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पर्यावरण विशेष

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

वर्ष-1 | अंक-25 | 05 - 11 जून 2017

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13 मिसाल

23 गुड न्यूज

थार में जलधार

प्रदूषित नदी भी स्वच्छ! लखनऊ से कुछ दूरी पर गोमती का जल है निर्मल

एक व्यक्ति के प्रयास से थार का जल संकट हुआ दूर

28 कायाकल्प

‘हलमा’ से बुझी प्यास जल स्रोतों की रक्षा की अनूठी आदिवासी परंपरा

‘चिपको आंदोलन’ से 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन’ तक भारत में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर हुई अहिंसक पहल की लंबी परंपरा है

एसएसबी ब्यूरो

हात्मा गांधी और पर्यावरण को लेकर विचार करने का कोई एक प्रस्थान बिंदु नहीं हो सकता है। वैसे गांधी जी के बाद देश में पर्यावरण चेतना और आंदोलन के इतिहास को देखें तो ‘चिपको आंदोलन’ का ध्यान सबसे पहले आता है। यह आंदोलन अप्रैल, 1973 में जंगल और पेड़ों की सुरक्षा के लिए अहिंसक प्रतिबद्धता के साथ शुरू हुआ था। ‘चिपको’ को लेकर छपे लेखों में एक प्रतिबद्ध पत्रकार ने एक बार लिखा था कि गांधी जी के विचारों ने हिमालय के वृक्षों को बचाया है। ‘चिपको आंदोलन’ से 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘राष्ट्रीय

स्वच्छता मिशन’ तक पर्यावरण सुरक्षा को लेकर हुई पहल की लंबी परंपरा है। इस परंपरा में कभी संस्थाओं ने तो कभी कुछ लोगों के समूह या फिर कभी अकेले किसी व्यक्ति ने जल संरक्षण से लेकर जैविक खेती और वृक्षों की रक्षा तक कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। प्रेरणा और ऐतिहासिक भूमिका की दृष्टि से जिन दो असाधारण गांधीवादी पर्यावरणविदों की चर्चा सबसे जरूरी है, वे हैं चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा। ‘चिपको’ को लेकर प्रसिद्धि पाने वाले भट्ट और बहुगुणा की कार्यशैली पर गौर करें तो कुछ और बातें साफ होती हैं। भट्ट और उनका संगठन शौली ग्राम स्वराज्य मंडल (डीजीएसएम) ने ‘चिपको’ के उद्भव में शुरुआती

भूमिका निभाई थी। इसकी तकनीकें स्वयं भट्ट ने मंडल के ग्रामवासियों को बताई थी। व्यावसायिक फैक्ट्रियों के विरुद्ध प्रदर्शन को समन्वित करने से लेकर डीजीएसएम ने पर्यावरणीय पुनरुद्धार पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसने हिमालय क्षेत्र में अलकनंदा के गांवों में वृक्षारोपण कार्य के लिए महिलाओं को संगठित करने में पहल की। चूंकि चंडी प्रसाद भट्ट की गिनती ‘चिपको’ के अगुआ के रूप में ज्यादा होती है, इसीलिए कई बार इसमें सुंदरलाल बहुगुणा के सामाजिक कार्यों के महत्व और ‘चिपको आंदोलन’ को उससे मिली ताकत के बारे में हम गहराई से नहीं समझ पाते हैं। दरअसल, बहुगुणा और उनकी पत्नी विमला सरला देवी कैथरीन मैरी हैलमैन द्वारा पहाड़ियों

एक नजर

‘चिपको आंदोलन’ के अगुवा थे चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण के लिए गांधीवादी संघर्ष का अहिंसक उदाहरण है ‘चिपको’ पीएम मोदी को स्वच्छता मिशन की प्रेरणा राष्ट्रपिता से ही मिली

में प्रशिक्षित किए गए पहले सर्वोदय कार्यकर्ताओं के समूह में से थे। सरला देवी महात्मा गांधी की शिष्या थीं, जो 1940 के दशक में कुमाऊं की


02 आवरण कथा

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पर्यावरण विशेष

'बापू को कार्यांजलि'

‘सत्याग्रह का लक्ष्य देश को आजादी दिलाना था, वहीं स्वच्छाग्रह का लक्ष्य देश को क्लीन इंडिया में बदलने का है’

चं

पारण आंदोलन के सौ साल पूरे होने पर दिल्ली के नेशनल आर्काइव्स म्यूजियम में खास कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । इस कार्यक्रम में चंपारण आंदोलन के सौ साल पूरे होने पर डिजिटल प्रदर्शनी 'स्वच्छाग्रह' का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। प्रदर्शनी का विषय 'बापू को कार्यांजलि' था। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा, ‘गांधी जी ने हमें शांतिपूर्ण सत्याग्रह का रास्ता दिखाया। महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कैसे लोगों को अपनी आत्मशक्ति का अहसास हुआ। उन्होंने कहा था कि आजादी से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। हमें उनके उसी सपने को पूरा करना है।’ इस मौके पर पीएम ने देश की जनता से अपील की थी कि स्वच्छता मिशन को सफल बनाकर वे महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। उनके ही शब्दों में, ‘सत्याग्रह का लक्ष्य देश को आजादी दिलानी थी, वहीं स्वच्छाग्रह का लक्ष्य देश को क्लीन इंडिया में बदलने का है।’ वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन और उसके लिए महात्मा गांधी की प्रेरणा की बात कोई एक बार नहीं की है। रेडियो पर हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने वाली ‘मन की बात’ में भी वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं स्वच्छता और प्रकृति प्रेम का सबक हमें गांधी जी से सिखनी चाहिए। गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन का लक्ष्य भी यही रखा गया है कि राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती यानी 2019 तक देश को स्वच्छता के उस मुकाम पर पहुंचा दिया जाए, जिससे न सिर्फ बारत की छवि बदली, बल्कि सरजमीन पर कारगर पहल प्रेरक उदाहरण के तौर पर दिखें।

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स्वच्छ भारत अभियान

1.04 करोड़ घरों को 2.6 लाख सार्वजनिक ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत सरकार शौचालय, 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय द्वारा देश को स्वच्छता के प्रतीक के रूप में पेश उपलब्ध कराना है। सामुदायिक शौचालय के करना है। स्वच्छ भारत का सपना महात्मा गांधी निर्माण की योजना रिहायशी इलाकों में की गई है, ने बहुत पहले देखा था इस बारे में खुद उनके ही जहां पर व्यक्तिगत घरेलू शौचालय की उपलब्धता शब्द हैं, ‘स्वच्छता स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी है।’ मुश्किल है। इसी तरह सार्वजनिक शौचालय की अपने समय में वे देश की गरीबी और गंदगी से प्राधिकृत स्थानों पर जैसे बस अड्डों, रेलवे स्टेशन, अच्छी तरह से अवगत थे, इसी वजह से उन्होंने बाजार आदि जगहों पर। शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता अपने सपनों को पाने के लिए कई सारे प्रयास भी कार्यक्रम को पांच वर्षों के अंदर 2019 तक पूरा करने की योजना है। इसमें ठोस कचरा प्रबंधन की किए। उनका मानना था कि निर्मलता और लागत लगभग 7,366 करोड़ रुपए है। स्वच्छता दोनों ही स्वस्थ और इसमें 1,828 करोड़ रुपए जन शांतिपूर्ण जीवन का अनिवार्य सामान्य को जागरूक करने भाग हैं। राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के लिए है, 655 करोड़ राष्ट्रीय स्वच्छता रुपए सामुदायिक मिशन को अपने शौचालयों के लिए प्रारंभ की तिथि • खु ल े में शौच की प्रवृ ति को जड़ से हटाना तथा 4,165 करोड़ से बापू की • शौचालयों को जल प्रवाहित शौचालयों में रुपए निजी घरेलू 150वीं पुण्यतिथि परिवर्तित करना शौचालयों के लिए है। (2 अक्टूबर 2019) •खु ल े हाथों से मल निष्पादन की प्रवृ ति पर तक पूरा करने का रोकथाम ग्रामीण स्वच्छ लक्ष्य है। इसे सफल •लोगों की सोच में परिवर्तन भारत मिशन बनाने के लिए सरकार •ठोस कचरा प्रबं ध न ग्रा म ीण स्वच्छ भारत मिशन ने सभी लोगों से निवेदन एक ऐसा अभियान है, जिसमें किया कि वे अपने आसपास ग्रा म ीण भारत में स्वच्छता कार्यक्रम और दूसरी जगहों पर साल में सिर्फ 100 घंटे सफाई के लिए दें। इसको लागू करने को अमल में लाना है। ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छ के लिए बहुत सारी नीतियां और प्रक्रिया है जिसमें बनाने के लिये 1999 में भारतीय सरकार द्वारा तीन चरण हैं- योजना, कार्यान्वयन और निरंतरता। इससे पहले निर्मल भारत अभियान की स्थापना की गई थी, लेकिन अब इसका पुनर्गठन स्वच्छ शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत अभियान भारत अभियान (ग्रामीण) के रूप में किया गया है। शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत मिशन का लक्ष्य हर इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को खुले में शौच नगर में ठोस कचरा प्रबंधन सहित लगभग सभी करने की मजबूरी से रोकना है। इसके लिए सरकार ने 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए 1,34,000 करोड़ रुपए की राशि खर्च करने ग्रामीणों को खुले में शौच करने से रोकने के लिए सरकार ने की योजना बनाई है। ध्यान देने योग्य है कि सरकार कचरे को जैविक खाद और इस्तेमाल करने करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख चौंतीस नेलायक ऊर्जा में परिवर्तित करने की भी है। इसमें हजार करोड़ रुपए की राशि खर्च करने की योजना बनाई है ग्राम पंचायत, जिला परिषद और पंचायत समिति की अच्छी भागीदारी है।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) का लक्ष्य • • • • • •

निर्धारित लक्ष्य

ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों के जीवन स्तर में सुधार 2019 तक स्वच्छ भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई के लिए लोगों को प्रेरित करना जरूरी साफ-सफाई की सुविधाओं को निरंतर उपलब्ध कराने के लिए पंचायती राज संस्थान, समुदाय आदि को प्रेरित करते रहना ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस और द्रव कचरा प्रबंधन पर खासतौर से ध्यान उन्नत पर्यावरणीय साफ-सफाई व्यवस्था का विकास, जो समुदायों द्वारा प्रबंधनीय हो ग्रामीण क्षेत्रों में निरंतर साफ-सफाई और पारिस्थितिक सुरक्षा को प्रोत्साहन

गांधी अपनी समझ में गांव और गरीब के हक में इस लिहाज से भी खड़े दिखाई देते हैं कि वे हमेशा गांवों की रचनात्मक ताकत को चिन्हित करते हैं और इसे ही भविष्य के भारत की ताकत बनाना चाहते हैं ओर आ गईं। बहुगुणा ने उनके घर भागीरथी घाटी में 1977 और 1980 के मध्य अनेक महत्वपूर्ण ‘चिपको आंदोलन’ के विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। यही नहीं, एक अथक पदयात्री के रूप सुंदरलाल बहुगुणा अपनी से आधी उम्र के लोगों के जोश के साथ भारत और विदेशों में व्यापक भ्रमण कर चुके हैं। वे एक आकर्षक वक्ता भी रहे हैं। अपनी इस क्षमता के सहारे उन्होंने शहरी प्रबुद्ध वर्ग को अनियंत्रित भौतिकवाद के खतरों के प्रति सचेत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बहुगुणा औद्योगिक समाज की गंभीर आलोचना करते समय गांधी जी की ‘हिंद स्वराज’ के अनुसरण के काफी करीब दिखाई देते हैं। जैसा कि बहुगुणा के भ्रमण, दौरों एवं व्याख्यानों से भी जाहिर होता है कि बहुगुणा व्यक्तियों की चेतना को एक सारमय अपील करते हैं, उन्हें उपभोक्तावाद के सशपथ त्याग एवं सादे जीवन की ओर लौटने के लिए तर्क देते हैं। इनके मुकाबले भट्ट और उनका समूह केंद्रीकृत विकास के स्थानापन्न टिकाऊ विकास को व्यवहार रूप में लाने के लिए कार्य करने को अहमियत देता है। निस्संदेह भट्ट के कार्यों ने महात्मा गांधी के आदर्श ग्राम स्वराज्य या ग्राम निर्भरता को एक नया पारिस्थितिकीय अर्थ देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रही बात एक पर्यावरणविद के रूप में खुद गांधी के मूल्यांकन की तो उन्होंने बहुत पहले ही आधुनिक औद्योगिक समाज के पारिस्थितकीय संकट का अनुमान लगा लिया था। इसीलिए यह प्रश्न कि क्या गांधी मौलिक तौर पर पर्यावरणवादी थे, तो इसका उत्तर यही है कि इसके लिए गांधी के विचार को एकांगी या वर्गीकृत तौर पर नहीं, बल्कि समग्रता के साथ देखना होगा। इस दृष्टि से गांधी की पुस्तिका ‘हिंद स्वराज’ सबसे अहम है। दिलचस्प है कि यह पुस्तिका वास्तव में तब लिखी गई थी जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे। इसमें उन्होंने सभ्यता और विकास को लेकर अपनी अहिंसक समझ की पूरी अवधारणा को स्पष्ट किया है। उल्लेखनीय है कि 1914 में अपने भारत आगमन पर गांधी ने अपने आप को तत्काल गांवों की सामाजिक व आर्थिक स्थितियों का प्रत्यक्ष परिचय पाने में लगा दिया। भारतीय गांवों में उनकी यात्राओं के द्वारा तथा चंपारण व खेड़ा में किसानों द्वारा प्रारंभिक सत्याग्रहों के दौरान गांधी ने उपनिवेशवाद को एक आर्थिक शोषण और जातीय विभेद की व्यवस्था की तरह स्पष्ट रूप से देखा।


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पर्यावरण विशेष वैसे इसका अनुभव वह दक्षिण अफ्रीका में भी कर चुके थे। भारतीय गांवों में अपनी तल्लीनता तथा उपनिवेशवाद की इस गहरी समझ के द्वारा गांधी ने यह देखा कि औद्योगिक विकास के पश्चिमी नमूने के साथ बराबरी करना भारत के लिए असंभव होगा। इसके लिए तो भारत को अपनी परंपरा और पुरुषार्थ की जमीन को हराभरा करना होगा। ‘यंग इंडिया’ के 20 दिसंबर, 1928 को वे लिखते हैं, ‘ईश्वर न करे कि भारत भी कभी पश्चिमी देशों के ढंग का औद्योगिक देश बने। एक अकेले इतने छोटे से द्वीप (इंग्लैंड) का आर्थिक साम्राज्यवाद ही आज संसार को गुलाम बनाए हुए है। 30 करोड़ आबादी वाला हमारा समूचा राष्ट्र भी अगर इसी प्रकार के आर्थिक शोषण में जुट गया तो वह सारे संसार पर एक टिड्डी दल की भांति छाकर उसे तबाह कर देगा।’ गांधी अपनी इस पूरी समझ में गांव और गरीब के हक में इस लिहाज से भी खड़े दिखाई देते हैं कि वे हमेशा गांवों की रचनात्मक ताकत को चिन्हित करते हैं और इसे ही भविष्य के भारत की ताकत बनाना चाहते हैं। 23.06.1946 को ‘हरिजन’ में छपे एक आलेख में वे कहते हैं, ‘ग्रामीण रक्त ही वह सीमेंट है, जिससे शहरों की इमारतें बनती हैं।’ ‘हरिजन’ में ही 11.05.1935 को दर्ज अपने एक अनुभव में वे कह चुके होते हैं, ‘हम इस सुंदर पंडाल में बिजली की रोशनी की चकाचौंध में बैठे हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि हम इस रोशनी को गरीबों की कीमत पर जला रहे हैं।’ दिलचस्प है कि गांधी के लेखन या चिंतन में ‘पर्यावरण’ शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है। वैसे यह एक भाषागत मुद्दा है न कि वैचारिक। हिंदी में ‘पर्यावरण’ शब्द वैसे भी ‘एनवायरेंटमेन्ट’ शब्द के हिंदी अनुवाद से ही ज्यादा प्रचलन में आया है। वरिष्ठ पर्यावरणविद अनुपम मिश्र भी कहते थे कि अगर हमें जीवन और प्रकृति के बीच संबंधों को लेकर उनकी देशज जड़ों तक पहुंचना है तो हमें देशज भाषा की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने शोध करके बताया था कि जिस राजस्थान में बादल का बरसना तो दूर, उसकी छाया भी वहां के लोगों नसीब नहीं होती, वहां बादल और मेघ के लिए एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों स्थानीय शब्द हैं। तारीफ ये कि इसमें एक भी शब्द दूसरे शब्द के पर्यावाची नहीं, बल्कि सभी अलग-अलग लक्ष्यार्थों को व्यक्त करते हैं। साफ है कि पर्यावरण शब्द का प्रचलन और उसको लेकर चिंता भले नई हो, पर पर्यावरण के साथ हमारे भाषिक-सांस्कृतिक सरोकार और संस्कार बहुत पहले से जुड़े रहे हैं। इन सरोकारों-संस्कारों के कारण ही कई लोग खुद को पर्यावरण कार्यकर्ता या प्रेमी कहलाने के बजाय प्रकृतिवादी अथवा प्रकृति प्रेमी कहलाना पसंद करते हैं। दरअसल, सभ्यता विकास के जिन आरंभिक बोधों के साथ मनुष्य आगे बढ़ा, उनमें हवा, पानी, पर्वत, नदी, वन, वनस्पति, पशु-पक्षी आदि के साथ एक समन्वयवादी संबंध शामिल रहा। उषा की प्रार्थना, सूर्य नमस्कार, नदियों की पूजा-आरती, पर्वतों की वंदना, जड़-चेतन सबमें ब्रह्म के होने की परिकल्पना, प्रकृति के प्रति करुणा का भाव आदि ने एक तरह से भारतीय जीवनशैली को गढ़ा है। भारतीय चिंतन की यही प्रवृति हमें गांधी

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करते हुए उसमें वृक्ष-पूजा को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। इस संबंध में ‘यंग इडिया’ के 26 सितंबर 1929 के अंक में उनके छपे लेख का यह अंश महत्वपूर्ण है- ‘ वृक्षपूजा में कोई मौलिक बुराई या हानि दिखाई देने के बजाय मुझे तो इसमें एक गहरी भावना और काव्यमय सौंदर्य ही दिखाई देता है। वह समस्त वनस्पति-जगत के लिए सच्चे पूजाभाव का प्रतीक है। वनस्पति जगत तो सुंदर रूपों और आकृतियों का भंडार है, उनके द्वारा वह मानो असंख्य जिह्वाओं से ईश्वर की महानता और गौरव की घोषणा करता है। वनस्पति के बिना इस पृथ्वी पर जीवधारी एक क्षण के लिए भी नहीं रह सकते। इसीलिए ऐसे देश में जहां खासतौर पर पेड़ों की कमी है, वृक्ष-पूजा का एक गहरा आर्थिक महत्व हो जाता है।’

‘हिंद स्वराज’ और मशीनीकरण

पर्यावरण शब्द का प्रचलन और उसको लेकर चिंता भले नई हो, पर पर्यावरण के साथ हमारे भाषिक-सांस्कृतिक सरोकार और संस्कार बहुत पहले से जुड़े रहे हैं के चिंतन में भी दिखाई पड़ती है। गांधी पर्यावरण शब्द का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उनके समय में यह शब्द प्रचलित नहीं था। पर पर्यावरण को लेकर आज जो भी आशय प्रकट किए जाते हैं या चिंता जताई जा रही है, गांधी उससे पूरी तरह जुड़े दिखाई पड़ते हैं। प्रेम और करुणा का भाव उन्हें प्रकृति के साथ रचनात्मक साहचर्य के लिए तो प्रेरित करता ही रहा, संत विनोबा सरीखे कुछ विद्वानों की नजर में ये भाव उन्होंने प्रकृति से ही ग्रहण भी किए। प्रकृति प्रदत्त नियमों से उनका गहरा लगाव व्यवहार में तो सामने आया ही है, इसे उन्होंने शब्दों में भी व्यक्त किया है। 20 अक्टूबर 1927 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में छपे एक लेख में हिंदू धर्म की विशेषता बताते हुए वे कहते हैं- ‘हिंदू धर्म न केवल मनुष्य मात्र की, बल्कि प्राणिमात्र की एकता में विश्वास करता है। मेरी राय में गाय की पूजा करके उसने दया धर्म के विकास में अद्भुत सहायता की

है। यह प्राणिमात्र की एकता में विश्वास रखने का व्यावहारिक प्रयोग है।’ जाहिर है कि जो व्यक्ति प्राणिमात्र की एकता में विश्वास करेगा, वह चर-अचर, पशु-पक्षी, नदीपर्वत-वन सबके सहअस्तित्व में भी जरूर विश्वास करेगा और उन सब के संरक्षण के लिए सदैव तत्पर रहेगा। आज पर्यावरण बचाने के नाम पर बाघ, शेर, हाथी आदि जानवरों, नदियों, पक्षियों, वनों आदि को बचाने का जो विश्वव्यापी स्वर उठ रहा है, गांधी की दृष्टि में इसका सबसे अच्छा समाधान सभी प्राणियों की एकता और सहअस्तित्व को जीवन संस्कार बनाना है।

वृक्षपूजा और महात्मा

आज पर्यावरण-रक्षा के नाम पर पौधारोपण का जो अभियान चलाया जा रहा है, उसके महत्त्व से गांधी भी अवगत थे और अपने धर्म का दायरा विस्तृत

गांधी जहां एक तरफ आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखने पर बल देते और इस कार्य को खुद भी करते थे, तो वहीं दूसरी तरफ वे अहिंसा के अंतर्गत समस्त प्राणियों की रक्षा पर बल देते हुए ऐसी उत्पादन-पद्धति को वांछनीय समझते थे जो प्रकृति के दोहन-शोषण से मुक्त रह कर मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इसी सोच की भूमि पर खड़े होकर वे आजीवन अंध मशीनीकरण का विरोध करते रहे। वे इसे मनुष्य को उसके शारीरिक श्रम से वंचित करने का कारण मानते थे। जो लोग गांधी की अहिंसा का दायरा सिर्फ मनुष्य द्वारा मनुष्य के खिलाफ हिंसा का विरोध या शाकाहार भर समझते हैं, वे उनकी अहिंसा को अधूरे तरीके से समझते हैं। वस्तुत: जब तक नाना प्राकृतिक संसाधनों-वनस्पतियों, नदियों, पर्वतों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को आवास सुलभ कराने वाले स्थानों की कीमत पर चलने वाली औद्योगिक पद्धति को बदल कर उसे मानव श्रम, प्रकृति की संगति पर आधारित नहीं करते, तब तक अहिंसा अपने संपूर्ण संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं हो सकती। मशीनीकरण को लेकर गांधी के बीज विचार ‘हिंद स्वराज’ में प्रकट हुए हैं। 1909 में प्रकाशित यह पुस्तिका गांधी विचार की कुंजी मानी जाती है। बाद में खुद गांधी ने भी माना था कि वे ‘हिंद स्वराज’ में प्रकट विचार पर आजीवन कायम रहेंगे और इसमें एक शब्द तक के हेर-फेर के लिए वे तैयार नहीं हैं। 1909 में आई इस पुस्तिका को प्रकाशित हुए सौ साल से ज्यादा हो गए हैं, पर आज भी गांधी विचार की यह टेक अपनी प्रासंगिक व्याख्याओं के साथ लगातार चर्चा में बनी हुई है। इसमें मशीनीकरण की अंधी दौड़ को लेकर एक जगह वे दो टूक कहते हैं, ‘ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना आता नहीं था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे। उन्होंने सोचसमझ कर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिए। हाथ-पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तंदुरुस्ती है।’ वस्तुत: गांधी की दृष्टि में श्रम आधारित उद्योगशिल्प ही वह चीज है, जिसकी बदौलत मनुष्य भोजन, वस्त्र, आवास जैसी आवश्यकताओं के


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है कि गांधी स्वराज की प्राप्ति के साथ जिस तर्ज पर अपने सपनों के भारत को देख रहे थे, उसमें किसान महज हरवाहा-चरवाहा या कुछ मुट्ठी अनाज के लिए चाकरी करने वाले नहीं थे, बल्कि देश के स्वावलंबन का जुआ अपने कंधों पर उठाने वाले पुरुषार्थी अहिंसक सेनानी थे। गांधीवादी अर्थ दृष्टि और कृषि-ग्रामोद्योग की उनकी दरकार को तार्किक आधार देने वाले प्रसिद्ध विद्वान डॉ. जेसी कुमारप्पा ने मशीनीकरण के जोर पर बढ़े शोषण की जगह सहयोग और उपभोग की जगह जरूरी आवश्यकता को मनुष्य के विकास और कल्याण की सबसे बड़ी कसौटी माना। सहयोग और आवश्यकता की इस कसौटी आज ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़े ग्लोबल वार्मिंग के संकट से लेकर जल और से स्वावलंबी आर्थिक स्थायित्व को तो पाया ही जा सकता है, वायु प्रदूषण के तमाम खतरों के बीच प्रकृति, प्रेम और करुणा का गांधी प्राकृतिक असंतुलन जैसे खतरे से का समन्वयवादी पक्ष एकमात्र समाधान की तरह दिखता है भी बचा जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि विकास को होड़ लिहाज से स्वावलंबी रहता आया था और अन्य निशानी है और वह महापाप है। मशीन की यह की जगह सहयोग के रूप में देखने प्राणी भी सुरक्षित रहते आए थे। इस जीवन संस्कार हवा अगर ज्यादा चली, तो हिंदुस्तान की बुरी दशा वाली गांधीवादी दृष्टि विकास और जीवन मूल्यों को की ही यह देन रही कि पेयजल संकट, ग्लोबल होगी।’ अलगाकर नहीं, बल्कि साथ-साथ देखती है। वार्मिंग, पशु-पक्षियों और पेड़ों की कई प्रजातियों कहना नहीं होगा कि गांधी ने औद्योगीकरण की कुमारप्पा अपनी किताब 'द इकोनमी ऑफ के समाप्त होने के खतरे जैसे अनुभव लंबे दौर अविवेकी राह पर चलते हुए मनुष्य और प्रकृति परमानेंस’ के पहले अध्याय में ही इस मिथ को में कभी हमारे सामने नहीं आए। ये संकट तो दोनों के धीरे-धीरे मिटते जाने का खतरा आज से तोड़ते हैं कि अर्थ और विकास कभी स्थायी हो ही उस आधुनिकता के साथ सामने आए जिसकी एक सदी पहले भांप लिया था। लिहाजा, आज नहीं सकते। औद्योगिक क्रांति से लेकर उदारीकरण शुरुआत यूरोपीय औद्योगिक क्रांति से मानी जाती ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़े ग्लोबल वार्मिंग के तक का अब तक हमारा अनुभव यही सिखाता रहा है है। औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन के जिस अंबार संकट से लेकर जल और वायु प्रदूषण के तमाम कि विकास की दरकार और उसके मानदंड बदलते और उसके असीमित अनुभव के लिए हमें प्रेरित खतरों के बीच प्रकृति, प्रेम और करुणा का गांधी रहते हैं। इसी लिहाज से सरकार और समाज भी किया, उसकी पूरी बुनियाद मजदूरों के शोषण पर का समन्वयवादी पक्ष एकमात्र समाधान की तरह अर्थ और विकास को लेकर अपनी प्राथमकिताओं टिकी थी। दिलचस्प है कि ज्यादा उत्पादन और दिखता है। अच्छी बात यह होगी कि यह समाधान में हेरफेर भी करते रहते हैं। पर इस बदलाव का असीमित उपभोग को जहां आगे चलकर विकास चिंतन और चर्चा से आगे हमारे जीवन में भी स्थायी अंतिम लक्ष्य क्या है, इसको लेकर कोई गंभीर सोच का पैमाना माना गया, वहीं प्राकृतिक संपदाओं के जगह बनाए। कभी सामने नहीं उभरी। जो सोच हर बार सतह पर निर्मम दोहन को लेकर सबने एक तरफ से आंखें दिखी, वह यही कि बचेगा वही, टिकेगा वही, जो मूंदनी शुरू कर दी। कार्ल मार्क्स ने इस विकेंद्रित अर्थव्यवस्था ताकतवर होगा। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में इसके उत्पादन-उपभोग की इस होड़ गांधी जिस ग्राम स्वराज की लिए जो सैद्धांतिक जुमला इस्तेमाल होता है, वह में मजदूरों के शोषण को तो बात करते हैं उसकी रीढ़ है- ‘सर्ववाइवल ऑफ द फिटेस्ट’। इस दृष्टि में देखा, लेकिन मनुष्येतर है कृषि और ग्रामोद्योग। मानवीय करुणा और अस्मिता के लिए कितना प्राकृतिक संसाधनों इसे ही विकेंद्रित स्थान है, समझा जा सकता है। यह समृद्धि और के दोहन को, अर्थव्यवस्था का विकास की हिंसक दृष्टि है। एक ऐसी दृष्टि जो बूट मशीनीकरण की नाम दिया गया। पहनकर दूसरों को रौंदते हुए सबसे आगे निकल आंधी से उजड़ते गांधी ने कृषि जाने की सनक से हमें लैस करती है। यूरोप को वे अर्थव्यवस्था में इस हिंसक विकास को लेकर कोई एतराज नहीं देख सके। भारत के चिरायु किसी स्तर पर कभी जाहिर नहीं हुआ, ऐसा भी इसे अगर किसी स्वावलंबन के नहीं है। खासतौर पर शीतयुद्ध के खात्मे के साथ ने देखा तो वे बीज देखे थे। भूमंडलीकरण का ग्लोबल जोर शुरू होने पर थे गांधी। उन्होंने ऐसा भला होता अमेरिका से लेकर भारत तक कई अराजनीतिक ‘हिंद स्वराज’ भी क्यों नहीं, जमात, चिंतक और जागरूक लोगों का समूह इस में साफ शब्दों में क्योंकि वे दक्षिण तार्किक दरकार को सरकारों की नीति पर हावी कहा, ‘मशीनें यूरोप को अफ्रीका से भारत कराने के संघर्ष में जुटा कि विकास की समझ और उजाड़ने लगी हैं और वहां आने पर सबसे पहले गांवों नीति मानव अस्मिता और प्रकृति के लिहाज से की हवा अब हिंदुस्तान में चल की तरफ गए, किसानों के बीच खड़े अकल्याणकारी न हो। आज अर्थ और विकास की हुए। चंपारण सत्याग्रह इस बात की मिसाल हर उपलब्धि को जिस समावेशी दरकार पर खरा रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य

