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सुब ह का सूर ज अब मे रा नह ीं है ! मीना चोपड़ा

कविता सींकलन1


“She unveils shimmering facets of love, possession, mind and self with sensitivity. She is delicate but strong, gentle yet sharp, vulnerable yet proud. Self-actualization is more a matter of routine than effort; it is the moment beyond the ones of self knowledge that she wants to live up to, and become, not a mere rhapsody in search of life but a rhapsody in search of the deeper self. In this sense she is her own Sun…” - Gautam Siddharth The Pioneer (Book reviews), (India) 28.9.1996

“The embryonic bond that she shares with nature forms the keynote of her work. Words freeze the impalpable fears finding their refuge in the womb of earth”. First City Delhi India 1999

“The glimpses of the setting sun

from my childhood nostalgically dissolve in the abundantly spread hues of the setting sun on the skyline of this beautiful country, Canada, to which I now belong and this creates a new sunshine within. This sunshine melts in me and flows out in the form of verses. Distances fade; my past becomes one with my present, rising sun of the East starts blending into the setting sun of the West. The directions merge into each other fading into the moments beyond.”Meena Chopra

“Her works are the rhythmic ex-

pression of the state of the subconscious”.- Soumik Mukhopadhyaya -The Statesman, Delhi, (India) 20th August 1999 “A characteristic of her style is that physical sensations beautifully blend with abstract thought .Yearning for fulfillment is attended upon by consciousness of fragmentation.”-Dr. Shalini Sikka The Quest, (India) 1996

“Painting and poems go very well together. There is vitality in the forms, colours and the words chosen by Meena Chopra. Here is a charming feast of lyricism in paintings and poems”. -Dr. L.M. Singhvi London U.K. 1996

Cover and the inside drawings Publisher: Hindi Writers’ Guild

“The heightened passionate quality of her verses imbues the images with a strong emotional power.”-Manisha Vardhan The Pioneer, New Delhi(India) August 11 1999 2


सबु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है! ( Adieu to the Dawn)

मीना चोपड़ा

कविता सींकलन

प्रकाशक: हहन्द राइटसस गिल्ड कैनडा


ISBN No. : 978-0-9813562-2-8 © Meena Chopra First Edition : 2010 Published simultaneously in Hindi , Urdu and Roman Scripts. Publisher: Hindi Writers’ Guild 3577 Nablus Gate, Mississauga, ON. L5B 3J9 hindiwg@gmail.com Price : $12.99

आिरण एिीं अन्य रे ख़ा-गचत्र लेखिका के हैं।

Cover and the inside drawings are by the Author.

“Art awakens a sense of real by establishing an intimate relationship between our inner being and the universe at large, bringing us a consciousness of deep joy.” -Rabindranath Tagore

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“कविता की भाषा में उनके सींग्रह की असींलक्ष्य ्रमम ्यीं्य्ििन पनने िाले

को, अिर सचमच ु िह सहृदय भािक ु है , तो उसे एकाएक कौंधेिा कक यह किियत्री ्यींजना के सहारे ककतनी मार्मसक बात कह रह है और उसके भीतर

की करुणा का आकाश ककतनी दरू तक भासमान है । असल में आँिों से द ि पड़ने िाले आकाश से कह ीं बड़ा और अपररमेय है बींद आँिों का आकाश।”

- डॉ.कैलाश िाजपेयी सदस्य साहहत्य अकादमी, भारत

उनकी कविताएीं पररपक्ि कविता का ठोस नमन ू ा हैं जो जीिन में सींबन्धों को नई ्याख्या दे ती हैं। विदे शों में रची जा रह कविताओीं में मीना चोपड़ा की कविताओीं का स्थान विर्शष्ट माना जाएिा। -तेजेन्र शमास , लींदन, इींिलैंड

Accompanying the cluster of these lovely oil pastels worked out like ’two inches of ivory’ are her versus. The words and the visuals support each other and the viewer is taken on to a journey to the end of the clouds. Look at her art or read her poetry there is a feeling of scaling heights, going to the mist of the mountains and scenting the fragrant pines.” -Nirupama Dutt Indian Express (India), August 22 1999

“ ‫مینا کے رنگ کینو س پر بکھر تے ہیں تو شا عری کر تے ہیں اور جب وہ شا عری‬ ‫ مینا‬-‫کر تی ہے تو دھنک کے رنگ اس کی شا عری کے کینوس پر بکھر جا تے ہیں‬ ‫کی رو ح فطر ت کے حسن سے جڑی ہو ئ ہے اور جب اسکا حسا س دل اور سو چتی‬ ‫آ نکھیں ان منا ظر سے گزر تے ہیں تو عشق کے آ وے پر ا حسا س کی مور تیا ں ڈ ھا‬ ‫لتے ہا تھ جلتے ہو ئے چر ا غو ں جیسی نظمیں قطا ر در قطا ر سجا تے چلے جا تے‬ "‫ہیں‬-Nasim Syed (Meena Chopra ek shaiira hii naheii.n artist bhee hai is liye shaayad jab is ke rang canvas par bikharte hai.n to rang shairii kerte hai.n aur jab woh shairii kartii hai to dhanak ke rang us kii shairii ke canvas par bikhar jate hai.n. Meena kii ruuh fitrat ke husn se ju.dii huii hai aur jab iska hassas dil aur soochte ankheen iin manazir sy guzar te hain to ishq ke aaway per ehssas kii morteyaN dhaltee hath jalte hue charagon jise nazmiin qatar der qatar sajate chalii jate hai.n....Nasim Syed)

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समर्पित

मै तुम्हारे सींयम को अपने में धारण कर िनरीं तर सुलिती लौ से जीिनधारा को िनष्कलींक करती हुई इस अविरत जीिन अग््न में अनाहद तक समवपसत हूँ। सुबह का सूरज अब मेरा नह ीं है ।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


र्िषय सच ू ी समवपसत

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आमुि—डा. कैलश िाजपैयी

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भौितक से अमूतस तक की यात्रा—तेजेन्र शमास

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मेर िोज—मीना चोपड़ा

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My Search—Meena Chopra

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ACKNOWLEDGMENTS

कुछ िनशान िक्त के कविता

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धआ ु ँ ओस की एक बँद ू

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एक सीप, एक मोती उन्मुक्त गथरकन

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स्पशस

कोयला अमािस को—

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पनाह

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अनमोल

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जीिन िाथा

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और कुछ भी नह ीं आिोश िक्त

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प्रज्िर्लत कौन? अिशेष

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अविस्मरणीय

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अींतरीं ि

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मुट्ठी भर

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चाह — ?

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आनन्द मठ

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बेनाम

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एक ररश्ता

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और एक अींितम रचना!

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ऊँचाई

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तीथस

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ये अँधेरे

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नूर

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अबद्ध

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सरहद

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आितसन

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र्मट्ट की सुिींध

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सींिाद

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गचींिार

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अघटनीय

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शो-विण्डो जौहर

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नीींद से जािता यह कौन?

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िँज ू

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कदम

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बह िोले —

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इश्क

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यि ु रात!

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धुींध के र्मटते चहरे ।

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कहाँ ढूनू मैं!

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अींग्रेज़ी मे र्लिी कुछ कविताओीं के हहन्द और कुछ हहन्द कविताओीं के अींग्रेज़ी में भािानुिाद

Transcreation of some English poems into Hindi and of some Hindi poems into English बाररश के खिलोने Misty Madness

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और एक अींितम रचना!

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A Stilled Sonata!

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कविता

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Co-travelling with a Poem

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A Death, A Beginning

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अरसे से िँज ू ती आिाज़ —

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White Canvas

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माखणक

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Memories

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शून्य की परछाईं मीना चोपडा का पररचय

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Meena Chopra, An Introduction

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Clippings from past reviews on the poems in English

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चचत्र

Drawings

पष्ृ ठ (Pages):

22 40 47 57 64 73

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आमि ु

डॉ.कैलाश िाजपेयी

अबसे लिभि पन्रह िषस पूिस मीना जी का एक कविता सींग्रह अींग्रेज़ी भाषा में यह ीं भारत से प्रकार्शत कराने में अपनी भी एक अदनी सी भूर्मका थी। इसके बाद मीना जी कब कहाँ िो िईं पता ह नह ीं चला। किर एकाएक दरू चल िई मीना जी की आिाज़ दोबारा सन ु पड़ी। िे विदे श में इतने लम्बे अींतराल के बाद भी रचनारत रह सकीीं यह सुनकर सुिद आश्चयस हुआ। मीना जी की आिाज़ के ठहराि से इतना भर लिा कक िह जैसी पहले थीीं िैसी ह अब भी हैं। किर उन्होंने बताया कक िे अब हहन्द भाषा में एक कविता सींग्रह प्रकार्शत करने के र्लये कृतसींकल्प हैं। उनके सींग्रह की पाण्डुर्लवप जब सामने आई तो रचनाएीं पनकर स्पष्ट हुआ कक पक्षी चाहे ग्जतनी भी दरू चला िया हो अपने नीड़ को नह ीं भल ू ता। िे शब्द की अथसछवि को भीतर-भीतर तक जानती हैं। कड़ी सीमा में न बींधने िाल सच्चाई को िे अपने सींिेदय सार-िर्भसत, प्रौन और तराश दृग्ष्ट के साथ पूर तन्मयता के साथ रूपाियत करती हैं। उनकी कविताओीं में एक िुज़र हुई दिु नयाँ की ट स या कसक रह-रह कर थपेड़े मारती है ग्जसे अींग्रेज़ी भाषा का सहारा लें तो ’इम्पलोज़न’ कहा जा सकता है । स्ियीं उनके सींग्रह का शीषसक ह उनके भीतर की याचना का दस्तािेज़ बनकर सामने आता है । िह ृ स्थी और उनके आए हदन के सींघषों की झलक भी उनकी इन अनुभूितयों में सुनी जा सकती है जो ’प्रसाद’ के ’आँस’ू की पींग्क्तयों की याद हदलाती है । मीना जी का सींग्रह ’सुबह का सूरज अब मेरा नह ीं है’ एक आह है एक ऐसी आह ग्जसका असर होने दे ने के र्लये एक ह ग्ज़न्दिी काफ़ी नह ीं। मीना जी की छ्टपटाहट यह है कक िे अभी भी जीिन को अर्भनय मान कर नह ीं जी पाईं। अर्भनय को जीिन की प्रितछवि तो हम सभी मानते हैं मिर जीिन को एक अर्भनय-धारािाहहक मानने की युग्क्त उन्हें अभी भी नह ीं भाई। 11


स्रष्टा की तरह उन्हें भी अिर अपना जीिन अर्भनय जैसा लिने लि जाये तब शायद यह कौंधेिा कक सूरज नह ीं हम उदय और अस्त हुआ करते हैं।

हालाँकक यह तकस घोर तत्ि ज्ञान है और कविता तकस से कह ीं आिे जन्म लेती है । कविता की भाषा में उनके सींग्रह की असींलक्ष्य ्रमम ्यीं्य्ििन

पनने िाले को अिर सचमुच िह सहृदय भािुक है तो उसे एकाएक कौंधेिा कक यह किियत्री ्यींजना के सहारे ककतनी मार्मसक बात कह रह है और उसके भीतर की करुणा का आकाश ककतनी दरू तक भासमान है । असल में आँिों से द ि पड़ने िाले आकाश से कह ीं बड़ा और अपररमेय है बींद आँिों का आकाश। भारत दे श में रहकर विदे शी भाषा और विदे श पहुँच कर अपनी भाषा में कविता रचने का दस् ु साहस करने िाल इस किियत्री को ढे र सारा स्नेहयुक्त आशीष। डॉ.कैलाश िाजपेयी सदस्य साहहत्य

अकादमी, भारत

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भौितक से अमत ू स तक की यात्रा -

तेजेन्र शमास

साहहत्य का सींसार एक अथाह समर ु है। प्रत्येक लेिक उसमें अपने साहहत्य की

कुछ बन् ू दें शार्मल कर उस विशाल जलाशय का भाि बना जाता है। ट . एस.

