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िजस कमर के दारा िकसी सती या पुरष को अपने पित मुगध करने का भाव िनिहत हो, वो मोहनकमर' कहलाता है। मोहन अथवा सममोहन यह दोनो पायः एक ही भाव को पदिशरत करते है। मोह को ममतव, पेम, अनुराग, सनेह, माया और सामीपय पापत करने की लालसा का कृतय माना गया है। मोहन कमर की यही सब पितिकयाएं होती है। िनषुर, िवरोधी, िवरकत, पितदंदी अथवा अनय िकसी को भी अपने अनुकूल, पणयी और सनेही बनाने के िलए मोहन कमर का पयोग िकया जाता है। मोहन कमर के पयोगो को िसद करने के िलए पहले िनमिलिखत मंत का दस हजार जप करना चािहए। ऊँ नमो भगवते कामदेवाय यसय यसय दृशयो भवािम यश मम मुखं पशयित तं तं मोहयतु सवाहा।'' पयोग से पूवर पतयेक तंत को पहले उपयुरकत मंत से अिभमंितत कर लेना चािहए। मोहन कमर के पयोग िनमिलिखत है :१. तुलसी के सूखे हुए बीज के चूणर को सहदेवी के रस मे पीसकर ललाट पर ितलक के रप मे लगाएं। २. असगंध और हरताल को केले के रस मे अचछी तरह से पीसकर उसमे गोरोचन िमलाएं तथा मसतक पर ितलक लगाएं तो देखने वाले मोिहत हो जायेगे। ३. वच, कूट, चंदन और काकड़ िसंगी का चूणर बनाकर अपने शरीर तथा वसतो पर धूप देने अथवा इसी चूणर का मसतक पर ितलक लगाने से मनुषय, पशु, पकी जो भी देखेगा मोिहत हो जाएगा। इसी पकार पान की मूल को िघसकर मसतक पर उसका ितलक करने से भी देखने वाले मोिहत होते है। ४. केसर, िसंदरू और गोरोचन इन तीनो को आंवले के रस मे पीसकर ितलक करने से लोग मोिहत होते है। ५. शेत वच और िसंदरू पान के रस मे पीसकर एवं ितलक लगाकर िजसके भी सामने जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा। ६. अपामागर (िजसे औंगा, मागरा या लाजा भी कहते है) धान की खील और सहदेवी - इन सबको पीसकर उसका ितलक करने से वयिकत िकसी को भी मोिहत कर सकता है। ७. शेत दवू ा और हरताल को पीसकर ितलक करने से मनुषय तीनो लोको को मोिहत कर लेता है। ८. कपूर और मैनिसल को केले के रस मे पीसकर ितलक करने से अभीष सती-पुरष को मोिहत कर सकता है।


९. तंत साधक गूलर के पुषप से कपास के साथ बती बनाए और उसको नवनीत से जलाए। जलती हुई बती की जवाला से काजल पारे तथा उस काजल को राितकाल मे अपनी आंखो मे आंज ले। इस काजल के पभाव से वो सारे जगत् को मोिहत कर लेता है। ऐसा िसद िकया हुआ काजल कभी िकसी को नही देना चािहए। १०. शेत धुध ं ली के रस मे बहदंडी की मूल को पीसने के बाद शरीर पर लेप करने से सारा संसार मोिहत हो जाता है। ११. िबलव पतो को लाने के बाद उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनहे पीसकर किपला गाय के दध ू मे िमलाकर गोली बना ले। उस गोली को िघसकर ितलक करने से देखने वाला तन, मन और धन से मोिहत हो जाएगा। १२. शेत मदार की मूल और शेत चंदन-इन दोनो को पीसकर उसका शरीर पर लेप करे। इस िकया से िकसी को भी सहज ही मोिहत िकया जा सकता है। १३. शेत सरसो को िवजय (भाग) की पती के साथ पीसकर मसतक पर लेप करे। अब िजसके सामने भी जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा। १४. तुलसी के पतो को लाकर उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनमे िवजया यानी भाग के बीज तथा असगंध को िमलाकर किपला गाय के दध ू मे पीस ले। ततपशात उसकी चार-चार माशे की गोिलया बनाकर पातः उठकर खाएं। इससे सारा जगत मोिहत हुआ पतीत होता है। १५. कड़वी तुंबी के बीजो के तेल मे कपड़े की बती बनाकर जलाएं और उससे काजल पार कर आंखो मे अंजन की भाित लगाएं। अब िजसकी तरफ भी दृिष उठाकर देखेगे, वो मोिहत हो जाएगा। १६. अनार के पंचाग को पीसकर उसमे शेत धुध ं ली िमलाकर मसतक पर ितलक लगाएं। इस ितलक के पभाव से कोई भी मोिहत हो सकता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : सतंभन िकया का सीधा पभाव मिसतषक पर पड़ता है। बुिद को जड़, िनषकय एवं हतपभ करके वयिकत को िववेक शूनय, वैचािरक रप से पंगु बनाकर उसके िकया-कलाप को रोक देना सतंभन कमर की पमुख पितिकया है। इसका पभाव मिसतषक के साथ-साथ शरीर पर भी पड़ता है। सतंभन के कुछ अनय पयोग भी होते है। जैसे-जल सतंभन, अिगन सतंभन, वायु सतंभन, पहार सतंभन, असत सतंभन, गित सतंभन, वाक् सतंभन और िकया सतंभन आिद। तेतायुग के महान् पराकमी और अजेय-योदा हनुमानजी इन सभी िकयाओं के जाता थे। तंत शािसतयो का मत है िक सतंभन िकया से वायु के पचंड वेग को भी िसथर िकया जा सकता है। शतु ,


अिगन, आंधी व तूफान आिद को इससे िनिषकय बनाया जा सकता है। इस िकया का कभी दुरपयोग नही करना चािहए तथा समाज िहताथर उपयोग मे लेना चािहए। अिगन सतंभन का मंत िनम है। १. ऊँ नमो अिगनरपाय मम् शरीरे सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुतजपात् िसिद भरवित। अषोतरशत जपात् पयोग (िसिदम) भवित॥'' ऊँ नमो इतयािद अिगन सतंभन का मंत है। इस मंत के दस हजार जप करने से िसिद होती है तथा एक सौ आठ जप करने से पयोग िसद होता है। सतंभन से संबिं धत कुछ पयोग िनमिलिखत है : २. घी व गवार के रस मे आक के ताजा दध ू को िमलाकर, शरीर पर उसका लेप करने से भी अिगन सतंभन होता है। ३. केले के रस मे घृतकुमारी व जवारपाठा के रस को िमलाकर शरीर पर लेप करने से शरीर अिगन मे िघरा होने पर भी नही जलता है। ४. पीपल, िमचर और सौठ को कई बार चबाकर िनगल ले। इसके पशात् मुंह मे जलता हुआ अंगारा भी रखे, तब भी मुंह नही जलेगा। ५. चीनी के साथ गाय के घृत को पीकर अदरक के टुकड़े को मुंह मे डालकर चबाएं िफर तपे हुए लोहे के टुकड़े को मुंह मे रखे तो वह भी बफर की भाित ठंडा पतीत होगा। ६. ऊँ नमो िदगंबराय अमुकसय सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुत जपात् मंतः िसदो भवित। अषोतर शत जपात् पयोगः िसदो भवित। उपयुरकत मंत का दस हजार जप करने से मंत िसद होता है और आवशयकता होने पर एक सौ आठ बार जप करने से मंत िसद हो जाता है। मंत अमुकसय' के सथान पर िजसके आसन पर सतंभन करना हो उसका नाम लेना चािहए। ७. भागरे के रस मे सरसो (सफेद) को पीसकर, मसतक पर उसका लेप करके िजसके सममुख भी जाएंगे उसकी बुिद का सतंभन हो जाएगा। ८. अपामागर और सहदेई को लोहे के पात मे डालकर पीसे और उसका ितलक मसतक पर लगाएं। अब जो भी देखेगा उसका सतंभन हो जाएगा।