पर्यावरण विशेष उतरने की बात हर तरफ हो रही है, उसके पीछे का तर्क गांधी की समन्वयवादी अवधारणा की ही देन है। वैसे यहां यह भी समझ लेना जरूरी है कि यह देन हमें गांधी के करीब तो जरूर ले जाती है, पर उनसे सीधे जुड़ने से परहेज भी बरतती है। यह परहेज कोई चालाकी है, ऐसा भी नहीं है।

उच्च कसौटियां

गांधी और उनके मूल्यों को लेकर नई व सामयिक व्याख्या रचने वाले सुधीर चंद्र इस परहेज को अपनी तरह से एक 'असंभव संभावना’ के तौर पर देखते हैं। यानी सत्य, प्रेम और करुणा के दीप सबसे पहले मन में जलाने का आमंत्रण देने वाले गांधी के पास आधे-अधूरे मन से जाया भी नहीं जा सकता। क्योंकि फिर वो सारी कसौटियां एक साथ हमें सवालों से बेध डालेंगी, जो गांधी की नजरों में मानवीय अस्मिता की सबसे उदार और उच्च कसौटियां हैं। बात पर्यावरण संकट को लेकर हो रही है तो गांधी के विकेंद्रीकरण की चर्चा भी जरूरी है। भारतीय ग्रामीण परंपरा और संस्कृति में सहअस्तित्व और स्वावलंबन का साझा स्वाभाविक तौर पर मौजूद है। जो ग्रामीण जीवन महज कुछ कोस की दूरी पर अपनी बोली और पानी के इस्तेमाल तक के सलूक में जरूरी बदलाव को सदियों से बरतता रहा है, उसे यह अक्ल भी रही है कि उसकी जरूरत और पुरुषार्थ को एक जमीन पर खड़ा होना चाहिए। गैरजरूरी लालच से परहेज और मितव्ययिता ग्रामीण स्वभाव का हिस्सा है। पर बदकिस्मती देखिए कि इस स्वभाव पर रीझने की जगह इसे विकास की मुख्यधारा से दूरी के असर के रूप में देखा गया। नतीजतन एक परावलंबी विकास की होड़ उन गांवों तक पहुंचा दी गई, जो स्वावलंबन को अपनी जीवन जीने की कला मानते थे।

प्रकृति, संस्कृति और पुरुषार्थ

गांधी ‘हिंद स्वराज’ में बड़ी लागत, बल्क प्रोडक्शन, मशीनीकरण इन सब का विरोध एक स्वर में करते हैं। उनकी नजर में प्रकृति, संस्कृति और पुरुषार्थ का साझा बनाए रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे विकास और स्वावलंबन के अस्थायी या गैर टिकाऊ होने का संकट तो नियंत्रित होता ही है, उस विकासवादी जोर से भी मोहभंग होता है जो हमें एक एेसे संकट की तरफ लगातार ले जा रहा है, जहां धूप-पानी-धरती सब हमारे लिए प्रतिकूल होते जा रहे हैं। आखिर में गांधी की पर्यावरणवादी दृष्टि की व्यापकता को समेकित तौर पर समझने के लिए प्रसिद्ध लेखक और ‘हिंद स्वराज’ की पुनर्व्याख्या का जोखिम उठाने वाले वीरेंद्र कुमार बरनवाल का यह कथन गौरतलब है- ‘गांधी ने अपनी आधी सदी से अधिक चिंतन के दौरान यह सिद्ध करने का अनवरत प्रयास किया कि लगातार धरती के पर्यावरण के विनाश की कीमत चुका कर अंधाधुंध औद्योगीकरण आर्थिक दृष्टि से भी निरापद नहीं है। गांधी हमें यह देखने की दृष्टि देते हैं कि हमारे जल-जंगल-जमीन के लगातार भयावह रूप से छीजने से हो रही भीषण हानि के सहस्रांश की भी भरपाई की क्षमता हमारे सुरसावदन बढ़ते उद्योगों में नहीं है। इसका आर्थिक मूल्य अर्थशास्त्र की बारीकियों को बिना जाने भी समझा जा सकता है। गांधी-चिंतन का यह प्रबल उत्तर आधुनिक पक्ष है।’


05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

पर्यावरण

बड़े काम के हैं पेड़

05

वृक्ष संरक्षण

इस दौर की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि हम पेड़ों का दर्द समझें, उन्हें टूटने न दें, यही नहीं, जहां तक संभव हो अपने आसपास और परिवेश को हराभरा करने के लिए नए पौधे लगाएं

एक नजर

दुनिया से प्रतिवर्ष 1.3 करोड़ हेक्टेयर जंगल पूर्ण रूप से मर रहे हैं

पेड़ों के नदारद होने से प्रतिवर्ष 101 गीगा टन कार्बन का ह्रास हो रहा है ध्वनि प्रदूषण नियंत्रित करने में भी पेड़ों की अहम भूमिका

एसएसबी ब्यूरो

घन वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है, क्योंकि वन ही वायु के शोधक होते हैं। पेड़ ही तो है जो हमें जीवन देते हैं। फिर क्यों हम इन मूक परमार्थी पेड़ों को काट डालते हैं और विरोध भी नहीं करते। आखिर कब तक हम लोग अपने विनाश का कारण स्वयं बनते रहेंगे? कृषि भूमि विस्तार, शहरीकरण तथा औद्योगीकरण के कारण वनों का अतिशय क्षरण हो रहा है। साथ ही वन्य जीवों पर भी संकट मंडरा रहा है। वनों की अंधाधुंध कटाई से जंगली जानवरों के आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे वह मानव के रिहायशी इलाकों में आए दिन आ जाते हैं। जाहिर है कि पेड़ काटने से प्रदूषण बढ़ा है। धीरे-धीरे जंगलों का सफाया तो हो ही रहा है। बस्तियों के पेड़ भी नदारद हो रहे हैं और हम पेड़ की छाया में खड़े होने का सुख खो रहे हैं।

आंकड़े डराते हैं

गौरतलब है कि इमारती लकड़ी और इंधन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 3.1 अरब घन मीटर लकड़ी जंगलों से प्राप्त की जाती है। इसी तरह वैश्विक परिदृश्य में देखें तो दुनिया से प्रतिवर्ष 1.3 करोड़ हेक्टेयर जंगल पूर्ण रूप से मर रहे हैं और इसके साथ हो रहा हैं आरण्यक सभ्यता का समूल अंत। जंगलों की बदहाली से मौसम भी बदल रहा है। ऐसा इसीलिए क्योंकि पेड़ कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित कर कार्बन को जमा कर लेते हैं। जंगल कार्बन के संग्रहकर्ता हैं। आकलन के अनुसार संसार के सारे जंगलों मे जैव भार के रूप में 283 गीगाटन कार्बन

संग्रहित है। जंगल में जीवंत पेड़-पौधों के अलावा भी कार्बन जैविकी कचरे के रूप में रहता है। अत: कार्बन का अनुपात वायुमंडल की तुलना में उससे भी अधिक रहता है। जंगलों से पेड़ों के नदारद होने में प्रतिवर्ष 101 गीगाटन कार्बन का ह्रास हो रहा है और यही चिंता कारण है। साफ है कि हमें पेड़ लगाने के प्रति संजीदा होना ही पड़ेगा।

कई पेड़ विशिष्ट

पेड़-पौधे हमारे अच्छे मित्र होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में देवदार के सघन वन थे, तराई के क्षेत्रों में सागौन वन थे, पठारी इलाकों में साल वन तथा मैदानी इलाकों में शीशम के पेड़ बहुतायत में थे। अनेक पेड़ों को विशिष्ट बतलाया गया है, जिनमें एक पीपल भी है जो ऑक्सीजन अधिक मात्रा में अमुक्त करता है। जब पीपल की स्वर्णिम पत्तियां हवा के झोंके से हिलती हैं, तो प्राणरक्षक वायु प्रवाहित होती है। पीपल की पल्लव छतरी बड़ी होती है, जो तेजी से कार्बन डाई आक्साइड अवशोषित करती है। जड़ें जमीन में गहरे जाकर जल पहुंचाती हैं। पीपल के अलावा नीम, बरगद, आम , पाखड़, गूलर, जामुन, महुआ, इमली, ढाक, साल, सागौन, कचनार, गुलमोहर और अमलतास आदि के पेड़ पर्यावरण के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं। दरअसल, हर वृक्ष की अनेक तरह से उपयोगिता होती है। कह सकते

हैं कि वह एक अचल योगी होता है। पीपल, नीम, पाखड़ और देसी बबूल के पेड़ मिट्टी के क्षरण को रोकते हैं तथा जमीन की उर्वरा शक्ति के वर्धक होते हैं और तुलसी, अश्वगंधा, हरड़, घृतकुमारी की औषधीय महत्ता है। तुलसी तो इसीलिए हर घर आंगन में विराजती है।

प्रदूषण पर रोक

बहुत से ऐसे पेड़ हैं, जो प्रदूषण रोक-थाम में महती भूमिका निभाते हैं। ऐसे पेड़ों में नीम अमलतास, शीशम, बांझ (ओक), पीपल, मौलश्री, आम, जामुन, अर्जुन, सागवान और इमली आते हैं। बबूल, गुलमोहर, अर्जुन, सिरस, कदंब और अमलतास के पेड़ बंजर नम तथा कूड़े-करकट वाली जमीन को भी उपयोगी बनाते हैं। दिलचस्प है कि ध्वनि प्रदूषण रोकने में भी पेड़ों की भूमिका है। अशोक, नीम, बरगद, कचनार, पीपल एवं सेमल ध्वनि प्रदूषण कम करने वाले पेड़ हैं । गैसीय प्रदूषण को अवशोषित करने वाले पेड़ों में बेल, बोगनविलिया, शीशम, पीपल, महुआ, इमली, तथा नीम का नाम है। ऊसर, क्षारीय, लवणीय तथा भारी धात्विक प्रदूषण से युक्त बंजर भूमि पर नींबू, घास, पामरोज, वेटीवर, केमोमिल, कालमेघ, खस, सेट्रोनिला तथा जावा घास लगाने की सिफारिश विशेषज्ञ करते हैं। जो पेड़ हमारे परिवेश के जहर को पीकर हमें अभयदान

पीपल, नीम, पाखड़ और देसी बबूल के पेड़ मिट्टी के क्षरण को रोकते हैं तथा जमीन की उर्वरा शक्ति के वर्धक होते हैं और तुलसी, अश्वगंधा, हरड़, घृतकुमारी की औषधीय महत्ता है

देते हैं, उन पर कुल्हाड़ी चलाते हुए अगर हम नहीं हिचकिचाते हैं, तो यह अफसोस की बात है। वृक्षों से हमें बहुत कुछ व्यक्त-अव्यक्त मिलता है। पेड़ पर खिला हर फूल प्यार बांटता है। वृक्षों से हमें नीति-पालन और नैसर्गिक अनुकरण के साथ नैतिक शिक्षा भी मिलती है। हमारे निराशा भरे जीवन में आशा और विश्वास तथा धैर्य की शिक्षा नितांत जरूरी है। यह शिक्षा हमें वृक्षों से सहज ही मिलती है। मनुष्य जब यह देखता है कि ठूंठ में तब्दील पेड़ या शाखा विहीन पेड़ भी कुछ दिनों बाद समय अनुकूल होने पर फिर हरा भरा हो उठता है - तो उसकी समस्त निराशा शांत हो जाती है, वह नए उत्साह से भर कर साहस बटोर कर आगे बढ़ता है। उसकी आशाएं भी हरी-भरी हो उठती है। इसे ही भारतीय मनीषा में ‘हरित विश्वास’ कहा गया है।

दिलचस्प प्रयोग

इधर पेड़ों को लेकर कुछ दिलचस्प प्रयोग भी चल रहे हैं। इसमें सबसे अहम है अब विशेषज्ञों के प्रयास से बूढ़े पेड़ों को जवान करने की कवायद। इस विधि से तीस साल पुराने वृक्ष को तीन साल का बना दिया जा सकता है। इसमें पेड़ से सभी पुरानी और रोगग्रस्त टहनियों को काटकर अलग कर दिया जाता है। इन हिस्सों से जो नए कल्ले उगते हैं, उनका ट्रीटमेंट करके एक स्वस्थ पौधा तैयार होता है। यह सराहनीय कोशिश है और सरकार भी इस विधि को आजमाने में पीछे नहीं है।

हमारे दौर की दरकार

हम सबको पेड़ और उसकी अहमियत के बारे में संकल्प औऱ संवेदना से एक साथ भरना होगा। जब कोई पेड़ टूटे तो मानना चाहिए कि किसी ने आपकी बाजू को उखाड़ फेंका हो। ऐसा इसीलिए क्योंकि हमारे दौर की सबसे बड़ी दरकार यही है कि हम पेड़ों का दर्द समझें, उन्हें टूटने न दें। यही नहीं, जहां तक संभव हो अपने आसपास और परिवेश को हराभरा करने के लिए नए पौधे लगाएं।


06 जेंडर

पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

स्वच्छता का तकाजा उन खास दिनों में महिला

स्वास्थ्य

देश में महिलाओं की कुल जनसंख्या का तकरीबन 75 फीसदी आज भी गांवों में है और उनमें से सिर्फ 2 प्रतिशत ही सेनिटेरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं

सि

एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

तकरीबन सात साल पहले एसी निल्सन ने एक अहम सर्वे किया था। इसके मुताबिक भारत में लगभग 35 करोड़ महिलाएं सक्रिय माहवारी के दौर में हैं, लेकिन सेनिटरी नैपकिन का प्रयोग मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं ही करती हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में सेनिटरी नैपकिन के प्रयोग दर की हालत और भी बदतर है। महिलाओं की कुल जनसंख्या का तकरीबन 75 फीसदी आज भी गांवों में है और उनमें से सिर्फ 2 प्रतिशत ही सेनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि आज भी ज्यादातर महिलाओं तक सेनिटेरी नैपकिन की पहुंच नहीं है। सरकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया और जागरुकता की कमी इस समस्या की मुख्य वजहें हैं। हमारा सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह बना हुआ है कि आज भी महिलाएं अपने व्यक्तिगत मसलों पर एक महिला से ही बात करने में सहज महसूस करती हैं। ऐसे में आशा और आंगनबाड़ी महिला कार्यकर्ताओं की भूमिका, जागरुकता अभियान में बेहद अहम साबित हो सकती है। वो आसानी से ग्रामीण महिलाओं तक अपनी पहुंच स्थापित करके उन्हें मेंस्ट्रुअल हाइजीन से जुड़ी जरूरी जानकारी दे सकती हैं। साथ ही सरकार सेनिटरी नैपकिन की पहुंच बढ़ाने के लिए ऐसी व्यवस्था कर सकती है कि प्रत्येक गांव में आशा,आंगनबाड़ी तथा सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पैड्स बेचे जा सकें ताकि महिलाओं को खरीदने में आसानी हो। 2016 की डासरा रिपोर्ट के अनुसार भारत में 20 करोड़ लड़कियां मेंस्ट्रुअल हाइजीन और शरीर पर पड़ने वाले इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हैं। रिपोर्ट बताती है कि आज भी 88 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के दौरान पुराने तरीकों जैसे कपड़े, बालू, राख, लकड़ियों की छाल और सूखी पत्तियों का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। इनके प्रयोग से शरीर में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है और महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। माहवारी के दिनों में महिलाओं को सबसे ज्यादा जरूरत साफ पानी और शौचालय की होती है। क्योंकि पैड्स को बदलने के लिए उन्हें एक ऐसे स्थान की जरूरत होती है जहां उनकी निजता भंग न हो। 2011 की जनगणना के मुताबिक गांवों में स्वच्छता की व्यवस्था महिलाओं के अनुरूप नहीं है। आज भी ज्यादातर ग्रामीण घरों में शौचालय और साफ पानी की व्यवस्था नहीं है। देश के 66.3 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो स्थिति और खराब है। झारखंड के 91.7 प्रतिशत ग्रामीणों के पास शौचालय नहीं है।

20 करोड़ लड़कियां माहवारी के दौरान स्वच्छता के महत्व से अनभिज्ञ

88 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के दौरान असुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल करती हैं खासतौर पर गांवों में स्वच्छता की व्यवस्था महिलाओं के अनुरूप नहीं

कई गैर सरकारी संगठन ग्रामीण इलाकों में आनंदी पैड्स और मुक्ति पैड्स जैसे अभियान चलाकर लोगों को पैड्स के बारे में जागरूक कर रहे हैं और इसका प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं कई गैर सरकारी संगठन ग्रामीण इलाकों में आनंदी पैड्स और मुक्ति पैड्स जैसे अभियान चलाकर महिलाओं को पैड्स के बारे में जागरूक कर रहे हैं और इसका प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि गैर सरकारी संगठन और स्वतंत्र पहल के मुकाबले सरकार के पास पैसे, संसाधन और मशीनरी की अधिकता होती है। व्यापक स्तर पर इसे लागू करने के लिए एक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ इस दिशा में गंभीर होकर काम करने की आवश्यकता है।

कुछ जरूरी सबक

आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं माहवारी (पीरियड्स) के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इसके दो कारण हैं, पहला से​िनटरी नैपकिन खरीदने की असमर्थता, दूसरा जानकारी की कमी। बिहार सरकार की एक योजना ‘महिला सामख्या’ की राज्य कार्यक्रम निदेशक रह चुकीं कीर्ति का कहना है कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में जब किशोरी लड़कियों और महिलाओं को सेनिटरी नैप​िकन दिखाया गया तो उनका जवाब था कि यह तो डस्टर है। उन्होंने उसके पहले कभी सेनिटरी नैप​िकन देखा तक नहीं था। कीर्ति का कहना है कि महिलाओं में पीरियड्स को लेकर जागरुकता की भारी कमी है, जिसका खामियाजा उन्हें इंफेक्शन के रूप में सहना पड़ता

है। लेकिन, इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि कई इलाकों में महिलाएं पीरियड्स के दौरान कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं करती। कीर्ति बताती हैं कि शुरुआत में हमने देखा कि औरतें बिलकुल भी जागरूक नहीं हैं। कई जगहों पर तो कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। माहवारी के दौरान महिलाएं घर से निकलती तक नहीं, पहने हुए कपड़े में जब खून लग जाता है तो वे उसे धो देती हैं और वापस वही कपड़ा पहन लेती हैं। कुछ जगहों में महिलाएं साड़ी के प्लेट को दोनों जांघों के बीच में दबा लेती हैं। सेनिटरी नैपकिन की जानकारी की कमी और लोगों तक उसकी पहुंच नहीं होने की वजह से कई ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में लड़कियों की हाजिरी में भी कमी देखी जाती है। पीरियड्स में लड़कियां स्कूल ही जाना छोड़ देती हैं। आज कई निजी संस्थाएं इस ओर जागरुकता के लिए काम कर रही हैं। यहां तक की कुछ राज्य सरकारें भी इस दिशा में काम करती हुई दिख रही हैं। बिहार सरकार की ही बात करें तो महिलाओं के लिए चलाए गए पूर्व प्रोजेक्ट ‘महिला सामख्या’ के तहत महिलाओं को सेनिटरी नैपकिन बनाने की ट्रेनिंग दी गई। इससे महिलाओं को दो फायदा हुआ। पहला महिलाओं को रोजगार मिला साथ ही महिलाएं कपड़े की जगह सेनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करने लगीं। इन दिनों छत्तीसगढ़ में ‘शुचिता योजना’ के

तहत किशोरी लड़कियों को वेंडिंग मशीन से सेनिटरी नैपकिन उपलब्ध करवाया जा रहा। मशीन में पैसे डालते ही एक नैपकिन बाहर आ जाता है। यहां इस्तेमाल किए गए नैपकिन को बर्न करने की भी सुविधा है। इस मशीन के लगने से वहां के स्कूलों में लड़कियों की अटेंडेंस में भी वृद्धि हुई है। दरअसल, माहवारी के दौरान साफ सफाई पर ध्यान देना बहुत जरूरी होता है। डॉक्टर्स की मानें तो हमें हर 6 से 7 घंटे में पैड या कपड़े बदलने चाहिए, वरना इंफेक्शन का खतरा बना रहता है। महिला हो या पुरुष उनके प्राइवेट पार्ट्स की सफाई बहुत जरूरी है। महिलाओं में प्राइवेट पार्ट्स में इन्फेक्शन से कई बीमारियों का खतरा बना रहता है। बार्थोलिन सिस्ट, यूरिन इन्फेक्शन जैसी कई भयावह बीमारियां झेलनी पड़ सकती हैं। बात जब पीरियड्स के दिनों की हो तो इन्फेक्शन का खतरा और भी बढ़ जाता है। ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी इलाकों में भी देखा जाता है कि महिलाएं एक ही कपड़े का कई बार इस्तेमाल करती हैं। वो यूज कपड़ों को धोकर पुनः इस्तेमाल करती हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि उन कपड़ों को सही ढंग से सुखाया नहीं जाता। जाहिर सी बात है, जिस समाज में महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स को खुले में सुखाने की इजाजत ना हो वहां पीरियड्स के कपड़ों को खुले में सुखाना तो एक बड़ा अपराध ही माना जाएगा। धूप ना लगने पर कपड़े के कीटाणु उसमें ही रह जाते हैं। यहां तक कि उन कपड़ों को धोने तक के लिए भी प्राइवेसी नहीं मिलती। कई बार तो महिलाएं गीले कपड़ों का ही इस्तेमाल कर लेती हैं। यौन स्वास्थ्य पर काम करते समय गुड़गांव के मुल्लाहेड़ा गांव की कुछ औरतों से बात करने पर पता चला कि उनके पास पीरियड्स के कपड़े धूप में सुखाने का कोई विकल्प ही नहीं है। उन औरतों का कहना था कि हम चाह कर भी पीरियड्स के कपड़ों को धूप में सुखा नहीं सकते और पैड खरीदने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं। पीरियड्स पर बात करना और इस दिशा में जागरुकता किस कदर जरूरी है इस बात का अंदाजा शायद इन बातों से लगाया जा सकता है।


पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

जेंडर

पर्यावरण सुरक्षा की आधी दुनिया महिला पर्यावरण

ता

07

संपूर्ण पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने के प्रति महिलाएं सदैव से ही अग्रणी रही हैं

एसएसबी ब्यूरो

रीखी तौर पर यह बात कई बार रेखांकित हो चुकी है कि भारतीय महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं। चाहे स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी की बात हो, कला का क्षेत्र हो, साहित्य का क्षेत्र हो, समाज सेवा का क्षेत्र हो अथवा साहसिक कारनामों का क्षेत्र हो। भारतीय महिलाएं,पुरुषों से किसी लिहाज से कम नहीं हैं। ऐसे में भला पर्यावरण संरक्षण में वे पीछे क्यों रहें। सर्वप्रथम हम अपनी सामाजिक प्रथाओं और रीतिरिवाजों को देखें तो पता चलता है कि प्राचीन काल से ही महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज भी महिलाओं द्वारा व्रत-त्योहार के अवसर पर या दैनिक पूजाअर्चना में अनेक वृक्षों यथा-पीपल, तुलसी, आंवला, अशोक, बेल, शमी, नीम, आम आदि वृक्षों तथा अनेक फूलों को शामिल करती हैं। यही नहीं, उनकी नजर में विभिन्न पशुओं यथा गाय, बैल, चूहा, घोड़ा, सांप, बंदर, उल्लू आदि भी अहम हैं, क्योंकि विभिन्न पर्व-त्योहारों में महिलाएं इन्हें भी पूजती हैं। जल स्रोतों के प्रति भी संरक्षण की भावना महिलाओं में प्राचीन काल से ही चली आ रही है, जैसे- गंगा-पूजन, कुओं की पूजा करना अथवा तालाब की पूजा करना। साफ है कि संपूर्ण पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने के प्रति महिलाएं सदैव से ही अग्रणी रही हैं। भारतीय संस्कृति में रची-बसी महिलाओं द्वारा प्रकृति-संरक्षण अथवा पर्यावरण-संरक्षण की यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आई है एवं आज भी देखने को मिलती है। यहां एक बात साफ कर देना समीचीन प्रतीत होता है कि भारत की सामाजिक रचना में महिलाओं की अपेक्षा पुरुष कई गुना अधिक महत्वाकांक्षी एवं सुविधाभोगी हैं, अतः खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण प्रदूषण ने महिलाओं की जीवन-शैली को बुरी तरह प्रभावित किया है। यही कारण है कि पर्यावरण एवं प्रकृति से सीधे रूप में जुड़ने में ग्रामीण महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक सचेष्ट हैं। आज ऐसे क्षेत्रों में जहां अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं, महिलाओं को रसोई के लिए लकड़ी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। इसी तरह जहां पानी की किल्लत है, वहां पानी जुटाने का दायित्व आमतौर पर महिलाओं पर ही है। कई इलाकों में एक-एक घड़ा पानी के लिए महिलाओं को 15-10 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। साफ है कि इन प्राकृतिक संसाधनों यथा- वन, मिट्टी एवं जल से महिलाओं का सीधा एवं गहरा संबंध है। यही कारण है कि महिलाओं को ही इसका संरक्षक माना गया है। खासतौर से आदिवासी लोगों में तो वन-संपदा की अर्थव्यवस्था पूर्णतया महिलाओं

एक नजर

‘चिपको’ और ‘अप्पिको’ आंदोलन की अगुआ महिलाएं ही महिलाओं से जुड़े रीति-रिवाजों में भी पर्यावरण को महत्वपूर्ण स्थान

बिश्नोई समाज की महिलाओं का वृक्षों को बचाने में अहम रोल

ने देवदार में वृक्षों को काटने से बचाकर अच्छा खासा तहलका मचा दिया है। केशू देव नाम की एक महिला की जमीन पर देवदार के पेड़ लगाए थे। जब उसकी मौत हो गई तो उसका लड़का उन पेड़ों को काटकर उस भूमि का प्रयोग दूसरे कार्यों में करना चाहता था। किन्तु स्थानीय महिला मंडल से जुड़ी महिलाएं सक्रिय हो गईं और उन्होंने पेड़ों को काटे जाने का प्रयास विफल कर दिया। की ही मानी जाती है। यही कारण है कि पर्यावरणसंरक्षण, खासतौर से वन-संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण हो गई है और महिलाएं इसके प्रति जागरूक भी हैं।

चिपको आंदोलन

देश के पर्वतीय अंचलों में चले ‘चिपको आंदोलन’ ने पर्यावरण संरक्षण खासतौर से वन-संरक्षण की दिशा में एक नई चेतना पैदा की है। यह आंदोलन पूर्णतया महिलाओं से जुड़ा है और इसने यह सिद्ध कर दिया कि जो काम पुरुष नहीं कर सकते, उसे महिलाएं कर सकती हैं। यह आंदोलन उत्तराखंड के चमोली, कुमाऊं, गढ़वाल, पिथौरागढ़ आदि में प्रारंभ हुआ और जंगलों के विनाश के विरुद्ध सफल आंदोलन के रूप में पूरी दुनिया में सराहा जा चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस आंदोलन का संचालन करने वाली महिलाएं पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों की रहने वाली निरक्षर एवं अनपढ़ महिलाएं हैं। यह स्वतः स्फूर्त एवं अहिंसक आंदोलन विश्व के इतिहास को महिलाओं की अनूठी देन है। यह आंदोलन उनका अपनी जीवनरक्षा का आंदोलन है। इन महिलाओं ने अपने आंदोलन को इस तरह से संगठित किया है कि उनके गांवों का प्रत्येक परिवार जंगलों की रक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात करके सामूहिक चंदा अभियान से उनके वेतन भुगतान की

व्यवस्था करता है। इन महिलाओं के शब्दकोश में असंभव नामक कोई शब्द है ही नहीं। इस आंदोलन की प्रमुख अगुआ गायत्री देवी रहीं।

