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रोिहत कुमार 'है पी' की ग़ज़ल

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ग़ज़ल आसमान म रखक़र पांव लटक रहे ह बेिसर-पैर के सपने लेकर भटक रहे ह घुटन म तकलीफ, पीठ म ददर् है भारी दिु नया कहती दे खो कैसे मटक रहे ह नीलकंठ ने जहर पी िलया सारा ऐसे जैसे मीठा शबर्त कोई गटक

रहे

शायद उनका यार या शायद होगा गु सा िदल के बोल गले म 'रोिहत' अटक रहे ह

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ग़ज़ल दिु नया गौरख-धंधा

समझ सके ना बंदा करे

बड़ी चतुराई

गले लगेगा फंदा

भख ू बढ़ी जब उसकी

तेज पड़ गया मंदा

दे खा एक अमीर बड़ा मांग रहा था चंदा

पाप की जहां कमाई धंधा है वो गंदा आंखे ह

जब मैली

'रोिहत' िदखता मंदा

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ग़ज़ल च का, झाड़ू, कपड़े-वपड़े सब िनबटा आया िजनसे जो थे पकड़े-वकड़े सब िनबटा आया उनके घर म नया-नया सब, नहीं पुराना कुछ दादी वाला चरखा-वरखा सब िनबटा आया जीवन म कुछ तोड़े-जोड़े िर त के धागे

सबको दे खा, परखा-वरखा सब िनबटा आया जाने क्या वो खोज रहा है चहुं-िदशाओ म मने खोया, पाया-वाया सब िनबटा आया एक पहना, इक और रखा है मने ओढन को बाकी के सब कपड़े-वपड़े सब िनबटा आया

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ग़ज़ल घर-सा पाओ चैन कहीं तो हमको भी बतलाना तम ु हमसा कोई और िदखे तो हमको भी िदखलाना तम ु

िमलने को तो िमल जाएंगे िदखने को तो दीख जाएंगे ढूंढ सको तो ढूंढ िनकालो हो हमसा कोई दीवाना तम ु उसकी चाल समझ ना आए बोल रहा है मेरे-बोल उसम मझ ु म फकर् बहुतेरा दोनो को अजमाना तम ु सात समंदर पार की दरू ी भी होती है क्या कोई दरू ी

पल भर म हम आ जाएंगे िदल से हम बल ु ाना तुम

आँख म इक सपना भी है और दोन का अपना भी है 'रोिहत' पल म मन जाएंगे यार से उ हे मनाना तुम

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ग़ज़ल जाडा हम लगे ना गरमी का हो असर हर हाल म कर लेते ह फ़कीर तो बसर तुम िदल से दआ दे दो जब भी हाथ उठाके ु दे खा नहीं है उसको कभी हो वो बेअसर

सख ू ा कभी पड़ता कभी बाढ़ का रहता डर

िफर भी ना कभी रखता मेहनत म वो कसर दे खी नहीं माथे पे पड़ी एक भी िशकन पांव से नंगा कभी नंगा हो उसका सर माथे पर तेज 'रोिहत' वाणी म गर असर मेले वहीं लगगे जहां कर ल अपना घर

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Ghazals by Rohit Kumar  

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