ईर्लयट ने अपने लेि ट्रै डीशन अण्ड इग्ण्डविजअ ु ल टे लेण्ट में कहा है कक ककसी भी लेिक के र्लये अपनी भाषा के साहहत्य की परम्परा का ज्ञान आिश्यक है।

यह उसकी पज ूीं ी है। इस पज ूीं ी में जब िह अपनी िनग्ज प्रितभा को जोड़ता है और नये साहहत्य की रचना करता है, तो श्रेष्ठ साहहत्य का जन्म होता है। विदेशों में

रचे जा रहे हहन्द साहहत्य पर यह आरोप लिता रहता है कक इस

साहहत्य में र्सिाय नॉस्टे लग्जया के और कुछ हदिाई नह ीं देता। नॉस्टेलग्जया के पक्ष और विपक्ष दोनों में ह बहुत कुछ र्लिा जाता रहा है। विदेशों में हहन्द साहहत्य रचने िाले अगधकाींश रचनाकार पहल पीन के प्रिासी होते हैं। उनके र्लये

अपनी जड़ों को भल ू पाना आसान नह ीं होता। इसर्लये उनके लेिन में नॉस्टे लग्जया सहज रूप से आ जाता है।

जब प्रिास में लेिक पहल बार अपनी कलम उठाता है तो उन्ह ग्स्थितयों और घटनाओीं की तरफ़ यात्रा शुरू कर दे ता है जहाीं से नई धती और नये लोिों के बीच रहने के र्लये आ पहुींचा है। उसकी कविता में िाींि, मींदर, पीपल, िाय, िोबर या किर अपना शहर और उससे जड़ ु ी सभी यादें उभर कर आती हैं। यहद

लेिक कहानीकार है तो उसके चररत्र और घटना्रमम उसके अपने छूटे हुए पररिेश से होते हैं। मीना चोपड़ा अपने नॉस्टे लग्जया को बहुत ख़ूबसूरती से अपने पररचय में कुछ इन शब्दों में दे ती हैं, “िहाीं नैनीताल की पहाड़ी के पीछे डूबते सूरज को मैं

जब भी यहाीं कैनाडा में अपनी खिड़की के सामने िैले क्षक्षितज पर दे िती हूीं तो पूिस का िह सूरज पग्श्चम के सूरज में विल न होता चला जाता है । मेरा

कल मेरे आज में ढल जाता है । मुझ में एक नया सूरज जन्म ले लेता है और कविताओीं में बहने लिता है ।”

“मे र कला और कविताओीं में अीं धे रों और उजालों की िोद में पड़ा एक

ररसता हु आ ररश्ता, पु रु ष और प्रकृ ित के बीच की दू ररयाीं नापता हु आ, कु छ जलती और बु झती कहािनयों में अपनी प्रितबबग्म्बत पहचान को िोजता अक्सर िो जाता है । ”

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मिर मीना चोपड़ा का नॉस्टे लग्जया आम लेिक के नॉस्टे लग्जया से अलि है। मीना ने अपने नॉस्टे लग्जया को अपने ितसमान से जोड़ र्लया है। उन्हें नैिनताल की पहाड़ी के पीछे का सरू ज अपने घर की खिड़की के सरू ज में विल न होता महसस ू होता है। िे नैनीताल के अतीत को कैनाडा जैसे दे श के ितसमान में जीने की कुित रिती हैं। “उम्र की पीठ थपथपाता / बचपन की पुरानी कोठर में / छुप

के जा बैठा है / सीलन के कींबल ओने / मेरे अतीत का टुकड़ा / िुमसुम सा सो रहा है। ”

आज की आधिु नक कविता या कहा जाए कक परू ा साहहत्य ह विमशस-केग्न्रत है।

मीना चोपड़ा का कविता सींसार मल ू तः प्रेम पर आधाररत है। नार और परु ु ष का सींबन्ध – चाहे आग्त्मक हो, शार ररक हो या किर बौद्गधक – ह उनकी कविताओीं का केन्रबबन्द ु है। अपनी कविता प्रज्जिर्लत कौन में मीना कहती हैं, “देह मेर /

कोर र्मट्ट ! / धरा से उभर / तम् ु हारे हाथों में / तम् ु हारे हाथों तक / जीिन धारा से / र्सींगचत हुई यह र्मट्ट ।”

मीना चोपड़ा की बहुत सी कविताएीं िुलेपन से शुरू होती हैं। सींबन्धों में शर र का महत्ि उन कविताओीं में उभरने लिता है । उनमें माींसलता का अनुभि स्पष्ट हदिाई दे ता है । मिर अपनी पें हटीं्ज़ की ह तरह किर उनकी कविताएीं एबस्ट्रै क्ट हो जाती हैं। “सपनों के सपाट कैनिास पर / रे िाींए िीींचता / असीम

स्पशस तुम्हारा / कभी खझींझोड़ता / कभी थपथपाता / कुछ िाींचे बनाता / आींकता

हुआ गचन्हों को / रीं िों से तरीं िों को र्भिोता रहा / एक रात का अहसास ।” मीना का कविता माखणक कुछ इस तरह से शुरू हो कर हमें बताती है , “ रात रोशन थी / श्िेत चाींदनी सो रह थी मुझ में / िनष्कलींक / अींधेरों की मुट्ठी में बन्द / जैसे मखणक हो सपस के िन से उतरा हुआ। ”

मीना चोपड़ा एक सींिेदनशील कवियत्री होने के साथ साथ एक समथस गचत्रकार भी हैं। उनकी पें हटीं्ज़ अगधकतर एबस्ट्रै क्ट ह होती हैं। ककन्तु उनकी पें हटीं्ज़

भी शार ररक सींरचना से बच नह ीं पाती हैं। उनकी बहुत से पें हटीं्ज़ नार और पुरुष के अींिों का आभास दे ती हैं। कह ीं नार के िभासशय में जैसे बच्चा हदिाई

दे ता है तो कह ीं नार और परु ु ष के अींिों का आभास होता है । ठीक उनकी कविताओीं की ह तरह उनकी पें हटीं्ज़ में एबस्ट्रै क्ट होने के साथ साथ एन्र य

तत्ि भी मौजूद हैं। आमतौर पर गचत्रकार कविताओीं पर पें हटीं्ज़ बनाते हैं

जबकक मीना की पें हटीं्ज़ में कविता की लय महसूस होती है तो उनकी कविताएीं ख़ुद-ब-ख़ुद शब्द गचत्र बनाती चलती हैं। “हाथों को िो छुअन और 14


िरमाहटें / बन्द हैं मुट्ठी में अब तक / ज्योितमसय हो चल हैं / हथेल में रक्िी रे िाएीं। / लािों जुिनू हिाओीं में भर िए हैं / तक़द रें उड़ चल हैं आसमानों में / सहदस यों की कोसी धूप / िछटक रह है दहल ज़ तक /”

मीना के भीतर की प्रेयसी अपने प्रेमी की िनरीं तर प्रतीक्षा करती है। िह अपने प्रेमी के साथ बबताए हुए पल िह एक पोटल में बाींध कर घर के एक कोने में रि दे ती है। उसके साथ बबताए हुए पलों की याद में िह उन माींसल पलों को बार बार जीती है - “इींतज़ार हो तो बस एक ह / कक िह रात एक बार किर

लौटे / बूद ीं बूद ीं चेहरे से तेरे िुज़रे , / भर के हाथों में उसे सहलाऊीं मैं / होठों से

चूमूीं / पोटल में रि दीं ू किर से - / इस बार सम्हाल कर / अपनी पलकों तले।” – (मुट्ठी भर)

अपने प्रेमी के साथ एक हो जाने की चाह बहुत सी कविताओीं में बार बार उभर कर सामने आती है। प्रकृित की िोद में, बहती नद के ककनारे मीना का कवि-हृदय

अपने प्रेमी को पा लेने की तमन्ना रिता है। अपनी कविता चाह में भी िे कहती हैं, “ रात के पानी में / बहती नद के ककनारे / धल ु रहे थे। इसे अमत ृ मान कर /

हाथों में भर कर / घट ू ीं घट ू ीं वपया था मैने / ‘मैं’ को उतार कर / ‘तम ु ’ को पहन र्लया था मैन।ें ”

मीना मल ू तः प्रेम की कवियत्री हैं। श्रींिार रस उनकी कविता के केन्र में मौजद ू है । आदमी और औरत के ररश्तों की पररभाषा उनकी हर कविता ढूींढती है । एक ऐसी तड़प जो बार बार कवियत्री के हदल को कचोटती है , “कैसा सींयोि था

यह। कौन सा भोि? / ककसकी इबादत? / र्सजदा ककसको? / िोज कैसी? / कैसा सपना? / चाह ककसकी -? / जो न र्मट न ह बुझी कभी।”

एक और स्तर पर जब मैं इन कविताओीं को पनता हूीं तो मुझे उनमें ओशो की सोच भी हदिाई दे ती है । मीना चोपड़ा भी अपनी कविताओीं में सींभोि के मा्यम से समागध के सुि तक पहुींच जाना चाहती हैं। कविता में िह माींसलता से शुरूआत करती हैं और इस्लामी इबादत से आिे बनते हुए भििान की िींदना तक पहुींच जाती हैं, “आसग्क्त से अनासग्क्त तक की दौड़ / भोि से

अभोि तक की चाह / जीिन से मृत्यु तक की / प्रिाह रे िा के बीच की / दरू याीं तय करती हुई मैं। इस िोने और पाने की होड़ को। अपने में विसग्जसत करती िई।” (तीथस)

मीना चोपड़ा स्ियीं कहती हैं कक उनकी कविताओीं में सािसभौम द्िैतिाद की

िोज है – कतास और कमस के बीच एक ररश्ता; आत्मा और पदाथस के बीच का 15


यह एक प्रयास है अींतःप्रिाहहत विरोधाभासों को समग्रता से समझने का; जीिन के रहस्यों को जानने की कोर्शश। उनकी कविताओीं में एक विशेष ककस्म की िहराई है , “कफ़न में र्लपटा बादलों के / छुपता सूरज / अींधेर क़ब्र में सो चुका

था / न जाने कब से। अपने आप से रूठा सूरज।

एक आि के दररया में ।

बहते ककनारे उफ़क के / न जाने जलते रहे ककसके र्लये। / हदन के ढल जाने तक।” (इश्क)

बब्रटे न के कवि मोहन राणा की ह

तरह मीना चोपड़ा की कविताएीं विश्ि

कविता को अपना लक्ष्य मानती हैं। उनकी कविताएीं पररपक्ि कविता का ठोस नमन ू ा हैं जो जीिन में सींबन्धों को नई ्याख्या दे ती हैं। विदे शों में रची जा रह कविताओीं में मीना चोपड़ा की कविताओीं का स्थान विर्शष्ट माना जाएिा। -तेजेन्र शमास, लींदन, इींिलैंड

हदनाींकः 30.11.2009

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मेर िोज — मेरा जन्म स्थल 'नैनीताल' उत्तर भारत में ग्स्थत एक सद ु ीं र एिीं सौम्य पिसतीय निर

है और यह सदा ह मेर आतींररक प्रेरणा का स्रोत रहा है | विग्स्मत हूँ की मेर कमस भर्ू म कैनाडा का प्राकृितक सौंदयस मझ ु े मेरे बचपन से जोड़ता हुआ सदैि ह मझ ु े उसकी याद हदलाता रहता है |

विशेषतः यहाँ का असीर्मत आकाश और उसके अींत में डूबता सूरज, क्षक्षितज पर बहते रीं िों के साथ दरू - दरू िनिाहों के छोर तक िैल धरती, यह सब

मुझ में आकर जैसे थम सा जाता है | िहाीं अपने बचपन से जुड़े नैनीताल की पहाड़ी के पीछे डूबते सूरज को मैं जब भी यहाँ कैनाडा में अपनी खिड़की के

सामने िैले क्षक्षितज पर दे िती हूँ तो पूिस का िह सूरज पग्श्चम के सूरज में विल न होता चला जाता है | मेरा कल मेरे आज में ढल जाता है | मुझ में एक नया सूरज जन्म ले लेता है और कविताओीं में बहने लिता है |

