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वर्ष-1 | अंक-23 | 22-28 मई 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

06 अल्पसंख्यक

नई राहें

अल्पसंख्यक कल्याण के लिए कई अहम पहल

08 बातचीत

स्वच्छता के लिए प्रार्थना

प्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल से विशेष बातचीत

30 श्रद्धांजलि

सूना हो गया ‘नदी का घर’ नर्मदा प्रेमी अनिल माधव दवे की प्रेरक स्मृति

‘नर्मदा की एक-एक बूंद की कीमत जानता हूं’ नरेंद्र मोदी

148 दिनों तक चली नर्मदा सेवा यात्रा के समापन पर प्रधानमंत्री मोदी ने नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल की तारीफ की

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सुनील पटेल

मामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा' के पूरे होने के मौके पर नर्मदा नदी के उद्गमस्थल अनूपपुर जिले के अमरकंटक में प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमारे यहां कहा जाता है जो एक साल का सोचता है, वो अनाज बोता है और जो भविष्य का सोचता है वह फलदार वृक्ष बोता है। ये फलदार वृक्ष आने वाले समय में कई परिवारों के लिए कमाई की गारंटी भी बन जाते हैं।’ इस मौके पर नरेंद्र मोदी ने स्थानीय नर्मदा मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की और डेढ़ सौ दिनों की नर्मदा यात्रा को असंभव और असामान्य बताया।

‘फ्यूचर विजन का परफेक्ट डॉक्यूमेंट’

उन्होंने कहा, ‘मध्य प्रदेश सरकार ने नर्मदा नदी के संरक्षण अभियान को लेकर जो कार्ययोजना बनाई है। उसमें हर व्यक्ति, हर जगह के लिए काम है। कब करना और कैसे करना है, उसका विधि-विधान है। कौन किस काम को देखेगा, इसका ब्योरा है। एक हिसाब से यह ‘फ्यूचर विजन का परफेक्ट डॉक्यूमेंट’ है।’ उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार ने नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर एक-एक किलोमीटर तक फलदार पेड़ों के पौधे लगाने की योजना बनाई है। इसके तहत पहले तीन साल तक सरकार किसानों को मुआवजा देगी, क्योंकि इन पेड़ों में फल कम से कम तीन साल बाद ही लगेंगे।

दिलचस्प है कि नर्मदा सेवा यात्रा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में चली। ऐसा पहली बार देखने में आया कि कोई मुख्यमंत्री किसी नदी के संरक्षण और स्वच्छता के संकल्प के लिए इस तरह के कार्यक्रम को हाथ में ले। चौहान की इस कार्यक्रम के पीछे जो उनकी प्रतिबद्धता रही, उसकी सराहना प्रधानमंत्री मोदी ने भी की। अलबत्ता इस यात्रा को लेकर मीडिया की उदासीनता से वे कुछ निराश भी दिखे। उन्होंने कहा, ‘नदी संरक्षण का इस तरह का अभियान दुनिया के किसी और देश में चला होता, तो उसकी दुनियाभर में चर्चा हो रही होती, मीडिया इस अभियान के पीछे भागा-भागा जाता, मगर इस यात्रा के साथ ऐसा नहीं हुआ, यह

एक नजर

नर्मदा संरक्षण को लेकर विस्तृत कार्ययोजना जारी नर्मदा यात्रा में करीब 25 लाख लोगों ने शिरकत की

11 दिसंबर 2016 को अमरकंटक से शुरू हुई थी यात्रा हमारा दुर्भाग्य है।’ मोदी ने मुख्यमंत्री शिवराज की योजनाओं और उनकी कार्यशैली की जमकर सराहना ...जारी पेज 2


02 आवरण कथा

22-28 मई 2017

‘नर्मदा की एक-एक बूंद की कीमत जानता हूं’

नर्मदा और अमरकंटक का साझा महत्व 148 दिनों तक चली नर्मदा सेवा यात्रा के समापन पर प्रधानमंत्री मोदी ने नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल की तारीफ की

नर्मदा नदी का जल 40 लाख लोगों की प्यास बुझाता है और 1.7 मिलियन हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के काम आता है। नर्मदा के किनारे ही मध्य प्रदेश की वन संपदा का सर्वाधिक हिस्सा पड़ता है

र्मदा नदी के तट पर मनाए जा रहे 148 दिवसीय 'नमा​िम देवी नर्मदा सेवा यात्रा' के समापन समारोह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्मदा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मध्य प्रदेश के अमरकंटक की यात्रा की। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने नर्मदा नदी के संरक्षण को लेकर एक खाका भी जारी किया। नर्मदा नदी अमरकंटक से निकलकर पूरे विंध्याचल पर्वत श्रृंखला क्षेत्र से होकर गुजरती है। नर्मदा के कारण ही इस क्षेत्र का विकास एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में हुआ है। बात करें नर्मदा सेवा यात्रा की तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 11 दिसंबर 2016 को इसका आरंभ किया था। इस यात्रा में शामिल लोगों को नदी के किनारे-किनारे यात्रा कराते हुए उन्हें नदी के उद्गम स्थल से लेकर अरब सागर में मिलाने वाले स्थान खंभात की खाड़ी तक और फिर खंभात की खाड़ी से यात्रा करते हुए नर्मदा के उद्गम स्थल तक पहुंचा दिया गया था। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य, नदी के संरक्षण और इसके संसाधनों के टिकाऊ उपयोग की जरूरतों के बारे में लोगों के बीच जागरुकता बढ़ाना और नदी के तटवर्ती इलाकों की रक्षा करने के लिए उसके किनारे पौधारोपण को बढ़ावा देना रहा। साथ ही इसका मकसद टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करते हुए उसे खत्म करना है। 148 दिनों की इस सघन यात्रा में 1,100 गांवों से गुजरते हुए 3,350 किलोमीटर की दूरी तय की गई। महानगरीय जीवनशैली के कारण अंदर तक थक चुके लोगों के लिए मध्य प्रदेश के विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के घने, प्राकृतिक जंगलों की यात्रा वैसा ही अहसास कराती है, मानो प्रचंड गर्मी से भरे किसी शुष्क मौसम के आखिर में लंबे समय से इंतजार करा रहे मॉनसून ने उस पर ठंडक के वरदान की बारिश कर दी हो। नर्मदा परिक्रमा के अंत को कवर करने वाली मीडिया के साथियों को भी कुछ ऐसा ही अहसास हुआ जब वे नई दिल्ली की बेचैन कर देने वाली गर्मी से दूर अमरकंटक में नर्मदा सेवा यात्रा का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समापन करने के कार्यक्रम को कवर करने पहुंचे। यह उनके लिए ईश्वर की ओर से मिलने वाले किसी हरे अवकाश की तरह था।

नर्मदा सेवा यात्रा के आखिर में जब नरेंद्र मोदी ने समारोह के हिस्से के रूप में एक स्वच्छ नर्मदा की शपथ लेने की बात दोहराई तो यह देश में नदियों से जुड़ी संवेदना और उसके संरक्षण के लिहाज से एक अभिभूत कर देने वाला क्षण था। भौगोलिक दृष्टि से नर्मदा नदी देश की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इसके ठीक उलट भारतीय प्रायद्वीप की दूसरी सभी नदियां पश्चिम से पूरब की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती हैं।

40 लाख लोगों की प्यास बुझाने वाली नदी

नर्मदा को मध्य प्रदेश की जीवनरेखा अगर माना जाता है, तो इसकी बड़ी वजह यह है कि यह यहां के लोगों की आस्था से लेकर प्यास तक से जुड़ा है। नर्मदा नदी का जल 40 लाख लोगों की प्यास बुझाता है और 1.7 मिलियन हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के काम आता है। नर्मदा के किनारे ही मध्य प्रदेश की वन संपदा का सर्वाधिक हिस्सा पड़ता है। इस लिहाज से देखें तो इस सूबे के पर्यावरण का बहुत बड़ा दारोमदार नर्मदा की सजलता और स्वच्छता पर निर्भर है। नर्मदा अपने इस महत्व के कारण ही इस सूबे के लोकजीवन और आस्था के साथ सैकड़ों सालों से गहराई से जुड़ी है। नर्मदा यहां 16 जिलों को पार करती हुई करीब 1,077 किलोमीटर दूरी तय करती है। इस पूरे क्षेत्र में कई ऐसी परंपराएं और त्योहार प्रचलन में हैं, जिस कारण तकरीबन पूरे साल नर्मदा की पूजा होती है। मध्य प्रदेश में होने वाली दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से परिचित हर एक शख्स को अच्छी तरह मालूम है कि नर्मदा यात्रा ने राज्य के लोगों की भावनाओं में किस तरह बड़े स्तर पर जुड़ाव पैदा किया है। यह भी कि देश के पर्यटन के लिहाज से मध्य प्रदेश अब भी भले पर्यटन मानचित्र पर कम दिखने वाला प्रदेश है, पर इस कारण इस प्रांत को अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने में मदद भी मिली है।

'विंध्य सुपर ग्रुप'

अमरकंटक मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में

विंध्याचल पर्वत श्रृंखला (विंध्य पर्वत) पर स्थित है। यह 'विंध्य सुपर ग्रुप' के नाम से भी जाना जाता है और यह दुनिया के सबसे बड़े और मोटे सिलसिलेवार तलछटों में से एक है। यह भारत में तीर्थयात्रा के नक्शे में पारिस्थितिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और पर्यटन के महत्व वाला यह सबसे छोटे पवित्र स्थलों में से एक है। नर्मदा के अलावा एक और महत्वपूर्ण नदी सोन है, जो अमरकंटक से निकलती है और उत्तर प्रदेश, ओडिशा से गुजरते हुए बिहार में जाकर एक विशाल आकार ले लेती है। बिहार के रोहतास जिले में डेहरी शहर भी सोन नदी के किनारे स्थित होने के कारण डेहरी-ऑनसोन के नाम से जाना जाता है। सोन नदी पर बना 3.065 किमी की लंबाई वाला पुल भारत का सबसे लंबा रेलवे पुल है, जो सोन नगर और डेहरी को जोड़ता है और सोन ब्रिज के रूप में लोगों के बीच जाना जाता है।

की साथ ही कहा कि 148 दिन चली 'नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा' को प्रदेश के लोगों का भरपूर साथ मिला है।

कृषि अर्थव्यवस्था में योगदान

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह नर्मदा के संरक्षण और विकास को लेकर कार्य कर रहे हैं, उससे प्रभावित होकर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वे मुख्यमंत्री से कहेंगे कि वह कार्ययोजना की किताब अन्य राज्यों को भी भेजें, ताकि वे प्राकृतिक संसाधन की रक्षा का तरीका क्या होता है, उसे उदाहरण के तौर पर लेकर अपने-अपने राज्य में योजना बनाकर लागू करें। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर नदियों के संरक्षण को अहम बताते हुए कहा, ‘जल ही जीवन है, नदी माता है, यह तो कहते हैं, मगर हमारी सारी अर्थव्यवस्था उसी पर आधारित होती है। उसके बिना अर्थव्यवस्था खोखली हो जाती है। मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर 20 प्रतिशत पहुंची तो उसमें सबसे बड़ा योगदान नर्मदा का है।’ प्रधानमंत्री ने मध्य प्रदेश के विकास में नर्मदा की भूमिका की चर्चा करते हुए आगे कहा, ‘नर्मदा में किसान की जिंदगी बदलने की ताकत है। 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का काम पूरे देश में चल रहा है। मध्य प्रदेश ने उसकी पूरी योजना तैयार कर दी है, जिसका लाभ देश को मिलेगा। मैं गुजरात से हूं, नर्मदा की एक-एक बूंद की कीमत जानता हूं।'

कुंवरी नदी नर्मदा

हिंदू पौराणिक कथाओं में अमरकंटक का जिक्र स्कंद पुराण में मिलता है, जहां इसे रेवा खंड के रूप में जाना जाता है। रामायण और महाभारत में इस नदी का जिक्र रेवा के रूप में किया गया है। धार्मिक रूप से इसका महत्व इसी बात से होता है कि यह एक कुंवारी नदी है। इसके अलावा कई और पौराणिक कथाओं और लोककथाओं के मुताबिक भी नर्मदा और सोन के बीच शादी नहीं हुई और नर्मदा कुंवारी बनी रही, जबकि सोन ने एक और छोटी नदी जोएला से शादी कर ली, जो नर्मदा की एक साथी थीं।

गंगा से बढ़कर नर्मदा

एक पौराणिक मान्यता ऐसी भी है कि गंगा नदी की तीन दिन की यात्रा और नर्मदा की एक दिन की यात्रा से समान लाभ होता है। मान्यता यह भी है कि अमरकंटक में किए गए 10,000 मंत्रोच्चारण किसी दूसरे तीर्थस्थलों पर किए गए एक लाख मंत्रोच्चारण के बराबर है। भोपाल के जाने माने ज्योतिषी और विद्वान प्रो. शिव प्रसाद पाठक का कहना है, 'यह शक्ति (आध्यात्मिक शक्ति) पीठ के रूप में भी जाना जाता है और इसका एक अद्भुत ज्योतिषीय और अनुष्ठानिक महत्व है।' विंध्याचल की मैकाल पर्वत श्रृंखला पर स्थित अमरकंटक अपने समृद्ध वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और औषधीय जड़ीबूटियों के साथ-साथ चिकित्सकीय महत्व के रूप में भी जाना जाता है।

‘नर्मदा में किसान की जिंदगी बदलने की ताकत है। 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का काम पूरे देश में चल रहा है। मध्य प्रदेश ने उसकी पूरी योजना तैयार कर दी है, जिसका लाभ देश को मिलेगा’ - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


22-28 मई 2017

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नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान 15 प्रमुख घोषणाएं

अमरकंटक को देश के सबसे सुंदर तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा प्रत्येक ग्राम पंचायत में नर्मदा सेवा समिति का गठन किया जाएगा नर्मदा तटीय क्षेत्रों को नशामुक्ति बनाने की दिशा में कार्य किया जाएगा पवित्र नगर अमरकंटक में तीर्थ-यात्रियों के लिए दो मोबाईल टायलेट व दो सामुदायिक शौचालय लागत 45 लाख स्वीकृत किया जाएगा नगर परिषद अमरकंटक के शहरी गरीबों को प्रधानमंत्री आवास योजना में आवास उपलब्ध कराए जाएंगे पवित्र नगर अमरकंटक में मां नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्ते करने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हेतु 15.50 करोड़ की राशि प्रदान की जाएगी नगर परिषद अमरकंटक स्थित सभी शौचालय विहीन पात्र घरों में शौचालय का निर्माण किया जाएगा नर्मदा तट पर पक्की दुकानों का निर्माण किया जाएगा शासकीय हाईस्कूल बोंदर, विकास खंड करंजिया हेतु नवीन भवन स्वीकृत किया जाएगा अगले साल से नर्मदा के किनारे शराब की दुकानें नहीं होंगी नर्मदा नदी के तटों पर जैविक खेती कराई जाएंगी नर्मदा नदी के दोनों तटों पर शासकीय एवं निजी जमीनों पर पेड़ लगाए जाएंगे। जो किसान निजी भूमि पर पौधे लगाएंगे, उन्हें मध्य प्रदेश शासन द्वारा मुआवजा दिया जाएगा नर्मदा नदी के तटों पर चेंजिंग रूम बनाए जाएंगे नर्मदा नदी के तटों पर अंतिम संस्कार का स्थान बनाया जाएगा। नर्मदा नदी में सीवेज का पानी न आए, इसके लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएंगे

नर्मदा सेवा यात्रा के 11 प्रमुख उद्देश्य • पौधारोपण के माध्यम से नदी तटीय क्षेत्र का संरक्षण • उन्नत स्वच्छता प्रबंधन, तरल एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सामुदायिक एवं व्यक्तिगत स्वच्छता प्रबंधन • जल संग्रहण एवं नदी कछार क्षेत्र का विकास • प्रदूषण नियंत्रण एवं प्रबंधन • जैविक खेती एवं उत्तम कृषि अभ्यास को प्रोत्साहन, संवेदनशील एवं स्वच्छ कृषि का विकास • नर्मदा नदी के संरक्षण एवं संवर्द्धन को आजीविका से जोड़ना • नदी संसाधनों का यथोचित उपयोग सुनिश्चित करना • नदी क्षेत्र में स्वस्थ पारिस्थितिकीय तंत्र का विकास करना • नर्मदा नदी के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु समाज की क्षमतावर्द्धन एवं सहभागिता सुनिश्चित करना • नर्मदा तटीय क्षेत्र में नशामुक्त समाज का निर्माण करना • 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान को गति देना

अनूठी यात्रा

आवरण कथा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा के प्रवाह को अविरल बनाए रखने और नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए निकाली गई नर्मदा सेवा यात्रा को प्रदेश, देश और विदेश में मिली सराहना ने यात्रा को अपने ढंग का अनूठा अभियान का दर्जा दे दिया है। यात्रा के दौरान लोगों को नर्मदा संरक्षण के प्रति जागरूक करने

के लिए 1093 जन-संवाद हो चुके हैं और इसके विभिन्न चरणों में करीब 25 लाख लोगों ने हिस्सा लिया है।

जन-संवादों ने समझाया संरक्षण का महत्व जन-संवाद कार्यक्रमों में नर्मदा जल-धारा को अविरल बनाने के लिए पौधा रोपण, तटों की

साफ-सफाई, जल-धारा में प्रतिमा विसर्जन न करने, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ आदि के प्रति भी लोगों को जागरूक किया गया। इसके सकारात्मक परिणाम दिखने भी लगे हैं। इस यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों के 600 के करीब दिग्गज हिस्सा ले चुके हैं। गत 11 दिसम्बर 2016 को अमरकंटक से शुरू हुई यह यात्रा 615 ग्राम पंचायत, 1093 गांव और 51 विकास खंडों से गुजर चुकी है। मुख्य यात्रा में 1862 उप यात्राएं शामिल हुई थीं। लगभग 85 हजार लोगों ने नर्मदा सेवा की वेबसाइट पर पंजीयन करवाया है। अब तक 40 हजार पौधे सांकेतिक रूप से रोपे गए हैं। यात्रा दल के सदस्यों के भोजन और अन्य व्यवस्थाओं में 2032 सामाजिक एवं स्वयंसेवी संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। तटीय ग्राम पंचायतों में 712 नर्मदा सेवा समितियों का गठन भी किया गया है।

लता, बिग बी और दलाई लामा ने भी सराहा

भारत रत्न से सम्मानित पार्श्वगायिका लता मंगेशकर, फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन और तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने नर्मदा के संरक्षण के लिए चली नर्मदा सेवा यात्रा की तारीफ की है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भेजे पत्र में अमिताभ ने इस यात्रा में शामिल न हो पाने पर खेद जताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर ट्वीट के जरिए भी इस अभियान की तारीफ की है। अपने

ट्वीट में बिग बी ने कहा कि नर्मदा सेवा यात्रा जैसी पहल से न केवल हमारी नदियां स्वच्छ होंगी, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को साफ-सुथरी नदियां भी मिलेंगी। एक अन्य ट्वीट में अमिताभ ने बताया कि ‘नमामि देवी नर्मदे-सेवा यात्रा’ एक महान अभियान है, जिसे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शुरू किया है, ताकि नर्मदा नदी को प्रदूषण से मुक्त किया जा सके। ट्वीट में उन्होंने लिखा कि यह यात्रा निश्चित रूप से समूचे भारत के लोगों को जागरूक करेगी और वे अपनी जीवनदायिनी नदियों को संरक्षित करना शुरू कर देंगे। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘केवल बोलना ही नहीं है, अपने आसपास के इलाकों को खुले में शौच से मुक्त करें, नदियों के तटों पर और अधिक पेड़ लगाओ। इनसे नदियां निर्मल एवं स्वच्छ होंगी। अमिताभ ने कहा कि इन छोटे-छोटे प्रयासों से हम जीवनदायी मां नर्मदा को पुनर्जीवित कर सकते हैं। हर-हर नर्मदे।’ इसी तरह लता मंगेशकर ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा, ‘मैं मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्मी हूं। इस कारण मेरा नर्मदा नदी से अनोखा संबंध रहा है। मैं अभिनंदन करना चाहती हूं कि नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए अभियान चलाकर एक अनिवार्य कदम उठाया गया है। यह निश्चित रूप से सफल होगा।’ तिब्बती धर्म गुरू दलाई लामा तो देवास के पास नेमावर में नर्मदा सेवा यात्रा में शामिल भी हुए । इस दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद रहे। वहां बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनसंवाद सभा को भी संबोधित किया। तिब्बती धर्म गुरु ने कहा, ‘वर्तमान में दी जा रही शिक्षा से केवल भौतिक विकास होता हैं। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे कि आपसी भाई चारा बढ़े।’

मानव श्रृंखला का विश्व रिकार्ड

'नमामि देवी नर्मदे'-सेवा यात्रा की कड़ी में 9 जनवरी को होशंगाबाद जिले में नागरिकों के समर्थन से मानव श्रृंखला का विश्व रिकार्ड बना। कुल 125 किलोमीटर तक नर्मदा नदी के घाट और 78 स्थान पर 25 हजार से अधिक लोगों ने श्रृंखला बनाकर यात्रा का समर्थन किया।


04 स्वच्छता

22-28 मई 2017

हर ओर स्वच्छता हर घर को पानी स्वच्छता अभियान

मोदी सरकार ने जहां एक तरफ तीन साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है, वहीं इस दौरान वह स्वच्छता और पानी के मुद्दे जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करने के करीब है

रेंद्र मोदी सरकार ने 16 मई को तीन साल कार्यकाल पूरा कर लिया। सरकार ने इस दौरान ‘मेक इन इंडिया’ से लेकर ‘डिजिटल इंडिया’ तक और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ से लेकर ‘स्किल इंडिया’ तक कई अभिनव योजनाएं इस दौरान शुरू की। पर इन तमाम कार्यक्रमों-योजनाओं के बीच सरकार ने जिस अभियान को शिद्दत के साथ शुरू किया, वह है ‘स्वच्छ भारत मिशन’। दो अक्टूबर, 2014 को प्रधानमंत्री मोदी ने इस मिशन को शुरू किया और संकल्प व्यक्त किया कि 2019 तक भारत एक स्वच्छ और सुंदर देश के रूप में दुनिया के सामने होगा। आज की तारीख में यह मिशन एक राष्ट्रीय आंदोलन का नाम है और इसमें समाज का हर तबका अपने-अपने तरीके से भूमिका निभा रहा है। इस बीच स्वच्छता के साथ सरकार ने जो संकल्प व्यक्त किया है, उसमें उसके कई मंत्रालय अलग-अलग टास्क को पूरा करने में लगे हैं। भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है, जब किसी सरकार ने घोषित तौर पर स्वच्छता को अपना

प्राइम एजेंडा माना हो और साफ-सफाई के साथ खुले में शौच मुक्ति से लेकर पेयजल उपलब्धता से लेकर नदी संरक्षण तक कई महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की तरफ एक साथ कदम बढ़ा रही हो।

बापू के विजन को समर्पित मिशन

दिलचस्प है कि 15 अगस्त 2014 को स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री ने स्वच्छता और शौचालय की बात कहीं थी, तो आलोचकों ने उन पर जमकर निशाना साधा कि लाल किले की प्राचीर से किसी प्रधानमंत्री को शौचालय का जिक्र करना शोभा नहीं देता, लेकिन आलोचनाओं पर ध्यान दिए बिना पीएम मोदी का ये अभियान अपनी सफलता की ओर बढ़ रहा है। इसके सकारात्मक नतीजे सबके सामने हैं- देश में ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) जिलों की संख्या अब 136 तक पहुंच चुकी है - 1, 95,207 से ज्यादा गांव अब ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त ) हो गए हैं - ‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत गंगा के

किनारे बसे 5,000 गांवों को शौच मुक्त करने के लक्ष्य के करीब पहुंचते हुए, 4058 गांव ओडीएफ (खुले में शौच से मुक्त) हो गए हैं - स्वच्छ भारत मिशन ( ग्रामीण) के तहत अब तक 3 करोड़ 99 लाख 43 हजार 7 सौ 17 शौचालयों का गांवों में निर्माण हो चुका है। इनमें घरेलू शौचालयों की संख्या 3.47 करोड़ है - खुले में शौचमुक्त ग्राम पंचायतों की संख्या फरवरी 2017 तक 74673 हो चुकी है, जबकि खुले में शौचमुक्त जिलों की संख्या 96 है - तीन राज्यों में घर-घर शौचालय युक्त होने का लक्ष्य पूरा। ये तीन राज्य हैं- सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और केरल

एक नजर

ग्रामीण क्षेत्रों में करीब चार करोड़ शौचालयों का निर्माण

अब तक तीन राज्य पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त

सौ सांस्कृतिक स्थलों पर चल रहा विशेष स्वच्छता अभियान

100 जगहों पर विशेष स्वच्छता अभियान

स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश के 100 प्रतिष्ठित धरोहरों, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जगहों को ध्यान में रखते हुए विशेष सफाई योजना चलाई जा रही है। इन 100 जगहों की सूची के पहले चरण में जिन 10 महत्वपूर्ण स्थानों,जहां स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है, वे हैं- 1. अजमेर शरीफ दरगाह 2. सीएसटी, मुंबई 3. स्वर्ण मंदिर 4. कामाख्या मंदिर 5. मणिकर्णिका घाट 6. मीनाक्षी मंदिर 7. माता वैष्णो देवी 8. जगन्नाथ मंदिर 9. ताज महल और 10. तिरुपति मंदिर । इन स्थानों के अतिरिक्त 10 अन्य स्थानों की घोषणा 25 अप्रैल 2017 को की गई। ये महत्वपूर्ण स्थान हैं - 1. गंगोत्री, 2. यमुनोत्री 3. महाकालेश्वर मंदिर, 4. चार मीनार 5. चर्च एंड कॉन्वेंट ऑफ सेंट

भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है, जब किसी सरकार ने घोषित तौर पर स्वच्छता को अपना प्राइम एजेंडा माना हो


22-28 मई 2017

2030 तक

सितारों ने बढ़ाई स्वच्छता की चमक

अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और अक्षय कुमार जैसे सितारे अपनी लोकप्रियता की मदद से स्वच्छता मिशन को गति दे रहे हैं

रवरी, 2017 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के अंतर्गत तेलंगाना के वारंगल जिले में इसी तरह की कवायद की सराहना की थी। उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से संबद्ध विख्यात व्यक्तियों का आह्वान किया था कि वे ‘वेस्ट टू वेल्थ’ यानी ‘कचरे से संपदा’ शौचालय प्रौद्योगिकी के बारे में लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए आगे आएं। इसी आह्वान पर फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार इस अभियान का हिस्सा हो गए हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश के खरगौन जिले के रेघवन गांव में शौचालयों के गड्ढे खाली करने के अभियान की शुरुआत इस इसी साल एक अप्रैल से की। उन्होंने गांव के एक घर में जाकर शौचालय के भरे हुए गड्ढे को फ्रांसिस ऑफ असीसी 6. आदि शंकराचार्य निवास 7. गोमतेश्वर 8. बैजनाथ धाम 9. गया तीर्थ और 10. सोमनाथ मंदिर।

मंडी और सिंधुदुर्ग सबसे स्वच्छ

पिछले साल किए गए एक सर्वे के मुताबिक मंडी और महाराष्ट्र का सिंधुदुर्ग देश के सबसे स्वच्छ जिले हैं। 8 सितंबर 2016 को जारी किए गए इस सर्वे में 22 पहाड़ी जिलों और 53 मैदानी जिलों को शामिल किया गया था। पहाड़ी जिलों में मंडी को सबसे अधिक स्वच्छ और मैदानी जिलों में सिंधुदुर्ग सबसे अधिक स्वच्छ जिले घोषित किए गए।

विश्व बैंक की मदद

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के लिए विश्व बैंक की 1,500 मिलियन डॉलर वाली परियोजना को 23 मार्च 2016 मंजूरी दे दी गई। यह परियोजना ‘स्वच्छ भारत मिशन’ (ग्रामीण) के तहत राज्यों को उनके प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहित करती है। अनुमोदित परियोजना के तहत राज्यों के प्रदर्शन को निश्चित मापदंडों के आधार पर मापा जाएगा, जिसे डिसबर्समेंट-लिंक्ड इंडीकेटर्स (डीएलआई) कहा जाता है। तीन डीएलआई इस प्रकार हैं:1. पिछले साल की तुलना में राज्यों में ग्रामीण परिवारों के बीच खुले में शौच के मामलों में कमी के आधार पर राज्यों को धन जारी किया जाएगा। 2. गांवों में खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ)

खाली करने का काम सार्वजिनक तौर पर किया। अपने हाथों से ऐसा करके उन्होंने यह दिखाया कि शौचालय से कैसे कंपोस्ट बनता है। स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑडियो-विजुअल अभियान के विज्ञापनों में ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर को बनाया गया है। इन विज्ञापनों के माध्यम से लोगों का समर्थन जुटाकर अभियान को सफल बनाने का प्रयास है। इनके विज्ञापन लोगों पर काफी प्रभाव छोड़ रहे हैं। खासतौर पर बच्चे और ग्रामीण अंचलों के लोग इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर अपने-अपने स्तर पर स्वच्छता को लेकर कई दिलचस्प पहल को अंजाम दिया है। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। की स्थिति को कायम रखना। इसके तहत ओडीएफ गांवों में रहने वाली अनुमानित जनसंख्या के आधार पर फंड जारी किया जाएगा। 3. उन्नत ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन (एसएलड्ल्यूएम) द्वारा ग्रामीण आबादी के प्रतिशत में वृद्धि। इस के तहत धन का आवंटन जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा।

राजघाट पर राष्ट्रीय स्वच्छता केंद्र

दिल्ली में राजघाट पर राष्ट्रीय स्वच्छता केंद्र को बनाए जाने की योजना सरकार ने बनाई है। इस केंद्र से देश भर में चल रहे स्वच्छता कार्यक्रम को सुचारू ढंग से चलाने में और मदद मिलेगी। पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय की पहल पर राजघाट पर स्थित गांधी स्मृति व दर्शन समिति यह केंद्र स्थापित करेगा।

विशेष बजटीय प्रावधान

‘स्वच्छ भारत मिशन’ के लिए वैसे तो लोग अपने साधनों से भी काफी कार्य कर रहे हैं, पर सरकार ने अपनी तरफ से इसके लिए बड़ा बजटीय प्रावधान किया है। मिशन के लिए वित्त वर्ष 2016-17 में 11,300 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसमें लगभग 12800 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इसी तरह वित्तीय वर्ष 2017-18 में इस के लिए 16248 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

स्वच्छता

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‘हर घर जल’

पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय ने 2030 तक हर घर जल पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन साल का कार्यकाल जिन वजहों के कारण सर्वाधिक चर्चा में रहा, वह तो निश्चित रूप से ‘राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन’ है, पर इस मिशन के साथ उन्होंने जल संरक्षण और इसके वितरण के मुद्दे को भी जोड़कर इसके आयाम को और प्रभावशाली बना दिया है। आज की तारीख में प्रत्येक ग्रामीण को बाढ़ और सूखे सहित सभी परिस्थितियों में पीने, भोजन बनाने एवं अन्य घरेलू आवश्यकताओं तथा मवेशियों हेतु पर्याप्त जल उपलब्ध कराने के लक्ष्य के साथ केंद्र सरकार अपनी योजनाओं पर कार्य कर रही है। इसी के तहत पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय ने 2030 तक हर घर जल पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। वर्ष 2017 तक देश के कम-से-कम 55 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल-जल पहुंचाया जाएगा। इसमें कम से कम 35 प्रतिशत घरों तक सीधे नल की सुविधा होगी, 20 प्रतिशत से कम लोगों को ही सार्वजनिक नल का उपयोग करना पड़ेगा, जबकि हैंडपंप का उपयोग करने वालों की संख्या को 45 प्रतिशत से नीचे लाने का लक्ष्य है। बात करें पूरे देश में जलापूर्ति के लक्ष्य की तो मौजूदा सूरत में देश में लगभग 17 लाख 14 हजार ग्रामीण बस्तियां हैं, जिनमें से लगभग 77 फीसदी बस्तियों को प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 40 लीटर से भी ज्यादा सुरक्षित पेयजल मुहैया कराया जाता है, जिनमें से लगभग 4 फीसदी बस्तियां जल गुणवत्ता की समस्याओं से जूझ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप वर्ष 2030 तक प्रत्येक घर को निरंतर नल का पानी उपलब्ध कराने की चुनौती वाकई बहुत बड़ी है। इस लक्ष्य को पूरा होने तक हर वर्ष 23,000 करोड़ रुपए के केंद्रीय कोष की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही देश में लगभग 2000 ब्लॉक ऐसे हैं, जहां सतह एवं भूमिगत जल स्रोतों की भारी किल्लत है। इन क्षेत्रों में ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं के बीच समुचित सामंजस्य बैठाते हुए युद्ध स्तर पर जल संरक्षण करने की योजना चल रही है। पानी की खराब गुणवत्ता से निपटने के लिए सरकार ने वरीयता क्रम में आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों को ऊपर रखा है। सरकार ने 25,000

करोड़ रुपए की योजना के साथ मार्च 2021 तक देश में लगभग 28000 प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने के लिए 22 मार्च 2017 को आर्सेनिक और फ्लोराइड पर राष्ट्रीय जल गुणवत्ताए उपमिशन शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के लिए वित्तवर्ष 2016-17 में रु. 6000 करोड़ (संशोधित) का प्रावधान रखा गया है, जिसे 2017-18 में बढ़ाकर 6050 करोड़ रुपए कर दिया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल के उपमिशन के हिस्से के रूप में अगले चार वर्षों के लिए आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रभावित 28000 से अधिक बस्तियों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया गया है। सरकार आयरन, खारापन, नाइट्रेट और अन्य तत्वों से प्रभावित पानी की समस्या से निपटने का लक्ष्य तय किया है। एक बार जिन बस्तियों को पेयजल आपूर्ति की उपलब्धता सुनिश्चित की जा चुकी है, उन्हें पुनः ऐसी समस्या का सामना न करना पड़े, इसके लिए जलस्रोतों के संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया गया है। गांवों और बस्तियों में पेयजल सुरक्षा-स्तर बहाली के लिये वर्षाजल, सतही जल तथा भूजल के उचित उपयोग की व्यवस्था की गई है। सरकार ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों के 23 लाख और शहरी क्षेत्रों में 88 लाख संरचनाओं के माध्यम से वर्षा के जल के संरक्षण की योजना बनाई है। भारत सरकार द्वारा गांवों और बस्तियों में पेयजल सुरक्षा-स्तर बहाली के लिए वर्षा जल, सतही जल तथा भूजल के उचित उपयोग की व्यवस्था की गई है। गांवों में पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन, कार्यान्वयन और मरम्मत का ग्रामीणस्तर पर विकेंद्रीकृत, मांग आधारित और समुदाय प्रबंधित योजना ‘स्वजलधारा’ प्रारंभ की गई है। सरकार पानी से जुड़े अपने इन तमाम कार्यों को जिस तरह पूरा कर रही है, वह भी इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि इससे पंचायती राज व्यवस्था का विशेष रूप से सशक्तिकरण हो रहा है। यानी केंद्र सरकार की पानी से जुड़ी तमाम योजनाएं प्रबंधन और क्रियान्वयन के विकेंद्रीकृत मॉडल के आधार पर चलाई जा रही हैं।


06 कल्याण

22-28 मई 2017

अल्पसंख्यक विकास

अल्पसंख्यक कल्याण की नई राहें

अल्पसंख्यकों के कल्याण को गति देने के लिए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय (एमओएमए) ने नई योजनाएं बनाई हैं

एसएसबी ब्यूरो

ल्पसंख्यक शब्द मुसलमानों की एक छवि प्रस्तुत करती, हालांकि ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन भी अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं। राजनेताओं और मीडिया के एक वर्ग द्वारा बनाई गई धारणा के विपरीत, मुख्तार अब्बास नकवी के मार्गदर्शन में अल्पसंख्यक मंत्रालय (एमओएमए) ने अल्पसंख्यकों पर खर्च में लगभग 128 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया, जो कि यूपीए सरकार के तहत था। हां, निश्चित रूप से यहां कोई मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं है, लेकिन मोदी सरकार का उद्देश्य सबका साथ, सबका विकास का है, जिसके लिए पिछले तीन सालों से मुस्लिमों सहित सभी समुदायों के उत्थान और कल्याण में काम किया जा रहा है। इस मंत्रालय ने अल्पसंख्यकों का समग्र विकास किया है और इसके साथ ही अपने मुद्दों को सुधारने के लिए कुछ नई और नवीन योजनाएं शुरू की हैं, जिसके तहत अल्पसंख्यकों को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया है और उनके शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए कड़ी मेहनत, इंटरनेट नेटवर्क और डिजिटल साक्षरता सहित बुनियादी ढांचे में भी सुधार किया गया है। इतना ही नहीं सरकार अल्पसंख्यकों और उनकी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाए रखने के लिए भी काम कर रही है। मुसलमानों का एक वर्ग या हिस्सा ही ट्रिपल तालक जैसे मुद्दों पर सरकार का मजाक उड़ा सकता है, लेकिन अधिकांश मुस्लिम महिलाओं ने पूरे दिल से इसका स्वागत किया है। इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को कौशल प्रदान करने के लिए ‘नई रोशनी’ नामक एक योजना भी शुरू की है। जिसका महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक अनूठे पहल के रूप में स्वागत किया गया है। सरकार अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम के माध्यम से ऋण प्रदान कर रही है, जो कि मौजूदा बाजार की दरों से काफी कम है। एमओएमए के लिए कुल शिक्षा क्षेत्र का बजट 2167 करोड़ रुपए रखा गया है, जिसमें से 48 फीसदी छात्रवृत्ति के लिए है। इसके माध्यम से युवाओं के सपने को पूरा करने में सहायता करने के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता दिखाई देती है। अल्पसंख्यकों की स्थिति को सुधारने में सहायता करने उद्देश्य से मंत्रालय ने असंख्य योजनाएं तैयार की हैं। उदाहरण के लिए उनमें से एक है ‘नई

एक नजर

सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ा दिया है

मंत्रालय ने नई रसोई और नई मंजिल जैसी कई योजनाएं चलाई हैं डीबीटी के माध्यम से छात्रवृत्ति हो रही है हस्तांतरित

मौलाना आजाद नेशनल एकेडमी ने कौशल विकास की स्थापना अल्पसंख्यक समुदायों के लिए स्वयंरोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की है मंजिल’- जिसमें 1 लाख अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को शिक्षित करने के लिए 650 करोड़ रुपए 5 साल के लिए निर्धारित किए गए हैं। बता दें कि सरकार की इस योजना के लिए पचास प्रतिशत की फंडिंग विश्व बैंक करता है। एक और ऐसी ही शैक्षिक सशक्तीकरण की योजना है, जिसके तहत 85.40 लाख रुपए अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृत्ति दी गई है, जबकि इस मंत्रालय की विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं के

अंतर्गत 2009 करोड़ रुपए जारी किए गए थे। 74.96 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने 12 9 2.7 करोड़ रुपए के पूर्व-मैट्रिक छात्रवृत्तियां प्राप्त की, जबकि 10.44 लाख विद्यार्थियों ने पोस्ट मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन आधारित छात्रवृत्ति प्राप्त की। पहली बार छात्रवृत्ति की राशि सीधे बैंक हस्तांतरण (डीबीटी) मोड के माध्यम से छात्रों के बैंक खाते में जमा की गई। इन दो योजनाओं के तहत जारी राशि 879.97 करोड़ रुपए थी।

विकास के लिए पारंपरिक कला, शिल्प में कौशल सुधार और प्रशिक्षण (यूएसटीटीएडी) महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है, जो अल्पसंख्यक समुदायों के पारंपरिक कलाओं, शिल्पों और परंपरागत कलाकारों और कारीगरों की कार्य क्षमता को बढ़ाती है। संघ लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा के लिए उम्मीदवारों को वित्तीय सहायता देने की योजना बनाई गई, जिसके तहत 786 उम्मीदवारों को 2.96 करोड़ रुपए का वितरण किया गया। 2014-15 के दौरान ‘पढ़ो परदेस’ की योजना लागू की गई थी। इस योजना के तहत 573 छात्रों को 3.50 करोड़ रुपए की ब्याज सब्सिडी मिली। नि: शुल्क कोचिंग और संबद्ध योजना के तहत नए घटक (11 वीं और 12 वीं कक्षा के छात्रों के लिए विज्ञान विषय के साथ गहन प्रशिक्षण) समेत 8118 उम्मीदवारों के लिए 31.34 करोड़ रुपए का खर्च शामिल किया गया है। एक बड़े वित्तीय सुधार के तहत सरकार ने 2015-16 से डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) मोड के जरिए पूर्व-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना सहित सभी छात्रवृत्तियां छात्रों के बैंक खाते में हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। डब्ल्यूएएमसीआई पंजीकरण मॉड्यूल में 3,60,577 वक्फ जायदाद दर्ज किए गए हैं। राज्य वक्फ बोर्डों के रिकॉर्ड को कम्प्यूटरीकृत करने के लिए केंद्रीय वक्फ परिषद (सीडब्ल्यूसी) को 3.00 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है। इसके अलावा केंद्रीय वक्फ परिषद ने शहरी वक्फ जायदादों के विकास के लिए ग्रांट इन एड की गैर-योजना के तहत 2.74 करोड़ रुपए जारी किए हैं। सरकार ने राज्य वक्फ बोर्डों को सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय वक्फ डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लि. (नवाडको) को 3.90 करोड़ रुपए जारी किए हैं। उसने वक्फ प्रॉपर्टी लीज नियम 2014 को पहले से


22-28 मई 2017

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एमओएमए के लिए आवंटन में गहराई से बढ़ोतरी हुई है और नई पहल की गई है ही अधिसूचित किया है। सरकार ने सितंबर 2014 के दौरान केंद्रीय वक्फ परिषद (संशोधन) नियम 2014 को अधिसूचित किया था।

नवाडको

वक्फ की आय बढ़ाने और वाणिज्यिक वक्फ संपत्तियों के विकास के लिए 500 करोड़ रुपए की पूंजी के साथ राष्ट्रीय वक्फ डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को स्थापित किया गया था। इसके साथ ही नवाडको के उद्देश्य के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए व्यापक प्रयास किए गए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न राज्यों का दौरा किया है और शहरी क्षेत्रों में 70 से अधिक संभावित वक्फ संपत्तियों की पहचान करने में सफल रहे हैं। संस्थागत / आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाओं के रूप में 218 एकड़ जमीन बैंक की पहचान की गई है। संबंधित राज्य वक्फ बोर्ड और मुटावलिस (प्रबंधक) को इन प्रॉपर्टीज के विकास के ब्याज के लिए राजी किया गया है। नवाडको को विभिन्न राज्यों में 22 संपत्तियों के संबंध ब्याज की अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। नवाडको ने कर्नाटक में तीन और राजस्थान में एक वक्फ प्रॉपर्टी के लिए संभावित रिपोर्ट तैयार करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान के पेशेवर रियल एस्टेट सलाहकारों को तैनात किया है। कर्नाटक राज्य वक्फ बोर्ड अपने वक्फ संपत्तियों के विकास के लिए नवाडको को अधिकार देने के पक्ष में सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। नवाडको ने एनबीसीसी लिमिटेड के साथ एक सामान्य समझौता किया है। नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी है, जिसे परियोजना प्रबंधन, कंसल्टेंसी और रियल एस्टेट परियोजनाओं के निष्पादन के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है। वहीं नवाडको ने 300 करोड़ रुपए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से राज्य वक्फ बोर्डों को मजबूत और उनके प्रदर्शन में सुधार के लिए लिया है।

एमएसडीपी

पिछले दस महीनों के दौरान विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं के लिए 756.62 करोड़ रुपए के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई और राज्यों / संघ शासित प्रदेशों के लिए 770.89 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। इन स्वीकृत परियोजनाओं में 7 डिग्री कॉलेजों, 85 स्कूल बिल्डिंग, 86 हॉस्टल, 36 आईटीआई, 1 पॉलिटेक्निक, 145 स्वास्थ्य केंद्र, 90924 अल्पसंख्यक युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण, 361257 छात्रों के लिए साइबर ग्राम आदि शामिल हैं।

सीखो और कमाओ

2014-15 के अंतिम दस महीनों के दौरान 20720 अल्पसंख्यक युवाओं के प्रशिक्षण में लगभग 46.02 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 2014-15 के अंतिम दस महीनों के दौरान ही नई रोशनी योजना के अंतर्गत 13,648 रुपए की लागत से 68,675 महिलाओं को भी प्रशिक्षित किया गया।

एनएमडीएफसी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 फरवरी 2015 को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम (एनएमडीएफसी) की अधिकृत शेयर पूंजी में 1500 करोड़ से 3000 करोड़ रुपए की वृद्धि की और केंद्र सरकार, राज्य सरकार और निजी संस्थानों के लिए 65: 26: 09 से 73: 26: 01 के शेयर होल्डिंग पैटर्न को संशोधित किया। नतीजतन, केंद्र सरकार के इक्विटी योगदान को 65% से बढ़ाकर 73% कर दिया गया। एनएमडीएफसी ने 1,08,747 अल्पसंख्यक लाभार्थियों को कवर करने के लिए 431.20 करोड़ रुपए का ऋण दिया।

हमारी धरोहर

अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक विरासत

को समृद्ध बनाए रखने और प्रदर्शित करने के लिए सरकार ने ‘हमारी धारोहर’ की योजना भी शुरू की है।

साइबर ग्राम

‘डिजिटल साक्षरता’ प्रदान करने के लिए साल 2014-15 से बहु-क्षेत्रीय विकास की योजना के अंतर्गत कार्यक्रम को शामिल करने के लिए मंत्रालय ने पहल की है। मंत्रालय की सहायता के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी), ई-गवर्नेन्स सर्विसेज इंडिया लिमिटेड (ईजीएसआईएल) को लगाया गया है।

नई मंजिल

2015-16 के बजट में केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक युवाओं के लाभ के लिए शिक्षा और आजीविका बढ़ाने के लिए ‘नई मंजिल’ की शुरुआत की घोषणा की है, जिनके पास औपचारिक स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र नहीं है या उन्हें संगठित क्षेत्र में बेहतर रोजगार पाने के लिए सक्षम करने और इस तरह उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए। यह योजना मदरसे में शिक्षित युवाओं को पूरा पाठ्यक्रम प्रदान करती है, ताकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। यह योजना जल्द ही शुरू हो जाएगी।

मानस

10 नवंबर 2014 को क्रेडिट लिंकेज के साथ उद्यमी कौशल के विकास के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदायों के लिए स्वयं रोजगार को बढ़ावा देने के लिए, मानस (मौलाना आजाद नेशनल एकेडमी फॉर स्किल्स) की स्थापना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम (एनएमडीएफसी) द्वारा की गई है

गुड-गवर्नेंस इनिशिएटिव्स

पोस्ट-मैट्रिक और मेरी-कम-मीन छात्रवृत्ति योजनाओं के लिए ऑनलाइन छात्रवृत्ति प्रबंधन प्रणाली (ओएसएमएस) की शुरुआत की गई है। प्रबंधन

कल्याण

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सूचना प्रणाली के लिए प्रशिक्षित अल्पसंख्यक युवाओं और ऑनलाइन ई-मॉनिटरिंग सिस्टम से ‘सीखो और कामाओ’ के अंतर्गत, कौशल विकास की योजना विकसित की जा रही है। ‘नई रोशनी’ के तहत आवेदन के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रबंधन प्रणाली, दस्तावेजों को प्रस्तुत करने और निगरानी के विकास के लिए काम किया जा रहा है। अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए नेतृत्व विकास की योजना को आधार से जोड़कर बॉयोमीट्रिक उपस्थिति प्रणाली के तहत लागू किया गया है। इसके साथ ही सोशल मीडिया, ट्विटर और फेसबुक के तहत घटनाओं के नवीनीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह स्पष्ट है कि मंत्रालय का पूरा ध्यान उनकी शैक्षिक सशक्तिकरण, कौशल विकास और उनके समृद्ध विरासत के संरक्षण के जरिए अल्पसंख्यकों के हर दौर के कल्याण पर है और यह सब कुछ उन्हें मुख्य धारा में एकीकृत कर रहा है। मंत्रालय अल्पसंख्यक क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं को विकसित करने और जहां तक संभव हो, लाभार्थी खातों को सीधे ऑनलाइन लाभ प्रदान करने पर ध्यान दे रही है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एमओएमए के लिए आवंटन में गहराई से बढ़ोतरी हुई है और नई पहल की गई है। इसके अलावा नई मंजिल, यूएसटीटीएडी, और हमारी धारोहर जैसी योजनाएं लांच की गई हैं। नई रोशनी, सीखो और कमाओ जैसी योजनाओं को अपने पोर्टल्स के माध्यम से ऑनलाइन लाया गया है और सभी छात्रवृत्ति योजनाओं को राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल के जरिए ऑनलाइन किया गया है। मंत्रालय ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और बजट घोषणाओं के बारे में कोई कमी नहीं की है। तथ्य यह है कि एमओएमए अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, जो मोदी के 'सबका साथ, सबका विकास' के लिए प्रभावी ढंग से उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता प्रदर्शित करता है। सरकार ने सऊदी अरब, यमन आदि से भी लोगों को बचाया है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि हर किसी को अपने धर्म का दावा करने का अधिकार है और सरकार संविधान का पालन करेगी।


08 बातचीत

22-28 मई 2017

‘स्वच्छता अभियान के लिए दिल से प्रार्थना है’ बातचीत अनुराधा पौडवाल

हिंदी फिल्मों में पार्श्व गायान से करियर की शुरुआत करने वाली अनुराधा पौडवाल इन दिनों समाज सेवा में जुटी हैं। अनुराधा पौडवाल से कई मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार त्रिदीब रमण ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के मुख्य अंश

मोदी जी के स्वच्छता अभियान के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? स्वच्छता अभियान बहुत जरूरी है। इसके लिए मैं दिल से भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मोदी जी को इसमें बहुत सफलता मिले। मैने देखा है कि लोग इंडिया में सड़क पर कहीं भी थूकते और कचरा फैलाते हैं। क्या उन्हें विदेशों में थूक नहीं आती। वह लोग यह सोचते हैं कि इंडिया अपना घर है यहां सब चलता है। ये नहीं सोचते कि हमें अपने घर को स्वच्छ रखना चाहिए।

45 सालों के करियर के बाद आपको पद्मश्री मिला तो क्या आपको लगता है कि बहुत देर हुई? ईमानदारी से बताऊं तो 15-10 साल पहले मुझे लगा था कि मुझे पद्मश्री के लिए अप्लाई करना चाहिए। उसके कुछ समय बाद हमने डिसाइड किया कि मुनष्य को किसी अवार्ड के लिए काम नहीं करना चाहिए, बल्कि लोगों की मदद और इंसानियत के लिए काम करना चाहिए। फिर हमने पद्मश्री के बारे में सोचना बंद कर दिया। मुझे बिल्कुल भी आइडिया नहीं था कि इस तरह पद्मश्री मिलेगा, क्योंकि मैं पिछले एक डेढ़ साल से सोशल वर्क कर रही हूं। हम किसानों, मरीजों, यूनिवर्सिटी, वीमेन इंपावरमेंट और कुछ बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। जब मुझे पद्मश्री दिया गया तो मेरी मां कहती हैं कि गाने से पद्मश्री मिलता है। ये तो सिर्फ गाने गाती है। किसानों के लिए आप क्या कर रही हैं? हमारे प्रोफेशन में कई प्रोग्राम होते रहते हैं, जिसके माध्यम से हम लोगों से सीधे तौर पर जुड़ते हैं। हम अपने सभी प्रोग्राम में यही कोशिश करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके। इसके लिए हम कई प्रोग्राम कराते हैं, इन प्रोग्रामों के जरिए हम किसानों को प्रोत्साहित और जागरूक करते हैं। अभी हाल ही में हमारा प्रोग्राम हुआ था तो

हमने किसानों को जागरूक करने के लिए उन्हें मिर्च के बीज दिए और उनकी वाइफ को चिली ग्राइंडिंग की मशीन । आपने किसानों के लिए किस क्षेत्र में काम करना शुरू किया? किसानों को आत्महत्या करते देखा तो मैंने उन्हें प्रोत्साहित करने का फैसला किया। मैंने ये काम विदर्भ और मराठवाड़ा में शुरू किया है। इसके लिए मोहन भागवतजी ने हमें अप्रोच किया। आजकल ज्यादा से ज्यादा लोगों को डाइलिसिस की जरूरत होती है। इसके लिए हम कोशिश करते हैं कि जहां लोगो को 2500 रुपए देने पड़ते हैं, वहीं हम उन्हें 250 रुपए में डाइलिसिस की सुविधा उपलब्ध कराएं। यह सभी कार्य हम सूर्योदय फांउडेशन के साथ मिलकर कर रहे हैं। सूर्योदय के कई प्रोजेक्ट हैं, मैं वहां मोटिवेटर की तरह काम करती हूं। हमारा उद्देश्य लोगों को मोटिवेट करना और जागरूक करना है।

गो रक्षा के मामले पर आपके क्या विचार है? यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं हैं। सबके लिए देश अपने घर की तरह होता है और हमें अपने घर में ये आजादी होनी चाहिए कि हम अपनी भावनाओं को सबके सामने रखें। गो रक्षा को लोग पर्सनल एजेंडा बना रहें हैं। यह अपनी भावना है, जिसकी भावना मां जैसी मानने की है वो मानता है, जिसकी नहीं है वह नहीं मानता है, इस पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। 1973 में एस डी बर्मन साहब ने ‘अभिमान’ फिल्म के लिए आपको बड़ा ब्रेक दिया और फिर 1976 तक इंतजार करना पड़ा? नहीं ऐसा नहीं है, 1973 में ही जयदेव जी ने हमसे फिल्म ‘कालीचरण’ के लिए गाने गवाए

गो रक्षा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं हैं। सबके लिए देश अपने घर की तरह होता है और हमें अपने घर में ये आजादी होनी चाहिए कि हम अपनी भावनाओं को सबके सामने रखें

थे, वह रिलीज भी हुई। हां वो अलग बात है कि फिल्म ‘अभिमान’ 1976 में रिलीज हुई। सबकी अपनी अपनी डेस्टीनी होती है। उस फिल्म की भी अपनी डेस्टीनी थी। फिलहाल आजकल ये सब भी मायने नहीं रखता है, क्योंकि मुझे एक इंस्टीडेंस याद है एक बार मैं विदेश गई थी वहां 16 साल की एक लड़की का गाना हिट हो गया और उसे लिजेंड बना दिया गया, जबकि ऐसा नहीं होता है। लिजेंड को लिजेंड बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। जो आपकी यात्रा रही, आपको ‘हीरो’ का गाना मिला यह आपके लिए टर्निंग प्वांइट रहा? ‘हीरो’ के गाने प्रमोट हुए, इसके पहले जो भी गाने मिलते थे वह प्रमोट नहीं हुए। ‘तू मेरा जानू है’...., ‘लाल दुपट्टा मलमल का....’ ‘आशिकी’ फिल्म के गाने सभी हिट रहे। आपको बता दूं कि ‘हीरो’ फिल्म के बाद मैं जब दिल्ली गई तो लोगो ने ‘लाल दुपट्टा’ के गाने सुने तो कहा कि आपने पहले क्यों नहीं गाया। आप तो बहुत अच्छा गाती हैं, जबकि उस समय मुझे 14-12 साल हो गए थे गाना गाते हुए। इसमें क्या होता है कि जब तक आप दिखाई नहीं देते हैं तब तक कोई आपको नहीं जानता है।

एक नजर

सामाजिक कार्यों में जुटी हैं प्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल

विदर्भ और मराठवाडा के किसानों को कर रही हैं प्रोत्साहित मरीजों और महिला सशक्तिकरण के लिए कर रही हैं काम

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ कैसे रिश्ते रहे आपके? वे मेरे मेंटर थे, उनके साथ मैंने बहुत काम किया है। लक्ष्मीकांत प्यारेलालजी के साथ मेरे अच्छे संबंध रहे, उनके साथ मैंने आपबीती से लेकर कई गाने गाए। मैं आज भी उनके गानों के साथ ही रियाज करती हूं। आपको बता दूं कि उनके गानों से हमेशा कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है। मेरा हमेशा से उनके साथ गाना गाने का सपना रहा। उनके गानें बहुत कुछ सिखा जाते हैं। आपने पुराने गायकों के साथ गाने गाए फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ गाया, दोनों में अंतर क्या था? मैंने सभी सिंगर के साथ गाया है, मन्नाजी के साथ भी गाया है, ऐसा था कि मदन मोहनजी को छोड़ कर मैंने शंकर जयकिशन, रामाचंद्रन, नौशाद, रफी साहेब, मन्ना डे, किशोर दा, तलत महमूद के साथ गाया, मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं कि मैंने लता जी को छोड़कर पुराने-नए सभी गायकों के साथ गाना गाया। लक्ष्मीकांत प्यारेलालजी के बारे में कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। वह ज्ञान के भंडार थे। बता दूं कि जमीनी स्तर से जुड़ा हुआ नए एडाप्टबिलिटी के साथ जो म्यूजिक आया वह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर डी बर्मन के साथ आया। टी-सीरीज के साथ आने के बाद आप पूरी तरह से एक ही क्षेत्र में सिमट गई? ‘हीरो’ के बाद मल्टी सिंगर्स के गाने चलने लगे तो मुझे अच्छा नहीं लगा, इसीलिए मैं टी-सीरीज के साथ गाने लगी। मल्टी सिंगर्स के साथ ये था कि खुद की क्रिएटबिलिटी खत्म हो रही थी, जिससे मैं खुश नहीं थी। उस दौर में बहुत गाने हुए, लेकिन उसमें मेक योर मार्क वाली बात नहीं थी। उसके बाद हमने म्यूजिक कंपनी के लिए अप्रोच किया, जैसे म्यूजिक इंडिया। एचएमवी में लताजी और आशाजी काम कर रही थी तो वहीं कॉरिडोर में पंकजजी, अनूप जलोटाजी थे। उन्होंने कहा कि डिवोशनल की मार्केट नहीं है और हम आपके साथ डिवोशनल के लिए आपके साथ काम नहीं कर सकते, क्योंकि मार्केट में इसके साथ अच्छा रिस्पांस नहीं है। आपको हमारे साथ गीत करना चाहिए। मैंने कहा कि हमें गीत नहीं करना है, मुझे भजन गाना है। यह मेरी किस्मत थी जो मैं टी-सीरीज के साथ जुड़ी। मेरी गुलशन जी से बात हुई तो उन्होंने कहा


22-28 मई 2017 कि उन पर वैष्णो माताजी की कृपा है, हम जो करते हैं वह बिकता है, तो हमने उनसे कहा कि अगर कृपा है तो ऑरिजिनल प्ले करो, वर्जन क्यूं प्ले करना। तब उन्होंने कहा कि ऑरिजिनल कैसे होगा। इसके लिए एक छोटे से एल्बम से काम शुरू किया गया जो सफल हुआ। उसके बाद 'लाल दुपट्टा मलमल का' पर काम किया गया, जिसकी मेगा सेल रही। आप प्राइवेट एल्बम का एक ट्रेंड लेकर आईं? पहले सिर्फ दूरदर्शन था, जिसमें छायागीत आते थे, उसमें चलाने के लिए उन गानों को पिक्चराइज किया गया। एल्बम पहले से था उसे चलाने के लिए फिल्माया गया। दो एल्बम हिट हुए फिर ये सिलसिला बढ़ता गया। महेशजी एक अच्छे डायरेक्टर हैं। फिर महेशजी का आना हुआ, उन्होंने हमें काफी सहयोग किया। उनके आने के बाद टी-सीरीज ने डिवोशनल की दुनिया में इतिहास रच दिया। ‘आशिकी’ के 22 गाने पहले से ही रिकॉर्डेड थे। गुलशन कुमार जी से क्या सीखा? हमने देखा कि लोगों के लिए उन्होंने कम कीमत पर निस्वार्थ भावना से काम किया। मैंने उनसे डेडिकेशन के सुपरलेटिव क्वालिटी के बारे में सीखा। गुलशन कुमार एक डेडिकेटिव पर्सनालिटी थे। वह 24 घंटे गाने के ही बारे में सोचते थे। उन्होंने अपना सब कुछ म्यूजिक को दे दिया। उनके जाने के बाद कोई उनके जैसा नहीं हुआ। वह निस्वार्थ भावना से काम करते थे। जो कहा जाता है कि किसी के हाथों से उद्धार होना होता है ना तो वही हुआ। उस समय जो छोटे गायक सीखने के साथ ही साथ संघर्ष कर रहे थे। उनके लिए बिना पैसों के काम किया। उनके जैसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ और वह एक महान आत्मा थे। आपकी इंडस्ट्री में तब डिमांड थी, फिर भी आपने टी-सीरीज नहीं छोड़ा? ऐसा नहीं था, ‘आशिकी’ के हिट होने के बाद डिमांड बढ़ी। उसके पहले हमने खुद को टी-सीरीज के आर्टिस्ट की तरह प्रमोट किया। टी-सीरीज अपने आर्टिस्ट को पूरी फ्रीडम देता है, लेकिन तब जब आर्टिस्ट सिर्फ हमारे लिए काम करता है। आपको नहीं लगता कि आपने उस दौर के अच्छे गाने मिस कर दिए? मैं ऐसा नहीं सोचती की मैंने अच्छे गाने मिस कर दिए। मुझे नहीं लगता कि उस दौर में 'नजर के सामने' और 'धीरे धीरे से' से अच्छा कोई गाना था। ईश्वर ने मुझे जो दिया मै उसके लिए उनकी आभारी हूं। मेरे डिवोशन और डेडिकेशन के लिए उन्होंने मुझे जिससे नवाजा वह मेरे लिए सबसे अच्छा था। मेरी 6 से 7 फिल्में ऐसी हैं, जिसमें अगर 10 गाने रहे तो 10 हिट रहे। क्या यही कारण है कि गुलशन जी के नहीं रहने पर आपने फिल्मी गानों को छोड़ दिया? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मेरे मन में ये पहले से ही था कि मैं फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ दूं , क्योंकि मैंने फिल्म इंडस्ट्री के कई दौर देख लिए थे। मैंने वसीपुर

