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वर्ष-1 | अंक-38 | 04 - 10 सितंबर 2017

आरएनआई नंबर-DELHIN/2016/71597

sulabhswachhbharat.com

08 सम्मान समारोह

सफलता का सम्मान

यूपीएससी के टॉपर्स किए गए सम्मानित

16 शिक्षक दिवस

डॉ. सर्वपल्ल​ी राधाकृष्णन

भारतीय ज्ञान, शिक्षा और नीति परंपरा के आधुनिक ध्वजवाहक

24 शिक्षा

हरिओम का थिएटर

बच्चों को नाटकों के जरिए शिक्षा और साहित्य का पाठ

सुलभ ने पेश किया स्वच्छता का उदाहरण - गिरिराज सिंह

केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री गिरिराज सिंह सुलभ ग्राम की व्यवस्था और सुलभ तकनीक से बेहद प्रभावित हुए


02 आवरण कथा

04 - 10 सितंबर 2017

सुलभ ने पेश किया स्वच्छता का उदाहरण - गिरिराज सिंह केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री गिरिराज सिंह सुलभ ग्राम की व्यवस्था और सुलभ तकनीक से बेहद प्रभावित हुए

एक नजर

'डॉ. पाठक बिहार के ही नहीं पूरे देश के गौरव हैं' 'डॉ. पाठक ने गंदगी को अर्थिक जगत का हिस्सा बनाया' 'डॉ. पाठक ने पूरी दुनिया में स्वच्छता के झंडे गाड़े'

कृषक पृष्ठभूमि के मुखर राजनेता

बि

गिरिराज सिंह को ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी : द मेकिंग ऑफ लिजेंड’ पुस्तक भेंट करते सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक और श्रीमती अमोला पाठक

डॉ.

प्रियंका तिवारी

विन्देश्वर पाठक बिहार के ही नहीं पूरे देश के गौरव हैं। इन्होंने देश में ही नहीं पूरे विश्व में स्वच्छता का एक उदाहरण पेश किया है, जिसके लिए हम सभी उनके आभारी हैं। यह बातें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री गिरिराज सिंह ने सुलभ ग्राम में कहीं। इस दौरान उन्होंने पूरे सुलभ ग्राम का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया और पूर्व स्कैवेंजर्स बहनों, वृंदावन की विधवा माताओं, ट्रंप विलेज से आए भाईयों व बहनों के साथ सुलभ में कार्यरत सदस्यों से बात की। इतना ही नहीं उन्होंने छात्रों को अपने जीवन में आगे बढ़ने के गुर भी बताए।

सुलभ प्रणेता ने किया स्वागत

कार्यक्रम समारोह में सुलभ प्रणेता विन्देश्वर पाठक

ने गिरिराज सिंह को पुष्प गुच्छ, शॉल और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया। वहीं डॉ. पाठक ने कहा कि आज हमारे लिए बड़े ही सम्मान की बात है कि माननीय मंत्री जी सुलभ ग्राम में अपना आशीर्वाद देने आए। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मंत्री जी राष्ट्रीयता के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। इनका मानना है कि राष्ट्र और संस्कृति रहेगी तभी सब कुछ रहेगा। कुछ लोग सुख पाने के लिए इधर उधर की बातें करते रहते हैं, लेकिन मंत्री जी साफसाफ शब्दों में अपनी बात रखते हैं, फिर वह किसी को बुरी लगे या अच्छी। गिरिराज जी हमेशा कहते हैं कि यदि राष्ट्र में रहना है तो राष्ट्रीयता का पालन तो करना ही पड़ेगा। राजनीति के साथ-साथ गिरिराज

जी में एक वैज्ञानिक सोच है, नई-नई खोज करने की ललक है, लोगों को जोड़ने का संकल्प है...जैसे हम लोगों ने यहां पर एक खोज की है, उसी तरह से गिरिराज सिंह ने भी एक खोज की है, जिसके बारे में हमें प्रधानमंत्री मोदी ने बताया और कहा कि आप गिरिराज सिंह से मिलिए और देश के विकास के लिए मिलकर इसे आगे बढ़ाइए। गिरिराज सिंह सुलभ ग्राम आए तो एक एक चीज का निरीक्षण ही नहीं किया, बल्कि उस पर अपनी राय भी बड़ी ही बेबाकी से दी। इसके लिए हम मंत्री जी के बहुत आभारी हैं।

सुलभ के बिना शहरों की स्थिति दयनीय गिरिराज सिंह ने कहा कि मैं सोचता हूं और चर्चा भी

डॉ. पाठक ने सुलभ शौचालय का निर्माण नहीं किया होता तो आज शहरों की स्थिति बड़ी दयनीय होती

हार के नवादा लोकसभा सीट से भाजपा की टिकट पर पहली बार लोकसभा पहुंचे गिरिराज सिंह मुखर प्रवृति के नेता रहे हैं। वे कृषक पृष्ठभूमि से आते हैं, इसीलिए ग्रामीण और आम जीवन की समस्याओं और सरोकारों से स्वाभाविक तौर पर जुड़े राजनेता के तौर पर भी उनकी पहचान रही है। वे पहली बार सांसद चुने जाने के बावजूद केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए, जो यह दिखाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके नेतृत्व कौशल और क्षमता पर काफी भरोसा है। फिलहाल केंद्र सरकार में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं। इससे पहले वे 2002 से मई 2014 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे। इस दौरान 2008-10 तक वे बिहार सरकार के सहकारित मंत्री रहे। 2020-13 तक वे बिहार के पशुधन और मत्स्य विभाग के भी मंत्री रहे हैं। करता हूं कि अगर डॉ. पाठक ने सुलभ शौचालय का निर्माण नहीं किया होता तो आज शहरों की स्थिति बड़ी दयनीय होती। सुलभ में आने के बाद हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं की वह हमें इतनी शक्ति दे कि हम देश के प्रत्येक चौराहे और प्रत्येक जिले में इस मॉडल को स्थापित


04 - 10 सितंबर 2017

गिरिराज सिंह का स्वागत करतीं उषा चौमड़

सुलभ टॉयलेट कॉम्पलेक्स में गिरिराज सिंह

डॉ. पाठक और सुलभ टीम के साथ गिरिराज सिंह

गिरिराज सिंह शोधित जल को देखते हुए

आवरण कथा

बायोगैस जेनसेट से पैदा बिजली को रोमांच के साथ देखते गिरिराज सिंह

बायोगैस से चलने वाले मेंटल लैंप को प्रज्ज्वलित करते गिरिराज सिंह

बायोगैस से चलने वाले गैस स्टोव पर पापड़ तलते गिरिराज सिंह

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04 आवरण कथा

04 - 10 सितंबर 2017

गिरिराज सिंह के साथ डॉ. पाठक सुलभ स्वच्छता रथ पर

सुलभ वाटर एटीएम को देखते गिरिराज सिंह

टू-पिट टॉयलेट देखते गिरिराज सिंह

सुलभ में बनी खाद को देखते गिरिराज सिंह

सुलभ वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर में गिरिराज सिंह

सुलभ शौचालय के पिट्स

फैशन डिजाइनिंग सेंटर के छात्रों से बातचीत करते गिरिराज सिंह


04 - 10 सितंबर 2017

आवरण कथा

सुलभ पब्लिक स्कूल के छात्रों के साथ बातचीत करते गिरिराज सिंह

गिरिराज सिंह और डॉ. पाठक कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर में

गिरिराज सिंह के साथ डॉ. पाठक, शिक्षक और सुलभ पब्लिक स्कूल के बच्चे

सैनेटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन देखते गिरिराज सिंह

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06 आवरण कथा

04 - 10 सितंबर 2017

डकवीड से जल शोधन

सुलभ परिसर में जैविक खाद देखते गिरिराज सिंह

सभा को संबोधित करते गिरिराज सिंह

डॉ. पाठक ने गंदगी को तकनीक के माध्यम से उपयोगी ही नहीं बनाया, बल्कि उसे अर्थिक जगत का भी हिस्सा बना दिया है

सुलभ टॉयलेट म्यूजियम को दिलचस्पी से देखते गिरिराज सिंह

कर सकें। डॉ. पाठक हमसे उम्र में ही नहीं, बल्कि अपने कार्यों से भी हमसे बड़े हैं, मैं इनका बहुत सम्मान करता हूं। डॉ. पाठक ने गंदगी को तकनीक के माध्यम से उपयोगी ही नहीं बनाया, बल्कि उसे अर्थिक जगत का भी हिस्सा बना दिया है। हमें सुलभ द्वारा बनाई गई तकनीक ने बहुत ही प्रभावित किया है और मैं जल्द से जल्द इस तकनीक को अपने संसदीय क्षेत्र में लगवाऊंगा। कहते हैं, जहां चाह है वहीं राह है, इस बात को डॉ. पाठक और सुलभ ने सार्थक किया है। डॉ. पाठक की चाह ने ही आज देश में ही नहीं पूरे विश्व में स्वच्छता का झंडा गाड़ दिया है।

हम भूलते जा रहे हैं अपनी संस्कृति

वृंदावन की विधवा माताओं की बनाई चीजें देखते गिरिराज सिंह

हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वच्छता के महत्व को समझा और उन्होंने कहा कि पहले शौचालय फिर देवालय, जिस पर सभी लोगों ने उनकी बहुत निंदा की थी, लेकिन इतिहास में भी हमें स्वच्छता के विशेष महत्व देखने और पढ़ने को मिलते हैं। हम पहले से ही विज्ञान के क्षेत्र में उन्नत थे, बड़े से बड़े विद्वान, ऋषि, मुनि हमारे देश में हुए, लेकिन हम अपने आप को भूलते जा रहे हैं। अपनी संस्कृति और संस्कार को भूलते जा रहे हैं। हमारा अध्यापकों से अनुरोध है कि वह छात्रों को हमारी संस्कृति और संस्कार का भी

पाठ पढाएं, तभी हमारा देश उन्नति की राह पर आगे बढ़ सकेगा। आज हमारे देश में बीमारियां बढ़ रही हैं, क्योंकि हमारे चारो तरफ गंदगी ही गंदगी है। अपने समाज को स्वच्छ रखने के लिए सभी को अपना योगदान देना होगा, तभी देश स्वच्छ और स्वस्थ हो सकेगा।

आज का आदमी कठोर हो गया है

हमारे देश में गाय को आदि काल से माता कहा जाता है, पहले उसकी पूजा की जाती थी, लेकिन आज का आदमी कठोर हो गया है। वह केवल गाय को सिर्फ इसीलिए पालता है कि वह दूध देती है, जो गाय दूध नहीं देती, उन्हें लोग कत्लखानों में भेज देते हैं। हमने इसका भी उपाय निकाल लिया और अब हमने इंसानों के सिर के बाल और गोमूत्र-गोबर को मिलाकर खाद बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। हमने पीएम मोदी से कहा कि अब कोई भी गाय कत्लखाने में नहीं जाएगी, क्योंकि हमने मनुष्य को अर्थ का केंद्र बिन्दु बना दिया है। अब दूध ना देने वाली गाय भी महीने में 50 से 60 हजार रुपए की आय गोबर और मूत्र से कराएगी। हम तकनीक क्षेत्र में अन्य देशों से कहीं बेहतर हैं, बस जरुरत है उन तकनीकों को लागू करने की। हम इसके लिए पूरा प्रयास करेंगे और पाठक जी से मिलकर इस विषय पर चर्चा भी करेंगे।


04 - 10 सितंबर 2017

कृषि

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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

बाढ़ और सुखाड़ में आशा की किरण नई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को किसानों के लिहाज से काफी सरल किया गया है और किसानों को जोखिम से बचाने के लिए अधिकतम आर्थिक सुरक्षा के प्रावधान किए गए हैं

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण

सं

दे

एसएसबी ब्यूरो

श की सवा अरब आबादी के मुंह में निवाला देने वाला किसान विपरीत से विपरीत स्थितियों में भी वर्ष दर वर्ष फसलों का न केवल उत्पादन करता रहा है, बल्कि बंपर उत्पादन का रिकार्ड भी तोड़ता जा रहा है। इसके बावजूद कर्ज में डूबा किसान प्राकृतिक आपदा की चपेट में आने से असहाय हो अपनी मुक्ति का रास्ता आत्महत्या में तलाशता रहा है। खेती व किसानों की बदहाली का बड़ा कारण मौसम में हो रहे बदलाव, बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि, कीट पतंगों का हमला व बीमारियों से फसलों व खेतों की बर्बादी होती रही है। ऐसे में नई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों और किसानी के लिए आशा की एक नई किरण हो सकती है, लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य सरकारें बीमा करने वाली निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों पर लगाम कसें। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2017-18 के लिए घोषित अपने चौथे अग्रिम फसल उत्पादन अनुमान में पिछले सभी रिकार्ड को तोड़ने का दावा करते हुए साढ़े 27 करोड़ टन से अधिक खाद्यान्नों के उत्पादन का अनुमान व्यक्त किया है, लेकिन मानसून की बेरुखी से इस अनुमान पर पानी भी पड़ सकता है, क्योंकि आधा देश इस समय भारी वर्षा से त्राहि-त्राहि कर रहा है, तो वहीं आधा दर्जन से अधिक कृषि उत्पादक राज्यों के बड़े इलाके सूखे के संकट से जूझ रहे हैं। सूखा प्रभावित राज्यों में सावन की झड़ी लगना तो दूर एक बूंद पानी भी नहीं गिरा, जबकि अब मानसून की वापसी का समय आ गया है। एक बार फिर देश बाढ़ और सुखाड़ की चपेट में आ गया है। कई राज्यों में जहां भारी वर्षा से तबाही मची हुई है, तो वहीं आधा महाराष्ट्र और कर्नाटक, गुजरात, पंजाब, हरियाणा,

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में सूखे की स्थिति बन गई है। पिछले कई वर्षों से सूखे का सामना कर रहे उक्त राज्यों में इस वर्ष भी पानी का टोटा पड़ने जा रहा है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में बीते 2 माह से एक बूंद वर्षा भी नहीं हुई है। वहीं विदर्भ के अमरावती संभाग की 42 तहसील में और नागपुर संभाग की 53 तहसीलों में 50 प्रतिशत वर्षा बीते सप्ताह तक हुई थी। फसलों की बुवाई में होने वाले नुकसान की अब भरपाई नहीं हो सकेगी। इससे खरीफ फसलों की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। पिछले वर्ष के 984 लाख हेक्टेयर रकबे की तुलना में इस वर्ष अभी तक 976 लाख हेक्टेयर ही हो सकी है। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में दलहन व कपास की बुवाई कम हुई है। मानसून के बीते दो माह में अच्छी वर्षा न होने से बुवाई कर चुके किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ रही है। यहीं पर नई फसल बीमा योजना किसानों के लिए जीवनदायी हो सकती है, बशर्तें किसान जागरुकता के साथ उसका इस्तेमाल करें और राज्य सरकार सख्त निगरानी में योजना का संचालन करें। नई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को किसानों के लिहाज से काफी सरल किया गया है और किसानों को जोखिम से बचाने के लिए अधिकतम आर्थिक सुरक्षा के प्रावधान किए गए हैं। नई योजना में किसानों को बुवाई करने के बाद पानी न बरसने, कीड़े लगने, बीमारी होने अथवा बाढ़ से बीजों को हुई क्षति की भरपाई का भी नियम है। किसानों को खरीफ फसल के लिए प्रीमियम 2 प्रतिशत और रबी के लिए

एक नजर

फसल बीमा का दायरा काफी व्यापक कर दिया गया है

इस योजना से अब तक 90 लाख से अधिक किसान हुए लाभान्वित बीमा दावे के निपटारे में एक माह से भी कम समय लगता है

डेढ़ प्रतिशत का भुगतान करना है, जबकि बागवानी व वाणिज्यिक फसल के लिए प्रीमियम 5 प्रतिशत देना है। शेष प्रीमियम राशि केंद्र और राज्य सरकारें देती हैं। फसल बीमा की लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है। यही कारण है कि वर्ष 2016-17 में कुल कृषि योग्य फसलों का 30 प्रतिशत हिस्सा ही कवर हुआ था। फसल बीमा का दायरा काफी व्यापक किया गया है। बुवाई पूर्व फसल क्षति का कवरेज पिछले वर्ष किया गया था। इसी तरह बाढ़, सूखा और गैरमौसमी वर्षा के कारण उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र को भी भुगतान किया गया। इसके अलावा स्थानीय आपदाओं ओलावृष्टि, जलभराव व भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए भी भुगतान किया गया। पूर्व में फसल बीमा के दावों के लिए 6 माह से 1 वर्ष का समय लगता था, लेकिन अब स्मार्ट फोन सीसीई एप्प और फसल बीमा पोर्टल के जरिए अब भुगतान एक

किसानों को खरीफ फसल के लिए प्रीमियम 2 प्रतिशत और रबी के लिए डेढ़ प्रतिशत का भुगतान करना है, जबकि बागवानी व वाणिज्यिक फसल के लिए प्रीमियम 5 प्रतिशत देना है। शेष प्रीमियम राशि केंद्र और राज्य सरकारें देती हैं

सद में कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री पुरूषोत्तम रूपाला ने जो राज्यवार आंकड़े जारी किए हैं, वह बीमा कंपनियों पर लगे आरोपों की पुष्टि करते हैं। रूपाला ने संसद में मानसून सत्र में बताया था कि खरीफ फसल 2016 के लिए बीमा कंपनियों को कुल 15685 करोड़ 73 लाख रुपए के प्रीमियम का भुगतान किया गया था, जिसमें से किसानों ने 2705 करोड़ रुपए का प्रीमियम का योगदान अपने खाते से किया था। इसके एवज में बीमा कंपनियों ने 53.94 लाख किसानों के कुल 3634 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया, जबकि किसानों ने 5621 करोड़ रुपए के दावे पेश किए थे। इस तरह बीमा कंपनियों को जितना प्रीमियम मिला, उसमें से केवल 23।17 प्रतिशत का लाभ किसानों को मिला। इस तरह फसल बीमा किसानों के लिए जीवनदायी तभी हो सकता है, जब योजना को लागू करने वाली राज्य सरकारें और उनकी एजेंसियां सख्त निगरानी करें।