अींधेरों और उजालों की िोद में पड़ा एक ररसता हुआ ररश्ता, पुरूष और प्रकृित के बीच की दरू रयों को नापता हुआ, कुछ जलती और बुझती कहािनयो में अपनी प्रितबबग्म्बत पहचान को िोजता अक्सर िो जाता है |

— और इन उड़ते हुए पलों के आभास को अपनी मुट्ठी में बींद कर लेने कक एक अींतह न तड़प, दृश्य को अदृश्य में पररणत करती हुई इस ठहरे बहाि की एक िनर सच्चाई, मेरे मूक होते हुए शब्दों में कुछ कहती हुई चुप हो जाती है |

मैं अपने रे िागचत्रों की लकीरों में , रीं ि भर तूर्लका से अपने कैनिास के स्पशस में , पींग्क्तयों में बबिरते शब्दों में और इस तरह कई बार अपनी लेिनी और

कािज़ के बीच की छटपटाहट में , मानि चेतना के छलािे को अक्सर िोजती हूँ |

सुबह का सूरज अब मेरा नह ीं है’ मेर कविताओीं का दस ू रा सींकलन है और हहन्द में पहला। इस सकींलन की अगधकतर कविताओ़़़़ की रचना कैनाडा में 17


२००४ से अब तक मेरे यहाीं आने के बाद हुई है । कुछ बहुत पहले भी र्लिी िई थीीं ़़ और यहाीं शार्मल भी हैं। अन्त मे कुछ अींग्रेज़ी की चुनी कविताओीं के भािाथस भी हैं, जो मेरे अींग्रेज़ी के सींकलन ’इ्नाइहटड लाइन्स’ से ल िई हैं और इस सींकलन में शार्मल की िई कुछ हहन्द की कवितओीं के भािाथस भी अींग्रेज़ी में हैं। अींग्रेज़ीीं सींकलन ’इ्नाइहटड लाइन्स’ १९९६ मे प्रकार्शत हुआ था। चाहती हूीं कक आने िाले समय में अपनी सभी कवितओीं के भािों को समेट कर, अींग्रेज़ी में र्लिी सभी कवितओीं को हहन्द में और हहन्द की कविताओीं को अींग्रेज़ी में अनूहदत करके प्रकार्शत करूीं और आप सबके साथ बाँटू।

यह सींकलन उदस ू ग्स््रमप्ट में भी उप्लब्ध है । इसे उदस ू में र्लिने और प्रकार्शत

करिानें में मैं उदस ू शायरा नसीम सैयद की बहुत आभार हूँ। इसके अितररक्त कुछ प्रितयाँ उन लोिों के र्लये जो हहन्द या उदस ू ग्स््रमप्ट नह ीं पन सकते रोमन र्सक्रमप्ट में भी उप्लब्ध हैं। इसे रोमन ग्स््रमप्ट में लाने के र्लये मैं हहन्द लेिक एिीं प्रकाशक सुमन घई की बहुत आभार हूँ। — मीना चोपडा

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My Search………..

Serene surroundings of my birth place ‘Nainital’, a scenic hill resort in North India, have always been a source of inspiration to me . Strangely enough the beauty of Canada reminds me of my birth place a lot. Significantly the immenseness of the sky, the glory of the setting sun with its ever-changing colors and the unlimited wide expanse of the earth stills my nature within. The glimpses of the setting sun from my childhood nostalgically dissolve in the abundantly spread hues of the setting sun on the skyline of this beautiful country, Canada, to which I now belong and this creates a new sunshine within. This sunshine melts in me and flows out in the form of verses. Distances fade; my past becomes one with my present. The rising sun of the East starts blending into the setting sun of the West. The directions merge into each other fading into the moments beyond. My poems search for the universal duality, a relationship between the subject and the object, spirit and the matter, trying to find the totality in this influx of paradoxes, in an effort to unlock the mysteries of life. The eternal agony of human desire within longs in a ceaseless strive to capture the very essence of each and every fleeting moment. Reflections of a passing feeling of being touched by the limitless remain for a while and then disappear into a stark silence of an unknown abstract reality. I search for the elusive reality of human consciousness through the lines, splashes of colors and the impressions of brush strokes on my canvasses and at times through pen and paper in the form verses. "Subah ka Suraj ab Mera Nahin Hai"(Adieu to the Dawn) is my second collection of poems and first in my native 19


language which is Hindi. The first collection was in English “Ignited Lines” and was published in 1996. Most of the verses in this new collection were written after I came to Canada, from 2004 and onwards. Towards the end of the collection I have trans-created few of my poems of English from my collection “Ignited Lines” into Hindi and of Hindi from this collection into English.. I do plan to bring out a collection of poems in both the languages trans-creating from either language into the other and share it with you all. Urdu poetess Nasim Syed has been helpful in transliterating and getting this collection published in Urdu script. I am very thankful to her for this. This collection is also available in Roman script for the people who can’t read either Hindi or Urdu scripts. It has been transliterated in Roman by writer and publisher Mr. Suman Ghai. I am thankful to him for doing the same. -Meena Chopra

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ACKNOWLEDGMENTS I would like to express my gratitude to the following people in bringing out this collection: Dr. Kailash Vajpeyi (poet and philosopher from India, author of many books on philosophy, poetry and columns in various newspapers), and a friend, has been a guiding force to me always and to my writings. Shri Tejendra Sharma (story writer and poet from England, author of many novels and story books ), for his immense support and encouragement. Shri Suman Ghai (writer, poet and publisher of a literary Hindi website from Canada) has been a major help in bringing out this collection. His broad thinking process and timely suggestions have been important, right from the beginning to the end, both in literary and in technical points of views. Ms. Nasim Syed (Urdu poetess and writer, President of Canadian Urdu forum), who became very close to my writings and me in a very short span of time. Her suggestions while publishing the book have been very useful. Dr. Shailja Saksena (poet and writer) and Shri Rakesh Tiwari (poet, writer and publisher) for their support and their concrete and useful suggestions. Tahira Masroor (teacher, journalist and writer) for her thorough knowledge of Hindi, Urdu and English,. Her suggestions became very useful, specifically in the final editing of Urdu edition of this book. Ben Girn (photographer) for photographing my paintings. Bhupinder Virdi , my life partner and friend, for his continuous support and suggestions. Taabeer Virdi, my daughter for her frequent inputs, constant support , ideas and inspiration. Mississauga Library Systems and Ms. Marian Kutarna (In-charge History and Art department), for their support, encouragement, and in arranging and sponsoring the formal launch of this ‘Hindi Poetry Book’ 21


and the art exhibition in Canada. I am proud to belong, now, to this beautiful country Canada which is truly sensitive to its unique multiculturalism and its magnanimity to embrace all. -Meena Chopra

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भुवपींदर और ताबीर को 23


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कुछ ननशान िक्त के झील से झाींकते आसमान की िहराई में बादलों को चूमती पहाड़ों की परछाईयाीं

और घने पेड़ों के बीच िड़िड़ाते अतीत के बुझते चेहरे झरनो के झरझराते मुि से झरते मधुर िीत सींिीत हिाओीं पर बबिर िें दे के िूलों की सुनहर िुशबू दरू कह ीं सजदों में झुकी घींहटयों की िूज ीं बाींसुर की धुन में र्लपट कर चोहटयों से

धीमे—धीमे उतरती सुबह की सुर ल धूप! पानी में डुबककयाँ लिाती कुछ मचलती ककरणें और उन पर छ्पक—छपक चप्पूओीं से साींसे लेती ग्ज़न्दिी की चलती नौका

रात की खझलर्मलाहटों में तैरती चुग्प्पयों की लहरें

ककनारों से टकराकर लौटती जुिनुओीं की िह पुरानी चमक! उम्मीदों की ठण्डी सड़क पर हिाओीं से बातें करती ककसी राह्िीर के सपनों की तेज़ दौड़ती टापें पिडींडडयों को समेटे कदमो में अपने पहुींची हैं िहाीं तक— जहाीं मींग्ज़लों के मुकाम़़ अक़्सों में थम िये हैं

झील की िहराई में उतरकर

नीींद को थपथपाते हुए उिती सुबह की अींिड़ाई में रम िये हैं! *यह कविता मेरे बचपन और

जन्मस्थल नैनीताल से प्रेररत है।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


कर्िता िक्त की र्सयाह में तुम्हार रौशनी को भरकर समय की नोक पर रक्िे शब्दों का कािज़ पर कदम-कदम चलना! एक नए िज़ूद को मेर कोि में रिकर माहहर है ककतना इस कलम का मेर उँ िर्लयों से र्मलकर तुम्हारे साथ-साथ यूँ सुलि सुलि चलना!

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


धआ ु ँ उठता है र्मट्ट के अन्तःकरण से िह धुआँ धुआँ क्यों है ? र्मट्ट जो मेर हथेल से लिकर बदल जाती थी एक ऐसे क्षण में ग्जसका न कोई आहद था न ह अन्त! उसी र्मट्ट से जो उठता है आज िह धुआँ क्यों है ?

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


ओस की एक बँद ू ओस में डूबता अन्तररक्ष विदा ले रहा है अँधेरों पर गिरती तुषार और कोहरों की नमी से! और यह बूँद न जाने कब तक ग्जयेिी इस लटकती टहनी से जुड़े पत्ते के आर्लींिन में ! धूल में जा गिर तो किर र्मट के जाएिी कहाँ? ओस की एक बूँद बस चुकी है कब की मेरे ्याकुल मन में !

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


एक सीप, एक मोती

बूँदें! आँिों से टपकें र्मट्ट हो जाएँ। आि से िुज़रें आि की नज़र हो जाएँ। रिों में उतरें तो लहू हो जाएँ! या कालच्रम से िनकलकर समय की साँसों पर चलती हुई मन की सीप में उतरें और मोती हो जाएँ|

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


उन्मक् ु त

कलम ने उठकर चुपके से कोरे कािज़ से कुछ कहा और मैं स्याह बनकर बह चल

मधुर स्िछ्न्द िीत िुनिुनाती,

उड़ते पत्तों की नसों में लहलहाती!

उल्लर्सत जोशीले से

ये चल पड़े हिाओीं पर अपनी कहािनयाँ र्लिने। र्सतारों की धूल

इन्हें सहलाती रह ।

कलम मन ह मन

मुस्कुराती रह िीत िाती रह ।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


चिरकन

प्रकृित की लय पर विचर्लत शब्दों ने सींिेदनाओीं को प्रेररत ककया, नज़र में उट्ठे पानी की तरीं िों में र्भिो हदया! कई नए प्रितबबम्ब उभरे कई कहािनयाँ भीरूह का इस तरह से पतझड़ के उड़ते सूिे पत्तों पर एक नया नृत्य और हिाओीं पर गथरक-गथरक चलना — जीिन का यह कलरि कुछ अधूरा सा नह ीं है क्या?

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


स्पशि

यह ीं से उठता है िह निाड़ा िह शोर िह नाद

जो हहला दे ता है पत्थरों को झरनों को आकाश को िह सब जो मुझमें धरा है । र्सफ़स नह ीं है तो एक स्पशस जहाँ से यह सब उठता है |

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


कोयला कुछ जला सा कुछ बुझा सा

कच्चा कोयला। िमी उतरती है हाथों से

घरों की ठीं डी द िारों में िछपे

ठीं डे ग्जस्मों को जिाने के र्लये। चल जाती है िनडर सी

कई सुरींिों में । जला था जो िह कच्चा तो नह ीं था!

