लो। खूब देखभाल करूंगा तुम्हारी मुर्गियों की।’ ‘अरे हटो, तुम भी क्या बात करते हो?’ बुढ़िया

ने खिसिया कर उत्तर दिया, ‘एक तो निरे काले-मोटे बदसूरत हो, मुर्गियां तो तुम्हारी सूरत देखते ही भाग खड़ी होंगी। फिर तुम्हारी बेसुरी आवाज उनके कानों में पड़ी तो वे मुड़कर दड़बे की ओर आएंगी भी नहीं। एक तो मुर्गियों के कारण मुहल्ले भर से मेरी दुश्मनी हो गई है, दूसरा तुम्हारे जैसा जंगली जानवर और पाल लूं तो मेरा जीना भी मुश्किल हो जाए। छोड़ो मेरा रास्ता, मैं खुद ही ढूंढ लूंगी अपने काम की नौकरानी।’ बुढ़िया आगे बढ़ी तो थोड़ी ही दूर पर एक सियार मिला और बोला, ‘राम-राम-राम बुढ़िया नानी! किसे खोज रही हो? बुढ़िया खिसिया कर बोली, अरे खोज रही हूं, एक भली सी नौकरानी जो मेरी मुर्गियों की देखभाल कर सके। देखो भला मेरी पुरानी नौकरानी इतनी दुष्ट छोरी निकली कि बिना बताए कहीं भाग गई। अब मैं मुर्गियों की देखभाल कैसे करूं? कोई कायदे की लड़की बताओ जो सौ तक गिनती गिन सके, ताकि वह मेरी सौ मुर्गियों को गिन कर दड़बे में बंद कर सके।’ यह सुन कर सियार बोला, ‘बुढ़िया नानी! ये कौन सी बड़ी बात है? चलो अभी मैं तुम्हें एक लड़की से मिलवाता हूं। मेरे पड़ोस में ही रहती है। रोज जंगल के स्कूल में पढ़ने जाती है, इसीलिए सौ तक गिनती उसे जरूर आती होगी। अक्ल भी उसकी खूब अच्छी है। शेर की मौसी है वो, आओ तुम्हें मिलवा ही दूं उससे।’ बुढ़िया लड़की की तारीफ सुन कर बड़ी खुश होकर बोली, ‘जुग जुग जियो बेटा, जल्दी बुलाओ उसे कामकाज समझा दूं। अब मेरा सारा झंझट दूर हो जाएगा। लड़की मुर्गियों की देखभाल करेगी और मैं आराम से बैठकर मक्खन बिलोया करूंगी।’ सियार भाग कर गया और अपने पड़ोस में रहने वाली चालाक पूसी बिल्ली को साथ लेकर लौटा। पूसी बिल्ली बुढ़िया को देखते ही बोली, ‘बुढ़िया नानी नमस्ते। मैं कैसी रहूंगी तुम्हारी नौकरानी के काम के लिए?’ नौकरानी के लिए लड़की की जगह

बिल्ली को देखकर बुढ़िया चौंक गई। बिगड़ कर बोली, ‘हे भगवान कहीं जानवर भी घरों में नौकर हुआ करते हैं? तुम्हें तो अपना काम भी सलीके से करना नहीं आता होगा। तुम मेरा काम क्या करोगी?’ लेकिन पूसी बिल्ली बड़ी चालाक थी। आवाज को मीठी बना मुस्कुरा कर बोली, ‘अरे बुढ़िया नानी, तुम तो बेकार ही परेशान होती हो। कोई खाना पकाने का काम तो है नहीं, जो मैं न कर सकूं। आखिर मुर्गियों की ही देखभाल करनी है न? वो तो मैं खूब अच्छी तरह कर लेती हूं। मेरी मां ने तो खुद ही मुर्गियां पाल रखी हैं। पूरी सौ हैं। गिनकर मैं ही चराती हूं और मैं ही गिनकर बंद करती हूं। विश्वास न हो तो मेरे घर चलकर देख लो।’ एक तो पूसी बिल्ली बड़ी अच्छी तरह बात कर रही थी और दूसरे बुढ़िया काफी थक भी गई थी, इसीलिए उसने ज्यादा बहस नहीं की और पूसी बिल्ली को नौकरी पर रख लिया। पूसी बिल्ली ने पहले दिन मुर्गियों को दड़बे में से निकाला और खूब भाग-दौड़ कर पड़ोस में जाने से रोका। बुढ़िया पूसी बिल्ली की इस भाग-दौड़ से संतुष्ट होकर घर के भीतर आराम करने चली गई। कई दिनों से दौड़ते भागते बेचारी काफी थक गई थी तो उसे नींद भी आ गई। इधर पूसी बिल्ली ने मौका देखकर पहले ही दिन छह मुर्गियों को मारा और चट कर गई। बुढ़िया जब शाम को जागी तो उसे पूसी की इस हरकत का कुछ भी पता न लगा। एक तो उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था और उसे सौ तक गिनती भी नहीं आती थी। फिर भला वह इतनी चालाक पूसी बिल्ली की शरारत कैसे जान पाती? अपनी मीठी-मीठी बातों से बुढ़िया को खुश रखती और आराम से मुर्गियां चट करती जाती। पड़ोसियों से अब बुढ़िया की लड़ाई नहीं होती थी, क्योंकि मुर्गियां अब उनके अहाते में घुस कर शोरगुल नहीं करती थीं। बुढ़िया को पूसी बिल्ली पर इतना विश्वास हो गया कि उसने मुर्गियों के दड़बे की तरफ

