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वर्ष-1 | अंक-30 | 10 - 16 जुलाई 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

08 स्पिक मैके

जड़ों से जोड़ने की पहल

संस्कृति और संगीत के क्षेत्र में स्पिक मैके के चार दशक

11 किताब

प्रधानमंत्री की किताब

युवाओं के लिए पीएम मोदी ने लिखी किताब

28 संग्रहालय

ट्राम म्यूजियम की सैर

150 सालों का इतिहास समेटे है यह म्यूजियम

स्वच्छता, शिक्षा और रोजगार का समन्वय है सुलभ : नरेंद्र सिंह तोमर सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया स्वच्छता अभियान अब आंदोलन बन गया है, अब इसे जन आंदोलन बनाने की हमारी जिम्मेदारी है। जिस दिन यह जन आंदोलन बन जाएगा, उस दिन भारत स्वच्छ और स्वस्थ भारत के रूप में तब्दील हो जाएगा


02 आवरण कथा

10 - 16 जुलाई 2017

एक नजर

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का स्वागत करते डॉ. विन्देश्वर पाठक

देश के 5 राज्य पूरी तरह खुले में शौच मुक्त घोषित 2 लाख 4 हजार से ज्यादा गांव हुए खुले में शौच से मुक्त

अब तक देश के 149 जिले हुए ओडीएफ घोषित

दिखे। उन्होंने बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने और भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए उत्साहित किया।

सुलभ के कार्यों ने बनाया ऊर्जावान

स्व

केंद्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का संबोधन

प्रियंका तिवारी

च्छता और उचित शिक्षा किसी भी समाज को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है, लेकिन उसके साथ रोजगार का समन्वय भी हो जाए तो उस देश और समाज को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है। स्वच्छता के साथ-साथ शिक्षा और रोजगार का उचित समन्वय हमें सुलभ ग्राम में देखने को मिला है, जिसके लिए हम डॉ. विन्देश्वर पाठक और सुलभ परिवार को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं देते हैं। यह बातें केंद्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सुलभ ग्राम में आयोजित एक कार्यक्रम में कहीं।

नरेंद्र सिंह तोमर मंगलवार को सुलभ ग्राम आए और उन्होंने यहां के विभिन्न विभागों का भ्रमण किया। इसके साथ ही उन्होंने सुलभ स्कूल के बच्चों और स्किल ट्रेंनिंग सेंटर के कार्यकर्ताओं व परीक्षार्थियों से बात की। उन्होंने वृदांवन से आई विधवा माताओं और राजस्थान से आई पूर्व स्कैवेंजर्स से भी मुलाकात की। सुलभ स्कूल के बच्चों ने नरेंद्र तोमर के समक्ष अंग्रेजी और संस्कृत में भगवान की प्रार्थना प्रस्तुत की। वहीं मंत्री तोमर बच्चों की लगन और प्रतिभा से बहुत प्रभावित

अपने संबोधन में नरेंद्र तोमर ने कहा कि सरकार की दृष्टि से देखा जाए तो स्वच्छता मेरा उत्तरदायित्व है, लेकिन सुलभ परिवार के कार्यों ने हमें और ऊर्जावान बना दिया है। अब हमें और तेजी से कार्य करने की आवश्यकता है। स्वच्छता किसी भी भारतीय के लिए नया विषय नहीं है। स्वच्छता हमारे संस्कारों में रची-बसी है। इस देश में किसी भी आदमी से पूछो कि वह गंदगी में रहना चाहता है तो शायद ही कोई ‘हां’ में जवाब देगा। सबसे बड़ा सवाल देश के सामने है कि कोई भी व्यक्ति गंदगी में नहीं रहना चाहता फिर भी गंदगी से भरा है। डॉ. पाठक ने भी इसी सवाल पर गहन अध्ययन किया है। हमारे प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसी सवाल का जवाब ढूंढते-ढूंढते देश की जनता का आह्वान कर रहे हैं कि जब देश की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे हों तो हम बापू को एक स्वच्छ और स्वस्थ भारत भेंट कर सकें। इस अभियान के पीछे मोदी

देश को खुले में शौच मुक्त कराने से ही हमारा काम समाप्त नहीं हो जाता है। इसके साथ ही इन अपशिष्टों का उपयोग करना भी जरूरी है

जी की जो दृढ़ संकल्पना है वह निश्चित रूप से आज स्वच्छता को एक आंदोलन का रूप दे चुकी है। सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया यह अभियान अब आंदोलन बन गया है, अब इसे जन आंदोलन बनाने की हमारी जिम्मेदारी है। जिस दिन यह जन आंदोलन बन जाएगा उस दिन भारत स्वच्छ और स्वस्थ भारत के रुप में तब्दील हो जाएगा।

शौचालय के लिए लेता था 5 रुपए की मदद

मैं पहले डॉ पाठक को नहीं जानता था, बल्कि इनके बारे में सुना था कि वे बिहार से हैं और शौचालय बनवाने का कार्य कर रहे हैं। छात्र राजनीति के बाद जब मैंने पहली बार 1983 में ग्वालियर से निगम पार्षद का चुनाव लड़ा तब सुलभ इंटरनेशनल नगर निगम के क्षेत्र में शौचालय बनवाने का कार्य कर रहा था। तब हमने भी शौचालय बनवाने के बारे में विचार किया। इसके लिए मैं लोगों से 5 रुपए की मदद लेता था। उसी समय से मैं सुलभ इंटरनेशनल के संपर्क में आया। यह सच है कि स्वच्छता हम सब के लिए बहुत ही आवश्यक है, इसके बिना हम अस्वस्थ रहेंगे और फिर कोई कार्य नहीं कर पाएंगे। इसके लिए जरूरी है कि हम सभी अपने घर के साथ-साथ आस-पड़ोस को भी साफ-सुथरा रखें।

5 राज्य हुए खुले में शौच मुक्त

स्वच्छता का विषय बहुत ही व्यापक है और व्यवहार परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। कठिन है, लेकिन इस लक्ष्य को हम सब लोगों को मिलकर प्राप्त करना ही होगा, क्योंकि आने वाले कल में श्रेष्ठ भारत के निर्माण के लिए यह अति आवश्यक है, इसी से स्वच्छ और स्वस्थ भारत का निर्माण होना है। 15 अगस्त 2014 को जब लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से अपने घरों में शौचालय बनवाने का आह्वान किया था तो यह नहीं सोचा था कि वह


10 - 16 जुलाई 2017

नरेंद्र सिंह तोमर के साथ डॉ. विन्देश्वर पाठक

नरेंद्र सिंह तोमर के साथ डॉ. पाठक

एक आंदोलन का रूप ले लेगा। लेकिन आज सरकार के इस अभियान ने पूरे देश में एक आंदोलन का रूप ले लिया है। अब हर गांव, स्कूल में शौचालय और स्वच्छता को लेकर लोग जागरूक हुए हैं। आज स्वच्छता की चारो तरफ धूम है। इस सुलभ ग्राम में मैं अकेला ही नहीं स्वच्छता पर बात कर रहा हूं, बल्कि इस देश में हजारों लोग किसी ना किसी रूप में स्वच्छता के लिए काम कर रहे होंगे। उन्होंने कहा कि 2014 में गांधी जयंती से लेकर अब तक देश के 5 राज्य पूरी तरह खुले में शौच मुक्त घोषित हो चुके हैं। इसमें केरल, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, और हरियाणा है। इसके साथ ही अब तक देश के 2 लाख 4 हजार से ज्यादा गांवों ने अपने आप को खुले में शौच से मुक्त किया है। लगभग 149 जिले हैं, जो पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त हो गए हैं। हम लोगों ने तय किया था कि गंगा के किनारे की जो 1651 ग्राम पंचायतें हैं, जिसमें 5 राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल आते हैं। इन राज्यों की 1651 पंचायतों में साढ़े चार हजार गांव है, जिनमें से 93 प्रतिशत गांव खुले में शौच मुक्त हो गए हैं।

अपशिष्ट-प्रबंधन के लिए ट्रेनिंग

देश को खुले में शौच मुक्त कराने से ही हमारा काम समाप्त नहीं हो जाता है। इसके साथ ही इन

आवरण कथा

03

सुलभ द्वारा व‌िकस‌ित मल निस्तारण की बालोपयोगी तकनीक समझाते डॉ. विन्देश्वर पाठक

छात्राओं के उद्यम की प्रशंसा करते केंद्रीय मंत्री

सुलभ ने दिखाया लोगों को रास्ता

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि सामान्य तौर पर लोग यह नहीं जानते थे कि शौचालय में भी बड़ी तकनीक की आवश्यकता है, लेकिन ऐसे लोगों को सुलभ ने रास्ता दिखाया। सुलभ के रास्ते का अध्ययन करने से बहुत सी तकनीक सामने निकल कर आईं और उन सभी तकनीकों का इस्तेमाल स्वच्छता के लिए हो रहा है। डॉ. पाठक 70 के दशक से ही इस काम में लगे हैं, जिसके लिए डॉ. पाठक का जितना अभिनंदन किया जाए उतना कम है। लेकिन अब प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में डॉ. पाठक के सहयोग से देश के नेता, अभिनेता, बड़े उद्योगपति और सभी लोग मिलकर इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि स्वच्छ भारत मिशन का लक्ष्य पूरा होना चाहिए सुलभ सभागार में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ डॉ. विन्देश्वर पाठक एवं अन्य अत‌िथ‌ि क्योंकि स्वच्छता ही स्वस्थ भारत का निर्माण कर सकती है। इसके माध्यम से ही हम अपने पूर्वजों जो गांव खुले में शौच मुक्त हो गए हैं, वहां हमने ट्रेनिंग शुरू कर दी है। के स्वच्छ और स्वस्थ भारत के सपने को साकार इसके साथ ही सेल्फ हेल्प ग्रुप का उपयोग करके हम ठोस-तरल कर सकते हैं। सुलभ परिवार न सिर्फ स्वच्छता, बल्कि अन्य प्रबंधन का काम भी आगे बढ़ा रहे हैं क्षेत्रों में भी सराहनीय कार्य कर रहा है। इसके लिए अपशिष्टों का उपयोग करना भी जरुरी है। इसके पूरी तरह से साफ नहीं होंगे। इसीलिए जो गांव खुले हम सभी सुलभ परिवार के सदस्यों की सराहना लिए जो क्षेत्र खुले में शौच मुक्त हुए हैं, वहां हम में शौच मुक्त हो गए हैं, वहां हमने ट्रेनिंग शुरू कर करते हैं और ऐसे ही डॉ. पाठक की अगुआई में ठोस और तरल अपशिष्टों के प्रबंधन कार्य को दी है। इसके साथ ही सेल्फ हेल्प ग्रुप का उपयोग आप सब का विकास उत्तम तरीके से हो। इसके प्रारंभ कर रहे हैं। क्योंकि ठोस और तरल अपशिष्टों करके हम ठोस-तरल प्रबंधन का काम भी आगे साथ ही आप लोग अपने लक्ष्य की ओर अग्रसरित का प्रबंधन जब तक नहीं होगा तब तक हमारे गांव बढ़ा रहे हैं। हों और सफलता प्राप्त करें।


04 सुलभ

10 - 16 जुलाई 2017

सुलभ एक प्रेरणा सुलभ परिभ्रमण

स्वच्छता और पर्यावरण की चिंता देश के बच्चों को सर्वाधिक है। इसकी मिसाल हैं नोएडा स्थित शिव नडार स्कूल के 11वीं कक्षा के छात्र, जिन्होंने गर्मी की छुट्टियों में अपने परिवार के साथ घूमने की अपेक्षा स्वच्छता का सबक सीखना जरूरी समझा। अपनी राष्ट्रीय और सामाजिक जिम्मेदारी का वहन करते हुए इन छात्र-छात्राओं ने सुलभ ग्राम का दर्शन किया। सुलभ में स्वच्छता और पर्यावरण का जो सबक इन बच्चों ने सीखा, उसे उन्होंने हमारे साथ साझा भी किया। प्रस्तुत है बच्चों के अनुभव उन्हीं के शब्दों में

सुलभ का हर हिस्सा एक सबक है

सुलभ ग्राम, दिल्ली के पालम क्षेत्र में स्थित है, इसके पीछे बड़ी कहानी है। यहां मौजूद सुविधाएं डॉ. विन्देश्वर पाठक के महान कर्मों का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं

सु

लभ के विचार को 1968 में विकसित किया गया, ताकि स्केवैंजर्स को मैला ढ़ोने से छुटकारा मिले और उनको मुख्यधारा में जोड़ा जा सके। उन लोगों के प्रति भेदभाव करने वाले लोगों का व्यवहार डॉ. पाठक को परेशान करता रहता था, जो अपने सिर पर दूसरों की गंदगी को उठाते थे। इस प्रकार उन्होंने सुलभ आंदोलन के माध्यम से वाल्मिकियों की मुक्ति के लिए उन्होंने एक रणनीति तैयार की, जिसमें वैकल्पिक रोजगार और सामाजिक सुधार के साथ प्रौद्योगिकी और पुनर्वास से संबंधित विभिन्न विचार शामिल हैं। सुलभ ग्राम एक आदर्श ग्राम है, जहां संसाधनों के उपयोग के साथ-साथ एक गैर-भेदभावपूर्ण ग्रामीण समाज मौजूद है। हर जगह शौचालयों के लिए ट्वीन-पिट टेक्नोलॉजी एक मकसद के साथ विकसित की गई है। यहां पर लोगों से कई तरह के प्रयोग करवाए जाते हैं, जैसे कि मिट्टी को उर्वरक बनाने, बिजली उत्पादन और खाना पकाने इत्यादि। यहां कचरे के उपयोग के साथ-साथ, उन छात्रों के लिए एक व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी है, जिन्होंने 10वीं कक्षा में प्रवेश किया है। इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों को एक बुनियादी कौशल प्रदान किया जाता है, ताकि वे नौकरी कर सकें और भविष्य में अपने परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान कर सकें। हमारे देश में 18 मिलियन युवाओं का कार्यबल है। वे अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यहां विभिन्न क्षेत्रों जैसे सौंदर्य, फैशन डिजाइनिंग, सिलाई और इलेक्ट्रॉनिक मरम्मत

अनन्या अरोड़ा में कौशल प्रदान किया जाता है। वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर एक बहुत ही दिलचस्प पहलू है, जहां पन्द्रह वर्ष के बच्चे सैनिटरी नैपकिन तैयार करते हैं और इसके बारे में महिलाओं को शिक्षित भी करते हैं। उन्होंने एक पैड डिस्पेंसर टेक्नोलॉजी और पैड डिस्पोजिंग टेक्नोलॉजी का भी विकास किया है, जो महिलाओं की स्वच्छता के लिए आवश्यक है। एक समाज जहां शौच और शौचालयों के बारे में बात करना मना है। उस समाज में डॉ. पाठक ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया। सुलभ परिसर का हर हिस्सा एक उदाहरण, एक सीख और हम सभी के लिए प्रेरणा के रूप में खड़ा है।

डॉ. पाठक ः उच्चतम आदर्श के नायक खु

सुलभ सिस्टम दूरदराज के क्षेत्रों में मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है

ले में शौच करना हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। जो लोग इसे अन्यथा में लेते हैं वे या तो झूठ बोलते हैं या इस बात से अनजान हैं। यहां दो तरह के हीरो हैं, एक वे जो गुंडों से महिलाओं को बचाते हैं और दूसरे वे, जो फावड़ा लेकर जरूरतमंदों के लिए शौचालय बनाते हैं। 1970 में डॉ. पाठक ने सुलभ की स्थापना की। समय के साथ उनके इस संगठन ने सभी लोगों को शौचालय बनाने और खुले में शौच के लिए जाने के अभ्यास को खत्म करने का एक व्यापक उद्देश्य दिया। सुलभ ने अब तक पूरे भारत में 1.4 लाख शौचालय बनवाए हैं। मुझे हाल ही में सुलभ म्यूजियम का दौरा करने का गौरव प्राप्त हुआ। सुलभ शौचालय मॉडल के पीछे मूल विचार टू-पिट पोर फलश तकनीक है। यदि आप उचित जल निकासी कनेक्टिविटी के बिना किसी दूरस्थ क्षेत्र में मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करना चाहते हैं तो यह प्रणाली बेहद उपयोगी है। सुलभ शौचालय को दो भागों आधार और अधोरचना में विभाजित किया गया है। आधार दो पिटों से बना है, जो शौचालय से पाइप के साथ जुड़ा हुआ है। इसके बीच में एक स्विच यह तय कर सकता है कि कचरे के गड्ढे में कितना कचरा है। आदर्श रूप से कचरे को पहले गड्ढे में एकत्र किया जाता है, फिर उसके भर जाने के बाद पहले गड्ढे को आप बंद कर देते हैं और दूसरे गड्ढे का उपयोग करते हैं। जब तक दूसरी पिट भरता है, तब तक पहले पिट का कचरा खाद में बदल जाता है, जिसे कृषि में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रणाली से बनने वाले टॉयलेट सिस्टम का निर्माण आसपास के क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री से भी किया जा सकता है। यह

डब्ल्यू एस अद्वैत उत्तर-पूर्व में लकड़ी या दक्कन पठार में चट्टानों से भी बनाई जा सकती है। यह जटिल रचना उपयोगकर्ताओं की पसंद के हिसाब से बनायी जा सकती है। कुछ लोग खुले में शौच करना पसंद करते हैं तो उनके लिए छत रहित शौचालय के मॉडल उपलब्ध हैं। जो लोग गोपनीयता को पसंद करते हैं उनके लिए बांस से कवर करके शौचालयों का निर्माण किया जा सकता है। सुलभ शौचालयों का 3, 5 और 10 लोगों की क्षमता के अनुसार 2, 3 या 5 साल तक की लंबी अवधि के लिए निर्माण किया जा सकता है। इन शौचालयों में बच्चों के अनुकूल और बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त पश्चिमी सीट भी उपलब्ध है। सुलभ शौचालयों के संयोजन और क्रमांतर अनगिनत हैं।


10 - 16 जुलाई 2017

आधुनिक गांधी आश्रम

प्रभावी स्वच्छता, स्कैवेंजर्स की देखभाल और ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों के विकास के लिए खड़ा है सुलभ

सु

लभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन, 1970 में डॉ. विन्देश्वर पाठक द्वारा स्थापित एक गैर-लाभकारी स्वैच्छिक सामाजिक संगठन है, जो स्कैवेंजर्स की मुक्ति के लिए गांधीवादी विचारधारा को समर्पित है। सुलभ अस्पृश्यता को हटाने के लिए काम कर रहा है। प्रभावी स्वच्छता, सफाई कर्मचारियों की मुक्ति, समाज के सामाजिक परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम और ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों के विकास के क्षेत्र में सुलभ सफलता प्राप्त करने के लिए जाना जाता है। सफाई करने वालों के एक वर्ग को परंपरागत रूप से भारतीय समाज में मानव अपशिष्ट को साफ करने के लिए बनाया गया था, जिनसे सभी लोग घृणा करते हैं। ऐसे लोगों के लिए सुलभ ने अच्छा काम किया। इन वाल्मीकियों की मानव गरिमा को बहाल करने के लिए सुलभ के दृष्टिकोण में पांच अलग-अलग चरण हैं: मुक्ति, पुनर्वास, व्यावसायिक प्रशिक्षण, अगली पीढ़ी को उचित शिक्षा और सामाजिक उन्नयन। पर्यावरण के अनुकूल टू-पिट पोर फ्लश तकनीक को सुलभ शौचालय के रूप में जाना जाता है, जो सामाजिक रूप से स्वीकार्य, आर्थिक रूप से किफायती और तकनीकी रूप से उपयुक्त है। पूरे भारत में 12 लाख से अधिक घरों में इस तकनीक के शौचालयों का निर्माण किया गया है। सार्वजनिक स्थानों पर सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण और उसका रखरखाव, 'कमाई और उपयोग के आधार पर', झोपड़ियों में स्वच्छता के क्षेत्र में सुलभ की यह पहल एक मील का पत्थर साबित हुई है। अब तक भारत में 8000 से अधिक ऐसे सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण या रखरखाव किया गया है। ये परिसर सार्वजनिक स्थान, बस स्टैंड, अस्पतालों, बाजार आदि जैसे मलिन बस्तियों में स्थित हैं। इन परिसरों के निर्माण, संचालन और रखरखाव के लिए, संगठन एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है। सरकारी एजेंसियों और शौचालय परिसरों के उपयोगकर्ताओं के बीच एक साझेदार है। इन सामुदायिक शौचालयों में अब स्नान करने की सुविधा भी प्रदान की जाती है। सुलभ द्वारा विकसित सामुदायिक शौचालयों के संचालन और रखरखाव की व्यवस्था ने स्थानीय निकायों, कस्बों को स्वच्छ रखने और पर्यावरण को बेहतर बनाने के प्रयास के लिए वरदान साबित हुआ है। यह स्थानीय अधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदाय की साझेदारी का अनूठा उदाहरण है।

सुलभ

05

सुलभ परिभ्रमण

बेहतर कल के लिए किया गया वादा

अब मैल से भरे गड्ढों को साफ करने के लिए स्कैवेंजर्स की जरूरत नहीं है। सुलभ की पहल से इसे हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है

डॉ.

श्रव्या अग्रवाल सार्वजनिक शौचालयों से बनने वाले बायोगैस से कई लाभ हैं - सफाई, सामुदायिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, पर्यावरण और महिलाओं-लड़कियों के लिए सुरक्षित माहौल प्रदान करता है। विभिन्न प्रयोजनों के लिए बायोगैस का उपयोग करने के लिए डॉ. पाठक ने एक बायोगैस संयंत्र के कुशल डिजाइन का आविष्कार किया है। इस सिस्टम के तहत बायोगैस संयंत्र में केवल पानी ही प्रवाहित करने की अनुमति है। बायोगैस बनाने के लिए इसमें किसी भी स्तर पर मलमूत्र से निपटने की आवश्यकता नहीं है। सुलभ ने पूरे देश में सार्वजनिक शौचालयों में 200 बायोगैस संयंत्र स्थापित किए हैं। इससे बनने वाले बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, प्रकाश लैंप और बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। पाककला बायोगैस का सबसे सुविधाजनक उपयोग है। हाल ही में सुलभ ने जेनसेट को संशोधित किया है, जिसे पहले 20 प्रतिशत डीजल और 80 प्रतिशत बायोगैस की आवश्यकता थी। इसे अब डीजल की आवश्यकता नहीं है और यह 100 प्रतिशत बायोगैस पर चलता है। इससे बायोगैस से अधिक बिजली उत्पादन हो रहा है। यह तकनीक रेत, वातानुकूलित टैंक और सक्रिय लकड़ी के कोयले के माध्यम से प्रवाह के अवसादन और निस्पंदन पर आधारित है। इसके बाद यह पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आता है। प्रदूषित प्रवाह रहित, गंधहीन और इस रोकमुक्त बायोकेमिकल ऑक्सीजन की मांग 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है। यह पानी दुर्लभ क्षेत्रों में सार्वजनिक शौचालयों के फर्श की सफाई के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

विन्देश्वर पाठक लिबरेशन ऑफ स्कैवेंजर्स सेल में शामिल हुए, जो एक जाति-आधारित भेदभाव के शिकार पुरुषों और महिलाओं के पुनर्वास के लिए काम करता है। उन्होंने 1968 में गांधी शताब्दी उत्सव समिति के माध्यम से उनके साथ काम किया, जहां उन्हें सफाई का कार्य सौंपा गया। डॉ. पाठक ने इस कार्य को संशोधित किया और टू-पिट की तकनीक विकसित की, जो फ्लश टॉयलेट सिस्टम (सामान्यतः सुलभ शौचालय के रूप में जाना जाता है) को तैयार करती है। वह विश्व बैंक को अपनी तकनीक के बारे में बताने में सफल रहे, जिसने इस शौचालय को मानवीय अपशिष्ट निपटान और अस्वस्थ और असुरक्षित प्रणालियों के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया है। इस मॉडल का उपयोग केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व और विकासशील देशों में भी किया गया है। जब तक डॉ. पाठक इस मॉडल को लागू कर सके तब तक सरकार द्वारा बिहार गांधी शताब्दी उत्सव समिति भंग कर दी गई थी। उसी वर्ष उन्होंने 1970 में स्कैवेंजर्स के लिबरेशन को पूरा करने के लिए अपनी स्वयंसेवी संस्था सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस संगठन की स्थापना की। डॉ. पाठक ने लगभग 50 हजार सुलभ स्वयंसेवकों के साथ एक देशव्यापी आंदोलन शुरू किया। वे वैष्णो देवी के पहाड़ों में दक्षिण से गहराई तक और पश्चिम में गुजरात के सबसे दूर के किनारों से पूर्वी और उत्तर पूर्व के सबसे दूर के किनारे तक काम करते हैं। सुलभ शौचालय पर्यावरण के अनुकूल, तकनीकी रूप से उचित, सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य है और ग्रामीण क्षेत्रों में यह सस्ती है, क्योंकि इन शौचालयों को सस्ती सामग्री का उपयोग करके बनाया जा सकता है। इसमें 25 डिग्री -28 डिग्री के एक ढलान के साथ पैन होता है, जो 20 मिलीमीटर के साथ एक विशेष रूप से डिजाइन किया गया जाल है। इसके लिए केवल 1 से 1.5 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे पानी बचाने में भी मदद मिलती है। इन गड्ढों को साफ करने के लिए सफाईकर्मी की जरूरत नहीं है। इसमें उपयोगकर्ताओं की संख्या के आधार पर विभिन्न आकार और क्षमता के दो गड्ढे बनाए जाते हैं। प्रत्येक गड्ढे की क्षमता सामान्यतः 3 साल तक उपयोग करने के लिए होती है। दोनों गड्ढों का वैकल्पिक रूप से उपयोग किया जाता है। जब एक गड्ढा भर जाता है, तो दूसरे गड्ढे का इस्तेमाल किया जाता है। यह लगभग दो वर्षों में उस कचरे को पचा जाता है और वह लगभग शुष्क और रोग मुक्त होता है। इस प्रकार यह कचरा खाद के रूप में सुरक्षित होता है। डाइस्टेड कीचड़ गंधहीन, एक

सिद्धांत बरुआ अच्छा खाद और मिट्टी कंडीशनर के रूप में कार्य करता है। यह आसानी से खोदा जा सकता है और कृषि में इस्तेमाल किया जा सकता है। भवनों के ऊपरी मंजिलों पर भी सुलभ शौचालय बनाया जा सकता है। इसमें सुधार की उच्च क्षमता है और इसे आसानी से नाली से जोड़ा जा सकता है। सुलभ ने अब तक पूरे देश में कई घरों में एक लाख से ज्यादा शौचालयों का निर्माण किया है।

