अंग माधुरी, बर्ष-४७, अंक-१ - २

Page 1

अिं माधुरी

दिसंबर 2015 - जनवरी 2016

* अंदिका के तल ु सी * अंदिका के शेक्सपीयर * अंदिका के कादलिास

* अंदिका के महावीर प्रसाि दिवेिी * अंदिका के भारतेन्िु हररश्चन्र

अंदिका भार्ा आंिोलन के प्रवतषक

डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’

जन्म : 03 जनवरी,1938 ई. - दनधन : 14 नवंबर, 2015 ई.

कोदि - कोदि नमन अंदिका के रऽ यिु ांतरकारी योद्धा डॉ. चकोर !

* अंदिका के रऽ अन्यतम सेवक * दहंिी - अंदिका सेतु * संपािक रत्न

बर्ष : ४७ अंक : ०१ - ०२ संस्थापक संपािक : डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’

* अंदिका के रऽ बहुआयामी साधक * अंदिका के रऽ िधीदच * अंदिका के रऽ भिीरथ * अंदिका के रऽ पयाषय * अंदिका के रऽ अदतमानव * अंदिका के साधक तपस्वी

बर्ष : 47 अंक : 01 - 02

।। अदं िका पुरोधा, डॉ. चकोर के रऽ लोकातं रन ।। पदिका नै जन - आंिोलन

िाम:३० रू.

अंदिका भार्ा की प्रथम मादसक पदिका दिसंबर २०१५ - जनवरी २०१६

संपािक : कुंिन अदमताभ


रयमदववयह समयरोह िेखते डॉ. चकोर

श्रीमती दिव्यांशु के सयथ डॉ. चकोर अपने ७२ वें जन्मदिवस अदिनांिन समयरोह में

सिु यमय के पयत्र कय अदिन् करते डॉ. चकोर

पटनय के एक सयदहदय्क समयरोह में डॉ. चकोर

दवदवध मरु ा म ॑ अंदिका पुरोधा डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ 2

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’

जन्म : 03 जनवरी,1938 ई. - दनधन : 14 नवंबर, 2015 ई. ‘अंि माधुरी’ के रऽ दिवंित संस्थापक संपािक अंदिका पुरोधा डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ क॑ अंि माधुरी पररवार के रऽ भावपूनष श्रद्धांजदल ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

3


पदिका नै जन - आंिोलन

अंदिका भार्ा की प्रथम मादसक पदिका बर्ष : ४७, अंक : ०१- ०२, दिसं-१५-जन-१६

संस्थापक संपािक

डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ संपािक

कांु िन अदमतयि सहायक संपािक

दवधशु ेखर पयण्डे् प्रकाशक

अांग मयधरु ी लेली अांदगकय ियषय मां ं॑ दलखलऽ मौदलक आरो अप्रकयदसत रचनय आमांदत्रत छै । सयफसयफ दलखलऽ ्य टांदकत रचनय कं॑ सांपयिकी् पतय पर िेदज्ै । नीचं ॑ िेलऽ िेलऽ कोय भी तरीका स ॑ रचना भेज ॑ सकै दियै : १. कृदतिेव फॉन्ट ्य ्ूदनकोड फॉन्ट मां ं॑ टयइप करलऽ रचनय के सॉफ्ट कॉपी ई मेल सां ं॑ िेजऽ । २. सयफ - सयफ दलखलऽ ्य टांदकत रचनय के बद़ि्यां फोटो खींची कं॑ वयट् सएप नांबर पर िेजऽ ्य ई मेल स ं॑ िेजऽ । ३. सयफ-सयफ दलखलऽ ्य टांदकत रचनय डयक स ं॑ िेजऽ । ४. रचनय सथां ं॑ आपनऽ नयम, पतय, फोटो, मोबयईल नां., ई-मेल पतय, अद्यतन सांदिप्त पररच् जरूर िेजऽ ।

संपािकीय संपकष CH-1 / 24, कें द्री् दवहयर, सेक्टर - 11, खयरघर, नवी मांबु ई– 410 210 , महयरयष्ट्र, ियरत

श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु

मोबाईल / वाि् सएप नं. : 09869478444 ई मेल : kundan.amitabh@angika.com

शेखर प्रकयशन, 59, गयाँधीनगर, बोररांग रोड (पदिम), पटनय - 800 001 , दबहयर, ियरत

ANG MADHURI

मो. 8002099017 / 9430919959

मैनदे जंि एदडिर शदशशेखर पयण्डे् दवधशु ेखर पयण्डे् इन्िशु ेखर पयण्डे् डॉ.सररतय सहु यवनी पदिका रूपांकन पदत्रकय लोगो रूपयांकन: आनांिी प्रसयि बयिल पदत्रकय सज्जय,रूपयांकन,शब्ि सां्ोजन: कुां िन अदमतयि

A Monthly Magazine of Angika Language & Literatures in Angika Language

सहयोि रादश एक अंक : 15 रू. बादर्षक: 150 रू. (व्दि) , 750 रू. (सांस्थय, पस्ु तकयल्) आजीवन (१० साल ) : 1200 रू. (व्दि), : 7500 रू. (सांस्थय, पस्ु तकयल्) संरक्षक (१० साल ) : 10000 रू. (व्दि) दवदशष्ट संरक्षक (१० साल ) : 20000 रू. (व्दि) पी.डी.एफ. (ईमेल िारा) - बादर्षक : (व्दि): 150 रू. (भारत) , 1500 रू. (दविेश), सांस्थय: 4500 रू. (दविेश)

मरु क : अदनतय आटट दप्रन्टसट , २९, ओएदसस इांड. सब्िे िगु तयन चेक/ बैंकड्रयफ्ट द्वयरय ‘श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश’ु के इस्टेट, वकोलय, सयांतयक्रुज (ई.), मांबु ई—४०० ०५५ नयम स ं॑ प्रकयशक के पतय पर िेजनय चयदह्ऽ ।

4

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अंि माधुरी सिस्य सूची दवदशष्ट संरक्षक श्री सियनन्ि दसांह, श्री अदिनी कुमयर चौबे, डॉ. अदनल सल ु ि, डॉ. दवज् कुमयर मेहतय, डॉ. उत्तम कुमयर दसांह, डॉ. दशवनयरय्ण, डॉ. दवद्ययरयनी, डॉ. बहयिरु दमश्र, श्री रयजीव पररमलेन्ि,ु दविूदत प्रसयि पयण्डे् ।

संरक्षक सिस्य सवट श्री गांगयधर पयण्डे्, डॉ. नयगेन्द्र कुमयर िूबे, डॉ. एन. पी. नयरय्ण, डॉ. रेखय दमश्र, डॉ. कुमयर िवु नेश, डॉ. मधु वमयट , हररशांकर श्रीवयस्तव ‘शलि’, रांजन, डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय, दिनेश बयबय, डॉ. प्रिीप प्रियत, प्रद्यग्ु न प्रसयि पयांडे्, चन्िप्रकयश जगदप्र्, रदवशांकर पयण्डे् डॉ.इन्ि​िु ूषण दमश्र िेवेन्ि,ु सधु ीर कुमयर प्रोग्रयमर, डॉ. मधस ु ूिन झय, दवजेतय मिु ूगलपरु ी, कुन्िन अदमतयि, डॉ. सकलिेव शमयट , डॉ. अरूणेन्द्र ियरती, रयके श पयठक, रयमयवतयर रयही, दिवयकर चन्द्र िूबे, डॉ. धनञ्ज् दमश्र, श्री. सरु न्े द्र प्र. ्यिव, श्री. आर प्रवेश, श्रीमती मीरय झय, डॉ. कल्​्यणी कुसमु दसांह ।

आजीवन सिस्य सवट श्री डॉ. िूतनयथ दतवयरी, डॉ. अमर कुमयर दसांह, अांजनी कुमयर शमयट , शांकर प्रसयि, श्रीदनके त, नृपेन्द्रनयथ गप्तु , अदनरूध्ि प्रसयि दवमल, मिन प्रसयि, रयमदकां कर झय, नरेश मोहन दतवयरी, डॉ. रमेश आयमदवियस, कवीन्द्र चैधरी, कनक लयल चैधरी ‘कणीक’, डॉ. रयसदबहयरी दसांह, प्रो.(डॉ. ) लखनलयल दसांह ‘आरोही’, आमोि कुमयर दमश्र, हीरय प्रसयि हरेन्द्र, नन्ि​िल ु यर दतवयरी, डॉ. तयरय दसांह, कै लयश झय दकां कर, दप्ूष दतवयरी, डॉ. रयजेन्द्र प्रसयि मोिी, रयमधयरी दसांह ‘कयव्तीथट ’, नीरज कुमयर पयण्डे्, रदव घोष, डॉ. कृ ष्ट्णय दसांह, नन्िलयल ्यिव सयरस्वत, प्रसून लतयांत, श्रीदनवयस दतवयरी, प्रदमलय िेवी वमयट , िेवन्े द्र कुमयर दमश्र, दविूदत िूषण दतवयरी, ज्प्रकयश ज्ी, डॉ. दनगम प्रकयश नयरय्ण, प्रियष चन्द्र दसांह (कोको), गणपदत दत्रवेिी, शिु लक्ष्मी पयण्डे् (नय्डू), रयज ियरती, रदवशांकर रदव, मनोज आनन्ि, प्रेमदशलय दसहां, दजतेन्द्र ठयकुर, डॉ. उग्रनयथ दमश्र, प्रो. डॉ. रयमिेव प्रसयि, अवधेिर प्रसयि दसांह, रयमबयलक दसांह, रयमचन्द्र ‘रदसक’ (स्वयमी आगमयनन्िज ् ी), डॉ. ए. कीदतट वर्द्टन, श्री रूद्रिेव अके लय ।

अांग मयधरु ी के वयदषट क सिस्​्ों से अनरु ोध है दक वे अपनय बयदषट क सिस्​्तय शल्ु क ्थयशीघ्र िेज िें दजससे दक अांग मयधरु ी के अांक दनबयट ध रूप से उन्हें दमलते रहें ।  सिी िगु तयन चेक/ बैंकड्रयफ्ट द्वयरय ‘श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश’ु के नयम से िे् होनय चयदहए ।  सिी िगु तयन (चेक/ बैंकड्रयफ्ट) प्रकयशक के पते पर िेजय जयनय चयदहए ।  अांग मयधरु ी के आजीवन /सांरिक/ दवदशष्ट सांरिक सिस्​्तय के दलए िी उपरोि तरीके से ही िगु तयन करें ।  िगु तयन दववरण के सयथ अपनय नयम, पतय, मोबयईल नां., ई-मेल आदि दववरण िेजनय नहीं िूलें ।  अांग मयधरु ी की सिस्​्तय व दवज्ञयपन के दलए सांपकट करें: दवधश ु ेखर (मो./वयट् सऐप: 8002099017)

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

5


इ अक ं म॑ प्रकाशकीय

9

संपािकीय ‘चयाँि-चकोर’ की तरह अमर रहेंगें ‘अांदगकय-चकोर’

11

डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल चकोर जी के दनधन स ॑ अंि समाज अनाथ होय िेलै / अदिनी कुमयर चौबे यह स्वीकारना दक डॉ. चकोर नहीं हैं अदवश्वसनीय लिता है / डॉ. अदनल सल ु ि अंदिका, दहन्िी की सेवा में डॉ. चकोर की दनष्ठा दिशा-दनिेशक / डॉ. दशववांश पयण्डे् मैं और सादहदत्यक िैमादसक दहन्िी पदिका उनके दबना अधूरे / नृपेन्द्रनयथ गप्तु अंदिका का इदतहास चकोर जी को स्वदणषम पृष्ठों में स्थान िेिा / डॉ. लखनलयल दसांह आरोही मेरी मातृभार्ा बदजजका और उनकी अंदिका / डॉ. दवन् कुमयर दबष्ट्णपु रु ी चकोर जी ने अंदिका के साथ-साथ दहन्िी की भी बहुत सेवा की / रयधय दवहयरी ओझय हमारी मत्ृ यु भी आिरणीय चकोर जी की तरह ही हो / हररहर पयण्डे् चकोर जी के असामदयक दनधन से ममाषहत / प्रकयश अंदिका भार्ा के उत्थान के दलये की िई उनकी साधना अमोल / प्रदमलय िेवी वमयट आिरणीय चकोर जी से अत्यदधक प्रेम / आनन्ि दकशोर शयस्त्री डॉ. चकोर के आकदस्मक दनधन से ममाषहत / सदु खत वमयट कालजयी डॉ. चकोर को कोदि-कोदि नमन / डॉ. दशवनयरय्ण समय से पहले ‘सूयाषस्त’ हो िया / डॉ. लिमी दसांह अद्भुत दविता एवं शादन्त के प्रतीक थे नरेश पाण्डेय चकोर / पां. िवेश चन्द्र झय डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर सच्चे अथष में संत थे / पां. दशवित्त दमश्र, शांकर शरण मधक ु र उनके कायष को आिे बढाना एक बहुत बडी जबाबिेही / दवज् कुमयर दतवयरी अंदिका में दलखने के दलए सिैव प्रोत्सादहत करते रहे / रदव घोष अंदिका आन्िोलन को उन्होंने जो उजाष िी वह अदमि है / डॉ. अमरेन्द्र अंदिका के रऽ एक सच्चा सपूत उठी िेलै / मनोज पयण्डे् उनके जाने से जो ररदि हुई है उसे सहज भर पाना कदठन / गांगेश गांज ु न चकोर जी मर ॑ नै पार ॑ / रयहुल दशवय् हर भासा आंिोलन लेली हुनी सबसं ॑ बडऽ प्रेरनास्त्रोत / कांु िन अदमतयि, अांदगकय.कॉम डॉ. चकोर बहुआयामी साधक आरो अपने आप मं ॑ एिो संस्था रहै / डॉ. प्रो. मधस ु ूिन झय, दव.दव. अांदगकय दवियग, दत. िय. दविदवद्ययल्, ियगलपरु

6

27 27 28 28 29 29 30 30 30 31 31 31 32 33 33 34 34 34 35 35 35 36 36 37

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल चकोर / शंकर शरण मधक ु र डॉ.नरेश पयण्डे् चकोर श्रर्द्य - समु न / योगेन्द्र प्र. ममश्र गेलै चकोर िैय्​्य चौकय परु य् कं॑ / मथरु ानाथ म हं ‘रानीपुरी’ उयसव परू ु स चकोर / डॉ. तेजनारायण कुशवाहा अांदगकयाँगन के मोर: डॉक्टर चकोर / हीरा प्र ाद हरेन्द्र चकोर : श्रर्द्यांजदल िोहय / धु ीर कुमार प्रोग्रामर हय् हो िय् चकोर / चन्द्र प्रकाश जगमप्रय My Grandfather - Dr. Chakor / मदव्या पाण्डेय डॉ. चकोर : श्रर्द्यांजदल गीत / ब्रह्मदेव म हं ‘लोके श’ अांदगकय चकोर / कुंदन अममताभ

60 61 62 63 64 65 66 67 68 69

डॉ. चकोर स्मदृ त : संस्मरण बयबू के आयमय आरो मय् के परमययमय छे कै ‘अांग मयधरु ी’/ मवधुशेखर पाण्डेय डॉ. चकोर के अांदतम िण / नपृ ेन्द्रनाथ गप्तु अांदगकय के रऽ िीष्ट्म दपतयमह / राके श पाठक चकोर : असरियर व्दियव / प्रो.(डॉ.) भूतनाथ मतवारी स्मदृ त - वैिव ‘चकोर’ जी / प्रो.(डॉ.) लखन लाल म हं ‘आरोही’ अांदगकय के सयधक तपस्वी चकोर जी / डॉ. अमनरूद्ध प्र ाद मवमल अांदगकय के अदि​ियवक सयदहय्कयर थे डॉ. चकोर / आर. प्रवेश चकोर जी सां ं॑ पदहलऽ पदहल िेंट / चन्द्रप्रकाश जगमप्रय अांदगकय प्रहरी - डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर / रामधारी म हं ‘काव्यतीथथ’ अांदगकय के तल ु सी: चकोर / डॉ. आमोद कुमार ममश्र डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ आरो पत्रकयररतय / डॉ. मधु ूदन झा जनकपरु की डोदमन बनकर नयचने लगते थे चकोर / पं. मशवदत्त ममश्र अांदगकय के एक महयन दविूदत थे डॉ. चकोर / डॉ. अमर कुमार म हं आब ं॑ ्यिऽ के रऽ झरोखय म ं॑ डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ / डॉ. प्रदीप प्रभात हर अांदगकयियसी के एकिम आपनऽ आरो खयस डॉ. चकोर / कुंदन अममताभ

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

70 72 74 76 77 80 84 86 89 94 102 106 110 112 116

7


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका डॉ. चकोर स्मदृ त : डॉ. चकोर रदचत अंदिका, दहन्िी कदवता

38

तल ु सी मदहमय (दहन्िी कदवतय) / डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ फूलऽ के गल ु िस्तय (पस्ु तक अांश) / डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’

46 47

डॉ. चकोर स्मदृ त : डॉ. चकोर कृत प्रथम व अंदतम दकताबऽ के समीक्षा अनवु यि के िेत्र में बहुत बडय कयम है अांदगकय रघवु शां म / डॉ. श्रीरंजन ूररदेव 50 सफल रांग-मांची् अांदगकय नयटक है ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ / डॉ. तेजनारायण कुशवाहा 52

डॉ. चकोर स्मदृ त : अतीत के रऽ ऐना मं ॑ अंि माधुरी ( िायादचि ) डॉ. चकोर स्मदृ त : रचना संसार

57

डॉ. चकोर कय रचनय सांसयर / डॉ. ररता हु ावनी

58

डॉ. चकोर स्मदृ त : धरोहर ( िायादचि ) डॉ. चकोर कय अांदतम प्रूफ रीदडांग व उसके दलए उप्ोग की गई कलम डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर स्मदृ त अांदगकय ियषय-सयदहय् सांग्रहयल् व शोध सांस्थयन

93 144

कहानी नै हो् छे लै / राके श पाठक

134

िप - सरक्का कयस हममां ं॑ कॉन्वेंटेड होदत्ांऽ / ज ं ीव मनगम

140

अंि माधुरी में दवज्ञापन की िरें (रू.) पृष्ठ अांदतम कवर पष्ठृ —पूरय अांिर के कवर पष्ठृ —पूरय अांिर के कवर पष्ठृ —आधय अांिर के पष्ठृ —पूरय अांिर के पष्ठृ —आधय अांिर के पष्ठृ —एक चौथयई

8

रंिीन 10000 8000 6000 5000 4000 3000

श्वेत-श्याम 8000 6000 5000 4000 3000 2000

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


प्रकाशकीय अंग मयधरु ी के

प्रकयशन के लांबे ऐदतहयदसक सफर को सांिव कर दिखयने में सवयट दधक महयवपूणट िूदमकय इसके पयठकों और लेखकों की ही रही है । मैं आप सब पयठकों, लेखकों, दवदशष्ट सांरिकों, सांरिकों, आजीवन सिस्​्ों, बयदषट क सिस्​्ों, शिु ेिओ ु ां एवां सिी प्रबर्द् ु जनों के सह्ोग, समथट न और प्रोयसयहन के दलए हृि् से आियरी हाँ । आपलोगों के स्नेह और सह्ोग के दबनय अांग मयधरु ी कय दन्दमत और प्रियवशयली प्रकयशन सांिव ही नहीं है । अांग मयधरु ी ने अपने जीवन में कई चनु ौतीपूणट और कदठनयइ्ों िरे िण िेखे हैं । व्दिगत और पयररवयररक िदत और कदठनयइ्ों को चकोर जी ने अांग मयधरु ी के प्रकयशन के रयस्ते किी रौपिी दिवयांशु िी आडे नहीं आने दि्य । अांदगकय और अांग मयधरु ी में उनके प्रयण बसते थे । दनजी दजांिगी के उतयर-च़ियव के प्रियव में आ्े बगैर दनदवट घ्न रूप से अांग मयधरु ी दकस प्रकयर और िी मजबूती से अपने प्रकयशन कय सफर त् करते रहे—इसके बयरे में वे हमेशय जयगरूक रहकर ्ोजनयबर्द् तरीके से सोचते रहते थे । इसी क्रम में ्ह चचयट बयर-बयर होती थी दक आने वयले सम् में अांग मयधरु ी के प्रकयशन कय क्​्य होगय ? वे हमेशय कांु िन कय नयम लेकर आिस्त होते थे दक वह अांग मयधरु ी कय सांपयिन कर इसे जयरी रख पय्ेगय । उनकी इच्छय थी दक उनके बयि अांग मयधरु ी के सांपयिन कय कय्ट कांु िन िेखे । मेरी िी ्ही इच्छय रही है । डॉ. चकोर के लोकयांतरण के पियत् िी उनकी इच्छय के अनस ु यर पदत्रकय कय प्रकयशन दनरांतर जयरी रहेगय । सैंतयलीसवें बषट के इस प्रवेशयांक से अांग मयधरु ी के सांपयिक, श्री कांु िन अदमतयि होंगें । श्री अदमतयि अांदगकय ियषय-सयदहय् जगत के दलए जयनय-पहचयनय नयम हैं । वे दहांिी और अांदगकय के अच्छे कदव और लेखक हैं । मैं और मेरय पररवयर कांु िन को उनके बचपन से ही जयनते हैं । वह मेरे अपने बच्चों जैसय ही है । अडतयलीस बषी् श्री कांु िन अदमतयि मूल रूप से ियगलपरु दजले के सल ु तयनगांज थयनयन्तगट त खयनपरु मयल गयांव, जो मेरे गयाँव िेवधय से कयफी करीब है, से हैं । उन्होंने दबडलय इांस्टीच्​्ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रयाँची से बैचलर ऑफ इांजीदन्ररांग (बी.ई.) की दडग्री और ्ू.बी.आई., ब्रस ु ेल्स, बेदल्ज्म से इांटरनेशनल एम.बी.ए. की दडग्री हयदसल की है । श्री अदमतयि दपछले सैंतीस - अडतीस सयलों से अांदगकय ियषय में सदक्र् रूप से लेखन कय कय्ट कर रहे हैं । वे अपने स्कूली जीवन से अांदगकय में सयदहय् सज ृ न कर रहे हैं । अांग मयधरु ी में उनकी रचनय्ें १९७८ ई. से ही प्रकयदशत हो रही हैं । वे अांग मयधरु ी के सांरिकों में से हैं । अांदगकय में उन्होंने कई दकतयबें दलखी हैं ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

9


श्री अदमतयि ने रयष्ट्री् - अांतरयट ष्ट्री् स्तर पर अांदगकय ियषय व सयदहय् के प्रचयर प्रसयर के दल्े कई महयवपूणट व उल्लेखनी् कय्ट दक्े हैं । ्ह उनकी ही िेन है दक अांदगकय ियषय के पयस अांतरयट ष्ट्री् सांस्थय द्वयरय प्रित्त अपनय एक ्ूदनक ियषयई कोड िस सयल पूवट से उपलब्ध है । वे अांदगकय को दहन्िी पत्रकयररतय की मख्ु ् धयरय से जोडने में अग्रणी रहे । लगिग बीस बषट पूवट दहन्िी िैदनक ‘प्रियत खबर’ के अपने दन्दमत सयप्तयदहक कॉलम “अांदगकय सांवयि : अबरी ियफी” के मयध्​्म से उन्होंने अांदगकय गद्य को एक नई उाँचयई िी थी । वे दपछले १२ बषों से अांदगकय.कॉम के सांस्थयपक सांपयिक हैं । सयथ ही अांदगकय दवदकपीदड्य को मूतट रूप िेने की परर्ोजनयओां से जडु े हैं । उनके अांदगकय आलेख और कदवतयओां के पयठ और प्रकयशन इांगलैंड में २००५ में आ्ोदजत ‘अांतरयट ष्ट्री् बहुियषी् सांगोष्ठी ’ में िी हुए हैं । श्री अदमतयि अांदगकय, दहांिी, अांग्रेजी, मैदथली के अलयवे चयइनीज (मेन्डरीन) ियषयओां के जयनकयर हैं । वे िेश के उन दगने -चनु े शरू ु आती लोगों में से हैं दजन्होंने बयरह बषट पूवट सन २००४ ई. से ही ियरती् ियषयओां की इांटरनेट पर उपदस्थदत िजट करयनय प्रयरांि कर दि्य थय । श्री अदमतयि रयष्ट्री् स्तर के ियषयदविों के बीच एक जयनय-पहचयनय नयम हैं जो आधदु नकतम तकनीक के पररप्रेक्ष्​् में नय के वल अांदगकय और दहन्िी बदल्क अन्​् ियरती् ियषयओां के दवकयस हेतु समयनरूप से प्र्यसरत रहते हैं । वे दवकीमीदड्य—मांबु ई कम्ूदनटी के एस.आई.जी.—चे्र रह चक ु े हैं । दवकीपीदड्य—दवकीमीदड्य- ियरत द्वयरय सन २०११ ई. में मबांु ई दविदवद्ययल्, मांबु ई में आ्ोदजत की गई वल्डट दवकी कॉन्रें स की ऑरगोनयइदजांग कदमटी के वे सदक्र् बोडट मेंबर थे । इस कय्ट क्रम में लगिग हजयर की सांख्​्य में दविेशी ियषयओां के प्रदतदनदध्ों के सयथ-सयथ अांदगकय, दहन्िी सदहत लगिग ४६ ियरती् ियषयओां के प्रदतदनदध्ों की सहियदगतय िी सदु नदित की गई थी । श्री अदमतयि दपछले बीस बषों से ममु बई में रहकर िेश की सबसे बडी कां पनी में उाँचे पिों पर कयम करने के अलयवय दविेश की कई नयमी -दगरयमी कां पदन्ों में इांजीदन्ररांग दवियग के उच्च पिों पर कयम दक्य है । ड् ्ूटी के िौरयन ही एक जयनलेवय सडक िघु ट टनय में शयररररक रूप से बरु ी तरह प्रियदवत होने की वजह से उन्हें नौकरी छोडकर सन २००९ ई. में खिु कय इांजीदन्ररांग कां सदल्टांग फमट प्रयरांि करनय पडय जहयाँ वे अिी कय्ट रत हैं । मैं श्री अदमतयि को धन्​्वयि िेनय चयहती हाँ और उनके प्रदत आियर प्रकट करनय चयहती हाँ दक अपने अय्दधक व्स्त जीवनच्यट के बयवजूि उन्होंने हमयरे अनरु ोध को दवनम्रतयपूवटक स्वीकयर कर अांग मयधरु ी के सांपयिन की दजममेियरी अपने उपर ली है । मेरे पररवयर की प्रयथदमकतय अांग मयधरु ी कय दनरांतर प्रकयशन है । हमयरे पररवयर के हर सिस्​् अपनी-अपनी िमतय के मतु यदबक इस पदत्रकय के प्रकयशन में अपनय सह्ोग िेते रहेंगें । मैं आप सबको पनु ः हृि् से धन्​्वयि िेते हुए, आगत कयल में अांग मयधरु ी के उयकषट की कयमनय करते हुए आपसे अपेिय करती हाँ दक ‘अांग मयधरु ी’ के दन्दमत प्रकयशन और अांदगकय ियषय-सयदहय् के दवकयस में आपकय अहम सह्ोग पूवटवत बनय रहेगय । 10

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


- संपािकीय -

‘चा​ाँि-चकोर’ की तरह अमर रहेंिें ‘अंदिका-चकोर’ अंदिका के युिांतरकारी योद्धा थे डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’

यह दवियस करनय एकिम असहज सय है दक अांदगकय परु ोधय डॉ.नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ हठयत् ही इस लोक को अलदविय कह सिय के दल्े हमसे िूर चले ग्े । चौिह नवांबर िो हजयर पांद्रह की शयम अांदगकय ियषय व सयदहय् जगत के सयथ-सयथ दहन्िी सयदहय् जगत के दल्े ऐसी मनहदस्त लेकर आ्य थय दजसकय दकसी को अांिेशय नहीं थय । सिैव सदक्र् और गदतमयन रहने वयले सांपयिक रयन और रयम ि​ि, डॉ. चकोर कय पटनय दस्थत अपने आवयस पर दहांिी त्रैमयदसक पदत्रकय “प्रज्ञयकुंिन अदमताभ वयणी” के ‘तलु सी के रयम - रयम के तलु सी ’ आलेख कय सांपयिन करते - करते अचयनक हृि् गदत रूक जयने से दनधन हो ग्य थय । उनकी अधयांदगनी श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु डॉ. चकोर के दनधन के कुछ ही दमनट पहले उनसे बयतें करके उनके कमरे से बगल के कमरे में आरयम करने गई थीं ां । डॉ. चकोर तब प्रूफरीदडांग में व्स्त थे । चांि दमनटों बयि जब वे पनु ः डॉ. चकोर के कमरे में वयपस आई ां तो उन्होंने पय्य दक उनकय दसर एक तरफ ल़िु कय हुआ है और चश्मय, कलम िूसरी तरफ । उन्हें कुछ बरु य अांिेशय हुआ और जब वे डॉ. चकोर की नयदसकय के पयस अपनय हयथ ले जयकर चलते हुए सयाँस के बयरे में आशवस्त होनय चयहीं तो पयई ां दक उनकी सयाँसें तो चल ही नहीं रहीं । घबरयतीं और कयफी जोर से दचल्लयतीं हुई ांवे घर के बयहर आ गई ांथीं और सहय्तय के दल्े खूब जोर-जोर से दचल्लयतीं रहीं थीं । उनकय दचल्लयनय सनु कर मोहल्ले के बहुत सयरे लोग अपने-अपने घरों से बयहर दनकल आ्े थे । पचयस बषट परु यने पडोसी के लडकों ने अपनी कयर से तरु तां डॉ. चकोर को दनकटतम अस्पतयल में पहुचाँ य्य थय, जहयाँ दचदकयसक ने उन्हें मतृ घोदषत कर दि्य थय । अांदगकय ियषय और ‘अांग मयधरु ी’ को आजीवन अपने बच्चों की तरह लयलन-पयलन करने में उनकी सहियदगनी रहीं श्रीमती दिव्यांशु अफसोस करतीं रहीं थीं दक कयश, आवयज

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : १, दिसंबर - २०१५ १, दिसंबर - २०१५ )

11


लगयने में असमथट तय की दस्थदत में डॉ. चकोर सेंटर टेबल ु पर रखे दगलयस को ही नीचे दगरयकर कुछ सांकेत िे िेते तो शय्ि उनकी जयन बचय सकने में सफल हो पयतीं....... ! श्रीमती दिव्यांशु की आाँखों से दसफट आाँसू झर रहे थे । अपनी नम आाँखों से दवदध के दवधयन के तहत् सम् के क्रूर बयजूओ ां में अांदगकय के महयनतम स्तांि को ढहते िेखने के दसवय उनके पयस चयरय िी क्​्य थय ? लोग बतयते हैं दक अनांत लोक की महय्यत्रय पथ पर अग्रसर अांदगकय के इस अदतमयनव के मख ु मांडल से प्रस्फुदटत हो रही दिव् आिय उनके सचमचु कय िेवपरू ु ष होने कय अहसयस करय रही थी । उफुक में अटके बनते-दबगडते ओस की बूिाँ ों के मयदनांि जेहन में शेष रह गई ां हैं बस उनसे जडु ी ्यिें । अपने िगीरथ प्र्यस से अांदगकय रूपी गांगय को जमीन पर उतयरने वयले अांदगकय के अन्​्तम सेवक डॉ. चकोर सम् से कहीं आगे चलने वयले ियषयदवि् और सयदहय्कयर थे । कि और चमक में हर उपमय, उपयदध, अलांकरण से ऊपर । दवद्वयनों और सयदहदय्क सांस्थयओां ने अांदगकय ियषय आांिोलन के प्रवतट क डॉ. चकोर को उनके व्दियव और कृदतयव के प्रदत अपनी ियवनयओां के उिगयर स्वरूप अनदगनत उपमयओां, उपयदध्ों से नवयजय और सममयदनत दक्य : - अांदगकय के ियरतेन्िु हररिन्द्र , अांदगकय के महयवीर प्रसयि दद्ववेिी, अांदगकय के तल ु सी, अांदगकय के शेक्सपी्र, अांदगकय के कयदलियस, अांदगकय के बहुआ्यमी सयधक, अांदगकय के िधीदच , सांपयिक रयन, सांपयिक दशरोमदण, कुलकलयधर, दवद्ययसयगर, दवद्ययवयचस्पदत अांदगकय के प्रयण,अांदगकय के सांि​िट परू ु ष, अांदगकय के सयधक तपस्वी, दहांिी - अांदगकय सेत,ु शब्ि सम्रयट , अांदगकय के प्यट ्, अांदगकय मनीषी, सयदहय्श्री, दहन्िी गररमय सममयन, ....... । सवोच्च रयजकी् परु स्कयर के रूप में २०१० ई. में उन्हें दबहयर रयष्ट्रियषय पररषि कय ‘लोकियषय सयदहय् परु स्कयर’ प्रयप्त हुआ थय । उन्हें िेश की अनेकों-अनेक सयदहदय्क व सयांस्कृदतक सांस्थयओां से अनदगनत सममयन और परु स्कयर दमले दजनकी फे हररस्त इतनी लांबी है दक एक पदु स्तकय तै्यर हो जय् । इन उपमयओां और उपयदध्ों से उनके व्दियव और कृदतयव के ्श की परयकयष्ठय के हि तक पहुचाँ चक ु ी उाँचयई कय अांियजय िर ही लगय्य जय सकतय है । सच्चे अथों में अांदगकय के ्गु यांतरकयरी ्ोर्द्य थे डॉ. चकोर । दजन्होंने सम् के थपेडों के बीच अांदगकय को पूरी दजांिगी 12

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अपने सीने से दचपकय्े रखकर इसकय पयलन-पोषण कर जूझयरूपन की हि तक जयकर अनवरत इसके सांरिण-सांवर्द्टन के दल्े जूझते रहे । डॉ. चकोर एक बहुत उियर, सौम्, मिृ िु यषी, दमलनसयर और स्नेहशील व्वहयर वयले व्दि थे । अय्ांत आयम सां्मी और अनशु यदसत । कय्यट ल् अवदध के बयि उनकय अदधकयांश सम् अध्य्​्न, लेखन और िजन कीतट न में बीततय थय । बच्चों की प़ियई दलखयई पर अय्दधक ध्​्यन िेते थे । बच्चों को कलय - सांगीत की दशिय दिलयनय और उनके द्वयरय सांगीत कय रर्यज उनकी प्रयथदमकतय होती थी । उनके घर की सय्ांकयलीन आरती िेखते ही बनती थी । अपने बच्चों द्वयरय बजय्े जय रहे ढोल, मिृ गां , हयरमोदन्म और तबले की ध्वदन के बीच ल् में समवेि् स्वर में िजन और कीत्तट न के गय्े जयने से अनूठय सय समयां बाँधतय थय । उनकी अपनी व्दिगत रूदच्याँ और शौक बहुत सीदमत थे । सयिय दलबयस सयिय खयनय । डॉ. चकोर अपने दमत्रों और शोधयदथट ्ों की बडी सहय्तय करते थे । वे स्पष्टविय और दनिीक थे । वे दवचयर रखने में सयफगोई पसांि करते थे । अपने धनु के पक्के थे । जो ठयन लेते थे उसे पूरय करके ही छोडते थे । मांच पर ियषण िेने की कलय में प्रवीण थे । वे अांदगकय, दहांिी, सांस्कृत और अांग्रेजी के जयनकयर थे । जो ियषय वे ियषणों में ्य अपनी रचनयओां में प्र्ोग में लयते वह बहुत सरल थी । दकसी िी कयम को फटयफट दनबटयने की आित थी, दजसके चलते किी-किी कुछ त्रदु ट्याँ रह जयतीं थीं । उसे सहजतय से स्वीकयरते िी थे । पर वे दिग्िशट क थे । सम् कयफी कम थय – कयम बहुत ही अदधक । अांदगकय और ‘अांग मयधरु ी’ में उनके प्रयण बसते थे । तन-मन-धन से आजीवन अांदगकय ियषय –सयदहय् की सेवय में रत रहे । वे अांदगकय कय प्यट ् बन ग्े थे । वे एक सवोच्च कोदट के सांगठक, आांिोलनधमी, सां्ोजक और आ्ोजक थे । रयमजन्मोयसवों के सांकीतट नों में चैतन्​् महयप्रिु की तरह नयचते पैर दथरकयते रयमधनु की रट लगयते थे । वे रयमदववयहोयसव के अवसरों पर डोदमन कय रूप धयरण कर नयृ ् करते थे । अपने स्कूली जीवन के िौरयन नयटकों में िी स्त्री कय पयत्र अिय करने से नहीं दहचदकचयते थे । पटनय की सयदहय्क गदतदवदध्ों के वे कें द्र दबांिु थे । अपनी सेवय दनवदृ त्त के पियत् वे सयदहदय्क, आध्​्यदयमक,सांपयिन,सांगठनययमक कय्ों में पहले से अदधक व्स्त रहने लगे थे ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

13


उन्होंने अपनी दजांिगी के दवदवध आ्यमों – सयदहय् सज ृ न, पत्रकयररतय, अध्​्ययम -सांकीतट न, सयमयदजक सरोकयर, सयांस्कृदतक गदतदवदध्याँ, गयहट स्​्​् जीवन,जीदवकोपयजट न में अपने को व्स्त रखकर अपनी प्रदतिय को दनखयरते हुए निी की धयर की तरह कलकल-छलछल करते बहते धरती के उनमि ु वयतयवरण कय आनांि लेते हुए दनिछलतय से सफलतय के प्रदतमयन ग़िते गए । डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर कय जन्म दबहयर के ियगलपरु दजलयन्तगट त सल ु तयनगांज से िदिण १५ दक.मी. की िूरी पर अवदस्थत िेवधय गयाँव में ३ जनवरी १९३८ ई. को एक बेहि सयमयन्​् कृषक व ब्रयह्मण पररवयर में हुआ थय । उनके दपतय कय नयम चन्द्रमोहन पयण्डे् और मयतय कय नयम प्रजयवती िेवी थय । अपने पीछे छोड ग्े उनके िरे-पूरे पररवयर में उनकी अधयांदगनी श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश,ु उनके तीन पत्रु – श्री शदशशेखर, श्री दवधशु ेखर, श्री इन्िशु ेखर, एक पत्रु ी डॉ. सररतय सहु यवनी, पत्रु वधु श्रीमती नूतन, श्रीमती सषु मय, ियमयि – श्री वीरेन्द्र और उनके बच्चे हैं । उनके दपतय अपने गयाँव के नयमी दकरतदन्य थे । वे हर रयमनवमी पर गयाँव में एक रयमधनु उयसव आ्ोदजत करते थे । अपने बचपन से ही डॉ. चकोर इसमें ियग लेने लगे थे । दपतय की मयृ ्ु के पियत वे खिु इस उयसव कय आ्ोजन करने लगे थे और हर रयमनवमी में गयाँव जयकर रयमजन्मोयसव में शयदमल होते रहे थे । डॉ. चकोर कय ्ह रयमजन्मोयसव इलयके िर में प्रदसर्द् हो ग्य थय । उनकी चौथे वगट तक की प्रयथदमक दशिय गयाँव के स्कूल में ही हुई । बयि की मैदरक तक की दशिय बगल के गयाँव करहरर्य के दमड् ल एवां उच्च दवद्ययल्ों में हुई ां । आई.ए. से लेकर एम.ए. (सयांदख्​्की) तक की प़ियई टी.एन.जे. कॉलेज,ियगलपरु दविदवद्ययल्, ियगलपरु से पूरी की । एम.ए. (सयांदख्​्की) की परीिय में वे ियगलपरु दविदवद्ययल् में अववल रहे थे । इसके पूवट आई.ए. करने के बयि से ही वे ियरत सरकयर की कई सरकयरी नौकरर्ों की सेवय में बीच-बीच के कुछ बषों में रहे पर उच्च दशिय के दल्े उन सयरी नौकरर्ों को एक-एक कर छोडते चले गए थे । अपनी अांदतम नौकरी सन १९६३ ई. में दबहयर रयज्​् खयिी ग्रयमोद्योग बोडट , पटनय में एक सयांदख्​्की पियदधकयरी के रूप में शरू ृ िी हुए । ु की और ्हीं से वे १९९६ ई. में सेवयदनवत्त 14

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


पर इसके पूवट एम.ए. (सयांदख्​्की) करने के तयकयल बयि उन्होंने सन १९६१ ई. में ियरत सरकयर के नेशनल सैमपल ु सवे दवियग में जो नौकरी शरू ु की उसकय उनके जीवन की दिशय को एक ऐदतहयदसक मोड िेने में और अांदगकय कय न्य इदतहयस रचने में दवशेष ्ोगियन है । इस नौकरी के बहयने सन १९६१ ई. में उन्हें पहली बयर स्थयई रूप से पटनय आने कय मौकय दमलय और कयलयांतरयल में आिरणी् रयजय रयदधकय रमण प्रसयि दसांह, डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांशु और अांततः श्री गियधर प्रसयि अमबष्ठ जैसे अांदगकय के आदि उन्नय्क से दमलने कय सअ ु वसर प्रयप्त हुआ थय ।१९६१ ई. में ही आधदु नक अांदगकय ियषय की पहली प्रकयदशत पस्ु तक डॉ. चकोर कृत ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ सयदहय् जगत के सयमने आई थी । दफर इसी सयल वे अांग ियषय पररषि से प्रचयर मांत्री के रूप में जडु कर अांदगकय ियषय आांिोलन की ्यत्रय प्रयरांि कर एक न्य इदतहयस रचने में लग ग्े थे । पर डॉ. चकोर को अांदगकय ियषय के बयरे में पहली जयनकयरी और इसमें दलखने की पहली प्रेरणय कहयाँ से दमली ? वे हमेशय सोचते थे दक दजस ियषय में वे बोलते हैं, उस ियषय में िी क्​्य दलखनय-प़िनय और ियषण िेनय सांिव हो सकतय है ? बीसवीं सिी के चयलीस कय िशक अांदगकय के इदतहयस में सवयट दधक महयवपूणट है । इसी कयलखांड में महयपांदडत रयहुल सयांकृय्य्न ने जयजट दग्र्सट न की कई ि्ांकर िूलों को सधु यरते हुए अांग िेत्र के दवशयल िू-ियग में बोली जयने वयली करोडों लोगों की ियषय को ‘दछकय-दछकी’ के जगह पर ‘अांदगकय’ नयम दि्य थय । अांग िेश की हजयरों सयलों से लोगों के कां ठों में दवरयजमयन, आम जनों के बीच उप्ोग हो रही लोकसयदहय् से िरी - पूरी एक उयकृष्ट लोकियषय सम् के गतट में समयतेसमयते बची थी । बर्द् ु कयल में अांग दलदप में दलखी जयने वयली अांग की ियषय और आठवीं सिी में सरह के रचनयओां की अांग की ियषय को एक नई दजांिगी दमली थी – एक न्े नयम ‘अांदगकय’ के रूप में । िरअसल डॉ. चकोर के गयाँव के आसपयस कई ऐसे गयाँव हैं जहयाँ उन दिनों बहुत अच्छे -अच्छे पस्ु तकयल् हुआ करते थे । उनके गयाँव िेवधय के एक पस्ु तकयल् के अलयवय खयनपरु मयल गयाँव कय गयाँधी पस्ु तकयल् और बगल के बयथ गयाँव कय ियरती पस्ु तकयल् इनमें प्रमख ु थे । इन्हीं में से बयथ गयाँव दस्थत ियरती पस्ु तकयल् से एक ‘ियरती’ नयमक हस्तदलदखत

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

15


बयदषट क पदत्रकय दनकलय करती थी । बयथ गयाँव की ग्रयमीण पदत्रकय होने के चलते उसमें मूलतः उस गयाँव के लेखक ही दलखय करते थे । डॉ. चकोर के अनस ु यर उन्होंने इसी ियरती पदत्रकय के १९५४ ई. के अांक में सवट प्रथम अांदगकय की हस्तदलदखत रचनय िेखी और प़िी थी । वह रचनय थी श्री उमेश जी उफट गल ु यबी जी की अांदगकय ियषय में दलखी अांदगकय कहयनी ‘चौबे जी के गप’ । दफर इसी ियरती पदत्रकय के १९५७ ई. के अांक में िी उन्हें श्री उमेश जी की ही अांदगकय ियषय में ही दलखी एक और अांदगकय कहयनी प़िने को दमली । इनसे प्रेररत होकर ही डॉ. चकोर के हृि् में अांदगकय ियषय में लेखन और इसके उयथयन हेतु कुछ करने की सूझी । तयपियत् अांदगकय उनके जीवन-लक्ष्​् कय एक अहम अांग बनकर उनकी सयाँसों में इस किर घल ु दमल गई थी दक अांदतम सयाँस टूटने तक ्ह उनके प्रयण कय दहस्सय ही बनी रही । ‘अांदगकय’ नयम से लोगों को अवगत करयते, दवरोदध्ों से टकरयते, तयने सहते, शदमांिगी झेलते, सयरी उलझनों को चीडते, मस ु ीबतों को लयाँघते, उपेिय कय दशकयर होते डॉ. चकोर एक जूझयरू ्ोर्द्य की तरह अांदगकय की सेनय तै्यर करते आगे ब़िते रहे, अांदगकय की दवज् पतयकय बल ु ांदि्ों से सरांग में लहरयते – फहरयते हुए । सन १९६१ ई. से दफर अांदगकय आांिोलन से जडु कर अांदगकय के सवयांगीण दवकयस के दल्े जीवन समदपट त कर िेने वयले डॉ. चकोर ने ‘दहन्िी अकयिमी’, हैिरयबयि द्वयरय प्रकयदशत अपनी एक पस्ु तक ‘अांदगकय आांिोलन कय इदतहयस’ की िूदमकय में दलखय िी है, “श्री हनमु यन जी ऐसय बल बदु र्द् होतय तो आज मैं िी छयती चीर कर बतय िेतय दक रग-रग में अांदगकय समयई हुई है जैसय दक हनमु यन जी के रग-रग में सीतयरयम जी समय्े हुए थे ।” दजस अांग की धरती को मगध ने वहयाँ के अदधपदत्ों को परयदजत कर अपनय आदधपय् जमय दल्य थय सां्ोग से उसी मगध की धरती से अांग की ियषय अांदगकय के दल्े इस ्गु यांतरकयरी ्ोर्द्य द्वयरय ्गु पररवतट न के दल्े िशकों पूवट दक्य ग्य शांखनयि आज तक िहो दिशयओां में गांज ु य्मयन होकर नव पररवतट न कय सांकेत िे रही है । डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर आधदु नक अांदगकय के सबसे पहले सयदहय् दनमयट तय थे दजनकी अांदगकय में दलखी कोई दकतयब प्रकयदशत रूप में सबसे पहले पयठकों के सयमने आई थी । अांदगकय ियषय की वह पहली प्रकयदशत ऐदतहयदसक 16

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


पस्ु तक थी – ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ । ्ह नयटक बीसवीं सिी के पचयसवें िशक में दलखय ग्य थय जब दहन्िी में िी नयट् ् सयदहय् दवधय अपने शैशवयस्थय में ही दवद्यमयन थीं । आदथट क अियव की वजह से ्ह तरु तां ही पस्ु तक रूप में नहीं आ पयई थी । कई बयर मांदचत हो चक ु ी अांदगकय नयट् ् सयदहय् की ्ह पस्ु तक १९६१ ई. में तब प्रकयदशत हुई जब डॉ. चकोर की पटनय में सरकयरी नौकरी हो गई थी और उनके पयस पस्ु तक छपवयने के दल्े प्यट प्त पैसे जमय हो गए थे । ्ह पस्ु तक इतनी लोकदप्र् हुई थी दक उनके द्वयरय इसके १९६१ ई. में प्रकयदशत प्रथम सांस्करण की एक हजयर प्रदत्याँ िेखते-िेखते दबक गई ांथीं और दद्वती् सांस्करण सन १९७२ ई. में पनु ः प्रकयदशत करनय पडय थय । अांदगकय ियषय आांिोलन कय जब-जब दजक्र होगय इस पस्ु तक कय िी दजक्र अवश्​् होगय । अांदगकय आांिोलन के इदतहयस की चचयट करते वि इस ऐदतहयदसक दकतयब कय दजक्र करते हुए डॉ. चकोर बडे गवट से कहय करते थे, “ पटनय में सन १९६१ ई. में दकसी अज्ञयत व्दि ने मझ ु े आिरणी् श्री रयजय रयदधकय रमण प्रसयि दसांह से सांपकट करय्य । रयजय सयहब ने मझ ु े अपनी कयर में बैठयकर उसी दिन दवधयन सिय अध्​्ि डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांशु से दमलय्य । डॉ. सधु यांशु ने मझ ु े रयष्ट्रियषय पररषि में श्री गियधर प्रसयि अमबष्ठ जी से दमलने की प्रेरणय िी । मैं अपनी सद्य प्रकयदशत पस्ु तक ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ के सयथ श्री अमबष्ठ जी से दमलय । आिरणी् श्री अमबष्ठ जी ने दबहयर रयष्ट्रियषय पररषि के सहकदमट ्ों – श्री परमयनन्ि पयण्डे्, श्री श्रीरांजन सूररिेव, श्री तोमरजी आदि से दमलयते हुए कहय – ‘हेि ं॑ िेखऽ अांदगकय के लेखक-कदव चकोर कं॑’ । उसी दिन से मैं और श्री अमबष्ठ जी दनय् िो-तीन घांटे कय सम् अांग ियषय पररषि के तहत अांदगकय आांिोलन के दल्े िेते रहे । श्री अमबष्ठ जी के दनधन के पियत मैं पांखहीन पांछी की तरह हो ग्य थय । ” इस बीच सन १९६३ ई. में डॉ. चकोर दलदखत एक और ऐदतहयदसक महयव की नयटक की पस्ु तक, ‘सवोि् समयज’ प्रकयदशत हुई । ‘सवोि् समयज’ नयटक कय प्रकयशन दबहयर सरकयर के सयमयदजक दशिय पषट ि द्वयरय दक्य ग्य थय । ्ह अांदगकय ियषय की पहली पस्ु तक थी, जो दकसी सरकयरी दवियग द्वयरय प्रकयदशत हुई थी । ज्ञयतव् है दक अांदगकय ियषय आांिोलन की शरु​ु आत सन १९५६ ई. में डॉ.