पखवाड़े से लेकर एक माह के अंदर किया जा रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएमएफबीवाई की समीक्षा बैठक में योजना के महत्व पर चर्चा करते हुए बताया था कि 90 लाख से अधिक किसान इस वर्ष लाभान्वित हुए हैं और बीते रबी फसल मौसम में किसानों को 7700 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के दावों का भुगतान किया गया है। फसल बीमा के दावों के भुगतान को लेकर काफी शंकाएं भी हैं। खासतौर पर कैग ने संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में भी कुछ आपत्तियां दर्ज की थीं। फसलों का बीमा करने वाली निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों पर आरोप है कि वह किसानों द्वारा क्षतिपूर्ति के लिए किए जा रहे दावों का पूरा भुगतान करने के बजाए मनमाने ढंग से फसलों की क्षति का आकलन कर भुगतान करती हैं। हालांकि बीमा कंपनियां मानती हैं कि कृषि और फसल बीमा बहुत गंभीर और संवेदनशील विषय है। इसलिए बीमा के प्रीमियम की राशि में वृद्धि करना चाहिए, लेकिन वर्ष 2016 17 के खरीफ व रबी फसलों के आंकड़े बताते हैं कि किसानों को बीमे का निर्धारित लाभ नहीं मिला, जबकि बीमा कंपनियों ने मुनाफा कमा लिया।


08 आयोजन

04 - 10 सितंबर 2017

सफलता का सम्मान सम्मान समारोह

एस्पायर आईएस कोचिंग इंस्टीट्यूट और धारा फाउंडेशन ने यूपीएससी के टॉपर्स को किया सम्मानित

यू

सौरभ सिंह

पीएससी परीक्षा में टॉप करने वाले छात्रों के सम्मान में एस्पायर आईएस कोचिंग इंस्टीट्यूट और धारा फाउंडेशन की तरफ से कमानी ऑडिटोरियम में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन उन लोगों को सम्मानित करने के लिए किया गया, जिन्होंने एस्पायर आईएस से कोचिंग करके यूपीएससी परीक्षा में अच्छे रैंक हासिल किए हैं। इस समारोह में नं​िदनी केआर जैसे टॉपर्स को सम्मानित किया गया, जिन्होंने 457 अंक हासिल किया और दूसरे छात्रों के लिए एक उदाहरण पेश किया है। कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक, कार्यकर्ता अनिल गर्ग, एससी / एसटी संगठन के अखिल भारतीय परिसंघ के महासचिव के.पी. चौधरी और एस्पायर आईएएस के संस्थापक अंकित

कुमार अग्रवाल मौजूद रहे। कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों को शॉल और पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया गया। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन ने सर्वप्रथम छात्रों को यूपीएससी परीक्षा में सफलता के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि हमें देश में शहरों के अतिरिक्त, छोटे शहरों को भी ध्यान में रखना चाहिए। वहां अब भी लोगों के लिए शौचालय, उचित भोजन और शिक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं है। उन्हें ये सभी मूलभूत चीजें प्रदान करने की जिम्मेदारी हम सभी की है। उन्होंने कहा कि आप सभी को देश के विकास के लिए मुख्य रूप से फोकस होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को

सम्मानित छात्रों के सामने साझा किया और कहा कि आप लोग अपने करियर में बहुत अच्छा काम कर सकते हैं। इसके अलावा उन्होंने वहां मौजूद दर्शकों से देश के पिछड़े समाज के लिए आगे आने और अपना योगदान देने के लिए अनुरोध किया। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने कहा कि जो लोग यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए हैं, उन्हें जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहने का वादा करना चाहिए। डॉ. पाठक ने कहा कि आप लोगों के ऊपर एक बड़ी जिम्मेदारी है, जो लोग आपके पास आएंगे वह दर्द और दुख से भरे होंगे। ऐसे लोगों की मदद करने के लिए कभी भी कोई बहाना नहीं बनाना चाहिए।

जो लोग आपके पास आएंगे वह दर्द और दुख से भरे होंगे। ऐसे लोगो की मदद करने के लिए कभी भी कोई बहाना नहीं बनाना चाहिए - डॉ. विन्देश्वर पाठक

एक नजर

पिछड़ों की तत्परता से करें मदद -केजी बालकृष्णन

जरुरतमंदों की करें हरसंभव मदद -डॉ. विन्देश्वर पाठक मेहनत से मिली सफलता -नंदिनी केआर

उन्होंने उल्लेख किया कि वह एक अमीर ब्राह्मण परिवार से थे, जो बाद में गरीब बन गया। सभी को पता है कि हम छूआछूत, खुले में शौच को रोकने के लिए शौचालयों का निर्माण और स्वच्छ भारत मिशन के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें एक बार आईएएस की चयन समिति के लिए चुना गया था। वह आईएएस चयन के साक्षात्कार में उपस्थित रहे और साक्षात्कार देने आए विद्यार्थियों को प्रेरित भी किया।


04 - 10 सितंबर 2017

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन सभा को संबोधित करते हुए

सभा को संबोधित करते डॉ. विन्देश्वर पाठक

श्रीमती मीरा अपने जीवन के अनुभव साझा करती हुईं

अनिल गर्ग अपने अनुभव और विचारों से अवगत कराते हुए

केपी चौधरी अपनी संस्था के बारे में लोगों को बताते हुए

उपराष्ट्रपति सेवा गिल्ड की मीरा खन्ना ने कहा कि एक बार उन्हें जम्मू-कश्मीर से उनके संगठन के आश्रयगृहों से कॉल आई कि उनके पास राशन नहीं है और बच्चे भूखे हैं। हमने वहां कई सरकारी संस्थानों में बात की, लेकिन कोई मदद को नहीं आया। कई लोगों से बात करने के बाद वहां सैन्य अधिकारियों ने मदद के लिए कहा, वह समय था जब कश्मीर में कर्फ्यू लगा हुआ था। बावजूद इसके सेना बच्चों की मदद के लिए आगे आई। इस कहानी के साथ उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि उन्हें नौकरी मिले या नहीं, लेकिन ऐसी परिस्थितियों में उन्हें पीछे नहीं हटना चाहिए, बल्कि लोगों की मदद करनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने सभी अव्वल रहने वालों को बधाई दी। अनिल गर्ग ने बताया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में भारत के ग्रामीण इलाकों में

अंकित कुमार प्रेरक संबोधन देते

आदिवासियों के संघर्ष को प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि भूमि और रेत माफिया इन क्षेत्रों में कैसे काम कर रहे थे और यहां तक कि इस मामले से जुड़े कई आंकड़े भी मिले हैं। उन्होंने कहा कि छात्रों को वास्तविकता का प्रदर्शन करना चाहिए और उन्हें समस्याओं को समझकर उसके बाद ही उस पर कोई निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर नए ऑफिसर्स को ऐसे स्थानों पर तैनात किया जाता है जहां तनाव अधिक होता है। इसीलिए इन इलाकों में किसी भी दुर्घटना के मामले में उन्हें अपने दिमाग को खुला रख कर कार्य करना चाहिए। एस्पायर आईएएस के संस्थापक अंकित कुमार ने छात्रों को प्रोत्साहित किया और कहा कि वे अगले साल मंच पर उपस्थित होने वाले अतिथि होंगे। उन्होंने अपने अनुभवों को अन्य छात्रों के साथ साझा किया। उन्होंने कहा कि नंदिनी के माता-पिता की

आयोजन

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नंदिनी केआर अपने अनुभव साझा करती हुईं

तरह अपने जीवन में किसी भी माता-पिता को कभी नहीं देखा था, जिन्होंने अपनी बेटी के लिए दिन और रात कड़ी मेहनत की। फिर उन्होंने उल्लेख किया कि वे 'ज्ञानांजलि' का उद्घाटन करेंगे, जिसमें विशेषाधिकार प्राप्त छात्रों शामिल होंगे, जहां वे छात्रों को उनके परीक्षाओं के लिए कोचिंग देंगे। उन्होंने कहा कि वे यूपीएससी परीक्षा में सभी बीस छात्रों के चयन की उम्मीद कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 'ज्ञानांजलि' के लिए प्रवेश प्रक्रिया 1 सितंबर से शुरू होगी। जो छात्र पंजीकरण करने में रुचि रखते हैं वह ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं। वहीं यूपीएससी की परीक्षा में शीर्ष स्थान पाने वाली नं​िदनी केआर ने कहा कि वह तमिलनाडु के दूरदराज के क्षेत्र की रहने वाली हैं। वहां स्कूलों में निरीक्षण करने आने वाले अधिकारियों को देखकर

एक बार हमने उनके बारे में पापा से पूछा था, तब पापा ने उनके बारे में विस्तार से बताया था। उसके बाद से ही हमने आईएएस अधिकारी बनने का सपना संजो लिया। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मैं पहली बार दिल्ली आई तो पता चला कि पढ़ाई के साथ दिल्ली की भीड़ में स्वयं को बनाए रखने के लिए काम करने की भी आवश्यकता है। कड़ी मेहनत और समर्पण के बाद हमें सरकारी कार्यालय में नौकरी मिली, लेकिन मैं इसके साथ बहुत खुश नहीं थी। इसके बाद हमने फिर से पढ़ाई करने की योजना बनाई और एस्पायर आईएएस इंस्टीट्यूट के बारे में पता चला। जो आज के समय से मेल खाती है। मैं बहुत डरी हुई थी, लेकिन एस्पायर ने मुझे नई दिशा दी और आज मैं अपने सपने को पूरा कर पाई। उन्होंने कहा कि हमें कभी आशा नहीं खोनी चाहिए और हमारी कड़ी मेहनत को जारी रखना चाहिए।


10 स्मरण

04 - 10 सितंबर 2017

डॉ. राधाकृष्णन जयंती (शिक्षक दिवस) पर विशेष

एक दार्शनिक और शिक्षक की शिखर कीर्ति

विद्यार्थियों का मन को अपने ज्ञान से ही नहीं, बल्कि अपने मैत्रीपूर्ण संबंधों से जीतने वाले डॉ. राधाकृष्णन भारतीय ज्ञान, शिक्षा और नीति परंपरा के आधुनिक ध्वजवाहक हैं

डॉ

एक नजर

एसएसबी ब्यूरो

. राधाकृष्णन को हम एक आदर्श शिक्षक क्यों मानते हैं और क्यों उनके जन्मदिन (5 सितंबर) को देश में ‘शिक्षक दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है। इस बारे में जानने के लिए दो बातें सबसे जरूरी हैं- पहला, तो छात्रों के साथ उनका संबंध और दूसरा दर्शन के क्षेत्र में उनकी विद्वता की अंतरराष्ट्रीय धाक। विद्यार्थियों के साथ राधाकृष्णन के संबंध मैत्रीपूर्ण रहते थे। जब वे अपने आवास पर शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करते थे, तो घर पर आने वाले विद्यार्थियों का स्वागत हाथ मिलाकर करते थे। वे उन्हें पढ़ाई के दौरान स्वयं ही चाय देते थे और साथी की भांति उन्हें घर के द्वार तक छोड़ने भी जाते थे। राधाकृष्णन में प्रोफेसर होने का रंचमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका मानना था कि जब गुरु और शिष्य के मध्य संकोच की दूरी न हो तो अध्यापन का कार्य अधिक श्रेष्ठतापूर्वक किया जा सकता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ऐसे मैत्री संबंधों के कारण एक मिसाल भी कायम हुई, जो कि बहुत ही अनोखी थी। जब उनको मैसूर से कलकत्ता में स्थानांतरित होना था, तब विदाई का कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। इसके लिए उन्होंने मना कर दिया। इनके विद्यार्थियों ने बग्घी द्वारा उन्हें स्टेशन तक पहुंचाया था। इस बग्घी में घोड़े नहीं जुते थे, बल्कि विद्यार्थियों के द्वारा ही उस बग्घी को खींचकर रेलवे स्टेशन तक ले जाया गया। उनकी विदाई के समय मैसूर स्टेशन का प्लेटफार्म 'सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जय हो' के नारों से गूंज उठा था। वहां पर मौजूद लोगों की आंखों में आंसू थे। राधाकृष्णन भी उस अदभुत प्रेम के वशीभूत होकर अपने आंसू रोक नहीं पाए थे। गुरु एवं विद्यार्थियों का ऐसा संबंध कम ही देखने को मिलता है।

शिक्षा को लेकर विचार

डॉ. राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिए अपने भाषण में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

राष्ट्रपति बनने से पहले देश के उपराष्ट्रपति भी रहे

स्टालिन जैसे कठोर व्यक्ति के मन को भी जीतने में सफल रहे

गांधी जी और टैगोर, दोनों के संसर्ग और विचारों से प्रभावित रहे

डॉ. राधाकृष्णन और गांधी जी

राधाकृष्णन की महात्मा गांधी से प्रथम भेंट 1915 में हुई थी। उनके विचारों से प्रभावित होकर राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थन में लेख भी लिखे। वह कभी भी किसी पार्टी से नहीं जुड़े, लेकिन निर्भय होकर राष्ट्रप्रेम को अभिव्यक्त करते थे। बाद में इन्होंने गांधी जी को अभिव्यक्त करते हुए कहा था – ‘मनुष्य के सर्वोत्तम प्रयासों में गांधी जी की आवाज सदैव अनश्वर रहेगी ।’ यहां पर आवाज का आशय गांधी जी की समग्र सोच से किया गया था। यद्यपि राधाकृष्णन ब्रिटिश सरकार की नौकरी कर रहे थे, तथापि देश की स्वतंत्रता के लिए वह ख्वाहिशमंद थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने अंग्रेजों से यह आशा रखी थी कि वे देश को स्वतंत्र कर देंगे। वे अंग्रेजों से यह आश्वासन भी चाहते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वे भारत को गुलामी से मुक्त कर देंगे।

गुरुदेव से भेंट

एक बार मैसूर में छात्रों ने उनसे पूछा था- ‘क्या आप उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना पसंद करेंगे?’ तब इनका प्रेरक जवाब था– ‘नहीं, लेकिन वहां शिक्षा प्रदान करने के लिए अवश्य ही जाना चाहूंगा’ ने कहा था, ‘मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति की स्थापना का प्रयत्न हो।’ डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से पूर्ण व्याख्याओं, आनंददायक अभिव्यक्ति और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को

मंत्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वे अपने छात्रों को देते थे। वे जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।

दर्शन शास्त्र के मर्मज्ञ के तौर पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पहचान कायम हो चुकी थी। जुलाई, 1918 में मैसूर प्रवास के समय उनकी भेंट रवींद्रनाथ टैगोर से हुई। इस मुलाकात के बाद वे गुरुदेव से काफी अभिभूत हुए। उनके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए डॉ. राधाकृष्णन ने 1918 में 'रवींद्रनाथ टैगोर का दर्शन' शीर्षक से एक पुस्तक लिखी। इसके बाद उन्होंने दूसरी पुस्तक 'द रीन आफ रिलीजन इन कंटेंपॅररी फिलॉस्फी' लिखी। इस पुस्तक ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। इस पुस्तक को भारत के शिक्षार्थियों ने 'आत्मतत्त्व ज्ञान' की पुस्तक के रूप में स्वीकार किया। यही नहीं, इसे इंग्लैंड तथा अमेरिका के विश्वविद्यालयों में भी बेहद पसंद


04 - 10 सितंबर 2017

किया गया। एक बार मैसूर में छात्रों ने उनसे पूछा था- ‘क्या आप उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना पसंद करेंगे?’ तब इनका प्रेरक जवाब था– ‘नहीं, लेकिन वहां शिक्षा प्रदान करने के लिए अवश्य ही जाना चाहूंगा।’

आलोचनाओं का सामना

डॉ. राधाकृष्णन को उनकी विद्वता के लिए जहां काफी सम्मान मिला, वहीं आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। उनके आलोचकों का कहना था कि राधाकृष्णन ने दर्शन शास्त्र को नया कुछ भी नहीं दिया है, उन्होंने तो बस भारत के आध्यात्मिक दर्शन की प्राचीनता को ही उजागर किया है। पश्चिम के सम्मुख उन्होंने भारतीय अध्यात्म को मात्र अंग्रेजी भाषा में उदधृत करने का ही कार्य किया है, लेकिन राधाकृष्णन ने अपने आलोचकों को कभी भी स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता महसूस नहीं की। इसके बाद इनका एक लेख ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका’ के 14वें संस्करण में प्रकाशित हुआ, जो एक बड़ी उपलब्धि थी।

आजादी की वेला में

यह डॉ. राधाकृष्णन की ही प्रतिभा थी कि स्वतंत्रता के बाद इन्हें संविधान निर्माण सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इस समय वे विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किए गए। जवाहरलाल नेहरु चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 1415 अगस्त, 1947 की रात्रि को किया जाए, जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना संबोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। उसके पश्चात संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी। डॉ. राधाकृष्णन ने ऐसा किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने संबोधन को विराम दिया। पंडित नेहरु और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी

राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल काफी कठिनाइयों से भरा था। उनके कार्यकाल में जहां भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए, वहीं पर दो प्रधानमंत्रियों की पद पर रहते हुए मृत्यु भी हुई जानकारी नहीं थी। आजादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिए विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार विजयलक्ष्मी पंडित का उन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पंडित नेहरु के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह संदेह था कि डॉ. राधाकृष्णन की योग्यताए सौंपी गई जिम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं, लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे बेहतरीन थे। वह एक गैर परंपरावादी राजनयिक थे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को स्टालिन से भेंट करने का दुर्लभ अवसर दो बार प्राप्त हुआ। 14 जनवरी, 1945 के दिन वह पहला अवसर आया, जब स्टालिन के निमंत्रण पर वह उनसे मिले। स्टालिन के हृदय में 'फिलॉस्फर राजदूत' के प्रति गहरा सम्मान था। इनकी दूसरी मुलाकात 5 अप्रैल, 1952 को हुई। जब भारतीय राजदूत सोवियत संघ से विदा होने वाले थे। विदा होते समय राधाकृष्णन ने स्टालिन के सिर और पीठ पर हाथ रखा। तब स्टालिन ने कहा था– ‘तुम पहले व्यक्ति हो, जिसने मेरे साथ एक इंसान के रूप में व्यवहार किया है और मुझे अमानव अथवा दैत्य नहीं समझा है। तुम्हारे जाने से मैं दुख का अनुभव कर रहा हूं। मैं चाहता हूं कि तुम दीर्घायु हो। मैं ज्यादा नहीं जीना चाहता हूं।’ इस समय स्टालिन की आंखों में नमी थी। फिर छह माह बाद ही स्टालिन की मृत्यु हो गई।