सुलभ स्कूल

सुलभ में वाल्मीकि छात्रों को 10 वीं कक्षा तक की शिक्षा भी प्रदान की जाती है। वाल्मीकि छात्रों को यहां मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है। इसके साथ इन बच्चों को यहां भोजन भी दिया जाता है। सुलभ स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है, ताकि छात्रों को सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा सके और अच्छी जगहों पर रोजगार मिल सके। सुलभ स्कूल की लाइब्रेरी में अंग्रेजी की 4,000 से अधिक पुस्तकों का संग्रह है। सुलभ में सिलाई, टाइपिंग, स्टेनोग्राफर, ब्यूटीशियन, फैशन डिजाइन, एम्ब्रायडरी और इलेक्ट्रीशियन जैसे व्यावसायिक शिक्षा भी दी जाती है। यहां के कई छात्रों ने अपनी दुकान और पार्लर खोल लिए हैं। इसके साथ ही सुलभ स्कूल ने अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते हैं, जो फैशन डिजाइन में उनके एक छात्र द्वारा बनाया गया था। सुलभ में सैनिटेशन क्लब भी है, जिसकी देखभाल स्कूल के छात्रों और महाविद्यालय के छात्रों द्वारा किया जाता है। वहां वे सैनिटरी नैपकिन और मैंस्चुरेशन नैपकिन बनाते हैं। वे मल्टीमीडिया और ग्राफिक डिजाइन के लिए कक्षाओं में भी जाते हैं।


06 मिसाल

10 - 16 जुलाई 2017

ग्लोबल वार्मिंग फेल है यहां जल संरक्षण

राजस्थान के टोंक जिले के किसान जहां एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग की मार से खेती-किसानी छोड़ दूसरे काम की तलाश कर रहे हैं, तो एक गांव बिफूर ने शानदार जल प्रबंधन से ग्लोबल वार्मिंग के असर को बेमानी साबित कर दिया है

ग्लो

एसएसबी ब्यूरो

बल वार्मिंग के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन की मार अगर किसी पर सबसे ज्यादा पड़ रही है, तो वे हैं किसान। भारत के ऐसे हिस्सों में जहां पानी की समस्या पहले से बहुत ज्यादा है, जलवायु परिवर्तन ने किसानों के संकट को और बढ़ा दिया है। ऐसा ही एक क्षेत्र है राजस्थान का टोंक जिला, पर अच्छी बात यह है कि यहां के किसान अब ग्लोबल वार्मिंग से घबराते नहीं हैं। उन्होंने स्थानीय स्थिति और जलवायु के नए संकट का समाधान निकाल लिया है। यह परिवर्तन वहां कैसे आया, यह एक दिलचस्प और प्रेरक प्रसंग है। बिफूर गांव यह राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा ब्लॉक में पड़ता है। बिफूर के किसान नाथूराम के पास 1.8 हेक्टेयर जमीन है। दो दशक पहले तक तक अपनी इस जमीन से वे हर साल करीब सवा लाख रुपए मूल्य की फसल पैदा कर लेते थे, लेकिन पानी की कमी ने धीरे-धीरे उनकी पैदावार कम कर दी। इस तरह उनकी करीब आधी जमीन बेकार हो गई। हालात इतने बदतर हो गए कि बहुत मेहनत से भी खेती करते तो बीस हजार रुपए से ज्यादा कीमत की फसल पैदा नहीं कर पाते थे। इस तरह नाथूराम दम टूटते जा रहे थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि खेती छोड़ आखिर वे करेंगे भी क्या। अपने उन दिनों के अनुभव के बारे मे वे बताते हैं, ‘जब खेती से गुजारा करना मुश्किल हो गया, तो हमने मजदूरी करने के लिए दूसरे जिलों में जाना शुरू कर दिया।’ यह भी नहीं कि बिफूर में यह दुर्दशा कोई अकेले नाथूराम की थी, बल्कि सभी की हालत कमोबेश नाथूराम की तरह ही थी। सभी असहाय महसूस कर रहे थे। किसी को भी भविष्य का कुछ सूझ नहीं रहा था। सबसे बड़ी मुश्किल तो यह थी कि गांव की इस

आज से डेढ़ दशक पहले तक ग्लोबल वार्मिंग के कारण पैदा होने वाली जो त्रासदी बिफूर की सच्चाई थी, आज उसका वहां के लोगों के लिए कोई मतलब नहीं रह गया है

दुर्दशा को कैसे ठीक किया जाए इसकी योजना किसी के पास नहीं थी। फिर एक संस्था की पहल ने गांव की दशा बदल दी। वह हरियाली जो सूख गई थी वह वापस लौट आई। अब बिफूर के किसान मजदूरी करने के लिए दूसरे जिलों में नहीं जाते और न ही कर्ज लेकर खाद बीज खरीदते हैं। पानी के प्रबंधन ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है और उनकी जिंदगी में अच्छे दिन फिर से लौट आए हैं। दरअसल, बिफूर की समस्या ठीक वैसी ही विकट थी जैसी आज देश के कई गांवों की हो चली है। भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और जमीन बंजर बनती जा रही है। वर्षा अनियमित हो चली है और जमीन का कटाव भी एक बड़ी समस्या है। बीज जमीन में तो डाले जाते हैं, लेकिन वातावरण में इतनी तपिश रहती है कि अंकुर फूटकर बाहर नहीं निकल पाते हैं। बीज जमीन में ही जल जाते हैं। पानी की कमी के कारण वातावरण और जमीन दोनों जगह

से नमी गायब हो रही है। इस तरह के संकट से जूझ रहे देश भर के तमाम इलाकों और किसानों के आगे आज बिफूर एक मॉडल गांव की तरह है। यहां के किसान देश भर के किसानों को राह दिखा सकते हैं। आज से डेढ़ दशक पहले तक ग्लोबल वार्मिंग के कारण पैदा होने वाली जो त्रासदी बिफूर की सच्चाई थी, आज उसका वहां के लोगों के लिए कोई मतलब नहीं रह गया है। दरअसल, बिफूर जब अपनी खेती-किसानी के हाल को लेकर बेहाल था तो वहां जयपुर की एक संस्था सिकोईडिकोन (सेंटर फॉर कम्युनिटी इकोनॉमिक्स एंड डेवलपमेंट कंसलटेंट सोसायटी) ने यहां कदम रखा। 2001 में उसने यहां एक ग्राम विकास समिति की स्थापना की। बिफूर गांव में कुल 150 परिवार थे जिसमें नट, गूर्जर और बैरवा समुदाय के लोग थे। यहां आने के बाद संस्था ने सबसे पहले स्थानीय पंचायत से संपर्क किया। सिकोईडिकोन के सचिव शरद जोशी कहते हैं,

एक नजर

2001 में सिकोईडिकोन संस्था ने जल संरक्षण के लिए प्रेरित किया कुओं और तालाबों में वर्षा जल संरक्षण के लिए हुए प्रयास

बिफूर और आस पास के इलाके में भूजल स्तर बढ़ चुका है

‘पंचायत के सहयोग से सबसे पहले हमने लोगों में यह अहसास जगाने की कोशिश की कि यह उनका ही काम है और उन्हें ही करना है। इसके बाद लगातार स्थानीय लोगों से सलाह-मशविरा करके हमने यह जानने की कोशिश की कि पानी की कमी हो या मिट्टी का कटान, उसके कारण क्या हैं? इसके साथ ही हमने कृषि उत्पादन और भंडारण आदि के बारे में भी जानकारियां इकट्ठी कीं।’ संस्था से जुड़े


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सीवरेज के पानी से पार्क की रौनक

राजस्थान के बाड़मेर में सीवरेज के पानी को रिसाइकिल कर पार्क को हराभरा रखने की अनूठी मिसाल

पा

नी बचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर कई योजनाएं संचालित होती हैं। करोड़ों रुपए इन योजनाओं पर खर्च भी किए जाते हैं, लेकिन पानी की बर्बादी रुकने का नाम नहीं ले रही है। इन स्थितियों के बीच राजस्थान के बाड़मेर में सार्वजनिक श्मशान घाट में पानी के सदुपयोग की अनूठी पहल मिसाल बन गई है। दरअसल, बाड़मेर के सार्वजनिक श्मशान घाट में कई बीघा जमीन पर पार्क है। इस पार्क में सैकड़ों पेड़ और घास लगी हुई है। पिछले साल देखरेख और पानी के अभाव में पार्क की हरियाली सूखने लगी थी। नौ साल की कड़ी मेहनत से बनाए गए इस पार्क की दुर्दशा तब और ज्यादा हो गई जब यहां का ट्यूबवेल खराब हो गया। स्थानीय प्रशासन से इस बारे में काफी शिकायत की गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। फिर कुछ लोगों का ध्यान श्मशान के बीच से गुजरते सीवरेज के नाले पर पड़ा और यहीं से उम्मीद की किरण फूट पड़ी। फिर क्या था, जल्द ही विशेषज्ञों की सलाह पर सीवरेज के पानी को रिसाइकिल करने का प्रयास किया गया, जो सफल भी रहा। आज यह पार्क हरा-भरा तो है ही, उसके पास पानी का अपना स्वावलंबी प्रबंधन भी है। अच्छी बात यह है कि बाड़मेर की इस मिसाल से कई और जगहों पर भी सीवरेज के पानी को रिसाइकिल करने की पहल शुरू हुई है।

विशेषज्ञों ने इस बात को महसूस किया कि सबसे पहले पानी का संरक्षण जरूरी है। यही वह रास्ता है जिसके जरिए कृषि उपज को बढ़ाया जा सकता है। मालपुरा ब्लॉक में सिकोईडिकोन के लिए काम कर रहे बजरंग सेन बताते हैं कि पानी बचाने के लिए हमारे सामने वर्षाजल को संरक्षित करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था,लेकिन शुरुआत कुओं से की गईं। इस तरह सबसे पहले इलाके के कुओं को गहरा किया गया। ऐसा इसीलिए किया गया ताकि तात्कालिक तौर पर पीने के पानी की समस्या का समाधान हो सके। इस काम के लिए श्रमिकों को आधी मजदूरी संस्था ने दी जबकि आधी मजदूरी गांव के लोगों ने मिलकर दी। कुओं को गहरा तो कर दिया गया, लेकिन यह प्रयास भी बहुत सफल नहीं रहा। जल्द ही कुओं का जलस्तर और नीचे चला गया। जाहिर है कि सिर्फ कुओं को गहरा करने से बिफूर की समस्या का समाधान नहीं होने वाला था। साल भर कुओं में जलस्तर बनाए रखने के लिये जरूरी था कि गांव में जल संरक्षण का काम शुरू किया जाए ताकि कुओं को और गहरा न किया जाए, बल्कि भूजल स्तर ऊपर उठ सके। इस तरह इसके बाद ही बिफूर में जल संरक्षण का नया चरण शुरू हुआ। वहां मिट्टी के ही बांध बनाए गए ताकि पानी

विशेषज्ञों की सलाह पर सीवरेज के पानी को रिसाइकिल करने का प्रयास किया गया, जो सफल भी रहा। आज यह पार्क हरा-भरा तो है ही, उसके पास पानी का अपना स्वावलंबी प्रबंधन भी है

को रोका जा सके। अतिरिक्त पानी को नालियों के जरिए एक तालाब में पहुंचा दिया गया। तालाब के पानी का स्थानीय लोगों द्वारा उपयोग के साथ-साथ भूजल स्तर ऊपर उठाने के लिए भी यह बेहद जरूरी था। इस तरह बांध और तालाब के कारण अब यह सुनिश्चित हो गया था कि कुएं में साल भर पानी बना रहेगा। सीकोइडिकोन ने अपनी पहल से करीब 100

हेक्टेयर जमीन पर जल संरक्षण का काम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आसपास के गांवों में भी जल संरक्षण के इस तरह के प्रयोग शुरू कर दिए गए। पहले नमी की कमी के कारण जमीन में बीज जल जाते थे और अंकुरण नहीं आता था, लेकिन अब ऐसा नहीं था। नमी के कारण अब पूरे बीज अंकुरित होने लगे। पानी की उपलब्धता होने के बाद खेतों

सबसे पहले इलाके के कुओं को गहरा किया गया। इस काम के लिए श्रमिकों को आधी मजदूरी एक संस्था ने दी, जबकि आधी मजदूरी गांव के लोगों ने मिलकर दी

मिसाल

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में पैदावार बढ़ी। किसानों का फसल चक्र फिर से बहाल हो गया। केवल मनुष्य के लिए ही अन्न की पैदावार नहीं बढ़ी, बल्कि पशुओं के लिए चारे की पैदावार में भी बढ़त हुई जिसके कारण गांव में दूध के उत्पादन में भी काफी बढ़त हुई। ​िबफूर के किसान भी इस बात को मानते हैं कि स्थानीय इलाके में वर्षा में बदलाव के कारण उनकी खेती में भी परिवर्तन आया है। किसान कालू सिंह बताते हैं, ‘बारिश में बदलाव साफ दिख रहा है। पहले चार महीने बारिश होती थी, अब सिर्फ दो महीने होती है। अब तो मानसून खत्म हो जाने के बाद बारिश होती है। इसके कारण किसान अब ऐसी फसलें बो रहे हैं जिसमें पानी भी कम लगे और समय भी।’ इसी तरह एक दूसरे किसान घासीलाल बैरवा बताते हैं, ‘अब हम मूंग, उड़द और ज्वार की फसल बोते हैं। ये फसलें साठ से सत्तर दिन में तैयार हो जाती हैं। अब किसान ऐसी फसलें नहीं लगाते जो पकने में ज्यादा समय लेती हैं।’ बिफूर के किसानों का एक अनुभव यह भी है कि हालांकि बारिश के समय में कमी आई है लेकिन बारिश की मात्रा में बढ़त हुई है। अब अधिक बारिश होने के कारण कई बार खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। कभी-कभी तो दस-पंद्रह दिन बारिश होती रहती है, जिससे फसलों का नुकसान ही होता है, लेकिन जल संरक्षण के कारण हवा में सालभर नमी बनी रहती है जिसके कारण गेहूं और सरसों जैसी दूसरी फसलों में इसका फायदा मिलता है। किसान मानते हैं कि बारिश में आए बदलाव की वजह से पैदावार में कमी आई है। इसी तरह सर्दी के दिनों में भी कमी देखने को आ रही है। अब सर्दियां देर से शुरू होकर जल्दी खत्म हो जाती हैं। इसके कारण गेहूं की पैदावार पर फर्क पड़ रहा है। इस पर भी सर्दियों के मौसम में होनेवाली बारिश भी अब जब-तब ही होती है। राजस्थान का मौसम विभाग भी किसानों की राय से सहमत है। विभाग का कहना है कि मौसम में यह बदलाव नया नहीं है। पहले भी इस तरह के बदलाव आते रहे हैं। फिर भी मौसम विभाग का कहना है कि तापमान में वृद्धि हो रही है, यह सच है। टोंक का कोई विस्तृत आंकड़ा मौसम विभाग के पास इसीलिए नहीं है, क्योंकि टोंक में मौसम विभाग का कोई स्टेशन नहीं है। ऐसे में सिकोइडिकोन के जोशी को उम्मीद है कि पानी प्रबंधन से बहुत फर्क पड़ा है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। इससे बढ़ते तापमान और असमय बारिश को रोकने में मदद मिलेगी। एक अच्छी बात यह भी है कि राजस्थान सरकार को भी गांवों में किए जा रहे जल संरक्षण के प्रयासों का महत्व समझ में आ रहा है। पहले यह काम व्यक्तिगत स्तर पर ही किया जा रहा था, लेकिन इसके महत्व को देखते हुए अब इसे मनरेगा से जोड़ दिया गया है। बिफूर के किसान घासीलाल बैरवा कहते हैं कि अब खेत में तालाब बनाने की जरूरत है। वैसे मनरेगा के तहत बिफूर में खेत में तालाब बनने शुरू भी हो गए हैं। वह दिन दूर नहीं जब बिफूर के साथ आसपास के कई गांव महज आसमान को निहारते हुए खेती नहीं करेंगे, बल्कि जल संरक्षण और वितरण का उनके पास मुकम्मल प्रबंधन होगा। एक ऐसा प्रबंधन जिसने अभी से यहां के किसानों के मुरझाए चेहरों पर भरोसे की चमक पैदा कर दी है और वे फख्र से कहते भी हैं कि अगर सब कुछ इसी तरह चला तो फिर ग्लोबल वार्मिंग भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।


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स्पिक मैके के चार दशक

जड़ों से जोड़ने की पहल

स्पिक मैके ने ईमानदारी और निरंतर प्रयास के जरिए एक लंबा सफर तय किया है। इस सफर में इस संस्था ने निश्चित सफलता के विभिन्न पड़ाव हासिल किए हैं। संस्कृति और संगीत का यह सफर जारी है

एक नजर

स्पिक मैके की शुरुआत 1977 में आईआईटी, दिल्ली में हुई शुरुआत में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कथक को स्थान

आज योग से लेकर ध्यान-दर्शन तक कई गतिविधियों को स्थान

कर ली गईं। इन समस्त गतिविधियों के द्वारा हमारा प्रयास यही रहा है की युवाओं को एक अमूर्त या अस्पृश्य ज्ञानक्षेत्र की ओर ले जा सके। उन्हें उनके अंतर्मन में बसे सत्व, रोंगटे खड़े कर देने वाले या आंखों से बरबस नीर बह निकलने वाले अनुभव अथवा 'मैं नहीं जानता कि वह क्या था, पर जो भी था अद्भुत था’ जैसी भावना के साथ जोड़ना ही हमारा असली ध्येय है।

1980 में पंजीयन

सं

डॉ. किरण सेठ

स्पिक मैके के संस्थापक

गीत से मेरे परिचय के दौरान जो बीज मेरे मन में प्रस्फुटित हुआ, जो अहसास मुझे झंकृत कर गया, वही स्पिक मैके की नींव का आधार बना। शास्त्रीय संगीत का ये स्पर्श बालपन का नहीं था, बल्कि आईआईटी के छात्र जीवन का था। न्यूयार्क के कोलंबिया विश्व विद्यालय में पीएचडी करने के दौरान एक बार मित्रों के साथ उस्ताद नसीर अमीनुद्दीन डागर, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के ध्रुपद गायन के कार्यक्रम में बस यूं ही चले गए। हम में से कोई भी ध्रुपद या संगीत की अन्य विधाओं के बारे में कुछ नहीं जानता था, लेकिन जब मैं कार्यक्रम में गया तो मैं साधारण श्रोता था, लेकिन जब लौटा तो आलौकिक स्पर्श ने मुझे छू लिया था। जो कुछ मेरे मन में घटा वही अनुभव अन्या युवाओं के साथ साझा करने की आस बलवती हुई। संस्कृति और संगीत युवाओं के मन में जरूर

रहने चाहिए ताकि वे जीवन के इस अनमोल स्पर्श से अछूते न रहें। पहले संगीत कार्यक्रम के दौरान मात्र 10 लोग शामिल हुए। इस आंदोलन की नींव पड़ी और नाम दिया गया स्पिक मैके यानी ‘सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड कल्चर अमंगस्ट यूथ‍ ’। स्पिक मैके की शुरुआत 1977 में आईआईटी, दिल्ली में हुई जिससे छात्रों को कम उम्र में ही भारत की कला व संस्कृति से परिचित कराया जा सके, क्योंकि उस समय उनका मन और मस्तिष्क अधिक ग्रहणशील होता है। स्पिक मैके का मकसद था छात्रों को देश के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों के सीधे संपर्क में लाना और उन्हें भारतीय विरासत के विभिन्न पहलुओं के बारे में अवगत कराते हुए प्रेरणा देना और फिर

इंतजार होता की कब कलाकारों और कला के जादू से इन छात्रों के मन में कला के प्रति अनुराग और दिलचस्पी उजागर हो।

संगीत से योग तक विस्तार

स्पिक मैके ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कथक के कार्यक्रमों से अपनी शुरुआत की थी, पर जल्द ही इसमें कर्नाटक शास्त्रीय संगीत, सभी आठ प्रकार के शास्त्रीय नृत्य, लोक संगीत और नृत्य की विभिन्न शैलियां, योग और ध्यान, देश के विभिन्न राज्यों के शिल्प और बुनाई की शैलियां, समग्र खाद्य परंपराए, क्लासिक सिनेमा, चित्रकला, सामाजिक कार्य, दर्शन, धर्मशास्त्र, आदि विभिन्न विषयों पर प्रसिद्ध विशेषज्ञों द्वारा वार्ता इत्यादि गतिविधियां भी शामिल

जब स्पिक मैके शुरू हुआ तब कई प्रतिष्ठित कलाकारों से नाम मात्र के मानदेय की पेशकश पर मान जाने के लिए अनुरोध करना पड़ता था। आज कलाकार स्वयं स्पिक मैके के कार्यक्रमों में स्वेच्छा से हिस्सा लेते हैं

जब स्पिक मैके शुरू हुआ तब कई प्रतिष्ठित कलाकारों से उनके कार्यक्रम के लिए नाम मात्र मानदेय की पेशकश पर समर्थन के लिए अनुरोध करना पड़ता था। आज कलाकार स्वयं स्पिक मैके के कार्यक्रमों में स्वेच्छा से भाग लेते हैं। 1980 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम (1860) के तहत पंजीकृत करने के बाद 1981 में इस आंदोलन ने अपने पंख पसारने शुरू किए और जल्द ही अहमदाबाद, मुंबई, कोलकत्ता, खड़गपुर, हैदराबाद (1984), बैंगलोर (1985) तक पहुंच गया। जैसेजैसे आंदोलन के स्वयंसेवक और छात्र विदेशों में पढ़ने या बसने के लिए जाते रहे, वे अक्सर उस देश में स्पिक मैके अध्याय शुरू करने की इच्छा व्यक्त करते और इस प्रकार आज यह आंदोलन अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, हांगकांग, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फिलीपींस, बांग्लादेश, श्रीलंका, फ्रांस और नार्वे तक फैल चुका है।

प्रसार और विस्तार

पिछले 40 वर्षों में स्पिक मैके में परिवर्तन निरंतरता से चला आ रहा है, क्योंकि हम नियमित रूप से नए कलाकार व कलाएं, नए संस्थान, नए कस्बे, देश और स्वयंसेवकों को जोड़ते रहे हैं। फिबोनैची स्पाइरल की तरह, स्पिक मैके भी कभी न समाप्त


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विशेष

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इस तरह फूटी संगीत की किरण

दु

भारतीय संगीत और संस्कृति के संरक्षण का विचार डॉ. किरण सेठ के मन में पहली बार 1972 में आया, जब उन्होंने उस्ताद अमीनुद्दीन डागर और उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर की प्रस्तुति सुनी

निया भर के संगीत प्रेमियों के बीच स्पिक मैके की गिनती एक प्रतिष्ठित संस्था के रूप में होती है। स्पिक मैके, ‘सोसायटी फॉर प्रमोशन ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड कल्चर एमंग्स्ट यूथ’ का संक्षिप्त नाम है। इसकी स्थापना का श्रेय डॉ. किरण सेठ को जाता है। इस संस्था का ध्येय वाक्य है- विसंस्कृतिकरण से लड़िए,पश्चिमीकरण से नहीं। यह ध्येय वाक्य एक सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है। भारतीय संगीत और संस्कृति के संरक्षण का विचार डॉ. किरण सेठ के मन में पहली बार 1972 में उस समय आया, जब उन्होंने ब्रुकलिन अकादमी ऑफ म्यूजिक में उस्ताद अमीनुद्दीन डागर और उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर की प्रस्तुति सुनी। वैसे विधिवत रूप से स्पिक मैके की शुरुआत 1979 में दिल्ली,आईआईटी से हुई। पहले कार्यक्रम में डागर बंधुओं के अलावा उस्ताद अमजद अली खान और बिस्मिल्ला खान जैसी हस्तियों ने शिरकत की। स्पिक मैके को अस्तित्व में लाने वाले डॉ. किरण सेठ का जन्म 23 अप्रैल, 1949 को हुआ। उनके पिता भोजराज सेठ आईआईटी, खडगपुर में गणित के प्रथम प्रोफेसर थे और माता भगवती सेठ गृहिणी थीं। सेठ की प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण

होने वाली एक घुमावदार कुंडली है, जहां खुलापन है, समग्रता है, विस्तार है, सह-अस्तित्व की भावना व्याप्त है, एकत्रीकरण व वृद्धिशील बढ़त है। आज एक वर्ष में 5000 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन भारत और विदेशों में, 817 स्थानों पर और 2000 से अधिक शैक्षिक संस्थान में किया जाता है, जिससे हम लगभग 30 लाख छात्रों को प्रभावित कर पाते हैं। 1986 में हैदराबाद के प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया में स्पिक मैके का पहला राष्ट्रीय

भारतीय संस्कृति के संरक्षण में डॉ. किरण सेठ के अहम योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2009 पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्हें साहित्य कला परिषद पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है

परिवेश में ही हुई। स्नातक डिग्री लेने के लिए वह आईआईटी खडगपुर चले गए। हम यह जानते हैं कि तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में आईआईटी,

सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 100 से ज्यादा लोग आए। आज हर वर्ष राष्ट्रीय सम्मेलनों में करीब 2000 लोग भाग लेते हैं, जिनमें विदेश से छात्र और स्वयंसेवक भी भाग लेते हैं। गत 5 वर्षों से राष्ट्रीय सम्मलेन अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में बदल चुका है और इस वर्ष आईआईटी दिल्ली में इसका आयोजन हुआ जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। स्पिक मैके की तरफ से गुरुकुल स्कीम को 1986 में शुरू किया गया। आज देश भर से लगभग

खडगपुर भारत के श्रेष्ठ संस्थानों में शामिल है। इस संस्थान की स्थापना भारत सरकार द्वारा 1951 में हुई। आईआईटी का ग्रामीण विकास

100 छात्रों को लंबे साक्षात्कार के बाद चुना जाता है और उन्हें अलग-अलग गुरुओं के साथ एक माह तक रहने के लिए भेजा जाता है। देश और दुनिया के कुछ जाने माने गुरु इस योजना का हिस्सा है, जैसे- दलाई लामा, मदर टेरेसा की मिशनरी ऑफ चैरिटी, अरुणा रॉय, अंज​िल इला मेनन, हरिप्रसाद चौरसिया, बिरजू महाराज, कोलकाता का संगीत अनुसंधान अकादमी, मुंगेर का बिहार स्कूल ऑफ योगा आदि। इन गुरुओं से सानिध्य में रह कर