९. भागरा, िचरिचटा, सरसो, सहदेई, कंकोल, वचा और शेत आक इन सबको समान माता मे लेकर कूटे और सतव िनकाल ले। िफर िकसी लोहे के पात मे रखकर तीन िदनो तक घोटे। अब जब भी उसका ितलक कर शतु के सममुख जाएंगे, तो उसकी बुिद कु ंिठत हो जाएगी। १०. ऊँ नमो भगवते महाकाल पराकमाय शतूणा शसत सतंभन कुर-कुर सवाहा।

२२२२२२ २२२२ २२२२२ : एक लक जपामंतः िसदो भवित नानयथा। अषोतरशत जपात् पयोगः िसदयित धुवम्॥ उपरोकत मंत का एक लाख जप करने से वह िसद हो जाता है और जब इसका पयोग करना हो, एक सौ आठ बार पुनः जप कर पयोग करे तो यह पयोग सफल होता है। ११. पुषय नकत वाले रिववार के िदन अपरािजता की मूल को उखाड़कर मुंह मे रखने अथवा िसर पर धारण करने से शसत सतंभन हो जाता है। १२. रिव पुषय के िदन शेत गुंजा की मूल को लाकर धारण करे तो युद मे शतु के शसत का भय नही रहता अथवा उसके शसत का सतंभन हो जाता है। १३. खजूर की मूल को पैर और हाथ मे धारण करने से खंजर-शसत का सतंभन हो जाता है। १४. जामुन की मूल को हाथ पर और केबड़े की मूल को मिसतषक पर तथा ताड़ की मूल को मुंह मे रखने से शसत चाहे िजस पकार हो, उसका सतंभन हो जाता है। इन तीनो जड़ो का चूणर बनाकर घृत के साथ सेवन करने से आकमणकारी के शसत का सतंभन हो जाता है। १५. चमेली की मूल को मुख मे रखने से िकसी भी शसत का भय नही रहता। रिववार को पुषय नकत आने पर अपामागर की मूल लाकर उसे पीस ले और शरीर पर उसका लेप करे तो सभी पकार के शसत से सतंभन हो जाता है। १६. ऊँ नमः काल राित ितशूलधािरणी। मम शतुसैनय सतंभन कुर कुर सवाहा। एक लकजपाचयापं मंतः िसदः पजायते। उपरोकत शतजपात् पयोगे िसिदरतमा॥ उपयुरकत मंत के एक लाख जप से यह मंत िसद हो जाता है और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करके पयोग करने से सैनय सतंभन होता है।


१७. िमटी के एक पात मे शमशान की भसम से शतु का नाम िलखे और उसे नीले सूत से बाधकर एक गहरे गडढे मे गाड़ दे। तदनंतर उस पर एक पतथर रखकर ढाप दे। ऐसा करने से शतु की पूरी सेना का ही सतंभन हो जाता है। १८. ऊँ नमो भगवते महारौदाय गभरसतंभनं कुर कुर सवाहा॥ इस मंत को िसद करने के िलए 1 लाख जप करना जररी है। अनयथा पयोग सफल नही होगे। जब भी पयोग करना हो तो एक सौ आठ बार जप अवशय करे।

२२२२२२ : १९. केशर, शकर, जवारपाठा और कु ंदपुषप को समान माता मे शहद मे िमलाकर खाने से गभरपात से रका होती है। २०. ऋतुसनाता सती यिद रेडी के बीज को िनगल ले तो उसका गभर कभी नही िगरता। कमर मे धतूरे का बीज बाधने से भी गभर सतंभन होता है। रिववार के िदन जब पुषय नकत हो, तब काले धतूरे की मूल लाकर गिभरणी सती की कमर मे बाध दे। इससे गभर का सतंभन होता है। २१. कुमहार के हाथ से लगी हुई चाक की िमटी को शहद मे िमलाकर बकरी के दध ू के साथ सेवन करने से गभर का सतंभन होता है।

२. २२२२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : ÷ देष' का अथर है दस ू रो के लाभ मे अवरोध उतपन करना है इसी देष भावना का िकयातमक रप ÷िवदेषण' कहलाता है। इसका मुखय उदेशय होता है िकनही दो लोगो के बीच फूट, िवदोह, उपदव, अिवशास और शतुता के भाव उतपन करके िवघटन की उतपित करना। ऊँ नमो नारदाय अमुकसयाकेन सहिवदेषणम् कुर-कुर सवाहा। इस मंत का एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है और जब कोई तंत पयोग करना हो तो पहले मंत का एक सौ आठ बार जप करके िसिद पापत कर लेनी चािहए। मंत मे अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना हो उसके नाम का उचचारण करे।

२२२२२२ : १. शेर और हाथी के दातो को गाय के मकखन के साथ पीसकर िजनके नामो से आग मे हवन िकया जाएगा, वे िवदेषण के पभाव मे आ जाएंगे।


२. कुते के बाल तथा िबलली का नाखून िमलाकर जहा जलाया जाएगा वहा के लोगो मे िवदेषण उतपन हो जाएगा। ३. साही का काटा िजसके मकान के मुखय दार पर गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे हर समय कलह बनी रहेगी। ४. जब कभी भी दो वयिकतयो के बीच देष उतपन करना हो, तो उनके पैरो की िमटी को सान एवं गूध ं कर उससे एक पुतली बनाएं और शमशान मे ले जाकर उसे भूिम मे गाड़ दे। इस िकया को करने से उनके बीच देष उतपन हो जाएगा। ५. कोई भाषण या समारोह चल रहा हो, तो भैसे और घोड़े के बालो को परसपर िमलाकर जलाएं। इससे सभा या समारोह मे भगदड़ मच जाएगी। ६. एक हाथ मे कववे का पंख और दस ू रे हाथ मे उललू का पंख लेकर िवदेषण के मंत से अिभमंितत करे और उन दोनो पंखो को िफर काले सूत से बाधकर िजस घर मे गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे रहने वालो का आपस मे झगड़ा हो जाएगा।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : वशीकरण का अथर वश मे करना है। वह कमर िजसके दारा पयोगकता अभीष पाणी को अपने वश मे कर लेता है ÷वशीकरण कहलाता है। वसतुतः यह आकषरण और मोहनकमर का चरम िवकिसत और अतयिधक पभावी रप है। १. ऊँ नमो नारायणाय सवर लोकानृ मम वंश कुर-कुर सवाहा। इस मंत का एक लाख जप करके इसे िसद करे और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करने से पयोग मे सफलता िमलती है। अथवा इस मंत को भी िसद कर सकते है। २. ऊँ नमो भगवते उऽ््् ऽमामरे ्् ो शराय धय