बातचीत

09

अरुण जी से कैसे मिलीं, वह म्यूजिक डायरेक्टर थे तो क्या आप पहले से जानती थीं ? मेरी उनके साथ शादी 17 साल की उम्र में हो गई थी। मैं उस समय छोटे-छोटे प्रोग्राम करती रहती थी, तो मेरे फादर इन लॉ ने मुझे देखा था और उन्होंने ही ये विचार बनाया था कि यह छोटी लड़की मेरी बहू बनने के लिए सही है। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे अपने इन लॉ से हमेशा सपोर्ट मिलता रहा।

ऑफ काली में कहा था कि मां मुझे फिल्म इंडस्ट्री से उतना लगाव नहीं है, मैं टॉप पर पहुंच कर इसे छोड़ दूंगी। जब 'आशिकी' और 'दिल है कि मानता नहीं' हिट हुई तो हमने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी। एक बार ऐसा हुआ कि आप बीमार हुईं और आपकी आवाज चली गई? मेरे बचपन में ऐसा हुआ तो मै बहुत दुखी हुई थी। मैंने लताजी को सुना और मैंने यही ठाना की ये मेरी आवाज होनी चाहिए। मुझे इस बात का साइकोलॉजिकली इतना फायदा हुआ कि जब मैं बीमार थी और मुझे निमोनिया हुआ था तो मेरी अपनी आवाज बिल्कुल बंद थीं और मैंने लगातार लताजी की आवाज में भागवत गीता सुना। आप इतने सारे स्टेज शो करती हैं, तो क्या आपके बच्चे भी आपके साथ शो करते हैं? जी हां, मेरे साथ मेरे बच्चे भी मेरा प्रोग्राम करते हैं। मैं डिवोशनल प्रोग्राम ज्यादा करती हूं। वह डिवोशनल में मेरा ज्यादा साथ देते हैं। बहुत लोगों को लगता हैं कि डिवोशनल गाने घिसे पिटे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। डिवोशनल गाने बहुत ही ऊर्जावान होते हैं। आज ही हमने अपने प्रोग्राम की शुरुआत 'धीरे धीरे से' की थी, लेकिन लोगों ने कहा कि 'राम रतन धन पायो' गाइए। ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है मुझ पर मैं उनकी आभारी हूं। मुझे पश्चिम बंगाल में एक प्रोग्राम के लिए बुलाया गया था। वहां फिल्मी गाना गाना शुरू किया तो वहां मौजूद लोगों ने कहा कि दीदी हम आपका भजन सुनने आए हैं। यह सब देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। गुलशन कुमार की बायोपिक में श्रद्धा कपूर आपका रोल कर रही हैं, इस पर आपको क्या लगता है कि वह कितना आपके रोल के साथ न्याय कर पाएंगी? जी हां, मैंने भी सुना है। मेरा रोल श्रद्धा करे ये दूसरी बात है, लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि गुलशन जी पर बायोपिक बन रही है। वह एक अच्छे इंसान थे। उन्होंन म्यूजिक इंडस्ट्री को काफी कुछ दिया है। उनको उनका न्याय मिलना चाहिए। उनके साथ काम करके हमेशा सुख की अनुभुति होती है। मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। उन्होंने हर घर में मंदिर

को पहुंचाया है। अगर आज के समय में डिवोशनल गाने एक बड़े क्षेत्र में उभरे हैं तो वह गुलशन जी की देन है। इसके साथ ही अनुराधा पौडवाल ने लक्ष्मी स्तुति का गान भी किया। मुझे लगा था कि आप मुझसे मेरे प्रोफेशन के अलावा भी सवाल करेंगे जो मैं बताना चाहती हूं। आजकल बेटियों को लेकर काफी चर्चा होती है। समाज को उनकी जरूरत है। इसके अलावा वीमेन इंपावरमेंट की बात होती है। महिला आदिशक्ति है, वह जीवनदायिनी है। मुझे ऐसा लगता है कि वोट बैंक या किसी भी तरह से उसे एड्रेस नहीं किया जाना चाहिए। उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह हमेशा कुछ ना कुछ आश्चर्यजनक कर सकती है। मुझे क्या लगता है कि अपने बच्चों में संस्कार सिर्फ मां ही डाल सकती है। क्योंकि मां बच्चों की पहली पाठशाला होती है। मेरी जिंदगी का एक छोटा सा घटना चक्र याद है मुझे, जब मेरे 8 साल के बेटे ने बोला कि मां आज ना जाओ तो हमने कहा कि मुझे जाना होगा, क्योंकि काम है। उसने कहा हां मुझे पता हैं कि आप मेरी मां नहीं अुनराधा पौडवाल हो तो मैंने उसी समय उसे डांटा और स्कूल भेजा। उसी समय मुझे अहसास हुआ कि हम अपने काम के चक्कर में अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते। लोग कहते हैं कि महिलाएं कमजोर होती है, लेकिन सच्चाई यह है कि महिलाओं में बहुत ज्यादा शक्ति होती है। अगर महिला पढ़ी लिखी होगी तो वह अपने बच्चों को अच्छी को शिक्षा देगी, जिससे हमारा समाज पढ़ा लिखा और संस्कारी होगा। आपके परिवार की महिलाओं के अलावा आप पर किसका प्रभाव पड़ा? जी हां, सुधा मूर्ति जी से मैं काफी प्रभावित रही। वह इस समय के लोगों की गुरु हैं। मैं उन्हें सभी गुरुओं में पहले स्थान पर रखती हूं। वह अपने आप में एक परफेक्ट नारीत्व हैं। उनसे ज्यादा वूमेन इंपावरमेंट किसको हैं। मैं तो उन्हें अपना गुरु मानती हूं। ऐसा नहीं है कि कम कपड़े पहनने वाली महिलाओं से महिला सशक्तिकरण होगा। अगर ऐसा हो तो आदिवासी महिलाएं ज्यादा सशक्त होतीं। महिला और पुरुष दोनों का समन्वय एक साथ होने में ही सुंदरता है।

जब आपकी शादी हुई तो अरुण जी मराठी के एक चर्चित म्यूजिक डायरेक्टर थे? उस समय उन्होंने कुछ फिल्मों में भाव गीत वगैरह किए थे। वह मराठी फिल्मों के लिए काफी बेहतर थे। अरुण जी मराठी फिल्मों में अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर थे। मेरी मदर इन लॉ की फिलींग मेरे लिए बिल्कुल मेरी मां की तरह है। मां तो सोचती है कि मेरे बच्चे हमेशा सफल हों, लेकिन मदर इन लॉ का अपनी बहू के लिए सोचना मुझे अचंभित किया। ‘अभिमान’ फिल्म का गाना जब आपको मिला तब आपकी क्या उम्र रही होगी? मैं 18 साल की थी जब मुझे ‘अभिमान’ का गाना मिला। इसके लिए मैं अपने इन लॉ की शुक्रगुजार हूं। उन्होंने हमेशा हमें प्रोत्साहित किया। अरुण जी के जाने के बाद भी उन लोगों ने हमेशा मेरा साथ दिया और रिकॉर्डिंग के लिए प्रोत्साहित करते रहे। अरुण जी तो एसडी बर्मन के लिए काम करते थे? जी हां, उन्होंने एसडी बर्मन के लिए काम किया, लेकिन कभी उन्होंने मेरे लिए मुंह खोल के किसी से काम नहीं मांगा। मुझे जो भी मिला मेरी ही काबिलियत पर मिला। लोग मुझे सुनते गए और काम देते गए। फिल्मों के बाद सामाजिक कार्यों में आने के लिए आप किसी घटना से प्रेरित हुई या यूं ही यह विचार आया? मैं इंदौर के सूर्योदय परिवार के बुलावे पर उनसे मिलने गई और उन्होंने बताया कि किसानों और दूसरे लोगों को किस तरह की समस्या है। उन्हें कैसे मोटिवेट किया जा सकता है। तो मुझे लगा कि हमें भी इसके लिए कुछ करना चाहिए। उनसे जुड़ने के बाद लोग हमसे जुड़ते गए और कारवां बनता गया। इसमें श्रीकांतजी ने हमारी बहुत बड़ी मदद की। उन परिवारों से जिनकी आप मदद करती हैं, क्या आप उनके टच में रहती हैं, या दूसरे सेलिब्रिटी की तरह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए करती हैं? हम लोग पब्लिसिटी के लिए कुछ नहीं करते हैं। इसमें क्या होता है कि जब कुछ नेचुरली होता है तो सब सही रहता है, लेकिन ऐसे टच में रहने पर उनके साथ साथ हमारी भी एक्सेप्टेशन बढ़ती हैं। वह कहेंगे ये नहीं किया, ये भी करना चाहिए और फिर हम कहेंगे कि इतना किया फिर भी कह रहे हैं। इसीलिए उतना ही टच में रहते हैं, जितनी जरूरत हो। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि उन जरुरतमंद लोगों की मदद कर दो फिर भूल जाओ।


10 पर्यावरण

22-28 मई 2017

पुरानी तकनीक से नया स्वरूप नदी संरक्षण मध्य प्रदेश

प्रदूषण और अतिक्रमण की वजह से सूखती नदियों के इस दौर में मध्य प्रदेश में चोरल नदी को सदानीरा बनाया गया

कि

सी नदी को सदानीरा बनाने की खबर से बेहतर कोई खबर नहीं हो सकती, क्योंकि हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उस दौर में पानी की दरकार सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है। पानी की दरकार इसीलिए कि पानी की कमी हर स्तर पर महसूस की जा रही है। इंदौर के पास बहने वाली चोरल नदी के तट से कुछ ऐसी ही खबर आई है। 32 किमी लंबी नदी को सदानीरा बनाने की कोशिश के साथ इसे एक बार फिर से जीवन देने की कोशिश की गई है। आदिवासियों के साथ सरकार और एक स्वयंसवे ी संगठन ने चोरल नदी की तस्वीर इस कदर बदल कर रख दी है कि कुछ साल पहले

तक इस नदी को देखने वाले आज इसे पहचान नहीं पाएंग।े लहराती बलखाती हुई लहरों में लिपटी चोरल का निर्मल जल आज उसकी पहचान बन गई है। मध्य प्रदेश में निमाड़ यानी घाट नीचे का इलाका। एक तरफ पहाड़ तो नीचे की तरफ गहरी खाईयां। चोरल पहाड़ों से जल समेट कर सांप की तरह बल खाती हुई नीचे अाती है। कभी सांगवान

के घने जंगलों में लहराती तो कहीं पछाड़ खाती 35 किमी का सुहाना सफर तय करते हुए अन्ततः यह बडवाह के पास नर्मदा नदी में जा मिलती है। इसके रास्ते में कई झरने भी हैं। चोरल इंदौर से करीब 55 किमी दूर इसी जिले के जानापाव की पहाड़ी से निकलती है। इसी पहाड़ी पर परशुराम की जन्मस्थली भी मानी जाती है। यह

बरसात के दिनों में अपनी अंजुरी में खूब सा पानी समेटे यह नदी बड़ी तेज और उतावली सी नजर आती है, लेकिन यह उतावलापन कुछ ही दिनों में शांत पड़ जाता है

एक नजर

32 किमी लंबी चोरल नदी बनी सदानीरा

चोरल के लिए 2011 में बनी दस करोड़ की योजना आदिवासियों के सहयोग से आधे बजट में पूरा हुआ काम

इलाका मालवा में आता है, लेकिन चोरल नदी कुछ किमी ही मालवा में चलते हुए अनायास पछाड़ खाकर पहाड़ों से करीब 1300 फीट नीचे निमाड़ में गिरती है और इस तरह मालवा से पानी समेट कर निमाड़ की झोली में डाल देती है। जिस जंगल से होकर यह गुजरती है उसमें इस नदी के किनारे रहते हैं छोटे–छोटे आदिवासियों के गांव हैं। ये लोग चोरल नदी के आसपास की ऊबड़– खाबड़ कुछ जमीन को जैस–े तैसे उपजाऊ बनाकर वहां अपने परिवार का पेट भरने लायक खेती करते रहे हैं। पर इस पहाड़ी नदी के भरोसे कोई खेती कैसे कर सकता है। यह बरसात के दिनों में अपनी अंजरु ी में खूब सा पानी समेटे बड़ी तेज और उतावली सी नजर आती है, लेकिन यह उतावलापन कुछ ही दिनों में शांत पड़ जाता है। इसके पूरे प्रवाह क्षेत्र में चार ग्राम पंचायतों के करीब 17 गांव आते हैं। इन सभी गांवों की ज्यादातर आबादी आदिवासी है। पीढ़ियों पहले ये लोग जंगल और उसके उत्पादों पर निर्भर रहते थे, लेकिन बाद के दिनों में जंगल इनके नहीं रहे तब इन्होंने खेती करना शुरू किया। आदिवासी यहां खेती तो करते पर कभी भी बारिश की फसल के अलावा कोई दूसरी फसल नहीं कर पाते थे। बारिश खत्म होते–होते नदी का बहाव कम होने लगता और गर्मी शुरू होने से पहले ही यह नदी धीरे–धीरे सूखने लगती। नदी सूखने के साथ ही आदिवासियों के पास हाथ-पर-हाथ धरे बैठने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता था। बरसों से ये आदिवासी इसी तरह की बदहाल और बदरंग जिंदगी बिताने को मजबूर थे। सरकारी नुमाइंदों ने कई बार इनकी दशा सुधारने की कोशिश की पर कोई फर्क नहीं आया। पता लगा कि यदि किसी तरह यह नदी सदानीरा बन जाए और लबालब भरी रह सके तो यह इलाका गुलजार हो सकता है। पर ऐसा होना तो जैसे आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा कठिन काम था। नदी का प्रवाह क्षेत्र पूरी तरह से पहाड़ी ढाल पर था और उसमें पानी रोक पाना आसान नहीं था। इसी विचार विनिमय में कई बरस और बीत गए। इधर पानी के लिए हाहाकार और तेज होने लगी। आखिरकार चोरल नदी को सतत प्रवाहमान बनाने के लिये कागजी कार्यवाहियां 2011 में तेज हुईं। इस काम के लिए तकनीकी सर्वे हुआ और इसकी करीब नौ करोड़ रुपए से अधिक का बजट बना। खाका तैयार हुआ कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार इसमें अलग–अलग कामों के लिये पैसा देगी। केंद्र


22-28 मई 2017

स्वास्थ्य

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स्वास्थ्य योजना

मां और बच्चे के सेहत की रखवाली केंद्र सरकार ने गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को छह हजार रुपए देने का बड़ा फैसला किया है

चोरल को सदानीरा बनाने में आदिवासियों की करीब पांच सौ साल पुरानी तकनीक काम में आई और नदी को साठ साल पुराने स्वरूप में लौटा दिया गया के भूमि विकास और जल संसाधन मंत्रालय तथा मप्र सरकार के पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग ने राजीव गांधी जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम के तहत इस काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया। लेकिन नदी पहाड़ों से जिस पहले गांव केकरिया डाबरी में उतरती थी, वहीं काम करना मुश्किल हो गया। बारह सौ फीट नीचे बसे इस गांव तक पहुंचने का कोई रास्ता ही नहीं था। आदिवासी जिसे रास्ता बताते थे, वह इतना दुर्गम था कि आदमी का पहुंचना भी मुश्किल। पहाड़ों में से निकल रहे पत्थरों को पकड़कर इस रेतीले और फिसलपट्टी की तरह के रास्ते को पार करना पड़ता था तो ऐसे में कैसे यहां तक मशीनें पहुंचती और कैसे निर्माण के लिये सामान। यह सब बेहद मुश्किल था। केकरिया डाबरी गाँव में 15 आदिवासी परिवार रहते थे और केवल बरसात के दिनों में ही गांव आते थे। नदी के सूखने पर बाकी दिनों में इन परिवारों को हर साल पलायन कर रोजगार की तलाश में यहां– वहां भटकना पड़ता था। यही हालत कुशलगढ़, गुजरा और रतवी गांवों में रहने वाले लोगों की भी थी। नदी सूखने के बाद इन्हें पीने के पानी से भी वंचित होना पड़ता था। ये लोग जैस–े तैसे नदी क्षेत्र में गड्ढा खोदकर अपने और परिवार के लिये पानी जुटाते थे। एक ही बार फसल होने से इन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता था। कहते हैं जहां चाह, वहां राह की तर्ज पर सबसे पहले यहां तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक कच्चा रास्ता बनाया गया। यहां से बैलगाड़ी, ट्रैक्टर और टट्टुओं के सहारे जैस–े तैसे सामान पहुंचना शुरू हुआ। अच्छे काम में लोग जुटना शुरू हुए। जब आदिवासियों ने देखा कि हमारी भलाई और नदी को सतत प्रवाहमान बनाए रखने के लिये काम हो रहा है तो उन्होंने भी श्रमदान करने का फैसला किया। इसी दौरान इलाके में लोगों की भलाई के लिए काम करने वाली एक संस्था भी सामने आई। सब मिलकर जुट गए। लोग जुटते गए और काम बनता गया। अब सवाल था कि नदी के प्रवाह को यहां धीमे कैसे किया जाए। इसके लिए कई तकनीकें एक साथ अपनाई गईं। प्रशासन, स्वयंसवे ी संस्थाओं और स्थानीय आदिवासी समाज ने मिलकर पहाड़ों पर कई जगह कन्टूर ट्च रें , बोल्डर चेकडैम और अन्य संरचनाओं तथा

खेतों की मेड़बंदी भी की गई। बारिश के साथ मिट्टी के कटाव को रोकने के लिये सभी तरह के जतन किए गए। चोरल नदी में मिलने वाले छते नदी-नालों को भी उपचारित किया गया। नदी क्षेत्र में दो दर्जन से ज्यादा नाले और दो छोटी नदियां भी थीं, लेकिन वक्त के साथ बंद हो चुकी थीं, इन्हें फिर से ढढंू कर पुराने स्वरूप में लाया गया। आदिवासियों की करीब पांच सौ साल पुरानी तकनीक काम में आई और नदी को साठ साल पुराने स्वरूप में लौटा दिया गया। पहाड़ी रास्ते पर जेसीबी या दूसरी मशीनों का उपयोग संभव नहीं था, इसीलिए आदिवासियों की टोली ने खुद मोर्चा संभाला और कुदाली और फावड़ा से उन्होंने पत्थरों चट्टानों तक को तोड़ डाला। पहाड़ी नालों के रास्ते खोल दिए गए। देखते-ही-देखते एक के बाद एक नाले धीरे–धीरे सामने आते गए। चोरल में छह और सहायक नदियों में दो स्टॉप डैम बनाए गए। नागरथ चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रभारी सुरश े एमजे बताते हैं कि ‘यह करीब नौ करोड़ का सरकारी बजट का प्रोजेक्ट था, लेकिन समुदाय की सहभागिता से इसे महज 5 करोड़ 45 लाख रुपए में ही पूरा कर लिया गया। अब चोरल अधिकांश क्षेत्र में पूरे साल बहती है। टीम वर्क से जहां प्रोजेक्ट की लागत कम हुई, वहीं सतत निगरानी से इसकी गुणवत्ता में भी असर आया है। बीते पांच सालों से हम लोग खुली आंखों से एक सपना देख रहे थे और अब वह साकार रूप ले चुका है।’ इंदौर के जिला कलेक्टर पी नरहरी बताते हैं कि ‘अब इन गांवों के आदिवासी किसानों को प्रशासन फल ू ों की खेती के लिये भी प्रेरित करेगा, ताकि इनकी नियमित आमदनी हो सके।’ आखिरकार पांच साल की कड़ी मेहनत और जज्बे का ही परिणाम है कि अब यह नदी जगह–जगह रुकतेथमते बहने लगी है, अब भी इसमें पर्याप्त नीला पानी ठाठे मार रहा है। यहां की तस्वीर अब बदल चुकी है। आसपास हरियाली-ही-हरियाली नजर आती है और इससे भूजलस्तर भी बढ़ गया है। अब यहां के आदिवासी परिवारों के चेहरे पर पानीदार चमक है। उत्साहित आदिवासी किसान बताते हैं कि अब उनकी बरसों पुरानी चाहत पूरी हुई है। अब वे भी गेह–ूं चने सहित साल में तीन फसल उपजा सकेंग।े

र्भवती और स्तनपान कराने वाली रुपए मिलेंगे।’ महिलाओं को समुचित पोषण सुनिश्चित पहली प्रसवपूर्व जांच (गर्भ धारण करने करने के लिए सरकार उन्हें 6,000 रूपए के छह माह बाद) के बाद 2000 रुपए मिलेंगे नकद देगी, ताकि वे प्रसव से पहले तथा बाद और बच्चे के जन्म के पंजीकरण के बाद 2000 में पर्याप्त आराम कर सकें और इस अवधि रुपए फिर दिए जाएंगे। सरकार विज्ञप्ति के में उनका स्वास्थ्य तथा पोषणस्तर बेहतर अनुसार, पात्र लाभार्थी को संस्थागत प्रसव रहे। केंद्र सरकार ने मातृत्व लाभ कार्यक्रम के बाद शेष नकद राशि मौजूदा कार्यक्रमों के को मंजूरी दे दी है, लेकिन यह योजना सिर्फ तहत मातृत्व लाभ के मान्य नियमों के अनुरूप पहली संतान के लिए होगी। दी जाएगी। इस तरह एक पायलट प्रोजेक्ट के दौरान योजना सिर्फ पहली महिला को औसतन कुल इस योजना का लाभ दो रुपए मिलेंगे। 31 संतान के लिए होगी। 6000 बच्चों के जन्म पर दिया जा दिसंबर को राष्ट्र के नाम पायलट प्रोजेक्ट के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री रहा था। कैबिनेट की बैठक के दौरान इस योजना का नरेंद्र मोदी ने ‘इंदिरा गांधी बाद मंत्रिमंडल के फैसलों लाभ दो बच्चों के जन्म मातृत्व सहयोग योजना’ की जानकारी देते हुए पर दिया जा रहा था को पूरे देश भर में लागू ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने करने की घोषणा की थी। बताया, ‘गर्भवती या बच्चे बता दें कि योजना के तहत को दूध पिलाने वाली मां को पहले बच्च्चे की गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं स्थिति में 6000 रुपए दिए जाएंगे। इनमें से को उनकी मजदूरी के नुकसान के एवज में 5000 रुपए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय नकद प्रोत्साहन राशि दी जाएगी, ताकि वह द्वारा तीन किश्तों में दिया जाएगा। गर्भवती और प्रसव से पहले और बाद में समुचित आराम स्तनपान कराने वाली महिलाएं तीन किश्तों कर सकें, गर्भावस्था और स्तनपान कराने के में 5000 रुपये नकद प्राप्त करने की हकदार दौरान उसके स्वास्थ्य और पोषण में सुधार हो होंगी। यह राशि महिला और बाल विकास और बच्चे के जन्म के छ: माह तक वह उसे मंत्रालय द्वारा सीधे उनके खाते में जाएगी। एक स्तनपान करा सके, क्योंकि नवजात के विकास महिला को गर्भावस्था के पंजीकरण पर 1000 हेतु यह बहुत महत्वपूर्ण है।


12 विशेष

22-28 मई 2017

जैव विविधता और हम 22 मई विश्व जैव विविधता दिवस

विकास के मौजूदा प्रचलन में उपभोग की कई चीजें जहां एक तरफ हमारे जीवन में शामिल होती जा रही हैं, वहीं प्रकृति और परंपरा का पुराना साझा लगातार दरकता जा रहा है

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एसएसबी ब्यूरो

योलॉजिकल' और 'डायवर्सिटी' शब्दों को मिलाकर संयुक्त राष्ट्र की पहल पर 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस मनाया जाता है। इसे 'विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस' भी कहते हैं। इस पहल का लक्ष्य एक ऐसे पर्यावरण का निर्माण करना है, जो जैवविविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए हमें अवसर प्रदान कर सके। दिलचस्प है कि विकास के मौजूदा प्रचलन में उपभोग की कई चीजें जहां एक तरफ हमारे जीवन में शामिल होती जा रही हैं, वहीं प्रकृति और परंपरा का पुराना साझा लगातार दरकता जा रहा है। दुनिया के तमाम देशों के विकासवादी लक्ष्यों के आगे यह बड़ी चुनौती है कि वह जैव विविधता के साथ सामंजस्य बैठाते हुए कैसे आगे बढ़ें। यह चुनौती इस कारण भी बड़ी है, क्योंकि जैव-विविधता की कमी से प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, सूखा और तूफान आदि आने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। जैव-विविधता की दरकार और इसके संरक्षण को लेकर बीते कुछ सालों में निश्चित रूप से जागरुकता बढ़ी है। सरकार के साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में कई अच्छी पहल के साथ सामने आई हैं। दरअसल, लाखों विशिष्ट जैविक की कई प्रजातियों के रूप में पृथ्वी पर जीवन उपस्थित

है और हमारा जीवन प्रकृति का अनुपम उपहार है। अत: पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, महासागर-पठार, समुद्र-नदियां इन सभी प्रकृति की देन का हमें संरक्षण करना चाहिए, क्योंकि यही हमारे अस्तित्व एवं विकास के लिए काम आती हैं। जैव-विविधता दिवस को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भी प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में जैव-विविधता का महत्व देखते हुए ही लिया गया।

थॉमस के दिए शब्द

जाने-माने संरक्षण जीवविज्ञानी थॉमस यूजीन लवजॉय ने 1980 में 'बायोलॉजिकल' और 'डायवर्सिटी' शब्दों को मिलाकर 'बायोलॉजिकल डायवर्सिटी' या जैविक विविधता शब्द प्रस्तुत किया। चूंकि यह शब्द दैनिक उपयोग के लिहाज से थोड़ा बड़ा महसूस होता था, इसीलिए 1985 में डब्ल्यू. जी.रोसेन ने 'बायोडायवर्सिटी' या जैव विविधता शब्द की खोज की। मूल शब्द के इस लघु संस्करण ने तुरंत ही वैश्विक स्वीकार्यता प्राप्त कर ली। शायद ही कोई दिन जाता हो जब हम इस शब्द के संपर्क

में नहीं आते हैं। समाचार पत्रों और शोध पत्रों में उद्धृत यह शब्द आसानी से समझ आ जाता है। जैव विविधता के मायने इतने अधिक प्रयुक्त शब्द के लिए कोई एक आदर्श परिभाषा का न होना वाकई आश्चर्यजनक है। परंतु शब्द के अर्थ से ही इसके मायने समझ में आ जाते हैं। सभी जानते हैं कि 'जैविक' का अर्थ जीव जगत है और 'विविधता' का शाब्दिक अर्थ है, ‘प्रकार’। बायोडायवर्सिटी के पहले हिस्से 'बायो' का अर्थ निकालने में भी कोई दुविधा नहीं है, यह शब्द जीवन या सजीव को इंगित करता है। जैविक विविधता अथवा जैव विविधता का सीधा अर्थ है, ‘जीवित संसार की विविधताएं’। कम से कम मोटे तौर पर तो इसका यही अर्थ समझा जा सकता है, परंतु 'विविधता' शब्द की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है। इससे जीवन के विविध पहलुओं का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों की चर्चा में सूक्ष्मभेद उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए 'विविधता' के तहत न सिर्फ एक प्रजाति के अंदर पाए जाने वाली विविधताएं, अपितु विभिन्न प्रजातियों के मध्य अन्तर और पारिस्थितिकीय तंत्रों के मध्य तुलनात्मक

12 देशों को वृहद जैव विविधता वाले देशों का दर्जा मिला हुआ है। ये देश हैं- भारत, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, कोलंबिया, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, मेडागास्कर, मलेशिया, मैक्सिको, पेरू एवं जायरे

एक नजर

'बायोडायवर्सिटी' शब्द 1985 से प्रचलन में आया 1992 में जैव विविधता की मानक परिभाषा तय की गई

विश्व में करीब 41,000 जीव और 2,50,000 वनस्पतियां हैं विविधता भी शामिल की जाती है। साधारण व्यक्ति जब जैव विविधता शब्द का प्रयोग करता है तो उसका तात्पर्य प्रजातीय जैव विविधता होता है। प्रजाति का अर्थ है ऐसे प्राणियों का समूह जो ऐसी संतति पैदा करने की क्षमता रखते हों जो खुद जनन क्षमता रखती हो। सामान्य आदमी के लिए इस शब्द के तहत कबूतर से लेकर हाथी और अनार से लेकर शलगम तक की समस्त प्रजातियां सम्मिलित हैं। जैव विविधता जीवों की असामान्य विविधताओं तक ही सीमित नहीं रहती है। इसके अंतर्गत जीवित पदार्थों के सम्पूर्ण संग्रह का कुल योग और जिस पर्यावरण में वे रहते हैं, अर्थात पारिस्थितिकी तंत्र, भी सम्मिलित हैं। इसमें जीवों के अंदर और उनके मध्य की विविधताओं को भी दृष्टिगत रखा जाता है। इसमें एक दूसरे के ऊपर प्रभाव डालने वाले समुदाय भी सम्मिलित हैं। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो जैव विविधता विभिन्न पारिस्थितिकीय तंत्रों में उपस्थित जीवों के बीच तुलनात्मक विविधता का आकलन है, यह एक महत्वपूर्ण संकल्पना है, क्योंकि सभी जीव और उनका पर्यावरण एक दूसरे पर अत्यंत नजदीकी से प्रभाव डालते हैं। इस पर्यावरण में कोई भी बदलाव या तो जीव के विलुप्त होने का कारण बनता है या फिर उनकी संख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का। कोई भी प्रजाति अपने पर्यावरण के प्रभाव से अनछुई नहीं रह सकती है। इसी प्रकार किसी प्राणी या वनस्पति की संख्या में कमी या वृद्धि इनके पर्यावरण में परिवर्तनीय प्रभाव डालता है। इससे अन्य प्रजातियों के जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है। वृहद रूप से देखा जाए तो वनस्पतियों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों को अति विविधताओं के आधार पर समझा जा सकता है, जीन से प्रजाति तक और उनके पारिस्थितिकी तंत्र के साथ। इसीलिए जैव विविधता की सबसे स्पष्ट परिभाषा होगी, जैविक संगठन के सभी स्तरों पर पाई जाने वाली विविधताएं ही जैव विविधता है। इस दृष्टिकोण को समझने वालों के लिए स्वीकार्य परिभाषा, किसी क्षेत्र के जीनों, प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों की सम्पूर्णता होगी। 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की मानक परिभाषा को अपनाने का निर्णय लिया गया। इसके तहत जैव विविधता के दायरे में ‘समस्त स्रोतों, यथा- अंतर्क्षेत्रीय, स्थलीय, समुद्री एवं अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों के जीवों के मध्य अंतर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिकी समूहों में पाई जाने वाली विविधताएं, इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधताएं, विभिन्न जातियों के मध्य विविधताएं एवं पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधताओं’