केंद्र इस संस्थान का प्रमुख आकर्षण है। इसके जरिए शोध और तकनीकी को स्थानीय समुदायों से जोड़कर उनको लाभान्वित करने की कोशिश की जाती है। स्नातक डिग्री के उपरांत वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका चले गए। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क में शोध कार्य के लिए एडमिशन लिया। अमेरिका से वापस लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली, आईआईटी में बतौर शिक्षक के रूप में कार्य किया। स्पिक मैके डॉ.किरण सेठ की सांस्कृतिक दूरदृष्टि का परिचायक है। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को युवाओं से जोड़ने की पहल की क्योंकि वह जानते थे कि युवा ही सांस्कृतिक विरासत का वाहक बन सकता है। आज भारत सहित पूरी दुनिया में स्पिक मैके कार्यक्रम आयोजित करके भारतीय शास्त्रीय संगीत को नवजीवन दे रहा है। डाॅ. किरण सेठ केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, संगीत नाटक अकादमी के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य रहे हैं। उन्हें साहित्य कला परिषद पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। भारतीय संस्कृति के संरक्षण और और संवर्द्धन में डाॅ. किरण सेठ के अहम योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2009 पद्मश्री से सम्मानित किया। यह बच्चे हमारे चिरंतन मूल्यों को ग्रहण कर पाते हैं। इसी प्रकार लोक कलाओं को भी 1986 में स्पिक मैके की गतिविधियों में शामिल किया गया। आज यह हमारी प्रोग्रामिंग का एक नियमित और अहम हिस्सा है। पहला संगीत-इन-द-पार्क भी 2002 में दिल्ली के नेहरू पार्क में उस्ताद बिस्मिल्ला खान के साथ आयोजित किया गया था और अब एक वार्षिक कार्यक्रम बन गया है, जो तीन शहरो में आयोजित हो रहा है। इसके अंतर्गत देश के वरिष्ठ कलाकार एक पार्क में जन-जन के लिए कार्यक्रम करते हैं। सभी कार्यक्रमों की तरह यह भी निशुल्क होता है। 2004 में स्पिक मैके ने कार्यशालाएं शुरू कीं और 2012 में राजस्थान के कोटा अध्याय में वर्कशॉप-डेमोस्ट्रेशन (डब्लूडीएस) का आरंभ हुआ। यह प्रोग्राम विशेषकर नगर निगम और ग्राम विद्यालयों के छात्रों को ध्यान में रख कर बनाया गया था। इसमें एक कलाकार 45 मिनट तक छात्रों को अपनी कला के बारे में बताता है और फिर अगले 45 मिनट पूर्वदर्ज संगीत के साथ उसी कला का प्रदर्शन करता है। एक सप्ताह तक प्रति दिन इसी प्रकार कार्यशाला चलती है और अंत में सब बच्चों से पूछा जाता है कि उन्होंने क्या सीखा। आज एक वर्ष में 2000


10 विशेष

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संगीत का अनुशासन

नई दिल्ली में आयोजित स्पिक मैके के 5वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का संपादित अंश

सेठ जी पिछले 40 वर्षों से इस प्रो.सांकिरण स्कृतिक आंदोलन को एक कुशल नेतृत्व

दे रहे हैं। वो एक ऐसे साधक हैं, जिनकी वर्षों की साधना ने भारतीय संगीत और संस्कृति को युवाओं के बीच जीवंत बनाए रखा है। सच्चे साधक अपनी सोच, अपने विचारों से फकीर होते हैं। संगीत के क्षेत्र में शासन नहीं, केवल अनुशासन चलता है। पिछले 40 वर्षों में आपकी सोसायटी ने जिस अनुशासन के साथ, सिंगल माइंडेड फोकस के साथ, देश के कोने-कोने में स्कूलों और कॉलेजों में जाकर, गांवों और शहरों में छात्रों को इस कार्यक्रम से जोड़ा है, बहुत कम फीस पर कलाकारों को अपने साथ काम करने के लिए तैयार किया है, साधन जुटाए हैं, संसाधन जुटाए हैं, वो अतुलनीय है। हमारे देश की मिट्टी से निकला संगीत, यहां की प्रकृति से जन्मा संगीत केवल सुनने का आनंद नहीं देता, बल्कि दिल और दिमाग तक पहुंचता है। भारतीय संगीत का प्रभाव व्यक्ति की सोच पर, उसके मन पर और उसकी मानसिकता

पदन्यास और भारतीय समाज में रची-बसी आध्यात्मिकता इन सबका मिला-जुला प्रतीक बन जाता है। इसीलिए संगीत की शक्ति को समझने और समझाने में लोग अपनी जिंदगी खपा देते हैं। भारतीय संगीत, चाहे वह लोक संगीत हो, शास्त्रीय संगीत हो या फिर फिल्मी संगीत ही क्यों न हो, उसने हमेशा देश और समाज को जोड़ने का काम किया है। धर्म-पंथ-जाति की सामाजिक दीवारों को तोड़कर सभी को एक स्वर में, एकजुट होकर एकसाथ रहने का संदेश संगीत ने दिया है। उत्तर का हिंदुस्तानी संगीत, दक्षिण का कर्नाटक संगीत, बंगाल का रवींद्र संगीत, असम का ज्योति-संगीत, जम्मू-कश्मीर का सूफी संगीत, इन सभी की नींव है हमारी गंगा- जमुनी सभ्यता। एक और विशेष बात है कि हमारे यहां का लोक-संगीत, जन-जातियों ने अपनी निरंतर साधना से विकसित किया है। उस समय की सामाजिक व्यवस्थाओं को, कुरीतियों को तोड़ते हुए उन्होंने अपनी शैली, प्रस्तुति का तरीका और कहानी कहने के अपने तरीके का

एक ओर जहां सफलताएं हैं, वहीं कई समस्याए भी हैं। आज यह लोक आंदोलन कई चुनौतियां का सामना कर रहा है। पहली चुनौती है नए स्वयंसेवकों को आकर्षित करना, उनका परिपोषण करना और उनको आंदोलन में बनाए रखना से अधिक वर्कशॉप-डेमोस्ट्रेशन सरकारी स्कूलों में आयोजित किए जाते हैं।

गांवों तक पहुंच

पर भी पड़ता है। जब हम शास्त्रीय संगीत सुनते हैं, चाहे शैली कोई भी हो, स्थान कोई भी हो, हम इसे भले ही न समझ पाएं, लेकिन यदि हम कुछ समय तक इसे ध्यान लगाकर सुनें तो असीम शांति का अनुभव होता है। हमारी तो पारंपरिक जीवनशैली में भी संगीत कूट-कूट कर भरा हुआ है। विश्व के लिए संगीत एक कला है, कई लोगों के लिए संगीत आजीविका का साधन है, लेकिन भारत में संगीत एक साधना है, जीवन जीने का एक तरीका है। मैजिस्टी, मैजिक और मिस्टीक यह भारतीय संगीत की त्रिगुण संपदा है। हिमालय की ऊंचाई, मां गंगा की गहराई, अजंता-एलोरा की सुंदरता, ब्रह्मपुत्र की विशालता, सागर की लहरों जैसा

विकास किया। लोक गायकों, नर्तकों ने स्थानीय लोगों की बातों का उपयोग करते हुए अपनी शैली का निर्माण किया। इस शैली में कठिन प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं थी और इसमें सामान्य जनता भी शामिल हो सकती थी। आप में से अधिकतर लोग हमारी संस्कृति की इन बारीकियों को और उसके विस्तार को समझते हैं, लेकिन आज की युवा पीढ़ी में ज्यादातर को इस बारे में पता नहीं है। इसी उदासीनता की वजह से बहुत से वाद्य यंत्र और संगीत की विधाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं। बच्चों को गिटार के अलग-अलग स्वरूप तो पता हैं लेकिन सरोद और सारंगी का फर्क कम को पता होता है। ये स्थिति ठीक नहीं।

पहला ग्रामीण स्कूल इंटेंसिव (कार्यशाला) सितंबर 2011 में आयोजित किया गया था, जहां 150 से अधिक छात्र छह दिवसीय सम्मलेन के लिए आए थे। ये कार्यशाला उन बच्चों से लिए था जो बहुत देश के पिछड़े इलाको में रहते थे। यही कुछ छात्र ऐसे थे, जिन्होंने कभी अपने गांव से बाहर कदम नहीं रखा था, कुछ लोग कभी भी ट्रेन में नहीं बैठे थे, कुछ लोगों को कभी एक दिन में तीन समय का भोजन नहीं मिला था, और कुछ तो केवल दो कपड़े पहनते थे। इस कार्यशाला का एक-एक कार्यक्रम इन सब ग्रामीण बच्चों ने बड़े प्यार और धन से देखा और आत्मसात किया। इससे स्वयंसेवकों को भी नया परिप्रेक्ष्य मिला। आज हैदराबाद, अनंतपुर, विशाखापत्तनम, बेंगलुरु, धारवाड़, गुलबर्गा, बिहार, गोवा, यूपी में 15 से अधिक ग्रामीण स्कूल इंटेंसिव का आयोजन किया जा चुका है।

चुनौतियां भी कम नहीं

एक ओर जहां सफलताएं है, वहीं कई समस्याए भी हैं। आज यह लोक आंदोलन कई चुनौतियां का सामना कर रहा है। पहली चुनौती है नए स्वयंसेवकों को आकर्षित करना, उनका परिपोषण करना और उनको आंदोलन में बनाए रखना। धन जुटाना एक और बड़ा संकट है। एक बड़े आंदोलन को, जो किसी कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह है, चलाने और प्रबंधित करने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। स्वयंसेवकों को भर्ती करना, उनका लगातार

पोषण करना, उन्हें बनाए रखने और उनके विकास की बड़ी आवश्यकता होती है। इस लोक आंदोलन में स्वंयसेवको का भी अभिन्न योगदान है जो विभिन्न गतिविधियो में वर्षों से बिना किसी वेतन के सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। छात्र स्वयंसेवकों को शामिल करने और इस आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए शिक्षक एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। वे यह भी सुनिश्चित कर सकते हैं कि कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएं और स्कूल प्रशासन से सहायता प्राप्त करने के लिए भी अध्यापको की मदद ली जाती है, स्पिक मैके इस तरह के कर्मठ शिक्षकों की तलाश में रहती है जो जिम्मेदारी लेना चाहते हैं। आउटरीच के विस्तार में खर्च और समय कम करने के लिए, एआईसीटीई, यूजीसी, सीबीएसई, आईसीएसई, राज्य और अन्य शिक्षा बोर्डों, केंद्रीय विद्यालय संगठन, जवाहर नवोदय विद्यालय समिति जैसी संस्थाओं को स्पिक मैके की गतिविधियों को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए संपर्क किया गया है। अलबत्ता, धन की कमी एक सतत मुद्दा है, चाहे निजी या सरकारी वित्त पोषण हो, स्पिक मैके को अपने विजन-2022 और इस मूल उद्देश्य कि ‘हर बच्चे को भारतीय और विश्व संस्कृति में व्याप्त रहस्यवाद का अनुभव हो और उससे प्रेरणा मिले’, तक पहुंचने के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता हैं। इस कार्य ने ईमानदारी और निरंतर प्रयास के जरिए एक लंबा सफर तय किया गया है। इस सफर में निश्चित सफलता के विभिन्न पड़ाव भी हासिल किए हैं। संस्कृति और संगीत का सफर जारी है और साथियों की तलाश भी है।


10 - 16 जुलाई 2017

युवाओं के लिए प्रधानमंत्री की किताब

किताब

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इस पुस्तक में प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया के युवाओं से जुड़े कई सारे विषयों पर अपने विचार रखे हैं

‘प्रणब दा मेरे लिए पिता की तरह’

प्र

एसएसबी ब्यूरो

एक नजर

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ढेर सारी पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने पद व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच युवाओं पर रहते हुए पुस्तक लिखी के लिए एक पुस्तक लिखी है। देश में यह पहली बार होगा, जब किसी प्रधानमंत्री ने पद पर रहते हुए कोई इस साल के अंत तक बाजार में आ पुस्तक लिखी है। कुछ प्रधानमंत्रियों ने पद छोड़ने जाएगी किताब का बाद पुस्तक अवश्य लिखी है। इस पुस्तक में इसे एक साथ कई भाषाओं में भी प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया के युवाओं से जुड़ी कई प्रकाशित करने की योजना सारे विषयों पर अपने विचार रखे हैं। पेंग्विन रेंडम हाउस इंडिया और ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन के संयुक्त सहयोग से यह पुस्तक इस साल के अंत तक का फैसला किया। बाजार में आ जाएगी। इसे एक साथ कई भाषाओं में युवाओं से जुड़े मुद्दे प्रधानमंत्री मोदी के दिल भी प्रकाशित करने की योजना है। के करीब हैं। वे कहते हैं, ‘मैंने पुस्तक को लिखने का विचार उस विषय पर लिखने का विचार ‘मैंने उस विषय पर किया, जो मेरे दिल के बहुत ही प्रधानमंत्री का अपना है। प्रधानमंत्री मोदी अपने ‘मन की बात’ रेडियो लिखने का विचार करीब है और जो मेरे भविष्य के कार्यक्रम के दौरान परीक्षाओं से किया, जो मेरे दिल विजन का मूल है। वह युवाओं पूर्व, युवाओं विशेषकर दसवीं के बहुत ही करीब है द्वारा ही संचालित और प्रेरित किया और बारहवीं के विद्यार्थियों से जाने वाला है।’ प्रधानमंत्री मोदी और जो मे र े भविष्य बातचीत करते रहे हैं। पीएम मोदी के भविष्य के विजन में युवाओं लगातार परीक्षा को लेकर युवाओं के विजन का मूल है’ का विशेष स्थान है। वे हमेशा से – नरेंद्र मोदी के मन में उठने वाले तमाम प्रश्नों, मानते रहे हैं कि भारत की आबादी परीक्षा के तनावों से मुक्त होने के का 65 प्रतिशत युवा हैं, जो उचित उपायों को लेकर चर्चा करते रहते हैं। इस चर्चा को अवसर और माहौल मिलने पर चमत्कार कर सकते युवाओं, उनके माता-पिता और शिक्षकों ने बहुत हैं। प्रधानमंत्री अपने नीतियों और योजनाओं से देश पसंद किया। इस उत्साह को देखकर प्रधानमंत्री ने के युवाओं को छलांगें मारकर आसमान छू लेने का अपने इन्हीं सारे विचारों को, कुछ अन्य घटनाओं अवसर दे रहे हैं। हर मौके पर युवाओं को प्रेरित और उदाहरणों के साथ इसे पुस्तक के रुप में लिखने करते रहते हैं।

‘प्रेसिडेंट प्रणब मुखर्जी: अ स्टेट्समेंट’ किताब के लोकार्पण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ अपने संबंध के अनुभव साझा किए

प्र

एसएसबी ब्यूरो

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी मेरे लिए एक पिता की तरह हैं। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए सौभाग्य रहा कि दिल्ली में मुझे प्रणब दा से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला और उनकी उंगली पकड़ कर दिल्ली की जिंदगी में स्वयं को सेट करने की सुविधा मिली। प्रधानमंत्री मोदी ने यह बात राष्ट्रपति भवन में तस्वीरों पर आधारित ‘प्रेसिडेंट प्रणब मुखर्जी: अ स्टेट्समेंट’ किताब के लोकार्पण समारोह में कही। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हम इतिहास के प्रति सजग नहीं रहे। उन्होंने कहा, ‘हम सामान्य मानव को राष्ट्रपति के रूप में सिर्फ प्रोटोकॉल दिखता है... राष्ट्रगान हो रहा है... कई कद्दावर लोग चल रहे हैं... लेकिन इन व्यवस्थाओं के बीच में एक जिंदादिल इंसान है, वह तब पता चलता है, जब किसी फोटो जर्नलिस्ट के कैमरा में क्लिक होता है और उसे हम एक किताब के रूप में देखते हैं।’ प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, ‘जब महात्मा गांधी थे, तब शायद इतने कैमरा नहीं थे, लेकिन गांधी की दो तस्वीरें हैं। एक में वे झाड़ू लेकर सफाई कर रहे हैं और दूसरी में माइक्रोस्कोप से तारे देख रहे हैं। इनसे गांधीजी के व्यक्तित्व को समझने में मदद मिलती है।’ उन्होंने कहा कि, ‘एक जमाना था जब ऑटोग्राफ और फोटोग्राफ

का चलन था, लेकिन अब दोनों का मिला-जुला स्वरूप सेल्फी आ गई है।’ प्रधानमंत्री ने कहा कि आपातकाल के दौरान उन्हें कई अन्य विचारधारा के लोगों के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि, ‘आपातकाल में मैं राजनीति में नहीं था, लेकिन सामाजिक जीवन में जुड़ा हुआ था। इस दौरान विभिन्न विचारधारा के लोगों से मिलने और उनको समझने का मौका मिला। यह मेरे लिए सौभाग्य रहा कि दिल्ली में मुझे प्रणब दा से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।’ प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति के साथ अपने आपसी रिश्ते के अनुभव को भी साझा किया। उस दौरान वह भावुक भी हुए। उन्होंने कहा कि प्रणब दा कहते थे, ‘देखो मोदी जी कुछ कार्यक्रम कम करो। तुम अपनी तबीयत को संभालो। तब यूपी में चुनाव के दिन थे। कहते कि भाई जीत और हार तो चलती रहेगी, लेकिन कुछ शरीर की ओर भी देखोगे की नहीं? यह राष्ट्रपति के दायित्व का हिस्सा नहीं था, लेकिन उनके भीतर का एक इंसान, एक बहुत बड़ा प्रेरणा देने वाला था।’ वहीं प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री की तारीफ करते हुए कहा, ‘निश्चित तौर पर हमारे विचारों में भिन्नता है, लेकिन इसने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के संबंधों को प्रभावित नहीं किया।’ उन्होंने कहा कि, ‘मैं इस अवसर पर प्रधानमंत्री को अपना गहरा आभार और प्रशंसा व्यक्त करता हूं। हमने करीबी सहयोगी की तरह काम किया है’।


12 विज्ञान

10 - 16 जुलाई 2017

मिसाइल प्रक्षेपण

फ्रेंच गुयाना से हुआ भारत का संचार उपग्रह लांच भारत का आधुनिकतम संचार उपग्रह जीसेट-17 को एरियनस्पेस के एक भारी रॉकेट के जरिए सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया

मिसाइल

परीक्षण

स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण

भारत ने ओडिशा तट से जमीन से हवा में कम दूरी तक मार सकने वाली स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण किया

क्षा मंत्री अरुण जेटली ने जब चीन को दो टूक कहा कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है, तो चीन बौखला गया। वजह भी साफ है, भारत ने रक्षा क्षेत्र में जबरदस्त विकास किया है, न सिर्फ अन्य मित्र देशों के सहयोग से, बल्कि भारत अपने बलबूते भी रक्षा क्षेत्र में लगातार सशक्त होता जा रहा है। जब ओडिशा के समुद्री तट से एक स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण किया तो यह हमारी सेना की शक्ति में इजाफे का एक और अध्याय जोड़ गया।

स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण

भारत ने ओडिशा तट से जमीन से हवा में कम दूरी तक मार सकने वाली स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण किया। ओडिशा के चांदीपुर के पास एकीकृत परीक्षण रेंज (आईटीआर) के लांच कॉम्पलेक्स संख्या तीन से अत्याधुनिक मिसाइल का परीक्षण किया गया। हवा में मौजूद लक्ष्य को निशाना बनाकर दागी गई इस अत्याधुनिक मिसाइल का यह दूसरा विकास परीक्षण था।

भा

रत का आधुनिकतम संचार उपग्रह जीसेट17 को एरियन स्पेस के एक भारी रॉकेट के जरिए सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। यह प्रक्षेपण फ्रेंच गुयाना के कौओरू से किया गया। लगभग 3477 किलोग्राम के वजन वाले जीसेट-17 में संचार संबंधी विभिन्न सेवाएं देने के लिए नॉर्मल सी-बैंड, एक्सटेंडेड सी-बैंड और एस-बैंड वाले पेलोड हैं।

कॉम्पलेक्स नंबर 3 से उड़ान भरी

इसमें मौसम संबंधी आंकड़ो के प्रसारण वाला यंत्र भी है और उपग्रह की मदद से खोज एवं बचाव सेवाएं उपलब्ध करवाने वाला यंत्र भी। अब तक ये सेवाएं इनसेट उपग्रह उपलब्ध करवा रहे थे। यूरोपीय प्रक्षेपक एरियन स्पेस फ्लाइट वीए 238 ने कौओरू के एरियन लांच कॉम्पलेक्स नंबर 3 से उड़ान भरी। कौओरू दक्षिण अमेरिका के पूर्वोत्तर तट पर स्थित एक फ्रांसीसी क्षेत्र है।

निर्धारित समय से कुछ देरी हुई

इस उड़ान में निर्धारित समय से कुछ मिनट की देरी हुई। भारतीय समयानुसार इसे रात दो बजकर 29 मिनट पर उड़ान भरनी थी। लगभग 41 मिनट

की निर्बाध उड़ान में जीसेट-17 को कक्षा में प्रवेश करवाने से कुछ ही समय पहले उसके सहयात्री हेलास सेट 3-इनमारसेट एस ईएएन को कक्षा में प्रवेश कराया गया। उपग्रह के सफल प्रक्षेपण की घोषणा करते हुए एरियनस्पेस के सीईओ स्टीफन इस्राइल ने ट्वीट किया, 'जीसेट-17 अपने एरियन 5 प्रक्षेपक वीए 238 से सफलतापूर्वक अलग हुआ। इसकी पुष्टि हो गई।' मिशन के बाद इसरो के मुख्यालय से की गई घोषणा में कहा गया, 'फ्रेंच गुयाना के कोऔरू से एरियन-5 वीए-238 के जरिए जीसेट-17 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया।' जीसेट-17 इसरो के हालिया 17 दूरसंचार उपग्रहों के समूह को मजबूत करेगा। इसे भूस्थैतिक स्थानांतरण कक्षा में प्रक्षेपित किया गया है। यह इस महीने इसरो द्वारा प्रक्षेपित तीसरा उपग्रह है। इससे पहले जीएसएलवी मार्क 3 और पीएसएलवी सी-38 का प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा से किया गया था। अपने भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए एरियन-5 रॉकेट पर निर्भर करने वाला इसरो इस काम के लिए जीएसएलवी मार्क 3 विकसित कर रहा है। मिशन कंट्रोल सेंटर से इस प्रक्षेपण को देखने वाले विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक डॉ. के

सिवान ने इस मिशन को एकदम सटीक बताते हुए एरियन स्पेस का धन्यवाद किया। इस अभियान को इसरो के लिए एक विशेष अभियान बताते हुए सिवान ने कहा, 'जीसेट-17 इसरो और भारत के लिए समय की जरूरत है, क्योंकि यह दो पुराने उपग्रहों की सेवा में निरंतरता प्रदान करता है। इसके अलावा यह हमारी ट्रांसपांडर क्षमता बढ़ाता है और हमारी पहुंच को मोबाइल उपग्रह सेवाओं के साथ-साथ अंटार्कटिक क्षेत्रों तक विस्तार देता है।' हेलास सेट (अरब सेट समूह का सदस्य) एक प्रमुख उपग्रह संचालक है और यूरोप, पश्चिम एशिया और दक्षिण अफ्रीका में सेवाएं देता है। इनमार सेट वैश्विक मोबाइल उपग्रह संचार सेवाओं का प्रमुख प्रदाता है। रॉकेट के साथ गए पेलोडों का कुल वजन लगभग 10,177 किलो है। जीसेट-17 इसरो का ऐसा 21वां उपग्रह है, जिसे एरियन सपेस द्वारा प्रक्षेपित किया गया। इसका जीवनकाल लगभग 15 साल है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि कक्षा में प्रवेश कराए जाने के बाद इसरो के हासन स्थित मास्टर कंट्रोल फेसिलिटी ने जीसेट-17 का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। (एजेंसी)

20-30 किलोमीटर है मारक क्षमता

इस मिसाइल का पहला परीक्षण चार जून 2017 को इसी प्रक्षेपण स्थल से किया गया था। यह मिसाइल कई लक्ष्यों को एक साथ साधने में सक्षम है। इसकी मारक क्षमता 25 से 30 किमी है। त्वरित प्रक्रिया मिसाइल के तौर पर डिजाइन की गई इस मिसाइल में हर मौसम में काम करने वाली हथियार प्रणाली लगी है।

डीआडीओ ने किया मिसाइल का विकास

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन और अन्य संस्थानों ने यह मिसाइल विकसित की है। मिसाइल की खासियत ये है कि यह बिना भटके एक साथ कई लक्ष्यों को सफलता के साथ साध सकती है। इसके अलावा इस मिसाइल को हर मौसम में काम करने वाली प्रणाली से लैस किया गया है। (एजेंसी)


10 - 16 जुलाई 2017

त्रिपुरा में रबर का राज त्रिपुरा

कृषि

त्रिपुरा में रबर क्षेत्र के एकीकृत विकास के परिणामस्वरूप आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में वृद्धि, प्रबंधन और निरंतरता का विकास हुआ है

एक नजर

62,000 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है रबर की खेती

केरल के बाद देश का दूसरा रबर उत्पाद राज्य है त्र‌िपुरा 2013-14 में प्रदेश को हुई 600 करोड़ रुपए कमाई

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राज कश्यप / गुवाहाटी

र्वोत्तर भारत के त्रिपुरा में सफलता की कहानी प्राकृतिक रबर के बगानों में होने वाली बढ़ोत्तरी से ही मुमकिन है। यहां रबर की खेती लगभग 62,000 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। रबर उत्पादन में त्रिपुरा केरल के बाद देश में दूसरे स्थान पर है। त्रिपुरा में रबर की खेती आमतौर पर ऊंचाई पर की जाती है, जिसे स्थानीय लोग टिला कहते हैं। यह रबर की खेती के लिए आदर्श रूप से उपयुक्त होते हैं और प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। 1963 में वन विभाग द्वारा रबर के बाग लगाए गए थे। 1976 में त्रिपुरा वन विकास प्लांटेशन कॉर्पोरेशन (टीएफडीपीसी) ने 10,000 हेक्टेयर भूमि को पट्टे पर लेकर रबर लगाया। आदिवासी कल्याण विभाग ने भी रबर के क्षेत्र को बढ़ाने के लिए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया, जिसे रबर बोर्ड और विश्व बैंक की सहायता से लागू किया गया ।

2013-14 में त्रिपुरा में रबर का उत्पादन करीब 37,277 मीट्रिक टन था, जिसमें राज्य की अर्थव्यवस्था को 600 करोड़ रुपए की वार्षिक आय का योगदान मिला था। इस अभ्यास में व्यक्तियों, समूहों और संस्थानों को शामिल किया गया है और ब्लॉक प्लांटेशन एप्रोच (बीपीए) जैसी पहल राज्य में एक अच्छे उदाहरण के रूप में उभरी है। राज्य में रबर क्षेत्र के एकीकृत विकास के परिणामस्वरूप आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में वृद्धि, प्रबंधन और निरंतरता का विकास हुआ है। उच्च गुणवत्ता वाली रबर की उपलब्धता ने राज्य में रबर आधारित उद्योगों की स्थापना में बहुत मदद की है। ब्लॉक वृक्षारोपण परियोजना (बीपीएस) का मुख्य उदेश्य आदिवासी झामिया परिवारों का

आर्थिक उत्थान करना है। रबर प्लांटेशन में इनकी भागीदारी ने इन आदिवासी किसानों को आजीविका में व्यवस्थित रुप से बदलाव के लिए सक्षम बनाया है। रबर बोर्ड द्वारा नियुक्त ब्लॉक प्लांटेशन ऑफिसर (बीपीओ) यह सुनिश्चित करता है कि रबर के बाग के लिए आवश्यक सभी इनपुट आसानी से उपलब्ध हों। बीपीओ ब्लॉक प्लांटेशन में अन्य सेवाओं के लिए भी केंद्र स्थापित किए गए हैं। ब्लॉक प्लांटेशन में परिवारों के लिए इम्यूनाइजेशन ड्राइव, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान और पशुपालन शिविर जैसे कई कार्यक्रम राज्य सरकार द्वारा आयोजित किए जाते हैं। रबर बोर्ड और राज्य सरकार रबर बागान की स्थापना के लिए 80 प्रतिशत खर्च करती है और इसके साथ ही लाभार्थियों ने 20 प्रतिशत का योगदान

