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वर्ष-1 | अंक-20 | 01-07 मई 2017

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04 जैविक खेती

14 विश्व अस्थमा दिवस

महिला रोल मॉडल

...ताकि न फूले दम

सफलता की इबारत लिख रही महिलाओं की दास्तान

देश में 50 फीसदी मरीज सांस की बीमारी से ग्रस्त हैं

31 श्रद्धांजलि

याद आएंगे विनाेद खन्ना वे जिंदगी में कई बार शून्य से शिखर तक पहुंचे

कॉमन मैन की ‘उड़ान’

‘मैं चाहता हूं कि हवाई चप्पल पहनने वाला गरीब से गरीब आदमी भी हवाई जहाज से यात्रा करता हुआ नजर आए। सब उड़ें, सब जुड़ें’

दे

प्रेम प्रकाश

श की राजनीति में बीते तीन साल तो अहम हैं ही, लोकोन्मुख विकास का समावेशी एजेंडा तय करने के लिहाज से भी ये तीन साल खासे महत्वपूर्ण रहे। जन-धन योजना से लेकर ‘स्टार्ट अप इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ का रोडमैप देने वाले प्रधानमंत्री ने अपने पहले ही संबोधन में कहा था कि उनकी सरकार गरीबों और युवाओं की सरकार है। अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी की हैसियत विश्व के नेताओं के बीच पोजिटिव विजन से भरे समर्पित राजनेता की बनी है, तो उनसे अपेक्षाएं भी काफी बढ़ गई हैं। अच्छी बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री इन तमाम अपेक्षाओं पर लगातार खरे उतरते जा रहे हैं।

दिनकर स्मृति

‘जाति और सामाजिक श्रेणियों से परे थे दिनकर’

दिनकर की 43वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित समारोह में पूरे देश में हिंदी साहित्य की शाखाएं खोलने की बड़ी घोषणा सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने की

रा

प्रियंका तिवारी

ष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 43वीं पुण्यतिथि पर सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन और दिनकर सुलभ साहित्य अकादमी की तरफ से दिनकर स्मृति व्याख्यान, कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन दिल्ली के मावलंकर हॉल में किया गया। इस मौके पर सुलभ की तरफ से वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार

शारदा सैदपुरी को पहला दिनकर सुलभ साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। ‘नई दुनिया’ अखबार के चीफ एडीटर भोजराज उच्चसरे को दूसरा पुरस्कार जन साधारण से जुड़े स्वच्छता एवं शौचालय जैसे संवेदनशील मुद्दे को प्राथमिकता से अपने अखबार में प्रकाशित करने के लिए दिया गया। तीसरा पुरस्कार सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार संजय शुक्ला को ‘सुलभ स्वच्छता सम्मान’ अनीता बाई नर्रे की खबर को प्रमुखता से लिखने के लिए दिया गया।

इस मौके पर सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक की तरफ से हिंदी शब्द कोश की रचना की घोषणा भी की गई। इस कार्यक्रम में साहित्य के छात्रों और समकालीन लेखकों ने भी हिस्सा लिया। कवियों में हापुड़ से अनिल वाजपेयी, ग्वालियर से राम वरण ओझा, फरीदाबाद से चरनजीत चरन, अलीगढ़ से विजय भारद्वाज, मैनपुरी से मनोज चौहान और मुरादाबाद से सौरभ कांत शर्मा शामिल थे। प्रसिद्ध लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘हम लोग’ से अभिनय की ...जारी पेज 2

आलम यह है कि देश अभी लाल बत्ती वाली वीआईपी संस्कृति के खात्मे को लेकर उनकी तारीखी पहल की सराहना में ही लगा था, कि उन्होंने एक और बड़ी घोषणा कर डाली। प्रधानमंत्री की यह घोषणा देश के गरीबों की उम्मीद से ज्यादा तरक्की से जुड़ी है। यह भी कह सकते हैं यह गरीब भारतवासियों के सपनों में पंख लगने का समय है। प्रधानमंत्री ने छोटे शहरों के बीच हवाई संपर्क बेहतर करने के लिए ‘उड़ान’ योजना की शुरुआत की है। इसके तहत शिमला से दिल्ली के बीच पहली उड़ान को उन्होंने हाल ही में हरी झंडी दिखाई है। इसी दिन कडप्पा-हैदराबाद और नांदेड़-हैदराबाद मार्गों पर दो अन्य उड़ानों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शुरुआत हुई। इस मौके पर आयोजित आम सभा में उन्होंने जो कहा, वह देश के गरीबों के अच्छे दिन का एक खुला घोषणापत्र ...जारी पेज 2


02 आवरण कथा

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कॉमन मैन की ‘उड़ान’

‘जाति और सामाजिक श्रेणियों से परे थे दिनकर’

एक नजर

है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि हवाई चप्पल पहनने वाला गरीब से गरीब आदमी भी हवाई जहाज से यात्रा करता हुआ नजर आए। सब उड़ें, सब जुड़ें।’ उन्होंने कहा कि दुनिया में हवाई सफर का सबसे ज्यादा स्कोप भारत में है और इस क्षेत्र में हमारी सरकार लगातार कार्य कर रही है।

उड्‌डयन नीति

हवाई क्षेत्र में संभावनाओं और सरकार के प्रयासों का जिक्र करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘दूसरे विश्व युद्ध के दौरान देश में कई हवाई पट्टियां बनीं, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हुआ। आजादी के बाद से अब तक सिर्फ 70-75 हवाई अड्‌डे ही हैं, जो व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। उड्‌डयन नीति नहीं बनाई गई, जबकि पूरी दुनिया में हवाई यात्रा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा संभावनाएं भारत में हैं। मुझे खुशी है कि हमारी सरकार ने इस स्थिति में बदलाव लाने का फैसला किया, उड्‌डयन नीति बनाई और उसमें भी ‘उड़ान योजना’ को सबसे अहम जगह दी। इस योजना से करीब 70 नए हवाई अड्‌डे शुरू होंगे। दूसरी ओर तीसरी श्रेणी के शहरों को हवाई यातायात से जोड़ा जाएगा। इसका सीधा फायदा आम आदमी को मिलेगा।’

‘उड़ान’ का अर्थ

उड़ान (यूडीएएन) का मतलब है, ‘उड़े देश का आम नागरिक’। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे शहरों को एक-दूसरे से जोड़ना और आम नागरिकों को सस्ती हवाई सेवा मुहैया करवाना है। इसके तहत यात्रियों को अधिकतम 2,500 रुपए (इससे कम हो सकता है पर ज्यादा नहीं) में हवाई जहाज से 500 किलोमीटर तक यात्रा की सुविधा मिलेगी। हर उड़ान की आधी सीटें योजना के तहत आरक्षित रहेंगी। जून- 2016 में बनी उड्‌डयन नीति में आरसीएस (क्षेत्रीय संपर्क योजना) एक अहम एजेंडा है। इसी के तहत अक्टूबर- 2016 में ‘उड़ान’ योजना का एेलान किया गया था। इस योजना में 128 हवाई मार्गों और पांच एयरलाइन संचालकों को शामिल किया गया है।

लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’

ढाई हजार रुपए में 500 किलोमीटर की हवाई यात्रा की घोषणा देश में आए दिन होने वाली सरकारी कल्याणकारी घोषणाओं से बिल्कुल अलग है। इस घोषणा की खासियत को रेखांकित करते हुए खुद

लोकल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए ‘उड़ान’ योजना इस योजना से हवाई किराए में होगी भारी कमी पिछले साल हुई थी उड्डयन नीति की घोषणा

प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले धारणा थी कि हवाई यात्रा राजा-महाराजा का ही विषय है। इसलिए एयर इंडिया का लोगो भी ‘महाराजा’ ही था। उन्होंने कहा कि अटल जी की सरकार के समय मैंने राजीव प्रताप जी से कहा कि ये लोगो बदलकर महाराजा के लोगो की जगह कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का कॉमनमैन क्यों नहीं बन सकता। उनका ये सपना पूरा हुआ इसके लिए उन्हें बेहद खुशी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में पहली बार एविएशन पॉलिसी बनाने का सौभाग्य उनकी सरकार को मिला है। इस योजना के तहत कडप्पा-हैदराबाद और नांदेड़-हैदराबाद मार्गों पर भी उड़ानें शुरू की गई हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि टीयर टू शहरों को हवाई मार्गों से जोड़ना हमारी सरकार की प्राथमिकता है और इसके तहत अगले एक साल में 30 से 35 एयरपोर्टों से तेज और सस्ती कनेक्टिविटी का दौर शुरू हो जाएगा। प्रधानमंत्री ने इस दौरान एविएशन कंपनियों को सलाह दी कि अगर वे व्यापारिक नजरिए से सोचें कि नांदेड़ साहिब, पटना साहिब और अमृतसर साहिब का रूट बनाएंगे तो उन्हें बहुत फायदा होगा।

संस्कृतियों का मेल

प्रधानमंत्री ने टूरिज्म को सबसे तेजी से ग्रोथ करने वाली इंडस्ट्री बताते हुए कहा कि नॉर्थ-ईस्ट जो जाता है वह बार-बार जाना चाहता है। लेकिन कनेक्टिविटी के अभाव में वह ऐसा नहीं कर पाता। इस योजना से सिर्फ यात्रा की सुविधा ही नहीं होगी, बल्कि दो संस्कृतियां भी जुड़ेंगी। रही खर्च में कमी की बात तो हम टैक्सी से सफर करें तो 8-10 रुपए प्रति किलोमीटर का खर्च आता है, लेकिन सरकार की नई उड़ान योजना से खर्च सिर्फ 6 या 7 रुपए ही होगा। साफ है कि नरेंद्र मोदी नई उड्डयन नीति के साथ देश में आम और गरीब लोगों को जहां एक तरफ विकास की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं, वहीं इसी के माध्यम से वह विकास की वर्टिकल अवधारणा को कहीं न कहीं समावेशी धरातल पर भी विस्तार दे रहे हैं और यह देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए समावेशी विकास की एक नई समझ है।

दिनकर जी ने कभी कविता को अपनी असली कमाई नहीं माना, बल्कि वे कहते थे कि मेरी असली कमाई और उपलब्धि यह है कि मैंने अपने जीवन में 24 लड़कियों की शादी करवाई है शुरुआत करने वाले अभिनेता अभिनव चतुर्वेदी भी इस समारोह में शामिल हुए। इस स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. विन्देश्वर पाठक के संबोधन से हुआ। राष्ट्रकवि दिनकर जी को नमन करते हुए उन्होंने कहा,‘राष्ट्रकवि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान दिया। आज हम सब उनकी 43वीं पुण्यतिथि पर एकजुट होकर उनकी रचनाओं और गुणों को युवाओं और बच्चों तक पहुंचाने का कार्य करेंगे। दिनकर जी का सपना हिंदी भाषा और साहित्य को विश्व पटल पर पहुंचाना था। आज हम घोषणा करते हैं कि हम सब मिलकर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए देश के सभी राज्यों में दिनकर के नाम से हिंदी साहित्य की शाखा की शुरुआत करेंगे, जिससे देश के युवाओं और बच्चों में हिंदी के प्रति जागरुकता बढ़े।’ उन्होंने दिनकर जी के जीवन और साहित्य के बीच अद्वितीय संबंध को रेखांकित किया,‘उन्होंने कहा कि दिनकर जी एक बौद्धिक और आम आदमी के कवि और लेखक थे। उनके लिए साहित्यिक ‘रूप’ और ‘शैली’ का अपने आप में कोई अंत नहीं था। उन्होंने उन विषयों और मुद्दों के बारे में बड़े पैमाने पर लिखा, जो आम आदमी को उनके दैनिक जीवन में होने वाली परेशानियों के लिए चिंतित करता है। डॉ. पाठक ने कहा कि दिनकर के प्रशंसकों में छात्र, साहित्यिक प्रेमी, राष्ट्रवादी और जवाहर लाल नेहरू जैसे राजनीतिक नेता शामिल थे। दिनकर जाति और सामाजिक श्रेणियों से परे व्यक्ति थे। उन्होंने समाज में दलित और महिलाओं की स्थिति के बारे में लिखा था। डॉ. पाठक ने बताया कि इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए सुलभ संगठन ने पिछले 43 सालों से विधवाओं और मैनुअल स्कैवेंजर्स के लिए काम करके अपने सामाजिक मिशन में एक समान मार्ग का अनुसरण किया है। सिक्किम के पूर्व राज्यपाल बीपी सिंह ने दिनकर के जीवन स्मृति पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘दिनकर जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कभी कविता, लेख को अपनी असली कमाई नहीं माना, बल्कि वे कहते थे कि मेरी असली कमाई और उपलब्धि यह है कि मैंने अपने जीवन में 24 लड़कियों की शादी

करवाई। दिनकर जी के मौलिक विचार थे कि अपने इतिहास को खंगालो, अपने पूर्वजों से ऊर्जा प्राप्त करो और परिवर्तन करो।’ उन्होंने कहा कि दिनकर जी दिल्ली को सांस्कृतिक राजधानी बनाना चाहते थे। उन्होंने कभी कहा था कि दिल्ली में संस्कार नहीं है, इसमें संस्कार विकसित करना है। दिल्ली को सांस्कृतिक राजधानी बनाना है। उनके इस कार्य को डॉ. पाठक पूरा कर रहे हैं, जो कि सराहनीय ही नहीं, अतुलनीय भी है। दिनकर और नेहरू अच्छे मित्र थे, दिनकर की अविस्मरणीय प्रतिभा को देखकर नेहरू ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। दिनकर जी हमेशा देश को शक्तिशाली बनाना चाहते थे। उनका मत था कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो ना हो, लेकिन जनशक्ति मजबूत होनी चाहिए। जनशक्ति को मजबूत करने के लिए कुशल नेतृत्व की आवश्यकता है। दिनकर जी चाहते थे कि भविष्य की कविता गाने, गुनगुनाने और गुदगुदाने की चीज ना होकर, पाठकों को सोचने पर मजबूर करे। दिनकर जी बिना एम ए की डिग्री के यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे। उसके बाद राज्यसभा के सदस्य बने, लेकिन सबके बावजूद उन्होंने अपने स्वभाव कविता सृजन को नहीं छोड़ा। आज भारत का हर नागरिक दिनकर जी ना बने, लेकिन उनके गुणों को आत्मसात जरूर करे। ‘एक फूल बिखरा तो हार टूट जाता है, गलत पड़ी उंगली से तार टूट जाता है ऐ दोस्त कुछ प्यार करो, प्यार की ही बात से प्यार छूट जाता है’ इन पंक्तियों के साथ शारदा सैदपुरी जी ने दिनकर जी को श्रद्धांजलि दी और कहा कि उन्हें जो पुरस्कार आज दिया गया है, वह सम्मान उनका नहीं डॉ. सीपी ठाकुर का है, जिन्होंने दिनकर की परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने इस दौरान गांधी जी को याद करते हुए कहा कि गांधी जी को किसी ने नहीं समझा, यदि किसी ने समझा तो सिर्फ नाम के लिए। गांधी जी की परंपराओं को डॉ. पाठक ने आगे बढ़ाया है। हमारे देश के प्रधानमंत्री साधारण व्यक्ति नहीं है, उन्हें पाठक जी ने पहचाना है। डॉ. पाठक ने प्रधानमंत्री मोदी पर कविता लिखी है, ‘मोदी


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एक नजर

शारदा सैदपुरी को पहला दिनकर सुलभ साहित्य अकादमी पुरस्कार

स्वच्छता को प्रमुखता देने के लिए ‘नई दुनिया’ अखबार पुरस्कृत पत्रकार संजय शुक्ला को मिला ‘सुलभ स्वच्छता सम्मान’

तेरा काशी, तेरा काशी....’ आज तो काशी सबका हो गया है। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने कहा,‘ डॉ. पाठक ने तो अपना पूरा जीवन शौचालय को प्रतिस्थापित करने में लगा दिया फिर ऐसे में साहित्य की तरफ उनका प्रेम देखकर मुझे समझ नहीं आया। शौचालय और साहित्य का भला क्या मेल... लेकिन जब इस पर गहनता से विचार किया तो समझ आया कि शौचालय तन की सफाई करता है, तो साहित्य मन की स्वच्छता को कायम करता है। ऐसे समय में जब भारत की एकता को लेकर हमारे ही देश और विश्वविद्यालयों में सवाल खड़े किए जा रहें हों, तब ऐसे आयोजन करा कर डॉ. पाठक ने सराहनीय कार्य किया है। व्यास जी ने कहा था कि धन तो आता जाता रहता है, इसकी रक्षा करना आवश्यक नहीं है, बल्कि अपने इतिहास की रक्षा करो। डॉ. पाठक ने अपने इतिहास की रक्षा के लिए सराहनीय कदम उठाया है।’ बलदेव भाई ने कहा,‘दिनकर जी राष्ट्रीयता के उद्घोषक थे। उनकी रचनाएं, वीर रस की कविताएं साहित्य भावबोध को जगाती है। दिनकर जी ने जिस राष्ट्रीयता के बारे में बताया है, आज की शिक्षा में लोग बताते हैं कि अंग्रेजों का शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्होंने देश को विकसित किया है। हमारे देश के लोग ये नहीं जानते की अंग्रेजो से पहले राष्ट्र के विकास और उन्नति के बारे में हमारे ऋषि-मुनियों ने बताया था। हम आज की पीढ़ियों को बता दें कि अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में सुझाया गया है कि हम धरती माता की संतान हैं। हमारे ऋषियों ने राष्ट्रीयता सिखाई है। भारतीय चिंतन में एक में से अनेक होना है। हम विविध में एक नहीं हैं, बल्कि हम एक में विविध हैं। भारत हमारी राष्ट्रभूमि है, इसकी उन्नति और उन्नयन में हम सब की भूमिका होनी चाहिए। दिनकर जी का स्मरण करना महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उनके विचारों गुणों का अवलोकन करना भी जरूरी है।’ बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. सी पी ठाकुर ने दिनकर जी को नमन करते हुए कहा,‘हिंदी भाषा ही परिपूर्ण नहीं है, पहले हमें इसे परिपूर्ण करना है। आजकल अंग्रेजी का बोलचाल की भाषा के रूप में

ज्यादा उपयोग हो रहा है, जिसे लोग आसानी से समझ और बोल रहे हैं। इसके लिए हमने विचार किया है कि हिंदी डिक्शनरी में अंग्रेजी के बोलचाल की भाषा को शामिल किया जाए।’ उन्होंने पूरे भारत में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए डॉ. पाठक द्वारा की गई घोषणा के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। डॉ. ठाकुर ने कहा कि वह और डॉ. पाठक एक ही स्थान के रहने वाले हैं। वे एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन फिर जीवन उन्हें अलग-अलग दिशाओं में ले गया। डॉ. ठाकुर ने ‘कालाजार’ रोग पर शोध किया, जबकि डॉ पाठक दूसरे क्षेत्र में शामिल हो गए। डॉ. सीपी ठाकुर ने कहा कि भारतीय लोग खुद पर गर्व नहीं करते, जबकि चीनी लोग विदेशों में जाकर खुद पर गर्व महसूस करते हैं। अगर ऋग्वेद की आयु घटाई नहीं जाती तो पूरे विश्व में यह बात सामने आ जाती की सभी देशों की सभ्यता का जन्मदाता भारत ही है। यह धारणा लोगों में प्रचलित ना हो इसलिए ऋग्वेद की आयु 60 हजार से घटाकर 600 दशक पूर्व कर दी गई। आज के परिवेश में हमारे बच्चे ये नहीं जानते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जो लिखा है, जो विकसित किया है उसे पूरी दुनिया में कोई नहीं कर सकता। इसके लिए हमें शिक्षा के माध्यम से बच्चों को यह सब बताने की आवश्यकता है और यह भी बताने की जरूरत है कि हम एक उत्कृष्ठ देश के नागरिक हैं। हमें खुद पर गौरवान्वित होना चाहिए। डॉ. पाठक ने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए राज्यस्तरीय अकादमी की शुरुआत करने की पहल की है। उनकी इस पहल से हिंदी के प्रचार प्रसार के साथ ही साथ हमारी संस्कृति का भी प्रचार होगा। उन्होंने हिंदी साहित्य के हित को आगे बढ़ाने के लिए डॉ. पाठक को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि यह दिनकर के विचार और उनके लेखन को फैलाने में स्वाभाविक रूप से एक समान हिस्सेदारी शामिल

होगी। दिनकर के साथ उनकी बैठक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी दिनकर जी से जेपी के घर पर अक्सर मुलाकात होती रहती थी। दिनकर को ‘जलेबी’ खाना पसंद था, जो उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं था। फिर भी वह जलेबी खा लिया करते थे। तिरुपति में दिनकर ने एक भजन पाठ में हिस्सा लिया था, लेकिन ऊर्जा और उत्साह की वजह से उनके हृदय में दर्द शुरू हो गया, जो उनकी मौत का कारण बना। डॉ. ठाकुर ने उस समय की बातों को गहरी भावनाओं के साथ याद किया। वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार पं. सुरेश नीरव ने दिनकर जी की स्मृति में कविता पाठ किया और कहा कि मैं दिनकर जी की मानस संतान हूं। संतान उसे भी कहते हैं जो उनकी कृतियों और विचारधाराओं को आगे बढ़ाने का कार्य करे। हमने दिनकर जी की विचारधारा को बढ़ाने का कार्य किया है, इसलिए मैं उनका मानस संतान हूं। उन्होंने प्रमथ्यु की कहानी सुनाते हुए कहा कि मैं दिनकर जी के लिए इतना जरूर कह सकता हूं कि वह प्रमथ्यु चेतना के कवि थे। दिनकर जी ने मनुष्यता को जगाने का काम किया और वह प्रगतिवाद के सूत्रधार थे। उन्होंने सिर्फ कविताएं ही नहीं लिखी, अपितु कई कवि भी पैदा किए। हिंदी कविता में वीर रस की धारा बहाने वाले दिनकर जी थे, इन्हें वीर रस की गंगोत्री भी कहा जाता है। दिनकर जी ने हमेशा अपने मनुष्य धर्म का पालन किया। वह कहते थे कि मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वीर रस का संचारी भाव करुणा है। संत दूसरों के दिए कष्ट तो सह सकता है, लेकिन किसी को कष्ट में नहीं देख सकता है। मुझे ये लगता है कि यह करुणा है जो हमारे डॉ. पाठक में है। पाठक जी वीर रस के कवि हैं, ये अपने आचरण से वीर रस को जी रहे हैं। जिसने दिनकर जी की विचार धारा को अपने विचार में शमिल किया

डॉ. पाठक को स्वच्छता के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक को ‘आईएससीफिक्की सेनिटेशन अवार्ड्स एंड इंडिया सेनिटेशन कॉन्क्लेव’ में लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए स्पेशल ज्यूरी अवार्ड दिया गया। नई दिल्ली स्थित फिक्की फेडरेशन हाउस के सभागार में आयोजित इस कॉन्कलेव में डॉ. पाठक को यह सम्मान रेल मंत्री सुरेश प्रभु के हाथों दिया गया। इस अवसर पर जिवा (ग्लोबल इंटर फेथ वाश एलायंस) के सह-संस्थापक स्वामी चिदानंद

सरस्वती महाराज के अलावा कई वि‍शिष्ट अतिथि मौजूद थे। सुलभ प्रणेता ने सम्मान स्वीकार करते हुए कहा, ‘मैं भारत के प्रख्यात वैज्ञानिकों में से एक और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. आर. ए. माशेलकर के नेतृत्व में बनी ज्यूरी का इस सम्मान के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।’ डॉ. पाठक ने कॉन्क्लेव के आयोजनकर्ताओं को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने स्वच्छता को लेकर एक गंभीर और सार्थक पहल की है।

आवरण कथा

03

वह कवि बन गया और जिसने उसे अपने व्यवहार में डाला वह डॉ. विन्देश्वर पाठक हो गया। दिनकर जी पद्म विभूण थे, वैसे ही पाठक जी भी पद्म विभूषण हैं। दोनो वीर रस के कवि हैं, एक ने करुणा के माध्यम से देश की सेवा की तो एक ने वीर रस के माध्यम से देश को जागृत किया है। साहित्य को जिंदा रखने का कार्य डॉ. पाठक ने किया है। इन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं, फिर भी खुद को लेखक नहीं पाठक कहलवाते हैं। इस कार्यक्रम में आयोजित कवि सम्मेलन में पहले अलीगढ़ के कवि विजय भारद्वाज ने अपनी कविता के माध्यम से दिनकर जी को श्रद्धाजंलि दी। इसके साथ ही उन्होंने डॉ. पाठक को आज के युग का दिनकर बता कर उनका आशीर्वाद लिया। फरीदाबाद के कवि चरणजीत चरण ने दिनकर जी को नमन करते हुए कहा कि देश की आजादी में साढ़े सात लाख शहीदों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, जिन्हें इतिहास का एक पन्ना भी नसीब नहीं हुआ। उन्होंने उन शहीदों को नमन किया। उन्होंने बताया कि देश की आजादी में शहीद होने वाले इन शहीदों का कोई लेखा जोखा नहीं मिला और ना ही कोई खिताब मिला। उन्होंने अपनी कविताओं में शहीद भगत सिंह का जिक्र करते हुए उन्हें नमन किया। ग्वालियर के कवि रामवरण ओझा ने दिनकर जी को नमन करते हुए डॉ. पाठक के सराहनीय कार्यों के लिए उनका अभिनंदन किया। उन्होंने हिंदी और आधुनिक संस्कृति पर कविता गान किया। मैनपुरी के कवि मनोज चौहान ने डॉ. पाठक के कार्यों की सराहना करते हुए उनका आशीर्वाद लिया। उन्होंने दिनकर जी को नमन करते हुए कहा कि हम लोग अंग्रेजी का उपयोग कर हिंदी का अपमान कर रहे हैं। हिंदी अपने ही देश में दासी जैसी बन कर रह गई है। हमें हिंदी को विश्व पटल पर लाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। हापुड़ के कवि अनिल वाजपेयी ने दिनकर जी को नमन करते हुए कहा कि मैं आज जो भी हूं अपने बाबा के आशीर्वाद से हूं। उन्होंने डॉ. पाठक की सराहना करते हुए कहा कि मैं उनके कार्यों के लिए उनकी स्तुति ही कर सकता हूं। उन्होंने कहा कि दिनकर जी ओज के हिमालय थे और मैं उनकी पुण्यतिथि पर काव्यपाठ करके खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। उन्होंने हास्य रस की कविताएं सुना कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के पाक दौरे और बिना लंच किए वापस आने पर कविता सुनाई। मुरादाबाद के कवि सौरभ कान्त शर्मा ने डॉ. पाठक की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पूरे देश में सुलभ शैचालय का निर्माण कराया है। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से बताया कि देश की मिट्टी दिनकर जैसे पुत्र की मांग कर रही है। उन्होंने कहा कि अकबर को लोगो ने महान बना दिया और राणा के कष्टों को भुला दिया।


04 जेंडर

01-07 मई 2017

जैविक खेती की महिला रोल मॉडल महिला मिसाल

खेती-किसानी की दुनिया में पहचान और सफलता की नई इबारत लिख रही दो महिलाओं की प्रेरक दास्तान

एक नजर

जैविक खेती से कमाई के साथ बढ़ रहा आत्मविश्वास 84 फीसदी महिलओं की आजीविका कृषि से जुड़ी चाय उत्पादन में तकरीबन आधा श्रम महिलाओं का