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अमािस को— अमािस को—

तारों से गिरती धूल में

चाींदनी रात का बुरादा शार्मल कर एक चमकीला अबीर बना डाला मैने

उजला कर हदया इसको मलकर रात का चौड़ा माथा।

सपनों के बीच की यह चमचमाहट सुबह की धुन में

ककसी चरिाहे की बाींसुर की िुनिुनाहट बन िूींजती है कह ीं दरू पहाड़ी पर। ऐसा लिता है जैसे ककसीने भोर के नशीले होठों पर

रात की आींिों से झरते झरनो मे धुला चाींद लाकर रि हदया हो

िकस से ढकी बफ़ी का डला हो। और-

चाींदनी कुछ बेबस सी उस धुले चाींद को आिोश मे अपने भरकर

एक नई धुन और एक नई बाींसुर को ढूींनती उसी पहाड़ी के पीछे छुपी

दोपहर के सुरों की आहट में

आती अमािस की बाट जोहती हुई िो चुकी हो|

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


पनाह माथे पे िुद तक़द र की लकीर को र्मटाकर

ढलते हुए सूरज को क्षक्षितज की िोद से उठाकर आिोश़़ में तुम्हारे रि हदया था मैंने|

एक बार किर

डूबने से इसे बचा र्लया था मैंने एक बार किर

अींधेरों में डूबने से बच िई हूँ मैं एक बार किर

यह शाम ढलने से रुक सी िई है | इस थमी शाम के चोिे को पहन कर बीते हुए िक्त की धूल और र्मट्ट से लथपथ इबादत में —

कुछ जले — बुझे लम्हों की लौ र्लए रूबरू तुम्हारे आ जाऊीं अिर तो क्या पल भर के र्लए आिोश में अपने

पनाह दे सकोिे मुझ? े िह आिोश़़

जहाँ मैंने कभी

काींपते हाथों से उठाकर

डूबता सूरज रि हदया था| 35

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अनमोल मदमस्त सुबह

लहरों में घुलती

मचलती ठीं डी हिा

सनन—सनन स्मृितयाँ। ह रे मोती जड़े सुनहरे पींि पहन

ऊँची उड़ानें भरती

खझलर्मल स्मृितयाँ।

सुबह की ठीं डक में डोलता स्िप्न लोक का झूला

स्मृितयों को पीींिों में पनाह दे ता जैसे कोई सुबह का भूला। अतीत में भीिे िक़्त के

बदलते चोलों में पलती

आज रूबरू िड़ी हैं

सदृश्य आँिों में भर हैं,

िुपचुप अनजान आिाज़ों में

जड़ी हुई ये अनमोल स्मृितयाँ। अँधेरों में इन्हें

मैं डुबो नह ीं सकती

कार्लि से रीं िों की इन्हें

र्भिो नह ीं सकती

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


मूँद कर आँिें

और ओनकर कफ़न काले मैं सो नह ीं सकती।

मुआफ़ करना मेरे अज़ीज़ मुझे

मैं अपनी स्याह की उजल सुबह के ये कीमती मोती मौत को सूँघती

कच्ची नीींद के धािों में वपरो नह ीं सकती

— मैं दफ़न हो नह ीं सकती!

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


जीिन गािा

उठती हैं गिरती हैं दपसण हैं साँसें प्रितबबम्बों को जन्म दे ती हैं। प्रितबबम्ब, जो कई गचह्न बना दे ते हैं दाि दे ते हैं प्रश्न -? कई दायरों पर र्लि दे ते हैं दायरे कई सीनों पर। छप जाती है समय के पन्नों पर जीिन िाथा।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


और कुछ भी नह ीं

ख़यालों में डूबे

िक्त की र्सयाह में

कलम को अपनी डुबोकर

आकाश को रोशन कर हदया था मैंने और यह लहराते,

घूमते -किरते, बहकते

बेकफ़्रम से आसमानी पन्ने न जाने कब चुपचाप आ के छुप बैठे

कलम के सीने में । नज़्में उतर ीं तो उतरती ह िईं मुझमें आयते उभर ीं

तो उभरती ह िईं तुम तक। आँिें उट्ठीीं तो दे िा

क़ायनात जल रह थी। जब ये झु ु्क्कीीं

तो तुम थे और कुछ भी नह ीं।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


आगोश ककरणों के पानी से धुल सूरज की साँसों में ढल िररमा – चौिट पर मेरे ग्जस्म की हर रोज़ जला करती है । आँिों में छुपाए परछाई आसमान की दरू मुस्कुराता झरना दगू धया सिेद पानी से बेजान र्मट्ट को धोता है िुशबू में बदलता मेरा बदन हिा का हाथ थामें ऊचाइयों को छूता है । आसमान की विशाल बाहें अनन्त से उठकर समेट लेती हैं मुझे मुझमें र्समट कर। लेककन – मेर िामोश आिाज़ को ऐसा क्यों लिा कक यह आिोश तुम्हारा था? 40

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


व़क्त

एक वपघलता सूरज दे िा है मैंने तुम्हार आँिों के ककनारे पर! कभी दे िा है ककनारों से वपघलता रीं ि गिरकर दररया में बहता हुआ और कभी दररया को इन्ह ीं रीं िों में बहते दे िा है दे िा है जो कुछ भी बस बहता ह दे िा है ।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


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प्रज्िललत कौन? दे ह मे र कोर र्मट्ट ! धरा से उभर , तु म्हारे हाथों में तु म्हारे हाथों तक जीिन धारा से र्सींगचत हुई यह र्मट्ट । अधरों और अँ धेरों की उँ िर्लयों में िुँथ ती एक हदये में ढलती र्मट्ट , ग्जसमें एक हटमहटमाती रौशनी को रक्िा मैंने और आँ िों से लिाकर अशस की ऊँचाइयों को पूजा एक अदृश्य और उद्द प्त अचसना में । कच्ची र्मट्ट का हदया है और कीं पकँ पाती हथे र्लयाँ मे रा भय! मे र आराधना और तु म्हार उदासीनता के बीच की स्पधास में द पक का गिरना गचटिना और टूट जाना, रौशनी का थक के बुझ ना बुझ के लौट जाना — मे र इबादत का अन्त क्या यूँह टूटना, बबिरना और र्मट जाना है ? तो किर प्रज्िर्लत कौन? 43

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अिशेष िक्त िग्ण्डत था, युिों में ! टूटती रग्स्सयों में बींध चुका था

अँधेरे इन रग्स्सयों को िनिल रहे थे। तब !

जीिन तरींि में अविरत मैं

तुम्हारे कदमों में झुकी हुई तुम्ह ीं में प्रिाहहत

तुम्ह ीं में र्मट रह थी

तुम्ह ीं में बन रह थी|

तुम्ह ीं से अस्त और उहदत मैं तुम्ह ीं में जल रह थी

तुम्ह ीं में बुझ रह थी!

कुछ िाँचे बच िए थे कई कहािनयाँ तैर रह थीीं ग्जनमें

उन्ह मे हमार कहानी भी अपना ककनारा ढूँढती थी!

एक अींत ! ग्जसका आरम्भ, दृग्ष्ट और दृश्य से ओझल

भविष्य और भूत की धुन्ध में र्लपटा मद्धम सा हदिाई दे ता था।

अविरल !

शायद एक स्िप्न लोक !

और तब आँि िुल िई

हम अपनी तकद रों में जि िए।

टुकड़े - टुकड़े ज़मीीं पर बबिर िए। 44

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अर्िस्मरणीय

धूल थी कपड़ों पर जमी

ककतनी आसानी से झड़ िई मैं

चेतना के हाथों झटकने मात्र से र्मट्ट में भर िई मैं।

असहाय से िुनाहों में िन उलझन बनकर एक काले गचराि के िहरे कुएँ में बींद

दम भरती हुई अँधेरों को अँधेरों से जोड़ती चल िई। कह ीं अच्छा होता -

र्सफ़स कुछ समय के र्लये

अचेतन में चेतन का ईंधन रि

एक छोटा सा जुिनू सुलिा दे ते तुम – हलका सा मुझको

हदये में अपने जला लेते तुम मीठी सी नीींद में मुझको सुला दे ते तुम। अगचर ह सह –

कुछ तो बबसात होती कह ीं कोई आस –

चाहे र्मट्ट के साथ होती।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अींतरीं ग तुमसे र्मल धूप तुम्ह ीं को अवपसत कर द मैंन।े सुबह की कोि से उहदत होकर यह आसमानों में डबडबाई थी। बूँद बूँद टपकी र्सलेट अँधेरों में । एक मद्धम सी रोशनी बबिर िई थी। कहती थी कुछ हमसे जो हम सुन ह न सके। ककसी चुप सी अमािस को कभी मुड़कर बींद दरिाज़ों के पीछे छुपे अँधेरों को टटोल पाएँ अिर तो शायद छू सकें उस टपकते नूर के कुछ अमूल्य सुनहरे मोती। कुछ िछटक के गिर िए थे इधर-उधर जो समेट के रि र्लये थे मैंने पास अपने।

सहदयों तक जीने के र्लये शायद कािी हों।

छोट सी पूँजी है न तो घटती है न ह टूटती है कभी | हो सके तो इसमें से कुछ तुम भी रि लो। जीिन का मोल और कुछ भी नह ीं अींतरीं ि, आिे इसके और कुछ भी नह ीं। 46

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


मट् ु ठी भर मुट्ठी भर िक़्त कुछ पींि यादों के

बटोर कर बाँध र्लये थे

रात की चादर में मैंने।

पोटल बनाकर रि द थी

घर के ककसी कोने में बहुत पहले। आज जब भूल से तुम ख़्िाब में आए तो याद आ िई।

बैठी हूँ िोजने तो कुछ र्मलता ह नह ीं

टटोलती हूँ, ढूँनती हूँ नज़रें पसार कर

पोटल तो क्या

घर के कोने भी

िुम हो चुके हैं सारे । इींतज़ार है तो बस एक ह

कक िह रात एक बार किर लौटे

बूँद-बूँद चेहरे से तेरे िुज़रे , भर के हाथों में उसे सहलाऊँ मैं

होठों से चूमूँ

पोटल में रि दँ ू किर से — इस बार सम्हाल कर

अपनी पलकों के तले।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


चाह — ? रात के पानी में

बहती नद के ककनारे

घुल रहे थे।

इसे अमृत मानकर हाथों में भरकर

घूट ँ —घूट ँ वपया था मैंने।

’मैं’ को उतारकर

’तुम’ को पहन र्लया था मैंने। अपने अग्स्तत्ि की झोल में

िुनाहों का शिुन रिकर

रूह के दरिाह को अवपसत

हो िई थी मैं।

शायद तुम भी — ?

कुछ पलों के र्लए ह सह ! कैसा सींयोि था यह?

कौन सा भोि?

ककसकी इबादत?

र्सजदा ककसको? िोज कैसी?

कैसा सपना? चाह ककसकी — ? जो न र्मट न ह बुझी कभी!

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


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आनन्द मठ

हाथों की िो छुअन और िरमाहटें

बन्द है मुट्ठी में अब तक ज्योितमसय हो चल हैं हथेल में रक्िी रे िाएँ। लािों जुिनू हिाओीं में भर िए हैं तक़द रें उड़ चल हैं आसमानों में सहदस यों की कोसी धूप

िछटक रह है दहल ज़ तक,

और तुम – कह ीं दरू –

मेर रूह में अींककत आकाश-रे िा पर चलते हुए –

एक बबींदु में ओझल होते चले िए। डूब चुके हो

जहाँ िनयित – सािर की बूँदों में तैरती है ।

मेर मुट्ठी में बींधी रे िाएँ

ज्योितमसय हो चुकी हैं। तुम्हार धूप

मुझमें आ रुकी है । 50

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


बेनाम

सुबह ने जब अपनी आँिें बींद कर ल थीीं और रात सपनों को साथ र्लए बुझने लिी थी उस िक्त समय की कोि से एक अनाम से ररश्ते ने जन्म र्लया था जो ज़मीन के िुनाहों की दहल ज़ को लाींघकर अपने नाम को कायनात की परछाई मे ढूँढता हुआ अँधेरों मे िो िया था |

िह ग्जसका कोई नाम नह ीं था क्या िह मेरा अपना भी नह ीं था — ?

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


एक ररश्ता लय और प्रलय के बीच की दरू रयों को नापता साग्ज़श में िक्त की र्लपटा जल से सघन बादलों के भरा-भरा चमकती बबजर्लयों में उलझकर काँपता रहा एक ररश्ता। बादलों से टपकता धुन्ध में लटकता बचता – बचाता आ गिरा िछटक के ज़मीीं की िोद में टूट के कह ीं से एक ररश्ता यूह ँ भटकता– भटकता | मौन हो िई है ज़मीीं मेर सूँघ के साँप रह िई है जल-जल के धुआँ हो चुकी है िित को अपनी ढूँढती है !

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


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और एक अींनतम रचना!