ब्लॉक वृक्षारोपण पद्धति ने मजदूरी समेत कई ठोस लाभों के लिए मार्ग प्रशस्त किए हैं। जनजातीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर और आजीविका के टिकाऊ क्षेत्रों को भी उपलब्ध कराया है

स्टेट न्यूज

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दिया है। इस परियोजना में ब्लॉक रबर के बागानों को 40-50 हेक्टेयर के एक विशिष्ट क्षेत्र में शामिल किया जाना है। इस परियोजना के कार्यान्वयन में रबर बागानों के क्षेत्र के विकास के साथ ही साथ गांव की सड़कों, आंगनवाड़ी केंद्रों, स्वास्थ्य उप केंद्रों, पेयजल सुविधाओं, प्राथमिक विद्यालय, बिजली कनेक्टिविटी जैसी योजनाएं में सशक्तिकरण समूहों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी है, जिसमें रबर उत्पादक समाज (आरपीएसएस) और महिला बचत दल (डब्ल्यूटीजीएस) को भी शामिल किया गया है। वृक्षारोपण व्यक्तिगत भूमि पर मजदूरों से कराया जाता है, इसके लिए उन बागानों पर काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वेतन दिया जाता है। गैरआदिवासी श्रमिकों को मजदूरों के रूप में काम करने की अनुमति नहीं है। इसीलिए इस तरह के नियम ने लाभार्थियों के मन में बाग के लिए स्वामित्व और लगाव की भावना पैदा की है। इसका मुख्य उद्देश्य जनजातीय समुदाय के लोगों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना है। बीपीएस ने सामुदायिक स्तर के संस्थानों को रबर के संबंध में महत्वपूर्ण सहभागी और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास के रूप में शामिल किया है। ब्लॉक वृक्षारोपण पद्धति ने मजदूरी समेत कई ठोस लाभों के लिए मार्ग प्रशस्त किए हैं। जनजातीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर और आजीविका के टिकाऊ क्षेत्रों को भी उपलब्ध कराया है। बीपीएस परियोजना कृषि और गैर-कृषि मजदूरों को तब तक रोजगार के अवसर प्रदान करती है, जब तक कि थर्मल वृक्षारोपण परिपक्व न हो जाए। पहले साल से लेकर छठें साल तक प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में 1010 व्यक्ति प्रति दिन के हिसाब से रोजगार उत्पन्न होते हैं। रबर संसाधन ने ब्लॉक वृक्षारोपण की सफलता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। एक अवधि में उत्पन्न आय से 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। प्रत्येक बीपीएस इकाई को 5 लाख रुपए की लागत से प्रोसेसिंग सुविधा प्रदान की गई है। इससे डीलरों पर अपनी आय और कम निर्भरता भी बढ़ी है। रबर की मार्केटिंग के लिए एम / एस मनीमालीयार रबर प्राइवेट लिमिटेड रबर बोर्ड की सहायक प्रभारी है। एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने से ब्लॉक वृक्षारोपण परियोजना गांव के स्तर पर कई तरह की सेवाओं में सफल हो गई है। समुदाय-स्तर की संस्थाओं का निर्माण, सशक्त महिलाएं, इत्यादि के लिए ग्राम स्तर पर सामुदायिक संसाधनों की सुविधा को उत्पादित और स्थापित किया है। ब्लॉक वृक्षारोपण की सफलता ने अन्य आदिवासी परिवारों के लिए उत्तेजना के रूप में कार्य किया है और गैर-आदिवासी परिवार अपने ही क्षेत्र में अपने पैसे से या बैंक से लोन लेकर खेती कर सकते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 35000 एसटी व्यक्ति रबर उद्यान के मालिक हैं, जबकि 1992 में जब बीपीएस शुरू किया गया था तब कोई भी व्यक्ति नहीं था। सरकार ने रबर पार्क की स्थापना की और त्रिपुरा में उत्पादित रबर का 10 प्रतिशत भाग रबर पार्क के कई इकाइयों में इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार ने त्रिपुरा वन विकास निगम (टीएफडीपीसी) के तहत पुराने वृक्षारोपण के इस्तेमाल के लिए रबर वुड फैक्ट्री की स्थापना की है।


14 स्टेट न्यूज

10 - 16 जुलाई 2017

गांवों में स्मार्ट बनने की होड़ ग्रामीण

भारत

एक तरफ जहां ऐसे कई गांव मॉडल गांव की तर्ज पर सराहे जा रहे हैं, वहीं इन्हें देखकर आसपास के गांवों के बीच भी स्मार्ट होने की होड़ मची है

एक नजर

गुजरात का अकोदरा देश का पहला डिजिटल गांव है

नोटबंदी के दौर में भी अकोदरा में नहीं लगी बैंकों के आगे कतार ‘डिजिटल इंडिया’ से जुड़ने वाला पहला आदर्श गांव मथुरा का रावल

डि

प्रियंका तिवारी

जिटल क्रांति के दौर में देश के गांवों का चेहरा भी तेजी से बदल रहा है। पिछड़ापन और गरीबी से आगे कैशलेस इकोनॉमी और ई-गवर्नेंस है अब इन गांवों की पहचान। अच्छी बात यह भी है कि एक तरफ जहां ऐसे कई गांव अलग-अलग सूबों में मॉडल गांव की तर्ज पर देखे और सराहे जा रहे हैं, वहीं इनकी सफलता से प्रेरणा पाकर आसपास के गांवों के बीच भी स्मार्ट होने की होड़ मची है।

देश का पहला कैशलेस गांव

देशभर के शहरों, कस्बों और गांवों में नोटबंदी के दौरान बैंकों के बाहर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिल रही थी, लेकिन गुजरात के एक गांव में सिर्फ एक एटीएम होने के बावजूद कोई लाइन नहीं लग रही थी। यहां के लोग सामान भी खरीदने जाते हैं तो फोन पर टेक्स्ट मैसेज से पेमेंट करते हैं। इस मैसेज में पेमेंट पाने वाले का अकाउंट नंबर और जितना पैसा ट्रांसफर किया जाना है, उसके बारे में जानकारी रहती है। यह मैसेज खरीदार सीधे अपने बैंक को भेजता है और फिर आगे का काम बैंक कर देता है।

दरअसल हम बात कर रहे हैं गुजरात के साबरकांठा जिले में स्थित अकोदरा गांव की। देश का यह पहला डिजिटल गांव आज कैशलेस इकॉनॉमी के लिहाज से भी देश का सबसे चर्चित मॉडल गांव है। गांव में छोटी से छोटी रकम का भुगतान भी आॅनलाइन ही होता है। अहमदाबाद से तकरीबन 90 किलोमीटर दूर अकोदरा गांव को आईसीआईसीआई बैंक ने 2015 में गोद लिया था। इस बैंक ने गांव को गोद लेकर राज्य सरकार के साथ मिलकर इसे डिजिटल गांव बनाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। 1500 की आबादी वाले इस गांव में 1200 लोगों के पास बैंक अकाउंट हैं। इस कारण बैंक की तरफ से प्रत्येक खाताधारक को मनी ट्रांसफर की सुविधा दी गई है। आज की तारीख में यह गांव पूरी तरह से कैशलेस है। तकनीक की मदद से इस गांव के सभी लोग बगैर कैश के इस्तेमाल के अपना सब काम करते हैं। अकोदरा में शिक्षिका जोत्सना बेन का कहना

है, ‘यहां तकरीबन सभी लोग मोबाइल बैंकिंग, कार्ड पेमेंट और नेटबैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं। यह भारत का पहला डिजिटल कैशलेस गांव है। गांव में 5000 रुपए तक के अधिकतर लेन-देन मोबाइल बैंकिंग के जरिए ही होते हैं। इसके लिए कोई भी एक मैसेज के जरिए दूसरे को पैसा भेज देता है, जो कि लेने वाले के सीधा खाते में पहुंच जाता है।’ गांव में रहने वाले सभी 250 लोगों का बैंक खाता है। गांव में कुल 1036 वयस्क लोग हैं और गांव की कुल आबादी 1191 है। इन लोगों को बैंक ने तकनीक का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी है। यहां के एक ग्रामीण का कहना है कि डिजिटल बैंकिंग के चलते हमें नोटबंदी से कोई भी दिक्कत नहीं हुई। हमारे पड़ोसी गांवों को कैश की काफी दिक्कत हुई, लेकिन हम मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं। यहां रहने वाले ट्रैक्सी ड्राइवर हेमंत भाई का कहना है कि मैं पूरे गुजरात में टैक्सी चलाता हूं, हर जगह पैसों को लेकर दिक्कत है, लेकिन अकोदरा

अकोदरा गांव के स्कूलों में ब्लैक बोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड ने ले ली है। पढ़ाई पूरी तरह डिजिटल हो गई है। बच्चों के बस्तों में किताबें नहीं, टैबलेट हैं

गांव में पैसों की कभी दिक्कत नहीं है। यहां मोबाइल बैंकिंग अंग्रेजी और गुजराती दोनों भाषा में होती है। ‘सबर डेयरी’ ने यहां जानवरों के लिए हॉस्टल की सुविधा मुहैया कराई है। स्थानीय किसान सुरेश भाई का कहना है कि सभी ग्रामीण अपने पशुओं क यहां रखते हैं। यहां ‘सबर डेयरी’ की गाड़ी आती है और दूध ले जाती है, दूध की जांच भी वहीं होती है, जिसके बाद दूध का पैसा महज 10 दिन के भीतर बैंक खाते में जमा हो जाता है। इस गांव में प्राइमरी, सेकेंडरी और हायर स्कूल हैं। स्कूलों में तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं। गांव के स्कूलों में ब्लैक बोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड ने ले ली है। पढाई पूरी तरह डिजिटल हो गई है। बच्चों के बस्तों में किताबें नहीं, टैबलेट हैं। तकनीक का असर विद्यालयों में साफ दिखाई देता है, जिससे बच्चे उत्साहित हैं और उनकी उपस्थिति भी बढ़ी है। स्कूलों में छात्र अपनी उपस्थिति भी कार्ड स्वैप के जरिए दर्ज कराते हैं। ऑडियो-विजुअल दोनों ही माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे अकोदरा गांव के बच्चे भी इन शिक्षण सुविधाओं को लेकर काफी संतोष और हर्ष जताते हैं। अकोदरा गांव में इंटरनेट की सुविधा तो है ही। इसकी उपलब्धता सर्वसुलभ बनाने के लिए वाईफाई टॉवर भी लगाया गया है। यहां तीन माइक्रो एटीएम लगे हैं। यहां ग्राम पंचायत स्तर पर कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाई गई है। इसके अलावा यहां आरओ प्लांट भी है। डिजिटल हो चुके अकोदरा में ई-हेल्थ सेंटर भी है, जहां गांव वालों के मेडिकल रिकॉर्ड बटन दबाते


10 - 16 जुलाई 2017

स्टेट न्यूज

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देश का पहला जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन वाला गांव कु

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर भनवापुर ब्लाॅक का हसुड़ी औसानपुर गांव के एक-एक मकान और उसके लोगों का डेटा वेबसाइट पर उपलब्ध है

श्रवण शुक्ला/लखनऊ

छ दिन पहले उत्तर प्रदेश का गोंडा शहर देश के गंदे शहरों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर था, वहीं उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में गिना जाने वाला सिद्धार्थनगर जिले का हसुड़ी गांव मिसाल बन गया है। यह गांव देश का पहला जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन वाला गांव बन गया है। सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर भनवापुर ब्लाॅक का हसुड़ी औसानपुर का यह गांव इन दिनों चर्चा का विषय है। इस गांव के एक-एक मकान और उसके लोगों का डेटा वेबसाइट पर उपलब्ध है। यही नहीं, गांव का पूरा मैप अलग से तैयार करवाया गया है। नेपाल सीमा से लगे इस गांव का अपना डिजिटो मैप और वेबसाइट है। गांव के तालाब, गोचर भूमि, कृषि योग्य जमीन, नहर, सड़कें और घर किसका है जैसी सभी जानकारी सिर्फ एक लिंक से प्राप्त की जा सकती है। इस गांव में अब हर परिवार का डेटा फीड किया जा रहा है, जो एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। खास बात यह है कि इस गांव को यह सब करने की प्रेरणा गुजरात के ही गांव पुंसरी से मिली। वैसे अब यह गांव पुंसरी से भी ज्यादा हाईटेक हो चुका है। इस गांव का प्राथमिक विद्यालय भी पूरी तरह से हाईटैक है। विद्यालय के फर्श पर टाइल्स लगे हैं और शौचायल भी वेस्टर्न स्टाइल के हैं। ऐसा करने में गांव के लोग भागीदारी भी बढ़-चढ़ कर रहे हैं। अपने गांव की इस उपलब्धि पर यहां के लोग काफी खुश और उत्साहित हैं। गांव को स्मार्ट विलेज बनाने की शुरुआत गांव के सरपंच दिलीप पांडेय ने अपने निजी संसाधनों से की। इसकी प्रेरणा उन्हें गुजरात के बनासकांठा के पुंसरी गांव से मिली। दिलीप त्रिपाठी ने पंचायती राज पर दिल्ली में हुए वर्कशॉप में पुंसरी की डॉक्यूमेंट्री देखी थी, तभी उन्होंने ठान लिया कि जब पुंसरी देश का मॉडल विलेज बन सकता है तो मेरा हसुड़ी क्यों नहीं? बस प्रयास शुरू हो गए। गांव का री-डेवलपमेंट प्लान ही उपलब्ध हो रहे हैं। टेली-मेडिसिन के जरिए यहां के लोग अब स्वास्थ्य संबधी मामलों पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय भी ले रहे हैं। इतना ही नहीं, बदलाव का असर अकोदरा के सामाजिक जीवन पर भी दिख रहा है। आसपास के गांव भी अकोदरा में अपनी लड़कियों का रिश्ता करना चाहते हैं, ताकि शादी के बाद उन्हें मॉर्डन रहन-सहन और बेहतर सुविधाएं मिलें। गांव में आंगनबाड़ी से लेकर शिक्षण संस्थानों तक यह बदलाव साफ देखा जा सकता है।

‘डिजिटल इंडिया’ से जुड़ने वाला पहला आदर्श गांव

मथुरा की सांसद हेमा मालिनी का गोद लिया आदर्श

हसुड़ी गांव में अब हर परिवार का डेटा फीड किया जा रहा है, जो एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। खास बात यह है कि इस गांव को यह सब करने की प्रेरणा गुजरात के पुंसरी गांव से मिली तैयार करवाया। इसी आधार पर आज इस गांव में 23 जगह सीसीटीवी कैमरे, सात जगहों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट और पब्लिक एड्रेसिंग सिस्टम के तहत 23 जगह स्पीकर लगे हैं। पब्लिक एड्रेस सिस्टम की विशेषता यह है कि सरपंच गांव में हो या कहीं और, इंटरनेट के माध्यम से सीधे ग्रामीणों के साथ बातचीत कर सकते हैं। ग्राम प्रधान के भाई रोहित त्रिपाठी की देख-रेख में गांव का विकास का कार्य हो रहा है। उनका कहना कि गांव के लोगों को हर तरह की सुविधा के साथ साफ सफाई का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है। गांव में पॉलीथिन के उपयोग को पूरी बैन कर दिया गया है। उन्हें खुशी है कि ग्राम पंचायत के लोग भी इन कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे और सहयोग भी कर रहे हैं। महज ग्राम रावल, देश का पहला डिजिटल इंडिया से जुड़ने वाला गांव बन गया है। हेमा मालिनी ने पिछले साल नवंबर में इस गांव में नवनिर्मित कम्युनिटी हॉल में निशुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन किया था। प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन करने के मौके पर सांसद हेमा मालिनी ने कहा था, 'मैं आज बहुत खुश हूं कि मेरा गोद लिया हुआ आदर्श गांव देश का ऐसा पहला आदर्श ग्राम बना है, जिसमें ‘डिजिटल इंडिया’ के अंतर्गत सभी ग्रामीणों को कंप्यूटर और इंटरनेट का प्रशिक्षण देने की पहल की गई।' समारोह में उपस्थित गांव के सभी युवा छात्र-छात्राओं, महिलाओं, किसानों, व्यापारियों एवं बुजुर्गों को कंप्यूटर, मोबाइल फोन

एक हजार से अधिक की आबादी वाला यह गांव 650 एकड़ में फैला है। प्रत्येक परिवार के सामाजिकआर्थिक विवरण अब वेबसाइट पर अपलोड किए जा रहे हैं, जिससे यह गांव के बड़े आंकड़ो की खान बनने जा रहा है। परिवार के सदस्यों की संख्या, आयु वर्ग, परिवार का प्रमुख, जाति जैसी बुनियादी जानकारियों के अलावा इसमें सभी ग्रामीणों के अन्य विवरण भी शामिल होंगे। अन्य विवरण में संबंधित व्यक्ति या परिवार के पास जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा है या नहीं, परिवार का कोई सदस्य धूम्रपान करता है या नहीं, तम्बाकू चबाता है या नहीं जैसी जानकारियां भी कंप्यूटर पर अपलोड की जा रही हैं। इन जानकारियों की तफसील इतनी ज्यादा है कि इससे यह जानकारी भी मिल सकती है कि किन-किन घरों में शौचालय,

एवं इंटरनेट की जानकारी और उससे होने वाले लाभों के बारे में भाजपा नेता कल्पना गर्ग ने प्रोजेक्टर

रसोई उद्यान, कंपोस्ट पिट, हैंडपंप और मच्छरदानी है और किन घरों में किन चीजों की कमी है। परिवार सदस्यों के बैंक खाते, एटीएम कार्ड, स्मार्टफोन, निजी कंप्यूटर आदि की जानकारी भी डिजिटली एकत्रित की जा रही है। गांव की सुरक्षा और स्थिति का जायजा सरपंच दिलीप त्रिपाठी नियंत्रण कक्ष में सीसीटीवी फुटेज की जांच के जरिए करते हैं। तारीफ की बात है कि यह सब उन्होंने सिर्फ 15 लाख रुपए लगाकर हासिल किया और यह पैसा भी उन्होंने अपनी बचत की रकम से खर्च किया। वे बताते भी हैं कि उन्होंने सरकार द्वारा प्रदान किए गए लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि इसमें केवल 6 लाख हैं, जिससे गांव को इस तरह विकसित करना मुश्किल था। अपने इस जज्बे को लेकर वे आगे कहते हैं, ‘बचपन से अपने गांव को एक आदर्श स्मार्ट गांव बनाने के लिए मैं दृढ़ था। मैं हमेशा समाज के लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन मुझे मौका नहीं मिल रहा था। पंचायत चुनाव में जीत ने मेरे इस सपने को साकार करने की राह आसान कर दी।’ गांव के डिजिटलीकरण के अलावा त्रिपाठी ने यह भी सुनिश्चित किया है कि गांव की सड़कों को अच्छी तरह से बनाए रखा जाए। साथ ही, प्राथमिक विद्यालय और जूनियर स्कूल में डिजिटल कक्षाएं चलें और स्वच्छता के लिए एक प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली का इस्तेमाल हो। दिलीप त्रिपाठी अपने इरादों में आगे की कई योजनाओं पर अभी से विचार कर रहे हैं, इनमें सर्वप्रमुख है-गांव में बिजली उत्पन्न करने के लिए सौर पैनल स्थापित करना। वे इस काम को गांव के विकास के अगले चरण में पूरा करने को लेकर कृतसंकल्प हैं। क्षेत्र के मानचित्रण और संपूर्ण वेबसाइट की उपयोगिता अभी तक स्पष्ट नहीं है, फिर भी ग्रामीणों में गांव में आए परिवर्तन को लेकर खुशी है। हसुड़ी निवासी प्रदीप कुमार बताते हैं, ‘हम युवा हैं। इंटरनेट, वाई-फाई, कैमरे यही हम चाहते हैं। हमारा गांव अब शहर जैसा है।’ पर लाइव वीडियो और ग्राफिक्स के माध्यम से समझाया। उन्होंने यह भी बताया कि आम आदमी प्रधानमंत्री मोदी की विभिन्न योजनाओं से किस प्रकार जुड़कर अपने जीवन को प्रभावकारी बना सकते हैं। इस अवसर पर रावल गांव के करीब 110 छात्र- छात्राओं, महिलाओं, किसानों आदि ने कंप्यूटर ट्रेनिंग के लिए अपना नाम पंजीकृत कराया था। सांसद हेमा मालिनी ने ग्रामवासियों को प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित करते हुए कहा, 'इस योजना का लाभ अधिक से अधिक लोग उठाएं जिससे मैं गर्व से कह सकूं कि मेरा ग्राम आदर्श ग्राम से कई कदम आगे बढ़कर 'डिजिटल ग्राम' बन रहा है।'


16 खुला मंच

10 - 16 जुलाई 2017

लोकेंद्र सिंह

‘क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात कहने के बजाय दूसरों के हृदय को ज्यादा दुख पहुंचाता है ’

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं

-मुंशी प्रेमचंद

स्वच्छता की राजधानी

दिल्ली का बदलता चेहरा बदलते देश का आईना होने जा रहा है और यह देश के विकास और उससे जुड़ी छवि के लिए शुभ संकेत है

आह्वान देशकामेंनामस्वच्छतानहीं, अबबल्किमहजइसनेएक सफलता

और प्रेरणा के कई सुलेख एक साथ लिखी हैं। इस क्रम में हर अगले दिन एक नई उपलब्धि दर्ज हो रही है, जो इस बात के भरोसे को पुष्ट करती है कि भारत 2019 यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 125वीं जयंती के अवसर पर स्वच्छता का एक बड़ा संकल्प काफी हद तक पूरा हो जाएगा। इस दिशा में जो नई और बड़ी कामयाबी दर्ज होने जा रही है, वह है राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का इस साल के अंत तक खुले में शौच (ओडीएफ) मुक्त होने का कार्ययोजना पर तेजी से अमल हो रहा है। बात करें दिल्ली को छोड़ अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तो वे भी अगले साल मार्च तक इस संकल्प को पूरा करने जा रहे हैं। दिल्ली देश की राजधानी है और उसका स्वच्छता के साथ दैनिक जीवन से जुड़े अन्य मुद्दों और सुविधाओं में आगे निकलना इसीलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। यह भी कह सकते हैं कि देश की छवि को भी तय करने में दिल्ली की बड़ी भूमिका है। इस लिहाज से यह संतोष की बात है कि दिल्ली में कई देसी महत्वपूर्ण कार्ययोजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है, जिससे यहां का नागरिक जीवन निकट भविष्य में काफी बेहतर हो जाएगा। कायाकल्प और शहरी रूपांतरण के लिए अटल मिशन (अमृत) के तहत दो सालों के भीतर यहां 6.22 लाख घरों में नल से पीने की पानी की सप्लाई शुरू करा दी जाएगी। फिलहाल राजधानी दिल्ली में 23.78 लाख घरों में यानी कुल 58 फीसद घरों में पानी के कनेक्शन हैं। अमृत के सहयोग से इसे बढ़ाकर 73 फीसद तक पहुंचा दिया जाएगा। इसी मिशन के तहत सीवर कनेक्टीवि​िट को मौजूदा 57 फीसद से बढ़ाकर 65 फीसद किए जाने की योजना है। इसी तरह आवासीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भी दिल्ली में जनता के सामने एक साल के भीतर कई विकल्प होंगे। कह सकते हैं कि दिल्ली का बदलता चेहरा बदलते देश का आईना होने जा रहा है और यह देश के विकास और उससे जुड़ी छवि के लिए शुभ संकेत है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

प्र

वृक्ष ही बचाएंगे हमें

पर्यावरण चिंतकों की ईमानदार आवाजों का ही परिणाम है कि सरकारों ने भी शुष्क क्षेत्र पर्यावरण पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है

कृति के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल-जंगल के बिना जन का जीवन संभव है क्या? साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस प्रश्न का उत्तर जानता है। लेकिन, लालच से वशीभूत आदमी प्रकृति का संवर्द्धन करने की जगह निरंतर उसका शोषण कर रहा है। हालांकि वास्तविकता यही है कि वह प्रकृति को चोट नहीं पहुंचा रहा है, वरन स्वयं के जीवन के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कर रहा है। देर से ही सही अब दुनिया को यह बात समझ आने लगी है। पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया में चल रहा चिंतन इस बात का प्रमाण है। भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में भी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं। प्रमुख नदियों का अस्तित्व संकट में है। जंगल साफ हो रहे हैं। पानी का संकट है। हवा प्रदूषित है। वन्य जीवों का जीवन खतरे में आ गया है। पर्यावरण बचाने की दिशा में गैर-सरकारी संगठन और पर्यावरणविद् एवं प्रेमी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ प्रयास कर रहे हैं। लंबे संघर्ष के बाद उनके प्रयासों का परिणाम दिखाई भी दिया है। पर्यावरण के मसले पर समाज जाग्रत हुआ है। प्रकृति के प्रति लोगों को अपने कर्तव्य याद आ रहे हैं। पर्यावरण चिंतकों की ईमानदार आवाजों का ही परिणाम है कि सरकारों ने भी शुष्क क्षेत्र पर्यावरण पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है। नदी और वन बचाने की दिशा में मध्य प्रदेश सरकार ने सराहनीय पहल की है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में पहले मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए अभूतपूर्व आंदोलन चलाया गया और अब तक रिकॉर्ड स्तर पर नर्मदा कछार में पौधारोपण किया गया है। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का दावा है कि 2 जुलाई को पौधारोपण के महाभियान के तहत प्रदेश में एक दिन में 6 करोड़ 63 लाख से अधिक पौधे रोपे गए हैं। यह पौधे एक लाख 17 हजार 293 स्थानों पर रोपे गए हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आह्वान पर सरकार और गैर-सरकारी संगठनों ने पौधारोपण महाभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। सरकार ने पौधारोपण को उत्सव की तरह आयोजित कर समाज को पर्यावरण बचाने का संदेश दिया है। उल्लेख करना होगा कि यह एक विश्व कीर्तिमान है। अब तक एक दिन में इतनी बड़ी संख्या में पौधारोपण नहीं किया गया है। इससे पहले उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने नाम एक दिन में पांच करोड़ पौधे लगाने का कीर्तिमान गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराया था। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