भा

प्रेम प्रकाश

रत को शुरू से कृषि और ऋषि पंरपरा का देश माना गया है। कृषि प्रधान देश होने की भारतीय पहचान तो खैर अब तक कायम है। पर बात किसानों की करें तो इसमें लैंगिक भेदभाव की शिकायत पुरानी है। महिला को किसान के तौर पर स्वीकृति देने में आज भी काफी कठिनाइयां हैं, जबकि कृषक भारत की पूरी रचना प्रक्रिया में महिलाएं आरंभ से ही शामिल रही हैं। सेंटर फॉर ट्रेड एंड डेवलपमेंट के एक अध्ययन के मुताबिक, ‘भारत में कुल कामकाजी महिलाओं में से 84 प्रतिशत महिलाएं कृषि उत्पादन और इससे जुड़े कार्यों से आजीविका अर्जित करती हैं। चाय उत्पादन में लगने वाले श्रम में 47 प्रतिशत, कपास में 48.84 प्रतिशत, तिलहन में 45.43 प्रतिशत और सब्जियों के उत्पादन में 39.13 प्रतिशत का सीधा योगदान महिलाओं का है।’ इसी तरह, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्लूए की ओर से नौ राज्यों में किए गए एक शोध से पता चलता है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी तक रही है। इतना ही नहीं, बागवानी में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत और फसल कटाई के बाद के कार्यों में 51 फीसदी तक ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी है। इसके अलावा पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी 58 प्रतिशत और मछली

उत्पादन में यह आंकड़ा 95 प्रतिशत तक है। सच्चाई तो यह है कि खेती के घरेलू काम में महिलाएं सबसे ज्यादा श्रम वाला काम करती हैं, किंतु उनके काम को मान्यता नहीं दी जाती और उनके आर्थिक योगदान को ‘नगण्य’ मान लिया जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं सप्ताह में 25 घंटे अपने घर के काम के लिए श्रम करती हैं। इसके साथ ही पांच घंटे देखभाल और सामुदायिक काम में लगाती हैं। इसके बाद वे 30 घंटे ‘बिना भुगतान का श्रम’ करती हैं। अच्छी बात यह है कि नए समय में श्रम और उद्यम की आधी दुनिया को नए सिरे से पहचान मिलनी शुरू हुई है। आज न सिर्फ उनके बारे में लिखा-पढ़ा जा रहा है, बल्कि सरकारें भी उनकी अलग से फिक्र कर रही हैं।

15 फसलें उगाती हैं वनिता

खेती-किसानी की दुनिया में भारतीय महिलाएं कैसे पहचान और सफलता की नई इबारत लिख रही हैं, इसकी मिसाल हैं महाराष्ट्र की महिला किसान वनिता बालभीम मनशेट्टी। वनिता को लेकर बीते दो सालों में सोशल मीडिया से लेकर पत्रिकाओं-अखबारों में

काफी लिखा गया है। कुछ न्यूज चैनलों पर अलग से उन पर फीचर स्टोरी भी दिखाई गई। वनिता एक साल में 15 फसलें उगाती हैं। उन्होंने 2014 में ‘एक एकड़ में खेती’ का फार्मूला अपनाया। आज आलम यह है कि खेती के बूते उनकी पूरी गृहस्थी आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित है। इस फार्मूले ने उन्हें आत्मनिर्भर किसान बना दिया है। महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के चिवड़ी गांव में रहने वाली वनिता की चार बेटियां हैं। उनकी सबसे बड़ी बेटी ग्रेजुएशन कर रही है, जबकि सबसे छोटी आठवीं कक्षा की छात्रा है। उनके पति बालभीम मनशेट्टी खेती के साथ-साथ ठेकेदारी भी करते हैं और घर का आधा खर्च वही वहन करते हैं, लेकिन पत्नी के सफल किसान होने पर उन्हें गर्व है। वह मानते हैं कि वनिता ने जिस आत्मविश्वास से खेती-किसानी का काम संभाला और सफल रहीं, वह काबिले-तारीफ है। वनिता के पास गाएं भी हैं। वह दूध बेचकर भी अच्छा-खासा कमा लेती हैं। तकरीबन तीन साल पहले वनिता स्वयं शिक्षण प्रयोग (एसएसपी) एवं कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने गई थीं। उसी दौरान

एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं सप्ताह में 25 घंटे अपने घर के काम के लिए श्रम करती हैं। इसके साथ ही पांच घंटे देखभाल और सामुदायिक काम में लगाती हैं

उनको ‘एक एकड़ में खेती’ के फार्मूले का पता चला। उन्होंने वहां देखा कि एक एकड़ खेत में करीब 100 फसलें उगाई गई थीं। ये वही फसलें थीं, जिनका रोजमर्रा के जीवन से ताल्लुक है। इतने छोटे से खेत में इतनी सारी फसलें देखकर वह हैरान रह गईं। वनिता के मन में तभी से जिज्ञासा घर कर गई कि क्या वे अपने एक एकड़ खेत में ऐसा कर पाएंगी। उन्होंने ज्यादा समय न लेते हुए एक दिन मन बनाकर फैसला कर लिया कि वह ऐसा करके दिखाएंगी। वेबसाइट ‘इंडियाएग्री डाट इन’ की रिपोर्ट के मुताबिक आमतौर पर लोग एक एकड़ खेत में सिर्फ एक क्विंटल जिंस उगा पाते हैं, लेकिन जैविक खेती से यह आंकड़ा बढ़कर चार क्विंटल तक पहुंच सकता है। वनिता के दिमाग में जैविक खेती का यह फार्मूला घर कर गया था। वह समझ चुकी थीं कि खेती में इस्तेमाल होने वाली रासायनिक खाद और कीटनाशक ही विभिन्न रोगों के कारण हैं। अधिक अन्न उत्पादन से धनार्जन के साथ वनिता को इस तरह की खेती से यह भी फायदा नजर आ रहा था कि इसके जरिए वह अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन कराएंगी। वनिता के पास ज्यादा खेत नहीं थे। सो जैविक खेती की शुरुआत में उन्होंने दो एकड़ खेत बटाई पर लिया। एक एकड़ खेत पहले से था। इसके बाद वनिता ने पति से खेती की मंजूरी ली और घोषित तौर पर इलाके की पहली महिला किसान बनीं। उन्होंने शुरुआत में अनाज, दालें और सब्जियां उगाईं। एक एकड़ में अपने बूते खेती की। बाकी दो एकड़ की खेती में उन्होंने पति की मदद ली। उसमें उन्होंने सोयाबीन और अंगूर की खेती की। अगले साल भी उन्होंने इन्ही फसलों को दोहराया। हालांकि उस साल सूखा पड़ा था, बावजूद इसके उन्होंने एक एकड़ में 15 फसलें उगाईं। इनमें अनाज, दालें और सब्जियां शामिल थीं। आज आलम यह है कि खेत के 68 फीसदी हिस्से में वह बरसात में खरीफ फसल उगाती हैं तो जाड़ों में रबी।


01-07 मई 2017

महिला सशक्तीकरण की नई लीक

जै

जैविक खेती के जरिये महिला उद्यम को एक नई लीक में तब्दील करने की ललक

विक खेती के बहाने भारत में महिलाएं श्रम को लेकर मौजूदा अवधारणा को भी एक तरह से चुनौती दे रही हैं। अपने श्रम-उद्यम और सफलता से वे महिला सशक्तीकरण का एक सर्वथा नया सर्ग तो रच ही रही हैं, साथ में इस मांग को भी कहीं न कहीं मजबूती से उठा रही हैं कि उनकी मेहनत और क्षमता को कम करके न आंका जाए और न ही उन्हें लैंगिक भेदभाव का शिकार बनाया जाए। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की मानें तो 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं के कुल श्रम की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और बिहार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 70 प्रतिशत रहा है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु और केरल में महिलाओं की भागीदारी 50 फीसदी है। वहीं, मिजोरम, असम, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नागालैंड में यह संख्या 10 प्रतिशत है। शोध के अनुसार, पौध लगाना, खर-पतवार हटाना और फसल कटाई के बाद के कामों में ग्रामीण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी शामिल है। 2011 की जनगणना में एक दिलचस्प तथ्य वनिता बताती हैं कि वह घर के इस्तेमाल का अनाज और दालें रखने के बाद सब्जियां मसलन प्याज, बैंगन बाजार में बेच देती हैं। इससे उनके परिवार का काम भी चल जाता है और अलग से आमदनी भी हो जाती है। वह कहती हैं कि बीते साल करीब 3900 किलो जिंस और सब्जी उगाई। इसमें से 25 फीसदी का इस्तेमाल घर में हुआ। इस खेती में प्रति एकड़ करीब साढ़े नौ हजार रुपए की लागत आई। इसके लिए खाद भी अपनी गाय के गोबर से ही बनाई। इससे दो फसली मौसम में उनकी आय साढ़े 44 हजार रुपए हो गई। यानी उन्हें प्रति एकड़ 18 हजार रुपए की आमदनी हुई। इतनी कमाई के बाद वनिता फूली नहीं समा रही थीं। अपनी इस कामयाबी को लेकर वनिता बताती हैं, ‘पहले मेरे पति सिर्फ घर के मसलों में राय करते थे, लेकिन अब मेरी कामयाबी से वह भी खुश हैं। घर में कमाई के दो स्रोत होने से हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो गया है। अब मैं खुद ही खेती

का खुलासा हुआ। इसमें भारत में कुल 72.89 करोड़ लोगों को अकार्यशील बताया गया है। आधिकारिक परिभाषा के मुताबिक ये वे लोग हैं, जिन्होंने संदर्भ अवधि में कोई और किसी भी तरह का काम नहीं किया है। ये वो लोग हैं जिनके काम या गतिविधि को आर्थिक योगदान करने वाली गतिविधि नहीं माना जाता है। इन 72.89 करोड़ अकार्यशील लोगों में से 16.56 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके जीवन में मुख्य काम ‘घरेलू जिम्मेदारियां’ निभाना रहा है। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि इनमें से 15.99 करोड़ यानी 96.50 फीसदी महिलाएं हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़ों से ही यह भी पता चलता है कि मुख्य काम के तौर पर केवल 34.49 लाख पुरुष (3.5 प्रतिशत) ही घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हैं। खाना पकाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना, परिजनों की देखभाल, पानी भरना जैसे और भी कई काम आमतौर पर महिलाएं निभाती हैं, पर उन्हें कामगार नहीं माना जाता है। खेती-किसानी के काम से तो पारंपरिक तौर पर महिलाएं पहले से जुड़ी रही हैं। इस तरह कह सकते हैं कि नए समय की अस्मितावादी ललक के बीच जैविक खेती के बहाने महिला उद्यम को एक नई लीक में तब्दील करने की ललक वाकई काबिले तारीफ है। करती हूं। खेतों में काम करने से मेरे बच्चों का भी आत्मविश्वास बढ़ गया है। गांव के अन्य लोग मुझे प्रगतिशील महिला किसान का तमगा देते हैं।’ एक अकेली महिला किस तरह जैविक खेती कर सकती है, इसका एक और प्रेरक उदाहरण महाराष्ट्र के मंजुला संदेश पाडवी ने प्रस्तुत किया है। जैविक खेती के जरिए न केवल उन्होंने अपने परिवार का पालन-पोषण किया, बल्कि अपनी बेटी को पढ़ाया-लिखाया भी और अब वह नौकरी भी कर रही है। महाराष्ट्र की नंदुरबार जिले के वागशेपा गांव की मंजुला की जैविक खेती की चर्चा अब इलाके से बाहर भी हो रही है। मंजुला के पास 4 एकड़ जमीन है। उनका पति 10 साल पहले घर छोड़कर चला गया। उसके खुद का हार्ट बाल्व बदला गया है। इस कारण अब भी दवाएं लेनी पड़ती हैं। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद मंजुला ने हार नहीं मानी और एक दिन खुद खेती करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

जेंडर

05

महिला किसान दिवस की घोषणा हर वर्ष 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस के रूप में मनाने का फैसला

दे शको मेंबढ़ावामहिलादेने केकिसानोंलिए

केंद्र सरकार ने उन्हें वर्ष में अपना एक पूरा दिन समर्पित किया है। केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने महिला किसानों को बढ़ावा देने के लिए इसी साल 15 फरवरी को ट्वीट करते हुए बताया,’अब देश में महिला किसानों को नई कृषि

तकनीकों से अवगत कराने व उन्हें कृषि से संबंधित सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाने के लिए अब हर वर्ष 15 अक्टूबर को ‘महिला किसान दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा।’ सरकार का यह फैसला निश्चित तौर पर महिला किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला साबित होगा।

वनिता और मंजुला जैसी महिलाएं अपनी कामयाबी से कहीं न कहीं देश-दुनिया को यह बता रही हैं कि जैविक खेती कम खर्चीली और ज्यादा मुनाफा देने वाली है अकेली मंजुला का साहस

अपने दृढ़ निश्चय पर अमल करते हुए मंजुला ने सबसे पहले बचत समूह से कर्ज लेकर खेत में मोटर पंप लगाया। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए गोबर खाद खरीदकर डाली। सरकारी योजनाओं के पैसे से एक जोड़ी बैल खरीदा। मंजुला खेत में खुद हल-बक्खर चलाती हैं। फसल की निकाई-गुड़ाई करती हैं। सबसे पहले खेत में मक्का और ज्वार लगाया तो उत्पादन अच्छा हुआ। इस तरह उनका उत्साह और बढ़ गया। जैविक खेती से जगे भरोसे के बाद मंजुला फख्र के साथ बताती हैं कि उनके बाजू वाले खेतों की फसल कमजोर होती है। पिछले साल उन खेतों में मक्का नहीं हुआ, पर हमारे खेत में हुआ। इसका कारण बताते हुए वह कहती हैं कि हमने जैविक खाद का इस्तेमाल किया, जबकि वे रासायनिक खाद डालते हैं। नंदुरबार स्थित जन सेवा मंडल ने इस इलाके में 15 बचत समूह बनाए हैं। इन समूहों में जो पैसा जमा होता है, उससे किसान खेती के लिए कर्ज लेते हैं। बिना रासायनिक और देसी बीज वाली खेती को प्रोत्साहित किया जाता है। पहले देसी बीज बैंक भी बनाए गए थे। इलाके में अन्य किसान भी सब्जी, फलदार वृक्ष और अनाजों की मिली-जुली खेती कर रहे हैं। मंजुला भी उनमें से एक हैं। मंजुला की बेटी मनिका को अपनी मां पर गर्व है। वह कहती है कि मेरी मां बहुत मेहनती और अच्छी हैं। दरअसल, खेती के विकास में महिलाओं का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। परंपरागत खेती में वे न सिर्फ पुरुषों के साथ बराबरी से काम करती रही हैं, बल्कि कुछ मायनों में उनसे ज्यादा भी काम करती हैं। खेत में बीज बोने से लेकर उनके संरक्षण-संवर्धन और भंडारण का काम आमतौर पर महिलाओं के ही जिम्मे रहता रहा है। यही नहीं, पशुपालन से लेकर विविध तरह की सब्जियां लगाने व फलदार वृक्षों की परवरिश में महिलाओं का

योगदान रहता है। जब से खेती में मशीनीकरण का जोर बढ़ा है, तब से महिलाओं और कृषि के बीच का स्वाभाविक रिश्ता दरका है, वे इससे लगातार बाहर होती गई हैं। वनिता और मंजुला इस मामले में मिसाल हैं कि एक तरफ तो वे जैविक खेती को लोकप्रिय बना रही हैं, वहीं इसके जरिए उनके भीतर एक नई तरह की जागरुकता आई हैं। वे अपने-अपने इलाकों में रोल मॉडल बनकर उभर रही हैं। वनिता और मंजुला की मिसाल इस लिहाज से अहम है कि दोनों ने अपनी घर-गृहस्थी की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए जैविक खेती की राह पकड़ी। वनिता की जिंदगी में तो फिर भी पति का सहयोग था पर मंजुला का तो पति भी उसे छोड़कर चला गया था। बावजूद इसके उसने न सिर्फ सफलता के साथ खेती की, बल्कि इसके जरिए अपने बच्चों को पढ़ाया भी। मंजुला की बेटी आज नर्स है और जलगांव में नौकरी कर रही है। ये दोनों ही महिलाएं अपनी कामयाबी से कहीं न कहीं देश-दुनिया को यह सिखा रही हैं कि जैविक खेती सुरक्षित, कम खर्चीली और ज्यादा आर्थिक मुनाफा देने वाली है। वैसे भी जैविक खेती समय की मांग बनती जा रही है, क्योंकि रासायनिक खाद से अन्न और जमीन को होने वाले नुकसान की बात अब सभी मान रहे हैं। इसको लेकर कई शोध अध्ययन भी आ चुके हैं कि कैसे रासायनिक खाद की मदद से उपजाए जाने वाले अन्न, फल-सब्जियां हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हैं। रासायनिक खादों के इस्तेमाल से हमारी उपजाऊ खेती लगातार बंजर होती जा रही है और भूजल स्‍तर घ्‍ाटता जा रहा है। साथ ही इससे प्रदूषण तो बढ़ ही रहा है और खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है। इसीलिए जैविक खेती को प्रोत्साहन देने में वनिता और मंजुला जैसी महिलाओं का योगदान इस दृष्टि से भी अमूल्य है कि वे खेती के साथ पर्यावण और स्वास्थ्य सुरक्षा की भी हमारे समय की सबसे बड़ी दरकार को पूरा कर रही हैं।


06 जेंडर

01-07 मई 2017

आधी दुनिया का साझा बल सामुदायिक विकास

झारखंड में करीब पांच हजार से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं सामुदायिक कैडर के रूप में गांवों के विकास के लिए काम कर रही हैं

एसएसबी ब्यूरो

हिलाओं की सामूहिकता की ताकत को इतिहास ने कम ही मौकों पर देखा है, पर जब भी यह शक्ति दिखी तो बड़े नतीजे सामने आए। भारतीय स्वाधीनता इतिहास का ही संदर्भ लें तो नमक सत्याग्रह के दौरान गांधी ने न सिर्फ इस आंदोलन में महिलाओं से सामूहिक भागीदारी की अपील की, बल्कि रणनीतिक तौर पर उन्हें आगे भी रखा। तब महिलाओं की इस सार्वजनिक शक्ति के सामने अंग्रेज सरकार की एक भी रणनीति नहीं चली। मौजूदा दौर की बात करें तो विकास के साथ जुड़कर महिला सामूहिकता की ताकत कामयाबी की नई इबारतें लिख रही है। ऐसा नहीं है कि कामयाबी की ये मिसालें महज शहरी क्षेत्रों में देखी जा रही हैं। ग्रामीण महिलाओं ने अब कई क्षेत्रों में विकास की बागडोर संभाल ली है। झारखंड की महिलाओं ने विकास को लेकर सामूहिकता का ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। पूरे झारखंड में करीब 5000 से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं सामुदायिक कैडर के रूप में गांव के विकास के लिए काम कर रही हैं। इन्हीं महिलाओं

में से एक हैं सीमा देवी। सीमा देवी राज्य के सबसे पिछड़े जिलों में से एक सिंहभू‌म के मनोहरपुर प्रखंड के उनधन गांव की रहने वाली हैं। पति की दुर्घटना में असामयिक मौत से टूट चुकी सीमा जिंदगी से हार मानने लगी थीं। घर में कमाई का कोई साधन नहीं था। बेटी की पढ़ाई बंद करने तक की नौबत आ गई थी। तभी आजीविका मिशन की एक महिला उनकी जिंदगी में भगवान बनकर आई और सीमा को ‘स्वयं सहायता समूह’ के फायदे बताकर उसका सदस्य बना लिया। फिर क्या था, सीमा ने समूह से जुड़कर अपनी जरूरतों को पूरा कर अपनी जिंदगी को नई दिशा दी। अब तक 50 हजार रुपये से ज्यादा कर्ज ले चुकी सीमा अपनी बेटी को इंजीनियरिंग पढ़ा रही हैं और कर्ज भी चुका रही हैं। सीमा यहीं नहीं रुकीं। गरीबी की बेड़ियों को तोड़ने में जिस तरह दूसरी महिलाओं ने उनकी मदद की थी, अब सीमा भी दूसरों की मदद करना चाहती

थीं। आज वह झारखंड के अलग-अलग जिलों में जाकर गरीबी से बाहर निकलने की अपनी कहानी सुनाकर दूसरी गरीब महिलाओं को समूह से जोड़ रही हैं। सीमा ने अब तक सैकड़ों गरीब महिलाओं की जिंदगी को बदलाव के रास्ते पर ला दिया है। सीमा कहती हैं, ‘महिलाओं को पहले घर से निकलने की आजादी भी नहीं थी, लेकिन मैं बाहर निकली और विषम परिस्थितियों में भी इस आजादी के फायदे आज हमारे सामने हैं। आज महिलाओं के लिए आजादी के मायने हैं, अपने आत्मविश्वास को बढ़ाकर अपनी पहचान बनाना और मैं ग्रामीण झारखंड में महिलाओं की ऐसी ही आजादी के लिए काम कर रही हूं, क्योंकि आने वाले दिनों में ऐसी ही आत्मविश्वासी महिलाओं की फौज राज्य से गरीबी खत्म करेगी।’ सीमा जैसी हजारों महिलाएं आज अपनी पहचान बनाकर दूसरे गांव तथा जिलों की महिलाओं को

सामुदायिक कैडर और सामुदायिक संगठन (स्वयं सहायता समूह और ग्राम संगठन) गांव में बदलाव का केंद्र बन चुके हैं और इनकी वजह से ही विकास के नए आयाम के परचम भी कई गांवों में लहरा रहे हैं

एक नजर

सामुदायिकता के जरिए बढ़ रहा महिलाओं का आत्मविश्वास स्थानीय विकास के काम में भी दिलचस्पी ले रही हैं महिलाएं

झारखंड की महिलाओं ने दिखाई सामुदायिकता की अनूठी ताकत

अपनी राह पर चलने के लिए तैयार कर रही हैं। हाल की कई ऐसी पहलाें ने इस बात को साबित कर दिया कि ये सामुदायिक कैडर और सामुदायिक संगठन (स्वयं सहायता समूह और ग्राम संगठन) गांव में बदलाव का केंद्र बन चुके हैं और इनकी वजह से विकास के नए आयाम का परचम भी कई गांवों में लहरा रहा है। सामुदायिक महिला जागरुकता के जरिए विकास की ऐसी ही एक दिलचस्प दास्तां सिंहभूम के फुलवारी गांव की है। ‘फुलवारी ग्राम संगठन’ की महिलाओं ने महिला शक्ति और संगठन से


01-07 मई 2017

सामुदायिक खेती का ‘चमेली’ मॉडल

जेंडर

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कुछ साल पहले तक जो महिलाएं दूसरों के खेतों में मजदूरी करती थीं, आज वही महिलाएं बचत के पैसे से समूह बनाकर खेती कर रही हैं

श्रवण शुक्ला

हराइच जिले के सिमरिया गांव की कुछ महिलाएं अपने परिवार के अस्तित्व के लिए दूसरों के खेतों में कार्य कर रही हैं। इसके साथ ही यह महिलाएं अपने समकक्ष पुरुषों को हिम्मत दिलाती हैं और उन्हें आय में वृद्धि के साथ ही साथ खेती करने के गुर भी सिखा रहीं है। इतना ही नहीं वह कृषि योग्य भूमि की मालकिन बनने के साथ ही साथ अपनी बेटियों की शादी के लिए बचत भी कर रही हैं। लखनऊ से 175 किमी दूर सिमरिया गांव की रहने वाली नजमा (38) ने सामुदायिक कृषि के बारे में लोगों को आइडिया दिया। नजमा इसी गांव की 20 महिलाओं में से एक थीं, जो दूसरों के खेतों में काम करके 100 से 120 रुपए प्रतिदिन कमा रही हैं। नजमा कहती हैं कि उन्होंने एक दिन अन्य महिलाओं से पूछा कि क्या हम रोजाना 20 से 30 रुपए बचा सकते हैं और इसे बैंक में जमा कर सकते हैं। अगर हम ऐसा कर सकते हैं तो दो से तीन साल के भीतर हमें अपनी जमीन पर खेती करने के लिए पर्याप्त पैसा मिल जाएगा। पहले तो महिलाएं 20-30 रुपए बचाने के लिए सहमत नहीं हुईं, क्योंकि ये पैसे उनके परिवार को चलाने के लिए काफी मायने रखते थे, लेकिन नजमा ने उन्हें समझाया। इसके बाद करीब 12 महिलाएं इसके लिए राजी हुईं। वे 20 रुपए बचाने लगीं और सप्ताह में एक दिन बैंक के एक ज्वाइंट खाते में पैसे जमा किया जाने लगा। जल्द ही इसमें और भी महिलाएं शामिल हो गई, अब इनका 20 महिलाओं का समूह है। यह अनूठा प्रयोग 2010 से चल रहा हैं। उन्होंने अपने इस समुदाय का नाम ‘चमेली स्वयं सहायता समूह’ रखा है। यह समूह जाति और धर्म की सीमाओं से परे है। इसमें मुस्लिम, दलित, पिछड़ी और कुछ ऊंची जातियों की महिलाएं भी शामिल हैं। एक साल से भी कम समय में इस समूह के बचत बैंक खाते में 40,000 रुपए से अधिक जमा हो गए। गांव के एक किसान को तत्काल 20,000 रुपए की आवश्यकता थी, वह बैंक गया और पैसे के लिए अनुरोध किया, लेकिन बैंक ने उसके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। इसका कारण उसकी बंजर जमीन थी, जिसे वह गिरवी रख कर ऋण लेना चाहता था। विकास का नया खाका खींचा। इस गांव तक पहुंचने के लिए कुछ समय पहले तक पक्की तो दूर कच्ची सड़क भी नहीं थी। गांव के लोग सड़क के अभाव में इलाज के लिए कहीं बाहर नहीं जा पाते थे। बरसात में तो स्थिति और खराब हो जाती थी। संगठन की महिलाओं ने अपनी बैठक में चर्चा कर इस परेशानी पर विचार किया। बस फिर क्या था। फैसला किया गया कि समूह की सभी महिलाएं श्रमदान से सड़क बनाएंगी। इस तरह एक निर्णय पक्के इरादे में बदल गया और महिलाएं रोजाना दो घंटे श्रमदान करने लगीं। छह महीने में कच्ची सड़क बनकर तैयार हो गई। गांव के भीतर अब गाड़ियों की भी आवाजाही शुरू हो गई है। ग्रामीण महिलाओं ने योजना बनाओ

यह अनूठा प्रयोग 2010 से चल रहा हैं। इस समुदाय का नाम ‘चमेली स्वयं सहायता समूह’ है। इसमें मुस्लिम, दलित, पिछड़ी और कुछ ऊंची जातियों की महिलाएं भी शामिल हैं