पहले उपराष्ट्रपति, फिर राष्ट्रपति

1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉ. राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किए गए। संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया। उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी संभाला। 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। बाद में पंडित नेहरु का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिए काफी सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं। सितंबर, 1952 में इन्होंने यूरोप और मिडिल ईस्ट देशों की यात्रा की ताकि नए राष्ट्र हेतु मित्र राष्ट्रों का सहयोग मिल सके। एक बार विख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा थाराजाओं काे दार्शनिक होना चाहिए और दार्शनिकों को राजा। प्लेटो के इस कथन को 1962 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने तब सच कर दिखाया, जब वह भारत के दूसरे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इस प्रकार एक दार्शनिक ने राजा की हैसियत प्राप्त की। बर्टेंड रसेल जो विश्व के जाने-माने दार्शनिक थे, वह राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने पर अपनी प्रतिक्रिया को रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा था– यह विश्व के दर्शन शास्त्र का सम्मान है कि महान भारतीय गणराज्य ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में चुना और एक दार्शनिक होने के नाते मैं काफी खुश

स्मरण

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हूं। प्लेटो ने भी कहा था कि दार्शनिकों को राजा होना चाहिए और महान भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर प्लेटो को सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित की है। राधाकृष्णन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जगह ली। राष्ट्रपति बनने के बाद राधाकृष्णन ने भी पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की भांति स्वैच्छिक आधार पर राष्ट्रपति के वेतन से कटौती कराई थी। उन्होंने घोषणा की कि सप्ताह में दो दिन कोई भी व्यक्ति उनसे बिना पूर्व अनुमति के मिल सकता है। इस प्रकार राष्ट्रपति भवन को उन्होंने सर्वहारा वर्ग के लिए खोल दिया। वे अमेरिका के राष्ट्रपति भवन 'व्हाइट हाउस' में हेलीकॉप्टर से अतिथि के रूप में पहुंचे थे। इससे पूर्व विश्व का कोई भी व्यक्ति व्हाइट हाउस में हेलीकॉप्टर द्वारा नहीं पहुँचा था। वैसे राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल काफी कठिनाइयों से भरा था। उनके कार्यकाल में जहां भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए, वहीं पर दो प्रधानमंत्रियों की पद पर रहते हुए मृत्यु भी हुई। 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था तो भारत की अपमानजनक पराजय हुई थी। उस समय वी.के. कृष्णामेनन भारत के रक्षा मंत्री थे। तब पंडित नेहरु को डॉ. राधाकृष्णन ने ही मजबूर किया था कि कृष्णामेनन से इस्तीफा तलब करें, जबकि नेहरु जी ऐसा नहीं चाहते थे। चीन के साथ युद्ध में पराजित होने के बाद सर्वपल्ली ने पंडित नेहरु की भी आलोचना की थी। बेशक वे पंडित नेहरु के काफी निकट थे, लेकिन उन्होंने आलोचना के स्थान पर आलोचना की और मार्गदर्शन की आवश्यकता होने पर मार्गदर्शन भी किया। यह राधाकृष्णन ही थे जिन्होंने पंडित नेहरु को मजबूर किया था कि वे लाल बहादुर शास्त्री को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान प्रदान करें। उस समय कामराज योजना के अंतर्गत शास्त्री जी बिना विभाग के मंत्री थे। पंडित नेहरु के गंभीर रूप से बीमार रहने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय शास्त्री जी के परामर्श से ही चलता था। डॉ. राधाकृष्णन के राष्ट्रपति रहते हुए ही पंडित नेहरु और शास्त्रीजी की प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु हुई थी। लेकिन दोनों बार नए प्रधानमंत्री का चयन सुगमतापूर्वक किया गया, जबकि दोनों बार उत्तराधिकारी घोषित नहीं था और न ही संवैधानिक व्यवस्था में कोई निर्देश था कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए। 1967 के गणतंत्र दिवस पर सर्वपल्ली ने देश को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब आगे राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे। यद्यपि कांग्रेस के नेताओं ने उनसे काफी आग्रह किया कि वह अगले सत्र के लिए भी राष्ट्रपति का दायित्व ग्रहण करें, लेकिन राधाकृष्णन ने अपनी घोषणा पर पूरी तरह से अमल किया। उनकी टिप्पणियों से जाहिर होता था कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ऐसी प्रतिभा हैं जो न केवल भारत के दर्शन शास्त्र की व्याख्या कर सकता है बल्कि पश्चिम का दर्शन शास्त्र भी उनकी प्रतिभा के दायरे में आ जाता है। एक शिक्षाविद् के रूप में उनको असीम प्रतिभा का धनी माना गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक डॉ. राधाकृष्णन को देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया था।


12 गुड न्यूज

04 - 10 सितंबर 2017

कृषि विकास

यु

स्टार्टअप के सहयोग से बढ़ी खेती

कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने में में स्टार्टअप बड़ी भूमिका निभा रहे हैं

वाओं की उद्यमशीलता को प्रोत्साहन देने के लिए स्टार्ट अप इंडिया योजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। जनवरी 2015 में शुरू हुई इस योजना से न सिर्फ औद्योगिक-व्यापारिक गतिविधियों के पक्ष में माहौल बनाने में सफलता मिली, बल्कि रोजगार के अवसर भी इसके माध्यम से तेजी से बढ़े। खास तौर पर कृषि क्षेत्र को भी आगे बढ़ाने में स्टार्टअप बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। खेती की प्रक्रिया को उन्नत बनाने और उसमें व्यापक सुधार लाने में इन स्टार्टअप की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। देश में 157.35 मिलियन हेक्टेयर खेती की जमीन है और खेती से जुड़े करीब 12 करोड़ किसानों को देश भर में संचालित करीब 250 एग्रीटेक स्टार्टअप्स मदद मुहैया करा रहे हैं। दरअसल केंद्र सरकार के प्रोत्साहन के कारण एग्रेटेक स्टार्टअप को विभिन्न स्रोतों से फंडिंग हासिल करने में मदद मिली है।

‘इंक42 डेटा लैब्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों में पिछले वर्षों के दौरान तेजी से बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। वर्ष 2011-12 में भारत से 24.7 अरब डॉलर के खेती के उत्पादों का निर्यात किया गया, जबकि वर्ष 2015-16 में यह बढ़ कर 32.08 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी इसमें वार्षिक रूप में करीब 6.75 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि देश की जीडीपी में खेती का योगदान वित्तीय वर्ष 2017 के दौरान पहले से ज्यादा रहा। देश में कृषि उत्पादन की दशा को सुधारने के लिए सरकार ने इसकी मार्केटिंग को सुविधाजनक बनाने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना और संसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की है।

वर्ष 2017-18 के केंद्रीय बजट में खेती और सहयोगी सेक्टर के लिए कुल बजटीय आवंटन में 24 फीसदी से अधिक बढ़ोत्तरी की गई और यह 1,87,233 करोड़ रुपए रहा। दरअसल पीएम मोदी की सोच है कि युवा उद्यमी अपनी प्रतिभा व कौशल का पूरा उपयोग देश के नवनिर्माण में करें। पिछले कुछ दशकों में सतत औद्योगिक ग्रोथ के बावजूद भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था में खेती सेक्टर अब भी हाशिए पर है। बाजार आधारित सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है कि फूड प्रोसेसिंग की बढ़ती जरूरतों और देश की

आबादी तक पोषक खाद्य पदार्थ मुहैया कराने के लिहाज से कृषि सेक्टर में अभी और तेजी आने की उम्मीद है। पिछले कुछ सालों में डेटा-आधारित सिस्टम के जरिए संगठित तरीके से तकनीकी सुधारों ने खेती की प्रक्रिया को दोबारा से खड़ा करने में किसानों को मदद मुहैया कराई है। इसका मकसद छोटे किसानों को बेहतर जीवन मुहैया कराना है। इस दिशा में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी से देशभर में एग्रेटेक स्टार्टअप को नए सिरे से फंडिंग मुहैया कराने पर जोर दिया गया है। (एजेंसी)

प्रधानमंत्री योजना

आया आर्थिक-सामाजिक क्रांति का दौर देश में जनधन, आधार और मोबाइल की ‘त्रिमूर्ति’ से सामाजिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी है

बी

ते तीन वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री जन धन योजना के जरिए देश के गरीब न सिर्फ देश की अर्थव्यस्था की मुख्यधारा का हिस्सा बने, बल्कि जन-धन योजना ने देश के गरीबों की गरिमा को भी बढ़ाया है। आज देश के लगभग तीस करोड़ परिवार प्रधानमंत्री जन-धन योजना से जुड़े हैं और इन खातों में 65 हजार करोड़ रुपए भी जमा हैं, लेकिन पीएम मोदी की नजर अब ‘एक बिलियन+ एक बिलियन+ एक बिलियन विजन’ पर है। जनधन, आधार और मोबाइल की ‘त्रिमूर्ति’ से सामाजिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। केंद्र सरकार की निगाह अब एक अरब-एक अरब-एक अरब पर है। यानी एक अरब आधार नंबर जो एक अरब बैंक खातों और एक अरब मोबाइल फोन से

जुड़े हों। इससे सभी भारतीय साझा वित्तीय, आर्थिक और डिजिटल क्षेत्र में आ चुके हैं। यह कुछ उसी तरीके से है जिससे वस्तु एवं सेवा कर से एकीकृत बाजार बना है। जनधन, आधार और मोबाइल ने देश में फाइनेंशियल, इकोनॉमिक और डिजिटल क्रांति लाने का काम किया है। अभी तक 52.4 करोड़ आधार, 73.62 करोड़ खातों से जोड़े जा चुके हैं। यह संख्या अब जल्दी ही एक अरब तक पहुंच जाएगी। यानी एक अरब आधार, मोबाइल और अकाउंट्स से जुड़ जाएंगे। जाहिर है मात्र इस कदम से देश के लोग स्वत: फाइनेंशियल और डिजिटल मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएंगे। जीएसटी ने एक टैक्स, एक मार्केट और एक

देश बनाया। अब जनधन, आधार और मोबाइल क्रांति से भारत को फाइनेंशियल, इकोनॉमिक और डिजिटल ग्रोथ मिलेगी। जनधन, आधार और मोबाइल सामाजिक क्रांति इसीलिए हैं कि इससे सरकार, अर्थव्यवस्था और खासकर गरीबों को फायदा है। वर्तमान में सरकार सालाना 35 करोड़ खातों में 74 हजार करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर कर रही है। इसमें से एक महीने में 6 हजार करोड़ ट्रांसफर होते हैं। पैसों का ये ट्रांसफर सरकार की पहल, मनरेगा, वृद्धावस्था पेंशन और स्टूडेंट स्कॉलरशिप योजनाओं में होता है। प्रधानमंत्री जन धन योजना देश के गरीबों के जीवन में नया सवेरा लेकर आई है। इसके माध्यम से न सिर्फ आर्थिक छुआछूत कम हुई है, बल्कि इससे गरीबी हटाने की दिशा में बड़ी सफलता मिल रही है।

पहले दिन ही डेढ़ करोड़ खाता खोलने का रिकॉर्ड बना चुकी यह योजना वित्तीय समावेशन की दिशा में केंद्र सरकार की बड़ी पहल है। ये बात इन खातों में औसत जमा से भी साबित होती है। 16 अगस्त, 2017 तक इन खातों में एवरेज बैलेंस 2,231 रु. रहा। बीते तीन सालों में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 16 अगस्त 2017 तक 29.52 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं। जनवरी, 2015 से अब तक जनधन खातों में 12.55 करोड़ का इजाफा हुआ है। जनवरी, 2015 से अगस्त 2017 तक 22.71 करोड़ रूपे कार्ड जारी किए गए। इसी दौरान जन धन योजना के तहत 17.64 करोड़ ग्रामीण खाते खोले गए। 16 अगस्त,2017 तक इन खातों में करीब 65,844.68 करोड़ रुपए जमा किए गए हैं। (एजेंसी)


04 - 10 सितंबर 2017

सौरमंडल उपग्रह

मंगल ग्रह के पास भी होगी शनि जैसी रिंग

सौर मंडल में मंगल के अलावा केवल नेप्च्यून ही ऐसा दूसरा ग्रह है जिसका सबसे बड़ा उपग्रह ट्राइटन भी अपने ग्रह की ओर तेजी से बढ़ रहा है

मं

गल ग्रह का सबसे बड़ा उपग्रह फोबोस धीरे-धीरे ग्रह की ओर बढ़ रहा है और 10 से 20 लाख वर्षो में यह ग्रह के काफी करीब पहुंच जाएगा। ग्रह के करीब पहुंचने पर यह शनि, बृहस्पति, यूरेनस और नेप्च्यून की तरह मंगल के चारों तरफ एक छल्ले का रूप अख्तियार कर लेगा। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के भारतीय मूल के वैज्ञानिक तुषार मित्तल और बेंजामिन ब्लैक के अनुसार इस अध्ययन का मकसद यह जानना था कि कोई चंद्रमा जब अपने ग्रह के करीब जाता है तो क्या होता है। ब्लैक ने बताया कि पृथ्वी का उपग्रह (चंद्रमा) हर साल कुछ सेंटीमीटर पृथ्वी से दूर जा रहा है, वहीं फोबोस हर साल मंगल की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में संभावना है कि या तो फोबोस मंगल से टकरा जाने या टूटकर बिखर जाने की है। सौर मंडल में इसके अलावा केवल नेप्च्यून ही ऐसा दूसरा ग्रह है जिसका सबसे बड़ा उपग्रह ट्राइटन भी अपने ग्रह की ओर तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि फोबोस निकट समय में नष्ट नहीं होने वाला। उम्मीद है कि उसका रिंग लाखों वर्षो तक कायम रह

सकता है, लेकिन बावजूद इसके यह अपने अंत की ओर बढ़ रहा है। फोबोस के ससंजक बल का आकलन करते हुए वैज्ञानिकों ने पाया कि यह अपनी ओर खींचने वाली ज्वार की ताकतों (टाइडल फोर्स) का विरोध करने में असक्षम है। ब्लैक और मित्तल ने फोबोस की शक्ति का अनुमान लगाने के लिए पृथ्वी पर इसी प्रक्रिया के तहत बिखरे चट्टानों और पृथ्वी पर गिरे ऐसे उल्कापिंडों जिनका घनत्व और संघटन फोबोस के समान था, से मिले आंकड़ो का इस्तेमाल किया। (एजेंसी)

नासा योजना

नासा बनाएगा चमकीला बादल

नासा के रॉकेट अभियान के लिए कृत्रिम चमकीले बादल बनेंगे

ना

सा का एक रॉकेट अभियान सफेद कृत्रिम बादल बनाएगा जो रात में आकाश में चमकेंगे। इसके जरिए ऊपरी वायुमंडल में विक्षोभ का अध्ययन किया जाएगा जो संचार

एवं तकनीकी प्रणालियों को बाधित करते हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी ने कहा कि ये कृत्रिम बादल रिपब्लिक ऑफ मार्शल आइलैंड के निवासियों को दो रॉकेट फ्लाइट के दौरान आइनोस्फीयर में होने वाली घटनाओं का अध्ययन न्यूट्रल डायनामो मिशन करेगा। ये विक्षोभ सूरज डूबने के बाद आईनोस्फीयर में एफ क्षेत्र के नाम से पहचाने जाने वाले एक हिस्से में घटित होते हैं। ये रेडियो संचार, नौवहन और इमेजिंग प्रणालियों को बाधित करते हैं और इस तरह तकनीक के लिए तथा उस पर निर्भर समाज के लिए खतरा पैदा करते हैं। एक रॉकेट में ट्राई मिथाईल एल्युमिनियम नाम का पदार्थ होगा जो कृत्रिम सफेद बादल बनाएगा। (एजेंसी)

विज्ञान

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उपग्रह शोध

सूखा है चांद का अंदरूनी हिस्सा

चंद्रमा की सतह से एकत्र की गई एक पुरानी चट्टान के विश्लेषण से पता चला है कि चांद का भीतरी हिस्सा सूखा है

र्ष 1972 में अपोलो 16 मिशन के दौरान चंद्रमा की सतह से इकट्ठी की गई एक पुरानी चट्टान का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के इस उपग्रह का अंदरूनी हिस्सा बहुत सूखा प्रतीत होता है। चंद्रमा पर नमी का सवाल इसीलिए अहम है, क्योंकि पानी और अन्य वाष्पशील तत्वों और यौगिकों की मात्रा चंद्रमा के इतिहास और इसके बनने के बारे में संकेत देती है। अमेरिका में यूनिवसिटी ऑफ कैलिफॉर्निया सैन डिएगो के जेम्स डे ने कहा, ''यह एक बड़ा सवाल रहा है कि चंद्रमा सूखा है या नमीयुक्त। यह मामूली

सी बात लग सकती है, लेकिन असल में यह अहम है।' डे ने कहा कि नतीजे दिखाते हैं कि जब चंद्रमा बना, तब वह बहुत अधिक गर्म था। शोधकर्ताओं का मानना है कि वह इतना अधिक गर्म रहा होगा कि जल या चंद्रमा की स्थितियों के तहत कोई अन्य वाष्पशील तत्व या यौगिक बहुत पहले ही वाष्पित हो गए होंगे। यह निष्कर्ष शोधकर्ताओं ने वर्ष 1972 में अपोलो 16 अभियान के दौरान चंद्रमा की सतह से एकत्र की गई एक पुरानी चट्टान का विश्लेषण कर निकाला है। (एजेंसी)

मिल गया आकाशगंगा का सबसे 'शैतान' तारा नासा खोज

नासा ने आकाशगंगा में एक नए और विचित्र स्वभाव वाले तारे को खोज निकाला है

मेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के हबल टेलीस्कोप ने आकाशगंगा में एक नए और विचित्र स्वभाव वाले तारे की खोज की है तथा इसके बर्ताव के कारण इसे 'नैस्टी' (शैतान) तारा नाम दिया गया है। वास्तव में इसे शैतान इसीलिए कहा गया है, क्योंकि इसे अपने जैसे ही एक अन्य तारे की बाहरी परत को चुराने वाला माना जा रहा है। विशालकाय, तेजी से नष्ट होने वाला तारा 'नैस्टी 1' विशालकाय तारों के विकसित होने के अल्पकालिक अस्थायी चरण की बानगी पेश कर सकता है। कुछ दशक पहले खोजे गए 'नैस्टी 1' तारे को 'वोल्फ रायेट' के रूप में पहचाना गया, जो तेजी से विकसित होने वाला तथा सूर्य से कहीं विशाल होता है। इस तारे की बाहरी हाइड्रोजन से भरी परत तेजी से नष्ट होती है, जिससे इसका बेहद गर्म और तेज चमक वाला हीलियम से भरा कोर दिखाई देने लगता है, लेकिन 'नैस्टी 1' आम वोल्फ रायेट तारे जैसा नहीं है। हबल द्वारा