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

17


लिमी नयरय्ण सधु यांशु की अध्​्ितय में ‘अांग ियषय पररषि’ की स्थयपनय से हुई थी । श्री गियधर प्रसयि अमबष्ठ - प्रधयनमांत्री, श्री मोहन दमश्र ‘मधपु ’ – सां्ि ु मांत्री, श्री परमयनन्ि पयण्डे् - सयदहय् मांत्री थे । बयि में सन १९६१ ई. में डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर प्रचयर मांत्री के रूप में इससे जडु े । बयि के बषों में श्री चकोर ने ‘अांग ियषय पररषि’ के अध्​्ि पि को िी सशु ोदित दक्य थय । डॉ. चकोर ने श्री अमबष्ठ जी के सयथ ‘अांग ियषय पररषि’ में सदक्र् रूप से कय्ट करते हुए अांदगकय ियषय आांिोलन को आगे ब़ियने में अहम् िदमकय अिय की । इसके प्रथम व दद्वती् अदधवेशन के आ्ोजनों कय वे हमेशय दजक्र करते थे दजसमें रयष्ट्री् स्तर तक के अांदगकय ियषय-ियषी िेत्र के दहन्िी सयदहय् जगत की बडी-बडी हदस्त्याँ बडे जोश के सयथ शयदमल हुई ां थीं । दद्वती् अदधवेशन की अध्​्ितय डॉ. रयमधयरी दसांह दिनकर ने की थी, उर्द्घयटनकतयट थे - डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांशु जबदक कदव सममेलन की अध्​्ितय श्री हांस कुमयर दतवयरी ने की थी । दफर १३ दिसांबर १९६७ को अांग ियषय पररषि की बयदषट क बैठक में इसके सांरिकों, पियदधकयरर्ों और कय्ट सदमदत के सिस्​्ों कय दनवयट चन िी हुआ थय । सांरिक के रूप में दनवयट दचत प्रमख ु नयमों में शयदमल थे - डॉ. रयमधयरी दसांह दिनकर, डॉ. मयहेिरी दसांह महेश, श्री ियगवत झय आजयि, श्री कृष्ट्ण दसांह आदि । पियदधकयरर्ों के रूप में दनवयट दचत प्रमख ु नयमों में शयदमल थे - डॉ. कुमयर दवमल, डॉ. वचनिेव कुमयर, श्री जगिीश दमश्र, श्री परमयनन्ि पयण्डे्, श्री नरेश पयण्डे् चकोर, श्री कयमेिर प्रसयि कयमेश आदि । जबदक कय्ट सदमदत के सिस्​्ों के रूप में दनवयट दचत प्रमख ु नयमों में शयदमल थे – श्री हांस कुमयर दतवयरी, श्री मधक ु र गांगयधऱ, श्री जयगेिर मांडल, श्री सरु न्े द्र दमश्र, श्री मोहन दमश्र ‘मधपु ’, डॉ. िशरथ मांडल, पां. श्रदु तिेव शयस्त्री आदि । डॉ. चकोर ने हमेशय एक सवोच्च कोदट के सांगठक, आांिोलनधमी, सां्ोजक और आ्ोजक की िूदमकय दनियई थी । अांग ियषय पररषि की स्थयपनय के पियत कयलयांतरयल में कई अन्​् सांगठनों की स्थयपनय की गई दजनमें डॉ. चकोर सदक्र् रूप से ्य प्रेरणयस्त्रोत के रूप में अांदगकय और दहन्िी ियषय-सयदहय् के दवकयस के दल्े जीवनप्ांत कय्ट करते रहे । इनमें प्रमख ु हैं – जयह्नवी अांदगकय 18

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


सांस्कृदत सांस्थयन, अदखल ियरती् अांदगकय सयदहय् कलय मांच, अदखल ियरती् अांग-अांदगकय दवकयस मांच, अदखल ियरती् अांदगकय दवकयस सममेलन, अांदगकय दवकयस सममेलन, अदखल ियरती् अांदगकय ियषय सममेलन, अदखल ियरती् ियषय सयदहय् सममेलन, अांदगकय ियषय सयदहय् पररषि, दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, लोकियषय पररषि, ियरती् ियषय सयदहय् समयगम, प्रज्ञय सदमदत आदि । ‘जयह्नवी अांदगकय सांस्कृदत सांस्थयन’ के तयवयधयन में वे आजीवन हर सयल रयजधयनी पटनय में ‘अांदगकय महोयसव’ कय आ्ोजन कर अांदगकय के सयदहय्कयरों को सयदहदय्क चचयट ओ ां और कयव् गोदष्ठ्ों के दल्े आमांदत्रत कर उनके ्ोगियनों और अवियनों के दल्े दवदिन्न सममयनों व परु स्कयरों से सममयदनत व परु स्कृत करते रहे । पटनय में आ्े दिन आ्ोदजत होने वयले सयदहदय्क गोदष्ठ्ों, कदव गोदष्ठ्ों व सममेलनों में उनकी िूदमकय अहम होती थी और वे इनमें बहुत सदक्र् और बडे उयसयदहत होकर ियग लेते थे । उनकी उपदस्थदत िर से ऐसे अवसरों पर जीवांततय आ जयती थी । वे हर ऐसे अवसरों पर पटनय के दजन कुछ सयदहय्कयरों और दवद्वयनों को बडी आयमी्तय से आमांदत्रत कर उनकी उपदस्थदत सदु नित करते थे वे हैं – मयननी् श्री अिनी कुमयर चौबे, डॉ. श्रीरांजन सूररिेव, डॉ. दशववांश पयण्डे्, डॉ. जगिीश पयण्डे्, डॉ. अदनल सल ु ि, डॉ. िगवतीशरण दमश्र, डॉ. खगेन्द्र ठयकुर, श्री नपृ ेन्द्रनयथ गप्तु , डॉ. दशवनयरय्ण, श्री दज्यलयल आ्ट , डॉ. िूतनयथ दतवयरी, श्री बलिद्र कल्​्यण, श्री ्ोगेन्द्र प्रसयि दमश्र, श्री दशवित्त दमश्र, श्रीमती प्रदमलय िेवी वमयट आदि । वे आमांत्रण दमलने पर िेश, रयज्​् के दकसी िी कोने में आ्ोदजत होने वयली कदव गोदष्ठ्ों और सयदहदय्क चचयट ओ ां में आवश्​्क रूप से दहस्सय लेते थे । वे ऐसे हर आ्ोजनों पर अांदगकय के पस्ु तकों की प्रिशट नी लगयनय नहीं िूलते थे, चयहे इन दकतयबों को उन्हें अपने मयथे पर ही ढोकर आ्ोजन स्थल तक क्​्ों नहीं ले जयनय पडतय हो । ‘अांग मयधरु ी’ के प्रकयशन कय दवचयर उन्हें कब, क्​्ों और कै से आ्य ? डॉ. चकोर कय कहनय थय दक श्री अमबष्ठ जी के दनधन के पियत वे कयफी आहत महसूस करने लगे थे दजसके फलस्वरूप उनमें कयम करने के दल्े पहले जैसय जोश ही शेष नहीं रहय थय । दजांिगी बेजयन सी हो गई थी । न्य जोश पनु ः तब जगय

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

19


जब उनके दमत्र श्री सरु द्रें दमश्र जी ने प्रेररत कर उनसे अांदगकय मयदसक पत्र, ‘अांग मयधरु ी’ दनकलवयनय शरू ु करवय्य । इस तरह शरू ु हुआ ‘अांग मयधरु ी’ कय ऐदतहयदसक सफर और अांदगकय ियषय आांिोलन कय एक न्य अध्​्य् । दिसांबर – १९७० ई. से दन्दमत प्रकयदशत होने वयली ‘अांग मयधरु ी’ ने डॉ. चकोर में अि​ितु उजयट और अपूवट शदि कय सांचयर दक्य थय । अांदगकय की दवदवध सयदहदय्क दवधयओां में दवदिन्न लेखकों द्वयरय रचनय्ें रची जयने लगीं जो अांततः पस्ु तक रूप में प्रकयदशत होकर पयठकों के सयमने आने लगीं । अांदगकय कदवतय, अांदगकय कहयनी, अांदगकय उपन्​्यस, अांदगकय लोक गयथय, अांदगकय लोक कथय, अांदगकय नयटक आदि की पस्ु तकें । िेखते-िेखते अांदगकय ियषय में दलखने वयले सैकडों लेखकों-कदव्ों की फौज तै्यर हो गई । इसी क्रम में अांदगकय पस्ु तक प्रकयशन की सहदल्त के दल्े बयि में शेखर प्रकयशन की स्थयपनय िी की गई, दजसके मयध्​्म से अांदगकय ियषय की डे़ि सौ से िी ज्​्यिय पस्ु तकें अब तक प्रकयदशत हो चक ु ी हैं । डॉ. चकोर की ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ से शरू ु हुई अांदगकय सयदहदय्क ्यत्रय ‘फूलऽ के गल ु िस्तय’ से गज ु रते हु्े ‘रघवु शां म’ तक पहुचाँ कर ‘सिांु र कयांड’ की ओर अग्रसर हो रही थी दक तिी १४ नवांबर की वह मनहस शयम आ गई जब वे हमसे दबछुड ग्े । उन्होंने अांदगकय व दहन्िी की ७१ दकतयबें दलखीं दजसमें उनके द्वयरय ८ सांपयदित पस्ु तकें शयदमल हैं । उसके अलयवे उन्होंने डॉ. अि्कयांत चौधरी के सयथ दमलकर ९ और दकतयबें दलखीं और सांपयदित करीं । डॉ. चकोर के उपर दवदिन्न दवद्वयनों द्वयरय ९ पस्ु तकें िी दलखीं गई हैं । उन्होंने अांदगकय मयदसक ‘अांग मयधरु ी’ कय ४६ बषों तक लगयतयर सांपयिन तो दक्य ही, सयथ ही वे बषों से दहन्िी त्रैमयदसक – ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’, ‘प्रज्ञयवयणी’ कय िी सांपयिन कर रहे थे । उन्होंने अांदगकय के कुछ अन्​् महयवपूणट त्रैमयदसक पदत्रकय के सांपयिन में िी सह्ोग दि्य, दजनमें प्रमख ु हैं – अांदगकय और अांगिूत । अपने प्रकयशन के ४६ बषों के लांबे सफर को अांदगकय ियषय की मयदसक पदत्रकय ‘अांग मयधरु ी’ ने अपने कयलज्ी ्शस्वी सांस्थयपक सांपयिक डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर के कुशल सांपयिन में सफलतय पूवटक त् कर ियरती् ियषयओां 20

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


के सांरिण व सांवर्द्टन के िेत्र में न्े कीदतट मयन ग़िकर अदद्वती् इदतहयस रचय है । डॉ. चकोर ने इस पदत्रकय में अांदगकय सयदहय् की दवदिन्न दवधयओां की रचनयओां को प्रकयदशत कर अांदगकय ियषय की पहचयन को रयष्ट्री् स्तर पर प्रदतष्ठयदपत कर एक ऐसय इदतहयस रचय जो अपने आप में असयधयरण, अवणट नी् व अतल ु नी् है । इस पदत्रकय के दन्दमत प्रकयशन से अांदगकय में रचनययमक सयदहय् के दवकयस को जो द्रतु गदत दमली और अांततः अांदगकय ियषय आांिोलन के जड को जो मजबूती दमली है वह सवट व्यपी है । चयहे वह दबहयर अांदगकय अकयिमी की स्थयपनय कय हकीकत में तब्िील होनय हो ्य दफर दविदवद्ययल्ों में अांदगकय की प़ियई के प्रयरांि होने कय मसलय हो ्य आकयशवयणी के कय्ट क्रमों में अांदगकय ियषय को शयदमल करनय हो । अांदगकय को रयज्​् व सांघ लोक सेवय आ्ोग की परीियओां में शयदमल करवयने की बयत हो ्य ियरती् सांदवधयन की अष्टम अनस ु ूची में शयदमल करवयने की । आज अगर आम जीवन से लेकर सत्तय के गदल्यरों तक में अांदगकय की आवयज बल ु दां ि्ों पर है तो ्ह अांदगकय को इसके वयदजब हक दिलवयने की चकोर जी की हि तक परयस्त करने वयली हठधदमट तय के फलस्वरूप दनकली उजयट कय ही असर है । ्ह िूसरे ियषयई आांिोलन के दल्े िी महयवपूणट मील कय पयथर सयदबत हो रही है । ‘अांग मयधरु ी’ को गवट है दक इसमें अांदगकय के दिवांगत दवद्वयनों ्थय डॉ. लिमी नयरय्ण सधु याँश,ु डॉ. जनयिट न दमश्र, गियधर प्रसयि अमबष्ठ, अनूपलयल मांडल, डॉ. परमयनन्ि पयण्डे्, पां. िवु नेिर प्रसयि चौधरी िवु नेश, उमेश जी, डॉ. अि्कयन्त चौधरी, समु न सूरो, िवु नेिर प्रसयि दसांह ‘िवु न’, गरु शे मोहन घोष सरल, डॉ. कुमयर दवमल आदि सदहत वतट मयन सम् के प्रय्ः सिी सयदहय्कयरों की रचनय्ें छपती रही हैं । डॉ. चकोर ने ‘अांग मयधरु ी’ के मयध्​्म से अांदगकय ियषय में दलखने वयले लगिग हजयर लेखक - कदव तै्यर दक्े । वे सिैव हर पी़िी के लेखकों को, दवदवध दवधय से सांपन्न दवदवध िेत्रों के दवचयरवयनों को, दसर्द्हस्त व स्थयदपत से लेकर न्े-न्े सयदहय्कयरों, कलयकयरों, रचनयधदमट ्ों को अांदगकय में लेखन के दल्े प्रोयसयदहत कर ‘अांग मयधरु ी’ को अांग और अांदगकय के मयध्ु ट के हर पहलू से सरयबोर करने िेने की अपनी तमन्नय को हकीकत में बिलने के दलए

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

21


तयपर रहय करते थे । डॉ. चकोर आजीवन इस बयत को लेकर सतकट रहे दक “कहीं सोडयवयटर के जोश की तरह ‘अांग मयधरु ी’ कय प्रकयशन बांि न हो जय्” । उन्होंने ‘अांग मयधरु ी’ के प्रथम अांक के प्रकयशन के उपरयांत प्रदतदक्र्य स्वरूप पत्र द्वयरय प्रयप्त दबहयर के प्रेमचांि कहे वयले उपन्​्यसकयर स्व. अनूपलयल मांडल के उस विव् को चनु ौती के रूप में स्वीकयर दक्य दजसमें उन्होंने पदत्रकय की प्रशांसय करते हुए इसी आश् के दवचयर व्ि दक्े थे । पूरे दछ्यलीस सयल बयि इस त्​् को ्यि करते हुए ‘अांग मयधरु ी’ के अपने अांदतम सांपयिकी् में डॉ चकोर ने स्व. अनूपलयल मांडल के विव् “कहीं सोडयवयटर के जोश की तरह ‘अांग मयधरु ी’ कय प्रकयशन बांि न हो जय्” को ‘अांग मयधरु ी’ के प्रकयशन को गदत िेने वयलय बतय्य है । डॉ चकोर ने स्व. अनूपलयल मांडल को इस पत्र के जबयब में दि्े ग्े वचन को शब्िशः दनिय्य । उन्होंने जबयब में दलखय थय,“जब तक चकोर दजांिय रहतै ‘अांग मयधरु ी’ बांि नै होतै ।” ियरत में स्थयदपत ियरती् ियषयओां ्हयाँ तक की दहन्िी ियषय की पदत्रकय को दनकयलनय िी अय्ांत जोदखम िरय प्रकल्प है । इसे कबीर के शब्िों में सयधु सांग्रयम िी कह सकते हैं । पदत्रकय दनकयलते हुए हमेशय ्ह दचांतय बनी रहती है दक पयठक कहयाँ से आ्ेंगें । अांदगकय जैसी ियषय की पदत्रकय दनकयलते वि एक ि् और जडु जयतय है दक लेखक कहयाँ से आ्ेंगें । ‘अांग मयधरु ी’ दनकयलते वि तो अांदगकय बोलने वयले करोडों लोगों तक को ्ह तक पतय नहीं थय दक जो ियषय वे बोलते हैं वह अांदगकय है । लोग ियषयओां की पदत्रकय्ें दनकयलते हैं, डॉ. चकोर ने ियषय के दल्े पदत्रकय दनकयली । उन्होंने आम लोगों के बीच जयगरूकतय फै लयकर अांदगकय ियषय को स्थयदपत करने के दल्े ‘अांग मयधरु ी’ पदत्रकय दनकयली । उन्होंने लोगों को बतय्य दक आप की ियषय अांदगकय है , आप अांदगकय में दलख सकते हैं । दफर लेखकों की दलखी रचनयओां को पदत्रकय में छयपकर उन लेखकों को ही ‘अांग मयधरु ी’ के पयठक वगट में शयदमल कर अांदगकय के लेखकों और पयठकों की फौज एक सयथ तै्यर की । ्ह कोई आसयन सय कय्ट नहीं थय । ्ह कयफी मजबूत सांकल्प से ही सांिव थय । ऐसय सांकल्प जो घर में ही लोगों को सयधु की दजांिगी जीने को दववश कर िे । एक ऐसी अद्भतु हकीकत दजसे आने वयली पी़िी शय्ि एक बनी-बनयई कथय के रूप में ही स्वीकयर करे । अांदगकय ियषय के व्यपक प्रचयर-प्रचयर के दल्े मेले से लेकर ठेले 22 अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


पर , गयाँव के ढग्घर से ले कर नगर की सीमय तक में अांदगकय ियषय के परचे, पदत्रकय और दकतयबें बेचने से िी परहेज न करने वयले डॉ. चकोर में अपनी ियषय की सेवय कय जज्बय असयधयरण थय । अांदगकय ियषय सेवय कय उनकय सांकल्प इतनय प्रबल थय दक उनकय ‘अांग मयधरु ी’ दनकयलने कय जोश किी िी सोडय वयटर कय जोश सयदबत नहीं हुआ । डॉ. चकोर ने अांदगकय ियषय के सांरिण और सांवर्द्टन के दल्े प्रय्ोदगक रूप से हर सांिव तरीके अपनय्े जो अपने आप में अनूठे थे । ‘अांग मयधरु ी’ कय अपेियकृत कम पन्नों कय होनय, ‘अांग मयधरु ी’ के बीच-बीच में सदन्नदवष्ट दक्े ग्े पन्ने जो इसके पहले किी दकसी पदत्रकय के प्रकयशऩ में नहीं िेखय ग्य थय । वस्ततु ः अांदगकय की कई पस्ु तकें इस प्र्ोग को अमल में लयकर ही कयफी सस्ते में प्रकयदशत हुई हैं । हर सयदहदय्क आ्ोजनों पर अांदगकय के पस्ु तकों की प्रिशट नी लगयनय आदि िी इन्हीं प्रय्ोदगक तरीकों कय ही एक दहस्सय थय । ्ह एक गहन शोध कय दवष् है दक कै से दबनय दकसी सरकयरी ्य अन्​् आदथट क मि​ि के स्त्रोत के उन्होंने ‘अांग मयधरु ी’ को इतने बरसों तक लगयतयर प्रकयदशत दक्य । जबदक इसी कयलखांड में नयमी प्रकयशकों की लोकदप्र् दहन्िी पदत्रकय्ें - सयररकय, धमट ्गु , दिनमयन, रदववयर, सयप्तयदहक दहन्िस्ु तयन, परयग आदि कुछ बरसों तक प्रकयदशत होकर ही बांि हो गई ां। डॉ. चकोर द्वयरय अांदगकय ियषय के सांरिण व सांवर्द्टन के दल्े दक्े ग्े िगीरथ प्र्यस के वल रयष्ट्री् ही नहीं वैदिक स्तर पर िी अदद्वती् नजर आते हैं । ियषय के सांरिण व सांवर्द्टन के िेत्र में वे अपनी तरह के पहले व अांदतम व्दि नजर आते हैं । ियरत में इस तरह के दक्े ग्े प्र्यसों पर नजर डयलें तो आचय्ट महयवीर प्रसयि दद्ववेिी और पांदडत श्रीरयम शमयट िी उनसे कमतर नजर आते हैं । आचय्ट महयवीर प्रसयि दद्ववेिी ने के वल १८ बषों तक ही सरस्वती कय सांपयिन दक्य थय । पांदडत श्रीरयम शमयट ने लगिग िो िशकों तक ‘दवशयल ियरत’ दहन्िी मयदसक कय सांपयिन दक्य । जबदक डॉ. चकोर ने अांदगकय मयदसक ‘अांग मयधरु ी’ कय पूरे ४६ बषों तक लगयतयर सांपयिन दक्य । सयथ में दहन्िी त्रैमयदसक, ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’ और ‘प्रज्ञयवयणी’ कय क्रमशः १८ बषों और १६ बषों तक सांपयिन में सह्ोग दि्य । वैदिक स्तर पर उनके जोर कय कोई उियहरण नहीं दमलतय । कौन करेगय इतनय पररश्रम ! डॉ. चकोर कय सयहस धन्​् थय । ियषय सेवय की उनकी सच्ची

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

23


लगनशीलतय इदतहयस के पन्नों में िजट होकर ्गु ों-्गु ों तक ियषयई आांिोलन को सही रयस्तय दिखयते रहने हेतु प्रकयश-स्तांि कय कयम करतय रहेगय । डॉ. चकोर’ की मयन्​्तय थी दक मयतिृ यषयएाँ, उपियषयएाँ और िेत्री् लोकियषयएाँ रयष्ट्रियषय के सांवर्द्टन में दवशेष ्ोगियन करती हैं । इसी सोच कय नतीजय थय दक वे अांदगकय ियषय की मयदसक पदत्रकय,’अांग मयधरु ी’ में एक समपयिक के रूप में समपयिकी् दहन्िी में ही दलखते थे । ्ह उनके रयष्ट्रवयिी और समन्व्वयिी सोच और दवचयरों के दवस्ततृ फलक को रेखयांदकत करते हुए एक ऐसय उियहरण पेश करतय है जो िेश की सदहष्ट्णतु य को ब़ियने की दिशय में अनक ु रणी् होकर महयवपूणट िूदमकय अिय करने की िमतय रखतय है । सन् २००८ ई. में ७१वें जन्म दिवस-समयरोह पर बहुआ्यमी प्रदतिय के सयधक डॉ. चकोर कय सयरस्वत सममयन दक्य ग्य थय और उन्हें लगिग ५०० पष्ठृ ों कय एक अदिनांिन ग्रांथ िेंट दक्य ग्य थय। दजसकय नयम थय-‘बहुआ्यमी सयधक-डॉ. चकोर’और दजसके सांपयिक थे - डॉ. दशवनयरय्ण । उसी तरह सन् २०१२ ई. में उनके ७५वें जन्म दिवस-समयरोह को अमतृ महोयसव के रूप में आ्ोदजत कर उन्हें लगिग ३०० पष्ठृ ों कय एक अदिनांिन ग्रांथ िेंट दक्य ग्य थय । दजसकय नयम थय – ‘सयदहय् मनीषी - डॉ. चकोर’ और दजसकय समपयिक दक्य थय डॉ. रेखय दमश्र ने । इन िोनों ग्रांथों में डॉ. चकोर के जीवन सफर को उनके व्दियव और कृदतयव के दवदवध आ्यमों पर सैकडों दवद्वयनों के दृदष्टकोण को समयदहत करते हुए दवस्तयरपूवटक उके रकर मूल्​्यांदकत दक्य ग्य है । डॉ. चकोर दज्े िी तो ्ोर्द्य की तरह अपनी शतों पर और दविय िी दल्े तो ्ोर्द्य की तरह । उनके जीवन कय सांिेश सयफ थय – अांदगकय जैसी ियषय के अदस्तयव की लडयई में बीच कय कोई रयस्तय नहीं होतय । इसके दल्े जरूरत है ्ोर्द्य की तरह जीने की और ्ोर्द्य की तरह ही मर दमटने की । उनकय पूरय जीवन अांदगकय व दहन्िी ियषय सयदहय् की सेवय करते तथय रयम की अरयधनय में गज ु रय । दजस तरह डॉ. चकोर कय लोकयन्तरण अांदतम िण तक सयदहय् की सेवय करतेकरते और रयम-तल ु सी सांबांधी आलेख कय प्रूफ रीदडांग करते-करते हुआ, एक ियषयदवि, सयदहय् सेवी और रयमि​ि के दल्े उससे बेहतर तरीके कय दनधन िी 24

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


िलय क्​्य हो सकतय है ? ्ह कै सय महयसां्ोग है दक वे उन्हीं िो चीजों में तल्लीन रहते अनांत लोक की तरफ प्रस्थयन िी कर गए दजनमें वे आजीवन तल्लीन रहे थे, दबल्कुल उस बेहि सच्चे, कमट ठ और कमट वीर ्ोर्द्य की तरह जो मयतिृ ूदम की रिय के दल्े रणिूदम में लडते सवट स्व न्​्ोछयवर कर वीरगदत को प्रयप्त कर लेतय है । बौंसी के समद्रु मांथन से दनकली हुई ां चौिह चीजों में से िो चीजें िोले बयबय के दहस्से में पडीं थीं । एक तो हलयहल दवष और िूसरी चांद्रमय । दवष को गले के िीतर दछपय दल्य थय और चयरुतय-चक्र-चूडयमदण चांद्रमय को दसर पर स्थयन दि्य थय । इसदल्े दक िदु न्य िेखे दक रयनयकर से उन्हें वह अनमोल रयन प्रयप्त हुआ । अांग िेश को अगर ्ह गौरव प्रयप्त है दक उन्होंने िदु न्य को चयाँि जैसय रयन दि्य । तो अांग िेश को ही ्ह गौरव िी प्रयप्त है दक उन्होंने चयाँि चकोर की तरह अांदगकय को अपनी जयन से िी ज्​्यिय चयहने वयलय “अांदगकय चकोर” दि्य । बौंसी के दजस मांियर परबत को समद्रु मांथन में मथनी की तरह उप्ोग कर चयाँि को प्रयप्त दक्य ग्य थय , उस स्थल पर चकोर जी आजीवन मकर सांक्रांदत के अवसर पर जयकर अांदगकय ियषय- सयदहय् की दकतयबों और अांदगकय मयदसक पदत्रकय, ‘अांग मयधरु ी’ कय स्टॉल लगयकर प्रिशट न करते रहे । मकसि दसफट एक थय - अांदगकय ियषय व सयदहय् के प्रदत लोगों में जयगरुकतय कय सांचयर, अांदगकय ियषय कय उयथयन । डॉ. चकोर कय अांदगकय ियषय-सयदहय् से बेतहयशय प्रेम कय दखस्सय सिय अमर रहेगय । ‘चयाँि-चकोर’ की तरह ‘अांदगकय-चकोर’ अमर रहेंगें । हमयरय दवनम्र आग्रह है दक ियरत के लगिग छह करोड अांदगकय ियषय-ियषी की ियवनयओां कय कद्र करते हुए रयज्​् सरकयर व ियरत सरकयर अांदगकय के इस ्गु यांतरकयरी सयदहय्कयर व ियषयदवि् डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ को पद्म-दविूषण / पद्म िूषण जैसे गौरवशयली रयजकी् सममयनों से सममयदनत करे ।

‘अांग मयधरु ी’ कय प्रस्ततु अांक दिवांगत सांस्थयपक सांपयिक डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ को समदपट त ‘डॉ. चकोर स्मदृ त अांक’ है । मेरे पयस दजतने लोगों के सांपकट नांबर उपलब्ध थे उन्हें फोन, एस.एम.एस., वयट् सऐप, ई-मेल आदि द्वयरय इस अांक के दल्े

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

25


रचनय िेजने कय आग्रह दक्य थय । िस जनवरी तक प्रयप्त रचनयओां को इस अांक में शयदमल दक्य ग्य है । बयि में प्रयप्त होने वयली शेष रचनयओां को अगले अकों में प्रकयदशत करने कय क्रम जयरी रहेगय । आप से दवनम्र आग्रह है दक अांदगकय की रचनयओां- कहयनी, कदवतय, आलेख, समीिययमक दनबांध, व्ांग्​् आदि के सयथ-सयथ डॉ. चकोर की स्मदृ त से जडु े अपने सांस्मरण, सांपयिकी्-सांपकट पते पर ्थयशीघ्र अवश्​् िेजें । हमयरे अनरु ोध पर सांचयर के दवदिन्न उपलब्ध मयध्​्मों ्थय – ईमेल, वयट् सऐप, स्पीड पोस्ट, रदजस्टडट पोस्ट आदि से अय्ल्प सम् में ही अपनी रचनय्ें िेजकर आप दवद्वतजनों ने दजस तरह की उियरतय, गांिीरतय और तयपरतय िशयट ई है उसके दल्े आप सबों के प्रदत कृतज्ञतय प्रकट करते हु्े आप सबों कय हयदिट क शदु क्र्य अिय करतय हाँ । आशय है ‘अांग मयधरु ी’ के प्रदत आपकय ्ह प्रेम, स्नेह आजीवन बनय रहेगय और आप अपने रांग-दबरांगे पष्ट्ु पों सदृश उयकृष्ट अांदगकय रचनयओां से इसे गदु मफत करने कय अवसर हमें प्रियन करते रहेंगें । हमयरी कोदशश ्ह रहेगी दक अांदगकय की उयकृष्ट प्रदतिय,सवोच्च मेधय और सवोयकृष्ट सजट नय ‘अांग मयधरु ी’ के पन्नों पर उतरकर आ्े दजससे दक ‘अांग मयधरु ी’ एक दवशयल पयठक वगट के हृि् में और गहरे पैठ सके । ‘अांग मयधरु ी’ के अनवरत और प्रियवशयली प्रकयशन के दलए आपकय सह्ोग, समथट न और प्रोयसयहन अपेदित है । इस पदत्रकय के शब्ियांकन, दडजयइन एवां सांपयिन में वतट मयन में उपलब्ध सिी आधदु नकतम तकनीकों कय उप्ोग दक्य ग्य है । दडजयइन और शब्ियांकन तक कय कयम िी खिु से दक्य ग्य है । अिी तक मैं ्ह अांदगकय.कॉम के दल्े करतय रहय हाँ । पर अपनी मयतिृ यषय अांदगकय की पदत्रकय, ‘अांग मयधरु ी’ के दल्े ऐसय करनय एकिम अद्भतु व सख ु ि अनिु व िेने वयलय रहय । मैं ‘अांग मयधरु ी’ की पूजनी्य प्रकयदशकय श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु जो मेरी मयाँ सदृश हैं के प्रदत हयदिट क कृतज्ञतय प्रकट करतय ह,ाँ जो उन्होंने मझ ु े अांदगकय ियषय – सयदहय् के उयथयन में महयवपूणट अवियन के दलए ्गु ों से प्रकयश स्तांि की तरह खडी ‘अांग मयधरु ी’ जैसी ऐदतहयदसक अांदगकय मयदसक पदत्रकय के सांपयिन कय स-ु अवसर प्रियन दक्य । हमने इस अांक को पररश्रमपूवटक ्थयसांिव पठनी् और प्रियवशयली बनयने कय प्र्यस दक्य है । अनजयने में रह गई ांप्रूफ सांबधां ी गलदत्ों के दलए िमयप्रयथी । आशय है, सधु ीजन हमयरे पररश्रम को अपनी प्रदतदक्र्य और अपने सांवयि से सयथट क बनयएाँगें ।

26

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल चकोर जी के दनधन स ॑ अंि समाज अनाथ होय िेलै

श्रर्द्े् स्व. डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी सां ं॑ हमरऽ समबन्ध बहुत परु यनऽ (४५ बरसऽ स ं॑ ) छे लै । हुनकऽ अचयनक मयृ ्ु स ं॑ हममां ं॑ बहुत हतप्रि हो् गेलांऽ । ई िःु खि समयचयर सनु ी कं॑ हमरय मनऽ मां ं॑ ई बयत उठलऽ दक अब ं॑ अांदगकय के ऐन्हऽ असयधयरन सेवय के करतऽ आरू अांदगकय मयदसक पदत्रकय ‘अांग मयधरु ी’ के िेजतऽ । सचमचु हुनकऽ दनधन स ं॑ अांग समयज अनयथ हो् गेलै । अांदगकय आरो दहन्िी ियसय सयदहय् िेत्र स ं॑ हुनकऽ बहुत गहरऽ सांबधां छे लै । प्रज्ञय सदमदत के कयम म ं॑ िी हुनी अनेकों लोगऽ कं॑ जोडै के महयवपूनट ्ोगियन करै छे लय । हुनी सिु यमय के िूदमकय मां ं॑ छे लय । िगवयन हुनकऽ आयमय कं॑ दचर शयदन्त आरू मोि प्रियन कर ं॑ , ्ह ं॑ प्रिु स ं॑ प्रयथट नय छै । ॐ शयदन्तः - शयदन्तः - शयदन्तः ।

अदश्वनी कुमार चौबे, मयननी् सयांसि, बक्सर, दबहयर

यह स्वीकारना दक डॉ. चकोर नहीं हैं अदवश्वसनीय लिता है

स्व. चकोर जी मेरे अय्ांत आयमी् स्वजनों में सदममदलत थे । एक वरेण्​् सयदहय्सेवी के रूप में, सयदहय् सममेलन के एक पियदधकयरी के रूप में और एक अय्ांत अनरु यगी शिु ेच्छक के रूप में उनके सयदन्नध्​् को मैं कियदप दवस्मतृ नहीं कर सकतय । उनकय सरल-तरल और दवरल व्दियव और उनकय सिैव प्रफुदल्लत मख ु यरदवन्ि मझ ु े सिैव प्रेररत करतय रहय है । मेरे प्रदत उनकय सममयन-्ि ु स्नेह अतल्ु ् थय । उनके चदकत और सन्न कर िेने वयले दतरोद्ययन ने मझ ु े एक प्रबल झटकय सय दि्य । ्ह स्वीकयर कर पयनय दक वे हमयरे बीच नहीं हैं, अदविसनी् लगतय है । उन्हें खोकर मैंने और सयदहय् सांसयर ने अपनय बहुत कुछ खो दि्य है । उनकी स्मदृ त को तपट ण िेते हुए उनकी दिव्ययमय को श्रर्द्यपूवटक नमन करतय हाँ । डॉ. अदनल सल ु भ, अध्​्ि, दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय, दबहयर

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

27


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल अंदिका, दहन्िी की सेवा में डॉ. चकोर की दनष्ठा दिशा-दनिेशक

डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ कय लोकयन्तरण सयदहय्, समयज और सयांस्कृदतक िेत्र की अपूरणी् िदत है । डॉ. चकोर ने अपने सयदहदय्क एवां सयांस्कृदतक अवियनों से इन िोनों िेत्रों को सनयढ् ् दक्य है । हमलोगों कय कतट व् बनतय है दक हम उनके द्वयरय प्रयरांि दकए गए सयदहदय्क, सयांस्कृदतक एवां आध्​्यदयमक कय्ों को गदतशील बनयए रखें । अांदगकय और दहन्िी की सेवय में जो दनष्ठय उन्होंने दिखयई वह हमयरे दलए दिशय-दनिेशक है। कय्ट के प्रदत सदन्नष्ठ और ियद्यव के प्रदत सजग डॉ. चकोर आजीवन सेवय धमट कय दनवयट ह करते रहे । िजन,ध्​्यन,पठन,लेखन ही उनकी दिनच्यट के अांग थे । वे स्वियव से दनश्छल और व्वहयर में दनष्ट्कपट सिय बने रहे । हमें उनके चयररदत्रक आिशों को अपनयने कय प्र्यस करनय चयदहए । प्रिु से प्रयथट नय है दक वे उन्हें अपने पयषट िों में सदममदलत कर उनकी िदि को फदलत करें । डॉ. दशववंश पाण्डेय, अध्​्ि, प्रज्ञय सदमदत- दबहयर, पटनय, दबहयर

मैं और सादहदत्यक िैमादसक दहन्िी पदिका उनके दबना अधूरे

चकोरजी नहीं रहे, दवियस ही नहीं होतय । िदवय् को कौन जयनतय है ? मैं और सयदहदय्क त्रैमयदसक दहन्िी पदत्रकय, “न्य ियषय ियरती सांवयि” उनके दबनय अधूरे हैं । नपृ ेन्रनाथ िप्तु , समपयिक, न्य ियषय ियरती सांवयि , दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय, दबहयर 28

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल अंदिका का इदतहास चकोर जी को स्वदणषम पृष्ठों में स्थान िेिा

डॉ. चकोर जी मेरे अांतरांग दमत्र थे । अांदगकय ियषय और सयदहय् की सेवय उन्होंने तपस्वी ियव से ही की है । ऐसय व्दियव सयदहय् पररसर में इन दिनों दवरले हैं । इनकय व्दियव बहुआ्यमी थय और अांदगकय के दल्े उनकय अवियन ऐदतहयदसक महयव रखतय है । मेरी चेतनय और सांवेिनय में उन्होंने स्थयई स्वरूप धयरण कर दल्य है । अांदगकय कय इदतहयस चकोर जी को स्वदणट म पष्ठृ ों में स्थयन िेगय । दबहयर अांदगकय अकयिमी उनके सपनों कय िी सयकयर रूप है और अकयिमी उनके ऋण को किी िूल नहीं सकती । अकयिमी चकोर जी के सपने के अनक ु ू ल कय्ट करने कय प्र्यस करेगी । डॉ. लखनलाल दसंह आरोही, अध्​्ि, दबहयर अांदगकय अकयिमी, पटनय, दबहयर

मेरी मातृभार्ा बदजजका और उनकी अंदिका

हमयरे परम पूज्​् डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी ने हमयरी रचनय महयकयव्, ‘जीवन रस आनन्ि’ की समीिय की एक पूरी पस्ु तक दलखी और िो मयदसक, सयप्तयदहक पत्र में िी अपनी कलम से दवस्तयर पूवटक दवचयर व्ि दक्य थय । मैं उनके ‘अांग मयधरु ी’ कय सिस्​् िी बनय हुआ थय । मेरय और चकोर जी कय सांबधां , दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन से हम िोनों के जडु े हु्े होने के नयते िी थय । मेरी मयतिृ यषय बदज्जकय और उनकी अांदगकय होने के चलते मेरी और चकोर जी की ियदषक व सयदहदय्क दवकयस की दवचयर धयरय एक सी रही है । मैं उनकी आयमय की शयांदत हेतु ईिर से प्रयथट नय करतय हाँ ।

डॉ. दवनय कुमार दबष्णुपुरी, शीलय िवन, दशवशदिनगर, बयजयर सदमदत, पटनय - 800 006

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

29


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल चकोर जी ने अंदिका के साथ-साथ दहन्िी की भी बहुत सेवा की

मैं परम वांिनी् डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी से व्दिगत रूप से जडु य हुआ थय और अांदगकय ियषय के उयथयन के दल्े इनके अनवरत प्र्यस कय तहेदिल से प्रशांसक थय । आिरणी् चकोर जी ने अांदगकय के सयथ-सयथ दहन्िी की िी बहुत सेवय की और अांदगकय तथय दहन्िी में इनके द्वयरय रदचत पस्ु तकें सयदहय् की अनमोल धरोहर हैं । सबसे महयवपूणट बयत ्ह है दक पूजनी् चकोर जी अय्ांत कमट ठ तथय परू ु षयथी व्दि थे । “प्रज्ञय सदमदत” तथय “प्रज्ञ सनयतन समयज” को इनकी अनपु दस्थदत बहुत अखरेगी । परमदपतय परमेिर पूज्​् चकोर जी की आयमय को शयांदत िे तथय पररवयर को इस पीडय को सहने की शदि प्रियन करे ।

राधा दवहारी ओझा, सेवय दनवत्त ृ दवशेष सदचव, अध्​्ि - प्रज्ञ सनयतन समयज, पटनय

हमारी मत्ृ यु भी आिरणीय चकोर जी की तरह ही हो

काश, हमयरी मयृ ्ु िी आिरणी् चकोर जी की तरह ही हो । हररहर पाण्डेय,, पटनय, दबहयर

चकोर जी के असामदयक दनधन से ममाषहत

आिरणी् चकोर जी के असयमद्क दनधन ने व्दिगत धक्कय पहुचाँ य्य है । िो दिन पूवट ही मैंने उनकी तस्वीरें खींचीं थीं । बयतें हुई ां थीं । मगर तीसरे दिन अचयनक िःु खि सूचनय दमली । मैं ममयट हत हाँ । उनकी आयमय को शयदन्त दमले ।

प्रकाश, परमयश्रम, ियगीरथी, पटनय

30

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्धांजदल अंदिका भार्ा के उत्थान के दलये की िई उनकी साधना अमोल

मैं डॉ. चकोर जी की इकलौती बहन हाँ । नयम की महुाँ बोली ह,ाँ परन्तु सगी सय स्नेह दमलय । उनके बयरे में कुछ िी दलखनय सू्ट को िीपक दिखयने जैसी बयत होगी । वे एक उच्चकोदट के सयदहय्कयर , सांपयिक एवां सयधक थे । अांग मयधरु ी कय हर सयल तीन जनवरी कय कय्ट क्रम ्गु ों से करते आ्े । अांदगकय ियषय के उयथयन के दल्े जो सयधनय उन्होंने की है वह अमोल है । हमलोग उनकी इस सयधनय को सिय बरकरयर रखेंगें, ्ही हमयरी उनके प्रदत दृ़ि श्रर्द्य एवां उनके प्रदत अगयध प्रेम कय प्रतीक होगय । वे सयदहय्कयर के अलयवे कयफी धयदमट क प्रवदृ त्त के सयधु थे । िै्य के दनधन से मेरी तो आयमय िहल उठी है । मैं उनके द्वयरय बतय्े और दिखय्े ग्े रयह पर अवश्​् चलने कय प्र्यस करूाँगीं । ियिी, िै्य और बच्चों के सयथ मेरय सांबधां जैसय रहय है, वैसय ही रहेगय । मेरी पस्ु तक ‘अांतरयल’ को छपयने कय उनकय ही पूणटरूपेण प्र्यस एवां प्रेरणय रहय । चकोर िै्य की कमी तो जीवन िर खलेगी । मैं अपने इष्टिेव से प्रयथट नय करतय हाँ दक उनकी आयमय को पूणट रूप से शयदन्त प्रियन करें, ियिीजी को शदि िें, बच्चों को सयहस िें । प्रदमला िेवी वमाष, पटनय ।

आिरणीय चकोर जी से अत्यदधक प्रेम

मैं आिरणी् चकोर जी से बहुत प्रेम करतय थय, उन्हें प्रणयम करतय थय और करतय रहगाँ य । आनन्ि दकशोर शास्त्री, दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय डॉ. चकोर के आकदस्मक दनधन से ममाषहत

डॉ. चकोर जी के आकदस्मक दनधन से ममयट हत हाँ । मेरी उनसे कयफी घदनष्टतय थी । न्य ियषय-ियरती सांवयि पदत्रकय के पररवयर कय एक महयवपूणट सह्ोगी खो ग्य है । मैं उनकी स्मदृ त को प्रणयम करतय हाँ । : सुदखत वमाष, प्रबांध सांपयिक, न्य ियषय-ियरती सांवयि

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

31


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल कालजयी डॉ. चकोर को कोदि-कोदि नमन डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ से मेरी सांगदत करीब िो िशक परु यनी थी । वे अांदगकय ियषय और सयदहय् के एकयांतदनष्ठ सयधक थे । अदखल ियरती् अांदगकय ियषय सममेलन के 16 वें अदधवेशन कय आ्ोजन पटनय में होनय थय, दजसकय ियद्यव डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय ने मझ ु े सौंपय थय । उसी सदक्र्तय के िौरयन डॉ. महेिरी दसांह ‘महेश’ की प्रेरणय से मैं एक दिन डॉ. चकोर से गयाँधी मैियन दस्थत उनके कय्यट ल् में दमलय थय । तयपियत हमयरी मल ु यकयतों कय जो दसलदसलय शरू ु हुआ उससे मैं उनके दनकट सममोहन में आतय चलय ग्य थय । उनकय व्दियव अवस्कयांती् थय । वे समपट ण ियव से अांदगकय ियषय और सयदहय् के दवकयस हेतु सतत् सयधनय में लगे रहते थे । जनपिी् ियषयओां के दवकयस से दहन्िी मजबूत होती है, ्ह उनकय एकयांत मत थय । इस मत के प्रसयर व्यज से वे रयष्ट्रियषय दहन्िी के दवकयस में िी सदक्र् रहते थे । ईिर ने उन्हें अनेक प्रदतियओां से सजय्य-साँवयरय थय । उनमें एक सयथ सजट क, ियषयदवि, सांपयिक,ि​ि, समीिक और न जयने दकतने रूप समयदहत थे । वे उत्तम कोदट के सांगठनकतयट , सां्ोजक, आ्ोजक एवां आांिोलनधमी थे । सिैव परवती पी़िी को लेखन हेतु प्रेररत करते रहते थे । डॉ. चकोर के सयत खांडों में दन्ोदजत अदिनांिन-ग्रांथ, ‘बहुआ्यमी सयधक – डॉ. चकोर’ के सांपयिन कय िद्यव मझ ु े सौंपय ग्य थय । इस दसलदसले में उनके उियत्त व्दियव को और िी करीब से जयनने कय मौकय दमलय थय । वे एक सरल व सौम् व्वहयर वयले व्दि थे । वे सयदहय्कयर के हर वगों के बीच लोकदप्र् थे । अांग िेत्र व पटनय में वे आए दिन दकसी न दकसी सयदहदय्क आ्ोजनों कय आ्ोजन करयते रहते थे और बडे प्​्यर व सममयनपूवटक हमयरी ियगीियरी सदु नदित करते थे । अब डॉ. चकोर के जयने के बयि उनकी पी़िी के डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय जैसे अांदगकय के एक-िो शीषट सयदहय्कयर ही हमयरे बीच बने हुए हैं । डॉ. चकोर कय गज ु र जयनय अांदगकय ियषय सयदहय् के दलए एक बहुत बडी िदत है । मेरय उन्हें कोदट-कोदट नमन ।

डॉ. दशवनारायण , संपािक, नई धारा, वयाख्याता—दहन्िी, अरदवन्ि मदहला महादवद्यालय, पिना । (फोन पर) 32

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल समय से पहले ‘सूयाषस्त’ हो िया परमपूज्​् डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी मेरे गरूु , अदि​ियवक, मयगट िशट क रहे । दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय में मझ ु े उनके प्रथम िशट न हुए थे । उनकय आशीवयट ि हमेशय दमलतय रहतय थय । मैंने दबहयर के व्रत-य्ोहयर के गीत पर पस्ु तक दलखी, दजसकय प्रूफरीदडांग चकोर सयहब ने ही दक्य थय । पस्ु तक दलखने में बहुत सह्ोग दमलय । अिी ‘दबहयर के लोकगीत गय्क एवां रचनयकयर’ पर पस्ु तक दलख रही हाँ । इसमें प्रयचीन लोकगीत रचनयकयर से सांबदां धत गीतों एवां उनके व्दिगत ब्​्ौरों की जरूरत थी । हमलोगों से दविय होने के चौबीस घांटे पहले उन्होंने मझ ु से टेलीफोन पर बयतें की थीं । मैं छठ पूजय में अपने घर बरौनी, बेगूसरय् गई हुई थी । उन्होंने कहय थय, “आपकय कयम पूरय हो ग्य है ।” मैं नहीं जयनती थी दक मेरे सयथ ्ह उनकी आदखरी बयतचीत होगी । मेरे पथप्रिशट क की आदखरी आवयज उम्र िर मझ ु े प्रेररत करती रहेगी । सम् से पहले ‘सू्यट स्त’ हो ग्य । लेदकन उनके द्वयरय दक्े ग्े कय्ट अांग प्रिेश के सयथसयथ, पूरे दबहयर व िेश के दलए पथ प्रिशट क कय कयम करते रहेंगें । उनके बहुत सयरे दशष्ट्​्, दशष्ट्​्यएाँ हैं जो उनके कयम को आगे ब़ियते रहेंगें । हे महयन आयमय ! मैं आप को शत-शत नमन करती हाँ । मन व्यकुल है पर दवदध के दवधयन िी अजीब हैं- उसे स्वीकयर करनय है ।

डॉ. लक्षमी दसंह, पूवट दवियगयध्​्ि – दहन्िी दवियग, कॉलेज ऑफ कॉमसट , पटनय एवां लोकगयद्कय – आकयशवयणी, िूरिशट न ।

अद्भुत दविता एवं शादन्त के प्रतीक थे नरेश पाण्डेय चकोर

श्री नरेश पयण्डे् चकोर जी अद्भतु दवद्वतय एवां शयदन्त के प्रतीक थे । मैं उनकी आयमय की शयदन्त एवां मोि हेतु ईिर से दनवेिन करतय हाँ । ईिर से प्रयथट नय करतय हाँ दक वे उनके पररवयर के सिी सिस्​्ों को धै्ट और सांबल प्रियन करें । :

पं. भवेश चन्र झा, अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

33


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर सच्चे अथष में संत थे अनवरत अांदतम िम तक अांदगकय िेत्रवयसी, अांदगकय ियषय और सयदहय् तथय दहन्िी ियषय एवां सयदहय् तथय सयदहय्सेवी के उयथयन के दलए दचन्तय करने तथय सिी से प्रेम और सद्भयव की प्रदतमूदतट स्वरूप हाँसमख ु रहने वयले धयदमट क एवां आध्​्यदयमक व्दियव वयले डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर सच्चे अथट में सांत थे । ईिर उनकी आयमय को शयांदत प्रियन करें । पं. दशवित्त दमश्र, उपयध्​्ि, दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय । , शंकर शरण मधुकर, दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन, पटनय ।

उनके कायष को आिे बढाना एक बहुत बडी जबाबिेही अंदगकय िदधदच एवां सयदहय् के मनीषी डॉ.नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ जी से मैं लगिग पयाँच बषों से जडु य थय । मेरय उनसे गहरय सांबांध थय । मैं इस सिमय से कयफी आहत हाँ । मेरे द्वयरय दलदखत ’ज् सोखय बयबय’ नयमक पदु स्तकय में उन्होंने कयफी मयगट िशट न दक्य । तब से मैं उनकी सेवय सच्ची दनष्ठय के सयथ दक्य । ऐसय िेख उन्होंने मेरी पदु स्तकय में मझ ु को उन्होंने अपनय बच्चय के समयन कहय है । सचमचु पूछय जय् तो मेरे दल्े ही नहीं पूरे समयज के दल्े ्ह एक अपूरणी् िदत है । समयज में चकोर जी ने अपनी कतट व्दनष्ठय के बल पर जो रचनययमक कय्ट दक्य है वह बहुत ही सरयहनी् है । इस कय्ट को आगे ब़ियने वयलों के उपर एक बहुत बडी जबयबिेही छोड कर ग्े हैं । दवजय कुमार दतवारी, महयसदचव, प्रज्ञ सनयतन समयज

अंदिका में दलखने के दलए सिैव प्रोत्सादहत करते रहे चकोर जी से मेरय गहरय सांबांध रहय । अनेक पत्र-पदत्रकयओां से जडु े चकोर जी मझु े सिैव प्रोयसयदहत करते रहे । सिैव दलखते रहने के दलए, दवशेषकर अांदगकय में दलखने के दलए इनसे प्रोयसयहन दमलतय रहय । अांग की मयटी में जन्म लेने कय ऋण मझ ु े अांदगकय में कुछ दलखकर चक ु यने के दलए इनकय प्रोयसयहन दमलय और ‘कयकी’ नयम से प्रकयदशत अांदगकय कयव् सांकलन कय सांपयिन आिरणी् डॉ. चकोर जी ने बडे ही सहृि्तय से दक्य । मैं उनकय सिैव ऋणी रहगाँ य । अांग मयधरु ी कय मैं आजीवन सिस्​् रहय । इसमें मझ ु े छपने को सिैव कहते रहे और मैं छपतय िी रहय । शत-शत नमन ! रदव घोर्, सशु ीलय सिन, रोड नां. – 17, रयजीवनगर, 34

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल अंदिका आन्िोलन को उन्होंने जो उजाष िी वह अदमि है अंग मयधरु ी के सांपयिक और सौ के आसपयस छोटी-बडी अांदगकय पस्ु तकों कय सजृ न करने वयले नरेश पयण्डे् चकोर कय कल शदनवयर 14/11/15 को सांध्​्य 6/30 बजे पटनय में दनधन हो ग्य । उन्होंने अांदगकय के दवकयस के दलए इतनय कुछ दक्य है दक इसे दकसी एक पस्ु तक में समेटनय सांिव नहीं हो सकतय । उनके दनधन से समपूणट अांग प्रिेश के अांदगकय सयदहय्कयर अपने को कयफी अके लय और टूअर अनिु व कर रहे हैं उनके शोक सांतप्त पररवयर के दलए हम सब प्रयथट नय करते हैं । हम सिी उनकी कमी महसूस कर रहे हैं । अांदगकय आन्िोलन को उन्होंने जो उजयट िी है, वह अदमट है ।

डॉ. अमरेन्र , लयल खयां िरगयह लेन, सरय्, ियगलपरु —812002, दबहयर । ( फे सबकु आरो फोन पर)

अंदिका के रऽ एक सच्चा सपूत उठी िेलै अंदगकय के रऽ एक सच्चय सपूत हमरय दसनी के बीच सें उठी गेलै | हयदिट क श्रर्द्यांजदल !!!

मनोज पाण्डेय, ियगलपरु । (फे सबक ु पर)

उनके जाने से जो ररदि हुई है उसे सहज भर पाना कदठन बडे सममयन के सांग कहय जय सकतय है-"चकोर" जी अांदगकय के आचय्ट दशव पूजन सहय् थे। कमट ठ व सरलतय की प्रदतमूदत्तट थे वे। आिरणी् चकोर जी के जयने से बहुत बडी ररदि हुई है। इसे सहज ही िर पयनय कदठन है। उनके गौरवशयली पररवयर के प्रदत इस लेखक की हयदिट क सांवेिनय दनवेदित है। मेरी दवनम्र श्रर्द्याँजदल अदपट त उन्हें ।

िंिश े िज ुं न, ियगलपरु । (फे सबक ु पर)

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

35


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल चकोर जी मर ॑ नै पार ॑ इ िदत कं॑ को् पूरय नै कर ं॑ पयर ं॑ । लेदकन आपनऽ दवचयर, रचनय के सयथ, हुनी हरिम सयथ रहतै । चकोर जी मर ं॑ नै पयर ं॑ । मतर जीवन के त ं॑ आपनऽ सीमय छै ।

राहुल दशवाय ियगलपरु । (फे सबक ु पर)

हर भासा आंिोलन लेली हुनी सबसं ॑ बडऽ प्रेरनास्त्रोत अंदगकय ियसय आांिोलन के रऽ प्रवतट क मां ं॑ स ं॑ एक, 46 बरस सां ं॑ लगयतयर प्रकयदसत हो् रहलऽ अांदगकय ियसय के रऽ मयदसक पदत्रकय - अांग मयधरु ी के रऽ ्सस्वी सांपयिक, लगिग सौ अांदगकय दकतयबऽ के लेखक /सांपयिक, अांदगकय आरू दहांिी के रऽ मनीसी सयदहय्कयर , डय. नरेश पयण्डे् चकोर के रऽ चौिह नवांबर-2015 कं॑ होलऽ दनधन पर सौसे ‘अांगिेश’ दनःसब्ि हो् गेलऽ छै । हुनकऽ दनधन सां ं॑ जे ररितय पैिय होलऽ छै , ओकरय िरनय आसयन नै छै । नै खयली अांदगकय बदल्क अांदगकय जैसनऽ हर ियसय आांिोलन सां ं॑ जडु लऽ हर व्दि आरू सांस्थय वयस्तें हुनी प्रेरनयस्त्रोत के रऽ कयम करतें रहतै । अांदगकय ियसय के रऽ महयनतम सेवक, अांग रयन डय. चकोर कं॑ अांदगकय.कॉम के रऽ अश्रपु ूनट ियविीनी श्रर्द्यांजदल. अांदगकय ियसय आरू सयदहय् के रऽ दवकयस के प्रदत हुनकऽ तन-मन-धन स ं॑ समपट ण कं॑ पयाँच-छह करोड अांदगकयियसी तरफऽ स ं॑ नतमस्तक नमन आरू कोदट-कोदट हयदिट क श्रर्द्यांजदल ! कुंिन अदमताभ , अंदिका.कॉम, अंदिका संवाि (फे सबकु पर) डॉ. चकोर के प्रदत श्रद्धांजदल अदपषत करै वाला आरो लोिऽ मं ॑ सादमल िऽत : डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय, मीरय झय, सयके त समु न आचय्ट , कुमयर कौशल, गौतम समु न, सधु ीर कु. प्रोग्रयमर, दवन् दनरयलय, रयम चांद्र घोष, रयहुल रांजन, मृिल ु ु टधयरी अग्रवयल, सबु ोध कुमयर, ु य शक्ु लय, ध्रवु गप्तु , दवियकर ठयकुर, रयजेंद्र नांिन चतवु िे ी, मक महेंद्र कुमयर, रदवशांकर रदव, सोनय श्री, ि्यनांि ज्सवयल, प्रियत कुमयर, अज् रय्, आनन्ि कुमयर, सधु यांशु शेखर, लतयांत प्रसून, सबु ोध कुमयर नांिन, डॉ. ्ोगेन्द्र, अदनरूर्द् दसन्हय, दशवशांकर दसांह पयररजयत, दशरोमदण कुमयर, िेवप्रकयश चौधरी, अनन्त घोष, रयके श पयठक, प्रवीण कुमयर, सनु ील कुमयर, रमेश कुमयर , अरदवांि कुमयर, ब्रह्मिेव दसांह लोके श , जयह्नवी अांदगकय सांस्कृ दत सांस्थयन, अांदगकय.कॉम, अांदगकय प्रचयररणी सिय, अांग-अांदगकय दवकयस मांच, रयमनांिन दवकल, डॉ. िूतनयथ दतवयरी, ्ोगेन्द्र प्र. दमश्र, शांकर शरण मधक ु र, आर. प्रवेश, ज्प्रकयश दमश्रय, प्रमिय मनीषी, रांजन, शदशशेखर, दवधशु ेखर, इन्िशु ेखर, सररतय सहु यवनी, आदि । 36

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : श्रद्ांजदल डॉ. चकोर बहुआयामी साधक आरो अपने आप म ॑ एिो संस्था रहै दवश्वदवद्यालय अंदिका दवभाि, दतलकामा​ाँझी भािलपुर दवश्वदवद्यालय, भािलपरु द्वयरय आ्ोदजत श्रर्द्यांजदल सिय के पयररत प्रस्तयव म ं॑ कहलऽ गेलऽ छै दक अांदगकय के ससि परु ोधय, महयन सपूत, गौरव स्तमि, बहुआ्यमी सयधक, अांग ियषय पररषि अध्​्ि, अांदगकय आांिोलन के प्रवतट क, दवदिन्न सांस्थय दसनी सां ं॑ समबर्द् डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ के आकदस्मक आरो असयमद्क दनधन स ं॑ स्नयतकोत्तर अांदगकय दवियग, अदखल ियरती् अांदगकय सयदहय् कलय मांच, ियगलपरु , अांग ियषय पररषि, दबहयर प्रिेश, अांग उयथयनन्िोलन सदमदत, ियगलपरु आरो अांदगकय प्रेमी मरमयहत छै । िगवयनऽ स ं॑ हुनकऽ आयमय के सयांदत आरो पररवयर कं॑ कस्ट सहै के सदि-सयमरथ िै लेली प्रयथट नय करलऽ गेलै । दवियग मां ं॑ श्रर्द्यांजदल अदपट त करैवयलय म ं॑ सयदमल रहै – डॉ. मधस ु ूिन झय, डॉ. दवद्ययरयनी, डॉ. आमोि कुमयर दमश्र, डॉ. अमरेंद्र, डॉ. बहयिरु दमश्र, हीरय प्रसयि हरेंद्र, रयजकुमयर, गौतम समु न, बयबय दिनेश तपन, गौतम कुमयर ्यिव, सय्यनांि, सरु शे सू्ट, महेंद्र दनशयकर, मथरु यनयथ रयनीपरु ी, रयमयकयांत मांडल, मनोज कुमयर, डॉ. गोपयल चांद्र समु न, डॉ. ज्ांत जलि, उमयकयांत झय अांशमु यली, मनोज कुमयर आदि । सिय मां ं॑ आपनऽ दवचयर प्रकट करतां ं॑ स्नयतकोत्तर अांदगकय दवियग, दवियगयध्​्ि, सह अदखल ियरती् अांदगकय सयदहय् कलय मांच, ियगलपरु के कय्ट कयरी अध्​्ि सह अांग ियषय पररषि, दबहयर प्रिेश के महयमांत्री डॉ. मधस ु ूिन झय न ं॑ कहलकै दक डॉ. चकोर बहुआ्यमी सयधक आरो अपने आप मां ं॑ एगो सांस्थय रहै । डॉ. बहयिरु दमश्र न ं॑ कहलकै दक चकोर पर सोध कय्ट के जरूरत छै । दहन्िी दवियग के रऽ अध्​्िय डॉ. दवद्ययरयनी न ं॑ डॉ. चकोर के दनधन कं॑ सयदहय् के अपूरनी् िदत बतैलकै । डॉ. आमोि कुमयर दमश्र न ं॑ कहलकै दक अांदगकय के सेवय मां ं॑ हुनी तन-मन-धन सां ं॑ समदपट त रहै । अांग ियषय पररषि के कय्ट कयरी अध्​्ि डॉ. अमरेंद्र न ं॑ कहलकै दक हुनी अांदगकय आांिोलन के रऽ प्रवतट कऽ म ं॑ स ं॑ एक रहै ।

डॉ. प्रो. मधस ु ूिन झा स्नयतकोत्तर दहन्िी दवियग सह दवियगयध्​्ि- स्नयतकोत्तर अांदगकय दवियग, दतलकयमयाँझी दविदवद्ययल्, ियगलपरु , दबहयर

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

37


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका फोिो सं. –1 : डॉ. चकोर आपनऽ मय् सथें, फोिो सं. –2 : दवद्ययथी जीवन म ं॑ डॉ. चकोर ,फोिो सं. –3 : सरु​ु आती नौकरी (1961 ई.) जीवन म ं॑ डॉ. चकोर , फोिो सं. –4: डॉ. चकोर (1980 ई.) आपनऽ बयबू सथें, फोिो सं. –5 : डॉ. चकोर (1981 ई.) आपनऽ बेटय दवधशेखर आरो बेटी सररतय सहु यवनी सथें सांगीत गोस्ठी म ं॑ ,फोिो सं. –6 : डॉ. चकोर (1984ई.) आपनऽ पूरय पररवयर (द्रौपिी दिव्यांश,ु पत्रु - शदशशेखर, ज्​्ेस्ठ पत्रु वधू—दकशोरी, दवधशु ेखर, इन्िशु ेखर, सररतय सहु यवनी) सथें ज्​्ेस्ठ बेटय शदशशेखऱ के दबहय के सम् , फोिो सं. –7 व 8 : डॉ. चकोर (1980 ई.) 108 गयमऽ के सांकीतट न ्यत्रय समयदप्त पर, फोिो सं. –9 : प्रवचन करत-ं॑ िजन गैतां ं॑ डॉ. चकोर फोिो सं. –10 : डॉ. चकोर (2011 ई.) अांदगकय महोयसव म ं॑ ‘अांग मयधरु ी - दिसांबर –2010 अांक’ के लोकयपट न प ं॑ । फोिो सं. –11: अांग मयधरु ी के २७वयाँ बरस के पदहलऽ अांक के लोकयपट न समयरोह म ं॑ श्री अदिनी चौबे, डॉ. परमयनांि पयण्डे् आरो डॉ. िगवतीशरण दमश्र आरदन्ह सथें डॉ. चकोर फोिो सं. –12 : सयदहदय्क सिय कं॑ सांबोदधत करत ं॑ डॉ. चकोर , फोिो सं. –13: अांदगकय महोयसव (1995 ई.) क िौरयन अांग मयधरु ी के रऽ पच्चीसवयाँ बरस के पदहलऽ अांक के लोकयपट न समयरोह मां ं॑ डॉ. परमयनांि पयण्डे् कं॑ सममयदनत करत ं॑ डॉ. चकोर , फोिो सं. –14 : रयष्ट्रकदव रयमधयरी दसांह दिनकर समयरोह म ं॑ डॉ. चकोर, फोिो सं. –15 : दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन मां ं॑ सयदहदतक कय्ट क्रम म ं॑ दहस्सय लेतां ं॑ पटनय के वररष्ठ सयदहय्कयर दसनी सथें डॉ. चकोर । फोिो सं. –16 : अदखल ियरती् ियषय सयदहय् सममेलन के चौिहवयाँ अदधवेशन (बांगलोर) , 1999 ई. म ं॑ डॉ. सतीश चतवु ेिी आरदन्ह सथां ं॑ डॉ. चकोर । फोिो सं. –17 :डॉ. चकोर (2009 ई.) जयहन्वी अांदगकय सांस्कृदत सांस्थयन के कय्ट क्रम म,ं॑ फोिो सं. –18 :डॉ. चकोर (2008 ई.) 71 वयाँ जनम दिन पर ‘बहुआ्यमी सयधक-डॉ. चकोर’ के लोकयपट न प,ं॑ फोिो सं. –19 : डॉ. चकोर (2008 ई.) 71 वयाँ जनम दिन पर ‘बहुआ्यमी सयधक-डॉ. चकोर’ के लोकयपट न प ं॑ श्रीमती दिव्यांशु सथें । फोिो सं. –20 : डॉ. चकोर के घर के मख्ु ् द्वयर, फोिो सं. –21 : डॉ. चकोर के घर के बरयमिय आरो बैठक कमरय जहयाँ हुनी रचनय दलखै छे लै आरो अांग मयधरु ी व अन्​् पदत्रकय के प्रूफ सही करै छे लै । फोिो सं. –22 : डॉ.