राजकुमारी कहती हैं कि जब हमें इसके बारे में पता चला, तो हम सब मिट्टी की जांच करने के लिए पहली बार जमीन देखने गए। चूंकि हम सभी को अभी तक खेती करने का अच्छा अनुभव मिल चुका था, इसलिए हमने फैसला किया कि थोड़े अतिरिक्त लागत और श्रम के साथ उस जमीन पर खेती की जा सकती है। हमने अपने पतियों के विरोध के बावजूद किसान को 20,000 रुपए कर्ज देने का फैसला किया। राजकुमारी कहती हैं कि किसान खुशी-खुशी अपनी जमीन गिरवी रखने को तैयार हो गया। हमने अपने बचत खाते से उसे 20,000 रुपए दिए और उसके साथ एक समझौता किया गया कि उनकी जमीन हमारे समूह के पास तब तक गिरवी रहेगी, जब तक कि वह थोड़े ब्याज के साथ उधार की रकम ना चुका दे। इस जमीन ने 2014 में ‘चमेली स्वयं सहायता समूह’ के लिए एक नई शुरुआत की। शुरू में गांव के बड़े-बुजुर्ग उन पर हंसते थे, लेकिन चमेली समूह के सदस्यों को यह विश्वास था कि वे दुनिया को अपनी ताकत दिखा सकती हैं। नासरी

ने कहा कि चमेली समूह के लिए यह चुनौती थोड़ी मुश्किल भरी थी, क्योंकि जिस भूमि पर हम खेती करने जा रहे थे वह बंजर और असमान थी। इसके अलावा भूमि की सिंचाई के लिए जलाशय और अन्य जल स्रोत भी दूर थे, जो सबसे बड़ी समस्या थी। लेकिन इन 20 महिलाओं के समूह के पास डरने के लिए भी समय नहीं था। इस समूह की महिलाओं ने चुनौती को स्वीकार कर लिया था। अगली सुबह वे सभी महिलाएं उस बंजर और असमान खेत को समतल बनाने में जुट गईं। जिसका परिणाम ये हुआ कि दस दिनों के भीतर भूमि समतल हो गई। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए उन्होंने तीन बार जैविक उर्वरक का इस्तेमाल किया। सिंचाई के लिए उन्होंने पानी दूसरे किसान से खरीदा, जिसकी भूमि उनके खेत के बगल में थी। पहली सिंचाई के बाद जमीन पूरी तरह से तैयार हुई और पहली फसल उपजाऊ रही। चमेली समूह की सबसे युवा सदस्या संध्या (30) ने बताया कि पिछले दो सालों से हमारे पास उसी बंजर जमीन से अच्छी पैदावार मिल रही

अभियान में भी सड़क की मांग रखी थी। उनकी इस पहल का नतीजा रहा कि जल्द ही सरकार ने मनरेगा के तहत इस कच्ची सड़क को पक्की करने का फैसला कर लिया। फुलवारी ग्राम संगठन की अध्यक्ष संक्रांति धम्याल बताती हैं कि एकता में बहुत बल है। इसीलिए ग्राम विकास के लिए महिलाओं को संगठन में जोड़ना जरूरी है। दिलचस्प है कि फुलवारी की तरह राज्य के अलग-अलग जिलों की महिलाएं इन संगठनों के माध्यम से काम कर रही हैं। मसलन, खूंटपानी में करीब 30 साल से बंद पड़े हाट को महिलाओं ने मिलकर दोबारा शुरू करा दिया। आज वहां सौ से ज्यादा छोटी–बड़ी दुकानें लगती हैं। गांव की

आर्थिक स्थिति को ठीक करने में यह हाट आज बड़ी भूमिका निभा रहा है। इसी तरह सिमडेगा और रांची में महिलाओं का ग्राम समूह नशाबंदी को लेकर सक्रिय है। गि‌िरडीह के भी कई गांवों में महिलाएं शौचालय एवं स्वच्छता को अपना नारा बना चुकी हैं। फुलवारी ग्राम संगठन की अध्यक्ष संक्रांति धम्याल बताती हैं, ‘एकता में बहुत बल है, इसीलिए ग्राम विकास के लिए महिलाओं को संगठन से जोड़ना जरूरी है। फुलवारी में सड़क का निर्माण तो महिला संगठनों के तहत किए जा रहे सामाजिक कार्यों का एक उदाहरण भर है ।’ एक ही राज्य के अलग अलग जिलों की ये महिलाएं अलग अलग मकसद से काम कर रही हैं। कुछ के लिए

है, जिसे उसके मालिक और अन्य किसानों ने बेकार जमीन की संज्ञा दी थी। हम अपने बचत बैंक खाते में भी पिछले दो साल से 30,000 से 40,000 रुपए तक की बचत कर रहे हैं। वहीं नजमा ने कहा कि हमारे बच्चे अब अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और हमारी सफलता को देख कर हमारे पति भी अब हमारी मदद करते हैं। स्थानीय पत्रकार राहुल यादव ने बताया कि वह उन महिलाओं की इच्छाशक्ति देख कर चकित हैं। उन्होंने बताया कि मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था कि उनकी यह नई पहल एक दिन गांव की बात हो जाएगी और उन्हें इतना सम्मान मिलेगा। इतना ही नहीं अब जब भी किसी किसान को अपने खेतों में मजदूरों की आवश्यकता होती है, तब वह इस समूह की सबसे अधिक मांग करता है। इस समूह की महिलाओं ने अब जमीन का एक टुकड़ा खरीदने की योजना बनाई है, ताकि वे अपनी जमीन की मालकिन बन सकें और उस पर खेती कर सकें। क्योंकि वे अभी तक उसी किसान की जमीन पर खेती कर रही हैं, जिसे उसने इनके पास गिरवी रखी थी। यह एक अनोखा प्रयोग है और इस तरह के स्वयं सहायता समूहों को यूपी के प्रत्येक गांव में शुरू किया जाना चाहिए। इससे कृषि को बढ़ावा मिलने के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गांव की महिलाएं सशक्त होंगी। स्वाधीनता का मतलब है नशा से मुक्ति, तो कुछ के लिए आजादी का अर्थ है, स्वच्छता और शौचालय। आजादी को अपना ब्रांड मानने वाली इन ग्रामीण महिलाओं का मानना है कि हम चलेंगे तभी हमारी बेटियां भी चलेंगी और जब सब साथ चलेंगी तो सब आजाद, बेफिक्र और बेपरवाह चलेंगी। फिर दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी और अगर नहीं होगी तो आदत डलवानी पड़ेगी। सामूहिकता में ताकत देख रही इन महिलाओं के लिए स्वाधीनता का अर्थ ही यही है कि वे हर माह सैकड़ों महिलाओं को अपने समूहों से जोड़ रही हैं और उन्हें अपने और समाज के कल को संवारने का एजेंडा समझा रही हैं।


08 स्वास्थ्य

01-07 मई 2017

2025 तक टीबी-मुक्त भारत! टीबी उन्मूलन

टीबी को लेकर आज वैश्विक स्तर पर प्रयास चल रहे हैं और इसके बेहतर नतीजे भी आ रहे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 के बाद दुनिया भर के ज्यादातर इलाकों में टीबी के मामलों में 20 प्रतिशत की कमी हुई है

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एसएसबी ब्यूरो

बी रोग के लिहाज से 22 देश सर्वाधिक खतरे में हैं। दरअसल ये वे देश हैं जहां टीबी के सर्वाधिक नए मामले सामने आ रहे हैं। इन 22 देशों की सूची में भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया व इंडोनेशिया आदि शामिल हैं। टीबी के नए मरीजों में करीब 3.6 प्रतिशत मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) यानी टीबी की गंभीर अवस्था से ग्रस्त हैं। एमडीआर के 50 प्रतिशत मामले भारत व चीन में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग 20 लाख लोग टीबी की चपेट में आते हैं, जिनमें से लगभग 9 लाख लोग टीबी रोगियों से फैले संक्रमण के कारण इसकी चपेट में आते हैं। इनमें से 3 लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो जाती है। साफ है कि टीबी की चुनौती भारत के लिए बड़ी है। पर अच्छी बात यह है कि सरकार अब इस मुद्दे पर तेजी से काबू पाने की रणनीति अपना रही है। पिछले माह हुई टीबी पर विश्व स्वास्थ्य संगठन और क्षेत्रीय देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में केंद्रीय

स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने साफ किया कि सरकार देश से तपेदिक को खत्म करने के लिए जल्द ही आक्रामक राष्ट्रीय रणनीति को अंतिम रूप दे सकती है। दुनिया में भारत में टीबी के सबसे ज्यादा मामले होने की बात स्वीकार करते हुए नड्डा ने कहा कि उनकी सरकार ने बीमारी को खत्म करने के लिए इसे एक चुनौती की तरह लिया है और 2025 तक टीबी को खत्म करने के लक्ष्य को पाने के लिए कार्रवाई तेज कर दी है। उनके ही शब्दों में, ‘हमारी सरकार ने 2025 तक टीबी को खत्म करने के लक्ष्य पर एक बैठक बुलाई है और इस बाबत कार्रवाई तेज कर दी है। हमारे सामने जो चुनौती है उसके बारे में हमें

जानकारी है। हमारे यहां हर साल टीबी के 28 लाख नए मामले सामने आते हैं और करीब पांच लाख लोगों की मौत होती है।’

एड्स के बाद सबसे जानलेवा बीमारी

दुनिया में हजारों ऐसी बीमारियां हैं जिसका निवारण बेहद जरूरी है, लेकिन एड्स के बाद सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी टीबी ही है। यह ऐसा रोग है जिसका निवारण तो मुमकिन है, बावजूद इसके हर साल लाखों लोगों की जान इसकी वजह से जाती है। बात करें भारत की तो पोलियो जैसी भयावह बीमारी पर तो हमने काबू पा लिया, लेकिन टीबी मुक्त

सरकार ने 2025 तक टीबी को खत्म करने के लक्ष्य पर एक बैठक बुलाई है और इस बाबत कार्रवाई तेज कर दी है। हमारे सामने जो चुनौती है उसके बारे में हमें जानकारी है जेपी नड्डा, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री

एक नजर

टीबी रोग के लिहाज से 22 देशों की स्थिति गंभीर

इन देशों की सूची में भारत के साथ चीन भी शामिल नए मरीजों में करीब 3.6 फीसदी मामले एमडीआर के

भारत बनाने में अब भी हम बहुत पीछे हैं। स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के बाद राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम चलाना पड़ रहा है। दुर्भाग्य से टीकाकरण और उपचार का लाभ सभी नहीं ले पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह कहीं न कहीं लोगों में जागरुकता का अभाव है।

वैश्विक महामारी

यह भी नहीं है कि भारत अकेले इस बीमारी से मुक्ति


01-07 मई 2017

बोवाइन टीबी की चुनौती

स्वास्थ्य

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मनुष्यों में टीबी के 10 प्रतिशत तक मामलों का कारण मवेशियों में होने वाला टीबी (बोवाइन टीबी) हो सकता है

द लांसेट’ के एक अध्ययन के अनुसार, जूनोटिक टीबी (जानवरों से मनुष्यों को होने वाली टीबी) की मार को हल्के में लिया जाता रहा है। रिपोर्ट में जूनोटिक टीबी के विशेष अध्ययन की जरूरत पर जोर दिया गया है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां टीबी का प्रभाव अधिक है और लोग संक्रमित पशुओं के आस-पास रहते हैं अथवा बिना प्रोसेसिंग के दुग्ध उत्पादों का सेवन करते हैं। वर्ष 2012 में इंटरनेशनल लाइव स्टॉक रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अनुमान लगाया था कि मनुष्यों में टीबी के 10 प्रतिशत तक मामलों के लिए मवेशियों में टीबी (बोवाइन टीबी) वजह हो सकती है। ये अध्ययन भारत के लिए बड़ी चेतावनी हैं, क्योंकि दुनिया के कुल पशुधन का 52 प्रतिशत यहां है और मवेशी भारत के ग्रामीण जनजीवन का अभिन्न अंग हैं। पशुओं से मनुष्यों में होने वाले टीबी संक्रमण के अध्ययन की बात तो भूल ही जाइए, यहां ऐसे मामलों को दर्ज करने के लिए भी कोई राष्ट्रीय एजेंसी नहीं है, जबकि इस विषय में हुए अनुसंधान भयावह तस्वीर पेश करते हैं।

वर्ष 2010 में वेटरनरी वर्ल्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की डेयरियों में पशुओं से फैलने वाली टीबी काफी अधिक देखी गई। पालमपुर के डॉ. जीसी नेगी कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेस के शोधकर्ताओं ने छह डेयरियों की 440 गायों की जांच में पाया कि उनमें से 63, यानी 14.3 प्रतिशत टीबी से पीड़ित हैं। एक फार्म में तो 34 प्रतिशत गायों को टीबी थी। हालांकि इस अध्ययन में पशुओं में टीबी के कारक जीवाणु को चिन्हित नहीं किया गया, लेकिन वर्ष 2013 में एक अन्य शोध के अनुसार एमट्यूबरक्लोसिस जीवाणु पशुओं में भी टीबी (बोवाइन टीबी) का कारण बन सकता है। शोधकर्ताओं ने उत्तर भारत की एक डेयरी में टीबी के संदेह वाले 30 पशुओं के फेफड़ों के टिशू सैंपल की जांच में पाया कि उनमें से आठ पशु एम- ट्यूबरक्लोसिस से संक्रमित थे। इससे संभावना दिखती है कि पशुओं में इस जीवाणु के पनपने के बाद यह दूसरे पशुओं और फिर मनुष्यों में फैल गया होगा। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि मनुष्यों और

पशुओं वाले टीबी के रोगाणुओं का मिला-जुला संक्रमण मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं में भी हो सकता है। वर्ष 2005 में प्रकाशित एक शोध में आठ प्रतिशत मानव नमूने और 35 प्रतिशत पशुओं के नमूनों में दोनों तरह का संक्रमण पाया गया था। इससे मनुष्यों में पशुओं और पशुओं से मनुष्यों में टीबी संक्रमण के खतरे का पता चलता है। साफ

पाने के लिए जूझ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो 1993 में टीबी को वैश्विक महामारी ही घोषित कर दिया। दिलचस्प है कि इसके बाद ही भारत में भी राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम का नाम बदलकर राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम कर किया गया था। इससे पहले भारत सरकार ने टीबी पर नियंत्रण पाने के लिए 1962 में राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया था। टीबी ग्रस्त नए मरीजों में करीब 3.6 प्रतिशत मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) यानी टीबी की गंभीर अवस्था से ग्रस्त हैं, लेकिन एमडीआर के 50 प्रतिशत मामले भारत व चीन में हैं।

बीमारी से आर्थिक नुकसान

भारत सरकार द्वारा जारी टीबी इंडिया 2012 की वार्षिक स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार 2009 के आंकड़े दिखाते हैं कि तकरीबन 40 प्रतिशत भारतीय टीबी से संक्रमित हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि टीबी की बीमारी से मरने वाले 95 फीसद लोग विकासशील देशों से ही हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर तीन मिनट में दो लोग टीबी से दम तोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, टीबी से देश का आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है। भारत में प्रतिवर्ष इसके कारण 12,000 करोड़ रुपए का घाटा होता है।

वैश्विक स्तर पर प्रयास

टीबी को लेकर आज वैश्विक स्तर पर प्रयास चल रहे हैं और इसके बेहतर नतीजे भी आ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 के बाद दुनिया भर के ज्यादातर इलाकों में टीबी के मामलों में 20 प्रतिशत की कमी हुई है। हालांकि इसी दौरान अफ्रीका में टीबी के मरीजों की संख्या में तिगुनी बढ़ोत्तरी हुई है।

टीबी से देश का आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है। भारत में प्रतिवर्ष इसके कारण 12,000 करोड़ रुपए का घाटा होता है उल्लेखनीय है कि टीबी वायु द्वारा एक से दूसरे व्यक्ति में फैलती है और किसी को भी हो सकती है। इसके जीवाणु का नाम माइक्रो-बैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस है, जिसकी खोज वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने 24 मार्च, 1882 को थी। शुरू में इसे लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां थीं, क्योंकि इसे लाइलाज एवं जानलेवा बीमारी ही नहीं, बल्कि अभिशाप तक समझा जाता था, लेकिन आज इसका पक्का

इलाज उपलब्ध है। बचाव के लिए बीसीजी का टीका तो है ही, टीबी नियंत्रण पाने के लिए देश भर में डॉट्स नामक एक विशेष कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। इस बारे में जो एक और तथ्य दिलचस्प है, वह यह कि टीबी का इलाज लंबा है और सरकारी सहायता के बिना यह खासा महंगा भी पड़ता है। इसीलिए कई बार रोगी ऊबकर, तो कभी आर्थिक तंगी के कारण इलाज

है कि जीवाणुओं की ऐसी दोतरफा संक्रमण क्षमता टीबी के खात्मे के लिए गंभीर चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार बीमारी दूर होने के बाद भी पशुओं से एम-बोविस या एम-ट्यूबरक्लोसिस जीवाणुओं के जरिए दोबारा टीबी संक्रमण हो सकता है। इस तरह के संक्रमण को लेकर अभी बहुत कम जागरुकता है। छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है। कभी-कभी दवा के दुष्प्रभाव भी उसे इलाज छोड़ने के लिए बाध्य कर देते हैं। एक सबसे बड़ा सच यह भी है कि देश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की बहुत कमी है। बड़ी संख्या में लोग नीम-हकीमों और झोलाछाप डॉक्टरों के सहारे हैं और वह क्षय रोगियों का सही इलाज नहीं कर पाते। इस तरह बड़ी संख्या में टीबी रोगी जानेअनजाने नियमित, पूरा और सही इलाज नहीं करा पाते हैं। टीबी शरीर के किसी भी अंग में हो सकती है, लेकिन आम तौर पर फेफड़ों में ही सबसे अधिक होती है। दो सप्ताह या अधिक समय से खांसी होना इसका मुख्य लक्षण है। साथ में भूख कम लगना, वजन कम होना, बलगम में रक्त आना और शाम के समय बुखार हो सकता है। देश में बढ़ता कुपोषण जहां इसे फलने-फूलने का पूरा मौका देता है, वहीं मधुमेह जैसी बीमारी इसके इलाज में आड़े आती है। बहरहाल, टीबी की चुनौती देश के लिए बड़ी तो है ही।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का लक्ष्य

दुनिया को टीबी से मुक्ति दिलाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ लक्ष्य तय किए हैं। इनमें वर्ष 2035 तक इन मामलों में 2015 के मुकाबले 90 प्रतिशत और इनसे होने वाली मौतों में 95 प्रतिशत कमी लाना सर्वप्रमुख है। भारत ने इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए नए तरीके और नीतियां अपनाई हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद भारत टीबी से छुटकारा पाने के लक्ष्यों से पिछड़ सकता है, क्योंकि इससे जुड़ी नीतियां खासकर मवेशियों से होने वाले टीबी के संक्रमण जैसे अहम कारणों पर लगाम लगाने में कारगर नहीं साबित हो रही हैं।


10 गुड न्‍यूज

01-07 मई 2017

संक्षेप में

‘स्वाइन फ्लू’ को लेकर सचेत

बदलते तापमान के कारण स्वाइन फ्लू का खतरा बढ़ा

हाराष्ट्र सरकार ने ‘स्वाइन फ्लू’ से निपटने के लिए सभी आवश्यक तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। सभी जिला स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिया गया है तैयारी में कोई कोताही नहीं की जाए। राज्य में बदलते तापमान के कारण स्वाइन फ्लू के कीटाणु सक्रिय हो गए हैं। इस रोग का प्रभाव 60 प्रतिशत शहरी और 40 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ दीपक सावंत ने आश्वस्त किया है कि समय से पूर्व ही इस पर काबू पाने की कोशिश शुरू कर दी गई है। विभाग ने इस सम्बन्ध में सभी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। अस्पतालों को सुसज्ज किया जा रहा है। दवाओं की आपूर्ति और जांच की सुविधाओं में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। वेंटिलेटर की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। लोगों को यह सलाह दी जा रही है कि बुखार, सर्दी, खांसी की शिकायत अगर 48 घंटे से अधिक रह जाती है तो वे तुरंत डॉक्टरों से संपर्क स्थापित करें। (भाषा)

दुकानों पर लगेंगी बायोमीट्रिक मशीनें

गो

वा सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मुहैया कराए जाने वाले खाद्यान्न की कालाबाजारी एवं जमाखोरी रोकने के लिए राज्य भर में उचित मूल्य की दुकानों पर बॉयोमीट्रिक मशीनें लगाएगी। नागरिक आपूर्ति विभाग के निदेशक विलास नाइक गौणेकर ने बताया, इस महीने के अंत में या अगले महीने की शुरुआत में राज्य में उचित मूल्य की कुल 450 दुकानों में से 43 दुकानों में प्रायोगिक आधार पर बॉयोमीट्रिक मशीनें लगाई जाएंगी।' उन्होंने कहा कि कानून के तहत सरकार की ओर से मुहैया कराए खाद्यान्न की कालाबाजारी एवं जमाखोरी की हर प्रकार की संभावना रोकने में मदद मिलेगी। गोवा सरकार ने इस परियोजना के लिए हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) के साथ हाथ मिलाया है। गौणेकर ने कहा कि ईसीआईएल मशीनें मुहैया कराएगी, जिन्हें सिम कार्ड के साथ लगाया जाता है और जो जीपीआरएस पर काम करती हैं। उन्होंने कहा, ये मशीनें आधार कार्ड रेकॉर्डों से जुड़ी होंगी और इनकी मदद से विभाग को तत्काल यह डेटा मिल जाएगा कि लाभार्थियों ने कितना खाद्यान्न प्राप्त किया है। अधिकारी के अनुसार सभी दुकानों पर इस वर्ष के अंत तक ये मशीनें लगाना चाहता है। उन्होंने कहा, '1.2 लाख जाली या फर्जी राशन कार्ड रद्द करने के बाद राज्य में इस समय 3.1 लाख राशन कार्ड

ग्रेटर नोएडा सेवा

गरीबों का डॉक्टर

ग्रेटर नोएडा के कासना में प्रत्येक गुरुवार को कैंसर के इलाज के लिए मश्‍ाहूर डॉक्टर अंशमु न कुमार गरीबों का फ्री इलाज करते हैं

संक्षेप में

मुंबई में है पर्याप्त पानी

मुंबई के लिए राहत की खबर है कि गर्मी के मौसम में उन्हें पानी की कोई दिक्कत नहीं होगी

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प्र

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में डॉक्टरों को सलाह दी है कि वे गरीबों को सस्ती जेनेरिक दवाएं लिखें। कई डॉक्टर ऐसे हैं जो यह काम काफी अरसे से कर रहे हैं। मशहूर कैंसर सर्जन डॉ. अंशुमन कुमार हर गुरुवार को ग्रेटर नोएडा के कासना में जमीन पर दरी बिछाकर गरीबों का फ्री इलाज कर रहे हैं और उन्हें सस्ती जेनेरिक दवाएं भी लिखते भी हैं। इतना ही नहीं डॉ अंशुमन उन्हें दवाएं भी मुफ्त में देते हैं। डॉ. अंशुमन दिल्ली स्थित धर्मशिला कैंसर अस्पताल के डायरेक्टर और चीफ कैंसर सर्जन हैं।

जब गरीब मजदूर पहली बार पहुंचा

मकानों में टाइल्स और पत्थर लगाने वाले शिवपाल के पैरों से खून का बहना कम हो गया और पैर उठाने में तकलीफ होने लगी। एक तरफ दिहाड़ी छूटने की चिंता और दूसरी तरफ इलाज का खर्च। शिवपाल को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। डॉक्टर की फीस देते तो खाते क्या ? तभी किसी ने शिवपाल को बताया कि इलाके में एक बड़े डॉक्टर हफ्ते में एक बार आते हैं और फ्री इलाज करते हैं। शिवपाल डॉक्टर के पास पहुंच गया। डॉक्टर ने उसे देखा और कहा कि स्मोकिंग के कारण उसके पैरों में खून का प्रवाह कम हो गया है। धूम्रपान बंद करने की सलाह देने के साथ डॉक्टर ने दवाई दी और कहा अगर लापरवाही करते तो पैर काटने तक की नौबत आ जाती है। शिवपाल की आंखें भर आई तब डॉक्टर ने दिलासा दिया कि वह दवा से ठीक हो जाएगा। डॉ. अंशुमन का ग्रेटर नोएडा के कासना स्थित सिविल सर्विसेज कॉलोनी में फार्महाउस है। एक बार इलाके के गार्ड दिलीप ने उन्हें बताया कि यहां आसपास काम करने वाले मजदूर, गार्ड व गरीब तबके के अन्य लोग बीमार होने पर इलाज

नहीं करवा पाते हैं, क्योंकि उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। इसके बाद हर गुरुवार को डॉ. अंशुमन वहां शाम 5 बजे से गरीबों का मुफ्त इलाज करते हैं।

हर गुरुवार शाम फ्री क्लीनिक

ऐसा ही मरीज था ब्रजेश, जिसका उन्होंने इलाज किया और वह ठीक हो गया। अंशुमन कुमार ने बताया कि इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि वाकई ऐसे मजदूर और गार्ड या फिर घर में काम करने वाले दिहाड़ी लेबर को अगर कोई बड़ी या छोटी तकलीफ हो तो वह अस्पताल के चक्कर काटेगा तो फिर दिहाड़ी कहां से कमाएगा और फिर खान-पान का खर्चा कैसे चलेगा? साथ ही इलाज के पैसे कहां से लाएगा? ऐसे लोगों को वाकई देखने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि यह सही है कि इनके इलाज के लिए उनकी बड़ी-बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं थी, लेकिन वह किसी और का इंतजार क्यों करें? उन्होंने खुद अपने अस्पताल और क्लीनिक से समय निकालकर गुरुवार शाम इन गरीब मरीजों को देने का फैसला किया। उन्होंने इन गरीबों का फ्री में इलाज करने की ठानी। डॉ. अंशुमन ने गुरुवार शाम अपनी क्‍लीनिक बंद करने का फैसला किया और तय किया कि ग्रेटर नोएडा के कासना स्थित सिविल सर्विसेज सोसायटी इलाके में शाम को मजदूर और जरूरतमंदों का इलाज करेंगे। यहां न तो किसी को अपॉइंटमेंट की जरूरत है और न ही फीस देने की। उन्होंने बताया कि वह यहां जमीन पर दरी बिछाते हैं और लोगों का शाम 5 बजे से लेकर जब तक अंधेरा न हो, इलाज करते हैं। इस दौरान वह सस्ती जेनेरिक दवा लिखते हैं और उन्हें फ्री में दवा भी देते हैं। (भाषा)

यह राहत गर्मी में भी उन्हें पानी की कोई दिक्कत न ह ीं होगी। यह जानकारी मुंबई महानगरपालिका के जल विभाग ने दी। विभाग ने कहा है कि अभी चार महीने तक के लिए पर्याप्त पानी झीलों और नदियों में मौजूद है। उत्तर भारत की तरह इस बार भीषण गर्मी का सामना कर रही मुंबई के लोगों के मन में यह डर बैठ गया है कि कहीं पानी की किल्लत न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो स्थिति को बिगड़ने से रोका नहीं जा सकेगा। मानसून के आने में अभी काफी देर है। बरसात का पानी ही झीलों-नदियों में जमा होकर मुंबई की प्यास बुझाता है। इन्हीं जलाशयों पर शहर को साल भर निर्भर रहना पड़ता है। मुंबई को खासकर मोडक सागर, तानसा, विहार, तुलसी, भातसा और मध्य वैतरणा सहित अन्य तालाबों से पानी की आपूर्ति की जाती है। प्रतिदिन लगभग 3750 हजार लीटर पानी मुंबई को चाहिए होता है, लेकिन इस बार की गर्मी से यह आशंका बन गई कि पानी के हो रहे वाष्पीकरण से झीलों के सूखने का ख़तरा पैदा हो जाएगा। लोगों को टैंकर पर निर्भर होना पड़ेगा। लेकिन जल विभाग ने यह कहकर चिंता दूर कर दी की मुंबईवासी पानी को लेकर चिंतित न हों। अभी चार महीने तक पानी का कोई संकट नहीं होने वाला है। तब तक मानसून भी आ जाएगा। जल विभाग के अभियंताओं का कहना है कि पिछले साल हुई अच्छी बरसात के कारण सभी झीलें भर गईं थीं। पानी जरूरत से ज्य़ादा जमा हो गया था। दूसरी बात, पानी की कमी की आशंका को देखते हुए इसकी आपूर्ति को भी संयमित किया गया है। साथ ही पानी की बर्बादी को भी रोका गया। इसीलिए अभी भी 4 लाख 95 हजार किलो लीटर पानी सुरक्षित है, जो 132 दिनों तक चलेगा। (भाषा)


