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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

वर्ष-1 | अंक-35 | 14 - 20 अगस्त 2017

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06 महात्मा गांधी

स्वाधीनता और सद्भावना राष्ट्रपिता के जीवन के आखिरी पांच वर्ष

24 हथकरघा उद्योग

करघे पर बुनी प्रगति

4.33 मिलियन लोगों को हथकरघा से रोजगार

संकल्प से सिद्धि पथ पर देश

32 नमन

बलिदानी तरुणाई

कम उम्र में देश के लिए बलिदान देने वाले नायक

‘करेंगे और करके रहेंगे’

हम सभी मिलकर देश से भ्रष्टाचार दूर करेंगे और करके रहेंगे

हम सभी मिलकर गरीबों को उनका अधिकार दिलाएंगे और दिलाकर रहेंगे

हम सभी मिलकर नौजवानों को स्वरोजगार के और अवसर देंगे और देकर रहेंगे...


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14 - 20 अगस्त 2017

स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

‘करेंगे और करके रहेंगे’ ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर संसद की विशेष चर्चा में शरीक होते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां देश को नए राष्ट्रीय संकल्प दिए, वही इन्हें पूरा करने के लिए ‘करो या मरो’ की तर्ज पर ‘करेंगे और करके रहेंगे’ का नया नारा भी दिया

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एसएसबी ब्यूरो

42 से 2007 तक की भारत की यात्रा को अगर कम शब्दों में कहना हो तो कह सकते हैं कि यह ‘करो या मरो’ से लेकर ‘करेंगे और करके रहेंगे’ के जज्बे तक पहुंचने की यात्रा है। 1942 में करो या मरो का तारीखी नारा महात्मा गांधी ने दिया था। आज जब देश इस निर्णायक स्वाधीनता संघर्ष की 75वीं जयंती मना रहा है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘करेंगे और करके रहेंगे’ का नारा दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि 1942 के जन आंदोलन ने 5 साल में अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। अगर वैसा ही संघर्ष हम सब मिलकर 2017 से 2022 के बीच के 5 साल में करें तो देश की तमाम बुराइयों और समस्याओं से भी मुक्ति पाई जा सकती है। उन्होंने सवा सौ करोड़ देशवासियों और उनके जन-प्रतिनिधिओं का आह्वान करते हुए कहा कि हम एकजुट होकर इसके लिए अभी से जुट जाएं और आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर अपने स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत बनाएं। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर लोकसभा को दिए अपने भाषण में ये बातें कही

हैं। दिलचस्प है कि इस अवसर पर संसद के दोनों सदनों में एक दिन की विशेष चर्चा रखी गई थी। आमतौर पर सभी संसद सदस्यों ने इस बात को माना कि भले 1942 से हम आज काफी आगे निकल गए हैं, पर बात करें राष्ट्रीय भावना की सर्वोपरिता और सांस्कृतिक-सामाजिक एकजुटता की तो 75 साल पहले देश ने जो मिसाल कायम की थी, वह आज हमारे लिए प्रेरणा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि 1942 में गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था, जिसका सूत्र था ‘करेंगे या मरेंगे’। उनके अनुसार आज 2017 में 2022 के नए भारत के लिए संकल्प लेना है-

हम सभी मिलकर देश से भ्रष्टाचार दूर करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर गरीबों को उनका अधिकार दिलायेंगे और दिलाकर रहेंगे। हम सभी मिलकर नौजवानों को स्वरोजगार के और अवसर देंगे और देकर रहेंगे। हम सभी मिलकर देश से कुपोषण की समस्या को खत्म करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने वाली बेड़ियों को खत्म करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर देश से अशिक्षा खत्म करेंगे और करके रहेंगे।

एक नजर

‘देश से भ्रष्टाचार दूर करेंगे और करके रहेंगे’

‘शौचालय और स्वच्छता, ये विषय मजाक के नहीं हैं’

‘कुपोषण की समस्या को खत्म करेंगे और करके रहेंगे’

प्रधानमंत्री के अनुसार अगर ‘करेंगे और करके रहेंगे’ का संकल्प सवा सौ करोड़ देशवासी एवं उनके प्रतिनिधि का संकल्प बनेगा, तो ‘संकल्प से सिद्धि’ तक, यानी 2017 से पांच साल बाद आजादी के 75वीं वर्षगांठ पर अर्थात 2022 तक आजादी के दीवानों के सपनों को पूरा कर सकेंगे। इसके लिए कुछ बातों पर सहमति बनाना आवश्यक है, जिससे ‘सपने, सामर्थ्य, शक्ति और लक्ष्य की पूर्ति’ के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले।

2017 में हमारे पास गांधी जी नहीं हैं, उस समय का नेतृत्व नहीं है। लेकिन सवा सौ करोड़ देशवासियों के विश्वास के साथ अगर हम सब लोग मिलकर प्रयास करें तो गांधी जी के सपनों को, स्वतंत्रता सेनानियों 1942 जैसा ही अवसर के सपनों को पूरा करना मुश्किल नहीं है- नरेंद्र मोदी 1942 के आंदोलन को नेतृत्व देने वाले महापुरुषों


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

‘न्यू इंडिया’ का संकल्प

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देश भर के जिला कलेक्टरों को प्रधानमंत्री ने दिया आजादी की 75वीं वर्षगांठ यानी 2022 तक न्यू इंडिया के निर्माण में सहभागी बनने का संदेश

प्रधानमंत्री के अनुसार गांधी जी के ग्राम स्वराज का सपना पीछे छूट गया है। लोग गांव छोड़-छोड़कर शहरों में बस रहे हैं। हमें गांधी जी की सोच को फिर से जीवित करना चाहिए

प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों के जिलाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि नए भारत के निर्माण के लिए सभी कुछ न कुछ संकल्प अवश्य लें। उन्होंने कहा कि 9 अगस्त 1942 के दिन हमारे महापुरुषों और देशवासियों ने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का जो संकल्प लिया था, उसी संकल्प के परिणामस्वरूप पांच साल बाद 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिल सकी। भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर आज फिर 9 अगस्त को हम सभी को अगले पांच सालों में किए जाने वाले कार्यों के लिए संकल्पित होना होगा, तभी आजादी की 75वीं वर्षगांठ यानी 2022 में हम देश के स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के भारत के निर्माण में सहभागी बनेंगे। ‘न्यू इंडिया मंथन’ थीम के तहत संवाद का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 2017 में हमारे पास गांधी जी नहीं हैं, उस समय का नेतृत्व नहीं है। लेकिन सवा सौ करोड़ देशवासियों के विश्वास के साथ अगर हम सब लोग मिलकर प्रयास करें तो गांधी जी के सपनों को, स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को पूरा करना मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री ने कहा कि 42 में भी वैश्विक माहौल भारत के अनुकूल था। 2017 में भी विश्व में भारत के लिए बहुत अनुकूल माहौल है और उसका फायदा जितना जल्दी उठा लें उतना अच्छा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की तरह ही आज भी दुनिया के कई देश हमारी ओर नेतृत्व करने के नजरिए से देख रहे हैं। यह स्थिति भारत के लिए बहुत बड़ा अवसर है।

के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के जिलाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंस के जरिए बातचीत की। प्रधानमंत्री मोदी ने कलेक्टरों से कहा कि वो अपने जिले के प्रतिनिधि हैं और उन्हें खुद तय करना होगा कि वो साल 2022 में अपने जिले को कैसे और किस हाल में देखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि सभी जिलाधिकारियों को आम लोगों में जागरुकता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। खासकर उन सरकारी योजनाओं के बारे में, जिनके बारे में जनता को पता नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सभी कलेक्टर अपने जिले में लोगों को एलईडी बल्ब, भीम ऐप जैसी योजनाओं के बारे में जागरूकता पैदा करें। कलेक्टर जितना ज्यादा क्षेत्रों का दौरा करेंगे, उतना ज्यादा फाइलों पर सक्रिय रहेंगे।

राजनीति से बड़ी राष्ट्रनीति

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि हमारे लिए दल से बड़ा देश है, राजनीति से बड़ी राष्ट्रनीति है। उन्होंने कहा कि मेरे से ऊपर सवा सौ करोड़ देशवासी हैं। अगर हम मिलकर के आगे बढ़ें तो सभी समस्याओं पर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम इससे कैसे इनकार कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार के दीमक ने देश को कैसे तबाह करके रखा है? उन्होंने कहा कि राजनीतिक, सामाजिक या व्यक्तिगत कोई भी भ्रष्टाचार हो, हम पीछे की बातों में पड़े बगैर देश को आगे कैसे ले जा सकते हैं इसपर विचार करें, यही समय की मांग है। गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा ये हमारे सामने चुनौतियां हैं। ये हमारा दायित्व बनता है कि इसे सरकार की समस्या न मानकर देश की समस्या मानें और इसको दूर

करने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि 1942 में भी अलग-अलग विचारधाराएं थीं, सुभाष चंद्र बोस भी थे, लेकिन सबने तब भारत छोड़ो आंदोलन में गांधी जी का साथ दिया था। आज भी समय की मांग है कि देश की समस्याओं को दूर करने के लिए सब लोग एक साथ संकल्प लेकर के चलें।

स्वच्छता की फिक्र

इस मौके पर अपने प्रेरक संबोधन में प्रधानमंत्री ने देश को एक बार फिर स्वच्छता मिशन की याद दिलाई। उन्होंने कहा, ‘शौचालय और स्वच्छता, ये विषय मजाक के नहीं हैं।’ आगे उन्होंने कहा कि उन मां-बहनों की परेशानी समझो तब पता चलता है कि जब शौचालय नहीं होता है, तो रात के अंधेरे का इंतजार का समय कैसे बिताना पड़ता है। लिहाजा, समाज की मानसिकता बदल कर शौचालय का उपयोग करने के लिए सबको प्रेरित करना, जनसामान्य की शिक्षा के लिए आवश्यक है। इस बात को हमें जगाना होगा और यह भाव कानून बनाने या लागू करने भर से नहीं होगा। कानून तो सिर्फ मदद कर सकता है। स्वच्छता का मिशन तो लोगों के भीतर कर्तव्य भाव जगाने से ज्यादा होगा।

कर्तव्य से ज्यादा अधिकार की बात

प्रधानमंत्री के अनुसार देश में जाने-अनजाने अधिकार

भाव प्रबल और कर्तव्य भाव लुप्त होता गया है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से हमारा चरित्र ऐसा हो गया है कि हमें लगता ही नहीं कि हम कुछ बुरा कर रहे हैं। रेड लाइट क्रॉस करने वाले को लगता ही नहीं कि वो कानून तोड़ रहे हैं। कहीं थूक देते हैं, गंदगी कर देते हैं, तो लगता ही नहीं कि कुछ गलत कर रहे हैं। नियम- कानून तोड़ना हमारा स्वभाव बन गया है। मरीजों के रिश्तेदार बिना पूरी बात समझे डॉक्टर को मारते-पीटते हैं, अस्पतालों में आग लगा देते हैं। कोई एक्सीडेंट हो गया तो कार जला देते हैं, ड्राइवर को मार देते हैं। इसीलिए ये लीडरशिप और समाज की जिम्मेदारी है कि लोगों में कर्तव्य भाव को जगाए। उन्होंने कहा कि सिर्फ शौचालय बनाने से काम नहीं चलेगा, उसका इस्तेमाल करने के लिए मानसिकता बनाना भी सबकी जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री के अनुसार गांधी जी के ग्राम स्वराज का सपना पीछे छूट गया है। लोग गांव छोड़-छोड़कर शहरों में बस रहे हैं। हमें गांधी जी की सोच को फिर से जीवित करना चाहिए। गांव, गरीब, दलित, किसान, शोषित और वंचितों के लिए सबको मिलकर काम करना चाहिए। ये सवा सौ करोड़ देशवासियों और उनके प्रतिनिधियों का भी दायित्व है।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

जश्न से दूर महात्मा महात्मा गांधी

महात्मा गांधी के लिए जहां आजाद भारत का साकार होता स्वप्न संतोष देने वाला था, वहीं वे देश्वयापी हिंसा और सामाजिक सद्भाव के बिगड़ने से खासे आहत थे

एक नजर

15 अगस्त 1947 को गांधी जी ने दो महत्वपूर्ण पत्र लिखे प. बंगाल के नए गवर्नर सी. राजगोपालाचारी से की मुलाकात इसके अलावा कुछ छात्रों और वामपंथी नेताओं से भी मिले

नौ

प्रेम प्रकाश

अगस्त 1942 से चलकर 15 अगस्त 1942 को भारत उस मुकाम पर आ गया, जहां से एक स्वाधीन और संप्रभु राष्ट्र की यात्रा शुरू होती है। इन पांच सालों में जहां एक तरफ राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम ने अपना चरमोत्कर्ष देखा, वहीं इस दौरान देश की आजादी के लिए असंख्य लोगों ने बलिदान दिए। इन पांच वर्षों का महत्व इसीलिए भी है कि इस दौरान अंग्रेजों ने जहां स्वाधीनता के लिए भारतीयों के संघर्ष के खिलाफ बर्बर दमनात्मक कार्रवाई की, वहीं सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए भी उसने कई शातिरी चालें भी चलीं। बात करें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तो उनके लिए जहां आजाद भारत का साकार होता स्वप्न संतोष देने वाला था, वहीं वे देश्वयापी हिंसा और सामाजिक सद्भाव के बिगड़ने से खासे आहत थे। इस लिहाज से यह जानना रोचक है कि महात्मा गांधी ने स्वाधीन भारत का पहला दिन कैसे बिताया। इस बारे में गांधी वाङ्मय में जो जानकारियां हैं, उससे यह पता चलता है कि 15 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कलकत्ता में थे। कई दिनों से हिंदू-मुस्लिम दंगों की आग में झुलस रहे इस शहर में उनकी कोशिशों के चलते काफी हद तक अमन कायम हो गया था।

आजादी के दिन की उनकी गतिविधियां कुछ इस प्रकार रहीं-

मित्र अगाथा को पत्र

इस दिन की उनकी दिनचर्या में कुछ पत्रों का लेखन महत्वपूर्ण है। इससे इस बात की बखूबी जानकारी मिलती है कि बापू स्वाधीन भारत के पहले दिन किस तरह की मन:स्थिति में थे। उन्होंने इस दिन जो पहला पत्र लिखा, वह अपनी मित्र अगाथा हैरीसन को लिखा। इस पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार हैमिस अगाथा हैरीसन ओल्ड जॉर्डन हॉस्टल बीकंसफील्ड बक्स के पास, एसडब्ल्यू-2 यह पत्र मैं चरखा कातते हुए लिख रहा हूं। तुम्हें पता है कि आज जैसे बड़े अवसरों को मनाने का

मेरा तरीका यह है कि मैं भगवान को धन्यवाद देता हूं और इसीलिए पूजा करता हूं। पूजा के साथ उपवास रखना भी जरूरी है, अगर फलों का रस लेने के बाद भी ऐसा कहा जा सकता है।...और इसके बाद गरीबगुरबों के संघर्ष से जुड़ने और समर्पण के लिए चरखा कातना जरूरी है। इसीलिए मुझे जितना चरखा मैं रोज कातता हूं उससे कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए और अपने दूसरे कामों के साथ जितना हो सके उतना इसे करना चाहिए। मुझे अमृत (राजकुमारी अमृत कौर) के हाथों सुबह चार बजे तुम्हारा पहला पत्र मिला। उसके द्वारा मुझे तुम्हारा दूसरा पत्र भी मिला। इसे पश्चिम बंगाल के गवर्नर, राजाजी लेकर आए थे, लेकिन वे खुद नहीं आ सके। उनके घर को उनके प्रशंसकों ने बहुत बड़ी संख्या में घेरा हुआ है। इसीलिए वे

देश में जो सांप्रदायिक हिंसा चल रही थी, उसमें सरकार के आगे सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह देश में फिर से सामाजिक सद्भाव का माहौल कायम करे। गांधी जी ने यही सलाह पं. बंगाल सरकार और उसके मंत्रियों को दी

अपने ही घर में कैदी हो गए हैं। उन्होंने अपने सचिव के हाथों राजकुमारी (अमृत कौर) काे पैकेट भिजवा दिया। तुमने विंटर्टन के भाषण में मेरा जिक्र किया, लेकिन तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि उसे मैंने नहीं पढ़ा है। इंडिपेंडेस बिल पर हुई बहस के दौरान हुए भाषणों को भी मैं नहीं पढ़ सका। मुझे अखबार पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। उनके कुछ हिस्से या तो मुझे पढ़कर सुनाए जाते हैं या मैं कभी-कभार उन पर नजर मार लेता हूं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन मेरे बारे में अच्छा या बुरा कहता है अगर मैं बुनियादी रूप से सही हूं। तुम्हें और मुझे तो जितना अच्छे से हो सके अपने काम करने चाहिए और खुश रहना चाहिए। इसीलिए अखबारों से छुट्टी। अब मैं चरखा बंद करने वाला हूं और मुझे और काम करने हैं। सभी हमारे मित्रों को मेरा प्यार। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कार्ल हीथ इतने स्वस्थ थे कि तुम्हारे द्वारा बताए सम्मेलन की अध्यक्षता कर सकें। मेरी कितनी इच्छा है कि मैं तुम्हें यहां जो चल रहा है उसके बारे में बताऊं। शायद होरेस बताएंगे। वे कुछ दिनों तक मेरे साथ थे और कल रात ही गए हैं। प्यार। बापू


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

गलत है कि उसका धर्म अलग है। छात्रों को एक ऐसा नया भारत बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए जिस पर हर कोई गर्व करे।

दंगा रोकने की फिक्र और पत्र

गांधी विचार और जीवन से जुड़े तमाम अध्ययनों के अलावा खुद गांधी ने भी माना है कि 1947 के आसपास देश में जिस तरह का सांप्रदायिक तनाव भड़का, वह उनके लिए बहुत कष्ट देने वाला था। अहिंसा का यह पुजारी अपनी आंखों के आगे अपने देश के सामाजिक सौहार्द काे बिगड़ते नहीं देखना चाहता था। उनकी इस मन:स्थिति और इसके लिए की जा रही उनकी कोशिश की गवाही देती है 15 अगस्त 1947 को लिखा उनका दूसरा पत्र। यह पत्र गांधी जी ने रामेंद्र जी सिन्हा को लिखा, सिन्हा ने बापू को लिखा था कि कैसे दंगों को रोकने की कोशिश में उनके पिता की जान चली गई। पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार हैरामेंद्र जी सिन्हा गोपाल मलिक लेन, बोबाजार कलकत्ता प्रिय मित्र, मुझे आपकी बात माननी पड़ेगी कि आपके पिता में वीरों वाली अहिंसा थी। ऐसे लोग कभी नहीं मरते। उनके लिए शरीर के नाश का कोई अर्थ नहीं है। इसीलिए ऐसे वीर पिता की मृत्यु के लिए आपका या आपकी मां का या फिर किसी का भी शोक करना ठीक नहीं है। अपनी इस मृत्यु से उन्होंने ऐसी समृद्ध विरासत छोड़ी है, जिसके बारे में मुझे आशा है कि आप सब लोग खुद को उसके योग्य साबित करेंगे। सबसे अच्छी सलाह मैं यही दे सकता हूं कि आज हमें जो आजादी मिली है उसको बनाए रखने के लिए आप सबको हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए और जो पहला काम आप कर सकते हैं वह है अपने पिता की वीरता का अनुकरण। अहिंसा से भरी वीरता कई तरह से दिखाई जाती है। इसके लिए जरूरी नहीं है कि आपको किसी हत्यारे के हाथ मरना पड़े। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर आप के प्रियजनों की मृत्यु के लिए आपको उचित न्याय मिलता है तो यह भी अपने आप में बड़ी मुश्किलों से हासिल हुई आजादी को बनाए रखने में एक योगदान होगा। आपका एमके गांधी

प. बंगाल के मंत्रियों को सलाह

स्वाधीनता प्राप्ति के साथ देश में शासन तो बदला ही साथ ही चुनौतियों का नया दौर भी शुरू हुआ। देश में जो सांप्रदायिक हिंसा चल रही थी, उसमें सरकार के आगे सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह देश में फिर से सामाजिक सद्भाव का माहौल कायम करे। गांधी जी ने यही सलाह पं. बंगाल सरकार और उसके मंत्रियों को दी। उन्होंने कहा, ‘आज से आपको कांटों का ताज पहनना है। सत्य और अहिंसा को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कोशिश करते रहें। विनम्र रहें। धैर्यवान बनें। इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटिश राज ने आपकी कड़ी परीक्षा ली है, लेकिन आगे भी यह परीक्षा बारबार होती रहेगी। सत्ता से सावधान रहें। सत्ता भ्रष्ट बनाती है। इसकी चमक-दमक में खुद को फंसने मत दें। आपको याद रखना है कि आपको भारत के गांवों में रह रहे गरीब की सेवा के लिए यह सत्ता मिली है। ईश्वर आपकी सहायता करे।’

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प्रार्थना सभा

सत्ता से सावधान रहें। सत्ता भ्रष्ट बनाती है। इसकी चमक-दमक में खुद को फंसने मत दें। आपको याद रखना है कि आपको भारत के गांवों में रह रहे गरीब की सेवा के लिए यह सत्ता मिली है। ईश्वर आपकी सहायता करे -महात्मा गांधी गांधी जी की इस सलाह से यह भी जाहिर होता है कि उन्हें सत्ता के नए चरित्र का अंदाजा बहुत पहले हो गया था। इसीलिए वे गांव-समाज के स्तर पर रचनात्मक कार्यों के जरिए नए भारत के निर्माण की दलील लगातार दे रहे थे। उनकी नजर में लोकतंत्र के साथ देश के स्वावलंबन की जड़ें गांवों में हैं, इसीलिए स्वाधीनता के बाद सबसे ज्यादा ध्यान गांवों की ओर ध्यान देना चाहिए।

सी. राजगोपालाचारी से भेंट

प. बंगाल के नए राज्यपाल सी राजगोपालाचारी ने गांधी जी से मुलाकात करके उन्हें कलकत्ता में हो रहे दंगों को रोकने पर बधाई दी थी। सारी दुनिया गांधी जी के इस काम को चमत्कार कह रही थी, लेकिन उनका कहना था कि उन्हें तब तक तसल्ली नहीं होगी जब तक हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के साथ सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे और अपने घर लौटकर पहले की तरह ही जिंदगी बसर नहीं करने लगेंगे। उनका कहना था कि अभी भले ही जोश दिखाया जा रहा हो, लेकिन जब तक दिल पूरी तरह नहीं मिलते तब तक आगे फिर हालात बिगड़ने की आशंका है।

वामपंथी नेताओं से वार्ता

15 अगस्त, 1947 का दिन गांधी जी के लिए इसीलिए भी खासी व्यस्तता का था, क्योंकि वे उस दिन देश की राजधानी दिल्ली में न होकर कलकत्ता में

थे और हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के लिए लगातार कई स्तरों पर कोशिश कर रहे थे। इस दिन दोपहर दो बजे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ सदस्यों के साथ गांधी जी की बातचीत हुई। इसमें गांधी जी ने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ता साम्यवादी हों या समाजवादी, उन्हें आज से सारे मतभेद भुलाकर बड़ी कोशिशों से हासिल इस आजादी को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना था, ‘क्या हम इस आजादी को बिखरने देंगे?’ दरअसल देश में हिंदू-मुस्लिम एकता के मुद्दे पर वह मजबूती नजर नहीं आ रही थी जो ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई में दिखी थी। आजादी के मौके पर आयोजित समारोह के बारे में गांधी जी का कहना था, ‘मैं इस जश्न में शामिल नहीं हो सकता, मुझे यह अच्छा नहीं लग रहा।’

छात्रों से मुलाकात

गांधी जी ने विस्तार से इस पर बात की कि क्यों अब टकराव तुरंत रुकना चाहिए। उनका कहना था, ‘हमारे पास अब दो देश हैं और दोनों में ही हिंदू और मुस्लिम नागरिकों को रहना है। अगर ऐसा है तो इसका मतलब है ‘टू नेशन थ्योरी’ या द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा का अंत। छात्रों को विचार करना चाहिए और अच्छी तरह से विचार करना चाहिए। उन्हें ख्याल रखना चाहिए कि उनसे कोई गलत काम न हो।’ गांधी जी ने यह भी कहा कि भारत में रहने वाले किसी व्यक्ति को सिर्फ इसीलिए परेशान करना