ने भी पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रकट करते हुए 11 जुलाई, 2016 को छह हजार से अधिक स्थानों पर 5 करोड़ पौधे लगवाए थे। अमूमन होता यह है कि सरकारें या स्वयंसेवी संस्थाएं जोरशोर से बड़े पैमाने पर पौधारोपण करती हैं, लेकिन उनका परिणाम लगभग शून्य ही आता है। दरअसल, पौधे रोप तो दिए जाते हैं, लेकिन रोपा गया पौधा सूखे नहीं, इसकी चिंता नहीं की जाती है। यानी पौधारोपण की योजनाएं अक्सर अपूर्ण होती हैं। ऐसे में पौधारोपण खानापूर्ति होकर रह जाते हैं। प्रदेश सरकार ने जब छह करोड़ पौधे लगाने की बात कही, तब सबके मन में यही आशंका थी कि पौधे लग तो जाएंगे लेकिन बचेंगे कैसे? छह करोड़ पौधों की चिंता कौन करेगा? समर्थ होने तक इन पौधों को पानी कौन देगा? यह अच्छी बात है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिकॉर्ड बनाने के लिए पौधारोपण कर इतिश्री नहीं की है, बल्कि उन्होंने पौधारोपण की पूर्ण योजना बनाई है। अपने इस अभियान में सरकार ने स्वयंसेवी नागरिकों को 'पौध रक्षक' बनाकर रोपे गए पौधों की पेड़ बनने तक रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी है। मनरेगा के जॉब कार्डधारी परिवारों को भी 'पौध रक्षक' बनाया गया है। मनरेगा के तहत तय किए गए पौधरक्षकों को पौधे के संधारण एवं जीवित रखने के लिए तीन से पांच वर्ष तक मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। ग्राम पंचायतों को भी पर्यवेक्षण के लिए राशि का प्रावधान किया गया है। वैसे भी इस प्रकार के समाजोन्मुखी अभियानों की सफलता समाज की सक्रिय सहभागिता के बिना संभव नहीं है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार के

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का दावा है कि 2 जुलाई को पौधारोपण के महाभियान के तहत प्रदेश में एक दिन में 6 करोड़ 63 लाख से अधिक पौधे रोपे गए हैं। यह पौधे एक लाख 17 हजार 293 स्थानों पर रोपे गए हैं


10 - 16 जुलाई 2017

मिहिर पॉल इन प्रयासों के कारण 6 करोड़ 63 लाख में से अधिक से अधिक पौधे पेड़ बन पाएंगे। यदि आधे पौधे भी अपने यौवन को प्राप्त कर लेंगे, तब भी यह सरकार की बड़ी उपलब्धि होगी। मध्य प्रदेश में नर्मदा कछार में लगाए गए छह करोड़ 63 लाख पौधे निकट भविष्य में मां नर्मदा को सदानीरा बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हम जानते हैं कि नर्मदा नदी का उद्गम किसी ग्लेशियर से नहीं हुआ है। नर्मदा नदी की धारा में बहने वाली जलराशि पेड़ों की जड़ से निकली बूंद-बूंद है। जंगल कम होने के कारण से नर्मदा की धार मंथर और कृषकाय हो गई है। नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवनरेखा है। यह प्रदेश के लाखों-करोड़ों लोगों का पोषण करती है। इसलिए नर्मदा का स्वस्थ और मस्त रहना जरूरी है। नर्मदा नदी का संरक्षण पेड़ों के अभाव में हो नहीं सकता। इसलिए भी मध्य प्रदेश सरकार के इस निर्णय की सराहना की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री ने भविष्य में भी इसी प्रकार वृहद स्तर पर पौधारोपण की बात कही है। समाज की साथ लेकर पर्यावरण के संरक्षण की जो पहल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रारंभ की है, उसके दूरगामी परिणाम प्राप्त होंगे। ‘नमामि देवी नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा’ के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह घोषणा की थी कि नर्मदा के संरक्षण के लिए नर्मदा कछार में छह करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। इससे पूर्व सिंहस्थ महाकुम्भ के दौरान आयोजित अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुम्भ में भी उन्होंने कहा था कि नर्मदा नदी और पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार नर्मदा सहित प्रदेश की प्रमुख नदियों के किनारे समाज के सहयोग से पौधारोपण कराएगी। उन्होंने पर्यावरण सरंक्षण के प्रति गंभीरता दिखाते हुए अविलम्ब अपनी घोषणा को धरातल पर उतारकर दिखा दिया है। निश्चित ही इस प्रयास के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान साधुवाद के पात्र हैं। पौधारोपण के महाभियान में उन्होंने एक और सार्थक एवं अनुकरणीय विचार प्रस्तुत किया है। मुख्यमंत्री ने अमरकांटक में वृक्षारोपण महाअभियान का शुभारंभ करते हुए कहा कि प्रदेश में अब सार्वजनिक कार्यक्रमों की शुरूआत पौधारोपण एवं कन्या-पूजन से होगी। यकीनन आज जंगल बचाने की आवश्यकता है। एक शोध के अनुसार समूची दुनिया में तकरीबन तीन ट्रिलियन पेड़ हैं। देखा जाए तो पूरी दुनिया में हर साल तकरीबन 15 अरब पेड़ काट दिए जाते हैं। मौजूदा हालात गवाह हैं कि मानव सभ्यता की शुरुआत के बाद से दुनिया में पेड़ों की संख्या में 46 फीसदी की कमी आई है। यह स्थितियाँ किसी भी प्रकार मानव समाज के लिए ठीक नहीं कही जा सकती हैं। एक दावे के मुताबिक अभी दुनिया में कुल मिलाकर 301 लाख वर्ग किलोमीटर जंगल बचा है जो दुनिया की धरती का 23 फीसदी हिस्सा है। लेकिन यदि दुनिया में जंगलों के खात्मे की यही गति जारी रही तो 2100 तक समूची दुनिया से जंगलों का पूरी तरह सफाया हो जाएगा। यदि यह दावा सच साबित होता है, तब हमें यह भी मान लेना चाहिए कि जंगलों के साथ हम सब भी खत्म हो जाएंगे। जंगल हैं इसीलिए जल है और जल है इसीलिए जीवन है। जीवन को बचाना है, तब जंगल को बचाना बेहद जरूरी है। मध्य प्रदेश सरकार को अपनी इस पहल को आगे भी जारी रखना चाहिए और अन्य प्रदेशों की सरकारों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

खुला मंच

लेखक अमेरिका के अरबाना शैम्पेन स्थित इलिनॉय विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र और मनोव‌िज्ञान में स्नातक हैं

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लगाव होंगे समाप्त तो नहीं होंगे जीवन में दुख-दर्द

प्रत्येक व्यक्ति को व्यापक रूप से व्यावहारिक बनना सीखने की आवश्यकता है। साथ ही, अपनी गतिविधियों को भी सामान्य बनाए रखना चाह‌िए

ब हम समय या परिस्थिति की अनिवार्यता को आंख मूंदकर स्वयं को उसके अनुकूल बना लेते हैं तभी ये अनुभव होने लगता है कि कोई बात है जो दर्द का कारण है और तब हमें यह सामान्य अनुभव होता है। ध्यान से देखें तो हम स्वयं परिस्थितियों से निरंतर जुड़ाव को उतना महत्व देते भी नहीं। शायद यही परेशानियों का मुख्य कारण है। हम स्वयं को भौतिक वस्तुओं, अपने घर, अपने बैंक खाते, साझेदारों और माहौल आदि से जोड़े रखते हैं। इसी जुड़ाव के कारण हम जिनसे बेहद लगाव अनुभव करते हैं, उनके खो जाने से उतना ही विचलित हो जाते हैं। परिणाम यह है कि ऐसी परिस्थिति आ जाने पर उसका सामना करना हमें मुश्किल लगता है। हम अपनी प्यारी वस्तुओं को लेकर सामान्य तौर पर इतने अभ्यस्त हैं कि जीवन की अपरिहार्यता भूल चुके हैं। जितना हमारी जानकारी में आ जाता है हम उसी के हो जाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कुछ भी स्थाई नहीं। यहां तक कि स्वयं हमारा जीवित बने रहना भी नहीं। हमें अपने भौतिक यथार्थ को स्थायी नहीं मानना चाहिए, बल्कि हमें स्वयं के अस्तित्व की अनिवार्यता को सीधे-सीधे उपयुक्त बनाना चाहिए। जीवन के उस एक क्षण को भी हमें नहीं गंवाना चाहिए जहां हम उपयुक्त मानते हैं। जीवन समय की परिधि में है। इसी परिधि में रहकर हमारा जीवन और ज्यादा मूल्यवान एवं

अनोखा बनता है। हमें जीवन की शुचिता को बनाए रखने का संतुलन समझना होगा। साथ ही, याद रहे कि जीवन स्थाई नहीं है। जीवन में उपलब्ध भौतिक वस्तुओं के प्रति लगाव तो रहे, लेकिन सच्ची आत्मा और स्वाभिमान के बीच कुछ निश्चित दूरी बनाए रखें, हालांकि ऐसा हमारे अनुभव के आलोक में प्रत्यक्ष दिखता भी है। हम सभी जानते हैं कि सकारात्मक और नकारात्मक अनुभव जीवन के दो पाट हैं। जो व्यक्ति अपने जीवन से दुराव का निश्चित स्तर प्राप्त कर लेता है, उसे जीवन में मिल चुका समूचा अनुभव समझ आने लगता है। ऐसे व्यक्ति संजीदा जीवन जीते हैं। ऐेसे लोगों पर सकारात्मक या नकारात्मक, किसी तक का बोझ नहीं टिक पाता। जब कोई व्यक्ति आकाश सरीखा स्वच्छ हो जाता है तब वह तटस्थ हो जाता है। उसके आसपास अधिकांश वस्तुएं उप‌स्थित हों तो भी वह इन सबसे निस्पृह बना रहता है। हमें शांति

स्वामी विवेकानंद पर प्रशंसनीय सामग्री

सुलभ स्वच्छ भारत’ का स्वामी विवेकानंद के जीवन एवं विचारों पर प्रकाशित अंक पढ़ा। स्वामी विवेकानंद के बारे में पहले भी बहुत कुछ पढ़ा था। आज भी उनको लेकर लोगों में खासी दिलचस्पी है। इस अंक को पढ़ने के बाद न सिर्फ लोगों को उनके विचारों से प्रेरणा मिली, बल्कि एक आम आदमी के रूप में उनके जीवन के बारे में भी बहुत कुछ जानने को मिला। स्वामी विवेकानंद एक आधुनिक संत थे जिन्होंने राष्ट्र की सेवा के लिए काफी कुछ किया है। प्रेरणा के अपार स्रोत स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी हमें

बनाए रखने वाले कारकों को चिन्हित करना ही होगा, क्योंकि जीवन यथार्थ की गतिशील व्यवस्था है। सब कुछ चलायमान है और कुछ भी स्थायी नहीं। जब एक बार हम इस यथार्थ को स्वीकारते हैं तब भौतिक वस्तुओं से दूर वाले स्थलों पर रहना शुरू कर देते हैं। यही दुराव जीवन के आंतरिक आलोक को उभारता है, क्योंकि हम कहीं इन्हीं बिंदुओं से भटक चुके होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को भौतिक वस्तुएं और अनुभव अपने अंतर्जगत से प्राप्त होते हैं न कि सच्चे स्वाभिमान को नकार देने से। जितना हम स्वयं को भौतिक विश्व से दूर रखते हैं, उतना ही आध्यात्मिक जगत की पास आते हैं। तब जाकर जीवन का अर्जित अनुभव सच्ची अभिव्यक्ति के रूप में दिखना शुरू होता है। हमें अनुभूति होने लगती है कि हम कौन हैं? यही अवस्था दुखों से मु‌क्ति का मार्ग मानी गई है। जिस व्यक्ति में कोई भाव ही न हो, उसे नकारात्मक आभास भी नहीं होता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शेष विश्व से अलग-थलग, उदासीन और बेहाल है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यापक रूप से व्यावहारिक बनना सीखने की आवश्यकता है। साथ ही, अपनी गतिविधियों को सामान्य बनाए रखना है। लेकिन यह सिर्फ किसी एक से ऐसा दुराव पाल लेने से नहीं होने वाला, क्योंकि प्राय: यह मुहावरा सुनने को मिलता है- ‘विश्व से मेलभाव रखो, लेकिन इसी से चिपके मत रहो।’

आत्मविश्वास से भर देते हैं। स्वामी विवेकानंद अपने जीवन का एक एक क्षण लोगों की सेवा में लगाते थे। वे एक सुखी और समृद्ध भारत का निर्माण करना चाहते थे और ऐसा ही करने के लिए लोगों को प्रेरित करते थे। उन्होंने मानवता की सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाया। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ को पढ़कर ही मैं यह जान पाया कि सचमुच स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र और मानवता की सेवा का निर्णय महान था। आपसे निवेदन है कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को आप ऐसे ही प्रकाशित करते रहें ताकि लोगों को इससे समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिल सके। रमेश प्रसाद, रायपुर, छत्तीसगढ़


18 फोटो फीचर

10 - 16 जुलाई 2017

अाषाढ़ का एक दिन

कालिदास के बादल आए, छाए और झमाझम बरसे। तपी-तपाई धरती की प्यास कितनी बुझी, कितनों की प्यास मिटी, कितने जम कर भीगे। बारिश में बच्चों की छप-छप। मौसम का रोमांच अपने चरम तक जा पहुंचा। घूंघट के अंदर की मुस्कान हरे-हरे पत्तों तक फैल गई। फूलों की क्यारियों से लेकर परती पड़े खेतों के लिए हरे-भरे मौसम का स्वागत सबने अपनी अपनी तरह किया

फोटा​ेः प्रभात पांडे

मेघदूत हरियाली का संदेश लेकर पूरे देश पर छा गए, ऐसे में देश की राजधानी दिल्ली का उल्लास सबसे खास होता है। उमड़-घुमड़ कर कालिदास के मेघदूत हर किसी की कामना पूरी कर रहे हैं। मान -मनुहार के इस मौसम से सबको कुछ न कुछ चाहिए होता है। किसे क्या मिलता है और क्या नहीं, लेकिन यह तय है कि बिना किसी भेदभाव के ये बादल हर जगह जम कर बरसते हैं


10 - 16 जुलाई 2017

फोटो फीचर

बादल बरसे तो बचपना बरसता है। हंसी-ठिठोली और मुस्कुराने के इस मौसम का स्वागत पूरी प्रकृति करती है। आसमान बरसता है तो धरती अमृत का गर्भ धारण करती है। एक नई उम्मीद और नया जीवन कहीं न कहीं पलता है। जिसकी प्रतीक्षा हम ही नहीं, पूरी दुनिया करती है अनवरत और अथक

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20 स्वच्छता

10 - 16 जुलाई 2017

संक्षेप में

बस स्टैंड पर बनेगा सामुदायिक शौचालय

र बस स्टैंड परिसर में झांसीयात्रियोंके ललितपु की सुविधा के लिए सामुदायिक

शौचालय बनाया जाएगा। दस सीटों वाले इस शौचालय का निर्माण स्वच्छ भारत मिशन के तहत नगर पालिका द्वारा कराया जाएगा। इसे बनाने में सात लाख रुपए का खर्च आएगा। शहर के मुहल्ला घुसयाना में स्थित संत कबीर अंतरराज्यीय बस अड्डे से प्रतिदिन 160 से अधिक बसें संचालित होती हैं। इन बसों में यात्रा के लिए हर रोज तीन हजार से अधिक यात्री यहां आते हैं। उनकी सुविधा के लिए यहां पर एक संस्था का सामुदायिक शौचालय तो है, लेकिन इसके उपयोग के लिए जनता को शुल्क देना पड़ता है और भीड़ भी अधिक रहती है। यात्रियों की असुविधा को देखते हुए एआरटीओ प्रशासन सतेंद्र कुमार ने विगत दिनों जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में सामुदायिक शौचालय का निर्माण का प्रस्ताव रखा था। जिलाधिकारी ने नगर पालिका को सामुदायिक शौचालय बनवाने के निर्देश दिए। बस स्टैंड पर सामुदायिक शौचालय का निर्माण नगर पालिका द्वारा स्वच्छ भारत मिशन के तहत कराया जाएगा। दस सीटों वाले इस सामुदायिक शौचालय में छह सीटें पुरुष और चार महिलाओं के लिए होंगी। गौरतलब है कि नगर पालिका को स्वच्छ भारत मिशन के तहत शासन से नगर क्षेत्र में लगभग 300 सीटों तक सामुदायिक शौचालयों का निर्माण कराने का लक्ष्य मिला है। प्रत्येक सीट के सापेक्ष शासन नगर पालिका को 26 हजार रुपए की धनराशि उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा खर्च होने वाली धनराशि नगर पालिका खुद के कोष से व्यय करनी होगी। बस स्टैंड पर सामुदायिक शौचालय का निर्माण कराने के लिए जिला प्रशासन से स्वीकृति मिल चुकी है। प्रस्ताव भी तैयार है और जल्द ही वित्तीय स्वीकृति के लिए इसे शासन को भेज दिया जाएगा।

स्वच्छता उत्तर प्रदेश

मंत्री जी ने की नाली की सफाई श

स्वच्छता का संदेश देने के लिए उत्तर प्रदेश के पर्यावरण राज्यमंत्री ने खुद की नाली की सफाई

पथ ग्रहण के बाद पहली बार दफ्तर पहुंचे प्रदेश के राज्यमंत्री उपेंद्र तिवारी ने हाथों में झाड़ू लेकर सफाई की थी। यह घटना तो बीते दिनों की बात है। अब वही मंत्री महोदय कांशीराम आवासीय कालोनी में सफाई अभियान की शुरूआत करते हुए खुद नाली की सफाई में जुट गए। स्वच्छता के प्रति उत्तर प्रदेश के पर्यावरण राज्य मंत्री उपेंद्र तिवारी का जज्बा वाकई सबके लिए एक मिसाल की तरह है। उपेंद्र तिवारी ने सफाई के इस अभियान में अधिक से अधिक संख्या में लोगों से जुड़ने का आह्वान किया था। उन्होंने सफाई कार्य हेतु सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि शहर की मलिन बस्तियों में सफाई के लिए अधिकारी, जनप्रतिनिधियों और जागरूक समाजसेवी संगठनों द्वारा मिलजुल कर प्रभावी ढंग से अभियान चलाया जाए। हाथ में फावड़ा लिए मंत्री और डीएम द्वारा सफाई करते देख देख बड़ी तादाद में लोग सफाई कार्य में हाथ बंटाने के लिये आगे आए। मंत्री और डीएम देख अनेक जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने फावड़ा, लकड़ी-लोहे की डंडियां हाथ में लेकर नालियों और सड़कों से गंदगी साफ की। उपेंद्र तिवारी ने क्षेत्रीय लोगों की समस्याओं की सुनवाई करने के बाद लोगों को स्वच्छता हेतु जागरूक करते हुए कहा कि वे अपने घर के बाहर सड़क

जगत ब्लॉक के 54 गांव में बनने लगे शौचालय

संक्षेप में

त्तर प्रदेश के बदायूं में खुले में शौच से मुक्ति दिलाने की कवायद कर रही सरकारी मशीनरी की मेहनत का नतीजा जगत ब्लॉक में दिखने लगा है। स्वच्छता की अलख जगाने निकली स्वच्छताग्रहियों की टीम की मेहनत से ब्लॉक के 54 गांवों में शौचालय बनने लगे हैं, तो बाकी बचे गांव में जाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। जिले का प्रशासनिक अमला स्वच्छ भारत मिशन अभियान में जुटा है। अब तक दर्जनों गांव एक के बाद एक ओडीएफ घोषित किए गए हैं।

पर कूड़ा-करकट न फेंके, अपने घर के अलावा घर के बाहर और सार्वजनिक स्थलों को साफ-सुथरा रखें। उन्होंने कांशीराम कालोनी सहित शहर की अन्य मलिन बस्तियों में नियमित रूप से सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। करीब दो घंटे से अधिक चले सफाई के इस अभियान को जारी रखने के लिए जिलाधिकारी अमित कुमार सिंह ने अधीनस्थ अधिकारियों को समुचित निर्देश दिए और कहा कि वे स्वच्छ भारत मिशन की कामयाबी के लिए समूचे जिले में प्रभावी ढंग से सफाई अभियान को संचालित कर नियमित रूप में समीक्षा करें और पाई गयी कमियों को दुरूस्त करें। मंत्री और बड़ी संख्या में उच्चाधिकारियों के एकाएक कालोनी आगमन पर क्षेत्रीय लोग अचंभित हो गए। सफाई अभियान के दौरान मंत्री, सांसद, एमएलए और आला अधिकारियों को अपने बीच में देखकर बुजुर्गो, महिलाओं और बच्चों ने प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि कमजोर, गरीब लोगों के इस क्षेत्र को साफ-सुथरा रखने की यह अच्छी शुरूआत की गई है। (भाषा)

बाकी की पहल अभी जारी है। बीते दिनों जिले का चार्ज संभालने के बाद सीडीओ शेषमणि पांडेय ने ओडीएफ की कवायद को और तेज किया तो जगत ब्लॉक इस चरण में ओडीएफ के लिए चिन्हित किया गया। जगत ब्लॉक को ओडीएफ कराने की कमान यूनीसेफ के कंसल्टेंट अब्दुल जाबाज को सौंपी गई। उनके नेतृत्व में गांवों में स्वच्छता की अलख जगाते हुए उन्हें जागरूक किया गया कि वे अपने घरों में शौचालय बनवाएं। इस अभियान के बाद करीब 54 गांवों में शौचालय बनने शुरू हो गए हैं।

नमामि गंगे अभियान के तहत चलंत शौचालय

स्वच्छता अभियान की कड़ी देशव्यापी में बिहार के वैशाली जिला प्रशासन

की एक पहल से गंगा की पवित्रता को बनाए रखने में विशेष मदद मिलने की पूरी संभावना है। जिला प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार गंगा किनारे के वैसे गांव जिनमें शौचालय का प्रबंध अधिकांशत: नहीं है,वहां चलंत शौचालय की व्यवस्था की गई है। करीब18 गांवों को चलंत शौचालय सौंपे भी जा चुके हैं। इसकी आधिकारिक घोषणा अब तक जिला प्रशासन की ओर से नहीं की गई है, लेकिन प्रशासनिक महकमें में चर्चा है कि शीघ्र ही इसकी घोषणा की जाएगी। नमामि गंगे अभियान के तहत प्रशासन ने गंगा किनारे के ऐसे 25 गांवों को योजना में शामिल किया था,जहां शौचालय की व्यवस्था नहीं होने से गंगा के पवित्र जल पर उसका दुष्प्रभाव दिख रहा था। गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए नमामि गंगे अभियान चलाया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन को लेकर केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता जिला प्रशासन के इस पहल में स्पष्ट रूप से दिखने लगी है। स्वच्छ भारत मिशन और नमामि गंगे अभियान के संयुक्त तत्वावधान में चिह्नित 25 गांवों में से 18 गांवों के लिए चलंत शौचालय की व्यवस्था कर इस अभियान को सफल बनाने का जिला प्रशासन ने प्रयास किया है। जिला प्रशासन के इस प्रयास से गंगा को निर्मल व स्वच्छ रखने में काफी मदद मिलने की उम्मीद के साथ उक्त योजना की शुरुआत की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता संबंधी प्रयासों को भी उक्त योजना के सफल होने पर काफी बल मिलेगा।


10 - 16 जुलाई 2017

स्वच्छता केंद्र शासित प्रदेश

सभी केंद्र शासित प्रदेश मार्च तक ओडीएफ

देश के सातों केंद्र शासित क्षेत्र अगले मार्च तक ओडीएफ हो जाएंगे। दिल्ली तो इस लक्ष्य को इस साल के आखिर तक ही पूरा कर लेगा

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ष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इसी साल दिसंबर माह तक पूर्णत: खुले में शौच (ओडीएफ) मुक्त हो जाएगी। जबकि देश के सभी सातों केंद्र शासित क्षेत्र अगले मार्च तक ओडीएफ हो जाएंगे। केंद्र की ओर से आयोजित नए शहरी निशानों की प्रगति की समीक्षा के दौरान सभी केंद्र शासित राज्यों की ओर इस आशय की प्रतिबद्धता जाहिर की गई। इस मौके पर केंद्रीय शहरी विकास, आवास व शहरी गरीबी उपशमन मंत्री एम. वैंकेया नायडू ने दिल्ली के उप राज्यपाल अनिल बैजल की राज्य में स्वच्छता व विकास के कार्यो के लिए जमकर प्रशंसा करते हुए उनका आभार व्यक्त किया। उन्होंने बैजल की प्रशासनिक क्षमता और उनके विवेकपूर्ण

कार्यों की खुलकर प्रशंसा की। नायडू ने सातों संघ शासित प्रदेशों से स्वच्छता, जल आपूर्ति और सीवर तथा किफायती आवास से संबंधित बुनियादी ढांचे में सुधार लाने के लिए बनाए गए विभिन्न शहरी मिशनों के अमल में तेजी लाने को कहा। समीक्षा बैठक में अंडमान निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी, पुड्डुचेरी के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी, पुड्डुचेरी के शहरी विकास मंत्री एम. कृष्ण राव और दिल्ली के शहरी विकास मंत्री सत्येन्द्र जैन ने हिस्सा लिया। चंडीगढ़, दमन और दीव, दादरा नगर हवेली और लक्षद्वीप का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिकारियों ने किया। समीक्षा के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि कायाकल्प और शहरी रूपांतरण के लिए अटल मिशन (अमृत) के तहत दो सालों के भीतर 6.22 लाख घरों में नल से पीने की पानी की सप्लाई शुरू करा दी जाएगी। फिलहाल राजधानी दिल्ली में 23.78 लाख घरों में यानी कुल 58 फीसद घरों में पानी के कनेक्शन हैं। अमृत के सहयोग से इसे बढ़ाकर 73 फीसद तक पहुंचा दिया जाएगा। इसी मिशन के तहत सीवर कनेक्टीविटी को मौजूदा 57 फीसद से बढ़ाकर 65 फीसद किए जाने की योजना है। दक्षिणी और पूर्वी दिल्ली नगर निगम इस साल अक्टूबर तक, जबकि उत्तरी नगर निगम इस साल दिसंबर तक खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा। राज्य में 22891 में से 11138 सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों की आवश्यकता है। संघ शासित प्रदेशों

के 16 शहरी स्थानीय निकायों में से केवल तीन एनडीएमसी, चंडीगढ़ और पुड्डुचेरी को अब तक ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। समीक्षा के दौरान संबंधित सरकारों ने अगले साल मार्च तक 13 शहरी स्थानीय निकायों को ओडीएफ बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। नायडू ने डीडीए और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड को तेजी से और एक साथ काम करने तथा सभी प्रस्ताव जल्द से जल्द भेजने को कहा ताकि मकानों का निर्माण 2022 तक पूरा किया जा सके। नायडू ने अमृत के तहत सभी घरों में नल से जलापूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए चंडीगढ़ की सराहना की। चंडीगढ़ की स्मार्ट सिटी योजना को 6272 करोड़ रुपए की लागत से मंजूरी दी गई है, जो अब तक मंजूर 90 स्मार्ट सिटी योजनाओं में से सबसे अधिक है। नायडू ने संघ शासित प्रदेशों में अच्छी गुणवत्ता वाली शहरी बुनियादी सुविधाओं के महत्व पर बल दिया। रात के समय सफाई कराने से संबंधित सुझाव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दिल्ली के उपराच्यपाल अनिल बैजल ने शुरूआत में नगर निगमों से चिन्हित क्षेत्रों में रात के समय मशीनों से सफाई का काम करने को कहा। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इसी साल दिसंबर माह तक पूर्णत: खुले में शौच (ओडीएफ) मुक्त हो जाएगी। जबकि देश के सभी सातों केंद्र शासित क्षेत्र अगले मार्च तक ओडीएफ हो जाएंगे। केंद्र की ओर से आयोजित नए शहरी निशानों की प्रगति की समीक्षा के दौरान सभी केंद्र शासित राज्यों की ओर इस आशय की प्रतिबद्धता जाहिर की गई। केंद्रीय शहरी विकास, आवास व शहरी गरीबी उपशमन मंत्री एम. वैंकेया नायडू ने दिल्ली के उप राज्यपाल अनिल बैजल की राज्य में स्वच्छता व विकास के कार्यो के लिए जमकर प्रशंसा करते हुए उनका आभार व्यक्त किया। बैजल की प्रशासनिक क्षमता और उनके विवेकपूर्ण कार्यों की खुलकर प्रशंसा की। नायडू ने सातों संघ शासित प्रदेशों से स्वच्छता, जल आपूर्ति और सीवर तथा किफायती आवास से संबंधित बुनियादी ढांचे में सुधार लाने के लिए बनाए गए विभिन्न शहरी मिशनों के अमल में तेजी लाने को कहा।

