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ध्वनिन की फलके जहाँ तारे करवनट बदलते है सीसा जहाँ मश्तिष्श्तष्क पकते है

आकाश, िनलर्लज्ता से उबलता है , भक्षण करता है तारो की नग्नता का। एक अदत ू और प्रबल दिू धिया आकाश मश्ते गहरे िरसती है

एक घोघा चढता है और िबगाड दे ता है मश्तेघो की प्रशािष्न्त को। आनंद और क्रोधि, यह सारा आकाश हमश्त पर उडेलता है , मश्तेघो की तरह, और हूिरकेन की िनष्ठुर हवनाये उडेलती है अश्लीलताये। –अन्तोिनन आतद ुर्ल

ध्वनि की फलकें  

अन्तोनिन आर्तुद की कविता