जाना छोड़ दिया। धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया जब दड़बे में बीस -पच्चीस मुर्गियां ही बचीं। उसी समय बुढ़िया भी टहलती हुई उधर आ निकली। इतनी कम मुर्गियां देखकर उसने पूसी बिल्ली से पूछा, ‘क्यों री पूसी, बाकी मुर्गियों को तूने चरने के लिए कहां भेज दिया?’ पूसी बिल्ली ने झट से बात बनाई, ‘अरे और कहां भेजूंगी बुढ़िया नानी। सब पहाड़ के ऊपर चली गई हैं। मैंने बहुत बुलाया लेकिन वे इतनी शरारती हैं कि वापस आती ही नहीं।’ ‘उफ!ये शरारती मुर्गियां।’ बुढ़िया का बड़बड़ाना फिर शुरू हो गया, ‘अभी जाकर देखती हूं कि ये इतनी ढीठ कैसे हो गयी हैं? पहाड़ के ऊपर खुले में घूम रही हैं। कहीं कोई शेर या भेड़िया आ कर ले गया तो बस!’ ऊपर पहुंच कर बुढ़िया को मुर्गियां तो नहीं मिलीं। मिलीं सिर्फ उनकी हडि्डयां और पंखों का ढेर! बुढ़िया को समझते देर न लगी कि यह सारी करतूत पूसी बिल्ली की है। वो तेजी से नीचे घर की ओर लौटी। इधर पूसी बिल्ली ने सोचा कि बुढ़िया तो पहाड़ पर गई है और अब वहां सिर पकड़ कर रोएगी, जल्दी आएगी नहीं। तब तक क्यों न मैं बची हुई मुर्गियां भी चट कर लूं। यह सोच कर उसने बाकी मुर्गियों को भी मार डाला। अभी वह बैठी उन्हें खा ही रही थी कि बुढ़िया वापस आई। पूसी बिल्ली को मुर्गियां खाते देखकर वह गुस्से से आगबबूला हो गई और उसने पास पड़ी कोयलों की टोकरी उठा कर पूसी के सिर पर दे मारी। पूसी बिल्ली को चोट तो लगी ही, उसका चमकीला सफेद रंग भी काला हो गया। अपनी बदसूरती को देखकर वह रोने लगी। शिक्षा ः आज भी लोग इस घटना को नहीं भूले हैं और रोती हुई काली बिल्ली को डंडा लेकर भगाते हैं। चालाकी का उपयोग बुरे कामों में करने वालों को पूसी बिल्ली जैसा फल भोगना पड़ता है।


24 - 30 जुलाई 2017

sulabh sanitation

लोक कथा

Sulabh International Social Service Organisation, New Delhi is organizing a Written Quiz Competition that is open to all school and college students, including the foreign students. All those who wish to participate are required to submit their answers to the email address contact@sulabhinternational.org, or they can submit their entries online by taking up the questions below. Students are requested to mention their name and School/College along with the class in which he/she is studying and the contact number with complete address for communication