स्वच्छता बिहार

स्वच्छता का आठवां फेरा बिहार के मधेपुरा जिले में होने वाली एक शादी में दूल्हा-दुल्हन ने अग्नि के सामने स्वच्छता के लिए आठवां फेरा लिया

के अनुसार शादी के दौरान हिंदूदूल्हा-रीति-रिवाज दुल्हन अग्नि को साक्षी मानकर सात

फेरे लेते हैं। इन फेरों के जरिए वे एक-दूसरे का जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाते हैं। लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले में होने वाली एक शादी में दूल्हा-दुल्हन ने अग्नि के आठवां फेरा लिया। यह आठवां फेरा स्वच्छता का फेरा था। दूल्हा-दुल्हन दोनों का कहना है कि उन्होंने अग्नि के समक्ष आठवां फेरा स्वच्छता का लिया, जिसमें दोनों ने खुले में शौच के खिलाफ साफ सफाई की कसमें खाई। बिहार के पूर्णिया जिले के बनवारी नगर इलाके के रहने वाले रविरंजन की शादी मधेपुरा जिले की गुड़िया से हुई है। शादी तय होने के बाद रवि रंजन में

लड़की वालों के सामने एक शर्त रखी जिसमें शादी के समय सात फेरे के बजाए आठ फेरा लिया जाएगा और यह आठवां फेरा स्वच्छता का होगा। यह बात सुनने के बाद लड़की और उसके परिवार वाले दोनों राजी हो गए। फिर धूमधाम से शादी की तैयारी की जाने लगी । दूल्हा रविरंजन दिल्ली के एक होटल में सीनियर मैनेजर है, तो दुल्हन गुड़िया गुड़गांव के एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। जब इस शादी के बारे में दूल्हा रवि रंजन से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हमेशा से ही यह सोच थी कि शादी में कुछ अलग हो इसीलिए हमने शादी में स्वच्छता को महत्वपूर्ण बनाया और शादी के निमंत्रण पत्र पर 'एक कदम स्वच्छता की

ओर' और 'शौचालय बिन दुल्हन का सिंगार अधूरा है' जैसे नारे भी लिखवाए। इस तरह के ख्याल मन में आने को लेकर जब रवि रंजन से पूछा तो उन्होंने बताया कि गुजरात में काम करने के दौरान उनके मन में यह प्रेरणा आई। गुजरात में उनके एक मित्र की शादी हो रही थी जहां शादी में स्वच्छता की शपथ ली गई तभी हम ने भी अपनी शादी में स्वच्छता स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान देने की कसम खाई थी। हमारे इस फैसले से हमारे परिवार वाले के साथ साथ लड़की के परिवार वाले भी काफी खुश हैं।

स्वच्छता

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स्वच्छता बिहार

स्वच्छता मुहिम में जुटीं महिलाएं

महिलाओं के समूह ने स्वच्छता की जो मुहिम छेड़ी है, उसका व्यापक असर दिखने लगा है

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हार के मधुबनी जिले में स्वच्छता की राह में अब कोई बाधा नहीं, क्योंकि महिलाएं इस बात का प्रण ले चुकी हैं ले चुकी हैं कि घरघर में शौचालय बनेगा। इसका असर यह हुआ कि 60 घरों में शौचालय का निर्माण हो गया। कुछ और घर इस राह पर हैं। जी हां, स्वच्छ भारत के सपने को साकार कर स्वस्थ समाज के निर्माण में में जुटीं हैं भारत माता स्वयं सहायता समूह की महिलाएं। खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में रहिका प्रखंड के भौआड़ा व राजनगर के मंगरौनी सहित आसपास के गांवों में समूह की महिलाओं के प्रयास का व्यापक असर दिख रहा है। तेरह महिलाओं वाले इस समूह की सहेली रेणुका देवी के नेतृत्व में चलाए जा रहे जागरुकता अभियान से प्रेरित करीब 60 लोगों ने अपने घरों में शौचालय का निर्माण कराकर एक मिसाल कायम की है। समूह की महिलाएं स्वावलंबन के क्षेत्र में भी महिलाओं को नई राह दिखा रहीं हैं। सिलाई-कढ़ाई सहित स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी ये महिलाएं अपनी अलग पहचान कायम कर रही हैं। राजनगर व रहिका प्रखंडस्तरीय जीविका समूह से जुड़ी कुल 13 महिलाएं पवित्री देवी, उषा देवी, विमला देवी, लीला देवी, नीलम देवी, सीता देवी, अठूला देवी, लीला देवी, किरण देवी, विमला देवी वर्ष 2016 से प्रतिदिन करीब दो घंटे रांटी, भौआड़ा पंचायत के गांवों में घूम-घूमकर महिलाओं को शौचालय की अहमियत बताते हुए खुले में शौच से परहेज करने की सलाह दे रही हैं। समूह की महिलाओं से प्रेरित रांटी व भौआड़ा पंचायत के गांवों में शौचालय का निर्माण कराने वाले लोगों का कहना है कि समूह की महिलाओं की प्रेरणा से शौचालय निर्माण के बाद खुले में शौच से मुक्ति मिल गई है।


22 स्टेट न्यूज

10 - 16 जुलाई 2017

उत्तर प्रदेश पर्यावरण

उत्तर प्रदेश महिला सुरक्षा

लगेंगे 51 हजार पौधे

बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए गाजियाबाद प्रशासन ने पूरे शहर में पेड़ लगाने का फैसला किया

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जियाबाद विकास प्राधिकरण शहर में 51 हजार पेड़ लगाएगा। इसकी तैयारी प्राधिकरण ने लगभग पूरी कर ली है। इस अभियान में प्राधिकरण ने एनजीओ, ग्रुप हाउसिंग, आरडब्ल्यूए, स्कूल और कॉलेजों को भी शामिल किया है। साथ ही प्राधिकरण ने अपने सभी आठ जोन में उद्यान विभाग से प्रभारी नियुक्त कर पौधे लगाने की पूरी जिम्मेदारी सौंपी है। एनजीटी ने भी गाजियाबाद में बढ़ते प्रदूषण को लेकर कई बार पर्यावरण संरक्षण पर जोर देने के निर्देश दिए हैं। इसी को देखते हुए जीडीए लगातार पर्यावरण संरक्षण को लेकर योजनाएं बना रहा है। साथ ही शहर के सौंदर्यीकरण पर भी ध्यान दे रहा है। इसी कड़ी के अंतर्गत जीडीए ने पेड़ लगाने का फैसला किया है। पेड़ पूरे शहर में निशुल्क

लगाए जाएंगे। जीडीए के उद्यान प्रभारी एसपी सिसोदिया ने बताया कि पौधे मुख्य रूप से सड़क के दोनों किनारे हरी पट्टी, पार्क, घरों के सामने, ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, स्कूल व कॉलेज आदि स्थानों पर लगाए जाएंगे। उद्यान प्रभारी ने बताया कि ये पेड़ ऐसे स्थानों पर लगाए जाएंगे जहां स्थानीय लोग इन पौधों की देखभाल कर सकें। हालांकि जीडीए का उद्यान विभाग भी इन पौधों की देखभाल करेगा। जीडीए शहर के एनजीओए आरडब्ल्यूएए ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, स्कूल, कॉलेजों आदि को इस अभियान से जोड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जीडीए उपाध्यक्ष कंचन वर्मा ने निर्देश दिया है कि इस अभियान में ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल किया जाए। (भाषा)

महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर गौतमबुद्धनगर जिले में हेल्पलाइन नंबर-181 शुरू हो गया है

त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गौतमबुद्धनगर जिले में महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर और रेस्क्यू वैन तैनात करने की आदेश दिया। इसके तहत जिलाधिकारी बीएम सिंह ने कलेक्ट्रेट पर रेस्कयू वैन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया है। जिलाधिकारी बीएन सिंह ने बताया कि प्रदेश सरकार ने नारी की सुरक्षा और सम्मान के उद्देश्य से हेल्पलाइन नंबर 181 शुरू किया है। महिलाओं को विधिक सहायता, परामर्श, चिकित्सा, पुलिस सहायता आदि की सुविधा मिलेगी। उन्होंने बताया कि अगर किसी महिला या लड़की के साथ

हरियाणा स्वास्थ्य

गुरुग्राम जिला अस्पताल को एनक्यूएसी प्रमाणपत्र

दिल्ली से सटे गुरुग्राम का जिला नागरिक अस्पताल नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाला दूसरा अस्पताल बन गया है

गु

रुग्राम के जिला अस्पताल को मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने के लिए यह प्रमाण पत्र दिया गया। इसके तहत अस्पताल को प्रत्येक वर्ष 10 लाख रुपए दिए जाएंगे। मालूम हो कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से अस्पतालों को एनक्यूएसी दिया जाता है। सीएमओ डॉ. बीके राजौरा ने बताया कि अस्पताल प्रबंधन पिछले एक साल से इसके लिए प्रयास कर रहा था।

मरीजों को दिए जा रहे उत्तम इलाज की बदौलत आखिरकार प्रमाण पत्र मिल गया। स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम के साथ तीनों दिन डॉ. मनीष राठी रहे। पंचकुला जिला अस्पताल के बाद गुरुग्राम के अस्पताल को प्रदेश में यह सर्टिफिकेट दिया गया है। इसके लिए मंत्रालय की टीम की तरफ से 28 से 30 जून 2016 के बीच तीन सदस्यीय टीम ने अस्पताल का निरीक्षण किया। इसमें अस्पताल में मरीजों को

उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं के कुल 85 फीसदी अंक दिए गए हैं। टीम की ओर से 9 फीसदी अंक कमजोर इमारत के काटे गए। इसके अलावा डॉक्टरों की कमी को लेकर 3 फीसदी अंक कम किए गए। इसके बावजूद अस्पताल ने अन्य मानकों पर अच्छा प्रदर्शन करते हुए प्रमाण पत्र के लिए निर्धारित 80 फीसदी से अधिक अंक हासिल कर

मारपीट, घरेलू हिंसा, ऐसिड अटैक, लड़कियों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज उत्पीड़न, आवास, चिकित्सा सुविधाएं, तत्काल पुलिस सहायता, विशेष सहायता, पुलिस चौकी आदि की समस्या है, तो इस नंबर पर फोन कर सूचना देनी होगी। रेस्कयू वैन तत्काल मौके पर पहुंचकर सहायता करेगी। जिलाधिकारी ने बताया कि हेल्पलाइन नंबर का कमांड सेंटर फेज-2 में जिला प्रोबेशन अधिकारी के कार्यालय में बनाया गया है। इतना ही नहीं महिला या लड़कियां हेल्पलाइन नंबर पर परामर्श भी ले सकती है। (भाषा)

लिए। जानकारी के मुताबिक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से हर वर्ष अस्पताल को 10 लाख रुपए दिए जाएंगे। अस्पताल को सर्टिफिकेट मिलने के बाद तीन साल तक मंत्रालय प्रति वर्ष 5000 रुपए प्रति बेड देता है। ऐसे में जिले के 200 बेड के अस्पताल को 10 लाख रुपए प्रति वर्ष दिए जाएंगे। इनका इस्तेमाल मरीजों के वेलफेयर में किया जाएगा। जिला नागरिक अस्पताल को एनक्यूएसी मिलने के बाद स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने बिस्तरों की संख्या बढ़ाने के निर्देश दे दिए हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज की तरफ से हरी झंडी मिल गई है। मंत्री ने बिस्तरों की संख्या में बढ़ोतरी के लिए टीम का गठन कर दिया है। टीम के सदस्य आगामी कुछ दिनों में अस्पताल का सर्वे करेंगे। अस्पताल में मरीजों की संख्या के मुताबिक बेड की संख्या में इजाफा किया जाएगा। (भाषा)


10 - 16 जुलाई 2017

स्मार्ट स्कूल

विवाहित छात्राओं को मिलेगी मैटरनिटी लीव

प्राइवेट स्कूलों से टक्कर लेने के लिए गाजियाबाद प्रशासन ने सौ स्कूलों को स्मार्ट बनाने की योजना तैयार की है

एरिया के 100 सरकारी स्कूलों की सूरत बदलने का फैसला किया है। पहले चरण में लोनी ब्लॉक के 27, रजापुर ब्लॉक के 35 और बाकी डासना देहात के गांवों के सरकारी स्कूल शामिल किए गए हैं। इनमें 90 प्रतिशत स्कूल प्राइमरी स्कूल हैं, बाकी हाईस्कूल हैं। एडीएम प्रशासन सिंह ने बताया कि अगले 6 से 8 महीनों के अंदर इन सभी स्कूलों में इंग्लिश टॉयलेट, फर्नीचर, लाइटिंग, कलरफुल बिल्डिंग, नए वॉल बोर्ड, प्ले ग्राउंड, ई-लाइब्रेरी, पंखे और लाइटिंग सिस्टम विकसित किए जाएंगे। सरकारी स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण बच्चों को काफी समस्याओं का सामना करना परता है। यही कारण है कि पहले प्रशासन स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक करेगा, इसके बाद एजुकेशन सिस्टम को ठीक किया जाएगा। प्लान है कि स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए प्रशासनिक अफसरों के साथ प्राइवेट लोगों की एक मॉनीटरिंग कमिटी बनाई जाएगी। यह कमिटी प्रत्येक स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए कार्य करेगी। (भाषा)

विवाहित छात्राओं को मातृत्व अवकाश देने का हरियाणा सरकार का फैसला अनुकरणीय है

रियाणा सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश की यूनिवर्सिटियों में पढ़ रहीं विवाहित छात्राओं को मैटरनिटी लीव देने का फैसला लिया है। मैटरनिटी लीव 45 दिन की होगी। सरकार ने यह कदम इस लिए उठाया है ताकि विवाहित छात्राओं की पढ़ाई को नुकसान न हो। छात्राओं को इसी शर्त पर मैटरनिटी लीव मिलेगी कि यदि वह सरकारी अस्पताल के अधिकारियों की सिफारिश पर सरकारी महिला कर्मचारियों के मामले में बनाए गए नियमों के

स्वास्थ्य शोध

जी

हां, चॉकलेट सिर्फ बच्चों के पसंद की चीज अब नहीं रही। यह बुजुर्गों के लिए ज्यादा लाभदायक है। खासतौर से उन बुजुर्गों के लिए जिनकी याददाश्त लगातार कजोर हो रही हो। एक शोध में कहा गया है कि चॉकलेट के फायदे का कारण इसमें मौजूद कोकोवा बीन है, जो इसका मुख्य घटक है और फ्लावनोल्स का एक अच्छा स्रोत है। फ्लावनोल्स एक तरह का प्राकृतिक तत्व है, जो तंत्रिकाओं की सुरक्षा करता है। शोध में पता चला है कि बुजुर्गों में जो रोजाना कोकाेवा फ्लावोनोल्स लेते हैं, उनके सामान्य संज्ञान, ध्यान व याददाश्त वाले कार्यों में सुधार देखा गया। इटली के एलक्यूविला विश्वविद्यालय

की वेलिंटिना सोकी ने कहा, ‘यह शोध कोकोवा फ्लावोनोल्स का समय के साथ कमजोर होती बुजुर्गो की संज्ञानात्मक क्षमता में सुधार के लिए इस्तेमाल का सुझाव देता है।’ (एजेंसी)

अनुसार लागू 45 दिनों तक मैटरनिटी लीव लेती हैं तो उन्हें अपने कोर्स या रिसर्च को पूरा करने के लिए अतिरिक्त क्लास करनी होगी। यह लीव पीरियड, सेमेस्टर के दौरान दिए गए कुल लेक्चरों में से निकाल दी जाएगी। छात्रा को यूनिवर्सिटी की तरफ से बनाए गए शिड्यूल में हर छोटी-बड़ी परीक्षा में भी हिस्सा लेना होगा। जरूरत हो तो छात्रा एक पूरा सेमेस्टर छोड़ सकती है, लेकिन फाइनल सेमेस्टर परीक्षा में भाग लेने के बाद उसे छोड़े गए उस सेमेस्टर की उपस्थिति पूरी करने होगी। (भाषा)

स्वास्थ्य शोध

चॉकलेट से दुरुस्त होगी बुजुर्गों की याददाश्त स्मरण शक्ति और दूसरी मानसिक बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों के लिए चॉकलेट फायदेमंद है

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महिला शिक्षा

100 सरकारी स्कूल बनेंगे स्मार्ट त्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के 100 प्राइमरी और हाईस्कूल जल्द ही स्मार्ट नजर आएंगे। इन सरकारी स्कूलों को स्मार्ट बनाने के लिए पीपी मॉडल पर एनजीओ, बिल्डर्स, पब्लिक स्कूल संचालकों और उद्योगपतियों की मदद ली जाएगी। इस योजना के तहत सबसे पहले लोनी, रजापुर और डासना देहात के 100 सरकारी स्कूलों की सूरत बदली जाएगी। डीएम मिनिस्ती एस. के आदेश पर प्रशासन ने इस ड्रीम प्रोजेक्ट का रोड मैप तैयार कर लिया है। गाजियाबाद में पब्लिक स्कूलों का जलवा है। पढ़ाई के लिए माहौल बनाने और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में प्राइवेट सेक्टर के स्कूलों ने सरकारी स्कूलों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। यही कारण कि देहात में भी ऐसे लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा होता जा रहा है, जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। कई सरकारी स्कूल ऐसे भी हैं, जहां न बाउंड्री है, रूम जर्जर अवस्था में हैं । इसके चलते जिला प्रशासन ने पहले चरण में लोनी, रजापुर और डासना देहात

गुड न्यूज

मक्खन जैसा ही नुकसान पहुंचाता है नारियल तेल वि

विशेषज्ञों का मानना है कि नारियल तेल भी मक्खन और पशु वसा जितना ही हानिकारक है

शेषज्ञों ने कहा है कि आम तौर पर स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाने वाला नारियल तेल उतना ही अस्वास्थ्यकर है जितना कि मक्खन और पशु वसा। पशु वसा को आम तौर पर स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता, जबकि जैतून और सूरजमुखी जैसे वनस्पति तेल स्वास्थ्य के लिए अच्छे विकल्प माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि नारियल तेल अन्य संतृप्त वसा से बेहतर हो सकता है। हालांकि, अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई विश्वसनीय अध्ययन नहीं है। संतृप्त वसा की अधिकता वाला आहार खाने से

रक्त में लो डेंसिटी लाइपोप्रोटीन (एलडीएल) या बुरे कॉलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। इससे धमनियां अवरद्ध हो सकती हैं या हृदय संबंधी रोगों और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। एएचए के अनुसार नारियल तेल में वसा का 82 प्रतिशत हिस्सा संतृप्त होता है। यह मात्रा मक्खन (63 प्रतिशत), बीफ (50 प्रतिशत) और सूअर वसा (39 प्रतिशत) से अधिक है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने एक परामर्श में कहा है कि लोगों को संतृप्त वसा के सेवन की मात्रा सीमित करनी चाहिए और इसकी जगह जैतून तथा सूरजमुखी जैसे गैर संतृप्त तेल का सेवन करना चाहिए। (एजेंसी)


24 गुड न्यूज

10 - 16 जुलाई 2017

राजस्थान

रेल आरक्षण

रेल टिकट बुकिंग पर सितंबर तक सर्विस चार्ज नहीं रेलवे ने ऑनलाइन रेलवे रिजर्वेशन टिकट बुक करने पर मिल रही सर्विस चार्ज की छूट को और आगे बढ़ा दिया है

ईआरसीटीसी ने एक बार फिर लोगोंं की सुविधाओंं का ख्याल रखा हैै। ऑनलाइन रेल टिकट बुक कराने वालों से सितंबर तक सर्विस चार्ज वसूल नहीं किया जाएगा। रेलवे ने ऑनलाइन रेलवे रिजर्वेशन टिकट बुक करने पर मिल रही सर्विस चार्ज की छूट और आगे बढ़ा दी है। इससे अगले तीन महीने और आपको ई-टिकट बुक कराने पर 40 रुपए तक का फायदा

मिलता रहेगा। गौरतलब है कि सरकार ने नोटबंदी के बाद नवंबर से ऑनलाइन बुकिंग को बढ़ावा देने के लिए सर्विस चार्ज लेना बंद कर दिया था। नवंबर से पहले आईआरसीटीसी के जरिए रेल टिकट बुक कराने पर 20 से 40 रुपए प्रति टिकट सर्विस चार्ज देना पड़ता था। लेकिन नोटबंदी के दौरान रेलवे ने 23 नवंबर, 2016 से 31 मार्च, 2017 के बीच टिकट बुक कराने पर सेवा शुल्क से छूट दी थी। मार्च में इस अवधि को बढ़ाकर 30 जून, 2017 कर दिया गया था। आईआरसीटीसी को सर्विस चार्ज नहीं लेने के कारण एक साल में 500 करोड़ का नुकसान हो सकता है। इसे देखते हुए रेलवे ने वित्‍त मंत्रालय को नुकसान की भरपाई के लिए चिट्ठी भी लिखी है। आईआरसीटीसी चाहती है कि सर्विस चार्ज माफी से होने वाले घाटे की आधी राशि की भरपाई रेलवे करे।

हवाई सेवा

बीकानेर से दिल्ली के बीच हवाई सेवा 17 जुलाई से बी

एयर इंडिया की सहयोगी कंपनी एलायंस एयर ने नए रूट को अंतिम रूप दे दिया है

कानेर से नई दिल्ली के बीच सीधी हवाई सेवा 17 जुलाई से शुरू होगी। एयर इंडिया की सहयोगी कंपनी एलायंस एयर ने तैयारियों को अंतिम रुप दे दिया है। एयर पोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया बीकानेर (नाल) के इंचार्ज राधेश्याम मीना ने बताया कि बीकानेर-नई दिल्ली के बीच सीधी उड़ान के निर्देश आ गए है। इसके तहत 17 जुलाई को पहली उड़ान शुरू होगी। एयरलाइंस कंपनी के अधिकारियों ने इस संबंध में तैयारियों का जायजा लिया। एयर टर्मिनल इंचार्ज संजय वर्मा ने बताया कि सोमवार को एयर इंडिया अधिकारी बीकानेर के नाल एयरपोर्ट का दौरा करेंगे। गौरतलब है कि क्षेत्रीय सांसद व केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल इसके लिए लंबे समय से प्रयासरत थे। स्थानीय व्यापारी व पर्यटन ऑपरेटर भी लगातार केंद्रीय वित्त

राज्यमंत्री से बीकानेर-नई दिल्ली के लिए सीधी विमान सेवा की मांग कर रहे थे। पर्यटन व्यवसायी व फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े विनोद भोजक बताते हैं कि बीकानेर-नई दिल्ली के बीच सीधी विमान सेवा से यहां पर्यटन के साथ-साथ फिल्म शूटिंग का व्यवसाय भी बढ़ेगा। सीधी विमान सेवा से फिल्म कलाकारों को यहां आना आसान रहेगा। यहां होने वाले अंतरराष्ट्रीय ऊंट मेले में आने वाले देशी व विदेशी सैलानियों को भी आसानी होगी। (भाषा)

चेन्नै पहल

मारीमुत्थु सर की क्लास

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सरकारी नौकरी पाने का सपना देखने वालों को मुफ्त में पढ़ाते हैं चेन्नै निवासी के. मारीमुत्थु

रीमुत्थु सर को चेन्नै में हर कोई जानता है। वजह यह है कि मारीमुत्थु सर के सैकड़ों छात्र आज सरकारी नौकरी कर रहे हैं। जब हर सप्ताह उनकी कक्षा लगती है तो सरकारी नौकरी पाने के सपने पाले हजारों छात्र उसमें शामिल होते हैं। मारीमुत्थु सर की कक्षा में हर किसी का स्वागत है क्योंकि वे किसी छात्र से कोई शुल्क नहीं लेते। पेशे से तहसीलदार के. मारीमुत्थु पटाखे के कारखाने और मिलों में काम करने वाले 100 से ज्यादा लोगों को मुफ्त में कोचिंग देकर सरकारी नौकरी पाने में मदद की है। उनके इस प्रयास ने बहुत लोगों का जीवन बदल दिया है। वह हर सप्ताह बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को कोचिंग देते हैं जो सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे होते हैं। उनकी कोचिंग कक्षा में आने चेन्नै से भी लोग आते हैं। मारीमुत्थु के छात्र सी. राममूर्ति एक ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी बन चुके हैं। वे बताते हैं कि

वह मारीमुत्थु की पहली कक्षा में जाने के बाद ही बहुत प्रेरित हुए थे। उसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू कर दी और कुछ महीनों के अंदर ही उन्हें नौकरी के कई प्रस्ताव मिले। समाज में एक बदलाव लाने की उम्मीद के साथ मारीमुत्थु ने अपने कोचिंग की शुरुआत 10 साल पहले की थी। मारीमुत्थु ने बताया कि उन्होंने लगभग 3,000 लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने में सहायता की है जिसमें से 300 लोग तमिलनाडु के विरूधुनगर जिलाधिकारी कार्यालय में ही काम करते हैं। उनका कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में विज्ञान, गणित, इतिहास, तमिल, अंग्रेजी व्याकरण और तर्क शक्ति से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। मारीमुत्थु ने बताया, 'अपनी दृढ़ स्मरण शक्ति की सहायता से मैं ऐसा शिक्षक बन पाया। एक शिक्षक के तौर पर आपको भी हर समय खुद को बेहतरीन रखना पड़ता है। मैं

प्रतिदिन सुबह-शाम कक्षा की तैयारी करने में बिताता हूं।' मारीमुत्थु अपने छात्रों को प्रेरित करने के लिए सरकारी अधिकारियों के अधिकारों की बात करते हैं। वह उन्हें बताते हैं कि एक अधिकारी बनना गर्व की बात है। उनकी छात्रा शिवकाशी की शंकरा लक्ष्मी बताती हैं कि वह हमेशा महत्वपूर्ण बिंदुओं को लिखने को कहते हैं जिससे वह हमें याद हो सके। उनकी कक्षा के शुरुआत के कुछ मिनट प्रेरित करने के लिए होते हैं, ताकि हम पूरे सप्ताह अपनी तैयारी पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