प्रार्थना गांधी जी के दैनिक जीवन का अहम हिंसा था। इस अवसर पर वे सर्वधर्म प्रार्थना के साथ शांत मन से लोगों के साथ संवाद भी करते थे। उन्हें लगता था कि यह अवसर मन को प्रशांत करने का तो है ही साथ ही यह अपनी प्राथमिकताओं को सुनिश्चित तरीके से तय करने का भी मौका है। इस लिहाज से देश की स्वाधीनता के पहले दिन गांधी जी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में क्या कहा, यह गौरतलब है। प्रार्थना सभा में गांधी जी ने हिंदुओं और मुसलमानों के फिर मेलजोल पर कलकत्ता को बधाई दी। हिंदुओं और मुसलमानों ने एक जैसे जोश के साथ तिरंगा लहराया और नारे लगाए। इससे भी बड़ी बात यह हुई कि मुसलमान अपने हिंदू दोस्तों को मस्जिदों में ले जा रहे थे और हिंदू अपने मुसलमान मित्रों को मंदिरों में। इन खबरों ने गांधी को खिलाफत आंदोलन के समय की हिंदू-मुस्लिम एकता की याद दिला दी, बल्कि कहा जाए तो इस एकता का महत्व खिलाफत के समय की एकता से भी ज्यादा था। इसकी सीधी वजह यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को ही दंगों का जहर पीना पड़ा था। उसके बाद दोस्ती का यह अमृत तो उन्हें और भी अच्छा लगना चाहिए था। गांधी जी ने उम्मीद जताई कि हावड़ा सहित पूरा कलकत्ता सांप्रदायिकता के इस राक्षस से हमेशा के लिए पूरी तरह आजाद हो जाएगा। अलबत्ता वे इन खबरों से दुखी थे कि लाहौर में सांप्रदायिक उन्माद की यह आग अब भी धधक रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कलकत्ते के इस उदाहरण का पंजाब और भारत के बाकी हिस्सों पर भी असर होगा। इसके बाद गांधी जी ने चटगांव में हुए दंगों का जिक्र किया और कहा कि यह पूरे बंगाल का कर्तव्य है कि वह चटगांव के लोगों के दर्द को अपना दर्द समझें। इसके बाद गांधी जी ने एक और घटना का जिक्र किया। भारत की आजादी की खबर सुनकर उस दिन खुशी से झूमते लोगों की एक विशाल भीड़ ने गवर्नर हाउस पर कब्जा कर लिया था और राज्यपाल राजाजी वहां से बाहर नहीं निकल पा रहे थे। गांधी जी ने कहा कि उन्हें खुशी है कि अगर यह सिर्फ जनसाधारण के हाथ में आई ताकत का संकेत हो, लेकिन अगर लोग यह सोच रहे हैं कि वे सरकारी या किसी दूसरी संपत्ति के साथ जो चाहे कर सकते हैं तो उन्हें बहुत दुख होगा। गांधी जी का कहना था कि यह आपराधिक अराजकता होगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि ये लोग राजभवन को जितना जल्दी हो सके, खुद ही खाली कर देंगे। गांधी जी ने लोगों को चेताया कि उन्हें इस आजादी का बुद्धिमानी और संयम के साथ इस्तेमाल करना है। साफ है कि उस दिन गांधी जी की चिंता में अगर सांप्रदायिक सद्भाव की बहाली अगर सबसे बड़ी प्राथमिकता थी तो वे इस बात को लेकर भी उतने ही चिंतित थे कि सरकार और प्रशासन को कार्य करने में लोग बाधा न बनें। उन्हें यह साफ दिख रहा था कि स्वाधनीता के जश्न में झूम रहे लोग कहीं न कहीं यह भूल रहे हैं कि शासन अब फिरंगियों का नहीं, बल्कि अपना है, लिहाजा उसे सहयोग देना उनका कर्तव्य है।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

स्वाधीनता की खुशी गांधी जी के आखिरी पांच वर्ष

सद्भावना की फिक्र आज जब देश अगस्त क्रांति की 75वीं और आजादी की 70वीं वर्षगांठ एक साथ मना रहा है तो राष्ट्र के साथ राष्ट्रपिता के जीवन से जुड़े आखिरी पांच वर्षों पर एक गहन मंथन की दृष्टि से विचार करना जरूरी है

एक नजर

भा

नोआखली के गांवों में बिना चप्पल घूमे महात्मा

एसएसबी ब्यूरो

रत के साथ महात्मा गांधी के जीवन के आखिरी पांच साल खासे महत्वपूर्ण हैं। 1942 से शुरू होकर 1947 तक पहुंचें तो एक तरफ जहां भारत को स्वाधीनता मिली, वहीं इस दौरान अंग्रेजों ने जबरदस्त दमनचक्र हिंदुस्तानियों के खिलाफ चलाया। यही नहीं राष्ट्रीय आंदोलन के लंबे इतिहास में जिस सांप्रदायिक सौहार्द और एकता की ताकत दिखी, वह भी इस दौरान काफी दरकी। नतीजा ये कि भारत को आजादी तो मिली पर साथ में उसे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। गांधी जी के लिए यह सब बहुत पीड़ादायी था। उनके आगे दो मुश्किलें थीं। एक तो वे स्वाधीनता के लिए बढ़े कदम के साथ अंग्रेजों की कुटिलता का कोई तोड़ नहीं निकाल पा रहे थे, दूसरे निजी स्तर पर भी वे इस दौरान काफी अशक्त हुए। उन्हें आगा खान पैलेस में अंग्रेजों ने कैद किया था। यहीं उन्होंने लंबा उपवास भी किया। स्वास्थ्य की दृष्टि से जहां वे काफी कमजोर हुए वहीं बा और महादेव देसाई का निधन हो गया। ये दोनों भी उनके साथ आगा खान पैलेस में ही थे। आज जब देश अगस्त क्रांति की 75वीं और आजादी की 70वीं वर्षगांठ एक साथ मना रहा है तो राष्ट्र के साथ राष्ट्रपिता के जीवन से जुड़े आखिरी पांच वर्षों पर एक गहन मंथन की दृष्टि से विचार करना चाहिए। इससे हमें अतीत के उन सबकों को एक बार याद करने में तो मदद मिलेगी

ही राष्ट्रीय सद्भाव, बहुलतावादी एकता के साथ देश के नवनिर्माण के लिए नए सिरे से ब्लूप्रिंट तैयार करने में भी मदद मिलेगी। इनमें जिन कुछ मुद्दों पर हमें ज्यादा गौर करने की जरूरत है, उसमें अंग्रेजों की विभेदकारी और विभाजनकारी नीतियों को समझना पहली दरकार है। गौरतलब है कि वायसराय माउंटबेटन से अपनी दूसरी मुलाकात में गांधी जी ने साफ-साफ कह दिया, ‘अंग्रेजी तंत्र की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने वह स्थिति बना दी है, जब सिर्फ यही विकल्प बचे हैं कि या तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजी राज ही चलता रहे या फिर भारत रक्त स्नान करे। अवश्य ही, भारत रक्त-स्नान का सामना करने को तैयार है।’

नोआखली में पैदल महात्मा

गांधी जी जिस रक्त स्नान की बात कर रहे थे, पूर्वी बंगाल का नोआखली जिला उसका पहला शिकार

बना। जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन’ प्लान को संयुक्त बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सोहरावर्दी ने अमली जामा पहनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पंद्रह दिनों तक तो यहां हुए व्यापक हिंसा की कानोकान खबर तक नहीं पहुंची। पर बाद में नोआखली नरसंहार ने समूचे हिंदुस्तान को स्तब्ध कर दिया। हिंदू-मुस्लिम एकता के गांधी के प्रयासों को यह एक बहुत बड़ा धक्का था। बापू के लिए परीक्षा की असली घड़ी आ गई थी। उन्होंने तुरंत दिल्ली से नोआखली जाने का निर्णय लिया। कई लोगों ने आशंका व्यक्त की, हथियार बंद, उन्मादी लोगों के सामने नोआखली जाना बेकार है। दिल्ली से कूच करते वक्त बापू ने इन चिंतित लोगों से कहा, ‘मेरी अहिंसा लूले-लंगड़े की असहाय अहिंसा नहीं है। मेरी जीवंत अहिंसा की यह अग्निपरीक्षा है। अगर हुआ तो मर जाऊंगा, लेकिन वापस नहीं लौटूंगा।’ गांधी जी ने नोआखली पहुंचकर अकेले ही पीड़ित गांवों का पैदल भ्रमण करना शुरू कर दिया।

1 सितंबर, 1947 को महात्मा ने आमरण उपवास का निर्णय कर लिया। आजाद भारत में गांधी का यह पहला उपवास था। एलन कैंपबेल जॉनसन ने इस उपवास के बारे में लिखा, ‘गांधी के उपवास में लोगों के अंतर्मन को झकझोर देने की कैसी अद्भुत शक्ति है, इसे तो सिर्फ गांधी के उपवास का साक्षी ही समझ सकता है’

5 मार्च, 1947 को बिहार पहुंचकर वहां सद्भाव की कोशिशों में लगे स्वाधीन भारत में भी महात्मा गांधी ने किया उपवास

इस यात्रा के दौरान उन्होंने चप्पल पहनना भी छोड़ दिया। उन्हें लगता था कि नोआखली एक श्मशान भूमि है, जहां हजारों आदमियों की मजार बनी है। ऐसी मजार पर चप्पल पहनकर चलना उन मृत आत्माओं का अपमान करना है। वे जिस गांव में जाते वहां किसी मुसलमान के घर में ही ठहरते। गांव का दौरा करते तो मुस्लिम व्यक्तियों को साथ लेते और उनसे बेघर-बार हिंदुओं को सांत्वना देने और सहायता करने को कहते। उन्होंने गांव-गांव में हिंदूमुस्लिम ग्राम रक्षा समितियां बनाईं। समितियां भी ऐसी जिनके हिंदू प्रतिनिधि का चुनाव मुसलमान करते और मुस्लिम प्रतिनिधि को हिंदू चुनते थे। इन्हीं प्रतिनिधियों पर अमन-चैन कायम रखने की जिम्मेदारी रहती। इन असैनिक समितियों का मुसलमानों के हृदय पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। यहां भटियारपुर गांव का घटनाक्रम बहुत प्रासंगिक है, जहां एक मंदिर को तहस-नहस कर डाला गया था। गांधी जी के प्रभाव में मुस्लिम युवकों ने स्वयं उस मंदिर का पुनर्निर्माण किया और बापू ने अपने हाथों से वहां देव प्रतिमा स्थापित की। धीरे-धीरे तनाव कम हो रहा था। अब गांधी की चिंता हिंदू


14 - 20 अगस्त 2017

अपनी अंतरात्मा की पुकार पर 12 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी ने अंतिम आमरण उपवास की घोषणा कर दी। बापू ने कहा कि इस उपवास का अंत तभी होगा, ‘जब मैं संतुष्ट हो जाऊंगा कि सभी संप्रदायों के दिल अपने कर्तव्य बोध की भावना से और बिना किसी बाहरी दबाव के फिर से एक हो गए हैं’ स्त्रियों को लेकर थी। तमाम शारीरिक और मानसिक अत्याचार झेल चुकी इन स्त्रियों को उनके ही परिवार वाले पुनः स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। गांधी जी ने हिंदुओं को समझाया कि इन स्त्रियों की घर वापसी शर्मिंदगी नहीं, बल्कि गौरव करने योग्य बात होगी। कई हिंदू परिवार अपनी करनी पर लज्जित हुए और स्त्रियों को सम्मानपूर्वक अपने घरों में वापस ले आए। धीरे-धीरे तनाव में कमी आती जा रही थी। बापू इसके बाद बिहार जाना चाहते थे, जहां कौमी दंगे बहुत उग्र रूप ले चुके थे, लेकिन वे यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहते थे कि नोआखली फिर से सुलग न उठे। गांधी जी की दुविधा देखते हुए नोआखली के पुलिस अधीक्षक अब्दुल्ला ने वादा किया, ‘आपके रहते दंगे नहीं होंगे।’ बापू ने कहा, ‘तब ठीक है, अगर अब दंगे हुए तो गांधी तुम्हारे दरवाजे पर मर जाएगा।’ अब्दुल्ला गांधी जी का मंतव्य समझ गए और कहा, ‘मेरे जीते जी दंगे नहीं होंगे।’ गांधी जी भी संतुष्ट थे। पांच महीने नोआखली में रहने के बाद वे बिहार के लिए रवाना हो गए। एक बार बिहार दौरा 5 मार्च, 1947 को गांधी जी बिहार पहुंच गए। वही बिहार जहां 1916 में उन्होंने चंपारण में आंदोलन शुरू किया था। यही तो वह भूमि थी जिसने मोहनदास गांधी को महात्मा गांधी बनाया था। आज उसी बिहार को नोआखली और कलकत्ता में अपने हिंदू परिजनों की हत्या ने उकसा दिया था। समाचार पत्र आग में घी की तरह काम कर रहे थे। 6 नवंबर को नोआखली में गांधी की इस घोषणा के बाद कि जब तक बिहार का पालगपन बंद नहीं होता, वे हर रोज आधे दिन का उपवास रखेंगे, बिहार की हिंसा में एकदम से कमी आ गई थी। बिहार की हिंसा पर तो गांधी के नोआखली वाले उपवास ने ही काफी हद तक नियंत्रण कर लिया था, अब असल काम था उजड़े हुए घरों को फिर से बसाना। बिहार के लोगों की गांधी पर अटूट श्रद्धा थी, इसीलिए यहां का राहत कार्य नोआखली से अलग था। नोआखली में गांधी बहुत चौकन्ने और शांत थे, पर यहां उन्होंने अपने कांग्रेसी साथियों को फटकार लगाई और यहां तक कह दिया, ‘कांग्रेसी सत्ता पाकर सुस्त हो गए हैं, उनकी अहिंसा एशोआराम में डूबी जा रही है।’

उन्होंने शरणार्थी मुसलमानों से नोआखली के हिंदुओं की ही तरह बहादुरीपूर्वक अपने घरों को लौट जाने को कहा। मुसलमानों से अपील की कि वे नोआखली जाकर हिंदुओं का रक्षण करें, बिहार की रक्षा गांधी अपने प्राण देकर भी करेगा। उन्होंने मुसलमानों को राहत पहुंचाने के लिए चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कांग्रेस के स्वयंसेवकों ने गांव-गांव जाकर पुनर्निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। इसी बीच, 20 मार्च 1947 को बिहार पुलिस ने हड़ताल कर दी। बापू ने जैसे-तैसे जयप्रकाश नारायण के सहयोग से हड़ताल समाप्त करवाई। विस्थापित कैंपों का दौरा वे लगातार कर रहे थे, इन कैंपों के लिए उन्होंने एक लिखित नियमावली भी तैयार कर दी। गैर-सरकारी संगठनों का तौर-तरीका कैसा होना चाहिए, लोकतंत्र में मंत्री का क्या दायित्व है, ये सब बातें उन्होंने कांग्रेस मंत्रिमंडल को विस्तार से समझाईं। उधर मुस्लिम लीग से बराबर अनुरोध करते रहे कि वह पाकिस्तान दिवस मनाकर पंजाब और बंगाल को हिंसा की आग में न धकेलें। बिहार जैसे-तैसे पटरी पर आया था कि दिल्ली से सरदार पटेल की सूचना आ गई कि दिल्ली में आपकी सख्त जरूरत है। बापू दिल्ली पहुंच गए, पर दिल्ली में ज्यादा रूक न पाए।

करीब आ रहा था 15 अगस्त

भारत की आजादी और बंटवारे का दिन 15 अगस्त करीब आता जा रहा था। गांधी महसूस कर रहे थे कि लाल किले पर होने वाले आजादी के भव्य समारोह की बजाए नोआखली के आम आदमी को उनकी ज्यादा जरूरत है। वे 9 अगस्त को कलकत्ता पहुंच गए। कलकत्ते के मुसलमानों ने उन्हें रोक लिया, वे नोआखली नहीं जा सके। कलकत्ते की स्थिति बहुत गंभीर थी। वहां तो जैसे 15 अगस्त, 1946 के बाद से डायरेक्ट एक्शन कभी खत्म ही नहीं हुआ। कलकत्ते की गलियों और घरों में हिंदू-मुसलमानों ने सशस्त्र मोर्चे संभाल रखे थे। गांधी जी ने कलकत्ता की गलियों का दौरा शुरू कर दिया। बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सोहरावर्दी अब तक मुस्लिम लीग की राजनीति से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके गए थे। वे भी गांधी के साथ हो लिए। दोनों हैदर मेंशन

की टूटी-फूटी हवेली में रहकर शांति प्रयास करते रहे। जैसे-तैसे शांति स्थापित हो गई। 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता दिवस सौहार्दपूर्ण माहौल में मनाया गया। लेकिन यह शांति अस्थायी थी, ऐसा लगता है जैसे स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्रपिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने थोड़ी गम खा ली थी। 27 अगस्त तक पंजाब और सिंध से आने वाले हिंसा के समाचारों ने कलकत्ता में भी सांप्रदायिक उफान ला दिया। ऊपर से छाई हुई नकली शांति का गुब्बारा फूट गया। घटनाक्रम किसी तूफान की गति से आगे बढ़ा। 30 अगस्त को सोहरावर्दी पर कुपित भीड़ ने हैदर-मेंशन वाले गांधी के निवास पर धावा बोल दिया। सोहरावर्दी तो वहां थे नहीं, सो एक गुस्साए युवक ने अपनी लाठी गांधी जी पर ही भांज दी। सौभाग्य से वार खाली चला गया, बापू सुरक्षित बच गए। बापू के मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘यह क्या हो गया? 15 अगस्त की शाम झूठी थी।’ अब 78 साल के बूढ़े गांधी के पास सिर्फ अपनी देह बची थी, जिसे वे दांव पर लगा सकते थे। 1 सितंबर, 1947 को महात्मा ने आमरण उपवास का निर्णय कर लिया। आजाद भारत में गांधी का यह पहला उपवास था। माउंटबेल के प्रेस सलाहकार एलन कैंपबेल जॉनसन ने इस उपवास के बारे में लिखा, ‘गांधी के उपवास में लोगों के अंतर्मन को झकझोर देने की कैसी अद्भुत शक्ति है, इसे तो सिर्फ गांधी के उपवास का साक्षी ही समझ सकता है।’ उपवास का चमत्कारी प्रभाव पड़ा। फारवर्ड ब्लॉक के नेता शरत बोस जो काफी दिनों से गांधी से नाराज थे, उपवास के दूसरे दिन दौड़े चले आए। हिंदू महासभा के प्रमुख डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वादा किया कि कल से हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग के गार्ड शहर की गलियों में गश्त करेंगे। दोनों संप्रदायों के कट्टरपंथी गुटों ने अपने हथियार बापू के चरणों में डाल दिए और उपवास तोड़ने की प्रार्थना की। बापू ने कहा, ‘परिवर्तन हो रहा है, लेकिन अभी नहीं। जीने की लालसा करना ईश्वर से द्रोह होगा। अभी और दृढ़ता से शांति का काम करो।’ उपवास का तीसरा दिन था, बापू ने मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र घोष से कहा, ‘मेरी जान बचाने के लिए दबाव मत डालो। जब स्वेच्छा से, यथार्थ से दिल्ली में एक्य हो जाएगा तो ही जीना चाहूंगा, अन्यथा मृत्यु श्रेयस्कर है।’ बंगाल प्रचार विभाग के डायरेक्टर ने चाहा कि गांधी जी की उपवास मुद्रा का फोटो छापने से प्रचार कार्य में सहायता मिलेगी। बापू ने मना कर दिया, ‘लोगों की क्षणिक दया-माया के लिए मैं अपनी क्षीण मुद्रा से अपील नहीं करना चाहता हूं।’ उपवास के चौथे दिन सोहरावर्दी, हिंदू महासभा के प्रांतपति एसी चटर्जी और सरदार निरंजन सिंह तालीब ने गांधी जी को शहर में अमन-चैन बहाल होने की रिपोर्ट सौंपी और कहा कि अगर अब अशांति पैदा हुई तो वे तीन नेता स्वयं जिम्मेदार होंगे। मिशन कलकत्ता पूरा चुका था। समय भागा जा रहा ता, 30 जनवरी आने में अभी पांच महीने बाकी थे। बापू अब सरहदी प्रांत पंजाब पहुंचने को व्याकुल थे।

दिल्ली में बापू

9 सितंबर को बापू दिल्ली पहुंच गए। सरदार पटेल

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उन्हें लेने स्टेशन पर आए थे। देसी राजाओं की तिकड़मों और दिल्ली में दिन पर दिन बढ़ती जा रही शरणार्थियों की तादाद से निबटने में सरदार अकेले पड़ गए थे। सरदार ने बापू को बताया कि दिल्ली सुलग रही है और सेना के जोर पर मरघट जैसी शांति थोपी गई है। लेडी हार्डिंग अस्पताल के पास सेना और कट्टरपंथियों के बीच गोलीबारी चल रही है। गांधी समझ रहे थे कि दिल्ली की आग बुझाए बिना, भारत में कहीं भी स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती, लेकिन दिल्ली की स्थिति कलकत्ता से अलग थी। उनके साथ दिल्ली की गलियों में घूमने को न तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कद्दावर नेता थे और न ही यहां के मुसलमानों पर सोहरावर्दी का कोई प्रभाव था। कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उलझनों में फंसे थे। ऊपर से लाखों की संख्या में आए शरणार्थियों ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया था। गांधी जी ने अपनी प्रार्थना सभाओं में लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। शरणार्थी शिविरों का दौरा शुरू किया। इसी दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आए कुछ छात्रों ने बापू से निवेदन किया कि वे हिंदू शरणार्थियों की सेवा करना चाहते हैं। गांधी जी ने उन्हें समझाया कि यहां की सेवा दिखावटी होगी, असली सेवा तो तब होगी जब आप लोग पाकिस्तान जाकर वहां के हिंदुओं का कत्लेआम रुकवाएं। एक अन्य शरणार्थी शिविर में जब एक सिख ने अपनी बहू-बेटियों पर हुए नृशंस अत्याचारों की व्यथा सुनाई तो गांधी ने कहा कि तुम्हारी मर्दांनगी पर धिक्कार है, तुम्हें तो अपनी स्त्रियों को बचाते हुए मर जाना चाहिए था। 14 सितंबर को दिल्ली में भारी बारिश हुई। थोड़ी ही दिनों में सर्दियां आने वाली थी। गांधी जी शरणार्थियों को समझाने लगे कि उन्हें सरकार का मोहताज नहीं रहना चाहिए। वे उन्हें ठंड से बचने के नुस्खे भी बताते चलते कि कैसे कंबल के ऊपर अखबार रख लेने से ठंड और ओस से बचा जा सकता है आदि। 15-20 दिन के प्रयासों से ऊपरी शांति स्थापित होने लगी परंतु दिलों के फफोले तो अब भी जल रहे थे। भारत और पाकिस्तान के बीच 55 करोड़ रुपए देने का विवाद उलझता जा रहा था। चारों तरफ फैल रही हिंसा की लपटों ने सत्य और अहिंसा के साधक गांधी को हिलाकर रख दिया। कोई नया आंदोलन वे छेड़ नहीं सकते थे, आखिर अपने ही लोगों की सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन करे भी तो कैसे? उनकी 125 वर्ष तक जीने की अभिलाषा समाप्त हो चुकी थी। अपनी अंतरात्मा की पुकार पर 12 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी ने अंतिम आमरण उपवास की घोषणा कर दी। बापू ने कहा कि इस उपवास का अंत तभी होगा, ‘जब मैं संतुष्ट हो जाऊंगा कि सभी संप्रदायों के दिल अपने कर्तव्य बोध की भावना से और बिना किसी बाहरी दबाव के फिर से एक हो गए हैं। ईश्वर को अपना सर्वोच्च संचालक और साक्षी मानते हुए, मैंने महसूस किया कि अवश्य ही, मुझे यह निर्णय, बिना किसी से परामर्श लिए करना है।’ महात्मा गांधी का यह उपवास आजाद भारत की सबसे बड़ी घटना है। इस उपवास का प्रत्येक दिन अपने आप में युगांतकारी था। कुल छह दिन चले इस उपवास ने ही वास्तव में आज के अखंड और मजबूत भारत की नींव डाली थी।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

बलिदान का स्मारक सेलुलर जेल

काल कोठरी की सजा के लिए विशेष तरह की कोठरियों के इंतजाम वाली सेलुलर जेल का नाम भारत की आजादी के संघर्ष के साथ अमिट रूप से जुड़ा है

एक नजर

11 फरवरी, 1979 को सेलुलर को जेल राष्ट्रीय स्मारक घोषित

एसएसबी ब्यूरो ‘ओ, मेरी प्रिय मातृभूमि, तुम क्यों आंसू बहा रही हो? विदेशियों के शासन का अंत अब होने को है! वे अपना सामान बांध रहे हैं! राष्ट्रीय कलंक और दुर्भाग्य के दिन अब लदने ही वाले हैं! आजादी की बयार अब बहने को है, आजादी के लिए तड़प रहे हैं बूढ़े और जवान! जब भारत गुलामी की बेड़ियां तोड़ेगा, ‘हरि’ भी अपनी आजादी की खुशियां मनाएगा!’ ये पंक्तियां हैं बाबू राम ‘हरि’ की। वे पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादियां के रहने वाले थे और ‘स्वराज्य’ के संपादक थे। उन्हें अपने तीन संपादकीयों को ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा ‘राजद्रोह’ करार दिए जाने के कारण अंडमान की सेलुलर जेल में 21 वर्ष की कैद हुई थी। दरअसल, भारत की आजादी का ख्वाब संजोने वाले लोगों को ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा ऐसे ही बेरहमी से कुचला गया था। सेलुलर जेल, बलिदान की ऐसी ही एक वेदी थी। काल कोठरी की सजा के लिए इस विशेष तरह की कोठरियों के इंतजाम वाली इस जेल का नाम भारत की आजादी के संघर्ष के साथ अमिट रूप से जुड़ा हुआ है।

भारतीय बेस्टिल

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उचित रूप से ही सेलुलर जेल को ‘भारतीय बेस्टिल’ कहकर पुकारा था। दूसरे