मिली तस्वीर में इस तारे के चारों ओर गैसयुक्त चपटे प्लेट जैसी आकृति दिखाई दी है। तारे के चारों ओर फैली गोल चपटी यह विशाल तस्तरी 2,000 अरब मील चौड़ी है। वर्तमान अनुमान के मुताबिक, तारे के चारों ओर फैली निहारिका कुछ हजार वर्ष ही पुरानी है और पृथ्वी से 3,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। खगोलविदों के अनुसार, इस तारे के चारों और फैली यह निहारिका दुर्लभ खगोलीय घटनाओं में है, जब एक ही सौरमंडल में दो वोल्फ रायेट तारे पाए जाएं और विशाल वोल्फ रायेट तारे का बाहरी हाइड्रोजन वाली परत को छोटा तारा अपनी ओर खींच ले। मुख्य अध्ययनकर्ता कैलिफोर्निया-बर्कले विश्वविद्यालय के जॉन मौरहान ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि हम इस तश्तरी जैसी संरचना को देखकर उत्साहित हैं, क्योंकि यह एक ऐसे वोल्फ रायेट तारे के विकसित होने का प्रमाण हो सकता है जो इस तरह के दो तारों के मिलने से बना हो। (एजेंसी)


14 गुड न्यूज

04 - 10 सितंबर 2017

नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश

जस्टिस दीपक मिश्रा बने देश के 45वें मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने न्यायमूर्ति मिश्रा को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई बम धमाकों के दोषी याकूब मुबईमें मनकेकीश्रृंखलाबद्ध फांसी के खिलाफ मध्य रात्रि में सुनवाई

करने तथा निर्भया बलात्कार कांड के दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखने वाले न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा देश के 45वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई गणमान्य लोग वहां मौजूद थे। राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद न्यायमूर्ति मिश्रा को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। उनका कार्यकाल तीन अक्टूबर 2018 को समाप्त होगा। न्यायमूर्ति मिश्रा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बनने वाले ओडिशा के तीसरे न्यायाधीश हैं। उनसे पहले ओडिशा से ताल्लुक रखने वाले न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा और न्यायमूर्ति जीबी पटनायक भी इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। न्यायमूर्ति मिश्रा याकूब मेमन पर दिए गए फैसले के कारण काफी सुर्खियों में रहे। उन्होंने रात भर

सुनवाई करते हुए याकूब की फांसी पर रोक लगाने संबंधी याचिका निरस्त कर दी थी। वे पटना और दिल्ली उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं। तीन अक्टूबर 1953 को जन्मे न्यायमूर्ति मिश्रा को 17 फरवरी 1996 को ओडिशा उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया गया था। तीन मार्च 1997 को उनका तबादला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में कर दिया गया। उसी साल 19 दिसंबर को उन्हें स्थायी नियुक्ति दी गई। चार दिन बाद 23 दिसंबर 2009 को उन्हें पटना उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया और 24 मई 2010 को दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। वहां रहते हुए उन्होंने पांच हजार से ज्यादा मामलों में फैसले सुनाए और लोक अदालतों को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के प्रयास किये। उन्हें 10 अक्टूबर 2011 को पदोन्नत करके उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। न्यायमूर्ति मिश्रा ने ही देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के आदेश जारी किए थे। (एजेंसी)

तुसाद म्यूजियम दिल्ली

तुसाद म्यूजियम में लगेगी पीएम मोदी की प्रतिमा दिल्ली के रीगल बिल्डिंग में बनने जा रहे मैडम तुसाद संग्रहालय में कई राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमा देखने को मिलेगी

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डम तुसाद संग्रहालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माहौल बनेगा। बयान में कहा गया है मोम की प्रतिमा लगने वाली है। दिल्ली के रीगल कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल, सुभाष बिल्डिंग में बनने जा रहे मैडम तुसाद संग्रहालय में चंद्र बोस और भगत सिंह के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पूर्व यहां समसामयिक नेताओं मोदी और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, भगत सिंह और कलाम की प्रतिमाएं भी होंगी। सरदार पटेल सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की मोम लंदन के मैडम तुसाद की एक विशेष टीम ने की प्रतिमाएं देखने को मिलेंगी। इन हस्तियों की प्रतिमाएं बनाई है। मैडम तुसाद के मैडम तुसाद की तरफ से जारी बयान के अनुसार सभी संग्रहालयों का संचालन करने वाले मर्लिन यह पहली बार होगा कि यहां आने वाले देश के एंटरटेनमेंट्स के इंडिया प्रमुख अंशुल जैन ने कहा कि लिए बलिदान देने वाले नेताओं को देख सकेंगे और हम आगे दूसरे और प्रभावशाली नेताओं की प्रतिमाएं उनके प्रति सम्मान व्यक्त कर सकेंगे। इससे राष्ट्रवादी यहां लगाएंगे।

दिल्ली के रीगल बिल्डिंग में इस मशहूर मैडम कनॉट पैलेस के रीगल बिल्डिंग में यह मैडम तुसाद संग्रहालय की शाखा इसी साल खुलनी है। तुसाद संग्रहालय का 22वां स्टूडियो होगा। उम्मीद भारत में यह इस तरह का पहला संग्रहालय होगा। है कि मैडम तुसाद के संग्रहालय से पर्यटन को नया इसमें इतिहास से जुड़ी हस्तियों, खेल जगत के आयाम मिलेगा। लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में दिग्गजों, बॉलीवुड तथा मनोरंजन जगत के सितारों दुनिया भर की दो हजार मशहूर हस्तियों के मोम के की मोम से निर्मित प्रतिमाएं होंगी। पुतले रखे हुए हैं। (एजेंसी)


04 - 10 सितंबर 2017

गुड न्यूज

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मुलाकात बाइकिंग क्वींस

प्रधानमंत्री मोदी से मिलीं बाइकिंग क्वींस

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और स्वच्छ भारत मिशन को लेकर दस हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्री कर चुकी है यह टीम

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जरात में बाइकिंग क्वींस के नाम से मशहूर 50 महिला बाइक सवारों के समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस समूह का कहना है कि उन्होंने 13 राज्यों-संघ शासित प्रदेशों में 10,000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की है और लोगों से सामाजिक विषयों पर बातचीत की है, जैसे कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और स्वच्छ भारत। उन्होंने 15 अगस्त, 2017 को लद्दाख के खारदुंग-ला में तिरंगा फहराया। दिलचस्प है कि ‘बेटी बचाओ’, ‘बेटी पढ़ाओ’ जागरुकता अभियान के एक हिस्से के रूप में, ‘बाइकिंग क्वींस’ ने पहले ही कई जगहों का दौरा किया है। प्रधानमंत्री ने उनके प्रयासों की सराहना की और भविष्य में उनके सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के लिए उन्हें शुभकामनाएं दी।

एचएएम रेडियो पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में खुलेगा एचएएम रेडियो केंद्र कोलकाता में राइटर्स बिल्डिंग के पास नबान्न में पहली बार एचएएम रेडियो केंद्र की स्थापना होगी

श्चिम बंगाल रेडियो क्लब के सचिव अंबरीश नाग बिस्वास ने कहा ये खुद में एक अनोखी बात है कि पहली बार राज्य सचिवालय के पास एक एचएएम रेडियो केंद्र स्थापित किया जाएगा, जिसका संचालन एक वरिष्ठ अधिकारी करेंगे। रेडियों केंद्र के लिए पहले से ही लाइसेंस प्राप्त किया जा चुका है। जानकारों का कहना है कि जो अधिकारी एचएएम रेडियो ऑपरेशन में उचित प्रशिक्षण लेकर आये थे, उन्हें जल्द ही संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के केंद्रीय मंत्रालय के तहत

दूरसंचार विभाग द्वारा जारी किए गए लाइसेंस सौंप दिए जाएंगे। एचएएम रेडियो प्राकृतिक आपदाओं और बड़ी घटनाओं के दौरान खास तौर पर काम में आते हैं। सुनामी के दौरान, एचएएम रेडियो ऑपरेटरों ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सैकड़ों फंसे लोगों को ढूंढने और बचाव करने में नौसेना, भारतीय वायुसेना और सेना के मुख्य आदेश की सहायता से काम किया था, जिसके परिणामस्वरूप लोगों को ढूंढ पाना आसान हो गया था और साथ ही लोगों की सहायता के लिए भीड़ भी इकठ्ठी हो गई थी। एक बार जब एचएएम स्टेशन चालू हो जाएगा, तो राज्य के दूसरे हिस्सों के संपर्क में रहना आसान हो जाएगा। खासकर जब सभी संचार माध्यम विफल हो जाएंगे तब एचएएम की मदद से प्रशासन स्थिति का आकलन करने और उपचारात्मक उपायों को व्यवस्थित करने में सक्षम हो जाएगा। (एजेंसी)

डिजिटल इंडिया

50 लाख कर्मचारियों को मिलेगी हिंदी-अंग्रेजी ईमेल-सेवा

‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम के तहत सरकार अपने सभी कर्मचारियों को सुरक्षित संपर्क के लिए ईमेल सेवा उपलब्धि करा रही है

50

लाख सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकार अपनी नई ईमेल नीति के तहत अंग्रेजी और हिंदी में ईमेल सेवा उपलब्धर कराने जा रही है। इसके तहत सरकारी कर्मचारी सुरक्षा कारणों से निजी ईमेल सेवाओं को इस्ते माल नहीं कर सकेंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम के तहत सरकार अपने सभी कर्मचारियों को सुरक्षित

संपर्क के लिए ईमेल सेवा उपलब्ध करा रही है। अब यह सेवा 50 लाख कर्मचारियों को उपलब्ध कराई जाएगी। अभी इसका इस्ते माल करने वालों की संख्या 16 लाख है। अंग्रेजी ईमेल सेवा के अंत में ‘@ gov.in’ रोमन लिपि में और हिंदी सेवा के लिए ‘सरकार’ भारत देवनागिरी लिपि में होगा। सरकार में केंद्रीकृत ईमेल संरचना से सरकारी आंकड़ो के लिए मजबूत सुरक्षा तंत्र सुनिश्चित किया जा सकेगा। साथ ही पर्यावरण के लिहाज से भी यह एक क्रांतिकारी कदम होगा, क्योंकि इस तरह ज्यादातर संवाद करने के लिए ईमेल का सहारा लिया जाएगा और कागजी काम कम होगा। (एजेंसी)


16 खुला मंच

04 - 10 सितंबर 2017

‘किताबें पढ़ने से हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है’

- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

स्वच्छता के स्कूल

2,68,402 स्कूलों में लगी स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार हासिल करने की होड़

में स्वच्छता को लेकर हो रही पहल और देशकार्यक्रमों के कारण जो एक बड़ी उपलब्धि

देखने में आ रही है, वह शिक्षा परिसरों के साथ बच्चों और युवाओं के मानस और संस्कार में स्वच्छता को लेकर बढ़ी अहमियत है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त 2014 को माननीय प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश के सभी स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था होनी चाहिए और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाए जाने चाहिए, तभी हमारी बेटियों को स्कूल छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। प्रधानमंत्री के इस संकल्प को जहां काफी हद तक पूरा कर लिया गया है, वहीं कई ऐसे कार्यक्रम भी सरकार की तरफ से चलाए जा रहे हैं, जिससे स्कूली छात्रों में स्वच्छता को लेकर जागरुकता तात्कालिक नहीं, बल्कि स्थायी तौर पर तो आए ही, विद्यालय का अपना प्रबंधन भी स्वच्छता को हमेशा अपनी प्राथमिकता के तौर पर लेकर चले। इन्हीं बातों के मद्देनजर स्वच्छ विद्यालय अभियान के तहत सरकार ने कई गतिविधियां प्रारंभ की हैं और 2016-17 में स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार की घोषणा की है। इस पुरस्कार को हासिल करने के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा में के लिए ऑनलाइन माध्यम से 35 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों के जिला व राज्य स्तर के विद्यालयों ने इस पुरस्कार प्रतिस्पर्धा में भाग लिया। विजेताओं को बधाई देते हुए मानव संसाधन मंत्री जावडेकर ने कहा कि अगले वर्ष इस पुरस्कार के अंतर्गत निजी स्कूलों को भी लाया जाएगा। गौरतलब है कि इस वर्ष केंद्र व राज्य सरकारों के 2,68,402 स्कूलों ने इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया और यह अपने आप में ही एक उपलब्धि है तथा यह ‘न्यू इंडिया’ की शुरुआत भी है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और राजस्थान शीर्ष तीन राज्य घोषित किए गए हैं, जहां पांच सितारा और चार सितारा रेटिंग वाले स्कूलों की अधिकतम संख्या है। इस प्रतिस्पर्धा को लेकर स्कूलों की तरफ से दिखा उत्साह यह दिखाता है कि स्वच्छता का संकल्प शिक्षा के इन परिसरों में न सिर्फ पूरा हो रहा है बल्कि इसे लेकर उनके अंदर प्रतिस्पर्धी श्रेष्ठता का भी भाव है और यह पूरे देश के लिए एक प्रेरक संतोष का विषय है।

टॉवर

(उत्तर प्रदेश)

स्मरण

शहनाज हुसैन

लेखिका अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं

सौंदर्य और स्वास्थ्य का योग

अनेक सौंदर्य समस्याएं मानसिक तनाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। योग से तनाव को कम करने तथा स्वछंद व उन्मुक्त मानसिक वातावरण तैयार करने में मदद मिलती है

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रतीय परंपरा हमेशा से ही जीवन को समग्र और संतुलित रूप से जीने की दृष्टि प्रदान करती रही है। भारतीय चिंतन और परंपरा का आधार रहा है योगशास्त्र। योग एक ऐसी अनमोल निधि है, जिसके उपयोग से शारीरिक सौंदर्य और मानसिक शक्ति हासिल की जा सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अनिंद्रा, रक्तचाप, मोटापा और आपाधापी से जन्मे अनेक रोगों को योग के माध्यम से दूर रखा जा सकता है और शारीरिक सौंदर्य को हासिल किया जा सकता है। छरहरी काया, दमकती त्वचा और कांतिमय केश की चाहत को योग एवं आयुर्वेदिक जीवन प्रणाली के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। बालों तथा त्वचा के सौंदर्य को बनाए रखने में प्राणायाम महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। प्राणायाम से जहां तनाव कम होता है, वहीं दूसरी ओर शरीर में प्राण वायु का प्रभावी संचार होता है तथा रक्त का प्रभाव बढ़ता है। प्राणायाम सही तरीके से सांस लेने की बेहतरीन अदा है। प्रतिदिन दस मिनट तक प्राणायाम से मानव शरीर की प्राकृतिक शुद्धि हो जाती है। प्राणायाम का आज पूरे विश्व में अनुसरण किया जाता है। प्राणायाम से मानव मस्तिष्क में व्यापक आक्सीजन तथा रक्त संचार होता है, जिससे बालों की प्राकृतिक रूप से वृद्धि होती है तथा बालों का सफेद होना तथा झड़ने जैसी समस्या को रोकने में भी मदद मिलती है। आमतौर पर अनिद्रा, तनाव आदि में पैदा होने वाले कील, मुंहासे, काले धब्बों आदि की समस्याओं के स्थायी उपचार में योग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। उत्थान आसन के लगातार उपयोग से आप कील, मुंहासे, काले धब्बों आदि की समस्याओं का स्थाई उपचार पा सकते हैं। कपालभाती शरीर में कार्बन डाईक्साईड को हटाकर खून को साफ करने में मदद मिलती है। उससे शरीर में हल्कापन महसूस होता है। धनुरासन से शरीर में रक्त का प्रभाव बढ़ता है तथा शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद मिलती है, इससे शरीर की त्वचा में प्राकृतिक चमक आती है तथा त्वचा की रंगत में निखार भी आता है।

योग प्राचीन भारतीय विद्या है तथा इसके निरंतर अभ्यास से संयमित व्यक्तित्व तथा वृद्वावस्था की भाव मुद्राओं को रोकने में मदद मिलती है। योग से रक्त संचार के प्रवाह में सुधार होता है। यह रक्त संचार सुंदर त्वचा के लिए अत्यधिक आवश्यक होता है, क्योंकि इससे त्वचा को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं और जिससे त्वचा सुन्दर तथा निखरी दिखाई देती है। इससे त्वचा में रंगत तथा स्फूर्ति आ जाती है। यह अवधारणा बालों पर भी लागू होती है। योग से सिर की त्वचा तथा बालों के कोश में रक्त संचार तथा आक्सीजन का व्यापक निरंतर प्रवाह होता है। इससे बालों के रक्त संचार को पौष्टिक तत्व पहुंचाने में काफी मदद मिलती है। इसी तरह सूर्य नमस्कार से पूरे शरीर में नवयौवन का संचार होता है और शरीर पर बढ़ती आयु के प्रभाव को रोका जा सकता है तथा यह चेहरे तथा शरीर पर बुढ़ापे की भाव मुद्राओं के प्रभाव को रोकने में मददगार साबित होता है। चेहरे की झुर्रियों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य नमस्कार तथा प्राणायाम दोनों प्रभावी आसन है। दरअसल, आपके सुंदर दिखने के लिए जरूरी नहीं कि आप सुंदर ही पैदा हुए हों, आप अपने प्रयत्नों से सौंदर्य प्राप्त कर सकते हैं। अच्छा स्वास्थ्य तथा सौंदर्य एक ही सिक्के के

मेरा विचार है कि आज की आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्य तथा सौंदर्य के संदर्भ में योग काफी सार्थक है। योग मेरे व्यक्तिगत जीवन का अभिन्न अंग रहा है तथा मैंने इसके असंख्य लाभ महसूस किए हैं