हर सप्ताह शनिवार और रविवार को करीब 2 हजार लोग मारीमुत्थु की कक्षा में पढ़ने आते हैं। इनकी कक्षा में दसवीं से लेकर पीएचडी तक के छात्र एक साथ बैठते हैं। मारीमुत्थु खुद एक निर्धन परिवार से आते हैं और पिता की बीमारी के बाद वह अपने परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य हैं। (भाषा)


10 - 16 जुलाई 2017

म​हाराष्ट्र पर्यावरण

दिल्ली पहल

प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारखानों को किया जाएगा बंद

एसडीएमसी ने अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पेट्रोल पंप मालिकों को शौचालय उपलब्ध कराने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है

पा

के बाद लोग इसकी सुविधा उठा सकें। एसडीएमसी की महापौर कमलजीत सहरावत ने बताया कि शौचालयों का प्रयोग केवल पेट्रोल पंपों के खुले रहने के समय तक ही किया जा सकेगा। पेट्रोल पंप मालिकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे एक बड़ा बोर्ड लगाएं, ताकि शौचालय होने की जानकारी लोगों को दूर से ही मिल सके। शौचालय साफ-सुथरे होने चाहिए और उनमें पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसा नहीं करने वाले पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में पेट्रोल पंपों के परिचालन के लिए लाइसेंस जारी करते वक्त निगम शौचालय की सुविधा भी अनिवार्य बनाएगा। (भाषा)

आनंद भारती

लघर जिला प्रशासन ने प्रदूषणकारी कारखानों पर लगाम लगानी शुरू कर दी है। यह जिला नया है जो थाणे से काटकर बनाया गया है। इसमें मुंबई के पड़ोसी उपनगर वसई, विरार, नालासोपारा को भी शामिल किया गया है। पालघर आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां सुविधाओं का अभी भी अकाल है। लेकिन जिला बनने के बाद विकास के काम में गति आई है। यहां बड़ी संख्या में कारखाने लगे हुए हैं। उद्योग के मामले में यह सबसे विकासशील जिला बन गया है। इससे सटा हुआ है गुजरात और दमन। लेकिन कारखानों के कारण जिस तरह पर्यावरण पर संकट आया हुआ है, उसने आम जनों को भी समस्याग्रस्त कर दिया है। इसकी सुधि लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने जिला प्रशासन को रासायनिक तथा प्रदूषणकारी कारखानों पर कार्रवाई का सुझाव दिया है। जिला अधिकारी प्रशांत नारनवरे ने तुरंत एक समिति का गठन कर जांच कराने उसे सही स्थिति का आकलन करने और कारखानेदारों से बातचीत के लिए कहा है। इस समिति में वसई औद्योगिक सुरक्षा व आरोग्य संचालक, श्रम उपायुक्त, प्रदूषण नियंत्रण मंडल तथा दो कॉलेजों के प्रिंसिपल को शामिल किया गया है। समिति बोईसर एमआईडीसी, वाडा इंडस्ट्रियल, पालघर पिड्को, तलासरी औद्योगिक क्षेत्र, वसई औद्योगिक क्षेत्र

स्वास्थ्य शाेध

वेस्टर्न फूड से अल्जाइमर का खतरा शोध के अनुसार पश्चिमी भोजन करने से अल्जाइमर होने का खतरा हो सकता है

श्चिमी भोजन के शौकीनों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। क्योंकि कोलेस्ट्रोल, वसा और शर्करा की उच्च मात्रा वाला पाश्चात्य आहार न्यूडीजनरेटिव रोग से जुड़े एपोई4 जीन वाले लोगों में अल्जाइमर के विकास पर असर डाल सकता है। एपोई4 और एपोई3 जीन के दो प्रकार प्रोटीन और एपोलिपोप्रोटीन के कोड हैं, जो वसा और कोलेस्ट्रॉल को बांधते हैं। एपोई4 सूजन, अल्जाइमर और कार्डियोवैस्कुलर रोग की वृद्धि से जुड़ा हुआ है, जबकि एपोई3 रोग के जोखिम में वृद्धि नहीं करता है, और यह बहुत अधिक सामान्य प्रकार है।

शोध के निष्कर्षों से पता चलता है कि जब एपोई4 जीन वाले चूहों को पश्चिमी आहार से प्रेरित भोजन दिया गया तो इनमें बीटा एम्लॉइड प्रोटीन प्लेक की वृद्धि देखी गई, जो उनके

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प्रदूषणकारी कारखानों पर लगाम

पेट्रोल पंप भी देंगे शौचालय की सुविधा

क्षिण दिल्ली नगर निगम ने होटलों और रेस्टोरेंटो के बाद अब पेट्रोल पंप मालिकों को भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने को कहा है। इसके लिए एसडीएमसी ने अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पेट्रोल पंप मालिकों को दो हफ्ते का समय दिया है। खासतौर पर जिन पेट्रोल पंपों पर शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन्हें इस अवधि के भीतर शौचालय बनवाने होंगे। लोग इसका इस्तेमाल 15 जुलाई से कर सकेंगे। शौचालयों के बनने से स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंकिंग में भी सुधार होगा। एसडीएमसी आयुक्त डॉ. पुनीत कुमार गोयल ने बताया कि वर्तमान में लोगों के लिए 904 शौचालय बने हुए हैं, जिनमें से 551 सार्वजनिक और 353 सामुदायिक शौचालय हैं। अब पेट्रोल पंपों पर भी 150 शौचालयों के बन जाने से इनकी संख्या 1054 हो जाएगी। निधरंरित समय में शौचालयों का निर्माण हो, इसके लिए नोडल अधिकारी तैनात किए गए हैं। साथ ही कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि निर्धारित समय

गुड न्यूज

दिमाग में सूजन का संकेत देती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर व इस अध्ययन के मुख्य लेखक क्रिश्चियन पाइक ने कहा कि इस शोध से प्राप्त निष्कर्ष बताते हैं कि यह जोखिम हर किसी को समान रूप से प्रभावित नहीं करता है, लेकिन अधिक जोखिम कारकों में यह अपना प्रभाव डाल सकता है। पाइक का कहना है कि आपके साथ क्या होता है, इसमें आपके जींस की बहुत बड़ी भूमिका होती है, लेकिन इसमें आपके वातावरण और परिवर्तनीय जीवनशैली की भी भूमिका होती है। आप कितना व्यायाम करते हैं और क्या खाते हैं, यह सब भी महत्वपूर्ण है। (एजेंसी)

समेत बाकी कारखानेदारों, इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों से बातचीत कर रही है। यह तय किया जा रहा है कि जिन कारखानों ने पूर्व के आदेशों को पालन करने में कोताही की है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस बीच पालघर के दो कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सख्त संकेत दे भी दिया है। कुछ दिनों पूर्व प्रदूषण नियामक मंडल ने बोईसर एमआईडीसी परिसर में मौजूद कुछ कारखानों को प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए बंद करने का आदेश दिया था। उम्मीद की जा रही है कि कारखानों के मालिक प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र तुरंत लगाने के लिए बाध्य होंगे। इससे प्रदूषण से होने वाली बीमारियों पर अंकुश लगेगा।

गर्भवती महिलाओं का मददगार

कांयंबटूर का ऑटोचालक गर्भवती स्त्रियों और स्कूली बच्चों से किराया नहीं लेता

मिलनाडु का एक ऑटो ड्राइवर गर्भवती महिलाओं की अलग तरह से मदद कर रहा है। कांयंबटूर के 25 साल के करुप्पास्वामी स्थानीय लोगों के बीच किसी हीरो से कम नहीं है। वह स्कूली बच्चों और गर्भवती महिलाओं से ऑटो में चढ़ने के लिए पैसे नहीं लेते हैं। इतना ही नहीं जरूरतमंद की मदद के साथ वह अपनी पढ़ाई भी कर रहे हैं। करुप्पास्वामी ने अपनी गरीबी से लड़ते हुए भी रोजगार के साथ पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने तमिल साहित्य से पीजी की अपनी पढ़ाई भी सरकारी छात्रवृत्ति की सहायता से पूरी कर ली है। करुप्पास्वामी ने बताया कि दोस्तों की सहायता से उन्होंने एक सेकेंड हैंड ऑटो खरीदा। ऑटो चलाकर वह अपनी आर्थिक जरूरतों के साथ पढ़ाई का सपना भी पूरा कर पा रहे हैं। करुप्पा आगे तमिल साहित्य से ही एमफिल की डिग्री भी लेना चाहते हैं। गरीबी और जीवन की मुश्किलों के बाद भी करुप्पा हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। (भाषा)


26 गुड न्यूज

10 - 16 जुलाई 2017

उपयोगी खोज

हरित परिवहन

पोलैंड की तर्ज पर गुरुग्राम की परिवहन व्यवस्था

बच्चे की कटोरी से नहीं गिरेगा खाना

बच्चों को खाना खिलाने की मुश्किल अब कम होगी क्योंकि बाजार में ऐसी कटोरी आ गई है, जिससे खाना गिरता नहीं

च्चों को खाना खिलाने में मां को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इसके लिए उसके आगे-पीछे लगातार भागते रहना पड़ता है, तब जाकर कहीं बच्चे की कटोरी खाली होती है। आमतौर पर यह देखा गया है कि बच्चों को अगर खुद से खाने के लिए दे दिया जाए, तो वे सहजता से खाते हैं और कटोरी खाली भी कर देते हैं, लेकिन इसमें दिक्कत यह होती है कि बच्चे एक जगह बैठकर तो खाते नहीं और जब वे खुद खाते हैं तो इधर-उधर भागने में कभी कटोरी से खाना गिरता है, तो कभी

कटोरी। ऐसे में बच्चा खाता कम है, गिराता ज्यादा है। अब आप इस मुश्किल से निजात पा सकते हैं, क्योंकि बाजार में एक ऐसी खिलौनानुमा कटोरी लांच हुई है, जिसके जरिए बच्चा खाना तो खा ही लेगा, साथ ही वह उससे खेल भी सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर यह कटोरी बच्चे के हाथ से गिर भी जाती है तो खाना गिरेगा नहीं। दरअसल इस कटोरी का डिजाइन ऐसा है कि जैसे ही यह गिरती है सामने एक ढक्कन आ जाता है, जो खाने को गिरने से बचा लेता है। (भाषा)

साइबर सुरक्षा

गूगल ने 13 साल बाद बदली पॉलिसी

अब आपके जीमेल अकाउंट की जासूसी हो जाएगी मुश्किल

गर आप गूगल की ई-मेल सर्विस जीमेल का इस्तेमाल करते हैं, तो आपके लिए एक राहत की खबर है। दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल ने आधिकारिक तौर पर घोषित किया है कि अब वह विज्ञापन देने के लिए उपभोक्ताओं के जीमेल नहीं पढ़ेगा। गौरतलब है कि गूगल द्वारा उपभोक्ताओं को विज्ञापन दिखाने के लिए उनके जीमेल पढ़े जाने को लेकर प्राइवेसी एक्टिविस्ट लंबे समय से गूगल द्वारा कंटेंट स्कैनिंग का विरोध कर रहे थे। यह फैसला गूगल की विज्ञापन टीम के बजाय उसके क्लाउड टीम की तरफ से आया है। दरअसल, गूगल क्लाउड टीम अपने कॉरपोरेट ग्राहकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह फैसला इसी इरादे को पूरा करने के लिए लिया गया है। गूगल की मदर कंपनी अल्फाबेट इंक का गूगल क्लाउड ऑफिस सॉफ्टेवयर (जी सूट) बेचता है। गूगल क्लाउड ने अपने प्रोडक्ट को बाजार के दूसरे प्रोडक्ट के मुकाबले में लाने के लिए यह फैसला लिया है। ऑफिस सॉफ्टवेयर के मामले में गूगल का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माइक्रोसॉफ्ट है। एड

गु

गुरुग्राम साइबर सिटी की परिवहन व्यवस्था को पोलैंड की तर्ज पर विकसित किया जाएगा

रुग्राम की वैश्विक मंच पर एक अलग पहचान है, इसीलिए शहर में सरकार पर्यावरण अनुकूल परिवहन व्यवस्था स्थापित करेगी। पहले चरण में 100 बसें साइबर सिटी में पहले चरण में 75 से 100 बिजली चालित बसों का संचालन किया जाएगा। दस साल के संचालन में प्रत्येक बस सवा चार लाख लीटर डीजल बचाते हुए 1150 टन कार्बन उत्जर्सन रोकेगी। ये बसें पर्यावरण को बेहतर बनाने में मददगार होने के साथ नागरिकों के लिए भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन सेवा की मिसाल बनेंगी। जीबीएम ने गुरुग्राम में इसकी जानकारी दी है। दरअसल पोलैंड के शहर पोजनान में कविता जैन की अगुवाई में हरियाणा के प्रतिनिधिमंडल ने यूरोप की सबसे बड़ी बिजली बस निर्माता कंपनी और जेबीएम ग्रुप के संयुक्त उद्यम जेबीएम सोलारिस इलेक्ट्रिक व्हीकल्स लिमिटेड के संयंत्र का दौरा कर इसकी घोषणा की हैं। उन्होंने बिजली चालित बसों को देखा और उसकी जानकारी ली। जेबीएम के

पदाधिकारियों ने बताया कि बिजली चालित बस आवाज और प्रदूषण मुक्त है। इसके संचालन में गैस अथवा तेल की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे हरित परिवहन को बढ़ावा दिया जाएगा। यह बसें सड़क पर वाहनों के दबाव को कम करेंगी। सामान्य बस के मुकाबले एक बिजली चालित बस अपने संचालन के 10 साल की अवधि में 4 लाख 20 हजार लीटर डीजल की खपत में कटौती करेगी। इन बसों के संचालन से गुरुग्राम में औसतन 50 हजार नागरिकों को दैनिक आधार पर बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मिलेगी। (भाषा)

दिल्ली स्वास्थ्य

कैंसर मरीजों को मिलेगी राहत दिखाने के लिए गूगल यूजर्स के जीमेल अकाउंट स्कैन करता था, क्योंकि मेल या चैट में इस्तेमाल की-वर्ड्स के आधार पर गूगल यूजर्स को पर्सनलाइज्ड ऐड दिखाता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि गूगल कैसे ऐड कस्टमाइज करता है, तो आप गूगल अकाउंट सेटिंग्स में जाएं और ऐड सेक्शन सेलेक्ट करें, आपके सामने उन सभी टॉपिक्स की लिस्ट आ जाएगी, जो सर्च हैबिट और ब्राउजिंग के आधार पर गूगल ने चुने हैं। पर अभ गूगल के नए फैसले के बाद यह सब बदल जाएगा और इसे इस्तेमाल करने वालों की गोपनीयता काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगी। (भाषा)

कैं

दिल्ली में कैंसर के मरीजों को अब डॉक्टरों की कमी का संकट नहीं झेलना होगा, क्योंक‌िजल्द ही 250 डॉक्टरों की भर्ती होने जा रही है

सर मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अब लंबी वेटिंग से छुटकारा पाना और समय पर इलाज मिलना संभव होगा। इसकी वजह है डॉक्टरों की नियुक्ति। आने वाले समय में दिल्ली राज्य कैंसर संस्थान 250 से ज्यादा डॉक्टरों की भर्ती करने जा रहा है। संस्थान में सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के लिए डॉक्टरों के 215 नए पद सृजित किए गए हैं। ये पद 22 विभागों में बढ़ाए जाने हैं। इनमें एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और सीनियर रेजिडेंट के पद हैं। इन पदों के लिए अब तक एक हजार से भी ज्यादा डॉक्टरों ने आवेदन किया है। संस्थान के डायरेक्टर डॉक्टर आरके ग्रोवर के अनुसार इन आवेदनों की स्क्रूटनी के बाद बचे हुए उम्मीदवारों का इंटरव्यू किया जाएगा।

इसके बाद आगामी 5 वर्ष के लिए उनका संस्थान में चयन किया जाएगा। इस प्रक्रिया के पूरे होने में डेढ़ से 2 महीने का समय लग सकता है। नए डॉक्टरों के आने के बाद संस्थान ने उपलब्ध सुविधाओं में भी बढ़ोत्तरी की जाएगी। (भाषा)


10 - 16 जुलाई 2017

गुड न्यूज

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स्वास्थ्य शोध

ह्यूमन प्रोजेक्ट में हजारों करेंगे डाटा शेयर शो

ध की दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा और अनूठा डाटा बैंक तैयार करने का काम शुरू हो गया है। इस पूरी रिसर्च को ‘द ह्यूमन प्रोजेक्ट' नाम दिया गया है और इसके लिए शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को अगले साल न्यूयॉर्क से इकट्ठा करने की तैयारी शुरू भी कर दी है। हर साल डेढ़ करोड़ डॉलर के बजट वाले इस शोध का लक्ष्य सारी जानकारियों को साथ लाकर इंसान के स्वास्थ्य, उम्र, शिक्षा और जीवन के दूसरे पहलुओं को बेहतर ढंग से जानना है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और प्रोजेक्ट के निदेशक पॉल ग्लिमकर इस परियोजना की व्यापक जानकारी देते हुए कहते हैं, ‘हमारा मकसद है समग्र तस्वीर को एक साथ लाना।’ बिग डाटा हेल्थ पर पहले भी स्टडी हुई है और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ इस साल दस लाख लोगों की एक परियोजना शुरू कर रहा है। ‘बिग डाटा’ पत्रिका के मुख्य संपादक डॉ. वसंत धर ह्यूमन प्रोजेक्ट के बारे में कहते हैं, ‘यह बहुत ही महत्वाकांक्षी परियोजना है।’ इस रिसर्च में हिस्सा लेने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। दरअसल, शोधकर्ता लोगों का ऐसा समूह तैयार कर रहे हैं, जो जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता हो। रिसर्च में भाग लेने वाले लोगों की सभी तरह की जांच की जाएगी, जिसमें खून, आईक्यू और आनुवंशकीय जांच शामिल होगी। शोधकर्ता लोगों से चिकित्सा, वित्त और शिक्षा से संबंधी सभी रिकॉर्ड्स भी मांगेंगे। इसके अलावा शोध में शामिल लोग अपने सेलफोन से जुड़े लोकेशन, मैसेज और नंबर जैसे आंकड़े भी देंगे। 20 साल तक चलने वाली इस परियोजना में अन्य जानकारियां पाने के लिए प्रतिभागियों को पहना

रेल उद्घाटन

‘द ह्यूमन प्रोजेक्ट' के तहत शुरू हुए इस रिसर्च में निजी जानकारियों का अलग-अलग तरह के शोध कार्य में इस्तेमाल किया जाएगा

एक नजर

'फ्रैमिंघम हार्ट स्टडी' से की जा रही इस शोध परियोजना की तुलना

अस्थमा और अल्जाइमर जैसी बीमारियों के इलाज में मिलेगी मदद डाटा सुरक्षा के लिए किए जा रहे विशेष सुरक्षा प्रबंध

जा सकने वाला एक्टिविटी ट्रैकर दिया जाएगा, वजन नापने की खास मशीनें दी जाएंगी। इसके अलावा हर तीन साल पर उनके ब्लड और यूरीन सैंपल लिए जाएंगे। इस शोध के लिए प्रतिभागियों को नामांकन के लिए प्रति परिवार 500 डॉलर भी दिए जाएंगे।

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस व्यापक शोध के नतीजे स्वास्थ्य, व्यवहार और परिस्थितियों के तालमेल को समझने में मदद करेंगे, जिससे अस्थमा और अल्जाइमर जैसी बीमारियों के बारे में शोध करने में मदद मिलेगी।

20 साल तक चलने वाली इस परियोजना में अन्य जानकारियां पाने के लिए प्रतिभागियों को पहना जा सकने वाला एक्टिविटी ट्रैकर दिया जाएगा, वजन मापने की खास मशीनें दी जाएंगी। इसके अलावा हर तीन साल पर उनके ब्लड और यूरीन सैंपल लिए जाएंगे

जब इतना सारा डाटा इकट्ठा किया जाएगा तो डाटा सुरक्षा का मामला मामूली महत्व का नहीं है। पॉल ग्लिमकर का कहना है कि इस रिसर्च में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। शोधकर्ता रिसर्च करने की जगह के अलावा इन जानकारियों को कहीं भी नहीं देख पाएंगे। काम करने की जगह पर कंप्यूटर इंटरनेट से भी नहीं जुड़े होंगे। इस शोध में बहुत सी व्यक्तिगत जानकारियां शामिल होने की वजह से यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। पॉल ग्लिमकर अपनी परियोजना की तुलना हृदय रोग संबंधी महत्वपूर्ण अध्ययन 'फ्रैमिंघम हार्ट स्टडी' से करते हैं। यह शोध 1948 में किया गया था जिसमें 15000 लोग शामिल थे। उनकी वर्षों तक निगरानी की गई थी और नतीजों में यह बात सामने आई थी कि ब्लड प्रेशर, कोलेस्टरॉल और स्मोकिंग दिल की बीमारियों की वजह बनते हैं। प्रो. ग्लिमकर कहते हैं, ‘यदि हमारे काम को भी 'फ्रैमिंघम हार्ट स्टडी' की तरह देखा जाए तो यह अपने आप में कितनी बड़ी उपलब्धि होगी।’ (एजेंसी)

नई रेल परियोजनाओं का उद्घाटन केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बिहार में कई रेल परियोजनाओं का उद्घाटन किया

प्रभु ने बिहार के सालौना स्टेशन रेअलावालपर मंयात्रीत्उन्होंरी सुसुरनविेशे धाओं का उद्घाटन किया। इसके यहीं से वीडियो कांफ्रेंसिंग के

जरिए तीन नए ट्रैक पर काम का शुभारंभ किया। रेल यातायात की भीड़भाड़ को कम करने के लिए हाजीपुर और बछवाड़ा, समस्तीपुर और दरभंगा के बीच लाइनों के दोहरीकरण, पतरातू और सोनानगर के बीच तीसरी लाइन के लिए

काम शुरू किया गया है। 72 किलोमीटर के हाजीपुर और बछवाड़ा में लाइनों के दोहरीकरण पर 678.15 करोड़ रुपए की लागत आएगी। वहीं 38 किलोमीटर के समस्तीपुर-दरभंगा में दोहरीकरण की लागत 491.01 करोड़ रुपए बैठेगी। पतरातू और सोनानगर की 291 किलोमीटर की तीसरी लाइन पर 306.16 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। ‍ (भाषा)


28 संग्रहालय

10 - 16 जुलाई 2017

ट्राम म्यूजियम की सैर कोलकाता ट्राम

विश्व के लगभग 300 शहरों में ट्राम चल रही है, लेकिन कोलकाता भारत का एकमात्र शहर है जहां अभी भी ट्राम की टुनटुन सुनी जाती है

एक नजर

1938 में बनी एक ट्राम को बनाया गया म्यूजियम 150 बरसों का इतिहास समेटे है यह अनूठा म्यूजियम

पुरानी टिकटें, ट्राम कर्मचारियों के बैज आदि का संग्रह

में दो डिब्बे हैं। पहले डिब्बे को कैफेटेरिया बनाया गया है, जहां आप कॉफी या कोल्ड ड्रिंक्स के साथ ट्राम पर चर्चा कर सकते हैं। कैफेटेरिया से सटे दूसरे डिब्बे में ट्राम का डेढ़ सदी का इतिहास दर्ज है, जिसमें ट्राम के स्वर्णिम काल और फिर विकास की आंधी में अस्तित्व के लिए जद्दोजहद की इबारत दर्ज है।

दिलचस्प चीजों का संग्रह

इस संग्रहालय में सौ वर्ष से पुरानी टिकटें, ट्राम कर्मचारियों के बैज, वैगन ट्राम के मॉडल, घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम के मॉडल समेत कई चीजें हैं, जिन्हें देखकर आपको हैरत होगी। मिसाल के तौर पर क्वाइन एक्सचेंजर मशीन को ही ले लीजिए। इस मशीन में छह चैंबर होते थे। एक चैंबर में एक पैसा, दूसरे चैंबर में दो पैसे, तीसरे चैंबर में पांच पैसे, चौथे चैंबर में 10 पैसे, पांचवें चैंबर में 25 पैसे और छठे चैंबर में 50 पैसे के सिक्के रखे जाते थे। टिकट लेने वाले को बैलेंस देने के लिए कंडक्टर जिस चैंबर के नॉब को दबाता, पैसा खुद-ब-खुद बाहर निकल आता। इस मशीन का इस्तेमाल 50 के दशक तक किया गया था। बाद में चमड़े के बैग ने इसकी जगह ले ली।

पुराने सिक्कों का सफर

एसएसबी ब्यूरो

धुनिकता और परंपरा का दुनिया के जिस महानगर में सबसे अनूठा संगम दिखाई देता है, वह कोई और नहीं, बल्कि भारत का सबसे पुराना कहा जाने वाला महानगर कोलकाता है। कहते हैं कि इस शहर की जीवनशैली में करीब पांच सौ बरसों का इतिहास एक साथ गतिमान है। बात करें कोलकाता की पहचान की तो यहां चलने वाले ट्राम के कारण काफी प्रसिद्धि मिली है। यह आवागमन का बहुत तेज माध्यम भले नहीं है, पर जिस तरह कोलकाता की बनावट है और यहां के लोगों की जरूरत है, उसमें ट्राम की दरकार अब तक बनी हुई है।

धर्मतल्ला में म्यूजियम

विश्व के लगभग 300 शहरों में ट्राम चल रही है, लेकिन कोलकाता भारत का एकमात्र शहर है जहां अभी भी ट्राम की टुनटुन सुनी जाती है। अगर आप

कोलकाता की ट्राम के इतिहास से रू-ब-रू होना चाहते हैं, तो ट्राम म्यूजियम आपके लिए सबसे उपयुक्त जगह हो सकती है। मध्य कोलकाता के धर्मतल्ला में स्थित इस ट्राम म्यूजियम के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन अगर आप एक बार यहां पहुंच जाएं तो फिर ट्राम के बारे में कई रोचक जानकारियां आपको मिलेगी।

ट्राम ही बन गया संग्रहालय

इस संग्रहालय को बनाया भी गया है काफी खास तरह से। दरअसल, 1938 में बनी एक ट्राम जो काफी जर्जर हो चुकी थी, उसी ट्राम को अत्याधुनिक रूप देकर उसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। इसमें ट्राम से जुड़ी कमोबेश हर तरह की जानकारी मौजूद है। कहा जा सकता है कि यह ट्राम अपने भीतर 150 वर्षों के इतिहास को समेटे हुए है।

संग्रहालय के साथ कैफेटेरिया

19 सितंबर 2014 को अस्तित्व में आए इस संग्रहालय

कुछ लोग पुराने सिक्कों को जमा करने या फिर उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने के शौकीन हैं। वे म्यूजियम में 150 वर्ष पहले इस्तेमाल किए जाने वाले काना पैसे, एक आना और दो आना समेत 25 सिक्के देख सकते हैं। म्यूजियम में रखे गए टिकटों से पता चलता है कि आजादी से पहले चार आने में लोग ट्राम में सफर किया करते थे। यह उस और मौजूदा दौर में सार्वजनिक परिवहन के बढ़े खर्च और सहूलियत के तुलनात्मक अध्ययन में भी मदद करता है।

बदली सबकी पोशाक

कोलकाता के लिए ट्राम भले परिवहन का एक पुराना माध्यम है, पर खुद इसने भी परिवर्तन के कई दौर देखे हैं। ट्राम के कंडक्टर और ड्राइवर जो टोपियां पहना करते थे, प्वाइंट्समैन और कंडक्टर को दिया जाने वाला पहचान पत्र, विभिन्न कर्मचारियों द्वारा पहने जाने वाले बैज आदि को भी म्यूजियम में जगह मिली है। यहां तक कि दिवाकर बनर्जी की फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ में ये इस्तेमाल किए गए वातानुकूलित ट्राम का मॉडल भी यहां


10 - 16 जुलाई 2017

संग्रहालय

तीन शताब्दी से कोलकाता में ट्राम

ट्राम के साथ साहित्यकार

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सियालदह से आर्मेनिया घाट के बीच डलहौजी स्क्वाॅयर, स्ट्रैंड रोड होते हुए मीटर गेज पर ट्राम चलाई गई, जिसे घोड़े खींचते थे

रवींद्रनाथ टैगोर, शरदेंदु बंद्योपाध्याय, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय और अन्य लेखकों की रचनाओं में ट्राम का जिक्र

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लकाता के ट्राम संग्रहालय के साथ एक खास बात यह भी है कि इसमें ट्राम के साथ बांग्ला साहित्य के संपर्क को भी दिखाया गया है, जो इसका विशेष आकर्षण है। रवींद्रनाथ टैगोर, शरदेंदु बंद्योपाध्याय, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय और अन्य लेखकों की रचनाओं में ट्राम के बारे में जो लिखा गया है, उन्हें संग्रहालय में जगह दी गई है। यहां उल्लेखनीय है कि हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में भी ट्राम का जिक्र आया है। वैसे उनकी यह कविता कोलकाता में कुलियों और श्रमिकों की जिंदगी पर है, पर उन लोगों की जिंदगी का ट्राम कैसे अभिन्न हिस्सा रहा है, यह यहां पढ़ने को मिलता है। संग्रहालय में इस कविता को जगह नहीं मिली है। कुछ लोगों ने इस बारे में संग्रहालय प्रबंधन का ध्यान दिलाया है। संभव है कि भविष्य में नागार्जुन की यह कविता भी ट्राम संग्रहालय में स्थान पा जाए और लोग जान सकें कि ट्राम के बारे में बांग्ला में ही नहीं, बल्कि हिंदी के साहित्यकारों ने भी लिखा है। यहां प्रस्तुत है ट्राम के हवाले के साथ नागार्जुन की कविताघिन तो नहीं आती पूरी स्पीड में है ट्राम खाती है दचके पे दचका सटता है बदन से बदन पसीने से लथपथ

छूती है निगाहों को कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान बेतरतीब मूंछों की थिरकन सच-सच बतलाओ घिन तो नहीं आती है? जी तो नहीं कुढ़ता है? कुली-मजदूर हैं बोझा ढोते हैं खींचते हैं ठेला धूल-धुआं-भाप से पड़ता है साबका थके मांदे जहां-तहां हो जाते हैं ढेर सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन आकर ट्राम के अंदर पिछले डिब्बे में बैठ गए हैं इधर-उधर तुमसे सटकर आपस में इनकी बतकही सच-सच बतलाओ नागवार तो नहीं लगती है? जी तो नहीं कुढ़ता है? घिन तो नहीं आती है? दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने बैठना था पंखे के नीचे, अगले डिब्बे में ये तो बस इसी तरह लगायेंगे ठहाके, फांकेंगे सुरती भरी मुंह बातें करेंगे अपने देस-कोस की सच-सच बताओ अखरती तो नहीं इनकी सोहबत? जी तो नहीं कुढ़ता है? घिन तो नहीं आती है?