First Prize: One Lakh Rupees

PRIZE

Second Prize: Seventy Five Thousand Rupees Third Prize: Fifty Thousand Rupees Consolation Prize: Five Thousand Rupees (100 in number)

500-1000) ti on (W or d Li m it: ti pe m Co iz Qu en tt Qu es ti on s fo r W ri nounced? rt was ‘Swachh Bharat’ an Fo d be no open Re the m fro y da ich houses and there should the 1. On wh all in d cte ru nst co be by 2019, toilets should 2. Who announced that l. defecation? Discuss in detai Toilet? 3. Who invented Sulabh ovement? Cleanliness and Reform M 4. Who initiated Sulabh e features of Sulabh Toilet? ? 5. What are the distinctiv used in the Sulabh compost r ise til fer of ge nta rce pe d an 6. What are the benefits of the Sulabh Toilet? ’? 7. What are the benefits be addressed as ‘Brahmins to me ca g gin en av sc al nu discussing ople freed from ma If yes, then elaborate it by s? 8. In which town were pe ste ca r pe up of s me ho take tea and have food in the 9. Do these ‘Brahmins’ story of any such person. entions of Sulabh? 10. What are the other inv

Last

ritten Quiz Competition W of on si is bm su r fo te da

: September 30, 2017

For further details please contact Mrs. Aarti Arora, Hony. Vice President, +91 9899 855 344 Mrs. Tarun Sharma, Hony. Vice President, +91 97160 69 585 or feel free to email us at contact@sulabhinternational.org SULABH INTERNATIONAL SOCIAL SERVICE ORGANISATION In General Consultative Status with the United Nations Economic and Social Council Sulabh Gram, Mahavir Enclave, Palam Dabri Road, New Delhi - 110 045 Tel. Nos. : 91-11-25031518, 25031519; Fax Nos : 91-11-25034014, 91-11-25055952 E-mail: info@sulabhinternational.org, sulabhinfo@gmail.com Website: www.sulabhinternational.org, www.sulabhtoiletmuseum.org

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32 अनाम हीरो

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

24 - 30 जुलाई 2017

अनाम हीरो पिंकी गोगोई और पूजा गोगोई

साहस की सहेलियां

असम में दो साहसी युवा सहेलियों-पिंकी और पूजा ने जान पर खेलकर 30 लोगों को बाढ़ में डूबने से बचाया है

सम में बाढ़ से जान-माल की काफी क्षति हुई है। इस बीच, वहां दो साहसी युवा सहेलियों ने जान पर खेलकर 30 लोगों को डूबने से बचाया है। ये दो सहेलियां हैंपिंकी गोगोई और पूजा गोगोई। दरअसल, ऊपरी असम के लखीमपुर जिले के हातीलुंग गांव में स्थिति एक दिन सुबह तब अचानक काफी गंभीर हो गई, जब स्थानीय डैम से काफी पानी छोड़ा गया। नतीजतन, गांव सहित पूरे इलाके में भयंकर बाढ़ आ गई। ऐसे में कई लोग तेज बहाव के बीच फंस गए। उनकी स्थिति ऐसी थी कि वे अपने बचाव के लिए

कुछ नहीं कर सकते थे। बाकी लोगों के पास भी खुद को अपने जरूरी सामान को बचाने के लिए कुछ लम्हों का ही समय था। पिंकी और पूजा बचपन से हाथ से बनी बांस का नाव चलाने का शौक रखती थीं। उस दिन जब गांव में बाढ़ आई तो उन्होंने इसी नाव की मदद से 30 ग्रामीणों को डूबने से बचाया। गांव में आई बाढ़ ​िकतनी जानलेवा थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई पेड़ तक डूब गए थे और उनसे करीब तीन फीट ऊपर पानी बह रहा था। अब न सिर्फ इस गांव में, बल्कि पूरे इलाके में दोनों युवा सहेलियों

न्यूजमेकर

सबसे युवा डॉक्टर

भा

भारतीय मूल के अर्पण दोषी जल्द ही उत्तर-पूर्व ब्रिटेन के एक अस्पताल में काम करने वाला देश का सबसे युवा डॉक्टर बन जाएंगे