सेवा मंडल की महिलाएं

राजस्थान में उदयपुर के निकट ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ऊसर एवं रेतीली भूमि को हरे-भरे खेतों में बदल रही हैं। ‘सेवा मंडल’ एक संस्था ने पिछड़े भील समुदाय को इतना अधिक प्रेरित किया है कि अब वह सैकड़ों वर्षों से वीरान पड़ी भूमि को हरा-भरा बनाने में जुट गया है। यह संस्था उदयपुर के छह विकासखंडों की सुरक्षा में बड़े ही मनोयोग से जुड़ी है। उनके इस उत्साह एवं सफलता को देखते हुए ही पर्यावरण-संरक्षण के लिए वर्ष 1991 का ‘केपी गोयनका पुरस्कार’ इन महिलाओं द्वारा तैयार ‘सेवा मंडल’ नामक संस्था को मिला है।

हिमाचल की महिलाएं

हिमाचल प्रदेश की महिलाएं भी पर्यावरण-संरक्षण कार्यक्रम में किसी से पीछे नहीं हैं। यहां की महिलाएं छोटे-छोटे गुट बनाकर आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। यही कारण है कि अखबारों में इनकी चर्चा तक नहीं है। हिमाचल प्रदेश में ही रामपुर परगने में तुरू नाम का एक गांव है। गांव की महिलाओं

राजस्थान में उदयपुर के निकट ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं ऊसर एवं रेतीली भूमि को हरे-भरे खेतों में बदल रही हैं

बिश्नोई समाज की महिलाएं

राजस्थान की बिश्नोई समाज की महिलाओं ने भी ऐसा ही एक अनोखा उदाहरण पेश किया है। थार रेगिस्तान के मध्य बिश्नोई जाति की बस्ती एक नखलिस्तान की तरह दिखती है। यह इस जाति की महिलाओं का पेड़ों के प्रति अनुराग का यह फल है। उनके समाज में एक लोक कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में जब राजा के नौकर एवं कर्मचारी राजमहल बनाने के लिए वृक्षों को काटने आते थे इस जाति की महिलाएं पेड़ों को काटने से बचाने की दृष्टि से पेड़ों से ही लिपट जाती थीं और कर्मचारी पेड़ों के साथ निर्दयतापूर्वक महिलाओं को भी काट देते थे। जब राजा ने यह सुना कि पेड़ों के साथ महिलाएं भी काट डाली जा रही हैं, तो राजा ने उस क्षेत्र में जंगलों को कटवाना रोक दिया। इस तरह विश्नोई जाति की महिलाओं ने न केवल उस समय पेड़ों की सुरक्षा की, बल्कि एक इतिहास रच डाला, जो आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा का काम करता है और आज भी पहाड़ों पर महिलाएं यही प्रक्रिया अपनाकर पेड़ों को बचाने में लगी हैं।

चिपको की तर्ज पर ‘अप्पिको’

दक्षिण में भी ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर ‘अप्पिको’ आंदोलन उभरा, जो 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र से शुरू हुआ। वहां सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश से काटा जा रहा था। तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया। यह आंदोलन लगातार 38 दिनों तक चला। सरकार को मजबूर हो कर पेड़ों की कटाई रुकवाने का आदेश देना पड़ा।


08 भूजल संरक्षण

05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

खो गए केंचुए, आ गया भूजल संकट वर्मी कंपोस्ट

लगातार गिरता भूजल स्तर एक बड़ी समस्या है, इसे सुधारे बगैर जल संकट से निपटा नहीं जा सकता

एक नजर

सि

एसएसबी ब्यूरो

र्फ महाराष्ट्र या कोई दूसरा राज्य नहीं, बल्कि आज पूरे देश में जल का संकट है। दिलचस्प है कि इस समस्या या जल संकट की वजह सूखा नहीं है। पिछले कई सालों से भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। बेहतर मानसून के बावजूद भूजल स्तर में कहीं सुधार देखने को नहीं मिला। आखिर क्यों बेहतर बारिश के बावजूद भूजल स्तर बढ़ नहीं रहा है‍? इस सवाल का जवाब खोजे बगैर पानी की समस्या का कोई दूसरा हल ढूंढ़ना मुश्किल है। हर साल बारिश होती है, कभी कम तो कभी ज्यादा, लेकिन कभी किसी ने यह सोचा कि क्या बरसने वाला पानी जमीन के अंदर जाता है या नहीं।

आखिर जब तक पानी जमीन के अंदर नहीं जाएगा तब तक भूजल स्तर बढ़ेगा कैसे? आज हालात यह है कि बरसात का पानी ऊपर से बह जाता है, जमीन के अंदर गहरे नहीं उतर पाता। वजह है, रासायनिक खादों का इस्तेमाल। इसे हमें विस्तार से समझना होगा तभी देश का भूजल स्तर बढ़ पाएगा। वैज्ञानिकों के शोध बताते हैं कि एक ग्राम उपजाऊ मिट्टी में कम से कम दस करोड़ सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, लेकिन आज एक ग्राम मिट्टी में एक करोड़ या उससे कम जीवाणुओं की संख्या है।

सवाल है कि आखिर कहां गए वे जीवाणु, उनकी संख्या इतनी कम क्यों हो गई और इन जीवाणुओं का वाटर लेवल से क्या संबंध है। रासायनिक खाद में जैसे यूरिया खाद में 46 प्रतिशत यूरिया तथा 54 प्रतिशत साल्टी मटेरियल होता है, उसी प्रकार सिंगल सुपर फास्फेट खाद में 84 प्रतिशत साल्टी मटेरियल होता है, जब हम ये खाद मिट्टी में डालते हैं तो साल्टी मटेरियल मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणुओं को मार डालता है। खेतों में 1968 से रासायनिक खाद डाली जा रही

रासायनिक खादों से मिट्टी में गर्मी बढ़ती गई और ऑक्सीजन की मात्रा कम से कम होती गई, इसीलिए मिट्टी में जो केंचुए 1.5 से 2 फुट के लेयर में काम करते थे वो केंचुए 2 से 3 मीटर नीचे जाकर समाधिस्थ हो चुके हैं

मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु कम हो रहे हैं

रासायनिक खाद से नष्ट हो रहे मिट्टी के लिए उपयोगी जीवाणु मिट्टी में अॉक्सीजन की भी मात्रा लगातार घट रही है

है, धीरे-धीरे सूक्ष्म जीवाणु मरते जा रहे हैं, इन सूक्ष्म जीवाणुओं के कारण ही मिट्टी नरम बनी रहती है,लेकिन अब रासायनिक खाद के इस्तेमाल की वजह से मिट्टी कड़क तथा पत्थर के जैसी हो गई है, इसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम से कम हो गई है। रासायनिक खादों से मिट्टी में गर्मी बढ़ती गई और ऑक्सीजन की मात्रा कम से कम होती गई, इसीलिए मिट्टी में जो केंचुए 1.5 से 2 फुट के


05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

भूजल संरक्षण

09

वर्मी कंपोस्ट से मुनाफा कमा रही महिला किसान

यूपी के सीतापुर के पुरैनी गांव की सावित्री देवी के पास जमीन नहीं थी, लेकिन आज सावित्री वर्मी बनाकर न सिर्फ अपने खेत को उपजाऊ बना रही हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी बेच रही हैं

हां एक तरफ महिला किसानों को किसान का हक नहीं मिलता वहीं एक महिला किसान ने पट्टे पर जमीन लेकर वर्मी कंपोस्ट बनाकर बेचना शुरू किया और गांव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के विसवां ब्लॉक के पुरैनी गांव की सावित्री देवी (45 वर्ष ) के पास जमीन नहीं थी, दूसरी महिलाओं की तरह ही वो दूसरों के खेत में मजदूरी करती थीं, लेकिन आज सावित्री वर्मी बनाकर न सिर्फ अपने खेत को उपजाऊ बना रही हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी बेच रही हैं। सावित्री की मदद की अटरिया कृषि विज्ञान केन्द्र की वैज्ञानिक डॉ सौरभ ने। सावित्री बताती हैं, ‘हमारे पास खेत तो है नहीं कृषि विज्ञान केंद्र की मैडम से खाद बनाने के बारे में पता चला, पहले मैं एक बीघा जमीन पट्टे पर लेकर सब्जियों की खेती करती थी, अब केवीके से जानकारी लेकर शुरू में कंपोस्ट बनाकर अपनी ही फसल में डालती थी, अब बनाकर दूसरे किसानों को बेचती भी हूं।’ सावित्री देवी लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह चलाती हैं, जिसमें उनके साथ 15 महिलाएं और भी जुड़ी हैं। महिलाएं वर्मी कंपोस्ट के साथ ही हैंड क्राफ्ट का सामान भी बनाती हैं। अपने काम और अनुभव के बारे में सावित्री

बेहतर खाद कौन पकने की अवधि

केंचुआ खाद 1-1.5 माह

कंपोस्ट खाद 4 माह

सूक्ष्म एवं अन्य पदार्थ प्रति एकड़ आवश्यकता

अपेक्षाकृत मात्रा अधिक 2 टन

मात्रा कम 5 टन

नाइट्रोजन फास्फोरस पोटाश

कहती हैं, ‘मेरे समूह से 15 और भी महिलाएं जुड़ी हैं, जो वर्मी कंपोस्ट बनाने में मेरी मदद करती हैं। इससे उन्हें भी घर बैठे ही आमदनी हो जाती है।’ अटरिया कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. सौरभ बताती हैं, ‘सावित्री केंद्र से 2014 से ही जुड़ी है, शुरू में तो हैंडी क्राफ्ट का काम ही सिखाया गया था। उसके बाद उसे वर्मी कंपोस्ट बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। इससे उसकी फसल तो अच्छी हो ही रही है, कंपोस्ट को दूसरे किसानों को भी बेच कर मुनाफा कमा रही हैं। शुरू में तो इन्हें दिक्कत होती थी पर अब किसान खुद उनके खेत में जाकर खाद खरीदते हैं।’

ऐसे बचेगा भूजल स्तर

2.5-3.0 प्रतिशत 1.5-2.0 प्रतिशत 1.5-2.0 प्रतिशत

0.5-1.5 प्रतिशत 0.5-0.9 प्रतिशत 1.2-1.4 प्रतिशत

मेरे समूह से 15 और भी महिलाएं जुड़ी हैं, जो वर्मी कंपोस्ट बनाने में मेरी मदद करती हैं - सावित्री देवी वर्मी कंपोस्ट से लाभ

वर्मी कंपोस्ट, सामान्य कम्पोस्टिंग विधि से एक तिहाई समय (दो से तीन महीने) में ही तैयार हो जाता है। वर्मी कंपोस्ट में गोबर की खाद की अपेक्षा नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। केंचुओं द्वारा निर्मित खाद को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ एवं उर्वरा शक्ति बढ़ती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पौधों की वृद्धि पर पड़ता है। वर्मी कंपोस्ट वाली मिट्टी में भू-क्षरण कम होता है तथा मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार होता है।

खेतों में केंचुओं द्वारा निर्मित खाद के उपयोग से खरपतवार व कीड़ों का प्रकोप कम होता है तथा पौधों की रोग रोधक क्षमता भी बढ़ती है।

राज्यपाल ने भी किया सम्मानित

सावित्री देवी को लखनऊ में भारतीय गन्ना अनुसधांन संस्थान में आयोजित उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के कृषि विज्ञान केन्द्रों की 23वीं वार्षिक क्षेत्रीय कार्यशाला में वर्मी कम्पोस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए राज्यपाल राम नाइक द्वारा प्रमाणपत्र तथा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कमी से नुकसान

• भूजल स्रोतों के सूखने की पूर्णतः संभावना

• कृषि फसलों व शाकाहार के लागत मूल्य में वृद्धि की संभावना • हरे चारे की समस्या

• दुग्ध उत्पादन में कमी की आशंका

• फसल चक्र के सिद्धांत को अपनाया जाए • ड्रिप एवं बौछारी सिंचाई विधि एवं क्यारी विधि अपनाई जाए • जीवाश्म खादों की मात्रा बढ़ाई जाए • भूजल स्तर को वर्षा जल से रिचार्ज किया जाए • तालाबों, पोखरों एवं झीलों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की जाए • पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रारंभ की गई ‘रिवर लिंकेज योजना, 2002’ को अपनाई जाए

लेयर में काम करते थे, वो केंचुए 2 से 3 मीटर नीचे जाकर समाधिस्थ हो चुके हैं। भूजल स्तर का संबंध सूक्ष्म जीवाणुओं तथा केंचुए से है, क्योंकि एक एकड़ क्षेत्र में कम से कम 40 हजार केंचुए होते हैं। प्रत्येक केंचुआ हर दिन 1.5 से 2फुट गहरे 2 छेद बनाता है, एक एकड़ क्षेत्र में हर दिन कम से कम अस्सी हजार छेद तैयार होते हैं। इन छेदों के कारण ही बरसात का पानी जमीन में नीचे तक जाता है, जिन खेतों की मिट्टी उपजाऊ होती है, उन खेतों में बरसात का पानी ज्यादा समय तक भरा नहीं रहता, जिन खेतों की मिट्टी खराब है वहां पानी खेतों में भरा रहता है, तथा नदी नाले में बह जाता है। खेतों में पानी मिट्टी के नीचे ना उतरने के कारण ही भयानक बाढ़ भी आती है।

मतलब साफ है कि अगर हमें पानी की दिन प्रतिदिन भयावह होती समस्या पर नियंत्रण पाना है, तो रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद करना पड़ेगा। रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद होने के बाद जमीन में ठंडे वातावरण की निर्मिति होते ही केंचुए ऊपर आकर काम करने लगेंगे, केंचुए मिट्टी में छेद बनाएंगे और बरसात का ज्यादा से ज्यादा पानी मिट्टी में नीचे उतर जाएगा। सूक्ष्म जीवाणुओं की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, इन जीवाणुओं की प्रत्येक 13 से 18 मिनट में एक नई प्रजाति पेशी विभाजन द्वारा जन्म लेती है, इनकी जन्म प्रक्रिया इतनी तेज है कि सिर्फ 24 घंटे में एक जीवाणु से एक करोड़ 60 लाख जीवाणु बन सकते हैं। इसके लिए सिर्फ मिट्टी में जीवाणु रह सकें ऐसे वातावरण की निर्मिति आवश्यक है।


10 कृषि

पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

जलवायु परिवर्तन

बिगड़ा मौसम बिगड़ी खेती

एक नजर

जलवायु चक्र की वजह से बिगड़ा कृषि चक्र

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से देश का 85 प्रतिशत हिस्सा संकट में

25 फीसदी कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की सरकार की तैयारी

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु चक्र का मिजाज बदला तो खेती के लिए आवश्यक संसाधनों और परिस्थितियों की किल्लत हो गई

सि

एसएसबी ब्यूरो

ग्लोबल वर्मिंग की वजह से पूरा जलवायु चक्र प्रभावित हुआ है। जाहिर है कि पूरी तरह मॉनसून पर निर्भर खेती पर भी इस बदले जलवायु चक्र का असर पड़ा होगा। अतिवृष्टि, सूखा और बाढ़ इस बदलते जलवायु की ही देन है, जिनसे कृषि प्रभावित होती है। कृषि अब पहले की तरह समृद्ध नहीं रही। किसान अब यह कहने पर मजबूर हैं कि अब कृषि से कोई फायदा नहीं है। वे खेती करने की बजाय अन्य उद्यमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि खेती के लिए आवश्यक परिस्थितियों और संसाधनों का घोर अभाव है। ये परिस्थितियां प्राकृतिक हैं,जो कृषि चक्र के लिए बहुत ही जरूरी है।

बीज बोते समय कृषि भूमि में कितनी नमी हो, कितनी गर्मी हो कि बीज बोया जाए, बीज बोने के कितने दिनों बाद उसे पानी की जरूरत होती है, एक समय इन चीजों के आधार पर ही किसान उपज का पूर्वानुमान लगा लेता था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में किसान न तो पूर्वानुमान ही लगा पाते हैं और न ही इसे सुनिश्चित करने का कोई उपाय तलाश पाते हैं। इसकी प्रमुख वजह है जलवायु में हो रहा परिवर्तन, जिसके चलते बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने कृषि को प्रभावित किया है।

निरंतर घटता भू-जल स्तर भी कृषि के लिए स्थायी समस्या बन चुका है। इससे पेय जल की समस्या तक खड़ी हो गई है। कुछ साल पहले तक किसान या आम आदमी केवल इन समस्याओं से जूझता था, इन बदलती परिस्थितियों को महसूस करता था, लेकिन अब वह इसके पीछे छिपे जलवायु परिवर्तन की भूमिका को भी समझने लगा है। शिक्षित लोगों के अलावा एक अशिक्षित किसान भी आज इस बात को समझने लगा है कि धरती गर्म होती जा रही है। बीज के स्वस्थ अंकुरण के लिए आवश्यक पर्याप्त नमी और गर्मी का संतुलन कृषि भूमि में अब पहले जितना सहज

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 1996 से 2000 के बीच देश को सकल घरेलू उत्पाद के 2.25 फीसदी और राजस्व के 12.5 फीसदी हिस्से का नुकसान उठाना पड़ा

नहीं रहा है। रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल ने फसल की गुणवत्ता के साथ-साथ भूमि की उपजाऊ शक्ति को भी एक हद तक प्रभावित किया है। फसल की सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता तो एक स्थायी समस्या बनती जा रही है। पिछले कुछ समय में पिघलते ग्लेशियर, बाढ़, भू-स्खलन, तूफान, समुद्री जलस्तर का बढ़ना और भू-जलस्तर का नीचे गिरना ग्लोबल वार्मिंग की ही देन है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 85 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक आपदाओं के दायरे में आता है। 4 करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़, 8 फीसदी चक्रवात और 68 फीसदी जमीन सूखे के की चपेट में है। दूसरी ओर पिछले सौ सालों में देश में बाढ़, सूखा, भूकंप, तूफान, सुनामी और भू-स्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ग्राफ लगभग सौ फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 1996 से 2000 के बीच देश को सकल घरेलू उत्पाद के 2.25 और राजस्व के 12.5 फीसदी हिस्से का नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट में इसकी मूल वजह भौगोलिक परिस्थितियों, संसाधनों की कमी, आपदाओं से लड़ने की तैयारियों का अभाव और जलवायु परिवर्तन को बताया गया है। हिमालय के 8 हजार ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं, उससे कृषि योग्य भूमि के डूबने की आशंका है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने से कई द्वीप और तटवर्ती इलाकों के जलमग्न होने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन के बारे में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आईपीसीसी के अध्यक्ष डॉ. आरके पचौरी के मुताबिक भारत सहित कई देशों की कृषि पैदावार जलवायु परिवर्तन की वजह से बुरी तरह प्रभावित होगी। गेहूं, चावल तथा दाल की पैदावार पर इसका ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। यह स्पष्ट है कि भारत की अधिकांश आबादी का मुख्य भोजन, गेहूं, दाल और चावल ही है। इसीलिए इस उत्पादन में होने वाली कमी से भारत में पड़ने वाले प्रभाव का


पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन

कृषि

11

ग्लोबल वार्मिंग से बचेगी दुनिया ! • सभी देशों को क्योटो संधि का पालन करना होगा और जल्द से जल्द हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा

• यह जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, हम सभी पेट्रोल, डीजल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं • जंगलों की कटाई को रोकना होगा। हम सभी अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, इससे भी ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम किया जा सकता है • तकनीकी विकास से भी निबटा जा सकता है। ऐसे रेफ्रीजरेटर्स बनाए जाएं, जिनमें सीएफसी का इस्तेमाल न होता हो और ऐसे वाहन बनाएं जाएं, जिनसे कम से कम धुआं निकलता हो

2030 तक दक्षिण अफ्रीका में फसलों के उत्पादन में जहां 30 फीसदी तक गिरावट आ सकती है, वहीं दक्षिण एशिया में चावल और मक्के का उत्पादन 10 प्रतिशत घट सकता है अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इससे निजात पाने के लिए किसानों को जल तथा प्राकृतिक संसाधनों के संयमित दोहन की जरूरत है। जिस प्रकार अधिकाधिक उपज प्राप्त करने की लालसा में भू-जल का दोहन और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है वह इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रहा है। इसीलिए अब किसानों को कृषि के तौर-तरीकों और फसल चक्र में बदलाव लाने की जरूरत है। कृषि के लिए उन तरीकों को अपनाया जाए जिसमें कम पानी और सूखे की स्थिति में पर्याप्त उपज प्राप्त की जा सके। डॉ. पचौरी ने 2007 में अपनी चौथी मूल्यांकन रिपोर्ट में वैश्विक तापमान में 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी की संभावना व्यक्त की है। इससे बारिश के पैटर्न में भारी बदलाव होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की इसका विद्युत, जल संसाधन और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ेगा। इसीलिए यह जरूरी है कि रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को कम करते हुए जैविक खेती पर ध्यान दिया जाए। जैविक खाद के उपयोग से न केवल भूमि की उर्वरता बढ़ेगी, बल्कि उसमें नमी की वजह से काफी हद तक सूखे की समस्या से भी निजात मिलेगी। वर्तमान में 180 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि का भविष्य में संवर्धन करने में जैव उर्वरक एक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। औद्योगीकरण के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों का कटाव और उसकी वजह से वर्षा चक्र में उत्पन्न अनिय​िमतता किसी से छुपी नहीं है। जिसका परिणाम भूमि के कटाव, भू-स्खलन के रूप में हमारे सामने है जो कृषि को प्रभावित करता है। वहीं दूसरी ओर ग्लोबल वार्मिंग के चलते जिस गति से वाष्पीकरण और अन्य माध्यमों से जल का हनन हो रहा है उसके सापेक्ष जल संवर्धन, वर्षा जल एकत्रीकरण के उपाय नहीं किए गए हैं। जंगलों की कटाई और औद्योगीकरण के चलते

वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन और अवशोषण का समीकरण गड़बड़ाया है। जिसका एक मात्र उपाय ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण है। इसके लिए ग्रीनर ट्रांसपोर्ट, भवन ऊर्जा का कुशल उपयोग, वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग और परमाणु ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने जैसे उपाय सुझाए गए हैं, लेकिन इसके साथ हमें वृक्षारोपण, परिस्थितिकी संतुलन और ऊर्जा संरक्षण पर भी जोर देना होगा। ईंधन के रूप में बायो फ्यूल का उपयोग कुछ हद तक प्रदूषण में कमी तो लाएगा, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि बायो फ्यूल फसलें उगाने से हमारी खद्यान्न उपलब्धता कितनी प्रभावित होगी, खासकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में। इस संदर्भ में विचार करना बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि सरकार द्वारा एथनॉल तथा जेट्रोफा की खेती पर पहले से ही काम किया जा रहा है। आज जलवायु परिवर्तन का जो स्पष्ट प्रभाव देखा जा रहा है वह खाद्यान्न असुरक्षा के रूप में सामने आ रहा है। वहीं प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से खद्यान्न की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। साथ ही तमाम किस्म की बीमारियों का उद्भव भी हुआ है। जलवायु परिवर्तन मनुष्य के सर्वांगीण विकास के तत्वों—आजीविका, भोजन, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। इसके यथेष्ट समाधान के लिए आवश्यक है कि हम अपने अतीत के अनुभवों और ज्ञान से सबक लें और ऐसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करें, जो कि खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए जलवायु परिवर्तन के लिए कारगर साबित हों। भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसदी तक की कमी लाने का प्रयास करेगी। यह एक बहुत बड़ा कदम है, जिसे हासिल करना काफी मुश्किल होगा। वैसे कुछ

छोटे-छोटे उपाय भी वैश्विक उष्णता को बढ़ने से रोक सकते हैं। जरूरत केवल इंसानी जज्बे की है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से होने वाले बदलाव भविष्य में और अकस्मात तथा अप्रत्याशित होंगे। रिपोर्ट में अगाह किया गया है कि अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र के जलस्तर में अचानक हुई बढ़ोत्तरी, कैलीफोर्निया के मौसम में बदलाव, भारत तथा नेपाल में मॉनसून के प्रभावित होने का करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ हुआ है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के ग्लोबल क्लाइमेट इनीशियेटिव के प्रमुख किम कारस्टेनसेन के मुताबिक अगर हमने जलवायु परिवर्तन को लेकर त्वरित कदम नहीं उठाए तो हमें विध्वंसकारी परिणाम भुगतने होंगे।

क्या है ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी है। धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुई धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है, जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें कार्बन डाई ऑक्साईड, मीथेन, क्लोरो फ्लोरो कार्बन आदि भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणें के एक हिस्से को रोक लेता है। इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। याद दिला दें कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों को जीवित रखने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणें को रोकने लगता है और यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह

ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां ही हैं। मनुष्य जाति इन गतिविधियों से कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है, जिससे इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावर्तित किरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृद्धि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों, उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन और धुंआ

निकलने से कार्बन डाइऑक्साइड में बढ़ोत्तरी हुई है। जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को मात्रा की प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनकी बेतहाशा कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रण भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग एक अन्य वजह सीएफसी है, जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का काम करता है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है, जिससे पराबैंगनी किरणें सीधे धरती पर पहुंच रही हैं और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही है। यह बढ़ते तापमान का ही नतीजा है कि ध्रुवों पर सदियों से जमी बर्फ भी पिघलती जा रही है। विकसित हो या अविकसित देश, हर जगह बिजली की जरूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन के लिए जीवाष्म इंधन का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में करना पड़ता है। जीवाष्म इंधन के जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होती है, जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने आता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से फसलों के उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक दक्षिण अफ्रीका में फसलों के उत्पादन में 30 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। वहीं दक्षिण एशिया में चावल और मक्के का उत्पादन 10 प्रतिशत घट सकता है। केवल जलवायु ही कृषि को प्रभावित नहीं करती है, बल्कि कृषि भी जलवायु को प्रभावित करती है। कृषि के दौरान मीथेन, कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें निकालती हैं, जो ग्रीन हाउस गैसें हैं। खेती के लिए जंगलों की कटाई की जाती है जिससे कार्बनडाइऑक्साइड अवशोषित नहीं हो पाती। धान की खेती के दौरान 54 फीसदी मीथेन गैस निकलती है। खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल से 80 फीसदी नाइट्रस ऑक्साइड निकलती है। स्वामीनाथन और सिन्हा की रिपोर्ट के मुताबिक 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से चावल का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर घट जाता है। वहीं 0.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से गेहूं की पैदावार 0.45 टन प्रति हेक्टेयर तक कम हो जाती है। शशीधरन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक डिग्री तापमान में बढ़ोत्तरी से चावल के उत्पादन में 6 प्रतिशत कमी आ जाती है।


12 जैव विविधता

05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष भारत जैव संरक्षण

जैव विविधता से आएगी बहार दु

दुनिया में भारत जैव विविधता के मामले में एक समृद्ध देश है। ‘जीयो और जीने दो’ के विचार के सहारे देश की जै​व विविधता को बचाया जा सकता है

एसएसबी ब्यूरो

निया के बारह मेगा बायोडाइवर्सिटी केंद्रों में से भारत एक है और 18 बायोलॉजिकल हॉट स्पाट में से भारत में दो पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाट हैं। अनुमान है कि देश में 45 हजार से अधिक वानस्पतिक प्रजातियां हैं, जो समूची दुनिया की पादप प्रजातियों का 7 फीसदी हैं। इन्हें 15 हजार पुष्पीय पौधों सहित कई वर्गीय प्रभागों में बांटा जाता है। करीब 64 जिम्नोस्पर्म 2,843 ब्रायोफाइट, 1,012 टेरिडोफाइट, 1,040 लाइकेन, 12,480 एल्गी तथा 23 हजार फंगी की प्रजातियां लोवर प्लांट के अंतर्गत हैं। पुष्पीय पौधों की करीब 4,900 प्रजातियां सिर्फ भारत में ही पाई जाती हैं। करीब 1,500 प्रजातियां विभिन्न स्तर के खतरों के कारण आज संकट में हैं। भारत खेती वाले पौधों के विश्व के 12 उद्भव केंद्रों में से एक है। भारत में समृद्ध जर्म प्लाज्म संसाधनों में खाद्यान्नों की 51 प्रजातियां, फलों की 104, मसालों की व कोन्डीमेंट्स की 27, दालों एवं सब्जियों की 55, तिलहनों की 12 तथा चाय, काफी, तंबाकू एवं गन्ने की विविध जंगली नस्लें शामिल हैं। देश में प्राणी संपदा भी उतनी विविध है। विश्व की 6.4 प्रतिशत प्राणी संपदा का प्रतिनिधित्व करती भारतीय प्राणियों की 81 हजार प्रजातियां हैं। भारतीय प्राणी विविधता में 5,000 से अधिक मोलस्क और 57,000 हजार इनसेक्ट के अतिरिक्त अन्य इनवार्टिब्रेट्स शामिल हैं। मछलियों की 2,546, उभयचरों की 204, सरीसृपों की 428, चिड़ियों की 1,228 एवं स्तनधारियों की 327 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। भारतीय प्राणी प्रजातियों में स्थानिकता या देशज प्रजातियों का प्रतिशत काफी अधिक है, जो लगभग 62 फीसदी है।