22-28 मई 2017

विलुप्ति का खतरा और बचाव स

विश्व में जीव-जंतुओं की 47677 प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियां यानी 7291 प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है

मूचे विश्व में 2 लाख 40 हजार किस्म के पौधे 10 लाख 50 हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजनर्वेशन ऑफ नेचर’ (आईयूसीएन) 2000 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में जीव-जंतुओं की 47677 प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियां, यानी 7291 प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। आईयूसीएन की रेड लिस्ट के अनुसार स्तनधारियों की 21 फीसदी, उभयचरों की 30 फीसदी

को शामिल किया गया। वैसे जैव विविधता को हम चाहे जैसे भी परिभाषित करें, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि यह अरबों वर्षों के विकास का परिणाम है, जिसे प्राकृतिक गतिविधियों द्वारा आकार प्रदान किया गया। जीवविज्ञानियों के नजरिए से जैव विविधता जीवों एवं प्रजातियों तथा उनके मध्य प्रभावों का संपूर्ण वर्णक्रम है। वे इस बात का अध्ययन करते हैं कि पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई, किस प्रकार वे विभिन्न प्रकार विलुप्त हुए। बहुत सारी प्रजातियां सामाजिक प्रवृत्ति की होती हैं जो अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों एवं अन्य प्रजातियों से पारस्परिक क्रिया कर अपने जीवित रहने की दर को अधिकतम रखती हैं। परिस्थितिविज्ञानी जैव विविधता का अध्ययन न सिर्फ प्रजातियों के संदर्भ में करते हैं, अपितु प्रजाति के निकटतम वातावरण और उस वृहद परिक्षेत्र, जिसमें वह निवास करते हैं, के संदर्भ में भी करते हैं। प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र में जीव एक समग्रता का हिस्सा होते हैं, जो न सिर्फ अन्य जीवों, बल्कि उनके चारों ओर मौजूद वायु, जल और मिट्टी से भी परस्पर प्रभावित होते हैं। यही वह पहलू है जिस पर ज्यादातर पारिस्थितिकीय अध्ययन केंद्रित होते हैं।

और पक्षियों की 12 फीसदी प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। वनस्पतियों की 70 फीसदी प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरिसृपों की 37 फीसदी प्रजातियां और 1147 प्रकार की मछलियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है।

रेबीज और गिद्ध

‘द एलायंस फॉर जीरो एक्सटिंशन’ में पर्यावरण एवं वन्य जीवों के क्षेत्र के 13 जाने-माने संगठन हैं। इसके तहत किए गए अध्ययन में 395 ऐसे स्थानों का विवरण तैयार किया गया है, जहां किसी न किसी प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में 800 से ज्यादा प्रजातियां सिर्फ एक ही स्थान पर पाई जाती हैं। अगर इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो कई विलुप्त हो जाएंगी। पक्षियों की दृष्टि से भारत का स्थान दुनिया के दस प्रमुख देशों में आता है। भारतीय उप महाद्वीप में पक्षियों की 176 प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले 1235 प्रजातियों के पक्षी भारत में हैं, जो विश्व के पक्षियों का 14 प्रतिशत है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों

ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया। इसी तरह 1997 में रेबीज से पूरी दुनिया के 50 हजार लोग मर गए। भारत में सबसे ज्यादा 30 हजार मरे। आखिर क्यों मरे रेबीज से, एक प्रश्न उठा। स्टेनफोर्ट विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि ऐसा गिद्धों की संख्या में अचानक कमी के कारण हुआ। वहीं दूसरी तरफ चूहों और कुत्तों की संख्या में एकाएक वृद्धि हुई। अध्ययन में बताया गया कि पक्षियों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों के रख-रखाव और परागण भी काफी हद तक प्रभावित हुए। आलम यह है कि अमेरिका जैसा देश आज अपने यहां चमगादड़ों को संरक्षित करने में जुटा पड़ा है। दरअसल, चमगादड़ मच्छरों के लार्वा खाते हैं। जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक विकास के साथ मानवीय गतिविधियों के चलते जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। पेड़, पौधों, जीव-जंतुओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। इन्हें बचाना मानवता को ही बचाना है। वर्ष 2000 में लंदन में अंतरराष्ट्रीय बीज बैंक की स्थापना की गई। बीज बैंक में अब तक 10 फीसदी जंगली पौधों के बीज संग्रहित हो चुके हैं। नार्वे में ‘स्वाल बार्ड ग्लोबल सीड वाल्ट’ की स्थापना की गई है, जिसमें विभिन्न फसलों के 11 लाख बीजों का संरक्षण किया जा रहा है।

वैश्विक जैव विविधता

वैश्विक जैव विविधता की सटीक रूप से गणना करना लगभग असंभव है। इनमें अब तक की गणना और उसके वर्गीकरण के मुताबिक विश्व भर में करीब 7,50,000 कीट, 41,000 जीव और 2,50,000 वनस्पतियां हैं। अनवरत वैज्ञानिक खोज और अनुसंधान के बावजूद हम अभी तक पृथ्वी पर समस्त संभावित पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक आवास भी नहीं खोज पाए हैं। इस प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों में महासागरों की गहराइयां, पेड़ों की चोटियां और उष्णकटिबंधीय वनों की मिट्टी सम्मिलित हैं। समय हमारे लिए भी बहुत तेजी से भाग रहा है। बहुत सी प्रजातियां खतरनाक ढंग से विलुप्तता के कगार पर हैं और शायद जब तक विज्ञान के ज्ञान का प्रकाश उन तक पहुंचे, उनमें से कई गुमनामी की गर्त में खो चुके होंगी। जैव विविधता का विस्तार पूरे विश्व में एक समान नहीं है। दुनिया की कुल भूमि क्षेत्र के लगभग सात प्रतिशत हिस्से में दुनिया भर की आधी प्रजातियां निवास करती हैं जिसमें से उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में ही एक बहुत बड़ा हिस्सा बसता है। हालांकि इस विषय पर एक राय कायम नहीं है कि पृथ्वी के किस हिस्से में सर्वाधिक जैव विविधता है, परन्तु अमेजन

वर्षावनों को इस शीर्ष पद पर काबिज करने के लिए सर्वाधिक स्वीकार्यता प्राप्त है।

जैविक संपन्नता वाले देश और भारत

कुछ देशों की तुलना में कुछ देशों में अत्यधिक प्रजातीय प्रचुरता एवं स्थानिक प्रजातियों की अधिक संख्या पाई जाती है। 12 देशों को वृहद जैव विविधता वाले देशों का दर्जा मिला हुआ है। ये देश हैं- भारत, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, कोलंबिया, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, मेडागास्कर, मलेशिया, मैक्सिको, पेरू एवं जायरे। यदि इन देशों की जैव विविधता को संयुक्त रूप से देखा जाए तो ये विश्वभर की ज्ञात जैव विविधता का 60-70 प्रतिशत हिस्सा होगा। विश्व भर के भूमि क्षेत्रफल के 2.4 प्रतिशत

विशेष

13

हिस्से के साथ भारत ज्ञात प्रजातियों के 7-8 प्रतिशत हिस्से का आश्रयदाता है। अभी तक वनस्पतियों की 46,000 से अधिक एवं प्राणियों की 81,000 से अधिक प्रजातियां भारत में खोजी जा चुकी हैं। खासतौर पर भारत को फसलों की विविधता का केंद्र माना जाता है। यह खेती की गई वनस्पतियों की उत्पत्ति के 12 केंद्रों में से एक है। भारत को चावल, अरहर, आम, हल्दी, अदरक, गन्ना, गूजबेरी आदि की 30,000-50,000 किस्मों की खोज का केंद्र माना जाता है और दुनिया में कृषि को सहयोग प्रदान करने में भारत का सातवां स्थान है।

जैविक हॉटस्पॉट

दुनिया के ‘जैव विविधता हॉटस्पॉट’, ऐसे क्षेत्र हैं, जहां स्थानित प्रजातियों की भरमार हो। ऐसे दो क्षेत्र भारत में हैं। जैव विविधता विशेषज्ञ डॉ. नॉर्मन मायर्स ने सबसे पहले जैव विविधता हॉट स्पॉट को पहचाना और 1988 और 1990 में प्रकाशित अपने दो लेखों में इन्हें प्रस्तुत किया। अधिकांश हॉट स्पॉट उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और जंगली इलाकों में मौजूद हैं। 1988 में किए गए अध्ययन में पहचाने गए 18 हॉट स्पॉट में से दो भारत में खोजे गए। ये दो क्षेत्र पश्चिमी घाट और पूर्वी हिमालय थे। हाल ही में संशोधित 25 हॉट स्पॉट की सूची में चुने गए दो क्षेत्र पश्चिमी घाट/श्रीलंका और भारत-बर्मा क्षेत्र को शामिल किया गया है। ये दोनों ही विश्व के आठ शीर्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण हॉट स्पॉट क्षेत्रों में सम्मिलित हैं। इसके साथ ही भारत में ऐसे 26 मान्यता प्राप्त स्थानिक केंद्र हैं, जहां आज तक पहचाने गए और वर्णित पुष्पीय पौधों में से लगभग एक तिहाई पौधे पाए जाते हैं।

पश्चिमी घाट/श्रीलंका हॉट स्पॉट

पश्चिमी घाटों को सहया​िद्र पहाड़ियां भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में लगभग 1,60,000 वर्ग कि.मी. का क्षेत्रफल आता है और यह क्षेत्र देश के दक्षिणी छोर से गुजरात तक 1600 कि.मी. तक फैला हुआ है। पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं को रोकते हैं, इसीलिए इन पहाड़ियों की पश्चिमी ढलानों पर हर साल भारी बारिश होती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यहां पाई जाने वाली वानस्पतिक विविधताएं गणना से लगभग परे हैं। झाड़ीदार जंगल, पतझड़ी एवं उष्णकटिबंधी वर्षावन, पर्वतीय जंगल और ढलानदार घास के मैदान, यहां सभी कुछ पाया जाता है।

भारत-बर्मा हॉट स्पॉट

यह हॉट स्पॉट उष्णकटिबंधीय एशिया के गंगाब्रह्मपुत्र निम्नभूमि का 23,73,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र घेरता है। इस हॉट स्पॉट में पारिस्थितिकी तंत्रों की आश्चर्यजनक विविधताएं देखने को मिलती हैं। इनमें मिश्रित आर्द्र सदाबहार, शुष्क सदाबहार, पतझड़ी एवं पर्वतीय वन सम्मिलित हैं। झाड़ीदार वन, काष्ठवन और बिखरे हुए बंजर वन भी कहीं-कहीं पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में निम्न भूमि बाढ़ से तैयार दलदल, कच्छ वनस्पतियां (मैंग्रोव) और मौसमी घास के मैदान भी पाए जाते हैं। प्राकृतिक वासों की विविधता के सहयोग से प्राप्त जीवन के प्रकार वास्तव में बेहतरीन विविधता का उदाहरण हैं।


14 स्टेट न्यूज

22-28 मई 2017

बाढ़ असम

गुवाहाटी को बाढ़ से बचाने की कवायद

असम सरकार ने गुवाहाटी को बाढ़ मुक्त रखने के लिए कई तरह के उपायों पर काम करने शुरू कर दिए हैं

राज कश्यप /गुवाहाटी

सम सरकार ने मॉनसून के दौरान गुवाहाटी को बाढ़ से मुक्त रखने के उपायों पर काम करने शुरू कर दिए हैं। विकास विभाग के मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने संवाददाताओं से कहा कि संबंधित विभागों को जल्द से जल्द शहर में सभी नालियों की सफाई करने और किसी भी भूमि-कटाई की गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश विभाग की परियोजना मिशन बाढ़ से मुक्त गुवाहाटी का हिस्सा है, जो मॉनसून के दौरान शहर को बाढ़ से मुक्त करने के लिए बनाया गया है। मंत्री ने कहा कि गुवाहाटी नगर निगम, कामरूप (मेट्रो) जिला प्रशासन और पीडब्ल्यूडी इस महीने के भीतर जल निकासी व्यवस्था के निर्माण और नवीनीकरण को पूरा करने और शहर की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए मासिक बैठकों का आयोजन करेगी । सरमा ने बताया कि जब गुवाहाटी नगर निगम (जीएमसी) नालियों की सफाई की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत कर रही थी, तब वह वहां मौजूद नहीं थे। उन्होंने कहा कि बैठक में बाढ़ के बाद सफाई अभियान और 15,383 शहर स्ट्रीट लाइटों के रखरखाव पर भी चर्चा हुई। मंत्री के मीडिया के साथ बातचीत के बाद, कामरूप (मेट्रो) के डिप्टी कमिश्नर एम अंगमुथु ने यह साफ किया कि भंगागढ़ फ्लाईओवर से गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक सड़क को एक प्रतिबंधित क्षेत्र के रूप में घोषित किया जाएगा। उन्होंने जीएमसी आयुक्त मोनालिसा गोस्वामी को तुरंत इस सड़क से सभी तरह के अतिक्रमण को दूर करने के लिए आवश्यक अभ्यास करने के निर्देश दिए। गुवाहाटी, पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार एक दशक से अधिक समय तक बाढ़ से हो रही दिक्कतों से गुजर रहा है। शहर में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र गीतन नगरी पहाड़ी पर स्थित जू नरंगी रोड के दोनों किनारे के अलावा जी.एन.बी. गुवाहाटी क्लब से नूनमती,

आरजी बरूआ रोड, नबीन नगर, अनिल नगर और अंबिकगिरी नगर, राजगढ़ रोड, पब साराणिया, लचितम नगर, और नबीन नगर का हिस्सा, आनंद नगर, द्वारका नगर के जीएस रोड कवर क्षेत्र, आमदार हॉस्टल कॉम्प्लेक्स, मथुरा नगर, रुक्मिनी नगर और तरुण नगर और शांतिपुर-भरलुखुख क्षेत्र आदि हैं। गुवाहाटी, देश का दूसरा सबसे पुराना शहर है, जिसको देश के 100 स्मार्ट शहरों में से एक के रूप में भी चुना गया है। बता दें कि गुवाहाटी मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट विजन का बयान, जो शहर की व्याख्या भारत की सबसे प्रशंसनीय राज्य की राजधानियों में से एक के रूप में करता है। जहां 24 घंटे पेयजल, एक उचित जल निकासी प्रणाली, एक आधुनिक और साइंटिफिक सीवरेज प्रणाली और बेहतर सार्वजनिक परिवहन और यातायात बुनियादी ढांचे को अनुमानित करता है। हालांकि, बयान में उल्लिखित योजनाओं के बारे में बहुत कुछ लागू किया जाना है। गुवाहाटी महानगर विकास प्राधिकरण द्वारा जल संसाधन विभाग, असम सरकार और गुवाहाटी नगर निगम की सहायता से शहर में बाढ़ से निपटने के गंभीर प्रयास पिछले कुछ सालों में किए गए हैं। बारिश से गलियों में भारी मात्रा में पानी की गिरावट होती है, जिसके कारण शहर की नालियां को भर जाती हैं। नालों में पॉलिथीन बैग डंपिंग भी नालियों के बंद होने का एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा, पहाड़ियों और झीलों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है, इस प्रकार थोड़ी सी भी बौछार आने पर सड़कों पर पानी भर जाता है। सरकार ने अक्सर स्वीकार किया है कि शहर में 19 पहाड़ी क्षेत्रों में से 80 प्रतिशत अतिक्रमण हुए हैं। पूर्वोत्तर के केवल रामसर स्थल, जो लगभग 42 वर्ग किमी से एक चौथाई से कम, लगभग 10 वर्ग किलोमीटर तक सिकुड़ रहा है, जबकि हाल के वर्षों में बर्सोला, शारसोला और सिलशॉबेइल्स भी तेजी से सिकुड़ चुके हैं। कुछ मामलों में, यहां तक कि इन जलीय निकायों और आसपास के इलाकों के अतिक्रमण के बाद उद्योग भी स्थापित किए गए हैं।

प्रोत्साहन राजस्थान

खिलाड़ियों को नौकरी का तोहफा वसुंधरा राजे सरकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता खिलाड़ियों को सरकारी सेवा में आउट-ऑफ-टर्न नौकरी देने की तैयारी कर रही है

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एसएसबी ब्यूरो

जस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने महाराणा प्रताप और गुरु वशिष्ट पुरस्कार समारोह में कहा कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता प्रदेश के खिलाड़ियों को सरकारी सेवा में आउट-ऑफ-टर्न नौकरी देने पर सरकार विचार कर रही है और आगामी केबिनेट बैठक में इस सम्बंध में प्रस्ताव लाया जाएगा। मुख्यमंत्री राजे ने कहा कि खेल प्रतियोगिताओं में प्रदेश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को राज्य सरकार पूरा प्रोत्साहन देगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में खेल सुविधाओं के विस्तार के लिए अगले साल एक व्यापक नीति लाएगी, जिससे निजी क्षेत्र में स्पोर्ट्स एकेडमी स्थापित की जा सकेंगी। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एसएमएस स्टेडियम के हॉकी मैदान में मेडिटेशन सेंटर, एस्ट्रो टर्फ और सिंथेटिक ट्रेनिंग ट्रैक बनाया जाएगा। वहीं चौगान स्टेडियम में भी बास्केटबॉल कोर्ट और इंडोर हॉल का निर्माण करवाया जाएगा। सीएम ने कहा कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के विशिष्ट श्रेणी एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के लिए पेंशन योजना प्रारम्भ की जाएगी। जनजाति समुदाय की लोक संस्कृति एवं कला के संरक्षण के लिए भी पंचायत, पंचायत समिति तथा जिलास्तर पर राज्यस्तरीय खेल एवं युवा सांस्कृतिक महोत्सवों का आयोजन भी किया जाएगा। इस अवसर पर 41 खिलाड़ियों को महाराणा प्रताप अवार्ड, 13 प्रशिक्षकों को गुरु वशिष्ठ सम्मान और 41 नवोदित खिलाड़ियों को राइजिंग स्टार अवॉर्ड से सम्मानित किया।


22-28 मई 2017

स्वास्थ्य

डब्ल्यूएचओ के सद्भावना राजदूत बने बिग बी

हाल में हुए एक शोध से पता चला है कि पेट के कैंसर से बचाव के लिए टमाटर खाना फायदेमंद है

रूप में सेवन करने से पेट के कैंसर से बचा जा सकता है। जी हां, एक नई रिसर्च कुछ ऐसा ही बताती है। हाल ही में आई एक नई रिसर्च के मुताबिक, टमाटर का रस और टमाटर ऐसे सेल्स के विकास और क्लोनिंग को रोकता है जिनके कारण पेट का कैंसर होता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि टमाटर के जरिए पेट के कैंसर सेल्स को रोकने में मदद मिलती है। रिसर्च में पाया गया कि सैन मरजानो और कॉरबारिनो वैरायटी के टमाटरों में पेट के कैंसर के खतरनाक सेल्स की ग्रोथ और क्लोनिंग को रोकने की क्षमता होती है। जर्नल ऑफ सेलुलर फिजियोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, पेट के कैंसर के इलाज के दौरान टमाटर के पूरे अर्क का इस्तेमाल करने से कैंसर सेल्स की मुख्य प्रक्रिया बहुत ज्यादा प्रभावित होती है। इतना ही नहीं, टमाटर से इन सेल्स के ट्रांसफर होने की प्रक्रिया भी कम हो जाती है और अंत में कैंसर सेल्स खुद ही नष्ट होने लगते हैं। इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ सिएना के प्रोफेसर एनटोनियो का कहना है कि अभी इस पर और

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हेपेटाइटिस के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए अमिताभ बच्चन को अपना गुडविल एंबेसडर नियुक्त किया है

वि

अधिक रिसर्च करने की जरूरत है। ऐसा करने से कैंसर के इलाज और बचाव में कुछ नए पोषक तत्वों को भी शामिल कर मूल्यांकन किया जा सकता है। आपको बता दें, गैस्ट्रिक कैंसर यानी स्टमक कैंसर दुनिया भर में चौथें नंबर पर आने वाला सबसे कॉमन कैंसर है। इसके होने के कारणों में जेनेटिक कारण, ईटिंग हैबिट्स, हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन जैसी चीजें शामिल हैं। इसके अलावा स्मोचकिंग और सॉल्टेड फूड का अधिक सेवन भी गैस्ट्रिक कैंसर का बड़ा कारण है। (भाषा)

श्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में दक्षिण पूर्व एशिया के क्षेत्र में हेपेटाइटिस के बारे में जागरुकता के लिए बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन को गुडविल एंबेसडर नियुक्त किया है। बच्चन भी पूर्व में हेपेटाइटिस-बी वायरस से पीड़ित रह चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि बच्चन अब हेपेटाइटिस की महामारी को रोकने के प्रयासों के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए उनके साथ हैं। अमिताभ बच्चन ने कहा,‘ मैं पूरी तरह से हेपेटाइटिस से लड़ने के कारण प्रतिबद्ध हूं। हेपेटाइटिस-बी से ग्रस्त होने वाले व्यक्ति के रूप में, मुझे पता है कि दर्द और पीड़ाएं हैं, जो हेपेटाइटिस का कारण बनती हैं। किसी को कभी भी वायरल हेपेटाइटिस से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक जागरुकता कार्यक्रमों के लिए अभिनेता की आवाज का समर्थन किया जा रहा है, जो वह निवारक उपायों को बढ़ाना और हेपेटाइटिस के प्रारंभिक उपचार की व्यवस्था करने के उद्देश्य से

दिल्ली के निजी स्कूलों के विद्यार्थियों में ‘स्लीप एप्निया’ अ

(आईएमसीआर) द्वारा वित्तीय मदद से किए। इस अध्ययन में दस से सत्रह साल के आयु वर्ग वाले छात्रों को शामिल किया गया है। एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कहा, ‘हम एक अध्ययन कर रहे हैं, जिसके निष्कर्ष बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में ओएसए बहुत मुश्किल से देखने को मिला। जबकि निजी स्कूलों में हमने छात्रों में ओएसए की मौजूदगी को देखा। इस अध्ययन में जो आंकड़े पहले चरण में पाए गए वे इतना चौंकाने वाले हैं कि हम जानना

उधार देगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा, ‘बच्चन की आवाज एक है, जो देश भर के लोगों द्वारा सांस्कृतिक, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना सुनी जाती है और वास्तविक परिवर्तन को संभव बना सकती है। हमने इसे पोलियो उन्मूलन में देखा है। डब्ल्यूएचओ दक्षिणपूर्व एशिया के क्षेत्रीय निदेशक पूनम खेत्रपाल सिंह ने बताया, ‘इस एसोसिएशन से वायरल हेपेटाइटिस से होने वाली मौतों की बड़ी संख्या और बीमारियों को कम करने में डब्लूएचओ के प्रयासों को मजबूत करने में मदद मिलेगी, जो न केवल व्यक्तियों और परिवारों के लिए कठिनाइयों का कारण बनी है, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्वास्थ्य और विकास को प्रभावित करती है।’ इस सम्मान के अलावा, बच्चन भारत में पोलियो को खत्म करने के अभियान के लिए सद्भावना राजदूत भी थे, और देश में स्वास्थ्य के मुद्दों के लिए बहुत सारे समर्थन अभियान का भी एक हिस्सा रहे हैं। (भाषा)

स्लीप एप्निया ऊपरी वायु मार्ग में सोने के दौरान अवरोध की वजह से होता है

एम्स के एक शोध से खुलासा हुआ है कि दिल्ली के निजी स्कूलों के पंद्रह से बीस प्रतिशत छात्र ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया से पीड़ित हैं

खिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक शोध में खुलासा हुआ है कि दिल्ली के निजी स्कूलों में पढ़ने वाले 15 से 20 फीसदी छात्र ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया (ओएसए या नींद में खर्राटा लेना) से पीड़ित हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में सिर्फ दो फीसदी छात्र इससे पीड़ित हैं। इस अध्ययन के पहले चरण में सात हजार छात्रों का परीक्षण किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी व भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद

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स्वास्थ्य

टमाटर खाइए कैंसर भगाइए

खाने के बहुत फायदे हैं, लेकिन यूतोक्यां टमाटर आप जानते हैं टमाटर का किसी भी

स्वास्थ्य

चाहते हैं कि अध्ययन के पूरा होने के बाद परिणाम क्या होगा।’ स्लीप एप्निया ऊपरी वायु मार्ग में सोने के दौरान अवरोध की वजह से होता है। इसके दूसरे कारकों में मोटापा, आयु और आनुवांशिकता शामिल हैं। इनमें से मोटापा स्लीप एप्निया का सबसे बड़ा जोखिम कारक (12 से 15 साल आयु) है। हल्के

से मध्यम मोटापा स्लीप एप्निया के बढ़ते प्रसार के साथ जुड़ा हुआ है। अब तक यह अध्ययन 1314 स्कूलों में किया गया है, जिसमें ‘फादर एंजल स्कूल’ और ‘दिल्ली पब्लिक स्कूल’, आरके पुरम और दूसरे स्कूल शामिल हैं। इसमें पाया गया है कि निजी स्कूलों में ओएसए की 15-20 फीसदी है। इस परियोजना के तहत आयोजकों को पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को शामिल करना लक्ष्य है, हालांकि अभी तक सिर्फ दक्षिण दिल्ली को कवर किया गया है। निजी स्कूलों में ओएसए की अधिक मौजूदगी पर डॉ. गुलेरिया ने कहा,‘सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों के छात्रों की आहार और जीवन शैली खराब है। आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि सरकारी स्कूलों के बच्चों ने ज्यादा शारीरिक गतिविधि की, जिसमें टहलना आदि भी है।’


16 खुला मंच

22-28 मई 2017

‘कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं। जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे विजयी होते हैं’ - लोकमान्य तिलक

साल्वे की सफलता

म्मीद के मुताबिक कुलभूषण जाधव मामले में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। भारत-पाक संबंध के लिहाज से इस केस में भारत की बड़ी जीत हुई है। नीदरलैंड के हेग में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने पाकिस्तान को झटका देते हुए जिस लहजे में जाधव की फांसी पर रोक लगाने की बात कही है, वह इस मामले में भारतीय पक्ष और दावे को हर लिहाज से मिली मंजूरी है। दिलचस्प ही है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की तरफ से पैरवी करते हुए जहां मशहूर वकील हरीश साल्वे ने फीस के तौर पर महज एक रुपया लिया, वहीं पाकिस्तान के वकील खैबर कुरैशी ने अपनी सरकार से 5 करोड़ रुपए की फीस वसूली। खुद विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने साल्वे की फीस की जानकारी ट्वीटर पर दी थी। आईसीजे का फैसला आने के बाद भी सुषमा स्वराज के साथ पूरे देश ने साल्वे को शुक्रिया अदा किया, क्योंकि यह पांच करोड़ पर एक रुपए की नहीं, बल्कि कहीं न कहीं 125 करोड़ हिंदुस्तानियों की जीत है। आईसीजे का फैसला आने के साथ ही सोशल मीडिया पर हरीश साल्वे को लेकर कई हैशटैग चलने लगे। देश के इस नामी और सबसे ज्यादा फीस लेने वाले वकील ने जिस तरह जाधव मामले में भारतीय पक्ष को अंतरराष्ट्रीय अदालत में रखा, उसकी तारीफ अदालत के जज ने फैसला सुनाते हुए भी की। हरीश साल्वे लंबे समय तक केंद्र में कई बार मंत्री रहे एनकेपी साल्वे के बेटे हैं। पर इस विरासत को हरीश साल्वे ने अपने तरीके से आगे बढ़ाया। 42 साल के अपने करियर में वह कई कॉरपोरेट घरानों का पक्ष कोर्ट में रख चुके हैं। हालांकि वकालत के पेशे में उनके आने की कहानी भी दिलचस्प है। वे बचपन से इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन कॉलेज तक आते-आते उनका रुझान चार्टर्ड अकाउंटेसी (सीए) की ओर हो गया। सीए की परीक्षा में वह दो बार फेल हो गए। जाने माने वकील नानी पालकीवाला के कहने पर उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि अपनी इस सफलता के श्रेय भी वे परिवार और संस्कार को ही देते हैं। वे कहते हैं, 'मेरे दादा एक कामयाब क्रिमिनल लॉयर थे। पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। मां डॉक्टर थीं। इसीलिए कम उम्र में ही मुझ में प्रोफेशनल गुण आ गए थे।' बहरहाल, इस गुणी और श्रेष्ठ वकील के लिए यह तो कहना ही पड़ेगा कि आज उनके परिवार को ही नहीं, देश को भी उन पर नाज है।

प्रभाकर सिन्हा

लेखक वरिष्ठ समाजसेवी और तीन दशकों से व‌िभ‌िन्न रचनात्मक संस्थाओं से जुड़े हैं

ताकि प्यासा न रह जाए गांव

धरती जितना जल दे रही है, उसे उसके अनुपात में बेहद कम जल मिल रहा है। यही वजह है कि दुनिया का भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है

गां

व से खबर आई कि दरवाजे पर बना कुंआ सूख गया है। गांव का तालाब तो सालों पहले बेपानी हो चुका था, लेकिन कुंओं के सूखने की खबर परेशान करने वाली है। कुंओं के साथ हैंडपंपों की हालत पानी देने की नहीं रही। गांव के प्यास की खबर मां बता रही थी और यह सब सुन कर मेरा गला सूखने लगा था। बिहार के मुजफ्फरपुर के करीब का मेरा गांव इस गर्मी में पहली बार पानी के संकट से जूझ रहा है। जिनके घरों में मोटर पंप लगा है, वो पड़ोसियों की प्यास बुझा रहे हैं। लेकिन सवाल यह कि आखिर एक छोटी नदी, दो बड़े तालाब और दर्जनों कुओं वाले इस गांव में ऐसा क्या हुआ कि धरती ही सबके हिस्से का सारा पानी पी गई। सवाल यह कि बारह में से चार महीने तक तरबतर रहने वाले गांव का पानी आसमान ने कैसे और क्यों सोख लिया। जो बादल पानी बरसा गए, वह पानी फिर क्यों बादल बन कर किसी दूर देश को चला गया। यह पानी का गुस्सा है या कुछ और, लेकिन यह तो तय है कि सूखा किसी जलजले की तरह अचानक नहीं आता। पहले मेरे गांव की नदी सूखी , फिर तालाब और अब हैंडपंप भी हड़ताल पर चले गए। भूजल स्तर गिरने की यह तस्वीर बिहार के एक छोटे से गांव की नहीं, कमोवेश पूरे देश की है। करीब एक दशक पहले तक मात्र तीस मीटर की खुदाई पर पानी मिल जाता था, लेकिन अब पानी के लिए साठ से सत्तर मीटर की गहराई नापनी पड़ती है। यह हालत भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के दर्जन भर राज्यों हिमाचल, बंगाल, झारखंड, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और गुजरात के भूजल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। सवाल यह है कि आखिर भूजल स्तर के लगातार गिरने की वजह क्या है? घटते भूजल का सबसे प्रमुख कारण तो उसका अनियंत्रित और अनवरत दोहन ही है। आज दुनिया अपनी जल जरूरतों की पूर्ति के लिए सर्वाधिक रूप से भूजल पर ही निर्भर है। लिहाजा, अब एक तरफ तो भूजल का ये अनवरत दोहन हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ तेज औद्योगीकरण के चलते प्राकृति को हो रहे नुकसान और पेड़-पौधों-पहाड़ों आदि की मात्रा में कमी के कारण बरसात में भी काफी कमी आ गई है। परिणामतः धरती को भूजल दोहन के अनुपात में जल की प्राप्ति नहीं हो पा रही है। मतलब साफ है कि धरती जितना जल दे रही है, उसे