चकोर के दनधन के बयि श्रीमती दिव्यांशु सें मल ु यकयत करतें दबहयर अांदगकय अकयिमी के अध्​्ि डॉ. आरोही । फोिो सं. –23 : डॉ. चकोर के अांदतम प्रूफ के अवलोकन करतें डॉ. दशववांश पयण्डे् आरो अन्​् सयदहय्कयर । फोिो सं. –24 : डॉ. चकोर के तस्वीर प ं॑ फूल अरांदपत करतें मयननी् सयांसि श्री अदिनी चौबे जी । फोिो सं. –25 : श्रयर्द्कमट म ं॑ पगडबन्हॉन के रस्म में शदशशेखर, दवधशु ेखर, इन्िशु ेखर कं॑ आदसरवयि िेतां ं॑ बडऽ बज ु ूगट । फोिो सं. –26 : डॉ. चकोर (2009 ई.) अांदगकय महोयसव के िौरयन फोिो सं. –27 : डॉ. चकोर (2010 ई.) दबहयर रयष्ट्रियषय पररषि द्वयरय सममयदनत होतें । फोिो सं. –28 : डॉ. चकोर (15-11-2015 ई.) के पयदथट व सरीर—दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन म ं॑ लोगो दसनी के अांदतम-िरसन वयस्तें । फोिो सं. –29 : डॉ. चकोर (2010 ई.) जयहन्वी अांदगकय सांस्कृदत सांस्थयन के कय्ट क्रम म,ं॑ फोिो सं. –30 : डॉ. चकोर (25 नवांबर—2015 ई.) के रऽ आवयस जेकरऽ एक दहस्सय हुनकऽ स्मदृ त में ‘अांदगकय ियषयसयदहय् सांग्रहयल् व शोध सांस्थयन’ म ं॑ बिली िेलऽ गेलऽ छै । 38

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

1

2

3

4

5

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

39


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

6

7

8

9 40

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

10

11

12

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

13 41


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

14

15

16 42

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

17

18

19

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

43


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

20

21

22 44

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : िायादचि वीदथका

23

24

25

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

45


डॉ. चकोर स्मदृ त : हुनकऽ एक िा दहन्िी कदवता तल ु सी - मदहमा

दजसने इसकय रस-पयन दक्य वह स्वस्थ, सख ु ी मन-ियवन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

जब मयनवतय बेचैन ्हयाँ थय नहीं दकसी को चैन ्हयाँ िदि सयदहय् के मयध्​्म से दि्य जग को न्य सयधन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

तल ु सी िल सय ्ह रयमय्ण घर-घर में होतय पयरय्ण कतट व्दनष्ठ हैं पयत्र सिी सब कय ही शील सहु यवन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

हम नव समयज की ओर ब़िे दनज धमट -कमट की ओर ब़िे सयदहय्, सांगीत सरल बनय हुआ ्हयाँ अमतृ प्लयवन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

दवन्पदत्रकय ्य कदवतयवली सब ग्रांथ हैं इनके मि ु यवली सब में है दनखयर न्य - न्य रोग, शोक, कलषु नशयवन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

तल ु सी बनय सबों कय प्​्यरय लयियदन्वत हुआ जग सयरय फै लय िी हरर्यली िू पर आ्य मयनो ऋतु सयवन है तल ु सी, तल ु सी सय पयवन है ।

तुलसी, तलु सी सय पयवन है ।

46

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : हुनकऽ दकताबऽ सें फूलऽ के िल ु िस्ता .....एक छोटऽ टय बी्य सां ं॑ जनमै छै पौधय धीरें-धीरें वू ब़िै छै ब़ितां-ं॑ ब़ितां ं॑ सहतां-ं॑ सहतां ं॑ बरसय, बतयस, रौिय खूब ब़िै छै फूलै छै फरै छै । रयही ओकरऽ छय्य मां ं॑ सस्ु तय् छै मऽन बहलय् छै जयनवरौं पयबै छै छय्य रौिय सें पयबै छै तरयन । को् फरऽ सां ं॑ को् पत्तय सां ं॑ को् धरऽ सां ं॑ को् बतयसऽ सां ं॑ जडु य् छै परयन । लकडहरयाँ टेंगयरी सां ं॑ कयटै छै ओकरऽ अांग । ढेलय सां ं॑ बचवय दसनी करतां ं॑ रहै छै तांग । तैय्​्ऽ वू रहै छै मौन िै छै दमट्ठऽ फऽल

सख ु ि छय्य जेनय रह ं॑ को् बडऽ सांत । पतय नै ‘अांग मयधरु ी’ सां ं॑ के करय की दमललै ? लेदकन अांदगकय लेखक कदव फूललै फललै आरो अनक ु ू ल मौकय पयबी कं॑ आगू ब़िलै । बह ं॑ लयगलै अांदगकय कदवतय के धयर पैिय होलै लेखक कदव कहयनीकयर, नयटककयर । छप ं॑ लगलै अांदगकय के ढेरी दकतयब हुअ ं॑ लयगलै अांदगकय कदव सममेलन दमल ं॑ लगलै महयकदव आरो कत्त ं॑ नी दखतयब । नद्दी के धयर बहतां ं॑ रहै छै कल-कल छल-छल बौगलय के पांख रां

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

47


डॉ. चकोर स्मदृ त : हुनकऽ दकताबऽ सें

फूलऽ के िल ु िस्ता फे दनल धयर सूरजऽ के दकरन सां ं॑ करै छै झलमल जेनय लगै छै उजरऽ िग-िग कपडय मलमल । आरो ओकरय सथां ं॑ करै छै दवहयर मछली छलमल । मधरु सरु मां ं॑ गयबै छै हाँसै छै खलखल ।

48

सब के आस परु य् कं॑ दकसयनऽ के सहयरय अपनऽ खेत पटय् छै । सब्िे कं॑ िै ल ं॑ अन्न रांग दबरांगय फसल खेतां ं॑ उगय् छै । सेवय के छै ियव िक्ु खय के िूख दमटय् छै । मेहनत आरो पसीनय स ं॑ सभ्िै के जी जडु य् छै ।

पयबी कं॑ अमररत जेनय मरलऽ परयनी जीवी उठै छै ओन्हैं जरलऽ मरलऽ टोवैलऽ फसल हरर्य् जय् छै कर ं॑ लगै छै हलहल, हलहल ।

बहतां ं॑ रह ं॑ नद्दी के धयर सख ु ी रह ं॑ घऽर पररवयर । दकसयनां ं॑ ्ह ं॑ हरिम हर घडी मनय् छै । धयर के प्​्यर पसीनय मजूर दकसयनऽ के सभ्िै कं॑ सोहय् छै ।

पस-ु पिी दप्यस बझ ु य् छै थकलऽ रयही चरू ु -चरू ु दप्ै छै पयनी के खरै स ं॑ नै लै छै कुछ कुछ नै कुछ ि ं॑ कं॑

आब ं॑ सोचऽ समझऽ की िेलखौं ‘अांग मयधरु ी’ की करलखौं सेवय अांगऽ के अांदगकय के लेखक के कदव के ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : हुनकऽ दकताबऽ सें

फूलऽ के िल ु िस्ता ियव-िदि सां ं॑ ियसय के सदि सां ं॑ प्​्यर आरो अनरु दि सां ं॑ । के प्रेररत होल ं॑ के उद्वेदलत होल ं॑ हदसट त होल,ं॑ गदवट त होल ं॑ की पैल्ह,ं॑ की खोल ं॑ करऽ नयप जोख लेखय जोखय । हममे त ं॑ बैठलऽ छी पकडी कं॑ मोखय । ियव छै सेवय के कुछ करतां ं॑ रहै के नै िै के के खरौ धोखय । नै डरै छी कखनू हहरै छी चयहे दतत्तऽ लगौं ्य दक दमट्ठऽ बयत कहै दछहौं चोखय । कहलौं छै रोख मजूरी चोखऽ कयम कयमहे पर

दमलै छै इनयम । हे िय् मन सां ं॑ मैल हटय् ि ं॑ । रोम-रोम मां ं॑ रमै छै रयम तहाँ रयम मां ं॑ रमय् ल ं॑ नै कुछु ल ं॑ कं॑ ऐलऽ छऽ नै कुछु ल ं॑ कं॑ जैि ं॑ । प्रेम के छै सब दप्यसलऽ प्रेम आपनऽ सिै कं॑ लटु य् ि ं॑ तोहरय मां ं॑ बडय सदि छौं िेस आरो ियसय ल ं॑ तोहरय मां ं॑ अनरु दि छौं ियव छौं िरलऽ हृि् मां ं॑ स्वच्छ गांगयजल रां नै करऽ प्रिदु सत । प्रिूसन कं॑ नै ब़ियबऽ ईस्​्यट द्वेस कं॑ दमटयबऽ । आबऽ अांग आरो अांदगकय कं॑ खूब सजयबऽ । ......

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

49


डॉ. चकोर स्मदृ त: डॉ. चकोर कृत अंदतम अंदिका पुस्तक की समीक्षा

अनुवाि के क्षेि में बहुत बडा काम है अंदिका रघुवश ं म महयकदव कयदलियस की ‘लघत्रु ्ी’ में ‘रघवु ांश’,

डॉ. श्रीरंजन ूररदेव

पूवट उपदनिेशक (शोध) एवां समपयिक : ‘पररषि पदत्रकय’, दबहयर रयष्ट्रियषय-पररषि, पटनय -संपकष ‘शुभैर्णा’, एमको पाइप फैक्री कै म्पस, श्रीनिर कालोनी, दनकि संस्कार स्कूल, सन्िलपरु , महेन्रू, पिना – 800006

50

‘कुमयरसमिव’ एवां ‘मेघिूत’ इन तीन कयव्ों को पररगदणत दक्य ग्य है । इनमें ‘रघवु ांश’ महयकयव् कय स्थयन सवोपरर है । ‘रघवु शां ’ उन्नीस सगों कय महयकयव् है । ्ह कयदलियस कय अदन्तम महयकयव् है । इसीदलए, इसमें उनकी कल्पनय-प्रौद़ि की दवस्म्कयरी प्रदतिय कय प्रस्फुटन पिे-पिे पररलदित होतय है । इस महयकयव् में िगवयन रयम के पूवटजों और उनके अनज ु न्मय कुल उनतीस रयजयओां कय वणट न दक्य ग्य है । इस रयजवांश के आदिम प्रदतष्ठयपक महयरयज रघु के नयम पर ्ह महयकयव् सांदज्ञत है । अवश्​् ही, ्ह महयकदव कयदलियस की कयलज्ी कयव्कृदत है, दजसकय पद्यबर्द् समश्लोकी अांदगकय अनवु यि करने के प्रथम श्रे्ोियगी डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर हैं । दकसी कृदत कय अनवु यि-कय्ट इसदलए सयरस्वत श्रम और प्रदतिय-सयध्​् है दक उसके अनवु यिक के दलए मूलियषय से दहन्िी ्य अन्​् दकसी ियषय में रूपयन्तररत करने में परकय्य-प्रवेश जैसी ्ोदगक दसदर्द् अपेदित होती है । सयथ ही, इसके दलए मूल ियषय और अनवु यद्य ियषय िोनों कय समयनयन्तर पररज्ञयन िी अदनवय्ट होतय है । अांदगकय के कृतदवद्य एवां ्शस्वी कदव डॉ. चकोर अांदगकय और सांस्कृत के समप्रदति मनीषी हैं । इसदलए, इनके द्वयरय समपन्न सांस्कृत-महयकयव् ‘रघवु ांश’ के

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अांदगकय में पद्यबर्द् अनवु यि-कय्ट में महयकयव् की मौदलकतय सरु दित है और इसीदलए इस अनवु यि में मौदलक कयव् कय िी आस्वयि दमलतय है । सयथ ही, अनवु यि में व्वहृत ठेठ अांदगकय की प्रकृदत और प्रवदृ त में कहीं िी शैदथल्​् कय बोध नहीं होतय । महयकदव कयदलियस के सांस्कृत-कयव्ों के अनवु यि की एक अपनी परमपरय रही है । प्रय्ेक अनवु यि में अनवु यिक की अनवु यि-शैली की अपनी दवदशष्टतय रहती है । डॉ. चकोर द्वयरय दक्े ग्े ‘रघवु ांश’ महयकयव् के अनवु यि – रूप सयरस्वत महय्ज्ञ में इनकी अपनी दवदशष्टतय है । आशय है अांदगकय-जनपि के प्रबर्द् ु नयगररक डॉ. चकोर के इस अनवु यि कय्ट में ‘रघवु शां ’ महयकयव् के मौदलक आस्वयि से दनि् ही अदि​िूत होंगें ।

“ डॉ. चकोर द्वारा म्पन्द्न स्ं कृत-महाकाव्य ‘रघवु श ं ’ के अंमगका में पद्यबद्ध अनवु ाद-कायथ में महाकाव्य की मौमलकता रु मित है और इ ीमलए इ अनवु ाद में मौमलक काव्य का भी आस्वाद ममलता है । ाथ ही, अनवु ाद में व्यवहृत ठेठ अंमगका की प्रकृमत और प्रवृमत में कहीं भी शैमथल्य का बोध नहीं होता ।” डॉ. चकोर द्वयरय ्थयप्रस्ततु अनवु यि-कय्ट की दवशेषतय और दवलिणतय इस रूप में है दक ्ह उि महयकयव् कय समश्लोकी अनवु यि है । इस प्रकयर कय अनवु यि-कय्ट सयदतश् श्रमसयध्​् एवां बौदर्द्क प्रदतिय –सयध्​् होतय है । डॉ. चकोर ने इस िेत्र में िी आदधकयररकतय प्रिदशट त कर अपनी अदतररि कयव्-प्रदतिय एवां वयङम्ीन मनीषय कय पररच् दि्य है । सचमचु , अनवु यि के िेत्र में ्ह बहुत बडय कयम है । ‘अ्मयरमिः शिु य् िवतु ।’ ( डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ अनदु ित अांदगकय ‘रघवु ांशम’ से ) अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

51


डॉ. चकोर स्मदृ त: डॉ. चकोर कृत प्रथम अंदिका पुस्तक की समीक्षा

सफल रंि-मंचीय अंदिका नािक है ‘दकसान क॑ जिाबऽ’ अंदगकय नयट् ् सयदहय् कय शिु यरांि श्री नरेश पयण्डे्

डॉ. तेजनारायण कुशवाहा

चकोर दलदखत ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ से बीसवीं शतयब्िी के षष्ठ िशक में हुआ । सिी ियरती् वयङम् के नयट् ् सयदहय् की समर्द् ृ परमपरय अांदगकय के सयमने है । इसदल्े अांदगकय नयट् ् सयदहय् कय अनष्ठु यन उप्ि ु सम् में समथट लेखक द्वयरय हुआ ्ह मयनय जय सकतय है ।

‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ नयटक कुल नौ दृश्​्ों में समयप्त हुआ है । सयतवें दृश्​् में दवलयसी बयाँध बयाँधने कय दृश्​् कुलपदत, दवक्रमदशलय दहन्िी दिखय्य ग्य है । ्हयाँ एक श्रदमक दृश्​् की िी ्ोजनय हुई है । दवद्ययपीठ, ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ एक सयमयदजक नयटक है । इसकी गयाँधीनगर, ईशीपरु , कथयवस्तु कृषक समयज से ली गई है । दकसयन को जगयनय, ियगलपरु – 813206 ग्रयम सधु यर करनय और न्य समयज बनयनय कथयवस्तु कय प्रधयन उद्देश्​् है ।

“‘दकसान क॑ जिाबऽ’ एक सामादजक नािक है ।दकसान को जिाना, ग्राम सुधार करना और नया समाज बनाना कथावस्तु का प्रधान उद्ेश्य है ।” 52

बीस वषट कय मांगल प़ि दलखकर कृदष-स्नयतक हुआ है । आधदु नक खेती पर उतरय है । लोगों को आि्ट होतय है । सिी कहते हैं – “प़िे फयरसी बेचे तेल, मांगल पयाँडे के चयले बेमेल ।” मांगल के दपतयजी को िी ्ह अच्छय नहीं लगतय है । उनकय सपनय थय दक ियन –िहेज अदधक दमले तयदक बेटय दबलय्त जय् ।मांगल एक गरीब बयदलकय मीरय से ब्​्यह कर लेतय है । वह सशु ील स्वियव की थी । खेती-गहृ स्थी में मांगल कय सयथ िेती थी । मांगल और मीरय आधदु नक ढांग की खेती प्रयरांि करते हैं । सहकयरी खेती िी की जयती है । गयाँव वयले उसकय अनस ु रण करते हैं । गयाँव धन-धयन्​् से पूणट हो जयतय है ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


मांगल नयटक कय नय्क है ।आिशट और ्थयथट की ियव िूदम पर इसकय चररत्र खडय है । वह दविदवद्ययल् कय कृदष स्नयतक है । उसे नौकरी दप्र् नहीं । वह आधदु नक ढांग की खेती को महयव िेतय है । इसी ओर ध्​्यन िी िेतय है । गयाँव के लोग प्रियदवत होते हैं । सिी कय दप्र् पयत्र बन जयतय है । मांगल दतलक-िहेज की प्रथय कय दवरोधी है । ब्​्यह में उसे बदहत बडी समपदत्त दमल रही थी दजसे उसने ठुकरय दि्य । उसने एक गरीब दिखयरी की बेटी से शयिी कर ली । वयस्तव में मांगल आिशट दकसयन कय प्रतीक है । मीरय मांगल की धमट पयनी है । वह गरीब घर से आई है । पियट को नहीं मयनती है । लेदकन दशष्टयचयर को िी नहीं छोडती है । मांगल को खेती में सह्ोग करती है । मीरय सन्ु िर और सशु ील है । वह पदतव्रतय और मयतिृ ि है । मीरय सयदवत्री है । सीतय है । उसे आलोचक िी कहतय है – मांगल की पयनी तो सयियत िेवी है । टोले –पडोसे में जो िी

“ मीरा मंगल की धमथपत्नी है । वह गरीब घर े आई है । पदाथ को नहीं मानती है । लेमकन मशष्टाचार को भी नहीं छोड़ती है । मंगल को खेती में हयोग करती है । मीरा ुन्द्दर और ुशील है । वह पमतव्रता और मातृभक्त है । मीरा ामवत्री है । ीता है । उ े आलोचक भी कहता है – मंगल की पत्नी तो ािात देवी है । टोले –पड़ो े में जो भी बीमार पड़ता है वहा​ाँ पहचाँ कर खुद ेवा करने में लग जाती है । ” बीमयर पडतय है वहयाँ पहुचाँ कर खिु सेवय करने में लग जयती है । रूप्े-पैसे से िी मि​ि करती है । बल ु यकी, मांगरू आदि परमपरयवयिी दकसयन हैं । वे लोग शरू ु में मांगल के कयम कय मजयक उडयते हैं । बयि में उसके गणु कय कय्ल हो जयते हैं । आधदु नक खेती में उनकय दवियस जगनय एक उियहरण है । दकसनु बयबू मांगल के दपतय हैं । वे रूद़िवयिी हैं । लेदकन सशु ीलय में आधदु नक ्गु बोध मख ु ररत है । दकसनु बयबू मांगल पर पूरय ियन-िहेज लेनय चयहते हैं । मांगल इसकय दवरोध करतय है । सशु ीलय मांगल के दवचयर कय समथट न करती है – “एकरऽ कहनय ठीक छै । सीतय सयदवत्री के जमयनय गेलै । शील स्वियव आब ं॑ कहयाँ रहलै ।”

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

53


सशु ीलय कय ्ह मनोियव आगे मीरय और उसके सांवयि में और स्पष्ट हो जयतय है – “एखनी जों िहेज ल ं॑ कं॑ हममें बेटय के शयिी करदतहयाँ त ं॑ ई सख ु हमरय नै दमल ं॑ पयरदतह ं॑ ।”सशु ीलय पत्रु वयसलय है । वे पत्रु वधू को िी खूब प्​्यर करती है । क्​्ों न करती, सयस जो ठहरी । कौशल्​्य जैसी सयस, दजन्होंने सीतय को असीम प्​्यर दि्य थय त्रेतय में । सशु ीलय ने मीरय के शील-स्वयियव और कतट व् परय्णतय की परख कर ली थी । वे एक आिशट सयस की आिशट उपदस्थत करती हैं । मीरय के कहे ग्े वयक्​्ों से उसके आिशट चररत्र कय ियव अदिव्ि हुआ है ।

“ आलोच्य नाटक का वं ाद बड़ा ही माममथक है । इ में आधमु नक मवचार व्यंमजत हैं । जै े – “एकरा त ॑ ग्राम धु ार करना छै , नया माज बनाना छै , मक ान क॑ जगाना छै ।” नाटक के कथावस्तु को गमत कथोपकथन े ममलता है । चकोर अंमगका के मथथ कमव और लेखक हैं । उनकी भाषा शुद्ध और भाव की अनुगाममनी हैं ।उनके वणथन में युग दशथन की झलक ममलती है । नाटककार ने नाटक में जहा​ाँ-तहा​ाँ महु ावरों एवं कहावतों का न्द्ु दर प्रयोग आलोच्​् नयटक कय सांवयि बडय ही मयदमट क है । इसमें आधदु नक दवचयर व्ांदजत हैं । जैसे – “एकरय त ं॑ ग्रयम सधु यर करनय छै , न्य समयज बनयनय छै , दकसयन कं॑ जगयनय छै ।” नयटक के कथयवस्तु को गदत कथोपकथन से दमलतय है । बयतचीत से मांगल, मखरू, बल ु यकी आदि पयत्र कय मनोियव दवकदसत हुआ है । चकोर अांदगकय के समथट कदव और लेखक हैं । उनकी ियषय शर्द् ु और ियव की अनगु यदमनी हैं ।उनके वणट न में ्गु िशट न की झलक दमलती है । नयटककयर ने नयटक में जहयाँ-तहयाँ महु यवरों एवां कहयवतों कय सन्ु िर प्र्ोग दक्य है – िोदग्य िोग िोगनय, समयन्है में प्रीत सोहै छै , उाँट आरो गिहय के िोस्ती अच्छय नै, चांि दिन के मेहमयन, आरयम हरयम छे कै आरो कयम िेवतय, कबीर ियस के उलटऽ बयनी बरसे कां बल िीजे पयनी, प़िे फयरसी बेचे तेल मांगल पयाँङे के चयले बेमेल, कौडी के तीन, चौबे गेलऽ छे लऽ छब्बे बनैल ं॑ िूबे बनी कं॑ ऐलऽ, दख्यली पोलयव, दबनय बयत के बयत, िगवयनें जेकरय िै छदथन मन्ु हय फयडी कं॑ िै छदथन, जेतनय चूतड पर तयल बोलै छै ओतनय ढोलक पर नै, दबनय खरचें खेती आरो दबनय िरबें िरबयर नै हअ,ं॑ तयली िोनऽ हयथऽ सें बजै छै , मखौल उडयनय, उत्तम खेती मध्​्म बयन दनदसध चयकरी िीख दनियन आदि । मखरू कय ‘की नयम कहै छै दक’ और बल ु यकी कय ‘मर तोरी’ की प्र्ोगयवदृ त्त में स्वियदवकतय समयकुल है । 54

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ में कुल तीन गीत हैं । आलोच्​् नयटक कय शिु यरांि गीत से हुआ है । पहले गीत के आरांि बोल हैं – “जयगऽ दकसयन िैय्​्य जयगऽ, िोर िेलै हो िय् जयगऽ ।” नयटक के नय्क मांगल ने ्ह गीत गय्य है । उनके सयदथ्ों ने इसमें सरु िरय है । निी में पयनी आ्य है । अिी बयाँध नहीं बयाँधने से पयनी ियग जयएगय । फसल पटेगय कै से, ्ह ियव इस गीत में व्ांदजत है । सयथ ही इस गीत में आधदु नक कृदष आांिोलन और उसके दवकयस की दिशय कय सांकेत करतय है । िूसरे गीत-“गे दबहदन्याँ गे रोपें न जल्िी-जल्िी धयन” श्रदमक गीत है । इसे चौथे दृश्​् के चौपयल में सनु य ग्य है । कथोपकथन की शैली में दलखे गीत में मांगल ने परू ु ष स्वर िरय है, रोपनी सब नयरी स्वर । गीत कय वण्​्ट दवष् है – “ हे रोपनी धयन रोदप्े, मयाँटी तै्यर है । पयनी सूख रहय है, हमयरय प्रयण सूख रहय है ।” हलवयहय िै्य मयटी िर रोपय हो ग्य है, खेत जल्िी जोतें, सयाँझ हो रहय है, बच्चय बतु रू की ्यि मन में आ रही है । इस प्रकयर से इस गीत में गयाँव कय सन्ु िर पदवत्र ियवनय मख ु ररत हो उठय है । तीसरय और अांदतम गीत िी एक िूसरय श्रदमक गीत है दजसे निी दकनयरे में बयाँध बयाँधते सम् मांगल ने गय्य है और समवेत स्वर मदहलयओां ने दि्य है । ्ह गीत धरती और श्रम की महत्तय को प्रिदशट त करतय है । इस प्रकयर ियव और दशल्प दवधयन की दृदष्ट से ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ के सिी गीत उच्च कोदट के हैं ।

“ चकोर अंमगका के माजवादी ामहत्यकार हैं । इनकी रचना में भारतीय गा​ाँव का स्पंदन है । इ में युग का दं ेश पूणथ रूप े ध्वमनत हआ है । ‘मक ान क॑ जगाबऽ’ ऐ ी ही कलाकृमत है । मीक्ष्य नाटक में ‘अमधक अन्द्न उपजाबऽ’ को उमचत मदशा ममली है । ” चकोर अांदगकय के समयजवयिी सयदहय्कयर हैं । इनकी रचनय में ियरती् गयाँव कय स्पांिन है । इसमें ्गु कय सांिशे पूणट रूप से ध्वदनत हुआ है । ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ ऐसी ही कलयकृदत है । समीक्ष्​् नयटक में ‘अदधक अन्न उपजयबऽ’ को उदचत दिशय दमली है । इसमें रैक्टर से खेती कय ममट बतय्य ग्य है । मशीन से दसांचयई की बयत कही गई है । सहकयरी खेती से लयि होने की बयत बतयई गई है ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

55


शयस्त्री् लिण पर दलखय कोई नयटक शय्ि ही रांगमांची् होतय है । लेदकन चकोर कय प्रस्ततु नयटक सफल रांग-मांची् नयटक है । इसको खेलते सम् कोई पररवतट न की आवश्​्कतय नहीं । इसके दृश्​् छोटे हैं । सांवयि सांदिप्त हैं । वयक्​् छोटय है । पयत्र कम हैं । ियषय जनमनोरांजक है । ियरत के दद्वती् प्रधयनमांत्री श्री लयल बहयिरु शयस्त्री ने १९५५ ई. में ज् जवयन, ज् दकसयन कय नयरय दि्य थय । लगतय है नयटककयर नरेश पयण्डे् चकोर कय ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ मयनो उनकी पूवट सांध्​्य पर अग्रलेख हो, सांिेश हो । हम चयहते हैं दक ियरत सरकयर कय कृदष मांत्रयल् ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ को एवां उसके लेखक को सममयदनत करे और इस नयटक के व्यपक प्रचयर की ्ोजनय तै्यर करे ।

“ शास्त्रीय लिण पर मलखा कोई नाटक शायद ही रंगमंचीय होता है । लेमकन चकोर का प्रस्तुत नाटक फल रंगमंचीय नाटक है । इ को खेलते मय कोई पररवतथन की आवश्यकता नहीं । इ के दृश्य छोटे हैं । वं ाद मं िप्त हैं । वाक्य छोटा है । पात्र कम हैं । भाषा जनमनोरंजक है । ” (अांदगकय ियषय सयदहय् की प्रथम प्रकयदशत पस्ु तक, डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर कृत ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ नयटक पर डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय की दलखी प्रस्ततु समीियरचनय जो तयकयलीन दहन्िी सयप्तयदहक पदत्रकय ‘उत्तर दबहयर’ के २३ अक्टूबर १९६२ अांक में प्रकयदशत हुई थी ।)

56

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : अतीत के रऽ ऐना मं ॑ अंि माधुरी अंि माधरु ी के दिसंबर -१९७० ई. आरो नवंबर-२०१५ ई. अंक

संस्थापक संपािक डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर के रऽ संपािन मं ॑ प्रकादसत अंदिका भासा के पदहलऽ मादसक पदिका ‘अंि माधुरी’ के पदहलऽ अंक जे दिसंबर -१९७० ई. मं ॑ प्रकादसत होलऽ रहै । ( फोिो जैन्हऽ आजकऽ तारीख मं ॑ उपलब्ध िै । )

संस्थापक संपािक डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर के संपािन मं ॑ प्रकादसत अंदिका भासा के पदहलऽ मादसक पदिका ‘अंि माधरु ी’ के दियालीसवा​ाँ बरस के अंदतम अंक जे नवंबर -२०१५ ई. मं ॑ प्रकादसत होलऽ रहै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

57


डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर का रचना संसार अंदगकय और दहन्िी के लब्धप्रदतष्ठ सयदहय्कयर

डॉ. सररता सुहावनी - संपकष बोररांग रोड (पदष्ट्चम), 59 गयाँधीनगर, पटनय-1

“‘अंमगका और महन्द्दी के लब्धप्रमतष्ठ ामहत्यकार डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर की अंमगका और महन्द्दी भाषाओं में कुल ८० पुस्तकें प्रकामशत हई हैं। उन्द्होंने अंमगका माम क पत्र ‘अंग माधुरी’ का मछयाली वषों तक लगातार प्रकाशन व म्पादन मकया ।”

58

डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर की अांदगकय और दहन्िी ियषयओां में कुल ८० पस्ु तकें प्रकयदशत हुई हैं। दजनमें डॉ. अि्कयांत चैधरी के सयथ दलदखत एवां समपयदित ९ पस्ु तकें िी शयदमल हैं । इसके अलयवय डॉ. चकोर ने अांदगकय मयदसक पत्र ‘अांग मयधरु ी’ कय दछ्यलीस वषों तक लगयतयर प्रकयशन व समपयिन दक्य । उनके द्वयरय दलदखत अांदगकय एवां दहन्िी ियषयओां की पस्ु तकें दनमनदलदखत हैं : 1 दकसयन कं॑ जगयबऽ (अांदगकय एकयांकी), 2. एक शयख : िो फूल (दहन्िी नयटक), 3. सवोि् समयज (अांदगकय नयटक) 4. फूल फूलैलै (अांदगकय कहयनी सांग्रह-समपयदित), 5. अांगलतय (अांदगकय कदवतय सांग्रह-समपयदित), 6. दवशयखय (अांदगकय लघु उपन्​्यस) 7. अांदगकय जतसयर (सांपयदित), 8. िोरकऽ लयली (अांदगकय कयव्), 9. श्री. रयम जन्मोयसव (अांदगकय गीदत-नयट् ्) 10. अांगश्री (अांदगकय कदवतय सांग्रह -समपयदित), 11. िदि पष्ट्ु पयांजदल (दहन्िी एवां अांदगकय के गीत-िजन), 12. महययमय िोली बयबय (समपयदित), 13. दकसयन: िेशऽ के शयन (अांदगकय कदवतय सांग्रह), 14. अांग मयधरु ी के लेखक आरो कदव, 15. ्​्यदत (अांदगकय कयव्), 16. अांदगकय के फै कडे एवां लोरर्याँ, 17. श्री िूवनेश जी, 18. श्री उमेश जी, 19. श्री करीलजी, 20. श्री दवनोि जी, 21. श्री उदचत लयल जी, 22. श्री अमबष्ठ जी, 23. एक सयदहय्कयर पररवयर (17 से 23 तक जीवनी), 24 दतलकय सन्ु िरी डयर-डयर (अांदगकय कहयनी सांग्रह), 25. ि​िमयली जी के िोजपरु ी िजन,

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


26. ियवयाँजदल िोली बयबय को (समपयदित), 27. फूलऽ के गल ु िस्तय (अांदगकय कयव्), 28. लोरकै न (समपयदित), 29. सयवन सलोनी (दहन्िी कयव्), 30. श्री. सीतयरयम लीलयमतु (समपयदित), 31. अांदगकय आन्िोलन कय इदतहयस, 32. हमरऽ सांकीतट न ्यत्रय (अांदगकय कयव्), 33. एदब्लन (दहन्िी उपन्​्यस), 34. घघु ली घटमय (अांदगकय गयथय कयव्-समपयदित), 35. अांग जनपि गौरव: हलधर बयबय (जीवनी) 36. दमलन (दहन्िी कदवतय) 37. बयबय ठयकुर (अांदगकय गयथय कयव्) 38. आध्​्यदयमक आरो सयदहदय्क जतरय, 39. अांदगकय सयदहय्कयर, 40. अांदगकय सांस्कृदत समु न, 41. िरतचररत्र, 42. िदि पष्ट्ु पयांजदल (िूसरय ियग), 43. ियन एक मजबूरी (दहन्िी लघक ु थय), 44. आध्​्यदयमक प्रसून, 45. श्री दिव्कलय चररतयमतृ (समपयदित), 46. मेरी कहयनी: नई परु यनी, 47. मेरी ्यत्रय कथय, 48. श्री रयमिूत हनूमयन, 49. गयाँव-जवयर, 50. मीरय की प्रेम सयधनय, 51. मूल्​्यांकन, 52. अांदगकय लोक सयदहय्, 53. सयदहय् सन्त: अि्कयन्त (जीवनी), 54. अांगजनपि के वैवयदहक दवदध दवधयन, 55. महययमय िोली बयबय: िोलय के अवतयर, 56. िगवयन के पयषट ि: ि​िमयली जी, 57. हमरऽकक्कय, 58, तल ु सी मांजर 59. रांग दबरांगऽ फूल 60. हनमु त ज्न्ती समयरोह समहृतय, 61. अांदगकय सयदहय् अब तक, 62. सममूल्​्न, 63. ियव पष्ट्ु प, 64. अांदगकय लोक सांस्कृदत के सांवयहक: ्िनु न्िन मांडल, 65. सदृ ष्ट आपकी दृदष्ट मेरी (समीिय) 66. अांदगकय गीतय (अनवु यि), 67. सख ु लऽ गयछवयलय जांगल (अनवु यि), 68. गरू ु कृपय: प्रिु प्रसयि (कयव्), 69. अनशु ीलन, 70. अांदगकय होली गीत, 71. रघवु शां म् (अनवु यि) डॉ. अभयकांत चैधरी के साथ दलदखत एवं सम्पादितः- 1. अांदगकय सयदहय् कय इदतहयस, 2. हऽर आरो गयडी, 3. सलेस िगत, 4. अांदगकय कयव् में रस व्ांजनय, 5. अांदगकय में अलांकयर, 6. अांदगकय लोकगीतों कय सयांस्कृदतक अध्​्​्न, 7. अांदगकय सयदहय् कय इदतहयस (दद्वती्यांश ), 8. अांदगकय लोकोदि सांग्रह, 9. अांदगकय सयदहय् कय इदतहयस (सांशोदधत एवां पररवदर्द्टत सांस्करण) । डॉ चकोर पर दलदखत पुस्तकें - 1. चकोर आरो हुनकऽ सयदहय् सयधनय, 2. अांदगकय लोक सयदहय् और डॉ. चकोर, 3. अांग मयधरु ी और चकोर (पत्रों के वयतय्न से), 4. िोरकऽ लयली: एक सममूलन, 5. बहुआ्यमी सयधक: डॉ. चकोर, 6. आचय्ट श्रीरांजन सूररिेव की दृदष्ट मे डॉ. चकोर, 7. दृदष्ट (डॉ. चकोर की कदतप् पस्ु तकों की समीिय), 8. सयदहय् मनीषी: डॉ. चकोर, 9. मेरे मयतय-दपतय ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

59


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल चकोर

शंकर शरण मधुकर

मर कर कोई नयम जी ग्य स्​्यह कर ग्य िोर, चकवय और चकइ्य के सांग लो उड ग्े चकोर । मीठी - मीठी शयम हृि् कय बांध खोलने आई, उसी सम् हल्के झोंके से बींध गई परु वयई, हुआ प्रकदमपत िदणक हृि् दफर दघरी घटय घनघोर, चकवय और चकइ्य के सांग लो उड ग्े चकोर ।

- संपकष -

जीवन और मरण प्रकृदत के दचर शयित् गहने हैं, सादहत्यकार, दबहार दहंिी सादहत्य सख ु - िःु ख, मय्य - मोह सम्मेलन, पिना, वेिनय के अरण्​् घने हैं, दबहार, भारत लौदककतय कय ऐसय ही श्रगांृ यर दिखे हर ओर, चकवय और चकइ्य के सांग लो उड ग्े चकोर ।

्यि बहुत आ्ेगी अपने शयांत कपोत धवल की, दहमदगरर से उन्नत सूरज से प्रखर ियल उज्जवल की, अांदगकय महयरयनी नरेश को खोजेंगीं चहुओ ाँ र, चकवय और चकइ्य के सांग लो उड ग्े चकोर । चयाँि बहुत खशु होगय पयकर अपनय प्रेम - पररांिय, हम िी तो खोकर चकोर को रह जय्ेंगें दजांिय, पर सयदहय् जगत जोडेगय कै से टूटी डोर कहयाँ दमलेंगे उसको कदववर नरेश पयण्डे् चकोर । मर कर कोई नयम जी ग्य स्​्यह कर ग्य िोर, चकवय और चकइ्य के सांग लो उड ग्े चकोर ।

60

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर श्रद्धा - समु न

एक श्रर्द्यवांत, श्रद्दयस्पि, जीवन जी्य कमट अदिरत ; जीवन - सांघषट में रहय दनरत, अांदतम सांघषट में हुआ हत !

योिेन्र प्र. दमश्र

अांदगकय के एकदनष्ट सयधक, दहन्िी के िी कदव व लेखक ; डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर थे — अांदगकय, दहन्िी के सांपयिक ! सरल, सौम्, सांिु र सांग — मिृ ल ु अनपु म व्दितयव ; दवद्वत गणु से िरय हुआ — थय दजसकय सघु ड कृदतयव !

- संपकष -

उर्द्टपण्ु डधयरी, व्वहयरी, धमयट नरु यगी, सियचयरी ; पूवष मख्ु य प्रबंधक ( पंजाब नेशनल बैंक ), िजते थे सीतयरयम सिय — मीनालय, बैंक कॉलनी, आडमबरय्यगी वे दवचयरी ! के सरीनिर, पिना , दबहार, भारत । एक सैलयब पर होकर सवयर— चयहय दजसने होनय पयर ; सबकुछ बह ग्य उसकय — टूट गई जब जीवन पतवयर ! अांग - मयधरु ी समपयिन में— बनय्य दजसने कीदतट मयन ; प्रशदस्त- पय्य सांस्थयओां से — पय्य िी अनदगनत सममयन !

डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर कय — िेवतल्ु ् थय सि् - व्वहयर ; अपने दिव्यांशु द्रौपिी को — छोड ग्य जो अब सांसयर ! दहन्िी सयदहय् सममेलन से, सयांस से जडु े थे जो प्रयणी ; अांदगकय के बने रहे सेनयनी — अठहत्तर ग्े वे स्वयदिमयनी ! शदश शेखर, दवधु शेखर कय — इन्िु शेखर कय थय जो कतयट र ; चकोर बनय रहय सिय वह — चन्द्र आस दकरण कय िांडयर ! अध्​्ययम,्ोग,स्वयध्​्य् कय — हर फूल दखलय दजस जीवन ; श्रद्दय - फूल कय हकियर है — चकोर कय वह जीवन पयवन ! सररतय सहु यवनी सांगीत सयधनय रहे सिय जो आगे ब़ियते ; चन्द्रमोहन - प्रजय पत्रु चकोर — रहे सांकीतट न में धदु न रमयते ! दजनकी कीदतट - स्मदृ त सिय — बसी रहेगी हमयरे दह् - मन ; डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर को है — बयर-बयर नमन ! शतबयर नमन !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

61


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल िेलै चकोर भैय्या चौका पुराय क॑

िेलऽ हो चकोर िैय्​्य, नयतय िलु य् कं॑ सांगी - सयथी सें अपनऽ हयथो छोडय् कं॑ .... ।

मथरु ानाथ दसंह ‘रानीपुरी’

- संपकष ग्राम:रानीपुर-लघररया, पो0 : लिमाहाि, दजला: भािलपरु , दपन : 813222, दबहार, भारत

आबै छै ्यि जखनी सरल सरस बोली िै छै िेहऽ के , अांगे - अांग झोली छयपतै कौनें कदवतय, अांग मयधरु ी बनय् कं॑ .... । अांग - अांदगकय के छे लै पज ु यरी मयन - सममयनऽ के छदव, छे लै दबहयरी गीत - िजन गयवै छे लै, ठुमकी लगय् कं॑ .... । कहै छै आाँखी के लोर, प्रीत के छोडकै पठोर रही - रही हुक उठै, िेहऽ कं॑ िै छै मरोर गेलै अांदगकय के अांग, की रांग दहलय् कं॑ ... । नयचतै के मांचऽ पर, कदवतय के छां िऽ पर िरतै के ियव, स्वियवऽ के गांधऽ पर सनु ैतै के फै कडय, हयाँसी - मस्ु कय् कं॑ ... । नजरी नय् झलकै , चकोर ऐसनऽ बयबय सबकं॑ कनयबै छै , मौत के बोलयवय रखतै के “मयधरु ी” के , अांग रे सजय् कं॑ ... । अांग - अांदगकय के , छे लय प्रयण ियतय ियषय - दवियगऽ के उ छे लय दनमयट तय गेलै नी चकोर िैय्​्य, चौकय परु य् कं॑ ... ।

62

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल उत्सव पुरूस चकोर

कहयाँ गेलऽ कहयाँ गेलऽ हे चकोर िय् सौंसे पदृ थवी लोक स ं॑ दपन्ड कं॑ छोडय्

डॉ. तेजनारायण कुशवाहा

- संपकष कुलपदत, दवक्रमदशला दहन्िी दवद्यापीठ, िा​ाँधीनिर, ईशीपरु , भािलपुर – 813206 दबहार, भारत

वयग्िेवतय अांदगकय मय् ल ं॑ िल ु य् िेलऽ सिे कुछु आरो दजनगी दसरय् िूलैलौ नञ िूलों अांगतीथट रऽ गोसयां् दपन्हय् दसल्क वस्त्र पूजौं फूल च़िय् ‘अांग मयधरु ी’ अांग मयदसक प्रकयसन दछ्यलीस बसट स ं॑ करी कं॑ सांपयिन सयदन्नध्​् सख ु पैल ं॑ ईस्वर के चकोर सिे अांग के करी नेत्र लोर सलोर अांग-अांदगकय स्वरूप उयसव परू ु स पयांडे् चकोर पयवसी नित्र पस ु सांवेिनय व्ि कर ं॑ कुशवयहय िय् िेन के उल्लेख करी फूल कं॑ च़िय् !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

63


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल अंदिका​ाँिन के मोर: डॉक्िर चकोर हमरऽ अांग प्रिेस मनोहर, मदहमय अगम अपयर ।

हीरा प्रसाि हरेन्र

- संपकष ग्राम + पो0 : किहरा, थाना : सल ु तानिंज, दजला: भािलपुर, दपन : 813213, दबहार, भारत

64

जेकरऽ बीचे-बीच बहै छै , गांगय जी के धयर ।। गांगय जी के बीच धयर मां,ं॑ अजगैबी के धयम । मनवयांदछत फल िै वयलय छै , मेटै कस्ट तमयम ।। ्हयाँ अांदगकय ियसय-बोली, ढेरी रचनयकयर । अांदगकय सयदहय् के जौनें, िरनें छै िांडयर ।। ऊ सब्िे रचनयकयरऽ मां,ं॑ चदचट त बडी चकोर । अांदगकय उद्ययन के गौरव, हांस कहऽ ्य मोर ।। नरेश पयण्डे् नयमयकरन, छै चकोर उपनयम । दवरयसतऽ मां ं॑ पैन ं॑ छे लै, िजन-ियव सिु कयम ।। ग्रयम िेवधय अांग िेत्र के , छै सन्ु िर रमनीक । थयनय बयथ वही सां ं॑ सटलऽ, बड् डी छै नजिीक ।। िेवधयम अखनी कहलयबै, जे चकोर के गयाँव । सयदहय् सयधनय बैठी कं॑, करै गयछ के छयाँव ।। गौर वनट उन्नत ललयट पर, सोिै टीक्कय तीन । गलय-कयन मां ं॑ सगरे चन्िन, िदि-ियव मां ं॑ लीन ।। आिर स ं॑ सब्िे सां ं॑ दमलनय, आिूसन अनमोल । स्वर सन्ु िर कां ठऽ सां ं॑ दनकलै, ज्​्ों दमश्री के घोल ।। दवह्वल होलऽ जैसें नयचै, बयिल िेखी मोर । गीत रसीलय गयबी-गयबी, नयची उठै चकोर ।। सयठ बरस तक अांदकत करन,ं॑ छै कयगज पर ियव । वोही मां ं॑ सीधय झलकै छै , उनकऽ सरल स्वियव ।। पस्ु तक त ं॑ ढेरी दलखन ं॑ छै , कदठन दगनयनय नयम । अांग-अांदगकय के नय ब़ितै, सोचै सबु हो-सयम ।। ियरत के ढेरी रयज्​्ऽ मां,ं॑ पैनां ं॑ छै सममयन । पररच् ल ं॑ महुाँ तयज जरय नैं, सगरे ही पहचयन ।। आज अांदगकय दलखबै्य त,ं॑ लगिग एक हजयर । अांगमयधरु ी के मयध्​्म सां,ं॑ करन ं॑ छै तै्यर ।। खैत-ां ं॑ पीतां ं॑ बह ं॑ अांदगकय, रहै च़िैनें मयथ । आज अांदगकय के पररवयरे, लयगै बडी अनयथ ।। छै चकोर के चरन-कमल पर, हीरय के रऽ सीस । इनको पररवयरऽ पर हरिम, कृपय करै जगिीस ।।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल चकोर : श्रद्धांजदल िोहा िू हजयर पनर ं॑ के रऽ, चौि ं॑ दतथी कठोर वहयाँ सयाँझ के छो बजे, गज ु री गेलै ‘चकोर’ ।१ कयदतट क-सक्ु ल दतरदत्य, ज् कयली के सोर अांग-सिय अदपट त करै, अमररत कलस ‘चकोर’ ।२ सधु ीर कुमार प्रोग्रामर

गोरो सय़िे पयाँच फुट, िूबर पयतर ठोर अांग-अांदगकय िेह म,ं॑ िरलऽ पोरे-पोर ।३ अांगमयधरु ी िेस म,ं॑ अधट सतक के ओर सांपयिक बेजोरबय, सब दिन श्री चकोर ।४

- संपकष महासदचव, अदखल भारतीय अंदिका सादहत्य कला मंच, सल ु तानिंज, दजला: भािलपुर, दपन : 813213, दबहार, भारत

शेखर परकयसन रहै, द्रौपिी के दचतचोर सबकं॑ पीछू छोडन,ं॑ आगू चलै ‘चकोर’ ।५ रिक, सांरिक चनु ै, घूमीं ओरी-छोर सबकं॑ सममयदनत करै, जनबरी तीन ‘चकोर’ ।६ लोरी, सोहर, फै कडय, मक ु री करै दहलोर खोजी-खोजी गयाँव स,ं॑ लयनै ढो् चकोर ।७ मधरु -मधरु गपसप करै, कदह्ो नै महुाँ जोर ्ह ं॑ रकम प्​्यरऽ बनी, सबके रहै ‘चकोर’ ।८ अांदगकय के सांसयर म,ं॑ आबै न्कय िोर खिु िी्य-बयती बनी, झक-झक करऽ इनोर ।९

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

65


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल हाय हो भाय चकोर

हा् हो िय् चकोर दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर ।

चन्र प्रकाश जिदप्रय

- संपकष डी. / 321 , जयोदतपूरम अपािष मेंि, दनकि - हल्िीराम स्वीि् स, खजपुरा, जि​िेवपथ, बेली रोड, पिना दपन : 800 014, दबहार, भारत

66

दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर , कयनतें - कयनतें सूखी गेलऽ नैनय के लोर, नै बचलऽ आवै आाँखीं म ं॑ लोर, हय् हो िय् चकोर दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर । रयतकं॑ नींि नै आवै, दहवै छी चयरो ओर , उठतें - बैठतें हो् जय् छै िोर, नै के खरौ स ं॑ बयजी, नै के खरौ स ं॑ होड, हय् हो िय् चकोर दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर । खूब पतयकय फहरैल्हऽ पकै डकं॑ अांदगकय के डोर , अांग सयदहय् के रऽ अजयतशत्रु अांदगकय के दसरमौर, अांग जन सूनय लयगै, हो् गेलऽ अन्होर, हय् हो िय् चकोर दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर । हांसमख ु चेहरय ललयट चांिन खूब शोिै रहै तोर, तोरय िेदखकं॑ जवयनी कं॑ िी लयगै रहै डऽर, सौंसे अांगजनपि अपने लेली करै छै दहलोर, हय् हो िय् चकोर दक्े छोदडकं॑ गेल्हऽ हो िय् चकोर ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल My Grandfather Dr. Chakor My grandfather Dr. Chakor was my brightening gem He made other ’ s future bright like a flame A pearl was compared to his single moment Which went on his books all day

दिवया पाण्डेय

Which kept his tiredness away The lesson which he taught The knowledge and respect which he got ‘ll be always remembered by us……… !

-संपकष -

A power of high thinking and simplicity of lifestyle in looks

59, िा​ाँधीनिर, बोररंि रोड, पिना-800 001, दबहार, भारत

Made him to be a great person by studying books A religious thought with music, enjoyment and song Wherever he is, his labour ‘ll stay long He was punctual, kind and children lover We salute this humble person by going on presenting bouquets of flowers !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

67


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल डॉ. चकोर श्रद्धांजदल िीत

ऐलऽ छै जे इ धरती प ं॑ एक दिन हुनकय जयनय छै गेलय प ं॑ को् गयली िै छै के करो जग मां ं॑ गयनय छै ।।

ब्रह्मिेव दसंह ‘लोके श’

-संपकष ग्राम : िेवधा, पो: बाथ, भािलपरु , दबहार, भारत

ई धरती प ं॑ ऐलै चकोरजी खूब कमैलकै जस दकरदत । दलखी गेलै सिस ् यदहय् सन्ु िर करी कं॑ गेलै प्रिु के िगदत ।। िै छलै उपिेस हुनी हरिम सख ु -िख ु म ं॑ मस्ु कयनय छै । ऐलऽ छै जे इ धरती प.ं॑ .. ।। गहृ स्त दवरि श्रीरयमिगत छलयत हुनी एक दवसर्द् ु सांत । रचनय रचद्तय के सांरिक हुनकऽ दप्र् सब सांत-महांत ।। नयची-कुिी कं॑ कहै छे लयत ‘श्रीरयम’ मां ं॑ हमरय समयनय छै । ऐलऽ छै जे इ धरती प ं॑ ... ।। अांदगकय के अांगि हनमु यन छलयत अांदगकय के अग्रिूत । दनर अदिमयनी पूनट ज्ञयनी छलयत अांग के दिव् सपूत ।। कृदतयव-व्दियव हुनकऽ िेखी ब्रह्मिेव ‘लोके श’ िीवयनय छै । ऐलऽ छै जे इ धरती प ं॑ ....।। एक दिन हुनकय जयनय छै ।।

68

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर स्मदृ त : कावयांजदल अंदिका चकोर

बनैल ं॑ ऐन्हऽ तों् आपनऽ दजांिगी, न्य - न्य चयाँि ! सगरे चयाँिनी, दहलदमल जयह्नन्वी, ियसय के रयदगनी, अांदगकय ियसय के ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ?