िह सभी क्षण जो मुझमें बसते थे

उड़कर आकाश िींिा में बह िए। और तब आहद ने अनाहद की िोद से उठकर इन बहते पलों को अपनी अींजल में भरकर मेर कोि में उतार हदया। मैं एक छोर रहहत िहरे कुएँ में

इन सींिेदनाओीं की िूँज सुनती रह । एक बुझती हुई याद की अींतह न दौड़! एक उम्मीद! एक सींपूणस स्पशस!

और एक अींितम रचना!

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


ऊँचाई

नीले आकाश के बीच से लटकती रग्स्सयाँ धरती की ओर ग्जनके छोर ऊँचे हैं बहुत छोट हैं बहुत मेरे हाथों की लींबाइयाँ शायद — उस छलाँि की ऊँचाई क्या होिी – ग्जसे लिाकर रग्स्सयों के छोर हाथों में पकड़कर बहती हिा के झोंकों की उठती लहरों के साथ लहरा पाऊँिी मैं?

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


तीिि सौंधी हिा का झोंका मेरे आँचल में किसल कर आ गिरा। िक्त का एक मोहरा हो िया। और किर कफ़ज़ाओीं को चादर पर बैठा हिाओीं को चूमता आसमानों की सरहदों में कह ीं जा के थम िया। एहसास को एक नई िोज र्मल ियी। एक नया िजूद मेर दे ह से िुज़र िया।

आसग्क्त से अनासग्क्त तक की दौड़, भोि से अभोि तक की चाह, जीिन से मृत्यु तक की प्रिाह रे िा के बीच की दरू रयों को तय करती हुई मैं इस िोने और पाने की होड़ को अपने में विसग्जसत करती िई।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


न जाने िह चलते हुए कौन से कदम थे जो ज़मीन की उजड़ी कोि में हिा के झोंके को पनाह दे ते रहे । इन्ह ीं हिाओीं के घुघ ँ रे ओीं को अपने कदमों में पहन कर मैं जीिन रे िा की सतह पर चलती रह —चलती रह —

कभी बुझती रह कभी जलती रह ।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


ये अँधेरे धूल और र्मट्ट में सने आरज़ुओीं से लथपथ उठकर नीींद से िहर आँिे मलते, पोंछकर आसमान को दे िते रहे चेहरा अपना र्सतारों के आइने में िुमसुम से ये अँधेरे। डिमिाते रहे – पानी और कीचड़ के छपाकों में छोड़ते िए र्मट्ट के िनशान चप्पलों के तले कभी िहरे तो कभी हलके से किसलते कदम बाररश के। सूिते रहे ये िनशान पैरों के तले र्मट्ट में सने-सने।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


थम िए चलते-चलते धूप से बने आँिन में पहुँच। धुल िई धूप में धूल और र्मट्ट सार बाररश के िीले तन से। सूि कर झड़ िए आइने सारे आसमानों से उतरके। और अब अँधेरों में र्लपटा बाररश का यह कक़स्सा धड़कता है आँिन में अकेला पड़ा पड़ा दे िने के र्लये चेहरों के नकाब ढूँनता है आईना धूप का – दरू बहुत दरू कह ीं – िड़ी रफ़्तार में पड़ी मृितृष्णाओीं के तले।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


नरू एक हाथ में बुझते चाींद का नूर और

दस ू रे में र्मट्ट से िनकल ढे र गचींिाररयाीं पकड़े

चाहा था सूरज के आींिन में उतरना मैने कदम कदम ककरणों की सीहनयाीं चनके । बाद्लों के पीछे छुपा िह उजला सा आींिन जहाँ ककलकार भरते जुिनुओीं का झुण्ड

सूरज के इदस -गिदस मस्ती में घूमता था, रोशिनयों में घुल सुर-महदरा पीकर

हदन और रात के सुर-सािर में झूमता था।

ले ककन हुआ क्या यह अचानक ह ?

क्यों आिें मे र चुींगधींया के रह िईं उट्ठी थीीं ये अधर अपने िोले

बूींद-बूींद बहते नूर के सुरूर को पीने

लेककन!

घूींट–घूींट प्यास को अपनी ह पीती हुई चकाचोंध सी बाींिल होकर ख़लाओीं का कीं बल ओने दपसण में सूरज के , कह ीं जा के िो िईं। न जाने जुिनुओीं की रौशनी में थी कर्शश कै सी?

जो ये पलकों के वपघलते पींि र्लये िनिाहों में दरू –दरू तक उड़ाने भरतीीं

60

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अबद्ध समय

बहता हुआ काश

बन्द हो पाता

मेर मुट्ठी में

और शुरूआत होती एक जीत की,

क्या असींभि है ?

उँ िर्लयाँ जो बाँधती

काींपती लकीरों को एक मुट्ठी में ढ ल पड़ने लितीीं और

इन झर ठों से कुछ क्षण

गिरने लिते

िैलने के र्लये

अनन्त शून्य की

अनदे िी हदशाओीं में — कौन से धािे होंिे जो इन्हें

रे िाओीं में किर बाँध पाएँिे?

उन्ह ीं को िोजती हूँ

शायद तुम्हारे पहलू में ।

61

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


सरहद मेर खिड़की के बाहर एक डूबता सूरज है ग्जसके रीं िों को मैंने आँिों से छुआ और पलकों पे सजाया है । रुकी हूँ उस पल के र्लये जब ये रीं ि मेरे लहू में घुलकर मेर नस—नस में बहें िे और ये नसें मेरे ग्जस्म से िनकलकर मेर रूह में बहें िी। मेरा सूरज इतने कर ब है मेरे कक मैं अपनी आँिों की रौशनी से उसके ग्जस्म को छूती हूँ। रुकी हूँ उस पल के र्लये जब मेर रूह आँिों की रोशनी बनकर िनकलेिी और सूरज र्समटकर मुझमें आ ढलेिा, मैं क्षक्षितज बनकर उन रीं िों में नहा लँ ू िी। 62

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


उस एक पल के सपने को र्लये जी रह हूँ तो र्सफ़स तुम्हारे र्लये। तुम जो मेर खिड़की के बाहर ग्ज़न्दिी की सरहद पर हर रोज़ डूब जाते हो और मैं अपने िाल हाथों में तुम्हारे रीं िों को बटोरे अँधेरों में िो जाती हूँ।

63

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


आितिन टे ने और ितरछे रास्तों पर चलती लकीरें नये, पुराने आयामों से िनकल उन्ह ीं में ढलती ये लकीरें पररगध के ककसी कोने में अटक बबन्दु को अपने तलाशती भटकती रह ीं — भटकती रह ीं — किर दे िा िोल सा सूरज टूट चुका था, ज़हन में भर चुके थे टुकड़े चापों में बँट चुकी थी रोशनी चप्पा -चप्पा। िक़्त में जमी और रुकी ये चापें आज िड़ी हैं रूबरू मेरे

64

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


र्सफ़स पत्थर ह पत्थर हदिाई दे ते हैं। आँिें चुभती हैं ग्जस्म के हर कोने में । दबी दबी थरासई हुई इींतज़ार में तो बस एक ह कक कब इन चापों में बँधी रोशनी वपघले—? लािा बनकर ग्ज़ींदिी के चक्के में कुछ ऐसी घूमे — बस घूमती ह चल जाए।

65

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


66


लमट्ट की सग ु ींध अपनी िोई हुई जड़ों को

आकाश में ढूँना मैंने। नज़र की रफ़्तार रुक िई है इस िींदम ु ी नीले रीं ि के बीच कह ीं। यहाँ से आिे रोशनी बनती नह ीं र्मटती है । र्मट्ट की सुिींध धरती से उठकर मेरे ग्जस्म के हर कोने में जम िई है । मुझे पकड़कर सटा-सटा कर अपने कर ब रिती है । मैं कह ीं बािल तो नह ीं जड़ों को अपनी आसमानों में ढूँढती हूँ।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


सींिाद एक पल िनरीं तर शून्य की िभस में ओझल दस ू र दिु नयाँ की ओट से झाँकता िनःशब्द िूँज में बहते आकाश की छवि को िनहारता ठहरा बहाि ज़मीन में डूबता उभरता र्मट्ट भर िोद से जूझता

अनगििनत आँिों में चूर अचग्म्भत सा भ्रर्मत सा दे िता रहा कह ीं दरू सन्नाटों में र्लपट शब्दािल और सनसनाहटों की िनत नई नृत्य—नाहटका।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


चुपचाप चलता रहा एक सींिाद िनरीं तर! ढूँनता रहा अपनी अींतररत भाषा का मौन — अन्त तक! कई मुिड़ों में उभर कई िीतों से िुज़र सुरों की सुरा में मस्त डिमिाता रहा िुनिुनाता रहा कींपकँपाता रहा एक सींिाद — अनन्त तक!

69

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


चचींगार

उम्र की पीठ थपथपाता बचपन की पुरानी कोठर में छुप के जा बैठा है सीलन का कींबल ओने मेरे अतीत का टुकड़ा िुम — सुम सा सो रहा है । आँिें चल जा रह हैं नए मुकाम नई मींग्ज़लों को पकड़े आिे ह आिे। मुड़ के दे िती है जब कभी ये फ़ुरसत में तो दरू रयों की धुध ँ भर जाती है इनमें । एक गचींिार जलती है हदिाई दे ती है तैरती है बादलों में कह ीं पास आ जाती है समय को तय करती हुई।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


उठ्ठी थी कभी यह बिूला सी अँिीहठयों में जलते पक्के कोयलों के अींिारों भरे सीने से बस िई थी जा के बाररश के बादलों में ईंट—ईंट अपना घर बनाती हुई। आसमानों में लिी झड़ी पकड़े िहर नीींद को बबसराती िनिाहों में उमड़ आई है आज िह गचींिार । जलाती जा रह है आँिों में अनगििनत मशालें और हदये रोशन करने के र्लये पड़ािों में पड़े दम भरते सहमे से, सकपकाते रस्तों के बहकते काकफ़ले।

71

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अघटनीय बबना रफ्तार दौड़ते अँधेरों और द िारों से गचपकते सायों का शहर की तींि िर्लयों में दब ु कते जाना कब तक? खझर ठों से िनकलती नुकील ककरणे पकड़े बींद दरिाज़ों और खिड़ककयों में र्ससकती उदासी का डबडबाना कब तक? बेबस सी — बेरुि और सुन्न िनिाहों का आँिन के अँधेरे कोनों और िुदे आलों में िड़िड़ाना कब तक? कहाँ है — ? कहाँ है — ? रौशनी का िह छलकता पानी बुहार दे ती ग्जसे बहाकर मैं अपने आँिन का हर एक दर और ज़मीीं धो दे ती कोना-कोना इसका | 72

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


सजा दे ती एक -एक आला और झरोिा जलते हदयों की श्रृिलाएँ रिकर। िड़ी हो जाती मैं इस साफ़ सुथरे आँिन के बीच उठाए हुए

अचींर्भत सी नज़रें

और तब — ! घट के रह जाता ररक्त आँिों के स्तग्म्भत शून्य में एक िनरा, साफ़ और स्पष्ट नीला आसमान।

73

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


शो-र्िण्डो

मेनेग्क्िन्स की भीड़ – कुछ वपघलते ग्जस्मों का पानी उभरता है एक शोर िो जाते हैं ग्जसमें अतीत के िुच्छे साँसों की रस्सी में बँधकर जो ग्ज़ींदिी की शो-विण्डो में सजा करते थे।

74

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


75


जौहर एक सुलिन

गचींिार भर र्सरहन

सहलाती रह हथेर्लयों में दबी नर्मसयाँ। न जाने क्यूँ आज

छील रह है िह हथेर्लयों को कतरा-कतरा

िून के कतरों को भेंट होती हुई। किसलती जा रह है कशमकश में मेर पकड़ के बाहर।

बसाना था इसने तो एक

ऐसा विशाल िभस

जन्म दे पाता जो

उस सुलिती लौ को

प्रज्िर्लत हो उठती िह

िीर के माथे का ितलक बनकर चीींिती-गचल्लाती

भकभकाती हुई भस्म कर दे ती अँधेरों और उजालों के मुँह से उिलती लपटें ,

िुद ह भस्म होकर। तोड़ दे ती धराओीं की पररगध उिाड़ दे ती

नीिों समेत समस्त चट्टानें िाड़ दे ती

आकाश के रीं िों में ढके आिरण लहू के;