उसके अनुपात में बेहद कम जल मिल रहा है। यही वह वजह है जिससे कि दुनिया का भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। दुखद और चिंताजनक बात ये है कि कम हो रहे भूजल की इस विकट समस्या से निपटने के लिए अब तक वैश्विक स्तर पर कोई भी ठोस पहल होती नहीं दिखी है। आजादी के इतने सालों में देश कहां से कहां तक पहुंचा इसका अंदाजा विकास के हर ग्राफ में दर्ज है, लेकिन जल प्रबंधन में हम काफी पीछे छूट गए। नतीजा सबके सामने है। प्यास के इस संकट के पीछे कम होती बारिश की फुहारें नहीं हैं, क्योंकि अगर ऐसा होता तो इस्राइल जैसे देश , जहां औत वर्षा मात्र 25 से.मी से भी कम होती है, वहां क्या होता। इतनी कम बारिश के बावजूद इस्राइल की प्यास बुझ जाती है तो इसके पीछे की वजह है वहां का जल प्रबंधन। हम तो बरसने वाले पानी का महज 15 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल कर पाते हैं। शेष जल को हम समुद्र के हवाले कर देते हैं। जो पानी बचता है उसमें से अधिकांश को शहरों एवं उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ प्रदूषित कर देते हैं। इसीलिए पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। 1994 में प्रति व्यक्ति मीठे जल की उपलब्धता 6000 घन मीटर थी, जो साल 2000 में घटकर मात्र 2300 घन मीटर रह गई है। जनसंख्या की वृद्धि दर और जल की बढ़ती खपत को देखते हुए अनुमान है कि साल 2025 तक यह आंकड़ा मात्र 1600 घन मीटर रह जाएगा। सवाल यह है कि गिरते भूजल स्तर और लगातार कम होती बारिश की वजह से मेरा गांव ही नहीं पूरा इलाका एक दिन बुंदेलखंड बन जाएगा‍‍? बुंदेलखंड की प्यास इतनी बढ़ी

जनसंख्या की वृद्धि दर और जल की बढ़ती खपत को देखते हुए अनुमान है कि साल 2025 तक यह आंकड़ा मात्र 1600 घन मीटर रह जाएगा


22-28 मई 2017 कि वह चुनावी मुद्दा बन गई। लेकिन साल यह कि क्या वाकई बुन्देलखण्ड से बादल नाराज हैं। मेघ के दूत बुंदेलखंड की अनदेखी कर किसी दूसरे इलाके में रिमिझिम फुहारें बरसाने चले जाते हैं, लेकिन सच यह नहीं है। बादल की मेहरबानी बुंदेलखंड पर भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो बुंदेलखंड में लगभग 95 सेंटीमीटर बारिश नहीं होती। बारिश की यह मात्रा राजस्थान के मरुस्थली इलाकों, मराठवाड़ा या विदर्भ की तुलना में काफी अधिक है। यह अनन्तपुर या कालाहांडी इलाके में होने वाली बरसात से भी ज्यादा है। यहां का मौसम भी खेती के लिये कभी बुरा नहीं रहा। इसीलिए कि उन कारणों की पड़ताल जरूरी है जो बुंदेलखंड की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं। बुंदेलखंड में बार-बार पड़ने वाले सूखे पर काफी कुछ सोचा समझा जा चुका है। बहुत सारे सुझाव दिए गए, कई योजनाएं बनीं, राहत पैकेजों की बरसात कराई गई, लेकिन सूखा ने बुंदेलखंड का कभी पीछा नहीं छोड़ा। अब बुंदेलखंड की किस्मत बदलने के लिए नदियों को जोड़ने की तैयारी चल रही है। लेकिन कभी जल सहेजने और उसके प्रबंधन के सहारे सूखे से निपटने की चंदेल और बुंदेला कालीन संरचनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। पिछले लगभग दो सौ सालों से भारत में मुख्यतः अंग्रेजों द्वारा अपनाए मौसम विज्ञान और जलविज्ञान के आधार पर काम हो रहा है, इसीलिए जरूरी है कि हम इंग्लैंड और बुन्देलखण्ड के मौसम की तुलना करें। लंदन में हर साल लगभग 60 सेंटीमीटर पानी बरसता है और बुन्देलखण्ड में करीब 95 सेंटीमीटर है। यह बारिश, लंदन की बारिश से 160 प्रतिशत अधिक है। लंदन में हर माह लगभग 8 से 11 दिन बारिश होती है अर्थात लगभग 107 दिन पानी बरसता है, या बर्फ गिरती है। बुंदेलखंड में बारिश के दिनों की कुल संख्या 40 है। इसमें 30 दिन जून से सितम्बर के बीच और बाकी 10 दिन आठ महीने में होती है। मतलब कि लंदन की तुलना में बुंदेलखंड में बहुत कम दिन पानी बरसता है। लेकिन लंदन की अपेक्ष बुंदेलखंड में बरसने वाली बूंदें ज्यादा बड़ी और पानीदार हैं। लंदन की बूंदों की औसत साइज 0.6 मिलीमीटर होती है, जबकि बुंदेलखंड में बारिश की बूंदों की औसत साइज दो से तीन मिलीमीटर है, जो लंदन की बूंदों की तुलना में लगभग तीन से पांच गुना अधिक बड़ी हैं। एक और फर्क तापमान का है। अधिक तापमान का मतलब खेत की मिट्टी की नमी और जलस्रोतों के पानी का तेजी से गायब होना। मौसम के अन्तर के कारण बुंदेलखंड की समस्याओं का हल विलायत या ठंडे मुल्कों के अनुभव के आधार पर लिखी किताबों या उस ज्ञान के आधार पर बनाए बांधों या स्टापडैमों में नहीं मिल पाया। इसी कारण योजनाओं और पैकेजों से जल स्वावलंबन नहीं आया। बुन्देलखण्ड में जल स्वावलंबन हासिल करने के लिये परम्परागत ज्ञान को अपनाना होगा। बरसात के चरित्र, तापमान, भारतीय जल विज्ञान और खेती के अन्तर संबंध को समझना होगा। संकट मेरे गांव का हो या फिर बुदेलखंड का, मुख्य कारण मौसम का है। इसीलिए मौसम के साथ जब केहतर तालमेल बनेगा, तब न मेरे गांव में जल की कमी होगी और न बुंदेलखंड में।

खुला मंच

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जीएसटी और उम्मीद की वादी

देश में कश्मीर मुद्दे पर एकल सहमति है कि उसे विकास की मुख्यधारा में साथ लेकर चलना है

ई 18 की तारीख कई मामलों में भारत के लिए तारीखी संयोग और संतोष वाला रहा। इस दिन एक तरफ हेग के अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) में भारत के पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान में दी गई फांसी की सजा के खिलाफ भारत की अपील के पक्ष में फैसला आया, तो वहीं जम्मू कश्मीर के सुलगते हालात के बीच भारत सरकार ने श्रीनगर में जीएसटी काउंसिल की दो दिवसीय बैठक बुलाई। जीएसटी काउंसिल की यह 14वीं बैठक थी। यही नहीं, इसी दिन श्रीनगर में पुलिस स्टेशन पर आतंकियों ने हमला भी किया। हमले की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि इस दौरान देश के रक्षा और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत सारे राज्यों के वित्तमंत्री और कई वरिष्ठ अधिकारी शहर में हो रही जीएसटी काउंसिल की बैठक में हिस्सा लेने के लिए मौजूद थे। दरअसल, यह पहली बार है कि जम्मू-कश्मीर में जीएसटी के मुद्दे पर बैठक बुलाई गई है। साफ है कि भारत सरकार जीएसटी के बहाने देश और दुनिया को यह संदेश देना चाहती है कि कश्मीर की वादी में पाकिस्तानी हिमाकत के कारण थोड़ी अस्थिरता और आतंकी गतिविधियां जरूर बढ़ी हैं, पर हालात काबू से बाहर नहीं हैं और न ही सरकार ऐसा सोचती है कि जम्मू कश्मीर सुरक्षा के लिहाज से देश का ऐसा सूबा है, जिसे पूरी तरह आपवादिक या देश की मुख्यधारा से अलग माना जाए। यह संदेश पाकिस्तान

वर्ष-1 | अंक-22 | 15-21

सत्य की राह पर

मई 2017

/2016/71597 आरएनआई नंबर-DELHIN

harat.com

sulabhswachhb

26

10 किक्ा

04 बातचीत

परदादा-परदादी सककूल

भकवष्य का बल

म’

बुलंदिहर के ‘अंकल सै का अनोखा सककूल

अनूठा गांव

बंद ककवाड़ों का गांव

व उत्तराखंड के मुसमोला गांदेवी में अकेली रहती हैं लीला

ए करोड़ों का दान

सीआईएसएफ के डीजी ओपी कसंह से बातचीत

सवच्छ भारत कोर के कल

कलए सरकारी उपक्रमों, कसद्ध हो रही है। कोर के कोर’ की स्ापना सा््षक हैं को पूरा करने में ‘सवच्छ भारत बढ़-चढ़ कर दान कर रहे सवच्छ भारत कमिन के लक््य कंपकन्यों व संस्ाओं के अलावा सामान्य लोग भी कनजी

य प्रयासरों गंगा नदरी के संरक्ण के राष्टरी सुम्वधाओं में सुधार करने और की धारा 80 को बढाने के मलए अमधमनयम एसएसबी ब्यूरो में जनसाधारण की भागरीदाररी है। (6) में संशोधन का प्रसता्व मलए यह लोगरों को प्रेररत करने के भारत ममशन’ आज एक कोर में अंशदान के मलए धानमंत्री नरेंद्र मोदरी का ‘स्वच्छ । इसमें जहां एक तरफ मकया गया है मक घरेलू दाताओं है भरी ा क चु ले प्रा्वधान शक्ल का राष्टरीय आंदोलन कोई कर नहीं , को दान की कुल रामश पर कॉरपोरेट घराने, मफलमरी हससतयां गा मनमध’ में मदए एक नजर लगेगा। यह ्छूट ‘स्वच्छ गं नाम्वर हससतयां कंपनरी मिलाडरी और अनय क्ेत्रों की पर प्रभा्वरी है। इसरी तरह ्त त दान सफफू गए स्वत: भरी लोग स्ापना सामामजक दामयत्व जुड रहरी हैं, तो ्वहीं आम ‘सवच्छ भारत कोर’ की अमधमनयम 2013 के तहत रहे हैं। गौरतलब भरी रामश दाता की भा्व से इसका महससा बन 2015 में हुई ्ी के मलए िच्त की गई कोई टलरी ने लोकसभा नहीं होगरी। ये है मक म्वत्त मंत्री अरुण जे करोड़ कुल आय से कटौतरी के योगय बजट पेश करते 2016-17 तक कोर में 245 2015 से लागू हैं में ्वर्त 2015-16 का आम सारे प्रा्वधान एक अप्ररैल त्रों तथा म्वद्ालय रुपए जमा ने में आए हैं। ि दे हुए ग्ामरीण और शहररी क्े भरी े ज नतरी अच्छे और इसके के माधयम भी चला कंपमनयरों पररसररों में ‘स्वच्छ भारत ममशन’ धार के कॉरपोरेट घराने अलग से सा्व्तजमनक उपक्रमरों, मनजरी में सु तरफ से ‘स्वच्छ से स्वच्छता संबंधरी सुम्वधाओं रहे सवच्छता अकभ्यान और जागरूक नागररकरों की की सथापना की ...जारी पेज 2 मलए ‘स्वच्छ भारत कोर’ स्वच्छता संबंधरी घोरणा की थरी। इसके तहत

प्र

के लिए भी है, जो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अपनी पूरी रणनीति को उस मोड में ले आई है। बात करें जीएसटी कौंसिल की श्रीनगर में बैठक बुलाने के मकसद की तो इस बहाने सरकार एक बार फिर से ‘एक देश, एक कर’ का संदेश देना चाहती है। जाहिर है कि यह संदेश अपनी व्याख्या में आर्थिक से लेकर कूटनीतिक तक कई अर्थ अपने में समेटे है। तारीफ करनी होगी नरेंद्र मोदी सरकार की जिसने एक ऐसे समय में कश्मीर के सवाल को देश के आर्थिक हित के साथ जोड़ने की सूझबूझ दिखाई है, जिस वक्त हर दूसरे-तीसरे दिन पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा है और वादी के भीतर पत्थरबाजी के बीच बारूदी धमाके एक साथ सुने जा रहे हैं। गौरतलब है कि जीएसटी के मुद्दे पर महबूबा मुफ्ती सरकार भी केंद्र के साथ खड़ी है। इससे पहले मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती यह कह भी चुकी हैं कि वादी के सुलगते हालात के बीच उन्हें सबसे ज्यादा भरोसा पीएम नरेंद्र मोदी पर है। इस लिहाज से जब श्रीनगर में जीएसटी काउंसिल की बैठक शुरू हुई तो

‘स्वच्छ भारत कोष’ में करोड़ों का दान देने वाला आलेख पढ़कर काफी खुशी मिली। हमें उस समय काफी खुशी मिली, जब प्रधानमंत्री स्वयं ही झाड़ू उठाकर सफाई पर निकले और उनके साथ लाखों लोग ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पर निकल पड़े। भारत में नरेंद्र मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने स्वच्छता के लिए देश भर में अभियान छेड़ दिया। उनकी सोच, दृष्टि और राष्ट्र को शिखर तक ले जाने का संकल्प हर किसी को रोमांचित करता है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ में हमेशा सत्य पर आधारित आलेख छपता है। इसीलिए मैं इसे बहुत ही चाव से पढ़ता हूं। लोगों को सार्थक और विकासपरक सामग्री पढ़नी चाहिए, ताकि

सूबे के वित्त मंत्री डॉ. हसीब द्राबू ने जो बातें कहीं वो गौर से सुनने लायक हैं। उन्होंने कहा, ‘जीएसटी हमारे राज्य के लिए बहुत फायदेमंद है। हम इस व्यवस्था का हिस्सा जरूर बनेंगे।’ जीएसटी को लेकर स्थानीय हल्कों और कुछ अलगाववादी समूहों द्वारा व्यक्त आशंकाओं को निराधार बताते हुए सूबे के वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य में आम लोगों के लिए यह कर व्यवस्था बहुत फायदेमंद होगी। उनके अनुमान के मुताबिक जीएसटी व्यवस्था का हिस्सा बनने के बाद जम्मू कश्मीर हर साल कर वसूली की मद में 1500 से दो हजार करोड़ तक का लाभ होगा और इससे इससे राज्य में महंगाई भी अगले तीन साल में कम हो जाएगी। जीएसटी काउंसिल की बैठक में भी देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यकीन दिलाया कि वे जम्मू-कश्मीर को जीएसटी के पुनर्गठन और क्रियान्वन में केंद्र सरकार की ओर से हर प्रकार की मदद दिलाएंगे। इस तरह देखें तो एक तरफ तो जहां अब कोई सूरत नहीं बची है, जिससे एक जुलाई से जीएसटी न लागू हो, वहीं यह भी साफ हो गया है कि देश में कश्मीर मुद्दे पर एकल सहमति है कि उसे विकास की मुख्यधारा में साथ लेकर चलना है। रही बात वादी में बढ़ी अशांति को तो निश्चित रूप से भारत सरकार के इस कदम का एक साकारात्मक संदेश जाएगा। यह संदेश सरहद पार के उन मंसूबों के लिए भी है, जिनके नापाक इरादे न तो कश्मीर में चल रही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पटरी से उतार पा रहे हैं और न ही इससे वादी में कोई बड़ी अलगाववादी खाई पैदा हो रही है। एक मानसिक वातावरण का निर्माण हो। इसीलिए मैं खासतौर पर ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ की टीम और प्रबंधन को धन्यवाद देता हूं जो इस तरह की सामग्री उपलब्ध कराते हैं। मिथिलेश कुमार, सहरसा, बिहार

प्रेरक साक्षात्कार

सीआईएसएफ के महानिदेशक का प्रेरक साक्षात्कार पढ़ने के बाद लगा कि देश के सैनिक सुरक्षा के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं। सुरक्षा सीमा की हो या फिर देश के अंदर हमारे ये वीर बहादुर प्रहरी लगातार बिना थके अपना काम करते हैं। इस साक्षात्कार को पढ़ने के बाद देश के हजारों युवकों को प्रेरण मिलेगी। संजय सिंह, रायपुर, छत्तीसगढ़


18 फोटो फीचर हुनर का हाट 22-28 मई 2017

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नई द‌िल्ली में लगे हुनर हाट में सजे-धजे रंग-बिरंगे स्टॉल हर क‌िसी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं

जयराम 1

1. हुनर हाट के प्रवेश द्वार पर लोगों का तांता 2. जालीदार डिजाइन वाले प्लासिटक के झाड़-फानूस 3.राजस्थानी कलाकाराें द्वारा बनाई गई कठपुतलियां 4. हुनर हाट में चीनी मिट्टी के बर्तन 5. नृत्य करते राजस्थानी कलाकार 6. कपड़े से बनाए गए झाड़-फानूस 7. चीनी मिट्टी से बनी शाही क्रॉकरी 8. कांच से बनी भगवान कृष्ण की प्रतिमा 4 3

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फोटो फीचर

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9. राजस्थानी खिलौनों को देखती नन्हीं बच्ची 10. हाथ से सूती दरी को बनाने की कला का प्रदर्शन 11. क्रॉकरी स्टॉल 12. कश्मीरी वाद्य यंत्र का प्रदर्शन करता हुआ कलाकार 13. विभिन्न प्र्रकार के डिजाइनर कंगन और हार 14. ग्रामोफोन का पुराना मॉडल 15. रिक्शा का मॉडल 16. दूध वाले की साइकिल का मॉडल 17. तोप का मॉडल

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20 कला

22-28 मई 2017

मधुबनी पेंटिंग

एक नजर

1934 में अंग्रेज अफसर डब्ल्यू जी. आर्चर की निगाहें चित्रों पर पड़ी 1949 में ‘मार्ग’ में उन्होंने ‘मैथिली पेंटिग’ पर लेख लिखा 70 और 80 के दशक में इसकी धूम दुनिया भर में मची

हैं, जिससे इनके बिखरने का खतरा नहीं रहता। आज जहां बाजार में भारतीय कला को मुंह-मांगी कीमतों पर खरीदा-बेचा जा रहा है, वहीं मिथिला शैली के चित्रों को उस तरह से बाजार नहीं मिल पा रहा है।

मधुबनी पेंटिंग की उषा

मधुबनी पेंटिंग

इस बीच कुछ प्रयास निजी तौर पर ऐसे जरूर हुए हैं, जिसने समय के मुताबिक मधुबनी पेंटिंग को एक उद्यम की शक्ल दी है। ऐसा ही एक अहम प्रयास किया है उषा झा ने। बिहार-नेपाल सीमा पर स्थित

पर चढ़ा उद्यम का रंग

कोहबर से निकल कर मिथिला की कला अब अंतरराष्ट्रीय कला बाजार तक जा पहुंची है। इस लंबी यात्रा में इस कला के विषय वस्तु से लेकर रंग तक बदले, लेकिन नहीं बदला तो वह है मिथिलांचल की गंध, जो आज भी हर पेंटिंग में मौजूद है

एसएसबी ब्यूरो

क ऐसे दौर में जब दुनिया भर की आर्ट गैलरियों में नामी चित्रकारों की पेंटिग्स लाखों-करोड़ों रुपए में नीलाम होती हों, तो ऐसा तो नहीं कह सकते कि हमारा दौर रंगों की कलात्मकता को नहीं समझता है। अच्छी बात यह है कि आज इस समझदारी में आधुनिकता और पारंपरिकता दोनों ही रंग घुले-मिले हैं। भारत में कई परंपरागत शैलियों की चित्रकलाएं आज भी प्रचलन में। इनमें ही एक शैली है ‘मिथिला पेंटिंग’। यह भी दिलचस्प है कि आज भले मिथिला पेंटिंग ‘मधुबनी पेंटिग’ के नाम से जानी जाती हो, लेकिन सही मायनों में इसे मिथिला पेंटिंग नाम देने से ही व्यापक विस्तार मिलता है। 70 और 80 के दशक में इस पेंटिंग की धूम जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, अमेरिका, जापान आदि देशों की कला दिर्घाओं में खूब रही। पश्चिमी कलाप्रेमी आज भी चित्रकला की इस शैली पर मुग्ध हैं, पर इसे बाजारवादी प्रसार के लिए अपेक्षित प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा है। नए दौर में सीता देवी और गंगा देवी की चित्र शैली और विषय वस्तु ने इस कला को नई जुबान

दी। कहते हैं कि पाब्लो पिकासो जैसे विश्वविख्यात पेंटर भी मिथिला पेंटिंग को देखकर प्रभावित हुए थे। सीता देवी और गंगा देवी जैसी चित्रकारों की विदेश यात्राओं और वहां उन्हें मिले सम्मानों ने मिथिलांचल के गांव की महिलाओं को इस कला की ओर नए सिरे से आकृष्ट किया। 1934 में बिहार में भारी भूकंप आया था, जिसमें जान-माल की काफी क्षति हुई थी। बताते हैं कि भूकंप पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के दौरान तत्कालीन ब्रितानी अफसर और कला प्रेमी डब्ल्यू जी. आर्चर की निगाहें क्षतिग्रस्त मकानों की भीतों पर बनी रेल, कोहबर वगैरह पर पड़ी। उन्होंने इन चित्रों को अपने कैमरे में कैद कर लिया। बाद में वे इस कला के संग्रहण और अध्ययन में जुट गए। वर्ष 1949 में ‘मार्ग’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उन्होंने ‘मैथिली पेंटिग’ नाम से एक लेख लिखा, जिसमें इस कला में प्रयुक्त बिंबों और प्रतीकों का विवेचन

है। इसमें चित्रों के आध्यात्मिक अर्थ और विभिन्न शैली की पड़ताल की गई है। इस लेख के बाद देशविदेश के कलाप्रेमियों की नजर इस चित्रशैली पर गई। 60 के दशक में ऑल इंडिया हैंडिक्राफ्ट बोर्ड की तत्कालीन निदेशक पुपुल जयकर ने मुंबई के कलाकार भास्कर कुलकर्णी को मिथिला क्षेत्र में इस कला को परखने के लिए भेजा। बहरहाल, इन वर्षों में मिथिला चित्र शैली की विषय वस्तु और भाव ही नहीं बदले हैं, बल्कि रंग भी बदले हैं। पहले प्राकृतिक तौर पर मिलने वाली रंगों का ही इस पेंटिंग में इस्तेमाल होता था। मसलन, हरी पत्तियों से हरा, गेरु से लाल, काजल और कालिख से काला, सरसों और हल्दी से पीला, सिंदूर से सिंदूरी, पिसे हुए चावल, दूध और गोबर से बने रंगों से ही कलाकार चित्रों को उकेरते थे, लेकिन वर्तमान में ज्यादातर कलाकार देशज और प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रेलिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे

पाब्लो पिकासो जैसे विख्यात पेंटर भी मिथिला पेंटिंग को देखकर प्रभावित हुए थे। सीता देवी और गंगा देवी जैसी चित्रकारों की ख्यात‌िने इस कला की ओर लोगों का ध्यान नए सिरे से आकृष्ट किया

एक गांव से आने वाली उषा झा ने अपने स्कूल की पढ़ाई जिला मुख्यालय शहर पूर्णिया में की। उनकी शादी कक्षा 10 उत्तीर्ण करने के पहले ही हो गई थी। शादी के बाद, वे पटना आ गईं, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। निजी ट्यूशन के माध्यम से, पत्राचार पाठ्यक्रम और सरकारी स्कूल से उन्होंने मास्टर डिग्री प्राप्त करने में सफलता हासिल की। उषा कहती हैं, 'कहीं गहरे, मेरे अंतर मन में उद्यमशीलता का एक सपना था। मैं स्वयं अपने और दूसरों के लिए कुछ करना चाहती थी। मेरे जीवन में सब कुछ था। बच्चे, सहयोग करने वाला एक प्यारा परिवार, फिर भी मुझे लगता था कि मेरी अपनी कोई पहचान नहीं है। अपने होने का बोध नहीं था।' अपनी स्वयं की पहचान बनाने से लेकर 300 से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने तक, उषा ने एक लंबा सफर तय किया है। हालांकि ये यात्रा इतनी भी आसान नहीं रही, लेकिन संतोषजनक जरूर रही और यही संतोष उषा को आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। 1991 में जब उनके बच्चे बड़े हो गए और उनके पास अधिक खाली समय था, तब उन्होंने कुछ करने का फैसला किया और उस


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मिथिला कला को अपने भविष्य-निर्माण का धार बनाया, जिससे कि वे बचपन से ही परिचित थीं। देखते-देखते उषा झा का एक छोटा सा कदम जो एक विशाल छलांग बन गई। 'पेटल्स क्राफ्ट' की शुरुआत 1991 में उषा झा के घर पटना के बोरिंग रोड से हुई, जहां से वे आज भी काम करती हैं। कलाकारों के लिए समर्पित एक कमरे से शुरू हुआ उनका काम अब पूरे घर में फैल चुका है। करीने से रखे फोल्डर्स, साड़ी, स्टॉल्स ग्राहकों के लिए तैयार रहते हैं। उषा कहती हैं, 'आज हमने आधुनिक मांगों को पूरा किया है और बैग, लैंप, साड़ी और घरेलू सामान सहित लगभग 50 विभिन्न उत्पादों पर मधुबनी पेंटिंग की है।' वे हमें एक नैपकिन होल्डर दिखाती हैं, जो उनके अमेरिकी और यूरोपीय ग्राहकों में खासा पसंद किया जाता है। आज उनके ग्राहकों में भारत के दौरे पर आए सरकारी और गणमान्य व्यक्तियों से लेकर दुनिया के विभिन्न देशों से आए पर्यटक भी शामिल हैं। उषा ने थोड़े से शिल्पकारों के साथ अपने काम की शुरुआत की थी, जिनमें से दो तो उनके घर में काम करती थीं, जबकि शेष अन्य मिथिलांचल में रह कर काम करती थीं। महिला कलाकारों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती रही और आज 300 से अधिक प्रशिक्षित स्वतंत्र महिलाएं उनके साथ काम करती हैं। 2008 में उषा झा ने गांवों में किए जा रहे अपने काम को औपचारिक रूप दिया तथा उन्होंने अपने गैर सरकारी संगठन, ‘मिथिला विकास केंद्र’ का पंजीकरण करवाया। उषा कहती हैं, 'इसके माध्यम से हम महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं। महिलाएं अपना घर चलाने में सक्षम हैं। हम उनके बच्चों के लिए शिक्षा भी उपलब्ध कराते हैं और उनके स्वास्थ्य के मुद्दे पर उन्हें जानकारी देते है। हम स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हैं और महिलाओं को होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में उनके बीच जागरुकता फैलाने का काम भी करते हैं।' उषा झा द्वारा प्रशिक्षित कई महिलाओं ने उन्हें छोड़ कर अपना काम भी शुरू कर लिया है और अब कई महिलाओं को पटना में भी प्रशिक्षित किया जा रहा है, लेकिन पूरी तरह से देखें तो प्रगति थोड़ी

धीमी है। वह कहती हैं, 'मैंने जब शुरुआत की थी तब ऑनलाइन विक्रय की कोई अवधारणा नहीं थी। उन दिनों में हमें पूरे देश में और यहां तक कि विदेशों में भी यात्रा कर के स्टॉल लगाने पड़ते थे। मुझे अपने उत्पाद को बेचने के लिए बड़े पैमाने पर यात्रा करनी पड़ती थी।' उषा झा आज की तारीख में मधुबनी पेंटिंस और उससे जुड़े उद्यम के क्षेत्र में एक बड़ा नाम बन गई हैं। विभिन्न वेबसाइट्स के माध्यम से वे अपने उत्पाद ऑनलाइन बेचती हैं, फिर भी उनका कहना है, 'आज भी हमारी ज्यादातर बिक्री एक-दूसरे से बातचीत के माध्यम से ही होती है।' प्रौद्योगिकी ने उन्हें गांव के कलाकारों के साथ संवाद करने में सबसे बड़ी मदद की है। व्हाट्सएप ने कस्टमाइजेशन की सभी समस्यायों को समाप्त कर दिया है। जब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने बिहार का दौरा किया, तो उन्हें 14 फीट लंबी एक पेंटिंग भेंट की गई थी, जो आज भी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ा रही है। इस पर वो गर्व से कहती हैं, 'वो पेंटिंग हमारे द्वारा ही दी गई थी। एक और दिलचस्प वाकया स्वीडन से आए एक पर्यटक के बारे में है। इस बारे में वह कहती हैं, 'उनके ड्राइवर को पता ही नहीं था कि आर्ट गैलरी क्या होती हैं, इसीलिए वो उस पर्यटक को पेटल्स क्राफ्ट ले कर आ गया।' आगे वे कहती हैं, 'हो सकता है कि वह एक आर्ट गैलरी नहीं खोज सका हो, लेकिन उसे हमारा शिल्प बहुत पसंद आया और वह हमारी कला देख कर बहुत खुश हुआ। उसने अपने परिवार के लिए बहुत सारे उपहार खरीदे।' पेटल्स क्राफ्ट के अलावा उषा झा ने इन तमाम सालों में और भी अन्य भूमिकाएं निभाई हैं, जैसे पटना में एक कॉलेज के अतिथि व्याख्याता के रूप में शिक्षण, पिछले 17 सालों से बिहार महिला उद्योग संघ के सचिव का पद संभालने के साथ ही वे अनेक जरूरतमंद महिलाओं के संबल का आधार भी रही हैं। वे सभी महिलाएं जिन्होंने अपने शुरुआती दिनों में उषा से प्रशिक्षिण लिया वे अब अगुआ के रूप में उभरी हैं और जो महिलाएं अभी इस क्षेत्र में नई हैं वे अपने भविष्य में उजाले की एक नई किरण को भर रही हैं।

आने वाले दिनों में उषा झा बिहार-नेपाल सीमा के पास गांवों और कस्बों में अधिक से अधिक प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित करना चाहती हैं, जहां उन्हें लगता है कि सरकार अभी तक पहुंचने में सफल नहीं हो पायी है। वे कहती हैं, 'ये एक महत्वाकांक्षी परियोजना है और मैं अधिक से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए इन केंद्रों की स्थापना करना चाहती हूं।' अपनी बात को खत्म करते हुए अंत में वे दूसरों को सिर्फ ये संदेश देना चाहती हैं, ‘यदि मैं ये कर सकती हूं तो आप भी कर सकते हैं।'