अर्पण दोषी

रतीय चिकित्सा जगत में इन दिनों अर्पण दोशी का नाम खासा चर्चा में है। भारतीय मूल के दोषी जल्द ही उत्तर-पूर्व ब्रिटेन के एक अस्पताल में काम करने वाले देश के सबसे युवा डॉक्टर बन जाएंगे। अर्पण दोषी ने 21 साल, 335 दिन की उम्र में यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड से बैचलर ऑफ मेडि​िसन और बैचलर ऑफ सर्जरी में स्नातक डिग्री हासिल की है। वह अगले महीने जूनियर डॉक्टर के तौर पर काम करना शुरू कर देंगे। इसके साथ ही वे सबसे युवा कामकाजी डॉक्टर का पिछला रिकाॅर्ड 17 दिन के अंतर से तोड़ देंगे। भारत में जन्मे अर्पण दोषी ने बताया, ‘मुझे पता नहीं था कि मैं योग्यता हासिल करने वाला सबसे युवा व्यक्ति हूं। मेरे एक दोस्त ने इंटरनेट पर

की बहादुरी के चर्चे हैं। सब लोग सरकार से बहादुरी के लिए उन्हें सम्मानित करने की मांग कर रहे हैं। इस बारे में स्थानीय लोगों ने

यह जानकारी देखी। मैंने अपने माता-पिता को भी अब तक इसके बारे में नहीं बताया है लेकिन मुझे पता है कि वे काफी गौरवान्वित होंगे।’ अर्पण ने गुजरात के गांधीनगर में 13 साल की उम्र तक स्कूल की पढ़ाई की थी। इसके बाद उनके मेकैनिकल इंजीनियर पिता को विदेश में नौकरी मिल गई और पूरा परिवार देश से चला गया। अर्पण बताते हैं, ‘मेरा सपना हार्ट सर्जन बनना है, लेकिन यह एक बेहद प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्र है। यह चौंकाने वाली बात नहीं है कि मैं डॉक्टर बन गया हूं।’ अर्पण अगस्त में यॉर्क टीचिंग हॉस्पिटल में जूनियर डॉक्टर के तौर पर अपने दो साल का प्रशिक्षण शुरू करेंग।े

मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रि​िजजू से लिखित मांग भी की है।

ब्रिटेन के संसदीय पैनल में महिला सिख प्रीत उन 11 सांसदों में से एक हैं, जो गृह मंत्रालय का कार्य देखेंगी

में पहली ब्रि टेबारन केसिखसंसदीयमहिलाचयनसांसमिति सद प्रीत कौर

गिल को चुना गया है। चयन समिति गृह कार्यालय के कामकाज का निरीक्षण करती है। प्रीत लेबर पार्टी की सांसद हैं और इन्होंने बर्मिंघम एबेस्टन सीट से वर्ष 2017 में चुनाव जीता है। प्रीत उन 11 सांसदों में से एक हैं, जो गृह मंत्रालय के क्रियाकलाप को देखेंगी। लेबर पार्टी की सांसद कैथ वैज नौ साल के लिए इस चयन समिति की अध्यक्ष थीं, लेकिन पिछले साल सितंबर में उन्हें ड्रग्स के आरोपों के कारण पद छोड़ना पड़ा। प्रीत गिल ने कहा कि चयन समिति में चुने जाने के बाद वह बेहद खुश हैं। संसद के भंग होने के बाद इस समिति को निरस्त कर दिया गया

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 32

प्रीत कौर गिल था, लेकिन अब पुन: इसे बहाल किया गया है। उन्होंने बताया कि मैं जांच के काम में रुचि रखती हूं और विशेषकर बच्चों के यौन शोषण के मामले को देखूंगी। प्रीत ने बताया कि उन्होंने दिल्ली में स्ट्रीट चिल्ड्रेन पर बहुत काम किया है। 11 सांसदों वाली इस समिति के एक अन्य 44 वर्षीय सदस्य ने कहा, ‘इस चुनाव से पहले हमारे पास एक भी सिख सांसद नहीं था। इसीलिए सिख का कोई प्रतिनिधि नहीं था।’ ब्रिटिश सिखों के लिए ऑल पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप (एपीपीजी) का नेतृत्व के लिए भी गिल को चुना गया है। यह ग्रुप भारत और ब्रिटेन के सांसदों और लोगों के बीच सहयोग व समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए काम करता है।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 32)  
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