कुंिन अदमताभ

-संपकष CH-1/24, कें रीय दवहार, सेक्िर - 11, खारघर, नवी मबंु ई - 410210, महाराष्र, भारत

जगैल ं॑ ऐन्हऽ अांदगकय उयथयनऽ के चेतनय, बनी दृढ.-प्रदतज्ञ ! सहल ं॑ अदतघोर वेिनय, दवघ्न बोहयरी, जगैल ं॑ जन - सांवेिनय, अांदगकय के अरयधक ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ? बजैल ं॑ ऐन्हऽ तों् आपनऽ बांसरु ी, अद्भतु सांकल्प ! चमकै ल ं॑ ‘अांग मयधरु ी’, धरपट लेखनी, अांदगकय के परम वांिनी्, अांदगकय के सयधक ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ? रमैल ं॑ ऐन्हऽ तों् आपनऽ रयमधनु ी, ज् सीतयरयम ! गज ुाँ ैल ं॑ ‘रघवु ांशम’ वयनी मन-प्रयन रौसनी, सांखनयि के वयदहनी अांदगकय के कयदलियस ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ? चललै - थमलै जेनय तोरऽ जीवन सफर, कोदटसः नमन वू पल कं॑ ! रयम के चकोर, रयमऽ के तल ु सी , चचयट चहुाँ ओर, अांदगकय के तल ु सी ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ? दहलदमल जयह्नन्वी, ियसय के रयदगनी, अांदगकय ियसय के ‘चकोर’ कहयाँ गेल्ह ं॑ ?

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

69


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

बाबू के आत्मा आरो माय के परमात्मा िे कै ‘अंि माधुरी’ आ् कुछ दलखै ल ं॑ चयहै छी पर दलख ं॑ न् पयरै छी । पतय नै की दलखाँऽ । असके ल्लऽ कोठरी मां ं॑ बयबू के फोटो के सयमने बैठी कं॑ कुछ दलखै ल ं॑ चयहै छी पर आाँखीं स ं॑ लोर टपकी जय् छै । कखनू हुनकऽ मवधश ु ेखर पाण्डेय गयाँधी थैलय िेखै छी, त ं॑ कखनू िीवयलऽ प ं॑ टाँगलऽ हुनकऽ दमललऽ सममयन पत्र, मेडल दसनी कं॑ । खोजतें - संपकष रहै छी चयरों तरफ कहयाँ की छै पतय न् छै । किी 59, गयाँधीनगर, बोररांग दकतयब झयडै छी त ं॑ किी दकतयबऽ पर पडलऽ िीमक रोड (पदिम), पटनय - 800 001 , हटयबै छी । कयफी दकतयब सब्िे रूमऽ मां ं॑ पडलऽ छै । दबहयर, ियरत

हमरऽ पेंदटांग बयबू के तनय सांियली कं॑ रखै छे लै । सब कं॑ कहै छे लै, “हमरऽ माँझलय लडकय ऐतै त ं॑ सब्िे सममयन पत्र, सदटट दफके ट कं॑ झयडतै आरू साँियली कं॑ रखतै ।” आ् पतय नै सदटट दफके ट त ं॑ झयडै छी पर “ डी.ए.िी. दबनय डयाँटऽ के । आब ं॑ अके लय पडी गेलयाँ । आब ं॑ के ु बल ु पयांडे ? रोज आसय िेखै इसकूली मां ं॑ कहतै, आबी गेलै बल ु बल ु कं॑ दप्रांसीपल कं॑ छुट्टी आरू कुछ हो् छे लै त ं॑ मय् कं॑ कहै, “बल कम दमलै छै पर बोलय् िहऽ, िेह िरि करै छै ।” जब-ं॑ जब ं॑ आबै छे लयाँ दफर िी दन्दमत बयबू के गोर जरूर िबय् छे लयाँ आरू मय् के िी । आबै छे लयाँ बयबू के डी.ए.िी. इसकूली मां ं॑ दप्रांसीपल कं॑ छुट्टी कम दमलै छै आदसरवयि लै ल ं॑ । पर दफर िी दन्दमत आबै छे लयाँ बयबू के आदसरवयि लै ल ं॑ । ” 70

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


बयबू बोलै छे लय, “बल ु बल ु अांग मयधरु ी के नय दनकलतै ।” कखनू-कखनू मय् बोलै छे लै, “एतनय-एतनय दकतयब कै न्हें छपबयबै छो ? दबकै नै छौं आरू कहीं स ं॑ कोनो सहय्तय िी न् दमलै छौं ।” एकरय प ं॑ बयबू कहै छे लै, “हमरय म ं॑ को् लत त ं॑ छै नै एक्के टय त ं॑ लत छै – ‘अांग मयधरु ी’ दनकयलै के । ई हममें जब तलक रहिौं, दनकयलतें रहबै ।” बहुत कदठनयई के सम् मां ं॑ िी ‘अांग मयधरु ी’ दनकलतें रहलै । किी-किी सयल-सयल िर सां ं॑ वेतन न् दमलै छे लै पर ‘अांग मयधरु ी’ नकलतें रहलै । कदह्ो गस्ु सय न् हो् छे लै । हरिम सकयरययमक सोच रखै छे लै । आ् बयबू के सरीर नै छै पर हुनकऽ कीदतट आरू ्स चयरों तरफ छै । हमरय लगै छै बयबू हमरे पयस बैठलऽ छै आरो कहै छै बल ु बल ु कुछ दलखऽ, प़िऽ आरू सच्चयई के रस्तय पर चलऽ । बयबू के आयमय आरो मय् के परमययमय छे कै ‘अांग मयधरु ी’ । बयबू आपनऽ इसकूली के आरू आपनऽ इलयकय के एगो िोस्त श्री गोरेलयल मनीषी के रऽ बेटय कांु िन अदमतयि कं॑ बहुत मयनै छे लै, आपनऽ बेटय समयन ही । हममें हमेसय समझै दछ्ै दक हममें तीन नै चयर िय् छी । मय्-बयबू

“ आय हम्में पा​ाँचो भाय-बमहन ममली क॑ अंग माधुरी क॑ मनरंतर मनकालतें रहै के क ं ल्प लेन ॑ मछयै । मनबाथध गमत ॑ अंगमाधुरी मनकलतें रह,॑ इ लेली आपन ॑ बके हयोग आरू आम रबाद अपेमित छै ” हमरय बोलै छे लै दक कांु िनें अांग मयधरु ी कं॑ रूकं॑ नै िेतै । आ् हममें पयाँचो िय्बदहन दमली कं॑ अांग मयधरु ी कं॑ दनरांतर दनकयलतें रहै के सांकल्प लेन ं॑ दछ्ै । दनबयट ध गदत स ं॑ अांगमयधरु ी दनकलतें रह ं॑ इ लेली आपन ं॑ सबके सह्ोग आरू आदसरबयि अपेदित छै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

71


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

डॉ. चकोर के अंदतम क्षण जहयाँ तक मझु े स्मरण है डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर के सयथ मेरय प्रथम सांपकट दबहयरशरीफ दजलय नयलांिय में हुआ थय जब वे खयिी ग्रयमोद्योग बोडट में दकसी पियदधकयरी के पि पर वे पिस्थयदपत थे । उसी सम् अांदगकय के प्रदत उनकय आग्रह तथय दहन्िी के प्रदत उनकय समदपट त ियव िेखने कय सअ ु वसर नपृ ेन्रनाथ िप्तु प्रयप्त हुआ थय । उस सम् मैं िी वहयाँ दजलय दनबांधन कय्यट ल् - संपकष में पियदधकयरी के रुप में पियस्थयदपत थय । धीरे-धीरे उनसे मेरय बरनवयल श्रीउदित सांपकट ब़ितय ग्य और वे दनष्ट्कयम ियव से ियषय-ियरती सांवयि आ्तन, शेखपरु य, त्रैमयदसक सयदहदय्क पदत्रकय के सांपयिन कय्ों में मेरय सह्ोग पटनय – 800014, करने लगे । सह्ोगी सांपयिक के रूप में उनकय सह्ोग दनरांतर प्रयप्त होतय रहय । जो िी कय्ट पदत्रकय के सांबधां में उन्हें दि्य जयतय थय, उसकय दनष्ट्पयिन वे ियद्यवपूणट ढांग से दक्य करते थे । “ जब वे खादी हठयत चौिह नवांबर को जब उनकी दकसी अप्रकयदशत ग्रामोद्योग बोडथ में पस्ु तक की पयांडुदलदप की मदु द्रत कॉपी के प्रूफ सांशोधन के दलए मक ी पदामधकारी जब उनको सांध्​्य सय़िे छह बजे के करीब िेने ग्य तो िरवयजे के पद पर वे पर ही पटनय हयईकोटट के प्रदतदष्ठत अदधविय श्री गणपदत जी से पदस्थामपत थे । िेंट हुई तो उन्होंने हठयत कहय दक आपके दप्र् दमत्र चकोर जी उ ी मय अंमगका के प्रमत उनका अब इस िदु न्य में नहीं रहे । आनन-फयनन में उनके अांदतम आग्रह तथा महन्द्दी िशट न के दल्े िीतर प्रवेश करने लगय तो बतय्य ग्य दक के प्रमत उनका उनकी मयृ ्ु कुछ सम् पूवट हो गई । मयृ ्ु की घडी में हयथ में ममपथत भाव देखने कलम उठय्े दहन्िी त्रैमयदसक पदत्रकय प्रज्ञयवयणी के प्रूफ का अ ु व र प्राप्त सांशोधन के कुछ पष्ठृ दबखरे पडे थे । हयथ में कलम थी और रयमि​ि चकोर अपने आरयध्​् से दमलने श्रीरयम के िरबयर में हआ था । ” दबष्ट्णल ु ोक प्रस्थयन कर चक ु े थे । 72

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


कह नहीं सकतय मेरी दस्थदत उस सम् ऐसी हो गई मयनो दक कयटो तो खून नहीं । कुछ सम् तक मैं अपनय िी होश-हवयस खो बैठय । िीतर से उनकी अर्द्यांदगनी श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु की करूण-क्रांिन की ध्वदन और दकरय्े में रहने वयलों के रोने की आवयज आ रही थी । उस सम् पररवयर कय कोई िी व्दि उपदस्थत नहीं थय । बयि में उनके पत्रु ों और सगे-सांबदां ध्ों को सूचनय गई । धीरे –धीरे पररवयर के सिी पररजन आ चक ु े थे । अय्ांत ही करूण और मयदमट क दस्थदत थी । डॉ. चकोर कय जन्म ३ जनवरी १९३८ ई. को और महयप्र्यण १४ नवांबर २०१५ ई. को ७८ बरस की आ्ु में हुई । अस्पतयल से शव लयने के बयि िी जब उनकय शव बरयमिे पर रखय ग्य तो उनके चेहरे पर शयांदत और चमक कय्म थी । इसके पूवट ही मझ ु े बतय्य ग्य दक अिी श्री आर. प्रवेश दमलकर गए थे । उस सम् वे दबल्कुल स्वस्थ थे और इनके सयथ उन्होंने चय् और नयश्तय दक्य थय । मयृ ्ु की घडी में उनके पयस कोई नहीं थय । बयि में उनकी अर्द्यांदगनी उनके रूम में प्रवेश कीं तो िेखकर दचयकयर कर उठीं । तब बयाँकी आसयपयस के लोग िौड के आए । बयि में ियह सांस्कयर के पूवट उन्हें दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन में सयदहय्कयरों के मध्​् उनकय पयदथट व शरीर लय्य ग्य । डॉ. अदनल सल ु ि की अध्​्ितय में उन्हें ियविीनी श्रद्वयांजदल िी गई । तयपियत समस्त सांस्कयर दवदध कय दनवयट ह करते हुए उनकय ियह सांस्कयर दक्य ग्य ।

“डॉ. चकोर का जन्द्म ३ जनवरी १९३८ ई. को और महाप्रयाण १४ नवंबर २०१५ ई. को ७८ बर की आयु में हई । अस्पताल े शव लाने के बाद भी जब उनका शव बरामदे पर रखा गया तो उनके चेहरे पर शांमत और चमक कायम थी ।” अपने सौहयिट ्पूणट व्वहयर और धमट परय्ण्तय के दलए चकोर जी हमेशय मेरी स्मदृ त में बने रहेंगें ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

73


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

अंदिका के रऽ भीष्म दपतामह

राके श पाठक - संपकष C/o - सरु न्े द्रनयथ ककयटी हयउस नां. : 23, 87, आर. ओ. स्टोर के पयस बीर दचलय रय् पथ, जोनकपरु , बीरूबन, गवु यहयटी . असम, ियरत

“ चकोर जी चल्लऽ गेला बमकर अपनऽ आत्मा ‘अंग माधुरी’ हमरा म नी लेली छोड़ी गेला, इ त ॑ मय बतैतै मक हम्मं ॑ म नी हनकऽ आत्मा क॑ कत्त ॑ मदना ता​ाँय मजंदा रखै पारै मछयै ” 74

नै नै, ‘िीष्ट्म दपतयमह’ कही कं॑ चकोर जी कं॑ महयियरत के रऽ मख्ु ् पयत्र ‘िीष्ट्म दपतयमह’ रकम मदहमय मांदडत करनय हमरऽ उद्देस्​् नै छै । जे सयदहय् के प्रियमांडल स ं॑ खद्दु े मांदडत छे लय हुनकय आरू की मदहमयमांदडत करलऽ जयब ं॑ पयरै छै ? नै । कदह्ो नै । के न्हौ कं॑ नै । हममां ं॑ त ं॑ वू अियगय मां ं॑ स ं॑ छी जे दजनगी मां ं॑ चकोर जी के िरसन-परसन सां ं॑ बांदचत रही गेलऽ छौं । १९८७ ई. के बयि दबहयर जयने छुटी गेलऽ । रहलऽ सहलऽ कसर २००० ई. के फरवरी महीनय मां ं॑ पूरय हो् गेलऽ, जब ं॑ दक सौ प्रदतशत दवकलयांगतय के दसकयर हो् गेलयाँ । चलै दफरै स ं॑ नचयर हो् गेलयाँ मतर दक अपनऽ मयतिृ यसय के ललक नै छुटलऽ । ऐहने सम् म ं॑ आिरनी् आमोि दमश्र जी के सौजन्​् स ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ के एक टय परु यनऽ अांक दमललऽ । ओकरे मां ं॑ सांपयिक के मोबयईल नांबर पर फोन करलयाँ । ्ह ं॑ छे लऽ हमरऽ चकोर जी सां ं॑ पहलऽ पररच् । अपनऽ टुटलऽ - फुटलऽ अांदगकय रचनय िेज ं॑ लयगलौं । आसय नै छे लऽ दक छपतऽ । मतर दक लगयतयर छप ं॑ लयगलऽ । कदवतय, कहयनी, सोध दनबांध सब कुछ अांग मयधरु ी मां ं॑ छप ं॑ लयगलऽ । पतय नै चकोर जी कं॑ हमरऽ रचनय मां ं॑ की नजर आबै छे लै दक हुनी हमरऽ कदवतय सांग्रह, सोध - पस्ु तक आरनी प्रकयदसत करलकै । फसट सां ं॑ असट तलक पहुचाँ य् िेन ं॑ छे लय हमरय । ओनय त ं॑ अांदगकय म ं॑ सम् - सम् पर कत्त ं॑ दसनी पदत्रकय दनकललै मतर दक िू - चयर अांक दनकली कं॑ सांसयधन के कमी के कयरन बांि हो् गेलै । लेदकन अांग मयधरु ी , दिसांबर - १९७० ई. सां ं॑ जे छपनय शरू ु िेलै वू आ् तलक नै रुकलै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


दछ्यलीस बररस के उमीर पैलकै । चकोर जी अपनऽ करेजय के लह दपलय् कं॑ तऽन - मऽन - धऽन स ं॑ “अांग मयधरु ी” दनकयलतां ं॑ रहन ं॑ छे लय । फोन पर बरमहल बयत हो् छे लै । एक्के बयतऽ कं॑ िोहरयबै छे लय - “अांदगकय ियसय आरू सयदहय् के प्रचयर - प्रसयर के हमरऽ ई प्रदतज्ञय दजनगी िर बनलऽ रह ं॑ ” । सच्चे मां ं॑ अपनऽ ई प्रदतज्ञय कं॑ हुनी दजनगी के रऽ अांदतम िन तलक दनिैने छे लय । अांदगकय ियसय सयदहय् के रऽ आजीवन प्रचयर-प्रसयर के प्रदतज्ञय ‘िीष्ट्म दपतयमह’ के प्रदतज्ञय सां ं॑ कम नै छे लै । अांदगकय दकतयब, पदत्रकय खररिै वयलय को् नै, पदत्रकय मां ं॑ छयपै लेली को् दवज्ञयपन नै । ्हयाँ तयाँ् दक अांदगकय मां ं॑ बरमहल रचनय करै बलय को् नै । ऐन्हऽ दवपरीत पररदस्थदत मां ं॑ अांग मयधरु ी कं॑ अपनऽ करेजय के लह दपलय् कं॑ दजांिय रखै के प्रदतज्ञय िीस्म प्रदतज्ञयां सां ं॑ दक कम छे लै ? एगो बयत आरू । दलखनय जेतनय आसयन हो् छै , दलखलऽ गेलऽ रचनय कं॑ सांपयदित करनय ओतने कदठन हो् छै । िोसरय के दलखलऽ एक-एक सब्ि, एक-एक पांदि कं॑ बयर-बयर प़िनय कम धै्ट के बयत नै हो् छै । वूहो एक्के टय नै, अांग मयधरु ी के रऽ अलयवे ‘न्य ियषयियरती’, ‘प्रज्ञय वयणी’ आदि दहांिी पदत्रकय के रऽ ढेर दसनी सयम्रगी कं॑ सब्िसः प्रूफ रीदडांग करी कं॑ सांपयदित करनय असयधयरन इच्छय सदि वयलय चकोर जी के रऽ वस के ही बयत छे लै । हमरऽ रचनय सांपयदित करै मां ं॑ हुनकय जों् को् कदठनयई हो् छे लै, जेनय दक कोनो

“ अंमगका मकताब, पमत्रका खररदै वाला कोय नै, पमत्रका मं ॑ छापै लेली कोय मवज्ञापन नै । यहा​ाँ ता​ाँय मक अंमगका मं ॑ बरमहल रचना करै बला कोय नै । ऐन्द्हऽ मवपरीत पररमस्थमत मं ॑ अंग माधुरी क॑ अपनऽ करेजा के लहू मपलाय क॑ मजंदा रखै के प्रमतज्ञा भीस्म प्रमतज्ञां ं ॑ मक कम छे लै ? ” अस्पस्ट दलखलऽ सब्ि प़िै मां ं॑ नै आबै छे लै त ं॑ हुनी छौ बजे िोरे म ं॑ हमरय फोन करै छे लय । हममें हैरयन रही जय् छे लयाँ दक ई वर्द् ृ यवस्थय मां ं॑ िी हुनी अपनऽ कयम के प्रदत , अपनऽ कतट व् के प्रदत, अपनऽ प्रन कं॑ अांजयम तलक पहुचाँ यबै के प्रदत के तनय समदपट त छे लय । सच म ं॑ हुनी अांदगकय के रऽ ‘िीष्ट्म दपतयमह’ ही छे लय । हुनी चल्लऽ गेलय बदकर अपनऽ आयमय ‘अांग मयधरु ी’ हमरय दसनी लेली छोडी गेलय । इ त ं॑ सम् बतैतै दक हममां ं॑ दसनी हुनकऽ आयमय कं॑ कत्त ं॑ दिनय तयाँ् दजांिय रखै पयरै दछ्ै । सत- सत नमन चकोर जी । कहलऽ—सनु लऽ मयफ करबै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

75


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

चकोर : असरिार वयदित्व सन १९६५ ई. के एक दिन चकोर जी सां ं॑ िेंट । तब सां ं॑ हर िेंट

प्रो. (डॉ.) भूतनाथ दतवारी - संपकष नयरय्ण मेदडकल कॉलेज, सयसयरयम, दबहयर, ियरत

“ अंमगका - वे ा मं ॑ रत नरेश पाण्डेय चकोर जी एगो फूल रं छेलात, मजनकऽ अंमतम इच्छा वही रस्ता मं ॑ पड़लऽ रहै के छेलै जेकरा प ॑ अंमगका वे ी चलतं ॑ रह ॑ । ”

76

मां ं॑ हुनी मऽन मां ं॑ समयब ं॑ लयगलयत । कयरन छे लै सरलतय, सयसयदहय् सां ं॑ लगयव, छलहीनतय आदि । ‘्थयलयि सांतोषय’ दजनकय जेहन मां ं॑ , सदहस्नतु य दजनकऽ अमयनत, सब के रऽ मऽन पर रयज त ं॑ करबे करतै । ्ही वजह सां ं॑ चकोर जी जीवन िर अचदमित करैवयलय सयकमट करतें रहलयत । रयमम् हो् कं॑ जीवन ्यपन करलकं॑ आरो हर दृदस्टकोन सां ं॑ सफल रहलयत । अांदगकय के रऽ जऽड मजगूत करै मां ं॑ आदथट क कमी के बयवजूि दजदि्य् कं॑, ठयनी कं॑ दिडलऽ रहलयत । नतीजय जे आज सबके सयमने छै , बतय् रहलऽ छै - सरांग मां ं॑ छे ि हुअ ं॑ सकं॑ गर मऽन सां ं॑ पयथर फें कलऽ जय् । अांदगकय - सेवय मां ं॑ रत नरेश पयण्डे् चकोर जी एगो फूल रां छे लयत, दजनकऽ अांदतम इच्छय वही रस्तय मां ं॑ पडलऽ रहै के छे लै जेकरय प ं॑ अांदगकयसेवी चलतां ं॑ रह ं॑ । ज्ञयन, दवरयग आरो िगती इ तीन दवशेस गनु नर तन के रऽ छे कै । चकोर जी तीनों गनु ऽ कं॑ आयमसयत करल ं॑ छे लै । हुनी ्ही कयरन सां ं॑ कुछ अलयिय आरो छयप छोडै छे लै । मयनी कं॑ चलै छे लै, “ है अदनदित हर दिवस हर एक िण, दसफट दनदित है अदनदिततय ्हयाँ ” ्ही ल ं॑ त ं॑ अांत सम् तलक कलम सां ं॑ रचतां ं॑ रहलै आरो कलम पकडले दिवांगत होलै । करयह के सोर िी को् सनु ं॑ नै पयरलकै । दचरदनद्रय मां ं॑ समय् के अद्भतु दखस्सय । सयधूजन ब्रह्मलीन हो् छऽत , चकोर जी “सयदहय्लीन” होलयत ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


चकोरसस्म : संस्सं मरण ॑ जदृ ुडत लऽ डॉ.- डॉ. चकोर स्मरण स्मदृ त - वैभव ‘चकोर’ जी

चकोर जी के जब ं॑ िी हमरय फोन आबै छे लै, तब ं॑ हममां ं॑ उनकय ्ह ं॑ कहै छे दलऐ - ‘कहयाँ उडी रहल ं॑ छ ं॑ चकोर जी ?’ ‘नै कहीं घरै प ं॑ दछ्ै’ - ऐसने कुछु उनकऽ उत्तर रहै छे लै । लेदकन चौिह नवांबर िू हजयर पनर ं॑ के सयमऽ मां ं॑ चकोर जी सचमचु े उडी गेलै ऐसनऽ िेस, जहयाँ स ं॑ को् ्हयाँ नै लौटै छै ! प्रो.(डॉ.) लखन लाल “उडी गेलै हांसय, रही गेलै िेह”

दसंह ‘आरोही’ - संपकष अध्​्ि, दबहयर अांदगकय अकयिमी, पटनय, दबहयर, ियरत

“ हौ ाम अंमगका के आका ऽ के एक खूब चमचमैलऽ नित्र लुप्त होय गेलऽ छेलै ।”

चकोर जी चल्लऽ गेलै, अब ं॑ त ं॑ उनकऽ ्यिे हमरय पयस रही गेलै ।

चकोर जी के दनधन के समयचयर हमरय पटनय स ं॑ आर. प्रवेसें फोन प ं॑ कहलकै - “आरोही जी, आ् सयम लगिग सय़िे छ बजें चकोर जी के हटट अटैक स ं॑ दनधन हो् गेलै ।” है सदु नए कं॑ हममें सन्न रही गेदलऐ । तैय्​्ो समयचयर अप्रय्यदसत नै छे लै ! बहुत दिनऽ स ं॑ चकोर जी बहुते कमजोरी अनिु व करी रहलऽ छे लै । दज्यिय नै चल ं॑ - दफर ं॑ सकै छे लै । उनकय है एहसयस हो् गेलऽ छे लै दक हुनी कखनु िदु न्य स ं॑ दविय हुअ ं॑ सकै छै । अांदगकय के रऽ एगो पतररकय में अपनऽ प्रदतदक्र्य में त ं॑ हुनी दलदख्ो िेल ं॑ छे लै - ‘हममें त ं॑ पक्कय आम छे दक्ौं, कखनु टपकी जैिौं । आदखर वहै पकलऽ आम चौिह नवांबर के उ मनहस सयमऽ मां ं॑ टपकी गेलै । हौ सयम अांदगकय के एगो सयदहय्कयर के रऽ पयनी के सहु यग खयली नै खतम होलऽ छे लै, अांदगकय के आकयसऽ के एक खूब चमचमैलऽ नित्र िी लप्तु हो् गेलऽ छे लै । चकोर जी के दबलखती पयनी कं॑ हममें फोनऽ प ं॑ धै्ट िेदलऐ । हुनकऽ मयसूम चेहरय के कल्पनय स ं॑ हमरय मनऽ में उियसी के रऽ बय़ि उमडी गेलै !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

77


चकोर जी हमरऽ छयत्र - सखय छे लै । िोनों करहरर्य उच्च दवद्ययल् के छयत्र । हुनी नवमयाँ मां,ं॑ हममें ग्​्यरहवयाँ मां ं॑ । हममें कदह्ो - कदह्ो चकोर जी के क्लयस मां ं॑ दहन्िी प़िय् ल ं॑ जय् छे दलऐ । तदि्े चकोर जी हमरऽ परियव मां ं॑ ऐलै । तखनी हुन्हीं चकोर नै नरेश पयांडे् छे लै ! बहुत बयिऽ म,ं॑ पतय नै कै दह्य हुन्हीं चकोर जी हो् गेलय । लेदकन सयदहय् के रऽ सांस्कयर हुनकय करहरर्े स्कूलऽ मां ं॑ दमललै । करहरर्य स्कूलऽ के बयि कदह्ो - कदह्ो चकोर जी स ं॑ िेंट मल ु यकयत ! ओकरऽ बयि त ं॑ वोहो िेंट नै । एक लमबय अांतरयलऽ के बयि एक दिन ियगलपरु म ं॑ पयरस स्टुदड्ो मां ं॑ चकोर जी स ं॑ अचयनक िेंट ! पैहने त ं॑ हुनकय नै पहचयनदल्ै । चकोर जी िेस-िूसय स ं॑ “ पैहने त ॑ हनका नै पहचानमलयै । चकोर जी भे -भू ा ॑ बदली गेलऽ छेलै । चंदन चरमचत कपाल आरू महंती पोशाक । मालूम होलै - चकोर जी छेकै ! बहत अर ा के बाद भेंट ! तमभये हमनये बतैलकै - अंमगका आरू अंग माधरु ी के बारे में आरू हनी हमरा अंमगका में मलखै ल ॑ कहलकै ! ” बिली गेलऽ छे लै । चांिन चरदचत कपयल आरू महांती पोशयक । मयलूम होलै - चकोर जी छे कै ! बहुत अरसय के बयि िेंट ! तदि्े हुदन्े बतैलकै - अांदगकय आरू अांग मयधरु ी के बयरे म ं॑ आरू हुनी हमरय अांदगकय म ं॑ दलखै ल ं॑ कहलकै ! ई १९८२-८४ ई. के घटनय छे कै । तखनी हममें एस.एस.वी.कॉलेज, कहलगयाँव के रऽ दहन्िी दवियग म ं॑ प्रयध्​्यपक छे दलऐ । ओकरऽ कुच्छु दिन बयि चकोर जी हमरऽ अांदगकय के िू ठो कदवतय - ‘कहलगयाँव म ं॑ गांगय’ आरू ‘है मौसम बडय कसय् छै ’ अांग मयधरु ी मां ं॑ छयपल ं॑ छे लै । तदिए स ं॑ चकोर जी स ं॑ िेंट-मल ु यकयत, अांग मयधरु ी मां ं॑ हमरऽ लेखन आरू हुनकऽ कय्ट क्रम मां ं॑ हमरऽ सह्ोग बरयबर बनलऽ रहलै ! हुनकय स ं॑ सब दिन हमरऽ पयररवयररक सांबधां बनलऽ रहलै । सब दिन िोनों के बीच गहरऽ आयमी्तय रहलै । हुनकय खो् कं॑ हममू आ् िररद्दर हो् गेलऽ दछ्ै । चकोर जी अांदगकय आांिोलन स ं॑ सरू ु स ं॑ जडु लऽ छे लै । हुनी समरदपत ियव स ं॑ अांदगकय ियसय आरू सयदहय् के सेवय करलकै - सांपयिक के रूपऽ म ं॑ आरू रचनयकयर के रूपऽ मां ं॑ ! हुनकय हममें ‘अांदगकय के पां. महयवीर प्रसयि दद्ववेिी’ के उपयदध िेल ं॑ छे दलऐ । लेदकन हुनकऽ सांपयिकी् लेखन स ं॑ हममें हरिम असांतस्ु ट रहदलऐ । हुनी हरिम सयदहय्ेतर सांपयिकी् अांग मयधरु ी म ं॑ दलखै छे लै, जेकरय चलतें हमरय हुनकय स ं॑ हमेसय नोंक-झोंक होत ं॑ रहै छे लै । लेदकन एकरय स ं॑ हमरय िोनों के आयमी्तय पर कदह्ो को् 78

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


प्रियव नै परलै । हममीं किी-किी दबगडी जय् छे दलऐ, लेदकन चकोर जी कदह्ो कठोर नै ! चकोर जी वयमपांथ सनु थैं िडकी जय् छे लै । हुनी कट्टर परांपरयवयिी, दवचयरऽ स,ं॑ िेसऽ स ं॑ । हुनी सरू ु स ं॑ ऐसनऽ नै छे लै । प्रगदतशील दवचयर गोस्ठी मां ं॑ हुनी ियग िी लै छे लै । हुनकऽ ह् वैस्नवी रूप िेखी कं॑ हममां ं॑ त ं॑ आस्च्ट चदकत छे लबे करदल्ै, डॉ. खगेंद्र ठयकुर िी चदकत छे लै । पतय नै, चकोर जी कै सें अचयनक बिली गेलऽ छे लै ! चकोर जी के ह् पररवतट न के असर ‘अांग मयधरु ी’ पर िी पडी गेलऽ छे लै । वह ं॑ धरम, परु यन सांबांधी रचनय, आधदु नकतय के को् पतय नै - सम् के तयप रांग को् अहसयस नै । है सांबांध म ं॑ िी हममें कत्त ं॑ बयर चकोर जी कं॑ कहदलऐ - लेदकन को् असर नै । चकोर जी के आस्थय आगू दववेक आरू आधदु नकतय के को् महयव नै ! सम् के दमजयज सां ं॑ चकोर जी कं॑ को् सरोकयर नै - हुनी परम वैस्नव । ्ह ं॑ कयरन छै दक ‘अांग मयधरु ी’ अब ं॑ गैर सयदहदय्क पदत्रकय हो् गेलऽ छे लै । जैन्हऽ िी रहै, ‘अांग मयधरु ी’ चकोर जी दन्दमत रूपऽ स ं॑ दनकयली त ं॑ रहलऽ छे लै । हमरय मयलूम छै दक चकोर जी के पररवयरें ‘अांग मयधरु ी’ के दनरांतरतय बनैल ं॑ रहतै ! चकोर जी के स्मदृ त-ध्वजय

“ ‘अंग माधुरी’ चकोर जी मनयममत रूपऽ ॑ मनकाली रहलऽ छेलै । हमरा मालूम छै मक चकोर जी के पररवारें ‘अंग माधरु ी’ के मनरंतरता बनैल ॑ रहतै ! चकोर जी के स्ममृ त-ध्वजा ‘अंग माधरु ी’ के रूपऽ में फहरतें रहतै !” ..................................................................................................... “हमरऽ चेतना ॑ वं दे ना तक पर चकोर जी के राज छै , हम्में चकोरमय होय गेलऽ मछयै—हनकऽ स्ममृ त न ॑ हमरा हनकऽ अनन्द्य बनाय देल ॑ छै ! हनकऽ स्ममृ त वैभव क॑ जल नमन !” ‘अांग मयधरु ी’ के रूपऽ म ं॑ फहरतें रहतै ! चकोर जी के सममयन आरू उियरतय के ियरऽ स ं॑ हमरऽ दहरि् िबलऽ जय् छै । हुनकऽ ्यिऽ के मेलय लगलऽ छै , बखयन करै वयस्तें हमरय ओत्त ं॑ सब्ि नै ! हमरऽ चेतनय स ं॑ सांवेिनय तक पर चकोर जी के रयज छै , हममें चकोरम् हो् गेलऽ दछ्ै—हुनकऽ स्मदृ त न ं॑ हमरय हुनकऽ अनन्​् बनय् िेल ं॑ छै ! हुनकऽ स्मदृ त वैिव कं॑ सजल नमन !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

79


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

अंदिका के साधक तपस्वी चकोर जी

डॉ. अदनरूद्ध प्रसाि दवमल - संपकष सांपयिक : सम् / अांगधयत्री सम् सयदहय् सममेलन, पनु दस्य, बयाँकय (दबहयर), दपन : 813 109

“ अंमगका लेली करलऽ गेलऽ ब प्रकार के क्ांमतकारी कोम मं ॑ चकोर जी के अग्रनी भूममका रहलऽ छै , ऐकरा में मनस्चय ही कोय क नै । ” 80

अंदगकय आांिोलन के प्रवतट क सयदहय्कयरऽ मां ं॑ डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ के नयम आिर आरो श्रर्द्य के सयथ लेलऽ जय् छै । अांदगकय के ियसय आरो सयदहय् के दवकयस दवस्तयर म ं॑ इनकऽ िूदमकय महयवपूनट रहलऽ छै । आ् िलां ं॑ अांदगकय दहांिी के समकि चलै के तयकत स ं॑ लबरेज छै मतरु पचयस-सयठ बरस पैन्ह ं॑ १९५६ ई. म ं॑ जखनी पटनय म ं॑ डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांशु के अध्​्ितय म ं॑ ‘अांगियषय पररषि’ के स्थयपनय होलऽ छे लै , उ सम् रहै जब ं॑ लोग अांदगकय के नयमऽ स ं॑ दबिकै छे लै, हयाँसै छे लै । तखनी अांदगकय के आदि उन्नय्क स्व. गियधर प्रसयि अमबष्ठ पररषि के प्रधयनमांत्री, परमयनांि पयण्डे् सयदहय् मांत्री आरो नरेश पयांडे् चकोर प्रचयर मांत्री छे लै । आ् जे अांदगकय ्हयाँ तयाँ् पहुचाँ लै, आरो जै स्वरूप पर हममां ं॑ सब नयज करै दछ्ै ओकरय म ं॑ ‘अांगियषय पररषि’ के िूदमकय सबसें बेसी महयवपूनट छै । ्ही सांस्थय स ं॑ क्रमसः मधक ु र गांगयधर, डॉ. महेिरी दसांह महेश, तेजनयरय्ण कुशवयहय, समु न सरु ो, िवु नेिर दसांह िवु न, अनूपलयल मांडल, सियनांि दमश्र जैसनऽ प्रदतियवयन कदव सयदहय्कयरें जडु ी कं॑ अांदगकय कं॑ सयदहदय्क िमतय स ं॑ ही खयली पूनट नै करलकै ओकरय अन्​् दबहयरी बोली के अदतक्रमन स ं॑ िी लडी कं॑ मि ु करलकै । अांदगकय लेली करलऽ गेलऽ सब प्रकयर के क्रयांदतकयरी कोदसस मां ं॑ चकोर जी के अग्रनी िूदमकय रहलऽ छै , ऐकरय में दनस्च् ही को् सक नै । अांदगकय के ्ै मदहमयवयन, सरल, सयिगी व्दियव के धनी डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ स ं॑ हमरऽ पदहलऽ िेंट १९८२ ई. मां ं॑ चांपयनगर के एक दवरयट कदव सममेलन मां ं॑ होलऽ छे लै । िू दिनऽ के ई महयदधवेसन प्रसून लतयांत द्वयरय आ्ोदजत छे लै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


’दनशयांत’ आरो ‘अदखल ियरती् अांदगकय दवकयस सममेलन’, चांपयनगर द्वयरय आ्ोदजत करलऽ गेलऽ ्ही अदधवेसन मां ं॑ चकोर जी के दलखलऽ नयटक, ’दकसयनऽ कं॑ जगयबऽ’ कं॑ िी मांच पर िेखै के अवसर दमललऽ छे लै । सय्ि ई हमरऽ दजनगी के पदहलऽ अांदगकय कयव् मांच छे लै । ्ही मांचऽ सां ं॑ हममां ं॑ आपनऽ पदहलऽ अांदगकय कदवतय ‘बेरोजगयरी बडी सतयबै छै ’ के पयठ करन ं॑ रदह्ै आरो ्यांही पदहलऽ बयर चकोर जी के मिृ ल ु , सरल व्दियव के िसट न होलऽ छे लै । कदव मांच पर ही आपनऽ हयथ हमरय पीठी पर हौले स ं॑ धरतें हुअां ं॑ दमट्ठऽ बोली मां ं॑ हुनी बोललऽ छे लै - “बहुते बद़ि्य कदवतय प़िलो । है कदवतय हमरय दलखी कं॑ ्यांही ि ं॑ दिहऽ । ‘अांग मयधरु ी’ में छपी जैथौं ।” हममें नै कह ं॑ पयरिौं दक ्ै छुअन मां ं॑ कोंन ऐन्हऽ आदसरवयि दछपलऽ छे लै जें हमरय दसफट अांदगके के बनय् िेलकै आरो आ् तयां् अांदगकय लेली ही समदपट त दछ्ै । गोरऽ िीप, लांबय छरहरऽ िेह, मयथय पर दत्रपडांु , उजरऽ िक-िक खयिी के धोती-कुतयट म ं॑ अजयनबयहु मांच पर बैठलऽ चकोरजी हमरय हौ दिन स्वगट स ं॑ उतरलऽ को् िेविूत नयांकी ही लयगलऽ छे लै । चकोर जी के ्ै खयदस्त के रऽ सय्ि सौंसे अांगजनपि के पररदचत कदव समयज कय्ल होतै दक अांदगकय के नयमऽ पर को् हुनकय कयांही बोलय् ल ं॑ हुनी एक्को ियफी नै, न् कहै छे लै । अांदगकय लेली नरको में जय् लेली तै्यर ई आिमी नमन के ्ोग्​् छे लै । नरक के बयत झूठ नै कहन ं॑ दछ्ौं । कदव सममेलन के परेसयनी स ं॑ हमरो कदव समयज पररदचत छै । रयत िर “ चकोर जी के यै खाम यत के रऽ शायद ौं े अंगजनपद के पररमचत कमव माज कायल होतै मक अंमगका के नामऽ पर कोय हनका कांही बोलाय ल ॑ हनी एक्को दाफी नै, नय कहै छेलै । अंमगका लेली नरको में जाय लेली तैयार ई आदमी नमन के योग्य छेलै । ” जगनय, बेहतर ओ़िनय-दबछौनय नै, मच्छरो के आतांकऽ कं॑ झेलनय अलगे आरो ्ै सब बीचऽ म ं॑ आनांि मगन रहनय की नयरकी् पीडय सां ं॑ कम छै ? जांगल में मांगल मनैवऽ, नरक मां ं॑ िी हाँसी - दठठोली करतां ं॑ जीवी लेवऽ चकोर जी के व्दियव के अहम खयदस्त छे लै । अदखल ियरती् अांदगकय कलय मांचऽ के अदधवेसन मां ं॑ सरल जी सयथें स ं॑ ल ं॑ कं॑ िजन-सांकीतट न म ं॑ रयमललय के आगू नयचतां ं॑ - गैतां ं॑ चकोरजी के कयरद्त्री आरो ियवद्त्री प्रदतिय के रऽ के ऐन्हऽ रदसक जन छै जे प्रियदवत नै होलऽ होतै । वै मां ं॑ डूबी कं॑ लोटपोट नै हो् गेलऽ होतै । मूल रूप सां ं॑ चकोर के कयव् मां ं॑ प्रकृदत आरो िदि रूप के दचत्रन

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

81


प्रमख ु तय के सयथ होलऽ छै । नयटक म ं॑ िलैं सयमयदजक आरो रयस्री् सरोकयर के िसट न हो् छै । ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ आरो ‘सवोि् समयज’ ्ही प्रकयर के नयटक छै । सबसें खयस बयत दहनकऽ नयट् ् सैली के रऽ ओकरऽ मांचन के अनक ु ू ल होनय छै । ओकरौह सां ं॑ बडऽ बयत जे वांिनी् आरो अांदगकय इदतहयस के तयरीख मां ं॑ हमेसय ्यि करलऽ जैतै, ऊ ई दक ई सब नयटक अांदगकय मां ं॑ दलखलऽ गेलऽ छै । ई ऊ सम् छे लै जब ं॑ अांदगकय एक ियसय के रूपऽ मां ं॑ आपनऽ पहचयन सांकट सां ं॑ गज ु री रहलऽ छे लै आरो ऐन्हऽ घडी म ं॑ अत्त ं॑ बडऽ खतरय, अत्त ं॑ बडऽ जोदखम उठय् के सयहस न ं॑ ही चकोर जी के व्दियव कं॑ महयन आरो दवरयट बनय् िेन ं॑ छै । हुनकऽ कृदतयव आरो व्दियव िूनो अांदगकयम् छै । एकिम अांग “ आपनऽ पमत्रका, ‘अंग माधरु ी’ के मनरंतर प्रकाशन ें महनी अंमगका ामहत्य लेखन क॑ जे बल प्रदान करन ॑ छै , अंमगका लेखक के जे एक मव ाल वगथ तैयार करन ॑ छै , यै रूपऽ म ॑ नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ च में कालजयी अंमगका इमतहा पुरू होय गेलऽ छै । ” सांस्कृदत के अनक ु ू ल । पहनवऽ, ओ़िवऽ, बोलचयल, हयाँसबऽ, दमलबऽ सब मां ं॑ अांग सांस्कृदत के िरसन पयवी कं॑ को् िी आप्​्यद्त आदक ओतप्रोत हो् जय् सकं॑ छे लै । रचनयकयर के व्दियव के रऽ प्रियव उनकय कृदतयव मां ं॑ नै चयहलय के बयवजूि िी व्ि हो् जय् छै । चकोर जी के सयिगी िरलऽ व्दियव के रऽ प्रियव उनकय समग्र रचनय सांसयर म ं॑ स्पस्ट पररलदित हो् छै । आपनऽ पदत्रकय, ‘अांग मयधरु ी’ के दनरांतर प्रकयसन सां ं॑ दहनी अांदगकय सयदहय् लेखन कं॑ जे बल प्रियन करन ं॑ छै , अांदगकय लेखक के जे एक दवशयल वगट तै्यर करन ं॑ छै , ्ै रूपऽ मां ं॑ नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ सच म ं॑ कयलज्ी अांदगकय इदतहयस परू ु स हो् गेलऽ छै । अांदगकय के ्ै तपःपूत तपस्वी सयधक कं॑ हममां ं॑ मांियर के बौंसी मेलय मां ं॑ मकर सांक्रयांदत के अवसर पर अांदगकय के दकतयबऽ के रऽ दहनकऽ लगैलऽ प्रिसट नी प्रय्ेक बरस िेखी कं॑ श्रर्द्य स ं॑ झक ु ी गेलऽ दछ्ै । हयड कां पय् िै वयलय मयघऽ के कनकन्नऽ ठयरऽ म ं॑ हममां ं॑ चकोर के रूपऽ मां ं॑ हमेसय एक औघड के िरसन करन ं॑ दछ्ै । एक ऐन्हऽ औघड दजनकऽ प्रयन आपनऽ मयतिृ यसय अांदगकय म ं॑ बसै छे लै, दजनकऽ िगवयन अांदगके छे लै । बीस - इक्कीस मई उन्नीस सौ नवयसी कं॑ दमजयट परु चांगेरी दस्थत हमरऽ घरऽ पर ‘सम् सयदहय् सममेलन’ के छठय महयअदधवेसन अांदगकय महोयसव के रूप मां ं॑ मनैलऽ गेलऽ रहै । िू दिनऽ के ्ै िव् कय्ट क्रम मां ं॑ सौ स ं॑ बेसी उपदस्थत कदव - सयदहय्कयरऽ 82

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


मां ं॑ चकोर जी न ं॑ अांदगकय वतट नी पर सवयल उठैन ं॑ रहै जे लांबय चचयट आरो बहस के बयिो अनसल ु झलऽ ही रही गेलै । ्ही मांचऽ सां ं॑ महयमांत्री के रऽ हैदस्त स ं॑ हममें इनकय ‘महयवीर प्रसयि दद्ववेिी सममयन’ प्रियन करन ं॑ छे दल्ै । मांच स सममयन ग्रहन करतां ं॑ इनकऽ हसट प्रफुदल्लत मख ु मांडल कं॑ हममें आ्तयां् नै िूल ं॑ पयरन ं॑ दछ्ै । जब-ं॑ जब ं॑ हममां ं॑ हुनकय अपनऽ सयदहदय्क कय्ट क्रमऽ म ं॑ ्यि करन ं॑ छे दल्ै हुनी दबनय को् आनयकयनी के ऐलऽ रहै आरो आबी कं॑ हमरय उयसयह के सांवर्द्टन करन ं॑ छे लै । उनकऽ मनमोहक नम्रतय, िद्रतय आरो अदकां चन ियवनय स ं॑ को् िी बडी सहजतय सां ं॑ प्रियदवत हो् जय् छे लै । ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ सां ं॑ जे ्यत्रय नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ न ं॑ सरू ु करन ं॑ छे लै ऊ ‘फूलऽ के गल ु िस्तय’ सां ं॑ गज ु रतां ं॑ हुअ ं॑ करीब अस्सी दकतयबऽ तक पहुचाँ ी गेलऽ छे लै । ्ै मां ं॑ इनकऽ खिु के “ अंमगका के यै तपःपूत तपस्वी ाधक क॑ हम्में मंदार के बौं ी मेला में मकर क् ं ांमत के अव र पर अंमगका भाषा- ामहत्य के मकताबऽ के महनकऽ लगैलऽ प्रदशथनी प्रत्येक बषथ देखी क॑ श्रद्धा ें झक ु ी गेलऽ मछयै । हाड़ कं पाय दै वाला माघऽ के कनकन्द्नऽ ठारऽ में हम्में चकोर के रूपऽ में हमेशा एक औघड़ के दर न करन ॑ मछयै । एक ऐन्द्हऽ औघड़ मजनकऽ प्राण आपनऽ मातृभाषा अंमगका में ब ै छेलै, मजनकऽ भगवान अंमगके छेलै ।” दलखलऽ कृदत तीन िजट न के करीब छै आरो सेस सांपयदित छै । डॉ. अि्कयांत चौधरी के सयथें सयत-आठ महयवपूनट कृदत के लेखन आरो सांपयिन िी दहनी करन ं॑ छे लै । ऐकरऽ अदतररि चयर - पयाँच सोधपरक कृदत िी इनकय उपर प्रकयदसत छै । एक आरो सख ु ि आस्च्ट के बयत दक आपनऽ ७८ बरस के उमर म ं॑ िी अांदगकय आरो रयम के प्रदत इनकऽ दिवयनगी घटलऽ नै छे लै । अनवरत सयदहय् सयधनय सां ं॑ चकोर रूपी ई सोनऽ तपी कं॑ कांु िन हो् गेलऽ छे लै । आ् हुनी नै छै त ं॑ हुनकऽ बहुते ्यि आबै छै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

83


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

अंदिका के अदभभावक सादहत्यकार थे डॉ. चकोर डॉ. चकोर अांदगकय सयदहय् के ममट ज्ञ दवद्वयन, समदपटत

आर. प्रवेश - संपकष -

अध्​्ि – सरोवर सयदहय् पररषि, पटनय 800 011 अध्​्ि – दवि अांदगकय सयदहय् सममेलन, बयाँकय

“ जीवन के अंमतम मदनों में भी चकोर जी उतना ही पररश्रम करते थे मजतना मवद्याथी वगथ करते हैं । यहा​ाँ तक की देहांत े पहले वे मलखतेपढ़ते ही रहे ।” 84

मनीषी और सांघषट शील रचनयकयरों में एक रहे । आज उनकय स्थयन ररि है । जीवन के अांदतम दिनों में िी चकोर जी उतनय ही पररश्रम करते थे दजतनय दवद्ययथी वगट करते हैं । ्हयाँ तक की िेहयांत से पहले वे दलखते-प़िते ही रहे । मैं जब िी उनके पयस जयतय तो उनको दलखते-प़िते ही िेखतय थय । मैं समझतय हाँ दक उस तरह कय सयधक आज दवरले ही दमलते हैं । मझ ु े तो वे बयर-बयर ्ही कहते थे दक तमु प़िते नहीं हो, कयम करो, मेहनत करो । िूसरी बयत वे बहुत दमतव्​्ी थे । ्ह िी अच्छी बयत है । मझ ु े िी ्ही कहते थे दक खचट सोच-समझ कर करो । बचत एक अच्छी आित है । तीसरी बयत िोस्ती दनियनय िी वे जयनते थे । श्री नपृ न्े द्रनयथ गप्तु जी के सयथ चकोर जी कय सांबधां बहुत प्रेरक थय । िोनों एक ही गयडी से कहीं िी जयते । चकोर जी गप्तु जी कय बडय सममयन दक्य करते थे । आज सबसे ज्​्यिय कोई िःु खी है तो वे हैं गप्तु जी । चकोर जी जब िी कोई बयत मेरी सनु ते थे तो सझ ु यव बहुत अच्छय िेते थे । वे अपने सांघषट के दिनों की चचयट करके बतयते थे । चकोर जी बहुत ही सहनशील व्दि थे । वे दकसी से दववयि नहीं करते थे । एक अच्छय अदि​ियवक िी रहे । बच्चों में अच्छे सांस्कयर दि्े । डॉ. चकोर िदि में बहुत लीन रहते थे । हमेशय िजन-कीतट न में अपनय सम् दि्य करते थे । मैंने अपने जीवन कय सवयट दधक सम् सयदहय् सयधनय में चकोर जी के सयथ ही दबतय्य । मैंने बहुत सयरी बयतें उनसे सीखीं । चकोर जी जो िी कहते थे, वह मेरे दलए आशीवयट ि

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


सयदबत हुआ । वे कहते थे – तमु िो कयम अच्छय कर रहे हो – एक तो वर्द् ृ दपतय की सेवय एवां गोसेवय । िोनों से पण्ु ् दमलतय है । ्ह दकतनी अच्छी दशिय है । उनके सयथ प्रयरांदिक दिनों में कदव सममेलनों में उनके सयथ रहतय थय । लोग कहते थे दक चकोर जी के सयथ पटनय से उऩकय दशष्ट्​् िी आ्य है । आज मझ ु े सममयन दमलतय है तो चकोरजी के कयरण । मैंने तो अपनय सयदहदय्क अदि​ियवक ही खो दि्य है । मैं चकोर जी के सयथ लगिग पच्चीस-तीस सयल से जडु य हुआ थय । अांदगकय दलखने में चकोर जी से प्रेरणय दमली और उनको मैं गरू ु वत ही सममयन िेतय रहय । सां्ोग कहय जय् दक दजस सम् उनकय िेहयांत हुआ उससे आधय घांटय पहले मझ ु से घांटों बयतें हुई ां और मेरे वहयाँ से आने के बयि पतय चलय, वे नहीं रहे । सनु कर बहुत िःु ख हुआ ।

मैं चकोर जी के ाथ लगभग पच्ची -ती ाल े जुड़ा हआ था । अंमगका मलखने में चकोर जी े प्रेरणा ममली और उनको मैं गरू ु वत ही म्मान देता रहा । यं ोग कहा जाय मक मज मय उनका देहांत हआ उ े आधा घंटा पहले मझ ु े घंटों बातें हई ं और मेरे वहा​ाँ े आने के बाद पता चला, वे नहीं रहे । नु कर बहत दुःख हआ । पटनय में चकोर जी अांदगकय सयदहय् के अदि​ियवक सयदहय्कयर थे । अब वे हमयरे बीच नहीं हैं तो शून्​्तय आ गई है । मझ ु े आशय थी दक चकोर जी और दज्ेंगें लेदकन जीवनमरण, लयि-हयदन तो दवधयतय के हयथ में है । मैं कह सकतय हाँ दक डॉ. चकोर एक सयदहय्कयर, सांपयिक,लेखक, ि​ि और अदि​ियवक के रूप में प्रेरणय िेने वयले रहे हैं । मैं उन्हें सच्चे हृि् से श्रर्द्य समु न अदपट त करतय हाँ । “अांदगकय के सयधनय म ं॑ िदधची के तरह जीवन दजलकै अांगमयधरु ी के लगतयर सांपयिन करीकं॑ लेखन म ं॑ प्रेरनय िेलकै वै तपस्वी कं॑ कोदट-कोदट परनयम हमरऽ प्रेरनय पज ुाँ हमरऽ बनले रहतै ”

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

85


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

चकोर जी स ॑ पदहलऽ पदहल भेंि तखनी हमरऽ पिस्थयपन पटनय मां ं॑ रहै । अनीसयबयि मां ं॑

चन्र प्रकाश जिदप्रय - संपकष डी. / 321 , ज्​्ोदतपूरम अपयटट मेंट, दनकट हल्िीरयम स्वीट् स, खजपरु य, जगिेवपथ, बेली रोड, पटनय दपन : 800 014

“ जब॑ भी हनका ं ॑ बात होय, तब॑ हनी अंमगका मं ॑ ही बात करै । अंमगका के बारे मं ॑ ही बात करै । के करो लेखनी पर बोलै त॑ कारात्मक आलोचना भी करै ।”