04 - 10 सितंबर 2017 दो पहलू हैं। यदि आप आंतरिक रूप से सुंदर नहीं हैं, तब तक आपका सौंदर्य चेहरे पर नहीं झलक सकता। सुंदर त्वचा, चमकीले बाल तथा छरहरे बदन के लिए अच्छी सेहत का होना बहुत जरूरी है। जहां तक बाहरी सौंदर्य का संबंध है, वहां छरहरे बदन से व्यक्ति काफी युवा दिखाई देते हैं जो कि लंबे समय तक यौवन बनाए रखने में सहायक होता है। योग से शरीर के हर टिशू को आक्सीजन प्राप्त होती है जिसे शरीर में सौंदर्य तथा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। यदि आप ऐसी जीवनशैली गुजार रहे हैं जिसमें शारीरिक गतिविधि नगण्य है तो आप वास्तव में बुढ़ापे को निमंत्रण दे रहे हैं। योग तथा शारीरिक श्रम से आदमी को यौवन की स्थिति को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलती है, क्योंकि इससे शरीर सुदृढ़ होता है तथा शरीर सुव्यवस्थित तथा तंदुरूस्त रखने में भी मदद मिलती है योग आसनों से रीढ़ की हड्डी तथा हड्डियों के जोड़ों को लचकदार एवं कोमल बनाने में मदद मिलती है। इससे शरीर सुदृढ़ तथा फुर्तीला बनता है, मांसपेशियों में रंगत आती है, रक्त संचार में सुधार होता है, प्राण शक्ति का प्रवाह होता है तथा सौंदर्य एवं अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है। अनेक सौंदर्य समस्याएं मानसिक तनाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। योग से तनाव को कम करने तथा स्वछंद व उन्मुक्त मानसिक वातावरण तैयार करने में मदद मिलती है तथा इससे तनाव से जुड़ी सौंदर्य समस्याओं को निजात प्रदान करने में मदद मिलती है। योग के लगातार अभ्यास से कील मुंहासों, बालों के झड़ने की समस्याओं, सिर की रूसी आदि समस्याओं का स्थायी उपचार मिलता है। योग तथा शारीरिक क्रियायें करने वाले युवाओं पर किए गए अध्ययन में यह पाया गया हैं उनके व्यक्तित्व में भावनात्मक स्थिरता, आत्म विश्वास, उचित मनोभाव जैसे सकारात्मक बदलाव महसूस किए गए हैं। वास्तव में मैंने समग्र स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेदिक सिद्धांत को प्रोत्साहित किया, जिसमें योग को इस कार्यक्रम का अभिन्न अंग माना गया। मेरी समग्र सौंदर्य देखभाल की विशिष्ट अवधारणा को विश्व भर में सराहा गया है। वास्तव में मेरा विचार है कि आज की आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्य तथा सौंदर्य के संदर्भ में योग काफी सार्थक है। योग मेरे व्यक्तिगत जीवन का अभिन्न अंग रहा है तथा मैंने इसके असंख्य लाभ महसूस किए हैं। आज का समय लगातार बढ़ती जटिलताओं और गति का समय है। जीवन यापन के लिए हर कोई लगातार गतिमान है। भाग-दौड़ की इन स्थितियों में एक सुसंगत, संयमित और स्वास्थ्य जीवन दृष्टि की खोज हर व्यक्ति को है। हर कोई अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहता है। योग जीवन को गहराई देने की एक विधा है। ऐसे में भारत का अनुसरण करते हुए विश्व के दूसरे देश भी योग को जीवन शैली में सुधार लाने का एक प्रमुख उपाय मान रहे हैं। योग वास्तव में शारीरिक समस्याओं, सौंदर्य तथा मानसिक शांति प्राप्त करने की अनमोल निधि है। यह जीवन को संतुलित रूप से जीने का शास्त्र है। हम खुशकिस्मत हैं कि भारतीय जीवनशैली में योग वर्षों पुरानी परंपराओं में शामिल रहा है। हम अपनी इसी अनमोल थाती को अपनाकर जीवन को संपूर्ण बना सकते हैं।

खुला मंच

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गिरिराज सिंह

लेखक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री हैं

मेरे गांव में सोलर चरखा प्रोजेक्ट सोलर चरखे में रोजगार सृजन की क्षमता तो है ही इससे कारीगरों की आय में भी इजाफा होता है

स्व

तंत्रता प्राप्ति के पूर्व स्वावलंबन और देश प्रेम का प्रतीक महात्मा गांधी का चरखा आज 70 साल बाद अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाया। तकनीक और नवाचार की कमी रही। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल इंडस्ट्रालाइजेशन (एमजीआईआरआई), वर्धा द्वारा विकसित सोलर चरखे के मॉडल को अपनाते हुए बिहार के नवादा जिले के ग्राम खनवां में मंत्रालय के सहयोग से एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू कराया, जिसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं। आज की तिथि में भारतीय हरित खादी ग्रामोद्योग संस्थान के तहत करीब 30 हजार वर्गफुट क्षेत्र में ट्रेनिंग-कम-प्रोडक्श न सेंटर में खादी की गिनिंग से लेकर आरटीडब्ल्यू के उत्पादन तक संपूर्ण वैल्यू चेन की ट्रेनिंग उपलब्ध कराई जा रही है और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत अब तक स्वीकृत 700 महिला कारीगरों में से 520 कारीगरों के घर पर सोलर चरखा कार्यरत हैं। इस प्रोजेक्ट के प्रभाव कई रूपों में सामने आए हैं। वर्तमान सोलर चरखे से ग्रामीण कारीगरों को 4-5 हजार रुपए प्रति माह की आमदनी हो रही है, जो पूर्व से कार्यरत हस्तचालित मॉडल की तुलना में 3-4 गुना है, जिससे आने वाले दिनों में प्रति कारीगर 9-10 हजार रुपए प्रति माह तक आमदनी सुनिश्चित करने की योजना है। सोलर ऊर्जायुक्त उन्नत चरखे के मॉडल से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं/बुनकरों

वर्ष-1 | अंक-37 | 28 आरएनआई नंबर-DELHIN

अगस्त - 03 सि्तंबर 2017

/2016/71597

harat.com

sulabhswachhb

08 मसिला िशक्तिकरण

मसिलाओं का नययू इंसिया

मसिला िुरक्षा और सवकाि के सलए नए कदम

28 जल िरंक्षण

16 प्ररोफेिर िे्तुकर झा

अक्षर समरण

िमाजशासत्र के क्षेत्र में प्ररो. का ऐस्तिासिक यरोगदान

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जलाशयों में बढा जल

दौरान देश के 91 प्रमुख में बढा जल का िंग्रिण

जलाशयों

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अनमरोल प्रेरणा, प्रेरक भ

को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध हुआ है। धागा उत्पादन से लेकर आरटीडब्ल्यू के उत्पादन तक करीब 1100 परिवार इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं और आने वाले दिनों में ग्रामीण आय में 10-12 करोड़ प्रति वर्ष तक की वृद्धि संभावित है। सोलर चरखा प्रोजेक्ट के एक चरखे से पूरी वैल्यू चेन में 10 प्रत्यक्ष-परोक्ष रोजगार उत्पन्न करने की क्षमता है और इसको देखते हुए खनवां में वर्तमान कार्यरत टीपीसी की सहायक यूनिट के रूप में ट्रेनिंग सेंटर हर 10 हजार की जनसंख्या के क्लस्टर में खोला जा रहा है। वर्तमान में पांच ट्रेनिंग सेंटर कार्यरत हैं तथा इस वर्ष के अंत तक 8-10 ट्रेनिंग सेंटर कार्यरत हो जाएंगे। खादी का टेक्सटाइल सेक्टर में वर्तमान योगदान एक प्रतिशत से भी कम है, वहीं हैंडलूम का योगदान करीब 11 प्रतिशत है। इस प्रकार सोलर चरखे से

सकारात्मक खबरों की दुनिया

जहां आजकल मीडिया में नकारात्मक खबरों को प्रमुखता दी जा रही है, लेकिन ऐसे दौर में ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ समाज में होने वाले विभिन्न साकारात्मक पहलुओं से हमें रूबरू करा रहा है, जो कि बहुत ही सराहनीय पहल है। हमने ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ का पिछला अंक पढ़ा, जिसमें देश में हो रहे सतत विकास और स्वच्छता पर विशेष जानकारी दी गई, जिससे हम काफी प्रभावित हुए हैं। हमें ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ के इस अंक का ‘गोशाला के लिए दासी का महादान’ आलेख काफी अच्छा लगा। हमें उम्मीद है कि आप हमें ऐसे ही समाज में छुपी विभिन्न प्रतिभाओं से रूबरू कराते रहेंगे। राजीव त्यागी, मेरठ, उत्तर प्रदेश

उत्पादित धागा, हैंडलूम सेक्टर के लिए एक अनुपूरक फॉरवर्ड लिंकेज के रूप में काम कर सकता है। यदि भारत की वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर (प्रति वर्ष 2 करोड़) और प्रति व्यक्ति 25-32 मीटर प्रति वर्ष कपड़े की आवश्यकता को दृष्टिगत रखा जाए तो सोलर चरखा/करघा के माध्यम से इस प्रत्यक्ष मांग को कॉस्ट इफेक्टिव और यूजर फ्रेंडली सोलर वस्त्र के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। आदर्श ग्राम खनवां के बाद माननीय प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के काकरहिया में भी ट्रेनिंग सेंटर प्रारंभ किए गए हैं। खनवां प्रोजेक्ट के विश्लेषित प्रभाव को देखते हुए 500 संसदीय क्षेत्रों में क्लस्टर आधारित सोलर चरखा प्रोजेक्ट को शुरू करने की योजना पर काम चल रहा है। जल्द ही इससे संबंधित प्रस्ताव को कैबिनेट के विचारार्थ रखा जाना है, जिसकी पूरी वैल्यू चेन से ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 5 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध होगा। सोलर चरखे का यह मिशन वस्तुतः परंपरागत चरखे को सोलर के माध्यम से ग्रीन एनर्जी के साथ युक्त करते हुए विकेंद्रीकृत धागा उत्पादन और आरटीडब्ल्यू वस्त्र उत्पादन तक की पूरी वैल्यू चेन की कई विशिष्टताओं को समाहित किए हुए है, जिसकी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी तेजी से आकर्षित हो रही हैं। रेमंड और डब्ल्यू जैसे ब्रांड का इस प्रोजेक्ट से जुड़ना इस बात का परिचायक है।

विकास में महिलाओं का योगदान

‘सुलभ स्वच्छ भारत’ ने अलग हटकर हमें समाज से जोड़ने का काम किया है। समाज में कौन से लोग बेहतर कार्य कर रहे हैं और क्या बेहतर हो सकता है इन सभी बातों से हमें ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ अवगत कराता है। हमें ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ के पिछले अंक में प्रकाशित ‘आधी आबादी का न्यू इंडिया’ और ‘नारियल की बागवानी में बढ़ा महिलाओं का दखल’ आलेख काफी अच्छे लगे। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ हमें देश के विकास में बढ़ती महिलाओं के योगदान से भी अवगत करा रहा है। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ ने समाज के हर क्षेत्रों पर खबरें प्रकाशित कर सराहनीय कार्य कर रहा है। संतोष गुप्ता, अलवर, राजस्थान


18 फोटो फीचर गणपति बप्पा मोरया! 04 - 10 सितंबर 2017

बुद्धि, शील, गुण और सौभाग्य के स्वामी के रूप में भगवान गणेश घर-घर में पूजे जाते हैं। गणेशोत्सव के अवसर पर तो खासतौर पर भगवान गणेश की पूजा पूरे देश में होती है। एक तरफ जहां बड़े-बड़े पंडालों में गणेश की बड़ी-बड़ी मूर्तियां स्थापित की जाती है, वहीं घरों में भी लोग इस मौके पर उनकी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। लोगों की कामना रहती है कि भगवान गणेश के साथ उनके जीवन,परिवार और समाज में सौहार्द और सौभाग्य का आगमन हो

फोटो ः प्रभात पांडेय

गणेश चतुर्थी से शुरू हुआ गणेश वंदन का सिलसिला दस दिनों तक चलता है। यह देश के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इसे एक नहीं, बल्कि कई जाति-मजहब औऱ समाज के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं


04 - 10 सितंबर 2017

फोटो फीचर

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स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तो लोकमान्य तिलक ने गणेश वंदन को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ दिया था। तब की शुरुआत आज एक प्रेरक राष्ट्रवादी परंपरा बन चुकी है। वाकई गणेशोत्सव के मौके पर राष्ट्रीय सौहार्द और एकता की मिसाल देखते ही बनती है


20 विकास

04 - 10 सितंबर 2017

नेतृत्व की सफलता विकास का संकल्प न्यू इंडिया संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘न्यू इंडिया’ के संकल्प से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। वे योजनाओं और नीतियों से लगातार इस संकल्प को पूरा करने में जुटे हैं

एक नजर

स्वच्छता से लेकर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कामयाबी 3.66 करोड़ किसान फसल बीमा योजना का लाभ उठा रहे हैं

15 अगस्त 2022 तक सभी घरों में बिजली पहुंचाने का संकल्प

एसएसबी ब्यूरो

सबका साथ, सबका विकास’, इसे बहुत सारे लोग भले ही एक चुनावी नारा समझते हों, लेकिन हकीकत यह है कि इस नारे में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ के वे तमाम सूत्र मौजूद हैं, जिसकी रूपरेखा आज धीरे-धीरे जनता के समक्ष आ रही है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के पहले दिन से इसी रूपरेखा के

अनुरूप कार्य कर रहे हैं। वे एक के बाद एक उन समस्याओं के समाधान की दिशा में कदम उठा रहे हैं, जो बेहद जटिल माने जाते रहे हैं। ‘न्यू इंडिया’ की इस विकास यात्रा में उन्होंने कई कठिन और साहसिक फैसले भी लिए हैं। किस फैसले से सियासत का समीकरण बिगड़ेगा और किस फैसले से बनेगा, उन्होंने इस बात की भी परवाह नहीं की। यह साहस वही व्यक्ति कर सकता है जिसके लिए ‘न्यू इंडिया’ के संकल्प से महत्वपूर्ण कुछ और

नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, फसल बीमा योजना, डिजिटल इंडिया, जन धन योजना, आवासीय योजना, जीएसटी और अनगिनत नीतिगत फैसले लेकर यह साबित कर दिया कि उनका मार्ग और उद्देश्य निश्चित है, जिसकी तरफ वह ‘टीम इंडिया’ को साथ लेकर आगे बढ़ने में जुटे हुए हैं। 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को

संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने अपने टीम इंडिया के भाव को शब्द देते हुए कहा, ‘हर कोई अपनी जगह से 2022 के लिए आजादी के बाद के 75 साल तक एक नया संकल्प , एक नया इंडिया, नई ऊर्जा, नया पुरुषार्थ, सामूहिक शक्ति के द्वारा देश में परिवर्तन ला सकता है। ‘न्यू इंडिया’ जो सुरक्षित हो, समृद्ध हो, शक्तिशाली हो, ‘न्यू इंडिया’ जहां हर किसी को समान अवसर उपलब्ध हो, ‘न्यू इंडिया’ जहां आधुनिक विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में भारत का विश्व में दबदबा हो।’ 67 सालों से देश में जड़ जमाए सामाजिक व आर्थिक कुरीतियों और विवेकहीन नीतियों को दूर


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करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने देश में एक आंदोलन छेड़ रखा है। ‘न्यू इंडिया’ के लिए जारी इस आंदोलन की सफलता को हर क्षेत्र में आए बदलावों के आंकड़ो से तो आंका ही जा सकता है, साथ में विधानसभा और उपचुनावों में मिल रही सफलता से भी मापा जा सकता है। ‘न्यू इंडिया’ को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए स्वच्छता अभियान को जोरदार तरीके से लागू किया जा रहा है। देश में 4.4 करोड़ घरेलू शौचालयों का निर्माण हो चुका है और देश के पांच राज्य, 149 जिले और 2.05 लाख गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। यही नहीं गंगा के किनारे बसे सभी गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। देश में आज, स्वच्छता का कवरेज 64.18 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। ‘न्यू इंडिया’ के लिए ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए हर स्तर पर समेकित योजनाओं को लागू किया है। ऊर्जा उत्पादन से लेकर उर्जा बचत तक को पूरी प्राथमिकता दी जा रही है। कोयले का उत्पादन बढ़कर 554.14 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिससे बिजली उत्पादन केंद्रों की उत्पादन की क्षमता बढ़ गई है। ये आज 3,19,606 मेगावॉट है। बिजली वितरण को अधिक व्यापक किया जा रहा है, ताकि हर घर को बिजली मिल सके। ट्रांसमिशन लाइन की लंबाई बढ़कर 3,66,634 सीकेएम तक पहुंच चुकी है। जिन 18,000 गांवों में आजादी के बाद आज तक बिजली नहीं पहुंची थी, उन गांवों में से 14,028 गांवों में बिजली पहुंच चुकी है और शेष गांवों में बिजली अगले साल मार्च तक पहुंचा देने का संकल्प है। यही नहीं 15 अगस्त 2022 तक देश के सभी घरों में बिजली पहुंचाने का संकल्प प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है, जिसकी सिद्धि में कोई संशय नहीं प्रतीत होता है। बिजली की बचत के लिए राज्यों में लगभग 27 लाख एलईडी स्ट्रीट लाइटें लगाई गई हैं, जिससे 13,088 करोड़ रुपए की सालान बचत हो रही है। इस बचत को गरीबों को मुफ्त बिजली देने का काम किया जा रहा है और अब तक 2.63 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली के कनेक्शन दिए जा चुके हैं। किसानों की समस्या का समाधानकिसानों के लिए पानी, बिजली, खाद, बीज और बाजार की समस्या को दूर करने के लिए समेकित रूप से

कई योजनाओं को लागू किया जा रहा है। फसलों के प्राकृतिक आपदा से बर्बाद होने पर किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए फसल बीमा योजना लागू की गई है। अब तक लगभग 3.66 करोड़ किसान इस फसल बीमा योजना का लाभ उठा रहे हैं। किसानों की जमीन में खाद की जरूरत को जांचने के लिए 7.1 करोड़ सॉयल हेल्थ कार्ड दिए जा चुके हैं। इन योजनाओं के लाभ मिलने से किसान अनाज का रिकॉर्ड उत्पादन कर रहे हैं। ऑनलाइन बाजार पर 46 लाख किसान, 90 हजार व्यापारी और 47,000 आढ़तिया काम करते हैं। ‘न्यू इंडिया’ में युवाओं

को रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों इसके लिए श्रम संहिता कानूनों में बदलाव से लेकर मेकइन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और मुद्रा योजना को कारगर तरीके से लागू किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की ये कुछ योजनाओं की हकीकत थी, लेकिन ऐसी कई योजनाएं हर क्षेत्र में लागू की जा रही हैं, जिससे पांच साल बाद, 2022 में ऐसा ‘न्यू इंडिया’ बने जिसमें ‘सबका साथ, सबका विकास’ संभव हो सके। भ्रष्टाचार और कालाधन ‘न्यू इंडिया’ के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। इसे खत्म करने के लिए नोटबंदी, बेनामी संपत्ति कानून से लेकर जीएसटी तक को लागू किया गया। परिणाम