01-07 मई 2017

सरकार योजना

संक्षेप में

बेटियों के लिए ‘भाग्यलक्ष्मी’ योजना

योगी सरकार की इस योजना के तहत बेटियों को जन्म देने वाली प्रसूताओं को भी 5,100 रुपए तत्काल मिलेंगे

त्तर प्रदेश में नई आई योगी आदित्यनाथ की सरकार अब बेटियों के लिए एक बड़ी सौगात लेकर आई है। सरकार की तरफ से अब बेटियों के जन्म पर 50 हजार का बांड दिया जाएगा। राज्य सरकार की ओर से यह योजना गरीब परिवारों के लिए 'भाग्यलक्ष्मी' के नाम से शुरू हो रही है। इस योजना के तहत बेटियों को जन्म देने वाली प्रसूताओं को भी 5,100 रुपए तत्काल मिलेंगे। वहीं बेटियां जैसे-जैसे बड़ी होंगी बांड से रकम जारी होना शुरू हो जाएगी। इसमें पहली किश्त, कक्षा 6 में जाने पर तीन हजार रुपए के रूप में मिलेगी। कक्षा 8 में 5 हजार रुपए, कक्षा 10 में 7 हजार, इंटर में 8 हजार रुपए सरकार देगी। वहीं बेटी की आयु 21 वर्ष होने पर अभिभावक को दो लाख रुपए मिलेंगे। योगी सरकार योजना को लेकर कई विकल्पों पर भी विचार कर रही है। इस

योजना के तहत बीपीएल परिवारों को तथा 2 लाख सालाना आय वाले परिवारों को भी शामिल करने की तैयारी की जा रही है। सरकार जल्द ही योजना को कैबिनेट में लाने जा रही है। इससे बालिकाओं के कल्याण के लिए गरीबों को खासी मदद मिल सकेगी। (भाषा)

वसई बीच को साफ करती है विदेशी महिला मुंबई के वसई बीच पर कूड़े का का अंबार देख हंगरी की महिला ने उसे साफ करने का फैसला किया

सई में रहने वाली हंगरी की एक सुसैना महिला ने वसई बीच को सुंदर और स्वच्छ बनाने की चुनौती ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन समुद्र किनारे की गंदगी मुंबई के लिए आम है। यही बात हंगरी की सुसैना को पसंद नहीं। चार हफ्ते पहले जब सुसैना ने वसई के पास रनगांव बीच की खराब हालत और बच्चों को कूड़े में खेलते देखा तो उन्होंने हर रविवार वहां से कूड़ा साफ करने की ठानी। इस काम में उनके पति लिसबन, तीन साल का बेटा और 19 महीने की बेटी भी उनकी मदद करते हैं। सुसैना के पति भारतीय मूल के हैं। सुसैना कहती हैं, 'हम हफ्ते में एक बार कूड़ा उठाते हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरे लोग भी इस काम को करने के लिए आगे आएंगे।' उनके पति लिसबन कहते हैं कि बच्चों को रेत या मिट्टी जैसी प्राकृतिक चीजों से खेलना चाहिए, न कि शराब की बोतलों से। सुसैना को बीच पसंद हैं और वह वहां बच्चों के साथ खेलना चाहती हैं,

लेकिन, उन्हें वहां चप्पलें, शराब की बोतलें, ‌िसरिंज और अन्य तरह का कूड़ा दिखा।' तब से हर रविवार को यह परिवार बीच से दो बोरी कूड़ा इकट्ठा करता है और निगम के डस्टबीन में डाल देता है। सुसैना पिछले 4 वर्षों से वसई में रह रही हैं। उनका कहना है, 'मेरे देश में बीच नहीं हैं, लेकिन नदियां और झीलें हैं, जो आमतौर पर साफ रहती हैं। मैं भारत को अपना ही देश मानती हूं और यह भी मानती हूं कि हम सबको इसे स्वच्छ रखने की कोशिश करनी चाहिए।' लिसबन ने भी सुसैना की सोच से इत्तफाक रखते हुए कहा कि वह भी स्वच्छ भारत अभियान में विश्वास रखते हैं और उसे लागू करने की कोशिश करते हैं। (भाषा)

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गुड न्‍यूज

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अब आप खरीद सकते हैं किराये का घर

निजी जमीन पर मिलेगी 1.5 लाख की सब्सिडी

द्र सरकार जल्द ही एक ऐसी हाउस रेंटल पॉलिसी लांच करने पर विचार कर रही है, जिसके तहत शहरों में आने वाले प्रवासी लोगों को सरकारी संस्थाओं से मकान किराये पर लेने की सुविधा होगी। यही नहीं भविष्य में उनके पास इस किराये के मकान को ही आसान किस्तों में पूरी कीमत चुकाकर खरीदने का विकल्प भी होगा। हाउसिंग मिनिस्ट्री के मुताबिक इस स्कीम का नाम 'रेंट टु ओन' होगा, जिसे केंद्र सरकार की नेशनल अर्बन रेंटल हाउसिंग पॉलिसी के तहत लांच किया जाएगा। केंद्रीय शहरी विकास एंव आवास मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा कि इस ऐक्ट को मंजूरी के लिए जल्दी ही कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाएगा। इसके अलावा सरकार निजी जमीन पर बने मकानों को खरीदने पर भी गरीब तबके के लोगों को 1.5 लाख रुपए की सब्सिडी देने पर विचार कर रही है। अब तक यह छूट राज्य सरकारों एवं निकायों की जमीन पर बने आवासों पर ही दी जाती थी। वेंकैया नायडू ने कहा कि प्राइवेट डिवेलपर्स की ओर से लांच किए गए अर्फीडेबल हाउसिंग प्रॉजेक्ट्स के उद्घाटन के बाद से ही मंत्रालय इस पर विचार कर रहा था। उन्होंने कहा कि अब तक हम 2008 शहरों और कस्बों में 17.73 लाख शहरी गरीबों के लिए आवासों को मंजूरी दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि 2022 तक सबको घर के वायदे को पूरा करने का लक्ष्य है। 2019 तक 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा, इनमें केरल, हिमाचल, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य शामिल हैं। इसके बाद 2022 तक अन्य राज्यों में इस टार्गेट को पूरा किया जाएगा। मंत्री ने कहा कि 'रेंट टु ओन' ऐक्ट की अधिसूचना जारी किए जाने के बाद राज्य इस पर काम कर सकेंगे। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 2022 तक सभी को आवास मुहैया कराने के सरकार के लक्ष्य के तहत यह बड़ी स्कीम होगी। इस स्कीम के तहत शहरों में पलायन कर आने वाली बड़ी आबादी के लिए उचित आवास की व्यवस्था करने का लक्ष्य रखा गया है। देश की गरीब जनता के हित मे यह सरकार के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इससे निश्चित रूप से गरीब जनता को अपने आशियाने का सपना पूरा होगा, जो उनके लिए अब तक मुंगंरी

लाल के सपने की तरह था।

ऐसे मिलेगा लाभ

इस स्कीम के तहत शुरुआत में कुछ निश्चित वर्षों के लिए घर लीज पर दिया जाएगा। खरीददार को प्रति माह ईएमआई के बराबर किराया बैंक में जमा करना होगा, इसमें कुछ किराये के तौर पर होगा और बाकी जमा होगा। खरीददार की ओर से जमा की गई ईएमआई की राशि जब 10 फीसदी के स्तर पर पहुंच जाएगी तब मकान उसके नाम पर रजिस्टर हो जाएगा। यदि लीज पर लेने वाला व्यक्ति रकम जमा नहीं कर पाता है तो सरकार इस मकान को दोबारा बेच देगी।

इसके अलावा किराये के साथ जमा की जाने वाली राशि किरायेदार को बिना ब्याज के वापस लौटा दी जाएगी।

नए रेंट कंट्रोल ऐक्ट से दूर होगा मकान मालिकों का डर

देश में मकानों की कमी दूर करने के लिए केंद्र सरकार जल्द ही रेंटल हाउसिंग पॉलिसी लाने जा रही है। इसके तहत अपना मकान किराए पर देने वाले मकान मालिकों को सरकार लाभ देगी। उसमें यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किरायेदार उसके मकान पर कब्जा न कर सकें। अभी जो रेंट कंट्रोल एक्ट है, वह किरायेदारों के पक्ष में है। इसी वजह से मकान मालिक अपना घर किराए पर देने से कतराते हैं। सरकार चाहती है कि जिन लोगों ने मकान खरीदे हैं, अगर वे खुद उसमें नहीं रहते तो उसे वे किराए पर दे दें, ताकि उनका सदुपयोग तो हो सके। अगर ऐसा होता है तो कई शहरों में तो मकानों की समस्या ही खत्म हो जाएगी। सरकार ऐसा मॉडल एग्रीमेंट तैयार करेगी, जो मकान मालिक और किराएदार आपसी सहमति से करेंगे। इसमें किराए की राशि और अवधि तय की जाएगी। इससे सुनिश्चित किया जाएगा कि मकान मालिक का मकान सुरक्षित रहे। (भाषा)


12 साइंस एंड टेक्नोलॉजी

01-07 मई 2017

संक्षेप में

संक्षेप में

पुरातत्व खोज

राजवंश के मकबरे में मिलीं कई ममी

अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए प्रस्ताव आमंत्रित

इसरो ने शुक्र अभियान शुरू करने के लिए अंतरिक्ष आधारित प्रयोगों के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं

मिश्र के लक्सॉर शहर में पुरातत्वविदों ने 3500 साल पुराने एक मकबरे की खोज की है

जमीन पर भी मार करने की क्षमता

भा

रत शुक्र ग्रह पर अपने पहले मिशन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने शुक्र ग्रह के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष आधारित प्रयोगों के लिए प्रस्ताव आमंत्रित करने की घोषणा की है। इसरो ने कहा कि अवसर की घोषणा (अनाउंसमेंट ऑफ ऑपर्च्यूनिटी) देश में संस्थाओं की ओर से अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए है और प्रस्ताव प्राप्त करने की आखिरी तारीख 19 मई 2017 है। अपनी वेबसाइट पर की गई एक घोषणा में इसरो ने कहा कि प्रस्ताव भेजने वाले वर्तमान में ग्रहों के अध्ययन से जुड़े काम में शामिल या अंतरिक्ष के लिए वैज्ञानिक उपकरणों के विकास या प्रयोगों के विकास के इच्छुक हो सकते हैं। बहरहाल, इसरो ने इस महत्वाकांक्षी मिशन के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है, लेकिन ऐसे संकेत हैं कि भारत का शुक्र मिशन 2020 से पहले शुरू नहीं हो सकेगा। शुक्र के लिए भारत का पहला मिशन सामान्य ऑर्बिटर मिशन की तरह होने की संभावना है। इसरो के अध्यक्ष ए एस किरण कुमार ने पहले कहा था कि शुक्र ग्रह के लिए मिशन पर विचार चल रहा है और इस बाबत अध्ययन भी जारी है। उन्होंने कहा था कि इसके अलावा, मंगल पर दूसरे मिशन और शुक्र मिशन पर विचार किया जा रहा है, हमें कई अध्ययन करने होंगे और फिर योजना तैयार कर इसे मंजूर कराना होगा और तब आगे बढ़ना होगा। अभी ये सारी चीजें अध्ययन के चरण में हैं। आकार, द्रव्यमान, घनत्व, संरचना और गुरुत्व में समानता के कारण शुक्र ग्रह को अक्सर पृथ्वी की ‘जुड़वां बहन’ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि दोनों ग्रहों का उदय एक ही समय में हुआ। 1960 के दशक के शुरुआती सालों में शुक्र ग्रह के अन्वेषण का जिक्र करते हुए इसरो ने कहा कि पहले कुछ मिशनों में इसकी जांचपरख की जा चुकी है। (भाषा)

पु

रातत्वविदों ने मिस्र के लक्सॉर शहर में के चलते प्राचीन मिस्र के मकबरों में रखे जाने वालों 3500 साल पुराने एक मकबरे को खोज शवों की रक्षा के लिए उनके साथ इंसानी आकार निकाला है जिसमें कई ममी, लकड़ी के की इन छोटी मूर्तियों को रखा जाता था। मकबरे के रंगीन ताबूत और कई मूर्तियां मिली हैं। इसे एक अंदर आर्किलॉजिस्ट मास्क और दस्ताने पहने हुए महत्वपूर्ण खोज बताया जा रहा है। शुरुआत में ताबूतों की जांच कर रहे थे। इन ताबूतों पर लाल, अधिकारियों ने बताया कि उन्हें 6 ममी मिली हैं, बाद नीले, काले, हरे और पीले रंगों में जटिल पेंटिंग्स में उन्होंने दो और ममी की पहचान की। बनी हुई थीं और उस पर मरने वाले का चेहरा बना इस आर्किलॉजिस्ट मिशन के प्रमुख मुस्तफा हुआ था। इन ताबूतों को काफी अच्छी तरह से रखा वजीरी ने एजेंसी को बताया, 'दस ताबूत और 8 ममी गया था, हालांकि बीते कुछ सालों में इनमें से कुछ हैं। खुदाई का काम जारी है।' मिश्र सरकार ने बयान टूट गए थे। विशेषज्ञ लिनन (कपड़े का एक प्रकार) जारी कर कहा कि वैली से लिपटे एक ताबूत की ऑफ द किंग्स (मिस्र की ताबूतों पर लाल, नीले, काले, भी जांच कर रहे थे। इनके एक घाटी) के नजदीक अलावा मकबरे में सफेद, हरे और पीले रं ग ों में जटिल द्रा अबुल नगा कब्रिस्तान नारंगी, हरे रंगों में बने पेंटिंग्स बनी हुई थीं में 18वें राजवंश का अलग-अलग आकार के मकबरा खोज लिया मटके भी मिले। गया है। बयान में बताया गया है कि यह मकबरा मंत्रालय के बयान में कहा गया, 'इस मकबरे उसेरहत नाम के एक रईस व्यक्ति का है, जो शहर का आकार (अंग्रेजी के) टी-शेप की तरह है, जिसमें के न्यायाधीश का काम करता था। एक आयताकार खुला दरबार, गलियारा और भीतर वजीरी ने 3000 साल पहले 21वें राजवंश के एक चैंबर भी है।' इसके अलावा नौ मीटर का एक दौरान की ममी को भी खोजने की बात की। प्राचीन शाफ्ट भी है, जिसमें उशाब्ती मूर्तियां रखी हुई हैं। चीजों की खोज के मंत्रालय के मंत्री खालेद एल- इसके अलावा लकड़ी से बने नकाब और ताबूत के एनानी ने बताया, 'यह एक सरप्राइज है कि अंदर आकार का ढक्कन भी मिला है। मकबरे के अंदर कितना दिखाई दे रहा है।' उन्होंने कहा, 'हमें बड़ी एक कमरा और मिला है, हालांकि इसे पूरी तरह संख्या में उशाब्ती (इंसानी आकार की छोटी मूर्तियां) खोदा नहीं गया है। मंत्रालय की एक प्रवक्ता ने कहा, मिलीं हैं, जो एक हजार से ज्यादा।' उन्होंने कहा, 'ऐसे सबूत और निशान मिले हैं, जिनसे भविष्य में 'यह एक महत्वपूर्ण खोज है।' नई ममी मिलने की उम्मीद है।' (भाषा) दरअसल 'मौत के बाद की जिंदगी' की मान्यता

भा

रतीय नौसेना ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। यह मिसाइल पानी के साथ ही साथ जमीन पर भी मार करने में सक्षम है। नौसेना के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि इस मिसाइल के परीक्षण का वांछित परिणाम मिला है। उन्होंने कहा कि मिसाइल का परीक्षण बंगाल की खाड़ी में किया गया और इसके परिणाम बहुत सफल रहे। आने वाले समय में यह मिसाइल भारतीय नौ सेना के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। बता दें कि इसके पहले ब्रह्मोस भी भारत ने 300 किलोग्राम के आयुध ले जाने में सक्षम ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। रक्षा अनुसंधान के अधिकारियों ने बताया था कि इस मिसाइल का परीक्षण चांदीपुर में एकीकृत परीक्षण रेंज से एक मोबाइल लांचर से किया गया। इस परियोजना से जुड़े डीआरडीओ के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि यह उत्कृष्ट परीक्षण है और यह भारतीय नौसेना के लिए एक बड़ी सफलता भी है। (भाषा)


मिसाल

01-07 मई 2017

महाराष्ट्र पहल

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संसार को संवारते लोग

अपने आसपास की दुनिया को बेहतर बनाने की हसरत तो सब में होती है, पर कुछ ही ऐसे होते हैं जो इसके लिए शुरुआत ख्‍ााद अपने बूते करते हुए सेवा की बड़ी लीक खींच पाते हैं, मिलिए ऐसे ही कुछ लोगों से

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आनंद भारती /मुंबई

वन को संवारने की चिंता आज जिस तरह लोगों के मन में घर कर रही है, वैसी स्थिति पहले कभी नहीं दिखती थी। हर कोई सुरक्षित होना चाहता है, अपने नजरिए को बदलना चाहता है, समय के साथ कदम मिलाना चाहता है और अपने सपनों को जमीन पर उतरते देखना चाहता है। जिसे इस रण में शामिल होने की सुविधा नहीं है या जो कुछ लोग इससे अनजान हैं या फिर जो लाचारी के शिकार हैं, उनके लिए भी कुछ लोग आज दरवाजे खोलकर खड़े हैं। ये वे लोग हैं जो समाज को जोड़ने चले हैं, अपना कुछ देने चले हैं। जो यह मानते हैं कि आज अगर वे मुस्करा रहे हैं तो यह इसी समाज की बदौलत। इसीलिए उन पर एक महती जिम्मेदारी है कि वे भी समाज को कुछ लौटाएं। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है, लेकिन उनमें अधिकतर लोग अपने मौन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि उन्हें कोई देखे और तारीफ करे, सम्मान दे। वे बस अपनी तरह के लोगों की एक श्रृंखला बनाना चाहते हैं। वे जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ना चाहते हैं। वे एक ऐसा समाज देखना चाहते हैं, जो विचारवान और सुसभ्य हों। दलित हो या घुमंतू वर्ग, उन्हें भी वह सब अधिकार और सम्मान प्राप्त हों जो प्रभु-वर्ग को हासिल है। उनके बच्चे भी समर्थ हों।

प्रो. इंगले की अक्षरशाला

पुणे से सटे पिंपरी-चिंचवाड के प्रो. दत्तात्रेय इंगले गुलबर्गा (कर्नाटक) जिले के बेरड समाज के बच्चों में जान फूंक रहे हैं। इन बच्चों के परिवारों को गांव में कोई काम नहीं था। वे भूख की समस्या से ग्रस्त थे। अकाल ने उन्हें चिंतित कर रखा था। वे काम की तलाश में इधर-उधर भटकते हुए पिंपरी-

चिंचवाड आ गए। सड़क किनारे कनात-तम्बू ताना और दिन गुजारने लगे। मां-बाप तो दिन भर मेहनत कर रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे थे, लेकिन बच्चों को पालने और सुरक्षित जिंदगी देने का कुछ भी उपाय नहीं था। प्रो इंगले वहां ‘जीवन विद्या परिवर्तन ट्रस्ट’ के माध्यम से शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए ‘अक्षरशाला’ चलाते हैं। अक्षरशाला में बड़ी संख्या में गरीब बच्चे शिक्षित हो रहे हैं। उन्होंने गुलबर्गा से पलायन कर आए उन वंचित बच्चों को यूं ही भटकते देखा। उन्हें लगा कि अगर इन्हें रास्ता नहीं दिखाया गया तो ये आवारा जीवन जीने के लिए विवश हो जाएंगे। प्रो. इंगले ने तय किया कि वे इन बच्चों को अक्षरशाला में भर्ती कर अक्षर ज्ञान के साथ-साथ जीवन का भी ज्ञान देंगे। ये बच्चे या परिवार आज यहां तो कल कहीं और होंगे। बच्चे अगर साक्षर हो जाते हैं तो उनमें और कुछ सीखने की ललक पैदा होगी। प्रो. इंगले की कोशिशों का परिणाम है कि आज काफी बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें प्रेरित करना पड़ा, समझाना पड़ा। शुरू में काफी कठिनाई हुई, लेकिन उन्हें इस बात का अहसास कराया गया कि बच्चे पढ़-लिख लेंगे तो अच्छी नौकरी भी हासिल हो सकती है। वे मान गए। उन्हें सड़क किनारे बसी झुग्गियों से निकालकर अपने स्कूल लाने में कामयाबी मिली। उसके आशादायक परिणाम भी मिल रहे हैं। सभी 18 बच्चों को स्लेट-पेंसिल, कॉपी-किताब, ड्राइंग बुक उपलब्ध कराई गई। वे हर रोज शाम 5 बजे से 7 बजे तक अक्षरशाला में आते हैं। उन्हें अंग्रेजी और मराठी का ज्ञान दिया जा रहा है। बच्चे चूंकि कन्नड़ भाषी हैं,

इसलिए उनके लिए विशेष व्यवस्था की गई। उन्हें कन्नड़ का भी अक्षर ज्ञान कराया जा रहा है। इस काम में प्रो. इंगले काे उनकी पत्नी सारिका इंगले के साथ-साथ कुछ और लोगों का भी सहयोग मिल रहा है उन्हें खेल के साथ-साथ ड्राइंग भी सिखाई जाती है। प्रो. इंगले का कहना है कि इस देश में सबको शिक्षा का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन आज भी लाखों बच्चे इस अधिकार और सुविधा से दूर हैं। हम सब हर काम के लिए सरकार पर आश्रित हैं। हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है, इस पर सोचने के लिए हम तैयार नहीं हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि इससे उन्हें क्या फायदा मिलेगा? यह दृष्टि समाज की उपेक्षा का एक गंभीर और चिंताजनक उदाहरण है। इन बेसहारा और वंचित बच्चों को शिक्षित करने के किए सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा, तभी सबको शिक्षित करने का लक्ष्य हम हासिल कर पाएंगे।

कुपोषण से मुक्ति का जुनून

मुंबई से सटा आदिवासी इलाका है पालघर, जहां के कई गांव पिछले कुछ सालों से कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं। सरकारी स्तर पर चाहे जो हो रहा हो, विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अपनी ओर से लगातार यह प्रयास किया है कि कुपोषण से बच्चों की मृत्यु को रोका जाए। इस दिशा में लायंस क्लब ऑफ इंटरनेशनल ने पिछले कुछ वर्षों से प्रयास किया है कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। इससे ग्रामीणों की बेरोजगारी और भूख की समस्या तो , खत्म होगी ही, जीवन-स्तर भी ठीक होगा। पिछले दिनों क्लब ने तय किया है कि जह्वार तालुका में एक लाख खजूर के पेड़ लगाए जाएंगे। एक हजार पेड़ लगा भी दिए गए। हालांकि कुपोषण का मुद्दा राज्य का विषय है, लेकिन लायंस क्लब इसे सामाजिक मुद्दा मानते हुए कुपोषित बच्चों के लिए दवाई आदि का इंतजाम कर रहा है। दूसरी तरफ ‘भारत विकास परिषद्’ ने भी इस क्षेत्र को अपने हाथ में लिया है। वह अस्पतालों में दवाइयां उपलब्ध कराने, डॉक्टरों की उपस्थिति तय करने, बच्चों को आहार की सुविधा देने के साथ-साथ

प्रो इंगले ‘जीवन विद्या परिवर्तन ट्रस्ट’ के माध्यम से शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए ‘अक्षरशाला’ चलाते हैं। बड़ी संख्या में गरीब बच्चे यहां आकर शिक्षित हो रहे हैं

एक नजर

प्रो. इंगले शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए ‘अक्षरशाला’ चलाते हैं आदिवासियों के बीच कुपोषण पर काम कर रहा लायंस क्लब एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरीडोर बनाने में जुटी हैं डॉ. रीता सावला

हर बच्चे को स्कूल पहुंचाने का जिम्मा ले रही है। परिषद् के पदाधिकारी हर्षद जोशी और रविप्रकाश ने बताया कि यह पूरा इलाका सबके लिए चुनौती बन गया है। परिषद् वहां जिलाधिकारी समेत समेत सभी संबद्ध अधिकारियों के साथ हर महीने बैठक कर रही है। स्कूलों और अस्पतालों को नए सिरे से संवारा जा रहा है। बच्चों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे स्कूल जाएं। इसमें काफी कामयाबी भी रही है।

‘ग्रीन कॉरीडोर’

मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर हों या छोटे शहर, अब एंबुलेंस को भी सड़कों पर रास्ता नहीं मिल पाता है। कुछ एंबुलेंस चालक हड़बड़ी में इस तरह चलते हैं कि वे और भी जाम में फंस जाते हैं। इस वजह से समय पर मरीज अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाते हैं। यह आकलन है कि पूरे देश में दस में से एक मरीज की अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही मौत हो जाती है। डॉ. रीता सावला को यह समस्या मथने लगी। उन्होंने इस दिशा में कोशिश प्रारम्भ करते हुए ‘राधी डिजास्टर एंड एजुकेशन फाउंडेशन’ के माध्यम से जागरुकता को अपना मिशन बना लिया। उन्हें आश्चर्य हुआ कि एंबुलेंस वाहन चालकों को यह भी जानकारी नहीं है कि सड़कों की परिस्थिति के अनुसार कैसे गाड़ी को आगे निकालना है। वे कैसे चलें कि ‘ग्रीन कॉरीडोर’ अपने आप बनता जाए। डॉ. रीता सावला को लगा कि इस काम को किया जाना चाहिए ताकि एंबुलेंस को रास्ते में आने वाली दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़े। उन्होंने पहले ट्रैफिक नियमों की पूरी जानकारी ली और फिर चालकों से मिलना शुरू कर दिया। वे उन्हें समझा रही हैं कि किस हालात में कैसे चला जाए। इस काम में उन्हें काफी सफलता मिल रही है और मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में मदद मिल रही है।


14 स्वास्थ्य

01-07 मई 2017

...ताकि न फूले दम

विश्व अस्थमा दिवस पर विशेष

भारत में लगभग 3.5 करोड़ लोग दमा पीड़ित

देश में 50 फीसदी से ज्यादा मरीजों को सांस से जुड़ी बीमारियां शरीर को दिनभर में दस हजार लीटर हवा की जरूरत

देश में 50 फीसदी से ज्यादा मरीज सांस से जुड़ी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित होने के कारण डॉक्टर के पास जाते हैं