86

ियडय के मकयन मां ं॑ सपररवयर रहै रदह्ै । अांग मयधरु ी के सांपयिक आिरनी् डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी स ं॑ बरयबर िूरियस पर बयत होतां ं॑ रहै । जब ं॑ िी हुनकय सां ं॑ बयत हुऐ, तब ं॑ हुनी अांदगकय मां ं॑ ही बयत करै । अांदगकय के बयरे मां ं॑ ही बयत करै । के करो लेखनी पर बोलै त ं॑ सकयरययमक आलोचनय िी करै । हममां ं॑ आपनऽ प्रकयदसत दकतयब िेजी दि्ै त ं॑ हुनी ‘अांग मयधरु ी’ हु्ै दक ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’ पदत्रकय मां ं॑ समीिय िी खिु करी कं॑ प्रकयदसत करी िै रहै । बयतचीत के रऽ क्रम मां ं॑ दकतयब के बयरे मां ं॑ कही िै दक हेनय करदथहो, ओनय करदथहो त ं॑ दकतयब आरू बद़ि्य बन ं॑ पयर ं॑ रहै । बयतचीत के रऽ क्रम मां ं॑ एक दिनय हुनी हमरय अपनऽ आवयस पर आबै लेली कहलकै । पदु लस के रऽ नौकरी मां ं॑ कयफी व्स्ततय के बयवजूि िी हुनकऽ अनरु ोध कं॑ टयर ं॑ नै सकदल्ै । आरो एक दिन हुनकऽ आवयस ५९, गयांधीनगर, पदच्छम बोररांग रोड, पटनय पहुचाँ दल्ै । वू रहै २९ जल ु य् २००५ के रऽ डे़ि बजे दिन । तखनी हुनी अपनऽ बरयमिय पर के चौकी प ं॑ बैठी कं॑ कुच्छू दलखै रहै । हमरय िेखथैं हुनी उठी कं॑ खयडऽ हो् गेलै । हममां ं॑ हुनकऽ अदिवयिन करदल्ै आरू जबयब मां ं॑ हुनी िी । हुनकय िेखथैं हममां ं॑ हुनकय पहचयनी लेदल्ै आरो हुनी हमरय िी । िेखथैं बोललै “आबऽ - आबऽ जगदप्र् जी । पटने मां ं॑ रहै छौ । तदह्ो-कदह्ो िेंट -मल ु यकयत नै हो् छै ।” बरयमिय पर के गेट खल ु लऽ रहै । प्रवेस करदल्ै त ं॑ हुनी बोललै दक ‘अांग मयधरु ी’ के अगलय अांक के प्रूफ िेखै रदह्ै । हुनी हमरय बरयमिय पर सां ं॑ सोझे पदच्छम वयलय कोठरी मां ं॑ ल ं॑ गेलै । िीतर गेदल्ै । सोफय िन्नां ं॑ इसयरय करलकै । हममां ं॑ सोफय पर बैठदल्ै । आरो हुनी पलांग पर । बयतचीत करतां ं॑ हुअ ं॑ दफर हुनी उठी कं॑ िोसरऽ रूमऽ मां ं॑ चल्लऽ गेलै । कुछ िेर के बयि अपनऽ हयथऽ मां ं॑ रसगल्ु लय के रऽ एगो प्लेट लेन ं॑ हयदजर हो् गेलै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


रसगल्ु लय ल ं॑ कं॑ महुाँ ऽ मां ं॑ रखदल्ै आरो हुनकय िेख ं॑ लयगदल्ै । जैदहने रसगल्ु लय के स्वयि ओदहने हुनकऽ दवनम्र स्वियव । हुनकऽ िेिीप्​्मयन चेहरय चौरऽ ललयट पर खडय चांिन के दटक्कय सलीके ियर पहनयवय आरू दवनम्र स्वियव िेखी कं॑ हममां ं॑ त ं॑ अदि​िूत हो् गेदल्ै । बयतचीत के रऽ क्रम मां ं॑ हुदन बोललै दक सनु ऽ जगदप्र् जी - हमरय ई बयत के िःु ख छै दक जे आजकल दलख ं॑ लयगलै ओकरो दकतयब दतलकयमयाँझी ियगलपरु दविदवद्ययल् के पयठ् ्क्रम मां ं॑ सयदमल हो् गेलै । मतरदक वू सयदहय्कयर दजनकऽ दक अांदगकय के उयथयन मां ं॑ कयफी ्ोगियन रहलै, जैसें दक स्व. उमेश दसांह, स्व. िवु नेश जी, स्व. जगिीश पयठक मधक ु र, स्व. उदचत लयल दसांह, डय. परमयनांि पयण्डे् आरो खिु हुनको दकतयब पयठ् ्क्रम मां ं॑ सयदमल नै छै । अांदगकय वतट नी के बयरे मां ं॑ िी हुनी िख ु ी दिखय् परलै । वै सम् मां ं॑ हममां ं॑ उत्तरयांगी त्रैमयदसक पदत्रकय दनकयलै रदह्ै । पदत्रकय के बयरे मां ं॑ कयफी

“बातचीत के रऽ क्म मं ॑ हमन बोललै मक नु ऽ जगमप्रय जी - हमरा इ बात के दःु ख छै मक जे आजकल मलख ॑ लागलै ओकरो मकताब मतलकामा​ाँझी भागलपुर मवश्वमवद्यालय के पाठ् यक्म मं ॑ शाममल होय गेलै । मतरमक वू ामहत्यकार मजनकऽ मक अंमगका के उत्थान मं ॑ काफी योगदान रहलै, हनको मकताब पाठ् यक्म मं ॑ प्रसांसय करलकै आरो कहलकै दक पदत्रकय कं॑ ियगलपरु सां ं॑ नै दनकयली कं॑ पटनय सां ं॑ दनकयलऽ त ं॑ सस्तय िी पडथौं आरू प्रूफ िेखै मां ं॑ िी सहुदल्त होथौं । पटनय के कोनो प्रेस सां ं॑ बयत करलऽ जय् आरू बोललै दक उत्तरयांगी के मख ु पष्ठृ पर वू सब सयदहय्कयर के फोटो आनय चयदह्ऽ जे अांदगकय लेली बहुत कयम करनै छै । ई बयत पर हममां ं॑ कहदल्ै दक ई कयम त ं॑ हममां ं॑ करर्े रहदल्ै - लिमी नयरय्ण सधु यांश,ु अनपु लयल मांडल, फणीिर नयथ रेण,ु रयमधयरी दसांह दिनकर, गियधर प्रसयि अमबष्ठ, डोमन सयहु समीर, तेजनयरय्ण कुशवयहय, आरू मधक ु र गांगयधर दसनी आरदन सबके त ं॑ पदत्रकय के मख्ु ् पस्ृ ठ पर िइ्े रहदल्ै । ्ै पर हुदन बोललै दक हुनकरो द्वयरय उपर सझ ु ैलऽ गेलऽ नयमऽ के फोटो िी मख ु पस्ृ ठ पर आनय चयदह्ऽ । जै पर हममां ं॑ कहदल्ै दक िदवस्​् मां ं॑ दनदस्चत ऐतै । ्ै मां ं॑ को् िू रय् नै । दवदवध दवस् पर बयत होलै । कयफी िेर तलक के बयतचीत के क्रम मां ं॑ लयगलै दक हुदन अपने आप मां ं॑ एगो वहृ त पस्ु तकयल् छे कै । हुनी अांदगकय सयदहय् के सब्िे दवधय मां ं॑ कयफी सांख्​्य मां ं॑ दकतयब के लेखन आरू सांपयिन करन ं॑ छै । आवै वि हुनी अपनऽ एगो दकतयब, ‘मेरी कहयनी - नई परु यनी’ िेतां ं॑ हुअ ं॑ कहलकै दक असल मां ं॑ ई दकतयब हुनकऽ आयमकथय छे कै । घऽर पर आबी कं॑ दकतयब प़िदल्ै । दकतयब मां ं॑ अपनऽ कटु सच्चयई कं॑ िी बेदहचक रूप सां ं॑ उर्द्तृ करन ं॑ छऽत । जीवन के रऽ बहुत उतयर- च़ियव के दिल म ं॑ रखलऽ बयत कं॑ दकतयब मां ं॑ उडेली कं॑ रखी िेन ं॑ छऽत ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

87


तदह्य सां ं॑ ल ं॑ कं॑ कै एक िफय िेंट- मल ु यकयत होतां ं॑ रहलै । दवचयरऽ के िी आियन-प्रियन होतां ं॑ रहलै दक अचयनक एक रयत १४-११-२०१५ कं॑ करीब आठ बजे ियगलपरु सां ं॑ डॉ. अमरेंद्र जी न ं॑ मोबयईल पर सूचनय िेलकै दक जगदप्र् अांदगकय के बहुत बडऽ नक ु सयन हो् गेलै । अांदगकय के रऽ बहुत बडऽ हस्ती आपनऽ बीचऽ सां ं॑ चल्लऽ गेलै । जयनल्हो दक नै ? मऽन छटपटयब ं॑ लयगलऽ । हममां ं॑ कहदल्ै दक जल्िी कहऽ न,ं॑ की होलै । हुन्नें सां ं॑ कहलकै नरेश पयण्डे् चकोर जी नै रहलै । हममें त ं॑ सनु ी कं॑ स्तब्ध रही गेदल्ै । दफरो अमरेंद्र जी के आवयज ऐलै - सनु ल्हो दक नै ? हममां ं॑ कहदल्ै - सनु दल्ै । दकां तु हमरऽ महुाँ ऽ सां ं॑ आवयज के गदत कयफी धीमय पडी गेलै । दफरो आधऽ घांटय के बयि अमरेंद्र जी न ं॑ टेलीफोन करलकै दक ई सूचनय अांदगकयलोक के सांपयिक सकलिेव शमयट जी कं॑ ि ं॑ िहो । हममां ं॑ कहदल्ै दक ऐत्ती असिु घटनय

“ हमरा आस्चयथ लागै छै मक पमहलऽ भेंट मं ॑ भी हनी अंग माधुरी के प्रफ ू देखै रहै आरो हनका बारे मं ॑ अंमतम चू ना ममलै वक्त भी हनी एगो पमत्रका “प्रज्ञावाणी” के प्रफ ू देखतं ॑ नु मलयै । हमन महंदी आरो अंमगका ामहत्य जगत के कमथवीर योद्धा रहै । हनकऽ मवपुल ामहत्य रचना ई बात के गवाही देतं ॑ रहतै मक हनकऽ पूरा जीवन ामहत्य लेली ममपथत रहलै । ” के सूचनय हमरय िै मां ं॑ ियरी लैग रहलै अपनै सां ं॑ कै ह िहो । तखदन्े हममां ं॑ “न्य ियषय ियरती सांवयि ” के प्रधयन सांपयिक नपृ ेन्द्रनयथ गप्तु जी कं॑ टेलीफोन लगय् कं॑ बयत करदल्ै । हुदन बतैलकै , “हयाँ वे नहीं रहे, मयल्​्यपट ण करके आ्े हैं ।” दफर हुदन बोललै दक, “ चयर बजे एक कय्ट क्रम में जयने के दल्े चकोर जी से बयत दक्े थे , चकोर जी बोले दक वे ‘प्रज्ञयवयणी’ कय प्रूफ िेख रहे हैं - मयथय िी ियरी लग रहय है - नहीं जय पय्ेंगें, मैं चलय ग्य लौटय तो रयस्ते में करीब छः बजे उनके समधी जो हयई कोटट में वकील हैं, ने बतय्य दक चकोर जी नहीं रहे ।” वै सम् हममां ं॑ पटनय सां ं॑ करीब 230 दक.मी. िूर आपनऽ गयमऽ मां ं॑ रदह्ै । गयाँव सां ं॑ आबै के सयधन िी नै रहै दक जल्िी सां ं॑ आबी जैइ्े । हमरय इ बयत के पूरय दजांिगी िर कचोट रहतै दक हुनकऽ अांदतम िसट न के िी ियगी हममां ं॑ नै बन ं॑ पयरदल्ै । हमरय आस्च्ट लयगै छै दक पदहलऽ िेंट मां ं॑ िी हुनी अांग मयधरु ी के प्रूफ िेखै रहै आरो हुनकय बयरे मां ं॑ अांदतम सूचनय दमलै वि िी हुनी एगो पदत्रकय “प्रज्ञयवयणी” के प्रूफ िेखतां ं॑ सनु दल्ै । हुदन दहांिी आरो अांदगकय सयदहय् जगत के कमट वीर ्ोर्द्य रहै । हुनकऽ दवपल ु सयदहय् रचनय ई बयत के गवयही िेतां ं॑ रहतै दक हुनकऽ पूरय जीवन सयदहय् लेली समदपट त रहलै । ऐन्हऽ सयदहय् सयधक अांग सपूत डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी कं॑ हमरऽ कोदट - कोदट नमन । 88

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


चकोरसस्म : संस्सं मरण ॑ जदृ ुडत लऽ डॉ.- डॉ. चकोर स्मरण अंदिका प्रहरी - डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर पन्द्रह नवांबर कं॑ दिनसरे मोबयईल पर नजर पडलै त ं॑ िेखै दछ्ै दक दमसकॉल छै । आगू ब़िदल्ै त ं॑ डॉ. अमरेंद्र जी के कॉल छे कै । डॉ्ल करदल्ै । आवयज सनु दल्ै, “थोडी िेर बयि डय्ल करें ।” कुछ िेर बयि हमरऽ मोबयईल घनघनैलै । िेखै दछ्ै त ं॑ डॉ. अमरेंद्र जी तै्यर । हुन्हीं कहलकै डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ जी के दनधन हो् गेलै, कल शयम कं॑ । रामधारी दसंह ई बयत सनु थैं हममें त ं॑ दकां कतट व्दवमू़ि हो् गेदल्ै । कां ठ ‘कावयतीथष’ अवरूर्द् हो् गेलै । समहली कं॑ फे नू कहदल्ै, अांदगकय के - संपकष ं॑ ग्रयम : अरयजी करसोप , दवकयस क एगो बडऽ झटकय लगी गेलै । डॉ. अमरेंद्र जी मय्ूस छे लै । पो. : शांिगु ांज, मौत अवस्​्मियवी छै । एकरय को् नै टयल ं॑ पयर ं॑ । वू दजलय : बयाँकय दनदस्चत सम् आरो स्थयनऽ पर आबै छै । ई को् जयन ं॑ नै दपन : 813 211 दबहयर, ियरत पयडै छै । ई सोची कं॑ सयहस बटोरलांऽ । श्री हीरय प्रसयि ‘हरेंद्र’ मो. : कं॑ कहलाँऽ । श्री आर. प्रवेश जी (पटनय) सां ं॑ पछ ु लाँऽ। हुनी बतैलकै , “ हममें त ं॑ चकोर जी स ं॑ दमलै ल ं॑ गेलऽ रदह्ै, तखनी हुनी स्वस्थ छे लै आरो कुच्छू दलखै रहै । बयि मां ं॑ बयथरूम गेलै “ डॉ. नरेश पाण्डेय । कुछ तकलीफ महसूस करलकै । कुछ िेर बयि जब ं॑ ्थयवत ‘चकोर’ जी के मनधन हो् गेलै,तब ं॑ हममें वहयाँ स ं॑ आपनऽ दनवयस चल्लऽ ऐलयां । के बात नु थैं हम्में त ॑ एकयध घांटय के बयि सूचनय दमललै दक हुनकऽ दनधन हो् गेलै मकं कतथव्यमवमढ़ू होय ।” गेमलयै । कं ठ अवरूद्ध हुनकऽ मौत त ं॑ हमरयदसनी वयस्तें िःु खि होलै कै हने ॑ होय गेलै । म्हली क दक अांदगकय के एक प्रहरी िदु न्य स ं॑ दबिय हो् गेलै । मतरु फे नू कहमलयै, अंमगका िोसरऽ तरफें िेखै दछ्ै त ं॑ हुन्हीं चलतें-दफरतें, दलखतें-प़ितें, के मवका क॑ एगो बड़ऽ अांदतम सयांस तयाँ् अांदगकय आरो दहांिी के रऽ सेवय म ं॑ रत रहलै । ई झटका लगी गेलै” खस ु ी के बयत होलै । हुनी के करो अधीन नै रहलै, बेटय-पतु ोह स ं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

89


को् तरह के सेवय नै करवैलकै । ऐसनऽ दनधन अांगश्री छोटेलयल मांडल ‘कयव्तीथट ’ जी के िी होलऽ रहै । हुदन्ों चलतें-दफरतें रहलै । मौत के रयत मां ं॑ पररवयर स ं॑ ११ बजे तयाँ् गपसप करतां ं॑ रहलै । ओकरऽ बयि कुछ तकलीफ होलै आरो सिय लेली आाँख मूनी लेलकै । डॉ. चकोर जी उच्च दवद्ययल् करहरर्य मां ं॑ , जे हुनकऽ पैतक ृ गयाँव िेवधय स ं॑ तीन दकलोमीटर िूर छै , प़िै छे लै आरो हममू िी । हुनी हमरय स ं॑ एक वगट आगू छे लै । प़िै मां ं॑ हुदन्ों तेज छे लै । ्ै लेली दवद्ययल् के प्रख्​्यत दसिक श्री गांगय प्रसयि दसांह जी आरो नयमी प्रधयनयध्​्यपक श्री शयरिय प्रसयि दसांह जी चकोर जी कं॑ बड् डी मयनै रहै । िोन्ह के “ मवद्यालय मं ॑ रस्वती पूजा के रऽ अव र पर नाटक के आयोजन होय रहै । जै मं ॑ नरेश जी नारी पात्र के पाटथ अदा करै छेलै । पदक पाबै रहै । यही रंगमंचीय प्रद थन के चलतें हनी नाटककार भी होलै आरो पमहलऽ अंमगका नाटक “मक ान क॑ जगाबऽ” मलखलकै । जेना मथयेटर मं ॑ दरबानी करतं ॑ - करतं ॑ शेक् पीयर एगो महान नाटककार बनी गेलऽ रहै । ” कृपय दृदस्ट स ं॑ चकोर जी जीवन मां ं॑ प्रगदत करतें रहलय । श्री गांगय बयबू स ं॑ चकोर जी कदवतय, कहयनी, नयटक आरो दनबांध दलखैल ं॑ दसखने रहै जबदक हुनी दहांिी के दसिक नै रहै । घरऽ के आदथट क हयलत ठीक नै रहलय के कयरन दबनय जूतय - चप्पल आरो छयतय के ही गरमी आरो बरसयत मां ं॑ स्कूल आबै-जयबै छे लै । हयफपैंट, अधबैं्य अांगय मोटऽ आरू मजबूत कपडय जे जल्िी फट ं॑ नै, पहनै छे लै । ्ह ं॑ हयल हमरो रहै । हुनी ट् ्ूटर स ं॑ प़िन ं॑ दबनय वगट मां ं॑ अच्छय स्थयन प्रयप्त करै छे लै, जे आसयन बयत नै रहै । दवद्ययल् मां ं॑ सरस्वती पूजय के रऽ अवसर पर नयटक के आ्ोजन हो् रहै । जै मां ं॑ नरेशजी नयरी पयत्र के पयटट अिय करै छे लै । पिक पयबै रहै । ्ही रांगमांची् प्रिसट न के चलतें हुनी नयटककयर िी होलै आरो पदहलऽ अांदगकय नयटक “दकसयन कं॑ जगयबऽ” दलखलकै । जेनय दथ्ेटर मां ं॑ िरबयनी करतां ं॑ - करतां ं॑ शेक्सपी्र एगो महयन नयटककयर बनी गेलऽ रहै । हमरय स ं॑ चकोर जी के रऽ जयन-पहचयन १९५२ ई. स ं॑ ही छे लै, जे करहरर्य स्कूल स ं॑ दनकललय के बयि धूदमल हो् गेलऽ रहै । सेवय दनवदृ त्त के बयि जब ं॑ हममें अांदगकय मां ं॑ दलखनय शरू ु करदल्ै तब ं॑ फे नु पररच् गहरय् गेलै । तखनी स ं॑ त ं॑ आ् तयां् 90

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


दनकटतम सांबधां रहलै । “जयह्नवी अांदगकय सांस्कृदत सांस्थयन” पटनय स ं॑ हमरय तीन जनवरी िू हजयर आठ कं॑ “गोपीनयथ दतवयरी स्मदृ त सममयन”, अांग वस्त्र आरो एक हजयर रूप्य ि ं॑ कं॑ सममयदनत करने छे लै । अांग मयधरु ी के हममें आजीवन सिस्​् िी दछ्ै । हमरऽ कै दकतयबऽ के समीिय िी हुनी करन ं॑ छै । हममां ं॑ िी हुनकऽ “बहुआ्यमी सयधक- डॉ. चकोर”, अदिनांिन ग्रांथ मां ं॑ आरो “सयदहय् मनीषी - डॉ. चकोर” पस्ु तक मां ं॑ आपनऽ लेख िेन ं॑ ररहै जे प्रकयदशत होलऽ छै । एक दजलय ( परु नकय ियगलपरु ) के दनवयसी आरू एक्के स्कूली के दवद्ययथी के नयते, सयथें

-सयथ एक जैसनऽ पयररवयररक आरो आदथट क दस्थदत के समयनतय के चलतें िी एक िोसरय सां ं॑ सदन्नकट हो् गेलऽ छे दल्ै । हुनी दमलनसयररतय, अपनयव आरो आयमी्तय के आिूसन स ं॑ आिूदसत छे लै । इक्कीस जनवरी िू हजयर सयत कं॑ हममां ं॑ हुनकय दनवयस स्थयन गयाँधीनगर, पटनय गेलऽ छे दल्ै आपनऽ कुछ दकतयब िेंट करै ल ं॑ । बयि मां ं॑ सल ु तयनगांज के डॉ. रयजेंद्र मोिी जी िी पहुचाँ लै । चकोर जी बड् डी खस ु होलै आरो कदव गोस्ठी के आ्ोजन करलकै । ई हुनकऽ “ हनी ममलन ाररता, अपनत्व आरो आत्मीयता के आभू न ॑ आभूम त छेलै । इक्की जनवरी दू हजार ात क॑ हम्मं ॑ हनका मनवा स्थान गा​ाँधीनगर, पटना गेलऽ छेमलयै आपनऽ कुछ मकताब भेंट करै ल ॑ । बाद मं ॑ ल ु तानगंज के डॉ. राजेंर मोदी जी भी पहचाँ लै । चकोर जी बड् डी खु होलै आरो कमव गोस्ठी के आयोजन करलकै । ई हनकऽ आत्मीयता आरो उदारता के उदाहरन छेकै । ” आयमी्तय आरो उियरतय के उियहरन छे कै । डॉ. चकोर के जीवन सांघसट म् छे लै । सयरस्वत सयदहय् के प्रदत दनस्ठय ियव छे लै । अध्​्​्नसीलतय, दवनम्रतय आरो कमट ठतय के प्रदतमूदतट छे लै डॉ. चकोर । सांपयिन-कलय मां ं॑ प्रवीन छे लै । ‘प्रज्ञयवयणी’ दहांिी त्रैमयदसक पदत्रकय के सांपयिक, ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’ त्रैमयदसक दहांिी पदत्रकय के सह-सांपयिक, “प्रणयमयांजने्” दहांिी मयदसक पदत्रकय के सांपयिक, ‘अांग मयधरु ी’ अांदगकय ियसय के रऽ मयदसक पदत्रकय के सांपयिक , ‘अांदगकयलोक’ के परयमसट -पररसि के सिस्​् मयृ ्पु ्ांत रहलै । ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’ के प्रधयन सांपयिक श्री नपृ ेंद्र नयथ गप्तु जी के सब्ि अांदकत करै के लोि सांवरन नै कर ं॑ पयरै छी । दहनी दलखन ं॑ छऽथ - “चकोर जी एक मौन सयधक के रूप में अथयट ियव से आक्रयांत रहते हुए िी पूणट दनष्ठय के सयथ रयष्ट्रियषय दहांिी एवां अांदगकय की सेवय कर रहे हैं ” ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

91


डॉ. चकोर स ं॑ सांबदां धत कुछ दहांिी तयांकय प्रस्ततु छै ; अांग मयधरु ी चकोर - पहचयन जयने जहयन । सतत् सांपयिन करूाँ अदिनांिन ।

चयाँि - चकोर तो सयदहय् -चकोर सयदहय्नरु यगी । जैसे मेघ से मोर वैसे सयदहय्-चकोर ।

बहुआ्यमी चकोर कय व्दियव व्ि कृदतयव । अध्​्​्नशीलतय दवनम्र - कमट ठतय ।

न कपट - बैर समयन समयिर दमलनसयर । कदव-गोष्ठी खबर चकोर जी नजर ।

सयदहय् - ्यत्रय िीघट , प्रवयहम्ी हषट , दवषयि । लेखन, सांपयिन सहृु ि दवद्वतजन ।

बयबय चकोर अथक पररश्रमी महयन इांसयन । दवचयरक लोके श अदत कृपय गणेश ।

अांग - सपूत दहांिी अांदगकय सेतु िेवधय-सतु । स्व. नरेश पयण्डे् अांगियषी श्रर्द्े् । अांत मां ं॑ अांदगकय आरो दहांिी के कदव,उपन्​्यसकयर,नयटककयर,अनवु यिक आरो समीिक डॉ.नरेश पयण्डे् चकोर के दिवांगत आयमय कं॑ दचरसयदन्त दमल ं॑ ्ह ं॑ परमदपतय परमययमय स ं॑ हमरऽ प्रयथट नय छै । ्ही सब्िऽ सयथें श्रर्द्यांजदल स्वरूप हुनकय श्रर्द्यियवसमु न अदपट त करै छी । 92

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डडॉ. चकोर स्मदृ त : डडॉ. चकोर के रऽ अंदतम प्रफ ू रीदडंि सम्पािक रत्न, डॉ. चकोर ‘तुलसी के राम—राम के तुलसी’ आलेख के रऽ प्रूफ सुधार करतेंकरतें अनंत लोक िन्नें प्रस्थान करी िेलऽ िे लै । नीचें िेलऽ िेलऽ फोिो में प्रूफ के साथ-साथ वू कलम भी िै जेकरा सें हुनी दलखी रहलऽ िे लै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

93


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

अंदिका के तुलसी : चकोर अंदगकय - सयदहय् सांसयर मां ं॑ ‘चकोर’ आपनऽ तपस्​्य के

आमोि कुमार दमश्र - संपकष कुलिीतकार, दत.भा.दवश्वदवद्यालय, मनोरमा दनकुंज, संतनिर, हनुमानघाि पथ,बरारी, भािलपुर, दबहार

“ अंगमाधुरी क॑ रची - रची जाबै में ामहत्यमषथ ’चकोर’ के कमठन ाधना फलवती - बलवती होली छै । कत्ते नी झोंकऽ झपाटऽ ऐलै, मगर धन्द्न छै है ‘अंग माधुरी’ अखम्मर होय क॑ जीवन के गीतकथा बा​ाँची रहली छै । ”

94

बलऽ पर तल ु सी के स्थयन पर प्रदतस्थयदपत छथ, जैम ं॑ सयदहय् के सगु धां छै , िदि के मकरांि छै आरो रयष्ट्री्तय के तरांग छै । ्ह ं॑ तीनों ियवऽ के दत्रवेनी सें पटैलऽ ‘चकोर’ के सयदहय् मह - मह करी रहलऽ छै । हुनकऽ मयृ ्ञ्ु ज्ी कृदतदसनी हुनकय दचरकयल प्रयनवांत रखतै । ह् तल ु सी गयाँव घरऽ के मदट्यहय ऐ ांगनय में दनपलऽ-पोतलऽ तल ु सीचौरय पर जनमलऽ तल ु सी दछकै , जेकरऽ पदवत्तर िल लहलहय् रहलऽ छै , मांजर छहरय् रहलऽ छै आरो सयदहय् सांसयरऽ में गौछी के गौछी तल ु सी दवरवय उगी-उगी कं॑ अांदगकय सयदहय् के डहर सजय्-गमकय् रहलऽ छै । ्ह ं॑ दछकै अांग के मधरु छदव— ‘अांगमयधरु ी’ ! एकरय रची-रची कं॑ सजयबै म ं॑ सयदहय्दसट ’चकोर’ के सिु ीघट कदठन सयधनय फलवती-बलवती होली छै । कत्त ं॑ दन झोंकऽ-झपयटऽ ऐलै, मगर धन्न छै ह् ‘अांग मयधरु ी’ अखममर हो् कं॑ जीवन के गीत-कथय बयाँची रहली छै , सयदहय्रसऽ मां ं॑ नयची रहली छै । ्ै नयचऽ सयथां ं॑ मय् के लोरी के िल ु यर, गीतऽ के झमु यर, प्रेमऽ के ब्यर, िेशऽ के दसांगयर, सथु रऽ दवचयर सयथां ं॑ अांदगकय के गांज ु यर जनगन के प्रयन हुलसय् रहली छै । अांगतपसी ’चकोर’ के सयदहय्-श्रर्द्य के जऽड गयमऽ के मयटी मां ं॑ बड् डी जब्बड हो्कं॑ गाँथलऽ छै । ह् गयाँव दछकै अांगमहयजनपि के रयजधयनी ियगलपरु के िेवधय गयाँव । जेकरऽ नयम त ं॑ िेवधयमऽ रांग लयग् छै मगर िल ु यरऽ स ं॑ जेनय कन्है्य कं॑ ’कयनू’ कही िै छै वह ं॑ रांग सयइत िेवधयमऽ कं॑ िेवधय कहलऽ जय् छै । ्यहीं िदिन मय् श्रीमती प्रजय िेवी के कोखी स ं॑ 3 जनवरी 1938 कं॑ ’चकोर’ के जनम होलै । मय् के अांचरय तर अमररत पयन, लोरीगयन, झपकीथपकी सयथां ं॑ ‘लोरबोर ननु ु जय् सयठी मय् कोर’ के कयजर सां ं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


बतु रू ‘चकोर’ के आाँख खल ु लै । घऽर ऐ ांगनय मां ं॑ घस ु क ु तां ं॑ - टुसक ु तां ं॑ अपनऽ नयन्हऽ-नयन्हऽ गोडऽ सां ं॑ पै्याँ पयर ं॑ लगलै आरो अपनऽ रयमि​ि दपतय पन्ु ्स्लोक पांदडत चन्द्रमोहन पयण्डे् जी के औ ांगरी धरी ठुमक ु तां-ं॑ उमकतां ं॑ सम् के प्रवयह सयथें उछलतां-ं॑ कूितां ं॑ हुनखै सयथां ं॑ पूजयथयनऽ मां ं॑ आलथी-पयलथी पयरीकं॑ बैठ ं॑ लयगलै । पांदडतजी ‘चन्िनां वन्ि्ते दनय्ां’ मन्तर प़िी कं॑ बयलक चकोरऽ के दललयरऽ प ं॑ जे टीकय लगैलकयथ दक वह ं॑ टीकय अपनऽ दपतयजी के आदसरबयि समझी कं॑ ‘चकोर’ जी अपनऽ दललयरऽ प ं॑ साँवयरी-बघयरी कं॑ अपनऽ महयप्र्यन तक रखलकयथ । आ् िी हुनकऽ स्मरनमयत्र सां ं॑ हुनकऽ जे छदव मऽन मदस्तस्क मां ं॑ उिरै छै वै पदवत्र छदव मां ं॑ हुनकऽ दललयरऽ परकऽ वैस्नवी टीकय के दिव्तय मनऽ कं॑ श्रर्द्य आरो आिर के ियवऽ सां ं॑ िरी िै छै । मय् के औ ांगरी सां ं॑ लगैलऽ अांदगकय के ‘लोरबोर’ कयजर आरो बयबू के हयथऽ सें दललयरऽ प ं॑ लगैलऽ अांगरयग चांिन सां ं॑ ‘चकोर’ के पूत व्दियव के दनमयट न होलै । बतु रू ‘चकोर’ घरहै मां ं॑ अपनऽ पांदडत दपतय के मांत्रोच्चयरन सां ं॑ खल्ली छुअलकयथ, ललयटऽ प ं॑ खल्ली के िसम लगैलकयथ रो वयाँही सां ं॑ हुनकऽ ‘ओनयमयसीधां’ (ॐ नमः दसर्द्म्) सरू ु होल्हैं । मय्-बयबूाँ आरो घरऽ के जेठऽ सिस्​्दसनी बड् डी हुल्लयसऽ सां ं॑ दहनकऽ नयम रखलकयथ ‘नरेश’ । जब ं॑ दहनी सयदहय्यनांि मां ं॑ मगन होलयथ तब ं॑ नरेश पयण्डे् सयथ ं॑ ‘चकोर’ जोडी िेलकयथ जेनय ‘सयदहय्दशव’ के मस्तक पर सोदित ‘चांद्रमोहन’ (दपतय) सयदहय् रहऽथ आरो दहनी सयदहय्-पूजक सयधक ‘चकोर’ रहऽथ । दहनकऽ ह् सांकल्प चररतयथट िी होल्हैं । तरूण अवस्थय के चांचल ‘चकोर’ गयमऽ घरऽ के जग्ग-जयजन, छट्ठी-दछल्लय, मडु नय, जनौआ,

“ पंमडतजी मन्द्तर पढ़ी क॑ बालक चकोरऽ के मललारऽ प॑ जे टीका लगैलकाथ मक वह ॑ टीका अपनऽ मपताजी के आम रबाद मझी क॑ ‘चकोर’ जी अपनऽ मललारऽ प॑ वाँ ारी -बघारी क॑ अपनऽ महाप्रयान तक रखलकाथ । आय भी हनकऽ स्मरनमात्र ं ॑ हनकऽ जे छमव मऽन ममस्तस्क मं ॑ उभरै छै वै पमवत्र छमव मं ॑ हनकऽ मललारऽ परकऽ वैस्नवी टीका के मदव्यता मनऽ क॑ श्रद्धा आरो आदर के भावऽ ं ॑ भरी दै छै ।” दबहय-सयिी, दजदत्य-सक ु रदत्य, दबसआ ु -दसरूआ, िगु यट -कयली, धजय-पतयकय, मेलय-ठेलय आरन्ही म ं॑ मगन त ं॑ हुहै लयगलयथ, बऽर-बदगच्चय, िोल-िोदलच्चय, खेत-खांियर, जोत-जाँतसयर, कोल्हसयर-कनसयर, नद्दी-कछयर, रोपऽ-डोिऽ, झमु टय-खेमटय आरन्हीं सब हुनकऽ मऽन-प्रयन मां ं॑ रसी-बसी गेल्हैं । तदह्य िेसऽ के आजयिी के झमु यर सें सौसें िेस गनगनय् रहलऽ छे लै । िेस आजयि त ं॑ होलै, मतरु जे आसय आरो उमांगऽ स ं॑ ियरतवयसी दसनी आजयिी के आदगन मां ं॑ अपनय कं॑ झोंकी िेलकै , हौ आस नै परु लै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

95


लांबधोदत्य, टोदप्यहयदसनी ऊाँच्चऽ-उाँच्चऽ दसांहयसन पर बैठी कं॑ चकरचयल चल ं॑ लयगलै आरो गररब्बयदसनी गडांु ऽ-सत्तू के जोगयडऽ मां ं॑ घयम बहैथैं रहलै । मोह त ं॑ िांग हो् गेलै जरूर मतर आइ्ो हमरयदसनी अपनऽ य्यग, तपस्​्य, बदलियनऽ सें पैलऽ अपनऽ स्वतांत्र ियरत मय् कं॑ पूजै दछ्ै आरो गौरव सें मयथऽ उठय् कं॑ जी्ै दछ्ै । सरु यज पयवै दिनय ‘चकोर’ नौ सयलऽ के बतु रू छे लयथ । गयमऽ के इसकूली में बोरर्य पर बैठी कं॑ दतसरी तलक प़िलकयथ आरो गयमऽ स ं॑ सयत-आठ बदह्यर पयर करी कं॑ करहरर्य गयमऽ के दमदडल स्कूली सें सतमय आरो वहयाँकरे उच्च दवद्ययल् सें अच्छय अांकऽ सें मैदरक पयस करलकयथ । फे रू आइ.ए. में नयाँव दलखय् कं॑ आइ.ए. के परीिय िेलकयथ । परीिय सें फुसट त पैल ं॑ छे लयथ दक दहनकऽ दबहय-सयिी के सूर-सयर हुए लयगलऽ । चकोर जी खूब नयकुरनक ु ु र करलकयथ, मगर दहनकऽ कुछ नैं चलल्हैं । सां्ोग ्ह ं॑ होलै दक सथु रऽ, सन्ु िर कन्​्यां द्रौपिी दिव्यांशु जी दहनकऽ सहधदमट नी बनी गेदलथ । द्रौपिी जी स ं॑ जीवन-सांघसट में दहनकय

“ मगर हनकऽ बुकऽ में अपनऽ मातृभा ा अंमगका आरो अंग जनपद के व्यथा-कथा, हा -मवला , खेत-खररहान, मगरहस्त-मक ान, ो नउत्पीड़न, गीत-नाद, भजन-कीतथन ब जोर मारथै रहय छेल्हैं । हरदम यह ॑ मन ुआ में रहऽथ मक के ना अपनऽ मनऽ म ॑ उमड़तं-॑ घुमड़तं ॑ हय भाव म नी क॑ परगट करौं । या​ाँहीं ें ुरू होलै ‘चकोर’ के ामहत्य-यात्रा । ” बड् डी बऽल दमलल्हैं । अपनऽ लि पयबै लेली दहनी जीवट हो्कं॑ सांघसट रत रहलयत । ्वु क ‘चकोर’ हयर मयनै वयलय कहयाँ छे लयत । छोटऽ-मोटऽ नौकरी, ट् ्ूसन आरन्हीं करी कं॑ बी.ए. ऑनसट के बयि एम.ए. (सयांदख्​्की) करलकयत । मेहनत बेरथ नैं जय् छै । १९६१ ई. म ं॑ ियरत सरकयर के ‘नेशनल सैंपल ु सवे’ दवियगऽ में नौकरी लयगल्हैं । आधयर दमली गेल्है । मगर हुनकऽ बक ु ऽ में अपनऽ मयतिृ यसय अांदगकय आरो अांग जनपि के व्थय-कथय, हयस-दवलयस, खेतखररहयन, दगरहस्त-दकसयन, सोसन-उयपीडन, गीत-नयि, िजन-कीतट न सब जोर मयरथै रह् छे ल्हैं । हरिम ्ह ं॑ मनसआ ु में रहऽथ दक के नय अपनऽ मनऽ म ं॑ उमडतां-ं॑ घमु डतां ं॑ ह् ियव दसनी कं॑ परगट करौं । ्याँहीं सें सरू ु होलै ‘चकोर’ के सयदहय्-्यत्रय । ्ै ्यत्रय में हुनकय लेली तीरथ बनी गेलयथ ख्​्यत सयदहय्कयर रयजय रयदधकयरमण प्रसयि दसांह, डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांश,ु श्री गियधर प्रसयि अमबष्ट, स्वतांत्रतय सेनयनी महदषट चनु चनु पयण्डे् जी के पत्रु डॉ.परमयनांि पयण्डे्, श्री जगिीश दमश्र रांग के कत्तदं॑ न सयदहय्दनस्ठ तपस्वीदसनी । दहनकय दसनी के हेमछे म सां ं॑ दहनकऽ ियवनय आरो सांकल्प कं॑ बऽल दमल्लहैं 96

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


आरो दहनी अपनऽ पैहलऽ अरग िेलकयथ ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ एकयांकी दकतयब दलखी कं॑ ।

एकरऽ बड् डी बडय् होलै । दहनी दकसयन कं॑ जगैलकयथ ओकरे फऽल होलै दक १९६३ ई. मां ं॑ दहनकऽ दन्दु ि, दबहयर रयज्​् खयिी ग्रयमोद्योग बोडट में सयांदख्​्की पियदधकयरी के पिऽ पर हो् गेल्हैं । लयगले दहनी ‘सवोि् समयज’ अांदगकय एकयांकी रची िेलकयथ । अपनऽ गयाँव-घरऽ के ियसय अांदगकय में दलखलऽ ह् नयटक िोनो के पठन आरू मांचन सें लोगऽ के रूदच जगलै । लौदकक जनम सां ं॑ िी कत्तदं॑ न परु यनऽ अांदगकय लोकियसय के उन्नय्क परु नकय ऋदस सयदहय्कयर आरो चकोर के जेठऽ सयदहय्कयरदसनीं चकोर रांग के अांदगकय सेवी कं॑ पयवी कं॑ एतने नी गिगि होलै जेकरऽ को् ठेकयनऽ नै छे लै । परु नकय सयदहय्कयर दसनी िल्हैं चकोर कं॑ प्रय्ि नैं िेखल ं॑ रह ं॑ मगर चकोर हुनकयदसनी कं॑ खोजी-खोजी कं॑ उजयगर करलकयथ । चकोर के सम् के हुनकऽ जेठऽ सयदहय्कयर दसनी त ं॑ चकोर कं॑ एतने दन उयसयह िेलकै दक चकोर एकिम सें सरु य् गेलयथ । ्ै सरु ऽ मां ं॑ रयष्ट्रियसय दहांिी कं॑ दबसरय् िेलकथ, से बयत नैं । दहनी दहांिी मां ं॑ िी समयनयन्तर रचनय -दववेचनय करथैं रहलयथ । एकटय सयाँचऽ बयत मयन्है ल ं॑ पडै छै दक जेतनय टय प्रबर्द् ु अांदगकय रचनयकयर छऽथ हुनकय दसनी दहांिी के सेवय में पयछू नै छऽथ । कहलऽ जय् दक ई हमरऽ दहदन्ि्े दछकै जौन ं॑ अपनऽ पूवटज अांदगकय कं॑ खोजी-खयजी कं॑ उपर करलकै । चकोर जी ्ै म ं॑ पयछू नै छऽथ । अांदगकय आरो दहन्िी दहनकय कहयाँ-कहयाँ नै पहुचाँ य् िेलकै “ परु नका ामहत्यकार म नी भल्हैं चकोर क॑ प्रत्यि नैं देखल ॑ रह ॑ मगर चकोर हनकाम नी क॑ खोजी-खोजी क॑ उजागर करलकाथ । चकोर के मय के हनकऽ जेठऽ ामहत्यकार म नी त ॑ चकोर क॑ एतने मन उत् ाह देलकै मक चकोर एकदम ें रु ाय गेलाथ । यै रु ऽ मं ॑ राष्ट्रभा ा महंदी क॑ मब राय देलकथ, े बात नैं । महनी महंदी मं ॑ भी मानान्द्तर रचना -मववेचना करथैं रहलाथ ।” । सांस्कृत, मगही, िोजपरु ी, बदज्जकय आरन्ही के सयदहदय्क आ्ोजन मां ं॑ सयदहय् सेवी चकोर के परु जोर चचयट हुअ ं॑ लयगलै । ्ै सयदहय् ्यत्रय मां ं॑ हुनकऽ ईस्वर िदि कखनू कम नै होलै । जेनय सूर, तल ु सी, कबीर, मीरय आरन्ही के िदि कं॑ हुनकऽ सयदहय् सां ं॑ फरक करनय कदठन छै होन्हैं चकोर के िदि आरो सयदहय् सजट नय म ं॑ कोन टय पल्लय बेसी ियरी छै ह् िेखनय, ‘को बड-छोट कहl अपरयध’ हो् जैतै । दहनकऽ ह् जब्बड रचनयधदमट तय स ं॑ दवियगी् कय्ट बयदधत होलै, सेहो नैं कह ं॑ सकै छी । दवियग्हौ मां ं॑ दहनकय सममयन दमलथैं रहल्हैं । अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६) 97


खैर, जे हुअ,ं॑ दहनी अांदगकय के परु नकय िांडयर खोजै मां ं॑ आपनऽ जी जयन लगय् िेलकयथ । अांदगकय के लोकगयथय, लोककथय, लोकगीत, सांस्कयर गीत, िदिगीत, फै कडय, लोरी, जाँतसयर, लोकनयटक, लोकनयच, गीदतनयट् ्, आरन्ही खोजै मां ं॑ गयाँव-घऽर, खेतखररहयन,गल्ली-कुच्ची,गोचर तयां् धयांगी मयरलकयत । िैसवयर, धोर्, नवेरर्य, गडीवयन, घोडवयन, हरवयहयदसनी कं॑ अपनऽ सांघदत्य बनैलकयथ । कत्तेदन लोकिेवतय दसनी के दपांडी पर मयथऽ पटकलकयथ, लोकगय्क दसनी के सयथें गल्लऽ दमलैलकयथ आरो अनदगनत अांदगकय के सच्ु चऽ धरोहर दसनी कं॑ सयदहय्-जगत में स्थयदपत करलकयथ । वै सम् मां ं॑ अांदगकय के वतट नी, छयपयखयनय मां ं॑ दमलनय बड् डी कदठन छे लै । चकोर जी अपनऽ आवयस बोररांग रोड,गयाँधीनगर,पटनय मां ं॑ ‘शेखर प्रकयशन’ नयम सां ं॑ आपनऽ प्रकयसन सरू ु करलकै । ्ही प्रकयसन सें अांदगकय के दकतयब दसनी प्रकयदसत हुअ ं॑ लयगलै । आ् िल्हैं अांदगकय के परवती सयदहय्कयर दसनी अपनऽ परु नकय सयदहय्कयरदसनी के हौ पहलकऽ कदठन श्रम कं॑ िूली कं॑ अांदगकय के मूल वतट नी कं॑ महयव नै ि ं॑ करी कं॑ अपनऽ-अपनऽ वतट नी बनय् कं॑ अांदगकय वतट नी के एकरूपतय मां ं॑ ियगठांऽ लगय् रहलऽ छऽथ । मगर सच बयत त ं॑ ई दछकै दक अदधकयांस सयदहय्कयर दसनी “ आय भल्हैं अंमगका के परवती ामहत्यकार म नी अपनऽ पुरनका ामहत्यकारम नी के हौ पहलकऽ कमठन श्रम क॑ भूली क॑ अंमगका के मल ू वतथनी क॑ महत्व नै द ॑ करी क॑ अपनऽ-अपनऽ वतथनी बनाय क॑ अंमगका वतथनी के एकरूपता मं ॑ भागठंऽ लगाय रहलऽ छऽथ । मगर च बात त ॑ ई मछकै मक अमधकां ामहत्यकार म नी यह ॑ मल ू वतथनी मं ॑ चकोर जी के माध्यम ं ॑ छपी चक ु लऽ छऽथ । ” ्ह ं॑ मूल वतट नी मां ं॑ चकोर जी के मयध्​्म सां ं॑ छपी चक ु लऽ छऽथ । अांदगकय के हौ मूल वतट दनय्है के प्रियव दछकै दक अांदगकय के पयदणनी कहयबै वयलय डॉ. परमयनन्ि पयांडे् जी के पदहलऽ सोधग्रांथ , ‘अांदगकय कय ियषय वैज्ञयदनक अध्​्​्न’ पर ियगलपरु दविदवद्ययल् द्वयरय डी.दलट. के उपयदध प्रियन करलऽ गेलऽ छै । चकोर जी वह ं॑ खेमय के सयदहय्कयर आरो सांपयिक छे लयथ । चकोर जी कं॑ अपनऽ जेठऽ अांदगकय सयदहय्कयर दसनी सां ं॑ बड् डी बऽल दमलल्हैं । 98

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


चकोर जी आपनऽ जेठऽ अांदगकय सयदहय्कयर दसनी के शरू ु करलऽ अांदगकय डहर कं॑ चमकयबै-गमकयबै में लयगी गेलयथ । आरो जहयाँ जैहनऽ मौकय दमलल्हैं अपनऽ जेठऽ सयदहय्कयर दसनी सां ं॑ सह्ोग लेलकयथ । तखनकऽ जत्त ं॑ अांदगकय दलक्खयड सयदहय्कयर दसनी छे लयथ हुनकऽ दलखलऽ कथय-कहयनी, कदवतय, गीत, िजन आरन्हीं के सांपयिन करी कं॑ प्रकयदशत करलकयथ । वेि, परु यण, उपदनषि,् महयियरत, रयमय्ण आरन्हीं औटी मयरलकयथ आरो ऊ सम् तक जत्त ं॑ नवकय, परु नकय अांदगकय सयदहय्कयर छे लै, सब को् दमली कं॑ अांदगकय के सांखनयि करी िेलकै । अांदगकय एकिम सां ं॑ झलफलय् उठलै । ्ही सूरऽ में १९७० ई. में ‘अांग मयधरु ी’ पदत्रकय के श्रीगनेस करी कं॑ एकरऽ सांपयिन कर ं॑ लयगलयथ । अांदगकय सयदहय्कयर दसनी दकदसम-दकदसम के रचनय सां ं॑ अांगमयधरु ी कं॑ धनगरऽ कर ं॑ लयगलै । जे दवद्वयनदसनी तदह्य अांदगकय आरो अांदगकय सयदहय्कयर दसनी कं॑ िेखी-सनु ी कं॑ अांदगकय के प्रदत उपेिय के ियव सां ं॑ हाँस्सै छे लै , वह ं॑ दवद्वयन दसनी चकोर जी के मयध्​्म सां ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ मां ं॑ छपी कं॑ अपनय कं॑ अांदगकय के “ ‘शेखर प्रकाशन’ ं ॑ अंमगका के नवका-पुरनका ामहत्यकारम नी के मवमवध मवधा पर अन भ ं ार रचना छपलै आरो अभी ता​ाँय छमपये रहलऽ छै । हमरा मवस्वा छै मक चकोर जी के बुनलऽ हय तुल ी के चा अखम्र होय क॑ लहलहैतें रहतै , कमहयो ख ु ाड़ नै होतै । ”

मसीहय समझी रहलऽ छै । ह् दछकै चकोर आरो अांगमयधरु ी के प्रियव जे लगयतयर दछ्यलीस सयलऽ सें छपी रहलऽ छै आरो नै खयली अांदगकय बलक ु िोसरऽ ियसय ियसी दसनी सां ं॑ आिर सममयन पयबी रहलऽ छै । ‘शेखर प्रकयशन’ सां ं॑ अांदगकय के नवकय-परु नकय सयदहय्कयरदसनी के दवदवध दवधय पर अनसांियर रचनय छपलै आरो अिी तयाँ् छदप्े रहलऽ छै । हमरय दवस्वयस छै दक चकोर जी के बनु लऽ ह् तल ु सी के चयस अखमम्र हो् कं॑ लहलहैतें रहतै , कदह्ो सख ु यड नै होतै । ‘अांग मयधरु ी’ एक टय ‘अांदगकय पथ दनिेदशकय’ हो् गेलै । ्ै मां ं॑ प्रकयदसत रचनयदसनी मां ं॑ िेसऽ के समसयमद्क दस्थदत , रयजनीदतक, सयमयदजक, सैदिक दस्थदत सयथां ं॑ सोसन, उयपीडन, असमयनतय, सरकयरी दसदथलतय,नयरी चेतनय,दववसतय, िोहरय चररत्र,धमट , आचयर-दवचयर,प्रेम,श्रगांृ यर, रयस्री्तय आरन्ही के ियव एतने दन प्रियवी रूपऽ सां ं॑ जगलऽ रह् छै दक िदु न्य के को् िी सयदहय् सां ं॑ पयछू नै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

99


चकोर के कलम अांदगकय सयदहय् के गौरव बखयनै में, एकरऽ अांग-अांग के सौन्ि्ट दनखयरै में को् कोर-कसर नै छोडलकै । चयहे अांदगकय ियषय के इदतहयस रह,ं॑ चयहे एकरऽ व्यकरण, रस, छां ि, अलांकयर रह,ं॑ एकरऽ सोन्हडपन रह,ं॑ एकरऽ गीत नयि रह,ं॑ एकरऽ सांपयिन कलय रह,ं॑ एकरऽ फै कडय लोरी रह,ं॑ एकरऽ परब य्ोहयर रह,ं॑ एकरऽ लोकतयदयवक महयव रह ं॑ सबकं॑ उजयगर करी िेलकयथ । दवदवध दवधय मां ं॑ रचलऽ हुनकऽ रचनय दसनी के उल्लेख करै मां ं॑ पन्नय के पन्नय रांगी िेलऽ जयब ं॑ पयर ं॑ । अांदगकय के ियदसक िमतय के िरसन चकोर जी के अनवु यि दवधय मां ं॑ िी हो् छै । एतनय करल्हौ पर अहांकयर हुनकय छूव ं॑ नै पयरलकै । अपनऽ गरू ु िोली बयबय रांग सहज-सरल ‘नयम जपतां ं॑ चलऽ कयम करतां ं॑ चलऽ’ बस । अठहत्तर बरसऽ के उमरी मां ं॑ िी हुनी थकै वयलय नै छे लयथ । चयहे मकरसाँकरयती के बौंसी - मांियर मेलय रह ं॑ दक स्वतांत्रतय दिवस पर गोड् डय के मेलय रह,ं॑ ियरत िरी मां ं॑ कयांही सां ं॑ िदि अनस्ु ठयन ्य सयदहय् अनस्ु ठयन मां ं॑ सममदलत हुऐ के नेतऽ रहै, चकोर जी अांदगकय पस्ु तक सयथां ं॑ दहांिी के दकतयबऽ के गठरी ल ं॑ कं॑ तै्यर रहै छे लयथ । चयहे टेबल ु , कुसी, स्टॉल दमल ं॑ दक नै दमल ं॑ ‘अांदगकय पस्ु तक प्रिसट नी’ लगय् कं॑ िइु य्हैं मां ं॑ बैठलऽ छऽथ । अांदगकय लेली हुनकऽ जैहनऽ बेजोड समपट न छे लै, िदि म ं॑ वै सां ं॑ कम नैं । रयमदववयह आ्ोजन मां ं॑ रयमिदि रसऽ में दहनी नहयब ं॑ लयगै छे लयथ । दमदथलय के डोदमन के रूप धरी कं॑ नयच ं॑ लयगै छे लयथ । धन्न “ अंगिका लेली हुनकऽ जैहनऽ बेजोड़ समर्प न छे लै, भगि म ॑ वै सं ॑ कम नैं । रामगववाह आयोजन मं ॑ रामभगि रसऽ में गहनी नहाब ॑ लािै छे लाथ । गमगथला के डोगमन के रूर् धरी क॑ नाच ॑ लािै छे लाथ । ” छे लयथ चकोर जी । सयदहय्कयर दसनी कं॑ खोजी-खोजी कं॑ हुनी दमलै छे लयथ । हुनकय सां ं॑ जाँऽ को् एक बेर दमली लै छे लै त ं॑ सिय् लेली हुनकऽ हो् जय् छे लैं । एक दिन िोररर्े हमरऽ िआ ु री पर के घांटी बजी उठलै—श्री रयम ज् रयम ज् ज् रयम । हममें जेन्हैं फयटक खोलदल्ै दक चकोर जी कं॑ िेखी कं॑ मऽन गिगि हो् गेलऽ । खयिी के धोती, कुतयट , बांडी, बांिरमूहय टोपी, दललयरऽ पर वैष्ट्णवी टीकय-जेनय तल ु सीियस िआ ु री पर आबी कं॑ खयडऽ छऽथ । 100

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


हमम ं॑ गोर ं॑ लयगदलय्हैं, - “ह् जयडय म ं॑ एतनय िोरे ? िरसन पयबी कं॑ धन्न हो् गेलयां ।” “रयमदववयह में फुलबदड्य जय् रहलऽ छी, सोचलयाँ आमोिजी सें दमली लौं ।” हुनी बोललै । तनी िेर बैठलयथ, हयल समयचयर सयथें ियगलपरु के सयदहय्कयर दसनी आरो अांदगकय के चरचय होलै । ‘अांग मयधरु ी’ लेली एक-िू गो रचनय िेदल्ै । जलख् पयनी के बयि कहलकयत, “ठीक छै आमोि जी, फे रू दमलिौं ।” हमरय लगलै दक अांदगकय के ह् सांस्कयरी सहज-सरल ियसयप्रेमी ि​ि के उपमय ‘रयमबोलय’ तल ु सी सें करत ं॑ होलऽ दहनकय ‘अांगबोलय’ कहलऽ जय् त ं॑ अदतस्ोदि नै होतै । 14 नवांबर 2015 (कयदतट क शक्ु ल ततृ ी्य, समवत 2017) कं॑ सयझें सल ु तयनगांज, ियगलपरु के ्वु य सयदहय्कयर श्री सधु ीर प्रोग्रयमर जी के फोन ऐलै— “आमोिजी चकोरजी चल्लऽ गेलयथ । ” हममें सहज रूपऽ सें पछ ु दलय्है, “कहयां चल्लऽ गेलयथ हो ?” हुनी कहलकै , “िगवयनऽ हयाँ ।” एह ह् सनु ी कं॑ त ं॑ मऽन प्रयन ममयट न्तक पीडय के महयसयगर में डूबय गेलै । लयगलै जेनय धोती, कुतयट , बांडी, बांिरमूहयाँ टोपी के पररधयन सयथें ं॑ दछनमयन अांदगकय के तल ललयटऽ पर वह ं॑ पदवत्र वैस्नवी टीकय लगैलां— ु सी रांग हमरऽ ऐ ांगनय में ठय़िऽ छऽथ आरो स्फीत हाँसी सदहत कही रहलऽ छऽथ— “अब ं॑ जय् दछहौं आमोि जी ! ज्-ज् सीतय रयम ।” बयि मां ं॑ कांु िन अदमतयि जी सां ं॑ पतय चललऽ दक हुनी ‘तल ु सी के रयम - रयम के तल ु सी’ आलेख के प्रूफ िेखत-ं॑ िेखतां ं॑ दचरदनद्रय मां ं॑ लीन हो् गेलयथ । धन्न छे दल्ै रयमि​ि अांदगकय के तल ु सी ‘चकोर’ जी । जीवन के अांदतम िन तलक रयमकथय बयांचतां ं॑ रहदल्ै आरो अन्ततः रयमम् हो् गेदल्ै । मगर हे पन्ु ्स्लोक ‘चकोर’ जी आयमय त ं॑ अमर हो् छै । ्ै लेली जाँऽ कहीं हमरऽ ियवपूनट उिगयर सनु ी रहलऽ दछ्ै त ं॑ सदु न्ै हे अांगमनीसी दप्र् ‘चकोर’ अांदगकय-सू्ट के सिु ि् िोर हे तल ु सी मधरु अांदगकय के सयदहय् तोरऽ मह-मह महकै हे रयमि​ि तांऽ सिय अमर रहिौ ई आांगी वसधु य पर श्रर्द्य के अघ्​्ट समदपट त छै , ियवऽ के मयलय अदपट त छै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