76

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


चीर दे ती

रफ़्तार की िूँज में

टूटती आिाज़ों के चेहरे , मोड़ दे ती

रुि हिा की धाराओीं का, िनकल पड़ती

यह विजय पताका का तीव्र बाण बनकर; एलान हो जाता

एक जींि का एक जीत पर।

चल जाती

क्षक्षितज के सीने पर

बनी तेज़ धार का किच पहने बेध दे ती

अपने शौयस से

उसीका तपता सीना। क्षक्षितज की धार पर बैठा िह लथपथ सीना

जहाँ हर सीं्या

एक कायनात डूब जाती है उस पार चल जाती है ।

77

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


नीींद से जागता यह कौन? अींिड़ाइयों ने उमड़कर िहर नीींद को विदा द थी | खझलर्मलाहटें दबे पाँि रात की सड़क से िुज़रकर

सुबह के आँिन में आ रुकी थीीं | छू कर इन्हे हाथों से

माथे पे लिाया था मैंने आँिे भर भी िईं थीीं और र्सहर भी | कींपकपाती, अधीर दे िती रह ीं ये अतीत की टहनी से लटकते धािे, वपरोकर ग्जन्हें भविष्य की इकाई में काश मैं अपना ितसमान बुन पाती | एक उजला सा चोिा बना डालती

पहनती ग्जसे िुलके, ठाट-बाट से, चुपचाप ढक लेती अपने

ठहरे िजूद के पैबींद सभी िह िजूद,

ग्जसकी पहचान न जाने कबकी सन्नाटों मे िो चुकी है | अतीत के अनजाने से

कोहरों के उमड़ते सायों मे िुम हो चुकी है । 78

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


गँज ू शब्द छूट िए हैं पीछे

और होंठ बनते जा रहे हैं आिे ह आिे ज़बान िले में अटक कर रह िई है रें कती रहती है बदन के हहस्सों में | आिाज़ों के झुींड तैरते हैं

गचरािों के ऊपर से िनकलते हुए जहाँ कभी ठीं डी हिा

ककसी झोंके को भर के बाँहों में सरसराती चला करती थी I कोई सुराि ढूढीं ती हुई िीतों के जुिनूओीं में

सहदयों के पनपने तक सरिोर्शयों में जला करती थी | आसमान छीं ट चुका है आज यहाँ कोई भी

हरकत नज़र नह ीं आती I शब्द छूट चुके हैं बहूत पीछे दरू रयों में बह िए हैं I

आिाज़ें हलक से उतर के रह िई हैं

होंठ र्सल चुकें हैं सूर्लयों पर लटके हुए सदाँएीं ज़मीन पर गिर-गिर कर र्मट रह ीं हैं िूींजती है यह ज़मीन आज-चुग्प्पयों में बँट -बँट चप्पा - चप्पा | 79

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


कदम टूटता है बबिर जाता है चाींद टुकड़े—टुकड़े धूप से झुलसती लम्बी सड़्कों पर वपघलते काींच के इन टुकड़ों पर चलते चले जाते हैं िून के धािों मे बींधे लहूलुहान नींिे कदम िह कदम जो कभी जलने से डरा करते थे।

80

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


बह खोले — मौत को छूता एक दरिाज़ा कुछ िाल , बेहतर न लम्हों की इबादत इनसे र्मल बूँद-बूँद भीि, भयभीत से झुके सर दौड़ती हुई साँसों के कट जाने का क्षखणक आभास सन्नाटों की सपाट सी ज़मीन को लाींघती लम्बी कूद, पन्नों के बीच की िाई में िसते, औींधें मुहीं गिरते पैर, रक्तह न लडिडाती आिाजों की चीींिती चुग्प्पयाँ| कुछ सफ़ेद चेहरों के बीच जािती मुट्ठी भर ज़दस ककरणे बह िोले उम्र से अपनी माींिती रह ीं जन्मो का हहसाब ज़रास - ज़रास | 81

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


इश़् कफ़न में र्लपटा बादलों के छुपता सूरज

अँधेर कब्र में सो चुका था न जाने कब से

अपने आप से रूठा सूरज एक आि के दररया में बहते ककनारे उिक के न जाने जलते रहे ककसके र्लए हदन के ढल जाने तक| कौन था यह? न जाने कबसे िड़ा था जो सामने बाहें पसारे पौ के िटने और भोर के हो जाने तक! कब्र के िटने और कफ़न के उड़ जाने तक! ओस की बूँद में बैठा िछपकर साँसे लेता इश्क का कोई टूटा हुआ टुकड़ा है शायद

ककसी बबसरे हुए िीत का कोई भटका हुआ

मुिड़ा है शायद!

82

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


यग ु फ़ासलों की एक लम्बी सड़क

उम्र भर पहचानों के जींिलों से िनकल ज़मीन की तह से िुज़रती है |

पसीनों से लथपथ पैरों के िनशान

बनते चले जातें हैं

हिाओीं की सल ब पर िानते जातें हैं

चनते चले जाते हैं

कोई बत्रशूल या कोई िींडा या कफ़र,

सूल पर चने उस शख्स के िून से भीिा चाँद तारे का अम्बर के िुनाहों में एक ररसता ररश्ता।

लहराता है ,

हदशाओीं को थामें

चूमता हिाओीं को

बस िह एक अलमएक ह परचम!

कई जन्मों के टूटे बबिरे शहर बस जातें हैं इसमें

साथ र्लए कुछ पींि पररींदों के और पेड़ों से टूटे पत्तों के चुकते करम! 83

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


पतझड़ का आिोश घबरा कर और भी बड़ा हो जाता है ,

जहाँ सहदयों की धूल में र्लपटे यह पत्ते सरिोर्शयों में उड़ा करतें हैं| धूप की मद्धम ककरणें

जड़ दे तीीं हैं िामोर्शयाँ इनके तन पर|

बाींिाल पतझड़,

झूमती है पहनकर

र्मट्ट की बेपनाह तवपश के कई रीं ि

उलझकर इन महकते उड़ते रीं िों में इतराती है ,

बलिाती है

जैसे नाच उठे

बेकि्रम, बेपरिाह सा कोई मस्त मलींि|

कफ़र थक हार कर

गिर जाती है ज़मीन पर

इस छल भरे नत्ृ य की झीनी चूनर

कुछ रींि भरे आलम

एक पथराई सी सहर|

शीत की िह कड़िी ठण्ड

ग्जसके आिास का घूट ँ पीकर सो चुके थे हम 84

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


तनहा से

तनहाइयों में बींद।

एक बार कफ़र

िछटक जाता है कह ीं दरू वपछले चाँद का िह नूर

भर-भर के उडेल दे ता है कोई रजाितम, रूपहला अबीर

बिीले ठीं डे सीनों में भर दास्तानों के कर ब।

चमक उठता है

बिस पर सोता

सन्नाटों का बेचाप रूआब

कौंधते ििाबो की हकीकत

िनिनाते चेहरों का शबाब

रात की हूर इस दश ु ाले को ओढे

िनकल पड़ती है अपलक

सन्नाटों भर बेनूर दरू रयों की

अकेल पिडींडडयों पर सकपकाती,

िींडहरों से िुज़रती है लाींघती है ,

बचपन की दहल ज़ टोहती है

ककसी सूकियानी सुबह का 85

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


बूँद-बूँद वपघलता

साफ़ सुथरा स्िखणसम र्सन्दरू माींि की सिेद को भरता और तब,

एक चींपई नूर!

हटमहटमाते ककनारों पर िड़ा अतीत में दम भरता परिती आींिों से

िक्त को एक -टक िनहारता

अय्यामों में िुम हो जाता है एक पारदशी दॄश्य!

रुक जातें हैं

रुन्धते िलों के सरु ों को टटोलते लेककन

िनष्कींठ शब्दों में िसते हलींत !

इस मौन होती हुई कायनात से छलकते छीं दों के बीच कौन बैठा था बबछाए पलकें? ढूँढ रहा है अब भी -

बहते रहने की इस होड़ में साँसों के सह हुर्लए कोई ठोस र्शनाख्त

िनयमों में बींद नामदार कोई

्िजों में अींककत उदाहरण दे ता िुमनाम अलमस्त ह सह ।

86

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


बस िह पलक झपकाता र्सलर्सला अपने नसीब से टूटा

बस िह टूट साँसों में भटकती सच्चाई

छोर को छोर से बाींधती

स्िछन्द हर छोर को लाींघती

िनर सच्चाई!

हटमहटमाते ककनारों पर बैठा बस िह ,

एक ह र्सलर्सला कभी कफ़ज़ाओीं में बहता

कभी घूमता पिडींडडयों पर और िींडहरों के बीच से िुज़र

झील के ककनारों पर ठहरता कभी सूर्लयों पर चनता कभी हिाओीं में

बींद िनशानों से गिरता

धुींधले से नसीब के दौर का बस िह ,

एक ह र्सलर्सला।

87

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


रात! चाँद से झरते हुए झरने मे नहा कर िनकल थी

पूनम के िहनों से सजी दल् ु हन बनी रात!

र्सतारों जड़ी झीनी चूनर ओने

चाँदनी का र्सींदरू माँि मे अपनी भर के उतर थी दबे पाँि

िक़् के सीने मे कह ीं से हाथों में ककरणों के कींिन पहने मदमस्त, महकती हुई रात!

रुक िई थी रुख़ पर

ककसी अजनबी गचलमन के क़र ब तरसती नज़रों की छटपटाहट का निीना बनकर! चुभ रह है अब तक

झील सी आँिों के ककनारों पर िह खझलर्मलाती, मचलती हुई रात!

पहन कर उँ िर्लयों में अपनी उसी निीने की अँिूठी

जािते सोते सपनों के झरोिों में कहािनयाँ र्लिती उमड़-उमड़ सहदयों में डुबककयाँ लेती है सहदयों से सहदयों तक बहती हुई यह रीं िों से बनी रीं िों भर रात।

88

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


धींध ु के लमटते चहरे लटकती रह आँिों के ककनारों से बादलों में िछपी बूद ीं की िह हल्की सी नमी छूट कर जा गिर किर पैरों पर बँधी पायल की छ्नक के बीच कह ीं छ्नछ्नाती सी एक र्मटती झनकार के सुरों को सजाती सी। तैरता रहा, तस्िुर अतीत की र्मट्ट में र्लपटा इन छ्नछनाहटों को एडड़यों मे पहने, दे िता रहा मुसलसल, सपनो की अनगििनत कडड़यों को जोड़े धुींध मे र्लपटे हुए धुींध के र्मटते चहरे ।

89

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


कहाँ ढूढ़ू मैं! सूरज को मुट्हठयों में पकड़ने की कर्शश में जले हाथों की लकीरों को कहाीं ढूनू मैं समय की नब्ज़ सो चुकी है

िो िई है अींधेरों में कब की अब इन र्सयाह, सुन्न लमहों में

िमस लहू के कतरों को कहाँ ढूनूँ मै

िक्त का र्मज़ाज तो बदलता रहता है पल पल इस बदलते िक्त के बदलते तुम में अपने को कहाँ ढूनूँ मैं।

िुज़र के छूट िया है बहुत पीछे रह िया है कल मेरा आज उस िक्त को इस िक्त में अपने पास कहाँ ढूनूँ मैं।

चल रहा है ये पहहया सहदयों का सहदयों की सड़्क पर घूमता हुआ सहदयों से, इस घूमती सड़क के उड़ते सैयारों में

धुर अपने र्सतारों की कहाँ ढूनूँ मैं। जलते हए सूरज की ककरणों के सािर में ग्ज़न्दिी की राख़ बहाकर

सन्नाटों में सुलिता िो महताब कहाँ ढूनूँ मैं! छू भी ले मुझे और छू कर छलनी भी कर दे िह लम्स, िह अहसास, ककस जािनब, कहाँ ढूढूँ मैं।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


हहन्द में र्लिी

कुछ कविताओीं के अींग्रेज़ी में भािानुिाद और अींग्रेज़ी मे र्लिी कुछ कविताओीं के हहन्द में भािानुिाद।

Trans-creation of some Hindi poems into English and Transcreation of some English poems into Hindi

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


बाररश के खखलोने

दौड़ती नज़रें जब िुज़रे समय की सड़क पर दे ितीीं हैं िापस मुड़कर तो हदिाई दे ते हैं दरू छोर पर िड़े कुछ बाररश के खिलोने और धूप की नमी में भीिे पुराने ररश्ते

और कुछ -िक्त की धुन्ध में र्मटते पाओीं के िनशान।

92

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


Misty Madness

Blank sight sees the vanishing point, the skyline of the past.