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एसएसबी ब्यूरो

श्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2007 के अनुमानों के अनुसार, वर्तमान में विश्वस्तर पर 30 करोड़ लोग दमा से पीड़ित हैं और 2025 तक इसके 10 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है। विश्व स्तर पर दमा से प्रतिवर्ष 2,50,000 लोगों की मौत होती है और इससे भारत में प्रतिवर्ष 57,500 लोगों की मौत होती है। भारत में लगभग 3.5 करोड़ लोग दमा से पीड़ित हैं, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत मरीज अनियंत्रित अस्थमा से ग्रस्त हैं, जबकि 60 प्रतिशत मरीज आंशिक रूप से नियंत्रित दमा से ग्रस्त हैं। बात भारत की चल रही है तो जानना दिलचस्प है कि देश में 50 फीसदी से ज्यादा मरीज सांस से जुड़ी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित होने के कारण डॉक्टर के पास जाते हैं। दूसरे नंबर पर पेट रोगों के शिकार मरीजों का नंबर आता है। यह खुलासा बीते साल एक शोध अध्ययन में हुआ। ‘चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन’ ने देश के 880 शहरों, कस्बों के 13,250 फिजिशियन से बात की। इनमें से 7400 डॉक्टरों ने अपने मरीजों का पूरा रिकार्ड रखा था। उसी के आधार पर 204,912 मरीजों के रिकॉर्ड की जांच की गई और उनके लक्षणों और किए जाने वाले इलाज से पता चला कि लोगों में सांस की बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह बढ़ता वायु प्रदूषण है। दरअसल एक दिन में हमें अपने फेफड़े और शरीर के दूसरे अंगों को ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए दस हजार लीटर हवा की जरूरत पड़ती है और ऐसे में दूषित हवा न केवल लोगों को बीमार कर रही है, बल्कि इससे दूसरे अंग भी प्रभावित हो रहे हैं। अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि सांस की बीमारियों से जूझ रहे देश भर के मरीजों के लक्षणों

एक नजर

में काफी समानता है, जबकि पेट की बीमारियों में ये समानता नहीं देखी गई। डॉक्टरों ने इस अध्ययन के नतीजे अस्थमा के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सार्वजनिक किए थे। इस अवसर पर एम्स के निदेशक व चेस्ट रोग विभाग के हेड डॉ. रनबीर गुलेरिया ने बताया कि बच्चों में अस्थमा अटैक तेजी से बढ़ रहा है और इसकी बड़ी वजह प्रदूषण ही सामने आ रही है। उन्होंने इस बात को लेकर भी चेताया कि आउटडोर प्रदूषण के साथ इंडोर प्रदूषण लंग्स को कमजोर करने, बच्चों में लंग्स विकसित न होने देने का बड़ा कारण है। घरों मे जलने वाले चूल्हे अंदर ही अंदर लोगों को सांस की बीमारियों का शिकार बना रहे हैं। इससे कम वजन वाले प्रीमैच्योर बच्चों की पैदाइश हो रही है। नवजात शिशुओं मौत के बढ़ते मामले भी प्रदूषण के साथ जोड़े जा रहे हैं। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में देश में प्रदूषण की बढ़ी भयावह तस्वीर सामने आई जाहिर है। इसके मुताबिक विश्व के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 13 भारत में मौजूद हैं, जिसमें देश की राजधानी दिल्ली की नाम सबसे ऊपर है। इस बीच, अस्थमा के उपचार को लेकर एक अच्छी खबर भी है। अस्थमा और इसकी उपचार पद्धति के बारे में विभिन्न भ्रांतियों को दूर करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि इनहेलेशन थेरेपी इसके उपचार का सबसे कारगर और प्रभावी तरीका है। ‘इंहेल्ड

भरा हो सकता है।’ सफदरजंग अस्पताल के सीनियर चेस्ट फिजिशयन डॉ. एमके सेन कहते हैं, "मैं रोजाना 15-10 रोगियों से मिलता हूं, जिन्हें दवाई को जारी रखने की सलाह दी जाती है। अक्सर देखा गया है कि कुछ समय बाद लोग दवा लेने में आनाकानी करने लगते हैं। ऐसे लोगों की दर करीब 70 फीसदी है।" इनहेलर लेने से आनाकानी करने की वजह के बारे में पूछे जाने पर डॉ. सेन ने कहा, ‘इसके कई कारण हैं। इनमें दवा की कीमत, साइड इफेक्ट्स, इसे लेकर भ्रांतियां और सामाजिक अवधारणाएं शामिल हैं।’ अस्थमा के मरीजों के लिए ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स ने डिजिटल इनहेलर डिजिहेलर पेश किया है। इसमें सटीक डिजिटल डोज काउंटर के साथ कम खुराक के लिए चेतावनी सूचक भी मौजूद है, जो मरीजों को उनके चिकित्सा संबंधी नियमों के अनुसार पालन करने पर नजर रखने में सक्षम बनाता है। ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स के

कोरटिकोस्टेरॉयड थेरेपी’ (आईसीटी) में दवा की बहुत कम डोज सीधे सूजन भरी सांस की नलियों में पहुंचती है। इसके साइड इफेक्ट्स भी सीमित होते हैं। ओरल दवा का डोज आईसीटी के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है। ज्यादा दवा की डोज शरीर के अन्य अंगों में भी जाती है, जिसे दवा की जरूरत नहीं होती है। इसके साइड इफेक्ट्स की अस्थमा से बचाव आशंका भी अधिक होती है। • बहुत ज्यादा ठंडी और गर्म चीजों को खाने से बचें असल में, अस्थमा को नियंत्रित • धूल वाले स्थान पर जाने से पहले चेहरे को अच्छी तरह से करने में सबसे बड़ी चुनौती दवा का अनियमित सेवन है। लोग ढंक लें अक्सर लक्षण नजर न आने पर • बाजार की अथवा तली व चिकनाई युक्त खाद्य सामग्री से कुछ समय बाद ही दवा छोड़ देते परहेज रखें हैं। लेकिन लक्षण न दिखने का • रात के समय में एसी की हवा की बजाय खुली हवा में लेटें मतलब अस्थमा मुक्त होना नहीं • किसान गेहूं की कटाई करते समय चेहरे को ढक कर रखें, है। इसीलिए दवा छोड़ने से पहले ताकि भूसे में मिली धूल श्वसन तंत्र पर प्रभाव न डाले चिकित्सक का परामर्श आवश्यक होता है। दरअसल, अस्थमा लंबे समय तक चलने भारत एवं अफ्रीका क्षेत्र के अध्यक्ष एवं प्रमुख सुरेश वाली बीमारी है, जिसे लंबे समय तक इलाज की वासुदेवन बताते हैं, ‘हमें विश्वास है कि डिजिटल जरूरत होती है। इस बारे में डॉ. गुलेरिया बताते हैं, क्रांति की उद्योग जगत में भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण ‘कई रोगी जब खुद को बेहतर महसूस करते हैं तो होगी। विशेषतौर पर, अस्थमा और सीओपीडी से इनहेलर लेना छोड़ देते हैं। यह खतरनाक हो सकता संबंधित बीमारियों में, जिसमें मरीज द्वारा उपचार है, क्योंकि आप उस इलाज को बीच में छोड़ रहे हैं, हेतु निर्धारित नियमों का पालन नहीं करना विश्वस्तर जिससे आप फिट और स्वस्थ रहते हैं। रोगियों को पर सदियों पुरानी चुनौती है, और यह हर आयु वर्ग इनहेलर छोड़ने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श के मरीजों में अस्थमा एवं सीओपीडी के अपर्याप्त लेना चाहिए। अपनी मर्जी से इनहेलर छोड़ना जोखिम नियंत्रण का एक प्रमुख कारण भी है।’ ‘डिजिहेलर’ भारत का प्रथम डिजिटल डोज इनहेलर (डीडीआई) है, जिसका लक्ष्य सदियों पुरानी चुनौती से निपटना है, क्योंकि यह उपकरण अस्थमा के मरीजों के लिए ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स इस मरीजों को उसके द्वारा ली गई खुराकों की संख्या पर ने डिजिटल इनहेलर डिजिहेलर पेश किया है। इसमें नजर रखने में सक्षम बनाएगा, साथ ही इसमें लगा सटीक डिजिटल डोज काउंटर के साथ कम खुराक इंडिकेटर कम खुराक की चेतावनी भी देता है, जो मरीजों के लिए फायदेमंद है।

के लिए चेतावनी सूचक भी मौजूद है


01-07 मई 2017

विरासत संरक्षण


16 खुला मंच

01-07 मई 2017

‘दिनकर जी को एक नहीं बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी की सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ मिलने चाहिए थे' - हरिवंश राय बच्चन

लोकेंद्र सिंह

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियां जल ही जीवन है। इस छोटे से एक वाक्य में जल संरक्षण के सारे तत्व मौजूद हैं। नदियां जल वाहक हैं, जो जल को हमारे करीब लाती हैं

कविता का शंख घोष

इस साल का ज्ञानपीठ पुरस्कार बांग्ला कवि शंख घोष को दिया गया है। वे बंगाल के ही नहीं, बल्कि भारत के बड़े कवियों में हैं

ज्ञा

नपीठ पुरस्कार ने आधी शती से अधिक का सफर तय कर लिया है। एक ऐसे दौर में जब पुरस्कारों को लेकर सम्मान का भाव कुछ कम हुआ है और इसके चयन के आधार में भी स्फीति की शिकायतें आई हैं, ज्ञानपीठ का सम्मान और स्वीकृति बरकरार है। अपनी अर्धशती लंबी यात्रा में भारतीय भाषाओं के इस सर्वोच्च और सर्वमान्य माने जाने वाले पुरस्कार को लेकर सर्वत्र एक सम्मान का भाव रहा है। यह भारतीय भाषाओं के साहित्य के हक में बड़ी बात है। इस साल का ज्ञानपीठ पुरस्कार बांग्ला के वरिष्ठ कवि शंख घोष को दिया गया है। स्वभाव से बेहद सौम्य, कुशाग्र, एकाग्र और सक्रिय शंख घोष सब कुछ हैं पर अपनी शर्तों पर, किसी तरह के आडंबर और दिखावे से दूर एकदम पानी की तरह छलकता हुआ उनका पूरा जीवन हर किसी को अपनी शीतलता का अहसास कराता है। शंख घोष इस समय बांग्ला के ही नहीं, बल्कि भारत में बड़े कवियों में से एक हैं। उनकी कविताएं आधुनिकता और शास्त्रीयता, निजता और सामाजिकता की सीमाओं का परस्पर अतिक्रमण करती हैं। शांत सौम्य प्रतिरोध के साथ उत्सवधर्मिता उनकी खास पहचान है। शंख घोष की कविता अपने समय की एक ऐसी तस्वीर है, जिसमें समाज का पूरा जीवन विस्तार पाता है। कहते हैं न कि कवियों की परख उनकी कविताओं से नहीं, गद्य से की जानी चाहिए। शंख घोष की परख और पहचान के लिए यह वाक्य पर्याप्त है। सिर्फ कविता ही नहीं, शंख घोष ने पर्याप्त गद्य भी लिखा है। उनका गद्य नौ खंडों में प्रकाशित है, जिसका एक चयन हिंदी में प्रकाशित किए जाने की योजना है। उम्मीद है जल्द ही हिंदी के पाठकों के लिए शंख घोष के गद्य प्रस्तुत होंगे। कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातक शंख घोष कई शैक्षिक संस्थानों से जुड़े रहे। 1992 में शंख घोष जाधवपुर यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए। 1960 में शंख घोष अमेरिका में लोवा राइटर्स वर्कशाप में शामिल हुए थे। वे दिल्ली यूनिवर्सिटी, शिमला में द इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी और विश्व भारती यूनिवर्सिटी में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले वे बांग्ला के छठे लेखक हैं। शंख घोष वास्तव में इक्कीसवी सदी के भारत में कविता के ऐसे वृक्ष हैं, जिनकी छाया में सहित्य को सुकून मिलता है।

मां

गंगा और यमुना के बाद अब नर्मदा को भी मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त होंगे। देवी नर्मदा भी अब जीवित इंसानों जैसी मानी जाएगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की है। जल्द ही विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दे दिया जाएगा। यह शुभ घोषणा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन, जीवनदायिनी नदियों को मनुष्य के समकक्ष स्थापित करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे ग्रंथों में नदियों का स्थान बहुत श्रेष्ठ है। वेदों में नदियों को मां ही नहीं, अपितु देवी माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों को लेकर यह मान्यता इसीलिए स्थापित की थी, ताकि हम नदियों के प्रति अधिक संवेदनशील रहें। उनके प्रति कृतज्ञ रहें। नदियों के प्रति अतिरिक्त आदर भाव रहे। जब मनुष्य नदियों को मां मानेगा और उन्हें दैवीय स्थान पर रखेगा, तब उसको नुकसान नहीं पहुंचाएगा। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि हम अपने पुरखों की सीख को विसर्जित कर कर्मकांड तक सीमित होकर रह गए। सम्मान के सर्वोच्च स्थान ‘मां’ के प्रति भी हम लापरवाह हो गए। हमारी यह लापरवाही नदियों के जीवन के लिए खतरा बन गई। आज न्यायालयों और सरकारों

को नदियों को न्याय दिलाने के लिए उन्हें मनुष्य की तरह जीवंत मानने को मजबूर होना पड़ रहा है। जबकि हमारे यहाँ सदैव से नदियों को जीवंत ही माना गया है। नदियों के संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दुनिया के सबसे बड़े नदी संरक्षण अभियान ‘नमामि देवी नर्मदे : सेवा यात्रा’ का संचालन कर रहे हैं। जन सहभागिता से प्रत्येक दिन नर्मदा के किनारे नदी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए बड़े-बड़े आयोजन किए जा रहे हैं। नर्मदा सेवा यात्रा के अंतर्गत इन आयोजनों में देश-दुनिया से अलग-अलग विधाओं के प्रख्यात लोग आ चुके हैं। इसी सिलसिले में मंडला में आयोजित जन-संवाद कार्यक्रम में शामिल होने गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पहुंचे। नर्मदा सेवा यात्रा की आवश्यकता को देखकर उन्होंने प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी को जीवित मनुष्य के समान अधिकार देने का सुझाव दिया। चूंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जन्म नर्मदा के किनारे ही हुआ अतः नर्मदा जल से सिंचित भूमि से उत्पन्न अन्न ने ही उनका पोषण किया है। 11 दिसंबर, 2016 से प्रारंभ हुई नर्मदा सेवा यात्रा में प्रतिदिन मुख्यमंत्री शामिल हो रहे हैं। देवी

वेदों में नदियों को मां ही नहीं, अपितु देवी माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों को लेकर यह मान्यता इसीलिए स्थापित की थी, ताकि हम नदियों के प्रति अधिक संवेदनशील रहें


01-07 मई 2017 नर्मदा को लेकर उनके मन में अगाध श्रद्धा उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। जब उत्तराखंड के नैनीताल उच्च न्यायालय ने मोक्षदायिनी मां गंगा को मनुष्य के समान अधिकार देने का ऐतिहासिक निर्णय सुनाया और गंगा नदी को भारत की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी, तभी शिवराज सिंह चौहान के मन में यह विचार जन्म ले चुका था। वह भी सेवा यात्रा के दौरान नर्मदा नदी को मनुष्य के समान दर्जा देने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। मंडला जिले में यह अवसर आया, जब गृहमंत्री ने सुझाव दिया तो अविलम्ब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने उस सुझाव का स्वागत किया। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि देवी नर्मदा के अच्छे दिन आएंगे। सदानीरा नर्मदा भारत की पांचवी सबसे लंबी नदी है। यह मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। लेकिन, आज प्रदेश को जीवन देने वाली इस नदी के सामने स्वयं के अस्तित्व संकट का खड़ा हो गया है। यह संकट आधुनिक विकास के कारण, अवैध रेत उत्खनन, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और हम मनुष्यों की अदूरदर्शिता के कारण उत्पन्न हुआ है। यह किस प्रकार की सोच है कि पवित्र नदियों में मानव का मलमूत्र छोड़ा जा रहा है। कारखानों के कचरे से नदियों के जल को दूषित किया जा रहा है। ग्वालियर की स्वर्ण रेखा नदी और इंदौर की खान नदी आखिर किन कारणों से नाले में तब्दील हुई? उज्जैन में मोक्षदायिनी नदी क्ष‌िप्रा के हालात क्या किसी से छिपे हैं? सिंहस्थ

मनुष्य यह भूल गया है कि जब तक नदियां जीवंत हैं, तब तक ही मनुष्यों का भी जीवन है

कुंभ के दौरान क्ष‌िप्रा को सांसें देने के लिए नर्मदा से जल उधार लेना पड़ा। जीवन देने वाली नदियों को भी लोभी मनुष्यों के कारण दुर्गति देखनी पड़ रही है। मनुष्य यह भूल गया है कि जब तक नदियां जीवंत हैं, तब तक ही मनुष्यों का भी जीवन है। यदि नदी नहीं बचेगी, तब हम भी कहां बचेंगे। मनुष्यों को यह याद दिलाना अधिक जरूरी है। याद दिलाने का यही काम शिवराज सिंह चौहान ‘नमामि देवी नर्मदे : सेवा यात्रा’ के माध्यम से करने का प्रयास कर रहे हैं। बहरहाल, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जब गंगा और यमुना को जीवित मनुष्य का दर्जा देने का निर्णय किया, तब उसके पीछे मंशा यह थी कि नदियों को भी अपना जीवन जीने का नैसर्गिक अधिकार मिले। नदियों को प्रदूषण मुक्त किया जाए। उनके बहाव को बाधित न किया जाए। लेकिन, यहां प्रश्न उठता है कि क्या नदियों को जीवित मनुष्य के समान दर्जा देने से यह संभव हो पाएगा? नदियों को मनुष्य मानने से ऐसा क्या परिवर्तन हो जाएगा? जबकि नदियों को लेकर वर्तमान में ऐसे तमाम कानून हैं, जिनका यदि कड़ाई से पालन हो जाए, तो नदियों को बचाने के लिए अलग से किसी दर्जे की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। भारतीय ज्ञान-परंपरा में वैसे भी नदियों का दर्जा मनुष्य से कहीं अधिक ऊपर है। मध्यप्रदेश सरकार को भी चाहिए कि नर्मदा के संरक्षण के लिए उसे ‘जीवित मनुष्य का दर्जा’ देने के साथ-साथ वर्तमान कानूनों का पालन सुनिश्चित करे। बहरहाल, नेक नीयत से की गई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा का स्वागत है। देवी नर्मदा को संरक्षित करने के लिए उन्होंने जो आंदोलन शुरू किया है, उसके भी बेहतर परिणाम आएंगे, इसकी उम्मीद है।

खुला मंच

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श्रमिक भारत का सुरक्षित कल

बीते तीन सालों में सरकार ने न्यूनतम राशि पर जिस तरह गरीब लोगों के लिए बीमा सुविधा उपलब्ध कराई है, उसका सबसे ज्यादा लाभ देश के गरीब किसानों-मजदूरों को ही हुआ है

ई दिवस मजदूरों आंदोलनों के सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों का एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव जरूर है, पर इसका भारतीय परिप्रेक्ष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है। भारत में इसे पहली बार 15 जून, 1923 को मनाया गया। आजादी के बाद के कुछ दशकों में देश में श्रमिक आंदोलनों का जोर भी रहा पर जब से दुनिया बाजारवादी अर्थव्यवस्था की छतरी के नीचे आई है, तब से रोजगार सृजन और श्रमिक सुरक्षा दोनों ही मुद्दे बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आए हैं। गौरतलब है कि भारत ने आईटी जैसे क्षेत्र में अपना लोहा पूरी दुनिया में मनवाया, पर इससे ग्रामीण भारत की सूरत पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। इस दृष्टि से मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर इस लिहाज से जरूर संतोष जरूर जताया जा सकता है कि इसका दूरगामी असर देश में श्रमिकों की दशा पर पड़ेगा। दिलचस्प है कि एक ऐसे दौर में जब श्रम और मशीन के बीच का द्वंद्व अपने चरम पर है, यह तथ्य भारत के हक में जाता है कि यहां श्रम और विकास के बीच का पारंपरिक साझा उस तरह नहीं दरका है, जिस तरह बाकी दुनिया में दिखता है। हालांकि बात करें श्रमिकों की स्थिति की तो उसको लेकर निश्चित तौर पर अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। अच्छी बात यह है कि बीते तीन सालों में सरकार ने न्यूनतम राशि पर जिस तरह गरीब लोगों के लिए बीमा सुविधा उपलब्ध कराई है, उसका सबसे ज्यादा लाभ देश के गरीब किसानों-मजदूरों को ही हुआ है। वैसे भी देश की अर्थव्यवस्था में 50

फीसदी से अधिक का योगदान करने वाले असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के लोगों का कुल कामगार आबादी में हिस्सा 80 प्रतिशत है। भारत का अनौपचारिक क्षेत्र या असंगठित क्षेत्र मूल रूप से ग्रामीण आबादी से बना है। ये वे लोग हैं जो गांव में परंपरागत पेशे में हैं या शहरों और महानगरों में आकर आजीविका तलाशने का प्रयास करते हैं। गांवों में परंपरागत पेशेवर, भूमिहीन किसान और छोटे किसान भी इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। शहरों में ये लोग अधिकतर खुदरा कारोबार, थोक कारोबार, विनिर्माण उद्योग, परिवहन, भंडारण और निर्माण उद्योग में काम करते हैं। असली सवाल इनकी ही सामाजिक सुरक्षा और वि‌िभन्न योजनाओं से मिलने वाले लाभ का है। 45वें भारतीय श्रम सम्मेलन के अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना और

एक अलग तरह का अखबार

‘सुलभ स्वच्छ भारत’ का पिछले कई महीने से पाठक हूं। आपके अखबार को पढ़कर समझ पाया हूं कि वाकई अपने देश में स्वच्छता अब एक आंदोलन का नाम है। इस आंदोलन की खास बात यह है कि इस बहाने पूरे देश में नए सिरे से लोक पुरुषार्थ देखने को मिल रहा है। यकीन नहीं था कि 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन का नारा दिया तो यह आह्वान इतनी तेजी से लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरुकता की राह पर ले आएगा। बधाई के पात्र सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक भी हैं, जो पिछले कम से कम पांच दशकों से लगातार इस काम में लगे हुए हैं। उनके कार्य और प्रतिबद्धता को लेकर उनका बढ़ता सम्मान हम सबको अभिभूत तो करता ही है, साथ ही प्रेरणा भी देता है कि हमें अपने समाज के बारे में खुले और समर्पित मन से सोचना चाहिए। अखबार

प्रधानमंत्री रोजगार सृजन जैसे विभिन्न कार्यक्रमों को लागू करने में ठोस प्रयास किए हैं। खासतौर पर मनरेगा से श्रमिकों के एक राज्य से दूसरे राज्य‍ में पलायन को कम करने और ग्रामीण परिवारों की खरीदारी क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है। यह बात भी खुशी की है कि गांवों की बड़ी संख्या में महिलाएं स्व रोजगार अवसरों की ओर रूख कर रही हैं। हमारे देश में कुल 44.32 लाख स्वयं सहायता समूहों में से 30.21 लाख विशेष रूप से महिलाओं के लिए हैं। साथ ही सरकार का लक्ष्य 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 5 करोड़ लोगों को कुशल बनाना है। साफ है कि सरकार दो मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। उसके लिए रोजगार सृजन और श्रमिकों की सुरक्षा दोनों ही बड़े मुद्दे हैं। यह दृष्टि इस लिहाज से सही ठहराई जा सकती है कि कहने को भले देश में करीब 20 हजार पंजीकृत श्रमिक संगठन हों, पर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले करीब अस्सी प्रतिशत मजदूर किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे 80 प्रतिशत लोगों का अपने नियोक्ता के साथ कोई लिखित समझौता नहीं है और 72 प्रतिशत को किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा का कोई लाभ प्राप्त नहीं हो पाती है। इस लिहाज से इस बात का काफी महत्व है कि सरकार कार्यस्थल पर श्रमिकों की सुरक्षा से लेकर उनके जीवन की सुरक्षा के लिए कई पहल कर रही है। आधार कार्ड की अनिवार्यता से सरकारी लाभ भी सीधे अब लोगों के बैंक खातों में पहुंच रहे हैं।

में कई सामान्य लोगों के असधाराण कार्यों के बारे में आप जानकारी देते रहते हैं, जिन्हें पढ़ना अच्छा लगता है। खासतौर पर ‘अनाम हीरो’ वाले कॉलम में कई लोगों के बारे दिलचस्प जानकारी आपने दी है। संपादकीय पृष्ठ पर तो हर बार सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर पठनीय लेख होते हैं। आखिर में एक बात और यह कि महात्मा गांधी के जीवन और कृतित्व के अलग-अलग आयामों से आपके अखबार के द्वारा ही मैं अवगत हुआ हूं, पहले उनके बारे में जानकारी बहुत सामान्य किस्म की थी। सो, इसके लिए मैं आपका अलग से आभार व्यक्त करता हूं। ‘सुलभ स्वच्छ भारत’ सच में एक अलग तरह का अखबार है। यह लंबे

समय तक अपने पाठकों को लाभान्वित करता रहे, यह कामना है। रत्नेश सोलंकी, भीलवाड़ा, राजस्थान


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01-07 मई 2017

कोलकाता

आधी रात, आबाद हाट फोटो ः शिप्रा दास

कोलकाता में जब घड़ी इशारा करती है आधी रात का, तो ठीक उसी वक्त इस महानगर के फुटपाथ जगते हैं, सजते हैं। अगर आपको ट्रैफिक के शोरगुल से दूर चैन से खरीदारी करने का लुत्फ उठाना है तो आधी रात के इन बाजारों में आपका स्वागत है। यहां आपको अपनी जरूरत का हर सामान मिलेगा। मछली से लेकर नारियल तक, कपड़ाें से लेकर सब्जी-भाजी तक, इन फुटपाथों पर हर चीज के लिए अलग से बाजार हैं। आप जो भी चाहें, जहां भी चाहें खरीदारी के लिए जा सकते हैं। कुछ खरीदना नहीं हो तो भी आधी रात में सैर-सपाटे के लिए निकलने का मजा ही कुछ और है


01-07 मई 2017

फोटो फीचर

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20 स्वच्छता

01-07 मई 2017

संक्षेप में

15 मई तक बनाएं शौचालय हरिद्वार के जिलाधिकारी ने 28,209 शौचालयों का निर्माण 15 मई तक करवाने का निर्देश दिया

स्वच्छता कर्नाटक

संक्षेप में

पिता ने नहीं बनवाया शौचालय तो उपवास पर बैठी बेटी

सीडीओ ने देखा शौचालय का हाल

शौचालय के लिए उपवास

रिद्वार के जिलाधिकारी एसए मुरुगेशन ने मुख्य सचिव एस. रामास्वामी के निर्देशानुसार स्वच्छ भारत मिशन के तहत 28209 शौचालयों का निर्माण 15 मई तक हर हाल में पूरा कराने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी एसए मुरुगेशन ने बताया कि मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने 13 अप्रैल को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए यह निर्देश दिया था कि विभागीय अधिकारी इस कसौटी पर हर हाल में खरे उतरें। जिलाधिकारी ने बताया कि शौचालयविहीन कुल 1,06,356 परिवारों में से अभी तक कुल 78,147 शौचालय ही निर्मित हुए हैं। शेष 28,209 शौचालयों का निर्माण 15 मई तक तक पूरा कराना होगा। उन्होंने कहा कि सभी ग्राम पंचायत अधिकारी अपनी ग्राम पंचायत में शौचालय निर्माण में तेजी लाएं। शौचालयों के निर्माण के अनुश्रवण के लिए जिला स्तर पर जिला पंचायत राज अधिकारी अनुश्रवण अधिकारी होंगे, जबकि विकासखंड स्तर पर खंड विकास अधिकारी एवं सहायक विकास अधिकारी पंचायत नोडल अधिकारी बनाए गए हैं। जिलाधिकारी ने मुख्य विकास अधिकारी को प्रत्येक सप्ताह शौचालय निर्माण कार्यों की समीक्षा कर जानकारी देने को कहा है। (भाषा)