मोधय िमली िमली ठः ठः सवाहा।

शुभ मुहत ू र मे उतर की ओर मुंह करके सूयोदय के समय मूंगे की माला से मंत का जप आरंभ करे। तीस हजार जप करने से यह मंत िसद हो जाता है, िफर िकसी पर भी पयोग करने से पूवर उकत वसतु को सात बार अिभमंितत करे तो िनशय ही सफलता िमलेगी। साधक दोनो मंत मे से िकसी को भी िसद कर सकता है। दोनो मंत समान पभावशाली है।

२२२२२२ : ३. बहदंडी, वच, और कूठ के चूणर को िकसी भी रिववार के िदन पान मे डालकर िखलाने से वह पयोगकता के वश मे हो जाएगा।


४. वट+ वृक की मूल को पानी मे िघसकर उसमे िचता की भसम िमलाये और मसतक पर उसका ितलक लगाकर िजसके सामने जाएंगे वह वश मे हो जायेगा। ५. पुषय नकत के िदन पुननरवा की जड़ को लाकर उसे उपरोकत मंत से केवल सात बार अिभमंितत करे और दाएं हाथ की कलाई मे बाध ले। अब जो भी उसे देखेगा, वशीभूत हो जाएगा। ६. किपला गाय के दध ू मे अपामागर की जड़ को पीसकर ितलक लगाने वाला साधक तीनो लोको को भी वश मे कर सकता है। ७. सहदेही की छाया मे सुखाकर चूणर बना ले। ततपशात उसे पान मे डालकर िजसे भी िखलाएंगे वह वशीभूत हो जाएगा। ८. गोरोचन और सहदेवी को िमलाकर उसका ितलक करने वाला वयिकत सभी को वशीभूत कर लेता है। ९. उदं ुबर की जड़ को िघसकर उसका ितलक करने वाला वयिकत िकसी को भी वश मे कर सकता है। १०. गूलर की जड़ का चूणर पान मे डालकर िजसे भी िखलाया जाएगा वह वशीभूत हो जाएगा। ११. सरसो और देवदाली के चूणर को गोली बनाकर और उस गोली को मूंह मे रखकर िजससे भी बातचीत की जाएगी वह उसी के हक मे बोलने लगेगा। १२. हरताल, मैनिसल, केसर, कूठ और सौठ का चूणर करके उसमे अपनी अनािमका उंगली का रकत िमलाकर ितलक लगाने से सब लोगो का वशीकरण हो जाता है। १३. गोरोचन, कमल का पत, कागनी और लाल चंदन- इनका ललाट पर ितलक करने से सब लोग वश मे हो जाते है। १४. िवलव पत और िवजौरा नीबू को बकरी के दध ू मे पीसकर ितलक करने से भी लोग वशीभूत हो जाते है। १५. आंवले के रस मे मैनिसल और असगंध िमलाकर माथे पर लेप करने से भी हर िकसी को वश मे िकया जा सकता है। १६. ऊँ नमः कामाखयादेवयै अमुकी मे वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है। पयोग के समय एक माला का जप करे। अमुकी के सथान पर अभीष सती का नाम ले।

२२२२२२ :


१७. काक जंघा, लगर, केशर और मैनिसल का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डालेगे, वो वश मे हो जाएगी। १८. िचता की राख, वच कूढ, तगर और केशर का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डाल िदया जाएगा, वो वश मे हो जाएगी। १९. पान के रस मे लालमखना और मैनिसल पीसकर मंगलवार के िदन ितलक करने से िसतयो को वशीभूत िकया जा सकता है। २०. ऊँ नमो महायिकणयै मम पित को वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप कर इसे िसद करे तथा पयोग के समय एक माला जप करे। पित को वश मे करने के िलए िनमिलिखत तंतो का पयोग िकया जाता है। २१. िवषणुकात, भागरा, गोखर और गोरोचन को पीसकर गोली बना ले। िफर पूवोकत मंत से अिभमंितत करने के बाद गोली को िघसकर ितलक करने से पित वश मे हो जाता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : आकषरण तंत मे सबसे पहले (कली) बीज मंत को िसद कर लेना आवशयक है इसके िसद होने के बाद ही आकरषण तंतो का पयोग करना चािहए। कली बीज मंत की कामबीज यािन कामकला बीज कहते है। ितकोण की ऊवरमुख तथा अधोमुख सथापना से जो आकृित बनती है वह योिन मुदा कहलाती है। इसके बीच मे कली की जाकर की सथापना करके धयान करना चािहए इसका जप करते समय िनमिलिखत बातो का धयान रखना चािहए। १. सवरपथम भृकिट के मधय मे योिनमुदा की कलपनाकरके उसके बीच मे कली की अकर की सथापना कर, उसका धयान करना चािहए। २. पातः काल मे दो घंटे तक इसका धयान अवशय करना चािहए। ३. सवसथ मन से शात िचत होकर ही धयान व जप िकया जाना चािहए। ४. दाएं हाथ की किनिषका उंगली पर माला फेरनी चािहए। ५. दंडासन का उपयोग व दिकण िदशा मे मुंह रखना चािहए एवं मूंगा की माला पर जप करना चािहए। ६. छह महीने मे यह बीज मंत िसद हो जाता है। उसके बाद आकषरण मंत और तंत का पयोग करना चािहए। ऊँ नमः आिदपुरषाय अमुकसयाकषरणं कुर-कुर सवाहा।


एक लाख जपकर िसद करे तथा पयोग के समय 1 माला जप करे। अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना है उनका नाम लेना चािहए।