जैव विविधता को क्षति

भारत जैव विविधता के मामले में विश्व के समृद्धशाली देशों में से एक है, इस कारण वह नैसर्गिक संपदा का व्यापारिक दोहन और उसकी तस्करी करने वालों की निगाहों में है। यही कारण है कि जहां एक तरफ इनकी स्वाभाविक स्थिति से छेड़छाड़ की कोशिशें हो रही हैं, तो वहीं इनकी तस्करी भी खुलेआम हो रही है। वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को बड़े पैमाने पर चोरी-छिपे ले जाया जा रहा है। वैसे भारत में जैव विविधता को क्षति पहुंचाने और उसे चोरी छिपे ले जाने के खिलाफ सरकार सतर्क है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां खाद्यान्नों को ले जाने की कोशिश में लगी हैं। वास्तविकता है कि जैव विविधता आमजन की नैसर्गिक संपदा है, जिसका अधिकार सरकार किसी

एक नजर

दुनिया के बारह बायोडाइवर्सिटी केंद्रों में भारत भी एक

देश में हैं 45 हजार से अधिक वानस्पतिक प्रजातियां विश्व की 6.4 प्रतिशत प्राणी संपदा भारत में मौजूद है

उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में 800 से ज्यादा प्रजातियां सिर्फ एक ही स्थान पर पाई जाती हैं। अगर इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो कई विलुप्त हो जाएंगी को नहीं दे सकती। जैव विविधता जीवन की सहजता के लिए जरूरी है। प्रकृति का नियामक चक्र व जैव विविधता दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वनस्पति, खाद्यान्न, जीव-जंतुओं की अनुपस्थिति से कितना नुकसान हो सकता है, वैज्ञानिक भी इसका आकलन नहीं कर सकते। धरती अमूल्य धरोहर संजोए हुए, जीवन को जीवंत बनाए हुए है।

जीव जीवनस्य भोजनम्

गीता की यह उक्ति-‘जीव जीवनस्य भोजनम्’, प्राकृतिक और जीवन क्रम के लिए जरूरी है। हवा, जल, मिट्टी जीवन के आधारभूत तत्व हैं। प्राकृतिक रूप से इनका सामंजस्य सतत जीवन का द्योतक है। मिट्टी से फसलें और कीट-पतंगे उन पर आश्रित हैं। शाकाहारी व मांसाहारी जीवों का भोजन यही है। मेढ़क और चूहे जिन पर आश्रित हैं। इन्हीं के बीच अनेक कीट, जीव और पशु-पक्षी हैं। इनका संबंध जितना जटिल होगा, जैव विविधता उतनी ही समृद्ध होगी।

भारत में 176 प्रजातियों के पक्षी

पक्षियों की दृष्टि से भारत का स्थान दुनिया के दस प्रमुख देशों में आता है। भारतीय उप-महाद्वीप में पक्षियों की 176 प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाली 1,235 प्रजातियों के पक्षी भारत में हैं, जो विश्व के पक्षियों का 14 प्रतिशत है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों ही नहीं, जंगलों से भी खत्म हो गए हैं। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया।

रेबीज का खतरा

1997 में रेबीज से पूरी दुनिया के 50 हजार लोग मर गए। भारत में सबसे ज्यादा 30 हजार मरे। सवाल है कि आखिर रेबीज से क्यों मरे? स्टेनफोर्ट विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि ऐसा गिद्धों की संख्या में अचानक कमी के कारण हुआ। वहीं दूसरी तरफ चूहों और कुत्तों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई। अध्ययन में बताया गया कि पक्षियों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का परागण भी काफी हद तक प्रभावित हुआ। अमेरिका जैसा देश अपने यहां के चमगादड़ों को

संरक्षित करने में जुटा है। अब हम सोचते हैं कि चमगादड़ तो पूरी तरह बेकार हैं। मगर वैज्ञानिक जागरूक करा रहे हैं। चमगादड़ मच्छरों के लार्वा को खाता है। यह रात्रिचर परागण करने वाला प्रमुख पक्षी है। उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है। भारतीय संस्कृति में पक्षियों के संरक्षण, संवर्धन की बात है। देवी-देवताओं का वाहन पक्षियों को बनाया गया है। उल्लू धन की देवी लक्ष्मी का वाहन है। उल्लू के भोजन चूहों का मंदिर मां करणी माता मंदिर राजस्थान में है।

जैव विविधता बचाने का प्रयास

जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक विकास के साथ मानवीय गतिविधियों के चलते जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। पेड़, पौधों, जीव-जंतुओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। इन्हें बचाना मानवता को बचाना ही है। साल 2000 में लंदन में अंतरराष्ट्रीय बीज बैंक की स्थापना की गई। बीज बैंक में अब तक 10 फीसदी जंगली पौधों के बीज संग्रहित हो चुके हैं। नार्वे में ‘स्वाल बार्ड ग्लोबल सीड वाल्ट’ की स्थापना की गई है, जिसमें विभिन्न फसलों के 11 लाख बीजों का संरक्षण किया जा रहा है। ‘द एलायंस फॉर जीरो एक्सटिंशन’ में पर्यावरण एवं वन्य जीवों के क्षेत्र के 13 जाने-माने संगठन हैं। इसके तहत किए गए अध्ययन में 395 ऐसे स्थानों का विवरण तैयार किया गया है, जहां किसी प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में 800 से ज्यादा प्रजातियां सिर्फ एक ही स्थान पर पाई जाती हैं। अगर इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो कई विलुप्त हो जाएंगी। धरती की जैव विविधता ‘जीयो और जीने दो’ जैसी लीक पर चलकर संरक्षित की जा सकती है। प्रकृति, जीव-जंतु और मनुष्य के बीच सामंजस्य कायम रहेगा, तब तक विविधता के रंग बने रहेंगे और मानव जीवन में बहारें आती रहेंगी।


पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

थार में जलधार

मिसाल

13

जल संरक्षण

सूखा और न्यूनतम बारिश के बावजूद चतर सिंह जाम ने परंपरागत जल व्यवस्थाओं को पुनर्जीवित कर जैसलमेर के कई गांवों को आत्मनिर्भर बनाया है

एक नजर

रामगढ़ में औसतन 100 मिमी ही बारिश होती है

सूखे से लोग यहां से थे पलायन को मजबूर चतर सिंह ने बदली इलाके की तस्वीर

रा

एसएसबी ब्यूरो

जस्थान में थार इलाके में दूर आसमान में दिखती सफेद और काली पट्टियों को ‘मोघ’ कहा जाता है। मतलब कि जहां सूरज छिपता दिख रहा है, वहां बादल है। अगर हवा की दिशा अनुकूल हो तो रात तक बारिश हो सकती है। रामगढ़ और आसपास के इलाके के लोग इन्हीं प्राकृतिक चिन्हों के सहारे बादल के बरसने की उम्मीद करते हैं। रामगढ़ जैसलमेर से 60 किमी की दूरी पर भरत-पाक सीमा के करीब है, जहां औसतन 100 मिमी ही बारिश होती है और वह भी हर साल नहीं। दस साल में इस इलाके को तकरीबन तीन बार सूखे की मार झेलनी पड़ती है। कुछ साल पहले तक पलायन और सिर्फ पलायन की कथा ही इस थार इलाके की पहचान थी, लेकिन आज इस इलाके की तस्वीर और पहचान दोनों बदल चुकी है। आज यहां पलायन नहीं, पानी है। थार इलाके में इतने बड़े बदलाव के पीछे हैं चतर सिंह ‘जाम’। ‘जाम’ उनकी पारिवारिक पदवी है, इसीलिए वे ‘जाम साहब’ के नाम से पूरे इलाके में जाने पहचाने जाते हैं।

चतर सिंह का ‘समभाव’

पचपन साल के चतर सिंह ‘समभाव’ नामक एक संस्था से जुड़े हैं। यह संस्था लोगों के साथ

मिलकर जल व्यवस्थाओं को मजबूत करने का काम करती है। पिछले 10 सालों में इस संस्था ने काफी लोगों को उन परंपरागत जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित किया जो कठिन परिवेश के बावजूद खेती और पशुधन को पालते हैं। थार के रेगिस्तान में दो स्तरीय व्यवस्था काम करती है। एक, ऊपर अच्छी बरसात में तालाब और जोहड़ भर जाते हैं और दूसरी, मुश्किल दिनों के लिए 15-20 फीट नीचे खड़िया मिट्टी या जिप्सम की एक पट्टी जमीन में रिसकर आने वाले पानी को संजो कर रखती है। यह पानी उस भूजल से बिलकुल अलग है जो जमीन में काफी गहरा और खारा है। जब तालाब सूख जाते हैं तब यही मीठा पानी कुईं या बेरियों द्वारा निकाला जाता है। इस इलाके में खेत अपना मूल नाम छोड़कर खड़ीन बन जाते हैं। एक धनुष या कोहनी की शक्ल का बांध लंबे चौड़े आगोर से आते बरसाती पानी में ठहराव लाता है और जिप्सम की पट्टी इसे नीचे जाने से रोकती है। इस तरह जमीन को उतनी नमी मिल जाती है, जिससे रबी की फसल फल-फूल सके। सदियों से कितने ही सामूहिक खड़ीन इस क्षेत्र

में अन्न उपलब्ध करवा रहे हैं। दूसरी योजनाओं और तकनीकों पर बढ़ती निर्भरता की वजह से इन पारंपरिक संरचनाओं का सामाजिक जुड़ाव टूट सा गया था। जब ऐसा हुआ तो इलाके से पलायन का सिलसिला शुरू हो गया। लेकिन चतर सिंह ने पारंपरिक संरचनाओं को पुनर्जीवित किया और लोगों से मिलकर न सिर्फ अपने पुरखों के खड़ीन, बेरियों और तालाबों को सुधारा, बल्कि कई नई संरचनाएं भी रचीं।

समाज का काम, समाज के साथ

चतर सिंह ‘जाम’ कहते हैं,‘समभाव से जुड़ने के बाद ही उनमें समाज की ज्यादा समझ बनी। पहले मैं सामान्य कर्मचारी की तरह प्रोजेक्ट के हिसाब से काम करता था। तब लोगों से जुड़ाव कम था। ‘समभाव’ के साथ मैंने जाना कि समाज का काम समाज के साथ मिलकर कैसे किया जाए।’ चतर सिंह समाज का काम समाज के साथ मिल कर कैसे करते हैं, इसे मीरवाला में किए गए काम के सहारे आसानी से समझा जा सकता है। मीरवाला रामगढ़ से दक्षिण में रेत के टीलों के

चतर सिंह ने पारंपरिक संरचनाओं को पुनर्जीवित किया और लोगों से मिलकर न सिर्फ अपने पुरखों के खड़ीन, बेरियों और तालाबों को सुधारा, बल्कि कई नई संरचनाएं भी रचीं

बीच एक छोटा सा गांव है जो अपने ढह चुके कुएं को फिर से सजीव करना चाहता था। चतर सिंह बताते हैं,‘यह कुआं 252 फीट गहरा था। यहां कुआं खोदना सबसे मुश्किल काम है, क्योंकि हर वक्त रेत के खिसकने का खतरा रहता है।’ काम करने के लिए बाड़मेर से कुएं के कारीगरों से बातकर उनके मीरवाला आने का प्रबंध किया गया। इस पूरी प्रक्रिया को ‘समभाव’ ने सुगम बनाया। काम का पूरा खर्च गांव वालों ने दिया। चतर सिंह कहते हैं कि ऐसे काम ज्यादा समय तक टिके रहते हैं क्योंकि उससे लोगों का स्वामित्व का भाव ज्यादा जुड़ा रहता है। चतर सिंह ने इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए तीन साल पहले 50 हेक्टेयर के एक सामूहिक खड़ीन पर व्यक्तिगत तौर से काम शुरू किया। आठ गांव की साझी संपत्ति होने के बावजूद यह खड़ीन जंगली बबूल से अटा पड़ा था। अभी तक यह एक मिला-जुला अनुभव रहा है। पहले साल बरसात नहीं हुई, दूसरा साल भरपूर हुई, पर अब फिर सूखा है। चतर सिंह कहते हैं, ‘लोगों की नजर में यह काम आ चुका है। अगली बरसात तक मुझे उम्मीद है वह सम्मलित हो जाएंगे।’

चतर सिंह का अंदाजे बयां

चतर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी है, उनका अंदाजे बयां। वह राजस्थान की कथा वाचन की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। चाहे वह पालीवाल ब्राह्मणों के रातोंरात पलायन का दुख हो या फिर लहास के जरिए पूरे समाज का तालाब बनाने की खुशी, उनकी आवाज की तान हमेशा दिल पर कायम हो जाती है। रेगिस्तान की वनस्पतियों की जानकारी हो या फिर तारों के जरिए दिशा का अनुमान लगाना, चतर सिंह का ज्ञान भंडार विलक्षण है। यही वजह है कि इलाके के कई लोग इन्हें अपना गुरु भी मानते हैं। गंभीर हास्य के जरिए किसी बात को समझाना भी वे बखूबी जानते हैं। चतर सिंह आजकल सोशल मीडिया से जुड़कर अपने शहरी शागिर्दों के और समीप आ गए हैं। उन्होंने लातूर के अकाल की तुलना रामगढ़ की जल दक्षता से कर एक महत्त्वपूर्ण संदेश जिस सरल ढंग से दिया उसकी हर जगह तारीफ हुई। इन सब बड़े कामों के बावजूद चतर सिंह का सरल व्यक्तित्व इस बात का भरोसा देता है कि दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं।


14 सामुदायिक जागरुकता

05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

बंजर पहाड़ी पर लौटी हरियाली अनूठा

प्रयास

निपानिया पहाड़ी पर हरियाली की बहार आई तो आसपास के गांवों के सात तालाब और और करीब 50 से ज्यादा कुएं पानीदार बन गए

वे

एसएसबी ब्यूरो

सारे के सारे गांव में रहने वाले थे। उनके पास न तो कोई तकनीकी ज्ञान था और न ही इस बात की किताबी समझ कि लगातार पानी की कमी से सूख रहे खेतों को कैसे हरा भरा बनाया जाए। बावजूद सबके उनमें एक बात साझा थी कि कैसे भी गांव को फिर से खुशहाल और हरियाला बनाना है। बस इसी जिद को ठाने वे लोग जुट गए और पास की एक बंजर पहाड़ी को हरियाली की चादर में लपेट दिया। पहाड़ी पर हरियाली की बहार आई तो आसपास के गांवों के सात तालाब और करीब 50 से ज्यादा कुएं पानीदार बन गए। आज पानी से लबालब इस गांव में भीषण गर्मी में फसलें लहलहा रही हैं और पहाड़ी पर सीताफल और करौंदे की बहार है। इस साल ही यहां के किसानों ने फल और खेती से करीब दो करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया है। तालाबों के लबालब होने से गांव के लोगों के चेहरे भी पानी की तरह चमकने लगे हैं।

यह कहानी मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के कुछ गांवों की है। इंदौर–कोटा हाईवे पर इंदौर से करीब सवा सौ किमी का सफर तय करने पर आगर से थोड़ी दूर जाते ही दांई ओर एक पहाड़ी नजर आती है। इस पहाड़ी को निपानिया कहा जाता है। हाईवे से निपानिया तक सड़क के किनारे करीब दो किमी लंबी इस पहाड़ी को देखकर यह अनुमान लगाना भी मुश्किल है कि कुछ सालों पहले तक यह बंजर पहाड़ी आज हरियाली से आच्छादित हो चुकी है। तालाबों में नीला पानी कलकल करता है। आसपास के इलाके में फसलें लहलहा रही हैं और किसान समृद्धि का नया इतिहास रच रहे हैं। निपानिया पहाड़ी पर हरियाली आई तो यह एक बड़ा चारागाह बन गई, जिस वजह से दुग्ध उत्पादन में भी आसपास के गांव इलाके में अव्वल हो गए। बात करीब दो दशक पुरानी है, जब निपानिया,

एक नजर

भानपुरा और देहरिया सहित आसपास के छह-सात गांवों में पानी की जबर्दस्त किल्लत होने लगी। खेती तो दूर, हालात ऐसे बने कि लोगों को पीने के पानी के लिए भी दूर तक भटकना पड़ता था। पानी की कमी की वजह से साल में बमुश्किल एक फसल होने से किसान बेहाल होने लगे। रोजगार की तलाश में खासतौर से नौजवान उज्जैन और इंदौर की राह पकड़ने लगे। इलाके पर संकट के बादल छाने लगे। शादी–ब्याह, तीज त्योहार सब रस्मी हो गए। सबकी चिंता पानी बन गई। कहां से आए पानी और कैसे हो खेती, इन्हीं सवालों के इर्द गिर्द यहां के लोगों की जिंदगी सिमट कर रह गई। मवेशी पालने के नाम से लोग घबराने लगे, क्योंकि जहां खुद पीने को पानी न

निपानिया पहाड़ी पर हरियाली आई तो यह एक बड़ा चारागाह बन गई, जिस वजह से दुग्ध उत्पादन में भी आसपास के गांव इलाके में अव्वल हो गए

निपानिया पहाड़ी से आई स्थानीय लोगों के जीवन में खुशहाली

अब इलाके में भीषण गर्मी में फसलें लहलहा रही हैं निपानिया के हरा-भरा होने से गांव से लोगों का पलायन भी रुका

मिले, वहां मवेशियों के लिए पानी का इंतजाम कैसे किया जा सकता है। चिंताओं और आशंकाओं के बीच कई साल गुजरे। कुछ किसानों ने गहरी से गहरी बोरिंग करवाई पर वह कारगर साबित नहीं हुई। पता नहीं धरती का जल स्तर किस पाताल में समा गया, मेहनत और धन दोनों खर्च करने के बावजूद यहां के लोगों को पानी नहीं मिला। इन्हीं चिंताओं में डूबे एक दिन चौपाल पर बात उठी तो किसी ने कहा कि यदि हम सब मिलकर


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पर्यावरण विशेष इस पहाड़ी को हरा–भरा बना दें तो गांव में भी पानी ठहर सकता है। इस सुझाव को मानने से पहले तो सबने मना कर दिया कि आखिर आधे किमी दूर खड़ी इस पहाड़ी की हरियाली का गांव के पानी से क्या संबंध हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों को यह बात जंच गई। तब तक प्रदेश में चलने वाले ‘जलाभिषेक अभियान’ के कारण जमीनी पानी का जलस्तर, बारिश के पानी को रिसाने की तकनीक और खेतों में पानी के लिए जंगल और पौधे लगाने की बातें गांवों में पहुंचने लगी थीं। एक दिन आसपास के सभी किसानों की एक बैठक बुलाई गई। इसमें चर्चा हुई और इस बात का फैसला हुअा कि सब मिलकर 142 हेक्टेयर की इस पहाड़ी को हरियाली से सजाएं, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था। गांव वाले मेहनत करें और कोई पेड़ ही काट ले जाए या मवेशी पौधे चर जाएं तो फिर क्या करेंगे। लेकिन जहां चाह, वहां राह की तर्ज पर रास्ता निकला और इसी रास्ते ने इन गांवों की दशा ही बदल डाली। सरकार से मदद मिल सकती थी, लेकिन समय बहुत लगता और उनके पास अब समय कहां बचा था। उन्होंने आपस में सहकारी समिति बनाकर 2001 में इस पहाड़ी को सरकार से 30 साल के लिए लीज पर ले लिया। समिति में 11 रुपए की सदस्यता से साढ़े तीन सौ किसान जुड़े। फिर यहां कुल्हाड़ीबंदी लागू की गई ताकि कोई भी गीली लकड़ी नहीं काट सके। अगला काम था–पानी रोकने का। यहां बरसाती पानी रोकने के लिए सबसे पहले कन्टूर ट्रेंच खोदी। 20 फीट लंबी, 2 फीट चौड़ी और 2 फीट गहरी खंतियां खोदी गईं। नालों के प्राकृतिक प्रवाह को सुचारू किया। जगह–जगह बरसाती पानी को छोटे पत्थरों का बांध बना कर रोकने का उपाय किया गया। सात छोटे तालाब बने, पौधे लगाए गए। गांव वाले इस काम में जुट गए, जिससे जो बनता वही करने लगा। दो तीन सालों में पहाड़ी की रंगत बदलने लगी। कोशिशों से पहाड़ी का पानी धरती में थमने लगा।

अब इस पहाड़ी पर शीशम, सफेद चंदन, पलाश, नीम, महुआ, जामुन, बांस सहित कई प्रजातियों के करीब पांच हजार से ज्यादा पौधे 8 से 10 फीट तक हो चुके हैं। इससे इलाके के करीब तीन सौ किसानों की उपज में बढ़ोत्तरी हुई है एक ग्रामीण नारायण सिंह चौहान कहते हैं,‘किसानों ने तय किया है कि इन तालाबों से किसान सीधे पंप लगाकर सिंचाई नहीं कर सकेंगे। इन तालाबों में पानी मार्च महीने तक भरा रहता है। इनमें पानी भरे रहने से आस-पास का जलस्तर बना रहता है और किसानों के निजी कुओं में भी पर्याप्त पानी रहता है। इसी पानी से किसान गेहूं की फसल में पांच से छह पानी तक दे पा रहे हैं। कुछ किसान अब सब्जियों की खेती कर रहे हैं।’ गांव के तालाब आधे से दो हेक्टेयर तक के हैं। इसकी वजह से करीब 800 लोगों की आबादी वाले

प्रसंग, प्रकृति और महात्मा

भानपुरा के आस-पास इन दिनों कोई खेत सूखा नहीं है। 50 कुएं पानीदार हैं। करीब एक सौ किसान खुश हैं। इसी तरह डेढ़ हजार की आबादी वाले देहरिया गांव में भी सवा सौ किसान गेहूं–चने की फसल पैदा कर रहे हैं। तेज सिंह बताते हैं,‘हम सोच भी नहीं सकते थे कि थोड़े से काम से इतना फायदा होगा। पानी तो हुआ ही। डेरी में दूध भी 60-70 लीटर से बढ़कर 400 लीटर हो गया है। अब हम दूध उत्पादन में भी अग्रणी हैं। पहाड़ी पर जंगली जानवर और पक्षी आने लगे हैं।’ ग्रामीणों के इस नेक काम में उज्जैन की संस्था

अपने जीवन को ही अपना संदेश कहने वाले महात्मा गांधी के जीवन के कई ऐसे प्रसंग हैं, जो पर्यावरण को लेकर उनकी सीख से तो हमें अवगत कराते ही हैं, प्रेरक समझ भी देते हैं।

प्रकृति की छटा

न्य लोगों की तरह महात्मा गांधी प्रकृति की छटा को देखने शायद ही कभी गए हों। हो सकता है कि शायद यह उनके संयमित व्यावहारिक मिजाज का हिस्सा हो। अपने इस मिजाज को वे आखिर तक बनाए भी रखते हैं। यह भी रोचक है कि दोनों में से नेहरू इस मामले में थोड़े ज्यादा खुले थे। वे भारतीय प्राकृतिक सुंदरता के गहरे प्रशंसक भी थे। नेहरू की अंतिम इच्छा एवं वसीयत में उनकी भारत की मिट्टी, पहाड़ों और नदियों के प्रति उनकी प्रार्थना में एक रहस्यात्मक विशेषता दिखती है। गांधी और नेहरू-दोनों के निकट मित्र ब्रिटिश

शिक्षाविद एवं लेखक एड्वर्ड थाम्पसन ने इस वैषम्य को दिखाने के लिए एक किस्सा बताया। 1937 में विभिन्न प्रदेशों में जब कांग्रेस की सरकारें बनीं तब थाम्पसन ने राष्ट्रवादी नेताओं को भारत के लगातार लुप्त हो रहे जानवरों के प्रति रुचि दिखाने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने बताया ‘जानवर लगातार या तो लुप्त हो रहे थे या खतरे की सूची में थे।’जब उन्होंने इस समस्या को गांधी के सामने रखा तो महात्मा ने हल्के अंदाज में कहा, ‘हमारे पास हमेशा ब्रिटिश शेर रहेंगे।’ उसके बाद थाम्पसन की उदासी को महसूस करते हुए गांधीजी ने उन्हें जवाहरलाल से इस बारे में कहने के लिए कहा, ‘एक वे हैं, जो इसमें दिलचस्पी दिखाएंगें।’ वास्तव में नेहरू ने

ऐसा ही किया, उन्होंने कांग्रेस शासित प्रदेशों के प्रधानमंत्रियों (तब मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था) से इस मुद्दे के बारे में अपनी बात रखी। बाद में नेहरू ने थोड़े गर्व के साथ थाम्पसन को सूचित किया कि मद्रास के प्रधानमंत्री सी. राजगोपालाचारी का अंतिम अधिनियम पेरियार प्रकृति संरक्षण को स्थापित करने वाला था।

दूरदर्शी सोच

नंद भवन में एक बार महात्मा गांधी ठहरे। सुबह सवेरे उन्होंने हाथ मुंह धोने के लिए

सामुदायिक जागरुकता

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‘फाउंडेशन फॉर इकोलाजी सिक्योरिटी’ ने तकनीकी और जागरुकता बढ़ाने में ग्रामीणों की मदद की तो आईटीसी ने भी कुछ वित्तीय मदद की है। संस्था ‘फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी सिक्योरिटी’ के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर सतीश पवार कहते हैं, ‘हमने देखा कि ग्रामीण जोश–खरोश से काम कर रहे हैं तो हमने उन्हें जागरूक बनाया और उनकी तकनीकी मदद की। सच में उनका काम अनुकरणीय है। हमने तो सिर्फ दिशा दिखाई पर बड़ी खुशी है कि ग्रामीणों ने उस पर चलकर कड़ी मेहनत से अपने सपने को सच कर दिखाया है।’ अब इस पहाड़ी पर शीशम, सफेद चंदन, पलाश, नीम, महुआ, जामुन, बांस सहित कई प्रजातियों के करीब पांच हजार से ज्यादा पौधे 8 से 10 फीट तक हो चुके हैं। इससे इलाके के करीब तीन सौ किसानों की उपज में बढ़ोत्तरी हुई है। डेढ़ सौ बीघा जमीन में पहले एक ही फसल होती थी लेकिन अब दो फसलें और सब्जियां होने लगी हैं। इससे लगे छह गांवों में पीने के पानी की दिक्कत खत्म हुई है। गांवों के कुएं इससे रीचार्ज हो रहे हैं। सीताफल, जामुन और करौंदे की बहार तो ऐसी आती है कि हर साल हजारों रुपए में नीलाम करनी पड़ती है। नीलामी की राशी ग्राम कोष में जमा होती है और इसका उपयोग पहाड़ी को और भी बेहतर बनाने में किया जा रहा है। सीताफल जो इस क्षेत्र से खत्म हो रहे थे, अब उसकी बंपर पैदावार होने लगी है। बीते साल समिति ने छह हजार रुपए के सीताफल नीलाम किए हैं। इसके अलावा खेतिहर अनुसूचित जाति वर्ग के 20 परिवारों को करौंदे की पैदावार का फायदा लेने के लिए ग्रामीणों ने तवज्जो दी है। ये लोग मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन सहित राजस्थान के कोटा में इन्हें बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इन गांवों में अब सब खुश हैं। उनके चेहरे पर खोई चमक लौट आई है। यह पहाड़ी अब पूरे इलाके की समृद्धि की नई इबारत रच रही है। एक बाल्टी पानी की मांग की। जवाहर लाल नेहरू ने एक की जगह दो बाल्टी पानी गांधी जी के पास भिजवा दिया। दो बाल्टी पानी देख गांधी जी ने एक बाल्टी पानी वापस भेज दिया। जवाहर लाल नेहरू ने गांधी जी के इस फैसले का विरोध किया, ‘क्यों गांधी जी,यह वह शहर है जहां गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों का संगम होता है, यहां पानी की कमी नहीं हो सकती।’ गांधी जी और नेहरू के बीच घटित इस पानी की घटना के मायने दूर तक जाते हैं। एक तरफ दूरदर्शिता है, तो दूसरी तरफ अपव्ययी तरीका। पर्यावरणवादियों के बीच गांधी-नेहरू की यह कहानी बेहद प्रचलित है। इस कहानी का कोई प्रामाणिक आधार नहीं, लेकिन पर्यावरणवादियों का भरोसा और विश्वास इस पर अब भी टिका है, क्योंकि पर्यावरण के लिहाज से यह कहानी दो बातें बताती हैं। एक यह कि नेहरू अपव्ययी थे और गांधी दूरदर्शी। दूसरी यह कि गांधी जी के पास विकास का अपना प्रारूप था, जो नेहरू के हिसाब से सही नहीं था।


16 खुला मंच

05 - 11 जून 2017

‘अपनी भूलों को स्वीकार करना उस झाड़ू के समान है, जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है’ महात्मा गांधी

स्वच्छता का उपहार

प्रधानमंत्री अपनी छोटी-छोटी बातों से देश में स्वच्छता को एक आंदोलन की शक्ल देने में सफल रहे हैं कल्पना राजनीतिक हो सकती है, पर देशजबकीहमसं‘राष्ट्र’ की बात करते हैं तो यह सीमा,