शौचालय के लिए सर्वे

त्तर प्रदेश के बागपत जिले के गौरीपुर जवाहरनगर गांव में पंचायत राज विभाग की टीम ने घर-घर सर्वे कर शौचालय विहीन परिवारों का चिह्नित किया। जिला स म न ्वय क जितेंद्र कुमार ने बताया कि गौरीपुर जवाहर गांव में पंचायत सचिव ने 117 शौचालयों के लिए बजट मांगा था, लेकिन गांव में सर्वे करने पर 85 परिवार ही शौचालय विहीन मिले हैं। अब इनके घरों में शौचालय बनवाए जाएंगे । सर्वे के दौरान कर्मियों ने ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया और कहा कि गंदगी बीमारियों की जड़ है। इसीलिए लोग खुले में शौच मुक्त गांव बनाने में सहयोग दें। (भाषा)

शौचालय निर्माण का मुआयना करने पहुंचे मुख्य विकास पदाधिकारी

र्नाटक के गुलबर्गा जिले की सेदम बंद कर दिया। लगातार तीन दिनों तक उपवास करने तहसील की पंचायत रिब्बानापल्ली के के बाद उसके माता पिता शौचालय बनवाने को गांव खंदेरयनपल्ली के निवासी मल्लेश की बिटिया तैयार हो गए। माधवी की जीत की कहानी पूरे गांव कुमारी माधवी कक्षा दसवीं की छात्रा है। माधवी में में फैल गई। देखते ही देखते माधवी गांव के बच्चों ऐसा खास कुछ नहीं है जो का अादर्श बन गई। घर एक घर भी ऐसा ना हो जहां दूसरी छात्राओं में नहीं है। घर में माधवी की मिसाल शौचालय के अभाव में लोग खु ल े लेकिन एक बात जो माधवी दी जाने लगी। बसावा केंद्र को सबसे खास बनाती है, में शौच को जाएं, मैं हर घर में एक श्री मुरुगामठ के चित्रदुर्गा वह है स्वच्छता की जिद। स्वामी जी ने माधवी के शौचालय देखना चाहती हूं माधवी ने जिद ठानी तो कार्यों से प्रभावित होकर उसके लिए कठिन परीक्षा देनी पड़ी तो भी देखी और उसे ‘शौर्य प्रशस्ति 2016’ से सम्मानित किया। जीत आखिरकार उसकी ही हुई। हुआ कुछ ऐसा माधवी भविष्य में अपने इस अभियान को लेकर कि माधवी के स्कूल में जिला पंचायत की तरफ से क्या कुछ नया करना चाहती हैं? इस सवाल के पूछे केंद्र सरकार के कार्यक्रम स्वच्छ भारत मिशन के जाने पर माधवी कहती हैं, ‘मेरी कोशिश है कि हमारे जनजागरण हेतु एक कार्यक्रम का आयोजन किया जिले की पंचायत में कोई एक घर भी ऐसा ना हो गया जिसमें स्कूली बच्चों ने बड़ी उत्सुकता से भाग जहां शौचालय के अभाव में लोग खुले में शौच को लिया। माधवी भी इस कार्यक्रम में प्रतिभागी रही। जाएं, मैं हर घर में एक शौचालय देखना चाहती अपने आस-पास की साफ सफाई, स्वच्छता हूं। हमारे चारों तरफ फैली गंदगी को दूर करना और पर्यावरण विषय के जागरुकता कार्यक्रम और अपने स्तर पर लोगों को पर्यावरण संरक्षण और और कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों द्वारा दी गयी स्वच्छता की जानकारी देना भी मेरा एक उद्देश्य है, जानकारी ने माधवी को बेहद प्रभावित किया। घर उम्मीद है मुझे इस कार्य में सफलता मिलेगी।’ पहुंचते ही माधवी में अपने घर में शौचालय निर्माण माधवी के स्कूल के हेड मास्टर, विद्यालय के की बात उठा दी, इस विषय पर उसने अपने माता- शिक्षकगण, ग्राम पंचायत के अध्यक्ष और कई अन्य पिता से खुलकर संवाद किया और उन तमाम संस्थाओं ने माधवी के कार्यों की खूब सराहना की। जानकारियों को भी साझा किया जो उसने स्कूल आज माधवी ने न सिर्फ अपने गांव खंदेरयनपल्ली में में उक्त कार्यक्रम के दौरान सीखी। माधवी के पिता अपनी पहचान बनाई है, बल्कि पूरी जिला पंचायत में मल्लेश और मां ने माधवी की बात नहीं मानी और वे माधवी की एक अलग पहचान बन चुकी है। स्कूलों घर में शौचालय बनवाने को तैयार नहीं हुए। माधवी में होने वाले अनौपचारिक कार्यक्रमों और संवादों का कई दिनों घर में शौचालय बनाने की बात को लेकर असर किस हद तक किसी एक व्यक्ति में बदलाव अपने माता-पिता से बहस करती रही। लेकिन नतीजा ला सकता है, माधवी के कार्यों को देखकर इसका कुछ नहीं निकला। आखिरकार माधवी ने खाना पीना अंदाजा लगाया जा सकता है। (भाषा)

त्त र प्रदे श के बलिया में स्वच्छ भ ा र त अ भिय ा न एवं नमामि गंगे योजना के तहत गांवों में बन रहे शौचालय एवं साफ-सफाई का जायजा लेने मुख्य विकास अधिकारी संतोष कुमार नगवा गांव पहुंचे। उन्होंने सरकार द्वारा बनवाए गए शौचालय का मौके पर जाकर मुआयना किया। वहीं ग्रामीणों को इकट्ठा कर उन्हें बताया कि परिवार के सभी सदस्य शौचालय का प्रयोग करें। उन्होंने बताया कि शौचालय का प्रयोग करने से लोग बीमारियों से हमेशा बचे रहेंगे। खुले में शौच करने की आदत हम सभी को बदलनी होगी, तभी जाकर देश को पूर्ण रूप से स्वच्छ और सुंदर बनाया जा सकता है। इस मौके पर ग्राम पंचायत के प्रधान विमल पाठक एवं ग्राम पंचायत अधिकारी रविंद्र चौरसिया ने बताया कि ग्राम पंचायत नगवा को शासन द्वारा 1020 शौचालय बनाने का लक्ष्य दिया गया था, जिसमें से 900 शौचालय बनकर तैयार हैं। इसका लोग उपयोग भी कर रहे हैं। शेष शौचालायों का निर्माण प्रगति पर है, जिसे हर हाल में जल्द ही पूर्ण कर लिया जाएगा। मुख्य विकास अधिकारी संतोष कुमार ने ग्राम पंचायत अधिकारी एवं ग्राम प्रधान को निर्देश दिए कि युवाओं की टोली बनाकर लोगों को शौचालय का प्रयोग करने के लिए जागरूक किया जाए। इससे होने वाले स्वास्थ्य संबंधी फायदे के बारे में भी बताया जाए। (भाषा)

निर्माण में लापरवाही पर कार्रवाई

झा

रखंड के लोहरदगा समाहरणालय परिसर स्थित सभाकक्ष में उपायुक्त विनोद कुमार की अध्यक्षता में शौचालय निर्माण योजना की समीक्षा बैठक हुई। इसमें जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ-साथ तकनीकी पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहर से लेकर गांव-गांव में शौचालय निर्माण और उसकी उपयोगिता पर चर्चा की गई। बैठक में शौचालय निर्माण कार्य की प्रगति की पंचायतवार समीक्षा करते हुए डीसी ने कहा कि शौचालय निर्माण में लापरवाही बरतने वालों पर सीधी कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि शौचालय निर्माण कार्य में तेजी लाकर लोहरदगा जिले को ओडीएफ (ओपन डिफेकेशन फ्री) है। डीसी ने इस बात पर बल दिया कि शौचालय का निर्माण जितना जरूरी है, उतना ही उसका उपयोग भी होना चाहिए। (भाषा)


01-07 मई 2017

स्वच्छता महाराष्ट्र

संक्षेप में

उपलब्ध कराने का वादा किया। वे हर किसी को समझाते रहे कि खुले में शौचालय जाने के क्याक्या नुकसान होते हैं। गांव को साफ-सुथरा रखना कितना जरूरी है। उस ग्राम सेवक के घर वाले उन पर शादी का दवाब बना रहे थे, लेकिन वे पहले अपने संकल्प को पूरा करना चाहते थे। वे रात-दिन इस काम को पूरा करने में जुट गए। नासिक जिले के सूचना अधिकारी किरण मोघे के अनुसार, पिछले साल विभूते ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया और इस साल अपने गांव जाकर शादी कर ली। छब्बीस वर्षीय किशोर विभूते लातूर जिले के रहने वाले हैं। (भाषा)

शौचालय नहीं बनानेवालों पर होगी प्राथमिकी

शौचालय नहीं बनवाने वालों के खिलाफ झुमरीतिलैया नगर परिषद प्राथमिकी दर्ज कराने की तैयारी में

झा

रखंड के झुमरीतिलैया में स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय नहीं बनानेवालों के खिलाफ नगर परिषद ने प्राथमिकी दर्ज कराने की तैयारी शुरू कर दी है। शौचालय निर्माण के लिए 2016-17 में शहर के 28 वार्डों में 6 हजार लाभुकों का चयन किया गया था। उन्हें सहायता राशि भी दी गई। इनमें 2800 लोगों के शौचालय का कार्य जारी है। नगर परिषद के सीटी मैनेजर लेमांशु कुमार ने बताया कि 30 अप्रैल तक वैसे लाभुक जो कि शौचालय का निर्माण नहीं करते हैं , उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाएगी। नगर परिषद द्वारा इसके लिए टीम भी गठित की है, जो लाभुकों के घरों में जाकर स्थिति का जायजा ले रही है। उसे पत्र एवं दूरभाष के जरिए लाभुकों को अतिशीघ्र शौचालय बनाने की अपील भी की

जा रही है। उन्होंने बताया कि वैसे लाभुकों की सूची तैयार की जा रही है, जो प्रथम किश्त लेने के बाद शौचालय निर्माण कार्य शुरू नहीं किया है। शौचालय निर्माण को लेकर नगर विकास विभाग द्वारा कड़े निर्देश के बाद नगर परिषद ने झुमरीतिलैया शहर में खुले में शौच मुक्त कराने के लिए ताकत झोंकी है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत एक वर्ष से कार्य चल रहा है। उन्होंने बताया कि कर्मियों द्वारा गली-मोहल्लों में घूम-घूमकर खुले में शौच नहीं जाने एवं शौचालय बनाने की अपील की जा रही है। 28 वार्डों में 14 वार्ड खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं, जबकि अन्य वार्डों में खुले में शौच से मुक्त बनाने पर कार्य किया जा रहा है। (भाषा)

शौचालय की उपयोगिता और निर्माण हो सुनिश्चित बीडीओ ने की शौचालय निर्माण की रिव्यू मीटिंग

खूं टीस्वच्छके भारतखलारीमिशन कोके

तहत प्रखंड क्षेत्र में शौचालय निर्माण का जो लक्ष्य मिला है, उसे तो पूरा करना ही है। इससे भी ज्यादा इन शौचालयों की उपयोगिता सुनिश्चित करना जरूरी है। यह बात बीडीओ रोहित सिंह ने शौचालय निर्माण के रिव्यू मीटिंग के दौरान मुखिया और जलसहिया से कही। मीटिंग में स्वच्छता समन्वयक विक्रम भगत के अलावा ब्लॉक कोऑर्डिनेटर, मुखिया और

जलसहिया उपस्थित थे। बैठक में जलसहिया और मुखिया ने बताया कि गरमी के कारण पानी की कमी हुई है, जो शौचालय निर्माण में बाधक है। बीडीओ ने बताया कि सोख्ता का गड्ढा लाभुक को स्वयं करना है। साथ ही निर्माण के लिए पानी भी उपलब्ध कराना है। समीक्षा के बाद बीडीओ ने बताया की 14 में से 10 पंचायतों को जल्द ही खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया जाएगा। (भाषा)

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श्रमदान से की वैवाहिक जीवन की शुरुआत

शादी तो की लेकिन हर घर में शौचालय बनाने के बाद

क ग्रामसेवक की जिद आज हर जगह चर्चा का विषय बन गई है। यह वाकया है ना‌सिक जिले के हिवारे गांव का। यहां के ग्राम सेवक किशोर विभूते ने संकल्प लिया था कि जब तक वे अपने गांव में हर घर में शौचालय नहीं बनवा देते तब तक शादी नहीं करेंगे। गांव में घरों की संख्या कुल 351 है। तीन साल पहले साल जब जानकारी ली गई तब पता चला कि शौचालय की संख्या मात्र 174 है। बाकी घरों के लोग खेतों, सड़क किनारे या खाली जगहों पर जाते हैं। तभी विभूते ने मन ही मन तय कर लिया कि वे हर घर में शौचालय बनवा कर ही दम लेंगे। उन्होंने लोगों को प्रेरित करना शुरू किया और सुविधाएं

स्वच्छता

विवाह के दिन ही शादी की वेशभूषा में ग्रामवासियों की मौजूदगी में श्रमदान कर अनोखा उदाहरण पेश किया

हाराष्ट्र के अनभुलेवाडी गांव की एक नवविवाहित जोड़ी ने अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत बिलकुल नए अंदाज में की। उन्होंने शादी के दिन ही शादी की वेशभूषा में ग्रामवासियों की मौजूदगी में श्रमदान कर अनोखा उदाहरण पेश किया। यह उन लोगों के लिए एक सबक भी है जो गांव की समस्याओं के प्रति या तो जागरूक नहीं है या फिर जान-बूझकर अनदेखी कर रहे हैं। अनभुलेवाडी गांव माण तहसील के अंतर्गत आता है, जो सतारा जिले में है। तीन सौ दस घरों वाले इस गांव की आबादी लगभग पंद्रह सौ है। पश्चिम महाराष्ट्र का यह गांव खेती पर निर्भर है और पानी की किल्लत से हमेशा जूझता रहता है। इसी गांव का है दत्तात्रय येले, जिसकी शादी 20 अप्रैल को लक्ष्मीनगर की मनीषा किसवे के साथ हुई। उनके आमंत्रण पत्र की यह खासियत थी कि उसपर ‘पानी बचाओ’ का संदेश लिखा गया था। शादी के दिन ग्रामीणों और मेहमानों की उपस्थिति में दत्तात्रेय और मनीषा ने श्रमदान करने का आदर्श स्थापित किया। वह दृश्य बहुत रोचक था जब दोनों ने हाथों में फावड़ा उठाया

और श्रमदान किया। प्रतीकात्मक रूप से यह संकेत दिया गया कि पानी का संरक्षण बहुत जरुरी है। ‘जल है तो जीवन है’ उक्ति को स्वीकार करते हुए एक-

एक बूंद का उपयोग किया जाए। यह भी संकेत दिया कि जो काम हम खुद कर सकते हैं उसके लिए प्रशासन पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। पूरा क्षेत्र मानसून की प्रतीक्षा में है, लेकिन उसके पहले लोग सूखे पड़े खेतों को जोत देना चाहते हैं, ताकि बारिश आए तो पानी के फैलने में कोई रुकावट नहीं आए। दंपति के श्रमदान को लेकर पूरे गांव में उत्साह का माहौल रहा। बाकी लोगों ने भी अपनीअपनी तरह से योगदान किया। लेकिन दत्तात्रेय और मनीषा के इस कदम की हर तरफ सराहना हो रही है। (भाषा)

स्वच्छता बोकारो

मैं ससुराल नहीं जाऊंगी शौचालय बना दो

ससुराल में शौचालय नहीं होने पर पत्नी ने साथ जाने से मना किया

के बालीडीह में बोकारो रहने वाली पारसमणि ने

ससुराल जाने से सिर्फ इसीलिए मना कर दिया क्योंकि वहां शौचालय नहीं है। उसने साफ कहा कि जब तक ससुराल में शौचालय की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक वह ससुराल नहीं जाएगी। धनबाद निवासी दिनेश बालीडीह निवासी पारसमणि मुर्मू के मामले में पत्नी ने कहा कि ससुराल में शौचालय ही नहीं है ऐसे में वह कैसे रहेगी। इस पर उसके पति दिनेश ने कहा कि जब तक उसके गांव में शौचालय नहीं बन जाता है, तब तक वह किराए के मकान में ही उसे रखेगा। पत्नी ने तर्क दिया कि उसके पति ने 2016 में ही छह महीने में शौचालय बनाकर

ससुराल ले जाने का आश्वासन दिया था। शौचालय के लिए ससुराल नहीं जाने की जिद ठान बैठी पारसमणि का मामला पारिवारिक विवादों के निपटारे के दौरान सामने आया। सुनवाई की अध्यक्षता सेंटर के अध्यक्ष शशिभूषण कर रहे थे। इसमें मुख्य रूप से सिटी डीएसपी अजय कुमार और महिला थाना प्रभारी संगीता कुमारी शामिल थीं। इसमें नए, पुराने कुल सात मामले के निष्पादन किए गए। (भाषा)


22 स्वच्छता

01-07 मई 2017

संक्षेप में

स्वच्छता मिसाल

‘बिन शौचालय दुल्हन का श्रृंगार अधूरा होता है’

बनेगा शौचालय

25 लाख की लागत से बनेगा सामुदायिक शौचालय

सि

मडेगा नगर परिषद द्वारा कचहरी परिसर के समीप 10 सीट वाले सामुदायिक शौचालय निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया। इस दौरान नप अध्यक्ष फुलसुंदरी देवी और वार्ड पार्षद कुलदीप द्वारा शिला पट्ट का अनावरण किया गया। मौके पर उपस्थित नप अध्यक्ष फुलसुंदरी देवी ने बताया कि 25 लाख की लागत से नगर परिषद द्वारा आम लोगों के सुविधा हेतु शौचालय का निर्माण कार्य प्रारंभ कराया गया है। वहीं वार्ड पार्षद कुलदीप ने संवेदक रमेश पाठक से शौचालय के निर्माण में गुणवत्ता का पूर्ण ध्यान रखने की बात कही। मौके पर नगर परिषद के कर्मियों के अलावा अन्य लोग मौजूद थे। (भाषा)

नगर निकायों में मोबाइल टॉयलेट सामुदायिक शौचालयों के स्थान पर मोबाइल टॉयलेट

शौ

चालय निर्माण के लिए जमीन नहीं मिलने के कारण बिहार के नगर विकास विभाग ने सरकार के सामने मोबाइल टॉयलेट लगाने का प्रस्ताव रखा है। अभी राज्य में 83,125 परिवार ऐसे हैं, जिनके पास शौचालय के लिए जमीन नहीं है। विभाग ने ऐसे परिवारों के लिए सामुदायिक शौचालय के निर्माण की योजना तैयार की है। इसमें हर परिवार के लिए एक शौचालय आवंटित करने की योजना है। लेकिन, उनके पास जमीन ही नहीं है। पिछले वित्तीय वर्ष में राज्यभर में मात्र 45 शौचालयों का निर्माण पूरा हो सका। ऐसे में विभाग ने अब मोबाइल टॉयलेट उपलब्ध कराने की योजना पर काम करना शुरू किया है। वर्ष 2018-19 तक शहरों में हर घर में शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में 2.50 लाख 2018-19 में 2,43,103 व्यक्तिगत शौचालय निर्माण का लक्ष्य है। (भाषा)

शौचालय और स्वच्छता के प्रति जागरुकता फैलाने की नई पहल

र्थिक रूप से हाशिये पर खड़े लोगों के बीच काम करतेकरते युवा अभियंता वरुण कुमार की मानसिकता कुछ ऐसी बदली कि ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ को आत्मसात करते हुए पहले तो उन्होंने निरक्षरों के लिए आयोजित होने वाली शाम की पाठशाला से खुद को जोड़ा और अब एक अनोखी पहल करते हुए वरुण ने अपनी होने वाली शादी के कार्ड पर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के साथ-साथ घर में शौचालय के प्रति जागरुकता का संदेश देने की कोशिश की है। 08 मई को वरुण की शादी होने वाली है और उन्होंने अपने शादी कार्ड के कवर पर दो पंक्तियां छपवायी हैं। इसमें पहली पंक्ति में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ लिखा है तो दूसरी पंक्ति में लिखा है, ‘बिन शौचालय दुल्हन का शृंगार अधूरा है।’ खास बात यह है कि उनकी इस पहल में पूरा-पूरा सहयोग उनके हम पेशा इंजीनियर मित्रों और शाम की पाठशाला के साथियों से मिल रहा है। बात यहीं खत्म नहीं होती है। वरुण की दिली तमन्ना है कि उनकी होने वाली पत्नी अनुराधा भी शादी के बाद बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के साथ-साथ स्वच्छता खासकर घर-घर शौचालय अभियान से जुड़ कर उनकी सोच को मुकाम तक पहुंचाए । वस्तुत: जब शादी के कार्ड में ‘मेले मामा की छादी में जलूल-जलूल आना ‘जैसी मीठी मनुहार दर्ज कराने की परंपरा चली आ रही हो तो दूसरी ओर ‘ ... बिन शौचालय दुल्हन का शृंगार अधूरा है’ दर्ज कराना मनुहार के बड़े कैनवास का आगाज है।

आठ मई को होगी शादी

वरुण मूल रूप से भवानीपुर प्रखंड के सोनदीप पंचायत के विरनिया गांव के रहने वाले हैं। पिता पेशे से किसान हैं, लेकिन साहित्यकार का मिजाज रखते हैं। लिहाजा जब वरुण ने शादी कार्ड छपाने से पहले अपनी मन की बात अपने पिता और माता से कही तो उन लोगों ने एक बार में ही हामी भर दी। भले ही अभी शादी में विलंब है, लेकिन वरुण की सोच और पहल की चर्चा आरंभ हो चुकी है। वे चाहते हैं कि अपनी सोच और पहल को अपनी पत्नी के साथ आमजन तक पहुंचाएं। वरुण बेबाकी से कहते हैं ,‘भला बिना शौचालय दुल्हन के शृंगार के क्या मायने हो सकते हैं, बिन शौचालय दुल्हन का शृंगार अधूरा है’।

गरीबी और बदहाली ने किया प्रेरित

वरुण बायसी अनुमंडल के बैसा प्रखंड में ग्रामीण आवास पर्यवेक्षक के रूप में पदस्थापित हैं। जिले

संक्षेप में

शौचालयों की सफाई का टेंडर

गंदगी मिली तो हर प्वाइंट पर ठेकेदार को 500 रुपए का जुर्माना भरना होगा

शौचालयों की हालत हि सारसुधारनेके बदहाल के लिए नगर निगम ने अब

का यह पूर्वी व दक्षिणी हिस्सा भौगोलिक रूप से दुरूह होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा है। लगभग हर वर्ष यहां महानंदा और कोसी की अन्य सहायक नदियां अभिशाप बन कर आती हैं। लिहाजा इस अभिशाप से इलाके के लोग कभी उबर नहीं पाए हैं। वरुण ने बताया कि इस इलाके में काम करने के दौरान उन्होंने पाया कि गरीबी की वजह से यहां बेटियां भार समझी जाती हैं। ऐसे में अधिकांश बेटियां पढ़ाई से महरूम रह जाती हैं और दूसरी कम उम्र में ही ब्याही जाती है, जो किसी त्रासदी से कम नहीं है। इसके अलावा बतौर आवास पर्यवेक्षक उन्होंने महसूस किया कि संभवत: जिले में सबसे कम शौचालय इसी इलाके में मौजूद हैं। वहीं शौच जाने के क्रम में दुष्कर्म की घटनाएं भी सबसे अधिक इसी अनुमंडल क्षेत्र में होती हैं। वरुण कहते हैं, ‘शौचालय और बेटियों को पढ़ाना और बचाना दोनों इस इलाके के लिए आवश्यक है।’

साथियों ने की हौसला आफजाई

दरअसल शिक्षा के क्षेत्र में बायसी अनुमंडल से एक नई पहल लगभग दो वर्ष पहले ही आरंभ हो चुकी है, जो शाम की पाठशाला के नाम से जानी जाती है। इसकी अगुवाई पेशे से इंजीनियर शशि रंजन कर रहे हैं। इसमें कई इंजीनियरों के साथ-साथ विभिन्न पेशे से जुड़े लोग भी शामिल हैं, जो फुरसत के क्षणों में शाम के समय गरीबों और दलितों की बस्ती में निरक्षरों के बीच अक्षर ज्ञान बांट रहे हैं। वरुण भी शाम की पाठशाला से जुड़े हुए हैं। पहली बार जब वरुण की शादी की बात चली तो उसने सबसे पहले अपने मित्रों के साथ अपने इस विचार को साझा किया। साथियों ने न केवल उसकी हौसला आफजाई की, बल्कि हरसंभव सहयोग का भी भरोसा दिलाया। (भाषा)

इनकी सफाई व्यवस्था निजी हाथों में देने का फैसला लिया है। इसके लिए टेंडर की शर्तें तैयार कर ली हैं। शीघ्र ही इसके लिए टेंडर मांगे जाएंगे। इसके तहत करीब 35 शौचालय यूरिनल की सफाई व्यवस्था ठेके पर दी जाएगी। ठेके की शर्त के मुताबिक यदि निरीक्षण के दौरान शौचालय में गंदगी मिली तो ठेकेदार पर प्रति प्वाइंट प्रति निरीक्षण 500 रुपये जुर्माना किया जाएगा। शौचालयों की दीवारों पर बैनर या पोस्टर लगे मिले तो छह घंटे में उतारना होगा, यदि वह ऐसा नहीं करता तो प्रति प्वाइंट 200 रुपये जुर्माना किया जाएगा। शहर के कई शौचालय यूरिनल के रखरखाव के कार्य को ठेके पर देने पर विचार-विमर्श कर इसकी रूपरेखा तैयार की जा रही है। आने वाले समय में इन्हें ठेके पर दिया जा सकता है। नगरनिगम के सफाई निरीक्षक को एक्सईएन रामजीलाल ने शहर के शौचालय की सफाई करवाकर फोटो सहित रिपोर्ट भेजने के आदेश दिए हैं। चंद शौचालय की रिपोर्ट तो भेजी गई, लेकिन इसके बाद मामले में सुस्त कार्यप्रणाली का परिचय देते हुए खानापूर्ति कर दी। शौचालयों के रखरखाव के मामले में बाद में फोटो आई और सफाई व्यवस्था दुरुस्त हुई। शहर में 13 नए शौचालय सहित मधुबन पार्क और क्रांतिमान पार्क के पुराने निर्माणाधीन शौचालय की सफाई व्यवस्था ठेके पर देने की योजना तैयार हुई है। इसके अलावा जिंदल चौक से डाबड़ा चौक, अग्रसेन मार्केट, कैंप चौक सहित 20 यूरिनल की सफाई का ठेका दिया जाएगा। इसके अलावा करीब 29 शौचालय एक अन्य निजी एजेंसी को रखरखाव के लिए दिए हुए हैं। शहर के 35 शौचालय यूरिनल के रखरखाव के लिए निगम प्रतिमाह एक लाख से अधिक का अनुमानित खर्च मान रहा है। रखरखाव के लिए करीब 21 नियम शर्तें नगर निगम ने तय की हैं। (भाषा)