विश्व युद्ध के दौरान अंडमान पर जापानियों द्वारा जीत हासिल किए जाने के बाद 8 नवंबर, 1943 को जारी वक्तव्य में नेताजी ने कहा था, ‘जिस तरह फ्रांस की क्रांति के दौरान सबसे पहले पेरिस के बेस्टिल के किले को मुक्त कराकर, वहां बंद राजनीतिक कैदियों की रिहाई कराई गई थी, उसी तरह भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान अंडमान को भी, जहां भारतीय कैदी यातनाएं भोग रहे हैं, सबसे पहले मुक्त कराया जाना चाहिए।’ ब्रिटिश उपनिवेश भारत और बर्मा में संगीन अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए कैदियों के लिए बैंकोलिन, मल्लका, सिंगापुर, अराकान और तेनास्सेजरिम में कैदियों की बस्तियां स्थापित की गईं। अंडमान की जेल इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी और भारतीय सरजमीं पर स्थापित होने वाली अपने किस्म की पहली जेल थी। हालांकि, इससे काफी पहले 1789 में ही पोर्ट कॉर्नवालिस, उत्तरी अंडमान में कैदियों की बस्ती स्थापित की गई थी, लेकिन सात साल बाद उसे खाली कर दिया गया था। 10 मार्च, 1858 को 200 ‘गंभीर राजनीतिक अपराधियों’ के पहले जत्थे ने दक्षिण अंडमान में पोर्ट ब्लेयर बंदरगाह के अंतर्गत चाथलाम द्वीप के छोर

पर कदम रखा। 216 कैदियों का दूसरा जत्था पंजाब सूबे से आया। 16 जून, 1858 तक यहां पहुंचने वाले कैदियों की कुल तादाद 773 हो गई, 64 कैदियों ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था, फरार होने और दोबारा हाथ न आने वाले कैदियों की संख्या 140 थी, एक कैदी ने आत्महत्या की थी, फरार होने के बाद दोबारा पकड़े जाने पर फांसी पर लटकाए गए कैदियों की संख्यात 87 थी, यह जगह छोड़ने वाले कैदियों की संख्या 481 थी। 28 सितंबर, 1858 तक यहां करीब 1330 कैदी पहुंच चुके थे। 1858 और 1860 के बीच देश के कोने-कोने से लगभग 4,000 स्वाधीनता सेनानियों को अंडमान भेजा जा चुका था। दुखद बात यह है कि उनमें से अधिकांश ने जीने और कार्य करने की बेहद पीड़ादायक परिस्थितियों के कारण दम तोड़ दिया। फरार होकर जंगल की ओर भागने वालों में से कोई भी जीवित न बच सका। बाद में आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों को भी कड़ी सजा के लिए यहीं भेजा जाने लगा। एक सदी के बाद 15 अगस्त, 1957 को पोर्ट ब्लेयर में ‘शहीद स्तंभ’ प्राण न्यौछावर करने वाले गुमनाम शहीदों को समर्पित किया गया। ब्रिटिश हुक्मरानों को डर था कि राजनीतिक कैदी

सेलुलर जेल में बंद रहे हमारे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के अमूल्यी बलिदान की याद और सम्मा न में 11 फरवरी, 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा इसे राष्ट्रीय स्मारक के रूप में राष्ट्र को समर्पित किया गया

1858 में स्वाधीनता सेनानियों की पहली खेप चाथलाम द्वीप पहुंची 1858-1860 के बीच 4,000 कैदियों को अंडमान भेजा गया

दूसरे कैदियों के बीच अपने क्रांतिकारी विचारों को फैलाने लगेंगे और उनके समूह के साथ घुलने-मिलने लगेंगे। लिहाजा, उन्होंने एक दूर-दराज के इलाके में काल कोठरियां बनाने का फैसला किया। इस प्रकार 1906 में कुख्यात सेलुलर जेल पूर्ण हो गई, जिसकी काल कोठरियों की संख्या बढ़कर 693 हो गई। जैसेजैसे स्वाधीनता संग्राम जोर पकड़ने लगा, 1889 में पूना से 80 क्रांतिकारियों को निर्वासित कर यहां भेजा गया। जैसे-जैसे स्वाधीनता संग्राम में उफान आया, 132 लोगों (1909- 1921), उसके बाद (193238) में 379 लोगों को यहां भेजा गया। विभिन्न तरह के षडयंत्र के मामलों में शामिल राजनीतिक कैदियों को सेलुलर जेल भेजा गया। इनमें से कुछ मामलों में अलीपुर बम मामला (माणिकटोला षडयंत्र मामले के नाम से भी चर्चित), नासिक षडयंत्र मामला, लाहौर षडयंत्र मामला (गदर पार्टी के क्रांतिकारी), बनारस षडयंत्र मामला, चटगांव शस्त्रशाला मामला, डेका षडयंत्र मामला, अंतर-प्रांतीय षडयंत्र मामला, गया षडयंत्र मामला और बर्मा षडयंत्र मामला आदि शामिल हैं। इनके अलावा, वहाबी विद्रोहियों, मालाबार तट के मोपला प्रदर्शनकारियों, आंध्र के रंपा क्रांतिकारियों, मणिपुर स्वाधीनता सेनानियों, बर्मा के थावरडी किसानों को भी अंडमान भेजा गया।


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान

जेल में जीवन

सेलुलर जेल में जीवन विशेषकर शुरुआती कैदियों के लिए बेहद अमानवीय और बर्बर था। राजनीतिक कैदियों को बहुत कम भोजन और कपड़े दिए जाते थे और उनसे कड़ी मशक्कत कराई जाती थी। ऐसी कठोर मेहनत की आदत न होने के कारण वे अपना रोज के काम का कोटा पूरा नहीं कर पाते थे, जिसके कारण उन्हें गंभीर यातना भुगतनी पड़ती थी। ऐसे व्यवहार का मकसद उन राजनीतिक कैदियों को अपमानित करना और उनकी इच्छा शक्ति को तार-तार करना था। उन्हेंं कोल्हू पर जोता जाता था, उनसे नारियल छिलवाए जाते थे, नारियल के रेशों की पिसाई कराई जाती थी, रस्सी बनवाई जाती थी, पहाड़ तोड़ने के लिए भेजा जाता था, जंगल साफ कराए जाते थे, सड़कें बनवाई जाती थी आदि। सबसे भयानक काम ‘मोटे सान की कटाई’ बहुत अधिक अम्लता वाली रामबन घास, ‘रस्सी बनाने की कला’ थी, जिसके बाद लगातार खुजली और रक्तस्राव जैसे तकलीफें होती थीं। जुलाई, 1937 में जब भारत के सात सूबों में कांग्रेस मिनिस्ट्री का गठन हुआ, तो सेलुलर जेल के राजनीतिक कैदियों को मुख्य भूमि में भेजे जाने की मांग जोर पकड़ने लगी। जब बार-बार की अपीलों और प्रदर्शनों का कोई नतीजा न निकला तो उनमें से 183 लोग 24 जुलाई, 1937 से 37 दिन की भूख हड़ताल पर बैठ गए। इससे उनके समर्थन की लहर उठी और मुख्य जेलों में बंद उनके साथियों ने भी भूख हड़ताल शुरू कर दी। देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। आखिरकार अंग्रेजों को झुकना पड़ा और 22 सितंबर 1937 को स्वाधीनता सेन‍ ानियों का पहला जत्था अंडमान से रवाना हुआ। आखिरी जत्था भी 18 जनवरी, 1938 तक अंडमान से रवाना हो गया। आपराधिक मामलों के दोषियों की वहां से रवानगी 1946 तक जारी रही, जब कैदियों की इस बस्ती को बंद कर दिया गया।

राष्ट्रीय स्मारक

इस जेल में अनेक करिश्माई हस्तियों को बंदी बनाकर रखा गया। उनमें अन्य लोगों के अलावा सावरकर बंधु, मोतीलाल वर्मा, बाबू राम हरि, पंडित परमानंद, लढ्डा राम, उलास्कर दत्त, बरिन कुमार घोष, भाई परमानंद, इंदु भूषण रॉय, पृथ्वी सिंह आजाद, पुलिन दास, त्रैलोकीनाथ चक्रवर्ती, गुरुमुख सिंह शामिल हैं। यह फेहरिस्त लंबी और विशिष्ट है। सेलुलर जेल में बंद रहे हमारे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के अमूल्य बलिदान की याद और सम्मान में 11 फरवरी, 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा इसे राष्ट्रीय स्मारक के रूप में राष्ट्र को समर्पित किया गया। वहां का संग्रहालय और साउंड एंड लाइट शो जेल के कठिन जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं, जहां उन लोगों ने सिर्फ इसीलिए कुर्बानियां दी, ताकि हम आजादी और शांति के साथ जी सकें। सेलुलर जेल यूनेस्को की विश्‍व धरोहर की संभावित सूची में शामिल हैं, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी तुलना में कोई और स्थान नहीं है। किसी जमाने में भयावह स्थान रही यह सेलुलर जेल, अब एक राष्ट्रीय स्मारक बन चुकी है, जो बलिदान का मूर्त रूप है, एक ऐसा स्थान है, जो हमें याद दिलाता है कि हमें आजादी बड़ी मुश्किलों से मिली है।

14 - 20 अगस्त 2017

• भीकाजी रुस्तम कामा पहली ऐसी शख्स थीं, जिन्होंने 22 अगस्त, 1907 को जर्मनी में तिरंगा फहराया था, लेकिन इस तिरंगे में और भारत के राष्ट्रीय ध्वज में थोड़ा अंतर था। भीकाजी कामा के झंडे में सबसे ऊपर हरा रंग, बीच में सुनहरा केसरी और सबसे नीचे लाल रंग था। इस झंडे पर ‘वंदे मातरम’ लिखा था। •

भारत 15 अगस्त को आजाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर ‘जन-गण-मन’ 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया। इसी तरह हर स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहराते हैं, लेकिन 15 अगस्त, 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। लोकसभा सचिवालय के एक शोध पत्र के मुताबिक नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।

• देश में गणतंत्र स्थिर रहे, इसीलिए उज्जैन के ज्योतिष सूर्यनारायण व्यास ने पंचांग देखकर आजादी का मुहूर्त निकाला था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर उन्होंने बताया कि अगर आजादी 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि 12 बजे ली गई, तो हमारा गणतंत्र अमर रहेगा। असल में 1947 में जब यह तय हो गया कि अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए तैयार हैं, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गोस्वामी गणेशदत्त महाराज के माध्यम से उज्जैन के पंडित सूर्यनारायण व्यास को बुलावा भेजा। पंडित व्यास ने पंचांग देखकर बताया कि आजादी के लिए सिर्फ दो ही दिन शुभ हैं। 14 और

स्वाधीनता का भूगोल

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स्वतंत्रता के समय भारत के अंतर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे। पहला, 'ब्रिटिश भारत के क्षेत्र', ये लंदन के इंडिया ऑफिस तथा भारत के गवर्नर-जनरल के सीधे नियंत्रण में थे। दूसरा, 'देसी राज्य' और तीसरा, फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र (चंदन नगर, पांडिचेरी, गोवा आदि)।

1947 के भारत विभाजन के दौरान ही ब्रिटिश भारत में से सीलोन (अब श्रीलंका) और बर्मा (अब म्यांमार) को भी अलग किया गया, लेकिन इसे भारत के विभाजन में नहीं शामिल किया जाता है, जबकि अखंड भारत में ये सभी शामिल थे।

• बहुत से विद्वानों का मत है कि ब्रिटिश सरकार ने विभाजन की प्रक्रिया को जान-बूझकर ठीक ढंग से नहीं संभाला। चर्चिल और माउंटबेटन ने मिलकर भारतीय राजनीतिज्ञों में पहले फूट डाली और फिर स्वतंत्रता की घोषणा की।

भारत का विभाजन माउंटबेटन योजना (3 जून प्लान) के आधार पर तैयार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के आधार पर किया गया। इस अधिनियम में कहा गया कि 15 अगस्त 1947 को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगे और उनको ब्रितानी सरकार सत्ता सौंप देगी।

• आजादी के बाद पुर्तगाल ने अपने संविधान में संशोधन करके गोवा को अपना हिस्सा घोषित कर दिया था। फिर 19 दिसंबर 1961 को भारतीय फौज ने गोवा पर कब्जा करके उसे भारत का हिस्सा बनाया। • 15 अगस्त 1947 को, 1 रुपया 1 डॉलर के बराबर था और सोने का भाव 88 रुपए 62 पैसे प्रति 10 ग्राम था।

• आजादी के समय भारतवर्ष में 662 रियासतें थीं, जिसमें से 565 रजवाड़े ब्रिटिश शासन के अंतर्गत थे।

आजादी का मुहूर्त 15 अगस्त। इसमें एक दिन पाकिस्तान को आजाद घोषित किया जा सकता है और एक दिन भारत को। उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत की आजादी के लिए मध्यरात्रि 12 बजे यानी स्थिर लग्न नक्षत्र का समय सुझाया, ताकि देश में लोकतंत्र स्थिर रहे। इतना ही नहीं, पंडित व्यास के कहने पर आजादी के बाद देर रात संसद को धोया भी गया था, क्योंकि ब्रिटिश शासकों के बाद अब यहां भारतीय

बैठने वाले थे। धोने के बाद उनके बताए मुहूर्त पर गोस्वामी गिरधारीलाल ने संसद की शुद्धि करवाई थी।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

वित्तीय अनुशासन का राष्ट्रीय पहरुआ रिजर्व बैंक

भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत संस्थानों में शुमार किए जाने वाले एक सुदृढ़ संस्थान का का नाम है भारतीय रिजर्व बैंक

एक नजर

भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में केंद्रीय बैंक के रूप में हुई नवंबर 1997 में एशियाई मुद्रा संकट का सफलतापूर्वक सामना

2000-2008 के मध्य बैंकिंग पर्यवेक्षण का काम सफलतापूर्वक संभाला

दे

एसएसबी ब्यूरो

श ने कुछ महीने पहले ही नोटबंदी की बड़ी वित्तीय कवायद देखी। भारत जैसे विशाल देश में इतनी बड़ी कवायद अगर सफल और सुचारु रही तो इसके पीछे देश के केंद्रीय बैंक की नियामक योग्यता है। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में देश के केंद्रीय बैंक के रूप में हुई थी। प्रथम गोलमेज सम्मेलन की उप-समिति ने साफ शब्दों में कहा था कि सुदृढ़ नींव और किसी भी राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त एक रिजर्व बैंक की स्थापना करने की नितांत आवश्यकता है, जिसके लिए हमें कोई भी कसर नहीं छोड़नी चाहिए। उपसमिति ने इसके साथ ही यह भी कहा था कि रिजर्व बैंक को मुद्रा के साथ-साथ मुद्रा विनिमय के प्रबंधन की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। सर ओसबोर्न स्मिथ को भारतीय रिजर्व बैंक के प्रथम गवर्नर के रूप में इसकी कमान सौंपी गई थी। सर स्मिथ की नियुक्ति करते समय यह सुनिश्चित करने की भरसक कोशिश की गई थी कि भारतीय रिजर्व बैंक के प्रथम गवर्नर एक ऐसे व्यक्ति होंगे जिन पर बैंक ऑफ इंग्लैंड पूर्ण भरोसा कर सकता है। यही नहीं, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भारतीय रिजर्व बैंक के प्रथम गवर्नर से निर्विवाद सहयोग मिलने की उम्मीद

भी कर रखी थी। हालांकि, सर ओसबोर्न स्मिथ बैंक ऑफ इंग्लैंड की इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे। सर ओसबोर्न स्मिथ ने वर्ष 1936 में दो टूक शब्दोंी में यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि सरकार आरबीआई पर हावी होने की अनुचित कोशिश कर रही है। सर ओसबोर्न स्मिथ के इस्तीफे के अनेक कारण थे। इनमें से एक वजह तो यह थी कि सर स्मिथ तुनकमिजाज थे। हालांकि, गंभीर वैचारिक मतभेद को सर स्मिथ के इस्तीफे का असली कारण बताया जाता है जो बैंक रेट को कम करने एवं बैंक के निवेश के प्रबंधन को लेकर उनके और सदस्य (वित्त) के बीच उत्पन्न हो गए थे। 11 अगस्त, 1943 को सर सी.डी.देशमुख, आईसीएस, भारतीय रिजर्व बैंक के प्रथम भारतीय गवर्नर नियुक्त किए गए। उस समय सर देशमुख की आयु सिर्फ 47 साल थी। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की स्थापना

के लिए 1944 में आयोजित ब्रेटन वुड्स कांफ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिनमें भारत एक मूल सदस्य के रूप में शामिल हुआ। आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया और इसके साथ ही उसमें सरकारी स्वामित्व सुनिश्चित किया गया। 1 जुलाई 1949 को सर बेनेगल रामा राव आरबीआई के गवर्नर नियुक्त किए गए। वर्ष 1951 में आरबीआई ने ब्याज दर को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया, जो वर्ष 1935 से ही अपने पुराने स्तर पर टिकी हुई थी। 12 दिसंबर, 1956 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आरबीआई के गवर्नर सर बेनेगल रामा राव द्वारा वित्त विधेयक पर आरबीआई के निदेशकों को भेजे गए एक विशेष नोट पर अपनी नाराजगी जताते हुए उन्हें एक पत्र लिखा। प्रधानमंत्री ने साफ-साफ शब्दों में लिखा, ‘इस नोट को पढ़कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ है। इस नोट में लिखी बातों को तो छोड़ ही दें, मुझे तो

11 अगस्त, 1943 को सर सी.डी.देशमुख, आईसीएस, भारतीय रिजर्व बैंक के प्रथम भारतीय गवर्नर नियुक्त किए गए। उस समय सर देशमुख की आयु सिर्फ 47 साल थी

समग्र नजरिया ही अनुचित प्रतीत हो रहा है। मुझे तो यह केंद्र सरकार के खिलाफ बगावती तेवर जैसा प्रतीत हो रहा है। मौद्रिक नीतियों को निश्चित तौर पर उन व्या पक नीतियों के अनुरूप रहना चाहिए जिसे कोई भी सरकार अपनाती है। इन व्यापक नीतियों के दायरे में रहते हुए ही रिजर्व बैंक को कोई सलाह देनी चाहिए। रिजर्व बैंक सरकार के मुख्य उद्देश्य और नीतियों को चुनौती नहीं दे सकता है।’ 7 जनवरी, 1957 को सर बेनेगल रामा राव ने आरबीआई के गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया। जुलाई 1966 में, भारत से होने वाले निर्यात की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से घरेलू मूल्यों को बाह्य कीमतों के अनुरूप करने के लिए रुपए का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप एक अमेरिकी डॉलर की कीमत जो पहले 4.75 रुपए के बराबर थी वह बढ़कर 7.50 रुपए हो गई। इसी तरह एक पौंड स्टर्लिंग की कीमत जो पहले 13.33 रुपए के बराबर थी वह बढ़कर 21 रुपए हो गई। आगे चलकर सरकार ने एक योजना अवकाश घोषित किया। इसके बाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया जिसके तहत जुलाई 1969 में सरकार ने बैंकिंग कंपनी (उपक्रमों का अधिग्रहण एवं अंतरण) अध्यादेश 1969 के तहत 14 प्रमुख भारतीय अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण का अनुमोदन कर दिया। इसके पश्चात जनवरी 1976 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक विधेयक पारित होने के बाद ग्रामीण ऋण का प्रवाह बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) की परिकल्पना सरकार द्वारा प्रायोजित, क्षेत्र विशेष आधारित एवं ग्रामीण उन्मुख वाणिज्यिक बैंकों के रूप में की गई। 1979-80 में भुगतान संतुलन की स्थिति में व्यापक बदलाव देखने को मिला। महंगाई दर कुछ ही समय में 3 प्रतिशत से छलांग लगाकर 22 प्रतिशत के अप्रत्याशित उच्च स्तर पर पहुंच गई। यही नहीं, विदेश में निर्यात-आयात मूल्यों की स्थिति भी


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष काफी बिगड़ गई। इस बीच, भारत ने आईएमएफ से 5 अरब एसडीआर का ऋण देने का अनुरोध किया। हालांकि, आईएमएफ की ऋण संबंधी शर्तें काफी कठोर थीं। आईएमएफ के ऋण कार्यक्रम के तहत चालू खाता घाटे में जीडीपी का 2 प्रतिशत और विदेशी वाणिज्यिक ऋणों की सीमा कम करने पर विशेष जोर दिया गया। इस ऋण कार्यक्रम की अवधि (नवंबर 1981 से लेकर फरवरी 1983 तक) के दौरान आरबीआई ने अनेक मुद्राओं के सापेक्ष रुपए के क्रमिक अवमूल्यन की नीति अपनाई। भारत ने अपनी सहमति के अनुरूप ही इस संदर्भ में प्रदर्शन संबंधी सभी मानदंडों को अच्छीन तरह से पूरा किया और प्रत्येक धन निकासी समय पर ही की। 3 साल बाद भारत ने 5 अरब एसडीआर में से 3.9 अरब एसडीआर की निकासी की। इसके पश्चारत 1.1 अरब एसडीआर की निकासी ही शेष रह गई थी। भारत एक बार फि‍र वर्ष 1990 तक गंभीर आर्थिक संकट के कगार पर पहुंच गया था। 27 अगस्त, 1991 को वित्त मंत्री ने आईएमएफ के प्रबंध निदेशक को 1656 मिलियन एसडीआर की राशि के बराबर 18 महीने की आपातकालीन या तात्कालिक व्यवस्था करने के लिए एक पत्र लिखा। इसके साथ ही आर्थिक नीतियों पर एक नोट भी पेश किया गया जिसमें वर्ष 1991-92 और वर्ष 1992-93 के दौरान भारत सरकार द्वारा उठाए जाने वाले आर्थिक कदमों का उल्लेख था। इतना ही नहीं, सरकार ने एक व्यापक संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम को अपनाने की अपनी इच्छा भी जता दी जिसे विस्तारित कोष सुविधा के तहत की गई विशेष व्यवस्था के अंतर्गत आवश्यक संबल या समर्थन प्राप्त था। नवंबर 1997 में आरबीआई को एशियाई मुद्रा संकट से निपटने की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। इसे ध्यान में रखते हुए आरबीआई ने उत्पादक क्षेत्रों में ऋण की उपलब्धता को प्रभावित किए बिना ही बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अधिशेष या अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने के लिए अनेक कदम उठाए। उधर, वर्ष 2001 तक आरबीआई मुद्रा बाजार का नियामक बन गया। सरकार द्वारा बाजार से ली गई उधारियों की बदौलत बजट घाटे के स्वत: मुद्रीकरण को चरणबद्ध ढंग से समाप्त कर दिया गया। रुपए को चालू खाते में पूरी तरह से परिवर्तनीय कर दिया गया। 2000 से लेकर वर्ष 2008 तक की अवधि के दौरान आरबीआई ने बैंकिंग पर्यवेक्षण का काम सफलतापूर्वक संभाला। आरबीआई ने वित्तीय क्षेत्र पर करीबी नजर रखने के लिए एक आधुनिक भुगतान एवं निपटान प्रणाली को अपनाया। गलतियां करने वाले बैंकों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की गई। आरबीआई ने कमजोर बैलेंस शीट वाले बैंकों का विलय मजबूत बैंकों में करने पर जोर दिया, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निजी क्षेत्र का कोई भी ऐसा बैंक न हो, जो आरबीआई की पूंजी पर्याप्त आवश्यकताओं को पूरा न करता हो। 1935 से ही भारतीय रिजर्व बैंक सार्वजनिक नीति और आर्थिक चिंतन के मामले में सबसे आगे रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत संस्थानों में शुमार किए जाने वाले एक सुदृढ़ संस्थान का प्रतिनिधित्व करता है।

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इस दिन के कई अफसाने 15 अगस्त, 1947

भारत का स्वाधीनता आंदोलन जब 15 अगस्त, 1947 को अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचा तो इसके साथ ही देश एक नए युग में प्रवेश कर गया। इतिहास में ये घटनाक्रम सुनहरे पन्नों पर अंकित हैं। 15 अगस्त को 32 करोड़ लोगों ने आजादी की सुबह देखी थी। आज हमारा देश जनसंख्या ही नहीं, बल्कि विकास के मामले में भी काफी आगे निकल गया है। पर हमारे लिए यह जरूरी है कि हम देश की स्वाधीनता से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जानें-समझें

महात्मा गांधी

• महात्मा गांधी आजादी के दिन दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे, जहां उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन भी किया। गौरतलब है कि जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आजाद होगा तो जवाहर लाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को पत्र भेजा। इस पत्र में लिखा था, ‘15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा। आप राष्ट्रपिता हैं। इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें।’ गांधी ने इस खत का जवाब भिजवाया, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं। ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं। मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा।’ •

• भारत में ब्रिटिश शासन का अंतिम वायसराय होने की वजह से लॉर्ड माउंटबेटन को भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में स्वतंत्रता दिवस से जुड़े आयोजनों में शामिल होना था। किसी भी प्रकार की असुविधा से बचने के लिए माउंटबेटन ने 14 अगस्त के दिन को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित कर दिया था और 15 अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस घोषित किया। • भारत के तत्कालीन वायसराय