क्षेत्रफल, राजनीति और संप्रभु शासन से आगे की बात होती है। भारत को सांस्कृतिक तौर पर ‘राष्ट्र’ के रूप में देखने-समझने वाले इसीलिए भारत की जगह ‘भारतवर्ष’ शब्द का इस्तेमाल करना ज्यादा पसंद करते हैं। इस तरह हम भारत की सांस्कृतिक समझ के साथ उसके ऐतिहासिक महात्म को तो रेखांकित कर ही पाते हैं, हमें अपनी विलक्षणता का गौरव बोध भी होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस लिहाज से देश के उन कुछ राजनेताओं में से हैं, जो भारत को इसी तरह की सांस्कृतिक संपन्नता के तौर पर देखते हैं। इसीलिए जब भी वे नए भारत के निर्माण को लेकर हो रही कोशिशों का जिक्र करते हैं, तो अपनी बातें अनौपचारिक और आत्मीय तरीके से करना पसंद करते हैं। हाल में ‘मन की बात’ कार्यक्रम की 32वीं कड़ी में भी उन्होंने इसी शैली में कई बातों का जिक्र किया। उन्होंने एक तरफ जहां मुस्लिम भाइयों को रमजान की शुभकामनाएं दीं, तो वहीं विश्व पर्यावरण दिवस के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने की भी देशवासियों से अपील की। उन्होंने तीसरे योग दिवस पर एक परिवार की तीन पीढ़ियों द्वारा योग करने की तस्वीरें शेयर करने के लिए भी कहा। साथ ही उन्होंने एक बार फिर स्वच्छता को लेकर महत्वाकांक्षी मिशन की भी बात की। प्रधानमंत्री ने देश को बताया कि देश के 4000 शहरों में अब ठोस और तरल कूड़े के लिए दो तरह के कूड़ेदान रखे जाएंगे। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि शहरों-इलाकों को आपस में इस तरह की प्रतियोगिता करनी चाहिए कि कौन कितना कचरा जमाकर अपने क्षेत्र को स्वच्छ बनाने में भूमिका निभा रहा है। प्रतियोगिता इसीलिए क्योंकि इससे जब वहां वे या कोई और महत्वपूर्ण व्यक्ति पहुंचे तो घोषणा की जा सके कि इस क्षेत्र ने स्वच्छता के लिए इतने टन कूड़े-कचरे का गिफ्ट दिया। आइडिया के तौर पर देखें तो स्वच्छता मिशन को आगे बढ़ाने के लिए यह एक इनोवेटिव बात है, जिसे लोग भी स्वाभिवक तौर पर पसंद करेंगे। बधाई के पात्र हैं प्रधानमंत्री मोदी, क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों से देश में स्वच्छता को एक आंदोलन की शक्ल देने में सफल हुए हैं। उनकी यह कोशिश 2019 तक भारत को निश्चित तौर पर सुंदर और स्वच्छ बनाने के संकल्प को पूरा करेगा।

राजीव रंजन गिरि

लेखक गांधीवादी लेखक-विचारक और दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्याता हैं

गांधी, जेसी और मीरा बेन

आज की पारिस्थितिकीय समस्याओं का पूर्वानुमान गांधी जी बहुत पहले लगा चुके थे। इस बात के साक्ष्य जेसी कुमारप्पा तथा मीरा बेन जैसे उनके अनुयायियों के लेखन और विचारों में दर्ज हैं

हात्मा गांधी के लेखन का फलक व्यापक था। उनके लेखन को समकालीन संदर्भों में फिर से परिभाषित किए जाने से पर्यावरणीय समस्याओं की सूक्ष्म अंर्तदृष्टि का पता चलता है। जेसी कुमारप्पा, जिन्होंने गांधी जी की आर्थिक दृष्टि को विस्तार और समृद्धि दी, पहले गांधीवादी पर्यावरणवादी रहे। लंदन से अकाउटेंसी की पढ़ाई करने वाले कुमारप्पा तमिल ईसाई थे। मुंबई में उनकी प्रैक्टिस चल रही थी, लेकिन अपनी प्रैक्टिस को उन्हें न्यूयार्क में कोलंबिया विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि लेने के लिए छोड़ना पड़ा। कोलंबिया विश्वविद्यालय में उन्होंने सार्वजनिक वित्त का अध्ययन किया और भारतीय अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक शोषण का व्यवस्थित रूप से पर्दाफाश किया। 1929 में एक राष्ट्रवादी के रूप में कुमारप्पा भारत वापस लौटे और गांधी के संपर्क में आए। सार्वजनिक वित्त पर उनका शोध ‘यंग इंडिया’ में धारावाहिक प्रकाशित हुआ। साबरमती आश्रम से जुड़ने के लिए उन्होंने अपनी प्रैक्टिस बंद कर दी। साबरमती में उन्हें गांधी की ग्राम पुनर्रचना की योजना का काम सौंपा गया,जिसका अगले एक दशक तक उन्होंने संचालन किया। अखिल भारतीय चरखा संघ और अखिल भारतीय ग्रामोद्योग – इन दो प्रमुख गांधीवादी संस्थाओं को चलाने में भी कुमारप्पा ने सहायता की। 1930 और 1940 में लिखी पुस्तकों में कुमारप्पा ने गांधीवादी अर्थशास्त्र को औपचारिक रूप देने की कोशिश की। कुमारप्पा के लेखन में गहन पारिस्थितिकीय संदर्भों के साथ सर्वेक्षण यहां वहां बिखरे हुए हैं। मसलन यह टिप्पणी पारिस्थितिकीय उतरदायित्व के लिए मूलमंत्र का कार्य करेगी,‘ हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर वस्तुएं उत्पन्न करके करते ही हैं तो इस स्थिति में होते हैं कि उत्पादन के तरीकों का निरीक्षण कर सकें। इसी बीच अगर हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति धरती के दूसरे कोने से मंगा कर करें तो फिर उन जगहों पर हो रहे उत्पादन की परिस्थितियों, प्रक्रियाओं पर कुछ नहीं किया जा सकता।’ गांधी जी की तरह कुमारप्पा प्रबलता से औद्योगिक सभ्यता की निंदा करते हैं,‘विनाश के बिना कहीं भी औद्योगीकरण संभव नहीं हो सकता है।’

कुमारप्पा का मानना है कि उस अवस्था में आजीविका हेतु कृषि सर्वश्रेष्ठ है और होनी चाहिए जिसमें पुरुष प्रकृति को तथा पर्यावरण को इस तरीके से नियंत्रित करने का प्रयास करता है, ताकि बेहतर नतीजे प्राप्त हो सकें। यह ध्यान देने की बात है कि उन्होंने कृषि और उद्योग के मध्य इस विरोध को प्राकृतिक जगत पर उनके प्रभाव के संदर्भ में बताया है। कुमारप्पा इसे इस प्रकार बताते हैं, ‘कृषि अर्थव्यवस्था में व्यवस्था प्रकृति से विहित होती है। जिसमें असीमित रूप से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। अगर इनमें विभिन्नता है तो यह प्राकृतिक उत्परिवर्तन का अनुसरण करता है। कृषक प्रकृति को सहयोग देता है या एक लंबी अवधि में होने वाली परिघटना को कम समय में होने का अवसर प्रदान करता है। आर्थिक व्यवस्था के भीतर हम पाते हैं कि प्रकृति द्वारा परिवर्तन हिंसक होते हैं, मांग का विचार किए बिना वस्तुओं की व्यापक पूर्ति उत्पन्न की जाती है तथा चतुर विज्ञापनों के साधनों द्वारा कृत्रिम रूप से वस्तुओं की मांग निर्मित की जाती है।’ कुमारप्पा इस मायने में अपने समय के गांधीवादियों से काफी अलग हैं, क्योंकि वे सैद्धान्तिक चिंतन में प्रमुख रूप से रुचि नहीं लेते थे। उनकी रुचि भारतीय किसान और कारीगर की दुर्दशा को सुधारने में थी। कृषि अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों की सजग व्यवस्था ही वह मुख्य मुद्दा है जो उनके अधिकांश कार्यों में दिखाई देता है। इस प्रकार उन्होंने मल को खाद की तरह उपयोग करने की आवश्यकता, जातिगत रूकावटों को जीतने के माध्यम के रूप में मानवीय मल तथा गांव के कचरे को जैविक खाद में बदलने के लिए लोगों को व्यक्तिगत अनुदान देने पर बल दिया। कुमारप्पा ने मृदा की गुणवता को मृदा क्षरण और जल स्तर की जांच के माध्यम से बनाए रखने की महत्ता पर भी बल दिया।

निष्क्रिय धूम्रपान एक छिपी हुई डरावनी वस्तु है, जिसने नीति निर्माताओं को लंबे समय तक के लिए चकमा दिया है


पर्यावरण विशेष महात्मा गांधी की एक अन्य सहयोगी मीरा बेन अपने समय के पर्यावरणीय विचारकों से काफी आगे थीं। वह अंग्रेज एडमिरल की पुत्री थीं, जो 1925 में साबरमती आश्रम में आई थीं। जेसी कुमारप्पा की तरह मीरा बेन भी गांधी के घनिष्ठ लोगों के समूह का हिस्सा थीं। तमिल अर्थशास्त्री की तरह उन्होंने भी अनेक वर्ष ग्रामीण पुनर्रचना के कार्य हेतु तथा अपने गुरू के निर्देशों को व्यवहार में लागू करने में बिताए। 1947 में हिमालय की पहाड़ियों में ऋषिकेश के नजदीक एक आश्रम स्थापित किया। कुछ वर्षों के बाद वह अपना स्थान बदलकर भीतरी पहाड़ियों में भीलंगना घाटी में चली गई थीं। मीरा बेन ने उस समय लिखे एक लेख में हिमालय के वनक्षरण, मृदाक्षरण व बाढ़ों के बीच घनिष्ठ संबंध की ओर नीति निर्माताओं का ध्यान खींचा था। चिपको आंदोलन से सालों पहले ऐसी आलोचनाओं को व्यापक बल देने के लिए उन्होंने वन प्रबंधन में कई कमियां बताई थीं। उन्होंने ग्रामीणों की कम भागीदारी पर चिंता भी जताई। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को चित्रों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट भेजी। नेहरू ने उसे संबंधित वन अधिकारियों की ओर बढ़ा दिया। ग्रामीण उत्तर प्रदेश में अपने वर्षों में मीरा बेन ने भारतीय कृषि की प्रमुख पारिस्थितिकीय समस्याओं पर कुछ उपयोगी टिप्पणियां की थीं। यह समस्याएं आज भी हमारे सामने मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि नहर द्वारा सिंचाई की योजना में जल संचय अनिवार्य रूप से जरूरी है, धरती की जुताई पशुओं के चारे के लिए व मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए ज्यादा उपयुक्त है। मीरा बेन के लिए पारिस्थितिकीय परिवर्तन और संकट की तीव्रता आज के आधुनिक जीवन की विशिष्ट पहचान थी। उत्तरी अमेरिका और मध्यपूर्व में प्राचीन सभ्यताएं प्राकृतिक पर्यावरण के दुरुपयोग के कारण ढह चुकी थीं। उन्होंने 5 जून, 1950 में लिखा,‘जो बात उन दिनों में हजारों सालों में होती है आज आधुनिक मशीनों व विज्ञान के युग में वह 100 सालों में हो जाती हैं।’ गांधी और कुमारप्पा की तरह मीराबेन का प्राथमिक संबंध भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनः प्रतिष्ठित करना था। प्राकृतिक पर्यावरण में उनकी रुचि मात्र यांत्रिक नहीं थी। अनेक समयों पर उन्होंने वर्ड्सवर्थ की पक्की यूरोपियन रोमांसवादी परंपरा के साथ एक आध्यात्मिक बंधुता को भी अभिव्यक्त किया है। वह अपने आप को ‘आदियुगीन धरती माता की भक्तिन’ कहती थीं, ‘आज सबसे बड़े दुख की बात यह है कि शिक्षित और धनी वर्ग ने अस्तित्व के जीवनप्रद मूल तत्वों – हमारी धरती मां, उसके द्वारा धारित प्राणी व अन्न जगत के साथ अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया है। प्रकृति की योजना का यह संसार मनुष्य द्वारा जब कभी भी अवसर मिलने पर बेरहमी से लुटा, छिना व छिन्नभिन्न किया गया। विज्ञान व मशीन के द्वारा वह एक समय के लिए व्यापक लाभ प्राप्त कर सकेगा परंतु अंततः उदास ही होगा। अगर हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ और नैतिक रूप से सभ्य प्रजाति के रूप में बने रहना है तो हमें प्रकृति के संतुलन का अध्ययन करना होगा।’

29 मई-04 जून 2017

शशांक गौतम

खुला मंच

लेखक विधिक एवं सामाजिक मामलों के जानकार हैं और एक दशक से विभिन्न सामाजिक संस्थाअों से संबद्ध हैं

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पानी से मनमानी खतरनाक

पर्यावरण, पृथ्वी और पानी को सहेजने से ही देश जल संकट से मुक्त होगा

स साल पहले तक मेरे गांव के बगीचों में बहुत सारे पेड़ हुआ करते थे, लेकिन आज उनकी संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। पेड़ सूख गए तो गांव के लोगों ने नए पौधे लगाने की जरूरत नहीं समझी। इन्हीं सब का नतीजा है कि आज जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। पीने के पानी से लेकर सिंचाई तक के लिए पानी की सारी जरूरतें धरती से पूरी की जा रही हैं। इसी वजह से भूजल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। यह स्थिति सिर्फ एक गांव की नहीं, देश के हजारों गांवों की है। पानी की कमी से खेतों का पानी लगातार उतर रहा है। पानी कितनी बड़ी जरूरत है इसे समझाने और बताने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में जल को प्रसाद बताया था। उन्होंने देश के लोगों से पानी बचाने की अपील भी की। पानी की कमी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिंता जायज भी है। भारत ही नहीं इस समय पूरी दुनिया जल संकट की समस्या से जूझ रही है। दुनिया के अधिकांश देशों में पेयजल की किल्लत है। इस समस्या से भारत भी अछूता नहीं है। पानी आज भी देश की एक बड़ी आबादी की पहुंच से कोसों दूर है। महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्य हर साल सूखे की मार झेलते हैं। महाराष्ट्र के लातूर में तो पानी आपूर्ति के लिए सरकार को ट्रेन भेजनी पड़ती है। वैसे यह बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पानी की समस्या के प्रति बेहद संवेदनशील हैं,

इसीलिए उन्होंने कहा कि पानी बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारों और नेताओं की ही नहीं, बल्कि यह जन-सामान्य की भी जिम्मेदारी है। पीएम मोदी ने कहा कि पानी की एक बूंद भी बर्बाद हो, तो हमें पीड़ा होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तरह ही ‘जल संरक्षण’ को भी एक जन-अभियान बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमें बरसात के चार महीनों में वर्षाजल के बूंद-बूंद को संरक्षित करने की चेष्टा करनी चाहिए। दरअसल, देश में वर्षाजल संरक्षण को लेकर अगर किसी बात की कमी है तो वह है इसके प्रति लोगों में पर्याप्त जागरुकता का अभाव। लेकिन दुनिया के कई देश वर्षा जल संरक्षण के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। वर्षा जल को संरक्षित नहीं कर पाने की वजह से देश में पानी की कमी का संकट लगातार गहराता जा रहा है। कभी पानी से लबालब गांवों के जल स्रोत एक के बाद एक कर सूखते जा रहे हैं। हकीकत यह है कि इस जल संकट के लिए गांव

किसानों के लिए संपदा योजना

‘सुलभ स्वच्छ भारत’ में प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के लिए ‘संपदा योजना’ घोषित करने वाली खबर को पढ़ने के बाद अच्छा लगा। प्रधानमंत्री न सिर्फ देश में स्वच्छता के लिए काम कर रहे हैं, बल्कि किसानों के कल्याण के लिए भी ठोस कदम उठा रहें हैं। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित इस योजना से किसानों को लाभ पहुंचेगा। यह योजना भारत में किसानों के लिए रोजगार और संपन्नता के लक्ष्य को पूरा करेगी। इस योजना में प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने की बात भी कही है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ की इस खबर को पढ़ने के बाद लगा कि अब किसानों को उनके हक का सही मूल्य दिया जाएगा। सुनील गुप्ता, गोरखपुर

के लोग ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपने जल स्रोतों की लगातर उपेक्षा की है। तालाब-कुओं का अस्तित्व बेहतर रख रखाव की कमी से ज्यादा खतरे में पड़ा है। बगीचों का अस्तित्व भी पुराने पेड़ काटने और नए नहीं लगाने की आदतों की वजह से मिटने के करीब है। इन्हीं वजहों से जल संकट की समस्या बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि पीने के पानी से लेकर सिंचाई तक के लिए पानी की सारी जरूरतें धरती से पूरी की जा रही हैं। हम धरती का जितना दोहन कर रहे हैं, उस अनुपात में वापस नहीं कर रहे हैं तो यह समस्या होनी ही है। शहरों में तो यह स्थिति और भी खराब है, वहां तो एकतरफा सिर्फ जल दोहन ही चल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा था कि हमें ऐसी फसल की खेती करनी चाहिए, जिसमें कम पानी लगता हो। इस मामले में मिस्र और चीन बहुत आगे हैं। ये दोनों देश अपने जल भंडार को बचाने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर ‘वाटर इंपोर्ट मैनेजमेंट’ को अपना रहे हैं। जल संरक्षण के प्रति प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता अच्छी बात है और सूखे से निपटने जैसे मुद्दों पर हमें समग्रता में जल प्रबंधन के लिए कृषि, सिंचाई और पर्यावरण के समावेश के साथ राष्ट्रीय जलनीति जल्द बनानी होगी, जिसमें वन संरक्षण पर भी फोकस हो और उस नीति को अमल में भी लाया जा सके। इसीलिए पर्यावरण, पृथ्वी और पानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं।

धूम्रपान छोड़ने के लिए योग

धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है, यह सब जानते हैं। हर कोई चाहता है कि धूम्रपान की आदत छूटे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ में प्रकाशित इस आलेख को पढ़ने के बाद योग के सहारे लोग इस बुरी लत से अपना पीछा छुड़ा सकेंगे। इस आलेख में धूम्रपान छोड़ने के लिए योग और प्राकृतिक उपचार की मदद लेने की बात कही गई है। इसमें कई उपचार बताए गए है जैसे योग करना, फल-सब्जी अधिक मात्रा में लेना, तनाव पर नियंत्रण रखना जैसे कई समाधान बताए गए हैं। सिगरेट का हर एक कश जिंदगी के 5 मिनट को कम कर देता है। मुझे उम्मीद है कि इस आलेख से युवाओं को धूम्रपान छोड़ने में मदद मिलेगी। ललित कुमार, बीकानेर


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नदी का सपना

जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक निदेशक एलेक्जेंडर कनिंघम ने भारत में पुरातत्व संबंधी खुदाई का आरंभ किया तो उसकी खोज सरस्वती नदी के किनारे मानव बस्तियों के चिह्न ढूंढने की दिशा में थी। इसी से भारत की संस्कृति और सभ्यता का पता चला। लेकिन अब हम क्या कर रहे हैं?

फोटा​ेः रंजन पांडा

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नदी का स्वर हमेशा से मनमोहक रहा है। इसके पास हमें सुनाने के लिए अनेक कहानियां होती हैं... उन लोगों की कहानियां, जिनके जीवन को इसने अपने जल से सींचा है, भोजन दिया है...उन लोगों की कहानियां, जिन्हें इसने मां बनकर पाला-पोसा और रहने को ठौर दिया और उन लोगों की कहानियां जिन्होंने इसे सौतेली मां समझ कर इसके साथ दुर्व्यवहार किया

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जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने से लेकर रेत खोदने, इसमें कूड़ा-कचरा डालने और सिंचाई के लिए अधिक से अधिक जल का इस्तेमाल करने में हमने नदी का बुरी तरह दोहन किया है, लेकिन एक मां के प्यार की भी सीमा होती है, अतः आश्चर्य नहीं कि मां की छाती भी सूख रही हो और मानव से दूर हटते हुए संभवतः यह इतिहास में आखिरी बार आंसू बहा रही हो

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पर्यावरण विशेष

विश्व रिकॉर्ड फसल देने वाला गांव दरवेशपुरा बेमिसाल गांव

जैविक खेती के देशज तरीके से फसल उत्पादन का विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले गांव और वहां के किसानों का भरोसा और पुरुषार्थ देखते ही बनता है

एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

रकारी आंकड़े के मुताबिक बिहार में करीब 1.62 करोड़ किसान हैं। किसानों की इतनी बड़ी संख्या के साथ खास बात ये है कि ये परंपरागत तरीके से खेती करना चाहते हैं, पर समय और पैदावार की चुनौती ने इन्हें रासायनिक तरीके से खेती करने को मजबूर कर दिया। अब जबकि दशकों के अनुभव के बाद रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव दूसरे प्रदेशों के साथ बिहार के किसान भी भुगत रहे हैं, तो वे एक बार तेजी से जैविक खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। अच्छी बात यह है कि ऐसा करते हुए वे जैविक खेती की परंपरागत शैली को वैज्ञानिक बनाने पर जोर दे रहे हैं। इसमें उन्हें खासी सफलता भी मिल रही है। इसी तरह की

बड़ी उपलब्धि हासिल की है सूबे के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के कुछ किसानों ने। आलम यह है कि इन किसानों की खेती करने की समझ और शैली की चर्चा अब देश-दुनिया में है। खासतौर पर यहां आलू की फसल का मुआयना करने पंजाब और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों से किसान आ चुके हैं।

दरवेशपुरा गांव

बात करें दरवेशपुरा गांव की तो यह एक विश्व रिकॉर्डधारी गांव है। बिहार सरकार के दावे के

मुताबिक 2011 में नालंदा जिले के इस गांव के एक नौजवान किसान सुमंत कुमार ने धान उत्पादन और 2012 में उसी गांव के एक दूसरे किसान नीतीश कुमार ने आलू उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। इसके बाद से ही यह गांव लगातार चर्चा में है। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर पावापुरी मोड़ से नीचे उतरने के बाद दरवेशपुरा गांव जाने का रास्ता जैन धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जल मंदिर से होकर गुजरता है। सुमंत कुमार के नाम से इस गांव की ख्याति आसपास भी काफी

किसान यदि श्रीविधि से धान, गेहूं या आलू की खेती करें तो उत्पादन में ढाई से तीन गुना वृद्धि आसानी से हासिल की जा सकती है। श्रीविधि से खेती करने में लागत भी परंपरागत विधि की तुलना में आधी आती है

बिहार में किसानों की संख्या करीब 1.62 करोड़ है

तेजी से जैविक खेती की तरफ लौट रहे हैं किसान दरवेशपुरा गांव के नाम फसल उत्पादन के कई रिकॉर्ड

है। इसीलिए उनके घर का पता पूछने में कठिनाई नहीं होती है। बेटे की कामयाबी से गदगद सुमंत के पिता रामानुज भी फख्र से कहते हैं कि उनका गांव तो अब बहुत मशहूर हो गया है। उन्होंने बताया कि वैसे विश्व रिकॉर्ड बनाने के पहले से ही यह गांव अपने आलू की चमक और बड़े-बड़े तरबूजों के कारण पूरे इलाके में मशहूर रहा है। 1964 में गांव के ही राजेंद्र सिंह ने जब दस इंच की मिर्च उगाई थी, तो तब भी उनका गांव काफी चर्चित हुआ था।


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पर्यावरण विशेष

फसल उत्पादन का विश्व रिकॉर्ड

सुमंत कुमार

वर्ष किसान रिकॉर्ड 2011

सुमंत कुमार प्रति हेक्टेयर 22.4 टन धान का उत्पादन

1964

राजेंद्र सिंह दस इंच की मिर्च उगाई

2012

नीतीश कुमार प्रति हेक्टेयर 72.9 टन आलू का उत्पादन

गुना वृद्धि आसानी से हासिल की जा सकती है। श्रीविधि से खेती करने में लागत भी परंपरागत विधि की तुलना में आधी आती है। हालांकि वे श्रीविधि की सीमा की ओर इशारा करते हुए यह भी बताते हैं कि इसके लिए बड़े पैमाने पर मजदूर और ऐसा नहीं होने पर मशीनों की जरूरत पड़ती है। क्षेत्र में दोनों की ही कम उलब्धता के कारण कई किसान चाहकर भी इस विधि से खेती नहीं कर पा रहे हैं।

शोहरत की कीमत

धान में पिछला विश्व रिकॉर्ड 19.4 टन प्रति हेक्टेयर उपज के साथ चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लॉंगपिंग का था

बदलावों का गवाह

आलू में यह रिकॉर्ड नीदरलैंड के एक किसान का था, जिसने प्रति हेक्टेयर 53.5 टन आलू पैदा किया था

दरअसल, विश्व रिकॉर्ड बनाने के बाद दरवेशपुरा कई बदलावों का गवाह बन रहा है। गांव में एक बार फिर से बिजली के बल्ब टिमटिमाने लगे हैं तो सकरी नदी पर प्रस्तावित पुल भी रिकॉर्ड के बहाने जल्दी पूरा हो गया है। खेती की बात करें तो गांव में पहले के मुकाबले ज्यादा संख्या में किसान ‘सिस्टम ऑफ राइस इंटिफिकेशन’ पद्धति यानी कि श्रीविधि से खेती करने लगे हैं। स्थानीय किसान रवींद्र राम बताते हैं, ‘उन्होंने भी अब सुमंत, नीतीश और दूसरे किसानों से प्रेरित होकर श्रीविधि से धान की खेती शुरू की है। इस विधि से खेती करने पर लागत पहले के मुकाबले लगभग आधी आती है और मौसम का साथ मिला तो उपज दोगुने से थोड़ा कम मिल जाती है।’

दरवेशपुरा गांव बड़े-बड़े तरबूजों के लिए भी जाना जाता रहा है

श्रीविधि से खेती

खेती की श्रीविधि के बारे में सुमंत कुमार बताते हैं कि 2010 में तीन किसानों ने इस तरह से धान की खेती शुरू की थी। 2011 में जिस साल रिकॉर्ड बना उस साल तेरह किसानों ने इस विधि को अपनाया था और अब तो ऐसे किसानों की संख्या काफी हो गई है। यहां तक कि दरवेशपुरा के आसपास के सैदी, सारिल चक जैसे गांवों में भी अब किसान इस विधि को अपना रहे हैं। वे न सिर्फ धान की खेती में इस तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि गेहूं और आलू आदि की खेती में भी इसे अपना रहे हैं। नीतीश कुमार इसकी वजह यह बताते हैं कि इलाके की जमीन पर पानी नहीं ठहरता है और श्रीविधि के लिए ऐसी ही जमीन चाहिए। किसान यदि श्रीविधि से धान, गेंहूं या आलू की खेती करें तो उत्पादन में ढाई से तीन

विश्व रिकॉर्ड बनाने के पहले से ही दरवेशपुरा गांव अपने आलू की चमक और बड़े-बड़े तरबूजों के कारण पूरे इलाके में मशहूर रहा है

शोहरत की कीमत भी चुकानी पड़ती है। ऐसा इन विश्व रिकॉर्डधारी किसानों के साथ भी हो रहा है। दरअसल सुमंत और नीतीश कुमार की परेशानी यह है कि इन्हें अक्सर गांव आने वालों के साथ समय बिताना पड़ता है या फिर गांव का प्रतिनिधत्व करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। दोनों ही परिस्थितियों में उनका अपना काम प्रभावित होता है। अलबत्ता इस परेशानी के फायदे भी हैं। इस बारे में नीतीश बताते हैं कि कर्नाटक के दौरे के दौरान जहां वे धान के 350 से अधिक बीजों से परिचित हुए, वहीं उत्तर प्रदेश के कायमगंज जाने पर जीरो बजट फार्मिंग के बारे में सीखा।

प्रेरक माहौल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे हैं कि वह देश की प्रत्येक थाली में बिहार का कोई उत्पाद परोसना चाहते हैं। लगता है कि नीतीश के इसी सपने को साकार करने के लिए बिहार के नालंदा जिले के कई गांव कृषि के क्षेत्र में अपना पुरुषार्थ दिखा रहे हैं। ‘नालंदा प्रगतिशील किसान संघ’ के राजेंद्र प्रसाद भी मानते हैं कि नालंदा में किसानों में खेती के प्रति जागरुकता पैदा हुई है। उन्होंने कहा कि कल तक जो किसान पलायन कर रहे थे, वे अब घर लौटकर खेती कर रहे हैं। श्रीविधि तकनीक से धान का उत्पादन यहां प्रति हेक्टेयर 224 क्विंटल तक पहुंच चुका है, जबकि पारंपरिक तरीके से यहां प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन महज 80 क्विंटल होता था। नालंदा जिला प्रशासन भी किसानों की इस जागरुकता को बढ़ाने में लगा है। नालंदा में राज्य जैविक सब्जी प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत 2,500 हेक्टेयर में किसानों को जैविक उत्पादन क्रय करने का लाभ दिया जा रहा है। पहले तो किसान पारम्परिक खेती को छोड़ने और आधुनिक तकनीक अपनाने को तैयार ही नहीं थे, परंतु प्रशासन द्वारा नई तकनीक से होने वाले नुकसान की भरपाई किए जाने के वादे के बाद किसान तैयार हो गए और अब नतीजा सबके सामने है। जिले में उन्नत खेती करने को लेकर गांवों और किसानों के बीच यहां एक तरह से प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है। दो साल पहले नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड के सारिलचक गांव के किसान सुरेंद्र प्रसाद ने एक हेक्टेयर भूमि में 135.75 क्विंटल गेहूं का उत्पादन किया, जो राष्ट्रीय रिकॉर्ड है। दिलचस्प है कि उनसे पहले यह कीर्तिमान बिहार के ही अररिया के एक किसान के नाम था, जिसने प्रति हेक्टेयर 100 क्विंटल गेहूं का उत्पादन किया था।