विकास

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यह कि अब तक 1.25 लाख करोड़ रुपए का दबा हुआ काला धन बाहर आ चुका है। 1.75 लाख फर्जी कंपनियां, जो व्यवस्था में कालेधन को ठिकाने लगाने का काम करती थी उन्हें बंद कर दिया गया है। अब तक, ऐसे 18 लाख लोगों का पता चला है जिनके पास आय से अधिक संपत्ति है और जो कालेधन के बाजार को फलने-फूलने में मदद कर रहे थे। बेनामी संपत्ति कानून को अधिसूचित करके अब तक 800 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति को जब्त कर लिया गया है। देश में कालाधन सबसे अधिक उन योजनाओं के जरिए पैदा होता था, जो गरीबों के लिए बनाई गई थीं। डीबीटी के माध्यम से इन योजनाओं में धन की लूट को बंद कर दिया गया है। आज डीबीटी के माध्यम से 35.7 करोड़ लोगों को 74607.55 करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं, जिससे चोरी में जाने वाले लगभग 50 हजार करोड़ सालाना की बचत हो रही है। मोबाइल बैंकिंग की सुविधा सबको उपलब्ध कराई गई है ताकि जनता में डिजिटल लेन-देन की आदत बढ़े और कालेधन पर सख्त लगाम लग सके। आज 722.2 मिलियन लेन-देन मोबाइल बैंकिंग के जरिए हो रहे हैं।


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स्वास्थ्य जागरुकता

फ्लोरोसिस को परास्त कर रहा सुभाष

आंध्र प्रदेश नलगोंडा फ्लोराइड युक्त पानी के कारण फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से है। कंचुकटला सुभाष ने इस समस्या के खिलाफ जहां जन-जागरुकता फैलाई, वहीं वे इस मामले को लेकर अदालत के दरवाजे तक गए। अब उनका मकसद पूरे देश को फ्लोरोसिस से मुक्त करने का है

एक नजर

पिता की असमय मौत ने सुभाष के जीवन पर गहरा असर डाला 1992 से सुभाष फ्लोरोसिस के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं

नलगोंडा के 800 गांवों में जनजागरण अभियान चलाया

फ्लो

एसएसबी ब्यूरो

रोसिस यानी एक ऐसा रोग जिससे आपकी जान जाने का खतरा तो खैर नहीं रहता पर आप धीरे-धीरे विकलांगता की तरफ बढ़ने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की जिंदगी में झांकें तो अहसास होता है कि कैसे इस बीमारी ने उनकी जिंदगी बदलकर रख दी है। करिंगू अजय सिर्फ चौदह साल के हैं, लेकिन खेलने कूदने की इस उम्र में उनका शरीर एक जिंदा लाश बनकर रह गया है। फ्लोरोसिस नामक जहरीली बीमारी ने उनके शरीर को एक गठरी बनाकर रख दिया है। उनके शरीर पर तकिया बांधकर रखा जाता है, ताकि हड्डियों का दर्द उन्हें कम तकलीफ दे। उन्हीं के पड़ोस की 19 साल के वीरमाला राजिता की हड्डियां

इस तरह से मुड़ गई हैं कि वो मुश्किल से जमीन पर रेंगकर चल पाती हैं। राजिता कहती हैं, ‘मेरा कोई जीवन नहीं है। मैं हर समय घर पर रहती हूं। कहीं जा नहीं सकती। बड़े लोग घर पर आते हैं जिनमें नेता और फिल्मी हस्तियां सभी शामिल हैं, लेकिन मदद कोई नहीं करता। सब सहानुभूति दिखाकर चले जाते हैं।’ राजिता और अजय की यह दर्दभरी कहानी न इकलौती है और न ही आखिरी। तेलंगाना के नलगोंडा

जिले में सदियों से हड्डियों की यह चीख पुकार जारी है। इन्हीं दर्दभरी पुकारों में एक आवाज कंचुकटला सुभाष की भी है। अधेड़ हो चुके सुभाष के तन पर तो फ्लोरोसिस नामक घातक बीमारी का कोई असर नहीं है, लेकिन उनके मन और जीवन पर फ्लोराइड का गहरा असर हुआ है। सुभाष के पिता जानते थे कि उनके गांव के पानी में फ्लोराइड का जहर मिला हुआ है, शायद इसीलिए समय रहते उन्होंने सुभाष को पढ़ने के लिए नलगोंडा से दूर हैदराबाद भेज दिया।

नलगोंडा जिले से डेढ़ लाख पोस्टकार्ड लिखवाकर सुभाष ने हाईकोर्ट को दिया साथ ही साथ उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वो नागार्जुन सागर बांध की तरफ चलें और अपना पानी खुद हासिल कर लें

सुभाष बताते हैं, ‘मैं तो फ्लोराइड के असर से बच गया, लेकिन मेरे पिता नहीं बच पाए। उनकी दोनों किडनी फेल हो गई और वो असमय हमें छोड़कर चले गए।’ सुभाष के पिता की असमय मौत ने उनके मन और जीवन दोनों पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने तय किया कि वो इस ‘दानव’ से लड़ेंगे, जिसने उनके पिता को असमय उनसे छीन लिया था। इस तरह सुभाष के जीवन में फ्लोराइड के खिलाफ एक जंग की शुरुआत हुई। हालांकि नलगोंडा के पानी में फ्लोराइड के खिलाफ यह सुभाष की पहली जंग नहीं थी। पहली जंग हैदराबाद के निजाम ने 1945 में शुरू कर दी थी, लेकिन नवाबियत के साथ ही उस जंग का भी खात्मा हो गया। 1945 में निजाम ने बटलापेल्ली गांव में फ्लोराइड मुक्त पानी मुहैया कराकर लोगों को फ्लोराइड से बचाने की शुरूआत की थी, लेकिन यह काम आगे नहीं बढ़ पाया। देश आजाद हुआ। निजाम का शासन खत्म हुआ और इसके साथ ही निजाम की बनाई व्यवस्था भी टूट गई। आजाद भारत के पास इतना पैसा ही नहीं था कि वह नलगोंडा वासियों के पानी से ‘जहर’ खींचकर बाहर निकाल सके। आजादी के करीब सत्ताइस साल बाद पहली बार पानी में फ्लोराइड के खिलाफ सरकारी मुहिम शुरू हुई। नीदरलैंड सरकार ने भारत सरकार को इस काम के लिए 375 करोड़ रुपए का अनुदान दिया। इसी पैसे से नलगोंडा में पानी छानने के 29 प्लांट लगाए गए। इस तकनीक को ही नलगोंडा तकनीक कहा गया, जिसमें भूजल को छानकर पीने योग्य बनाया जाता था। लेकिन जैसे ही नीदरलैंड सरकार का फंड खत्म हुआ, पानी छानने


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का यह काम भी बंद हो गया। इसके बाद एलम नाम का एक तरल पदार्थ लोगों को दिया गया, जिसे पानी में मिलाने पर पानी में फ्लोराइड को खींच लेता था। इसे 10 लीटर पानी में 40 मिली लीटर तरल मिलाना पड़ता था, लेकिन तकनीकि कारणों से यह तकनीक भी सफल नहीं हो सकी। इसके बाद एक घरेलू वाटर फिल्टर लाया गया, जिसमें एक्टिवेटेड एल्युमुनिया होता था। यह एक्टिवेटेड एल्युमुनिया फ्लोराइड कणों को पकड़ लेता था। इस एक्टिवेटेड एल्युमुनिया को हर पंद्रह दिन पर बदलना पड़ता था जो कि ग्रामीण परिवेश में संभव नहीं था। लिहाजा, यह तकनीक भी फेल हो गई। नलगोंडा में फ्लोराइड से लड़ने के लिए एक के बाद एक तकनीक आती रहीं, लेकिन सब फेल होती रहीं। इधर, 1992 में जब सुभाष हैदराबाद से पढ़ाई करके वापस लौटे तो उनका पहला सामना फ्लोराइड की समस्या से ही हुआ। सुभाष ने इस समस्या के खिलाफ अपनी लड़ाई की शुरुआत जनजागरण से शुरू करने का फैसला किया। सुभाष बताते हैं, ‘दूषित पानी का सबसे पहला शिकार बच्चे ही होते हैं, क्योंकि घर से लेकर बाहर तक वो बिल्कुल अनजान होते हैं कि वो जो पानी पी रहे हैं उसका उनके स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा।’ इसीलिए सुभाष ने सबसे पहले स्कूलों में जन जागरण अभियान चलाया। इसके अलावा नलगोंडा के आठ सौ गांवों में दीवार लेखन किया। गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटक किए और लोगों को बताया कि उनके साथ जो शारीरिक

2003 में हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि सरकार साल भर के भीतर नलगोंडावासियों को सुरक्षित पीने का पानी मुहैया करवाए समस्या हो रही है, वह पानी में फ्लोराइड के कारण हो रही है। उन्होंने लोगों को समझाना शुरू किया कि वो सावधानी रखेंगे तो कैसे इससे अपना बचाव कर सकते हैं। सुभाष जानते थे कि सिर्फ जन-जागरण से समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। फिर भी इससे कुछ बचाव तो हो ही सकता था। ऐसा नहीं है कि नलगोंडा के पास इस फ्लोराइड वाले पानी की समस्या का कोई समाधान नहीं था। समाधान था और बिल्कुल बगल में था। 1968 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने जिस नागार्जुन सागर बांध की आधारशिला रखी थी, वह नलगोंडा में ही था। नलगोंडा का यह नागार्जुन सागर बांध राज्य के दूर दराज के इलाकों की प्यास तो बुझा रहा था, लेकिन खुद नलगोंडावासियों को नागार्जुन सागर का पानी पीने के लिये उपलब्ध नहीं था। इसीलिए अब सुभाष के सामने एक ही रास्ता था कि वे सरकार को मजबूर करते कि वह नलगोंडावासियों को पीने के लिए नागार्जुन सागर बांध का पानी मुहैया कराती। सुभाष कहते हैं, ‘हमारा संविधान हमें जीने का अधिकार देता है लेकिन यहां हमें अपने उस मूलभूत

अधिकार से ही वंचित कर दिया गया था।’ सुभाष ने 2000 में हाईकोर्ट जाने का फैसला किया। उन्होंने नलगोंडा में पानी के बारे में विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, प्रयोगशालाओं में पानी की जांच करवाई और पूरी तैयारी के साथ वो हाईकोर्ट गए कि नलगोंडा वासियों के जीवन के मूलभूत अधिकार की रक्षा हो सके। तीन साल सुनवाई के बाद 2003 में हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि सरकार साल भर के भीतर नलगोंडावासियों को सुरक्षित पीने का पानी मुहैया करवाए। हाइकोर्ट ने अपने आदेश में जो मुख्य बातें कहीं उसके मुताबिक, ‘सरकार सुरक्षित पेयजल उपलब्ध करवाए, बच्चों के लिए स्कूल में फ्लोराइड मुक्त पानी की व्यवस्था करे, जहां जरूरी हो, वहां गैर सरकारी संगठनों की भी मदद ले और युद्धस्तर पर इस काम को पूरा करके एक साल के भीतर न्यायालय को सूचित करे।’ हाईकोर्ट के इस सख्त निर्देश के वाजिब कारण थे। नलगोंडा की 36 लाख की आबादी में से आधी आबादी को उस वक्त डेंटल फ्लोरोसिस था। 75 हजार ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनके शरीर का ढांचा बिगड़ गया था और करीब 8.5 लाख बच्चे

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फ्लोराइड के प्रभाव में थे, लेकिन अदालत के इस सख्त आदेश के बावजूद सरकार सालभर में अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकी। लिहाजा सुभाष ने अपने आंदोलन को और तेज करने का निर्णय किया। नलगोंडा जिले से डेढ़ लाख पोस्टकार्ड लिखवाकर उन्होंने हाईकोर्ट को दिया साथ ही साथ उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वो नागार्जुन सागर बांध की तरफ चलें और अपना पानी खुद हासिल कर लें। राज्य में चुनाव आया तो उन्होंने फ्लोराइड को राजनीतिक मुद्दा बनाते हुए अपने प्रत्याशियों को भी चुनाव मैदान में उतारने का काम किया। नलगोंडा जिले में पदयात्रा का आयोजन किया और हैदराबाद में होने वाले एशिया सोशल फोरम से लेकर दिल्ली के वर्ल्ड सोशल फोरम तक नलगोंडा में फ्लोराइड की समस्या को उठाते रहे। आखिरकार एक दशक से ज्यादा समय से चला आ रहा उनका संघर्ष सफल हुआ और राज्य सरकार ने नागार्जुन सागर बांध से नलगोंडावासियों को पीने का पानी मुहैया कराना शुरू कर दिया। शुरुआत में आंगनबाड़ी केंद्रों, स्कूलों और उन गांवों को प्राथमिकता पर रखा गया जहां फ्लोराइड का असर सबसे ज्यादा था। इसके साथ ही सरकार ने एक विभाग डीएफएमसी का गठन भी किया, जो फ्लोराइड प्रभावित इलाकों पर नजर रखने का काम करता है और वहां चलायी जा रही योजनाओं का क्रियान्वयन और समीक्षा करता है ताकि समय से योजनाएं पूरी होती रहें। राज्य का पुलिस विभाग भी नागरिकों की मदद के लिए आगे आया और कंपनियों की मदद से जिले के 25 गांवों में आरओ प्लांट लगवाया। नलगोंडा में फ्लोराइड ने न केवल व्यक्ति का शरीर, बल्कि अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक व्यवस्था तक सबको चौपट किया है। सुभाष बताते हैं कि हमारे यहां फ्लोराइड की वजह से लोग खुलकर हंसना भूल गए थे। दांतों पर चढ़ा फ्लोराइड का रंग यहां के लोगों की जिंदगी को बदरंग कर रहा था। शादी विवाह की समस्या भयावह हो चुकी थी। जिन गांवों में फ्लोराइड की समस्या बहुत ज्यादा थी, वहां न तो लोग अपनी बेटी देते थे और न ही वहां की बेटी को बहू बनाकर अपने यहां लाते थे। शारीरिक अक्षमता के कारण यहां के लोग सेना पुलिस में भी भर्ती होने नहीं जा पाते हैं। पलायन तो एक समस्या थी ही। लोगों को जहां साफ पीने का पानी मिला, वहां जाकर बस गए। वैसे अब सुभाष को उम्मीद है कि जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन भविष्य में धीरे-धीरे हालात बदलेंगे। नलगोंडा में उनका संघर्ष रंग लाया है। अब वे चाहते हैं कि फ्लोराइड के खिलाफ नलगोंडा का यही मॉडल पूरे देश में लागू किया जाए। देश में जहां-जहां फ्लोराइड लोगों की जिंदगी के रंग को बदरंग कर रहा है वहांवहां नलगोंडा की ही तर्ज पर डीएफएमसी मॉडल लागू किया जाए। सुभाष को उम्मीद है कि नलगोंडा मॉडल भले ही खुद नलगोंडा में कम सफल रहा हो, लेकिन नलगोंडा का यह मॉडल देश में जरूर सफल होगा। अब उनके जीवन का अगला मकसद भी यही है। इसके लिए नलगोंडा के इस नायक ने देशभर में उन इलाकों का दौरा करना शुरू कर दिया है जहांजहां फ्लोराइड का असर है।


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थिएटर जागरुकता

जन-जागरुकता और हरिओम का थिएटर मध्य प्रदेश के अशोक नगर में प्रगतिशील रंगकर्मी हरिओम और उनकी पत्नी सीमा राजोरिया कई सालों से बच्चों के साथ काम कर रही हैं और इनका आशियाना इन सभी बच्चों का घर बन चुका है

एक नजर

राजोरिया दंपति ने अपने घर को ही बच्चों की रंगशाला में बदल दिया

बच्चों को नाटकों के जरिए सिखाते हैं शिक्षा और साहित्य का पाठ

राजोरिया दंपति 1998 से ही लगे हैं इस कार्य में

बी

सवीं सदी में जब थिएटर आंदोलन पूरी दुनिया में फैला तो उसका एक बड़ा मकसद इस माध्यम को मनोरंजन से आगे जन-जागरुकता के एक माध्यम के तौर पर बदलना था। अलबत्ता आज यह आंदोलन टेलीविजन और इंटरनेट की बढ़ी लोकप्रियता के बीच कमजोर पड़ा है, फिर भी कुछ लोग और समूह थिएटर के माध्यम से आज भी जागरुकता और समाज सेवा का बड़ा कार्य कर रहे हैं। ऐसे ही हैं मध्य प्रदेश के हरिओम राजोरिया और उनकी पत्नी सीमा राजोरिया।

घर पर बच्चों का मजमा

मध्य प्रदेश के अशोक नगर का एक घर, जहां ढेर सारे बच्चों का मजमा लगता है। ये बच्चे कभी नाटक करते हैं, कभी ढेर सारी मस्ती, तो कभी देश-दुनिया की तमाम चर्चाएं। इन बच्चों की उम्र भले ही छोटी हो मगर साहित्य और देश-दुनिया का ज्ञान तो इन्हें इस कदर है कि बड़े-बड़ों को मात कर दें। यह घर है हरिओम राजोरिया का। इंडियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा) के सक्रिय सदस्य हरिओम और उनकी पत्नी

सीमा राजोरिया पिछले कई सालों से अशोक नगर के बच्चों के साथ काम कर रही हैं और इनका आशियाना इन सभी बच्चों का घर बन चुका है।

घर में ही लाइब्रेरी भी

हरिओम के घर में इन बच्चों के लिए सिर्फ एक कमरा ही नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक लाइब्रेरी भी है, जहां कोई भी कला और साहित्य प्रेमी अपना पूरा वक्त गुज़ार सकता है। अशोक नगर के ही इप्टा के एक सदस्य का कहना है कि अगर आप साहित्य या कला प्रेमी हैं तो हरिओम जी का घर आपके लिए हमेशा खुला रहता है। न सिर्फ नाटक के रिहर्सल के दौरान, बल्कि कई बार नाटक करने के बाद भी पूरी मंडली उनके घर पर ही अपना डेरा जमाए रहती है, यहां खाना पीना सब चलता है, पूरा महौल एक परिवार जैसा होता है।

बच्चे ही परिवार

हरिओम राजोरिया का कहना है कि जब तक आप अपने परिवार और अपने जीवन को शामिल नहीं करेंगे

तब तक आप नाटक या कोई भी सामाजिक कार्य नहीं कर सकते। मेरे लिए इप्टा और ये बच्चे मेरे परिवार के ही हैं। जहां तक रही बात मेरे घर के इस कमरे की तो हमने अपना घर बनाते समय उसमें एक हॉल बना दिया और वो अपने आप ही नाटक के लिए इस्तेमाल होने लगा। हमने देखा है, आप जब जनता के लिए नाटक करते हैं तो आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती रिहर्सल की जगह की होती है। इन चुनौतियों से हम गुजर चुके थे। इसीलिए मेरे घर का एक कोना इन चीजों के लिए इस्तेमाल होता है तो ये मेरे लिए खुशी की बात है।