मधुबनी पेंटिंग में निपुण एक परिवार

बिहार के मिथिला क्षेत्र में एक ऐसा परिवार भी है, जिसके सभी सदस्य मधुबनी पेंटिंग के माहिर कलाकार हैं। प्राचीन समय में भले ही इस पेंटिंग से घरों की दीवारों को सजाया संवारा जाता हो, मगर हाल के दिनों में मधुबनी पेंटिंग कपड़ों और सजावटी वस्तुओं के साथ-साथ इसकी पहचान देश-विदेश में होने लगी है। कलाकार राजकुमार की नानी, मां, पत्नी भाई, भाभी, मामा-मामी के अलावा परिवार के कई अन्य सदस्य मधुबनी पेंटिंग की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। राजकुमार बताते हैं कि मधुबनी पेंटिंग के नाम से मशहूर यह चित्रकला मिथिला निवासियों की प्राचीन परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर के तौर भी जानी जाती है। मधुबनी जिले का शायद ही कोई गांव ऐसा हो, जहां इस प्रकार की पेंटिंग नहीं की जाती हो, लेकिन इस कला के लिए दो गांवरांटी और जितवारपुर का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम होने से कलाकारों को विदेश में जाकर काम करने का मौका मिला। रांटी में लोग आज भी फूलों से बने रंगों और चित्रकारी में लाइन का इस्तेमाल करते हैं, जबकि जितवारपुर में अब फैब्रिक में लगने वाले कृत्रिम रंग का भी इस्तेमाल किया जाता है। वैसे जितवारपुर को प्रसिद्धि इस कारण भी मिली कि इसी गांव की निवासी जगदंबा देवी को मधुबनी कला को लोकप्रिय बनाने में योगदान माना जाता है। दिवंगत जगदम्बा देवी को वर्ष 1970 में राष्ट्रीय पुरस्कार और 1975 में

कला

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पद्म पुरस्कार से सम्मनित किया गया था। जगदंबा देवी के निधन के बाद उनकी विरासत को संभालने और उनकी कला को आगे बढ़ाने के लिए उनकी भतीजी यशोदा देवी ने जिम्मा संभाला। मधुबनी पेंटिंग की चर्चित कलाकार और कई सम्मान तथा पुरस्कारों से नवाजी गईं यशोदा ने अपनी पूरी जिंदगी मधुबनी कला के लिए समर्पित कर दी। कहा जाता है कि यशोदा देवी सात-आठ वर्ष में ही रंगों और लकीरों से खेलने लगी थीं। यशोदा देवी आज भले नहीं हों, परंतु उनकी विरासत को अब उनके दो पुत्र अशोक कुमार दास और राजकुमार लाल आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। 15 साल से कर रहे कला का प्रचार-प्रसार राजकुमार पटना में रहकर पिछले 15 वर्षों से इस कला के बहुआयामी पक्ष का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस क्रम में वे लगातार विदेशों का भी दौरा करते हैं। राजकुमार कहते हैं, ‘इस कला को अब विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की जरूरत है। इस कला के प्रति अभिरुचि जगाने की जरूरत है।’ मॉरीशस सरकार के आमंत्रण पर वहां स्थित रवींद्रनाथ टैगोर इंस्टीट्यूट के शिक्षकों को मधुबनी कला की बारीकियों से अवगत करा चुके राजकुमार कहते हैं कि मधुबनी पेंटिंग की चर्चा अब विदेशों में खूब हो रही है। उन्होंने बताया कि मॉरीशस के धरहरों को उन्होंने चित्रों में उतारा है। राजुकमार की पत्नी विभा देवी भी लड़कियों को मधुबनी पेंटिंग का प्रशिक्षण देती हैं। वह कहती हैं, ‘विवाह के पूर्व मैं थोड़ी बहुत कला जानती थी, लेकिन मधुबनी पेंटिंग को बेहतरीन तरीके से बनाने की कला ससुराल आकर ही सिखी थी।’


22 गुड न्यूज

22-28 मई 2017

संक्षेप में

सेवा के लिए तीन बहनों ने नहीं की शादी

उपलब्धि सैटेलाइट

भारतीय छात्र ने बनाया दुनिया का सबसे छोटा सैटेलाइट

संक् क्षेपषेप में

महिलाओं के सम्मान का प्रतीक है शौचालय

तमिलनाडु के बारहवीं के छात्र द्वारा बनाए गए मात्र 64 ग्राम वजनी सैटेलाइट को नासा जून में करेगा लांच

पने काम के प्रति समर्पण के भाव के कई किस्से आपने सुने-देखे होंगे, लेकिन लखनऊ की तीन बहनों ने बड़ी मिसाल कायम की है। नर्सिंग एक ऐसा प्रोफेशन है जो सेवा भाव मांगता है। इसी सेवा भाव का जीताजागता उदाहरण हैं ये तीन बहनें, जिन्होंने अपने प्रोफेशन की खातिर शादी न करने का फैसला किया और उस पर कायम रहीं। लखनऊ में एक ऐसा परिवार है, जहां तीन बेटियों ने शादी ना करके मरीजों की सेवा करने का फैसला लिया। ये तीन बहनें स्निग्धा, सुचित्रा और कविता दास हैं। स्निग्धा और सुचित्रा दोनों केजीएमयू में कई साल से मरीजों के लिए अपना समर्पण दिखा रही हैं। वहीं, कविता राजधानी के ऐशबाग स्थित बीएमसी में कार्यरत हैं। सिस्टर स्निग्धा ने बताया कि तीनों बहनों ने लोगों की सेवा करने की ठानी है। यही कारण है कि उन्होंने नर्सिंग का प्रोफेशन चुना। (भाषा)

एसी का सस्ता विकल्प

भा

रतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड्गपुर के दो छात्रों के नाम एक और उपलब्धि दर्ज हो गई है। इन छात्रों ने एक वाटर टैंक का अविष्कार किया है जो भविष्य में एसी का विकल्प बन सकता है। इस वाटर टैंक को दीवारों के अंदर फिट किया जाता है, जिस वजह से कमरा ठंडा रहता है। यह टैंक कमरे को ठंडा करने की लागत में 50 फीसदी तक की कटौती कर सकता है। छात्रों के इस अविष्कार को ‘शेल आइडियाज 360 ऑडियंस च्वाइस अवॉर्ड्स’ में शीर्ष पांच में शामिल किया गया। आईआईटी खड्गपुर के भूभौतिकी विभाग की तकनीक टीम में शहश्रंसु मौर्या और सोमरूप चक्रवर्ती ने 'पैसिव सोलर वाटर वॉल' नाम से एक कूलिंग प्रणाली ईजाद की है। मौर्या ने बताया, 'यह वाटर टैंक पारंपरिक टैंकों की तुलना में अलग है, क्योंकि इसका सतही क्षेत्र काफी अधिक है, ताकि टैंक तक ज्यादा से ज्यादा हवा पहुंच सके। यह भविष्य में एसी का विकल्प बना सकता है।' मौर्या ने कहा कि घर की कुल बिजली खपत में लगभग 35 फीसदी भागीदारी एसी की है और यह प्रतिवर्ष 1.5 टन कार्बन का उत्सर्जन करती है। (आईएएनएस)

मरीकी स्पेस एजेंसी नासा जून महीने में एक भारतीय छात्र द्वारा बनाए गए दुनिया के सबसे छोटे सैटेलाइट को लांच करने वाला है। तमिलनाडु के 18 साल के छात्र रिफत शारूक ने मात्र 64 ग्राम वजनी सैटेलाइट तैयार किया है। इसे दुनिया का सबसे छोटा और सबसे कम वजन सैटेलाइट माना जा रहा है। सैटेलाइट का नाम देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखा गया है। इस सैटेलाइट का नाम 'कलामसैट' है। । तमिलनाडु के पल्लापट्टी कस्बे के रिफत शारूक बारहवीं कक्षा के छात्र हैं। नासा ‘कलामसैट’ को 21 जून को लांच करेगा। नासा के 240 मिनट के मिशन में ‘कलामसैट’ को 12 मिनट के बाद ऑर्बिट में छोड़ दिया जाएगा। ‘कलामसैट’ में कई तरह के सेंसर और सोलर पैनल भी लगाए गए हैं। बता दें कि नासा पहली बार

किसी भारतीय छात्र के प्रयोग को अपने मिशन में शामिल कर रहा है। रिफत ने बताया, ‘कलामसैट को कॉर्बन फाइबर पॉलिमर से बनाया है, जो किसी स्मार्टफोन से भी हल्का है। नासा के कॉन्टेस्ट 'क्यूब्स इन स्पेस' और 'आई डूडल लर्निंग' के तहत इसे बनाया है। सैटेलाइट एक टेक्नोलॉजी डेमोन्सटेटर की तरह काम करेगा।' 'सैटेलाइट को बनाने के लिए सबसे कठिन काम हल्के मटेरियल को खोजना था। इसके लिए काफी रिसर्च करनी पड़ी। कमालसैट नासा के मिशन में 3D प्रिंटेड कॉर्बन फाइबर की परफार्मेंस को डेमोन्सट्रेट करेगा। मैं बहुत खुश हूं। नासा साइंटिस्ट और इंजीनियर्स के टेलेंट को जज करने के लिए यह कॉन्टेस्ट कराती है। सैटेलाइट बनाने के लिए 'स्पेस किड्ज इंडिया' ऑर्गेनाइजेशन ने सपोर्ट किया। (भाषा)

सजगता मुंबई

दूषित बर्फ से बचाने का अभियान

गले को तर करने के लिए बर्फ का इस्तेमाल लोगों को बीमार बना रही है, इसीलिए प्रशासन ने दूषित बर्फ के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है

मुबईकिनारे ं प्रशासनफेरसड़क ीवालों

और रेस्तराओं में घूम-घूम कर बर्फ बरामद करने में लगी हुई है। दरअसल इन दिनों यहां गेस्ट्रो रोग का प्रकोप बढ़ता दिखाई दे रहा है। अन्न और औषधि प्रशासन (एफडीए) ने सर्वेक्षण और जांच के बाद पाया है कि सड़कों पर कोल्ड ड्रिंक्स बेचने वालों के पास जो बर्फ होती है उसमें ई-कोली बैक्ट्रीया मौजूद है, जो स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसी जांच के बाद महानगरपालिका ने पिछले कुछ दिनों से कार्रवाई प्रारंभ की है। अब तक लगभग सवा लाख किलो बर्फ को जब्त कर उसे नष्ट किया गया है। इसी तरह का अभियान कोंकण-ठाणे में भी चल रहा है। गेस्ट्रो मरीजों की हालत और ग्राफ को देखने के बाद मुंबई प्रशासन को यह कठोर फैसला लेना पड़ा है। हालांकि इस बार मुंबई तथा आस-पास के क्षेत्रों में भीषण गर्मी पड़ रही है। लोग बेहाल हैं। राह चलते

हुए वे गर्मी और प्यास से निजात पाने के लिए फेरीवालों का सहारा लेते हैं। कोल्ड ड्रिंक हो या ठंडा पानी या गन्ने का रस, सबमें उसी दूषित बर्फ का इस्तेमाल होता है। सबसे ज्यादा दूषित बर्फ गोवंडी और देवनार के इलाकों से बरामद की गई है। उसके अलावा चारकोप, कांदीवली, संता नगर, पोइसर, आकुर्ली, भायखला, चिंचपोकली, नागपाड़ा, आग्रीपाड़ा, आदि वार्डों में बहुतायत में पाया गया। पालिका की इस कार्रवाई का फेरीवालों ने विरोध भी किया है। उनका कहना है कि प्रशासन को बर्फ की फैक्ट्री में जाकर जांच करनी चाहिए या उत्पादन पर रोक लगानी चाहिए, लेकिन वे आम गरीब फेरीवालों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन प्रशासन का कहना है कि जनता की सेहत के साथ होने वाले खिलवाड़ से बचाने की जिम्मेदारी भी उसकी ही है। फैक्ट्री और सड़क, दोनों जगहों पर कार्रवाई की जा रही है। (मुंबई ब्यूरो)

बि

हार के निर्मली में ‘स्वच्छ भारत मिशन’ व ‘लोहिया स्वच्छता अभियान’ के अंतर्गत प्रखंड मुख्यालय स्थित नगर भवन में पंचायतीराज प्रतिनिधियों, पदाधिकारियों व कर्मियों की एकदिवसीय उन्मुखीकरण कार्यशाला डीडीसी अखिलेश कुमार झा की अध्यक्षता में हुई। कार्यक्रम में मुखिया, वार्ड सदस्य, सीआरसीसी, बीआरसी, कॉर्डिनेटर, विकास मित्र, टोला सेवक, पंचायत रोजगार सेवक, कृषि सलाहकार, इंदिरा आवास सहायक आदि उपस्थित थे। कार्यशाला को संबोधित करते हुए डीडीसी ने कहा कि ‘ स्वच्छ भारत मिशन’ व ‘लोहिया स्वच्छता अभियान’ के तहत जिले में सामूहिक व्यवहार परिवर्तन के साथ अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य खुले में शौच की प्रथा समाप्त कर लोगों को स्वस्थ व उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना और साथ ही महिलाओं को सुरक्षा व सम्मान भी प्रदान करना है। गांवों के खुले में शौच मुक्त होने के बाद सरकार द्वारा कुल 12 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान किया गया है। डीडीसी ने कहा कि अभियान के प्रथम चरण में निर्मली अनुमंडल के सभी ग्राम पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए विभिन्न स्तर पर कार्यक्रम संचालन किया जा रहा है। विभागों व संस्थाओं का समन्वय कर अभियान को मूर्त रूप प्रदान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि निर्मली अनुमंडल के अंतर्गत निर्मली प्रखंड का ओडीएफ के लिए लक्ष्य 14 हजार 494 निर्धारित है। जहां 10 हजार 362 परिवार खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। जबकि मरौना प्रखंड के कुल लक्ष्य 23 हजार 777 में से 7659 घरों में शौचालय निर्माण कार्य कराया जाना शेष है। अनुमंडल पदाधिकारी अरुण कुमार सिंह ने बताया कि निर्मली प्रखंड के हरियाही व मरौना प्रखंड के बेलही पंचायत को खुले में शौचमुक्त कराया जा चुका है। निर्धारित समय से पूर्व अनुमंडल के दोनों प्रखंड खुले में शौच मुक्त घोषित हो जाएंगे। सरकार द्वारा लोगों के हितों को ध्यान में रखकर यह अभियान चलाया गया है, जिससे गांव के हर घर में शौचालय हो और सभी उसका उपयोग कर बीमारियों से बचें। लोग भी अब स्वच्छता के प्रति जागरूक हो चुके हैं और इसमें जनप्रतिनिधियों, उत्प्रेरकों व कर्मियों सहित आम जनता की सराहनीय भूमिका रही है।


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स्वच्छता मुंबई

दिव्यांग छात्रों के लिए फ्री ऑनलाइन ट्यूशन

मुंबई में गंदगी फैलाने वालों से क्लीन-अप मार्शल सिर्फ जुर्माना ही नहीं वसूल रहे हैं, बल्कि उनके साथ गांधीगिरी भी कर रहे हैं

कोशिश में क्लीनअप मार्शलों की भूमिका बढ़ती जा रही है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में हिस्सेदारी बढ़ाते हुए महानगरपालिका ने काफी पहले इन मार्शलों को नियुक्त किया था। उनका काम है साफ-सफाई की निगरानी करें और जो लोग गंदगी फैलाने में लगे रहते हैं, उन्हें दंडित करें। पिछले 10 महीनों की अपनी सक्रियता से इन मार्शलों ने 5 लाख लोगों से लगभग आठ करोड़ रुपए वसूल किए हैं। इनमें ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जो कहीं भी थूकने से परहेज नहीं करते हैं, जहां-तहां लघुशंका के लिए खड़े हो जाते हैं। वे लोग भी हैं जो अपने कुत्तों को सड़कों पर टहलाने लाते हैं और पेशाब-टट्टी करवाते हैं। पालिका लगातार यह अपील कर रही है कि शहर के निवासी अपनी मुंबई को स्वच्छ रखने

में सहयोग करें। इस अपील और जागरुकता फैलाने के बावजूद गंदगी करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं हो रही है। हालांकि पालिका का प्रयास है कि लोग समझ जाएं। कचड़े को कूड़ेदान में ही डालें और जहां-तहां न थूकें। इसके बावजूद अगर कोई नहीं मानता है तो उनके लिए दंड का प्रावधान किया गया है। क्लीन-अप मार्शलों ने यथासंभव कोशिश की कि लोग स्व-विवेक से नियमों का पालन करें। यह भी एक रिकॉर्ड ही है कि इन मार्शलों ने गंभीर परिस्थिति में जहां पांच लाख लोगों से वसूली की, वहीं वे लगभग 13 लाख लोगों के साथ गांधीगिरी भी की। इन लोगों को मार्शलों ने न केवल प्यार और आत्मीयता के साथ समझाया, बल्कि हाथ जोड़कर अपील की कि वे कूड़ेदान का ही उपयोग करें। (मुंबई ब्यूरो)

स्वच्छता मुंबई

सिटीजन ग्रुप की यह कामयाबी

सिटीजन ग्रुप की पहल से साफ हो रही है गंदी पोइसर नदी

श्चिम मुंबई में बहती पोइसर नदी को स्वच्छ करने की मुहिम ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। नेशनल पार्क की पहाड़ी से निकलने वाली यह नदी पूरी तरह नाले का रूप ले चुकी है। यह एक तरह से डंपिंग ग्राउंड बनकर कचरे से भर गई है। हर साल मानसून आने लोग खुद नदी में उतरकर, खास तौर पर प्लास्टिक की के पहले महानगरपालिका थैलियां निकाल रहे हैं की कोशिशें तेज हो जाती खुद नदी में उतरकर, खास तौर पर प्लास्टिक की हैं, ताकि बरसात का पानी घरों, गलियों, सड़कों पर न बहने लगे। लेकिन इस बार थैलियां निकाल रहे हैं। यह देखा गया कि प्लास्टिक स्थानीय जागरूक लोगों ने समय से पहले निर्णय के कारण ही गंदे पानी का बहाव जहां-तहां रुका लेकर खुद सफाई का जिम्मा ले लिया। उन्होंने पड़ा है। पानी उफनकर ऊपर आ रहा है। यह नदी जागरुकता फैलाने के लिए ‘रिवर मार्च’ भी निकाला। क्रान्ति नगर और कां​िदवली के रास्ते मार्वे क्रीक इसमें स्कूली बच्चे भी शामिल हुए। इसका काफी में विलीन होती है। इस कारण समुद्र का पानी भी साफ नहीं रह पाता है। अच्छा असर हुआ। सिटीजन ग्रुप अपनी इस पहल से खुश तो है, लेकिन पिछले चार-पांच रविवार को हुई सफाई का उसका कहना है कि अभी बहुत काम बाकी है। मानसून परिणाम बताता है कि उस नदी से लगभग डेढ़ आने के पहले ही वे इसे क्लीन कर देना चाहते हैं। लाख किलो कचरे को बाहर निकाला गया। इसमें ग्रु प लोगों से लगातार अपील कर रहा है कि कचरे महानगरपालिका ने भी मदद की। उनकी मशीनें तैनात रहीं। जहां मशीन नहीं पहुंच सकती है, वहां लोग को नदी में नहीं डालें। (मुंबई ब्यूरो)

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शिक्षा मिसाल

मुंबई में क्लीन-अप मार्शल

मुबईरखने ं को स्वच्छकी

गुड न्यूज

दिव्यांग छात्रों की मदद के लिए शिखा उपाध्याय ने फ्री ऑनलाइन ट्यूशन दे रही हैं

च्चों के लिए ट्यूशन ढूंढना पैरंट्स के लिए किसी आफत से कम नहीं है। वहीं, लड़कियों और दिव्यांग बच्चों को लेकर उनकी टेंशन और बढ़ जाती है। इस टेंशन को दूर करने के लिए इंदिरापुरम की रहने वाली शिखा उपाध्याय ने हाल ही में एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसके जरिए ऐसे स्टूडेंट्स घर बैठे अपने टाइमिंग के मुताबिक ऑनलाइन लाइव ट्यूशन ले सकेंगे। इससे अलगअलग स्टेट के करीब 22 टीचर जुड़े हैं जो बच्चे की रुचि को परखने के बाद उन्हें पढ़ाएंगे, ताकि बच्चे को समझने में दिक्कत न हो। इस ऑनलाइन ट्यूशन में लड़कियों और दिव्यांगों को फ्री क्लास दी जाएगी, जिसमें वे महत्वपूर्ण चैप्टर्स कवर कर सकते हैं। इस प्रोजेक्ट को इंदिरापुरम की रहने वाली शिखा उपाध्याय, रामप्रस्थ से संजय शर्मा और

डॉ. अजय रावत ने मिलकर शुरू किया है। शिखा उपाध्याय ने बताया कि इस प्रोजेक्ट को शुरू करने का मकसद ही लड़कियों और दिव्यांगों की मदद करना है। उन्होंने बताया कि लड़कियों और दिव्यांग छात्रों के लिए ट्यूशन ढूंढते समय पैरंट्स को काफी परेशानी होती है और हर किसी पर भरोसा करना भी उनके लिए मुश्किल हो जाता है। इसी कारण कई लड़कियां ट्यूशन ही नहीं पढ़तीं और अच्छे नंबर भी स्कोर नहीं कर पाती हैं। ऐसे में टैलेंट होने के बावजूद भी उन्हें रूटीन कोर्स में ही दाखिला लेना पड़ता है। अभी तक 77 लड़कियों और 60 दिव्यांगों का फ्री क्लास के लिए रजिस्ट्रेशन किया गया है। प्रोजेक्ट के तहत 9वीं से 12वीं के साथ इंजिनियरिंग के विषय शामिल किए गए हैं। (भाषा)

स्वच्छता झारखंड

शौचालय निर्माण पूरा करने का निर्देश

झा

गढ़वा के अनुमंडल पदाधिकारी ने शौचालय निर्माण कार्य सात दिनों में पूरा करने के निर्देश दिए

रखंड के गढ़वा अ नु मं ड ल पदाधिकारी प्रदीप कुमार ने नगर परिषद के वार्ड नंबर 15 का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने नगर परिषद द्वारा बनाए जा रहे शौचालय के संबंध में लाभुकों से जानकारी ली। एसडीओ ने लाभुकों को निर्देश दिया कि सभी लोग शौचालय बनाकर शौचालय का उपयोग करें। शहर को स्वच्छ व सुंदर बनाने में सभी की भागीदारी जरूरी है। एसडीओ ने कहा कि जिन लाभुक के खाते में प्रथम किश्त की राशि चली गई है वे शौचालय

निर्माण का कार्य शुरू करें। जो लोग शौचालय का निर्माण कार्य शुरू नहीं करेंगे उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सभी लोग एक सप्ताह के अंदर शौचालय का निर्माण कार्य पूर्ण कर नगर परिषद को सूचना दें। जो लोग शौचालय का उपयोग नहीं करेंगे उनको विभिन्न तरह की सरकारी योजनाओं से वंचित रखा जाएगा। वैसे लाभुक के जिनके खाता में पैसा चला गया है और उन्होंने शौचालय नहीं बनवाया है। वैसे लाभुकों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की जाएगी। (भाषा)


24 स्वच्छता

22-28 मई 2017

गंगा

सफाई

साहस एटा

स्वच्छता का ‘राजकुमार’

स्वच्छता के जज्बे ने बनाया ब्रांड एंबेसडर

मास्टर साहब के नाम से मशहूर राजकुमार बिना बिजली के गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए 15 सालों से भगीरथ प्रयास कर रहे हैं

पंद्रह परिजनों की मौत का गम और ससुराल में शौचालय का न होना, लेकिन नई नवेली दुल्हन ने कुछ ऐसा किया कि उसे स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर बना दिया गया

गं

गा को साफ करने की जिम्मेदारी तो सबकी है। उस दिन का इंतजार तो सबको है, जब गंगा निर्मल बनेगी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में एक ऐसा दिव्यांग है, जिसे न तो किसी वक्त का इंतजार है, न किसी सहयोगी का और न ही किसी सरकारी योजना का। बिना किसी का इंतजार और परवाह किए साठ साल का यह शख्स लगातार गंगा की सफाई में पिछले पंद्रह सालों से अथक जुटा हुआ है। इस काम में न तो उम्र बाधक है और न उसकी हैसियत। बाबा विश्वनाथ की नगरी में गंगा किनारे रहने वाले 60 साल के दिव्यांग राजकुमार पंद्रह सालों से गंगा के कचरे से सजावटी सामान को बनाकर लोगों में जागरुकता फैला रहे हैं। यही नहीं इस जागरुकता से राजकुमार अपनी रोजी-रोटी चलाते हुए सबको गंगा सफाई की उम्मीद दे रहे हैं। वाराणसी के अस्सी में भदैनी स्थित एक छोटे से कमरे में राजकुमार अपने परिवार के साथ रहते हैं। राजकुमार रोज सुबह घाटों पर फैले कोल्ड ड्रिंक की बोतलें, शादियों के फेंके कार्ड, आइसक्रीम की स्टिक, मिट्टी के खराब बर्तन, कलश, आतिशबाजी के डिब्बे, पॉलीथीन जैसे कचरों को उठाकर घर लाते हैं और बेहतरीन गुलदस्ते, ग्रीटिंग कार्ड, सीनरी, बर्थ-डे गिफ्ट, सजावटी कैलेंडर और वॉल हैंगिंग बनाते हैं। राजकुमार कचरे से बने सामान को बेचकर अपनी जीविका चलाने के साथ बच्चों को मुफ्त शिक्षा भी देते हैं। मास्टर साहब के नाम

स्व

च्छ भारत अभियान को सफल बनाने की कोशिशों में लगे महाराष्ट्र में एक नया प्रयोग किया जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि इस प्रयोग से न केवल गंदगी फैलाने और खुले में शौच जाने वाले शर्मशार होंगे, बल्कि वे इस अभियान की गंभीरता को भी समझेंगे। सरकार ने गांधीगिरी के रास्ते लोगों को समझाने का जिम्मा उठाने की दिशा में ‘गुड मॉर्निंग’ दस्ता गठित करने का फैसला किया है। यह दस्ता अभी शहरों को ही निशाने पर लेगा। सरकार खास तौर पर खुले में शौच जाने वालों से मुक्ति के लिए यह कदम उठा रही है।

से मशहूर राजकुमार कमरे में बिना बिजली के गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए 15 सालों से भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। राजकुमार ने बताया,‘कि मैं रोज गंगा घाटों की सीढ़ियों से कचरे को साफ करता हूं। अनपढ़ हूं, सोचा था कभी कि मास्टर बनूंगा। गरीबी के चलते पढ़ाई नहीं हो सकी, बचपन गंगा की गोद में बीता। समय के साथ कचरे से निकले हुनर ने कब मास्टर बना दिया पता ही नहीं चला। चाहे धूप हो या बरसात, हर दिन गंगा के किनारे जाकर फेंके कचरों में उपयोगी सामान लेकर घर आता हूं और उससे तरह-तरह के सामान बनाकर बेचता हूं।’ वर्षों से राजकुमार के इस मुहिम को घाट पर आने वाला हर व्यक्ति जनता है। यहां आने वाले पर्यटक भी राजकुमार के इस तरीके की तारीफ किए बगैर नहीं रहते। राजकुमार के इस भागीरथ प्रयास की यहां के लोग भी सराहना करते हैं। अस्सी घाट पर रहने वाले सुधीर मिश्रा कहते हैं, ‘ये वही घाट हैं, जहां प्रधानमंत्री से लेकर बीजेपी के सभी नेताओं ने स्वछता अभियान चलाया था’, लेकिन निस्वार्थ भाव से गंगा से कचरा निकालने वाले इस राजकुमार पर ध्यान किसी का नहीं गया। लेकिन राजकुमार के इस काम से घाट पर आने वाले लोगों में गंगा में हो रही इस गंदगी को लेकर जरूर चिंता होती है और राजकुमार ऐसे में एक प्रेरक के रूप में नजर आते हैं।

क छोटा सा हादसा भी इंसान को तोड़कर रख देता है, लेकिन आगरा के पावसर नगरिया गांव की एक बेटी का साहस सबको सीख देने वाला है। मुश्किल समय में खुद को संभालते हुए कल्पना ने जो कर दिखाया है वो हर किसी के बस की बात नहीं है। खुद की ही शादी के दौरान हुए सड़क हादसे में भाई समेत 15 परिजनों की मौत हर किसी को हिला कर रख देती है। लेकिन कल्पना ने साहस दिखाते हुए ससुराल पंहुचते ही शौचालय इस बात से उदास हो गई, लेकिन उसने बनवाकर इतिहास रच दिया और बन गई हिम्मत नहीं हारी। शादी के अगले दिन ब्रांड एंबेसडर। स्वच्छता के प्रति इसी जज्बे डीएम अमित किशोर ने हाल चाल पूछने की वजह से कल्पना को प्रधानमंत्री से के लिए उसे फोन किया तो उसने ससुराल में शौचालय ना होने की बात बताई। उसके मिलने का अवसर मिलने वाला है। बाद डीएम अमित किशोर 5 मई को शगुन लेकर कल्पना के परिवार वाले स्वच्छता के प्रति इसी नगला लाल सिंह पहुंचे एटा के नगला लाल सिंह जज्बे की वजह से और शौचालय बनवाने में उसकी मदद की। गांव गए थे। वहां से कल्पना को प्रधानमं त् री डीएम कल्पना की वापस लौटते वक्त भीषण से मिलने का अवसर ससु राल में शौचालय सड़क हादसे में भाई समेत निर्माण की इस शुरुआत 15 परिजनों की मौत हो मिलने वाला है को देखकर बहुत खुश गई। 9 मई को गमगीन हुए। कल्पना के इस साहस को देखकर माहौल में उसकी शादी हुई और कल्पना अपने ससुराल नगला लाल सिंह आई। डीएम द्वारा उसे ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का इतनी बड़ी घटना के बाद खुद को सभांलते ब्रांड एंबेसडर भी घोषित कर दिया। इतना हुए जो उसने कर दिखाया वो तारीफ के ही नहीं उन्होंने गांव वालों के सामने यह भी काबिल है। वहां आकर उसने देखा कि वादा किया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उसके ससुराल में शौचालय नहीं है तो वो समय लेकर कल्पना को मिलवाएंगे।

स्वच्छता महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में ‘गुडमॉर्निंग दस्ता’ स्वच्छ महाराष्ट्र अभियान को सफल बनने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक अनूठी पहल की है

इसके लिए सभी स्थानीय स्वराज संस्थाओं और सामाजिक संगठनों से सहयोग ले रही है। इसमें उन्हीं संस्थाओं के प्रतिनिधियों, समाज के जागरूक लोगों और छात्रों की भागीदारी होगी। यह दस्ता पूरे प्रदेश में सक्रिय रहेगा जो सुबह सोकर उठते

ही गली-मोहल्ले, सार्वजनिक स्थानों और सड़क किनारों में घूमना शुरू कर देगा। गंदगी फैलाने वालों को मौके पर ‘गुड मॉर्निंग’ बोलेगा और उन्हें समझाएगा कि स्वच्छता क्यों जरूरी है। दरअसल, यह वैसे लोगों की मानसिकता बदलने और दबाव