1938 में बनी एक ट्राम जो काफी जर्जर हो चुकी थी, उसी ट्राम को अत्याधुनिक रूप देकर उसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है मौजूद है। इन सबके अलावा भी बहुत कुछ है, जो ट्राम के लंबे इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों को संतोष देगा।

संग्रहालय की नींव 2013 में

इस ट्राम संग्रहालय की नींव 2013 में डाली गई थी। इसके लिए शोधकर्ताओं की एक टीम तैयार की गई थी। टीम ने गहन शोध किया और 2014 के सितंबर महीने में संग्रहालय का सपना साकार हुआ। इसे बनाने के पीछे उद्देश्य था ट्राम के इतिहास

को संजोना। कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर नीलांजन शांडिल्य ने संग्रहालय की परिकल्पना कर उसे मूर्त रूप दिया है। उनका मानना है कि हम सबको ट्राम का इतिहास जानना चाहिए और इसलिए ट्राम संग्रहालय की परिकल्पना की गई थी।

नीलांजन की मेहनत

संग्रहालय बनाना तो आसान था, लेकिन इसमें संग्रह किए जाने वाले सामान को इकट्ठा करना बेहद

लकाता महानगर में ट्राम का शामिल होने को का इतिहास तीन सदी का है। 1873 में शहर में ट्राम चलाने की पहली कोशिश हुई। 24 फरवरी 1873 में पहली ट्राम पटरियों पर चली थी। सियालदह से आर्मेनिया घाट के बीच 2.4 मील का ट्राम ट्रैक माल ढुलाई के लिए बनाया गया था। हालांकि तब ये सेवा लोकप्रिय नहीं हुई और उसे 20 नवंबर को बंद कर दिया गया। 1880 में कोलकाता ट्रामवेज कंपनी ( सीटीसी) का गठन हुआ। सियालदह से आर्मेनिया घाट के बीच डलहौजी स्क्वाॅयर और स्ट्रैंड रोड होते हुए मीटर गेज पर ट्राम चलाई गई जिसे घोड़े खींचते थे। एक नवंबर 1880 को ट्राम सेवा का उदघाटन वायसराय लार्ड रिपन ने किया। 1882 में स्टीम लोको से ट्राम का संचालन शुरू किया गया। 19वीं सदी के अंत में सीटीसी के पास 186 ट्राम कार, 1000 घोड़े, 7 स्टीम इंजन और 19 मील का ट्राम नेटवर्क था। साल 1900 में ट्राम रुट के विद्युतीकरण की शुरुआत की गई। तब इसे मीटर गेजसे बदल कर स्टैंडर्ड गेज पर (4 फीट 8.5 इंच) लाया गया। 1905 तक पूरा ट्राम ट्रैक विद्युतीकृत हो चुका था। 1943 न्यू हावड़ा ब्रिज के बनने पर ट्राम हावड़ा स्टेशन पर भी हावड़ा पुल होते हुए पहुंच चुकी थी। हालांकि 1992 में ट्राम को हावड़ा ब्रिज से ट्रैफिक और पुल पर संकट का हवाला देते मुश्किल था, क्योंकि ट्राम कंपनी के पास भी बहुत सारी चीजें नहीं थीं। इस बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए नीलांजन शांडिल्य बताते हैं, ‘ट्राम कंपनी के विभिन्न विभागों से कुछ संग्रहणीय सामग्री मिलीं तो ट्राम में काम करने वाले कुछ कर्मचारियों ने ट्राम से जुड़ी चीजें मुहैया करवाईं। ट्राम से भावनात्मक लगाव रखने वाले महानगर के कुछ वरिष्ठ लोग भी आगे आएं और उनके पास ट्राम से जुड़े जो सामान थे, उन्होंने दिया और इस तरह संग्रहालय जीवंत हो उठा। बहरहाल, ट्राम संग्रहालय जब शुरू हुआ था, तब

हुए हटा दिया गया। 1943 में ट्राम का कोलकाता शहर में 67.3 किलोमीटर के दायरे में विस्तार था। यह कोलकाता के सभी प्रमुख इलाकों को कवर करती थी। आजादी के बाद 1951 में कोलकाता ट्रामवे कंपनी पश्चिम बंगाल सरकार के अधीन आ गई। 1970 में नीमतल्ला घाट और हावड़ा में कुछ इलाकों में ट्राम सेवा बंद कर दी गई। कुल ट्राम रूट घट कर 62.08 किलोमीटर रह गया। 1986 में दक्षिण में ट्राम का विस्तार बेहाला से जोका तक किया गया। 1992 में कोलकाता ट्रामवे कंपनी ने अपनी बसें भी चलानी शुरू कर दीं।

90 किलोमीटर अधिकतम रफ्तार आमतौर पर लोग ट्राम को आधुनिक समय के लिहाज से परिवहन का सुस्त साधन मानते हैं। पर यह इतना सुस्त भी नहीं है। अन्य वाहनों की तरह ट्राम भी 90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने की क्षमता रखती है, पर उसकी पटरियों पर अन्य वाहनों के अतिक्रमण एवं शहर की भीड़भाड़ व सुस्त यातायात व्यवस्था के कारण ट्राम को 8 से 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ट्रामों की रफ्तार तेज करने एवं ट्राम की पटरियों पर से अन्य गाड़ियों को चलने से रोकने के लिए पुलिस कभी भी हमारी मदद नहीं करती है।

बहुत कम लोग आते थे, लेकिन अब इनकी संख्या में इजाफा हुआ है। पूरी तरह वातानुकूल इस ट्राम संग्रहालय का टिकट महज पांच रुपए है और दोपहर एक बजे से रात आठ बजे तक यह खुला रहता है। इसके साथ ही कोलकाता के विभिन्न लैंडमार्क्स की आधा दर्जन से अधिक तस्वीरें हैं, जिन्हें आजादी से पहले कैमरों में कैद किया गया था। इस संग्रहालय में ट्राम ही नहीं कोलकाता की भी तारीख दर्ज है। एक ऐसी तारीख जिससे होकर गुजरना एक सतरंगी रोमांच के अनुभव से कम नहीं है।


30 स्वास्थ्य

10 - 16 जुलाई 2017

सोशल मीडिया पर रक्तदान की मुहिम प्रेरक पहल

सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर रक्तदान करके देश के कुछ उत्साही युवा एक बड़ी मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं

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एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

शल मीडिया आज संपर्क, सूचना और संदेश का ही बड़ा माध्यम नहीं है। इसके जरिए कई रचनात्मक मुहिम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसी ही एक सराहनीय मुहिम रक्तदान से जुड़ी है। भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति वर्ष 120 लाख यानी 1.20 करोड़ यूनिट खून की जरूरत पड़ती है, जबकि महज 90 लाख लोग ही हर साल रक्तदान करते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से रक्तदान की मुहिम चलाकर कुछ लोग इसके उपयोग की सार्थकता को सिद्ध कर रहे हैं तो यह बड़ी पहल है। वाकई यह तारीफ के काबिल हैं। वे तमाम लोग सोशल मीडिया का उपयोग फोटो-वीडियो शेयर करने या फिर मन की भड़ास निकालने की बजाय सामाजिक सेवा के कार्यों के लिए कर रहे हैं।

मिसाल बन गया मुकेश

ऐसे ही शख्स हैं पटना निवासी मुकेश हिसारिया जो गोविंद मित्रा रोड पर एक मेडिकल दुकान चलाते हैं। वर्ष 1991 में जब उनकी मां की तबियत खराब हुई तो लोकल डॉक्टर ने कैंसर की आशंका जताते हुए उन्हें वेल्लोर ले जाने की सलाह दी। वहां जाने पर मां के इलाज के दौरान मुकेश ने महसूस किया कि वहां हर दिन सैकड़ों-हजारों लोग बिहार, झारखंड सहित अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से बेहतर इलाज की उम्मीद से आते हैं। उनमें से कइयों की मौत समय पर सही ग्रुप का ब्लड न मिलने की वजह से हो जाती है। मुकेश इस बात से बेहद परेशान हुए। उन्होंने तय किया कि वह खून की कमी की वजह से किसी को मरने नहीं देंगे। पर यह काम वह कैसे करेंगे, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा था। उन दिनों सोशल मीडिया में ऑरकुट लोगों के बीच काफी पॉपुलर था, तो उन्होंने उसी के जरिए लोगों को जोड़ना शुरू किया। कुछ समय बाद फेसबुक आया और उसके बाद अब व्हाट्सएेप्प। जैसे-जैसे ये नए-नए सोशल मीडिया के माध्यम विकसित होते गए, मुकेश की पहुंच भी अधिक से अधिक लोगों तक होती गयी। आज वो अपने ‘मां वैष्णो देवी सेवा समिति’ से पूरे भारत में करीब साढ़े छह लाख लोगों को ब्लड डोनेशन कैंपेन से जोड़ चुके हैं। रक्तदान के लिए सोशल मीडिया के जरिए शुरू किए गए अपने अभियान के बारे में मुकेश बताते

ऑरकुट के दौर से रक्तदान के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल

पटना के मुकेश और रांची के अतुल ने किए सराहनीय प्रयास ग्रामीण युवा भी सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर कर रहे रक्तदान

ग्रामीण भी पीछे नहीं

हैं, ‘हम सभी को एक ही जीवन मिला है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसका किस तरीके से सदुपयोग करते हैं। मैंने दूसरों की मदद करने का यह रास्ता अपनाया है, क्योंकि दूसरों की जान बचाने से जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है, वह मेरे ख्याल से दुनिया के और किसी भी काम से नहीं मिल सकती।’

अतुल का अतुलनीय प्रयास

पटना के मुकेश की तरह की रांची के रहने वाले अतुल गेरा ने पहली बार 19 वर्ष की आयु में परिवार में किसी को ब्लड डोनेट किया था। उसके बाद एकदो बार आस-पड़ोस और दोस्तों के लिए भी रक्तदान किया। धीरे-धीरे अतुल ने इसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। करीब 10 साल पहले फेसबुक के माध्यम से लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करना शुरू किया। आज उनके ‘लाइफ सेवर’ ग्रुप से न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के लाखों लोग जुड़े हुए हैं।

रेडक्रॉस की भी मदद

अतुल का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक संख्या में ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित करना है। उनके अनुसार, ‘हम सभी को साल में चार बार तो ब्लड डोनेट करना चाहिए। साथ में लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित करने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए, ताकि जरूरतमंदों को फ्रेश

ब्लड मिल सकें, जो ब्लड की तुलना में कहीं ज्यादा कारगर और असरदार है।’ अब तो कई अस्पताल और रेडक्रॉस जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी जरूरत पड़ने पर रक्तदान के लिए उनसे संपर्क करती हैं। दरअसल, आज देश के हजारों-लाखों ब्लड डोनर मुकेश और अतुल के माध्यम से जुडे़ हैं। जब जहां जिस किसी को भी रक्त की जरूरत हो, उसे निःस्वार्थ भाव से ब्लड डोनेट कर रहें हैं। इसी तरह कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर ऑर्गन डोनेशन के अलग-अलग ग्रुप बना रखे हैं, वहीं कुछ अन्य किसी अन्य सामाजिक उद्देश्य के निहितार्थ सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि तकनीक में भले ही लाख खामियां हों, लेकिन यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उसका किस तरह से और किस दिशा में बेहतर सदुपयोग कर पाते हैं।

शहरों के साथ ही अब गांव के युवा भी नई सोच के साथ पहल कर रहे हैं। मध्य प्रदेश स्थित खंडवा के खरगोन में ग्रामीण युवाओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से समाज को जागरूक करने के साथ ही जरूरतमंदों को रक्तदान कर नया जीवन भी दे रहे हैं। यहां रहने वाले सतीश पटेल ने करीब एक साल पहले बालसमुद सहित कसरावद, बलगांव, पथोरा व बामंदी के युवाओं के सहयोग से 63 लोगों को जोड़कर एक व्हाट्सएेप्प ग्रुप बनाया। इसे ‘रक्तदान ग्रुप बालसमुद’ का नाम दिया। इस ग्रुप में एक दर्जन से ज्यादा सदस्य खरगोन, धामनोद व इंदौर के अस्पताल में स्वयं के खर्च से जाकर रक्तदान कर चुके हैं। ग्रुप एडमिन 40 वर्षीय सतीश पटेल ने बताया उन्होंने अब तक 25 बार से ज्यादा रक्तदान किया है। पिछले साल वे धामनोद के निजी अस्पताल गए थे, तब एक महिला को वहां लाया गया था जिसे करीब तीन यूनिट ब्लड की जरूरत थी। धामनोद के एक युवा के सोशल मीडिया पर यह बात पोस्ट करने के करीब 20 मिनट बाद ही चार युवा अस्पताल पहुंच गए और महिला को ब्लड दिया। यह सब देख सतीश के मन में भी सोशल मीडिया पर रक्तदान के लिए ग्रुप बनाकर लोगों को मदद करने की प्रेरणा मिली।

फालतू पोस्ट पर प्रतिबंध

सतीश पटेल द्वारा शुरू किए गए रक्तदान ग्रुप में रक्तदान से जुड़ी पोस्ट ही की जाती हैं, अन्य पोस्ट पर पूरी तरह प्रतिबंध है। ब्लड के लिए पोस्ट आते हैं तो इस ग्रुप सदस्य तत्काल जरूरतमंद से संपर्क करते हैं। यदि जरूरी ब्लड ग्रुप का खून ग्रुप सदस्यों के पास नहीं होता तो अन्य बाहरी संपर्क से व्यवस्था की जाती है। कोई सदस्य पहली पर रक्तदान करता है तो उसका फोटो ग्रुप में डालकर अन्य सदस्यों का हौसला बढ़ाया जाता है। ग्रुप मेंबर अन्य लोगों को, जो व्हाट्सएेप्प का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें भी अपने स्टेटस पर अपना-अपना ब्लड ग्रुप रखने की अपील करते हैं।


10 - 16 जुलाई 2017

लोक कथा

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बंदर और हिरण ब

हुत समय पहले की बात है। तब हिरण की पूंछ बहुत लंबी होती थी। हिरण को अपनी लंबी पूंछ पर बहुत ही ज्यादा घमंड था। दूसरे जानवर उसकी लंबी पूंछ से बहुत जलते थे। एक बार एक हिरण जंगल में घूम रहा था। उसको रास्ते में एक बंदर मिला। उस बंदर की पूंछ बहुत छोटी थी। वह दोनों आपस में बातें करने लगे। बंदर लगातार हिरण की पूंछ को देख रहा था। बंदर ने हिरण से बहुत मीठी–मीठी बातें की, हिरण भाई तुम्हारी पूंछ बहुत बड़ी और सुंदर है। बंदर ने हिरण से कहा एक बार मैं तुम्हारी पूंछ लगा कर देख लूं । हिरण बंदर की मीठी–मीठी बातों में आ गया और उसने अपनी पूंछ बंदर को दे दी। बंदर ने हिरण की पूंछ

हुत समय पहले की बात है, एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किए। वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे। राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे। राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया। जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन किया। राजा उस जगह पहुंच गए जहां उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे । राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ‘मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूं, तुम इन्हें उड़ने का इशारा करो।’ आदमी ने ऐसा ही किया। इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे, पर जहां एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीं दूसरा कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था। ये देख, राजा को कुछ अजीब लगा। ‘क्या बात है जहां एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है और वहीं ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा?’ राजा ने सवाल किया। ‘जी हुजूर, इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है, वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।’ राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे, लेकिन वे दूसरे बाज को भी उसी तरह उड़ता देखना चाहते थे। अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊंचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिए जाएंगे।

फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आए और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे, पर हफ्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोड़ा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता। फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ। राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था। अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा, ‘ मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान नहीं कर पाए वो तुमने कैसे कर दिखाया।’ ‘मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूं, मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता, मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका था, जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा।’ शिक्षा – दोस्तो, हम सभी ऊंचा उड़ने के लिए ही बने हैं, लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते हैं उसके इतने आदी हो जाते हैं कि ऊंची उड़ान भरने की, कुछ बड़ा करने की काबिलियत भूल जाते हैं। यदि आप भी बरसों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके मुताबिक नहीं है तो एक बार जरूर सोचिए कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की जरूरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं ?

अपनी पीठ पर लगा ली। बंदर तेजी से छलांग मार कर और एक पेड़ पर चढ़ गया और हिरण के देखते ही देखते वहां से भाग निकला। हिरण वहीं बैठा बंदर का इंतजार करता रहा, परंतु बंदर नहीं लौटा। हिरण को अपनी सुंदर और लंबी पूंछ खोकर बहुत दुख हुआ। इस तरह से माना जाता है कि हिरन की पूंछ बंदर ने ले ली थी जिसकी वजह से हिरण की पूंछ इतनी छोटी होती है। शिक्षा–यह कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि हमें कभी किसी की झूठी प्रशंसा में नहीं आना चाहिए। बच्चो! जब कभी कोई आपकी ज्यादा प्रशंसा कर रहा है तो उनसे सचेत रहें, क्योंकि वह आपकी झूठी प्रशंसा किसी मतलब के लिए कर रहा है।

बाज और किसान


32 अनाम हीरो

10 - 16 जुलाई 2017

अनाम हीरो महेश मुरलीधर भागवत

मानव तस्करी से अथक जंग

मानव तस्करी के खिलाफ 13 सालों से संघर्ष कर रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी महेश मुरलीधर भागवत को अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने किया सम्मानित

मा

नव तस्करी से लड़ने के अपने अथक प्रयासों के लिए वरिष्ठ भारतीय पुलिस अधिकारी महेश मुरलीधर भागवत को अमेरिका के प्रतिष्ठित ट्रैफिकिंग इन पर्संस (टीआईपी) रिपोर्ट हीरोज सम्मान दिया गया है। दिलचस्प है कि भागवत को अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप के हाथों यह सम्मान दिया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान अमेरिकी विदेश मंत्रालय के तहत मानव तस्करी की रोकथाम के लिए काम रहे विभाग द्वारा हर साल दिया जाता है। इसके तहत मानव तस्करी के खिलाफ काम कर रही गैरसरकारी संस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ताओं, पुलिस अधिकारी सहित विभिन्न विभागीय अधिकारियों को सम्मानित किया जाता है। भागवत पिछले 13 साल से मानव तस्करी रोकने

के लिए विभिन्न मोर्चों पर उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में भागवत तेलंगाना में राककोंडा के पुलिस आयुक्त हैं। दिलचस्प है कि भागवत ऐसे तीसरे पुलिस अधिकारी हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया गया है। इस बहादुर और समर्पित पुलिस अधिकारी ने मानव तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों में एक साल के भीतर कम से कम 25 रेड लाइट अड्डों, पांच होटलों और 25 रिहायशी ठिकानों को बंद कराया है। भागवत के इस कार्य की विशेषता यह भी रही कि वे लोगों को मानव तस्कर गिरोहों से मुक्त भर नहीं कराते, बल्कि बाद में उनकी आजीविका और पुनर्वास का भी ध्यान रखते हैं। इसके लिए वे सरकारी के साथ विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं की मदद लेते हैं।

न्यूजमेकर

अमेरिका में जेजे की जय-जय

भारतीय मूल के स्कूली छात्र जेजे कपूर ने अमेरिका में राष्ट्रीय भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिता जीता

जेजे कपूर

मेरिका में भारतीय मूल के सिख छात्र जेजे कपूर इन दिनों अमेरिका में भारतवंशियों के बीच चर्चित नाम है। दरअसल, जेजे ने वहां राष्ट्रीय भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिता जीतने का गौरव प्राप्त किया है। यह अमेरिका में हाईस्कूल स्तर की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता मानी जाती है। जेजे के साथ अच्छी बात यह रही कि उन्होंने 'लेट्स डांस' शीर्षक वाले अपने भाषण को स्वयं लिखा। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत बॉलीवुड की चर्चा के साथ की और एक सिख-अमेरिकी के तौर पर अपने अनुभवों का जिक्र किया। जेजे कपूर को मौलिक वक्ता श्रेणी में विजेता चुना गया। दिलचस्प है कि जेजे इस प्रतियोगिता के सेमीफाइनल और फाइनल राउंड में शीर्ष

स्थान पर रहे, इस कारण उन्होंने चैंपियनशिप ट्राफी भी हासिल की। उन्होंने अपने भाषण में कहा, 'मैंने पाया कि बॉलीवुड कहानी और वास्तविकता को अलग करता है और इन्हें भारत की सीमाओं से परे ले जाता है।' भाषण में जेजे ने भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों की विशेषता बताई कि यह संस्कृति आज भारतीय सीमा से आगे निकलते हुए ग्लोबल शक्ल ले चुकी है। आयोवा के वैली हाईस्कूल में पढ़ने वाले जेजे कपूर ने इस मौके पर 11 सितंबर, 2001 के आतंकी हमले के बाद सिख और मुस्लिमों की पहचान को लेकर अपने अनुभवों को भी साझा किया। गौरतलब है कि इस आतंकी हमले के समय जेजे महज दो साल के थे।

सोनल को कल्पना चावला स्कॉलरशिप

आईसीयू और कॉर्क इंस्टीट्यूट द्वारा शुरू किया गया पहला कल्पना चावला स्कॉलरशिप सोनल बबेरवाल को

हाराष्ट्र में अमरावती की रहने वाली सोनल बबेरवाल को पहला कल्पना चावला स्कॉलरशिप पाने का यश हासिल हुआ है। इंटरनेशनल स्पेस यूनिवर्सिटी (आईसीयू) के साथ मिलकर आयरलैंड के कॉर्क इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने यह स्कॉलरशिप शुरू की है। गौरतलब है कि भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला का एक फरवरी, 2003 को स्पेस शटल कोलंबिया में अंतरिक्ष से लौटने के वक्त हुई दुर्घटना में निधन हो गया था। स्कॉलरशिप से जुड़ी घोषणा में कहा गया है कि यह ग्लोबल स्पेस कम्युनिटी और मार्केट में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को बल देने के लिए शुरू किया गया है। इस बड़े मकसद से शुरू की गई इस स्कॉलरशिप को पाने वाली सोनल बबेरवाल अमरावती के

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 30

सोनल बबेरवाल आर.एल.टी कॉलेज ऑफ साइंस और सिपना कॉलेज ऑप इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की छात्रा रह चुकी हैं। उसकी दिलचस्पी रोबोटिक और स्पेस में जमा मलबे सहित पर्यावरण से जुड़े क्षेत्रों में है। स्कॉलरशिप के संस्थापकों में से एक माइकल पॉटर के मुताबिक, ‘अंतरिक्ष विज्ञान और उससे जुड़ी गतिविधियों में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अहम भूमिका निभाता रहेगा।’ उन्होंने यह भी कहा कि कल्पना चावला कभी मर नहीं सकतीं। वह हमारे दिल और दिमाग में इस अहसास के साथ बस गई है कि हम कड़ी मेहनत के साथ अपने सपनों को सच कर सकते हैं। निसंदेह ऐसे कई सपने सच करने की उम्मीद सोनल से भी है, जिसे कल्पना के नाम से शुरू हुई प्रतिष्ठित स्कॉलरशिप के लिए चुना गया है।

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 30)  
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