२२२२२२ : १. भोजपत पर अनािमका उंगली के रकत से उपरोकत मंत िलखे और मधय मे अभीष सती या पुरष का नाम िलखकर शहद मे डाल दे। इस िकया से उसका आकषरण हो जाएगा, िजसका नाम िलखा होगा। २. रिव पुषय के िदन बहदंडी को लाकर पीस ले। तदनंतर िजस कािमनी के मसतक पर यह चूणर डाल िदया जाएगा वह सती वशीभूत हो जाएगी। ३. पंचमी के िदन सूवावतर वृक की मूल लाकर एवं उसे पीसकर चूणर बना ले िफर पूवोकत मंत से एक सौ आठ बार अिभमंितत कर, िजस सती या पुरष को पान के साथ िखलाएंगे, वो आकिषरत होकर िखंचा चला आएगा। नोट : अंत मे सभी पयोग समाज के िहताथर मे या अचछे कायर हेतु िकये जाये तो अचछा होगा। िकसी भी बुरे उदेशय हेतु िकया गया पयोग लाभ की अपेका हािन भी कर सकता है। पता : डॉ. िनमरल कोठारी बधव् ऐसटो पॉइंट १३ िकड सटीट, कोलकाता-१६ २. २२२२ २२२२२ २२२२२२ :

िजस कमर के दारा िकसी सती या पुरष को अपने पित मुगध करने का भाव िनिहत हो, वो 'मोहनकमर' कहलाता है। मोहन अथवा सममोहन यह दोनो पायः एक ही भाव को पदिशरत करते है। मोह को ममतव, पेम, अनुराग, सनेह, माया और सामीपय पापत करने की लालसा का कृतय माना गया है। मोहन कमर की यही सब पितिकयाएं होती है। िनषुर, िवरोधी, िवरकत, पितदंदी अथवा अनय िकसी को भी अपने अनुकूल, पणयी और सनेही बनाने के िलए मोहन कमर का पयोग िकया जाता है। मोहन कमर के पयोगो को िसद करने के िलए पहले िनमिलिखत मंत का दस हजार जप करना चािहए। ऊँ नमो भगवते कामदेवाय यसय यसय दृशयो भवािम यश मम मुखं पशयित तं तं मोहयतु सवाहा।'' पयोग से पूवर पतयेक तंत को पहले उपयुरकत मंत से अिभमंितत कर लेना चािहए। मोहन कमर के पयोग िनमिलिखत है :-


१. तुलसी के सूखे हुए बीज के चूणर को सहदेवी के रस मे पीसकर ललाट पर ितलक के रप मे लगाएं। २. असगंध और हरताल को केले के रस मे अचछी तरह से पीसकर उसमे गोरोचन िमलाएं तथा मसतक पर ितलक लगाएं तो देखने वाले मोिहत हो जायेगे। ३. वच, कूट, चंदन और काकड़ िसंगी का चूणर बनाकर अपने शरीर तथा वसतो पर धूप देने अथवा इसी चूणर का मसतक पर ितलक लगाने से मनुषय, पशु, पकी जो भी देखेगा मोिहत हो जाएगा। इसी पकार पान की मूल को िघसकर मसतक पर उसका ितलक करने से भी देखने वाले मोिहत होते है। ४. केसर, िसंदरू और गोरोचन इन तीनो को आंवले के रस मे पीसकर ितलक करने से लोग मोिहत होते है। ५. शेत वच और िसंदरू पान के रस मे पीसकर एवं ितलक लगाकर िजसके भी सामने जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा। ६. अपामागर (िजसे औंगा, मागरा या लाजा भी कहते है) धान की खील और सहदेवी - इन सबको पीसकर उसका ितलक करने से वयिकत िकसी को भी मोिहत कर सकता है। ७. शेत दवू ा और हरताल को पीसकर ितलक करने से मनुषय तीनो लोको को मोिहत कर लेता है। ८. कपूर और मैनिसल को केले के रस मे पीसकर ितलक करने से अभीष सती-पुरष को मोिहत कर सकता है। ९. तंत साधक गूलर के पुषप से कपास के साथ बती बनाए और उसको नवनीत से जलाए। जलती हुई बती की जवाला से काजल पारे तथा उस काजल को राितकाल मे अपनी आंखो मे आंज ले। इस काजल के पभाव से वो सारे जगत् को मोिहत कर लेता है। ऐसा िसद िकया हुआ काजल कभी िकसी को नही देना चािहए। १०. शेत धुध ं ली के रस मे बहदंडी की मूल को पीसने के बाद शरीर पर लेप करने से सारा संसार मोिहत हो जाता है। ११. िबलव पतो को लाने के बाद उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनहे पीसकर किपला गाय के दध ू मे िमलाकर गोली बना ले। उस गोली को िघसकर ितलक करने से देखने वाला तन, मन और धन से मोिहत हो जाएगा। १२. शेत मदार की मूल और शेत चंदन-इन दोनो को पीसकर उसका शरीर पर लेप करे। इस िकया से िकसी को भी सहज ही मोिहत िकया जा सकता है।


१३. शेत सरसो को िवजय (भाग) की पती के साथ पीसकर मसतक पर लेप करे। अब िजसके सामने भी जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा। १४. तुलसी के पतो को लाकर उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनमे िवजया यानी भाग के बीज तथा असगंध को िमलाकर किपला गाय के दध ू मे पीस ले। ततपशात उसकी चार-चार माशे की गोिलया बनाकर पातः उठकर खाएं। इससे सारा जगत मोिहत हुआ पतीत होता है। १५. कड़वी तुंबी के बीजो के तेल मे कपड़े की बती बनाकर जलाएं और उससे काजल पार कर आंखो मे अंजन की भाित लगाएं। अब िजसकी तरफ भी दृिष उठाकर देखेगे, वो मोिहत हो जाएगा। १६. अनार के पंचाग को पीसकर उसमे शेत धुध ं ली िमलाकर मसतक पर ितलक लगाएं। इस ितलक के पभाव से कोई भी मोिहत हो सकता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : सतंभन िकया का सीधा पभाव मिसतषक पर पड़ता है। बुिद को जड़, िनषकय एवं हतपभ करके वयिकत को िववेक शूनय, वैचािरक रप से पंगु बनाकर उसके िकया-कलाप को रोक देना सतंभन कमर की पमुख पितिकया है। इसका पभाव मिसतषक के साथ-साथ शरीर पर भी पड़ता है। सतंभन के कुछ अनय पयोग भी होते है। जैसे-जल सतंभन, अिगन सतंभन, वायु सतंभन, पहार सतंभन, असत सतंभन, गित सतंभन, वाक् सतंभन और िकया सतंभन आिद। तेतायुग के महान् पराकमी और अजेय-योदा हनुमानजी इन सभी िकयाओं के जाता थे। तंत शािसतयो का मत है िक सतंभन िकया से वायु के पचंड वेग को भी िसथर िकया जा सकता है। शतु , अिगन, आंधी व तूफान आिद को इससे िनिषकय बनाया जा सकता है। इस िकया का कभी दुरपयोग नही करना चािहए तथा समाज िहताथर उपयोग मे लेना चािहए। अिगन सतंभन का मंत िनम है। १. ऊँ नमो अिगनरपाय मम् शरीरे सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुतजपात् िसिद भरवित। अषोतरशत जपात् पयोग (िसिदम) भवित॥'' ऊँ नमो इतयािद अिगन सतंभन का मंत है। इस मंत के दस हजार जप करने से िसिद होती है तथा एक सौ आठ जप करने से पयोग िसद होता है। सतंभन से संबिं धत कुछ पयोग िनमिलिखत है : २. घी व गवार के रस मे आक के ताजा दध ू को िमलाकर, शरीर पर उसका लेप करने से भी अिगन सतंभन होता है।