101


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ आरो पिकाररता डॉ.(प्रो.) मधस ु ूिन झा - संपकष -

स्नयतकोत्तर दहन्िी दवियग सह दवियगयध्​्ि - स्नयतकोत्तर अांदगकय दवियग, दतलकयमयाँझी दविदवद्ययल्, ियगलपरु , दबहयर

“ चकोर जी कहला ॑ अंमगका के एक ऐन्द्हऽ आदमी के मचत्र उभरी क॑ ामनां मं ॑ आबै छै जें ब्भे जग्घऽ प॑ घूमीघूमी क॑ , नाची-नाची क॑ , प्रचार करी क॑ अंमगका के मबगुल मजंदगी के रऽ अंमतम ां ता​ाँय बजैलकै ।”

102

अंदगकय आरो दहन्िी के

अमर सेनयनी डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ स्वियवऽ सें ि​ि, सयदहय्कयर आरू पत्रकयर छे लै । कुच्छु नै कुच्छु ग़ितें होलऽ हुनी आगू ब़ितें रहलै । अांदगकय हुनकऽ मयतिृ यसय छे लै । अांदगकय के चदचट त हस्तयिर चकोर जी दवद्वयन सयदहय्कयर, प्रकयांड पांदडत, सांस्कृदत उन्नय्क, सदु वज्ञ दचांतक, कुसल सांपयिक, अनवु यिक, पटु मांच सांचयलक, िदि-ियव दविोर िजन गय्क, प्रवयचक, सांस्तय दसनी के सांगठन करै वयलय, नयटककयर, कहयनीकयर, उपन्​्यसकयर, दनबांधकयर, समीिक आरू सफल कदव दसनी सथां ं॑ हुनी सयदहय् के सयधक छे लै । हुनकऽ व्दियव के कत्तेनी पहलू छे लै । हुनी चकोर छे लै सयदहय् के । चकोर जी कहलय स ं॑ अांदगकय के एक ऐन्हऽ आिमी के दचत्र उिरी कं॑ सयमनयां मां ं॑ आबै छै जें सब्िे जग्घऽ प ं॑ घूमी-घूमी कं॑, नयचीनयची कं॑, प्रचयर करी कं॑ अांदगकय के दबगल ु दजांिगी के रऽ अांदतम सयांस तयाँ् बजैलकै । लेखन –मद्रु न-सांपयिन, दचांतन-मनन, सांकीतट न, िजन, िेसयटन के नयम छे कै चकोर । गोरऽ रांग, छरहरऽ बिन, झकझक उजरऽ धोती-कुरतय, दत्रदटक्कय ्ि ु कपयर , मिृ ल ु मस्ु कयन छे डतें चेहरय चकोर जी के खयस पहचयन छे लै । िेस के कोनय-कोनय मां ं॑ आ्ोदजत हो् वयलय आ्ोजनऽ म ं॑ दहस्सय ल ं॑ कं॑ अांदगकय के प्रदतदनदधयव करै में आगू रहै वयलय छे लय चकोर जी । दवदवध ियसय दसनी के सयदहय् रचनय मां ं॑ लगलऽ रहलऽ चकोर जी के दनःस्वयथट सयदहय् सेवय श्रे्यस्पि छे लै । चकोर जी अांदगकय के ऊ व्दियव छे लै जें समयज सेवय आरो सयदहय् सेवय के समन्व्तय के बेजोड उियहरन पेस करलकै । दहनी दसर्द्यांत के पक्कय छे लै आरो ओकरे मूल्​्ऽ पर दटकलऽ जीवन दज्ै छे लै । सयधनय,समरपन आरो दनस्ठय ियव हुनकय म ं॑ िरलऽ छे लै । अांदगकय के इ िगीरथ परू ु स के अांदगकय ियसय-सयदहय् के रऽ िेत्र मां ं॑ करलऽ ्ोगियन के रऽ सवयट दधक ऐदतहयदसक महयव छै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी -


डॉ. चकोर प्रकृदत आरो प्रवदृ त स ं॑ वैस्नव छे लै । हुनी ि​ि छे लै दस्यरयम के । हुनी अांदगकय सांस्कृदत के तयवज्ञ रचनयकयर छे लै । सयस्त्रदचांतक, कदव, समयजदचांतक, कथयकयर के रूपऽ म ं॑ हुनकऽ व्दियव सौम् छे लै । कत्तेनी सयदहदय्क, सयमयदजक आरो आध्​्यदयमक सांस्थय दसनी स ं॑ जडु लऽ चकोर जी उच्च कोदट के दवद्वयन, दवन्सील आरो सयपरू ु स छे लै । कमट ्ोगी चकोर के सरल स्वियव, मिृ िु यसय, आकसट क व्दियव, अिम् उयसयह, कुच्छु करतें रहै के धनु ें के करहौ सहज ढांगऽ सें ही आपनऽ िन्न ं॑ खींची लै छे लै । दवद्ययवयचस्पदत (पी.एच.डी.), दवद्ययसयगर (डी.दलट.), महयवीर प्रसयि कुलकलयधर, िवप्रीतय परु स्कयर, नांि परु स्कयर, सांपयिक रयन, शब्ि सम्रयट, सधु यांशु सयधनय सममयन, अांदगकय मनीषी, सयदहय् श्री, ियरत ियषय िूषण, मनीषय रयन, दहन्िी गररमय सममयन, अांदगकय-दहन्िी सेतु आदि कत्ते नी सममयनऽ सें सममयदनत प्रज्ञय परू ु स डॉ. चकोर सयिय जीवन आरो उच्च दवचयरऽ के जीवांत प्रतीक छे लै । गयाँधी िरसन के प्रदतमूदतट चकोर जी मनस्ु ्ऽ के सेवय आरो

“ डॉ. चकोर ादा जीवन आरो उच्च मवचारऽ के जीवंत प्रतीक छे लै । गा​ाँधी दर न के प्रमतमूमतथ चकोर जी मनस्ु यऽ के वे ा आरो नया पनपैवाला ामहत्यकारऽ के मदद लेली ममपथत छे लै । अंमगका भा ा- ामहत्य के वे ा महनी जे प्रमतबद्धता, तन्द्मयता, कमथठता ें करलकै ऊ आपनां आप म ॑ महनका एक टा अनूठा आरू दुलथभ चीज बनाय दै छै ।” न्य पनपैवयलय सयदहय्कयरऽ के मि​ि लेली समदपट त छे लै । अांदगकय ियसय-सयदहय् के सेवय दहनी जे प्रदतबर्द्तय, तन्म्तय, कमट ठतय स ं॑ करलकै ऊ आपनयां आप म ं॑ दहनकय एक टय अनूठय आरू िल ु ट ि चीज बनय् िै छै । डॉ. ‘चकोर’ कं॑ दवदिन्न नयमऽ स ं॑ पक ु यरलऽ गेलै । अांदगकय परु ोधय (डय. दशववांश पयण्डे्), अांदगकय के पां. महयवीर प्र. दद्ववेिी (डॉ. लखन लयल दसांह आरोही), शब्ि सम्रयट प्रहरी (डॉ. रमण शयांदडल्​्), अांदगकय के ियरतेन्िु हररिन्द्र (डॉ.रमण शयांदडल्​्), अांदगकय के तल ु सी (डॉ.आमोि कुमयर दमश्र), अांदगकय के ्गु यांतरकयरी ्ोर्द्य (कांु िन अदमतयि), अांदगकय के सयधक तपस्वी (अदनरूर्द् प्रसयि दवमल), अांदगकय ियषय के महयरथी (श्रीमती चतवु ेिी प्रदतिय दमश्र), अांदगकय महयरथी (श्री नपृ ेंद्रनयथ गप्तु ), कमट ्ोगी (आचय्ट अदखल दवन्), दहन्िी-अांदगकय सेतु (प्रो. रांगी प्रसयि ‘रांगम’), अांदगकय के अथक सयधक (डॉ. िूतनयथ दतवयरी),

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

103


अांदगकय के सांि​िट परू ु ष (श्री अदिनी कुमयर आलोक), अांदगकय सयदहय् के समदपट त सयधक (श्री दवज् अमरेश), सयदहय् सांगीत कलय प्रेमी (श्री आनन्िी प्र. बयिल),अांदगकय ियषय के परु ोधय (श्रीमती पष्ट्ु पय जमआ ु र), अांदगकय सपूत (डॉ. रयमशोदित प्र. दसांह), अांदगकय के प्रयण (डय. सदच्चियनांि दसांह सयथी),्य्यवर सयदहय्कयर ,अांदगकय के िधीदच (डॉ. सरु द्रें प्र. जमआ ु र), सयदहय् मनीषी (इरय स्मदृ त), सयदहय् दशरोमदण (डॉ. रयजेन्द्र प्रसयि मोिी), अांदगकय के शेक्सदप्र (डॉ. बी.एन. दविकमयट ), अांदगकय कय परु ोदहत (आनांि शांकर मयधवन) । डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ जी एगो कुसल,सफल आरो कमट ठ सांपयिक रहै । मद्रु न, प्रकयसन आरो सांपयिन के िेत्रऽ मां ं॑ हुनकऽ बहुत्ते उल्लेखनी् ्ोगियन छै । अांदगकय मां ं॑ पदत्रकय प्रकयदसत करैवयलय मां ं॑ दहनकऽ प्रमख ु स्थयन छै । अांदगकय म ं॑ अिी तलक चयलीस के लगिग पदत्रकय प्रकयदसत हो् चक ु लऽ छै । जै म ं॑ जयिेतर कुच्छू अांकऽ के प्रकयसन के बयि दसमटी गेलै । मतरदक चकोर जी के ‘अांग मयधरु ी’ ४६ बरस स ं॑ लगयतयर प्रकयदसत होतें आबी रहलऽ छै । सन १९७० ई. स ं॑ डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ के सांपयिकयव मां ं॑ पटनय स ं॑ प्रकयदसत हो् रहलऽ इ पदत्रकय श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु द्वयरय प्रकयदसत करलऽ जय् रहलऽ छै । ई अांदगकय ियसय के सबसां ं॑ पदहलऽ मयदसक पदत्रकय छे कै । पदत्रकय के नयम ‘अांग मयधरु ी’ अथट पूनट आरो आकसट क छै । नयम के उच्चयरनऽ स ं॑ मऽन-प्रयन प्रसन्न हो् जय् छै । सनु थै सब्िे समझी जय् छै दक अांगऽ के मयधरु ी / मयध्ु ट फै लयनय एकरऽ कयम छे कै । अांगजनपिऽ के सपूतऽ के अांदगकय मां ं॑ अदिरूदच ब़ि,ं॑ जनपिी् कदव, लेखक, कहयनीकयर, आलोचक दसनी हेकरऽ मयध्​्मऽ स ं॑ रयस्री् स्तरऽ पर पहुचाँ ,ं॑ ियसय-सयदहय्,धमट सांस्कृदत के प्रचयर हुअ ं॑ आदि ही पदत्रकय के उद्देश्​् छे कै । अांदगकय के सौंि्ट , मयध्ु ट आरो ियव चेतनय कं॑ दवरयट फलक िै लेली चकोर जी पदत्रकय के परकयसन प्रयरांि करनां ं॑ छे लै । पदत्रकय मां ं॑ कदवतय, कहयनी, लेख, एकयांकी, सांस्मरन, गजल, हय्कू, हयस्​्-व्ांग्​्, समीिय, आलोचनय, खेती-गहृ स्थी, नयरी जगत, बयल-दवनोि, पत्र आदि दवस्क रचनय के प्रकयसन हो् छै । सांपयिक के सांपयिन कलय आरो सांकलन चयत्ु ट िोनो बेजोड छै । ई मयदसक पदत्रकय सब्िे दृदस्ट स ं॑ महयव सां ं॑ िरलऽ प्रेरनय िै वयलय आरू उप्ोगी छै । ्ै पदत्रकय मां ं॑ स्थयदपत के सयथसयथ न्य-न्य सयदहय्कयरऽ दसनी के दलखलऽ सयदहय् के हर दवधय के रचनय कं॑ छयपलऽ जय् छै । ्ै पदत्रकय में सब्िे अांदगकय सयदहय्कयरऽ के सह्ोग दमलै छै । चकोर जी के सबसां ं॑ बडऽ जीवट के कयम रहै – तन-मन-धन लगय् कं॑ मयदसक पदत्रकय अांग मयधरु ी के सम् स ं॑ प्रकयसन । स्वगयट रोहन स ं॑ पैन्हां ं॑ दहनी अांग मयधरु ी के नवांबर अांक छयपी चक ु लऽ रहै । ‘अांग मयधरु ी’ अांग जनपि के ियवनय के आईनय छे कै । इ पदत्रकय अांदगकय सयदहय् के दवकयस मां ं॑ मील के पयथर सयदबत होलै । ्ें आपनऽ सैसवयस्थय स ं॑ अबतयाँ् तहलकय मचय् रहलऽ छै । ्ै पदत्रकय के कयरनें अांदगकय सयदहय् के गद्य-पद्य सब्िे आ्यम समररध होलै । 104

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अांग मयधरु ी मां ं॑ प्रकयदसत अांदगकय के सयदहय्कयरऽ दसनी के नयमऽ के सूची बहुत लांबय छै । प्रमख ु सयदहय्कयरऽ दसनी के नयम छै : गियधर प्र. अमबष्ठ, डॉ. परमयनांि पयण्डे्, अि्कयांत चौधरी, डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’, डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय,िवु नेिर दसांह ‘िवु न’,हलधर चौधरी िीन,जनयिट न रय्, मधक ु र गांगयधर, श्रीमती प्रकयशवती नयरय्ण, उमेश जी, सियनांि दमश्र, समु न सूरो, उि्कयन्त ठयकुर ‘दबहयरी’, महेन्द्र प्रसयि ज्सवयल, गोपयल कृष्ट्ण प्रज्ञ, प्रियत सरदसज, रयधयकृष्ट्ण चौधरी, गोरेलयल मनीषी, दवद्ययिूषण दसांह ‘वेण’ु , उदचतलयल दसांह, हांस कुमयर दतवयरी, डॉ. रांजन सूररिेव, मदतकयांत पयठक, अदनरूर्द् प्रियस, सरु शे मण्डल ‘कुसमु ’, डॉ. सकलिेव शमयट , डॉ. िूतनयथ दतवयरी, सिु यषचन्द्र भ्रमर, शांकर प्रसयि श्रीदनके त, कमलय प्रसयि बेखबर, ियमोिर शयस्त्री, जगिीश दमश्र, डॉ. कुमयर दवमल, शांकर मोहन झय, गरु शे मोहन घोष ‘सरल’, मीरय झय, जगिीश पयठक मधक ु र, प्रो. अदनल कुमयर दमश्र, वेि प्रकयश बयजपे्ी, दद्ववेिी सदच्चियनांि ‘श्रीस्नेही’,कुमयर ियगलपरु ी, प्रसून लतयांत, खशु ीलयल मांजर, अदनरूर्द् प्रसयि दवमल, डॉ. अमरेंद्र, डॉ. आमोि कुमयर दमश्र, रयमयवतयर रयही, डॉ. सरु न्े द्र झय पररमल, अनूपलयल मांडल, दवकयस पयण्डे्, परमयनांि प्रेमी, अदनलशांकर झय, रयमशमयट अनल, कांु िन अदमतयि, रयजमोहन शमयट , डॉ. श्​्यमलयल आनांि, सधु ीर प्रोग्रयमर, नवीनचांद्र शक्ु ल पष्ट्ु प, नीलमोहन दसांह, प्रयण मोहन प्रयण, अदिनी, बैकांु ठदबहयरी, रयजकुमयर, मीनय दतवयरी, इन्ि​िु ूषण दमश्र, हीरय प्रसयि हरेन्द्र, जनयिट न ्यिव, सोहन चौबे, डॉ. दवन् प्रसयि गप्तु , अांजनी कुमयर शमयट , रांजन, कमल दकशोर सयह, रयके श पयठक, िीन िीप उफट ‘गरू ु जी’, अांजनी कुमयर दनशयांक आदि अांग मयधरु ी आरो चकोर जी के प्रसांसकऽ के एकटय दवसयल वगट छै । सयथें-सयथ आदसरवयि आरो सह्ोग िै वयलय के िरमयर छै । जै म ं॑ कुच्छू के नयम छै :रयजय रयदधकय रमण प्रसयि दसांह, डॉ. लिमी नयरय्ण सधु यांश,ु अनूपलयल मांडल, डॉ. उि् नयरय्णदतवयरी, डॉ. कुमयर दवमल, रयजेिरी शयांदडल्​्, डॉ. श्रीरांजन सूररिेव, डॉ. रयमि्यल पयण्डे्, दवष्ट्णु दकशोर झय ‘बेचन’, डॉ. मधक ु र गांगयधर, ्िनु ांिन पांदज्यर,डॉ. लखन लयल दसांह ‘आरोही’, प्रियत सरदसज, प्रो. अदनल कु. दमश्र, बजरांग वमयट , रयमरीझन रसलपरु ी, सिु यष झय, के ियरनयथ दमश्र प्रियत, विांृ यवन ियस, शांकर ि्यल दसांह, डॉ. दशवनयरय्ण, डॉ. समीर, डॉ. परशरु यम ठयकुर ‘ब्रह्मवयिी’, डॉ. अि्कयत चौधरी, डॉ. िेशि​ि, प्रदतिय दमश्र, डॉ. बहयिरु दमश्र, डॉ. प्रो. मधस ु ूिन झय, परशरु यम रय् ‘प्रेम प्रियकर’, डॉ. दवद्ययरयनी, डॉ. प्रदतिय रयजहांस, प्रो. िगवती झय । ‘अदखल ियरती् ियषय सयदहय् सममेलन’ सें छपैवयलय दहन्िी त्रैमयदसक पदत्रकय ‘न्य ियषय ियरती सांवयि’ के हुनी सहसांपयिक रहै । अांदगकय, अांगिूत, प्रगदतशील समयज, चतिु ट ज ु , प्रज्ञयवयणी, सांकल्​्,िेवियरती, हयलचयल, अांगवयणी, अांदगकय लोक आदि पदत्रकय स ं॑ िी हुनी जडु लऽ रहै । ‘अांग ियषय पररषि’ के अध्​्ि, अांदगकय आांिोलन के प्रनेतय, ‘अदखल ियरती् अांदगकय सयदहय् कलय मांच’ के मयगट िसट क, वरेन्​् सयदहय्कयर डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ कं॑ श्रर्द्य समु न समरदपत करै दछ्ै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

105


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

जनकपुर की डोदमन बनकर नाचने लिते थे चकोर भागलपरु दजले के िेवधयम ग्रयमवयसी परम रयमि​ि

पं. मशवदत्त ममश्र - संपकष सांपयिक—सनयतन ियरत, रेन्टल फ्लैट सांस्थय-344, कां कडबयग कॉलोनी, पटनय—800 020

“डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ अपने खानदानी स्ं कार और प्रमतभा की तत ाधना और लगनमनष्ठा के बल पर अंमगका राट और ामहत्य मनीषी कहलाने की ऊंचाई पर पहचं गए ।

106

स्व. पांदडत चांद्रमोहन पयांडे् और िदि परय्णय श्रीमती प्रजय िेवी के घर तीन जनवरी 1938 ई. को उयपन्न डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ अपने खयनियनी सांस्कयर और प्रदतिय की सतत सयधनय और लगन-दनष्ठय के बल पर अांदगकय सम्रयट और सयदहय् मनीषी कहलयने की ऊांचयई पर पहुचां गए । सयदहय् मनीषी और अांदगकय ि​ि डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ ने लगिग 70 पस्ु तकें दहन्िी और अांदगकय में दवदिन्न सयदहदय्क दवधयओां में दलखी हैं। एक शयखय िो फूल (दहन्िी नयटक), दकसयन कं॑ जगयवऽ (अांदगकय एकयांकी), सवोि् समयज (अांदगकय नयटक), फूल फूलैलै (अांदगकय कहयनी सांग्रह), अांगलतय (अांदगकय कदवतय सांग्रह), आदि कृदत्याँ उनकी सयदहदय्क रचनयकररतय और सयांस्कृदतक अदिरूदच के पररचय्क हैं । पदत्रकय समपयिन में उनकी ि​ितय िी उल्लेखनी् है । अांग मयधरु ी (अांदगकय मयदसक पदत्रकय), ियषय ियरती सांवयि (दहन्िी त्रैमयदसक पदत्रकय), प्रज्ञयवयणी (दहन्िी त्रैमयदसक पदत्रकय), कय वे सतत सांपयिन करते रहे। अांग मयधरु ी मयदसक पदत्रकय कय उन्होंने ही प्रकयशन प्रयरांि दक्य और अके ले इसकय प्रकयशन 46 वषों तक दनबयट ध करते रहे । उनके दिवांगत होने पर दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन में श्रध्ियांजदल सिय को सांबोदधत करते हुए ियषय ियरती सांवयि के प्रधयन सांपयिक श्री. नपृ ेन्द्र नयथ गप्तु ने कहय दक डॉ. चकोर के दनधन से ियषय-ियरती सांवयि को प्रकयदशत करनय कदठन हो जयएगय,

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी -


क्​्ोंदक अांदतम प्रूफ प़िने को छोडकर सयरय कयम डॉ. चकोर ही सांियलते थे । प्रज्ञयवयणी पदत्रकय डॉ. चकोर की लगनशीलतय और अथक पररश्रम के कयरण प्रकयदशत हो रही थी, बदल्क दजस सम् उनकय प्रयणयन्त हुआ वे प्रज्ञयवयणी कय ही प्रूफ िेख रहे थे तिी वे सोफय पर से ल़िु क ग्े और प्रूफ एक तरफ तथय उनकय चश्मय िूसरी ओर दगरय पय्य ग्य । दिनयांक 14 नवांबर 2015 को अपने ही घर पर उनकय प्रयणन्त तब हुआ जब वे अके ले ही सोफय पर बैठकर प्रज्ञयवयणी कय प्रूफ िेख रहे थे । डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ मौन और बहुआ्यमी सयधक थे । अथयट ियव से आक्रयन्त रहते हुए िी रयष्ट्रियषय दहन्िी एवां अांदगकय की जो अदहदनट ष सेवय उन्होंने की वह प्रशांसनी् है । ‘गयव-जवयर’ उनकी हय्कू की प्रथम और सशि कृदत है । श्री रयमिूत हनमु यन और मीरय की प्रेम सयधनय िी उन्होंने हय्कू में ही दलखी है । उनकी गौरवम्ी लेखनी से गद्य-पद्य अपने दवदिन्न दवधयओां में स्वियदवक रूप से दनःसतृ होती रहती थी। वे के वल ियवययमक दृदष्ट से ही आध्​्यदयमक नहीं थे, बदल्क उनकय व्वहयररक पि िी पूणटतः आध्​्यदयमक थय । ललयट पर श्री समप्रिय् कय चांिन, गले में तल ु सी की मयलय,

“ ादगी और शालीनता जन ामान्द्य की प्रमतमूमतथ तथा अध्यनशीलता एवं कमथठता के प्रतीक डॉ. चकोर मनगथटु और अमभमान े को ों दूर रहने वाले ऐ े ामहत्यकार थे, मजन्द्हें आ ानी े मवस्मतृ नहीं मकया जा कता । लोकभाषा आन्द्दोलन में उनका अभूतपूवथ योगदान रहा । यही कारण है मक महन्द्दी के मवद्वानों का भी मय- मय पर इन्द्हें हयोग और आशीवाथद ममलता रहा । ” रसयदन्वत मख ु मांडण व्दियव रखते थे। सयिगी और शयलीनतय जनसयमयन्​् की प्रदतमूदतट तथय अध्​्नशीलतय एवां कमट ठतय के प्रतीक डॉ. चकोर दनगट टु और अदिमयन से कोसों िूर रहने वयले ऐसे सयदहय्कयर थे, दजन्हें आसयनी से दवस्मतृ नहीं दक्य जय सकतय । लोकियषय आन्िोलन में उनकय अिूतपूवट ्ोगियन रहय । ्ही कयरण है दक दहन्िी के दवद्वयनों कय िी सम्-सम् पर इन्हें सह्ोग और आशीवयट ि दमलतय रहय। सवट श्री लक्ष्मीनयरय्ण सधु यांशू, रयजय रयदधकय रमण प्रसयि दसांह, पां हजयरी प्रसयि दद्ववेद्वी डॉ. उि् नयरय्ण दतवयरी, गियधर प्रसयि अांमबष्ट, डॉ. मधक ु र गांगयधर, डॉ. कुमयर दवमल,

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

107


पांदडत रयमि्यल पयांडे्, श्री नयरय्ण ियस, आनांि शांकर मयधवन, डॉ. परमयनांि पयण्डे्, आचय्ट श्रीरांजन सूररिेव आदि उनमें अग्रगण्​् हैं। डॉ. चकोर ने दजस समपट ण और य्यग की उियत्त ियवनय से सयदहय् की सेवय की है । दवशेष रूप से अांदगकय सयदहय् की श्रीवदृ र्द् में उपनय अशेष ्ोगियन दि्य है। उसी प्रकयर समयज और सयदहदय्क सांस्थयओां द्वयरय उन्हें सममयन और प्रशदस्त पत्र िी प्रयप्त हुए हैं। अकयरण नहीं है दक उन्हें पचयस से अदधक सांस्थयओां द्वयरय सममयदनत, परु स्कृत तथय अदिनांदित दक्य ग्य है। रयष्ट्री् लेखक सांघ दबहयर द्वयरय 23 जनवरी 1977 को दिए गए प्रथम सममयन पत्र के सयथ जो दसलदसलय शरू ु हुआ वह दनरांतर जयरी रहय । लगिग प्रय्ेक वषट इन्हें एक-िो उल्लेखनी् सममयन और उपयदध्यां प्रयप्त होती रहीं । उनमें दवद्ययवयचस्पदत, दवद्यय सयगर शब्ि सम्रयट, ियरत-ियषय िूषण, मनीषी रयन, सयदहय् मयतांड, अांग दशरोमदण, रयष्ट्री् दहन्िी सेवी सहस्त्रयब्िी सममयन आदि शयदमल हैं

“ ामहत्य म्मेलन हो, ांस्कृमतक म्मेलन हो या पस्ु तक मेला हो, डॉ. चकोर अंमगका के अनमगनत पुस्तकों का बोझ लेकर उ स्थल तक पहचं जाते थे और पस्ु तकों की प्रदशथनी लगाते थे । डॉ. चकोर पस्ु तकों का गठ्ठर अपने कं धे पर ढोकर आयोजन स्थल तक ले जाने में तमनक भी क ं ोच नहीं करते।

” । सन् 2001 में अमेररकन बय्ोग्रयदफकल इांस्टीट्ूट (्ूएसए) ने डॉ चकोर को ‘मैन ऑफ ि ई्र’ जैसे अदत प्रदतदष्ठत सममयन से दविूदषत दक्य । चयहे मकर सांक्रयांदत के अवसर पर बौंसी (मांियर) कय मेलय हो, स्वांतत्रतय दिवस पर गोड् डय कय मेलय हो, बक्सर में रयम-जयनकी दववयह कय अवसर हो, दबहयर िर में कहीं िी कोई दवष् सयदहय् सममेलन हो, सयांस्कृदतक सममेलन हो ्य पस्ु तक मेलय हो, डॉ. चकोर अांदगकय के अनदगनत पस्ु तकों कय बोझ लेकर उस स्थल तक पहुांच जयते थे और पस्ु तकों की प्रिशट नी लगयते थे । डॉ. चकोर पस्ु तकों कय गठ्ठर अपने कां धे पर ढोकर आ्ोजन स्थल तक ले जयने में तदनक िी सांकोच नहीं करते। 108

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


डॉ. चकोर सगणु िदिधयरय के एक समदपट त ि​ि व्दियव थे । कदव चकोर वैष्ट्णयवतयर िगवयन श्रीरयम की िदि में दविोर होकर नयचने लगते थे और िदि कयव् की सजट नयओां के सयथ दवदिन्न तीथट स्थलों की ्यत्रयएां कर स्व्ां को धन्​् समझते थे । दवदिन्न स्थलों में रयम-दववयह के आ्ोजनों में ियव-दविोर होकर सयडी पहनकर जनकपरु की डोदमन बनकर नयचने लगते थे । पटनय में महयमूखट सममेलन में िी वे ऐसय करते थे । अांदगकय अकयिमी की स्थयपनय, दबहयर लोक सेवय आ्ोग, ियरती् सांदवधयन की अष्टम सूची में तथय दविदवद्ययल्ों में अांदगकय पयठ्क्रम को शयदमल करयने के दलए वे सतत् आांिोलन करते रहे । जब हयल में दबहयर सरकयर ने अांदगकय अकयिमी की स्थयपनय की तो सबसे अदधक डॉ. चकोर प्रसन्नदचत्त दिखे । उनके जैसे अांदगकय और अांदगकय ियषय एांव सयदहय् के उयथयन के दलए सवट स्व न्​्ौछयवर करने वयले को इस नवगदठत अांदगकय अकयिमी कय अध्​्ि नहीं बनयए जयने पर उन्हें जरय िी िख ु नहीं हुआ बदल्क दजन्हें

“ जब हाल में मबहार रकार ने अंमगका अकादमी की स्थापना की तो ब े अमधक डॉ. चकोर प्र न्द्नमचत्त मदखे । उनके जै े अंमगका और अंमगका भाषा एंव ामहत्य के उत्थान के मलए वथस्व न्द्यौछावर करने वाले को इ नवगमठत अंमगका अकादमी का अध्यि नहीं बनाए जाने पर उन्द्हें जरा भी दुख नहीं हआ बमल्क मजन्द्हें अध्यि बनाया गया उन्द्हें हामदथक धन्द्यवाद देकर अपनी प्र न्द्नता जामहर करने डॉ. चकोर उनके पा गए।” अध्​्ि बनय्य ग्य उन्हें हयदिट क धन्​्वयि िेकर अपनी प्रसन्नतय जयदहर करने डॉ. चकोर उनके पयस गए । डॉ चकोर सचमचु एक सांत सयदहय्कयर थे ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

109


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

अंदिका के एक महान दवभूदत थे डॉ. चकोर अंगजनपि के सपूत डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर की जन्म

डॉ. अमर कुमार दसंह - संपकष -

सिु यमय कांु ज, जनतय मयके ट, छोटय गोदवांिपरु , जमशेिपरु - 831 015

“ वे अपने गरू ु जनों का आशीवाथद लेने मवद्यालय पहचाँ े थे । वहा​ाँ जब उन्द्होंने ‘मक ान क॑ जगाबऽ’ पस्ु तक की पंमक्तयों का स्वर पाठ मकया तो हम भी अंमगका भाषा-भाषी छात्र गद-् गद् हो गये थे ।”

110

िूदम उत्तरवयदहनी मयाँ गांगे के तट पर ियगलपरु दजले के सल ु तयनगांज से १५ दकलोमीटर िदक्खन में िेवधय गयाँव में थी । उनकी प्रयइमरी स्कूल की प्रयरांदिक दशिय उनके अपने ही गयाँव में हुई थी । इस गयाँव से दसफट २ दक.मी. की िूरी पर दस्थत मेरय गयाँव करहरर्य है जहयाँ के मध्​् व उच्च दवद्ययल् में इनकी शेष स्कूली प़ियई हुई थी । इस उच्च दवद्ययल् कय नयम अब िेवी प्रसयि महतो+२ उच्च दवद्ययल् हो ग्य है । इनके छोटे ियई वीरेन्द्र जी उसी स्कूल में मेरे सहपयठी थे जो अिी एक सरकयरी उच्च दवद्ययल् में दशिक हैं । डॉ. चकोर दनय् िो दकलोमीटर की िूरी पैिल त् करके मेरे गयाँव स्कूल प़िने आ्य करते थे । मध्​् दवद्ययल्ों के दशिक श्री दगरयनांि मेहतय व श्री ज् प्रसयि दसांह के सयथ-सयथ उच्च दवद्ययल् के दशिक श्री गांगय प्रसयि दसन्हय के दप्र् दशष्ट्​् रहे थे । दवद्ययली् दशिय के िौरयन ही िजन-कीतट न, सयमयदजक-ऐदतहयदसक पररदृश्​्ों में रूदच, खेत खदलहयन से लगयव के चलते ही इनकी पहली पस्ु तक ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ आई । इस दकतयब की कयफी धूम मची थी । वे इस दकतयब के प्रकयशन के पियत अपने गरू ु जनों कय आशीवयट ि लेने दवद्ययल् पहुचाँ े थे । वहयाँ जब उन्होंने ‘दकसयन कं॑ जगयबऽ’ पस्ु तक की पांदि्ों कय सस्वर पयठ दक्य तो हम सिी अांदगकय ियषय-ियषी छयत्र गि-् गि् हो ग्े थे । अांगजनपि के अांदगकय ियषी इस सदु वख्​्यत हस्तयिर को दकसी पररच् की जरूरत नहीं । उन्होंने अपने व्दियव

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी -


व कृदतयव से अांदगकय सयदहय् व पत्रकयररतय जगत में ऐसी छयप छोडी दक सिी उनके गणु ों के कय्ल हो गए थे । उनके सांपयिन में पूरे ४६ बषों तक अांदगकय मयदसक पदत्रकय, अांग मयधरु ी के सफल व दन्दमत प्रकयशन के सयथ-सयथ अांदगकय व दहन्िी ियषय सयदहय् व पत्रकयररतय के िेत्र में अमूल्​् ्ोगियन के दलए अनेक सांस्थयओां ने शीषट स्थ मयनि उपयदध्याँ व परू ु स्कयरों से सममयदनत व परु स्कृत दक्य थय । उन्होंने कई नवोदित रचनयकयरों को अांदगकय एवां दहन्िी ियषय में लेखनी चलयने के दलए, पस्ु तक प्रकयशन में , मांच िेने में , सांस्थयओां के दनमयट ण में, प्रेररत व उयसयहवर्द्टन कर महयवपूणट िूदमकय अिय दक्य थय । दविदवद्ययल् स्तर पर अांदगकय की प़ियई, अांदगकय अकयिमी की स्थयपनय आदि के दलए इन्होंने कयफी सांघषट दक्य थय । अग्रजतल्ु ् चकोर जी की मझ ु े अांदगकय ियषय में दलखने, मांच प्रियन करने, सयदहदय्क गोष्ठी, सममेलनों आदि में शरीक करयने में महयवपूणट ियगीियरी रही थी । उनकी धमट पयनी श्रीमती दिव्यांशु मयतयृ व की प्रदतमूती ही हैं । इनलोगों कय स्मरण कर हमेशय गौरव महसूस करतय हाँ ।

“ अग्रजतल्ु य चकोर जी की मझ ु े अंदिका भार्ा में दलखने, मंच प्रिान करने, सादहदत्यक िोष्ठी, सम्मेलनों आदि में शरीक कराने में महत्वपूणष भािीिारी रही थी । उनकी धमषपत्नी श्रीमती दिवयांशु मातृत्व की प्रदतमूती ही हैं । इनलोिों का स्मरण कर हमेशा िौरव महसूस करता हाँ । ” श्री कांु िन अदमतयि जी ने मोबयईल पर जब डॉ. चकोर के दनधन की सूचनय िी तो सनु कर हम िोनों पदत-पयनी िांग रह गए । आज के दिन वे हमयरे बीच नहीं रहे । अांदगकय के दलए उनकी कमी खलती रहेगी । इसकी ियरपयई दनकट िदवष्ट्​् में होती नहीं दिखती । उन्हें कोदट-कोदट नमन !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

111


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

आब ॑ यािऽ के रऽ झरोखा म ॑ डॉ. नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ चकोर जी स ं॑ हमरऽ पैहलऽ मलु यकयत सन१९८९ ई. डॉ. प्रिीप प्रभात - संपकष -

सयदहय्कयर, सम् सयदहय् सममेलन, पनु दस्य, बयाँकय (दबहयर), - 813109

“ चकोर जी उठलै । लंबा कद काठी, गोरऽ खरा छरहरऽ बदन, कपारऽ प ॑ तीन मटकानी लंबा मटक्का, ौम्य व्यमक्तत्व । हम्में आगू -आगू आरो हमरा पीछू-पीछू डॉ. चकोर वू कमरा ॑ मनकललै । ” 112

म ं॑ ‘सम् सयदहय् सममेलन’, पनु दस्य के रऽ महयदधवेसन म ं॑ होलऽ छे लै । ई महयदधवेसन दवमलजी के गयाँव दमजयट परु म ं॑ होलऽ रहै । चकोर जी के ठहरै लेली जै कमरय मां ं॑ व्वस्थय रहै, वू कमरय मां ं॑ कै एक ठो हुनके हमउमर के ही दवद्वयन सयदहय्कयर छे लै । हमरय दवमल जी न ं॑ कहलकै , “जय प्रिीप, चकोर जी कं॑ बल ु य् लयनऽ ।” हममें सकपकै लऽ कमरय मां ं॑ घस ु दल्ै । तीन गो दवद्वयन छे लै ऊ कमरय मां ं॑ । तीनो के तीनो करीब-करीब एक्के उमर के । हमरय समझऽ मां ं॑ नै ऐलै कोन आिमी चकोर जी छे कै । हममें ऊ कमरय म ं॑ सब्िे कं॑ िेखी घरु ी ऐदल्ै आरू दवमल जी स ं॑ कहदल्ै वहयाँ चकोर जी नै छौं वू कोठरी म ं॑ तीने ठो आिमी छै । ्ै प ं॑ दवमल जी कहलकै , “अरे ब़िु बक लडकय, जेकरय कपयरऽ प ं॑ लमबय तीन टेकयनी वयलय दटक्कय होथौं, हुदन्े चकोर जी छे कै ।” वै कोठरी मां ं॑ डॉ. डोमन सयह समीर, डॉ. तेजनयरय्ण कुशवयहय आरो डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर जी छे लय । हममें फे रू घरु ी कं॑ वू कोठरी में हुलकदल्ै त ं॑ डॉ. समीर जी न ं॑ कहलकै , “हे जी तों् िू-िू बयर ई कमरय मां ं॑ ऐल्ह ं॑ आरो दबनय कुछु बोलले लौटी गेल्ह,ं॑ के करय खोजै छो ? ” तब ं॑ हममें कहदल्ै दक दवमल सर न ं॑ चकोर जी कं॑ बल ु ैने छै । समीर जी न ं॑ कहलकै , “ जय चकोर जी तोरऽ बल ु यहट आबी गेल्हौं, सनु ऽ दवमल जी की कहै छौं ।” चकोर जी उठलै । लांबय कि कयठी, गोरऽ खरयस छरहरऽ बिन, कपयरऽ प ं॑ तीन दटकयनी लांबय दटक्कय, सौम् व्दियव । हममें आगू-आगू आरो हमरय पीछूपीछू डॉ. चकोर वू कमरय स ं॑ दनकललै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी -


दवमल जी आपनऽ मकयनऽ के पक्कय प ं॑ डॉ. अमरेंद्र, अदिनी बयबू आरो मांजर जी सथें महयदधवेसन के सरू ु आत के रऽ रय्-मसबीरय करी रहलऽ छे लै । चकोर जी के पहुचाँ थैं सब्िे एक्के सयथें हुनकऽ अदिवयिन करतें हुअ ं॑ हुनकय स ं॑ बैठै के आग्रह करलकै । बैठथैं हुअ ं॑ मांजर जी कहै छै , “आब ं॑ त ं॑ चकोर जी आदब्े गेलै, कय्ट क्रम के रूपरेखय दहनकय स ं॑ बद़ि्याँ के बनयब ं॑ पयर ं॑ ?” पयाँचो सयदहय्कयर दसनी दमली कं॑ महयदधवेसन के रऽ कय्ट क्रमऽ के रूपरेखय तै्यर करलकै । ्ही बीचऽ में चय् आबी गेलै । चय् के रऽ चस्ु की लेतें हुअ ं॑ चकोर जी कहै छै , “ई लडकय के छे कै ? ई लडकय के रऽ कपयरऽ के रेखय बतयबै छै जे ई आगू चली कं॑ कुच्छू अच्छय करतै ।” दवमल जी, चकोर जी स ं॑ हमरऽ पररच् करैतें हुअ ं॑ कहै छै , “दहनकऽ नयम प्रिीप प्रियत छे कै आरू दहनी हमरऽ दवद्ययथी िी छे कै । सयदहय् म ं॑ अिी पयाँव रखन ं॑ छै । ” चकोर जी न ं॑ दवमल जी स ं॑ कहलकै , “सनु ऽ दवमल जी, आगू के पी़िी के सयदहय्कयर कं॑ दजांिय रयखै वयस्तें न्य कदव, लेखक दसनी कं॑ प्रोयसयदहत करी कं॑ जोडै के जरूरत छै । तदि्े हममूाँ आरो तों् सयदहय् म ं॑ दजांिय रह ं॑ पयरि ं॑ । ” हमरय िन्न ं॑ मख ु यदतब हो् कं॑ चकोर जी कहै छै , “हमरऽ पतय दलखी ल,ं॑ ्ै पतय प ं॑ कदवतय, गीत, आरो जे तोरय स ं॑ बन ं॑ पयर ं॑ दलखी कं॑ िेजी दि्ऽ । हममें आपनऽ पदत्रकय, ‘अांग मयधरु ी’ मां ं॑ छयपी िेिौं ।” फे रू

“ चकोर जी न ॑ दवमल जी से ॑ कहलकै , “सनु ऽ दवमल जी, आिू के पीढी के सादहत्यकार क॑ दजंिा राखै वास्तें नया कदव, लेखक दसनी क॑ प्रोत्सादहत करी क॑ जोडै के जरूरत िै । तदभये हम्मूाँ आरो तोंय सादहत्य में दजंिा रह ॑ पारभऽ । ” ” चकोर जी आपनऽ पतय दलखय् िेन ं॑ रहै । हममें आपनऽ दलखलऽ एक कदवतय हुनकऽ दलखैलकय पतय पर िेजी िेल ं॑ रदह्ै । िोसरऽ महीनय मां ं॑ अांग मयधरु ी के अांक हमरऽ छपलऽ कदवतय सथें दमललऽ रहै । मऽन खस ु ी स ं॑ गिगि । पदत्रकय मां ं॑ आपनऽ छपलऽ कदवतय कं॑ आपनऽ िोस्त, पररजन, कऽरकुटुम के रऽ सयथें-सयथें सयदहदय्क दमत्र दसनी कं॑ िी प़िवय् मां ं॑ को् कोर-कसर नै

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

113


छोडदल्ै । ई तरह स ं॑ हमरऽ अांदगकय महय्ज्ञ के रऽ सरू ु आत होलै । एकरऽ बयि त ं॑ लगयतयर पत्रयचयर जयरी रहलै । दफनु त ं॑ दहनकऽ िेख-रेख म ं॑ हमरऽ दकतयब, ‘अांग जनपि के लोक सांस्कृदत’ बरस २००१ ई. म ं॑ दहनके शेखर प्रकयसन, पटनय स ं॑ छपलै । दफनु झयरखांड लोक सेवय आ्ोग द्वयरय आ्ोदजत प्रयथदमक दशिक प्रदत्ोदगतय परीिय -२००७ जै म ं॑ दक ३० अांकऽ के अांदगकय सां ं॑ प्रस्न रहै ओकरऽ उत्तर पदु स्तकय जयाँचै लेली दसतांबर – २००८ ई. म ं॑ हुनकय सयथें बयरह दिन तयां् एक सथें रहै के मौकय दमललऽ छे लै । ऊ एक अि​ितु िन रहै । ऊ दिन कं॑ हममें आिी तयाँ् िल ु यब ं॑ नै पयरी रहलऽ दछ्ै । हेकरऽ बयि ‘अांग मयधरु ी’ के कै एक अांकऽ मां ं॑ सूचनय दनकललऽ रहै दक ‘अांदगकय के रऽ आदिकयल’ दवस् पर आलेख आमांदत्रत छै । जेकरऽ अदतदथ सांपयिक डॉ. लखन लयल दसांह आरोही जी छे लय । हममें एगो सोधपूनट आलेख ‘अांदगकय के रऽ आदिकयल’ दलखी कं॑ िेजी िेदल्ै । अांग जनपि स ं॑ दहनकय हमरऽ आलेख छोडी कं॑ आरू के करो

“झारखंड लोक ेवा आयोग द्वारा आयोमजत प्राथममक मशिक प्रमतयोमगता परीिा -२००७ जै म ॑ मक ३० अंकऽ के अंमगका ं ॑ प्रस्न रहै ओकरऽ उत्तर पुमस्तका जा​ाँचै लेली म तंबर – २००८ ई. मं ॑ हनका ाथें बारह मदन तांय एक थें रहै के मौका ममललऽ छेलै । ऊ एक अदभुत िन रहै । ऊ मदन क॑ हम्में आभी ता​ाँय भुलाब ॑ नै पारी रहलऽ मछयै । ”

आलेख नै दमललऽ रहै । अांत म ं॑ दहनी ‘अांग मयधरु ी’ के एक अांक मां ं॑ असकल्ले हमरे आलेख छयपलकै । दकां तु दहनी वही आलेख कं॑ एक स्वतांत्र दकतयब के रऽ रूप िै कं॑ ‘अांदगकय सयदहय् के रऽ आदिकयल’ नयम करी कं॑ हमरऽ नयम सां ं॑ बरस २०११ ई. मां ं॑ प्रकयदसत करी िेलकै । कयांही एक पैसय हुनी हमरय सां ं॑ नै मयांगलकै आरो दकतयब प्रकयदसत होलय प ं॑ ओकरऽ िस ठो प्रदत रदजस्री डयक स ं॑ हमरऽ घरऽ के पतय स ं॑ िेजी िेल ं॑ रहै ।

114

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


गत १० जल ु य् २०१५ ई. कं॑ पटनय गेलऽ रदह्ै । दहनकय डेरय प ं॑ जय् कं॑ िेंट करदल्ै । दबहयर अांदगकय अकयिमी के रऽ न्य-न्य गठन होलऽ रहै । अध्​्ि के रऽ च्न होनय बयाँकी छे लै । दहनी हमरय कहल ं॑ रहै, “प्रिीप, तों् त ं॑ हमरऽ छोटऽ िय् ! अांदगकय लेली हमरऽ दनरांतर सेवय स ं॑ अांग जनपि के ऐन्हऽ को् सयदहय्कयर नै छै जे पररदचत नै छै । तोरय आरनी आिी ्वु य छो, िौड-धूप कर ं॑ पयर ं॑ छो । आब ं॑ हममें जयिय चल-ं॑ दफर ं॑ मां ं॑ असमथट दछ्ौं । तदि्ो मौकय दमललै त ं॑ अांदगकय अकयिमी के अध्​्ि के रूपऽ म ं॑ अांदगकय के सेवय स ं॑ पीछू नै हटबै । तों् मांतरी – सांतरी स ं॑ दमली-जल ु ी कं॑ अध्​्ि पि लेली वररस्ट सयदहय्कयरऽ के नयम कह ं॑ सकं॑ छो, पर उपयध्​्ि पि लेली त ं॑ तोरऽ ऐन्हऽ ्वु य सयदहय्कयरऽ के ही जरूरत रहतै । हममूां मयननी् मख्ु ्मांत्री जी कं॑ अध्​्ि पि लेली एक सूची अनस ु ांदसत करी कं॑ िेजल ं॑ दछ्ै आरो आग्रह करल ं॑ दछ्ै दक ई सूची म ं॑ जे वररस्ट सयदहय्कयर छै , हुनकय अध्​्ि बनयबै के कृपय करबै । ्ै सूची मां ं॑ तोरो नयम छौं ।” फे रू वू सूची हमरय चकोर जी िेखैलकै आरू बोललै, “ अकयिमी के अध्​्ि पि लेली प्रो. (डॉ.) लखनलयल दसांह ‘आरोही’ जी िी प्र्यसरत छै । िेखऽ की हो् छै , चनु यव के रऽ िी सम् छै । ” ई सब हमरऽ प्रदत दहनकऽ उियरतय ही छे लै । ्ै सब बयतऽ कं॑ जब ं॑ हममें आपनऽ मनऽ मां ं॑ गोदछ्य् कं॑ ्यि करै दछ्ै त ं॑ रही-रही कं॑ आाँख लोरऽ सां ं॑ ढबढबय् जय् छै ।

“ अंत में महनी ‘अंग माधुरी’ के एक अंक मं ॑ अ कल्ले हमरे आलेख छापलकै । मकं तु महनी वही आलेख क॑ एक स्वतंत्र मकताब के रऽ रूप दै क॑ ‘अंमगका ामहत्य के रऽ आमदकाल’ नाम करी क॑ हमरऽ नाम ं ॑ बर २०११ ई. मं ॑ प्रकाम त करी देलकै । कांही एक पै ा हनी हमरा ं ॑ नै मांगलकै आरो मकताब प्रकाम त होला प ॑ ओकरऽ द ठो प्रमत रमजस्री डाक ॑ हमरऽ घरऽ के पता ं ॑ भेजी देल ॑ रहै । ” धन्​् छे लै ई महयपरू ु स । ई तरह के ‘अांदगकय दशरोमदण’ कं॑ हमरऽ सत्-सत् नमन ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

115


डॉ.चकोर चकोर स्मदृ त :: संसंस्स्मरण - -डॉ. मरण- -

हर अंदिकाभासी के एकिम आपनऽ आरू खास डॉ. चकोर डॉ. चकोर के रऽ दनधन के समयचयर हमरय दबहयर

कुंिन अदमताभ - संपकष CH -/24, कें द्री् दवहयर, सेक्टर - 11, खयरघर, नवी मांबु ई - 410 210 महयरयष्ट्र, ियरत

“हनी बहत रूआं ऽ स्वर में फे रू बोललै, “ चकोर जी नै रहलै।” हमरा महुाँ ऽ ॑ आवाज मनकललै, “ अरे बाप रे, की बोलै मछयै – गलत माचार नु ल ॑ होबै – चकोर जी के मनधन नै हअ ॑ पार ॑ ।”

116

अांदगकय अकयिमी के रऽ मयननी् अध्​्ि डॉ.(प्रो.) लखनलयल आरोही जी स ं॑ फोन द्वयरय १५ नवांबर के िूपहर कं॑ दमललै । तखनी हममें रयजस्थयन के रऽ ज्परु स ं॑ सटलऽ ‘आमेर दकलय’ इलयकय म ं॑ आपनऽ पररवयर सदहत भ्रमन पर छे दल्ै । दकलय के रऽ मख्ु ् द्वयर सां ं॑ लगिग डेढ. दकलोमीटर के रऽ िूरी पर रैदफक जयम मां ं॑ फाँ सलऽ कयर म ं॑ बैठलऽ रयस्तय खल ु ै के इांतजयर करी रहलऽ छे दल्ै । परनयम-पयती के बयि आरोही जी पछ ु लकै , “चकोर जी के बयरे म ं॑ पतय चल्लहौं ?” “नै त,ं॑ की िेलै जे ?”हममां ं॑ जबयब िेदल्ै । हुनी बहुत रूआांसऽ स्वर म ं॑ फे रू बोललै, “चकोर जी नै रहलै ।” हमरय महुाँ ऽ स ं॑ आवयज दनकललै, “ अरे बयप रे, की बोलै दछ्ै – गलत समयचयर सनु ल ं॑ होबै – चकोर जी के दनधन नै हुअ ं॑ पयर ं॑ ।” फे रू बोलदल्ै, “जब ं॑ आपने बोली रहलऽ दछ्ै त ं॑ गलत त ं॑ नदह्ें होतै ... लेदकन अिी त ं॑ दहन्नैं हयले मां ं॑ बयत होलऽ छे लै हुनकय स.ं॑ .. ।” फे रू कहदल्ै, “हमरय लेली हमरऽ दजांिगी के रऽ सबस ं॑ बडऽ िःु खि आरू आहत करै वयलय समयचयर छे कै ई – अांदगकय के रऽ महयनतम पय्य ढही गेलै – पदत्यनय बहुत मदु स्कल छै – पर चकोर जी कदह्ो नै मरतै ।” हुनी कहलकै , “अांदगकय.कॉम मां ं॑ दनधन के समयचयर डयली दिहो ।” हममां ं॑ कहदल्ै, “सां्ोग ऐन्हऽ गडबड छै दक हममां ं॑ दबनय लैपटॉप के ही दनकललऽ दछ्ै मांबु ई स ं॑ िस–बयरह दिनय लेली,कल सयांझै त ं॑ पहुचाँ ले दछ्ै, ्हयाँ मोबयईल म ं॑ नेटवकट एतनय कमजोर छै दक तरु तां डयलनय सांिव नै लगी रहलऽ छै , मांबु ई लौटी कं॑ ही सांिव हुअ ं॑ पयरतै लगै छै , लेदकन हमरऽ चेस्टय त ं॑ जल्िी सें जल्िी डयलै के ही रहतै ।” मूरी आ़िी म ं॑ करी कं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी -


कपसी - फफकी कं॑ कयनतां ं॑ हमरऽ आाँखी के लोऽर बगल के सीटऽ पर बैठलऽ रयजस्थयनी ड्रय्वर के नजर मां ं॑ आबी गेलऽ रहै, पूछ ं॑ लयगलै, “सर, लगतय है आपके दकसी बहुत खयस सांबधां ी कय दनधन हो ग्य है ।” जबयब हमरऽ बजय् पीछू के सीट पर बच्चय दसनी सथां ं॑ बैठलऽ हमरऽ पयनी, मयधरु ीं िेन ं॑ रहै, “वे के वल इनके दल्े ही नहीं, अांदगकय ियषय बोलने वयले सिी लोगों के दलए बहुत खयस और एकिम अपने थे ।” फे रू वू रयजस्थयनी ड्रय्वर हमरऽ पयनी स ं॑ अांदगकय ियसय के बयरे मां ं॑ पूछे लयगलऽ रहै । कयर स ं॑ उतरी कं॑ ‘आमेर दकलय’ के प्रयांगन में पहुचाँ ी कं॑ सबसें पहने डॉ. चकोर के मोबयईल पर सांपकट करी कं॑ चयची ( हुनकऽ अर्द्यांदगनी श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश)ु स ं॑ सांपकट करै के कोदसस करदल्ै त ं॑ पतय चललै दक मोबयईल हुनकऽ ियमयि – श्री वीरेन्द्रजी लगयाँ छे लै आरू तखनी हुनी दबहयर दहन्िी सयदहय् सममेलन िवन मां ं॑ रयखलऽ डॉ. चकोर के पयदथट व सरीर के पयस रहै । दनधन के बयरे मां ं॑ हुनी सब दवस्तयर सां ं॑ बतैलकै फे रू कहलकै , “तोरऽ फोन लगयबै के बड् डी कोदसस करदलहौं पर नेटवकट के बयहर बतयबै छे ल्हौं ।“ फे रू कहलकै दक घऽर पहुचाँ लय के बयि अब ं॑ रयथैं मां ं॑ चयची स ं॑ बयत हुअ ं॑ सकतै । ‘आमेर दकलय’ म ं॑ हमरय वयस्तें िेखै लेली कुछू न्य नै रहै, लगिग पच्चीस सयल पहने एक बयर घूमी कं॑ गेलऽ रदह्ै । ्हयाँ आबै के मख्ु ् उद्देस्​् आपनऽ बच्चय दसनी कं॑ ्हयाँकरऽ िव्तय,