01-07 मई 2017

संक्षेप में

संक्षेप में

स्वच्छता गोरखपुर

स्वच्छता के साथ शौचालय के लिए बेच दिया मंगलसूत्र शौचालय खासतौर से महिलाओं के लिए कितनी बड़ी जरूरत रहेगी ‘मां’ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई

स्वच्छता अभियान को लेकर नैनीताल नगर पालिका का एक पोस्टर पिछले दिनों सोशल मीडिया में वायरल हो गया

स्व

च्छता और शौचालय के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए पूरे देश में तरह तरह के दिलचस्प तरीके अपनाए जा रहे हैं। कहीं सामूहिक उपवास का आयोजन किया रहा है तो कहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और कहीं फिल्मी पोस्टरों और उनके संवादों का सहारा लिया जा रहा है। नैनीताल नगर पालिका ने फिल्म दीवार के पोस्टर और उसके संवाद के साथ एक दिलचस्प पोस्टर जारी किया है, जो इन दिनों काफी चर्चा में है। पोस्टर में ‘दीवार’ फिल्म के तीनों पात्र, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और निरूपा रॉय नजर आ रहे हैं। इस फिल्म का एक मशहूर डायलॉग है, जो आज भी हर किसी की जुबान पर है ‘मेरे पास मां है’। ‘दीवार’ फिल्म के इसी संवाद को कुछ बदल कर नैनीताल नगर पालिका ने पोस्टर पर छापा है। इस पोस्टर में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर दोनों को यह कहते हुए दिखाया गया है कि मां मेरे साथ रहेगी। दोनों के बीच इस जुबानी जंग में निरूपा रॉय के संवाद का पंच डाला गया है। निरुपा रॉय कहती दिख रही हैं कि जो पहले शौचालय बनाएगा मैं उसी के साथ रहूंगी। इस संवाद के साथ नगर पालिका परिषद का संदेश भी लिखा है, ‘खुले में शौच ना जाएं, घर में ही शौचालय बनवाएं।’ स्वच्छता अभियान के तहत पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का महाअभियान चलाया जा रहा है। इन्हीं कोशिशों के बीच नैनीताल की नगर पालिका परिषद का पोस्टर आकर्षण का केंद्र बन गया है। (भाषा)

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महिलाओं ने इसके लिए अपने मंगलसूत्र तक बेच दिए

रखपुर में भटहट क्षेत्र के बूढ़ाडीह गांव की सविता देवी आम लोगों के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। उन्होंने उन लोगों को स्वच्छता की राह दिखाई है, जो पैसे की कमी का हवाला देकर शौचालय का निर्माण नहीं करवाते हैं। सविता देवी ने शौचालय बनाने के लिए अपना मंगलसूत्र बेचकर एक मिसाल पेश की है। बिहार के पटना जिले की सविता देवी की शादी बूढ़ाडीह निवासी दिव्यांग वीरेंद्र मौर्या से हुई। शादी के बाद गांव आने पर शौचालय का नहीं होना उन्हें अखरता था। आखिरकार उन्होंने मंगलसूत्र बेचकर शौचालय बनाने का फैसला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरणा लेकर शौचालय बनाने वाली सविता देवी पहली महिला नहीं हैं। ऐसी कई महिलाएं और भी हैं जिन्होंने शौचालय के लिए अपने गहने बेचे हैं । इन महिलाओं के लिए गहने शौचालय से ज्यादा जरूरी नहीं है ।

कानपुर की लता देवी

उत्तर प्रदेश के कानपुर की लता देवी दिवाकर ने भी घर में शौचालय बनवाने के लिए अपना मंगलसूत्र बेच दिया। शौचालय नहीं होने की वजह से परिवार को काफी दिक्कतें होती थीं। इस महिला ने अपने सुहाग की निशानी मंगलसूत्र और अन्य जेवर बेचकर घर में शौचालय बनवाया। मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनाने की बात पूरे इलाके में फैल गई। गांव के लोगों ने लता की सोच और हौसले को सलाम किया। लता की सोच से सबक लेते हुए गांव के कई परिवारों ने घर में शौचालय का निर्माण शुरू करा दिया है।

बरेली की सुमन गंगवार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान और घर-घर में शौचालय बनवाने के अभियान का आम लोगों पर गहरा असर होता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के ही बरेली की रहने वाली सुमन गंगवार ने अपने घर में शौचालय बनवाने के लिए अपने गहने तक गिरवी रख दिए। गुलरिया भवानी गांव की रहने वाली 31 साल की सुमन का कहना है कि हर सुबह हमें शौच के लिए अलग-अलग जगह की खोज करनी पड़ती थी। खेतों में अक्सर पानी भरा रहता है और जंगली जानवरों का खतरा भी रहता है। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं अपने घर में शौचालय

बालियां भी गिरवी रखनी पड़ीं।

स्वच्छता

बनवाउंगी फिर चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। पहले मैंने अपना मंगलसूत्र गिरवी रखा जिससे मुझे 6 हजार रुपए मिले, लेकिन फिर एक हजार रुपए के लिए मुझे अपनी कान की

रोहतास की फूल कुमारी

बिहार के रोहतास जिले की फूल कुमारी ने भी में शौचालय निर्माण के लिए अपने मंगलसूत्र को गिरवी रखकर एक उदाहरण पेश किया है। संझौली प्रखंड के बरहखाना गांव की फूल कुमारी ने अपने पति के घर में शौचालय नहीं होने पर उसके निर्माण के लिए अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया। फूल कुमारी के पति खेतिहर मजदूर होने के कारण वे अपने घर में शौचालय नहीं बना पा रहे थे। ऐसे में फूल कुमारी ने मंगलसूत्र को गिरवी रखकर शौचालय बनवाया। जिला प्रशासन ने अब अन्य लोगों को प्रेरित करने के लिए फूल कुमारी को संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम का ब्रांड एंबेस्डर बनाया है।

विदर्भ की संगीता अवहले

महाराष्ट्र के विदर्भ जिले में वाशिम के सिक्खड़ गांव की संगीता अवहले ने मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनवाकर एक अनोखी मिसाल पेश की है। संगीता ने घर में शौचालय बनवाने के लिए मंगलसूत्र बेच दिया। यह खबर गांव से लेकर पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। संगीता के इस कदम की प्रशंसा करते हुए महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे ने कहा कि राज्य में हम ज्यादा से ज्यादा संख्या में शौचालय बनवाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को आगे बढ़ाने के लिए मुंडे ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसे एक नया मंगलसूत्र भेंट किया, जिसे उसने अपने पति के हाथों गले में पहना। केंद्र सरकार की ओर से 2019 तक ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रो में सभी घरों में शौचालय उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान सरकार ने इसके लिए प्रोत्साहन राशि 9,000 हजार से बढ़ाकर 12,000 रुपए कर दी है। महज दो साल के भीतर ही दो करोड़ शौचालयों का निर्माण हो चुका है। इसके साथ तकरीबन 2.75 लाख स्कूलों में विशेषतौर पर लड़कियों के लिए करीब 4.25 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है। सबसे खास ये है कि प्रधानमंत्री स्वयं हर बुधवार को होने वाली बैठकों में स्थिति का जायजा लेते हैं। (भाषा)

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स्वच्छता का संदेश

लोक संगीत के माध्यम से स्वच्छता का संदेश

त्तीसगढ़ के विकास खंड कांसाबेल में सभी ग्राम पंचायतों के आश्रित गांव के समस्त परिवारों के निवास परिसर में जल वाहित शौचालय उपलब्ध होने के कारण पूरे विकास खंड को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया है। जनपद पंचायत में हुई सामान्य बैठक में शौचालय का निरंतर उपयोग करने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए जशपुर की लोक संगीत कला जत्था अकादमी द्वारा कार्यक्रम आयोजित कर पूरे विकास खंड में स्वच्छता जन जागरण कार्यक्रम आयोजित कर स्वच्छता अभियान के तहत सफाई रखने एवं नियमित रूप से शौचालय का उपयोग करने का संदेश दिया गया। सीईओ मार्को ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत स्वच्छता जन जागरण कार्यक्रम आयोजित कर शासन की महत्त्वपूर्ण योजना के तहत शौचालय नियमित रूप से उपयोग करने, लोगों को विशेष रूप से लोक संगीत के माध्यम से स्वच्छता रखने व बीमारियों से बचने के लिए बेहतर प्रयास किया जा रहा है।

थाने में होगा शौचालय और स्वच्छ पेयजल

का

नपुर के थानों में साफ-सफाई कराने के बाद अब शौचालय और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था की जाएगी। डीआइजी ने रेंज के सभी जिलों को संदेश भेजकर ऐसे सभी थानों के नाम मांगे हैं, जहां फरियादियों के लिए ये दोनों सुविधाएं नहीं हैं। सूची आने के बाद प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। पिछली सरकारों की तमाम कोशिश के बावजूद अब तक थानों में फरियादियों के लिए शौचालय और पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है। कानपुर में ही बादशाही नाका, मूलगंज, स्वरूप नगर, अर्मापुर, बिल्हौर, बिधनू आदि थानों में पब्लिक टायलेट की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा एक दर्जन से ज्यादा थानों में स्वच्छ पानी के लिए आरओ भी नहीं है। इसी तरह इटावा, फतेहगढ़, औरैया आदि जिलों में भी कई थानों में फरियादियों को परेशानी उठानी पड़ती है। डीआइजी राजेश डी मोदक ने बताया कि थानों में आने वाले फरियादियों को किसी तरह की असुविधा न हो, इसका ख्याल रखने के लिए शासन से कहा गया है। सभी जिलों से सूची आने के बाद शौचालय और आरओ के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। (भाषा)


24 स्वच्छता

01-07 मई 2017

बिल गेट्स का ‘टॉकिंग टॉयलेट’

गेट्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की जमकर तारीफ की और एक वीडियो भी शेयर किया

एसएसबी ब्यूरो

में इसके बारे में कहा था। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक ने अपने ब्लॉग में मोदी के भाषण इक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का अंश भी डाला और लिखा कि हम 21वीं ने स्वच्छ भारत मिशन को लेकर सदी में रह रहे हैं, क्या हमें कभी इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की लेकर तकलीफ महसूस हुई कि हमारी माताएं है। गेट्स ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि पिछले और बहनें खुले में शौच करने को मजबूर तीन वर्षों में स्वच्छता और खुले में शौच को हैं? गांव की गरीब महिलाएं रात के अंधेरे लेकर मोदी के ओर से उठाए गए कदम काफी का इंतजार करती हैं ताकि वे शौच के लिए सराहनीय हैं। उन्होंने आगे लिखा कि पीएम जा सकें। ब्लॉग में बिल गेट्स ने लिखा कि मोदी ने ऐसी समस्या तीन सालों में पीएम ने जन मेरे ख्याल से अभी को उठाया है, जिसके स्वास्थ्य को लेकर जिस तरह की तक किसी अन्य बड़े नेता ने इस तरह ऐसे बारे में हम सोचना साहस‌ि क टिप्पणी की है , वै स ी मुद्दे को नहीं उठाया तक पसंद नहीं करते अब तक हम ने किसी निर्वा चि त है। उन्होंने लिखा कि हैं। उन्होंने ‘टॉकिंग सदस्य के मु ह ं से नहीं सु न ी है मोदी ने सिर्फ भाषण टॉयलेट’ नाम से एक नहीं दिया, बल्कि उस वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें भारत की खुले में शौच की समस्या के बारे में बताया पर काम भी किया है। पीएम ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत 2019 तक लगभग 7.5 गया है। बिल गेट्स ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया है पिछले तीन सालों में पीएम ने जन स्वास्थ्य को और इस पर लगातार काम भी चल रहा है। इससे लेकर जिस तरह की साहस‌िक टिप्पणी की है, पहले गेट्स ने मोदी की नोटबंदी के फैसले की वैसी अब तक हमने किसी निर्वाचित सदस्य भी सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि केंद्र के मुंह से नहीं सुनी है और अब इसका काफी सरकार के नोटबंदी के फैसले से भारत में शैडो असर देखने को मिल रहा है। गेट्स ने मोदी अर्थव्यवस्था को खत्म करने में मदद मिलेगी की तारीफ में कहा कि पीएम मोदी ने स्वतंत्रता और नगदी-रहित अर्थव्यवस्था की ओर देश दिवस के मौके पर ही अपने पहले संबोधन आगे बढ़ सकेगा।

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स्वच्छता मिसाल

गुल्लक तोड़कर बनवाया शौचालय

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कुछ माह पहले राज्य स्वच्छता सम्मेलन के मंच पर छात्रा मोंद्रिता चटर्जी को सम्मानित किया है

एसएसबी ब्यूरो

स्कूल में अध्यापिका हैं। मोंद्रिता बताती हैं कि बचत करना उसका शौक था। वह अपने पिता धानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत से रुपए लेकर बचत करती थी। तब उसने मिशन देश के कई गांव-शहरों में जहां यह सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह इन एक आंदोलन की शक्ल ले चुका है, वहीं रुपयों से समाज के लिए शौचालय बनाएगी। अब इसके साथ बच्चों का भी प्रेरक जुड़ाव गुल्लक में रुपये एकत्र होते थे। कई गुल्लक देखने को मिल रहा है। ऐसी ही एक 11 साल भर गई थीं, लेकिन कभी उन्हें खर्च नहीं की छात्रा है जमशेदपुर (टेल्को) की मोंद्रिता किया। फिर एक दिन अक्टूबर 2014 में जब चटर्जी। स्थानीय हिलटॉप प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन का स्कूल की छात्रा मोंद्रिता मिशन का ऐलान किया ऐलान किया तो उसने अपने गुल्लक से पैसे तो उसने ठान लिया कि ठान लिया कि वह बचत निकालकर जमशेदपुर प्रखंड की छोटा गोविंदपुर वह बचत के रुपए से वह के रुपयों से ऐसे स्कूलों पंचायत के केंदाडीह गांव ऐसे स्कूलों में शौचालय में शौचालय बनवाएगी, जहां छात्राओं के लिए में सामुदायिक शौचालय बनवाएगी शौचालय नहीं है। इसके बनवा रही है। इस शौचालय के निर्माण पर 24 हजार रुपए खर्च बाद वह पिता से आए दिन रुपये लेने लगी। होने हैं। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कुछ माह इस पर पिता ने एक दिन उसे डांटा भी कि पहले राज्य स्वच्छता सम्मेलन के मंच पर वह इतने पैसे का क्या करती है। केंदाडीह में छात्रा मोंद्रिता चटर्जी को सम्मानित किया तो बनने वाले सामुदायिक शौचालय में दो यूनिट उसके माता-पिता के साथ ही जिले के लोग हैं। इसमें एक स्नानागार भी बनाया जा रहा है। भी गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। मोंद्रिता अमिताभ चटर्जी बताते हैं कि जल्द ही उनकी चटर्जी को पूर्वी सिंहभूम का स्वच्छता चैंपियन बेटी हलुदबनी के एक स्कूल में भी शौचालय चुना गया है और राज्य स्वच्छता सम्मेलन में बनवाएगी। इस स्कूल में बच्चे नृत्य और गाना सीखते हैं। अमिताभ कहते हैं कि उन्हें फख्र मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सम्मानित भी किया। मोंद्रिता टेल्को के रिवरव्यू इंक्लेव में रहने है कि उनकी बेटी समाज के अच्छे कामों में वाले अमिताभ चटर्जी और स्वीटी चटर्जी की सहयोग कर रही है। मुख्यमंत्री रघुवर दास भी इकलौती बेटी है। अमिताभ चटर्जी आदित्यपुर कह चुके हैं कि हम बड़ों को इस छोटी बच्ची स्थित मेडिट्रिना अस्पताल के निदेशक हैं। से सीख लेनी चाहिए, जिसने अपने लिए नहीं, मोंद्रिता की मां स्वीटी चिन्मया भारती टेल्को बल्कि दूसरों के लिए सोचा।

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01-07 मई 2017

स्वच्छता मिसाल

स्वच्छता की बेमिसाल प्रतिभा नरसिंहपुर को खुले में शौच से मुक्त कराने का मुख्य श्रेय जाता है जिला पंचायत की सीईओ प्रतिभा पाल को

संक्षेप में

ध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले महीने गाडरवारा में आयोजित मुख्यमंत्री स्वच्छता सम्मान समारोह में नरसिंहपुर जिले को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया। नरसिंहपुर अब प्रदेश का प्रथम संपूर्ण (ग्रामीण एवं शहरी) ओडीएफ (ओपन डेफेकेशन फ्री) जिला बन गया है। मुख्यमंत्री ने सम्मान समारोह में जिले को खुले में शौच से मुक्त बनाने में योगदान देने वाले तथा मेहनत और लगन से कार्य करने वाले जन-प्रतिनिधियों के साथ अधिकारियों- कर्मचारियों की प्रशंसा की। उन्होंने जिले के खुले में शौच से मुक्त होने पर जिलावासियों को बधाई दी। मुख्यमंत्री ने साथ ही यह भी कहा कि अब आगे भी सावधानी रखने की जरूरत है, ताकि परिश्रम बेकार न जाए। जिले में आगे भी कोई खुले में शौच के लिए न जाए और शौचालय का उपयोग करना लोगों की आदत में शुमार हो। दिलचस्प है कि नरसिंहपुर रातोंरात खुले में शौच से मुक्त नहीं हुआ। इसके लिए सरकार के कुछ अधिकारियों ने खासतौर पर काफी परिश्रम और लगन से काम किया है। ऐसी ही एक अधिकारी हैं, जिला पंचायत की सीईओ प्रतिभा पाल। पाल ने जिले को खुले में शौच से मुक्त कराने को लेकर खासे जुनून के साथ काम किया।

मुख्यमंत्री ने जिस दिन नरसिंहपुर को ओडीएफ फ्री घोषित किया, वह उस दिन भी गांवों के औचक निरीक्षण के लिए निकलीं, ताकि कहीं कोई खुले में शौच करता न मिले हालांकि वे इस बारे में किसी तरह का श्रेय लेने से बचती हैं। वे साफ कहती हैं, ‘कृपया याद रखिए कि यह काम उनके अकेले का नहीं है। सबने जिलाधिकारी के नेतृत्व में इसके लिए काफी समर्पण से काम किया। दरअसल, इस ओर तब मैं पहली बार गंभीरता से उन्मुख हुई, जब नरसिंहपुर का चांवरपाठा प्रखंड खुले में शौच से मुक्त हुआ। मुझे लगा कि ऐसा अगर यहां हो सकता है तो फिर पूरे जिले में क्यों नहीं हो सकता है।’ प्रतिभा का स्वच्छता को लेकर समर्पण कितना पक्का है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने जिस दिन नरसिंहपुर को ओडीएफ फ्री घोषित किया, वह उस दिन भी गांवों के औचक निरीक्षण के लिए निकलीं, ताकि कहीं कोई खुले में शौच करता न दिखे। प्रतिभा स्वच्छता मिशन को लेकर कैसे काम करती हैं, वाकई यह काफी प्रेरक है। नरसिंहपुर को ओडीएफ घोषित होने पर ऐसे ही एक दौरे पर प्रतिभा जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव मुर्गाखेड़ा पहुंचीं। वहां पहुंचकर प्रतिभा ने बच्चों के एक समूह के साथ पहले दोस्ताना तरीके से बातचीत शुरू की। जैसे ही उन्हें लगा कि बच्चों को अब वे आसानी से अपनी बातें कह सकती हैं, तो

खुले में शौच के बारे में वो बच्चों को बताने लगीं। प्रतिभा ने बच्चों से पूछा, ‘क्या तुम लोगों में से कोई खुले में शौच के लिए जाता है?’ बच्चों ने ना कहते हुए तेजी के साथ अपना सिर हिलाया। इसी बीच नौ साल की सीता उठ खड़ी होती है और कहती है, ‘खुले में शौच जाने से हम बीमार पड़ सकते हैं।’ इसी तरह एक दूसरा बच्चा आशीष, जिसकी उम्र करीब दस साल होगी, कहने लगता है, ‘खुले में शौच पर मंडराने वाली मक्खियां घर में भी पहुंचती हैं और खाने-पीने की चीजों पर बैठती हैं।’ इसी क्रम में सारे बच्चे फख्र के साथ बताते हैं कि उनके घरों में और स्कूल में भी शौचालय है और वे इनका इस्तेमाल करते हैं। देखते-देखते माहौल खुशनुमा हो जाता है और बच्चों के साथ प्रतिभा भी ताली बजाने लगती हैं। दरअसल, प्रतिभा जिस अनौपचारिकता के साथ ग्रामीणों के साथ घुलतीमिलती हैं, वह काफी प्रभावशाली है। वो देखते ही देखते ग्रामीणों के साथ आत्मीय संबंध बना लेती हैं और फिर उन्हें अपनी बात समझाती हैं। आज अगर मध्यप्रदेश का यह जिला खुले में शौच से मुक्त घोषित हुआ है, तो उसमें प्रतिभा पाल जैसी काबिल और समर्पित अधिकारी की बड़ी भूमिका है।

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रसोईघर तोड़ शौचालय बनवा रही महिलाएं बिहार की महिलाएं शौचालय के लिए रसोईघर और खपरैल के कमरे को तुड़वा रही हैं

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एसएसबी ब्यूरो

स्वच्छता

हार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सात निश्चय योजनाओं में एक हैसभी के लिए शौचालय। इसके तहत चलाए जा रहे जागरुकता अभियान का असर अब दिखने लगा है। सीतामढ़ी जिले के चोरौत उत्तरी पंचायत में कई महिलाओं ने जिद कर रसोईघर व कमरे तुड़वा दिए और शौचालय की नींव रख दी। सीतामढ़ी के वार्ड संख्या सात में हरि मंडल के घर में दो कमरे और रसोईघर थे। ईंट से निर्मित 15 इंच की मोटी दीवार के ऊपर खपरैल था। शौचालय की कमी अरसे से खल रही थी। पत्नी रेखा देवी को यह जानकारी मिली कि शौचालय निर्माण कराने पर सरकार की ओर से 12 हजार रुपए की सहायता मिल रही है। फिर क्या था, उन्होंने शौचालय बनवाने की जिद ठान ली। पति ने जगह की कमी का रोना रोया तो वह रसोईघर तोड़ शौचालय के लिए जगह निकालने पर अडिग हो गईं। अब रसोईघर के एक हिस्से में शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। वैसे ही वार्ड संख्या आठ में सोनी देवी ने शौचालय पर जोर दिया तो पति सुरेंद्र मंडल ने जमीन कम होने की बात कह पल्ला झाड़ना चाहा, लेकिन सोनी नहीं मानी। आखिरकार फूस की बनी उसकी झोपड़ी तोड़ कर जिस कोने में रसोई का काम होता था, वहीं शौचालय की नींव डाली गई। चोरौत पूर्वी पंचायत के वार्ड संख्या आठ में विधवा पेंशन से गुजर-बसर करने वाली शीला देवी ने पिछले महीने दो कमरे के खपरैल घर के एक हिस्से को तुड़वाकर शौचालय बनवाया और अब वो खुद फूस की बनी झोपड़ी में रह रही है। इस संबंध में चोरौत के प्रखंड विकास पदाधिकारी नीलकमल ने बताया कि जब पूरा प्रखंड खुले में शौच मुक्त घोषित हो जाएगा तो इन महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा।


28 मौसम

01-07 मई 2017

गर्मी में कूल-कूल जुगाड़ आवश्यकता अविष्कार की जननी ही नहीं, देसी जुगाड़ की भी प्रेरणा है। गर्मी से परेशान हाल कुछ लोग ऐसे ही दिलचस्प जुगाड़ से तपती गर्मी में भी कूल-कूल एहसास करा रहे हैं

बिन बिजली का देसी कूलर इको कूलर और कुछ नहीं एक ग्रिडनुमा व्यवस्था है, जो आधी कटी हुई प्लास्टिक की बोतलों से बनता है

एसएसबी ब्यूरो

ई से पहले ही देश के कई हिस्सों में पारा 46-45 डिग्री तक पहुंच गया है। देश में एक बड़ी आबादी के पास इस झुलसाती गर्मी से राहत पाने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि उसके पास न पंखा है, न कूलर। अगर है भी तो जहां यह आबादी रहती है, उन इलाकों में बिजली या तो नहीं है या फिर उसका कोई भरोसा नहीं है। भारत के पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से इस मुश्किल के एक दिलचस्प उपाय की खबर सामने आई है। यह उपाय है घर को ठंडा करने के लिए बनाया गया कूलर। इसे इको कूलर नाम दिया गया है। इस सस्ते और उपयोगी कूलर की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए न तो बिजली की जरूरत

पड़ेगी और न पानी की। बांग्लादेश में ढूंढा गया गर्मी से निजात का यह उपाय भारत में भी काफी कारगर साबित हो सकता है, क्योंकि पड़ोसी मुल्क की तरह भारत की भी शहरी झुग्गी बस्तियों और ग्रामीण इलाकों में भी कई लोग टिन की छत वाले घरों में रहते हैं। दोपहरी में तपती टीन की छतें गरमी में घर को किसी भट्टी की तरह गर्म कर देती हैं। इको कूलर ऐसे घरों के तापमान को सामान्य कर सकता है। दरअसल, इको कूलर और कुछ नहीं, एक ग्रिडनुमा व्यवस्था है जो आधी कटी हुई प्लास्टिक की बोतलों से बनता है। इस ग्रिड को खिड़की पर फिट कर दिया जाता है। बोतल के चौड़े हिस्से से घुसने वाली गर्म हवा जब इसके संकरे हिस्से में पहुंचती है तो कंप्रेस हो जाती है

और फिर यह दूसरे छोर से बाहर निकलती है तो थर्मोडायनेमिक्स के नियमों के मुताबिक थोड़ी ठंडी हो जाती है। यही ठंडी हवा कमरे में दाखिल होकर राहत पहुंचाने का काम करती है। इससे तापमान कम से कम पांच डिग्री तक कम हो जाता है। इको कूलर का मॉडल एक एडवरटाइजिंग

एजेंसी ‘ग्रे बांग्लादेश’ और ढाका स्थित एक तकनीकी कंपनी ‘ग्रामीण इंटेल सोशल बिजनेस’ ने विकसित किया है। इसके बनने में जो सामग्री लगती है वह आसानी से उपलब्ध है। इसीलिए आने वाले दिनों में यह कूलर अगर बांग्लादेश के साथ भारत के भी विभिन्न हिस्सों में तेजी से लोकप्रिय होता है, तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

इशाक भाई का कूलर रिक्शा

भा

मात्र एक हजार रुपए के खर्च से ऑटो रिक्शा के लिए बनाया देसी एयर कूलर एसएसबी ब्यूरो