३. केले के रस मे घृतकुमारी व जवारपाठा के रस को िमलाकर शरीर पर लेप करने से शरीर अिगन मे िघरा होने पर भी नही जलता है। ४. पीपल, िमचर और सौठ को कई बार चबाकर िनगल ले। इसके पशात् मुंह मे जलता हुआ अंगारा भी रखे, तब भी मुंह नही जलेगा। ५. चीनी के साथ गाय के घृत को पीकर अदरक के टुकड़े को मुंह मे डालकर चबाएं िफर तपे हुए लोहे के टुकड़े को मुंह मे रखे तो वह भी बफर की भाित ठंडा पतीत होगा। ६. ऊँ नमो िदगंबराय अमुकसय सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुत जपात् मंतः िसदो भवित। अषोतर शत जपात् पयोगः िसदो भवित। उपयुरकत मंत का दस हजार जप करने से मंत िसद होता है और आवशयकता होने पर एक सौ आठ बार जप करने से मंत िसद हो जाता है। मंत अमुकसय' के सथान पर िजसके आसन पर सतंभन करना हो उसका नाम लेना चािहए। ७. भागरे के रस मे सरसो (सफेद) को पीसकर, मसतक पर उसका लेप करके िजसके सममुख भी जाएंगे उसकी बुिद का सतंभन हो जाएगा। ८. अपामागर और सहदेई को लोहे के पात मे डालकर पीसे और उसका ितलक मसतक पर लगाएं। अब जो भी देखेगा उसका सतंभन हो जाएगा। ९. भागरा, िचरिचटा, सरसो, सहदेई, कंकोल, वचा और शेत आक इन सबको समान माता मे लेकर कूटे और सतव िनकाल ले। िफर िकसी लोहे के पात मे रखकर तीन िदनो तक घोटे। अब जब भी उसका ितलक कर शतु के सममुख जाएंगे, तो उसकी बुिद कु ंिठत हो जाएगी। १०. ऊँ नमो भगवते महाकाल पराकमाय शतूणा शसत सतंभन कुर-कुर सवाहा।

२२२२२२ २२२२ २२२२२ : एक लक जपामंतः िसदो भवित नानयथा। अषोतरशत जपात् पयोगः िसदयित धुवम्॥ उपरोकत मंत का एक लाख जप करने से वह िसद हो जाता है और जब इसका पयोग करना हो, एक सौ आठ बार पुनः जप कर पयोग करे तो यह पयोग सफल होता है।


११. पुषय नकत वाले रिववार के िदन अपरािजता की मूल को उखाड़कर मुंह मे रखने अथवा िसर पर धारण करने से शसत सतंभन हो जाता है। १२. रिव पुषय के िदन शेत गुंजा की मूल को लाकर धारण करे तो युद मे शतु के शसत का भय नही रहता अथवा उसके शसत का सतंभन हो जाता है। १३. खजूर की मूल को पैर और हाथ मे धारण करने से खंजर-शसत का सतंभन हो जाता है। १४. जामुन की मूल को हाथ पर और केबड़े की मूल को मिसतषक पर तथा ताड़ की मूल को मुंह मे रखने से शसत चाहे िजस पकार हो, उसका सतंभन हो जाता है। इन तीनो जड़ो का चूणर बनाकर घृत के साथ सेवन करने से आकमणकारी के शसत का सतंभन हो जाता है। १५. चमेली की मूल को मुख मे रखने से िकसी भी शसत का भय नही रहता। रिववार को पुषय नकत आने पर अपामागर की मूल लाकर उसे पीस ले और शरीर पर उसका लेप करे तो सभी पकार के शसत से सतंभन हो जाता है। १६. ऊँ नमः काल राित ितशूलधािरणी। मम शतुसैनय सतंभन कुर कुर सवाहा। एक लकजपाचयापं मंतः िसदः पजायते। उपरोकत शतजपात् पयोगे िसिदरतमा॥ उपयुरकत मंत के एक लाख जप से यह मंत िसद हो जाता है और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करके पयोग करने से सैनय सतंभन होता है। १७. िमटी के एक पात मे शमशान की भसम से शतु का नाम िलखे और उसे नीले सूत से बाधकर एक गहरे गडढे मे गाड़ दे। तदनंतर उस पर एक पतथर रखकर ढाप दे। ऐसा करने से शतु की पूरी सेना का ही सतंभन हो जाता है। १८. ऊँ नमो भगवते महारौदाय गभरसतंभनं कुर कुर सवाहा॥ इस मंत को िसद करने के िलए 1 लाख जप करना जररी है। अनयथा पयोग सफल नही होगे। जब भी पयोग करना हो तो एक सौ आठ बार जप अवशय करे।

२२२२२२ :


१९. केशर, शकर, जवारपाठा और कु ंदपुषप को समान माता मे शहद मे िमलाकर खाने से गभरपात से रका होती है। २०. ऋतुसनाता सती यिद रेडी के बीज को िनगल ले तो उसका गभर कभी नही िगरता। कमर मे धतूरे का बीज बाधने से भी गभर सतंभन होता है। रिववार के िदन जब पुषय नकत हो, तब काले धतूरे की मूल लाकर गिभरणी सती की कमर मे बाध दे। इससे गभर का सतंभन होता है। २१. कुमहार के हाथ से लगी हुई चाक की िमटी को शहद मे िमलाकर बकरी के दध ू के साथ सेवन करने से गभर का सतंभन होता है।

२. २२२२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : ÷ 'देष' का अथर है दस ू रो के लाभ मे अवरोध उतपन करना है इसी देष भावना का िकयातमक रप 'िवदेषण' कहलाता है। इसका मुखय उदेशय होता है िकनही दो लोगो के बीच फूट, िवदोह, उपदव, अिवशास और शतुता के भाव उतपन करके िवघटन की उतपित करना। ऊँ नमो नारदाय अमुकसयाकेन सहिवदेषणम् कुर-कुर सवाहा। इस मंत का एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है और जब कोई तंत पयोग करना हो तो पहले मंत का एक सौ आठ बार जप करके िसिद पापत कर लेनी चािहए। मंत मे अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना हो उसके नाम का उचचारण करे।

२२२२२२ : १. शेर और हाथी के दातो को गाय के मकखन के साथ पीसकर िजनके नामो से आग मे हवन िकया जाएगा, वे िवदेषण के पभाव मे आ जाएंगे। २. कुते के बाल तथा िबलली का नाखून िमलाकर जहा जलाया जाएगा वहा के लोगो मे िवदेषण उतपन हो जाएगा। ३. साही का काटा िजसके मकान के मुखय दार पर गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे हर समय कलह बनी रहेगी। ४. जब कभी भी दो वयिकतयो के बीच देष उतपन करना हो, तो उनके पैरो की िमटी को सान एवं गूध ं कर उससे एक पुतली बनाएं और शमशान मे ले जाकर उसे भूिम मे गाड़ दे। इस िकया को करने से उनके बीच देष उतपन हो जाएगा। ५. कोई भाषण या समारोह चल रहा हो, तो भैसे और घोड़े के बालो को परसपर िमलाकर जलाएं। इससे सभा या समारोह मे भगदड़ मच जाएगी।