डालने का प्रयास है जो जान-बूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं या वे अपनी जिद में असहयोग का रवैया अपनाते हैं। इस संबंध में नगर विकास विभाग ने एक परिपत्र जारी किया है और अपील की है कि वे ‘स्वच्छ महाराष्ट्र’ का सपना साकार करने में सहयोग करें। यह दस्ता फिलहाल आगामी 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) तक काम करेगा। उल्लेखनीय है कि ‘स्वच्छ महाराष्ट्र अभियान’ के अंतर्गत शहरी क्षेत्रों में 8.32 लाख परिवारों को व्यक्तिगत, सामूहिक और सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध करा दिया गया है। जो बचे हैं उसके लिए काम चल रहा है। (मुंबई ब्यूरो)


22-28 मई 2017

स्वच्छता कानपुर

बकरियां बेचकर बहू ने वृद्धा सास के लिए बनवाया शौचालय उत्तर प्रदेश की अस्सी साल की बहू ने एक सौ दो साल की सास के लिए शौचालय बनवाया

श्रवण शुक्ला / लखनऊ

इस अभियान के लिए देशभर में शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए सरकार नपुर के अनंतापुर गांव में सास-बहू भी मदद कर रही हैं, लेकिन कुछ लोग रिश्ते की अनोखी मिसाल देखने को स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर अपनी जरूरत मिली है। यहां एक 80 साल की बहू ने अपनी की चीजों को बेचकर भी शौचालय बनवा 102 साल की सास के लिए बकरियां बेच कर रहे हैं। बिना किसी सरकारी इमदाद और सहयोग टॉयलेट बनाया, ताकि उन्हें तकलीफ न हो। के पांच बकरियां बेचकर 110 साल की सास को शौचालय का तोहफा देने वाली 80 वर्षीय बहू इसके लिए उसे अपनी को जिला प्रशासन छह बकरियां बेचनी सम्मानित करेगा। पड़ीं। जिलाधिकारी सहित दरअसल, सास अन्य अफसर गांव को शौचालय जाने जाकर सास और में तकलीफ न हो, बहू को शौचालय इसीलिए बहू चंदना ने निर्माण की धनराशि परिवार की जीविका भी देंगे। बता दें कि के साधन को बेचकर मलासा विकासखंड टॉयलेट बनवाया। चं द ना ने बताया कि उसने सरकारी के अनन्तापुर निवासी चंदना ने बताया कि उसने सरकारी मदद मदद लिए बगैर टॉयलेट बनाने का 80 वर्षीय चंदाना देवी लिए बगैर टॉयलेट निर्णय लिया। जिसके लिए अपनी ने आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी 110 बनाने का निर्णय छह बकरियां बे च नी पड़ीं वर्षीय बेवा सास माया लिया। जिसके लिए देवी को शौचालय का अपनी छह बकरियां बेचनी पड़ीं। महिला के बेटे राम प्रकाश ने बताया कि उनकी दादी का तोहफा दिया था। इसके लिए चंदाना देवी को पांव टूट गया था, जिसकी वजह से वो चल फिर पांच बकरियां बेचनी पड़ी थी। जबकि वृद्ध सास नहीं सकती थीं। वहीं दादी की इस तकलीफों को को सुबह-शाम खुले में शौच न जाना पड़े चंदना देखकर उसकी मां ने टॉयलेट बनाने के फैसला देवी के इस प्रयास की हर किसी ने सराहना की किया, लेकिन पैसे नहीं होने की वजह से उसे थी। सीडीओ केके गुप्त ने बताया कि चंदना ने राजकीय अभियान में चार चांद लगाकर सराहनीय अपनी बकरियां बेचनी पड़ीं। केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के प्रयास किया है। इसपर जिलाधिकारी उक्त बहू तहत 2 अक्टूबर 2019 तक पूरे देश को खुले को शौचालय निर्माण के लिए मिलने वाली 12 में शौच से मुक्त कराने का फैसला किया है। हजार की धनराशि देकर सम्मानित करेंगे।

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स्वच्छता

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स्वच्छता उत्तर प्रदेश

यूपी में हर महीने बनेंगे 8.5 लाख शौचालय

उत्तर प्रदेश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए सरकार ने आगामी डेढ़ साल में डेढ़ करोड़ शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है

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च्छ भारत अभियान को उत्तर प्रदेश में अमलीजामा पहनाने के लिए डेढ़ करोड़ शौचालयों का निर्माण अगले करीब डेढ़ साल में करवाया जाएगा। जिसके लिए डेढ़ लाख राजमिस्त्री सरकार अस्थाई तौर पर रखेगी। निर्माण श्रमिकों और राजमिस्त्रयों का श्रम विभाग में पंजीकरण किया जाएगा। ताकि समय पर 2018 तक डेढ़ करोड़ शौचालयों का निर्माण करवाया जा सके। यानी की अब प्रत्येक माह उप्र में साढ़े आठ लाख शौचालयों का निर्माण किया जाएगा। जिसके बाद यूपी को खुले में शौचमुक्त व्यय में मदद की जा सके। पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव किया जाएगा। जिसको लेकर पंचायतीराज विभाग ने तैयारियों का आगाज कर दिया है। चंचल कुमार तिवारी ने कहा,‘2018 तक राज्य आने वाले दिनों में इन शौचालयों का निर्माण गांव के बचे हुए 74 जिलों को खुले में शौचमुक्त के दायरे में लाया जाना है। जिसको लेकर राज्य गांव में शुरू किया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अभियान के सरकार पंजीकृत राजमिस्त्रियों को काम देगी। ये अन्तर्गत प्रदेश के 30 जनपदों को 31 दिसम्बर, राजमिस्त्री और श्रमिक जिनकी संख्या लगभग 2017 तक खुले में शौच मुक्त करने का लक्ष्य डेढ़ लाख होगी, उनका पंजीकरण के बाद निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही प्रदेश प्रशिक्षण होगा। जिसके बाद डेढ़ साल में डेढ के बचे हुए 44 जनपदों को भी दो अक्तूबर, करोड़ शौचालय बनाए जाएंगे।’ इसको देखते हुए आवश्यक है कि पात्र निर्माण 2018 तक खुले में शौच मुक्त किया जाना तय किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत लगभग श्रमिकों का शत प्रतिशत पंजीयन सुनिश्चित किया जाए। श्रमिकों के शत प्रतिशत 1.55 करोड़ शौचालयों का निर्माण कराया जाना है। जिसके 2018 तक राज्य के पंजीयन की कार्यवाही सुनिश्चित लिए लगभग 1.50 लाख बचे हुए 74 जिलों को करने के लिए नोडल अधिकारी नामित किए गए हैं। स्वच्छ राजमिस्त्रियों की टीम तैयार की खु ले में शौचमु क्त के भारत मिशन (ग्रामीण) के जा रही है। इस काम के लिए उन्हें दायरे में लाया जाना है अन्तर्गत निर्माणाधीन शौचालयों में कार्यरत निर्माण श्रमिकों के आगामी दो माह में तकनीकी पंजीयन के लिए मुख्य विकास रूप से प्रशिक्षित भी किया जाएगा। वर्तमान में अधिकारी को नोडल अधिकारी तथा विकास बड़ी संख्या में राजमिस्त्री स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अभियान के अन्तर्गत शौचालयों का खंडों के लिए खंड विकास अधिकारी को निर्माण कर रहे हैं। जिनमें अब नए लोंगों को भी सहायक नोडल अधिकारी नामित किया गया है। जोड़ा जाएगा। यह जानकारी अपर मुख्य सचिव श्रमिकों के पंजीयन की प्रक्रिया निर्धारित की गई पंचायती राज चंचल कुमार तिवारी ने दी। उन्होंने है। जनपदों में तैनात श्रम विभाग के अधिकारियों बताया कि इस संबंध में आदेश भी जारी कर को नोडल/सहायक नोडल अधिकारियों से दिए गए हैं। उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार समन्वय स्थापित करते हुए कार्यवाही के निर्देश कल्याण बोर्ड द्वारा पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के भी दिए गए हैं। सभी जनपदों के जिलाधिकारी व लिए विभिन्न लाभकारी योजनाएं संचालित की मुख्य विकास अधिकारी अपने जनपद में स्वच्छ जा रही हैं। जिससे ऐसे श्रमिकों तथा उनके भारत मिशन (ग्रामीण) अभियान के अन्तर्गत आश्रितों को दुर्घटना, मृत्यु, गंभीर बीमारी आदि स्वच्छ शौचालयों के निर्माण हेतु कार्यरत पात्र की स्थिति में लाभान्वित कराया जा सके। उन्हें निर्माण श्रमिकों/राजमिस्त्रियों का शतप्रतिशत, अवासीय सुविधा उपलब्ध कराया जा सके तथा पंजीयन कराए ताकि आवश्यकतानुसार उन्हें ऐसे श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा पर होने वाले लाभ प्राप्त हो सके। (भाषा)


26 स्वच्छता

22-28 मई 2017

विशाखापट्टनम सबसे स्वच्छ स्टेशन रेलवे स्वच्छता सर्वे- 2017

रेलवे स्टेशनों की स्वच्छता को लेकर कुल 407 रेलवे स्टेशनों का स्वच्छता सर्वे हाल में जारी हुआ। पिछली बार की तुलना में जहां इस बार कईयों ने अपनी रैंकिंग सुधारी तो कई इस होड़ में लुढ़के

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एसएसबी ब्यूरो

च्छता को विकास का प्रतिस्पर्धा मानक बनाकर सरकार इसके लिए प्रयासों में तेजी लाना चाहती है। सरकार की इसी दृष्टि को आगे रखते हुए देश के सबसे स्वच्छ शहरों की सूची सामने आने के बाद देश के 75 व्यस्त रेलवे स्श टे नों की सफाई का सर्वे भी सामने आया है। इस सर्वे में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम को सबसे साफसुथरा स्श टे न और बिहार के दरभंगा रेलवे स्श टे न को देश के सबसे व्यस्त स्टेशनों में सबसे गंदा बताया गया है। इस सर्वे में आंध्र का ही सिकंदराबाद रेलवे स्श टे न सफाई के मामले में दूसरे स्थान पर है, जबकि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को 39वां स्थान मिला है। बात देश की राजधानी की ही करें तो निजामुद्दीन रेलवे स्श टे न को 23वां और पुरानी दिल्ली रेलवे स्श टे न को 24वां स्थान मिला। रेल मंत्री सुरश े प्रभु ने रेलवे सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी करते हुए उम्मीद जताई कि कई जगहों पर स्वच्छता को लेकर हुए प्रयास के काफी अच्छे नतीजे आए हैं, तो वहीं कई जगहों पर अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। इस सर्वेक्षण के अनुसार सबसे व्यस्त रेलवे स्श टे नों में जम्मू रेलवे स्टेशन को तीसरा स्थान मिला। इस सर्वे के नतीजों को सरजमीनी सच्चाई के इसीलिए भी करीब माना जा रहा है, क्योंकि यह सर्वे भारतीय

गुणवत्ता परिषद द्वारा कराया गया है। स्वच्छता के मामले में रेलवे स्टेशनों को आंकने के लिए प्लेटफार्म पर स्वच्छ शौचालय, साफ ट्रैक और स्श टे नों पर कूडद़े ान जैसे कुछ मापदंड तय किए गए थे। 'स्वच्छ रेल' अभियान के तहत रेल परिसरों की सफाई पर नजर रखने और इससे संबधि ं त भविष्य की कार्ययोजना तय करने के लिए रेलवे द्वारा स्वच्छता पर कराया गया यह तीसरा सर्वेक्षण है। रेलमंत्री सुरश े प्रभु ने सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी करने के मौके पर कहा, ‘हम सभी स्टेशनों को साफ रखना चाहते हैं। कई स्टेशनों ने पिछली बार से अपनी स्वच्छता रैंकिगं में सुधार किया है।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी का रेलवे स्श टे न 14वें नंबर पर रहा। यह सर्वेक्षण कुल 407 स्श टे नों के लिए किया गया था, जिनमें से 74 ए-1 श्ण रे ी के हैं या सबसे व्यस्त स्टेशन हैं तथा 332 ए श्रेणी के हैं। ए श्ण रे ी में ब्यास रेलवे स्टेशन सबसे स्वच्छ रहा, जबकि खम्मम दूसरे नंबर पर । इस श्रेणी में अहमदनगर स्श टे न तीसरे पायदान पर रहा। ए-1 श्ण रे ी में दरभंगा रेलवे स्टेशन 75वें नंबर पर रहा, जबकि जोगबानी ए श्रेणी में सबसे गंदा स्टेशन

रहा। रेलवे के करीब 8,000 स्टेशन सालाना यात्री राजस्व के आधार पर सात श्रेणियों - ए1, ए, बी, सी, डी, ई और एफ में विभाजित हैं। जिन स्श टे नों का यात्री राजस्व एक साल में 50 करोड़ रुपए से ज्यादा हैं, वे ए-1 श्रेणी में आते हैं। ए श्रेणी वाले स्श टे नों का सालाना यात्री राजस्व छह करोड़ से 50 करोड़ रुपए के बीच है। सभी उपनगरीय स्टेशन सी श्रेणी के हैं, जबकि जिन स्टेशनों से ट्रेनें चलती नहीं, बल्कि सिर्फ रूकती हैं, वे सभी एफ श्रेणी के हैं। आगे रेलवे अब स्वच्छता को लेकर 200 ट्रेनों का सर्वेक्षण भी कराएगा, जिसके नतीजे को लेकर लोगों में अभी से काफी दिलचस्पी है। गौरतलब है कि पिछले लंबे समय से रेलवे मंत्रालय के कामकाज का मूल्यांकन महज खर्च और आमदनी के आधार पर किया जाता था। पिछले तीन सालों में ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है, जब राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन जैसे सामाजिक अभियान को आगे बढ़ाने में रेलवे भी अपनी तरह भूमिका निभा कर राष्ट्र की सेवा कर रहा है। रेलवे की नई विश्वसनीय छवि और कामकाज की बदली प्राथमिकता का श्यरे बहुत हद तक रेलमंत्री सुरश े प्रभु को जाता है। इसी साल फरवरी माह में लोकसभा में राष्ट्रपति के संबोधन पर धन्यवाद ज्ञापन देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि एनडीए सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में रेलवे के क्षेत्र में अभूतपूर्व और सराहनीय कार्य किया है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर बताया था कि एनडीए सरकार जबसे सत्ता में आई है तब से रेलवे नेटवर्क में ब्रॉड गेज लाइनों के विस्तार के बारे में लगभग दोगुना विस्तार हो चुका है। साफ है कि सरकार अगर स्वच्छता मिशन के साथ रेलवे को प्रमुखता के साथ जोड़ रही है, तो वह इसके विकास की कीमत पर नहीं, बल्कि यह रेलवे के विकास और कामकाज को स्तरीयता प्रदान करने के प्रतिस्पर्धी लक्ष्य के तहत किया जा रहा है। दरअसल, भारतीय रेल अपनी डेढ़ सौ साल से ज्यादा लंबी यात्रा में आज इतनी आगे बढ़ गई है कि वह देश के शहरों, गांवों और कस्बों को सबसे सघनता और तीव्रता के साथ जोड़ने वाला सबसे लोकप्रिय और विश्वसनीय जरिया है और उसकी इस खासियत को समझे बिना हम कोई भी राष्ट्रीय अभियान सफलतापूर्वक नहीं चला सकते हैं।

‘हम सभी स्टेशनों को साफ रखना चाहते हैं। कई स्टेशनों ने पिछली बार से अपनी स्वच्छता रैंकिंग में सुधार किया है’ - रेलमंत्री सुरेश प्रभु

एक नजर

सर्वाधिक व्यस्त रहने वाले 75 रेलवे स्टेशन सर्वे में शामिल

सर्वे में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को 39वां स्थान मिला निजामुद्दीन 23वें व पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन 24वें स्थान पर

बात करें भारतीय रेलवे की सघन विकास यात्रा की तो जब 1950 में रेलवे भारतीय रेलवे का राष्ट्रीयकरण हुआ, उसके बाद से इसके विस्तार को काफी व्यवस्थित और ढांचागत तरीके से आगे बढ़ाया गया। 1952 में छह जोनों के साथ जोनल सिस्टम शुरू हुआ, जो आज 17 जोन तक पहुंच गया है। इसी के साथ रेलवे आज दुनिया का सबसे बड़ा महकमा बन चुका है। भारतीय रेलवे में 16 लाख से अधिक नियमित कर्मचारी और दो लाख से अधिक आकस्मिक कर्मचारी कार्यरत हैं। इसी तरह एक अनुमान के मुताबिक साल में छह अरब से भी अधिक मुसाफिर रेल से यात्रा करते हैं। कह सकते हैं कि देश में रेल- रेलवे स्श टे नों के साथ सामाजिक जिंदगी का साझा इतना गाढ़ा है कि इसे अलगाकर देखा ही नहीं जा सकता। मुबं ई जैसे महानगर में जहां जिंदगी कभी थमती ही नहीं है, वहां रेलवे को लाइफलाइन कहा जाता है। एक दिन क्या, कुछ घंटे के लिए भी अगर वहां चलने वाली लोकल ट्नरे ें रुक जाती हैं, तो पूरी मायानगरी हांफने लगती है। भारतीय रेल की एक बड़ी खासियत यह भी है कि जहां अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करने के लिए सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखकर वह काफी कम किराया लेती है, वहीं आपदा या विपत्तियों के समय देश की नि:स्वार्थ भाव से सेवा भी करती है । अच्छी बात यह है कि रेलवे की इस प्राथमिकता और उपयोगिता को अब तक की तमाम सरकारों ने सिर्फ समझा है, बल्कि उसमें अपने तरीके से व्यवस्थागत और योजनागत सुधार को प्राइम एजेंडे में शामिल रखा है। रेलवे के सामने आज तीन सबसे दो बड़ी चुनौतियां हैं- सुरक्षा और स्वच्छता। मौजूदा सरकार इन दोनों ही मुद्दों पर काफी गंभीरता से काम कर रही है। रेलवे स्वच्छता सर्वे के नतीजे विभिन्न रेलखंडों के स्श टे नों की दशा पर रोशनी डालती है। स्वाभाविक तौर पर जिस क्षेत्र के स्श टे न स्वच्छता पैमाने पर पिछड़े हैं, वे तेजी से आगे आने की कोशिश करेंग।े गौरतलब है कि स्वच्छता और सुरक्षा के सवाल अलग-अलग भले हों, पर एक-दूसरे से गहराई से भी जुड़े हैं। अस्वच्छ दशा में कई व्यवस्थागत समस्याएं भी खड़ी होती हैं। इसीलिए स्वच्छता की दरकार रेलवे की सुरक्षा की भी कहीं न कहीं कसौटी है। कोई चाहे तो इस आधार पर भी रेलवे स्वच्छता सर्वे-2017 को देख सकता है। वैसे जो एक बात यहां खासौतर पर समझने की है, वह यह कि रेल डिब्बों से लेकर रेलवे स्श टे नों तक पर दिखने वाला समाज-व्यवहार जब तक एक जरूरी अनुशासन की शक्ल नहीं लेगा, तब तक न तो हम रेलवे की सुरक्षा और संरक्षा के मुद्दे पर कारगर कामयाबी हासिल कर सकते हैं और न ही स्वच्छता और रेलवे का साझा पर्याय एक प्रेरक मॉडल की शक्ल ले पाएगा। लिहाजा, रेल महकमे के साथ लोगों को भी रेल परिसरों की सफाई को लेकर गंभीरता दिखानी होगी।


22-28 मई 2017

लोककथा

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वियतनाम की लोककथा

उम्र लंबी करने वाले आड़ू

क बार चीन के राजा ने अम्मन के राजा को बहुत बड़े-बड़े आड़ू भेजे जिनको उम्र बढ़ाने वाले आड़ू कहा जाता था। जब उपहार लाया गया तो दरबार लगा हुआ था। दरबारी उस असाधारण फल को देखने के लिए एक-दूसरे पर टूट पड़े। ट्रेग क्विन भी वहां मौजूद था, क्योंकि वह भी एक दरबारी था। उसने आगे बढ़कर एक आड़ू उठा लिया, उसको मुंह के पास ले गया और उसका मजा लेते हुए दांत से एक टुकड़ा काट लिया। राजा गुस्से से कांपने लगा। ‘गिरफ्तार करो इस अभागे को।’ राजा ने आज्ञा दी। ‘सिर काट दिया जाए इसका।’ दरबार के सिपाहियों ने ट्रेग को गिरफ्तार कर लिया। उसकी आंखों से बाल्टी भर-भर आंसू गिरने लगे। राजा चिल्लाया, ‘तुम्हारी हिम्मत कि तुम अपने राजा के लिए भेजी गई चीज को चखो? इस अपराध की सजा मौत है। कायर!बदमाश! मरने से घबराता है!’

चीन की लोककथा

वियतनाम की लोककथा

गुरु सेर, चेला सवा सेर

उंगलियों का खेल

ती

न आदमियों को एक सरकारी इम्तहान में बैठना था। वे एक ज्योतिषी के पास गए। ज्योतिषी ने उनके सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। जब वे तीनों बोल चुके तो उसने एक उंगली उठा ली। जब इंतिहान का नतीजा निकला तो उन तीनों में से सिर्फ एक पास हो गया था। ज्योतिषी का नाम हो गया। एक शिष्य ने ज्योतिषी से पूछा कि उसकी सफलता का रहस्य क्या है? ‘मेरा रहस्य यही है कि मैं कुछ बोलता

नहीं।’ जवाब उस नौजवान को समझ में नहीं आया। ज्योतिषी ने समझाया, ‘तुमने देखा था कि मैंने एक उंगली उठाई थी। इसका मतलब यह हो सकता था कि सिर्फ एक पास होगा। अगर दो पास होते तब भी मेरी भविश्यवाणी ठीक निकलती, क्योंकि तब इसका अर्थ होता था कि केवल एक फेल होगा, और दो पास होंगे। अगर तीनों पास होते तो इसका अर्थ यों लगाया जा सकता था कि तीनों एक समूह के रूप में पास होंगे। इसका उल्टा भी सही होता।’

‘नहीं, अन्नदाता,’ ट्रेग क्विन ने कहा। वह और भी ज्यादा रो रहा था। ‘मैं तो आपके लिए रो रहा हूं क्योंकि आपकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाएगी।’ ‘पागल! बेवकूफ! क्या बकता है? यह तुझसे किसने कहा कि मैं जल्दी मर जाऊंगा?’ राजा ने और भी गुस्से से पूछा। ‘महाराज, यह सुनकर कि ये आड़ू उम्र बढ़ाने वाले आड़ू कहलाते हैं, मैं एक खाना चाहता था, ताकि जितने साल हो सके, जिंदा रहूं। मैंने तो अभी चौथाई फल भी नहीं खाया था कि बिना किसी सूचना के मृत्यु ने आकर मेरी गर्दन बदोच ली। इसीलिए मैं सोचकर डर रहा था कि अगर महाराज ने सारे आड़ू खा लिए तो भगवान जाने उनका क्या होगा।’ ‘छोड़ दो ड्रेग को।’ राजा उसकी हाजिर जवाबी पर मुस्करा कर बोला।

क स्कूल का मास्टर अपने आलस के लिए मशहूर था। कोई भी अपना बच्चा उसके पास नहीं भेजना चाहता था। लेकिन एक दिन एक लड़का उसके पास पढ़ने आया। ‘अच्छी बात है।’ मास्टर ने चिढ़ कर कहा। उसको यह अच्छा नहीं लग रहा था कि काम करना पड़ेगा। ‘तुम मुझसे ही पढ़ना चाहते हो तो जाओ,’ अपने लिए एक मेज ले आओ।’ ‘किसलिए?’ लड़के ने पूछा। ‘उसके ऊपर पान के पत्ते रखना है न और अपने गुरुदेव की प्रार्थना करनी है। यह कायदा है।’

‘हूं।’ अपना सर खुजाते हुए, शिष्य ने कहा। ‘तो मैं घुटनों और पंजों के बल खड़ा हो जाता हूं। मेरी पीठ पर पान के पत्ते रखे जा सकते हैं। इस तरह हम दोनों मेहनत से बच जाएंगे।’ यह सुन कर मास्टर लड़के के चरणों पर गिर पड़ा। ‘शाबाश, बेटे!’ तुमको मुझसे कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है। मुझको जो विद्या सबसे अच्छी लगती है, वह है काम करने से बचना। और इसमें तो तुम मेरे भी गुरु हो!’


28 परंपरा

22-28 मई 2017

रामलीला मिसाल

सामाजिक सौहार्द की राम लीला दिल्ली में होने वाली राम लीलाओं में दिल्ली के सामाजिक साझे का तानाबाना पूरी तरह से दिखता है। तमाम तरह की भव्यता के बावजूद यहां की रामलीलाएं मुस्लिम कलाकारों की भागीदारी की वजह से सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं

एक नजर

दिल्ली में रामलीला की तैयारी में जुटे मुस्लिम कलाकार मुस्लिम कलाकारों के बगैर संभव नहीं है रामलीला

पुतला बनाने से लेकर अभिनय तक का काम करते हैं मुस्लिम कलाकार

रा

सत्यम

जधानी दिल्ली में भूमि पूजन के बाद रामलीला महोत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सितंबर में दुर्गापूजा है। इस बार दिल्ली के सांसद व प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष मनोज तिवारी अंगद की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो गए हैं। तिवारी का कहना है कि जब भी उन्हें रामलीला में किरदार निभाने का मौका मिलता है तो वे उसे हाथ से जाने नहीं देते। तिवारी सरीखे कई फिल्मी कलाकार दिल्ली की रामलीलाओं में अपना अभिनय प्रस्तुत कर आकर्षण का केंद्र बनते हैं, पर दिल्ली की रामलीलाओं में जो सबसे प्रमुख चीजें देखने को मिलती हैं वह है मुस्लिम कलाकारों का बढ़-चढ़कर भाग लेना। इन कलाकारों की बदौलत दिल्ली की रामलीलाओं में सदभाव का माहौल दिखता है। वह चाहे लाल किला मैदान की नवश्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला हो या फिर द्वारका के श्रीराम लीला सोसाइटी की। हर जगह मुस्लिम कलाकारों की बानगी देखते ही बनती है। वे परदे के पीछे और आगे दोनों जगहों पर रामलीला के मंचन में अहम भूमिका निभाते हैं। बीते साल फिल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सि​िद्दकी ​को मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना में रामलीला में अभिनय करने का मौका नहीं दिया गया। यह मुद्दा

राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह चर्चित हुआ कि नवाजुद्दीन को सामने आकर अपनी आपबीती बतानी पड़ी। नवाजुद्दीन सधे और मंजे हुए कलाकार हैं और उन्हें पता है कि इस तरह की बातों को अगर ज्यादा तवज्जो दी जाए तो वह मजहबी रूप ले सकता है, लिहाजा उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि वे रामलीला में भाग लेना चाहते थे। उनकी मंशा थी कि वे इसमें अभिनय कर यह साबित करेंगे कि पर्व और त्योहार किसी खास मजहब और समुदाय से जुड़े नहीं होते। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा होता है जिसे जैसे चाहे मना सकते हैं। लेकिन दिल्ली एक ऐसा शहर है जहां मुस्लिम कलाकार और अदाकारा के बिना रामलीला की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। यह बात कुछ अजीब सी लग सकती है पर जब उसके अतीत और वर्तमान को गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि कैसे एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-तीन पीढ़ियों से मुस्लिम कलाकार दिल्ली की रामलीलाओं में महीनों तक बिना अपना मेहनताना तय किए काम करते हैं। दिल्ली की रामलीलाओं में मुस्लिम किरदार ही नहीं,

बल्कि मुस्लिमों की भागीदारी का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि बिना कुछ बताए, सोचे समझे घर परिवार को राम भरोसे छोड़कर भोपुरा के फरूखनगर का आलम अली अपने 60 आदमियों के साथ महीने भर के लिए दिल्ली में डेरा डाले रहते हैं। आलम से जब इस संवाददाता की बातचीत हुई तो वे कहते हैं कि हमें पैसे जरूर मिलते हैं, पर यह तय नहीं होता कि कितना लेना है और कितना देना है। कोई दो लाख भी दे देता है तो कोई एक लाख, 50 हजार या 25 हजार। हम मेहनत करते हैं और मेहनताना रामलीला के आयोजकों पर छोड़ देते हैं। यह उन्हें भली भांति पता होता है कि साल में एक बार उन्हें हमें बुलाना है और यही हमारी आजीविका का साधन है। लिहाजा उनकी तरफ से हमें जो मिलता है वह हम राम के नाम पर रख लेते हैं। आलम अकेले नहीं है जो दिल्ली में डेरा डालने की तैयारी में लग गए हैं। उनके साथ अनवर अहमद, चंद्रपाल, लाजिम खान, रमजाने और इदरिश अली इस समय बहुत व्यस्त हो गए हैं। कारण दिल्ली की सात रामलीलाओं में रावण के पुतले बनाने से लेकर दुर्गापूजा के बाद

मुस्लिम कलाकार और अदाकारा के बिना रामलीला की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। यह बात कुछ अजीब सी लग सकती है पर जब उसके अतीत और वर्तमान को गौर से देखेंगे तो पता चलेगा

जुलुस, झांकियां और फिर दीवाली की तैयारी में उन्हें लग जाना है। इन मुस्लिम कलाकारों का कहना है कि सदभाव, भाईचारा हमारे खून में है। वह चाहे हिंदू हो या मुस्लिम शरीर के किसी भी एक अंग को काटकर देखिए तो पता चलेगा कि खून का रंग लाल ही निकलता है। उसमें कहां मजहब की बू आती है। इसीलिए हम धर्म जैसी बातों पर सोचते कम है, ध्यान कम लगाते हैं और अपने साथियों को भी यही कहते हैं कि हमें धर्म पर सोचना नहीं है, सोचना है अपनी भूमिका और काम के बारे में। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या हम तीन पीढियों के लोग दिल्ली की रामलीला का इंतजार करते? यह हमारी तीसरी पीढ़ी है जो यहां काम करने खुशी-खुशी आ रही है। आलम की मंडली बीते साल सीबीडी ग्राउंड बालाजी रामलीला कमेटी के भगवत रूस्तगी और मुकेश गुप्ता के आमंत्रण पर एक महीने के लिए पुतला बनाने आए थे। रामलीला मंचन से अलग सबसे उंचे पुतलों की होड़ में नजीब का बनाया रावण का पुतला था जिसकी उंचाई 85 फीट थी। वहीं मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों की उंचाई भी 80 फीट रखी गई थी। रामलीला आयोजकों में शामिल अशोक कपूर, प्रवीण कपूर और देवेश गुप्ता के भी विचार इन्हीं मुस्लिम कलाकारों और अदाकारों से मिलते जुलते हैं। वे कहते हैं कि जब बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रूप में रामलीला का आयोजन होता है तो फिर उसमें हमें हिंदू और मुस्लिम जैसी बातों पर सोचने का सवाल ही नहीं है। पिछले 20 सालों से नजीब अहमद अपने पूरे परिवार के साथ यहां रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण का पुतला बनाते हैं। उनकी मेहनत का हमें पता है, लिहाजा हमें उन्हें पूरे महीने भर वह सम्मान देते हैं जिसे पाने के वे हकदार हैं। जाने के समय हमारी आर्थिक भेंट उनके लिए सिर्फ रस्मअदायगी भर रह जाती है। इस बिना पर वे इसे स्वीकार करते हैं कि अगले साल उन्हें फिर आने का मौका मिलेगा और वे हमारा आतिथ्य सहर्ष स्वीकार करेंगे। दरअसल, रामलीला निजी जिंदगी का एक हिस्सा