I capture the playful rainfall. A soothing touch, the by gone sunshine wet with the kisses of a rainbow.

Footsteps fade in the misty madness of time.

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


और एक अींनतम रचना!

िह सभी क्षण जो मुझमें बसते थे

उड़कर आकाश िींिा में बह िए। और तब आहद ने अनाहद की िोद से उठकर इन बहते पलों को अपनी अींजल में भरकर मेर कोि में उतार हदया। मैं एक छोर रहहत िहरे कुएँ में

इन सींिेदनाओीं की िूँज सुनती रह । एक बुझती हुई याद की अींतह न दौड़! एक उम्मीद! एक सींपूणस स्पशस!

और एक अींितम रचना!

94

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


A Stilled Sonata!

I soared the heights In the Milky Way sailing a vast panoramic emptiness. The finite dispensed the infinite. Time ticked the circled core. a schismatic dry and dark bottom less pit listened to the echoes, the looped moments, my sensibilities, in the chasm of life. Eternally at run dying reminiscences aspired, a touch a final composition tuned in a stilled sonata.

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


कर्िता

िक्त की र्सयाह में तुम्हार रोशनी को भरकर समय की नोक पर रक्िे शब्दों का कािज़ पर कदम-कदम चलना। एक नए िज़ूद को मेर कोि में रिकर माहहर है ककतना इस कलम का मेर उँ िर्लयों से र्मलकर तुम्हारे साथ-साथ यूँ सुलि सुलि चलना |

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


Co-travelling with a Poem

I penned down the sun shine You!

in an instance Inscriptions settled down in a hub Structuring words into seething sentences, Spread and Smoothened with the finger tips, Surfaced , A spectacular, ever changing landscape, Spelled a lifetime, Blending a new language, A simmering new journey Co-travelling perpetuity.

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


A Death, A Beginning Have you ever searched? Your lost self unfolding those ruthless cold nights inside me ... ? Ever dreamt-? The blazing honesty of my unyielding unborn unprotected vulnerable naked self in your arms, enslaved in disastrous fantasies, tearing me apart making me a whole grasping a moment beyond bondages, seizing a death, a beginning an eternal embrace unraveling mysteries unknown ... ? Have you ever discovered, worshipped, my primeval existence within you. Recognizing loving the woman in me -

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


अरसे से गँज ू ती आिाज़ —

िोजा है कभी तुमने अपनी िोई हुई पहचान को

अँधेर , र्सयाह, ठीं डी रातों की िुलती हुई परतों के तले ढकी हुई मेर कोि की सुलिती परतों में।

तस्िुरस के उस एक एहसास को क्या महसूस ककया है कभी तुमने जहाँ एक अजन्मी कोर सफ़ेद आि की लपटों में र्लपटा मेरा कँपकपाता नाज़ुक सा ग्जस्म कई टूटते ख्िाबों में उलझा रहा तुम्हर बाहों में कभी उधेड़ता रहा और कभी बुनता रहा भटकती साँसो के भटकते हुए सपने। लम्हों को लम्हों में तलाशता हुआ

िह एक आज़ाद सा लम्हा उस मौत के आिाज़़़ को ढूनता रहा ग्जसमे कायनात के आिोश से उतरा हुआ ़़ एक अनजाना सा आिोश तुम्हारा

बाँधता रहा मेर िुलती हुई परतों के पल-पल वपघलते अन्तराल को-

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


पूछ्ती हूँ मैं तुमसे कभी ढून है तुमने इबादत में झुकी नज़रों में मेर बरसों से बबछ्ड़ी हुई िह फ़ररयाद जन्मो से जन्मो तक बहती रह मुहोब्बत भर आँिों की झुकी पलकों में झपकती हुई एक पुकार सहदयों से जूझती र्सफ़स तुम्हारे र्लये सहदयों से बनी हमेशाँ से िह तुम्हार -मैं एक अरसे से िूँजती आिाज़।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


White Canvas Your vivid stroke etched in my memory bestirred my stark white canvas. A passing night clasped me replete with colours. Raw impulses wide awake splashed shades tinting the sheet toning the moods. A splendor bedded with me all night. A river oozed out in heat. My opaque vision. grasped the forthcoming dawn. A fatigue tarried within me throughout the day.

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


माखणक सपनों के सपाट कैनिास पर रे िाएँ िीींचता

असीम स्पशस तुम्हारा कभी खझींझोड़ता

कभी थपथपाता

कुछ िाँचे बनाता

आँकता हुआ गचन्हों को रीं िों से तरीं िों को र्भिोता रहा

एक रात का एक मख़मल एहसास।

कच्ची पक्की उम्मीदों में बँधा

सतरीं िी सा उमड़ता आिेि

एक छलकता, प्रिाहहत इींरधनुष झलकता रहा िल -कूचों में

बबिर र्सयाह परछाइयों

के बीच कह ीं दबा दबा।

रात रोशन थी

श्िेत चाँदनी सो रह थी मुझमें िनष्कलींक!

बींद

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अँधेरों की मुट्ठी में जैसे माखणक हो सपस के

सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


िन से उतरा हुआ। सुबह का झुटपुटा झुकती िनिाहों में बहती मीठी धूप

थम िया दपसण हदन का अपने अक़्स में िुम होता हुआ। और तब

थका-हारा, भुजींि सा

हदन का यह सरसराता धुध ँ लका

सरकता रहा परछाइयों में प्रहर - प्रहर।

नीींद में डूबी अधिुल आँिों के बीच िासलों को िनभाता यूँ दरबदर साथ चलता रहा मेरे एकटक आठों प्रहर।

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


Memories

All the stars engulfed in silence trying to grab the hands of futility. The day explodes. Whiteness spills the residues of the waning moon. Death of the night is still alive in the memories of space.

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


शन् ू य की परछाईं

र्सतारों में ल न हो चुके हैं स्याह सन्नाटे ख़लाओीं को हाथों में थामें हदन िूट पड़ा है लम्हा - लम्हा रोशनी को अपनी ढलती चाँदनी की चादर पर बबिराता अींधेरों की िहर मौत शून्य की परछाईं में धड़कती है अब तक ग्जींदा है न जाने कब से — न जाने कब तक —

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सब ु ह का सरू ज अब मेरा नह ीं है।


मीना चोपडा का पररचय - मीना चोपड़ा का जन्म उत्तर भारत में ग्स्थत एक सौम्य पहाड़ी निर

नैनीताल में हुआ। मीना बहुमुिी प्रितभा की स्िार्मनी हैं | इनका का पहला अींग्रेज़ी कविताओीं का सींकलन ’इ्नाइहटड लाईन्स’ १९९६ में इीं्लैंड में लोकावपसत हुआ। इनकी कविताओीं का अनुिाद जमसन भाषा में भी हो चुका है । इनकी कविताएँ अनेक राष्ट्र य एिीं अन्तरासष्ट्र य साहहग्त्यक पत्र-पबत्रकाओीं में प्रकार्शत होती रह हैं। २००४ में कैनेडा में प्रिास के पश्चात र्मसीसािा (ओण्टे ररयो,

कैनेडा) के लाइब्रेर र्सस्टम द्िारा आयोग्जत अींग्रेज़ी कविताओीं की प्रितयोगिता

में इनकी कविताओीं को सम्मािनत ककया िया। इन्होने हदसींबर २००८ में ICCR (इग्न्डियन काऊींसल फ़ोर कल्चरल ररलेशन) के सहयोि से अकशरम ु् द्िारा भारत, हदल्ल में आयोग्जत ७िें अन्तरराष्ट्र य हहन्द उत्सि में कैनडा का प्रितिनगधत्ि ककया।

मीना एक किियत्री होने के साथ-साथ एक गचत्रकार भी हैं। अब तक राष्ट्र य

एिीं अन्तरासष्ट्र य स्तर पर २५ से अगधक कला-प्रदशसिनयाँ लिा चुकी हैं। इन्होंने २००२ में ’साऊथ एर्शयन ऐसोर्सएशन ऑफ़ र जनल कोऑपरे शन’(SAARC) द्िारा आयोग्जत कलाकारों की सभा में भारत का प्रितिनगधत्ि ककया। मीना

कला-क्षेत्र में हमेशा से ह बहुत क्रमयाशील रह हैं। भारत में "पोइट्र क्लब" की सगचि भी रह हैं। इसके अितररक्त कई ्यापाररक एिीं कला सींस्थाओीं की सदस्या भी रह चक ु ी हैं। बी.एस सी. करने के उपरान्त इनहोने टे क्सटाइल डडज़ाइिनींि में र्शक्षा ग्रहण की। भारतिषस में क़र ब सात साल फ़ैशन के फ़ील्ड मे काम करने के बाद

इन्होने एडिटासइग्ज़ींि का ्यिसाय अपनाया, जहाँ यह अपनी एडिटासइग्ज़ींि

एजेन्सी का सींचालन करती रह हैं। कैनेडा में अपने पित के साथ "StarBuzz'

नामक मनोरींजन और किल्मी पबत्रका का सञ्चालन कर रह हैं, साथ ह Learna नामक एक एजक ू े शन सेंटर चला रह हैं |

कैनेडा आने के बाद इन्होंने कई कलाकारों और कला प्रेर्मयों को सींिहठत कर

एक कला सींस्था का िनमासण ककया, ग्जसका उद्दे श्य र्भन्न-र्भन्न, जन-जाितयों के लोिों को कला के द्िारा समान स्थल पर लाकर जोड़ना, आपस की

भािनाओीं को कला के द्िारा समझना और बाँटना है । कला जो हमेशा से सीमाओीं में बींधती नह ीं, उसे सीमाओीं से आिे ले जाना ह इस सींस्था का

उद्दे श्य है । इस सींस्था को "्रमॉस-करीं ट्स इींडो-कनेडडयन इींटरनेशनल आटस स’ के नाम से जाना जाता है । यह सींस्था २००५ से लिभि दस से अगधक कला, 106


कविता आहद समारोह एिीं प्रदशसिनयाँ आयोग्जत कर चुकी है । मीना चोपड़ा के बनाये हुए गचत्र भारत तथा कई अन्य दे शों में सरकार , ्यिसाियक तथा सींग्रहकतासओीं के कला सींग्रहों में हैं। Email: meenachopra17@gmail.com http://meenasartworld.blogspot.com/