६. एक हाथ मे कववे का पंख और दस ू रे हाथ मे उललू का पंख लेकर िवदेषण के मंत से अिभमंितत करे और उन दोनो पंखो को िफर काले सूत से बाधकर िजस घर मे गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे रहने वालो का आपस मे झगड़ा हो जाएगा।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : वशीकरण का अथर वश मे करना है। वह कमर िजसके दारा पयोगकता अभीष पाणी को अपने वश मे कर लेता है ÷वशीकरण कहलाता है। वसतुतः यह आकषरण और मोहनकमर का चरम िवकिसत और अतयिधक पभावी रप है। १. ऊँ नमो नारायणाय सवर लोकानृ मम वंश कुर-कुर सवाहा। इस मंत का एक लाख जप करके इसे िसद करे और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करने से पयोग मे सफलता िमलती है। अथवा इस मंत को भी िसद कर सकते है। २. ऊँ नमो भगवते उऽ््् ऽमामरे ्् ो शराय धय

मोधय िमली िमली ठः ठः सवाहा।

शुभ मुहत ू र मे उतर की ओर मुंह करके सूयोदय के समय मूंगे की माला से मंत का जप आरंभ करे। तीस हजार जप करने से यह मंत िसद हो जाता है, िफर िकसी पर भी पयोग करने से पूवर उकत वसतु को सात बार अिभमंितत करे तो िनशय ही सफलता िमलेगी। साधक दोनो मंत मे से िकसी को भी िसद कर सकता है। दोनो मंत समान पभावशाली है।

२२२२२२ : ३. बहदंडी, वच, और कूठ के चूणर को िकसी भी रिववार के िदन पान मे डालकर िखलाने से वह पयोगकता के वश मे हो जाएगा। ४. वट+ वृक की मूल को पानी मे िघसकर उसमे िचता की भसम िमलाये और मसतक पर उसका ितलक लगाकर िजसके सामने जाएंगे वह वश मे हो जायेगा। ५. पुषय नकत के िदन पुननरवा की जड़ को लाकर उसे उपरोकत मंत से केवल सात बार अिभमंितत करे और दाएं हाथ की कलाई मे बाध ले। अब जो भी उसे देखेगा, वशीभूत हो जाएगा। ६. किपला गाय के दध ू मे अपामागर की जड़ को पीसकर ितलक लगाने वाला साधक तीनो लोको को भी वश मे कर सकता है। ७. सहदेही की छाया मे सुखाकर चूणर बना ले। ततपशात उसे पान मे डालकर िजसे भी िखलाएंगे वह वशीभूत हो जाएगा। ८. गोरोचन और सहदेवी को िमलाकर उसका ितलक करने वाला वयिकत सभी को वशीभूत कर लेता है।


९. उदं ुबर की जड़ को िघसकर उसका ितलक करने वाला वयिकत िकसी को भी वश मे कर सकता है। १०. गूलर की जड़ का चूणर पान मे डालकर िजसे भी िखलाया जाएगा वह वशीभूत हो जाएगा। ११. सरसो और देवदाली के चूणर को गोली बनाकर और उस गोली को मूंह मे रखकर िजससे भी बातचीत की जाएगी वह उसी के हक मे बोलने लगेगा। १२. हरताल, मैनिसल, केसर, कूठ और सौठ का चूणर करके उसमे अपनी अनािमका उंगली का रकत िमलाकर ितलक लगाने से सब लोगो का वशीकरण हो जाता है। १३. गोरोचन, कमल का पत, कागनी और लाल चंदन- इनका ललाट पर ितलक करने से सब लोग वश मे हो जाते है। १४. िवलव पत और िवजौरा नीबू को बकरी के दध ू मे पीसकर ितलक करने से भी लोग वशीभूत हो जाते है। १५. आंवले के रस मे मैनिसल और असगंध िमलाकर माथे पर लेप करने से भी हर िकसी को वश मे िकया जा सकता है। १६. ऊँ नमः कामाखयादेवयै अमुकी मे वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है। पयोग के समय एक माला का जप करे। अमुकी के सथान पर अभीष सती का नाम ले।

२२२२२२ : १७. काक जंघा, लगर, केशर और मैनिसल का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डालेगे, वो वश मे हो जाएगी। १८. िचता की राख, वच कूढ, तगर और केशर का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डाल िदया जाएगा, वो वश मे हो जाएगी। १९. पान के रस मे लालमखना और मैनिसल पीसकर मंगलवार के िदन ितलक करने से िसतयो को वशीभूत िकया जा सकता है। २०. ऊँ नमो महायिकणयै मम पित को वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप कर इसे िसद करे तथा पयोग के समय एक माला जप करे। पित को वश मे करने के िलए िनमिलिखत तंतो का पयोग िकया जाता है।


२१. िवषणुकात, भागरा, गोखर और गोरोचन को पीसकर गोली बना ले। िफर पूवोकत मंत से अिभमंितत करने के बाद गोली को िघसकर ितलक करने से पित वश मे हो जाता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : आकषरण तंत मे सबसे पहले (कली) बीज मंत को िसद कर लेना आवशयक है इसके िसद होने के बाद ही आकरषण तंतो का पयोग करना चािहए। कली बीज मंत की कामबीज यािन कामकला बीज कहते है। ितकोण की ऊवरमुख तथा अधोमुख सथापना से जो आकृित बनती है वह योिन मुदा कहलाती है। इसके बीच मे कली की जाकर की सथापना करके धयान करना चािहए इसका जप करते समय िनमिलिखत बातो का धयान रखना चािहए। १. सवरपथम भृकिट के मधय मे योिनमुदा की कलपनाकरके उसके बीच मे कली की अकर की सथापना कर, उसका धयान करना चािहए। २. पातः काल मे दो घंटे तक इसका धयान अवशय करना चािहए। ३. सवसथ मन से शात िचत होकर ही धयान व जप िकया जाना चािहए। ४. दाएं हाथ की किनिषका उंगली पर माला फेरनी चािहए। ५. दंडासन का उपयोग व दिकण िदशा मे मुंह रखना चािहए एवं मूंगा की माला पर जप करना चािहए। ६. छह महीने मे यह बीज मंत िसद हो जाता है। उसके बाद आकषरण मंत और तंत का पयोग करना चािहए। ऊँ नमः आिदपुरषाय अमुकसयाकषरणं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जपकर िसद करे तथा पयोग के समय 1 माला जप करे। अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना है उनका नाम लेना चािहए।