कृषि

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श्रीविधि से ‘श्री’

के लिए चर्चा में आई श्रीविधि की प्रक्रिया जटिल नहीं है। अच्छी बात बंयह किपरखेतीफसल यह विधि खेती की भारतीय परिस्थिति

के सर्वथा अनुकूल है। धान की तर्ज पर गेहूं की खेती भी किसान यदि इस विधि से करें तो गेहूं के उत्पादन में भी ढाई से तीन गुना वृद्धि हो सकती है। इस विधि से खेती करने पर गेहूं की खेती में लागत परंपरागत विधि की तुलना में आधी आती है। इसके लिए खेत की तैयारी सामान्य गेहूं के खेत की भांति ही करते हैं। सबसे पहले खर-पतवार व फसल अवशेष निकालकर खेत की तीन-चार बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा करना होता है। यदि दीमक की समस्या है तो दीमकनाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए। खेत में पर्याप्त नमी न होने पर बुवाई के पहले एक बार पलेवा करना चाहिए। खेत में छोटी-छोटी क्यारियां बनानी होती हैं। इस तरह से सिंचाई समेत दूसरे कृषि कार्य आसानी से और कम लागत में हो जाते हैं। बुवाई : गेहूं की फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने में बुवाई का समय महत्वपूर्ण कारक है। समय से बहुत पहले या बहुत बाद में गेहूं की बुवाई करने से उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। नवंबर-दिसंबर के मध्य में बुवाई संपन्न कर लेनी चाहिए। गेहूं की अधिक उपज देने वाले बीजों की किस्मों का चयन स्थानीय कृषि जलवायु एवं भूमि की दशा (सिंचित या असिंचित) के अनुसार करना चाहिए। क्षेत्र विशेष के लिए प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें तो अच्छा होगा। बुआई के लिए प्रति एकड़ 10 किलोग्राम बीज का उपयोग करना चाहिए। बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी आवश्यक है, क्योंकि बुवाई हेतु अंकुरित बीज का प्रयोग किया जाना है। सिंचाई : बुवाई के 15-20 दिनों बाद गेहूं में प्रथम सिंचाई करनी जरूरी है, क्योंकि इसके बाद से पौधों में नई जड़ें आनी शुरू हो जाती हैं। भूमि में नमी की कमी से पौधों में नई जड़ें विकसित नहीं हो पाती हैं। बुवाई के 30-35 दिनों बाद दूसरी सिंचाई देनी चाहिए, क्योंकि इसके बाद पौधों में नए कल्ले तेजी से आना शुरू होते हैं और नये कल्ले बनाने के लिए पौधों को पर्याप्त नमीं एवं पोषण की आवश्यकता रहती है। बुवाई के 40 से 45 दिनों के बाद तीसरी सिंचाई देनी चाहिए, इसके बाद से पौधे तेजी से बड़े होते हैं साथ ही नए कल्ले भी आते रहते हैं। गेहूं की फसल में अगली सिंचाई भूमि एवं जलवायु अनुसार की जानी चाहिए। खेत में सिंचाई उपरांत निराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। लाभ : श्रीविधि से खेती करने पर परंपरागत विधि से प्राप्त 10-20 क्विंटल प्रति एकड़ की तुलना में 25 से 50 प्रतिशत अधिक उपज और आमदनी ली जा सकती है। इस विधि से बीज के साथ खाद-पानी की भी बचत होती है।


22 पर्यावरण

05 - 11 जून 2017

अमेजन रीफ का संकट अमेजन संकट

तेल का जरूरत से अधिक भंडार उपलब्ध होने के बावजूद कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाने वाला एक और तेल खनन हमारे पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। अमेजन रीफ का पूरा संकट इसी तेल खनन से जुड़ा है

पर्यावरण विशेष

एक नजर

अमेजन के मुहाने पर 9,500 वर्ग किमी क्षेत्र में है अमेजन रीफ

जैव विविधता का मूल्यवान खजाना है रीफ तेल खनन से जलवायु परिवर्तन का खतरा

होगा, जिनकी आजीविका जंगल पर निर्भर है। कोरल रीफ की समुद्र के नीचे अपनी जैवविविधता होती है। जलवायु परिवर्तन में इन चट्टानों की बड़ी भूमिका है। वजह यह है कि वातावरण और समुद्र के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है, जिनमें मुख्य कॉर्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन हैं। समुद्र ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है और कार्बन डाइऑक्साइड को सोखता है। इस लिहाज से भी अमेजन रीफ को बचाए रखना बेहद जरूरी है।

जीवाश्म ईंधन

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एसएसबी ब्यूरो

श्विक तपानमान को दो डिग्री तक कम करने की दुनिया भर की कोशिशों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रवैये से पानी फिरता नजर आ रहा है। वैसे इस मुद्दे पर और भी कई खतरे हैं, जिनसे समय रहते निपटने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पर्यावरण के संकट से निपट पाना पूरी दुनिया के लिए मुश्किल हो जाएगा। पर्यावरण पर मंडरा रहे इन्हीं खतरों में से एक है अमेजन रीफ का संकट। दुनिया को बीस फीसदी ताजा पानी देने वाली अमेजन नदी के मुहाने पर 9,500 वर्ग किमी क्षेत्र में मूल्यवान अमेजन रीफ का फैलाव है। अमेजन की चट्टानें अमेजन के बहुत गंदी मिट्टी और गाद में सराबोर, तलछट से भरे पानी में स्थित हैं और असामान्य रसायन-संश्लेषण का एक उत्पाद है। जहां एक तरफ रीफ शृंखलाओं में प्रकाश संश्लेषण के द्वारा अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का भरण प्रचलित है, वहीं रसायन-संश्लेषण के फलस्वरूप जन्मे अमेजन रीफ ने वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों को अपनी ओर खासा आकर्षित किया है।

जैव-विविधता वाला क्षेत्र

अमेजन रीफ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह एक विशिष्ट जैव-विविधता वाले इलाके में स्थित है। फिलहाल कई वैज्ञानिक इस क्षेत्र में अध्ययन कर रहे हैं और उम्मीद है कि अभी और भी कई प्रजातियां यहां पर खोज निकाली जाएंगी। रीफ प्राकृतिक रूप

से कार्बन सिंक का भी काम करता है। अमेजन रीफ के साथ खास बात है कि यह दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव जंगल से घिरा हुआ है, जो बड़ा कार्बन सिंक करने का जरिया है, लेकिन आज इस अमेजन रीफ पर तेल खनन की वजह से खतरा पैदा हो गया है। साफ है कि रीफ पर किसी भी तरह का खतरा धरती पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के लिए झटका साबित होगा। ब्राजील सरकार के आंकड़े बताते हैं कि तेल कंपनियों ने इस इलाके से 14 बिलियन बैरल तेल निकालने का अनुमान लगाया है। अब अगर इस तेल की खपत से पैदा होने वाले कार्बन उत्सर्जन को भी जोड़ा जाए तो साफ है कि धरती पर कार्बन उत्सर्जन में और बढ़ोत्तरी होगी और इससे जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि अमेजन रीफ के इलाके में मछुआरे ऐसी मछलियों को देखते थे जो सिर्फ रीफ क्षेत्र में ही पाए जाते हैं।

2012 से चल रहा शोध

वैज्ञानिकों ने लगभग 2012 में इस रीफ के बारे में शोध शुरू किया और 2016 में इसे आधिकारिक रूप से दुनिया को बताया गया। 2017 में पहली बार ग्रीनपीस ने इस रीफ की तस्वीर और वीडियो बनाने में सफलता हासिल की। अभी भी बहुत सारे शोधकर्ता इस रीफ

का अध्ययन कर ही रहे हैं। वैज्ञानिकों का अध्ययन तो एक तरफ जारी है, लेकिन दूसरी तरफ खतरनाक यह है कि इस इलाके पर लंबे समय से तेल कंपनियों की निगाहें टिकी हैं। समुद्र तल के अस्थिर होने की वजह से रीफ इलाके में भूस्खलन होता है। आखिरी बार ड्रिल करने जो जहाज इस इलाके में पहुंचा, वह भी बह गया। बावजूद सबके ब्राजील सरकार खनन के लिए यह इलाका तेल कंपनियों को देने का फैसला करने वाली है। इसके लिए पर्यावरण संबंधी जरूरी मंजूरी भी 2013 में ले ली गई है। लेकिन यह मंजूरी तब ली गई थी जब तक अमेजन चट्टानों को खोजा नहीं गया था। इसीलिए मंजूरी देते वक्त अमेजन रीफ पर होने वाले कुप्रभावों पर विचार ही नहीं किया गया था। अब जब यह रीफ दुनिया के सामने आ चुका है, तो जरूरी है कि पहले के पर्यावरण संबंधी आकलन करने के बाद मंजूरी को खत्म करके फिर से फैसला लिया जाए। वैसे भी यह देखा गया है कि जहां भी तेल खनन होता है वहां तेल के लीक होने की संभावना भी काफी होती है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण जंगल के पास तेल खनन की इजाजत देने का मतलब होगा कि पूरे जंगल को खतरे में डालना। इस इलाके में तेल खनन की इजाजत से जंगल और रीफ के आसपास रह रहे स्थानीय लोगों के लिए भी मुश्किलों का दौर शुरू

अमेजन रीफ के साथ खास बात है कि यह दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव जंगल से घिरा हुआ है, जो बड़ा कार्बन सिंक करने का जरिया है, लेकिन आज इस अमेजन रीफ पर तेल खनन की वजह से खतरा पैदा हो गया है

पूरी दुनिया में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल औद्योगिक विकास के लिए बहुतायत में किया जाता है। नतीजे में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी उसी बड़ी मात्रा में होता है। समुद्र में एसिड की मात्रा का लगातार बढ़ना इसी वजह से होता है। समुद्र में बढ़ने वाले एसिड कोरल सिस्टम को क्षतिग्रस्त करते हैं। इन्हीं सब खतरों को भांपते हुए पूरी दुनिया में अमेजन रीफ को बचाने का अभियान शुरू किया जा रहा है। ग्रीनपीस द्वारा जारी अभियान को पूरी दुनिया से दस लाख लोगों ने अब तक अपना समर्थन दिया है। अपनी प्रकृति और दुनिया को बचाने के साथ उसे बेहतर बनाने की लड़ाई पूरी दुनिया में शुरू हो चुकी है। इस अभियान में हॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘द टाइटैनिक’ के हीरो लियोनार्ड डी कैपेरियो जैसे बड़े अभिनेता भी जुड़ चुके हैं। बात करें भारत की तो पेरिस समझौते के बाद से ही उसे पर्यावरण संकट से जूझने में एक नेता के रूप में देखा जा रहा है। खुद भारत में अब तक 6 हजार से ज्यादा लोग इस अभियान के समर्थन में आगे आ गए हैं। आज पूरी दुनिया में जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करने की कोशिश हो रही है और तेल का पर्याप्त भंडार भी मौजूद है। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाने वाला एक और तेल खनन की जरूरत फिलहाल नहीं है, जो पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो। अमेजन रीफ न सिर्फ अपने आसपास, बल्कि पूरी दुनिया में पर्यावरण को बचाए रखने, कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायक है। इसीलिए इसे बचाया जाना जरूरी है। यह वैश्विक तापमान को 1.5 सेल्सियस डिग्री से आगे नहीं बढ़ने देने में भी सहायक है। इसीलिए जरूरी है कि तेल कंपनियों द्वारा राजनीतिक व आर्थिक सत्ता पर कब्जा करने की कोशिशों पर विराम लगाया जाए। अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देना है तो अमेजन रीफ को बचाना ही होगा तथा जीवाश्म इंधनों के इस्तेमाल के खात्मे की ओर बढ़ना होगा।


पर्यावरण विशेष

05 - 11 जून 2017

गुड न्यूज

प्रदूषित नदी भी स्वच्छ है जहां

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निर्मल गोमती

गोमती के जल को लखनऊ से कुछ किलोमीटर पहले के गांव वाले रोजाना पीते हैं

एक नजर

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एसएसबी ब्यूरो

श में जिन नदियों के प्रदूषण को लेकर चिंता जताई जाती है, उसमें गोमती नदी भी शामिल है। पर दिलचस्प है कि उसी गोमती के पानी को लखनऊ से कुछ किलोमीटर पहले के गांव वाले रोजाना पीते हैं। गोमती के पानी से कई घरों का खाना पकता है। दूर-दराज के खेत खलिहानों में जब इस चटक धूप में प्यास लगती है तो वह भी इसी गोमती के पानी से प्यास बुझाता है। नदी के किनारे बसे गांव वालों का कहना है कि आज तक उनके इलाके में न तो कभी गोमती की सफाई हुई और न ही कभी कोई विभाग का अधिकारी गोमती की सफाई के नाम पर आया। बरसों से लखनऊ जिले में गोमती का पानी सदैव निर्मल होकर बहता रहा है। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि इस इलाके में गोमती का जल बेहद निर्मल और शुद्ध है। इटौंजा से पांच किलोमीटर दूर माल रोड गोमती पुल के किनारे पर गांव है, बसहरी घाट। इस गांव के शिवकुमार और धीरेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि उनकी उम्र तीस साल से ज्यादा हो गई है, लेकिन आज तक उन्होंने कभी भी गोमती को इस इलाके में गंदा देखा ही नहीं। वे कहते हैं कि कभी कभार जब तेज हवाएं चलती हैं या फिर बरसात में पीछे से गंदा पानी आता है, लेकिन वह भी तेज बहाव के चलते कुछ दिनों में साफ हो जाता है। गांव की महिलाएं भी नदी के घाट पर रोजाना पानी लेने पहुंचती हैं। गांव के लोगों का कहना है कि आज तक उन्होंने तो कभी नहीं देखा कि उनके गांव

लखनऊ पहंुचने से पहले तक गंदी नहीं है गोमती

ऐसे निर्मल है गोमती

• गोमती नदी में इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी (ईसी) का स्तर बसहरी घाट पर तकरीबन 300 सौ के करीब है • लखनऊ शहर के गऊघाट पर ईसी का स्तर 380 से 450 के करीब है

• लखनऊ के शहीद स्मारक पर 659 से 746 के करीब ईसी का स्तर है

• गोमती नदी में कॉलीफॉर्म काउंट का स्तर बसहरी घाट पर तकरीबन सौ मिलीलीटर पानी में पांच का है • यही कॉलीफॉर्म काउंट गऊघाट पर बढ़ जाता है, लेकिन शहीद स्मारक तक आते-आते इसका प्रति सौ मिलीलीटर पर कॉलीफॉर्म काउंट 35000 से 50000 तक हो जाता है • बसहरी घाट पर गोमती नदी के पानी का पीएच लेवल 6.5 से 7.5 है • लखनऊ शहर के गऊघाट पर यह स्तर बढ़कर 7.5 हो गया

• शहीद स्मारक पर गोमती में यह स्तर पर बढ़कर 7.8 हो जाता है की नदी की कभी सफाई हुई हो या कोई अधिकारी या इंजीनियर नदी को साफ करने के लिए आए हो। इस इलाके में बसहरी, अकड़रिया, अटरिया, लासा, हुहरा समेत दर्जनों गांव गोमती नदी के अविरल जल को शुद्ध मानते हुए न सिर्फ पानी पीते हैं, बल्कि खाने से लेकर पूजा अर्चना तक करते हैं।

स्वच्छता की गहराई

गोमती का पानी कितना साफ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नदी की तकरीबन

18 फीट की तलहटी एकदम साफ दिखती है। यही नहीं, नदी के कई फीट गहरे शैवाल तक साफ-साफ इस जगह पर देखे जा सकते हैं। पानी की सफाई का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि बच्चे नदी में सिक्के डालकर उसको देखते हैं और मैग्नेट से उसको चिपका कर ऊपर उठा लेते हैं। नदी में तैरते हुए बच्चे जब डाइव लगाते हैं तो आप उनको वहां के पुल से साफ-साफ नदी की तलहटी में जाते हुए देख सकते हैं।

गोमती का पानी कितना साफ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नदी की तकरीबन 18 फीट गहरी तलहटी एकदम साफ दिखती है

गांव के लोग पीते हैं गोमती का पानी लखनऊ आकर मैली होती है गोमती

डेढ़ हजार करोड़ रुपए खर्च

गोमती को साफ करने और लखनऊ के रिवरफ्रंट को डेवलप करने के लिए अब तक तकरीबन डेढ़ हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है कि गोमती उससे भी ज्यादा गंदी हो चुकी है। नदी एवं पर्यावरण वैज्ञानिक बताते हैं कि लखनऊ में रिवरफ्रंट को जिस तरह से डेवलप किया गया है वह तरीका ही ठीक नहीं है। यह न सिर्फ रुपयों की बर्बादी है, बल्कि नदी को मारने जैसा है। इसीलिए मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने सबसे पहले गोमती रिवर फ्रंट का ही जायजा लिया। इससे जाहिर है कि गोमती की निर्मलता उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में एक है। पीलीभीत के माधोटांडा से निकली गोमती जिनजिन गांवों से होकर आती है, उनमें से अधिसंख्य जगहों पर उसका पानी पीने लायक है। इस नदी के किनारे बसे गांवों के लोग गोमती का पानी पीते हैं। उनकी अपनी रिसर्च भी बताती है कि गोमती में पीने वाले पानी के जो तत्व होने चाहिए, वह लखनऊ से पहले तक मौजूद रहते हैं। वैसे गोमती जिस तरह से लखनऊ में आकर गंदी होती है उतनी गंदी गोमती कहीं नहीं है, क्योंकि इस वक्त लखनऊ के 38 गंदे नाले इसमें गिरते हैं।


24 स्वच्छता

05 - 11 जून 2017

‘वेस्ट’ में भी बनें ‘बेस्ट’

पर्यावरण विशेष

कचरा प्रबंधन

कचरे का बढ़ता अंबार हमारे समय की बड़ी चुनौती है। अच्छी बात यह है कि कचरा प्रबंधन को लेकर अब सरकार और समाज दोनों ज्यादा तत्पर और जागरूक हैं

स्वीडन से सीखें कचरा प्रबंधन

n कचरा मुक्त बनाने के लिए यूरोपीय देश स्वीडन ने 1904 में पहला वेस्ट टू एनर्जी संयंत्र लगाया और 1975 तक अपना 38 फीसद कचरा रिसाइकिल करने लगा n 1985 से यह देश 99 फीसद कचरे को रिसाइकिल कर रहा है n स्वीडन में मौजूद 32 रिसाइकिलिंग प्लांटों ने इसे जीरो-गारबेज (शून्य कचरा) राष्ट्र बना दिया है। हां कचरे से बिजली पैदा की जाती है जो 8.1 लाख घरों को रोशन कर रही है n स्वीडन में कचरा प्रबंधन के लिए रिहायशी इलाकों के 300 मीटर के दायरे में ही रिसाइकिलिंग स्टेशन मौजूद है और लोग जागरूक भी हैं। वे पहले से ही अपने घरों में प्लास्टिक, लोहे का सामान, न्यूज पेपर, रसोई का कचरा अलग-अलग कर के रखते हैं और इन्हें रिसाइ​िकलिंग स्टेशन पर देते हैं n 50 फीसद कचरे की रिसाइकिलिंग करने के बाद इसे दोबारा इस्तेमाल किया जाता है और 50 फीसद कचरे को जलाकर ऊर्जा पैदा की जाती है n कचरे से बिजली पैदा करने के लिए स्वीडन हर साल अन्य देशों से 7 लाख टन कचरे का आयात भी करता है n ऊर्जा संयंत्रों में जलने के बावजूद कचरे की राख में कुछ चीजें रह जाती हैं, ये या तो धातु होती है या टाइल्स या कंक्रीट जैसी चीजें। राख से निकालकर धातु पिघला दी जाती है और बाकी चीजों का इस्तेमाल सड़क बनाने में कर लिया जाता है

शहरों का कचरा

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एसएसबी ब्यूरो

च्छता को अपना संकल्प बनाकर आगे बढ़ रहे भारत के सामने ठोस कचरे का निपटान एक बड़ी चुनौती है। इन दिनों देश के शहरों से हर वर्ष 62 लाख टन कचरा निकलता है, जिसमें 5.6 लाख टन प्लास्टिक कचरा, 15 लाख टन ई-कचरा, 7 लाख टन खतरनाक औद्योगिक कचरा और 0.5 लाख टन मेडिकल कचरा है। इसके अलावा 75 फीसद सीवेज का भी सही ढंग से निपटारा नहीं हो पा रहा है। आलम यह कि नगरों-महानगरों के चारों ओर कचरे के ढेर ही ढेर नजर आते हैं। बात देश की राजधानी दिल्ली की करें तो यहां बारह बड़े कचरे के ढेर तो सात मंजिला इमारतों से भी ऊंचे हैं। यही हाल मुंबई का है। इस शहर में एक लाख टन कचरा यों ही खुले में पड़ा है। कचरे के ढेरों के पास झोपड़-पट्टियों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। इनके आसपास रहने वाले लोगों को गंभीर बीमारियों जैसे मलेरिया, टीबी, अस्थमा व चर्म रोगों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा कचरे से निकलने वाले खतरनाक रसायनों से जल,भूमि व वायु प्रदूषित हो रहे हैं। आज ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन समय की मांग है। इसके लिए कई उपाय किए जाने चाहिए। जैसे शहर की खाली पड़ी जमीन पर कूड़ा डालने से रोकना, सार्वजनिक जगहों पर जहां-तहां कूड़ा फैलाने वाले व्यक्ति को आर्थिक दंड देना, जो नगर निगम समय पर कूड़ा-कचरा न उठाए उन पर ठोस कार्रवाई करना और कचरे के पुनर्शोधन संयंत्रों की संख्या बढ़ाना आदि। ध्यान रखना होगा कि यह काम अकेले सरकारी स्तर पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए आम जनता को भी बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभानी होगी तब जाकर साफ-सुथरे

62 लाख टन कचरा हर साल निकलता है 5.6 लाख टन प्लास्टिक कचरा 15 लाख टन ई-कचरा 7.0 लाख टन खतरनाक औद्योगिक कचरा 0.5 लाख टन मेडिकल कचरा 75 फीसद सीवेज का भी सही ढंग से निपटारा नहीं होता और गंदगी मुक्त भारत की कल्पना साकार की जा सकेगी। अलबत्ता इस बीच कुछ अच्छी पहल भी हुई है। बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स सामान विनिर्माताओं ने खतरनाक ई-कचरा पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है। सरकार ने भी इसे रोकने के लिए नियम बनाए हैं। जहां सैमसंग, एलजी, वीडियोकॉन, पैनासोनिक, वर्लपूल और वोल्टास प्रमाणित रीसाइकलर्स से समझौते कर चुके हैं, तो वहीं कई और कंपनियां पर्यावरण मंत्रालय को अपनी समग्र योजना सौंप रही हैं। पर्यावरण मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए ई-कचरा (प्रबंधन) नियम2016के मुताबिक भारत में इलेक्ट्रॉनिक सामान के विनिर्माताओं को ई-कचरे के पुनर्चक्रण की व्यवस्था का खाका तैयार करना है। इसमें कचरे के प्रसंस्करण को लेकर उत्पादकों की जवाबदेही बढ़ाए जाने पर जोर दिया गया है, जो वे अपने उत्पादों से पैदा करते हैं और स्थानीय बाजार में बेचते हैं। दिलचस्प है कि देश में ई कचरे के प्रबंधन को संगठित स्वरूप देने और प्रक्रिया को पटरी पर लाने के लिए सरकार परंपरागत कचरा प्रबंधक 'कबाड़ीवालों' को भी इस काम में लगाने पर विचार कर रही है। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत अगले 10 साल में 3,00,000 कबाड़ी वालों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है, जिससे ई-कचरे का प्रभावी तरीके से संग्रह हो सके।

दुनिया का कचरा लाख टन कचरा पूरी दुनिया में रोजाना निकलता है लाख टन होगी 2025 तक कचरे की मात्रा लाख टन कचरा केवल भारत से निकलता है

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हल और पहल

v विश्व के सभी देशों में औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया बढ़ रही है। औद्योगिक समाजों में विभिन्न प्रकार के कूड़ा-करकट की मात्रा में वृद्धि होती जाती है। परंपरागत तौर पर मानव, पानी के द्वारा कूड़े-करकट एवं रासायनिक प्रदूषण को निपटाते रहते थे और गैसों को वायुमंडल में निष्कासित करते रहते थे

v पर्यावरण प्रदूषण में कूड़ा-करकट इत्यादि की बड़ी भूमिका है। यदि इसको खोदकर मिट्टी में दबाया जाए तो भूमिगत जल प्रदूषित हो जाता है और यदि नदी-नाला अथवा झीलों-तालाबों में डाला जाए तो उनका जल प्रदूषित होता है। पहले तो कूड़ा-करकट को इधर-उधर बिखेर दिया जाता था पर आज यह एक बड़ी समस्या का रूप धारण कर चुका है

v कूड़ा-करकट का कई प्रकार से प्रबंधन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कूड़ा-करकट को गड्ढा खोद कर दबाया जा सकता है, उसको खाद में बदला जा सकता है अथवा सागरों में डंप किया जा सकता है


05-11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

जल संरक्षण

मिलिए जौनपुर के ‘जल युवा’ से

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जल संरक्षण

एसएसबी ब्यूरो

जौनपुर के एक गांव से निकले युवक शारदेंदु सौरभ ने जल संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है

ल संकट हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या और चुनौती है। अच्छी बात यह है कि इस संकट से निपटने के लिए अब लोग महज सरकारों के मुखापेक्षी नहीं, बल्कि अपने-अपने स्तर से भी कारगर प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के अच्छे नतीजे भी आ रहे हैं। इस तरह की पहल से जुड़ी खास बात यह है कि लोग इस बहाने जल, जंगल और जमीन के अविवेकपूर्ण दोहन के प्रति जहां जागरूक हो रहे हैं, वहीं इनके संरक्षण के लिए तत्परता के साथ कदम उठा रहे हैं। युवकों में इस तरह की चेतना को देखना वाकई काफी सुखद और प्रेरक है। यहां हम बात कर रहे हैं गांव से निकले ऐसे युवक की, जिसने जल संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर, इलाहाबाद आदि जिलों में जल संरक्षण पर खासा काम कर चुके इस युवक का नाम है शारदेंदु सौरभ। सौरभ को जल संरक्षण के लिए किए कार्यों के लिए कई सम्मान मिल चुका है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बरसठी तहसील अंर्तगत दतांव गांव के रहने वाले 21 साल के सौरभ इस समय केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद में कानून के छात्र हैं। अध्ययन के दौरान भी उनका लगाव हमेशा जल संरक्षण को लेकर बना रहा। उन्होंने अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन और सहपाठियों व ग्रामीणों के सहयोग से अब तक कई तालाबों को पुनर्जीवित किया है। उनके इन प्रयासों में सबसे अहम है, अपना अस्तित्व खो चुकी जौनपुर की वसुही नदी को सदानीरा बनाए जाने के लिए निकाली गई वसुही जल संवाद यात्रा। शारदेंदु सौरभ अपने पिता और इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील जयशंकर मिश्र के साथ इलाहाबाद में रहते हैं। गर्मी की छुट्टी में वे जब गांव जाते थे तो पास की वसुही नदी और तालाबों को सूखा देखकर उनका मन विचलित हो जाता था। बस वहीं से शुरुआत हुई जल के लिए जिंदगी जीने की। आज इलाके में लोग सौरभ को ‘जलयुवा’ के नाम से पुकारते हैं।

सदानीरा बनेंगी नदियां

सबसे पहले जौनपुर जिले की वसुही नदी को बचाने के लिए सौरभ ने 2014 में वसुही जलसंवाद यात्रा निकाली। यह यात्रा उन्होंने अपने सहपाठियों तथा वसुही के किनारे केवला प्रसाद महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं के सहयोग से की। वसुही समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए उन्होंने जौनपुर के जिलाधिकारी, तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव को भी पत्र लिखा था। सरकारी संज्ञान में आने के बावजूद वसुही

एक नजर

वसुही नदी के संरक्षण के लिए निकाली जल संवाद यात्रा

कई तालाबों को भी नवजीवन दे चुके हैं शारदेंदु सौरभ 21 साल के सौरभ इस समय कानून की पढ़ाई कर रहे हैं

मित्रों के सहयोग को श्रेय देते हैं। यही कारण है कि जब भी उनसे नदियों-तालाबों के संरक्षण के लिए उनके उठाए कदमों की बात की जाती है तो वे अपने साथियों विभव मिश्र, सलिल दुबे, लव वर्मा, शाहबाज, दीपांकर मौर्य, विजय यादव जैसे कुछ साथियों का नाम लेना नहीं भूलते हैं। इसके साथ ही केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद के पूर्व कुलपति केजी श्रीवास्तव, अपने अधिवक्ता पिता जयशंकर मिश्र तथा बाम्बे हाईकोर्ट के अधिवक्ता महेश शुक्ल के मार्गदर्शन तथा आर्थिक सहयोग की भी चर्चा करना नहीं भूलते हैं।