किताबें सबसे अच्छी साथी

हरिओम अपने घर में सार्वजनिक लाइब्रेरी के बारे में बात करते हुए कहते हैं, ‘जी हां, मेरे घर में एक लाइब्रेरी भी है। जहां कोई भी कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी अपना वक्त गुज़ार सकता है। हम लोगों का मानना है कि किसी भी इंसान के सामाजिक विकास के लिए उसका मानसिक विकास बहुत जरूरी है और उसके लिए किताबें सबसे अच्छा साथी है। लेकिन, यह लाइब्रेरी अकेले मेरे या मेरी पत्नी के सहयोग से संभव नहीं हुआ है, बल्कि हमारे कई साथियों के सहयोग से इस लाइब्रेरी में किताबों का संग्रह संभव हो सका।’

‘कोई भी अकेले हीरो नहीं होता। एक सामूहिक प्रयास से ही कोई उद्देश्य पूरा हो सकता है। आज अगर मैं इन बच्चों के लिए कुछ कर पा रहा हूं तो दो दशक से कर रहे कार्य इस सबकी शुरुआत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने उसके पीछे मेरे कई साथियों का योगदान है’ - हरिओम राजोरिया बताया, ‘यह वह दौर था जब अशोक नगर का

साहित्य या रंगकर्म से कोई वास्ता नहीं हुआ करता था। हम कुछ युवाओं का साहित्य और कला के प्रति काफी रुझान था। हमारे यहां उस वक्त प्रगतिशील लेखक और कवियों का एक समूह आ चुका था। इन लोगों से जुड़ने के बाद हमें इप्टा के बारे में पता चला और हम कुछ युवाओं ने अपने शहर में इप्टा की एक इकाई खोली। इप्टा यानी इंडियन पीपुल्स थियेटर के तहत हम जनगीत, जन-नाटक तैयार करते थे। हम समाज के लिए नाटक करते थे, सामाजिक बदलाव के लिए। इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए बच्चों को जोड़ना जरूरी था। इसी सोच के साथ हम लोगों ने अशोक नगर के बच्चों के साथ काम करना शुरू किया और 1998 में पहली बार हम लोगों ने बच्चों का शिविर लगाया।’

श्रमिकों के बच्चे

हरिओम बताते हैं कि ये बच्चे श्रमिक वर्ग से आते हैं। जाहिर सी बात है इस तरह के सामाजिक बैकग्राउंड से आने वाले बच्चों के सामने आर्थिक स्थिति एक बड़ी समस्या होती है, जिसका असर उनकी शिक्षा पर भी पूरा पड़ता है, लेकिन हम लोग इन बच्चों को न सिर्फ नाटक की शिक्षा देते हैं, बल्कि इन बच्चों के लिए लगातार सामाजिक और साहित्यिक माहौल भी बनाते हैं। जिसका फायदा भी सकरात्मक रूप में देखने को मिलता है। हमारे यहां के बच्चे आज देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।

सबके प्रयास से बदलाव

हरिओम का कहना है कि जब आप इप्टा जैसे सामाजिक संगठन से जुड़े रहते हैं तो खुद-बखुद समाज के लिए कुछ करने का भाव आपके अंदर पैदा हो जाता है। शुरुआत से ही जनता के लिए नाटक करने के कारण हमें सामाजिक जीवन जीने की आदत सी हो गई है। आखिर में हरिओम कहते हैं कि कोई भी अकेले हीरो नहीं होता। एक सामूहिक प्रयास से ही कोई उद्देश्य पूरा हो सकता है। आज अगर मैं इन बच्चों के लिए कुछ कर पा रहा हूं तो उसके पीछे मेरे कई साथियों का योगदान है।


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स्वास्थ्य

खतरनाक है लिथियम आयन बैटरी!

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स्वास्थ्य शोध

स्मा

एक नए शोध में स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाले लिथियम आयन बैटरी से 100 से ज्यादा जहरीली गैसें निकलने का पता चला

र्टफोन भले ही आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हों, पर इसके अंदरूनी निर्माण और उसमें प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के बारे में हमारी जानकारी न के बराबर है। बात करें स्मार्टफोन्स और कई और इलेक्ट्रानिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले लीथियम बैटरियों की तो चीन की शिन्हुआ यूनिवर्सिटी और अमेरिका के इंस्टीट्यूट ऑफ एनबीसी डिफेंस के शोधकर्ताओं के अनुसार इनसे कार्बन मोनोऑक्साइड समेत 100 से अधिक खतरनाक गैसें निकलती हैं। दरअसल, स्मार्टफोन का दखल जितनी तेजी से हमारी जिंदगी में बढ़ रहा है, उससे भी अधिक तेजी से उससे जुड़े खतरे बढ़ते जा रहे हैं। जिंदगी की राह आसान करने वाले स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट आदि इलेक्ट्रानिक उपकरणों में प्रयोग होने वाली लिथियम आयन बैटरी हमारी सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं। ज्यादा देर तक ऐसे उपकरणों को चार्ज करना, जर्जर बैटरी और खराब चार्जर से ऐसी गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाता है। दुनिया भर की सरकारें लिथियम आयन बैटरी को बेहतर विकल्प के रूप में देखती हैं और इसके उपयोग को प्रोत्साहित कर रही हैं, जबकि ये बैटरियां हमारे स्वास्थ्य के लिए हद से ज्यादा हानिकारक हैं।

शरीर और पर्यावरण को नुकसान

चीन की शिन्हुआ यूनिवर्सिटी और अमेरिका के इंस्टीट्यूट ऑफ एनबीसी डिफेंस के शोधकर्ताओं ने इस बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल की हैं। इस शोध के अनुसार लीथियम बैटरियों से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड समेत 100 से अधिक खतरनाक गैसों की पहचान की गई है। इनसे त्वचा, आंखों और नासिका मार्ग में जलन होने के अलावा पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। अधिकतर लोग तो यह भी नहीं जानते कि रिचार्ज होने वाले उपकरणों की बैटरी का अधिक गरम होना और घटिया स्तर के चार्जर का उपयोग भी खतरनाक हो सकता है।

20 हजार बैटरियों पर शोध

इस स्टडी के लिए 20 हजार लीथियम आयन

अधिकतर लोग तो यह भी नहीं जानते कि रिचार्ज होने वाले उपकरणों की बैटरी का अधिक गरम होना और घटिया स्तर के चार्जर का उपयोग भी खतरनाक हो सकता है

एक नजर

शिन्हुआ यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूट ऑफ एनबीसी डिफेंस का शोध

स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों में होता है लिथियम बैटरी एहतियात से बचा जा सकता है लिथियम आयन बैटरी के खतरों से

बैटरियों को काम में लिया गया। इनको आग पकड़ने के तापमान तक गर्म किया गया। इस दौरान बहुत सी बैटरियां फट गईं और उन्होंने कई जहरीली गैसें छोड़ीं। इसमें यह भी सामने आया कि बैटरियां कई बार चार्जिंग के दौरान या अन्य तरीकों से ओवरहीट

होने पर भी ऐसे फट सकती हैं और नुकसान पहुंचा सकती हैं। इनमें यह भी बात सामने आई कि यदि आप कार में या किसी बंद जगह पर हों और कार्बन मोनॉक्साइड बैटरियों से निकलती रहे तो यह घातक साबित हो सकती है। हालांकि भले ही यह कम मात्रा

में निकल रही हो। प्रमुख शोधकर्ता और इंस्टीट्यूट ऑफ एनबीसी डिफेंस की प्रोफेसर जी सन के मुताबिक, 'आजकल दुनियाभर के कई देशों की सरकारें इलेक्ट्रानिक वाहनों से लेकर मोबाइल उपकरणों के लिए लीथियमआयन बैटरियों को बढ़ावा दे रही हैं। इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि आम लोगों को ऊर्जा के इस स्त्रोत के पीछे के खतरे के प्रति सचेत किया जाए।'

बैटरियों पर रोक की मांग

शोधकर्ताओं ने इन खतरनाक गैसों से बचने का आग्रह किया है। आज दुनिया के कई देशों की सरकारें मोबाइल फोन से लेकर इलेक्ट्रिक से चलने वाली गाड़ियों में लीथियम बैटरियों को यूज कर रही है। आम लोगों को इस बड़े खतरे से सावधान रहना चाहिए। कोबाल्ट आॅक्साइड से बनी लीथियम बैटरी में एनर्जी डेंसिटी ज्यादा होती है। आमतौर पर लीथियम बैटरी उपयोग में भी ज्यादा आती है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार बैटरी में विस्फोट होने के कारण कई कंपनियों को अपने उपकरणों को बाजार से वापस मंगवाना पड़ा है। डेल कंपनी ने बैटरी में विस्फोट की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर वर्ष 2006 में अपने लाखों लैपटॉप को बाजार से बाहर किया था। सैमसंग ने भी बैटरी में आग लगने की घटनाओं के कारण अपने लाखों सैमसंग ग्लैक्सी नोट-7 को बाजार से वापस मंगवाया । डॉ. सन के मुताबिक, 'यह चिंता का विषय है कि लिथियम आयन बैटरी से खतरनाक गैस के रिसाव और उसके उद्गम के बारे में अभी तक ठोस अध्ययन नहीं हुआ है।' ये गैसें पर्यावरण के लिए भी खतरा उत्पन्न करती हैं। इन 100 गैसों में सर्वाधिक खतरनाक कार्बन मोनो ऑक्साइट गैस तो कम समय में काफी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। बंद छोटी कारों और बंद विमान के केबिन में कार्बन मोनो आक्साइड का रिसाव बेहद खतरनाक हो सकता है।


26 गुड न्यूज

04 - 10 सितंबर 2017

प्रधानमंत्री योजना

सस्ते मकानों के निर्माण में तेजी

प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत राज्यों के शहरी इलाकों में सस्ते मकानों के निर्माण में तेजी आ रही है

प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत मंजूर मकानों की संख्या के मामले में टॉप 10 राज्य (करोड़ रुपए) 8,138 5,090 4,415

1,959 1,474 1,454

साथ अब तक 26,13,568 मकानों की मंजूरी दी जा चुकी है। नवीनतम मंजूरी में आंध्र प्रदेश को 1,20,894 सस्ते मकान, उत्तर प्रदेश को 41,173, असम को 16,700, गुजरात को 15,222, झारखंड को 14,017 और महाराष्ट्र को 9,894 अतिरिक्त, सस्ते मकान मिले हैं। आंध्र प्रदेश अन्य के मुकाबले सबसे आगे है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत उसे अब तक मंजूर किए गए सभी मकानों का 20.71 प्रतिशत मिला है। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत अब तक मंजूर किए गए कुल 26,13,568 मकानों का 82 प्रतिशत टॉप दस राज्यों के पास है। गौरतलब है कि दिल्ली, चंडीगढ़, गोवा और लक्षदीप को छोड़कर सभी 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को इस योजना के अंतर्गत मकानों की मंजूरी मिली है।

अनुपालन किया जा सके। रुद्र ने बताया कि इनमें से प्रत्येक डिवाइस की लागत 7,000 रुपये के करीब है। उन्होंने कहा, ‘अक्सर पुलिस वालों को यह तय करने में परेशानी होती थी कि आवाज का स्तर निर्धारित सीमा से

अधिक है या नहीं। अब यह हाथ में पकड़ने लायक मॉनिटर उन्हें इसकी जांच करने में सक्षम बनाएगा। इससे वे पटाखों, लाउडस्पीकर से निकलने वाली आवाज के डेसिबल स्तर का पता लगा सकेंगे।’ (एजेंसी)

क्रम राज्य

देशआवासके शहरीयोजनाइलाकों(शहरी)में केसस्ते मकानों के निर्माण में तेजी आ रही है। प्रधानमंत्री

अंतर्गत उत्तर प्रदेश को 41,173 और अधिक मकानों की मंजूरी दी गई है। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने उत्त‍र प्रदेश सहित 6 राज्यों के लिए 2,17,900 और मकानों की मंजूरी दी है, इसके साथ ही 40,597 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता और कुल 1,39,621 करोड़ रुपए के कुल निवेश के

एक नजर

प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत यूपी को 41,173 अतिरिक्त मकान 21 प्रतिशत मकानों की मंजूरी के साथ आंध्र प्रदेश सबसे आगे

इस योजना के अब तक 26 लाख से अधिक मकानों की मंजूरी

मंजूर मकानों कुल की संख्या निवेश

मंजूर केंद्रीय सहायता

1 2 3

आंध्र प्रदेश तमिलनाडु मध्य प्रदेश

5,41,300 3,35,039 2,87,101

(करोड़ रुपए) 31,056 11,987 19,502

8 9 10

उत्तर प्रदेश झारखंड बिहार

1,20,028 95,742 88,375

4,767 3,561 3,915

4 5 6 7

कर्नाटक गुजरात पश्चिम बंगाल महाराष्ट्र

2,03,260 1,72,816 1,44,904 1,44,165

9,282 11,497 5,920 15,868

3,345 2,493 2,186 2,244

स्वच्छता पश्चिम बंगाल

पुलिस को साउंड मॉनिटर मुहैया होगा

कोलकाता व अन्य जिलों की पुलिस को 700 से अधिक साउंड मॉनिटर मिलेंगे

श्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ध्वनि प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए कोलकाता व अन्य जिलों की पुलिस को 700 से अधिक साउंड मॉनिटर मुहैया कराएगा। एक अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष कल्याण रुद्र ने आईएएनएस को बताया, ‘हमने इन डिवाइसों की खरीद कर ली

है और अब इसकी कोलकाता, हावड़ा और अन्य जिलों की पुलिस को आपूर्ति की जा रही है, ताकि वे नियमित रूप से आवाज के स्तर की निगरानी कर सकें।’ उन्होंने कहा कि त्योहारी अवधि को देखते हुए यह अभियान शुरू किया गया है ताकि आवाज के स्तर को डेसिबल सीमाओं के अंदर रखने का


04 - 10 सितंबर 2017

पर्यटन

सैर के लिए सैलसौर से बेहतर क्या उत्तराखंड

27

हिल स्टेशन

सैलसौर उत्तराखंड का एक छोटा सा हिल स्टेशन है। यह पर्यटकों के बीच अभी ज्यादा लोकप्रिय नहीं है

एक नजर

यहां से केदारनाथ, तुंगनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा शुरू की जाती है सैलसौर का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट है यहां मंदाकिनी नदी को देखने का सुख ही अलग है

र्मी के दिनों में लोग अक्सर ठंडे इलाकों की सैर पर जाना पसंद करते हैं। शिमला, नैनीताल, मसूरी जैसे इलाकों के बारे में तो लोगों ने बहुत सुन रखा है, पर कुछ ऐसे भी इलाके हैं जिनके नाम भले अनसुने हैं, पर वे निहायत ही खूबसूरत हिल स्टेशन हैं। अगर आपको सर्द अहसास के बीच दिमाग और दिल का सुकून भी चाहिए तो एक बार जरूर उत्तराखंड के सैलसौर का रूख कीजिए। सैलसौर उत्तराखंड का एक छोटा सा हिल स्टेशन है, यह पर्यटकों के बीच अभी ज्यादा लोकप्रिय नहीं है, पर अगर आप यहां आते हैं तो फिर आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। सैलसौर एक ऐसी जगह है,जहां आने वाले पर्यटक रूक कर यहां की खूबसूरती को निहार सकते हैं। यहां देखने की कई सारी ऐसी जगहें हैं, जो मन को प्रफुल्लित करती हैं। सैलसौर उन लोगो के लिए एक बेहतरीन जगह है, जो शहर और ऑफिस की भाग दौड़ से कुछ पल सुकून के बिताना चाहते हैं। यहां की खूबसूरत वादियां मन और जीवन दोनों की शांति प्रदान करती है। यहां एक स्टॉपओवर प्वाइंट है, जहां से केदारनाथ, तुंगनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा शुरू की जाती है।

सैलसौर जाने का सबसे उचित समय अक्टूबर से अप्रैल तक का है। इस दौरान यहां मौसम काफी सुहाना रहता है, जिसके चलते आप आसपास की जगहों को अच्छे से घूम सकते हैं

यह एक बेहद ही छोटा सा कस्बा है और उत्तराखंड के बाकी पर्यटन स्थलों की तरह भीड़भाड़ से बेहद दूर है। यहां जाने का सबसे उचित समय अक्टूबर से अप्रैल तक का है। इस दौरान यहां मौसम काफी सुहाना रहता है, जिसके चलते आप आसपास की जगहों को अच्छे से घूम सकते हैं। इसका सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट है, जो कि यहां से तकरीबन 180 किलोमीटर की दूरी पर है। यह हवाई अड्डा भारत के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जो कि यहां 165 किमी की दूरी पर स्थित है। यह स्टेशन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशन से जुड़ी हुई है। सड़क द्वारा सईलासुर पहुंचने का सबसे अच्छा आप्शन सड़क है। यह जगह हरिद्वार से तकरीबन 186 और देहरादून से 206 किलोमीटर दूर है। यहां मंदाकिनी नदी को देखने का सुख ही अलग है। मंदाकिनी आमतौर पर शांत रहती है लेकिन मानसून के दिनों में यह नदी बेहद ही उग्र हो जाती है। सैलसौर में यह नदी लोगों की लाइफ लाइन है। नदी के किनारे कैंपिंग करना आपकी ट्रिप को भी यादगार बनाता है। अगर आप चाहे तो यहां फिशिंग के साथ कायकिंग भी कर सकते हैं। देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक केदारनाथ सईलासुर से करीबन 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केदारनाथ का मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। बताया जाता है कि यह मंदिर करीबन 1000 साल पुराना है। इस मंदिर में कई सारी आकृतियां हैं, जो हिंदू पौराणिक कहानियों को दर्शाती हैं। इस मंदिर की खास बात यह है कि यह मंदिर उत्तर भारत में भले स्थित है, पर इसके मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से हैं, जोकि मंत्रों का उच्चारण कन्नड़ भाषा में करते हैं। तुंगनाथ 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव का मशहूर मंदिर है और यह लगभग 1000 वर्ष पुराना है। यह मंदिर हिमालय के चोटी के नीचे स्थित है, जिसे चंद्रशिला कहते हैं। यहां पहुंचकर आप चाहें तो केदारनाथ वाइल्ड सेंचुरी घूमने का भी आनंद ले सकते हैं। यह सेंचुरी कस्तूरी हिरण अभयारण्य के रूप में विख्यात है। इस क्षेत्र में कस्तूरी हिरण की लुप्तप्राय प्रजाति रहती है।