२२२२२२ : १. भोजपत पर अनािमका उंगली के रकत से उपरोकत मंत िलखे और मधय मे अभीष सती या पुरष का नाम िलखकर शहद मे डाल दे। इस िकया से उसका आकषरण हो जाएगा, िजसका नाम िलखा होगा।

२. रिव पुषय के िदन बहदंडी को लाकर पीस ले। तदनंतर िजस कािमनी के मसतक पर यह चूणर डाल िदया जाएगा वह सती वशीभूत हो जाएगी। ३. पंचमी के िदन सूवावतर वृक की मूल लाकर एवं उसे पीसकर चूणर बना ले िफर पूवोकत मंत से एक सौ आठ बार अिभमंितत कर, िजस सती या पुरष को पान के साथ िखलाएंगे, वो आकिषरत होकर िखंचा चला आएगा।


नोट : अंत मे सभी पयोग समाज के िहताथर मे या अचछे कायर हेतु िकये जाये तो अचछा होगा। िकसी भी बुरे उदेशय हेतु िकया गया पयोग लाभ की अपेका हािन भी कर सकता है। पता : डॉ. िनमरल कोठारी बधव् ऐसटो पॉइंट १३ िकड सटीट, कोलकाता-१६

२. २२२२ २२२२२ २२२२२२ : िजस कमर के दारा िकसी सती या पुरष को अपने पित मुगध करने का भाव िनिहत हो, वो ÷मोहनकमर' कहलाता है। मोहन अथवा सममोहन यह दोनो पायः एक ही भाव को पदिशरत करते है। मोह को ममतव, पेम, अनुराग, सनेह, माया और सामीपय पापत करने की लालसा का कृतय माना गया है। मोहन कमर की यही सब पितिकयाएं होती है। िनषुर, िवरोधी, िवरकत, पितदंदी अथवा अनय िकसी को भी अपने अनुकूल, पणयी और सनेही बनाने के िलए मोहन कमर का पयोग िकया जाता है। मोहन कमर के पयोगो को िसद करने के िलए पहले िनमिलिखत मंत का दस हजार जप करना चािहए। ऊँ नमो भगवते कामदेवाय यसय यसय दृशयो भवािम यश मम मुखं पशयित तं तं मोहयतु सवाहा।''

२२२२२२ २२ २२२२२ २२२२२२२२ २२२२२ २२ २२२२ २२२२२२२२२ २२२२२ २२ २२२२२२२२२२ २२ २२२२ २२२२२। २२२२ २२२२ २२ २२२२२२ २२२२२२२२२२ २२ :१. तुलसी के सूखे हुए बीज के चूणर को सहदेवी के रस मे पीसकर ललाट पर ितलक के रप मे लगाएं। २. असगंध और हरताल को केले के रस मे अचछी तरह से पीसकर उसमे गोरोचन िमलाएं तथा मसतक पर ितलक लगाएं तो देखने वाले मोिहत हो जायेगे। ३. वच, कूट, चंदन और काकड़ िसंगी का चूणर बनाकर अपने शरीर तथा वसतो पर धूप देने अथवा इसी चूणर का मसतक पर ितलक लगाने से मनुषय, पशु, पकी जो भी देखेगा मोिहत हो जाएगा। इसी पकार पान की मूल को िघसकर मसतक पर उसका ितलक करने से भी देखने वाले मोिहत होते है। ४. केसर, िसंदरू और गोरोचन इन तीनो को आंवले के रस मे पीसकर ितलक करने से लोग मोिहत होते है। ५. शेत वच और िसंदरू पान के रस मे पीसकर एवं ितलक लगाकर िजसके भी सामने जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा।


६. अपामागर (िजसे औंगा, मागरा या लाजा भी कहते है) धान की खील और सहदेवी - इन सबको पीसकर उसका ितलक करने से वयिकत िकसी को भी मोिहत कर सकता है। ७. शेत दवू ा और हरताल को पीसकर ितलक करने से मनुषय तीनो लोको को मोिहत कर लेता है। ८. कपूर और मैनिसल को केले के रस मे पीसकर ितलक करने से अभीष सती-पुरष को मोिहत कर सकता है। ९. तंत साधक गूलर के पुषप से कपास के साथ बती बनाए और उसको नवनीत से जलाए। जलती हुई बती की जवाला से काजल पारे तथा उस काजल को राितकाल मे अपनी आंखो मे आंज ले। इस काजल के पभाव से वो सारे जगत् को मोिहत कर लेता है। ऐसा िसद िकया हुआ काजल कभी िकसी को नही देना चािहए। १०. शेत धुध ं ली के रस मे बहदंडी की मूल को पीसने के बाद शरीर पर लेप करने से सारा संसार मोिहत हो जाता है। ११. िबलव पतो को लाने के बाद उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनहे पीसकर किपला गाय के दध ू मे िमलाकर गोली बना ले। उस गोली को िघसकर ितलक करने से देखने वाला तन, मन और धन से मोिहत हो जाएगा। १२. शेत मदार की मूल और शेत चंदन-इन दोनो को पीसकर उसका शरीर पर लेप करे। इस िकया से िकसी को भी सहज ही मोिहत िकया जा सकता है। १३. शेत सरसो को िवजय (भाग) की पती के साथ पीसकर मसतक पर लेप करे। अब िजसके सामने भी जाएंगे वो मोिहत हो जाएगा। १४. तुलसी के पतो को लाकर उनहे छाया मे सुखा ले। िफर उनमे िवजया यानी भाग के बीज तथा असगंध को िमलाकर किपला गाय के दध ू मे पीस ले। ततपशात उसकी चार-चार माशे की गोिलया बनाकर पातः उठकर खाएं। इससे सारा जगत मोिहत हुआ पतीत होता है। १५. कड़वी तुंबी के बीजो के तेल मे कपड़े की बती बनाकर जलाएं और उससे काजल पार कर आंखो मे अंजन की भाित लगाएं। अब िजसकी तरफ भी दृिष उठाकर देखेगे, वो मोिहत हो जाएगा। १६. अनार के पंचाग को पीसकर उसमे शेत धुध ं ली िमलाकर मसतक पर ितलक लगाएं। इस ितलक के पभाव से कोई भी मोिहत हो सकता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : सतंभन िकया का सीधा पभाव मिसतषक पर पड़ता है। बुिद को जड़, िनषकय एवं हतपभ करके वयिकत को िववेक शूनय, वैचािरक रप से पंगु बनाकर उसके िकया-कलाप को रोक देना सतंभन कमर की