पंचायत में बढ़ी जागरुकता के लिए तो कोई खास काम नहीं हुआ, पर वरुणा के लिए जरूर कुछ पहल हुई। सौरभ इलाहाबाद में गंगा और यमुना की स्वच्छता को लेकर भी कई जागरुकता कार्यक्रम कर चुके हैं। वे निकट भविष्य में जौनपुर की सभी पांच नदियों (पंचगंगा), जिनमें गोमती, पीली, सई, वसुही, वरूणा की स्वच्छता और उन्हें सदानीरा बनाने के लिए कार्य करना चाहते हैं।

तालाबों को नवजीवन

जौनपुर में बंधवा बाजार के पास एक प्रदूषित तालाब को स्वच्छ करवाने में सौरभ ने स्थानीय सहयोग से एक सफल कोशिश की। उन्होंने बरसठी के गंगादीन रामकुमार इंटरमीडिएट कालेज के छात्रों के सहयोग से तालाब से सिल्ट को हटाया। यह काम उन्होंने साल 2015 से शुरू किया था। देखते-देखते आज इस तालाब की सूरत ही बदल गई है। फलस्वरूप जिस तालाब का पानी पीकर पशु-पक्षी अपनी जान तक गंवा बैठते थे, आज उसी तालाब के पानी में आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होने से पशु-पक्षियों की प्यास बुझ रही है। बरसठी तहसील के बारी गांव स्थित शांति निकेतन स्कूल के छात्र भी उनकी मुहिम से जुड़े।

इससे स्कूल के आसपास अनेक तालाबों की जिंदगी बदली और लोगों को तालाबों का महत्व समझ में आया। इसी तरह बरसठी तहसील के ही दतांव और तिवारीपुर गांव के बीच ‘बूढ़ी का तारा’ तालाब से सिल्ट को भी उनकी पहल से हटाया गया। शारदेंदु सौरभ इसके अलावा बसहरा, दियावा, सोतीपुर, पाडेंयपुर जैसे गांवों में भी तालाबों को बचाने की मुहिम चला रहे हैं। विनम स्वभाव के सौरभ नहीं मानते कि जल संरक्षण को लेकर उन्होंने कोई बड़ा कार्य किया है। वे हमेशा इसके लिए समाज और

निकट भविष्य में शारदेंदु सौरभ जौनपुर की सभी पांच नदियों (पंचगंगा), जिनमें गोमती, पीली, सई, वसुही, वरूणा की स्वच्छता और उन्हें सदानीरा बनाने के लिए कार्य करना चाहते हैं

शारदेंदु सौरभ की पहल से बरसठी तहसील के कई ग्राम प्रधान जल संरक्षण को लेकर जागरूक हुए हैं। जौनपुर के मछलीशहर थाना अंतर्गत तिलोरा गांव (अलापुर) के प्रधान महेश तिवारी व सोतीपुरा, पांडेयपुरा, बसहरा समेत अन्य गांवों के प्रधानों के लिए सौरभ एक प्रेरक युवा हैं। ये सभी सौरभ के कार्य शैली के कायल हो चुके हैं। अलापुर गांव के प्रधान महेश तिवारी साफ स्वीकार करते हैं, ‘शारदेंदु सौरभ की कोशिशों से इलाके में जल की उपलब्धता और उसकी स्वच्छता की स्थिति में काफी सुधार आया है। अब क्षेत्र के लोग जल संरक्षण के प्रति जागरूक हैं और इसके लिए हर तरह की पहल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते हैं।’

सम्मान और पुरस्कार

सौरभ के कार्यों को देखते हुए कई संस्थान उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। 2013 में रामकृष्ण मिशन तथा गुजरात के राज्यपाल के द्वारा भी वे सम्मानित हो चुके हैं। सौरभ को राष्ट्रीय युवा पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका हूं। अलबत्ता सौरभ इन पुरस्कारों और सम्मानों से अहम उस जागरुकता और सहयोग की भावना को मानते हैं, जिसका निर्माण बीते कुछ सालों में जल संरक्षण को लेकर जौनपुर और इलाहाबाद से लगे क्षेत्रों में अपने सहयोगियों के साथ काम करने में हुआ है। कहना नहीं होगा कि जौनपुर का यह ‘जल युवा’ अगर इसी प्रेरणा और निष्ठा से अपने कार्य में लगा रहा तो उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र जल संरक्षण का एक सफल मॉडल बन जाएगा।


26 जागरुकता

05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष नदी

संरक्षण

...ताकि गाद से न रुके नदी का बहाव

गाद के कारण नदियों का बहाव तो प्रभावित होता है पर जरूरी है कि इसका कोई कृत्रिम समाधान खोजने के बजाय नदी की संरचना से मेल खाते किसी रास्ते पर विचार किया जाए

एक नजर

गाद के जमने से नदी का प्रवाह बदल जाता है

नर्मदा की मुख्य धारा में रेत खनन पर रोक

अरुण तिवारी

दियों के पुनर्जीवन और उसे सदा-सलिला बनाने के लिए न सिर्फ जागरुकता बढ़ी है, बल्कि कई अच्छे प्रयास भी हो रहे हैं। बेहतर होगा कि नदी को लेकर चिंता जताने वाले सभी लोग, इससे जुड़े सभी वैज्ञानिक इसके व्यावहारिक पहलुओं को समझें। इस लिहाज से नदी की बनावट और उसके बहाव से जुड़ी कुछ मोटी बातों की जानकारी सबसे ज्यादा जरूरी है, मसलन सैंड, सेडिमेंट और सिल्ट यानी रेत, गाद और तलछट। सबसे मोटा कण रेत, उससे बारीक गाद और उससे बारीक कण को तलछट कहते हैं। रेत, स्पंज की तरह होता है। इस नाते रेत का काम होता है, नदी के पानी को सोखकर उसे सुरक्षित रखना। नदी से जितना अधिक गहराई से रेत निकालते जाएंगे, नदी की जलसंग्रहण क्षमता उतनी कम होती जाएगी। इसके मद्देनजर गहराई का उचित आकलन कर ही रेत खनन को संचालित किया जा सकता है। इसी कारण मध्य प्रदेश शासन ने आईआईटी, खड़गपुर की रिपोर्ट आने तक नर्मदा की मुख्य धारा

में रेत खनन पर रोक लगा दी है। तलछट का काम होता है, नदी के तल में कटाव व ढाल की रूपरेखा तैयार करना। तलछट के साथसाथ छेड़छाड़ करेंगे, तो नदी का बहाव और उसकी गति प्रभावित होगी। गाद को नदी के पानी के साथ क्रिया करके नदी जल की गुणवत्ता बढ़ानी है। गाद को नदी किनारे फैलकर, नदी का उपजाऊ मैदान बनाना है, मैदान को ऊंचा करना है। समुद्र किनारे डेल्टा का निर्माण करना है। समुद्र में मिलकर उन मूंगा भित्तियों का आवास बनाना है, जिन्हें कार्बन अवशोषण की सबसे उत्तम प्राकृतिक प्रणाली माना जाता है। इस सभी को करने के लिए गाद को बहकर आगे जाना है। इस नाते गाद, वरदान है, किंतु यदि यही गाद नदी के मध्य में ही सिमटकर बैठ जाए, तो समस्या है। गाद जैसे ही नदी के बीच में जमेगी, नदी का

प्रवाह बदल जाएगा। नदी कई धाराओं में बंटेगी, किनारों को काटेगी, तबाही लाएगी। यदि गाद किनारे से बाहर नहीं फैली, तो नदी के मैदान का उपजाऊपन और ऊंचाई दोनों घटने लगेंगे। ऊंचाई घटने से किनारों पर बाढ़ का दुष्प्रभाव अधिक होगा। डेल्टा तक गाद नहीं पहुंची, तो डेल्टा भी डूबेंगे। कार्बन का 90 प्रतिशत अवशोषण समुद्र ही करता है। गाद को रास्ते में रोककर हम समुद्र की कार्बन अवशोषण शक्ति के घटाएंगे। परिणामस्वरूप, वायुमंडल का ताप बढे़गा, मौसम बदलेगा और अंततः हम सभी उसके शिकार होंगे। स्पष्ट है कि वायुमंडल के ताप, मौसम, उपजाऊपन, डेल्टा, बाढ़ के दुष्प्रभाव और नदी की जैव विविधता से गाद का बेहद गहरा रिश्ता है। इस रिश्ते के नाते गाद का नदी के बीच में ठहर जाना, नदी के कम बहाव और अधिक मलीनता से कम

बैराजों के फाटक प्रवाह के वेग को इतना धीमा कर देते हैं कि गाद, पानी के साथ बह नहीं पाती। पानी आगे बह जाता है और गाद नीचे बैठ जाती है

गंगा में जैव विविधता का संकट गहरा गया है

गंभीर मुद्दा नहीं है। उत्तर प्रदेश से पश्चिमी बंगाल तक गंगा के मध्य रुक गई गाद के कारण कटान का नया संकट पैदा गया है। माल्दा और मुर्शिदाबाद जिलों के कई गांव कटकर अपना अस्तित्व खो चुके हैं। जिस सुल्तानगंज में नदी कभी 80 फीट तक गहरी थी, वहां ऊपर उठा तल अब एक बड़ी समस्या है। गाद नहीं पहुंचने के कारण, सुंदरबन का लोहाचारा द्वीप डूब चुका है। कई पर डूबने की चेतावनी चस्पां हो गई है। संकट, गंगा जलमार्ग परियोजना के अस्तित्व पर भी जा पहुंचा है। गंगा में जैव विविधता का संकट गहरा गया है, सो अलग। समाधान पर पहुंचने से पहले एक बात सदैव याद रखने की है कि गंगा कोई एक नदी नहीं, गंगा बेसिन के सैकड़ों नदियों, प्रवाहों, वनस्पतियों, जीवों, सूरज, तल, मिट्टी, हवा और ग्लेशियर ने मिलकर इसका निर्माण किया है। इस भौतिक स्वरूप के मद्देनजर, आज हमारे सामने गंगा गाद संकट के तीन समाधान हैं: पहला कि गंगा में आने वाली गाद


पर्यावरण विशेष

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जागरुकता

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गंगा को बहने देने के लिए तय करना होगा कि गंगा पर अब और बांध-बैराज न बनें। बन चुके बांध-बैराज सतत इतना प्रवाह अवश्य छोड़ें, ताकि गाद का प्रवाह बाधित न हो

खास बातों की गंगा

• गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है, जो कुमायूं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है • गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊंचाई समुद्र तल से 3140 मीटर है

• गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियां यमुना, रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं • दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलने वाली प्रमुख नदियां चंबल, सोन, बेतवा, केन, दक्षिणी टोस आदि हैं

• यमुना गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है, जो हिमालय की बंदरपूंछ चोटी के आधार पर यमुनोत्री हिमखंड से निकली है • उत्तराखंड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक गंगा विशाल भू-भाग को सींचती है

• 2, 071 किमी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है

• गंगा नदी को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो गंगा जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है, हालांकि इसे दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रयास जारी है • डॉलफिन की दो प्रजातियां गंगा में पाई जाती हैं, जिन्हें गंगा डॉलफिन और इरावदी डॉलफिन के नाम से जाना जाता है • शार्क की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है की मात्रा नियंत्रित की जाए। दूसरा, गाद को गंगा में बहने दिया जाए। तीसरा यह कि गाद को गंगा किनारे के मैदानों पर फैलने से न रोका जाए। गाद समस्या से निपटने के लिए ये तीनों ही समाधान जरूरी हैं, लेकिन यह हो। प्रथम समाधान हासिल करने के लिए समझना होगा कि बिहार की गंगा समेत कई मुख्य नदियों के मूल स्रोत हिमालय में स्थित हैं। हिमालय अब भी निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा है। हिमालय जितना हिलेगा, उतना झड़ेगा। हिमालय में भूकंप की आवृति जितनी बढ़ेगी, बिहार की नदियों में उतनी गाद बढ़ेगी। सुरंग, विस्फोट, चौड़ी सड़कें, जंगल कटान, अधिक निर्माण, अधिक वाहन, अधिक शोर, अधिक छेड़छाड़ – ये सभी हिमालय को हिलाने के काम हैं। जैसे ही हिमालय में उक्त गतिविधियां नियंत्रित होंगी; उ.प्र., बिहार, झारखण्ड और पश्चिम

बंगाल की गंगा में गाद की मात्रा स्वतः नियंत्रित होने लगेगी। नियंत्रण के लिए मिट्टी के कटाव को रोकने का काम गंगा प्रदेशों में अपने-अपने भूगोल में भी करना होगा। वर्षाजल को धरती के पेट में बिठाकर, मिट्टी की नमी बढ़ाकर तथा छोटी वनस्पतियों का परिवार बढ़ाकर यह संभव है। यमुना में गाद को बहने के लिए 0.75 मीटर प्रति सेकेंड की गति का प्रवाह चाहिए। यह गति ही है, जो किसी भी नदी की गाद की प्राकृतिक तौर पर निकासी यानी डेजिंग करता रहती है। बांध-बैराजों के फाटक प्रवाह के वेग को इतना धीमा कर देते हैं कि गाद, पानी के साथ बह नहीं पाती। पानी आगे बह जाता है। गाद नीचे बैठ जाती है। फरक्का बैराज में 108 फाटक हैं। इन फाटकों के बीच जगह इतनी कम है कि गाद बैराज से पहले ही रुकने लगी है। इस रुकावट ने पटना, गाजीपुर तक गाद के प्रवाह के

वेग को प्रभावित किया है। वेग बढ़ाने के लिए गंगा को 700 मीटर की चैड़ाई में बांध देने की वकालत करना अपने-आप में दूसरे विनाश को आमंत्रित करना है। गंगा को बहने देने के लिए तय करना होगा कि गंगा के मध्य अब और बांध-बैराज न बनें। बन चुके बांध-बैराज सतत इतना प्रवाह अवश्य छोड़ें, ताकि गाद का प्रवाह बाधित न हो। इसके लिए यदि डिजाइन बदलना हो, तो बदलें; ढांचे को ढहाना हो, तो ढहायें। प्रवाह बढ़ाने के लिए गंगा बेसिन की हर नदी और प्राकृतिक नाले में पानी की आवक भी बढ़ानी होगी। इसके लिए छोटी नदियों को पुनर्जीवित करना होगा। शोधित जल नहर में और ताजा पानी नदी में बहाना होगा। नदियों को सतह अथवा पाईप से नहीं, बल्कि भूगर्भ तंत्रिकाओं के माध्यम से जोड़ना होगा। जहां कोई विकल्प न हों, वहां छोड़कर अन्यत्र लिफ्ट

कैनाल परियोजनाओं को न बोलना होगा। जलदोहन नियंत्रित करना होगा। वर्षा जल संचयन ढांचों से कब्जे हटाने होंगे। जितना और जैसा जल जिससे लिया, उसे उतना और वैसा जल वापस लौटाना होगा। गंगा और इसकी सहायक नदियों में रेत खनन नियंत्रित करने से नदी जलसंग्रहण क्षमता बढ़ेगी। इससे भी गंगा का प्रवाह बढ़ेगा। ‘नीरी’ नामक संस्था का मत यह है कि गंगा की कुल गाद का 0.1 से 0.2 तक प्रतिशत होने के बावजूद यह कारण इसीलिए है, चूंकि यह गाद में मिलकर सीमेंट की तरह सख्त हो जाता है और गाद को बहने से रोक देता है। कृत्रिम तौर पर गाद की निकासी निश्चित तौर पर इसका समाधान नहीं है। नचिकेत केलकर की रिपोर्ट कहती है कि मशीनों द्वारा गाद निकासी के बाद भागलपुर में नदी मध्य गाद बढ़ी और किनारों पर घटी है। इस कारण डूब और कटान की समस्या और बढ़ी है। प्रो. कल्याण रुद्र की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फरक्का बैराज से पहले हुगली में से एक वर्ष में जितनी गाद निकाली जाती है, उससे दोगुना जमा हो जाती है। कृत्रिम गाद निकासी के लिए तय 300-350 करोड़ का बजट व्यर्थ ही जाता है। इससे गंगा तल में इस छेड़छाड़ से जलजीवों के जीवन में दुश्वारियां और गंगा जल की गुणवत्ता में जो दुष्प्रभाव बढ़ रहा है, सो अलग है। तीसरा समाधान हासिल करने के लिए से पहले जवाब चाहिए कि गंगा को नदी किनारे के मैदानों में बहने से रोका किसने है? गाद को किनारे बहाकर ले जाने का काम बाढ़ का है। पहली रोक तो बाढ़ मुक्ति के नाम पर बने तटबंधों ने लगाई। दूसरी रोक, नदी भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण और निर्माण के कारण लगी है। पटना में राजेन्द्र नगर जैसी बसवाटों ने क्या किया है ? सारी सभ्यताएं नदी के ऊंचे तट की ओर बसाई गईं। हम निचले तट की ओर भी निर्माण कर रहे हैं। इस तरह नदी किनारे की प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली में अवरोध पैदा करके हमने तीसरी रोक लगाई है। हमने छोटी-छोटी नदियों, नालों और प्राकृतिक तौर पर उबड़-खाबड़ भूगोल के जलनिकासी महत्व का समझे बगैर उन पर कब्जे और निर्माण नियोजित किए हैं। चौथी रोक, आने वाला मल है। पांचवीं रोक का काम नदियों में अंधाधुंध रेत खनन ने किया है। रेत खनन, किनारों को गहरा करता है। गहरे किनारे गाद को फैलने से रोकते हैं। पहले आप्लावन नहरें पलट पानी और गाद को खेतों तक ले जाती थी। आप्लावन नहर प्रणाली अब लगभग नष्ट हो चुकी है। इनका नष्ट हो जाना गाद को फैलने देने में बाधक छठी रोक है। स्पष्ट है कि आप्लावन नहरें होंगी, तो गाद फैलेगी। रेत खनन घटेगा, तो गाद फैलेगी। गंगा बाढ़ क्षेत्र में निर्माण घटेगा, तो गाद फैलेगी। गंगा में मल घटेगा, तो गाद बहेगी।


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पर्यावरण विशेष आदिवासी

परंपरा

‘हलमा’ ने बुझाई हजारों गांवों की प्यास मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में आदिवासियों की ही एक पुरानी परंपरा के जरिए जलस्रोतों को फिर से पानीदार करने की कोशिश में जुटे हैं समाजसेवी महेश शर्मा

पू

एसएसबी ब्यूरो

रे देश में पारा आसमान छू रहा है। लू के कारण लोगों के मरने तक की खबरें आ रही हैं। सरकार से लेकर सामाजिक संस्थाएं ऐसे में लोगों को सूर्य की तपिश से बचाने में जुटी हैं। कहीं प्याऊ से लोगों की प्यास बुझाई जा रही है तो, कहीं तपती सड़कों पर पानी का छिड़काव किया जा रहा है। ऐसे में रोना इस बात का बढ़ जाता है कि कैसे हमने अपने जलस्रोतों को गंवाया है। अखबारों में भी इस बारे में कई खबरें इन दिनों छप रही हैं। ऐसे में एक आदमी अपनी जिद में गांव–गांव सूखे तालाबों को गहरा करवाने, नए तालाब बनाने और जंगलों को सुरक्षित करने की फिक्र में घूम रहा हो तो

इस जज्बे को तो सलाम करने की हसरत किसी के भी मन में होगी। दरअसल, हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के झाबुआ इलाके में करीब तेरह सौ गांवों को पानी और पर्यावरण संपन्न बनाने में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता महेश शर्मा की।

चार दशकों से सक्रिय

महेश शर्मा करीब चार दशकों से स्वस्थ पर्यावरण के लिए काम कर रहे हैं। अलबत्ता बीते एक दशक से उन्होंने अपना पूरा फोकस आदिवासी गांवों पर ही कर दिया है। इस बीच, उन्होंने आदिवासियों की अल्पज्ञात परंपरा ‘हलमा’ को पुनर्जीवित किया तथा पंद्रह हजार से ज्यादा आदिवासियों के साथ मिलकर खुद श्रमदान करते हुए झाबुआ शहर के पास वीरान

हो चुकी हाथीपावा पहाड़ी पर पचास हजार से ज्यादा कंटूर ट्रेंच (खंतियां) खोद कर साल दर साल इसे बढ़ाते हुए पहाड़ी को अब हरियाली का बाना ओढ़ा दिया है। आदिवासी समाज को पानी की महत्ता के प्रति जागरूक कर उन्होंने सामूहिक श्रमदान से बिना किसी बड़े बजट इलाके में कई तालाब बनवाए हैं। दर्जनभर जंगली इलाकों को सुरक्षित कर उनमें लकड़ी कटाई पर पूरी तरह पाबंदी लगाई है। बड़ी जल यात्राएं निकालकर लोगों से बारिश का पानी रोकने का आह्वान किया। मवेशियों सहित जंगली जानवरों के लिए पानी-पर्यावरण की चिंता सहित उनके किए गए कामों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। इन दिनों, वे आदिवासी गांवों में 11 नए तालाब, छह जंगल सुरक्षित करने सहित अगली बारिश का

एक नजर

अभी तक करीब 1300 गांवों को पानीदार कर चुके हैं महेश शर्मा जल स्रोतों को नवजीवन देने में स्थानीय लोग करते हैं श्रमदान

तालाबों को सजल करने के अलावा वन संरक्षण में भी जुटे हैं शर्मा

बूंद–बूंद पानी धरती में रोकने की जिद में जुटे हैं।

बीस की उम्र में त्यागा घर

सामाजिक सरोकारों के कारण ही उन्होंने महज बीस


पर्यावरण विशेष साल की उम्र में अपना घर–बार छोड़ दिया और तब से अब तक अविवाहित रहते हुए वे लगातार समाज के लिए काम कर रहे हैं। वे बताते हैं कि मध्य प्रदेश के दतिया से करीब 24 किमी दूर बडौनी के पास घुगसी गांव में जन्म के बाद 1976-77 में जब वे एमएलबी कॉलेज ग्वालियर से स्नातक कर रहे थे, इसी दौरान देश में आपातकाल घोषित हो गया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश का बड़ा युवा तबका संपूर्ण क्रांति से जुड़ गया। इसी दौरान हजारों कॉलेज विद्यार्थियों के साथ उन्होंने भी देश और समाज के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन प्रारम्भ किया। वे बताते हैं कि इस आंदोलन के बाद फिर घर नहीं लौटे। बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। महेश शर्मा 1997-98 में ग्वालियर से करीब 800 किमी दूर पश्चिमी मध्य प्रदेश के सीमावर्ती झाबुआ जिले में आदिवासियों के बीच काम करने पहुंचे। झाबुआ प्रदेश के सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में गिना जाता है। कभी यह इलाका दुर्गमता की वजह से काला पानी माना जाता था। जिन सरकारी अधिकारियों की यहां तैनाती होती, वे इसे काला पानी की सजा की तरह मानते थे। करीब 3,782 वर्ग किमी में फैले इस जिले की ढालू जमीन होने से बारिश का ज्यादातर पानी नदी नालों में बह जाता है। धरती प्यासी ही रह जाया करती है। यहां की औसत बारिश 800 मिलीमीटर है। पानी के वैकल्पिक संसाधन नहीं होने से धरती का उजाड़ होना नियति बन चुका है। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां दस लाख 25 हजार आबादी में अधिकांश (करीब 87 फीसदी) ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी हैं। यहां साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम 44.45 फीसदी ही है, लेकिन महिलाओं को सम्मान देने तथा वधू मूल्य जैसी परंपराओं की वजह से लिंगानुपात सर्वाधिक 989 है। उन्होंने देखा कि गुजरात और राजस्थान से सटे इस इलाके में लाखों आदिवासी कड़ी मेहनत और कर्मठ प्रकृति के होने के बाद भी ठीक से दो समय का भोजन भी नहीं कर पाते हैं। यहां पानी की बहुत कमी होने से ऊसर और उजाड़ धरती है। यहां सूखे जैसे हालात होने से अधिकांश जमीन बिना खेती की ही है। जहां खेती होती है, वहां भी छोटी–छोटी पहाड़ियों और मैदानों से घिरे होने से ज्यादातर किसान एक ही फसल ले पाते हैं। यहां कृषि जोतों का औसत आकार 1.6 हेक्टेयर ही है और महज 22.8 प्रतिशत क्षेत्र में ही सिंचित खेती हो पाती है। आजादी के इतने सालों के बाद भी आदिवासियों की इस स्थिति ने उन्हें भीतर ही भीतर विचलित कर दिया। उन्हें लगा कि असली आजादी के मायने तभी पूरे हो सकेंगे, जब इन आदिवासी परिवारों के चेहरे पर उम्मीद और खुशियों की रौनक बिखेर सकेंगे। हैरत की बात थी कि जब वे ऐसा सोचसमझ रहे थे, तब उन्हें इनकी बोली की समझ भी नहीं थी। दरअसल इस इलाके में रहने वाले भील और भिलाला भीली और भिलाली बोली बोलते हैं। विकास की मुख्य धारा से कटे होने तथा सुदूर जंगलों में रहने के कारण ये लोग ठीक से हिंदी में बात भी नहीं कर पाते। यहां तक कि कई आदिवासी तो अब

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कायाकल्प

आदिवासियों की पानीदार परंपरा

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‘हलमा’ एक आदिवासी परंपरा है। इस परंपरा में पर्यावरण सुरक्षा के लिए आदिवासी समाज खुशी-खुशी सामूहिक श्रमदान करता है

हलमा’ आदिवासियों की बड़ी पुरानी परंपरा है। इसमें आदिवासी समाज सामूहिक श्रमदान करते हुए प्रकृति और पर्यावरण के लिए निशुल्क काम करता है। यह परंपरा अब इस समाज से लगातार विस्मृत होती जा रही थी, लेकिन महेश शर्मा को लगा कि उनके हाथ सौ तालों की एक चाबी लग गई है, इसी को आधार बनाकर वे समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। उन्हें शुरुआत में इसे लेकर चिंता थी कि ‘हलमा’ बहुत अच्छी परंपरा तो है, लेकिन यह किसी तरह यहां के पर्यावरण के लिए एक बड़ी ताकत बन सके तो ये खुद बिना किसी बड़े जतन और खर्च अपना काम कर सकेंगे। यह उन्हें अपने संकट से उबार सकती है और गांव के सारे दुख का निजात इसी से संभव है। उन्होंने 2008 में पहली बार हजारों आदिवासियों को शिवगंगा अभियान से जोड़ते हुए झाबुआ की हाथीपावा पहाड़ी को हरा–भरा बनाने के लिए गांव–गांव जाकर हजारों आदिवासी परिवारों को अपने कुदाल–फावड़े के साथ आमंत्रित किया। पहले ही प्रयास में करीब दो हजार से ज्यादा आदिवासी अपने गांवों से ‘हलमा’ करने के लिए एक दिन पहले यहां पहुंचे और अलसुबह से दोपहर तक उन्होंने पहाड़ी पर हजारों जल संरचनाएं बना डाली। इन लोगों ने अपने इस

काम के लिए एक पैसा नहीं लिया। इससे पूरे इलाके में उत्साह का नया संचार हुआ और लोगों के बीच विश्वास जगा कि हम खुद अपनी किस्मत बदल सकते हैं। दो हजार लोगों का यह आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते अब 15-20 हजार तक पहुंच गया है।

जिस इलाके में ‘हलमा’ किया जाता है, वहां पहले उजाड़ और ऊसर हुआ करती थी, लेकिन अब वहां हर बारिश के बाद आठ फीट ऊंचाई तक घास के बड़े-बड़े मैदान बनते हैं। पहाड़ी की दूसरी तरफ का हिस्सा अब भी वैसा ही उजाड़ और ऊसर है तक हिंदी भी नहीं समझ पाते हैं। ऐसे इलाके में उनके लिए काम करना बहुत कठिन था, लेकिन उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और बीते बीस सालों से लगातार यहां काम में जुटे हैं।

निराशा दूर करने का संकल्प

उन्होंने गांवों में काम करने के दौरान यह पाया कि आदिवासी गांवों की निराशा में उम्मीद बोना है तो सबसे पहले उन्हें पानीदार बनाना होगा। पानीदार बनाने के सिवा उन्हें समृद्ध बनाने की कल्पना भी बेमानी है, लेकिन यह काम बहुत मुश्किल था। ऐसा वातावरण था कि बिना स्वार्थ कोई भी समाज या प्रकृति के लिए अपनी तरफ से कोई काम करना ही नहीं चाहता था। सब हाथ पर हाथ धरे सरकारों से काम कराने के लिए गुहार लगा रहे थे पर आगे बढ़कर काम कौन करे। उन्होंने इस बीच गांव–गांव से करीब 20-25 ऐसे युवा छांटे, जिनकी पानी और पर्यावरण पर समझ साफ थी और उन्हीं के जरिए गांव की जरूरतें निकाली। ये लोग उर्जा से भरे हुए थे और अपने गांव की समृद्धि के लिए कुछ करना