22-28 मई 2017

'दि

परंपरा की लीला

परंपरा

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बनारस के रामनगर में तो पिछले करीब 180 सालों से रामलीला का मंचन हो रहा है

ल्ली जैसे महानगरों और चैनल संस्कृति के प्रभाव में देश के कुछ हिस्सों में रामलीलाओं के रूप पिछले एक दशक में इलेक्ट्रॉनिक साजोसामान और प्रायोजकीय हितों के मुताबिक भले बदल रहे हैं। पर देश भर में होने वाली ज्यादातर लीलाओं ने अपने पारंपरिक बाने को कमोबेश आज भी बनाए रखा है’, यह मानना है देश-विदेश की रामलीलाओं पर गहन शोध करने वाली डॉ. इंदुजा अवस्थी का। बनारस के रामनगर में तो पिछले करीब 18० सालों से रामलीला खेली जा रही है। दिलचस्प है कि यहां खेली जानेवाली लीला में आज भी लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होता है। यही नहीं लीला की सादगी और उससे जुड़ी आस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता है। खुले मैदान में यहां-वहां बने लीला स्थल और इसके साथ दशकों से जुड़ी लीला भक्तों की आस्था की ख्याति पूरी दुनिया में है। लोक और परंपरा के साथ गलबहियां खेलती भारतीय संस्कृति की बहुलता और अक्षुण्णता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि चाहे बनारस के रामनगर, चित्रकूट, घाट या कालभैरव की रामलीलाएं हों या फिर भरतपुर और मथुरा की, राम-सीता और लक्ष्मण के साथ दशरथ, कौशल्या, उर्मिला, जनक, भरत, रावण व हनुमान जैसे पात्र के अभिनय 10-14 साल के किशोर ही करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अब कस्बाई इलाकों में पेशेवर मंडलियां उतरने लगी हैं, जो मंच पर अभिनेत्रियों के साथ तड़क-भड़क वाले पारसी थियेटर के अंदाज को उतार रहे हैं। पर इन सबके बीच अगर

भर नहीं होता, बल्कि उसके तार हमारी सनातन परंपरा से जुड़े होते हैं और उसे मूर्त रूप देने का काम यही मुस्लिम कलाकार करते हैं। खुद की इच्छाशक्ति को वे यहां किसी पर थोपते नहीं, बल्कि अपने काम से यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार की दकियानूसी दलीलों और मान्यताओं की कोई जगह नहीं है, जिससे दिल्ली पूरे देश में कहीं से भी शर्मिंदगी महसूस कर सके। अपने अभिनय से बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक पहचान बनाने वाले नवाजुद्दीन सि​िद्दकी को भले ही साल 2016 में मुजफ्फरनगर में अभिनय करने का मौका नहीं मिला पर दिल्ली की रामलीलाओं में मुस्लिम युवतियां कहीं उर्मिला की भूमिका तो कहीं सुलोचना और लक्ष्मी की भूमिका में नजर आती हैं। द्वारका की रामलीला में रूखसार उर्मिला, सुलोचना और लक्ष्मी के तीन-तीन किरदार निभाती हैं। जबकि लाल किला के बाहर के मैदान पर मुजीबुर रहमान कुंभकर्ण की भूमिका को चार चांद लगाते दिख जाते हैं। सीबीडी ग्राउंड में आलम अली तो अजमल खां पार्क करोलबाग में नजीब अहमद रावण, मेघनाथ

पारंपरिक ही है। मानो सोने की थाल में माटी के दीये जगमग कर रहे हों।

यूनेस्को ने दी मान्यता

रामलीला देश का सबसे बड़ा लोकानुष्ठान है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण रामकथा का अलग स्वरूप है। अवस्थी बताती हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम कृष्ण की लीला प्रस्तुति में बारीक मौलिक भेद है। शायद ऐसा दो ईश्वर रूपों में भेद के कारण ही है। पुष्प वाटिका, कैकेयीमंथरा और रावण-अंगद या रावण-हनुमान आदि प्रसंगों में भले थोड़ा हास्य होता है, पर इसके अलावा पूरी कथा के अनुशासन को बदलना आसान नहीं है।

लोकभाषाओं का ठेठ रंग

तुलसी ने लोकमानस में अवधी के माध्यम से रामकथा को स्वीकृति दिलाई और आज भी इसका ठेठ रंग लोकभाषाओं में ही दिखता है। और कुंभकर्ण के पुतले बनाते हैं। इससे बड़ा सामाजिक सौहार्द का और क्या उदाहरण हो सकता है कि गाहे-बगाहे छिटपुट घटनाओं को छोड़कर हम दिल्ली के लोग सदभाव की मिसाल हमेशा पेश करते आए हैं। द्वारका सेक्टर-दस ‘श्री रामलीला सोसाइटी’ में मुस्लिम युवती रूखसार को देखने दूर दराज से लोग आते हैं। यहां चिराग खान इंद्रदेवता की भूमिका निभाते हैं। रामलीला कमेटी के संरक्षक पूर्व विधायक राजेश गहलोत से जब इस बाबत पूछा गया तो उनका कहना था कि यह बात उठती कहां कि कौन हिंदू है और कौन मुस्लिम। हमारे यहां रावण और राम की सेना के बीच के युद्ध का मंचन, लक्ष्मण को मूर्छित दिखाना और साक्षात भगवान का स्वंय मैदान में उतरकर युद्ध करने जैसे रोमांचक प्रसंगों को दर्शाने और दिखाने में इन्हीं मुस्लिम युवक युवतियों का महत्वपूर्ण योगदान है। गहलोत कहते हैं कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी और सांसद तरुण विजय से लेकर स्थानीय सांसद प्रवेश साहिब सिह वर्मा तक रामायण में मु​स्लिम युवक-युवतियों के जोश की तारीफ करने

मिथिला में रामलीला के बोल मैथिली में फूटते हैं, तो भरतपुर में राजस्थानी की बजाय ब्रजभाषा की मिठास घुली है। बनारस की रामलीलाओं में वहां की भोजपुरी और बनारसी का असर दिखता है पर यहां अवधी का साथ भी बना हुआ है। बात मथुरा की रामलीला की करें तो इसकी खासियत पात्रों की शानदार सज-धज है। कृष्णभूमि की रामलीला में राम और सीता के साथ बाकी पात्रों के सिर मुकुट से लेकर पगपैजनियां तक असली सोने-चांदी के होते हैं। मुकुट, करधनी और बांहों पर सजने वाले आभूषणों में तो हीरे के नग तक जड़े होते हैं और यह सब संभव हो पाता है यहां के सोनारों और व्यापारियों की रामभक्ति के कारण। आभूषणों और मंच की साज-सज्जा के होने वाले लाखों के खर्च के बावजूद लीला रूप आज भी कमोबेश से खुद को रोक नहीं पाते हैं। यहां सांप्रदायिकता जैसी कोई बातें सोचने का मतलब ही नहीं है। जो उत्साह मुस्लिम युवाओं में देखा जाता है उससे कम हिंदुओं में भी नहीं होता और यही कारण है कि हम यह भरसक प्रयास करते हैं कि उन्हें महीने भर पहले बुलाकर इस चीज का आभास दिलाते रहें कि दिल्ली दिलवालों की नगरी है, यहां सदभाव और सरोकार से अलावा अन्य बातों में लोगों का विश्वास नहीं है। रामलीला की चर्चा हो और उसमें लालकिला ग्राउंड के नवश्री धार्मिक लीला कमेटी की चर्चा नहीं हो तो कुछ छूट गया सा लगता है। 60 सालों से रामलला के दर्शन के लिए आतुर लोग इस इंतजार में रहते हैं कि इस साल यहां कौन की मंडली आ रही है और किस मुस्लिम किरदार की क्या भूमिका होने वाली है। यहां मुजीबुर रहमान कुंभकर्ण की भूमिका अदाकर सबकी आंखों के तारा बने रहते हैं। 26 साल का मुजीबुर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का छात्र हैं। रामलीला में पूरे आईटी विभाग का जिम्मा संभाले मुजीबुर बीते साल पहली बार कुंभकर्ण की भूमिका में नजर आए तो एकबारगी उनके साथी भी हतप्रभ

रामलीला केवल भारत ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, म्यांमार जैसे देशों में भी काफी लोकप्रिय है। यूनेस्को ने इसकी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए 2005 में इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया था। दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे ज्ञात होता है कि इन देशों में लंबे समय से रामलीला प्रचलन में थी। जावा के सम्राट वलितुंग से जुड़े एक शिलालेख में एक समारोह का विवरण मिलता है, जिसमें रामलीला का जिक्र है। इस शिलालेख की तिथि 907 ई. है। इसी तरह थाईलैंड के नरेश वोरमत्रयी के राजभवन की नियमावली में रामलीला का उल्लेख मिलता है, जिसकी तिथि 1458 ई. दर्ज है। बर्मा के राजा ने 1767 ई. में थाईलैंड पर आक्रमण किया था। इस युद्ध में थाईलैंड पराजित हो गया। विजेता सम्राट स्वर्ण आभूषण के साथ रामलीला कलाकारों को भी अपने साथ ले गए थे। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रामलीला कई रूपों में पाई जाती है। इनमें ‘मुखौटा रामलीला’ और ‘छाया रामलीला’ प्रसिद्ध है। इंडोनेशिया और मलेशिया में यह ‘लाखोन’, बर्मा में ‘ल्खोनखाल’ और थाईलैंड में ‘नंग’ के नाम से प्रचलित है। यूनेस्को के अनुसार, ‘दशहरा के मौके पर कस्बों, गांवों, शहरों में आयोजित की जाने वाली ‘रामलीला’ असत्य पर सत्य की विजय को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।’ रह गए। बहरहाल, सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए प्रयासरत दिल्ली के अलग-अलग सौ से ज्यादा रामलीलाओं की तैयारी फिर शुरू हो गई है। लाल किला की लवकुश समिति में फिल्मी दुनिया के गई जाने माने सितारों के शामिल होने की घोषणा हो चुकी है। रामलीला में ‘बाहुबली’ फिल्म से मिलते जुलते एक्शन सीन दिखाने के लिए मुंबई से 60 कलाकारों ने अपनी रजामंदी दे दी है। शक्ति कपूर और असरानी, अनूप जलोटा और शंकर साहनी कहीं मर्यादा पुरुषोत्तम राम तो कहीं उनके पिता दशरथ, कहीं केवट तो कहीं सीता के पात्र में होंगे, यह तय हो गया है। अन्य रामलीला समितियों की फिल्मी कलाकारों को लाने और उनसे अभिनय कराने की घोषणा अभी बाकी है। पर सबसे ज्यादा जिन चीजों के लिए दिल्ली की रामलीलाएं याद की जाएंगी, वह होगा मुस्लिम अदाकारों और किरदारों से सज्जित राजधानी की विरासत को सजाने संवारने में रुखसार, नजीब और आलम जैसे लोगों की हिस्सेदारी।


30 स्मरण

22-28 मई 2017

श्रद्धांजलि अनिल माधव दवे

नर्मदा प्रेमी अनिल माधव दवे की प्रेरक स्मृति एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता और सौम्य राजनेता के तौर पर लंबे समय तक बनी रहेगी

सूना हो गया

‘नदी का घर’ प्र

एसएसबी ब्यूरो

धानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैबिनेट को लेकर हमेशा यह बात तो सुर्खी बनी कि इसमें कितने पॉलिटिकल स्टॉलवर्ट हैं, जबकि इस कैबिनेट की खासियत यह है कि इसमें स्वयंसेवकत्व के भाव से सार्वजनिक जीवन में आए लोगों को अवसर दिया गया है। ऐसे ही एक स्वयंसेवक थे अनिल माधव दवे। केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में जब उन्हें मोदी कैबिनेट में शामिल किया गया तो लोगों ने यह जाना कि पर्यावरण के साथ उनका रिश्ता नया नहीं है। अपने साठ साला जीवन को जिस सार्थकता और उद्देश्यपरकता के साथ दवे ने जिया, वह वाकई अभिभूत करने वाला है। अनिल माधव दवे को निस्संदेह एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता और सौम्य राजनेता के तौर पर याद किया जाएगा। नर्मदा को लेकर तो वे बहुत ही भावुक थे। भोपाल में अपने घर का नाम ही उन्होंने ‘नदी का घर’ रखा है, जिसे लोगों के लिए एक संग्राहलय के रूप में खोला गया है। दरअसल, मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी कही जाने वाली नर्मदा नदी के सम्मान की राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई की शुरुआत सबसे पहले अनिल माधव दवे ने ही की थी। ‘नर्मदा समग्र’ नामक संगठन बनाकर वे नर्मदा की स्वच्छता और उसके पवित्रता को पहचान देने

के लिए प्रयास करते रहे। हौशंगाबाद के बांद्रा भवन में नर्मदा नदी के किनारे उन्होंने अपना एक आश्रम बना रखा था, जहां से नर्मदा और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों की रूपरेखा तैयार होती थी। नर्मदा के किनारे उन्होंने देश—विदेश से लोगों को बुलाकर अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव के आयोजन की शुरूआत की। बीते वर्ष उज्जैन कुंभ में हुए ‘ज्ञान संगम’ के भी वही प्रमुख कर्ताधर्ता थे। उनका जन्म महाकाल की नगरी उज्जैन के वडनगर में 9 जुलाई 1956 को हुआ था। उनके पर्यावरण प्रेम को देखते हुए ही पिछले साल कैबिनेट के विस्तार में पीएम मोदी ने उन्हें सरकार में शामिल करते हुए पर्यावरण मंत्री बनाया था। दिलचस्प है कि पर्यावरण से जुड़कर जीने वाले और पर्यावरण की चिंता के साथ आखिरी सांस लेने वाले दवे के लिए पर्यावरण प्रेम एक वंश परंपरा की तरह रहा। उनके पिता वन विभाग में कार्यरत थे। उनका निधन भी पिता की तरह असमय ही हुआ था। वे बेहद लो प्रोफाइल रहने वाले व्यक्ति थे। दवे तब छोटे ही थे कि उनके पिता का हृदयघात के वजह से निधन हो गया था। दवे के दादा, दादा साहब दवे का मध्य प्रदेश में बड़ा सम्मान था। अनिल माधव दवे की पर्यावरण को लेकर सोच और अभियानों में जोर हमेशा आधुनिकता के साथ पर्यावरण के संतुलन पर रहा। पर्यावरण और राष्ट्र प्रेरणा से भरे विषयों पर उन्होंने ‘सृजन से विसर्जन

तक’, ‘चंद्रशेखर आजाद’, ‘संभल के रहना घर में छुपे हुए गद्दारों से’, ‘शताब्दी के पांच काले पन्ने’ और ‘नर्मदा समग्र’ जैसी किताबें लिखी हैं। उनके बारे में यह दिलचस्प है कि वे एक प्रशिक्षित पायलट भी थे। खूबी यह कि अपनी इस दक्षता को भी उन्होंने नर्मदा प्रेम को ही समर्पित किया। उन्होंने नर्मदा नदी के उदगम स्थल से लेकर उसके समुद्र में मिलने तक के सफर का खुद हवाई जहाज उड़ाकर 18 दिन की यात्रा की। इस तरह उन्हें नर्मदा के बहाव और उससे

अनिल माधव दवे के असामयिक निधन से हैरान हूं। यह निजी क्षति है। दवेजी के रूप में देश ने एक सच्चा देशभक्त और मां नर्मदा का सपूत खो दिया है। - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

जुड़े संकट को तो समग्रता में समझने में मदद मिली ही, इस नदी के आसापास के जीवन को लेकर भी उनकी समझ बढ़ी। वे वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भी बेहद करीबी रहे। चौहान और दवे दोनों के साथ खास बात यह है कि वे दोनों नर्मदा प्रेमी हैं। यही वजह है कि जब दवे के निधन की सूचनी मिली, तो मुख्यमंत्री चौहान काफी भावुक हो गए। उनके ही शब्दों में, ‘बड़े भाई, घनिष्ठ मित्र अनिल माधव दवे के असामयिक निधन से हैरान हूं। यह निजी क्षति है। दवेजी के रूप में देश ने एक सच्चा देशभक्त और मां नर्मदा का सपूत खो दिया है। इसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।’ दवे की राजनीति और प्रकृति की बात करते हुए यह जानना भी दिलचस्प है कि उनके आदर्श छत्रपति शिवाजी थे। उन्होंने शिवाजी के प्रशासन और रणनीति का गहन अध्ययन किया था। उनका मानना था कि शिवाजी का प्रशासन बेहद आदर्श था, जिसे अमल में लाकर भारत को सर्वश्रेष्ठ बनाया जा सकता है। दवे की स्कूली शिक्षा गुजरात में हुई है, जिस वजह से गुजराती भाषा का उन्हें बेहद बढ़िया ज्ञान रहा है। उन्होंने स्नातक और एम. कॉम की शिक्षा भी इंदौर के गुजराती कॉलेज से पूरी की। दवे के भीतर नेतृत्व और सांगठनिक कौशल के बीज छात्र जीवन पर ही पड़ चुके थे। उन्होंने न सिर्फ जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया, बल्कि वे कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए। वे नेशनल कैडेट कोर की एयर विंग के सदस्य भी थे। इसके बाद दवे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और नर्मदा संरक्षण के लिए काम किया। पीएम मोदी के साथ उनके बेहतर रिश्ते बनने में उनके गुजराती भाषा के ज्ञान को भी एक अहम कारण माना जाता है। तभी उनके निधन पर प्रधानमंत्री ने कहा भी, ‘मेरे दोस्त और एक बहुत ही सम्मानित सहयोगी के अचानक निधन से हैरान हूं। पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवेजी को मेरी संवेदना। अनिल माधव दवे जी को जन सेवक के रूप में याद किया जाएगा। वह पर्यावरण के संरक्षण के प्रति बहुत ही जागरूक थे। मैं अनिल माधव दवेजी के साथ देर शाम तक प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर चर्चा कर रहा था। यह मौत मेरे लिए व्यक्तिगत नुकसान है।’ एक ऐसे दौर में जब नेताओं में जीते जी अपना नाम अमर करने की लालसा रहती है, दवे ने एक मिसाल कायम की है। उनके निधन के बाद उनके भाई ने जब उनकी वसीयत को जारी किया, तो अपने अपने इस विनम्र और प्रिय नेता को लेकर लोगों का उनके प्रति सम्मान और बढ़ गया। उन्होंने अपनी वसीयत 23 जुलाई 2012 को ही लिख दी थी। उन्होंने इसमें लिखा था कि उनकी स्मृति में न तो कोई स्मारक बनाया जाए, न कोई प्रतियोगिता आयोजित हो, न पुरस्कार दिए जाएं और न ही कहीं उनकी प्रतिमा लगाई जाए। उन्होंने लिखा था कि उन्हें याद करने का एक ही तरीका होगा कि पौधे रोपे जाएं और उन्हें बड़ा किया जाए। उन्होंने अपनी याद में नदी और जलाशयों को बचाने का काम भी करने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन साथ ही यह भी आग्रह भी किया कि इसमें भी उनके नाम का इस्तेमाल न किया जाए। नर्मदा के इस सेवक और राजनीति के इस विनम्र व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि।


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स्मरण

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श्रद्धांजलि रीमा लागू

बहुत याद आएंगी हिंदी फिल्मों की

‘आधुनिक मां’

रीमा लागू हिंदी फिल्मों की न सिर्फ ‘आधुनिक मां’ थीं, बल्कि उन्होंने मां के अभिनय और किरदार को सफेद साड़ी और रोते-बिसूरते संघर्ष से आगे का रास्ता दिखाया और साथ ही इसके आगे मां के किरदार को कई शेड में दिखाने का विकल्प भी उन्होंने फिल्मकारों के आगे खोला

फि

गीता सिंह

ल्मी परदे पर मां का किरदार निभाने वाली अभिनेत्रियों में खासी पसंद की जाने वाली रीमा लागू का 17 मई को हृदयाघात से निधन हो गया। आमतौर पर बॉलीवुड में मां सफेद साड़ी में दिखाई जाती है, जो आंसू और परेशानी के बीच गरीबी और

भ्रष्टाचार के साथ संघर्ष करती है। मां के इस सिनेमाई अवतार को जिन अभिनेत्रियों ने पहचान और लोकप्रियता प्रदान की, उनमें सुलोचना, निरूपा राय और राखी सर्वप्रमुख हैं। दरअसल, हम मां को लेकर जिस संवेदना से सबसे पहले और सबसे ज्यादा भरते हैं, उसमें भी मां की तस्वीर कुछ इसी अंदाज में जेहन में उभरती है। पर महेश मांजरेकर की फिल्म ‘वास्तव’ ने मां

की इस सिनेमाई छवि को काफी हद तक तोड़ा। इस फिल्म में मां ही अपने गैंगेस्टर बेटे को गोली मारने के लिए आगे बढ़ती है। इस भूमिका को निभाया था रीमा लागू ने। इस किरदार को निभाने के लिए रीमा ने सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता। दिलचस्प है कि इस तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिका को निभाने का साहस रीमा ने यह जानने के बावजूद निभाया कि फिल्म में उनके बेटे का रोल निभाने वाले संजय दत्त से वह उम्र में महज दो साल बड़ी थीं। अपने एक साक्षात्कार में रीमा ने बताया भी है कि इस फिल्म में जब उन्हें अपने बेटे को मारने का अभिनय करना था तो वह काफी नर्वस थीं। नतीजा यह कि अभिनय के दौरान जब संजय दत्त ने उनके हाथ में पिस्टल थमाया, तो वह कांप रही थीं। कहने की जरूरत नहीं कि बॉलीवुड में मां के किरदार की चली आ रही लंबी लीक को रीमा ने अपने इस नए और दमदार अभिनय से न सिर्फ तोड़ा, बल्कि इसके आगे मां के किरदार को कई शेड में दिखाने का विकल्प भी उन्होंने फिल्मकारों के आगे खोला। इस तरह कह सकते हैं कि रीमा लागू हिंदी फिल्मों की आधुनिक मां थीं और उन्होंने मां के अभिनय और किरदार

को सफेद साड़ी और रोते-बिसूरते संघर्ष से आगे का रास्ता दिखाया। 21 जून 1958 को मुंबई में जन्मी रीमा की अभिनय यात्रा करीब चार दशक लंबी रही। उनकी मां मंदाकिनी भदभदे भी अभिनेत्री थीं और अपने नाटक ‘लेकुर उदंड जाहली’ के कारण उनका मराठी रंगमंच की दुनिया में बड़ा नाम था। रीमा ने अपनी अभिनय यात्रा पुणे में स्कूली छात्रा के तौर पर की थी। बाद में उन्हें मराठी नाटकों और फिल्मों में अभिनय के प्रस्ताव मिलने लगे। वैसे जिस तरह के अभिनय से उन्हें अपनी पहचान मिली, वह था बच्चों को समझने वाली, उससे संवाद करने वाली एक मध्यवय की आधुनिक मां का किरदार। रीमा ने मां के इस नए किरदार को एक तरफ जहां फिल्मों से लेकर टीवी तक मान्यता दिलाई, वहीं उन्होंने कई बड़े सितारों की मां की भूमिका निभाने का यश भी पाया। रीमा लागू तब महज 30 साल की ही थीं, जब उन्हें मंसूर खान की फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ में जूही चावला की मां का रोल करने का मौका मिला। दिलचस्प है कि तब जूही रीमा से महज दस साल छोटी थीं। इस फिल्म से रीमा पहली बार चर्चा में आईं। इस तरह से एक मिथ भी टूटा और उम्र में कुछ साल छोटे अभिनेताओं की मां का रोल निभाने की चुनौती रीमा ने स्वीकार की। संजय दत्त, शाहरुख खान से गोविंदा और माधुरी दीक्षित तक हिंदी सिनेमा के कई नामचीन सितारों की मां का किरदार रीमा रीमा लागू ने कम से कम लागू ने निभाया। वह जिस एक और में अपने दमदार अभिनय के लिए 11 फिल्मों में सलमान की फिल्म याद की जाती रहेंगी, वह है ‘हम आपके हैं मां की भूमिका निभाई। कौन’। इस फिल्म में रीमा ने अनुपम खेर की पत्नी और माधुरी दीक्षित और रेणुका फिल्मों में मां के दमदार शहाने की मां की भूमिका निभाई थी। अभिनय के लिए उन्हें चार अलबत्ता जिस सितारे की ऑन स्क्रीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार मां के रूप में उन्हें सर्वाधिक लोकप्रियता मिली वे सलमान खान हैं। उन्होंने कम मिला था से कम 11 फिल्मों में सलमान की मां की भूमिका निभाई। फिल्मों में मां के दमदार अभिनय के लिए उन्हें चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। रीमा ने टीवी धारावाहिकों ‘खानदान’, ‘दो और दो पांच’ और ‘श्रीमान श्रीमती’ में भी अपने अभिनय से काफी लोकप्रियता हासिल की थी।


32 अनाम हीरो

22-28 मई 2017

अनाम हीरो लखपा शेरपा

आठवीं बार एवरेस्ट फतह

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नेपाल में जन्मी लखपा शेरपा वर्ष 2000 से अब तक दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंच चुकी हैं

पाल की लखपा शेरपा माउंट एवरेस्ट पर सबसे ज़्यादा बार चढ़ने वाली महिला बन गई हैं। 44 वर्षीया लखपा ने आठवीं बार एवरेस्ट की चोटी पर कदम रख नया कीर्तिमान बनाया। इसी दिन भारत के भी छह पर्वतारोही एवरेस्ट पर पहुंचे। ये इस वर्ष एवरेस्ट पर जानेवाला पहला जत्था है। इस साल नेपाल की ओर से लगभग 750 पर्वतारोही एवरेस्ट पर जाने की कोशिश कर रहे हैं। लखपा ने वर्ष 2000 में पहली बार माउंट एवरेस्ट फतह किया था। नेपाल में जन्मी लखपा शेरपा अमेरिका में रहती हैं, जहां वो तीन बच्चों का अपना परिवार संभालती हैं। उन्होंने पिछले साल कहा था, ‘मैं अमरीका में बहुत मेहनत करती हूं, ये आसान नहीं है, मगर मैं अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती हूं, मैं उनके लिए मेहनत कर रही हूं।’ 11 भाई-

प्रभाकर का कैनवास

न्यूजमेकर

केरल के पेंटर सेदुनाथ प्रभाकर अपनी कृतियों को ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया पार्लियामेंट में प्रदर्शित करेंगे

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सेदुनाथ प्रभाकर

रल और चित्रकला का रिश्ता पुराना है। राजा रवि वर्मा से लेकर अब तक वहां कई मशहूर चित्रकार हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिहाज से इस सिलसिले में नया नाम जुड़ गया है सेदुनाथ प्रभाकर का। प्रभाकर पहले ऐसे भारतीय हैं, जिन्हें मेलबोर्न स्थित विक्टोरिया पार्लियामेंट में अपनी पेंटिंग प्रदर्शित करने के लिए आमंत्रित किया गया है। ‘प्राइड ऑफ मेलबोर्न’ कही जाने वाली इस पेंटिंग प्रदर्शनी में ऑस्ट्रेलिया के 50 प्रसिद्ध चित्रकारों को अपनी कला शोकेस करने का अवसर दिया जाता है। प्रभाकर मेलबोर्न में ही बस गए हैं, इस लिहाज से उन्हें यह मौका मिला है। अलबत्ता, उनके भारतीय मूल के होने के कारण भारत में भी उन्हें मिले इस बड़े अवसर को लेकर काफी हर्ष का माहौल है। यही नहीं आॉस्ट्रेलिया में केरल के जो लोग हैं, वे इसे अपने लिए गर्व की बात मान रहे हैं। इस पेंटिंग प्रदर्शनी में 50 मीटर के एक कैनवस पर प्रभाकर एक पोट्रेट बनाएंगे।

बहनों में से एक लखपा शेरपा का जन्म माउंट मकालू की तलहटी में बसे एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके पिता पहले याक चराया करते थे, फिर बाद में वे लॉज चलाने लगे। शुरू में लखपा लॉज की रसोई में मदद किया करती थीं, जहां वो पर्वतारोहियों के लिए खाना बनाया करती थीं। लखपा कहती हैं कि वह अभी बहुत सारी चोटियों पर जाना चाहती हैं। अपनी पहली बार एवरेस्ट फतह के दिनों की बात याद कर वे बताती हैं, ‘हमारे सामान पुराने और भारी थे, जूते और दूसरे सामान उतने अच्छे नहीं थे, जितने अब हैं।’ बाद में काठमांडू में पर्वतारोहियों के एक सम्मेलन में उनकी मुलाक़ात अमरीका में बसे रोमानियाई मूल के एक पर्वतारोही से हुई, जिनके साथ उनकी शादी हुई और वह अमेरिका जा बसीं।

फ्लैट देने का ‘विवेक’

सुकमा के नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के परिवारों को अभिनेता विवेक ओबेरॉय अपनी आवासीय परियोजना में 25 फ्लैट दान में देंगे

भिनेता विवेक ओबेरॉय सामाजिक कार्यों में शुरू से दिलचस्पी लेते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के परिवारों को उन्होंने अपनी आवासीय परियोजना में 25 फ्लैट दान में दिए हैं। विवेक की कंपनी ‘कर्मा इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड’ ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को इस बारे में लिखित रूप में जानकारी दी है। कंपनी ने कहा वह देश के विभिन्न ऑपरेशन्स में शहीद हुए जवानों के परिवार वालों को यह मदद देना चाहते हैं। सीआरपीएफ ने अपने ट्विटर हैंडल पर इसके लिए अभिनेता को धन्यवाद दिया है। अर्द्ध सैनिक बल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चार फ्लैट शहीद जवानों के परिवारों को आवंटित भी किए जा चुके हैं। जल्द ही शेष 21 फ्लैट भी सीआरपीएफ को सौंपे दिए जाएंगे। फ्लैट आवंटन में महाराष्ट्र के जवानों को प्राथमिकता दी जाएगी, क्योंकि ये फ्लैट इसी राज्य में स्थित हैं। ये फ्लैट मुंबई के ठाणे जिले के दो भवनों ‘करम रेजिडेंसी’ और ‘करम पंचतत्व’ में हैं। गौरतलब है कि इसी साल 11 मार्च को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने पैरा मिलिट्री फोर्स की रोड ओपनिंग पार्टी पर हमला किया था। इसमें 12 जवान शहीद हो गए थे। ये फ्लैट्स ठाणे में दिए जाएंगे।

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 23

विवेक ओबेरॉय

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 23)  
सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 23)  
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