“ मरू ी आढ़ी मं ॑ करी क॑ कप ी - फफकी क॑ कानतं ॑ हमरऽ आाँखी के लोऽर बगल के ीटऽ पर बैठलऽ राजस्थानी ड्रायवर के नजर म ॑ आबी गेलऽ रहै, पूछ ॑ लागलै, “ र, लगता है आपके मक ी बहत खा बं धं ी का मनधन हो गया है ।” जबाब हमरऽ बजाय पीछू के ीट पर बच्चा म नी थं ॑ बैठलऽ हमरऽ पत्नी, माधुरीं देन ॑ रहै, “वे के वल इनके मलये ही नहीं, अंमगका भाषा बोलने वाले भी लोगों के मलए बहत खा और एकदम अपने थे ।” वैिवतय आरू ऐदतहयदसकतय के िरसन करयनय रहै । ्ोजनय छे लै दक आपनऽ पयनी आरू िूनू बच्चय कं॑ हममां ं॑ खिु वहयाँकरऽ चप्पय-चप्पय के जयनकयरी िेदत्ै । पर चकोर जी के दनधन के समयचयर स ं॑ हतोउयसयदहत हममां ं॑ वैन्हऽ मनःदस्थदत म ं॑ नै छे दल्ै । सां्ोग स ं॑ पच्चीस सयल पहने हमरऽ गयइड बनी कं॑ जे हमरय ्हयाँकरऽ जयनकयरी िेने रहै, ओखरै स ं॑ मल ु यकयत ि ं॑ गेलै । गयइड के उमर अब ं॑ ८०सयल के करीब हो् गेलऽ रहै । हुनकै आपनऽ

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

117


सयथें करी कं॑ भ्रमन करै लगदल्ै । गयइड सथें घूमी कं॑ बच्चयां दसनी खूब आनांि उठैने रहै ‘आमेर दकलय’ भ्रमन के । आरू हममां ं॑ बस चकोर जी के िव्, ऐदतहयदसक, क्रयांदतकयरी आरू अलौदकक स्वरूप के िरसन करी – करी मने-मऽन मांत्र मग्ु ध हो् रहलांऽ छे लयां । हुनकय मने-मऽन नमन करी रहलांऽ छे लयाँ सथें अपनय कं॑ ियग्​्वयन समझी-समझी धन्​् हो् रहलऽ छे लयाँ दक हुनकऽ ऐन्हऽ दिव् आयमय के सयदनध्​् म ं॑ आपनऽ दजनगी के तनी टय पल दबतयबै के मौकय दमललऽ रह ं॑ । सम् सबसां ं॑ बडऽ सयिी हो् छै – तेज, तरयट र, धयरियर । को् िी घटनयक्रम आरू त्​् कं॑ बडय महीन तरीकय स ं॑ इदतहयस के पन्नय प ं॑ दलदपबर्द् करै स ं॑ हदगट ज नै चूकै छै । इ लेली इदतहयस बनी चक ु लऽ चकोरजी के अांदगकय ियसय उयथयन लेली करलऽ गेलऽ य्यग – तपस्​्य के सही मूल्​्यांकन त ं॑ आबै वयलय सम् ही करतै । ज्परु के रऽ होटल म ं॑ लौटलय के बयि त् होलै दक िू-तीन दिनय के अन्िर ही जे घमु नय छै घमु ी-घयमी कं॑ हममां ं॑ पटनय पहुचाँ ी जयाँव आरू बयाँकी जऽन वयपस मांबु ई । सबसां ं॑ बडऽ समस्​्य न्य प्रोग्रयमऽ के दहसयबऽ स ं॑ दटकट के उपलब्धतय कं॑ ल ं॑ कं॑ हो् रहलऽ

“ मय ब ं ॑ बड़ऽ ािी होय छै । कोय भी घटनाक्म आरू तथ्य क॑ बड़ा महीन तरीका ॑ इमतहा के पन्द्ना प ॑ मलमपबद्ध करै ं ॑ हमगथज नै चूकै छै । इ लेली इमतहा बनी चुकलऽ चकोरजी के अंमगका भा ा उत्थान लेली करलऽ गेलऽ त्याग – तपस्या के ही मल्ू यांकन त ॑ आबै वाला मय ही करतै ।” छे लै । इ बीच डॉ. चकोर के रऽ दनधन के समयचयर बयि में डॉ. चकोर के रऽ पत्रु श्री दवधशु ेखरजी आरू श्री इन्िशु ेखरजी के अलयवे अांदगकय के सयदहय्कयर श्री सधु ीर प्रोग्रयमर जी आरू श्री आर. प्रवेश जी सां ं॑ िी दमललऽ रहै । तखनी हममां ं॑ ज्परु स ं॑ अजमेर पहुचाँ ी कं॑ वहयाँकरऽ नवदनमयट नयधीन ए्रपोटट म ं॑ पिस्थयदपत इांजीदन्ररांग कॉलेज के आपनऽ क्लयसमेट श्री सनु ील कुमयर जी लगयाँ ठहरलऽ छे दल्ै । श्री सनु ील जी के ्हयाँ रूकी कं॑ हुनके सथां ं॑ अजमेर, पष्ट्ु कर, उि्परु , मयउांट आबू आदि के भ्रमन के आगू के रऽ प्रोग्रयम छे लै । पर वहयाँ पहुचाँ ी कं॑ खयली अजमेर, पष्ट्ु कर घूमी कं॑ वहयाँ सां ं॑ जल्िी स ं॑ जल्िी दनकलै वयस्तां ं॑ दटकट के व्वस्थय मां ं॑ लगी गेदल्ै । छुट्टी आरू य्ोहयर के मौसम चलतां ं॑ अजमेर स ं॑ मांबु ई आरू पटनय लेली सोझे जय् वयलय कोनो रेन म ं॑ दटकट नै दमललै । सां्ोग स ं॑ जब ं॑ चयची (श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश)ु के फोन ऐलऽ रहै इ पूछै लेली दक हममां ं॑ कदह्य तयाँ् पटनय पहुचाँ ी रहलऽ दछ्ै, तब तलक ‘अजमेर-शतयब्िी’ मां ं॑ दिल्ली तक के 118

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


दटकट दमली गेलऽ रहै । ओकरऽ आगू के दटकट प्रतीिय सूची मां ं॑ रहै । दिल्ली पहुचाँ तां-ं॑ पहुचाँ तां ं॑ दटकट कां फमट हो् गेलऽ रहै । दिल्ली स ं॑ पररवयर के बयाँकी जनऽ कं॑ मांबु ई रवयनय करी कं॑ हममां ं॑ ‘पटनय रयजधयनी’ रेन स ं॑ २१ नवांबर कं॑ िोरे-िोर पटनय पहुचाँ लऽ रदह्ै । दबहयन १०-११ बजे के आसपयस डॉ. चकोर के आवयस पर पहुचाँ लय पर सबसां ं॑ पहन ं॑ डॉ. चकोर के ज्​्ेस्ठ पत्रु श्री शदशशेखर जी सां ं॑ आरो ओकरऽ बयि चयची (श्रीमती द्रौपिी दिव्यांश)ु आरू बयाँकी सब स ं॑ िेंट होलऽ रहै । श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु के रऽ धै्ट आरू सयहस िेखथैं बनै छे लै । िेखथैं बोललै, “आबी गेल्हैं र ं॑ कांु िन ? ” हमरय महुाँ ऽ सां ं॑ तनी िेर लेली कोनो बोली नै दनकललै, फे रू बोलदल्ै, “चयचय (डॉ. चकोर) एतनय जल्िी चल्लऽ जैतै ...अांियजय नै रहै... कम स ं॑ कम िस सयल आरू रहनय छे लै, हुनकय ।” डॉ. चकोर के रऽ जीवन के रऽ अांदतम िन के बयरे म ं॑ सब कुछ बतैलय के बयि चयची आगू बोललै, “हुनी त ं॑ गेलय....तोरय सबसां ं॑ जयिे ्यि करै छे लौ...तोरय ऊपर पूरय िरोसय... कांु िनें आगू ब़िैतै ‘अांग मयधरु ी’ कं॑, रूकं॑ नै िेतै, चलैतां ं॑ रहतै ।” हममां ं॑ बस चयची कं॑ तयकतां ं॑ रही गेलऽ छे दल्ै, दिांजलऽ मनऽ स ं॑ ्ह ं॑ बोल ं॑ पयरल ं॑ छे दल्ै, “‘अांग मयधरु ी’ दनकलतां ं॑ रहतै चयची, पहलकरे ऐसनऽ लगयतयर, िगवयन अपनय सब कं॑ एतनय सदि िेन ं॑ छै , एतनय सयम्​्ट वयन बनैन ं॑ छै दक एकरऽ प्रकयसन कदह्ो नै रूकतै ।” हममां ं॑ महसूस करदल्ै दक “ डॉ. चकोर के रऽ जीवन के रऽ अंमतम िन के बारे म ॑ ब कुछ बतैला के बाद चाची आगू बोललै, “हनी त ॑ गेला....तोरा ब ं ॑ जादे याद करै छेलौ...तोरा ऊपर पूरा भरो ा... कुंदनें आगू बढ़ै तै ‘अंग माधुरी’ क॑, रूक॑ नै देतै, चलैतं ॑ रहतै ।” हम्मं ॑ ब चाची क॑ ताकतं ॑ रही गेलऽ छेमलयै, मभंजलऽ मनऽ ॑ यह ॑ बोल ॑ पारल ॑ छेमलयै, “ ‘अंग माधुरी’ मनकलतं ॑ रहतै चाची, पहलकरे ऐ नऽ लगातार, भगवान अपना ब क॑ एतना मक्त देन ॑ छै , एतना ामथ्यथवान बनैन ॑ छै मक एकरऽ प्रका न कमहयो नै रूकतै ।” ” चयचीं ‘अांग मयधरु ी’ कं॑ आपनऽ आाँचरऽ मां ं॑ छुपय् दसद्दत स ं॑ प्​्यर स ं॑ जे सींचतां ं॑ आबी रहलऽ छै ओह ं॑ ममयव कं॑ बरकरयर रखतां ं॑ एकरऽ अदस्तयव बनैन ं॑ रयखै लेली, एकरय फलतां ं॑ -फूलतां ं॑ िेखतां ं॑ रह ं॑ िै म ं॑ सांपयिक के रूप म ं॑ हमरऽ ्ोगियन लेली हमरय सां ं॑ आस्वयसन चयहै छे लै । हममां ं॑ बस ्ह ं॑ कहदल्े दक चयची ई त ं॑ हमरऽ फजट छे कै जेकरय दनियबै मां ं॑ हमरय खस ु ी ही दमलतै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

119


हममां ं॑ महसूस करदल्े दक इ चयची के एगो आिेस जेनय ही छे लै दक हमरय ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ सांपयिन करनय छै । जेकरय टयलनय मदु स्कल ही छे लै । आिेस टयलै के मतलब सयमने वयलय के ियवनय के तौहीन आरू आपनऽ अहम दजममेियरी सां ं॑ ियगनय होदत्ै । चयची के आिेस के पयलन मां ं॑ ही चयचय कं॑ िेलऽ गेलऽ हमरऽ आस्वयसन आरू वचन िी पूरय हो् रहलऽ छे लै । हममां ं॑ इ िी महसूस करदल्ै दक आ् स ं॑ ४२ सयल पहने जब ं॑ हमम ं॑ बतु रू छे दल्ै चयची एकिम ऐन्हैं हमरय आपनऽ अाँचरय मां ं॑ छुपय् लै छे लै आरू चयचय (डॉ. चकोर) स ं॑ झगडय करी लै छे लै, बोलै छे लै, “जबरिस्ती इसकूल-होस्टल नै िेज ं॑ िेिौं, अखनी स ं॑ कत्त ं॑ प़ितै बूतरू ?” डॉ. चकोर जब ं॑ बोलै रहै दक की कहतै गोरेलयलें (हमरऽ बयबू स्व. श्री गोरेलयल मनीषी) – एक िू दिनय लेली ्हयाँ रयखन ं॑ छे लै इसकूल खल ु लय प ं॑ होस्टल मां ं॑ छोडी िै लेली – आरू इ त ं॑ महीनय िू महीनय स ं॑ ्हीं पडलऽ छै । इसकूल म ं॑ पडैवयलय हर लांबय छुट्टी पर ्ह ं॑ दखस्सय िोहरैलऽ जय् । इसकूल “इ चाची के एगो आदे जेना ही छेलै मक हमरा ‘अंग माधरु ी’ के रऽ पं ादन करना छै । जेकरा टालना ममु स्कल ही छेलै । आदे टालै के मतलब ामने वाला के भावना के तौहीन आरू आपनऽ अहम मजम्मेदारी ॑ भागना होमतयै । चाची के आदे के पालन मं ॑ ही चाचा क॑ देलऽ गेलऽ हमरऽ आस्वा न आरू वचन भी पूरा होय रहलऽ छेलै ।”

के रऽ छुट्टी खतम होलय पर गयाँव स ं॑ पटनय ऐलय के बयि चयचय-चयची के िरसन बगैर होस्टल मां ं॑ डेग नै रखयबै । ऐन्हऽ हर मौकय पर आदखर म ं॑ जीत चयची के रऽ हो् छे लै । िरअसल एक्के इलयकय के होलय स ं॑ आरू एक्के इसकूली स ं॑ प़िय् करलय के कयरन हमरऽ बयबू श्री मनीषी आरू डॉ. चकोर कयफी घदनस्ट दमत्र रहै । ियगलपरु इांजीदन्ररांग कॉलेज स ं॑ इांजीदन्ररांग करलय के बयि दबहयर सरकयर के रऽ दसांचयई दवियग म ं॑ नौकरी करतें हुअ ं॑ सन १९७३ई. म ं॑ हुनकऽ पोदस्टांग कुछ महीनय लेली पटनय होलऽ रहै आरू डॉ. चकोर के मोहल्लय मां ं॑ ही रहै छे लै । बयबू न ं॑ अच्छय प़िय् लेली हमरऽ नयमयांकन ्ह ं॑ बोररांग रोड मोहल्लय के एगऽ इसकूल, ‘पटनय मॉन्टेसरी स्कूल’ म ं॑ करय् कं॑ एकरऽ होस्टल म ं॑ रखी िेन ं॑ रहै । एकरऽ पहने तलक हममां ं॑ आपनऽ गयमऽ के बगल के िीखनपरु गयमऽ के प्रयइमरी इसकूली म ं॑ पहलय किय मां ं॑ प़िै रदह्ै । कुछ महीनय बयि ही बयबू के रऽ ्हयाँ स ं॑ रयांसफर हो् गेलऽ रहै आरू डॉ. चकोर हमरऽ स्थयनी् अदि​ियवक बनी गेलऽ रहै । इ तरह स ं॑ डॉ. नरेश पयण्डे् चकोर, श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु आरू दहनकऽ पररवयर स ं॑ हमरऽ पहलऽ मल ु यकयत आ् स ं॑ ४२ सयल पहने १९७३ ई. 120

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


के दिसांबर म ं॑ पटनय के दहनकऽ अखनकऽ आवयस पर ही होलऽ छे लै । तखनी हममां ं॑ ६ सयल के रऽ एगो बतु रू छे दल्ै । बचपन स ं॑ डॉ. चकोर कं॑ चयचय आरू श्रीमती दिव्यांशु कं॑ चयची ही पक ु यरतां ं॑ ऐलऽ दछ्ै । ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ प्रकयसन प्रयरमि होनय तखनी करीब तीन सयल होलऽ रहै । ियगलपरु दजलयन्तगट त सल ु तयनगांज स ं॑ िदक्खन करीब १२ दक.मी. िूर दस्थत एगो एकिम ठेठ िेहयती गयाँव खयनपरु मयल स ं॑ पहलऽ िफय रयजधयनी ऐलऽ रदह्ै । सब्िे कुछ “डॉ. नरेश पाण्डेय चकोर, श्रीमती रौपदी मदव्यांशु आरू महनकऽ पररवार ॑ हमरऽ पहलऽ मल ु ाकात आय ॑ ४२ ाल पहने १९७३ ई. के मद बं र मं ॑ पटना के महनकऽ अखनकऽ आवा पर ही होलऽ छेलै । तखनी हम्मं ॑ ६ ाल के रऽ एगो बुतरू छेमलयै । बचपन ं ॑ डॉ. चकोर क॑ चाचा आरू श्रीमती मदव्यांशु क॑ चाची ही पुकारतं ॑ ऐलऽ मछयै । ‘अंग माधुरी’ के प्रका न प्रारम्भ होना तखनी करीब तीन ाल होलऽ रहै । “

एकिम न्ऽ–न्ऽ लयगै । स्कूल आरू होस्टल के जीवन एकिम अनस ु यदसत । कहयाँ बोरर्य पर बैठी कं॑ दसलेट पर दलखी कं॑ मरु ् के डटकी सां ं॑ मेटय् कं॑ प़ियई करै के गयमी इसकूली के मयहौल आरू कहयाँ कॉन्वेंट स्टयइल मां ं॑ प़िय् के रऽ पटनय के इ इसकूली के मयहौल । जमीन – आसमयन के रऽ फरक छे लै । कपडय लत्तय पहनै के तौर-तरीकय सब कुछ एकिम अलग । गयमऽ म ं॑ कहयाँ वू असरगांज हदट्य के रऽ मयमय (ियिी) के लयनलऽ अांगय-पैंटय कं॑ पहनतें रहनय आरू ्हयाँ दक सबकुछ चकयचक, उपर स ं॑ टय् आरू बेल्ट अलग स ं॑ । गयमऽ के इसकूली म ं॑ छुट्टी के घांटी बजथैं िरबदन्य मयरी कं॑ एक्के िरबन म ं॑ डयाँर आरू बैहयर टप्पी कं॑ घऽर तक पहुचाँ ी जयनय जबदक ्हयाँ सब्िेकुछ पांदिबर्द् हो् कं॑ करनय । को् जोर नै छे लै गयमऽ आरू ्हयाँकरऽ जीवनसैली म ं॑ । हर तरह स ं॑ पटनय के इसकूली जीवन बेहतर छे लै । पर दफर िी बाँधलऽ–बाँधलऽ लयगै । होस्टल स ं॑ बीचऽ– बीचऽ म ं॑ डॉ. चकोर के घऽर जइ्ै त ं॑ खल ु लऽ–खल ु लऽ लयगै । हुनकय ्हयाँकरऽ अांदगकय ियसय के मयहौल स ं॑ लयगै जेनय आपनऽ गयमै-घरऽ म ं॑ दछ्ै । चयचय-चयची आरू मय्-बयबू के िल ु यर म ं॑ हममां ं॑ फरक नै कर ं॑ सदक्ै । एकिम दबल्कुल आपनऽ रकम के प्​्यर आरू िल ु बल ु (दवधशु ेखर) आरू हममां ं॑ हमउमर रदह्ै आरू ु यर दमलै छे लै हुनकय ्हयाँ । बल एक्के क्लयस के रऽ दवद्ययथी छे दल्ै, खयली इसकूल अलग-अलग छे लै । इ लेली स ं॑ हमरय िूनू के एक्के सयथ खेलनय–कूिनय, उठनय-बैठनय जयिे हो् छे लै । घऽर ऐन्हऽ उन्मि ु वयतयवरन दमललय स ं॑ हुनकय ्हयाँ गेलय पर फे रू स ं॑ होस्टल लौटै के मऽन नै करै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

121


हमरय आपनऽ बचपन स ं॑ ही डॉ. चकोर ऐन्हऽ ऐदतहयदसक परू ु स कं॑ बहुत करीब सां ं॑ िेखै के सयथ-सयथ हुनकऽ सयदनध्​् म ं॑ रहै के सौियग्​् प्रयप्त होलऽ छै । ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ प्रकयसन के रऽ एकिम सरू ु आती िौर रहै वू । हुनी तखनी रूप-रांग, पहनयवयओ़ियवय मां ं॑ को् िी अांगरेज अदधकयरी कं॑ मयत िै छे लै । तखनी मस्तक पर दटक्कय नै लगयबै रहै । हुनकऽ दजांिगी तखनी िी अांदगकय आरू ‘अांग मयधरु ी’ के इिट -दगिट ही घूमै छे लै । िजन-कीतट न िी सयथ-सयथ तखदन्ो चलै रहै । सयाँझै आबै त ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ के बयत, िोरे दनकलै त ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ के बयत । बच्चय सब के रऽ प़िय् दलखय् के सयथसयथ सांगीत, दचत्रकयरी आदि के दसिय दिलयबै पर जोर रहै छे लै । हममां ं॑ जों महीनय-महीनय िर िी रूकी जइ्ै, तदि्ो एक्को बयर हुनकय झांझ ु लैतें नै िेखदल्ै उल्टय सयाँझैं जब ं॑ ऑदफस स ं॑ लौटी कं॑ आबै त ं॑ चयची स ं॑ पूछतां ं॑ रहै छे लै, “कांु िन के की हयल चयल छै ?” “ अंग माधरु ी’ के रऽ प्रका न के रऽ एकदम रू ु आती दौर रहै वू । डॉ. चकोर तखनी रूप-रंग, पहनावा-ओढ़ावा में कोय भी अंगरेज अमधकारी क॑ मात दै छेलै । तखनी मस्तक पर मटक्का नै लगाबै रहै । हनकऽ मजंदगी तखनी भी अंमगका आरू ‘अंग माधुरी’ के इदथ-मगदथ ही घूमै छेलै । ा​ाँझै आबै त ॑ ‘अंग माधरु ी’ के बात, भोरे मनकलै त ॑ ‘अंग माधरु ी’ के बात ।” इमरजेंसी के सम् आरू पटनय म ं॑ बय़ि के कदठन सम् हममां ं॑ बोररांग रोड के रऽ स्कूल के होस्टल मां ं॑ रही कं॑ दबतैने रदह्ै आरू हुनकऽ सांपकट मां ं॑ छे दलऐ । अांदतम बयर जब ं॑ हममां ं॑ हुनकय ्हयाँ रुकलऽ रदह्ै वू सम् छे लै पटनय मां ं॑ सन १९७५ ई. के रऽ ि्ांकर बूहऽ के लगिग चयर-पयाँच महीनय बयि के रऽ । वू बूहऽ म ं॑ बोररांग रोड म ं॑ सबसां ं॑ जयिे पयनी िरलय के कयरन सबसां ं॑ जयिे तबयही मचलऽ छे लै । स्कूल होस्टल म ं॑ रहतां ं॑ हममां ं॑ बूहऽ मां ं॑ फाँ सलऽ छे दल्ै । लगिग सप्तयह िर छऽत पर ही दबतयबै ल ं॑ पडलऽ छे लै । हेदलकॉप्टर सां ं॑ दगरैलऽ गेलऽ खयनय-पयनी ही दजांिगी के आधयर छे लै । बयि मां ं॑ हमरय सबकं॑ सेनय के रऽ जवयनें नयव स ं॑ गयाँधी मैियन लगयाँकरऽ सेंट जेदव्सट स्कूल के रऽ कै मप म ं॑ पहुचाँ ैन ं॑ रहै । ओकरऽ बयि वहीं स ं॑ बयबूजी सथां ं॑ गयाँव लौटी गेलऽ रदह्ै । एक-डे़ि महीनय बयि जब ं॑ स्कूल खल ु लऽ रहै त ं॑ पटनय ऐलऽ रदह्ै । डॉ. चकोर ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ कॉपी सख ु यबै में लयगलऽ रहै । गयमऽ मां ं॑ जेनय धयन आरू अनयज सख ु ैलऽ जय् छै ठीक ओन्हैं छतऽ पर पसयरी कं॑ । सन १९७५ ई. के रऽ ि्ांकर बूहऽ मां ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ आरू अांदगकय के रऽ बहुत्ते दकतयब दसनी कं॑ बडय नक ु सयन पहुचाँ लऽ छे लै । 122 अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


ओकरऽ बयि हममां ं॑ फे रू स ं॑ गयाँव आबी गेलऽ रदह्ै आरो एक िू सयल गयमऽ के आसपयस के इसकूली मां ं॑ प़िय् करलय के बयि बयबू के रयांसफर के कयरन नेपयल सीमय स ं॑ लयगलऽ दमदथलय िेत्र के रऽ कुनौली पहुचाँ ी गेलऽ रदह्ै । ्हीं प ं॑ 1978 ई. मां ं॑ हममां ं॑ आपनऽ पहलऽ अांदगकय रचनय दलखन ं॑ छे दल्ै जे ओह ं॑ सयल के ‘अांग मयधरु ी’ में डॉ. चकोर न ं॑ छयपन ं॑ छे लै । कुछ सयलऽ के बयि जमशेिपरु चल्लऽ गेलऽ रदह्ै । ओकरऽ बयि हुनकय स ं॑ िेंट होलऽ रहै शांिगु ज ां हय् स्कूल म ं॑ आ्ोदजत ‘अदखल ियरती् अांदगकय सयदहय् व “हनी बड़ा स्नेह आरू प्यार ें अंमगका के नयऽ–नयऽ प्रकाम त मकताब ब हमरा ल ॑ जाब ॑ लेली दै छेलै । हम्में जब ॑ पूछै छेमलयै मक के तना भेलै चाचा ? हनकऽ दैव यह ॑ जबाब रहै मक हमरा कुछू दै के जरूरत नै छै । पर हम्मं ॑ हमे ा मजद करी क॑ ब मकताबऽ के पै ा चुकाय क॑ ही मकताब अपना ाथें ल ॑ जाय छेमलयै ।”

कलय मांच’ के कदव सममेलन म ं॑ 1990 ई. के आसपयस । तखनी हममां ं॑ दबडलय इांस्टीच्​्ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रयाँची म ं॑ प़िी रहलऽ छे दल्ै । हुनकऽ आमांत्रन पर हममां ं॑ कय्ट क्रम म ं॑ दहस्सय लै लेली पहुचाँ लऽ रदह्ै । बीचऽ–बीचऽ म ं॑ बयहर रहत ं॑ हुअ ं॑ जब ं॑ िी पटनय आबै छे दल्ै हुनकय स ं॑ दमलै लेली हुनकऽ आवयस पर जरूर जय् छे दल्ै । हुनी बडय स्नेह आरू प्​्यर स ं॑ अांदगकय के न्ऽ–न्ऽ प्रकयदसत दकतयब सब हमरय ल ं॑ जयब ं॑ लेली िै छे लै । हममां ं॑ जब ं॑ पूछै छे दल्ै दक के तनय िेलै चयचय ? हुनकऽ सिैव ्ह ं॑ जबयब रहै दक हमरय कुछू िै के जरूरत नै छै । पर हममां ं॑ हमेसय दजि करी कं॑ सब दकतयबऽ के पैसय चक ु य् कं॑ ही दकतयब अपनय सयथां ं॑ ल ं॑ जय् छे दल्ै । फे रू पटनय स ं॑ बयहर रह ं॑ लगलय प ं॑ पत्र आरू ‘अांग मयधरु ी’ ही िूगो मयध्​्म छे लै हुनकय स ं॑ समपकट मां ं॑ रहै के , बयि म ं॑ दचट्टी के रऽ जगह फोन ल ं॑ लेन ं॑ रहै । हुनी पत्र के जबयब सम्बर्द् तरीकय स ं॑ जरूर िै छे लै । सन 1992 ई. म ं॑ हमरऽ बयबू के रयांसफर जमशेिपरु स ं॑ पटनय हो् गेलऽ रहै । तखनी हमरऽ इांजीदन्ररांग िी पूरय हो् गेलऽ रहै । कैं पस म ं॑ ही नौकरी दमली गेलय स ं॑ सरू ु म ं॑ पटनय स ं॑ बयहर ही रहै छे दल्ै । बयि म ं॑ नौकरी छोडी कं॑ सरकयरी नौकरी के तै्यरी लेली आपनऽ मय्-बयबू लगयाँ पटनय ही रह ं॑ लयगलऽ छे दल्ै । ई तरह पटनय म ं॑ एक बयर फे रू 1994 ई. स ं॑ 1996 ई. तक हुनकय सथां ं॑ सम् दबतयबै के मौकय दमललै । तखनी ज्िगु यट प्रेस महेंद्रू सां ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ छपै छे लै । बहुत बयर प्रूफ चेदकां ग, फयइनल प्रूफ वगैरह के दसलदसलय मां ं॑ प्रेस जय् के मौकय दमलै रहै ।’अांग मयधरु ी’ के रऽ प्रकयसन के

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

123


दसलदसलय म ं॑ करकरौआ रौिी मां ं॑ हुनकय गयाँधी मैियन स ं॑ महेन्द्रू पैिले ऐतां-ं॑ जैतां ं॑ िेखन ं॑ छे दल्ै । कई िफय हमरौ जौरां ं॑ ल ं॑ ल ं॑ छे लै आरू गप-सप करतां ं॑ कखनी गयाँधी मैियन स ं॑ महेन्द्रू पहुचाँ ी जइ्ै आरू वयपस लौटै छे दल्ै पतय नै चलै छे लै । पटनय मां ं॑ रही कं॑ हुनकय सथां ं॑ दन्दमत रूप सां ं॑ अलग-अलग सयदहदय्क सांस्थय के रऽ बहुत्ते सयदहदय्क आरू कदव गोस्ठी सब मां ं॑ दहस्सय लै के रऽ अवसर दमलतां ं॑ रहै छे लै । ्ह ं॑ िरम्यन तदह्े प्रियत खबर मां ं॑ समसयमद्क दबस्ऽ पर अांदगकय ियसय म ं॑ दलखलऽ आलेख के हमरऽ दन्दमत सयप्तयदहक कॉलम “अांदगकय सांवयि – अबरी ियफी” छपै छे लै । मख्ु ् धयरय के एगो दहांिी ियसय के रऽ अखबयरऽ मां ं॑ अांदगकय ियसय के दन्दमत कॉलम दलखै के रऽ ई पहलऽ ऐदतहयदसक प्र्यस छे लै । दहांिी के रऽ अखबयरऽ म ं॑ अांदगकय

“ यह ॑ दरम्यान तमहये प्रभात खबर मं ॑ म ाममयक मब यऽ पर अंमगका भा ा मं ॑ मलखलऽ आलेख के हमरऽ मनयममत ाप्तामहक कॉलम “अंमगका वं ाद – अबरी दाफी” छपै छेलै । मख्ु य धारा के एगो महंदी भा ा के रऽ अखबारऽ म ॑ अंमगका भा ा के मनयममत कॉलम मलखै के रऽ इ पहलऽ ऐमतहाम क प्रया छेलै । महंदी के रऽ अखबारऽ म ॑ अंमगका भा ा के मनयममत कॉलम के प्रका न देखी क॑ हनकऽ प्र न्द्नता आरू आत्म तं ुमस्ट के रऽ स्तर रंग के रऽ ऊाँचाई तक पहचाँ ी जाय ।” ियसय के दन्दमत कॉलम के प्रकयसन िेखी कं॑ हुनकऽ प्रसन्नतय आरू आयम सांतदु स्ट के रऽ स्तर सरांग के रऽ ऊाँचयई तक पहुचाँ ी जय् । हमरऽ 1996 ई. के रऽ मयचट मां ं॑ मांबु ई आबै के पहने तलक ई सब चलतां ं॑ रहलै । मांबु ई ऐलय के बयि चयर-पयाँच सयल तक कयम मां ं॑ अय्दधक व्स्ततय के चलतां ं॑ आरू सांवयि के आसयन मयध्​्म के अियव मां ं॑ हुनकय स ं॑ नै के बरयबर सांवयि होलऽ रहै । पर मोबयईल के सदु वधय ऐथैं सन 2000 ई. मां ं॑ एक बयर दफर जे सांवयि स्थयदपत होलै, आजीवन चलतां ं॑ रहलै । मांबु ई म ं॑ रही कं॑ अांदगकय सांबधां ी जयनकयरी प्रयप्त करै के रऽ पहलऽ आरू अांदतम प्रयमयदनक जरर्य हुदन्े हो् छे लय । हमरय िी अांदगकय सांबधां ी को् िी न्ऽ जयनकयरी सयझय करनय रहै छे लै त ं॑ हुनकै सिसां ं॑ पहने बतयबै रदह्ै । चयहे वू अांदगकय गूगल सचट इांजन,अांदगकय दवदकपीदड्य, अांदगकय.कॉम के रऽ दनरमयन के बयत हुअ ं॑ 124

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


्य दफर इांगलैंड म ं॑ आ्ोदजत ‘अांतरयट ष्ट्री् बहुियषी् सांगोष्ठी’ म ं॑ अांदगकय ियसय के प्रदतदनदध के रूप म ं॑ हमरऽ ियग लै के बयत हुअ,ं॑ अांदगकय ियसय लेली अांतरयट स्री् ियसय कोड हयदसल करै के बयत हुअ,ं॑ ऐपल मोबयईल में अांदगकय ियसय टयइप करै के सदु वधय उपलब्ध हुऐ के बयत हुअ ं॑ ्य दफर आपनऽ दकतयबऽ दसनी के पी.डी.एफ.सांस्करन म ं॑ प्रकयसन के बयत हुअ ं॑ हममां ं॑ सबसां ं॑ पहने डॉ. चकोर कं॑ ही बतयबै रदह्ै । हमरय बतैलय पर हुनी बहुत खस ु हो् छे लै, फे रू दलखी कं॑ िेजी िै ल ं॑ कहै जेकरय सां ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ म ं॑ “ चाहे वू अंमगका मवमकपीमडया, अंमगका.कॉम के रऽ मनरमान के बात हअ॑ या मफर इंगलैंड म॑ आयोमजत ‘अंतराथष्ट्रीय बहभाषीय गं ोष्ठी’ म॑ अंमगका भा ा के प्रमतमनमध के रूप म ॑ हमरऽ भाग लै के बात हअ॑, अंमगका भा ा लेली अंतराथस्रीय भा ा कोड हाम ल करै के बात हअ॑, ऐपल मोबाईल में अंमगका भा ा टाइप करै के मु वधा उपलब्ध हऐ के बात हअ॑ या मफर आपनऽ मकताबऽ म नी के पी.डी.एफ. स्ं करन म॑ प्रका न के बात हअ॑ हम्मं ॑ ब ं ॑ पहने डॉ. चकोर क॑ ही बताबै रमहयै ।”

छयपलऽ जयब ं॑ पयर ं॑ । हमरय ्यि छै दक सन 2005 ई. मां ं॑ जब ं॑ नयवे िेजलऽ हमरऽ आवेिन पर गांिीरतय स ं॑ दवचयर करी कं॑ दनरन् लेलय के बयि अांदगकय ियसय कं॑ जब ं॑ अांतरयट स्री् ियसय कोड हयदसल होलऽ रहै ओकरऽ जयनकयरी हमरय रयत के लगिग एक बजे दमललऽ रहै । हममां ं॑ एतनय खस ु छे दल्ै दक तखदन्े डॉ. चकोर कं॑ फोन करदल्े आरू जब ं॑ बयत खतम हो् प ं॑ छे लै त ं॑ ध्​्यन ऐलै दक एतनय रयत कं॑ फोन करी कं॑ कहीं हुनकऽ नींि त ं॑ खरयब नै करी िेदल्ै । पर हुनी बड् डी खस ु होलऽ रहै आरू बधयई, आदसरवयि िेतां ं॑ दवस्तयर स ं॑ एकरय बयरे मां ं॑ पूछ ं॑ लयगलऽ रहै । हममां ं॑ ्ह ं॑ कहन ं॑ छे दल्ै दक ई एक तरह स ं॑ अन्न् ियसय के रूप म ं॑ अांदगकय कं॑ अांतरयट स्री् मयन्​्तय दमलनय छे कै । मांबु ई म ं॑ ही २००७ ई. के दिसांबर मां ं॑ होलऽ एक िीसनतम कयर िघु ट टनय मां ं॑ हममां ं॑ बहुत गांिीर रूप सां ं॑ घय्ल हो्कं॑ मरनयसन्न दस्थदत म ं॑ पहुचाँ ी गेलऽ रदह्ै । दज्ै के को् िरोसय नै रहै । हमरऽ दसर लगिग िू टुकडय म ं॑ बाँटी गेलऽ छे लै । मेरूिांड (स्पयइनल कॉडट ) म ं॑ गांिीर चोट ऐलऽ रहै । सीनय आरू कमर म ं॑ िी गांिीर चोट ऐलऽ रहै । महीनों दजांिगी आरू मौत स ं॑ जूझतां ं॑ रहलऽ छे दल्ै । इ हयिसय स ं॑ कुछ हि तक उबरै म ं॑ हमरय बरसों लगी गेलऽ रहै । अिी दपछलय सयल के ही बयत छे कै जब ं॑ दपछलय कयर िघु ट टनय स ं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

125


प्रियदवत कमजोर अांगऽ के चलतां ं॑ लगिग एक सयल फे रू स ं॑ पूरय तरह स ं॑ सय्​्यग्रस्त रहै ल ं॑ पडलऽ छे लै । दस्थदत इ छे लै दक बैठलऽ िी नै जयब ं॑ सकं॑ छे लै । ऐन्हऽ दिनय मां ं॑ िी हुनकऽ कुछ सप्तयह के अांतरयल पर फोन ऐतां ं॑ रहै छे लै हमरऽ हयलचयल जयनै लेली । ई हुनकऽ महयनतय ही छे लै । हुनकय स ं॑ परस्पर गहरऽ लगयव आरू आयमी्तय वयलय सांबधां रहै । हर सख ु -िःु ख के अवसर पर एक-िोसरय के ्हयाँ आनय–जयनय छे लै । आपनऽ हर सख ु -िःु ख िरसक आपस म ं॑ बयाँटै छे दल्ै । हुनकय स ं॑ जडु लऽ सब्िे सांस्मरन कं॑ जों पन्नय पर उतयरलऽ जय् त ं॑ एगो मोटऽ रकम के दकतयब तै्यर हुअ ं॑ पयर ं॑ । पर िू-चयर मख्ु ् बयत करनय ही कयफी रहतै ।

“अगर ध्येय ऊच्चऽ रह ॑ त ॑ चकोर जै नऽ व्यमक्तत्व के वू स्वभावगत मव े ता क॑ अपनाबै के जरूरत छै जेकरऽ बदौलत अंमगका के रऽ म ाल के रूप म ॑ प्रज्वमलत ‘अंग माधुरी’ जनपदीय भा ा के रऽ उत्थान के राहऽ के मम ाल बनी गेलै । तमभये अंमगका जै नऽ अपेिाकृत कम राजनीमतक रं िन प्राप्त भा ा ब के रुत मवका भ ं व छै ।” हमरय अांदगकय के रऽ एगो कदव व लेखक के रूप म ं॑ उियरे के अदधकयांस श्रे् परमयिरनी् डॉ. नरेश पयांडे् ‘चकोर’ कं॑ ही जय् छै । सन 1978 ई. मां ं॑ हुनी हमरऽ पहलऽ अांदगकय कदवतय कं॑ आपनऽ ्ह ं॑ अांदगकय मयदसक, ‘अांग मयधरु ी’ मां ं॑ जगह िेन ं॑ छे लय । हुनी कदवतय प्रयदप्त आरू छपै के सूचनय पोस्टकयडट स ं॑ ि ं॑ करी कं॑ प्रोयसयहन के रऽ कुछ सब्ि िी दलखन ं॑ छे लय । तखनी हममां ं॑ अठमय म ं॑ प़िै छे दल्ै । हुनकऽ प्रोयसयहन के सब्ि अांदगकय म ं॑ सयदहय् सज ृ न लेली हमरऽ हृि् म ं॑ असीम उजयट के सांचयर करै वयलय सयदबत होलऽ रहै । दपछलय सैंतीस - अडतीस सयल के अांदगकय लेखन के क्रम म ं॑ हममां ं॑ पैन ं॑ दछ्ै दक कुछे क कं॑ छोडी कं॑ सब्िे अांदगकय सयदहय्कयर डॉ. चकोर के रऽ प्रोयसयहन के ही फल छे कै । ‘अांग मयधरु ी’ इ दलहयज स ं॑ प्रय्ः हर अांदगकय सयदहय्कयरऽ के अांदगकय सयदहदय्क जगत म ं॑ पियपट न लेली प्रवेस द्वयर जैसनऽ ही छै । ‘अांग मयधरु ी’ आरू डॉ. चकोर के बयरे म ं॑ लगिग पांद्रह - बीस सयल पूवट दलखलऽ आरू शेखर प्रकयशन स ं॑ प्रकयदसत अांदगकय के अपनऽ एक पस्ु तक ‘धमस’ के िूदमकय म ं॑ दलखलऽ कुछ वयक्​् ्हयाँ िोहरय् ल ं॑ चयहै दछ्ै - “ ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ महत्तय एकरऽ रूप म ं॑ नै एगो मसयल रूपऽ मां ं॑ सतत् प्रज्वदलत हो् रहलऽ एकरऽ लौ के दनरांतरतय म ं॑ छै , जे बहुत्ते कं॑ चकोर जैसनऽ लगनसीलतय आरू धै्टतय प्रियन करी कं॑ अपनऽ मयतिृ यसय कं॑ उदचत सममयन 126 अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


दिलयबै खयदतर सतत् सांघसट रत रहै के प्रेरनय िै छै । इ सांसयर मां ं॑ अपने आप म ं॑ को् िी सांपूनट नै छै । हर म ं॑ कुछ न कुछ कमी छै । अपनय सब कं॑ हर के करौ मां ं॑ समपूनटतय के दनकटवती तयवऽ कं॑ खोजी दनकयलै के जरूरत छै । प्रय्ेक के अच्छयई कं॑ नजर म ं॑ लयनै के जरूरत छै । अगर ध्​्े् ऊच्चऽ रह ं॑ त ं॑ चकोर जैसनऽ व्दियव के वू स्वियवगत दवसेसतय कं॑ अपनयबै के जरूरत छै जेकरऽ बिौलत अांदगकय के रऽ मसयल के रूप मां ं॑ प्रज्वदलत ‘अांग मयधरु ी’ जनपिी् ियसय के रऽ उयथयन के रयहऽ के दमसयल बनी गेलै । तदि्े अांदगकय जैसनऽ अपेियकृत कम रयजनीदतक सांरिन प्रयप्त ियसय सब के द्रतु दवकयस सांिव छै ।”

“ ‘अंग माधुरी’ के रऽ महत्ता एकरऽ रूपऽ म ॑ नै एगो म ाल रूपऽ म ॑ तत् प्रज्वमलत होय रहलऽ एकरऽ लौ के मनरंतरता म ॑ छै , जे बहत्ते क॑ चकोर जै नऽ लगन ीलता आरू धैयथता प्रदान करी क॑ अपनऽ मातभ ृ ा ा क॑ उमचत म्मान मदलाबै खामतर तत् घं थरत रहै के प्रेरना दै छै ।” डॉ. चकोर द्वयरय सफलतय के एत्त ं॑ बडऽ प्रदतमयन ग़िै के पीछू के मूलमांत्र की रहै ? ई एक वयक्य स ं॑ कुछ-कुछ पतय चलै छै । ई बयत तदह्यकरऽ रहै जब ं॑ हममां ं॑ आ्. एस. सी. म ं॑ प़िै छे दल्ै । ररचडट एटनबेरो के रऽ गयाँधी दफल्म न्य-न्य ररलीज होलऽ छे लै । कदटहयर म ं॑ छे दल्ै । हममू गयाँधी दफल्म िेखै लेली वहयांकरऽ वसांत दसनेमय हॉल मां ं॑ दटकट लेली लयइन म ं॑ लगलऽ छे दल्ै । एकयएक हमरऽ नजर दटकट लेली इांतजयर करतां ं॑ बगल मां ं॑ ठयरऽ िू-तीन आिमी के रऽ एगो झडांु पर पडलै, जेकरय मां ं॑ सां ं॑ एगो के हयथऽ म ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ छे लै । हममां ं॑ हुनकय स ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ िेखै लेली मयाँगन ं॑ रदह्ै, पर हुनी नै िेन ं॑ रहै । हमरय इ बयत लेली तकलीफ होलऽ रहै । हममां ं॑ सोचदलऐ ि ं॑ िेदत्ै िेखै लेली त ं॑ की होदत्ै ? उल्टय पदत्रकय के ही प्रचयर होदत्ै । हममां ं॑ इ वयक्य के दजक्र करतां ं॑ डॉ. चकोर कं॑ एगो दचट्ठी दलखी कं॑ िेजन ं॑ रदह्ै । आपनऽ जबयब मां ं॑ हुनी दवस्तयर सां ं॑ समझैलें छे लै दक हर इांसयन के रऽ आपनऽ – आपनऽ स्वियव हो् छै । हर एक जऽन आपनऽ - आपनऽ स्वियवऽ के दहसयब स ं॑ ही आचरन करै छै । िोसरय के आचरन आरू व्वहयर स ं॑ खिु कं॑ प्रियदवत नै हुअ ं॑ िेनय चयदह्ऽ - नै त ं॑ िःु खी होनय चयदह्ऽ, नै जयिय खस ु ही । आपनऽ आचरन ठीक रखी कं॑ जीवन के रऽ लक्ष्​् पर ध्​्यन रखी कं॑ दबनय दवचदलत होतां ं॑ आगू ब़ितां ं॑ रहनय चयदह्ऽ ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

127


एक िू मौकय कं॑ छोडी कं॑ डॉ. चकोर कं॑ हममां ं॑ किी िी अांदगकय सां ं॑ इतर चीजऽ लेली अय्दधक िःु खी होतां ं॑ नै िेखन ं॑ रदह्ै । ऐन्हऽ मौकय प ं॑ हुनी सबस ं॑ जयिय िःु खी तब ं॑ नजर ऐलऽ रहै जब ं॑ हुनकऽ सबसे बडऽ पत्रु वधु (स्व. श्रीमती दकशोरी) कैं सर स ं॑ पीदडत हो् गेलऽ रहै आरू अांततः हुनकऽ दनधन हो् गेलऽ रहै । िोसरऽ बयर हुनकय आहत होतां ं॑ तब ं॑ िेखन ं॑ छे दल्ै जब ं॑ ‘दबहयर अांदगकय अकयिमी’ के रऽ अध्​्ि पि आरो कय्ट कयररनी सदमदत के सिस्​्ऽ लेली अांदगकय के एक सांस्थय द्वयरय अनस ु ांदसत करलऽ गेलऽ चांि नयमऽ के एक सूची म ं॑ हुनकऽ नयम नै छे लै । हुनी इ बयत कं॑ ल ं॑ कं॑ आहत छे लै दक की हुनी अांदगकय के इ लय्क िी नै छै । जीवनप्ट न्त अांदगकय के दवकयस के धरु ी रहलऽ डॉ.

“जब ॑ ‘मबहार अंमगका अकादमी’ के रऽ अध्यि पदऽ पर प्रो.(डॉ.) लखनलाल म हं आरोही के मनोनयन होलै, त ॑ हनी एकरा बड़ा हज भाव ं ॑ ही लेन ॑ रहै । हनी प्रो.(डॉ) आरोही क॑ बधाय आरू ुभकामना देतं ॑ हनका आरू ‘मबहार अंमगका अकादमी’ क॑ अंमगका के मवका लेली हर तरह के भ ं व हायता आरू हयोग प्रदान करै के बात दोहरैन ॑ छेलै ।” चकोर के रऽ सूची म ं॑ नयम नै िेखी कं॑ िःु खी होनय स्वयियदवक िी छे लै । लेदकन फे रू जल्ि ही एकरय बडय सहज ियव स ं॑ लेतां ं॑ हुनी खिु उम्र के दहसयबऽ स ं॑ सीसट एक सौ अांदगकय सयदहय्कयरऽ के नयम के एक सूची अनस ु दां सत करी कं॑ दबहयर सरकयरऽ के पयस िेजन ं॑ रहै । ओकरऽ बयि िी एक िफय फे रू जब ं॑ ‘दबहयर अांदगकय अकयिमी’ के रऽ अध्​्ि पिऽ पर प्रो.(डॉ.) लखनलयल दसांह आरोही के मनोन्न होलै, त ं॑ हुनी एकरय बडय सहज ियव सां ं॑ ही लेन ं॑ रहै । हुनी प्रो.(डॉ) आरोही कं॑ बधय् आरू सिु कयमनय िेतां ं॑ हुनकय आरू ‘दबहयर अांदगकय अकयिमी’ कं॑ अांदगकय के दवकयस लेली हर तरह के सांिव सहय्तय आरू सह्ोग प्रियन करै के बयत िोहरैन ं॑ छे लै । जोन कोठरी म ं॑ आ् हुनकऽ ्यिगयरी म ं॑ अांदगकय ियसय सयदहय् सांग्रहयल् आरू सोध सांस्थयन लेली जग्घऽ बनैलऽ गेलऽ छै , ओकरय म ं॑ कदह्ो हममां ं॑ आरो बल ु बल ु (दवधशु ेखर) डॉ. चकोर स ं॑ छुपी-छुपी दिवयली के मौकय पर मट्टी के घरौंिय बनयबै रदह्ै,ओकरय सजयबै छे दल्ै, पटयखय जौरऽ करै छे दल्ै, सनयठी जौरऽ करै रदह्ै --लछमी घऽर िररद्दर बयहर करै लेली – उल्लयसम् उयसव मनयबै लेली । 128

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


ई कदह्ो नै सोचन ं॑ छे दल्ै दक एक दिन ऐन्हऽ िी ऐतै दक ्हीं प ं॑ अांदगकय के रऽ धरोहर के रूप मां ं॑ पडलऽ अांदगकय सयदहय् के सैकडों दकतयब आरू दपछलय ४६ सयलऽ के िौरयन डॉ. चकोर द्वयरय प्रकयदसत आरू सांपयदित करलऽ अांदगकय ियसय के रऽ ऐदतहयदसक पदत्रकय ‘अांग मयधरु ी’ कं॑ जौरऽ करी कं॑ सजय् कं॑ आरू साँवयरी कं॑ रयखै ल ं॑ पडतै । कखनू –कखनू लगै छै दक हुनकय आपनऽ अांत सम् के पूवयट ियस हो् गेलऽ छे लै । की सचमचु म ं॑ ऐन्हऽ कोनो बयत रहै ? दपछलय लगिग छो महीनय के िौरयन, जून जल ु यई स ं॑ मयृ ्-ु प्ांत जब ं॑ िी फोन पर बयत होलै, हुनी ई बयत के दजक्र जरूर करलकै दक “ की हनका आपनऽ अंत मय के पूवाथभा होय गेलऽ छेलै? मपछला लगभग छो महीना के दौरान, जून - जुलाई ॑ मत्ृ य-ु पयंत जब ॑ भी बात होलै, हनी ई बात के मजक् जरूर करलकै मक ‘अंग माधुरी’ के हनकऽ बाद की होतै ? हमरा हमे ा आग्रहपूवथक बोलै छेला मक आबै वाला मदना म ॑ हमरा एकरऽ पं ादन करना छै । हम्मं ॑ हमे ा ही हनका आस्वस्त करतं ॑ कहै छेमलयै मक आपन ॑ एकदम मनमफमकर रमहयै, ‘अंग माधुरी’ के प्रका न पूवथवत जारी रहतै” । “अंमतम बार अक्तूबर – नवंबर मं ॑ भी जब ॑ बातचीत होलऽ रहै त ॑ हनी बोललऽ रहै, “अगला एक-दू महीना मं ॑ तोरा ‘अंग माधरु ी’ के पं ादन के कायथ प्रारंभ करै ल ॑ परतौ, अपनऽ पं ादकीय मं ॑ हम्मं ॑ एकरऽ मजक् करै वाला मछयै ।” आपनऽ घरऽ म ॑ भी कुछ ऐन्द्हे ममललऽ– जुललऽ बात करै । हम्मं ॑ इ वाकया ॑ काफी अचंमभत मछयै ।” ‘अांग मयधरु ी’ के हुनकऽ बयि की होतै ? हुनकऽ आस् हुनकऽ दनधन के बयि के ही छे लै । हमरय हमेसय आग्रहपूवटक बोलै छे लय दक आबै वयलय दिनय म ं॑ हमरय एकरऽ सांपयिन करनय छै । हममां ं॑ हमेसय ही हुनकय आस्वस्त करतां ं॑ कहै छे दल्ै दक आपन ं॑ एकिम दनदफदकर रदह्ै, ‘अांग मयधरु ी’ के प्रकयसन पूवटवत जयरी रहतै । हममां ं॑ ई िी बोलै रदह्ै, “ आपने कं॑ एतनय जल्िबयजी की छै ? ऐन्हऽ कै न्हें सोचै दछ्ै दक आपन ं॑ नै रहबै, आपन ं॑ कं॑ होलऽ की छै जे ? ‘अांग मयधरु ी’ के रऽ सयठ सयल पूरय हो् तलक कम स ं॑ कम आपन ं॑ कं॑ रहनय छै ।” ई बोललय पर हुनी कुछ नै बोलै, तनी िेर लेली गमु समु हो् जय् रहै । कयर िघु ट टनय म ं॑ हमरऽ गांिीर रूप स ं॑ घय्ल हो्कं॑ बरसों दजांिगी-मौत स ं॑ जूझै आरू सयरीररक रूप स ं॑ प्रियदवत रहै के त्​् स ं॑ त ं॑ हुनी अवगत छे लबे करलै । एकरऽ अलयवे िी अपनऽ

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

129


कयमऽ म ं॑ हमरऽ अय्दधक व्स्ततय आरो मांबु ई मां ं॑ हमरऽ पिस्थयदपत रहै के हवयलय िेतां ं॑ हुअ ं॑ अदधक आस्वस्त हो् लेली पूछै रहै दक एतनय िूर रही कं॑ ‘अांग मयधरु ी’ के सांपयिन के नय सांिव छै ? हममां ं॑ बस ्ह ं॑ बोलै छे दल्ै दक पररदस्थदत सब सांिव करी िै छै । हममां ं॑ बोलै छे दल्ै दक दहन्िी के रऽ प्रदसर्द् पदत्रकय - ‘सरस्वती’ इलयहयबयि के रऽ इांदड्न प्रेस सां ं॑ छपै रहै पर आचय्ट महयवीर प्रसयि दद्ववेिी जी कयनपरु लगयाँकरऽ एगो गयाँव जूही मां ं॑ रही कं॑ ओकरऽ सांपयिन करै छे लय । आरू आपन ं॑ िी त ं॑ अस्सी के िसक म ं॑ कुछ महीनय ्य कुछ बरस तलक पटनय के बजय् दबहयरशरीफ म ं॑ रही कं॑ ‘अांग मयधरु ी’ के सांपयिन – प्रकयसन करन ं॑ रदह्ै । फे रू आ्कयल त ं॑ इन्फॉरमेसन टेक्नोलॉजी के जमयनय छे कै । आस्वस्त हो्कं॑ बोलै रहै , “ हमरय पूरय िरोसय छै – तों् ‘अांग मयधरु ी’ अच्छय सां ं॑ दनकयली लेिैं ।” अांदतम बयर अिूबर – नवांबर मां ं॑ िी जब ं॑ बयतचीत होलऽ रहै त ं॑ हुनी बोललऽ रहै, “अगलय एक-िू महीनय मां ं॑ तोरय ‘अांग मयधरु ी’ के सांपयिन के कय्ट प्रयरांि करै ल ं॑ परतौ, अपनऽ सांपयिकी् मां ं॑ हममां ं॑ एकरऽ दजक्र करै वयलय दछ्ै । ” आपनऽ घरऽ मां ं॑ िी कुछ ऐन्हे दमललऽ–जल ु लऽ बयत करै । हममां ं॑ ई वयक्य स ं॑ कयफी अचांदित दछ्ै । एकरऽ अलयवय हमरय सथां ं॑ अांदतम वयतयट लयप के िौरयन हुनी अपनऽ ८० वयाँ जन्मदिन के अवसर प ं॑ २०१८ ई. मां ं॑ प्रकयदसत हो् वयलय एगो अदिनांिन ग्रांथ लेली हमरय स ं॑ अपनऽ ऊपर एगो आलेख दलखी कं॑ िेजै लेली िी कहन ं॑ छे लय । हुनी कहन ं॑ “हनी अंमगका भा ा के रऽ रुत प्रचार-प्र ार आरू म्यक मवका लेली मानक भा ा के अनरू ु प वतथनी के रऽ भा ा वैज्ञामनक एकरूपता के रऽ व्यापकता पर जोर दै रहै । अंमगका के वतथनी पर चचाथ करतं ॑ हअ॑ पुछन॑ रहै , “कुंदन, की तोंय बताब॑ कै छैं मक ‘अंग माधरु ी’ के कोन अंकऽ मं ॑ वतथनी बं धं ी हमरऽ एगो मवस्ततृ आलेख छपलऽ छै ।” फे रू हनी मचंमतत होत॑ कहन॑ रहै, “बहत्ते अंमगका मकताबऽ म नी म॑ दीमक लगी गेलऽ छै । १९७५ ई. के रऽ पटना बूहऽ ॑ प्रभामवत मकताबऽ के हाल ओतना अच्छा नै छै ।” ”