Meena Chopra, An Introduction -A multi faceted person, painter and poet, Meena Chopra is now settled in Mississauga, Canada, for 5 years after migrating from New Delhi India. She hails from Nainital, a hill resort in India. She has had several art exhibitions in many countries, which includes India, Canada, England. An avid reader of prose and poetry, she writes both in English and her native language Hindi. Her first collection of English poems, "Ignited Lines" was published in 1996 was released in London, England the same year. Her poems have been published in many national and inter-national journals. They have also been translated into German by Carla Kraus, a well known Austrian author. She represented Canada in New Delhi India in 7th Inter-national Hindi Celebration Meet in December 2008 organized by Akshram in association with ICCR (Indian Council for Cultural Relations). She has also represented India in the SAARC (South Asian Association for Regional Cooperation) Artists Meet, New Delhi in December 2002. She received Honourable Mention at Poetry Writing Contest 2003 held by the Mississauga Library System Canada when she landed in Canada. Her paintings are with many Corporates, Government Bodies, Embassies, Hotels and Private Collections in India, Canada, Australia, England, Switzerland, Dubai and many other countries She qualified as a textile and fashion designer and worked in this industry for seven years, then got into advertising. She has had an intense career in advertising for twenty years and was running an advertising agency in New Delhi, India. Now she runs an Entertainment & Life Style news weekly called "STARBUZZ" along with her husband in GTA, Canada and also runs an after school learning centre in Mississauga. Meena is also passionately involved in community arts and has directed many art events and curated many art exhibitions. Most of these have been done under the aegis of 'CROSS CURRENTS - Indo Canadian International Arts' which has a mission of embracing diverse cultures and origins and bringing them on a common platform through arts there by ‘taking arts beyond boundaries’. The organization has had sev107


eral successful art events in past. This includes an art exhibition "Confluence", which was taken to India, " "Children's Art Competition, Unity In Diversity" and "Beyond Boundaries International Arts Festival". She is also a qualified art educator (Learning Through the Arts) from The Royal Conservatory School (The RCM) Ontario, which means to implement an arts-infused approach in developing the potential of every child and adult. Email: meenachopra17@gmail.com http:// meenasartworld.blogspot.com/ Painting and poems go very well together. There is vitality in the forms, colours and the words chosen by Meena Chopra. Here is a charming feast of lyricism in paintings and poems. - Dr. L.M. Singhvi (the then High Commisioner of India in UK and a well known litterateur and poet) These comments were left by him in in my Visitor’s Book, during my art exhibition and launch of my 1st book of poems ‘Ignited Lines’ in London U.K. 1996

Clippings from some earlier reviews: “Each one of the forty expressions picturise a lived reality, an experienced emotion, a missed heartbeat without being sentimental about it. Nothing comes as after thought or an overstatement. She is precise and matter of fact even in articulations” … - Suresh Kohli The Hindu, Delhi, 1.12 1996 “Meena Chopra will not have too many words getting in between the ignition of an idea and its consummation. It must be having to do with the fact that she also paints. Her poems have neat compactness of paintings; words become colours that fill up the canvas if-or when she is not using her brush. Ignited Lines, Meena’s first volume of verse, is therefore not for the gallery; rather, it is a gallery. You can browse through it, but you will periodically pause, much like when confronted with a new painting that has succeeded in achieving the different, a range and depth of emotions far removed from the every day clichés of existential dilemmas, not existence. She unveils shimmering facets of love, possession, mind and self with sensitivity. She is delicate but strong, gentle yet sharp, vulnerable yet proud. Self-actualization is more a matter of routine than effort; it is the moment beyond the ones of self knowledge that she wants to live up to, and become, not a mere rhapsody in search of life but a rhapsody in search of the deeper self. In this sense she is her own Sun, her own guiding star as is brightly revealed in the poem Fire” 108


- Gautam Siddharth The Pioneer (Book reviews), Delhi, (India) 28.9.1996 “These poems talk of ‘hidden fire/rising with/a smokey thread…..’ A seemingly ordinary enough statement, it might also mirror the extraordinary sensibility of a committed artist.” -Adrian Khare Blitz, Bombay, India 13.3 1993 “...by one who is also an artist, a painter, provides perhaps an alternative and additional medium of self expression to a surcharged personality. It is the story of a soul that is caught in the throes of trying to unravel the mystery of the self in terms of subjective experience.” - Dr. Shalini Sikka The Weekend Observer (Review) Delhi(India) January 4 1997 “A characteristic of her style is that physical sensations beautifully blend with abstract thought – yearning for fulfillment is attended upon by consciousness of fragmentation.” -Dr. Shalini Sikka The Quest, Ranchi (India) 1996 “Ignited Lines, a collection of poems by Meena Chopra, expresses desire for ignition of the mind for illumination in a world of duality and paradoxes.” -Dr. Shalini Sikka The Journal Of The Poetry Society (India), 1996 “Accompanying the cluster of these lovely oil pastels worked out like ’two inches of ivory’ are her versus. The words and the visuals support each other and the viewer is taken on to a journey to the end of the clouds. Look at her art or read her poetry there is a feeling of scaling heights, going to the mist of the mountains and scenting the fragrant pines.” -Nirupama Dutt Indian Express (India), August 22 1999 “Her canvasses have fluid grace and character that is reflected in her persona too. Her paintings are as intense as the poetry she writes”. -Anshu Khanna Savvy (India) 1992 “Images have been made use of in abundance while expressing her feelings, thoughts and views .... The poems are short but very powerful and impressive indeed! Meena strikes with force to show her caliber of thinking which is on par with any Indian modern poet who is of great repute.” -M. Fakhruddin Poets International, (India) December 1996 “Meena Chopra’s poetry mirrors her acute sensibilities which, in turn, enmesh with her deft strokes on canvas.” -S. Rajoo The Times of India, Delhi, 23. 7. 1996 “In paintings there is a poetic beauty and poems are strong in imagery and spontaneity. And both types of work are intense in movement” -Deshbandhu Singh Rashtriya Sahara, Delhi, (India) August 1996 109


“Her works are the rhythmic expression of the state of the subconscious. “Sparkling vacuum that glimmers and floats in the morning breeze….” or “A chilly winter blossoming in spring…” Soumik Mukhopadhyaya The Statesman, Delhi, (India) 20th August 1999 “The embryonic bond that she shares with nature forms the keynote of her work. My feet stick to the damp earth / Fearing devastation / My mouth is full of clay / Is it the smell of the soil that I eat?/ Swallowing every bit. Words freeze the impalpable fears finding their refuge in the womb of earth. And the pastels accompanying the words, capture the anonymous smell in a tensile cage that bears the colour of earth. The other elements of nature find beautiful expressions in her works. Swirling flames of orange recalling to protecting warmth and destroying the fury of fire. Ice blue serenity of water… And most of all, it is the interaction with her own self that gets portrayed in her works.” -Critic First City, Delhi, (India) August 1999 “Accompanying her paintings are her verses, and the two compliment each other. In fact, they often seem to flow from and into each other, making one wonder which came first, the word or the image. The heightened passionate quality of her verses imbues the images with a strong emotional power.” -Manisha Vardhan The Pioneer, New Delhi(India) August 11 1999 “One notices a rhythm of universal duality underlying her poetry as well as her paintings. The poems strong in imagery and spontaneity complement the paintings” -Critic First City Magazine, January 1997 “What ever the reason, there is no doubt that this lady packs a lot of talent.

To be a mistress of words and lines is no means a feat by any standards.” -Critic Financial Express July 21 1996 “What adds to her talent is the beautiful poetry she writes ….. Her verses at times influence her paintings and vice versa.” -Akshaya Mukul The Pioneer, Delhi, India, June 13, 1996 “Paintings and poems by Meena Chopra at the Jehangir Art Gallery, turned out to be a veritable feast to the eyes as one drifts from spasms of energy thrust into the portrait to the lovely exterior. -Venkastesh Raghavan Free Press Journal , Bombay, (India )11th March 1993 “The book ‘Ignited Lines’ thus presents a deep insight into the inner passages of delicate human emotions and inner meanings .... It is a beautiful example of simplicity and feeling embedded together, obviously by a very talented writer. The poems, on the whole are charming pieces of more finished art which have surpassed the realms of literature because of embel110


lishingly philosophizing of the subject” - A.H. Naqawi Day After (Delhi, (India) 30th Sept.-14thOct. 1996 “…for she doea succeed to a remarable extent in self-expression. Her thoughts, aspirations struggle and internal conflicts find faithful reflection in her works”. -V.V. Prasad MID-DAY (India) December 9, 1986

Comments by some International Poets and poetry lovers : “I first read Meena’s works here, at ‘Post Poems’. I was intrigued by the vivid imagery portrayed in her beautiful works, and found her to be an extremely multi- talented woman. I contacted her about doing the article.” Bi-weekly Feature Poet - Meena Chopra at postpoems.com Rachelle Wiegand, USA “Your writing is emotive and full of romantic expression, very strong. Thank you for your openness.” “White Canvas” - Deborah Russell painter and a poet USA “I love the vividness in this piece, a combination of Tangible Art and Poetic Art that blends quite nicely”.“Birth Of A Stupor” -Rachelle Wiegand Poet & Journalist, USA “..perhaps dissolution, emptiness, loss of the walls of concepts, and thereby the rebirth of oneness... why? why not? your writing here both real and thought provoking”. -Eric Cockrell USA “you are quite a mystery to me. I've been hearing about the quality of your work. I have to say, excellent piece. ...you have an interesting observation with life and the occurrence of events. you're able to draw meaning into the smallest things. A gift.” “Memories In Space” - Dead Poet (Richard Sinclair) USA “Masterful. Your grasp of subtly explosive imagery is beyond admiration. I found myself holding my breath by the end. Thank you for sharing it. “Reverberation” - Stuart Staub USA “You are a beautiful, talented poet and your words are captivating”. “Unbound” - Marianne Chrisos, USA

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“I have to tell you that I am of native American heritage and this is the way that we took care of our dead back in history. I thought that you did well with this. It was awesome. Thank you for posting this” “Pyre” - Renee' Quinn USA “I find your poetry very sensual, and very moving...you have a marvelous talent for touching both the heart, and that inner core of sexuality that brightens the day with thoughts of tender, yet passionate love!!!” -HooK USA “Dear Meena--I just wanted to tell you how much I've enjoyed reading Ignited Lines--your poetry is wonderful, and I keep your book with my Neruda, Borges, and Rilke collections.” -Robert Darlington USA “Dear Ms. Meena Chopra, I viewed a few of your poems on Shadow poetry.com and was very impressed. After reading poems such as “A Glimmer It Was”, I can honestly say that you are one of the best poets that I have had the pleasure of reading in a long time. Your words are filled with emotion and depth. Thank you for Sharing your work. =Nav Chandi, India Dear Meena, I enjoy your writing. I love meeting people from all over the world. Thanks for being a part of postpoems. I can't wait to read more of your writing. -Teresa Jacobs USA “Your work expresses a dynamic of power, emotions, and fear. Only a great mind and a multi layered individual could construe the creations that you have set forth. I know I don't know you but through your work, I feel that I do. Your work portrays something more than the picture. It conjures up raw emotion”. -Vique Mora, USA

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“She unveils shimmering facets of love, possession, mind and self with sensitivity. She is delicate but strong, gentle yet sharp, vulnerable yet proud. Self-actualization is more a matter of routine than effort; it is the moment beyond the ones of self knowledge that she wants to live up to, and become, not a mere rhapsody in search of life but a rhapsody in search of the deeper self. In this sense she is her own Sun…” - Gautam Siddharth The Pioneer (Book reviews), (India) 28.9.1996

“The glimpses of the setting sun

from my childhood nostalgically dissolve in the abundantly spread hues of the setting sun on the skyline of this beautiful country, Canada, to which I now belong and this creates a new sunshine within. This sunshine melts in me and flows out in the form of verses. Distances fade; my past becomes one with my present, rising sun of the East starts blending into the setting sun of the West. The directions merge into each other fading into the moments beyond.”Meena Chopra

“Painting and poems go very well together. There is vitality in the forms, colours and the words chosen by Meena Chopra. Here is a charming feast of lyricism in paintings and poems”. -Dr. L.M. Singhvi London U.K. 1996

Cover and the inside drawings Publisher: Hindi Writers’ Guild

“The embryonic bond that she shares with nature forms the keynote of her work. Words freeze the impalpable fears finding their refuge in the womb of earth”. First City Delhi India 1999

“Her works are the rhythmic ex-

pression of the state of the subconscious”.- Soumik Mukhopadhyaya -The Statesman, Delhi, (India) 20th August 1999 “A characteristic of her style is that physical sensations beautifully blend with abstract thought .Yearning for fulfillment is attended upon by consciousness of fragmentation.”-Dr. Shalini Sikka The Quest, (India) 1996

“The heightened passionate quality of her verses imbues the images with a strong emotional power.”-Manisha Vardhan The Pioneer, New Delhi(India) August 11 1999 114

सुबह का सूरज अब मेरा नहीं है!- मीना चोपड़ा (कविता संकलन ) ( Adieu to the Dawn)  

कविता संकलन प्रकाशक: हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनडा ISBN No. : 978-0-9813562-2-8 © Meena Chopra First Edition : 2010 Published simultaneously i...

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