गांधी जी ने स्वतंत्रता दिवस के उपहार के रूप में नेहरू और पटेल को दूत के हाथों एक सूखा पत्ता भिजवाया था। आजादी के दिन पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री गांधी जी का आशीर्वाद लेने आए, तब गांधी जी ने उन्हें विनम्र रहने और गरीबों की सेवा करने को

लॉर्ड माउंटबेटन के प्रेस सचिव कैंपबेल जॉनसन के मुताबिक मित्र देश की सेना के सामने जापान के समर्पण की दूसरी वर्षगांठ 15 अगस्त को पड़ रही थी, इसीलिए इसी दिन भारत को आजाद करने का फैसला हुआ। 15 अगस्त, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने दफ्तर में काम किया। दोपहर में नेहरु ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डन में एक सभा को संबोधित किया।

कहा था। • गांधी और देश की आजादी से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जवाहर लाल नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण 'ट्रायस्टविद डेस्टनी' 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) से दिया था। दिलचस्प है कि तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे। रही बात बापू की तो भले इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी जी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे। • डेविड थोरो की किताब के अनुसार किसी को भी टैक्स नहीं भरना चाहिए। इससे महात्मा गांधी काफी प्रभावित हुए थे। उन्होंने इसी किताब में उल्लेखित तरीकों का अनुसरण भारत के स्वतंत्रता संग्राम में किया था। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और नमक पर लगने वाले कर का विरोध करना, जिसके परिणामस्वरूप उनके अनुयायी स्वयं नमक बनाने के लिए प्रेरित हुए, ऐसे ही कुछ उदाहरण थे।

लॉर्ड माउंटबेटन


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

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देश में फिर खादी की वादी खादी ग्रामोद्योग

वित्त वर्ष 2016-17 में खादी उत्पाादों की बिक्री करीब 33 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ 2,005 करोड़ रुपए के स्तरर पर पहुंच गई, जबकि इससे पिछले साल यह 1,510 करोड़ रुपए रही थी

एक नजर

खादी और ग्राम उद्योग आयोग की स्थापना 1957 में हुई थी

इस समय देश में 1.42 लाख बुनकर और 8.62 लाख कातने वाले कारीगर 2018-19 के अंत तक 5,000 करोड़ रुपए की बिक्री का लक्ष्य

एसएसबी ब्यूरो

पनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में महात्मा गांधी ने कहा है, ‘1908 में ‘हिंद स्वराज’ में जब मैंने चरखे या हथकरघे को भारत में मुफलिसी को दूर करने की रामबाण दवा बताया था तो मुझे याद नहीं कि तब तक मैंने कभी इन्हें देखा था। असल में 1915 में जब मैं दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटा तब भी मैंने चरखा नहीं देखा था। 1917 में मेरे गुजराती मित्र मुझे भरुच शिक्षा सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए वहां लेकर गए। यहीं मेरी मुलाकात एक विलक्षण महिला गंगा बेन मजूमदार से हुई, जिन्होंने ईमानदारी से चरखे की तलाश लगातार जारी रखने

का वचन लेकर मेरा बोझ हल्का कर दिया।’ साफ है कि जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने उससे पूर्व चरखा देखा तक नहीं था। अलबत्ता स्वदेशी आंदोलन के दौरान वह राष्ट्रीय जीवनशैली का अनुसरण करते हुए बड़े मनोयोग से चरखा चलाने लगे थे।

समय के चक्र के साथ एक समय ऐसी भी आया जब खादी की चमक फीकी पड़ने लगी। मगर आज खादी एक बार फिर फैशन में है। पिछले तीन वर्षों में खादी की बिक्री के आंकड़ों के भारी-भरकम पिटारे को खंगालते हुए खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआइसी) ने बताया है कि वित्तय वर्ष 2016-17

अपनी कुदरती रंगत और अनगढ़-सी बुनावट वाले खादी के धागों से बने वस्त्र एक बार फिर तब से लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं जब तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी पर अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में खादी का जिक्र किया था

में खादी उत्पादों की बिक्री करीब 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 2,005 करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गई जबकि इससे पिछले साल यह 1,510 करोड़ रुपए रही थी। ब्रिकी के आंकड़ो में जबरदस्त उछाल को देखकर आलोचकों के मन में भले ही संशय हो, लेकिन वस्तु स्थिति और वास्‍तविकता का अनुमान किसी भी खादी भंडार या खादी बिक्री केंद्र पर खरीदारी के लिए आए लोगों की उमड़ती भीड़ और उनके फूट फॉल्सड के आंकड़ो से लगाया जा सकता है। अपनी कुदरती रंगत और अनगढ़-सी बुनावट वाले खादी के धागों से बने वस्त्र एक बार फिर तब से लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं जब तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी पर अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में खादी का जिक्र किया था। जाहिर है उन्होंने अपने भाषण में खादी के प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ा। प्रधानमंत्री हमेशा लोगों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने मित्रों को उपहार में फूलों का गुलदस्ता भेंट करने की बजाय खादी की बनी वस्तुएं और पुस्तकें दें, क्योंकि फूल तो कुछ ही देर में मुरझा कर नष्ट हो जाते हैं। वे केंद्र, राज्य सरकारों और आम लोगों को इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि खादी को राष्ट्रीयता की भावना से बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हाल में खादी और ग्राम उद्योग आयोग ने एक बयान में कहा था, ‘2016-17 में खादी उत्पादों की बिक्री में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया। हमें सरकारों, कंपनियों, स्कूल-कालेजों और राज्य सरकारों आदि की तरफ से भारी-भरकम ऑर्डर मिल रहे हैं। 2018-19 के अंत तक हम 5,000 करोड़ रुपए की बिक्री के लक्ष्य को हासिल कर लेंगे।’ खादी और ग्राम उद्योग आयोग अपने उत्पा5दों की विदेशों में बिक्री बढ़ाने के लिए निर्यात प्रकोष्ठों की स्थापना भी कर रहा है। खादी के बारे में आम धारणा है कि यह महात्मा गांधी की गौरवशाली विरासत है और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का सशक्त माध्यम रही है। यह हमारी ‘नैतिकता


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

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प्रधानमंत्री की अपील के बाद अक्तूबर 2014 से मार्च 2015 तक खादी की बिक्री में 17.55 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई।

और जातीयता’ दोनों से जुड़ी है। इसकी सबसे बड़ी खूबी जिसकी वजह से यह बिकती है, वह यह है कि यह कुदरती है, हाथ से तैयार की जाती है, पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल है, जैव-अपघटनीय (यानी सड़कर नष्ट हो जाने वाली) है और इस रेशे को बनाने में किसी के शोषण का सहारा नहीं लिया जाता। खादी एक ऐसा कपड़ा है जो हाथ से काते गए धागे से ही बनाया जाता है। इसे बनाने में सूत, ऊन और रेशम का इस्तेमाल किया जाता है। धागे में घुमाव की दिशा से खादी की पहचान की जा सकती है। खादी के धागे में घुमाव की दिशा अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर की तरह होती है जिसे आम तौर पर बांईं ओर का या घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा का घुमाव माना जाता है। इस समय देश में 1.42 लाख बुनकर और

8.62 लाख कातने वाले कारीगर हैं। इनमें से बहुत से अपने हुनर के लिए अच्छे मेहनताने की मांग करते हैं। एक अनुमान के अनुसार 9.60 लाख चरखों और 1.51 लाख करघों में खादी बनती है। अधिकारियों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों में खादी और ग्राम उद्योंगों में रोजगार में 13 लाख लोगों का इजाफा हुआ है। इस साल 31 मार्च को इस क्षेत्र में कुल 144 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा था। खादी कारीगरों के लिए कर्मशालाएं उपलब्ध कराने के कार्यक्रम के तहत खादी और ग्राम उद्योग आयोग ने 43.15 करोड़ रुपया जारी किया जिससे 9,057 कारीगरों को लाभ हुआ। इसी तरह मौजूदा कमजोर खादी संस्थाओं को सुदृढ़ करने तथा विपणन के बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद के लिए खादी और ग्राम उद्योग

आयोग को पिछले तीन वर्षों में 15.50 करोड़ रुपए दिए गए, जिससे 108 खादी संस्थाओं और 187 खादी बिक्री केन्द्रों का जीर्णोद्धार किया गया। खादी और ग्राम उद्योग के उत्पाादों का उत्पादन निजी स्वामित्व वाली करीब सात लाख कुटीर इकाइयों में होता है, जिनके लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम से आर्थिक सहायता प्राप्त होती है। प्रधानमंत्री मोदी ने तीन साल पहले आकाशवाणी से प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लोगों से कम से कम एक खादी वस्त्र खरीदने का अनुरोध किया था। उन्होंने उसी वक्त यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वे उनसे पूरी तरह खद्दरधारी बनने को नहीं कह रहे हैं, बल्कि सिर्फ इतना अनुरोध कर रहे हैं कि त्योहार के अवसर पर कोई न कोई खादी वस्त्र धारण करें। केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री ने बताया था कि प्रधानमंत्री की अपील के बाद अक्तूबर 2014 से मार्च 2015 तक खादी की बिक्री में 17.55 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई। अपील के बाद खादी उत्पाीदों का उत्पादन करीब 6 गुना बढ़ गया। अक्तूूबर 2014 से मार्च 2015 तक की अवधि में इससे पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में उत्पादन में 31.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सार्वजनिक उद्यमों और कंपनियों, जैसे दिल्ली पुलिस, एयर इंडिया, एनटीपीसी, प्रधानमंत्री कार्यालय, ओएनजीसी और रेलवे आदि से बड़ी तादाद में एकमुश्त सप्लाई के लिए बल्क ऑर्डर मिले। खादी और ग्राम उद्योग आयोग की स्थापना 1957 में भारत की आजादी के वस्त्र खादी की

अनोखी खूबियों का फायदा उठाने, ग्रामीण हस्त शल्पियों के उत्थान और खादी कार्यक्रम को देश की नियोजन प्रक्रिया के साथ समन्वित करने के उद्देश्य से की गई थी। आज खुरदरे खादी वस्त्र के साथ-साथ हाथ के कते हाई काउंट धागे से बने वस्त्रों की बड़ी मांग है और खादी का फैशन जोर पकड़ता जा रहा है। अब खादी जबरदस्त ‘फैशन स्टेटमेंट’ यानी फैशनेबल लोगों की पहचान बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। खादी के अंतर्गत आने वाले कार्यक्रमों में खादी और ग्राम उद्योग आयोग की केन्द्रीय क्षेत्र की विभिन्न योजनाओं द्वारा समर्पित ये विकास कार्यक्रम शामिल हैं- बाजार विकास सहायता (एमडीए), ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणपत्र (आईएसईसी), खादी पॉलीवस्त्र योजना, पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए धन की व्यवस्था की योजना (एसएफयूआरटीआई), खादी सुधार और विकास कार्यक्रम (केआरडीपी), खादी कारीगरों के लिए कर्मशाला योजना, आम आदमी बीमा योजना, खादी कारीगर जनश्री बीमा योजना (जेबीवाई), दुर्बल खादी संस्थाओं के बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने की योजना और कच्चा माल प्रबंधन कार्यक्रम के तहत विपणन ढांचे के विकास की योजना आदि। नए आदर्श चरखा कार्यक्रम के तहत बेहतरीन कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए खादी और ग्राम उद्योग आयोग ने कुट्टूर (केरल), चित्रदुर्ग (कर्नाटक), सिहोर (मध्य‍ प्रदेश), एटा और राय बरेली (उत्त‍र प्रदेश) और हाजीपुर (बिहार) में छह सेंट्रल सिल्वर प्लांट्स स्थापित किए हैं।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

उद्यम का भारतीय आख्यान भारतीय डायस्पोरा

ना

गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना तक सफल और प्रसिद्ध प्रवासी भारतीयों की लंबी सूची है

एसएसबी ब्यूरो

सा से लेकर इसरो तक और विप्रो से लेकर फेसबुक हेडक्वार्टर तक, हर जगह भारतवंशी न सिर्फ छाए हुए हैं, बल्कि अपनी मेधा और उद्यम से सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहे हैं। दिलचस्प यह कि यह सिलसिला कोई आज का नहीं है। मॉरिशस, फिजी जैसे देशों की अगर आज वैश्विक पहचान है, तो इसके तार भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के दिनों से जुड़े हैं। ढाई दशक पीछे लौटें तो 1990 में जब सद्दाम हुसैन की ईराकी सेनाओं ने कुवैत पर हमला किया तो माथुनी मैथ्यूज ने, जिन्होंने टोयोटा सनी के नाम से अधिक पहचाना जाता है, मसीहा मैथ्यूज बनकर वहां फंसे भारतीयों की जीवन रक्षा की। सनी ने जैसा अनोखा कार्य किया उससे कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 हजार भारतीयों को 488 उड़ानों के जरिए भारत लाने में बड़ी मदद मिली। 2017 का साल भारतवंशियों के लिए सबसे बड़े नुकसान का साल कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें एक बॉलीवुड फिल्म के प्रेरणा स्रोत रहे टोयोटा सनी इस दुनिया से चल बसे, लेकिन ऐसे कई प्रवासी भारतीय (एनआरआई) हैं जिन्होंने राष्ट्र के इतिहास के विभिन्न कालखंडों में भारत को गौरवान्वित किया है। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना तक और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला तथा जाने माने संगीत निर्देशक जुबिन मेहता जैसे प्रवासी भारतीयों की सूची बड़ी लंबी है और विश्व के प्रति उनके अवदान भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आज हमें जीवन के तमाम क्षेत्रों में भारतीय नजर आते हैं। चाहे फिल्मकार हों, वकील हों, पुलिसकर्मी हों, लेखक हों या व्यापारी हों, दुनिया भर में विभिन्न क्षेत्रों में प्रवासी भारतीयों ने अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े हैं। भारत आज दुनिया में सबसे अधिक प्रवासी देने वाला देश होने का दावा कर सकता है, क्योंकि भारतीय मूल के तीन करोड़ से भी अधिक लोग आज विदेशों में प्रवास करते हैं। हालांकि कुल संख्या की दृष्टि से प्रवासी भारतीयों की तादाद देश की कुल जनसंख्या। का मात्र एक प्रतिशत है, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 3.4 प्रतिशत का योगदान करते हैं। पिछले साल जारी विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2015 में प्रवासियों द्वारा सबसे अधिक रकम प्राप्त करने वाला देश था, क्योंकि इस दौरान उसे 69 अरब डालर की अनुमानित आमदनी हुई। भारतवंशियों की छवि कुशल, शिक्षित और धनी समुदाय के रूप में उभरी है। पिछले दशक में व्यापार, पूंजी और श्रम के वैश्वीकरण की बुनियाद मजबूत होने से अत्यंत कुशल प्रवासी भारतीयों की तादाद

एक नजर

भारत की जीडीपी में भारतवंशियों का 3.4 प्रतिशत का योगदान 2015 में प्रवासियों द्वारा सबसे अधिक रकम प्राप्त

2000 में अमेरिकी भारतवंशियों की वार्षिक आय 51 हजार डॉलर थी

तौर पर चल जाता है।

प्रवासियों के अनुकूल नीतियां

ड्यूक विश्वविद्यालय और कै​िलफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में 1995 से 2005 तक प्रवासियों द्वारा स्थापित इंजीनिय​रिंग और आईटी कंपनियों में से एक चौथाई से ज्यादा भारतीयों की थीं में जबरदस्ती इजाफा हुआ है। भारत के करीब 3 करोड़ प्रवासी जिन-जिन देशों में रह रहे हैं, वहां की तमाम महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां और भूमिकाएं निभा रहे हैं और इस तरह इन देशों की नियति का निर्धारण करने में योगदान कर रहे हैं। सिंगापुर के राष्ट्रपति, न्यूज़ीलैंड के गवर्नर जनरल और मॉरिशस तथा ट्रिनिडाड-टोबैगो के प्रधानमंत्री भारतीय मूल के हैं। ड्यूक विश्वविद्यालय और कै​िलफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में 1995 से 2005 तक प्रवासियों द्वारा स्थापित इंजीनिय​िरंग और आईटी कंपनियों में से एक चौथाई से ज्यादा भारतीयों की थीं। इतना ही नहीं देश के होटलों में से करीब 35 प्रतिशत के स्वामी प्रवासी भारतीय ही थे। अमेरिका की 2000 की जनगणना के अनुसार वहां रह रहे प्रवासी भारतीयों की औसत वार्षिक आय 51 हजार डॉलर थी, जबकि अमेरिकी नागरिकों की औसत वार्षिक आय 32 हजार डॉलर थी। करीब 64 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास स्नातक की डिग्री या इससे ऊंची शैक्षिक योग्यताएं थीं, जबकि डिग्रीधारी अमेरिकियों का समग्र औसत 28 प्रतिशत और डिग्रीधारी एशियाईअमेरिकियों का औसत 44 प्रतिशत था। करीब 40 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास स्नातकोत्तर, डाक्टरेट या अन्य पेशेवर डिग्रियां थीं जो अमेरिकी राष्ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक है। विदेशों में जब

भारतीय मूल के किसी व्यक्ति को सम्मान मिलता है तो इससे हमारे देश का भी सम्मान होता है और भारत बारे में लोगों की समझ बढ़ती है। प्रभावशाली भारतवंशी न सिर्फ उस देश के जनमत पर असर डालते हैं, बल्कि वहां की सरकारी नीतियों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है, जिसका लाभ भारत को मिलता है। भारत को इन लोगों के माध्यम से एक बड़ा फायदा यह भी होता है कि वे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्यमिता वाले उपक्रमों को भारत जाने को प्रेरित करते हैं। स्वदेश लौटकर नया कारोबार शुरू करने वाले भारतवंशी अपने साथ तकनीकी और किसी खास कार्यक्षेत्र की विशेषज्ञता लेकर आते हैं, जो देश के लिए बड़े मददगार कारोबारी साबित होते हैं। विदेशों में कार्यरत शै‍क्षणिक क्षेत्र के भारतवंशी भारतीय शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्वेच्छा से अपना समय और संसाधन मुहैया करा रहे हैं। इंडो यूनिवर्सल कोलैबरेशन ऑफ इंजीनियरिंग एजुकेशन की सदस्य संस्थाएं इसका उदाहरण हैं। इसका पता मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया के साथ-साथ बुनियादी ढांचे तथा परिवहन संपर्क सुधारने और शहरी व ऊर्जा क्षेत्र में चहुंमुखी टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रयासों अथवा निजी वाणिज्यिक समझौतों से चलाई जा रही परियोजनाओं से साफ

सरकार प्रवासी भारतीयों के रूप में अपनी सबसे बड़ी पूंजी की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना जारी रखे हुए है, जिसके लिए अनेक नीतियां बनाई गई हैं और पहल की गयी हैं। प्रवासन की प्रक्रिया को और अधिक सुरक्षित, व्यवस्थित, कानून-सम्मत और मानवीय बनाने के लिए संस्थागत ढांचे में सुधार के मंत्रालय के प्रयास भी जारी हैं। प्राथमिकता वाला एक क्षेत्र है प्रवासन चक्र के विभिन्न चरणों, जैसे विदेश रवानगी से पहले, गंतव्य देश में पहुंचने और वहां से वापसी के समय प्रवासी कामगारों को मदद देने वाले समूचे तंत्र को सुदृढ़ करना। प्रवासी भारतीय श्रमिकों के कौशल में सुधार और उनके व्यावसायिक कौशल के प्रमाणन के लिए नयी पहल की गई है। 2 जुलाई, 2016 को विदेश मंत्रालय और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने एक समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए जिसका उद्देश्य प्रवासी कौशल विकास योजना (पीकेवीवाई) पर अमल करना था। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम इस योजना को लागू करने के लिए इंडिया इंटरनेशनल स्किल सेंटर्स स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत है जिन्होंने स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अनुकूलित किया जाएगा। पिछले साल गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में प्रवासी भारतीय केंद्र का उद्घाटन किया और इसे भारतवंशियों को समर्पित किया। इस केंद्र की स्थापना का उद्देश्य दुनिया भर में फैले भारतवंशियों द्वारा विदेशों रह कर किये गये परिश्रम और धैर्य का स्मरण करना और उसके परिणामस्वरूप हासिल उपलब्धियों और विकास की ओर ध्यान आकृष्ट करना है। भारत के महानतम प्रवासियों में से एक महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका से स्व देश वापसी की स्मृति में देश में हर साल प्रवासीय भारतीय दिवस का आयोजन किया जाता है। इसमें देश-विदेश में भारतवंशियों के योगदान को याद किया जाता है।


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

राष्ट्रीय विजन और टेलीविजन इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण

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2014-15 में भारत का टेलीविजन उद्योग 4,75,003 करोड़ रुपए का था, जो 2015-16 में 5,42,003 करोड़ रुपए हो गया। इस तरह इसमें लगभग 14.10 प्रतिशत की वृद्धि हुई

एसएसबी ब्यूरो

लीविजन के बिना मौजूदा जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। वैसे भारत में टेलीविजन का इतिहास आजादी के साथ शुरू न होकर कुछ वर्षों बाद शुरू हुआ। ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) द्वारा 1936 में दुनिया की पहली टेलीविजन सेवा शुरू करने के दो दशकों के बाद ही भारत में 15 सितंबर, 1959 को दिल्ली में टेलीविजन प्रसारण शुरू किया गया। यूनेस्को की सहायता से इसकी शुरूआत की गई। शुरूआत में हफ्ते में दो दिन एक-एक घंटे के लिए कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था, जिनमें सामुदायिक स्वास्थ्य, यातायात, सड़क के इस्तेमाल पर नागरिकों के अधिकार और कर्त्तव्य जैसे विषय शामिल थे। 1961 में प्रसारण का दायरा बढ़ाया गया और उसमें स्कू्ल शिक्षा टेलीविजन (एसटीवी) परियोजना को शामिल किया गया। भारत में टेलीविजन का दायरा बढ़ाने का पहला बड़ा कदम 1972 में उठाया गया, जब बंबई में दूसरा टेलीविजन स्टेशन खोला गया। इसके बाद 1973 में श्रीनगर और अमृतसर में तथा 1975 में कलकत्ता, मद्रास और लखनऊ में टीवी स्टेशन खोले गये। शुरूआत के 17 वर्षों के दौरान टेलीविजन प्रसारण का दायरा धीरे-धीरे फैला। उस दौरान श्वेत-श्याम प्रसारण ही होते थे। 1976 तक आठ टेलीविजन स्टेशन वजूद में आ चुके थे और इनके दायरे में 75 हजार वर्ग किलोमीटर के फैलाव में 45 मिलियन आबादी आती थी। आकाशवाणी के एक अंग के रूप में विस्तृत टेलीविजन प्रणाली के प्रबंधन में दिक्कत आने के कारण सरकार ने ‘दूरदर्शन’ का गठन किया। यह संस्था सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन एक अलग विभाग के रूप में सामने आई। 1970 के दशक के मध्य में भारत में टेलीविजन की अभूतपूर्व वृद्धि के तीन महत्त्वपूर्ण शुरूआती बिंदु हैं। पहला, उपग्रह शैक्षिक टेलीविजन अनुभव (एसआईटीई) है, जिसकी शुरूआत अगस्त , 1975 और जुलाई, 1976 के बीच हुई। इसके तहत छह राज्यों के गांवों तक उपग्रह के माध्यम से शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाने लगा। इसका मकसद विकास के लिए टेलीविजन का उपयोग करना था, हालांकि मनोरंजन के कार्यक्रमों को भी इसमें शामिल किया गया। वास्तव में इस प्रकार टेलीविजन जनता के और नजदीक हो गया। इसके बाद इनसैट-1ए की शुरूआत हुई। यह देश का पहला घरेलू संचार उपग्रह था, जो 1982 में गतिशील हो गया। इसके कारण दूरदर्शन के सभी क्षेत्रीय स्टेशन प्रसारण करने में सक्षम हो गए।

एक नजर

भारत में 15 सितंबर, 1959 को टेलीविजन प्रसारण शुरू हुआ

चीन के बाद भारत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है 2015-16 में सरकार द्वारा 869 पंजीकृत टीवी चैनल

टेलीविजन विज्ञापन के मामले में 2020 तक भारत में दो अंकीय विकास होगा और इस तरह भारत ऐसी कामयाबी दर्ज कराने वाले चंद देशों में शामिल हो जाएगा दूरदर्शन ने पहली बार ‘राष्ट्रीय कार्यक्रम’ शुरू किया, जिसे दिल्ली से अन्य स्टेशनों के जरिए प्रसारित किया। नवंबर, 1982 में देश ने एशियाई खेलों की मेजबानी की और सरकार ने खेलों के मद्देनजर रंगीन प्रसारण शुरू किया। 1980 के दशक को दूरदर्शन का युग कहा जाता है। इस दौरान ‘हम लोग’ (1984), ‘बुनियाद’ (1986-87) तथा अत्यंत लोकप्रिय पौराणिक धारावाहिक ‘रामायण’ (1987-88) और ‘महाभारत’ (1988-89) जैसे प्रसारण किए गए। अब भारत की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी दूरदर्शन के कार्यक्रम देखती है, जिन्हें लगभग 1400 ट्रांसमीटरों के नेटवर्क के जरिए प्रसारित किया जाता है। टेलीविजन का तीसरा महत्त्वपूर्ण विकास 1990 के दशक की शुरूआत में हुआ, जब सीएनएन और स्टार टीवी जैसे विदेशी कार्यक्रमों को उपग्रह टीवी के जरिए दिखाया जाने लगा। इसके कुछ समय बाद ही भारतीय घरों में जी-टीवी और सन-टीवी जैसे घरेलू चैनलों ने प्रवेश किया। सरकार ने धीरे-धीरे नियंत्रण में ढील दी, जिसके कारण 1990 के दशक में केबल टीवी ने मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति ला दी। अगर हम ट्राई द्वारा 2015-16 में जारी वार्षिक रिपोर्ट का जायजा लें, तो हमें पता चलेगा कि चीन के बाद भारत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा

टीवी बाजार है। औद्योगिक आंकड़ो के अनुसार मार्च, 2016 को मौजूदा 2841 मिलियन घरों में से लगभग 1811 मिलियन घरों में टेलीविजन सेट मौजूद है, जिन्हें केबल टीवी सेवा, डीटीएच, आईपीटीवी सहित दूरदर्शन टीवी नेटवर्क सेवाएं प्रदान करते हैं। इसके अलावा लगभग 1021 मिलियन केबल टीवी ग्राहक, 88.64 मिलियन पंजीकृत डीटीएच ग्राहक (58.53 मिलियन सक्रिय ग्राहक सहित) और लगभग 5 लाख आईपीटीवी ग्राहक मौजूद हैं। दूरदर्शन टीवी नेटवर्क देश की लगभग 92.62 प्रतिशत आबादी को अपने विस्तृत ट्रांसमीटर नेटवर्क के जरिए सेवाएं प्रदान करता है। इस समय 48 पे-ब्रॉडकास्टवर, लगभग 60 हजार केबल ऑपरेटर, 6 हजार मल्टी सिस्टम ऑपरेटर, 6 पे-डीटीएच ऑपरेटर मौजूद हैं। इनके अलावा दूरदर्शन की फ्री-टू-एयर डीटीएच सेवा भी काम कर रही है। वित्त 2015-16 के समापन तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में 869 पंजीकृत टीवी चैनल मौजूद हैं। इनमें 205 स्टैंडर्ड डेफिनीशन (एसडी) पे-टीवी चैनल (पांच विज्ञापन मुक्त पे चैनल सहित) और 58 हाई डेफिनीशन (एचडी) पे-टीवी चैनल भी हैं। 2014-15 में भारत का टेलीविजन उद्योग 4,75,003 करोड़ रुपए का था, जो 2015-16 में 5,42,003 करोड़ रुपए हो गया। इस तरह इसमें

लगभग 14.10 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2014-15 में ग्राहकों से प्राप्त राजस्व 3,20,003 करोड़ रुपए था, जो 2015-16 में बढ़कर 3,61,003 करोड़ रुपए हो गया। इसी प्रकार 2014-15 में विज्ञापन से होने वाली आय 1,55,003 करोड़ रुपए थी, जो 2015-16 में बढ़कर 1,21,003 करोड़ रुपए हो गई। पिछले दशक में केबल और उपग्रह टीवी बाजार में भारी बदलाव आया है। ग्राहकों की संख्या के मद्देनजर एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत दूसरा सबसे बड़ा ग्राहक आधारित टेलीविजन बाजार है। टेलीविजन विज्ञापन के मामले में 2020 तक भारत में दो अंकीय विकास होगा और इस तरह भारत ऐसी कामयाबी दर्ज कराने वाले चंद देशों में शामिल हो जाएगा। ग्राहक संख्या में औसत रूप से वार्षिक गिरावट देखी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद 2020 तक केबल टेलीविजन का बाजार में दबदबा बना रहेगा। डिजिटलीकरण के कारण टेलीविजन चैनलों में भी भारी वृद्धि देखी गई है और इसकी संख्या 800 के पार हो गई है। इस समय भारत में टेलीविजन की पहुंच 61 प्रतिशत है। इस तरह उसके विकास और विस्तार की अपार संभावना है। एक आकलन के अनुसार भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग की वार्षिक विकास दर (सीएजीआर) 10.5 प्रतिशत रहने की संभावना है। इस समय यह आंकड़ा 27.3 अरब डॉलर का है, जो 2021 तक 45.1 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। यह आकलन प्राइस वॉटर हाऊस कूपर्स द्वारा जारी ‘ग्लोरबल इंटरटेनमेंट एंड मीडिया आउटलुक 2017-21’ रिपोर्ट में किया गया है। 18.6 प्रतिशत सीएजीआर के मद्देनजर भारत में डिजिटल विज्ञापन के विकास के बारे में कहा जाता है कि वह सबसे तेज होने वाला है। उसकी संभावित वृद्धि 11.1 सीएजीआर के मद्देनजर 2017 और 2021 के बीच होने की संभावना व्यक्ती की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘अर्थव्यवस्था के विकास को देखते हुए टीवी बाजार के विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।’


16 खुला मंच

14 - 20 अगस्त 2017

‘पहले वो आपको अनदेखा करेंगे, फिर वे आप के उपर हंसेंगे, फिर वे आपके साथ लड़ेंगे, तभी आपकी जीत होगी’

सात दशक और लोकतांत्रिक ललक

-महात्मा गांधी

देश के नए उपराष्ट्रपति

‘आज देश के सभी शीर्ष पदों पर विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग हैं, जो हमारे संविधान की परिपक्वता को दर्शाता है’

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रतीय लोकतंत्र की रचना ही चूंकि बहुलतावादी आदर्शों को लेकर हुई है, इसीलिए इसमें सबके लिए अवसर है। यही कारण है कि राजवंशीय परंपरा से दूर कभी भी, कोई भी व्यक्ति भारत में अपनी योग्यता से ऊंचे से ऊंचे पद पर पहुंच सकता है। इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने तरीके से रेखांकित किया है। उन्होंने कहा, ‘आज देश के सभी शीर्ष पदों पर विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग हैं, जो हमारे संविधान की परिपक्वता को दर्शाता है।’ वेंकैया नायडू देश के 13वें उपराष्ट्रपति हैं। उनका जन्म 1 जुलाई, 1949 को आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में हुआ। नेल्लोर से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वहीं से राजनीति में स्नातक किया। विशाखापट्टनम के लॉ कॉलेज से अंतरराष्ट्रीय कानून में डिग्री ली। कॉलेज के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। नायडू पहली बार 1972 में जय आंध्रा आंदोलन से सुर्खियों में आए। 1975 में वे इमरजेंसी में जेल भी गए थे। महज 29 साल की उम्र में वे 1978 में पहली बार विधायक बने। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित पार्टी के विभिन्न पदों पर रहने के बाद नायडू पहली बार कर्नाटक से राज्यसभा के लिए 1998 में चुने गए। इसके बाद से वे 2004, 2010 और 2016 में राज्यसभा सांसद बने। गौरतलब है कि उपराष्ट्रपति बनने के साथ ही नायडू राज्यसभा के सभापति भी बन गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नायडू का राज्यसभा के सभापति के तौर पर स्वागत करते हुए कहा, ‘वह देश के पहले उपराष्ट्रपति हैं, जिनका जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ। वेंकैया जी बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि राज्यसभा कैसे काम करता है। लंबे समय से सदन में रहने के कारण उन्हें पता है कि यह कैसे कार्य करता है।’ देश को विश्वास है कि वेंकैया नायडू सदन और संविधान दोनों की अस्मिता और विशेषता अक्षुण्ण बनाए रखने में सराहनीय भूमिका निभाएंगे।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

अहिंसा और आंदोलनों का नया मेल भारतीय गणतंत्र में नया अध्याय जोड़ने की जहां एक तरफ ललक पैदा कर रहा है, वहीं इसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर कुछ सामयिक दरकारों को भी रेखांकित कर दिया है

न दिनों भारतीय समाज और राजनीति दोनों ही विमर्श के नए धरातल को तलाशने में लगे हैं। ऐसा इसीलिए कि बीते तीन सालों में ग्लोबल छतरी का रंग ही नहीं, उसके नीचे खड़े देशों की गिनती और हैसियत भी बदल गई है। कहीं ब्रेक्जिट जैसा संकट है, तो कहीं वैश्विक नेतृत्व का वह विकल्प जिसकी संभावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पैदा हुई है। कह सकते हैं कि कम समय में आए ये बड़े बदलाव हैं। हालांकि इसका एक अर्थ यह भी है कि देश में परिवर्तन का मिजाज पहले से बन गया था, भले ही कैलेंडर में यह हालिया दिख रहा हो। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक सुखद लक्षण भी है, क्योंकि एक तरफ जागरूक लोकतंत्र अपनी केंद्रीय उपस्थिति को लेकर दशकों बाद एक तरह से संतोष का अनुभव कर रहा है। वैसे भी भारतीय जन-गण का नया मन बदलाव और संभावनाओं के साझे से बना है। देशकाल से जुड़े तमाम सरोकारों के साथ अहिंसा और आंदोलनों का नया मेल भारतीय गणतंत्र में नया अध्याय जोड़ने की जहां एक तरफ ललक पैदा कर रहा हैं, वहीं इसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर कुछ सामयिक दरकारों को भी रेखांकित किया है। दरअसल, 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो इस बदले सूरते हाल को एक क्रांतिकारी संभावना के तौर पर हर तरफ देखा गया। मीडिया में तो खासतौर पर इसकी चर्चा रही। अमेरिका और यूरोप से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगीं कि भारत में फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर

देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। दिलचस्प है कि सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। आश्चर्य नहीं कि आज बात स्वच्छता की हो, देश की एकजुटता की हो या स्वावलंबन के देसी करघे की, हर बात के लिए देश के प्रधानमंत्री सबसे पहले राष्ट्रपिता को याद करते हैं, और फिर उनकी 150वीं जयंती यानी 2019 तक देश के नवनिर्माण के नितांत नए खाके में रंग भरने का संकल्प। गौरतलब है कि देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का जो दौर शुरू हुआ है, उसमें कुछ सवाल और मुद्दे बार-बार उठाए जा रहे हैं। क्या लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है, पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता

न तो व्यवस्था परिवर्तन की बात और न ही इसकी मांग नई है, नया है तो सिर्फ यह कि ये सारी बातें आज सरकार से बाहर बैठे लोग नहीं बल्कि खुद सरकार कर रही है


14 - 20 अगस्त 2017

लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने और आज प्रधानमंत्री खुद आगे बढ़कर इनमें से एक-एक मुद्दे को हाथ में लेते दिख रहे हैं। खुद उनके ही एक वक्तव्य का हवाला लें तो ‘लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल के लिए सरकार चुनना और उसे पांच साल का कांट्रेक्ट देना नहीं है, बल्कि हर समस्या के समाधान में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना है। मुद्दा चुनाव सुधार का हो या सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की बहाली का, ये मुद्दे सरकार के एजेंडे से बाहर नहीं, बल्कि उनमें शामिल हैं और इसकी गवाही प्रधानमंत्री के विभिन्न मौकों पर दिए गए संबोधन हैं। गौरतलब है कि न तो व्यवस्था परिवर्तन की बात और न ही इसकी मांग नई है, नया है तो सिर्फ यह कि ये सारी बातें आज सरकार से बाहर बैठे लोग नहीं, बल्कि खुद सरकार कर रही है। यह जरूर है कि इन सारे मोर्चों पर न तो एक साथ कदम उठाया जा सकता है और न ही यह सब कुछ रातोंरात हासिल किया जा सकता है। इन सवालों, सरोकारों और मुद्दों के सामयिक जनतांत्रिक तकाजों से देश की कुछ परंपरागत सियासी जमातें ठीक से कनेक्ट नहीं कर पा रही हैं, उसकी वजह एक ही है। यह वजह है 'परिवर्तन’ को लेकर समझ। दरअसल, परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। इसीलिए जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है, उसे परिवर्तन की आहट थोड़ी कम सुनाई दे रही है। इसका हश्र और हासिल देश की राजनीति के बदली सच्चाई में देखा भी जा सकता है। देश का नया जनमानस क्या सोच रहा है और उसकी पसंद-नापसंद क्या है, इसका अंदाजा हाल में संपन्न चुनावों के नतीजे को देखकर तो लगाया जा सकता है, इसका अंदाजा केंद्र सरकार द्वारा तीन साल के भीतर शुरू की गई कई नई योजनाओं और उसे मिली सफलता से भी लगाया जा सकता है। कहा जा सकता है कि जनता को अब 'ठग प्रवृत्ति’ की राजनीति के जाल में आसानी से नहीं फंसाया जा सकता है। नरेंद्र मोदी इस मामले में अपने तमाम प्रतिद्वंद्वियों पर इसीलिए भी भारी पड़े, क्योंकि उनके पास विकास और सुशासन का नया मॉडल है। इसीलिए वह जब जनता के बीच जाते हैं तो करके दिखाएंगे के साथ करके दिखाया वाले भरोसे से बोलते हैं। यही वजह है कि देश को जनधन योजना से लेकर जीएसटी तक नया वित्तीय अनुशासन देने वाले और डिडिटल से लेकर स्टार्ट अप इंडिया तक विकास का नया मनोबल देने वाले नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता पूरी तरह से निर्विवाद है। हाल के कुछ अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भी उनके नेतृत्व की सराहना की गई है। 1947 से चलकर 2017 तक पहुंचे भारत के लिए यह सराहना किसी उपलब्धि से कम नहीं है।

खुला मंच

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इस ‘गदर’ को भी रखें याद

जो 'वंदे मातरम’ का नारा आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय है, उसे देशप्रेम के मंत्र का दर्जा सबसे पहले गदर पार्टी के सदस्यों ने ही दिया था

क देश जिसने तकरीबन सौ साल का गहन स्वाधीनता संघर्ष जिया हो, उसके पास प्रखर संघर्ष क्षमता और राष्ट्रीय मूल्यबोध के इतने अक्षर दस्तावेज तो होने ही चाहिए कि देशवासियों के लिए कभी राष्ट्रप्रेम की प्रेरक ऊर्जा कम न पड़े। यों तो भारतीय स्वाधीनता संघर्ष पर किताबों की कमी नहीं है। खासौतर पर ऐतिहासिक रूप से इस संघर्ष को कई-कई चश्मों से देखा गया है। पर अगर बात करें साहित्य की तो देश के इतिहास के इस अन्यतम अनुभव को शब्द देने का काम अपेक्षित रूप से नहीं हुआ है। इस लिहाज से वेदप्रकाश 'वटुक’ की 'आजादी या मौत’ पुस्तक काफी अहम है। इस किताब में गदर पार्टी के 1848 से लेकर 1910 तक के आंदोलनात्मक इतिहास की महज ब्योरेबाजी नहीं है, बल्कि इसमें गदर पार्टी की स्थापना और उसके क्रियाकलापों का एक तरह से औपन्यासिक आख्यान है। दरअसल, देश के कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों ने गुलामी से मुक्ति का संघर्ष या तो विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल करते हुए ही सीखा या फिर काम की तलाश में विदेश जाने पर एक गुलाम देश के वासी होने के कारण मिली हिकारत के कारण। इस दौरान इंग्लैंड, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में एक अनुभव नस्लभेद का भी सामने आया। यह वही अनुभव है जो दक्षिण अप्रीका में मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना देता है। काम की तलाश में भटकते हुए अमेरिका पहुंचे सोहन सिंह और उनके साथियों के ऐसे ही अनुभव को वटुक ने काफी जीवंत तरीके से व्यक्त किया है। सोहन सिंह भकना और उनके एक साथी जब काम

आरएनआई नंबर-DELHIN

/2016/71597

अगस्त कांि्त के 75 वर्ष

वर्ष-1 | अंक-34 | 07

अगस्त - 13 अगस्त 2017

harat.com

sulabhswachhb

04 रहातरा गांधी

08 जयप्रकाश नारायण

कांि्त का युवा नायक

21 डॉ. िवनददेश्वर पाठक

'सोशल िरफॉर्षर ऑफ द

ईयर'

को सुलभ प्रणदे्ता डॉ. पाठक रुंबई रें िरला यह समरान

अगस्त कांि्त का संकलप आंदोलन के सूत्रधार

अगस्त कांि्त की प्रदेरणा थदे गांधी जी

75वीं वर्षगांठ को 'भार्त छोडो' आंदोलन की भार्त छोडो, ार गंदगी भार्त छोडो, भ्रष्ाच द भार्त छोडो, जाि्तवा आ्तंकवाद भार्त छोडो, संकलप के ्तौर के संप्रदायवाद भार्त छोडो नरेंद्र रोदी की पर रनानदे की प्रधानरंत्री अपील सदे ददेशवािसयों

भूिरग्त रहकर संभाली अगस्त कांि्त की करान

के सिलसिले में अमेरिका के एक सुपरिटेंडेंट से मिले, तो वह उन्हें खरी-खरी सुना देता है। सुपरिटेंडेट कहता है, 'काम तो है, पर तुम्हारे लिए नहीं... मेरा दिल तो करता है कि तुम दोनों को गोली मार दूं... तुम्हारे देश की कितनी आबादी है? ये तीस करोड़ आदमी हैं या भेड़ें? ...जाओ पहले अपने देश को आजाद कराओ।’ इस तरह के लानत भरे अनुभवों ने विदेशी धरती पर भारतीयों की गोलबंदी बढ़ा दी। राष्ट्रहित की ऐसी ही प्रवासी भारतीय चिंता ने 1909 में हिंदुस्तान एसोसिएशन को जन्म दिया। इसके बाद 1913 में 'गदर’ नाम से एक अखबार निकलना शुरू होता है। अखबार की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि लोग इसे ही गदर पार्टी कहने लगे। जो 'वंदे मातरम’ का नारा आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय है, उसे देशप्रेम के मंत्र का दर्जा सबसे पहले गदर पार्टी के सदस्यों ने ही दिया था। यही नहीं पूर्ण स्वराज की मांग भी सर्वप्रथम गदर

भा

गंदगी भारत छोड़ो

रत छोड़ो, 1942 में लगाए गए इस नारे ने आखिरकार अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और देश आजाद हो गया, लेकिन जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज गंदगी, भ्रष्टाचार, संप्रदायवाद, जातिवाद और आतंकवाद के भारत छोड़ने की जरूरत है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ के नए अंक में भारत छोड़ो आंदोलन को जिस तरह से याद किया है, वह बेहद प्रासंगिक और जरूरी सबक की तरह है, जिसे देश के हर नागरिक को सीखना चाहिए। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को पढ़ने से यह स्पष्ट होता

के मंच से ही उठी। 'वह दिन दूर नहीं जब मजदूर जागेंगे, किसान जागेंगे, शोषित कुचले हुए लोग जागेंगे, बराबरी का हक मागेंगे, इंसान की तरह जीने का अधिकार मांगेंगे। उसके लिए प्राणों का उत्सर्ग करेंगे- उनकी ताकत के आगे न अन्याय टिकेगा न झूठ भरा जालिम राज।’ 25 मार्च 1914 को दिए गए हरदयाल के इस भाषण का लोगों पर इतना असर पड़ा कि वे आजादी के लिए अपने संघर्ष को विदेश की धरती से आगे अपने देश में लड़ने के जज्बे से भर उठे। पर यह सब इतनी तेजी और देशप्रेम के जज्बाती तेवरों के बीच घटित हो रहा था कि इसे दीर्घ और सुनियोजित संघर्ष की तरह विकसित करने का अवसर हाथ से जाता रहा। वैधानिक सरकार को पलटने के लिए षड्यंत्र करने के नाम पर गदरी क्रांतिकारियों में मुकदमे चले और उनमें से ज्यादातर को फांसी दे दी गई। पर इस क्रांतिकारी अंगड़ाई ने पूरे देश में और विदेशी सरजमीं पर भी राष्ट्रप्रेम की एक दहकती बयार जरूर बहा दी। बाद में जब भारत आजाद हुआ तो सोहन सिंह भकना जैसे क्रांतिकारी ने यह जरूर कहा, 'मुझे इस बात का फख्र है कि कौम की दुश्मन अंग्रेज सरकार मेरी कमर न झुका सकी, जो अभी झुकी है, तो उन्हीं मित्रों की सरकार के कारण जिनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़कर हमने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।’ आज भारत अगर अपनी स्वाधीनता का 70वां सालगिरह मना रहा है, तो इस खुशी और फख्र के पीछे गदर पार्टी का संघर्ष है, जिसे कभी भी भूला नहीं जा सकता। है कि इस आंदोलन के असली नायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, उषा मेहता, अरुणा आसफ अली और चित्तू पांडे जैसे युवा नेता रहे, जिन्होंने अपने अपने तरीके से आजादी की इस निर्णायक लड़ाई में अपना योगदान दिया। इनके साथ हमें उन गुमनाम बलिदानियों को भी नमन करना चाहिए, जिन्होंने अंग्रेजो की गोली झेल कर, फांसी के फंदों पर झूल कर, यातना गृहों में अंग्रेजी बर्बरता की वजह से अपने प्राणों की आहूति दी। आज देश आजाद है, इसीलिए हमें पीएम मोदी के इस मंत्र के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है और सबसे पहले इस बात की जरूरत है कि गंदगी भारत छोड़े। एक और शानदार अंक के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। सत्येंद्र गुप्ता, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश


18 फोटो फीचर 15 अगस्त, 1947

14 - 20 अगस्त 2017

स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

रोम-रोम पुलकित जन-जन हर्षित ब्रिटिश हुकूमत की लंबी गुलामी के बाद 15 अगस्त भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम दिन बनकर आया। इसके साथ ही जहां ब्रितानी दासता का लंबा दौर खत्म हुआ, वहीं स्वाधीन राष्ट्र का जन्म हुआ फोटो सर्च ः जयराम

इस अवसर पर जो घटनाक्रम रहे और जिस तरह लोगों ने खुशियां मनाई, इसे जहां उस दिन छपे अखबारों में निहारा जा सकता है, वहीं इस ऐतिहासिक दिवस की कुछ ऐसी तस्वीरें भी हैं, जो हमें उस दिन के देश के माहौल का अंदाजा देते हैं। नई दिल्ली में राजपथ पर उस दिन लोगों का सैलाब उमड़ आया। इसके अलावा देश के गांवों-शहरों में भी तिरंगा फहराकर आजादी का जश्न मनाया गया


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

फोटो फीचर

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15 अगस्त 1947 को एक तरफ देश के प्रथम प्रधानमंत्री घोड़े पर सवार होकर लोगों के बीच निकले, वहीं महात्मा गांधी मिलने आए बच्चों और लोगों को आशीष दे रहे थे। लाल किले पर फहरे तिरंगे को देखकर तो लोगों की खुशी का ठिकाना ही नहीं था। इन सबके बीच भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी एडविना भी थीं, जो भारत की स्वाधीनता के साथ ब्रितानी सम्राज्यवाद के खात्मे के नियामक और चश्मदीद दोनों थे


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

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भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दुनिया का भरोसा आर्थिक विकास

विश्व बैंक ने उम्मीद जताई है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 7.2 प्रतिशत रहेगी। इसका सबसे बड़ा कारण, स्टैंडअप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के कारण देश के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश को माना जा रहा है

एसएसबी ब्यूरो

प छोटी पूंजी से कारोबार शुरू करना चाहते हैं। आप बड़े उद्योगपति हैं। जिस सेक्टर में चाहें उसमें पूंजी निवेश की अपार संभावनाएं हैं। कृषि, रसायन, रक्षा, डेयरी, शिक्षा, सेवा या फिर कोई अन्य क्षेत्र, भारत सरकार की नीतियों ने देश-दुनिया के कारोबारियों की राह आसान कर दी है। पीएम मोदी ने विविधता से भरे देश में जीएसटी जैसे कानून लागू करवाकर देश में कारोबारी माहौल को और भी मजबूती प्रदान की है। केंद्र सरकार की नीतियों से देश-दुनिया के व्यापारियों को भारत में अपार संभावनाएं नजर आ रहीं हैं, लेकिन कुछ ऐसे संगठन भी हैं जो भारत को बिजनेस के लिहाज से भरोसेमंद देश नहीं मानते हैं। इंडियन सेल्युलर एसोसिएशन यानि आईसीए ने भारत में कारोबारी माहौल की आलोचना की है और प्रक्रियाओं को बोझिल बताते हुए भारत को कारोबार के लिए सबसे खराब देश करार दे दिया, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है, या फिर सच कुछ और है?

तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था में भारत चौथा

10 जुलाई 2017 को जारी विश्व बैंक की सूची के अनुसार, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाली सूची में भारत का स्थान चौथा है। विश्व बैंक ने उम्मीद जताई है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 7.2 प्रतिशत रहेगी। इसका सबसे बड़ा कारण, स्टैंडअप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के कारण देश के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश को माना जा रहा है। 09 जुलाई 2011 को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने भी एक अध्ययन के बाद कहा है कि भारत चीन से आगे बढ़कर वैश्विक विकास के आर्थिक स्तंभ के रूप में उभरा है। आने वाले दशक में उम्मीद है कि भारत नेतृत्व को जारी रखेगा। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (सीआईडी) के अनुसार विभिन्न कारणों के चलते, भारत 2025 तक सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की सूची में सबसे ऊपर है। हार्वर्ड के अनुसार भारत में अर्थव्यवस्था के ग्रोथ की गति औसत 7.7 प्रतिशत की वार्षिक रहेगी। सीआईडी यानि सेंटर फॉर इंटरनेशनल

एक नजर

तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में भारत दुनिया का चौथा देश सीआईडी का मानना है कि भारत विकास की धुरी बना रहेगा

हर्वर्ड विश्वविद्यालय ने माना कि भारत विकास की धुरी बना रहेगा

प्रवाह वित्त वर्ष 2016-17 में 43.48 अरब डॉलर रहा, जो किसी एक वित्त वर्ष में यह सर्वाधिक है।

विदेशी निवेश में चीन से आगे भारत

पिछले तीन साल में भारत ने विदेशी निवेश और मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। अब तो चीन ने भी मान लिया है कि उसे पछाड़ कर भारत मैन्यूफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है डेवलपमेंट के रिसर्च से ये निकल कर आया है कि वैश्विक आर्थिक विकास की धुरी अब भारत है। चीन की तुलना में दुनिया का भारत पर भरोसा बढ़ा है, जो आने वाले एक दशक से अधिक समय तक कायम रह सकता है। भारत ने अपने एक्सपोर्ट के आधार का विस्तार किया है और कई जटिल क्षेत्रों जैसे रसायन, वाहन और कुछ विशेष इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को इसमें शामिल किया है।

विकास से बढ़ी रफ्तार

सीआईडी के शोध में कहा गया है कि तेल पर निर्भर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट हो रही है, क्योंकि ये एक ही संसाधन पर निर्भर हैं। भारत, इंडोनेशिया और वियतनाम ने विविधता के लिए अपनी नई क्षमताओं को विकसित किया है और कई तरह के उत्पादन की वजह से आने वाले वर्षों में उनका विकास तेजी से होने की संभावना है। जीएसटी लागू होने के बाद प्रक्रिया गत खामियों को दूर करने में सहायता मिलेगी और भारत पर दुनिया का भरोसा और बढ़ेगा।

चीन से तेज भारत की इकोनॉमी

2015 में जहां चीन की विकास दर 6.9 थी, जबकि भारत की 7.2 थी। 2016 में यह आंकड़ा चीन के लिए 6.7 प्रतिशत था, जबकि भारत ने इस दौरान 7.6 प्रतिशत की रफ्तार से वृद्धि की। वहीं इस वर्ष भारत ने 7.1 प्रतिशत की दर से विकास किया है, जबकि चीन का आंकड़ा आना अभी बाकी है। लेकिन चीन ने 6.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान जताया है। जाहिर भारत जहां पिछले तीन सालों में सात प्रतिशत से ज्यादा की गति से वृद्धि कर रहा है, वहीं चीन की विकास दर अभी भी सात से कम है। वित्त वर्ष 2016-17 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दौरान (एफडीआई) में पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। ये बढ़कर अब 60.08 अरब डॉलर की नई ऊंचाई पर पहुंच गई है। दरअसल एफडीआई नीति में बदलाव तथा विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) द्वारा मंजूरी की सीमा में वृद्धि और देश में ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ नीति को बढ़ावा देने से एफडीआई में बढ़ोत्तरी हुई है। एफडीआई इक्विटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया भर में बढ़ते प्रभाव से भारत विदेशी कंपनियों के लिए पसंदीदा जगह बनता जा रहा है। दुनिया भर की तमाम बड़ी कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही है। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद मेक इन इंडिया कार्यक्रम के चलते डिफेंस, फार्मा, ऑटो से लेकर मोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां भारत आ रही हैं। मेक इन इंडिया, इज ऑफ डुईंग बिजनेस के बाद जीएसटी से आकर्षित होकर निवेशक भारत आ रहे हैं। विदेशी निवेश के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है। 2015 में जहां भारत को 63 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिला था, वहीं चीन को मात्र 56 बिलियन डॉलर मिला। पिछले तीन साल में भारत ने विदेशी निवेश और मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। अब तो चीन ने भी मान लिया है कि उसे पछाड़ कर भारत मैन्यूफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने जुलाई में लिखा कि भारत विदेशी कंपनियों के लिए खूब आकर्षण बन रहा है और कम लागत में उत्पादन धीरे-धीरे चीन से हट रहा है। अखबार ने लिखा है कि भारत सरकार ने देश के बाजार के एकीकरण के लिए जीएसटी लागू किया है। यह अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने वाला है।

तेज रहेगी जीडीपी ग्रोथ

अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज इनवेस्टर सर्विस ने 30 मई को जारी अपनी ग्लोबल मैक्रो आउटलुक रिपोर्ट में


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

देश में ऊर्जा परिवर्तन के संकेत

कहा है कि अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का नकारात्मक असर अल्पकालिक था। मूडीज के मुताबिक अगले तीन से चार सालों में भारत के अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर आठ प्रतिशत हो जाएगी। मूडीज के अनुमान में वित्त वर्ष 2017-18 में भारत की अर्थव्यवस्था में 7.5 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2018-19 में 7.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि होगी। मूडीज को विश्वास है कि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार अगले 3-4 साल में बढ़कर 8 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाएगी।

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हमारे पास प्राकृतिक संसाधन हैं, क्योंकि हमारी पहले की पीढ़ियों ने इन संसाधनों को संजोया है। हमें भावी पीढ़ियों के लिए ऐसा ही करना होगा-नरेंद्र मोदी

इंग्लैंड से बड़ी अर्थव्यवस्था बना भारत

पीएम मोदी की विकास नीतियों के कारण आर्थिक तरक्की के मामले में भारत ने इंग्लैंड को पछाड़ दिया है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। 17 दिसंबर 2016 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले सौ साल में पहली बार ऐसा है कि कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाला ब्रिटेन उपनिवेश रहे भारत से पीछे हो गया है। हालांकि 2011 में विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई थी कि भारत अर्थव्यवस्था के मामले में 2020 तक इंग्लैंड को पीछे छोड़ देगा, लेकिन भारत ने उससे काफी पहले ही इंग्लैंड को पछाड़ दिया।

आईएमएफ ने कहा आएगी तेजी

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत की विकास दर में 2017-2018 तक तेजी आने की उम्मीद जताई है। आईएमएफ ने 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7.8 फीसदी की दर से विकास करने का अनुमान व्यक्त किया है, जो मौजूदा आर्थिक गतिविधियों की तुलना में कहीं अधिक है। आईएमएफ ने अपनी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में कहा है कि भारत की विकास दर में 2017 और 2018 तक तेजी आने की उम्मीद है, जो अप्रैल, 2017 में जताए गए अनुमान के अनुकूल है। बीते छह हफ्ते से भारतीय शेयर बाजार में लगातार उछाल है। 13 जुलाई को पहली बार सेंसेक्स 32,000 का आंकड़ा भी पार गया। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साहसिक और त्वरित फैसले लेने, उसे लागू करने के लिए आगे बढ़कर काम करने की कार्यशैली से भारतीय अर्थव्यवस्था में दिन-ब-दिन सुधार हो रहा है। मोदी सरकार के तीसरी वर्षगांठ पर जब केंद्र सरकार ने तीन साल का लेखा-जोखा 26 मई, 2017 को जारी किया। तब शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक पहली बार 31,000 के आंकड़े को पार किया था। तब सेंसेक्स का यह उछाल ऐतिहासिक था।

बेहतर रोजगार परिदृश्य

एशिया प्रशांत क्षेत्र में रोजगार को लेकर भारत का परिदृश्य सबसे बेहतर है। करीब 84 प्रतिशत भारतीय पेशेवरों का मानना है कि देश में बेहतर आर्थिक परिदृश्य की संभावानाएं दिख रही हैं। माइकल पेज रोजगार आवेदक विश्वास सूचकांक, 2017 के अनुसार भारतीय पेशेवरों में से अधिकांश ने अगले छह महीने के दौरान अपनी नौकरियों और आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। उन्होंने इसे काफी शानदार बताया है। भारत में जहां 84 प्रतिशत पेशेवरों को देश के आर्थिक परिदृश्य के प्रति भरोसा है वहीं एशिया प्रशांत में ऐसा मानने वाले पेशेवरों की संख्या 66 प्रतिशत है।

दु

निया को आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक खतरा है। अगर वे इसकी चिंता करते हैं तो उनका एक्शन भी इन समस्याओं के निराकरण के लिए होता है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आतंकवाद के विरुद्ध विश्व के देशों को सतर्क करने में एक तरफ सफल हुए, तो दूसरी तरफ पर्यावरण रक्षा को लेकर भी वे बड़ी लकीर खींच रहे हैं। केंद्र सरकार के प्रयासों से ही भारत में कोयला खपत वृद्धि में कमी आई है, जो कि भारत का पेरिस समझौते के प्रति पीएम मोदी की संजीदगी को दिखाता है।

कोयले की कम हो रही मांग

ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब भारत में कोयला खपत वृद्धि में तेजी से कमी आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2016 और 2017 को समाप्त हुए दो वित्तीय वर्षों में कोयला खपत में 2.2 प्रतिशत की औसत वृद्धि हुई है, जबकि इससे पहले 10 वर्षों में 6% से अधिक की औसत वृद्धि हुई थी। इसमें सीमेंट और इस्पात कारखानों

ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब भारत में कोयला खपत वृद्धि में तेजी से कमी आई है

का बड़ा योगदान है, क्योंकि कम खपत ने ईंधन के धीमा इस्तेमाल में योगदान दिया है। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि बिजली संयंत्रों और ईंधन के सबसे बड़े उपभोक्ता अपनी क्षमता से कम बिजली का उपयोग कर रहे हैं।

ऊर्जा परिवर्तन के मिलने लगे संकेत

ग्रीनपीस के मुताबिक “यह कहना बहुत जल्दी होगा कि नवीनतम प्रवृत्ति भारत में ऊर्जा परिवर्तन ला सकती है। लेकिन ये संकेत हैं कि यह एक लंबी गिरावट की शुरुआत हो सकती है।” दरअसल भारत के बिजली संयंत्र अपनी क्षमता का लगभग 60 प्रतिशत उपयोग कर रहे हैं , क्योंकि पैसे ना होने की वजह से प्रांतीय बिजली के खुदरा विक्रेता उनसे पर्याप्त बिजली नहीं खरीद पा रहे हैं। सौर और पवन ऊर्जा के घटते टैरिफ भी कोयला परियोजनाओं पर पुनर्विचार कर रही हैं।

कोयले पर निर्भरता घटेगी

दरअसल भारत का काम अभी कोयला के बिना नहीं चल सकता है। इसीलिए कोयले पर निर्भरता दशकों तक जारी रहेगी, लेकिन वायु प्रदूषण पर बढ़ती चिंता से सरकार और कंपनियों को ईंधन का उपयोग अधिक विवेकपूर्ण ढंग से करने के लिए मजबूर कर रहा है। जाहिर है भारत सरकार जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है और इसे

रोकने को कटिबद्ध है। इसीलिए सरकार ऊर्जा के नये स्रोतों, नये विकल्पों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है।

विकसित देशों की बड़ी जिम्मेदारी

चीन और अमेरिका के बाद भारत कार्बन उत्सर्जन में तीसरे नंबर पर जरूर है, लेकिन प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में इन दोनों देशों और अन्य कई देशों से बहुत कम है। बावजूद इसके भारत सरकार पर्यावरण के प्रति अपनी भूमिका निभा रही है और कोयले के समग्र उपयोग में धीरे-धीरे गिरावट निश्चित रूप से भारत को पेरिस समझौते के तहत अपना लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है।

परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा

भारत ने ग्लोबल डील के तहत 2030 तक ऊर्जा के गैर-जीवाश्म स्रोतों से अपनी बिजली का 40% उत्पादन करने के लिए प्रतिबद्ध किया है। इसीलिए, 2021-22 तक 2016-17 से 175 गीगावॉट तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में 30 जीडब्ल्यू के अतिरिक्त लक्ष्य को बढ़ाने के लिए योजना बनाई गई है। ऐसी उम्मीद है कि सौर और पवन ऊर्जा की लागत प्रतियोगिता के कारण निश्चित तौर पर भारत में नवीकरणीय उत्पादकता बढ़ी है।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

विदेश नीति से बढ़ा दुनिया में मान अंतरराष्ट्रीय संबंध

भारत ने अपने पड़ोसियों पर आई आपदा में मदद की। मालदीव का पानी संकट आया तो महज तीन घंटे में रेल नीर भेजा गया। श्रीलंका में मदद की। नेपाल में भी भूकंप के समय मदद की

एक नजर

विदेश नीति की वजह से दुनिया में मजबूत हुई भारत की साख पड़ोसियों की मदद को हरदम तत्पर रहने वाली नीति

विश्व शांति और जन कल्याण है नीति का मूल मंत्र

भी गति मिली। मोदी सरकार की विदेश नीति के कारण पश्चिम एशिया के कतर, ईरान और जॉर्डन जैसे देशों से भी संबंधों में ठहराव को खत्म करने में मदद मिली।

भारत कर सकता है दुनिया का नेतृत्व

कें

एसएसबी ब्यूरो

द्र सरकार के प्रयासों से दुनियाभर में भारत का मान बढ़ा है। मोदी सरकार की विदेश नीति के कारण आज दुनियाभर के सभी प्रमुख देशों के साथ भारत के संबंध को एक नई ऊंचाई मिली है। आज हालत यह है कि भारत बोलता है और पूरी दुनिया गौर से सुनती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत आज ग्लोबल एजेंडा तय कर रहा है। पहले रूस हमारे साथ तो अमेरिका पाकिस्तान के साथ रहता था, लेकिन आज देश की मजबूत विदेश नीति के कारण रूस और अमेरिका दोनों भारत के साथ हैं। आज अमेरिका की अधिकतर नीतियों में भारत को प्राथमिकता दी जा रही है और भारत-अमेरिका के बीच आपसी विश्वास और परस्पर सहयोग नए मुकाम पर पहुंच गया है। आज इजरायल भारत का दोस्त है, तो फिलीस्तीन भी साथ है। पश्चिम एशिया के सभी देशों के साथ भारत के बेहतर संबंध हैं।

आतंक पर पूरी दुनिया का समर्थन

आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता, आतंकवाद तो बस आतंकवाद होता है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की यही बात सालों तक अनसुनी रही, लेकिन अब भारत की बातों को दुनिया मानने लगी है और एक सुर में आतंक की निंदा कर रही है। आतंक के खिलाफ आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, नार्वे, कनाडा, ईरान जैसे देश हमारे साथ खड़े हैं। पाकिस्तान को छोड़कर सार्क के सभी सदस्य देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव और नेपाल हमारे साथ हैं। जी-20 हो या हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन, ब्रिक्स हो या सार्क समिट सभी ने हमारे

साथ आतंकवाद को मानवता का दुश्मन बताते हुए दुनिया को इसके खिलाफ एक होने का आह्वान किया है।

विकासशील देशों के साथ बढ़ा सहयोग

पिछले तीन साल में पड़ोसी देशों के साथ सहयोग का एक नया अध्याय शुरू हुआ है, जिसके तहत श्रीलंका, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार को एक नई गति मिली है। इससे दोनों देशों में न सिर्फ आपसी विश्वास को बढ़ावा मिला, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को

यह मोदी सरकार की विदेश नीति का ही कमाल है कि जब अमेरिका ने खुद को पेरिस समझौते से अलग किया, तो दुनिया की नजर भारत पर ठहर गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व मंच पर अपनी ताकतवर उपस्थिति दर्ज करा चुका है। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसे प्रयास किए हैं, जिनके चलते अब ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े मुद्दे पर उसके लीड करने की उम्मीद काफी बढ़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर ही इंटरनेशनल सोलर एलायंस का गठन हुआ जिसमें 121 देश शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

21 जून, 2015- ये वो तारीख है, जो स्वयं ही एक यादगार तिथि बनकर इतिहास का हिस्सा बन गई है। इसी दिन अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आगाज हुआ और पूरी दुनिया में भारत का डंका बजने लगा। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के प्रस्ताव को जब 193 ने अपना समर्थन दिया ये अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसके साथ ही 177 देशों ने इसका सह-प्रायोजक बनना स्वीकार किया। सबसे खास ये रहा कि इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 75 दिन में ही पूर्ण बहुमत से पारित कर दिया गया। ये संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी प्रस्ताव के पारित होने का सबसे कम समय है।

भारत-अमेरिका के बीच आपसी विश्वास और परस्पर सहयोग नए मुकाम शांति की पहल को दुनिया ने सराहा पर पहुंच गया है। आज इजरायल भारत का दोस्त है, तो फिलीस्तीन भी भारत विश्व शांति का सबसे बड़ा पैरोकार रहा है। साथ है। पश्चिम एशिया के सभी देशों के साथ भारत के बेहतर संबंध हैं यूनाइटेड नेशन ने भी माना है कि इस दिशा में भारत


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

का प्रयास अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है, लेकिन सब जानते हैं कि भारत की शांति की पहल को पाकिस्तान हमेशा नकारता रहा है। बावजूद इसके पीएम मोदी ने अपनी तरफ से हर कोशिश की कि पाकिस्तान भारत के साथ सहयोग की मुख्यधारा में रहे। 25 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री जब लाहौर पहुंच गए तो दुनिया ने देखा कि पीएम मोदी ने शांति की पहल की। 26 मई 2014 को जब पीएम मोदी ने सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रण भेजा था तो ये पड़ोसी देशों के साथ शांति और सहयोग की पहल ही थी। हालांकि पाकिस्तान अब भी शांति की राह में रोड़ा बना हुआ है।

पाक पड़ा अलग- थलग

जम्मू-कश्मीर के उरी में 18 सितंबर, 2016 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 29 सितम्बर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों और लांच पैड को तबाह किया। इस के साथ ही पहली बड़ी सफलता 28 सितंबर को तब मिली जब पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा के तुरंत बाद तीन अन्य देशों (बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान) ने उसका समर्थन करते हुए सम्मेलन में ना जाने की बात कही। वहीं नेपाल ने सम्मेलन की जगह बदलने का प्रस्ताव दिया और पाकिस्तान के आंतकवाद के कारण सार्क सम्मेलन न हो सका।

अरब कूटनीति

भारत की सशक्त विदेश नीति ने चीन और पाकिस्तान की खतरनाक जुगलबंदी को तोड़ने के लिए वियतनाम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों को अपने पक्ष में लामबंद कर चक्रव्यूह तैयार कर लिया है। इस साल 2017 के गणतंत्र दिवस समारोह के लिए अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान को मुख्य अतिथि बनाकर एक अहम कूटनीतिक चाल चली, जिससे पाकिस्तान के होश उड़ गए। यूएई, सऊदी अरब और पाकिस्तान ही ऐसे तीन देश थे, जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबानी शासन को मान्यता दी थी। अब इन सभी से भारत के अच्छे रिश्ते बन गए हैं।

सार्क सैटेलाइट से पाक पर चोट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उम्दा कूटनीति की मिसाल है, दक्षिण एशिया संचार उपग्रह। इसकी पेशकश उन्होंने 2014 में काठमांडू में हुए सार्क सम्मेलन में की थी। यह उपग्रह सार्क देशों को भारत का तोहफा है। सार्क के आठ सदस्य देशों में से सात यानी भारत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव इस परियोजना का हिस्सा बने, जबकि पाकिस्तान ने अपने को इससे यह कहकर अलग कर लिया कि इसकी उसे जरुरत नहीं है, वह अंतरिक्ष तकनीक में सक्षम है। 5 मई 2017 के सफल प्रक्षेपण के बाद इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने जिस तरह खुशी का इजहार करते हुए भारत का शुक्रिया अदा किया उससे उपग्रह से जुड़ी कूटनीतिक कामयाबी का संकेत मिल जाता है, लेकिन पाकिस्तान ने अपने अलग-थलग पड़ने का दोष भारत पर यह कहते हुए मढ़ दिया कि भारत परियोजना को साझा तौर पर आगे बढ़ाने को राजी नहीं था।

भारत की ताकत को चीन ने किया महसूस

चीन के प्रति जिस तरह का आक्रामक रुख भारत ने इस बार अख्तियार कर रखा है, वैसा पहले कभी नहीं दिखा। चीन ने भूटान की सीमा में पड़ने वाले डोकलाम के हिस्से में सड़क निर्माण शुरू किया था। इससे भारत की संप्रभुता भी खतरे में पड़ सकती थी,इसीलिए भारत ने ना सिर्फ चीन की इस हिमाकत का कड़ा विरोध किया,बल्कि चीन के नापाक इरादों पर पानी फेरने के लिए भारतीय सैनिक भी मोर्चे पर जा डटे। अब चीन की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। शायद वो ये बात भूल गया कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उभर रहा ताकतवर भारत है जो किसी भी तरह के दबाव में नहीं आने वाला है। भारत के रुख से चीन को अपने चकनाचूर होने की भयावह तस्वीरों का आभास होने लगा है। पहली बार चीन भारत के सामने खुद को पस्त पा रहा है।

हिंदी बोल रहे हैं विदेशी नेता

भारतीय विदेश नीति का यह असर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां भी जाते हैं विदेशी नेता उनकी

14 - 20 अगस्त 2017

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भारत की सशक्त विदेश नीति ने चीन और पाकिस्तान की खतरनाक जुगलबंदी को तोड़ने के लिए वियतनाम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों को अपने पक्ष में लामबंद कर चक्रव्यूह तैयार कर लिया

अगवानी में ना सिर्फ पलक-पांवड़े बिछा देते हैं, बल्कि हिंदी बोलने और लिखने लगते हैं। जॉन रूट से लेकर बेंजामिन नेतन्याहू तक सब हिंदी में पीएम मोदी से मुलाकात की शुरुआत कर रहे हैं। मोदी सरकार की विदेश नीति के कारण आपदा प्रबंधन से कई देशों के साथ संबंध और मजबूत हुए हैं।

मालदीव के लोगों की प्यास बुझाई

दिसंबर 2014 में मालदीव का वाटर प्लांट जल गया, जिससे पूरे देश में पीने के पानी की किल्लत हो गई। पूरे देश में त्राहिमाम मच गया और आपातकाल की घोषणा कर दी गई। तब भारत ने पड़ोसी का फर्ज अदा किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्वरित फैसला लिया। मालदीव को पानी भेजने का निर्णय कर लिया गया और इंडियन एयर फोर्स के 5 विमान और नेवी शिप के जरिए पानी पहुंचाया जाने लगा।

नेपाल भूकंप में राहत का अद्भुत उदाहरण

25 अप्रैल 2015 को नेपाल की धरती में हलचल हुई और आठ हजार से ज्यादा जानें एक साथ काल के गाल में समा गईं। जान के साथ अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ सो अलग। हलचल नेपाल में हुई लेकिन दर्द भारत को हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और नेपाल के लिए भारत की मदद के द्वार खोल दिए। नेपाल में जिस तेजी से मदद पहुंचाई गई वो अद्भुत था। भारतीय आपदा प्रबंधन की टीम ने हजारों जानें बचाईं। सबसे खास रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय का नेपाल सरकार से बेहतरीन समन्वय रहा। प्रधानमंत्री मोदी की इस पहल की पूरे विश्व ने सराहना की।

यमन और खाड़ी देशों में राहत कार्य

जुलाई 2015 में यमन गृहयुद्ध की चपेट में था और सुलगते यमन में पांच हजार से ज्यादा भारतीय फंसे हुए थे। बम गोलों और गोलियों के बीच हिंसाग्रस्त देश से भारतीयों को सुरक्षित निकालना मुश्किल लग रहा था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कुशल नेतृत्व और विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह के सम्यक प्रबंधन और अगुवाई ने कमाल कर दिया। भारतीय नौसेना, वायुसेना और विदेश मंत्रालय के बेहतर समन्वय से भारत के करीब पांच हजार नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया वहीं 25 देशों के 232 नागरिकों की भी जान बचाने में भारत को कामयाबी मिली। इस सफलता से भारत ने विश्वमंच पर अपना लोहा मनवाया।

अफगानिस्तान में भूकंप में राहत

अक्टूबर 2015 में अफगानिस्तान-पाकिस्तान में 7.5 तीव्रता के भूकंप से करीब 300 लोगों की मौत हो गई। पीएम मोदी ने तत्काल दोनों देशों को मदद की पेशकश की। अफगानिस्तान में भारतीय राहत टीम को बिना देर किए रवाना किया गया और मलबे में फंसे सैकड़ों लोगों को निकालने में सफलता पायी।

सऊदी अरब में फंसे हजारों भारतीयों को निकाला

सऊदी अरब में गलत हाथों में जाकर फंसे करीब 20 हजार भारतीय तीन महीने के भीतर अपने वतन वापस लौट पाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के प्रयास से सऊदी अरब सरकार ने भारतीयों को 90 दिन के लिए ‘राजमाफी’ दी है। ‘राजमाफी’ के तहत 20 हजार से ज्यादा लोगों ने भारत लौटने के लिए अर्जी दाखिल की है।


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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

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करघे पर बुनी प्रगति हथकरघा उद्योग

हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण भारत में कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्र है और यह विभिन्न समुदायों के 4.33 मिलियन लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है

एक नजर

एक आकलन के मुताबिक देश भर में 2.38 मिलियन करघे चल रहे हैं हथकरघा ग्रामीण भारत में कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता

हथकरघा का कपड़ा उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान है

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एसएसबी ब्यूरो

जी से आ रहे बदलावों के बावजूद, कला एवं करघा परंपराएं कलाकारों और शिल्पकारों की कई पीढ़ियों के सतत प्रयासों के कारण अब तक जीवित रही हैं, जिन्होंने अपने सपनों एवं विजन को उत्कृष्ट हथकरघा उत्पादों में पिरोया और अपने कौशल को आने वाली पीढ़ियों तक रूपांतरित किया। विविध रंगों, आंखों को सुकुन देने वाले डिजाइन, चमचमाते रूपों, शानदार ताना बाना और उनकी खूबसूरत बुनावट इन कपड़ों में एक विशिष्ट आकर्षण पैदा कर देती है। देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र से लेकर कश्मीर और दक्षिणवर्ती हिस्से तक इन कपड़ों की विशिष्टताएं एक अनूठी और मोहक आकर्षण जगाती हैं। सदियों से, हथकरघा का संबंध कपड़ों से जुड़ी उत्कृष्ट भारतीय कारीगरी और लगभग प्रत्येक राज्य में लाखों हथकरघा कारीगरों को रोजगार का स्रोत उपलब्ध कराने से जोड़ा जाता रहा है। प्राचीन काल से ही, भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहचान उनकी दोषरहित गुणवत्ता से की जाती

रही है। इनमें चंदेरी का मलमल, वाराणसी के सिल्क के बेल बूटेदार वस्त्र, राजस्थान एवं ओडिशा के बंधेज की रंगाई, मछलीपट्टिनम के छींटदार कपड़े, हैदराबाद के हिमरूस, पंजाब के खेस, फर्रुखाबाद के प्रिंट, असम एवं मणिपुर के फेनेक तथा टोंगम तथा बॉटल डिजाइन, मध्य प्रदेश की महेश्वरी साड़ियां और वडोदरा की पटोला साड़ियां शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कांचीपुरम एवं बनारसी सिल्क, छत्तीसगढ़ एवं असम के कोसा एवं मोगा सिल्क, या बंगाल की जामदानी, भागलपुरी सिल्क, मध्य प्रदेश की चंदेरी और ओडिशा के टसर और इकात जैसे इन विशिष्ट हथकरघा उत्पादों के निर्माण में शामिल कौशल देश की विशेष सांस्कृतिक पूंजी का हिस्सा

हैं। हालांकि, आज हल्के पश्चिमी परिधान पसंद किए जाते हैं, लेकिन हममें से अधिकांश लोग शादी-विवाह एवं त्योहारों जैसे विशेष अवसरों पर सर्वाधिक जटिल ढंग से बुने पारंपरिक परिधान पहनना नहीं भूलते। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने हथकरघा बुनकरों को तथा पावरलूम तथा मिल क्षेत्रों के अतिक्रमण से इस उद्योग की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने तथा खादी को सम्मान देने की गांधीवादी विरासत को संरक्षित करने के लिए कई उपाय किए हैं। हथकरघा (उत्पादन के लिए सामग्रियों का आरक्षण) अधिनियम, 1985 ने किनारी वाली साड़ियों, धोती, लुंगी जैसी 22 पारंपरिक वस्त्रों को विशिष्ट हथकरघा उत्पादन से अलग कर दिया और उन्हें पावरलूम क्षेत्र

जुलाई 2016 में कपड़ा मंत्रालय का पदभार ग्रहण करने के बाद से ही केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने सोशल मीडिया पर पिछले अगस्त से अपने ‘आई वियर हैंडलूम’ अभियान के साथ एक उदाहरण स्थापित किया है

के दायरे से बाहर कर दिया, लेकिन जब आठ वर्षों और पावरलूम क्षेत्र द्वारा एक लंबी मुकदमेबाजी के बाद 1993 में यह कानून प्रभावी हुआ, तो आरक्षित सूची में केवल 11 मद थे। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में, ग्राहकों की बदलती अभिरुचियों, व्यापार प्रचलनों, चीनी क्रेप यार्न के शुल्क मुक्त आयातों जैसे कई कारकों के सम्मिश्रण की वजह से उत्पादन प्रभावित हुआ और बुनकर मजदूर बन गए। धीरे धीरे, लोगों के रुझान में परिवर्तन आया और पारंपरिक शिल्पकारों को अपनी आजीविका बनाये रखना कठिन हो गया। बहरहाल, 2015 से साड़ियों ने हथकरघा में लोगों की दिलचस्पी फिर से इतनी अधिक बढ़ा दी, जितनी पहले कभी नहीं थी। हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण भारत में कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्र है और यह विभिन्न समुदायों के 4.33 मिलियन लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है जो देश भर में 2.38 मिलियन करघों से जुड़े हुए हैं। यह देश में कपड़ा उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देता है और निर्यात आयात में भी सहायता करता है। विश्व में हाथ से बुने हुए 95 प्रतिशत कपड़े भारत के ही होते हैं। हथकरघा उद्योग के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता को स्वीकार करते हुए, सरकार हाथ से बुने कपड़ों और बुनकरों के पुनरुत्थान के प्रति प्रतिबद्ध है। 2015 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 1905 में आरंभ स्वदेशी आंदोलन की याद में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया और इस दिवस को देश के बुनकरों को समर्पित कर दिया और पांच ‘एफ’ का फार्मूला दिया। इसके साथ ही सरकार ने फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैब्रिक, फैब्रिक टू फैशन एवं फैशन टू फॉरेन के अपने चुनावी वादे को पूरा किया। प्रधानमंत्री ने ग्राहकों का विश्वास जीतने के लिए सामाजिक एवं पर्यावरण अनुकूलता के अतिरिक्त कच्चा माल, प्रसंस्करण, बुनावट एवं अन्य मानदंडों


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हथकरघा उद्योग

टेक्सटाइल इंडस्ट्री का कायाकल्प

सरकार की कड़ी मेहनत का असर टेक्सटाइल इंडस्ट्री में दिखने लगा है। पिछले दो सालों में इस उद्योग में निवेशकों का रुझान बढ़ा है

हाथ से बुनाई की जाने वाली विरासत की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, देश भर में स्थित नौ भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान अगली पीढ़ी को हथकरघा बुनाई में विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं के लिहाज से उत्पादों की गुणवत्ता के समर्थन के लिए उसी दिन ‘भारत हथकरघा‘ ब्रांड (आईएचबी) भी लांच किया। आईएचबी ने उच्च गुणवत्तापूर्ण हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए ग्राहकों के बीच जागरुकता निर्माण करने एवं इसके लिए एक विशिष्ट पहचान बनाने में सहायता देने के लिए शीघ्र ही सोशल मीडिया पर ग्राहकों, विशेष रूप से, युवाओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। जुलाई 2016 में कपड़ा मंत्रालय का पदभार ग्रहण करने के बाद से ही केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने सोशल मीडिया पर पिछले अगस्त से अपने ‘आई वियर हैंडलूम’ अभियान के साथ एक उदाहरण स्थापित किया है। सरकार ने भी हथकरघाओं को पुनरुजीवित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने बुनकरों की आय बढ़ाने पर विशेष बल दिया है जिससे युवा पीढ़ी आकर्षित होकर इस पेशे से जुड़ सकती है। इन कदमों में क्लस्टरों में बुनकरों को संगठित रूप देना एवं समान सुविधा केंद्रों के निर्माण के जरिए उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना शामिल हैं। हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए कपड़ा मंत्री ने अभी हाल में एक अनूठी सार्वजनिकनिजी साझीदारी के जरिए देश के अग्रणी डिजाइनरों को एक साथ लाने का काम किया है। उनमें से एक दर्जन से भी अधिक डिजाइनरों को उत्पाद विकास एवं बुनकरों को उनके कौशल को उन्नत बनाने हेतु उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए हैंडलुम क्लस्टर सौंपे गए। अन्य कदमों में- ई कॉमर्स के जरिए उत्पादों को बेचने के लिए बुनकरों को प्रोत्साहित करना, बुनकरों के परिवारों के शिक्षित युवाओं को बुनकर उद्यमियों के रूप में प्रोत्साहित करना जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से बाजार सूचना, उत्पाद एवं बाजार कपड़ा प्राप्त होगा, बाजार को विस्तारित करने एवं आय में बढोतरी करने के लिए हथकरघा को फैशन एवं पर्यटन से जोड़ना,

और डिजाइन विकास तथा विपणन में निजी क्षेत्र को सम्मिलित करना शामिल है। कपड़ा मंत्रालय सभी प्रकार के कपड़ों के लिए भारत को एक वैश्विक सोर्सिंग केंद्र बनाने का सतत प्रयास कर रहा है, जिससे कि भारत का हथकरघा अंतरराष्ट्रीय फैशन उद्योग में अपना विशेष योगदान दे सके। बुनकरों की सुविधा, उत्पादकता एवं गुणवत्ता के लिहाज से हाथ से बुनाई की जाने वाली प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाने के प्रयास जारी हैं। हाथ से बुनाई की जाने वाली विरासत की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, देश भर में स्थित नौ भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान अगली पीढ़ी को हथकरघा बुनाई में विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। आधुनिक विश्व में ग्राहकों की बदलती मांग की पूर्ति करने के लिए, भारत में हथकरघा बुनाई रोजाना विकसित हो रही है। भारी खेसमंट, पुनरावर्तित गलीचा एवं मोटे कपास में जैकक्वार्ड बुने कपड़े तथा रेशमी कपड़े आज सबसे के पसंदीदा वस्त्र बन गए हैं। हाथ से बुनने वाले बुनकर कपास एवं रेशम में घरों के लिए सजावटी एवं फर्निशिंग कपड़ों की विशाल श्रृंखला प्रस्तुत करते हैं। हाथ से बुने उत्पादों के निर्यात में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान गृह कपड़ा उत्पादों का होता है। सेलेब्रिटी और डिजायनर लगातार दुनिया भर में भारतीय हथकरघों को फैशन स्टेटमेंट बनाए रखते हैं। हथकरघा उत्पादन की विकेंद्रित प्रकृति और पर्यावरण पर इसका गैर-प्रदूषणकारी प्रभाव इसे भविष्य में एक पसंदीदा क्षेत्र बनाता है। एक निम्न पूंजी-उत्पादन अनुपात के साथ, इस क्षेत्र की मजबूती इसके अनूठेपन, समृद्ध परंपरा, लघु उत्पादन के लचीलेपन, नवोन्मेषण के प्रति खुलेपन और आपूर्तिकर्ताओं की जरुरतों के प्रति अनुकूलता में निहित है।

रेंद्र मोदी सरकार की कड़ी मेहनत का असर टेक्सटाइल इंडस्ट्री में दिखने लगा है। पिछले दो सालों में इस उद्योग में निवेशकों का रुझान बढ़ा है। आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 में जहां केवल 230.13 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ। वहीं दूसरे वित्तीय वर्ष 201617 में निवेश का आंकड़ा लगभग तीन गुणा हो गया है। चालू वित्तीय वर्ष के मात्र दो महीने में ही इस इंडस्ट्री में निवेश का आंकड़ा 21.41 मिलियन अमेरिकी डॉलर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सकारात्मक सोच और एग्रेसिव एप्रोच के कारण विगत तीन साल में टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने मार्केटिंग के लिए 849 कार्यक्रम आयोजित किए। इन कार्यक्रमों के परिणाम अब सामने आ रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से अब तक 8.5 लाख से अधिक बुनकरों को लाभ मिल चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने बुनकरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव के लिए प्रधानमंत्री परिधान रोजगार प्रोत्साहन योजना की शुरुआत की। अब तक इस योजना के माध्यम से 500 यूनिटों का पंजीकरण हो चुका है। इस योजना के माध्यम से टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक लाख अस्सी हजार नए कारीगर जुड़े।

गौरतलब है कि पिछले महीने ही 30 जून 2017 को गुजरात के गांधी नगर में ‘टेक्सटाइल इंडिया 2017' के नाम से प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसका उद्घाटन पीएम मोदी ने किया था। तब उन्होंने कहा था कि टेक्सटाइल के क्षेत्र में अब तक जितनी भी प्रदर्शनियां हुई हैं, उन सबमें अबकी बार की प्रदर्शनी कई गुना उत्तम है। इस कार्यक्रम में गुजरात और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्रियों समेत दुनिया भर के 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। (एजेंसी)


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14 - 20 अगस्त 2017

सामाजिक न्याय

एसएसबी ब्यूरो

रत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जिसने अपनी स्वाधीनता के बाद सामाजिक न्याय की चुनौती को न सिर्फ कबूला, बल्कि उसे विधिक से लेकर राजनीतिक स्तर तक तार्किक समाधान देने की भी भरसक कोशिश की है। हमारे देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी अनुसूचित जातियों के लोगों की है। एक लंबे समय तक सामाजिक बहिष्कार होने के कारण समाज का एक वर्ग व्यक्तिगत वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक अवसरों से वंचित रहा है। बाबा साहेब आंबेडकर ने इस वर्ग को 'वंचित वर्ग' कहा। इसी पृष्ठभूमि से आने वाले बाबा साहेब इस वर्ग की जरूरतों और चुनौतियों से परिचित थे। अपने सार्वजनिक जीवन में बाबासाहेब ने कई उपलब्धियों की ऊंचाइयों को छुआ। विश्व के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर वे समुदाय के हित में कार्य करने के लिए स्वदेश लौटे। भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के चलते उन्होंने तथाकथित वंचित वर्गों से आने वाले लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में विशेष प्राथमिकता की व्यवस्था सुनिश्चित की। विशिष्ट क्षेत्रों में सकारात्मक कार्रवाई के अलावा उन्होंने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण के माध्यम से उन्होंने समाज में सामाजिक और राजनीतिक रूप से वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया। हालांकि संसद के ऊपरी सदन (राज्य सभा) और राज्य विधान परिषदों के लिए नामांकन में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया था।

प्रतिनिधित्व और नेतृत्व

इतिहास आमतौर पर व्यक्तियों और परिस्थितियों के परस्पर संबंधों का उत्पाद होता है। इसी तरह दलित इतिहास भी कई ऐसे नायक और नायिकाओं के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने खुद के विपरीत सामाजिक परिस्थितियों के बीच तमाम चुनौतियों को मुहंतोड़ जवाब दिया और पूरी ताकत के साथ ऊपर आए। दक्षायनी वेलायुदान भारतीय संविधान सभा की पहली महिला दलित सदस्य थीं। वह देश के संविधान का प्रारूप तैयार करने वालों में वह भी शामिल थीं। बाबू जगजीवन राम आजाद भारत के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य बने। 1971 के युद्ध के दौरान उन्होंने रक्षा मंत्री के पद पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी युद्ध की बदौलत एक नए देश का जन्म हुआ। अमेरिकी राजनयिक और 'द ब्लड टेलीग्राम' के लेखक गेरी बास ने उन्हें सबसे तेजतर्रार रक्षा मंत्री बताया है। इसी तरह ऐसी कई दिग्गज

एक नजर

संविधान के अनुच्छेद 17 के जरिए सामाजिक सुधार की अहम कोशिश अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को एसटी-एससी के हितों को प्रोत्साहन गरीबों के लिए प्रधानमंत्री जन धन योजना बड़ा कदम

न्याय का फैला सामाजिक धरातल

वंचित वर्ग को देश की मुख्यधारा में शामिल करने व उन्हें सशक्त बनाने के लिए भारतीय संविधान में कई विशेष प्रावधान किए गए हैं। संविधान की इस मूल भावना के मुताबिक सरकार भी कई कदम उठा रही है हस्तियां हुई हैं, जिन्होंने दलित समुदाय के भविष्य के लिए अपने वर्तमान की कुर्बानी दे दी।

संवैधानिक कवच

वैश्विक रूप से ऐसे कई पुख्ता संवैधानिक उपाय किए गए हैं, जो समाज के कमजोर तबकों के लिए न्याय सुनिश्चित करते हैं। अमेरिकी समाज भी विविधताओं से भरा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, अमेरिकी नागरिकों, जो अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के हैं, को भी स्थानीय प्रभावशाली व वर्चस्व वाले लोगों द्वारा किए गए दुर्भाग्यपूर्ण भेदभाव का शिकार होना पड़ा। इस बात को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी नीतिनिर्माताओं ने 'अफरमेटिव एक्शन' और 'पॉजिटिव डिस्क्रीमेशन' के लिए नियम बनाए। महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रभावी प्रतिनिधित्व और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के लिए इस तरह की प्रावधान किए जाते हैं। देश के इतिहास में पीछे छूट गए लोगों को मुख्यधारा में शामिल करने व उन्हें सशक्त बनाने के लिए भारतीय संविधान में भी इसी तरह के विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 17 को सामाजिक सुधार लाने की दिशा में एक अग्रणी प्रयास माना जाता है। इस अनुच्छेद को लागू करके आजाद भारत की सरकार ने सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए पूरी ईमानदारी से काम किया। संविधान निर्माताओं ने न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को अपराध की श्रेणी में लाया, बल्कि इस तरह के भेदभाव के लिए दंड का भी प्रावधान किया। इसी तरह अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के हितों को प्रोत्साहन देने और उनके आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए काम करने और उन्हें भेदभाव तथा शोषण से बचाने का अधिकार दिया गया है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अनुच्छे द 15(4) के माध्यम से राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों एवं अनुसूचित जातियों के लिए विशेष प्रावधान करने के सशक्त बनाया गया है। यह अनुच्छेद राज्यों को शैक्षणिक

संस्थानों में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए सीटें आरक्षित करने के समर्थ बनाता है। अनुच्छेद 335 एससी/एसटी के लिए शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले को लेकर आवश्यक क्वालिफाइंग मार्क्स में छूट का प्रावधान करने के लिए समर्थ बनाता है। इसी तरह अनुच्छेद 243डी प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है। जहां अनुच्छेद 243टी हर नगरपालिका में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है, वहीं अनुच्छेद 330 लोक सभा में अनुसूचित जनजातियों व अनुसूचित जातियों के लिए सीटों का आरक्षण का प्रावधान करता है। इसी तरह अनुच्छेेद 332 राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों व अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है।

को सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा मुहैया कराने के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (दुर्घटना बीमा), अटल पेंशन योजना (असंगठित क्षेत्र) और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना (जीवन बीमा) जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की गई हैं। समाज के सबसे कमजोर तबकों में उद्यमशीलता की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए हाल ही में स्टैंड अप योजना शुरू की गई। ये विशेष वर्ग हैं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाएं। इस योजना के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रत्येक शाखा से कहा गया है कि वह महिला एवं एससी/एसटी वर्ग से एक-एक उद्यमी को सपोर्ट करें।

अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक अन्य प्रावधान है, जो जातीय हिंसा और भेदभाव से संरक्षण उपलब्ध कराता है। हाल ही के कुछ संशोधनों ने इस अधिनियम को और सशक्त बना दिया है।

मउ में भव्य स्मारक का निर्माण करवाया है। महाराष्ट्र सरकार ने लंदन में स्थित 10, किंग हेनरी रोड पर स्थित घर को खरीद लिया है जहां बाबा साहेब ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में अपनी यात्रा के दौरान इसका उद्घाटन किया। ये सभी योजनाएं स्पष्ट रूप से दलितों एवं अन्य वंचित वर्गों के उत्थान के प्रति मौजूदा सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। गरीबी को खत्म करने और समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने के लिए वर्तमान सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। अलबत्ता आखिर में यह जरूर कहना होगा कि देश में सामाजिक न्याय के मोर्चे पर काफी कुछ तो किया गया है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी भी है।

पंचतीर्थ

भारत सरकार ने बाबा साहेब आंबेडकर से जुड़े स्थलों को ‘पंचतीर्थ’ घोषित करने का फैसला किया है। मध्य प्रदेश की सरकार ने आंबेडकर की जन्मस्थली

भारत सरकार ने बाबा साहेब आंबेडकर से जुड़े स्थलों को ‘पंचतीर्थ’ घोषित करने का फैसला किया है

सरकार की नई योजनाएं

सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार लगातार कृत संकल्प रही है। इस लिहाज से सबसे अहम कदम है- प्रधानमंत्री जन धन योजना। यह एक बहुत महत्वपूर्ण योजना है जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को बैंक खाते उपलब्ध करवाकर वित्तीय अस्पृश्यता को समाप्त करने का प्रयास करती है। इसी तरह समाज में हाशिए पर जा चुके वर्गों


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

पधारो म्हारे देस..! पर्यटन विकास

दुनिया भर के पर्यटक भारत आकर भांति-भांति के जो अनुभव हासिल करते हैं, वही इसे स्वर्ग के समान और ‘अतुल्य’ बनाते हैं

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एसएसबी ब्यूरो

हियान-ह्वेनसांग से लेकर कई ऐसे ऐतिहासिक पर्यटक हुए, जिन्हें भारत भ्रमण अभिभूत कर गया। मार्क ट्वेन ने तो भारत के बारे में यहां तक लिखा, ‘एक ऐसी जगह जिसे सभी लोग देखना चाहते हैं और एक बार इसके दर्शन कर लेने के बाद, भले ही उन्होंने इसकी केवल झलक भर देखी हो, दुनिया की तमाम छवियों को इस एक झलक पर न्योछावर करने को तैयार हो जाते हैं।’ भारत के पर्यटन विकास के लिए ‘अतुल्य भारत’ का संदेश दिया गया है। इन दो शब्दों को सुनते हुए अनेक अनोखे चित्र उभरते हैं, जिनमें उत्तर में हिमालय की हिम मंडित चोटियों से लेकर पश्चिम में फैला विशाल मरुस्थल, पूर्व की अनोखी वनस्पतियां, गर्म जलवायु के वर्षावन, मनोहर झीलें, रमणीक समुद्र तट और दक्षिण में मानसून की वर्षा की फुहारें शामिल हैं। इसके अलावा भी यहां बहुत कुछ है, जैसे कई ऐतिहासिक व सांस्कृतिक स्थल, जो देश की उस विविधता को प्रदर्शित करते हैं, जो सदियों पुरानी है। दुनिया भर के पर्यटक भारत आकर भांति-भांति के जो अनुभव हासिल करते हैं, वही इसे स्वर्ग के समान और ‘अतुल्य’ बनाते हैं। यह एक ऐसा स्वर्ग है, जहां आने की चाहत वे बार-बार अपने मन में करते हैं। जहां दुनिया के अनेक देशों में पर्यटकों को छुट्टियां मनाते हुए सिर्फ एक तरह का अनुभव प्राप्त होता है, वहीं भारत में उन्हें जलवायु, भूगोल, संस्कृति, कला, साहित्य और खान-पान संबंधी विविध अनुभव हासिल होते हैं। देश के इस अतुल्य धरोहर, विरासत और प्रकृति का लाभ उठाने के लिए सरकार ने जो अनेक योजनाएं बनाई हैं, उनके अच्छे परिणाम सामने आने लगे हैं। भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या और उससे सरकार के राजस्व तथा विदेशी मुद्रा की आय में बढ़ोतरी इसका स्पष्ट

प्रमाण हैं। सरकार अपनी नई पर्यटन नीतियों और कार्यक्रमों से जिन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है, उनमें पर्यटन से देश की अर्थव्यवस्था और राजस्व का समावेशी एवं निरंतर विकास, रोजगार के अवसरों का सृजन, विदेशी निवेश में वृद्धि तथा दुनिया के देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों में मजबूती सम्मिलित हैं। भारत सदियों से विदेशी यात्रियों, पर्यटकों और व्यापारियों के आकर्षण का केंद्र जरूर रहा है, लेकिन यह भी तथ्य है कि आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में पर्यटन क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। उस समय कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यह बड़े पैमाने पर आमदनी उपलब्ध कराने वाला उद्योग साबित हो सकता है। 1966 में भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) का गठन किया गया। इसका मूल्य उद्देश्य देश में पर्यटन के बुनियादी ढांचे और सेवाओं का विकास करना था। इसी तरह के संगठन राज्यों में भी बनाए गए। पर्यटन क्षेत्र की गतिविधियों और नीतिगत पहलों ने 1980 के दशक के बाद सही मायने में गति पकड़ी। 1982 में यानी देश की आजादी के 35 साल बाद भारत में पहली बार पर्यटन के बारे में राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई। इसी वर्ष भारत में एशियाई खेलों की मेजबानी करने की योजना भी बनी थी, जिसके तहत विदेश से बड़ी संख्या में लोगों के आगमन की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए विदेशी मेहमानों के रहने, ठहरने और मनोरंजन की सुविधाओं को केंद्र बनाकर देश में पर्यटन पर जबरदस्त चर्चा भी छिड़ी। पर्यटन के बारे में आम दिलचस्पी और बहस