छे लय, “ तोरऽ जदह्य एक्सीडेंट होलऽ रहौ ओकरऽ तीन चयर सयल के िौरयन प्रकयदसत िू दवदिन्न अदिनांिन ग्रांथऽ म ं॑ तोरऽ को् आलेख नै आब ं॑ पयरलऽ छै , ई बयर के अदिनांिन ग्रांथ लेली अदि्े िेजी ि,ं॑ बयाँकी आरू लोगऽ स ं॑ िी आग्रह करलऽ गेलऽ छै । ” आलेख हमरय पयस दलखले रही गेलै कै न्हेंदक प्यट प्त सम् होलय के चलतें हममां ं॑ एकरय पटनय मां ं॑ हुनकऽ हयथऽ म ं॑ ही सौंपै लेली सोचन ं॑ रदह्ै । 130

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अांदगकय ियसय के रऽ लेखन मां ं॑ अांदगकय वतट नी के एकरूपतय पर िी चचयट होलऽ रहै । हुनी अांदगकय ियसय के रऽ द्रतु प्रचयर-प्रसयर आरू सम्क दवकयस लेली मयनक ियसय के अनरू ु प वतट नी के रऽ ियसय वैज्ञयदनक एकरूपतय के रऽ व्यपकतय प ं॑ जोर िै रहै । अांदगकय के वतट नी पर चचयट करतां ं॑ हुअ ं॑ पछ ु न ं॑ रहै , “कांु िन, की तों् बतयब ं॑ सकै छैं दक ‘अांग मयधरु ी’ के कोन अांकऽ मां ं॑ वतट नी सांबधां ी हमरऽ एगो दवस्ततृ आलेख छपलऽ छै ।” “िेखी कं॑ बतयबै दछ्ै पर थोडय सम् लगतै” हममां ं॑ कहन ं॑ रदह्ै । फे रू हुनी दचांदतत होतां ं॑ कहन ं॑ रहै, “बहुत्ते अांदगकय दकतयबऽ दसनी मां ं॑ िीमक लगी गेलऽ छै । १९७५ ई. के रऽ पटनय बूहऽ स ं॑ प्रियदवत दकतयबऽ के हयल ओतनय अच्छय नै छै ।” एकरय प ं॑ हममां ं॑ कहन ं॑ रदह्ै, “सन “ हनी अपनऽ अंमतम मदना मं ॑ ‘ दुं र कांड’ के अंमगका मं ॑ अनवु ाद करै म ॑ व्यस्त छेला । हनी इ अनवु ाद लेली काफी उत् ामहत नजर आबै छेला । हमरऽ अंमतम वाताथलाप मं ॑ हनी कहन ॑ छेला, “बड् डी क ु ू न आरू आनंद ममली रहलऽ छै - ‘ दुं र कांड’ के अनवु ाद करै म ॑ । घड़ी म ॑ अलामथ लगाय क॑ मनत भोरे चार बजे जगी क॑ हम्मं ॑ ‘ दुं र कांड’ के अनवु ाद मं ॑ मभड़ी जाय मछयै, भोरे-भोर बड़ा भल्लऽ लगै छै मलखना ।” २०१६ ई. मां ं॑ हममां ं॑ एक-िू महीनय के फुसट त दनकयली कं॑ आबै दछ्ै आरू सब्िे अांदगकय दकतयब आरू ‘अांग मयधरु ी’ के सब्िे अांकऽ के दडदजटयइजेशन करै दछ्ै । फे रू आपन ं॑ के सब दचांतय खतम हो् जैतै, सयथ म ं॑ ‘अांग मयधरु ी’ म ं॑ छपलऽ को् िी चीजऽ कं॑ खोजनय िी अपनय लेली आसयन हो् जैतै ।” हुनी अपनऽ अांदतम दिनय मां ं॑ ‘सांिु र कयांड’ के अांदगकय मां ं॑ अनवु यि करै म ं॑ व्स्त छे लय । हुनी ई अनवु यि लेली कयफी उयसयदहत नजर आबै छे लय । हमरऽ अांदतम वयतयट लयप मां ं॑ हुनी कहन ं॑ छे लय, “बड् डी सक ु ू न आरू आनांि दमली रहलऽ छै - ‘सांिु र कयांड’ के अनवु यि करै म ं॑ । घडी म ं॑ अलयमट लगय् कं॑ दनत िोरे चयर बजे जगी कं॑ हममां ं॑ ‘सांिु र कयांड’ के अनवु यि मां ं॑ दिडी जय् दछ्ै, िोरे-िोर बडय िल्लऽ लगै छै दलखनय ।” अांदतम वयतयट लयप के िौरयन हुनी श्रीमती मीरय झय ,श्री रयके श पयठक आदि के रऽ प्रकयसनयधीन दकतयबऽ के दजक्र करतां ं॑ कहन ं॑ छे लय दक दिसांबर तयाँ् सब्िे दकतयब प्रकयदसत हो् जैतै । हुनकय स ं॑ बयतचीत के िौरयन हुनकऽ बीमयरी के गांिीरतय के अांियजय किी िी नै लग ं॑ पयरलै । दपछलय जून-जल ु य् मां ं॑ होलऽ एगो बयतचीत स ं॑ पहलऽ बयर थोडय अहसयस

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

131


जरूर होलऽ रहै दक हुनी चलै दफरै म ं॑ दिक्कत महसूस कर ं॑ लयगलऽ छै । वयक्य छे लै हुनकऽ दलखलऽ अांदगकय आलेखऽ के प्रियत खबर मां ं॑ प्रकयसन के । हमम ं॑ हुनकय स ं॑ आग्रह करन ं॑ रदह्ै दक दन्दमत रूप स ं॑ हर सप्तयह अांदगकय म ं॑ दलखी कं॑ हुनकऽ घऽर के दबल्कुल पयस म ं॑ ही दस्थत ‘प्रियत खबर’ िैदनक के रऽ कय्यट ल् म ं॑ पहुचाँ य् िेलऽ करर्ै – हुनी प्रकयदसत करी िेतै । ओह ं॑ दसलदसलय म ं॑ जब ं॑ एक दिनय बयत होलै त ं॑ हुनी बोललै , “एगो आलेख त ं॑ पहुचाँ य् िेन ं॑ दछ्ै बयाँकी आरू िी तै्यर छै ...पर हमरय चलै म ं॑ कयफी दिक्कत हो् छै ...चल-ं॑ दफर ं॑ नै पयबी रहलऽ दछ्ै ... तों् बोल ं॑ सकं॑ छैं त ं॑ बोली िहीं हुनकय दक

“जीवन पयथन्द्त अंमगका भा ा आरू ामहत्य, अंमगका भा ा-भा ी के रऽ उत्थान लेली मचन्द्ता करै वाला तथा ब्भे ॑ स्नेह आरू द्भाव के प्रमतरूप दृ हाँ मख ु रहै वाला डॉ चकोरें ही अथथ मं ॑ अपनऽ पूरा मजंदगी ऋम ऐ नऽ ही मजलकै आरू ौ े ं ार लेली प्रेरनास्त्रोत बनी गेलै ।” हमरय ्हयाँ आबी कं॑ ल ं॑ जैतै ..... नै त ं॑ हममीं बोली िै दछ्ै ।” फे रू हममां ं॑ िी बोललऽ रदह्ै आरू हुनी िी ..आरू प्रियत खबर वयलयां घऽर आबी कं॑ आलेख ल ं॑ गेलऽ छे लै । बयि के सांवयिऽ म ं॑ िलक ु कदह्ो ऐसनऽ नै लगलै दक हुनी गांिीर रूप स ं॑ बीमयर छे लय । हुनकऽ हमेसय के सदक्र् रहै वयलय छदव न ं॑ हमरऽ मन मदस्तस्क पर पियट डयली िेन ं॑ रहै जेकरय सां ं॑ हमरय हुनकऽ बीमयरी के गांिीरतय के किी अांियजय ही नै लग ं॑ पयरलै । हमरय अांत तलक हुनकऽ कमजोरी अस्थयई स्वियव के ही लगलऽ छे लै । हमरय लगलऽ रहै दक हुनी बीचऽ मां ं॑ फ्लू वगैरह के चपेट म ं॑ आबी गेलऽ होतय जेकरय स ं॑ उबरलय के बयि िी कमजोरी बनलऽ रही गेलऽ छै । िैदनक ‘प्रियत खबर’ मां ं॑ छपलऽ अांदगकय कॉलम ‘हे हो सनु ऽ नी’ मां ं॑ छपलऽ हुनकऽ अांदगकय रचनय अखबयरऽ मां ं॑ छपलऽ हुनकऽ अांदतम रचनय िी छे लै । एगो सयदहय्कयर के रऽ असीमतय कं॑ कोनो सीमयनय म ं॑ नै बयाँधलऽ जयब ं॑ सकै छै । ओकरय मां ं॑ प्रवयदहत हो् रहलऽ दवचयर स ं॑ ऐन्हऽ प्रबल ऊजयट उयपन्न हो् छै दक वू हमरय मनऽ कं॑ उद्वेदलत करी कं॑ ऐसनऽ सदि जगय् दिअ ं॑ दक हममां ं॑ खिु के रू-ब-रू हो् कं॑ खिु स ं॑ सवयल कर ं॑ पयरांऽ दक हममां ं॑ की करी रहलऽ दछ्ै ? हमरय समझ म ं॑ जों को् 132

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


सयदहय्कयर आपनऽ सम् म ं॑ ई कर ं॑ सकै छै त ं॑ वू आपनऽ सयदहदय्क धमट के सयथ न्​्य् करै छै । वू ऋदस, सयधू हो् छै – जेकरय म ं॑ तीनो कयल समयदहत हो् छै । वू वतट मयन म ं॑ दजांिय रही कं॑ िूत के अनिु वऽ कं॑ िी सयथ ल ं॑ कं॑ साँवरलऽ िदवस्​् के दनमयट तय बनी जय् छै । डॉ. चकोर न ं॑ सचमचु ऐसने करलकै । जीवन प्ट न्त अांदगकय ियसय आरू सयदहय्, अांदगकय ियसय-ियसी के रऽ उयथयन लेली दचन्तय करै वयलय तथय सब्िे स ं॑ स्नेह आरू सद्भयव के प्रदतरूप सदृस हाँसमख ु रहै वयलय डॉ चकोरें सही अथट म ं॑ अपनऽ पूरय दजांिगी ऋदस ऐसनऽ ही दजलकै आरू सौसे सांसयर लेली प्रेरनयस्त्रोत बनी गेलै । जब ं॑ हममां ं॑ डॉ. चकोर ऐसनऽ कोनो व्दियव के स्मरन करै दछ्ै त ं॑ िरअसल

“अंमगका भा ा ामहत्य के रऽ अलौमकक व्यमक्तत्व युक्त इ मनमाथता, मवधाता, वथस्व ॑ आलोमकत होय करी क॑ जों अपना ब रत्ती मात्रा म ॑ ही ही- कुंठा प ॑ आ ा के , अधोगमत प ॑ उत्थानऽ के , पराभव प ॑ ऊध्वथमख ु ी जीवन के मवजय पताका फहराब ॑ कौं त ॑ अंमगका जै नऽ भा ा के रुत मवका अवस्यंभावी छै , एकरा मं ॑ कोनो दं ेह नै छै ।” हममां ं॑ वू व्दि कं॑ नै वरन् वू मूल्​्ऽ कं॑ ्यि करै के चेस्टय करै दछ्ै, जेकरय वू व्दि न ं॑ अपनऽ सम् म ं॑ प्रवदतट त, स्थयदपत आरू सांवदर्द्टत करलकै । हममां ं॑ हुनकय श्रर्द्य समु न अदपट त करी कं॑ अपनऽ मऽन कं॑ खांगयलतां,ं॑ उपयपोह के दजांिगी सां ं॑ तदनक दजरय् करी कं॑ अपनऽ अांिर झयाँकी कं॑ िेखै दछ्ै दक हममां ं॑ कहयाँ दछ्ै । आरू इ प्रदक्र्य मां ं॑ दचरययमय के अगयध सयदन्त के कयमनय करतां ं॑ हुअ ं॑ हममां ं॑ अपनऽ आयमय कं॑ आह्वयन करै दछ्ै दक दिवांगत दचरययमय स ं॑ तदनक मयत्रय मां ं॑ ही सही सकयरययमक ऊजयट के रऽ प्रवयह के रुख कं॑ अपनऽ तरफ करी िै के रऽ दनवेिन करी लेलऽ जय् । जेकरय स ं॑ दक हममां ं॑ अय्दधक सांकल्पवयन हो् कं॑ हुनकऽ दमसन कं॑ दनरांतर आगू ब़ियबै मां ं॑ कयम्यब हुअ ं॑ सकौं । अांदगकय ियसय सयदहय् के रऽ अलौदकक व्दियव ्ि ु इ दनमयट तय, दवधयतय, सवट स्व स ं॑ आलोदकत हो् करी कं॑ जों अपनय सब रत्ती मयत्रय म ं॑ ही सही- कांु ठय प ं॑ आसय के , अधोगदत प ं॑ उयथयनऽ के , परयिव प ं॑ ऊध्वट मख ु ी जीवन के दवज् पतयकय फहरयब ं॑ सकौं त ं॑ अांदगकय जैसनऽ ियसय के द्रतु दवकयस अवस्​्ांियवी छै , एकरय मां ं॑ कोनो सांिेह नै छै । अांदगकय ियसय-सयदहय् के रऽ ्गु यांतरकयरी ्ोर्द्य, डॉ. नरेश पयण्डे् ‘चकोर’ कं॑ हमरऽ कोदट-कोदट नमन !

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

133


अंदिका कहानी नै होय िेलै आधय सयवन लगिग पयर हौवे-हौवे वलय छे लै। बदह्यरऽ

राके श पाठक - संपकष C/o - सरु न्े द्रनयथ ककयटी हयउस नां. : 23, 87, आर. ओ. स्टोर के पयस

बीर दचलय रय् पथ, जोनकपरु , बीरूबन, गवु यहयटी , असम

“ बेरा डुबतं-॑ डुबतं ॑ लगभग ौं े बमहयार ूनऽ होय गेलऽ छेलै । ावन के मभंजलऽ ांझ के रऽ अन्द्हररया ौं े बमहयार पर प र ॑ लगलऽ छेलै । बूदं ा-बांदी, झरऽ के झका , पमछया हवा के ाथें- ाथ चली रहलऽ छेलै । ”

134

मां ं॑ िरखर रोपय चली रहलऽ छे लै । को् मोरी कबयड् मां ं॑ व्स्त त ं॑ को् कयिो करै मां,ं॑ चौकी िै म,ं॑ त ं॑ आर अड् डय िै मां ं॑ व्स्त । ठेहुनय तयाँ् सदड्य उठय् कं॑ आरू कमर मां ं॑ खोंसी कं॑ झडांु के झांडु रोपदन्याँ दसनी कयिो करलऽ चौकी िेलऽ खेतऽ मां ं॑ धयनऽ के रऽ गौछी रोपै मां ं॑ व्स्त । धनखेती के बगल-सय्ट स ं॑ जय् बलय पक्की सडकऽ पर स ं॑ को् रयही बटोही कं॑ िेखतैं रोपदन्याँ दसनी के रऽ मजयक मां ं॑ गैलऽ गीत सयवन के रऽ फुहयर मां ं॑ दिांजलऽदततलऽ हवय- ब्यर पर तैर ं॑ लगै छे लै- “छतवय दगरलौ रे बटोदह्य छतवय दगरलौ रे, तोहर मौगी दछनयर छतवय लोकी लेलकौ रे....” आरू सडकऽ पर चलतां ं॑ रयही बटोही दसनी के रऽ गोड अपने-आप थमी जय् छे लै । नजर उठी जय् छे लै गीत गैतां ं॑ रोपदन्याँ दसनी िन्न ं॑ । ठोरऽ पर एक टय रसीलय मस्ु कयन बरबस पसरी जय् छे लै । आाँखी मां ं॑ रोपदन्याँ दसनी के प्रदत रसीलय आकसट न के ियव तैर ं॑ लगै छे लै । ्े हे िरखर रोपय के वयतयवरन म ं॑ धनेसर मांडल शमिगु ज ां स ं॑ खेसर हो् कं॑ जे पक्की सडक बयाँकय चल्लऽ गेलऽ छै वहे सडक के पूरब िू-तीन दक्यरी छोडी कं॑ आपनऽ दतनकदठ्य खेतऽ म ं॑ अड् डय िै म ं॑ व्स्त छे लय । हरबयहय जेठुआ बेरय डुबै स ं॑ आधय-पौने घांटय पदहलै हऽर -बैल ल ं॑ कं॑ घरऽ िन्नां ं॑ चल्लऽ गेलऽ छे लै । बेरय डुबतां-ं॑ डुबतां ं॑ लगिग सौंसे बदह्यर सूनऽ हो् गेलऽ छे लै । सयवन के दिांजलऽ सयांझ के रऽ अन्हरर्य सौंसे बदह्यर पर पसर ं॑ लगलऽ छे लै । बूिां य-बयांिी, झरऽ के झकयस, पदछ्य हवय के सयथें-सयथ चली रहलऽ छे लै । ओकरे सयथे सयथ चली रहलऽ छे लै सयठ बररस के लमबय कि कयठी बलय हृस्ट-पस्ु ट िेहऽ वलय धनेसर मांडल के रऽ मजबूत हयथऽ म ं॑ पकडलऽ अ़िय् सेर

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


के रऽ कोियर । झऽर-पयनी स ं॑ दिांजलऽ, कयिो- कीचड स ं॑ लेटैलऽ ठेहुनय तयाँ् लटकलऽ धोती, गोल गल्लय के रऽ गांजी दपन्हल ं॑ आरो मयथय प ं॑ गमछी के रऽ मरु ठे य बयन्हलां ं॑ धनेसर मांडल तयवड तोड कोियर पयरै मां ं॑ आरऽ अड् डय िै मां ं॑ व्स्त छे लय । गयमऽ के नयमी-दगरयमी पांदडत बैकुण्ठ दमदसर अपनऽ जजमयन स ं॑ कहन ं॑ छे लय- “तों धरम-करम म ं॑ दबसबयस करै छ ं॑ जजमयन, ्ह ं॑ लेली तोरय कहै दछहौं जे कयल्ह सू्यट स्त स ं॑ घडी िर पदहले गौछी घऽर करै के बडी सिु जतरय छै । सिु जतरय म ं॑ गौछी घऽर करलय स ं॑ घरऽ म ं॑ अन-धन के कमी नै रहै छै । लछमी- अन्नपूनयट के िांडयर िरलऽ रहै छै । तोहें पोथी-पतरय मयनी कं॑ चलै बलय आिमी छ.ं॑ ....... कोदसस कररहऽ सम् प ं॑ गौछी घऽर हो् जय् ।” सेहे धनेसर मांडल अपनऽ परु ोदहत के बतैलऽ सिु महु तट म ं॑ गौछी घऽर करै लेली खेत तै्यर करै मां ं॑ लगलऽ छे लय । धनेसर मांडल के अपनऽ परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर पर पूरय दबसबयस छे लै । कर-कुटमैती म ं॑ आनय-जयनय हो्, को् सिु कयम करनय हो् अपनऽ पांदडजी स ं॑ जतरय िेखैलां ं॑ दबनय धनेसर मांडल को् कयम नै करै छे लै । हुनकऽ िोसर दबसबयस िोलय बबय पर छे लै । होदत्ै कै हन ं॑ नै ? हुनकऽ दबचयर स ं॑ बेटय उदपनरय िोले बबय के दकरपय स ं॑ अखनी बैंक मनीजर के कुसी पर बैठलऽ छैं । गौंछी घऽर करलय “ परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर अपनऽ जजमान धनेसर मंडल स ॑ कहने िेला- “जजमान उदपनरा के भाि म ॑ बेसमु ार दवद्या धऽन िौन । एकरा पढाबै-दलखाबै मं ॑ कोय कोरकसर नै रदखहऽ, पढी दलखी क॑ तोरऽ बेिा उदपनरा एक दिन बडका हादकम बनथौं । हमरऽ पतरा कदहयऽ झूठ नै उचारै िै ।”

के बयि धनेसर मांडल सल ु तयनगांज के अजगैबी नयथ घयटऽ के जऽल ल ं॑ कं॑ बयबयधयम जय् के बयबय बैजनयथ पर प्रदत सयल जऽल ढयरै छे लय । बेटय उदपनरय जखनी िोसरय दकलयस म ं॑ “मयमय मयलय लय” दलखै लेली सीखी रहलऽ छे लै तखनी ओकरऽ “दलखनय” िेखी कं॑ परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर अपनऽ जजमयन धनेसर मांडल स ं॑ कहन ं॑ छे लय- “जजमयन उदपनरय के ियग म ं॑ बेसमु यर दवद्यय धऽन छौन । एकरय प़ियबै-दलखयबै मां ं॑ को् कोर-कसर नै रदखहऽ, प़िी दलखी कं॑ तोरऽ बेटय उदपनरय एक दिन बडकय हयदकम बनथौं । हमरऽ पतरय कदह्ऽ झूठ नै उचयरै छै । एकरऽ लीलयर के रेखय िेखी कं॑ हममां ं॑ आज कही िेदलहौं । हमरऽ िदवसबयनी आज तयाँ् गलत नै होलऽ छै ।” बैकुण्ठ दमदसर के उदपनरय के बयरे मां ं॑ िदवसबयनी करै मां ं॑ चयहे बैकुण्ठ दमदसर

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

135


के जजमयन कं॑ खशु करी कं॑ ियन िदिनय लै बलय व्वहयररक परु ोदहतयई बदु द्व्े कै न्हें नै छे लै मतरु दक धनेसर मांडल अपनऽ परु ोदहत के िदवसबयनी पर दबसबयस करी कं॑ बेटय उदपनरय कं॑ पढयबै दलखयबै में कोनो कसर नै रखन ं॑ छे लय । बेटय उदपनरो एतनय तेज, एतनय बधु गर दक खयली गयमऽ के उच्च दवद्ययल्े स ं॑ फस्ट दडवीजन मां ं॑ मैदरक ही नै पयस करलकै बलक ु ियगलपूर के टी.एन.वी. कौलेजऽ मां ं॑ पढी कं॑ एक्के चोट मां ं॑ बी.ए.के खट्टु ऽ उखयडी कं॑ फें की िेलकै । तब ं॑ ्हऽ बयत छे लै दक ियगलपरु मां ं॑ डेरय ियडय ल ं॑ कं॑ बेटय कं॑ रखी कं॑ बी.ए. पयस करयबै मां ं॑ धनेसर मांडल के रऽ आठ बीघय पस्ु तैनी धनखेती मां ं॑ स ं॑ चयर बीघय सरू ु ज लरय्न दसांह कन बनकी रखय् गेलऽ छे लै । तखनी धनेसर मांडल सोचन ं॑ छे लय “बेटय बी.ए. पयस होइ्े गेलै, अब ं॑ हयदकम बनै िर के िेरी छै .... छबे मदहनय के उपरी आमिनी सां ं॑ बनकी खेत छुटी जैतै । सयल िू सयल दबततां-ं॑ दबततां ं॑ ढहलऽ ढनमैनलऽ “ “हे गे माय हय कोन रं मबहा? नै मड़वा मटकोर होलै, नै म न्द्नरु दान होलै....।” धने र मंडल अपनऽ घरऽ के ामने बनलऽ बथानी पर बैठलऽ अछताय-पछताय रहलऽ छेला- “हमरऽ ब आ ा पर पानी पड़ी गेलऽ.... ोचनं ॑ छेला​ाँ मनीजर बेटा के मतलक मं ॑ नगद पा​ाँच लाख कड़कमड़या लम्बरी नोट मगनैबऽ.....” ” खपडैल के जगह िमु हलय पक्कय दपटय् जैतै ।” उदपनरय बैंक मनीजर हो् गेलै, ियगलपरु म ं॑ तीन बेडरुम के फ्लैटऽ दकनय् गेलै । मतरु दक धनेसर मांडल के मनऽ के सोचलऽ बयत मने मां ं॑ रही गेलै । उदपनरय शयिी दब्यह करी कं॑ िू बच्चय के रऽ बयपऽ बनी गेलै पर बनकी खेत नै छुटलै । खपडैल के जगह पक्कय नै दपटैलै । बलक ु खपडैल पदहलें स ं॑ बेदस्े ढही-ढनमनय् गेलै । धनेसर मांडल कं॑ सबसें बडकय धक्कय त ं॑ तखनी लगलऽ छे लै जखनी उदपनरय कौलेज के अपनऽ सयदथन उमय दसांह सां ं॑ कचहरी मां ं॑ रदजस्टर पर सही करी कं॑ दबहय करी लेन ं॑ छलै मय् बयप स ं॑ पछ ु ले दबनय । उदपनरय के मय् ई सोची कं॑ हैरयन परेसयन छे ली- “हे गे मय् ह् कोन रां दबहय? नै मडवय मटकोर होलै, नै दसन्नरु ियन होलै....।” धनेसर मांडल अपनऽ घरऽ के सयमने बनलऽ बथयनी पर बैठलऽ अछतय्-पछतय् रहलऽ छे लय- “हमरऽ सब आसय पर पयनी पडी गेलऽ.... सोचनां ं॑ छे लयाँ मनीजर बेटय के दतलक मां ं॑ नगि पयाँच लयख कडकदड्य लमबरी नोट दगनैबऽ.....” 136

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


सब जयत-दवरयिर, सौसे गयमऽ के सब टय छोटकय-बडकय जखनी उदपनरय के कुलांगयर घोदसत करी रहलऽ छे लै आरू नैकी पतु ौह कं॑ जखनी घरऽ के िेहरी पयर नै करय् कं॑ बैरगां ियगलपरु लौटय् िै के दबनय मयाँगलऽ सलयह िै रहलऽ छे लै तखनी परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर जजमयन धनेसर मांडल कं॑ समझैन्हौं छे लै- “दचांतय दफदकर छोडऽ जजमयन..... हयथी चल ं॑ बयजयर कुत्तय िूक ाँ ं॑ हजयर..... सौंसे गयमऽ कं॑ बेंग रां टरयट व ं॑ िहो..... तों् जरय सोची कं॑ िेखऽ.... तोरऽ घी दगरल्हौं कहयाँ त ं॑ दखचडी मां.ं॑ ... सौंसे गयमऽ मां ं॑ के करऽ पतु ौह ऐसनऽ छै जे ियगलपरु जैसनऽ बडकय सहर के सबस ं॑ बडकय अ ांग्रेजी दमदड्म इसकूल के रऽ हेडमयस्टरनी छे कै । बिली रहलऽ छै जमयनय.... बहतां ं॑ ब्यर िन्न ं॑ जे पीठ करी िै छै सेहे जीतै छै .... तोरय जैसनऽ दग्यनी समझियर कं॑ दक समझयवै ल ं॑ पडतै... चलऽ उठऽ.... नै्की पतु ौह कं॑ अदसरबयि ि ं॑ कं॑ ससरु के करतब पूरय करऽ... उठऽ चलऽ” कहतां ं॑ - कहतां ं॑ परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर जजमयन धनेसर मांडल के हयथ दखांचतां ं॑ - दखांचतां ं॑ घरऽ के अ ांगनय मां ं॑ लयनी कं॑ खडय करी िेन ं॑ छे लय आरू कहन ं॑ छे लय “उदपनरय अपनऽ कदन्यां् कं॑ ससरु के गोड लगी कं॑ अदसरबयि लै लेली कहां ं॑ ।” परु ोदहत बैकुण्ठ दमदसर के बयत सनु ी कं॑ उदपनरय िोनों जीव आबी कं॑ धनेसर मांडल के रऽ गोडऽ प ं॑ मूडी नबय् िेन ं॑ छे लै आरू बैकुण्ठ दमदसर स्वदस्तमांत्र उच्चयरन कर ं॑ लगलऽ छे लय “ऊां स्वदस्तनः...” उदपनरय जब ं॑ धनेसर मांडल के गोड लगी कं॑ सोझे ठयरऽ होलऽ छे लै तखनी धनेसर मांडल उदपनरय सां ं॑ कहन ं॑ छे लय- “पांडीजी के गोडऽ पर कुछु रखी कं॑ परु ोदहत बयबय के अदसरवयि

“ धनेसर मंडल के मनऽ मं ॑ बैकुण्ठ दमदसर के रऽ कहलऽ बात घरु ी रहलऽ िेलै“घी कहा​ाँ दिरलै त ॑ दखचडी मं.॑ .. िामऽ मं ॑ के करऽ पुतौह अाँिरेजी दमदडयम के इसकूल के रऽ हेडमास्िरनी िेकै....।”” ल ं॑ ले ।” उदपनरय िोनों बेकत एक-एक टय सौ टदक्य नोट बैकुण्ठ दमदसर के हयथऽ म ं॑ रखी कं॑ अपनऽ खयनियनी परु ोदहत के गोड लगन ं॑ छे लै आरू परु ोदहत जी िोनों कं॑ ‘‘खस ु रहऽ’’ कही कं॑ िोनों सौ टदक्य नोट डयाँडय मां ं॑ खोंसतां-ं॑ खोंसतां ं॑ अपनऽ घरऽ िन्नां ं॑ चल्लऽ गेलऽ छे लय । धनेसर मांडल के मनऽ मां ं॑ बैकुण्ठ दमदसर के रऽ कहलऽ बयत घरु ी रहलऽ छे लै- “घी कहयाँ दगरलै त ं॑ दखचडी मां.ं॑ .. गयमऽ मां ं॑ के करऽ पतु ौह अाँगरेजी दमदड्म के इसकूल के रऽ हेडमयस्टरनी छे कै....।”

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

137


सम्-सम् प ं॑ धनेसर मांडल सोचतां ं॑ रहै छे लय- “पांडीजी के कहनय दठक्के छै ... पोतय पोती अाँगरेजी मां ं॑ दगट-दपट करै छै ...।” उदपनरय जब ं॑ होली-दिवयली-िसहरय मां ं॑ अपनऽ कदन्यां् आरू बच्चय-बतु रू कं॑ ल ं॑ कं॑ आबै छे लै तखनी पूरय पररवयर कं॑ अांग्रेदज्े मां ं॑ बदत्ैतां ं॑ सनु ी कं॑ धनेसर मांडल के करेजय खस ु ी सां ं॑ फूली कं॑ चौडय हो् जय् छे लै । मनऽ मां ं॑ सांतोस करी लै छे लय दक पेट कयटी कं॑ कजयट ल ं॑ कं॑ हुनकऽ उदपनरय के प़ियनय व्थट नै गेलै । तब ं॑ मनऽ मां ं॑ एक्के टय मलयल ई रही गेलऽ छे लै दक बेटय पतु ौह धनेसर मांडल से कदह्ऽ नै कहन ं॑ छे लै दक हे हो बयबू चलऽ हमरे सयथां ं॑ ियगलपरु के फ्लैटऽ मां ं॑ रदहहऽ । एक दिन अपनऽ परु ोदहत सां ं॑ मऽन के इच्छय बतैतां ं॑ हुअ ं॑ धनेसर मांडल कहन ं॑ छे लय- “अब ं॑ दिने दिन हमरऽ सरीर दगरलऽ जय् छै पांडीजी सोचै छी दक जे बचलऽ खचु लऽ कट्ठय- डांटय छ ं॑ ओांकरय अधबट्टै्य प ं॑ ि ं॑ कं॑ हमहां ियगलपरु े मां ं॑ जय् कं॑ रहौं...” तखनी बैकुण्ठ दमदसर कहन ं॑ छे लय “ की जे तों् सोचै छो जजमयन... वहयाँ तोरऽ बेटय पतु ौह, पोतय-पोती अाँगरेजी मां ं॑ दगटदपट करथौं आरू तों् जय् कं॑ छे -छय कर ं॑ लगि.ं॑ .. त ं॑ जहयाँ छ ं॑ वहीं ठीक छ.ं॑ .. ्हयाँ परम स्वतांत्र दसर पर नहीं के ऊ छ.ं॑ ... वहयाँ बेटय-पतु ौह के महुाँ तक्कय बनी जैि ं॑ । तल ु सी ियस कहन ं॑ छऽत -”मयाँगनय िलय न बयप से जो दवदध रयखे टेक”.... वहयाँ तोरय त ं॑ एक कनमय खैनी लेली बेटय-पतु ौह के आगू हयथ पसयरै ल ं॑ पडथौ...” आरू धनेसर मांडल ियगलपरु जय् कं॑ बेटय-पतु ौह सयथां ं॑ रहै के दवचयर दत्यगी िेन ं॑ छे लय । अपनऽ बचलऽ खचु लऽ खेतऽ मां ं॑ िरसक हऽर- कोियर रोपनी कटनी बांधनी करी कं॑ दिन दबतय् रहलऽ छे लय । बेटय के आगू हयथ पसयरै के बिलय नेमयन, जेठयन, दतलयसांक्रयांत मां ं॑ चूडय-िही गडु त ं॑ लैइ्े जय् छे लय । बेटय पतु ौह जब ं॑ गयम आबै छे लै तब ं॑ अपनऽ मेहनत सां ं॑ अपनऽ खेतऽ मां ं॑ उपजैलऽ

“ उदपनरा जब॑ अपनऽ कदनयांय आरू बच्चा-बतु रू क॑ ल॑ क॑ आबै िेलै तखनी पूरा पररवार क॑ अंग्रदे जये मं ॑ बदतयैते सनु ी क॑ धनेसर मंडल के करेजा खुशी स ॑ फूली क॑ चौडा होय जाय िेलै । मनऽ मं ॑ संतोस करी लै िेला दक पेि कािी क॑ कजाष ल॑ क॑ हुनकऽ उदपनरा के पढाना वयथष नै िेलै । ” चॉर, ियल, आलू, दप्यज, कद्दू, परोर, दझांगली, कोंहडय तलक मोटरी बयन्ही कं॑, बोरय मां ं॑ िरी कं॑ ि ं॑ िै छे लय । बयबय बैजनयथ स ं॑ ्ह ं॑ दवनती करै छे लय दक ्ह ं॑ रां बेटय पतु ौह कं॑ िेतां ं॑ हुनकऽ जीवन के पयर घयट लगी जय् । कदह्ो मयाँगै ल ं॑ नै पडै के खरौ स ं॑ । सेहे धनेसर मांडल सयमन के झऽर-झकयसऽ मां ं॑ दिांजी-दतती कं॑ अन्हयर पन्हयर हो् गेलय के बयिो अड् डय िै मां ं॑ व्स्त छे लय । अड् डय िेनय जब ं॑ पूरय हो् गेलै तब ं॑ अ़िय् सेर के रऽ कोियर कयन्हय प ं॑ रखी कं॑ खेतऽ सां ं॑ बहरय् गेलऽ छे लय । घरऽ िन्नां ं॑ जय् बलय पक्की सडकऽ पर ऐतां-ं॑ ऐतां ं॑ एक बेर सोचन ं॑ छे लय- “पक्की सडक के बगल स ं॑ बहै वलय जोर मां ं॑ गोडऽ हयथऽ के कयिय कीचड 138

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


धो्-धय् कं॑ घऽर चललऽ जय् ।” मतरु दक फे रू सोचलकय - “अन्हयर मां ं॑ कयिय-कीचड ठीक स ं॑ नै धोवैतऽ, एक्के बेर घरे जय् कं॑ धोनय बद़ि्याँ होतऽ...................गोड-हयथ धो् कं॑ सख ु लऽ धोती-गांजी दपन्ही कं॑ िैंसी के िूधऽ के रऽ दपतरर्य दगलयसऽ मां ं॑ िर दगलयस चयह के चस्ु की लेलऽ जय्....।” सेहे कयन्हय प ं॑ कोियर रखलां ं॑ सयाँझके पसरते अन्हरर्य मां ं॑ पक्की सडकऽ पर घरऽ िन्नां ं॑ गोड ब़ियब ं॑ लगलऽ छे लय । मतरु दक दिन िर के रऽ थकलऽ-मयांिलऽ िेहऽ के ियर ढोबै मां ं॑ गोड सयथ नै ि ं॑ रहलऽ छे लै । उपर स ं॑ सयवन ियिऽ के रऽ झकयस मां ं॑ दिांजलऽ-दततलऽ िेह काँ पकपय् रहलऽ छे लै । तदह्ो घऽर त ं॑ जयनय ही छे लै । कम सां ं॑ कम पयव िर जमीन पयाँव पैिल नयपनय छे लै । अिी पक्की सडकऽ प ं॑ िू-चयर डेग आगू ब़िले छे लय दक न्ऽ चमचमैलऽ मयरूदत िैन आवी कं॑ हुनकऽ बगल मां ं॑ खडय हो् गेलै । धनेसर मांडल अकचकय् कं॑ नजर उठय् कं॑ िेखलकय । ड्रय्दवांग सीटऽ प ं॑ उदपनरय बैठलऽ छे लै आरू ओकरऽ बगल मां ं॑ िदु ल्हन । दपछलय सीटऽ पर बैठलऽ पोतय-पोती हयथ दहलय्-दहलय् कं॑ कदह रहलऽ छे लै- “हय् ग्रेनपय हयऊ आर ्ू ?” न्य चमचमैलऽ गयडी, िीतर म ं॑ बेटय-पतु ौह बैठलऽ आरू पोतय-पोती कं॑ अ ांग्रेजी बोलतां ं॑ िेखी कं॑ धनेसर मांडल के रऽ दिन िर के थकयन नै मयलूम कहयाँ ियाँरीं स ं॑ दनकललऽ कबतु रय नयाँकी फुरट हो् गेलऽ छे लै । मयथय गवट सां ं॑ तनय् गेलऽ छे लै । सीनय खस ु ी स ं॑ फूली गेलऽ छे लै । दपछलकय गेट खोलतां-ं॑ खोलतां ं॑ उदपनरय कहन ं॑ छे लै, “आबऽ बयबू गयडी मां ं॑ बैठी जय”.... हुबसी कं॑ गयडी मां ं॑ च़िै लेली धनेसर मांडल अिी िदहनय गोड गयडी मां ं॑ ढुकैल्हैं छे लय दक पतु ौह कं॑ कहतां ं॑ सनु न ं॑ छे लय “उपेन्द्र क्​्य कर रहे हो.... िेखते नहीं हो.... उनकय पूरय शरीर कीचड से िरय है.... पूरय सीट गांिय हो जय्ेगय... इतनय कीमती सीट किर बरबयि हो जय्ेगय....” “बयबू हो... दठक्के त ं॑ तोरऽ सौंसे िेह कयिऽ स ं॑ िरलऽ छौं... सीट गांिय हो् जैतै... घऽर िस डेग त ं॑ छे बे करै.... बल ु ले चल्लऽ आबऽ...।” कदन्यां् के बयत सनु ी कं॑ उदपनरय कहन ं॑ छे लै । गयडी पर रखलऽ अपनऽ िदहनय गोड धनेसर उतयरी कं॑ फनू सडकऽ पर रखी िेन ं॑ छे लय । उदपनरय खट सां ं॑ गेट बांि करी लेन ं॑ छे लै आरू गयडी चलय् कं॑ आगू ब़िी गेलऽ छे लै। धनेसर िकुऐलऽ अचांिय रां सडकऽ पर ठयरे रही गेलऽ छे लय । फे रू मनेमन कु़ितां ं॑ अपनऽ थकलऽ मयांिलऽ गोड घऽर िन्नां ं॑ ब़िय् िेन ं॑ छे लय । िनिनयब ं॑ लगलऽ - “बतु रू मां ं॑ जखनी जयाँघऽ प ं॑ झयडय -पेसयब करी िै छे लैं तखनी हमरऽ धोती गांिय नै हो् छे लै...अखनी बयप के बैठलय सां ं॑ गयडी के सीट गांिय हो् जैतै..।” बूलै घडीं गोडऽ स ं॑ जयिे अब ं॑ हुनकऽ मऽन ियरी लग ं॑ लयगलऽ रहै ।

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

139


अंदिका वयंग्य संसार : िप - सरक्का

कास हम्मं ॑ कॉन्वेंिेड होदतयंऽ

संजीव दनिम - संपकष डी– 204, संकल्प – 2, दपंपरीपाडा, दफल्म दसिी रोड, मलाड पूवष, मबुं ई - 400097 - अंदिका अनवु ाि कुंिन अदमताभ

‘िप-सरक्का’ स्तंभ लेली आपन ॑ स ॑ मौदलक अंदिका म ॑ दलखलऽ स्तरीय वयंग्य रचना आमंदित िै । संपािक

140

( हास्य-वयंग्य अंदिका भासा लोक सादहत्य के रऽ अदभन्न अंि रहलऽ िै । आजकल के रऽ तनाव स ॑ भरलऽ दजनिी म ॑ हास्यवयंग्य कुि जािे ही महत्वपूनष होय िेलऽ िै । अंि माधुरी के रऽ स्थाई-स्तंभ के रूप मं ॑ ‘िप - सरक्का’ आरंभ करै के मकसि वयंग्य दवधा के रऽ महत्ता क॑ रेखांदकत करतं ॑ हुअ ॑ एकरा प्रमख ु ता के साथ प्रकादसत करी क॑ अंदिका के रऽ श्रेस्ठ वयंग्य सादहत्य क॑ सामने लाना िै । ‘िप - सरक्का’ स्तंभ लेली आपन ॑ सं ॑ मौदलक अंदिका मं ॑ दलखलऽ स्तरीय वयंग्य आलेख आमंदित िै । दहंिी वयंग्य सम्राि ‘हररशंकर परसाई’ के अनुसार जरूरी नै िै दक वयंग्य मं ॑ हाँसी आब ॑ । जों वयंग्य चेतना क॑ झकझोरी िै िै , दवरूप क॑ सामने लानी ठाडऽ करी िै िै , आत्मसाक्षात्कार कराबै िै , सोचै लेली बाध्य करै िै , वयवस्था के रऽ सरांध क॑ इंदित करै िै आरू पररवतषन लेली प्रेररत करै िै , त ॑ वू सफल वयंग्य िेकै । ई स्तंभ के रऽ सुरूआत दहंिी के रऽ प्रख्यात वयंग्य रचनाकारऽ म ॑ स ॑ एक, श्री संजीव दनिम के रऽ मल ू दहंिी मं ॑ दलखलऽ िेलऽ आरू अंदिका मं ॑ अनदु ित रचना स ॑ करलऽ जाय रहलऽ िै । अपनऽ रचना के अंदिका म ॑ अनवु ाि के अनमु दत िै लेली श्री संजीव दनिम के प्रदत आभार प्रकि करै दियै । - संपािक ) बिदकस्मती स,ं॑ दजनगी के बहुत बडऽ दहस्सय खरच करलय के बयि हमरय पतय चललै दक ई िेसऽ म ं॑ आपनऽ िदवस चमकयबै लेली बचपन म ं॑ : ‘ए फॉर एप्पल’ आरू “बी फॉर बेबी’ प़िनय के तनय जरूरी छै । हमरऽ ई एगो नयियनी स ं॑ िेस एगो आरू महयन व्दियव के रऽ दनरमयन स ं॑ वांदचत रही गेलै । होलै कुछू एनय दक जेन्हैं हममां ं॑ अपनऽ गल ु ेल सां ं॑ पडोसी दसनी के सीसय फोडनय सरू ु करदलऐ, हमरऽ बयबू हमरऽ कयन पकडी हमरय एगो ऐन्हऽ इसकूल म ं॑ िरती करय् िेलकै जहयाँ हमरय ‘अ स ं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


अनयर’, ’आ स ं॑ आम’ रटनय दसखैलऽ जय् छे लै । तदह्य हमरय की पतय रहै दक हममां ं॑ इ िजन नै गयबी रहलऽ दछ्ै, िलक ु दलखै वयलय सलेट के पयथर सां ं॑ अपनऽ दकसमत के नयरर्ल कं॑ आपन्हें फोडी रहलऽ छौं । बडऽ होदल्ै, िदु न्य िेखदल्ै त ं॑ आाँख फट्टी गेलै । तब ं॑ समझ ऐलै दक हमरऽ ऐसनऽ िेसी इसकूल के पैियइस एतनय दसकुडलऽ दसमटलऽ कै न्हें छै । कयस हममां ं॑ कॉन्वेंटेड होदत्ांऽ । अस्सी के िसक स ं॑ पहन ं॑ बहुत कम लोग ई कॉन्वेंटी दसक्छय के लयिकयरी पररनयमऽ स ं॑ पररदचत रहै । जोन बूतरू दसनी के मय्-बयप लगयाँ महयियरत के रऽ सांज् वयलय आाँख छे लै, हुनी तखदन्े समझी गेलऽ छे लै दक बचबय दसनी कं॑ ‘बयबय ब्लैक शीप’ वयलय इसकूली मां ं॑ ही प़ियबै म ं॑ कल्​्यन छै । के तनय महयन दचांतक आरू िूरिरसी रहलऽ होतै हुनी सब जे तदह्े जयनी गेलऽ छे लै दक ‘इांदड्य सयइदनांग’ के रऽ आगयमी पटकथय ऐन्ह ं॑ सब इसकूली मां ं॑ दलखलऽ जय् रहलऽ छै । आजयिी दमललय के बयि आपनऽ िेसऽ म ं॑ लयखऽ के तयियि म ं॑ ‘िेसी’ इसकूल खल ु लै । मगर वू सब दमलय् कं॑ िी मट्ठु ी िर ‘पदब्लक’ इसकूली के मक ु यबलय नै कर ं॑ सकलकै । दहन्न ं॑ िेसी इसकूली के बूतरू दसनी ‘बयल दिवस’ मनय्-मनय् कं॑ खस ु होतां ं॑ रहलै आरो हुन्नां ं॑ ‘हैप्पी बथट डे’ सांस्कृदत कुरसी पर जय् कं॑ दचपकतां ं॑ गेलै । अपनऽ इसकूली के डांडय प्रधयन दसक्छय पद्वदत न ं॑ हमरय कदह्ो कलयस आरू मयर सां ं॑ आगू कुछू सोच ं॑ ही नै िेन ं॑ रहै । प्रतयदडत होतां ं॑ रहनय आरू अपमयदनत होतां ं॑ रहनय ई किर हमरय आित म ं॑ दमली गेलऽ छे लै दक आ् िी वू हमरय आपनऽ ऐन्हऽ लयगै छै । जों कहीं प ं॑ जरय िी सममयन दमल ं॑ लगै छै त ं॑ मऽन म ं॑ अजनबीपन गांधयब ं॑ लगै छै । हमरय इसकूली मां ं॑ टीचर नै ’मयस्टर’ हुऐ छे लै । एक िोसरय लेली हमरय दसनी के मनऽ मां ं॑ एतनय सरधय रहै छे लै दक हमम ं॑ हुनकय कदह्ो ‘मयस्टर’ के िरजय स ं॑ आगू नै ब़ि ं॑ िेदलऐ आरू हुनी हमरय ’कयमचोर’ आरू ’नयलय्क’ स ं॑ । पूरे स्कूली जीवन म ं॑ हुनी सब समझतां ं॑ रहलै दक हममां ं॑ दसनी प़िै ल ं॑ नै चयहै दछ्ै आरू हममां ं॑ दसनी समझतां ं॑ रहदल्ै दक हुनकय दसनी कं॑ प़ियबै ल ं॑ नै आबै छै । ्यदन दक िूनू एक िोसरय कं॑ आपनऽ-आपनऽ ढांगऽ स ं॑ प़ियबै के चेस्टय करतां ं॑ रहदल्ै । आपसी प्रेमवस हुनी हमरय सब कं॑ ‘तू’ कही कं॑ पक ु यरै रहै आरू हममू दसनी हुनकय दसनी कं॑ ‘तू’ के रऽ तजट प ं॑ ही आप कहै रदह्ै । मयस्टर जी के रऽ ध्​्यन कलयस म ं॑ प़ियबै स ं॑ जयिे नै प़ियबै प ं॑ इ लेली िी रहै छे लै तयदक हुनकय िरपूर ट् ्ूसन दमल ं॑ सकं॑ । जे हुनकय स ं॑ ट् ्ूसन प़ि ं॑ लयगै छे लै वू अगले दिनय स ं॑ होदस्यर कहलयब ं॑ लग ं॑ छे लै बयाँकी त ं॑ छे लबे करलै नयलय्क, गधय कहींकरऽ । बचपन म ं॑ जब ं॑ हममां ं॑ ’वू’ इसकूली के बतु रू दसनी कं॑ िोरे-िोर टय् लगय् कं॑

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

141


सन्ु नर सयफ पोसयकऽ मां ं॑ इसकूल जैतां ं॑ िेखै रदहऐ त ं॑ आपनऽ उपर बडय तरस आबै रहै । के तनय स्मयटट लयगै रहै वू बतु रू दसनी । चस्ु त पैंटय के नीचां ं॑ खोंसलऽ अांगय, ओकरय प ं॑ उज्जर धयरीियर टय्, सलीकय स ं॑ कयन्हऽ पर लटकै लऽ बैग आरू महुाँ ऽ स ं॑ झरतां ं॑ अांगरेजी के फूल । िोसरऽ िन्नां ं॑ हममां ं॑ दसनी छे दल्ै । दस्यही के रऽ ियग लगलऽ कोनो अांगय, हर घडी दगरै ल ं॑ मचलतां ं॑ ढीलऽ-ढयलऽ खयकी पैंटय, बगल मां ं॑ डे़ि मनऽ के बस्तय आरू महुाँ ऽ स ं॑ दनकलतां ं॑ दफल्मी डय्लॉग ‘अब तेरय क्​्य होगय, कयदल्य ।’ हमरय इसकूली के मयस्टर दसनी कं॑ दपटयई के रऽ न्य-न्य तरीकय ईजयि करै म ं॑ मयस्टरी रहै । हुनकऽ ई तरीकय एक ही सब्ि के रऽ अनेक महु यवरय ऐन्हऽ रहै छे लै । जेनय दक—िीवयर स ं॑ सर फोडनय, सर स ं॑ सर बजयनय, सर प ं॑ दकतयब मयरनय, सर के रऽ बयल खींचनय..। ्ह ं॑ तरह सरीर के आरू दपटयई ्ोग्​् अांगऽ लेली अलग-अलग अनेक तरीकय रहै, जेकरऽ उप्ोग हुनी बेदहचक दबनय कोनो सांकोचऽ के करै रहै । बिलय मां ं॑ हमम ं॑ हुनकय पीठ पीछू गरर्ैतें रहै छे दल्ै आरू गांडु य दसनी सां ं॑ दपटबयबै के प्रन करतां ं॑ रहै छे दल्ै । हमरऽ अलयवे अनेक दवद्ययथी ऐन्हऽ रहै, दजनकऽ ई मजगूत दबसबयस रहै दक इसकूल खयली मजगूत बिन वयलय लेली ही हो् छै । चूदाँ क हमरऽ सेहत पहनै स ं॑ गरीबी रेखय के नीचयाँ रहतां ं॑ ऐलऽ छे लै ई लेली अदधकतर हममां ं॑ आरो हमरऽ सयथी दसनी घऽर स ं॑ तै्यर हो् कं॑ इसकूल लेली दनकलै छे दल्ै पर रस्तय म ं॑ कोनो मैियनऽ म ं॑ रूकी कं॑ खेलीकूिी सेहत बनयबै रदह्ै तयदक कोनो दिनय दन्दमत रूप स ं॑ स्कूल जयबै लय्क सेहत बन ं॑ सकं॑ । हमरऽ इसकूली जीवन के रऽ रौसनी हमरऽ आगू के रऽ कॉलेज जीवन मां ं॑ िी चमकतां ं॑ रहलै । जहयाँ एक िन्नां ं॑ तथयकदथत पदब्लक इसकूली के दवद्ययथी कॉलेज के रऽ हर गदतदवदध्ऽ प ं॑ छै लऽ रहै छे लै, वहीं िोसरऽ िन्न ं॑ हमम ं॑ पीछू के सीटऽ प ं॑ बैठी थपडी पयरतां ं॑ रहदल्ै आरू सीटी ही बजैतां ं॑ रही गेदल्ै । वू अफसर बनै के तै्यरी करतां ं॑ रहलै आरू हममां ं॑ को् तरह सां ं॑ कोनो कां पनी म ं॑ दकरयनी के जग्घऽ प ं॑ दचपकै के इांतजयर करतां ं॑ रही गेदल्ै । आ् इ मोड प ं॑ आबी कं॑ सोचै दछ्ै दक जों बचपन म ं॑ मय्-बयबू कजट ल ं॑ कं॑ हमरौ कोनो पदब्लक इसकूली म ं॑ डयली िेन ं॑ रहदत्ै त ं॑ कसम स ं॑ ऑक्सफोडट दडक्सनरी के खोटय दसक्कय रहतां ं॑ हुअ ं॑ िी हमम ं॑ बजयर म ं॑ न्य नोट ऐसनऽ कडकतां ं॑ रहदत्ांऽ । हमरे ऐसनऽ नै मयलूम के तनय आरू लोगें ऐन्हे महसूस करै छै तदि्े त ं॑ गली-गली ‘नसट री पदब्लक स्कूल’ कहै वयलय नयटक कें द्रऽ के बूहऽ आबी गेलऽ छै । िेसी स्कूलऽ के रद्दीपन स ं॑ उकतैलऽ बेचयरय सयधनहीन मय्-बयप दसनी आरांि के रऽ कुछ सयल ्ह ं॑ इसकूली म ं॑ आपनऽ बूतरू दसनी कं॑ िेजी आपनऽ जरतां ं॑ करेजऽ प ं॑ पयनी के रऽ कुछ छींटय मयरी लै छ ं॑ । 142

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)


26

27

28

अंि माधुरी ( बर्ष : ४७, अंक : ०१ - ०२, दिसंबर - २०१५ - जनवरी - २०१६)

143


दिसंबर -२०१५ - जनवरी -२०१६

ियरत सरकयर द्वयरय पांजीकृ त पांजी्न सांख्​्य—२२, १९४ / ७०

डयक दवियग द्वयरय पांजीकृ त पांजी्न सांख्​्य पी.टी. १३/२०१५-१७

बर्ष : 47 अंक : 01 - 02

अंि माधरु ी

30

अिं माधुरी

शेखर प्रकाशन

59, िा​ाँधीनिर, बोररंि रोड (पदश्चम), पिना - 800 001 मो. : 9430919959, 8002099017

श्रीमती द्रौपिी दिव्यांशु द्वयरय मदु द्रत आरू शेखर प्रकयशन, ५९, गयाँधीनगर, बोररांग रोड (पदिम), पटनय - १ स ं॑ प्रकयदशत 144

दिसंबर 2015 - जनवरी 2016

29


Millions discover their favorite reads on issuu every month.

Give your content the digital home it deserves. Get it to any device in seconds.