चाहते हैं। उन्होंने हर गांव में जाकर ग्रामीणों से बात की और पता लगाया कि गांव के दुःख क्या हैं। इससे पहले लोग अब तक व्यक्ति के दुःख की ही बात करते रहे थे। यह पहली बार था कि किसी ने उनके गांव के हाल चाल पूछते हुए उसके दुख मिटाने की बात की थी। ज्यादातर गांवों में बातचीत से यह बात सामने आई कि कहीं शिक्षा नहीं है, कहीं स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं, कहीं कानून-व्यवस्था में खामियां हैं। पर्यावरण बिगड़ जाने और आदिवासी समाज के प्रकृति से कटते जाने के कारण ही दिक्कतें पेश आ रही हैं। बात हुई कि अब उतने सघन जंगल नहीं रहे। पानी की लगातार कमी होती जा रही है। परंपरागत अनाज बोना कम हो गया। धरती में प्राकृतिक खाद की जगह रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल होने लगा। तालाब, नदियों और कुओं को समाज ने उपेक्षित कर दिया। इन सबमें मूल बात यही थी कि जीवन चक्र ही ठीक तरह से नहीं चल रहा है। पानी नहीं होने से ये सारी तकलीफें हमें बड़े रूप में दिखाई देती है। गांव–गांव पानी के संसाधन हों, अच्छी खेती हो, लोगों को पानी मिले तो धीरे–धीरे सब कुछ अच्छा हो सकता है। तो गांव

इसमें बड़ी कोशिश यह भी है कि गांव के सभी तबकों के लोग इसमें शामिल हों, यहां तक कि औरतें और बच्चे भी। लक्ष्य यही है कि गांव का सशक्तिकरण करते हुए वे खुद अपने आपको भी आंतरिक रूप से सक्षम बनाएं। का सबसे बड़ा दुख निकला पानी का नहीं होना।

जल यात्राएं

हर साल बारिश में पानी खूब आता है पर ढालू सतह से नदी-नालों में बह जाता है, इसे ही रोकना होगा। हम इसे रोकने की कला जानते हैं पर रोकते नहीं हैं। थोड़े-बहुत प्रयास से ही यह संभव है। फिर सबके बीच इस बात पर सहमती बनी कि इलाके में हम सब मिलकर जन, जल, जंगल, जमीन, जानवर और नव विज्ञान के काम करें तो हमारे गांव के दुख मिटेंगे और समृद्धि आएगी। गांव में हर व्यक्ति की समृद्धि गांव के पर्यावरण से ही संभव है तो क्यों न हम सब मिलकर ऐसे प्रयास करें कि हमारा पर्यावरण बेहतर हो सके। उन्होंने सैकड़ों आदिवासियों के साथ 2004 से 07 तक बड़ी जल यात्राएं निकालीं। पानी और पर्यावरण को लेकर गांव-गांव में अच्छा माहौल बनने लगा। लोगों को समझ आने लगा कि हमारी जिंदगी और गांव की बदहाली का कारण हम खुद ही हैं और हम ही इसे बदल सकते हैं। ग्रामीणों ने वह कहानी सुनी थी, जिसमें बहुत प्रयास करने के बाद भागीरथ गंगा को धरती पर अकाल से बचाने और समाज के उद्धार के लिए लाए। गंगा का बहाव तेज होने से पहले उसे शिव की जटाओं में उतारा और वहां से पर्वतों में उतरकर गंगा मैदानों में बहने लगी। उन्होंने इस कहानी से अपनी बात लोगों के बीच रखी। उन्होंने बताया कि जिस तरह उस समय भागीरथ ने पानी के लिए मेहनत की और शिव ने अपनी जटाओं में स्थान दिया। उसी तरह आज भी संकट की घड़ी है। पानी की कमी से हमारे इलाके में


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मवेशियों व जंगली जानवरों के लिए पानी-पर्यावरण की चिंता सहित महेश शर्मा के किए गए कामों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। इन दिनों, वे आदिवासी गांवों में 11 नए तालाब, छह जंगल सुरक्षित करने सहित अगली बारिश का बूंद–बूंद पानी धरती में रोकने की जिद में जुटे हैं अकाल जैसे हालात हैं। हम भागीरथ की तरह कोई नदी तो नहीं ला सकते, लेकिन अब हमें भागीरथ की तरह बारिश की एक-एक बूंद बचाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। जिस तरह गंगा शिव की जटाओं में आकर ठहरी, उसी तरह धरती, पहाड़ तालाब और छोटी पहाड़ियां हमारे पानी के लिए शिव की जटाएं हैं, इनमें बरसों की गाद–मिट्टी इकट्ठा हो गई हैं और इसी वजह से हमारे इलाके का पानी धरती में नहीं रिसता। धरती में पानी ही नहीं जाएगा तो हमारे कुओं, हैंडपंप या ट्यूबवेल में पानी कहां से आएगा।

जागरुकता से बनी बात

महेश शर्मा गांव-गांव जाते। चौपाल पर लोगों के बीच बातचीत होती। गांवों में ही रात रुक जाते। जंगलों के बीच दूर-दूर बसे इन मजरे–टोलों तक बारिश और गर्मियों में जाना मुश्किल होता। कई बार विपरीत स्थितियां भी बनीं। कुछ आदिवासी शराब पीकर हंगामा भी करते और कई बार तो उन्हें अपमान भी सहना पड़ा। कुछ लोगों के राजनीतिक और व्यावसायिक स्वार्थ भी प्रभावित हो रहे थे, वे भी उनसे नाराज हुए, लेकिन काम आगे बढ़ता रहा। वे लोगों से आग्रह करते कि हर कोई इससे जुड़े। कुछ लोग मिलकर हालात नहीं बदल सकते, इसे बदलने के लिए हम सब को एकमत होकर जुटना होगा। सबकी सहभागिता से ही कुछ बदलाव किया जा सकता है। समुद्र मंथन की प्रक्रिया में भी तो देव और दानव सब मिलकर सामने आए तभी तो धरती को कई सौगातें मिल सकी। इसीलिए कोई अच्छा–बुरा

नहीं होता। सब मिलकर एकजुट हों तभी गांव को हम बचा पाएंगे। गांव बचेंगे और समृद्ध होंगे तो फायदा किसी एक का नहीं सभी का होगा। सामूहिक श्रम से सामूहिक फायदा होगा। तभी उन्होंने आदिवासियों की परंपराओं पर उनसे जाना तो एक अच्छी परंपरा ‘हलमा’ की जानकारी उन्हें मिली। उसके बाद लगातार करीब दस सालों से हाथीपावा की पहाड़ियों पर हर साल हजारों आदिवासी जुटते हैं और अपनी कुदालों से पानी को थामने की कोशिश करते हैं। वे नई ट्रेंच बनाते हैं, पुरानी ट्रेंच में जमी गाद और मिट्टी हटाते हैं। कुछ ही घंटों में तीस हजार से ज्यादा हाथ इस पहाड़ी को बारिश के स्वागत के लिए तैयार कर देते हैं। महेश शर्मा की कोशिशों से इस साल भी अब तक करीब तीस हजार जल संरचनाओं को तैयार किया गया है। उनके द्वारा फैलाई जागरुकता का ही नतीजा है कि झाबुआ के बहादुरसागर तालाब में गर्मियों के महीनों में भी पानी ठाठे मारता नजर आता है। इतना ही नहीं, जिस इलाके में ‘हलमा’ किया जाता है, वहां पहले उजाड़ और जमीन ऊसर हुआ करता था, लेकिन अब वहां हर बारिश के बाद आठ फीट ऊंचाई तक घास के बड़े-बड़े मैदान बनते हैं। पहाड़ी की दूसरी तरफ का हिस्सा अब भी वैसा ही उजाड़ और ऊसर है।

सामूहिक श्रमदान की मिसाल

जल संरक्षण के कार्य में महेश शर्मा जिस प्रेरणा से जुटे हैं, उसका नतीजा है कि उन्होंने तमाम जगहों

पर्यावरण विशेष

पर सामूहिक श्रमदान की मिसाल भी कायम की है। लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि अपने पर्यावरण और प्रकृति को बचाने–संवारने के लिए सरकारी प्रयासों के बिना भी हम सब मिलकर काम कर सकते हैं। इसी सामूहिकता का सुपरिणाम झाबुआ जिले के कई गांवों में देखने को मिलता है, जहां जगह-जगह लोगों ने नए तालाब बनवाए या अपने पुराने तालाबों की मरम्मत करवाई। यह सब बहुत कम खर्च में हुआ। पानी और पर्यावरण के कामों के लिए सामूहिक श्रमदान की सहभागिता का यह नायाब तरीका अब अन्य आदिवासी इलाकों तथा आस-पास के प्रदेशों में भी अपनाया जाने लगा है। महेश शर्मा ने लगभग इस भूली जा चुकी परंपरा को पुनर्जीवित कर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है, उसे अब कईकई जगह दोहराए जाने की तैयारी चल रही है। अब मध्यप्रदेश के बैतूल में भी पहली बार ‘हलमा’ होने जा रहा है। महाराष्ट्र में सामजिक क्षेत्र में काम करने वाले सिद्धेश्वर स्वामी भी यहां आकर ‘हलमा’ को समझ कर गए हैं। अगली गर्मियों के दौरान वे इसे महाराष्ट्र में कोल्हापुर के कुछ गांवों में करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके अलावा गुजरात और राजस्थान में भी इसे किए जाने की खबरें हैं। इस साल भी हाथीपावा की पहाड़ी पर ‘हलमा’ के बाद गांव-गांव तालाब बनाने और अनुपयोगी होते जा रहे तालाबों की मरम्मत तथा गहरीकरण का काम किया जा रहा है। अप्रैल और मई महीने में दस तालाब बनकर तैयार हो चुके हैं। चार अन्य तालाबों के लिए काम चल रहा है और अगली बारिश का पानी इनमें भर सकेगा। इन तालाबों में स्थानीय आदिवासी ‘हलमा’ करते हैं। ट्रैक्टर तथा जेसीबी का प्रबंध भी आस-पास से ही होता है। ज्यादातर काम मशीनों के बजाए हाथों से किया जाता है। इसकी बानगी हमें मिलती है पेटलावद ब्लॉक के छायन तालाब को देखकर, यहां इस अनपढ़ समझे

जाने वाले आदिवासी समाज ने ‘हलमा’ के जरिए तालाब को ही आकार नहीं दिया, ब​ल्कि इससे आज आधा दर्जन गांव पानीदार बन सके हैं। अब उनके यहां पानी की किल्लत नहीं रही। सरकार ने पहले यहां तालाब बनाने की बात सोची थी। सरकार के अधिका​िरयों ने नाप-जोख किया और तय पाया कि यहां तालाब बनाने में करीब नौ लाख रुपए का खर्च आएगा। इस बड़ी राशि के लिए फाइलें झाबुआ से भोपाल तक दौड़ती रहीं। लेकिन कुछ नहीं हुआ। इधर गांव के लोगों के लिए बिना पानी के एक-एक दिन निकालना मुश्किल हो रहा था। ‘हलमा’ का चमत्कार वे जान ही चुके थे। उन्होंने अपने गांव में तालाब बनाने के लिए ‘हलमा’ का आह्वान किया और हजारों आदिवासीयों ने देखते ही देखते सरकार के नौ लाख की जगह महज 85 हजार की छोटी-सी रकम से तालाब बना दिया। इतना ही नहीं स्थानीय अमरा वसुनिया ने तालाब के लिए अपनी निजी जमीन भी दे दी। बड़े जलग्रहण क्षेत्र और पहाड़ियों से जुड़ा होने के कारण इसमें गर्मियों के दौरान भी पानी रहता है। यहां पानी इनके लिए आज किसी वरदान से कम नहीं है। इसका संधारण और संरक्षण भी अब गांव के लोग ही करते हैं। इससे आस-पास के गांवों की सामाजिक और माली हालत में भी सकारात्मक बदलाव हुए हैं। दूसरी बानगी हमें देखने को मिली रामा ब्लॉक के गांव साढ़ में, जहां इस साल गर्मियों में आदिवासी बरसों पुराने एक सरकारी तालाब की मरम्मत बिना कोई पैसा लिए खुद पसीना बहाकर कर रहे हैं। कुछ साल पहले एक करोड़ की लागत से बना 400 मीटर लंबी और 55 फीट ऊंची पाल का यह तालाब गाद भर जाने और पाल फूट जाने से करीबकरीब अनुपयोगी ही रह गया था। महेश शर्मा ने गांव की चौपाल पर इसके लिए ‘हलमा’ और सामूहिक श्रमदान की बात रखी तो सब तैयार हो गए और अब यहां एक बड़ा तालाब बारिश की मनुहार में खड़ा इंतजार कर रहा है। यहां इसी साल अप्रैल में ग्रामीणों ने पूरे एक महीने तक लगातार काम किया है।

‘मातावन’

इसी तरह संरक्षित वनों को उन्होंने ‘मातावन’ नाम दिया है ताकि यहां कोई लकड़ी नहीं काटे। आदिवासी इन्हें माता का जंगल मानकर श्रद्धावश कभी इन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। हर साल यहां बारिश में कुछ नए पौधे लगाने की भी परम्परा बनाई है। अब तक जिले में छायन, घाटिया सहित दस से ज्यादा ऐसे वन बनाए गए हैं। इन्हें बढ़ाकर 25 करने का लक्ष्य है। ये तो कुछ बानगियां भर है, जमीन पर असली काम इससे कहीं बड़ा नजर आता है। बड़ी बात यह है कि ऐसे संसाधन विहीन इलाके में इतना काम बड़ी उम्मीद जगाता है। महेश शर्मा ने अपनी जीवटता और सरोकारों से इस बात को साबित किया है कि काम करने की जिद और जुनून से सब कुछ बदला जा सकता है। उनका लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है। वे खुद मानते हैं कि उनका असली मकसद तो झाबुआ जिले के सभी साढ़े तेरह सौ गांवों तक पानी पहुंचाना है ताकि इनमें रहने वाले लोग समृद्ध हो सकें। उनकी आंखों में तैरते हुए उस हरियाली और खुशहाली के सपने को साफ-साफ देखा जा


05 - 11 जून 2017

पर्यावरण विशेष

टिप टिपवा

लोककथा

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भारत की लोककथा

क शेर शिकार की खोज में भटकताभटकता एक खेत में आ निकला और बारिश तूफान में फंस गया। वह बारिश से बचाव के लिए नैनी बुढ़िया की झोपड़ी की ओट में दुबक गया। नैनी एक बदमिजाज बुढ़िया थी जो गांव के बाहर रहती थी। आज तो उसका मिजाज बहुत खराब था, क्योंकि उसकी छत टपक रही थी। वह अपने टीन के बक्से और खाट को कभी इधर सरकाती, कभी उधर। ‘परेशान कर दिया इस टिप टिपवा ने।’ उसने बुड़बुड़ा कर कहा। ‘क्या इससे कोई बचाव नहीं है?’ उसने टीन का बक्सा जोर से खिसकाया तो वह खाट से टकराया। फिर उसने लकड़ी का एक छोटा-सा बक्स निकाला और उसे खींच कर दीवार के साथ लगा दिया। दीवार हिल गई। शेर बाहर दीवार के साथ दुबका हुआ था। दीवार का हिलना और नैनी का चिल्लाना! ‘यह टिप-टिप मार डालेगा मुझको!’ वह घबरा गया और हैरान भी हुआ। ‘यह कोई भयानक जीव होगा, यह टिपटिपवा! आवाज कितनी अजीब है! कौन है यह टिप टिपवा?’ उसी वक्त भोला कुम्हार उधर से आ निकला। उसका भी मिजाज बिगड़ा हुआ था, क्योंकि उसका गधा कहीं भाग गया था। अचानक उसने किसी जानवर को झोपड़ी से सटा बैठा देखा। ‘यह रहा!’ वह चिल्लाया और शेर के पास जाकर उसको एक लात मारी। फिर उसने उसके कान खींच कर कहा, ‘चुपचाप चल, नहीं तो तेरी

हड्डियां तोड़ दूंगा।’ शेर बहुत डर गया। उसने सोचा, ‘यह होगा वह भयंकर टिप टिपवा।’ वह गुर्राया तक नहीं। चुपचाप भोला के पीछे हो लिया। अपनी झोपड़ी तक पहुंच कर भोला ने शेर को बाहर ही मोटी रस्सी से बांध दिया और झपट कर बोला, ‘अब सारी रात बारिश में बैठा रहा।’ दूसरे दिन तड़के ही सुबह भोला की स्त्री उठी। झोपड़ी से बाहर निकल कर उसने शेर को देखा तो चीख पड़ी। भोला दौड़ा आया। शेर को देखकर उसे काठ मार गया। फिर मुड़ कर भागा। उसकी स्त्री भी चीखती-चिल्लाती उसके पीछे भागी। उन्होंने अपनी झोपड़ी का दरवाजा बंद कर दिया और बक्से और चारपाइयां उसके साथ लगा दीं। तब तक गांव के और लोग भी जग गए थे। उन्होंने गुर्राते शेर को भोलानाथ की झोपड़ी के बाहर बंधा देखा तो हैरान होकर औरों को बताने भागे। सहमे हुए शेर ने धीरे-धीरे रस्सी चबा डाली और तुड़ाकर जंगल में भाग गया। कुछ देर बाद भोला ने दीवार के एक छेद से झांक कर देखा। उसने फुसफुसा कर अपनी स्त्री से कहा, ‘शेर चला गया!’ उसकी जान में जान आई। कांपते हुए उसने दरवाजा खोला। उस दिन बहुत से लोग भोलानाथ से मिलने आए। ‘तुमने सचमुच उसके लात मारी थी?’ बढ़ई ने पूछा। अब तक भोला का डर दूर हो चुका था। हंस

कर उसने डींग मारी, ‘अरे, मैंने उसको सिर्फ लात ही नहीं लगाई’ तमाचा मारा और उसके कान भी खींचे।’ सारे गांव में खबर फैल गई। फैलते-फैलते राजा के कानों तक पहुंची। उसने कुम्हार को बुलावा भेजा। बोला, ‘मैंने ऐसी बहादुरी कभी नहीं सुनी। तुम्हारे जैसे आदमियों की फौज में जरूरत है।’ एक शाम दरबार में एक सिपाही दौड़ा आया। बोला, ‘पड़ोसी राजा ने हमला कर दिया है। वह अस्सी हजार सिपाहियों को लेकर हमारी सीमा पर पहुंच गया है।’ राजा ने भोलानाथ को बुलाया। ‘अब तुम्हारी बहादुरी साबित करने का मौका आ गया है। तुमको मैं सेनापति नियुक्त करता हूं।’ भोलानाथ की तो सिट्टी-पिट्टी गुम! हकलाता हुआ बोला, ‘मैं पूरी कोशिश करूंगा, अन्नदाता!’ रात को चिंता से अधमरे भोलानाथ ने स्त्री से कहा, ‘मैं तो घोड़े पर चढ़ना भी नहीं जानता। अब क्या करूं?’ स्त्री ने कहा, ‘चिंता मत करो। मैं तुमको घोड़े से बांध दूंगी। उसके बाद क्या होता है यह ईश्वर की इच्छा।’ दूसरे दिन सुबह एक दूत आया बहुत शानदार काले घोड़े के साथ। उसने कहा, ‘यह घोड़ा खुद महाराज का है।’ उन्होंने आपके लिए भेजा है लड़ाई में जाने के लिए।’ भोलानाथ मुंह लटकाए अपनी स्त्री के साथ घर

से बाहर निकला। चार नौकरों ने उसको घोड़े पर बिठाया। फिर उसकी बीवी ने उसको घोड़े के साथ कस कर बांध दिया। रस्सी का एक सिरा उसने घोड़े की पूंछ के साथ बांध दिया। घोड़े को अपने बदन पर रस्सी अच्छी नहीं लगी। वह अचानक पिछली टांगों पर खड़ा हो गया फिर छलांग लगाकर हवा की तरह सरपट दौड़ा। भोलानाथ अपनी जान मुट्ठी में लिए उसकी पीठ से चिपका बैठा रहा। अचानक भोलानाथ ने देखा कि घोड़ा दुश्मनों के खेमों की तरफ भाग रहा है। ‘नहीं, नहीं।’ भोलानाथ चिल्लाया। उसने बरगद का एक पेड़ देखा जिसकी जड़ें नीचे लटक रही थीं। घोड़ा उसके नीचे पहुंचा ही था कि भोलानाथ ने लपक कर एक जड़ थाम ली। उसने सोचा था कि इस तरह वह अपने को खींचकर छुड़ा लेगा, लेकिन घोड़ा इतनी तेज दौड़ रहा था कि जड़ टूट कर भोला के हाथों में आ गई। घोड़ा दौड़ता रहा और जड़ उसके हाथ में ही फड़फड़ाती रही। ‘मदद! मदद करो!’ भोला चिल्लाया और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए जड़ को हिलाने लगा। घोड़ा दौड़ता-दौड़ता सीधे वहां पहुंचा, जहां शत्रुओं का डेरा था। शत्रु के सिपाहियों ने देखा कि एक जंगली-सा आदमी, बाल और कपड़े फड़फड़ाता, चारों ओर रस्सियां बांधे, भयंकर काले जंगी घोड़े पर सवार, जड़ें हिलाता, चिल्लाता, तूफान की तरह बढ़ा आ रहा है। एक सिपाही चिल्लाया, ‘यह हरावल (सेना का आगे चलने वाला दस्ता) का सिपाही है।’ इस राजा के पास राक्षसों की सेना है,’ दूसरा चिल्लाया। तीसरे ने कहा, ‘भागो-भागो!’ औरों ने भी कहा, ‘भागो-भागो’ और सारी सेना जान बचा कर भाग खड़ी हुई। भोलानाथ का घोड़ा दुश्मनों के डेरे के बीचोंबीच पहुंच गया। वह रस्सी खुल गई थी जिससे वह बंधा था और वह घोड़े से नीचे गिर पड़ा। वह देखकर हैरान रह गया कि शत्रुओं का पूरा डेरा खाली पड़ा है। वह धीरे-धीरे कराहते हुए उठा और घोड़े को वापिस घर की ओर ले चला। इतने में राजा की सेना भी चल पड़ी थी। उसने रास्ते में अपने सेनापति को थकी-थकी चाल से घोड़े के साथ आते देखा। भोला ने बताया, ‘दुश्मन चले गए।’ सिपाही अपनी आंखों से देखने दुश्मनों के खेमों में पहुंचे तो उसे बिल्कुल खाली पाया। विजयी सेना शहर वापस गई और राजा को सब-कुछ बताया। ‘अकेले ही सारी फौज को भगा दिया?’ खुशी से उछल कर राजा ने कहा। ‘कमाल का आदमी है!’ आज भी लोग उस बहादुर कुम्हार की कहानी सुनाते हैं, जिसने शेर को पकड़ कर बांध रखा था, और शत्रुओं की पूरी फौज को अकेले ही उखाड़ दिया था।


32 अनाम हीरो

05 - 11 जून 2017

अनाम हीरो इंद्राणी दास

भारतीय मूल की बेटी को जूनियर नोबेल

भा

जून‌ियर नोबेल कहे जाने वाले अमेर‌िका की रीजेनेरोन साइंस टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में इस बार भारतीय मूल के छात्रों का रहा दबदबा

रतीय मूल की 17 वर्षीय अमेरिकी छात्रा इंद्राणी दास को इस साल के रीजेनेरोन साइंस टैलेंट सर्च पुरस्कार से नवाजा गया है। इसे साइंस का जून‌ियर नोबेल कहा जाता है। यह पुरस्कार अमेरिका में हाई स्कूल के विज्ञान और गणित के छात्रों की प्रतियोगिता के विजेता को दिया जाता है। इंद्राणी को न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में उनके प्रोजेक्ट के लिए यह पुस्कार द‌िया गया है। इंद्राणी के प्रोजेक्ट में मानव मस्तिष्क में चोट लगने के बाद होने वाले नुकसान का इलाज करने का नया तरीका बताया गया है। वह बताती हैं उन्हें तो यकीन ही नहीं हो रहा है कि उन्हें जूनियर नोबेल पुरस्कार मिला है। उनके ही शब्दों में, ‘जब यह पुरस्कार मुझे मिला तो मुझे तो बहुत अचंभा हुआ था, मुझे तो अब भी यकीन नहीं होता। मैं तो बार-बार उस लम्हे को याद करती हूं, लेकिन मैं अपने को बहुत भाग्यशाली समझती हूं। मेरे माता पिता ने तो

पूरा पुरस्कार समारोह टीवी पर देखा था, उन्हें भी यकीन नहीं आ रहा था कि मुझे पुरस्कार मिला।’ इस वैज्ञानिक प्रतियोगिता में शामिल होने वाले छात्रों ने कैंसर समेत कई जानलेवा बीमारियों से लेकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के विभिन्न तरीकों का प्रदर्शन किया था। वैसे इस प्रतियोगिता में भारतीय मूल के छात्रों का ही डंका बजा। इसमें भारतीय मूल के ही छात्र अर्जुन रमानी तीसरे नंबर पर रहे। इसके अलावा इस प्रतियोगिता में पहले 10 विजेताओं में से 5 भारतीय मूल के युवा हैं। पहले नंबर की विजेता इंद्राणी दास को 250,000 अमेरिकी डॉलर भी इनाम में मिले, जबकि तीसरे नंबर पर आने वाले अर्जुन रमानी को 150,000 डॉलर मिले। इंद्राणी न्यू जर्सी के ओराडेल में रहती हैं और करीब के हैकेनसैक इलाके में अकादमी फॉर मेडिकल साइंस टेक्नोलोजी की छात्रा हैं।

न्यूजमेकर

महिला सशक्तिकरण की ट्विंकल कामयाबी की टॉपर

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ट्विंकल खन्ना मासिक धर्म जैसे विषय पर जागरुकता लाने के लिए 'पैडमैन' नाम से फिल्म बना रही हैं

ल्म 'पैडमैन' के साथ फिल्म प्रोडक्शन में पहली बार कदम रख रहीं लेखिका और अभिनेत्री ट्विंकल खन्ना का कहना है कि उन्हें इस फिल्म से जुड़ने पर गर्व है। यह फिल्म मासिक

टि्वंकल खन्ना

धर्म जैसे विषय पर जागरुकता लाएगी। 'पैडमैन' अरुणाचलम मुरुगननथम के जीवन पर आधारित है। वह तमिलनाडु में 'पैडमैन' के नाम से लोकप्रिय हैं। मुरुगननथम महिलाओं को सस्ता सेनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए जाने जाते हैं। इस बारे में ट्विंकल ने कहा, 'फिल्म की शूटिंग सही ढंग से चल रही है। यह ऐसे विषय पर जागरुकता लाएगी, जिस पर बात करने से अब तक शर्मिंदगी महसूस की गई है और मैं इस फिल्म का हिस्सा बनकर खुश हूं।' फिल्म में ट्विंकल के पति और अभिनेता अक्षय कुमार प्रमुख भूमिका में हैं। वहीं राधिका आप्टे उनकी पत्नी के किरदार में हैं। इस फिल्म का डायरेक्श्न निर्देशक आर. बाल्की कर रहे हैं। इस फिल्म में सोनम कपूर भी नजर आने वाली हैं। दिलचस्प है कि हाल ही में ट्विंकल खन्ना ने महिलाओं के साथ होने वाले यौन शोषण पर भी अपनी बात भी रखी थी। ब्लॉग में ट्विंकल ने लिखा, ‘मैं खुद काफी मुखर हूं, मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हुई है जो फिल्मों में अपने मुक्के से दीवार पर छेद करता दिखता है, इसके बावजूद मेरे साथ भी ऐसी घटना हुई। इसने मुझे लाखों वर्किंग महिलाओं के बारे में सोचने पर मजबूर किया।’

सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली नंदिनी के.आर. ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा, 2016 में पहली रैंक हासिल की है

भा

रतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) की अधिकारी नंदिनी के.आर. ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा, 2016 में पहली रैंक हासिल की है। नंदिनी अभी फरीदाबाद स्थित राष्ट्रीय सीमा-शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं नारकोटिक्स अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। नंदिनी मूल रूप से कर्नाटक के कोलार जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने बताया कि आईएएस अधिकारी बनना हमेशा से उनका सपना था। उन्होंने कहा कि यह सपने के साकार होने जैसा है। यह उनका चौथा प्रयास था। 2014 की सिविल सेवा परीक्षा में भी वह सफल हुई थीं और उन्हें भारतीय राजस्व सेवा (सीमा शुल्क एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क) आवंटित किया गया था। नंदिनी के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं और मां गृहिणी हैं। सिविल परीक्षा की तैयारी के बारे में नंदिनी बताती हैं कि उन्होंने कभी घंटे के हिसाब से पढ़ाई नहीं की, बल्कि एक निश्चित लक्ष्य बनाकर पढ़ाई करती थीं। उन्होंने कहा कि उनकी सफलता में परिवार का भी पूरा सहयोग रहा। किसी भी कठिनाई के वक्त परिवार मेरे साथ मजबूती से खड़ा रहा। नंदिनी ने सिविल सेवा परीक्षा में कन्नड़ साहित्य को

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597; संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 25

वैकल्पिक विषय के तौर पर चुना था। उनका कहना है कि सब्जेक्ट भले ही कोई भी हो, तैयारी अच्छी हो तो सफलता निश्चित रूप से मिल सकती है।

नंदिनी के. आर.

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 25)  
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