रत में जुगाड़ हर मर्ज का इलाज है। गर्मी के कोप से बचने के लिए लोग देसी ‌िफ्रज से लेकर कूलर-एसी तक न जाने क्या-क्या बना रहे हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प खोज की है भिवंडी के एक ऑटो रिक्शेवाले ने। महज सात जमात पास इस ऑटो रिक्शा ड्राइवर ने अपने जुगाड़ू इंजिंनियरिंग कौशल का इस्तेमाल करके अपने रिक्शा में देसी कूलर की व्यवस्था की है। मात्र एक हजार रुपए के खर्च से बनाए गए देसी एयर कूलर का यात्री बिना कोई अतिरिक्त किराया दिए आनंद उठा रहे हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं मुंबई के कल्याण रोड में रहने वाले इशाक शेख की। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह एक केमिकल कंपनी में काम करने लगा था। यहीं मजदूरी करते-करते वह कूलिंग टॉवर की मरम्मत करने लगा। बाद में कंपनी की नौकरी छोड़ 1988 में उसने ऑटो रिक्शा का परमिट ले लिया। परमिट मिलने के बाद वह कल्याण से ठाणे रिक्शा चलाने लगा। इस बार गरमी की तीव्रता को लेकर उसके दिमाग में कई आइडिया आए। उसके लिए इशाक शेख ने ऑटो रिक्शा में पतरा और प्लास्टिक पाइप लगाकर स्पंज की सहायता से गरमी से निजात दिलाने का प्रयास शुरू कर दिया। उसका यह प्रयोग सफल रहा। रिक्शा में बैठने वाले यात्रियों के लिए उसने देसी एयर कूलर बना दिया था। रिक्शा के ऊपर उसने प्लास्टिक के तीन 'टी' आकार के एयर कूलर लगा दिए। पाइपों से होते हुए ठंडी होकर हवा नीचे रिक्शा में लगे कूलर-बक्से तक पहुंचती है, जिससे रिक्शा में बैठने वाले यात्रियों को कुदरती ठंडी हवा मिलती है। यात्रियों को यात्रा के दौरान यह उपकरण गरमी से राहत दिला रहा है। इसके लिए ऑटो रिक्शा में अलग से कोई ईंधन भी खर्च नहीं हो रहा। बिना बिजली, बिना गैस और बिना पेट्रोल चल रहा है इशाक भाई का कूलर रिक्शा।


01-07 मई 2017

नारायण का एसी ऑटो म

नारायण का ऑटो खास इसलिए है, क्योंकि वह अपने ऑटो में पानी, एयर कंडीशन की सुविधा के अलावा प्राकृतिक अनुभव देने के लिए पौधे भी रखते हैं

छत पर लटकने वाला कूलर

मौसम

एसएसबी ब्यूरो

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हंगी गाड़ियों के दौर में ऑटो की सवारी का क्रेज पहले की तरह नहीं रहा। पर बात अगर बेंगलुरू के वी नारायण के ऑटो की करें, तो इसकी सवारी का तो लुत्फ ही कुछ और है। गर्मी के दिनों में तो अगर किसी को नारायण का ऑटो मिल जाए, फिर तो वह आदमी खुशकिस्मत ही समझिए। नारायण का ऑटो खास इसीलिए है, क्योंकि वह अपने ऑटो में पानी, एयर कंडीशन की सुविधा के अलावा प्राकृतिक अनुभव देने के लिए पौधे भी रखते हैं। इतना ही नहीं, नारायण अपने ऑटो में पौधे भी उगाते हैं। उन्होंने अपने ऑटो को एक तरह से छोटे गार्डन की तरह बना रखा है। नारायण बताते हैं कि बेंगलुरु के बारे में लोगों की राय अच्छी बने, इसीलिए उनके मन में अपने ऑटो को एक नया लुक और फील देने का आइडिया आया। शुरू में नारायण बस स्टाप पर पानी के कैन पहुंचाने का काम करते थे। फिर उन्होंने इसी तरह का कुछ काम अपने ऑटो में करना चाहा। शुरू में उन्होंने ड्राइवर सीट के पास पंखा रखना शुरू किया और छोटा सा बोर्ड लगाया जिस पर लिखा था कि यह एक एसी ऑटो है। लोग मुझे चिढ़ाकर पूछते थे कि इसमें क्या खास है? इस पर नारायण ने सोचा कि क्यों न ऑटो में ही पेड़ और छोटे पौधे लगाए जाएं जिससे एसी में भी कुदरती ठंडक का एहसास हो। वे बताते हैं, 'लोगों को यह आइडिया पसंद आया।’ आज आलम यह है कि बेंगलुरू में नारायण के इस अनोखे ऑटो के बारे में न सिर्फ सभी जानते हैं, बल्कि सभी इसकी सवारी के लिए लालायित भी रहते हैं।

दो युवकों ने एक ऐसे कूलर का ईजाद किया है जो सीधे घर या दुकान की छत में सिलिंग फैन की तरह लगाया जा सकता है

एसएसबी ब्यूरो

ध्य प्रदेश के आठवीं पास दो युवकों ने एक ऐसे कूलर का ईजाद किया है जो सीधे घर या दुकान की छत में सिलिंग फैन की तरह लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, इसमें बार-बार पानी भरने का झंझट भी नहीं है। यह छत पर बने पानी टैंक से जरूरत के हिसाब से पानी ले लेगा। यही नहीं, भीषण गर्मी में इसका उपयोग कूलर के रूप में और अन्य मौसम में सिर्फ पंखे के तौर पर किया जा सकता है। इस अनूठे कूलर का निर्माण किया है मंदसौर के भानपुर में रहने वाले महेश कुमार लोहार और तालिब हुसैन अंसारी ने। पेशे से महेश लेथ मशीन का और तालिब बिजली का काम करते हैं। गर्मी से परेशान होकर दोनों ने एक दिन सोचा कि क्यों

न एक ऐसा कूलर बनाया जाए जो जगह भी ना घेरे और लोगों की जरूरत भी पूरी करे। अब जब उनका देसी कूलर बनकर तैयार है, तो दोनों चाहते हैं कि उनके इस इनोवेशन को प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया के तहत प्रमोट किया जाए। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को पत्र भी लिखा है। वे दोनों बताते हैं कि उनका बनाया कूलर जगह न घेरने के साथ बिजली की खपत भी कम करता है। यही नहीं इसकी देखरेख पर भी न के बराबर खर्च है। आम कूलर को गर्मी खत्म होने के बाद सहेज कर रखना पड़ता है पर इसका कूलर पंखें के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ी खासियत यह कि यह चलने पर शोर भी नहीं करता है। जब तक जरूरत हो इसे कूलर की तरह चलाया जा सकता है और जरूरत

नहीं होने पर पंखे का उपयोग किया जा सकता है। यह कूलर 32 इंच व्यास के प्लास्टिक फ्रेम में बना है। फ्रेम के बीच एल्युमिनियम की जाली है। जाली में कूलर की घास और बीच में एक पंखा है। युवकों ने दो तरह के कूलर बनाए हैं-

एक टैंक वाला और एक बिना टैंक वाला। टैंक वाले कूलर में पानी भरा जा सकता है और बिना टैंक वाला सीधे छत पर बने टैंक से कनेक्टेड रहेगा। खास बात यह कि कूलर में सेंसर है जो जरूरत के हिसाब से पानी लेने के बाद स्वत: पानी बंद कर देगा। दोनों कूलरों की लागत छह से सात हजार के बीच है। कूलर का कलर कमरे के अनुरूप करवाया जा सकता है।


30 श्रद्धांजलि

01-07 मई 2017

बहुत याद आएंगे ‘मेरे अपने’ विनोद खन्ना स्मरण

विनोद खन्ना एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने अपनी जिंदगी कई बार शून्य से शुरू की और हर बार शिखर तक पहुंचें

एसएसबी ब्यूरो

भिनेता और विनोद खन्ना की अंत्येष्टि में यूं तो पूरा बॉलीवुड उमड़ा पर उनके खोने का गम कितना गहरा होगा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन पर तकरीबन पूरा बॉलीवुड उमड़ पड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने गहरा शोक जताया। दरअसल, यह उस लाजवाब शख्स की लोकप्रियता और स्वीकृति का प्रमाण है, जो बीते चार दशकों में रोल मॉडल की तरह सार्वजनिक जीवन जीने वाला इंसान रहा। जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच उन्होंने

जिस तरह संतुलन साधा, वह वाकई काबिले तारीफ है। खासतौर पर जिस तरह अपने करियर की ऊंचाई पर रहते हुए उन्होंने एक दिन अचानक अपने परिवार के साथ मीडिया के सामने आकर एेलान कर दिया कि वे फिल्मों को अलविदा कह रहे हैं और ओशो के शिष्य बनने जा रहे हैं। हालांकि इस घोषणा से पहले ही वे सेट पर भगवा कपड़े और माला पहनकर आने लगे थे। यह अलग बात है कि ओशो के नाम आध्यात्मिकता की जो लीक उन्होंने पकड़ी उसे भी वे बीच में ही छोड़ गए। अलबत्ता यह मानने से वे आखिर तक गुरेज करते रहे कि यह ओशो से उनका मोहभंग किस कारण हुआ।

विनोद खन्ना को असली पहचान दिलाई गुलजार की फिल्म 'मेरे अपने' ने। इस फिल्म में बेरोजगारी और भटकाव से गुजर रहे युवक की भूमिका में विनोद खन्ना ने मौजूदगी दर्ज कराई। कह सकते हैं कि वो गुलजार के ‘एंग्री यंग मैन’ थे

विनोद खन्ना दरअसल समय की ढलान और चढ़ाई के साथ नहीं, बल्कि उसके खिलाफ चलने वाले शख्स थे। धारा के खिलाफ तैरने का उनका यह हुनर ही था कि वे अपने चाहने वालों के लिए एक ऐसे चहेते सितारे की तरह रहे जिसने जीवन और सफलता का ताना-बाना अपने तरीके से बुना। उनके बारे में सबसे अहम बात तो यही है कि वे हिंदी फिल्मों में छोटे-मोटे विलेन का रोल करते हुए दाखिल हुए और देखते ही देखते मोस्ट हैंडसम स्टार का तमगा पहन लिया। बात करें उनके फिल्मी सफर के आगाज की तो 1968 में विनोद खन्ना सबसे पहले फिल्म 'मन का मीत' में नजर आए थे। पेशावर से मुंबई आकर बसे विनोद खन्ना पर सुनील दत्त की नजर पड़ी। दिखने में अच्छे खासे थे तो झट से उन्हें साइन कर लिया, लेकिन बतौर खलनायक। इस फिल्म में हीरो थे सुनील दत्त के भाई सोम दत्त। दिलचस्प है कि सोम दत्त तो आज लोगों को शायद ही याद हैं, पर विनोद खन्ना लंबी कद काठी, उनके संवाद कहने के तरीके, उनके फिल्मों के नाम और न जाने क्या-क्या आज भी लोगों को याद हैं। 1970-71 तक फिल्मों में विनोद खन्ना की पहचान कायम हो चुकी थी और वे हर तरफ डिमांड में थे, पर 'आन मिलो सजना', 'पूरब और पश्चिम', 'सच्चा झूठा' जैसी कई फिल्में इस दौरान आईं, जिनमें वे हीरो के बजाए सहायक भूमिका या खलनायक के तौर पर ही दिखे। विनोद खन्ना को असली पहचान दिलाई गुलजार की फिल्म 'मेरे अपने' ने। इस फिल्म में बेरोजगारी और भटकाव से गुजर रहे युवक के रोल में विनोद खन्ना ने मौजूदगी दर्ज कराई। कह सकते हैं कि वो गुलजार के ‘एंग्री यंग मैन’ थे। 1973 में गुलजार की ही फिल्म 'अचानक' में विनोद खन्ना ने वही रोल निभाया था जिसके लिए अब अक्षय कुमार को 'रुस्तम' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला है। इसके बाद जो फिल्में उन्हें मिलती गईं, उन फिल्‍मों ने उन्हें हैंडसम और डैशिंग हीरो की जमात में सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। स्थिति यह रही कि फिल्मों से संन्यास लेकर जब वे बॉलीवुड में दूसरी पारी खेलने 1987 में आए, तब भी उन्होंने कई हिट और यादगार फिल्में दीं। विनोद खन्ना की जिंदगी का एक जबरदस्त टर्निंग प्वाइंट तब था जब 1997 में उन्होंने राजनीति में उतरने का

एक नजर

विनोद खन्ना को सुनील दत्त फिल्मों में लेकर आए विनोद के ही कहने पर हेमा मालिनी राजनीति में आईं

चार बार सांसद और केंद्र में मंत्री रहे विनोद खन्ना

मन बनाया। वे चार बार भाजपा से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे। युवाओं में लोकप्रिय होने के कारण बड़े-बड़े नेता भी चुनावी सभा में उनके साथ मंच साझा करने के लिए तैयार रहते थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री बनाए गए थे, हालांकि छह माह बाद ही उन्हें विदेश राज्य मंत्री बना दिया गया था। विनोद खन्ना को ही हेमा मालिनी को भी राजनीति में लाने का श्रेय जाता है। विनोद खन्ना अपने चाहने वालों के बीच कितने लोकप्रिय थे और कैसे लोग उन्हें लंबे समय तक अपने साथ देखना चाहते थे। इसकी इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि जब वे अस्पताल में भ्‍ार्ती हुए तो बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान ने सामने आकर कहा कि जरूरत पड़ने पर वे उनके लिए अंगदान भी करेंगे। इरफान के ही शब्दों में, ‘विनोद खन्ना इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के सबसे खूसबूरत इंसान हैं। मैंने विनोद खन्ना की सारी फिल्में देखी हैं। उनकी खराब सेहत की खबर सुनकर धक्का लगा। कोई भी मदद हो तो जरूर करूंगा। जरुरत पड़ी तो अंगदान भी करूंगा।’ यही वजह है कि मुंबई के वर्ली में जब उनका अंतिम संस्कार किया गया तो अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, सुभाष घई, दीया मिर्जा, ऋषि कपूर समेत कई हस्तियां पहुंचीं। सबने नम आंखों से विनोद खन्ना को आखिरी विदाई दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभिनेता विनोद खन्ना के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें एक लोकप्रिय अभिनेता, समर्पित कार्यकर्ता और बेहतरीन इंसान बताया। वहीं करण जौहर ने ट्वीट कर लिखा कि आज भी सिल्वर स्क्रीन पर विनोद खन्ना की मौजूदगी को कोई टक्कर नहीं दे सकता है, उनके स्टारडम को देखते हुए हम बड़े हुए हैं। कह सकते हैं कि विनोद खन्ना की मृत्यु ने कला जगत से लेकर राजनीति और आम लोगों तक सबको अपने-अपने तरीके से मर्माहत किया है।


01-07 मई 2017 पपुआ न्यू गिनी की लोककथा

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इंडोनेशिया की लोककथा

नस की लंबाई

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हुत दिन गुजरे, दो दोस्त थे। वे दोनों बहुत ही पक्के दोस्त थे, लेकिन एक दूसरे के साथ मजाक में तरह-तरह की चाल चलने की कोशिश में रहते थे। एक दिन उन्होंने सूअर को फंसाने के लिए गड्ढा खोदने का निश्चय किया। यह तय हुआ कि दोनों एक-एक गड्ढा खोदें, लेकिन उन्होंने एकदूसरे को नहीं बताया कि कहां और कब खोदेंगे। एक दिन एक दोस्त ने गड्ढा खोदने का फैसला किया और एक झाड़ी के पीछे जाकर खोदना शुरू किया। उसने यह नहीं देखा कि उसका दोस्त झाड़ी के पीछे छिपा उसको देख रहा है। दूसरा आदमी उसको देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया। फिर वह उस जगह से निकल कर सोचने लगा कि कौनसी चाल चली जाए अपने दोस्त को बेवकूफ बनाने के लिए। उसको एक चाल सूझी। उसने ‘टैरो’ का एक खूब बड़ा पत्ता गड्ढ़े के ऊपर रख दिया। उसका दोस्त गड्ढ़ा खोदे जा रहा था, गहरा और गहरा। आखिरकार वह थक गया। वह थोड़ा आराम करने के लिए रुका और जो सिर उठा कर ऊपर देखा तो उसने गड्ढे के ऊपर रखे पत्ते में बने छेद में से आती रोशनी देखी। उसने समझा कि रात हो गई है और आकाश में चांदतारे निकल आए हैं। उसने आंख बंद कर ली और उसको तुरंत नींद आ गई। उसके दोस्त ने चुपके से गडढे के ऊपर से पत्ता हटा लिया। जो आदमी खुदाई कर रहा था उसने सिर उठा कर देखा तो खूब धूप चमक रही थी। वह समझ गया कि उसके दोस्त ने कोई चाल चली है। अब

लोककथा

उसको अपना बदला लेना था। वह सोचने लगा। दूसरे दिन दूसरा आदमी गड्ढा खोदने चला। उसका दोस्त चुपके-चुपके उसके पीछे हो लिया। पहला वाला आदमी, जिसे गड्ढा खोदना था, एक स्थान पर पहुंचा और उसने खुदाई शुरू की। वह खोदता गया जब तक कि थककर चूर नहीं हो गया। उससे अब और खुदाई नहीं की जा रही थी। थोड़ा-सा आराम करने के बाद उसने फिर खोदना शुरू किया। उसका दोस्त कहीं से एक सांप लाया। उसके चारों ओर डोरी बांध कर उसको गड्ढे में नीचे तक लटका दिया। जो आदमी खोद रहा था उसने सांप को देखा तो डर के मारे चीख पड़ा और मदद के लिए लोगों को पुकारने लगा। फिर उसको एक उपाय सूझा। गड्ढे की दीवरों से मिट्टी खोद कर उसने गड्ढे को भरना शुरू किया। उसका दोस्त बाहर छिप कर खड़ा था और उस डोरी को हिलाता जा रहा था जिसमें सांप बंधा था। और वह बेचारा जिसने गड्ढा खोदा था, इतनी मेहनत से खोदे गड्ढे को भरता जा रहा था, जब तक गड्ढा इतना ऊंचा नहीं हो गया कि वह आसानी से बाहर निकल सकता। उसका दोस्त तब तक वहां से चंपत हो गया था। उसने वह रस्सी देखी जिससे सांप को बांधा गया था और वह समझ गया कि उसको बेवकूफ बनाया गया। यह मजाक था इसीलिए किसी ने बुरा नहीं माना। दोनों ने एक-दूसरे को सब-कुछ बता दिया और उन्होंने यह भी अनुभव किया कि इस तरह समय की ओर मेहनत की कितनी बर्बादी हुई।

लिन साबर के दांत में बहुत ही ज्यादा दर्द हो रहा था। वह बाजार में मिलने वाली सब तरह की दवाइयां आजमा चुका था, लेकिन उनसे फायदा नहीं हुआ। एकदो रोज के बाद दर्द लौट आता। उसने गांव के वैद्य की दवा भी ली, लेकिन फायदा नहीं हुआ। वह बड़बड़ाता, ‘आजकल रोजी-रोटी कमाना ही कठिन नहीं हो गया है, दवाइयों का असर भी अब वैसा नहीं होता।’ दांत के डॉक्टर के पास क्यों नहीं जाते? एक मिनट में ठीक हो जाओगे,’ एक पुराने शिक्षक ने कहा। ‘पता नहीं, श्रीमान। मैं दांत के डॉक्टर के पास जाने को तैयार नहीं हूं। वह दांत उखाड़ देगा या सुइयां चुभाएगा, या काटा-कूटी करेगा। कहीं गलत काट दिया तो और भी तकलीफ होगी। क्या पता, मुझे अपाहिज ही बना दे।’ मलिन साबर ने कहा। लेकिन एक दिन दर्द भड़क उठा। जब तकलीफ सही नहीं गई तो मलिन साबर ने सोचा, ‘दांत के डॉक्टर के पास जाना ही होगा, चाहे मैं मर ही जाऊं।’ जिस गाल में दर्द था उसे हाथ से दबाए वह डॉक्टर के पास गया। ‘नमस्ते, डॉक्टर साहब!’ कृपा कर के मेरे दांत का कुछ कीजिए,’ उसने डॉक्टर से कहा। डॉक्टर ने कहा, ‘चिंता मत कीजिए। लेकिन आपको कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।’ मलिन साबर कराहता हुआ बेंच पर बैठ गया। दूसरे कमरे से एक मरीज की चीखें सुनाई दे रही थीं। सुन कर मलिन साबर के तो हाथ-पांव ठंडे हो गए। वह डर से कांपने लगा, और सोच ही रहा था कि वहां से खिसक जाए जब उस कमरे का दरवाजा खुला और डॉक्टर ने उसको अंदर आने को कहा। मलिन साबर का दिल बुरी तरह धड़क रहा था और शरीर कांप रहा था। वह पछता रहा था कि यहां आया ही क्यों? ‘यहां बैठिए।’ डॉक्टर ने एक कुर्सी दिखाकर

कहा और अपने औजारों को तैयार करने लगे। रोशनी में डॉक्टर के औज़ारों को चमकते देख, मलिन साबर और भी कांपने लगा। डॉक्टर एक औजार हाथ में लिए उसके पास आ कर बोला, ‘अच्छा, अपना मुंह पूरा खोलिए।’ ‘नहीं,नहीं, दांत मत उखाड़िए, डॉक्टर। मेरे ऊपर दया कीजिए,’ कांपती आवाज में मलिन साबर ने कहा। कुछ नाराज होकर डॉक्टर ने कहा, ‘फिर और क्या चाहते हो मुझसे?’ ‘कोई दवा दे दीजिए।’ ‘सुनो, मुंह खोलो...जल्दी,’ डॉक्टर ने हुक्म दिया। मलिन साबर ने जबड़े और भी कस कर भींच लिए। लेकिन डॉक्टर और प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं था। उसने मलिन साबर का जबड़ा पकड़ कर उसका मुंह खोल दिया। मलिन साबर अभी भी अपना मुंह पूरा खोलने को तैयार नहीं था। तब डॉक्टर ने अपनी नर्स को कुछ हिदायत दी। नर्स ने पीछे से एक सुई मलिन साबर की पीठ में चुभो दी। ‘आह!’ डर से मलिन साबर चिल्लाया। उसका मुंह पूरा खुल गया। डॉक्टर ने फौरन अपने औजार उसके मुंह में डाले और जिस दांत में दर्द था, उसे उखाड़ दिया। आवश्यक उपचार करने के बाद डॉक्टर ने हंस कर कहा, ‘अब घर जा सकते हो।’ ‘तुम कहां गए थे, मलिन साबर?’ किसी ने उससे पूछा। ‘डॉक्टर के पास, दांत निकलवाने।’ ‘दर्द हुआ?’ ‘दर्द क्यों नहीं होगा? मैं तो मर ही गया था समझो। नस इतनी लंबी थी कि यहां तक पहुंचती थी।’ अपनी पीठ मलते हुए उसने कहा।


32 अनाम हीरो

01-07 मई 2017

अनाम हीरो प्रफुल्ल सामंतारा

प्रफुल्ल को ‘ग्रीन नोबेल’

अवैध खनन के विरोध में प्रफुल्ल सामंतारा ने लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई

डिशा के अवैध खनन विरोधी कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतारा प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार2017 से सम्मानित हुए हैं। इस पुरस्कार को 'ग्रीन नोबेल' के तौर पर भी जाना जाता है। भारत स्थित ओडिशा प्रांत के खनन विरोधी कार्यकर्ता प्रफुल्ल प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार 2017 विजेताओं में से एक हैं। प्रफुल्ल के साथ 5 अन्य विजेताओं को भी यह पुरस्कार दिया गया। गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार हर साल मानव सभ्यता वाले छह इलाकों-एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण व मध्य अमेरिका और द्वीप व द्वीपीय देशों में काम रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिया जाता है। प्रत्येक विजेता को

पुरस्कार राशि के रूप में 175,000 अमेरिकी डॉलर मिलते हैं। 65 वर्षीय प्रफुल्ल सामंतारा ने 12 साल की एक लंबी कानूनी लड़ाई का नेतृत्व किया। इन्होंने डोंगरिया कोंद आदिवासियों के भूमि अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया और नियामगिरी पहाड़ियों को एल्यूमीनियम अयस्क की विशाल खुली खान बनने से बचाया। इसके लिए 12 वर्ष तक चली कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि केवल ग्राम परिषद ही खनन की जमीन को लेकर निर्णय ले सकती है। प्रफुल्ल से पहले गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार विजेता भारतीयों में मेधा पाटकर, एम.सी. मेहता, रशीदा बी व चंपा देवी शुक्ला और रमेश अग्रवाल शामिल हैं।

न्यूजमेकर

अंकों से खेलने वाली लड़की 13 साल की उम्र में अदिति गणित के कठिन से कठिन सवालों को पल में मौखिक रूप से हल कर देती है

भा

रत में आमतौर पर जब भी कोई छात्र गणित में अच्छा होता है, तो उसकी तुलना महान गणितज्ञ आर्यभट्ट से की जाने लगती है। 13 साल की अदिति शर्मा के साथ आजकल यही हो रहा है। अदिति को भी अपनी इस उपलब्धि पर फख्र है। अदिति गणित के कठिन सवालों को पल भर में हल कर देती है। अधिकतर बच्चों के लिए जहां जटिल समीकरण किसी स्वप्न की तरह होते हैं, वहीं अदिति के लिए यह बच्चों का खेल है। नई दिल्ली में आयोजित राज्य स्तरीय 12वीं एबेकस एंड मेंटल अर्थमेटिक चैंपियपशिप में अदिति ने 'लिसनिंग कॉम्पिटिशन' में जीत हासिल की। अदिति ने कागज पर सवाल हल करने में लगने वाले समय से अधिक तेजी से इकाई से हजार अंक वाली संख्या की पंक्तियों की गणना को मौखिक रूप से हल किया। उन्हें एक ट्रॉफी और 5,100 रुपए का पुरस्कार दिया गया है।

अदिति

अब तोहफे में तालाब सूरत के नामी हीरा कारोबारी बनवा रहे हैं दो सौ बीघे का तालाब

सावजी ढोलकिया सू रतके बारेके हीरामें सुकारोबारी नकर हर कोई यही कहता

करोड़ रुपए का है। उन्होंने अपने माता-पिता और गांववालों को पानी की किल्लत झेलते है कि बॉस हो तो ऐसा। अपने कर्मचारियों देखा है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी को बोनस के तौर फ्लैट और गाड़ियां भेंट अपने सूरत दौरे में कहा था कि यहां हीरा करने वाले ढोलकिया इस बार एक बड़े कारोबारियों के मां-बाप भी बस अच्छी बारिश कल्याणकारी मकसद से चर्चा में हैं। की प्रार्थना करते हैं, उनके लिए बस उन्होंने इस बार गर्मी में पानी की यही मायने रखता है, बच्चों की शिक्षा कमी से जूझने वाले 20 गावों के भी उनके लिए बड़ा विषय नहीं। 80,000 लोगों की परेशानी खत्म ढोलकिया की योजना के अनुसार करने का बीड़ा उठाया है। इन गांवों दूरदराज के इन गांवों में तालाब की में गुजरात के अमरेली जिले का खुदाई का काम शुरू उनका अपना गांव भी हो गया है। वहां दुधाला भी शामिल दिन-रात ट्रैक्टर चल है। ढोलकिया इन रहे हैं, खुदाई हो रही बीस गांव के लोगों है, ताकि मॉनसून के लिए 200 बीघे से पहले 200 बीघा का तालाब खुदवा जमीन पर 20 फुट रहे हैं। ढोलकिया का कारोबार आज गहरा तालाब तैयार करीब 6,000 किया जा सके।

संयुक्त पुलिस कमिश्नर (लाइसेंसिंग) दिल्ली नं.-एफ. 2 (एस- 45) प्रेस/ 2016 वर्ष 1, अंक - 20

सावजी ढोलकिया

सुलभ स्वच्छ भारत (अंक - 20)