से ही पहली राष्ट्रीय पर्यटन नीति का जन्मा हुआ जिसके तहत इस क्षेत्र के विकास के लिए एक कार्य योजना तैयार की गई। इसके बाद के दशकों में भारत की वैश्विक छवि में बदलाव आया और भारत झुग्गी -झोंपड़ियों वाले और गरीबी से ग्रस्त देश की बजाय विकासशील देश और उसके बाद उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में सामने आने लगा। इससे बाद के दशकों में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या। में लगातार तेजी से बढ़ी। एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2002 में सरकार ने नई पर्यटन नीति तैयार की जिसका उद्देश्य था पर्यटन को देश के आर्थिक विकास के प्रमुख कारक के रूप में प्रतिष्ठित करना और रोजगार तथा गरीबी उन्मूलन में इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का इस तरह से फायदा उठाना जिससे कि पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल असर न पड़ने पाए। ‘अतुल्य भारत’ की आत्मा, विविधता में एकता में अंतर्निहित है। देश का प्रत्येक क्षेत्र सैलानियों को अपने तरह का अनोखा अनुभव देता है जो शेष भारत से एकदम अलग होता है। देश के उत्तरी भाग में पर्यटक बर्फ से ढंकी चोटियों और वादियों के बीच पर्वतीय क्षेत्र का आनंद उठा सकते हैं तो दक्षिण में सागर का अनंत विस्तार उन्हें खूबसूरत तटों, झीलों और नदियों के मनोरम दृश्यों की जो झलक दिखाता है उसका अनुभव एकदम अलग होता है। अंडमाननिकोबार द्वीप समूह या लक्ष्य द्वीप में समुद्री जीवों और शांत द्वीपों की पवित्र सुंदरता के दर्शन होते हैं। दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समागम- कुंभ मेले में

जनवरी से मई 2017 के दौरान भारत को पर्यटन से 74,008 करोड़ रुपए की आमदनी हुई, जो 19.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है

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एक नजर

1966 में आईटीडीसी का गठन किया गया

1982 में राष्ट्रीय पर्यटन नीति की घोषणा की गई 2002 में एनडीए सरकार ने नई पर्यटन नीति तैयार की

भाग लेकर पर्यटक भारत की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन सकते हैं। इसी तरह देश के विभिन्न भागों में आयोजित किए जाने वाले वार्षिक साहित्योत्सव देश की कला और साहित्य की समृद्ध परम्परा की स्पष्ट झांकी प्रस्तुत करते हैं। इस तरह भारत के अनोखे गंतव्य स्थल, यहां के ग्रामीण अंचल, रंगारंग उत्सव, रं‍गबिरंगी पोशाकें, पारंपरिक पकवान और विभिन्न आस्था वाले लोगों का आपस में मिलजुल कर रहना एक ऐसा आकर्षण है जो छुट्टियां बिताने के लिए विदेश यात्राएं करने वाले पर्यटकों के लिए भारत को एक बेमिसाल जगह बना देता है। देश में पर्यटन की संभावनाओं के विस्तार और इसमें विविधता लाने तथा इसे साल के सभी दिनों पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनाए रखने के लिए ‘नीश टूरिज्म प्रोडक्ट्स ‘ यानी खास तरह के पर्यटकों के लिए खास तरह की सुविधाओं की शुरुआत से भी विदेशी पर्यटकों की संख्यान में इजाफा हुआ है। इस तरह के नीश प्रोडक्ट्स (विशिष्ट पर्यटक सुविधाओं) में वन्यजीव एवं पारिस्थितिकीय पर्यटन, बैठक, प्रोत्साहन, सम्मेलन और कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पर्यटन, टिकाऊ पर्यटन, गोल्फ पर्यटन, पोलो पर्यटन, चिकित्सा पर्यटन और स्वास्थ्य पर्यटन आदि शामिल हैं। इधर वीजा ऑन अराइवल सुविधा और ई-टूरिज्म वीजा सुविधा प्रारंभ किए जाने से भी भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई 2017 में भारत आए विदेशी पर्यटकों की संख्या 6.30 लाख तक पहुंच चुकी थी, जबकि मई 2016 में यह 5.27 लाख और मई 2015 में 5.09 लाख थी। जनवरी से मई 2017 के दौरान भारत को पर्यटन से 74,008 करोड़ रुपए की आमदनी हुई, जो 19.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी को दर्शाता है। सरकार आध्यात्मिक पर्यटन और तीर्थ पर्यटन को बढ़ावा देने पर विशेष रूप से ध्यान दे रही है। इससे भी पर्यटन क्षेत्र की क्षमता का और अधिक उपयोग हो सकेगा और भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी। पर्यटन की संभावनाओं वाले सर्किटों के योजनाबद्ध और प्राथमिकता के आधार पर विकास के लिए सरकार ने ‘स्वदेश दर्शन’ नाम की योजना शुरू की है। इसका उद्देश्य लोगों में संस्कृति और विरासत के महत्व के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए देश में पर्यटन को बढ़ावा देना है। विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर भारत के बढ़ते महत्व को ध्यान में रखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी।


28 साल 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1857 1858 1858 1858 1859 1876 1885 1898 1905 1905 1906 1908 1908 1909 1911 1912 1912 1914 1914 1915 1916 1916 1916 1917 1917 1918 1918 1918 1919 1919 1919 1920 1920 1920 1920 1921 1922 1922 1925

14 - 20 अगस्त 2017

स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

स्वतंत्रता संग्राम की समयरेखा

स्थान बरहमपुर मेरठ अंबाला बैरकपुर लखनऊ कानपुर झांसी मेरठ कानपुर झेलम गुरदासपुर कलकत्ता ग्वालियर झांसी शिवपुरी बॉम्बे सूरत बंगाल ढाका मांडले दिल्ली दिल्ली दिल्ली

कोलकाता मुंबई लखनऊ पुणे मद्रास चंपारण चंपारण खेड़ा अमृतसर

कलकत्ता मालाबार चौरीचौरा इलाहबाद काकोरी

घटना 19वीं इंफेंट्री के सिपाहियों का राइफल अभ्यास से इंकार सैनिक विद्रोह अंबाला में व्यापक गिरफ्तारियां मंगल पांडे का ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला और बाद में मंगल पांडे को फांसी लखनऊ में विद्रोह दूसरी कैवलरी का विद्रोह, सतीचैरा घाट नरसंहार, बीबी घर में महिलाओं और बच्चों का नरंसहार रानी लक्ष्मीबाई का दत्तक पुत्र के अधिकार को नकारे जाने के प्रति विरोध प्रदर्शन और हमलावर सेनाओं से झांसी को बचाने का सफल प्रयास सिपाहियों और भीड़ द्वारा 50 यूरोपियों की हत्या कानपुर की दूसरी लड़ाईः तात्या टोपे ने कंपनी की सेना को हराया देसी सेना द्वारा ब्रिटिश विरोधी गदर त्रिम्मू घाट की लड़ाई ईस्ट इंडिया कंपनी का खात्मा ग्वालियर की लड़ाई, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई ने मराठा बागियों के साथ सिंधिया शासकों के कब्जे से ग्वालियर छुड़ाया रानी लक्ष्मीबाई की मौत तात्या टोपे गिरफ्तार और उनकी हत्या महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित ए ओ ह्यूम द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन लॉर्ड कर्जन वायसराय बने स्वदेशी आंदोलन शुरू बंगाल का विभाजन ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन 30 अप्रैल को खुदीराम बोस को फांसी राजद्रोह के आरोप में तिलक को छह साल की सजा मिंटो-मार्ले सुधार या इंडियन काउंसिल एक्ट दिल्ली दरबार आयोजित, बंगाल का विभाजन रद्द नई दिल्ली भारत की नई राजधानी बनी लॉर्ड हार्डिंग की हत्या का दिल्ली साजिश मामला सेन फ्रांसिसको में गदर पार्टी का गठन कोमारगाता मारु घटना गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु लखनऊ एक्ट पर हस्ताक्षर तिलक द्वारा पुणे में पहली इंडियन होम रुल लीग का गठन एनी बेसेंट द्वारा होम रुल लीग का नेतृत्व महात्मा गांधी द्वारा बिहार में चंपारण आंदोलन शुरू राज्य सचिव एडविन शमूएल मोंटेगू द्वारा मोंटेगू घोषणा चंपारण अगररिया कानून पास खेड़ा सत्याग्रह भारत में ट्रेड संघ आंदोलन शुरू जलियांवाला बाग नरसंहार लंदन में इंपिरियल लेजिसलेटिव काउंसिल द्वारा रॉलेट अधिनियम पास खिलाफत आंदोलन शुरू तिलक ने कांग्रेस डेमोक्रेटिक पार्टी गठन किया असहयोग आंदोलन शुरू नारायण मल्हार जोशी के नेतृत्व में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस शुरू गांधी जी द्वारा प्रस्ताव पारित जिसमें अंग्रेजों से भारत को अधिराज्य का दर्जा देने को कहा गया मोपला विद्रोह चौरीचौरा घटना सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में स्वराज पार्टी गठित काकोरी षडयंत्र (रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद)


स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष 1925 1928 1928 1928 1929 1929 1929 1929 1929 1929 1930 1930 1930 1931 1931 1931 1932 1932 1932 1932 1932 1933 1934 1935 1937 1938 1938 1939 1939 1939 1940 1940 1940 1941 1942 1942 1942 1942 1942 1943 1943 1943 1944 1944 1946 1946 1946 1946 1946 1946 1946 1947 1947 1947

बारडोली बॉम्बे लाहौर लाहौर लाहौर दिल्ली लाहौर लंदन लाहौर

लंदन

हरीपुरा जबलपुर

वर्धा

बाॅम्बे पोर्ट ब्लेयर कराची मोरेंग शिमला दिल्ली दिल्ली दिल्ली लाहौर दिल्ली

14 - 20 अगस्त 2017

बारदोली सत्याग्रह बॉम्बे में साइमन कमीशन आया और अखिल भारतीय हड़ताल हुई पुलिस की ज्यादती और जख्मों के चलते लाला लाजपत राय की मृत्यु नेहरु रिपोर्ट में भारत के नए डोमिनियन संविधान का प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन आयोजित कैदियों के लिए सुविधाओं की मांग करते हुए भूख हड़ताल करने पर स्वतंत्रता सेनानी जतिंद्रनाथ दास की मृत्यु ऑल पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस ने 14 सूत्र सुझाए सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंका जाना (भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त) भारतीय प्रतिनिधियों से मिलने राउंड टेबल कांफ्रेंस की लॉर्ड इरविन की घोषणा जवाहरलाल नेहरु ने भारतीय ध्वज फहराया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज घोषित किया साबरमती महात्मा गांधी की अगुवाई में दांडी मार्च के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू साइमन कमीशन की रिपोर्ट पार विचार हेतु लंदन में पहली गोलमेज बैठक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी महात्मा गांधी और लाॅर्ड इरविन द्वारा गांधी-इरविन पैक्ट पर दस्तखत दूसरी राउंड टेबल बैठक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसकी सहयोगी संस्थाएं अवैध घोषित बिना ट्रायल के गांधी विद्रोह के आरोप में गिरफ्तार ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने भारतीय अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचक मंडल बनाकर 'सांप्रदायिक अवार्ड' घोषित किया गांधी जी का अछूत जातियों की हालत में सुधार हेतु आमरण अनशन, जो छह दिन चला तीसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस अछूतों के कल्याण की ओर ध्यान की मांग पर गांधी जी का उपवास गांधी जी ने खुद को सक्रिय राजनीति से अलग किया और सकारात्मक कार्यक्रमों के लिए समर्पित किया भारत सरकार अधिनियम 1935 पास भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत भारत प्रांतीय चुनाव हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हरीपुरा अधिवेशन सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया त्रिपुरी अधिवेशन ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में कांग्रेस मंत्रियों का इस्तीफा। सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया कांग्रेस मंत्रियों के त्यागपत्र के जश्न में मुस्लिम लीग ने उद्धार दिवस मनाया मुसलमानों के लिए अलग राज्य की मांग करते हुए मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन लॉर्ड लिंलीथगो ने अगस्त ऑफर 1940 बनाया, जिसमें भारतीयों को उनका संविधान बनाने का अधिकार दिया गया कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने अगस्त ऑफर ठुकराया और एकल सत्याग्रह शुरू किया सुभाष चंद्र बोस ने भारत छोड़ा भारत छोड़ो आंदोलन क्रिप्स मिशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव शुरु किया गांधी जी और कांग्रेस के अन्य बड़े नेता गिरफ्तार आजाद हिंद फौज का गठन सेल्युलर जेल को भारत की अस्थायी सरकार का मुख्यालय घोषित किया गया सुभाष चंद्र बोस ने भारत की अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा की मुस्लिम लीग के कराची अधिवेशन में बांटो और राज करो नारा अपनाया गया जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज के कर्नल शौकत मलिक ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों को हराया भारतीय राजनीतिक नेताओं और वायसराय आर्किबाल्ड वेवलीन के बीच शिमला सम्मेलन केबिनेट मिशन प्लान पास संविधान सभा का गठन रॉयल इंडियन नेवी गदर नई दिल्ली में कैबिनेट मिशन का आगमन जवाहरलाल नेहरु ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला भारत की अंतरिम सरकार बनी भारत की संविधान सभा का पहला सम्मेलन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ब्रिटिश भारत को ब्रिटिश सरकार का पूर्ण सहयोग देने की घोषणा की लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय नियुक्त और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने 15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारत के भारत और पाकिस्तान में विभाजन हेतु माउंटबेटन प्लान बनाया गया

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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

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भारतीय लोकतंत्र की प्रस्तावना भारतीय संविधान

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संविधान की प्रस्तावना से जुड़े आदर्शों और हिदायतों के पालन में भारतीय नागरिक और उनके चुने हुए प्रतिनिधि अब तक खरे उतरे हैं

एसएसबी ब्यूरो

रतीय संविधान का सबसे अहम हिस्सा है, इसकी प्रस्तावना। इसे संविधान से आगे भारतीय लोकतंत्र की प्रस्तावना भी माना जाता है। अच्छी बात है कि इस प्रस्तावना से जुड़े आदर्शों और हिदायतों के पालन में भारतीय नागरिक और उनके चुने हुए प्रतिनिधि अब तक खरे उतरे हैं। दरअसल, भारत का संविधान जिस समय बनाया गया, उसे समय की तत्कालीन परिस्थितियों तक सीमित नहीं मानना चाहिए, क्योंकि संविधान निर्माण में ऐतिहासिक मूल्य और दर्शन ने भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। भारतीय संविधान सर्वोच्च रूप से विभिन्न विचारधाराओं और संवैधानिक नियमों और मूल्यों को स्थापित करता है। ये लक्षण भारतीय संस्कृति, दर्शन और इतिहास को उत्तर-उपनिवेशी समय में भी प्रभावित कर रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान बनने के बाद से दुनिया के उदार लोकतंत्रों ने अपने संविधान में प्रस्तावना या उद्देशिका रखी है। इसके बाद दुनिया के विभिन्न देशों ने अपने संविधान में प्रस्तावना रखने का प्रचलन शुरू हुआ। वस्तुत: किसी भी संविधान के दर्शन की झलक हमें संविधान की प्रस्तावना में मिलती है। प्रत्येक संविधान का अपना एक दर्शन होता है। भारतीय संविधान के पीछे जो दर्शन है उसकी झलक हमें पंडित नेहरू के उस ऐतिहासिक उद्देश्य संकल्प में मिलती है, जिसे उन्होंने संविधान सभा में व्यक्त किया था। सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई और कुछ ही दिन बाद 13 दिसंबर को उद्देश्य संकल्प प्रस्तावित हुआ। इस संकल्प द्वारा संविधान सभा के लक्ष्य और प्रयोजन सुनिश्चित किए गए, जो इस प्रकार हैं‘संविधान सभा भारत की स्वतंत्र प्रभुत्त्व संपन्न गणराज्य के रूप में घोषित करने के अपने दृढ और सत्यनिष्ठ संकल्प की और भारत के भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है।’ यह प्रस्तावना भारतीय संविधान के राजनीतिक, नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है। संविधान के ये मूल्य भारतीय संस्कृति, दर्शन और ऐतिहासिक लक्षणों को निर्मित करने में देश की जनता को प्रेरणा प्रदान करता है। ब्रिटेन के आदर्शवादी राजनीतिक विचारक सर अर्नेस्ट बार्कर भारतीय संविधान की प्रस्तावना से अत्यधिक प्रभावित थे। भारतीय संविधान घोषित होने के अगले साल 1951 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘प्रिसिंपल्स ऑफ सोशल एंड पॉलिटिकल’ थ्योरी की शुरुआत उन्होंने बिना किसी टिप्पणी के भारतीय संविधान की प्रस्तावना से की थी।

एक नजर

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई संविधान की प्रस्तावना में 1976 में संशोधन किया गया

बार्कर ने अपनी पुस्तक की शुरुआत भारतीय संविधान की प्रस्तावना से की

संविधान की प्रस्तावना का एक महत्व यह भी है कि यह कानून की व्याख्या और उसे समुचित रूप से लागू कराने में कार्यप्रालिका तथा न्यायपालिका को निर्देशित करता है। इसके अलावा प्रस्तावना संविधान के अंतर्गत दो और बातों के लिए महत्त्वपूर्ण है। एक तो इससे स्पष्ट होता है कि संविधान की वैधानिकता का स्त्रोत क्या है, दूसरा इसमें वे उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताए गए हैं, जिन्हें संविधान स्थापित करना और प्राप्त करना चाहता है। यद्यपि प्रस्तावना संविधान की कुंजी का काम करती है, फिर भी यह माना जाता है कि यह संविधान का भाग नहीं है। ‘बेरुबारी यूनियन मुकदमे’ में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान का अंग मानने से इंकार कर दिया। पर ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ के मुकदमें में न्यायालय ने अपने निर्णय को पलटते हुए कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, क्योंकि सभी उपबंधों के बाद प्रस्तावना को अलग से पारित किया गया था। बात करें भारतीय संविधान की समग्रता की तो यह एक राजनीतिक संरचना है, जिसके द्वारा देश का शासन चलाया जाता है। मुख्य संस्थाएं स्थापित की जाती हैं, जैसे विधायिका, कार्यप्रणाली और न्यायपालिका| दुनिया के पहले राजनीतिक वैज्ञानिक अरस्तु ने अपनी किताब ‘पॉलिटिक्स’ में संविधान को दो तरीकों से परिभाषित किया है, ‘वर्णात्मक’ और ‘मानकीय’। वर्णात्मक तरीके से उन्होंने संविधान को

एक राज्य में खासकर सर्वोच्च स्तर पर न्याय क्षेत्रों की व्यवस्था की तरह परिभाषित किया है और कहा है कि राज्य में सरकार सभी जगह संप्रभु है और वास्तव में संविधान ही सरकार है। मानकीय रूप में उन्होंने बताया है कि संविधान राज्य में कार्यालयों की व्यवस्था है और तय करता है कि नियंत्रक संस्था कौन होगी तथा प्रत्येक समुदाय की क्या जगह है। दरअसल, किसी भी देश में संविधान की आवश्यकता इसीलिए होती है, क्योंकि सरकार के पास व्यापक शक्ति होती है। इस शक्ति पर नियंत्रण रखने के लिए हमें संविधान की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि संविधान के अंतर्गत शासन को चलाने के लिए नियम बनाए जाते हैं तथा सरकार और नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित किए जाते है। इस लिहाज से भारतीय संविधान आदर्श रूप में देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन का सूत्र तो देते ही हैं, इनके आगे एक सर्वमान्य आदर्श भी रखते हैं। उदार संविधान का विचार ‘संविधानवाद’, ‘कानून के शासन’ और सीमित सरकार के साथ जुड़ा हुआ है। इसके अंतर्गत संविधान के कुछ कार्य होते हैं, जैसे- संविधान राजनीतिक पहचान विकसित करता है, यह मूल संरचना को स्थापित करता है, राजनीतिक शक्ति की सीमा निर्धारित करता है। भारत का संविधान भी संविधानवाद, कानून के शासन और सीमित सरकार के विचार के साथ जुड़ा हैं, क्योंकि

देश के लोकतंत्र में तमाम असहमतियों के बीच व्यापक मुद्दों पर स्वाभाविक सहमति भी रही है। यह हमारे संविधान द्वारा प्रकट नैतिकता की भी खासियत है कि इसके आलोक में भारत का लोकतंत्र लगातार मजबूत होता गया

भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत ‘हम भारत के लोग.....’ से शुरू होती है, जिसका मुख्य अर्थ है, सरकार की सभी शक्तियों का स्रोत भारत के नागरिक हैं। इस तरह कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र के साथ भारतीय संविधान को भी भारत के साथ दुनियाभर में लोकतांत्रिक मूल्यों के इतिहास और दर्शन के आलोक में ही देखा जाना चाहिए।

मूल प्रस्तावना

‘हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्त्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए दृढ-संकल्प होकर अपनी संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते है।’

1976 में संशोधन

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में संशोधन किया गया। शुरू में दो शब्द ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्षता’ अंतःस्थापित किए गए और बाद में एक जगह ‘अखंडता’ शब्द जोड़ा गया। भारतीय संसद द्वारा आपातकाल के समय पारित 42 वें संविधान संशोधन की बहुत आलोचना हुई। आपातकाल के बाद बनी नई सरकार के द्वारा 43 वें और 44 वें संशोधन द्वारा 42 वें संशोधन के कई हिस्से बदल दिए, पर ‘समाजवादी और पंथनिरपेक्ष’ शब्द समूह को बनाए रखा गया। इसका अर्थ है कि देश के लोकतंत्र में तमाम असहमतियों के बीच व्यापक मुद्दों पर स्वाभाविक सहमति भी रही है। यह हमारे संविधान द्वारा प्रकट नैतिकता की भी एक तरह से खासियत है कि इसके आलोक में भारत का लोकतंत्र लगातार मजबूत होता गया है।


24 - 30 जुलाई 2017

sulabh sanitation

लोक कथा

Sulabh International Social Service Organisation, New Delhi is organizing a Written Quiz Competition that is open to all school and college students, including the foreign students. All those who wish to participate are required to submit their answers to the email address contact@sulabhinternational.org, or they can submit their entries online by taking up the questions below. Students are requested to mention their name and School/College along with the class in which he/she is studying and the contact number with complete address for communication

First Prize: One Lakh Rupees

PRIZE

Second Prize: Seventy Five Thousand Rupees Third Prize: Fifty Thousand Rupees Consolation Prize: Five Thousand Rupees (100 in number)

500-1000) ti on (W or d Li m it: ti pe m Co iz Qu en tt Qu es ti on s fo r W ri nounced? rt was ‘Swachh Bharat’ an Fo d be no open Re the m fro y da ich houses and there should the 1. On wh all in d cte ru nst co be by 2019, toilets should 2. Who announced that l. defecation? Discuss in detai Toilet? 3. Who invented Sulabh ovement? Cleanliness and Reform M 4. Who initiated Sulabh e features of Sulabh Toilet? ? 5. What are the distinctiv used in the Sulabh compost r ise til fer of ge nta rce pe d an 6. What are the benefits of the Sulabh Toilet? ’? 7. What are the benefits be addressed as ‘Brahmins to me ca g gin en av sc al nu discussing ople freed from ma If yes, then elaborate it by s? 8. In which town were pe ste ca r pe up of s me ho take tea and have food in the 9. Do these ‘Brahmins’ story of any such person. entions of Sulabh? 10. What are the other inv

Last

ritten Quiz Competition W of on si is bm su r fo te da

: September 30, 2017

For further details please contact Mrs. Aarti Arora, Hony. Vice President, +91 9899 855 344 Mrs. Tarun Sharma, Hony. Vice President, +91 97160 69 585 or feel free to email us at contact@sulabhinternational.org SULABH INTERNATIONAL SOCIAL SERVICE ORGANISATION In General Consultative Status with the United Nations Economic and Social Council Sulabh Gram, Mahavir Enclave, Palam Dabri Road, New Delhi - 110 045 Tel. Nos. : 91-11-25031518, 25031519; Fax Nos : 91-11-25034014, 91-11-25055952 E-mail: info@sulabhinternational.org, sulabhinfo@gmail.com Website: www.sulabhinternational.org, www.sulabhtoiletmuseum.org

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बलिदानी तरुणाई

स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर विशेष

14 - 20 अगस्त 2017

डाक पंजीयन नंबर-DL(W)10/2241/2017-19

कम उम्र में ही देश के लिए प्राण न्योछावर करने स्वाधीनता संघर्ष के बहादुर नायकों को नमन

रानी लक्ष्मी बाई 30 साल की उम्र में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झांसी की रानी।

भगत सिंह 23 वर्ष की अल्पायु मे

बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ

शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वे आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श हैं। इन्होंने केंद्रीय संसद (जनरल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च, 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फांसी पर लटका दिया गया।

राजगुरु

25 साल

चन्द्रशेखर आजाद

की उम्र में चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिंदुस्तान

की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ, किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रांतिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पंडितजी ही कहकर संबोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।

खुदीराम बोस

19 साल

की उम्र में हिंदुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गए। मुजफ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक खास किस्म की धोती बुनने लगे।

करतार सिंह सराभा

23 साल की उम्र मे इन्हें भगत

सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे ।

19 साल की उम्र मे लाहौर

अशफाक उल्ला खां

27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणों की आहु​ित देने वाले वीर हुतात्मा।

कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा । देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 35

मंगल पांडे

30 साल

की उम्र में इन्हें फांसी दे दी गई। सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे।

उधम सिंह 14 साल

की उम्र में लिए अपने प्रण को उन्होंने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होंने जालियांवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लंदन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।

सुखदेव

33 साल

की अल्पायु मे 23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फांसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।

गणेश शंकर विद्यार्थी

25 साल

की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 35)