28 गुड न्यूज

04 - 10 सितंबर 2017

अटल पेंशन योजना

अर्थव्यवस्था नोटबंदी

बुलंदी की राह पर भारतीय अर्थव्यवस्था

पूरा हो रहा एक राष्ट्र एक पेंशन का सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से देश को एक पेंशन भोगी समाज में तब्दील करने सपना अटल पेंशन योजना से साकार हो रहा है

एसएसबी ब्यूरो

पर उच्च आय का अवसर भी उपलब्ध होता है। नामांकन बढ़ने से संपत्तियों का वित्तीयकरण होता माज के सबसे निचले पायदान पर खड़े है और लोग पेंशन सुविधाओं की ओर आकर्षित गरीबों के कल्याण और उनके आर्थिक होते हैं। भारत सरकार अपने ग्राहक, उसके जीवन विकास का जो सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो साथी या ग्राहक द्वारा नामित व्यक्ति को निश्चित सपना देखा था, उस सपने को अटल पेंशन योजना रिटर्न की गारंटी देती है। पूरा करती दिखाई दे रही है। अटल पेंशन योजना पेंशन कोष नियामक और विकास प्राधिकरण की सफलता इसी से पता चलती है कि अब तक (पीएफआरडीए) के सहयोग से वित्तीय सेवा देश में 3.07 लाख अटल पेंशन योजना (एपीवाई) विभाग ने कई एपीवाई अभियान आयोजित किए खाते खोले जा चुके हैं। देश के सबसे बड़े बैंकों हैं, जिनके माध्यम से एपीवाई सेवा प्रदाता बैंक में से एक भारतीय स्टेट बैंक में 51 हजार एपीवाई और डाक विभाग किसी भी पेंशन योजना के तहत खाते हैं। अन्य प्रमुख बैंक जैसे केनरा बैंक में कवर नहीं किए गए लोगों के पास जाकर एपीवाई 32,306 और आंध्रा बैंक में 29,057 एपीवाई खाते योजना की विशेषताओं और लाभों की जानकारी हैं, जबकि अन्य निजी श्रेणी के बैंकों में कर्नाटक देते हैं तथा इस योजना में नामांकन करने के बैंक में 2,641 एपीवाई खाते हैं। आरआरबी लिए उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। पीएफआरडीए ने श्रेणी में इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक में एपीवाई सेवा प्रदाता बैंकों के साथ मिलकर देशभर 28,609 खाते हैं। इसके बाद मध्य बिहार ग्रामीण में 2 से 19 अगस्त, 2017 तक राष्ट्रीय स्तर पर बैंक में 5,056, बड़ौदा उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक पेंशन जागरुकता अभियान ‘एक राष्ट्र एक पेंशन’ में 3,013, काशी गोमती आयोजित किया था। भारत सरकार अपने ग्राहक, संयुक्त ग्रामीण बैंक योजना शुरू होने के में 2,847 और पंजाब उसके जीवन साथी या ग्राहक दो वर्ष बाद अब तक ग्रामीण बैंक में 2,194 62 लाख ग्राहक अटल द्वारा नामित व्यक्ति को निश्चित पेंशन योजना के सदस्य एपीवाई खाते हैं। रिटर्न की गारंटी देती है बचत बैंक खातों बने हैं। सहित विभिन्न वित्तीय पीएफआरडीए का सुविधाओं पर देश में उद्देश्य किसी भी पेंशन ब्याज दर कम हो रहा है, लेकिन अटल पेंशन योजना के अंतर्गत कवर नहीं किए गए अधिकतम योजना अपने ग्राहकों के लिए 8 प्रतिशत दर से लोगों को एपीवाई योजना के तहत कवर करना रिटर्न सुनिश्चित करता है और इस योजना में 20 है, ताकि भारत एक राष्ट्र के रूप में पेंशन भोगी से 42 वर्ष के लिए निवेश करने पर परिपक्वता समाज बने और नागरिक अपनी वृद्धावस्था में के समय रिटर्न दर आठ प्रतिशत से अधिक रहने सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।

नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती अब दिखने लगी है

एसएसबी ब्यूरो

भी पता लगाने में मदद मिली है, जो कि काला धन भी हो सकता है। इस बेहिसाब धन से सरकार को ना टबंदी के चलते भारतीय अर्थव्यस्था पर काफी सिर्फ जुर्माने और टैक्स की आमदनी होगी, बल्कि सकारात्मक असर पड़ा है और आने वाले अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। समय में इसके और मजबूत होते रहने की संभावना इसके अच्छे परिणाम भी सामने आ रहे हैं। है। नोटबंदी को सिर्फ वापस हुए धन के आधार पर नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कंपनियों की भी सफल या विफल बताना सही नहीं होगा। यह कहना पहचान हुई है। इससे टैक्स रिटर्न के दौरान दिए भी पूरी तरह से गलत होगा कि बैंकों में जमा होने के गए आंकड़ो में हेराफेरी की बात भी सामने आई है। बाद कालाधन सफेद हो जाएंगे। नोटबंदी के कारण 56 लाख नए करदाता भी सिस्टम नोटबंदी के बाद इतनी बड़ी मात्रा में रकम की से जुड़े हैं। वापसी सरकार की सफलता दिखाती है। इससे जमा रिजर्व बैंक के अनुसार 4 अगस्त तक लोगों के की गई कैश की वैधता की जांच करने का भी एक पास 14,75,400 करोड़ रुपए की करेंसी सर्कुलेशन में मौका मिल गया है। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने थे। जो वार्षिक आधार पर 1,89,200 करोड़ रुपए की स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा था कि नोटबंदी के कमी दिखाती है। जबकि वार्षिक आधार पर पिछले कारण पहली बार तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा साल 2,37,850 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गई की धनराशि वित्तीय व्यवस्था में वापस आ गई है। थी। इस प्रकार, बिना किसी प्रतिबंध के, नोटबंदी इससे कर्ज के लिए ब्याज के बाद कैश का प्रचलन मोदी ने स्वतं त्र ता दिवस के भाषण दरों में महत्वपूर्ण रूप से कम हो रहा है। इससे पता कमी आई है। में कहा था कि नोटबंदी के कारण चलता है कि लेस कैश सरकार ने न कभी ये के अभियान में सरकार न घोषणा की है और न ही पहली बार तीन लाख करोड़ रुपए सिर्फ सफल रही है, बल्कि दावा किया है कि कुछ से ज्यादा की धनराशि वित्तीय बिना हिसाब-किताब वाले खास मात्रा में रकम वापस धन की जमाखोरी में भी व्यवस्था में वापस आ गई नहीं भी लौट सकती है। इस तेजी से गिरावट आई है । तरह का कोई भी विश्लेषण इस समय पूरी स्थिति एकतरफा है। को समग्रता से देखने की जरूरत है, न कि एकतरफा इसके विपरीत, सरकार ने पूरी कोशिश की है किसी नतीजे पर पहुंचने की। साफ है कि नोटबंदी कि नोटबंदी के बाद सारी करेंसी अर्थव्यवस्था में और उससे जुड़े कदम भारतीय अर्थव्यवस्था को वापस आ जाए। इसने न सिर्फ सब कुछ सामान्य लंबे समय में बहुत ज्यादा मजबूती प्रदान करेंगे इस करने में मदद मिली है, बल्कि संदिग्ध लेन-देन का संभावना में जरा भी संदेह नजर नहीं आ रहा है।

नो


04 - 10 सितंबर 2017

व्याख्यान

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कृपलानी स्मृति

रचनात्मक विरोध की राजनीति के पुरोधा थे कृपलानी : रामबहादुर राय

दिल्ली के राजधानी कॉलेज में गांधी स्टडी सर्किल द्वारा आयोजित ‘एक थे कृपलानी’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में रामबहादुर राय ने आचार्य कृपलानी के जीवन के विभिन्न संदर्भों से परिचित कराया

रदार वल्लभ भाई पटेल अगर महात्मा गांधी के दायां हाथ थे तो आचार्य कृपलानी बांया। शांति निकेतन में 1915 गांधी जी के साथ पहली मुलाकात में ही कृपलानी गांधी की शख्सियत से खासे मुरीद हो गए थे। तभी उन्होंने गांधी को यह बता भी दिया था कि भविष्य में अगर कभी मौका मिला तो आपके साथ काम

करके मुझे प्रसन्नता होगी। दो साल बाद ही यह मौका भी आया जब गांधी चंपारण सत्याग्रह के लिए मुजफ्फरपुर पहुंचे। यहां उनके ठहरने की व्यवस्था कृपलानी ने ही की थी, जिस कारण अंग्रेज हुकूमत की नाराजगी का उन्हें शिकार होना पड़ा। नतीजतन उन्हें अपनी प्रोफेसरी की नौकरी तक से हाथ धोना पड़ा। बाद में कृपलानी चंपारण गांधी जी के सहयोगी

के तौर पर चंपारण पहुंचे। वहां उनकी गिरफ्तारी से चंपारण के किसानों के निर्भयता का प्रेरक माहौल बना। ये बातें वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में गांधी स्टडी सर्किल द्वारा आयोजित ‘एक थे कृपलानी’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहीं। रामबहादुर राय ने कहा कि आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन और चंपराण सत्याग्रह जैसी देश के इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाओं को सौ साल बाद याद कर रहे हैं तो हमें गांधी के एक सच्चे अनुयायी के रूप में आचार्य कृपलानी के जीवन और विचार को गहराई से समझने की जरूरत है। राय ने जोर देते हुए कहा कि मौका चंपारण सत्याग्रह का हो, असहयोग आंदोलन हो या अगस्त क्रांति का, कृपलानी हमेशा गांधी जी के सर्वाधिक विश्वस्त के तौर पर सामने आए। पर कृपलानी ने कभी भी गांधी जी को अपने निजता के क्षेत्र में प्रवेश करने नहीं दिया। इसका सबसे

मौका चंपारण सत्याग्रह का हो या अगस्त क्रांति का, कृपलानी हमेशा गांधी जी के सर्वाधिक विश्वस्त के तौर पर सामने आए

बड़ा उदाहरण सुचेता मजूमदार के साथ कृपलानी का विवाह है। गांधी जी इस विवाह के पक्ष में नहीं थे। पर यह शादी दोनों ने की और इस बारे में अपनी राय से गांधी जी को विनम्रता से परिचित भी कराया। ‘एक थे कृपलानी’ विषय पर व्याख्यान देते हुए रामबहादुर राय ने कहा कि अगर आचार्य कृपलानी के जीवन को समग्र रूप से देखें तो वे अंदर से क्रांतिकारी और सिद्धांतप्रिय प्रवृति के नेता थे। यही कारण है कि आजादी के बाद पंडित नेहरु से जब उनका मतांतर हुआ तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया। यह भी कि देश में विपक्ष की राजनीति के कृपलानी एक तरह से पुरोधा रहे हैं। उन्होंने आजीवन सत्ता से बाहर रहकर रचनात्मक विरोध की राजनीति की। इस बीच खादी और दूसरी गांधीवादी प्रवृतियों के प्रति भी उनकी आस्था लगातार बनी रही। राजधानी कॉलेज में राय के इस व्याख्यान को सुनने के लिए जहां छात्रों की भारी संख्या उमड़ी थी, वहीं इस मौके पर शिक्षकों की बड़ी तादाद भी उपस्थित थी। कॉलेज के गांधी स्टडी सर्किल के प्रमुख डॉ. राजीव रंजन गिरि ने बताया कि इस कार्यक्रम को मिली सफलता इस बात को दिखलाती है कि छात्रों में आज भी गांधी विचार और उसके नायकों को लेकर गहरा आकर्षण है और वे इस बारे में ज्यादा से ज्यादा सुनना और जानना चाहते हैं।

जल संरक्षण

27 साल में खोद डाला तालाब

गांव में पानी की समस्या को दूर करने के लिए छत्तीसगढ़ के एक युवक ने अपने जीवन के 27 साल खर्च कर बनाया तालाब

त्तीसगढ़ के कोरिया जिले के एक व्यक्ति ने अपने गांव में पानी की समस्या को दूर करने के लिए जमीन खोदकर तालाब बना डाला। सजा पहाड़ गांव के श्याम लाल 15 साल के थे जब उन्होंने इस अविश्वसनीय काम अपने कंधों पर लिया। गांव के लोगों के मुताबिक, श्याम लाल को तालाब बनाने में 27 साल लग गए। दरअसल इस गांव में पानी की समस्या थी। गांववाले मवेशियों की प्यास बुझाने को लेकर मुश्किल में थे। सरकार की तरफ से भी कुछ नहीं किया

गया। ऐसे में 15 साल के श्याम लाल आगे आए। उन्होंने एक खास जगह का चुनाव किया और खुदाई शुरू कर दी। गांव के लोग उन पर हंसते थे, लेकिन श्याम लाल ने जो ठाना वह कर दिखाया। उनकी कहानी बिहार के माउंटेन मैन दशरथ मांझी जैसी लगती है जिन्होंने सिर्फ एक हथौड़े से 22 साल में एक पहाड़ी को बीच से काटकर रास्ता बना दिया था। अब 42 साल के हो चुके श्याम लाल बताते हैं, 'किसी ने मेरी मदद नहीं की, न प्रशासन ने और न ही गांववालों ने।' वह कहते

हैं कि उन्होंने गांव के लोगों और मवेशियों के भले के लिए यह काम किया। गांववाले श्याम लाल को अपना आदर्श और रक्षक मानते हैं। गांव का हर व्यक्ति उनके द्वारा खोदे गए तालाब का पानी इस्तेमाल करता है। उनकी उपलब्धि पर महेंद्रगढ़ के विधायक श्याम बिहारी जायसवाल सजा पहाड गांव पहुंचे और श्याम के प्रयास के लिए उन्हें दस हजार रुपए दिए। जिले के कलेक्टर नरेंद्र दुग्गल ने भी श्याम को सहयोग देने की बात कही है। (एजेंसी)


30 लोक कथा

सु

दादा जी का पेड़

04 - 10 सितंबर 2017

रेश को अपने दादा जी का साथ बहुत ही अच्छा लगता है। सुरेश के माता पिता के साथ रहने पर भी सुरेश को हमेशा दादा के साथ रहना ज्यादा पसंद है, वो अपने दादा के साथ खेलता है और उन्हीं के साथ खाना खाता है, अपने दादा जी के साथ सुरेश गांव में भी उसके लिए रोज कोई न कोई मीठा फल जरूर लेकर आते हैं। उन फलों को देखकर सुरेश खुश हो जाता, और बड़े ही मजे से खाता। दादा जी कभी भूलकर भी अपने पोते को नहीं डांटते। एक दिन सुरेश ने पूछा कि दादा जी अगर हम सभी फलों के पेड़ अपने घर के आंगन में ही लगा लें तो कितना अच्छा होता, हम रोज फल तोड़कर खाते। इस पर दादा जी ने कहा कि देखो आज हम आम का पेड़ अपने आंगन में लगा देंगे और तुम्हें भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि तुम हर रोज उस

पेड़ में पानी देना और तुम्हें इस पेड़ का ख्याल रखना होगा। हां दादा जी मैं इस पेड़ का ख्याल जरूर रखूंगा सुरेश ने कहा। और फिर सुरेश के दादा जी ने आंगन में पेड़ लगा दिया और समय बीतता चला गया और सुरेश भी काफी बड़ा हो गया था और पेड़ भी, पर अब उसके दादा जी नहीं रहे। उनकी याद दिल में हमेशा बनी रहे इसके लिए सुरेश अपनी पढ़ाई भी पेड़ के नीचे बैठ करता और उसी पेड़ के नीचे आराम भी करता। सुरेश आम के उस पेड़ को अपने दादा जी की तरह ही प्यार करता था। अपने दादा जी की बातें भी सुरेश को याद है कि पेड़ से हमें कितने फायदे होते हैं और ये हमारे कितने काम आता है, एक दिन पेड़ पर फल आए और गली के बच्चों ने आम तोड़ने के लिए पत्थरों का प्रयोग किया। एक पत्थर सुरेश की मां को लगा। उनके सिर पर घाव हो गया। इससे नाराज

होकर सुरेश के पिताजी ने पेड़ काटने की ठान ली। उन्होंने इसके लिए कुछ लोगों को भी बुला लिया। उन लोगों ने जैसे ही पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी उठाई तभी सुरेश ने उन्हें रोक दिया । उसने कहा कि इस पेड़ को मत काटो, ये दादा जी की जगह है। जब दादा जी ने पेड़ को लगाया था तो कहा था कि इस पेड़ का हमेशा ध्यान रखना और देखना कि कभी इस पेड़ का नुकसान न हो पाए। इस पेड़ के होने से सुरेश को कभी दादा जी की याद नहीं सताई। जब भी उनकी याद आती, सुरेश इस पेड़ के पास आता और महसूस करता कि दादा जी उसके पास ही हैं। इस पेड़ को सुरेश और उसके दादा जी ने मिलकर साथ में लगाया था। इसलिए इस पेड़ से उनकी यादें जुड़ी हैं। लेकिन सुरेश के पिता ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने कहा कि देखो इस पेड़ से हमें कितना नुकसान हुआ है। गली

के बच्चे पत्थर फेंकते हैं, इससे और भी नुकसान हो सकता है। इसे काटना ही चाहिए, तुम सामने से हट जाओ। इस पर सुरेश ने कहा कि ये पेड़ हमारे बहुत काम आता है। इससे बहुत सी वस्तुएं भी बनती हैं और इसकी पत्तियां भी हमारे काम आती हैं और सबसे बड़ा फायदा तो ये है कि इसके होने से दादा जी भी हमारे साथ हैं। सुरेश की बातों को सुनकर उसकी मां ने भी पेड़ को काटने से मन कर दिया और फिर सुरेश के पिताजी जी भी मान गए। सुरेश के पिताजी ने भी अपनी गलती मानी कि हम लोग कितना गलत करते हैं। पेड़ हमारे लिए बहुत ही उपयोगी है और हमारे साथ तुम्हारे दादा जी का भी आशीर्वाद हमेशा रहेगा। इतना सुनकर सुरेश की आंखों में भी आंसू आ गए और प्यार भरे शब्द निकले, मेरे दादा जी आप हमेशा हमारे साथ रहना।


24 - 30 जुलाई 2017

sulabh sanitation

लोक कथा

Sulabh International Social Service Organisation, New Delhi is organizing a Written Quiz Competition that is open to all school and college students, including the foreign students. All those who wish to participate are required to submit their answers to the email address contact@sulabhinternational.org, or they can submit their entries online by taking up the questions below. Students are requested to mention their name and School/College along with the class in which he/she is studying and the contact number with complete address for communication

First Prize: One Lakh Rupees

PRIZE

Second Prize: Seventy Five Thousand Rupees Third Prize: Fifty Thousand Rupees Consolation Prize: Five Thousand Rupees (100 in number)

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