पमुख पितिकया है। इसका पभाव मिसतषक के साथ-साथ शरीर पर भी पड़ता है। सतंभन के कुछ अनय पयोग भी होते है। जैसे-जल सतंभन, अिगन सतंभन, वायु सतंभन, पहार सतंभन, असत सतंभन, गित सतंभन, वाक् सतंभन और िकया सतंभन आिद। तेतायुग के महान् पराकमी और अजेय-योदा हनुमानजी इन सभी िकयाओं के जाता थे। तंत शािसतयो का मत है िक सतंभन िकया से वायु के पचंड वेग को भी िसथर िकया जा सकता है। शतु , अिगन, आंधी व तूफान आिद को इससे िनिषकय बनाया जा सकता है। इस िकया का कभी दुरपयोग नही करना चािहए तथा समाज िहताथर उपयोग मे लेना चािहए। अिगन सतंभन का मंत िनम है। १. ऊँ नमो अिगनरपाय मम् शरीरे सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुतजपात् िसिद भरवित। अषोतरशत जपात् पयोग (िसिदम) भवित॥'' ऊँ नमो इतयािद अिगन सतंभन का मंत है। इस मंत के दस हजार जप करने से िसिद होती है तथा एक सौ आठ जप करने से पयोग िसद होता है।

२२२२२२ २२ २२२२२२२ २२२ २२२२२२ २२२२२२२२२२ २२ : २. घी व गवार के रस मे आक के ताजा दध ू को िमलाकर, शरीर पर उसका लेप करने से भी अिगन सतंभन होता है। ३. केले के रस मे घृतकुमारी व जवारपाठा के रस को िमलाकर शरीर पर लेप करने से शरीर अिगन मे िघरा होने पर भी नही जलता है। ४. पीपल, िमचर और सौठ को कई बार चबाकर िनगल ले। इसके पशात् मुंह मे जलता हुआ अंगारा भी रखे, तब भी मुंह नही जलेगा। ५. चीनी के साथ गाय के घृत को पीकर अदरक के टुकड़े को मुंह मे डालकर चबाएं िफर तपे हुए लोहे के टुकड़े को मुंह मे रखे तो वह भी बफर की भाित ठंडा पतीत होगा। ६. ऊँ नमो िदगंबराय अमुकसय सतंभन कुर कुर सवाहा। अयुत जपात् मंतः िसदो भवित। अषोतर शत जपात् पयोगः िसदो भवित। उपयुरकत मंत का दस हजार जप करने से मंत िसद होता है और आवशयकता होने पर एक सौ आठ बार जप करने से मंत िसद हो जाता है। मंत -


अमुकसय' के सथान पर िजसके आसन पर सतंभन करना हो उसका नाम लेना चािहए। ७. भागरे के रस मे सरसो (सफेद) को पीसकर, मसतक पर उसका लेप करके िजसके सममुख भी जाएंगे उसकी बुिद का सतंभन हो जाएगा। ८. अपामागर और सहदेई को लोहे के पात मे डालकर पीसे और उसका ितलक मसतक पर लगाएं। अब जो भी देखेगा उसका सतंभन हो जाएगा। ९. भागरा, िचरिचटा, सरसो, सहदेई, कंकोल, वचा और शेत आक इन सबको समान माता मे लेकर कूटे और सतव िनकाल ले। िफर िकसी लोहे के पात मे रखकर तीन िदनो तक घोटे। अब जब भी उसका ितलक कर शतु के सममुख जाएंगे, तो उसकी बुिद कु ंिठत हो जाएगी। १०. ऊँ नमो भगवते महाकाल पराकमाय शतूणा शसत सतंभन कुर-कुर सवाहा।

२२२२२२ २२२२ २२२२२ : एक लक जपामंतः िसदो भवित नानयथा। अषोतरशत जपात् पयोगः िसदयित धुवम्॥ उपरोकत मंत का एक लाख जप करने से वह िसद हो जाता है और जब इसका पयोग करना हो, एक सौ आठ बार पुनः जप कर पयोग करे तो यह पयोग सफल होता है। ११. पुषय नकत वाले रिववार के िदन अपरािजता की मूल को उखाड़कर मुंह मे रखने अथवा िसर पर धारण करने से शसत सतंभन हो जाता है। १२. रिव पुषय के िदन शेत गुंजा की मूल को लाकर धारण करे तो युद मे शतु के शसत का भय नही रहता अथवा उसके शसत का सतंभन हो जाता है। १३. खजूर की मूल को पैर और हाथ मे धारण करने से खंजर-शसत का सतंभन हो जाता है। १४. जामुन की मूल को हाथ पर और केबड़े की मूल को मिसतषक पर तथा ताड़ की मूल को मुंह मे रखने से शसत चाहे िजस पकार हो, उसका सतंभन हो जाता है। इन तीनो जड़ो का चूणर बनाकर घृत के साथ सेवन करने से आकमणकारी के शसत का सतंभन हो जाता है। १५. चमेली की मूल को मुख मे रखने से िकसी भी शसत का भय नही रहता। रिववार को पुषय नकत आने पर अपामागर की मूल लाकर उसे पीस ले और शरीर पर उसका लेप करे तो सभी पकार के शसत से सतंभन हो जाता है। १६. ऊँ नमः काल राित ितशूलधािरणी।


मम शतुसैनय सतंभन कुर कुर सवाहा। एक लकजपाचयापं मंतः िसदः पजायते। उपरोकत शतजपात् पयोगे िसिदरतमा॥ उपयुरकत मंत के एक लाख जप से यह मंत िसद हो जाता है और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करके पयोग करने से सैनय सतंभन होता है। १७. िमटी के एक पात मे शमशान की भसम से शतु का नाम िलखे और उसे नीले सूत से बाधकर एक गहरे गडढे मे गाड़ दे। तदनंतर उस पर एक पतथर रखकर ढाप दे। ऐसा करने से शतु की पूरी सेना का ही सतंभन हो जाता है। १८. ऊँ नमो भगवते महारौदाय गभरसतंभनं कुर कुर सवाहा॥ इस मंत को िसद करने के िलए 1 लाख जप करना जररी है। अनयथा पयोग सफल नही होगे। जब भी पयोग करना हो तो एक सौ आठ बार जप अवशय करे।

२२२२२२ : १९. केशर, शकर, जवारपाठा और कु ंदपुषप को समान माता मे शहद मे िमलाकर खाने से गभरपात से रका होती है। २०. ऋतुसनाता सती यिद रेडी के बीज को िनगल ले तो उसका गभर कभी नही िगरता। कमर मे धतूरे का बीज बाधने से भी गभर सतंभन होता है। रिववार के िदन जब पुषय नकत हो, तब काले धतूरे की मूल लाकर गिभरणी सती की कमर मे बाध दे। इससे गभर का सतंभन होता है। २१. कुमहार के हाथ से लगी हुई चाक की िमटी को शहद मे िमलाकर बकरी के दध ू के साथ सेवन करने से गभर का सतंभन होता है।

२. २२२२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : ÷ देष' का अथर है दस ू रो के लाभ मे अवरोध उतपन करना है इसी देष भावना का िकयातमक रप ÷िवदेषण' कहलाता है। इसका मुखय उदेशय होता है िकनही दो लोगो के बीच फूट, िवदोह, उपदव, अिवशास और शतुता के भाव उतपन करके िवघटन की उतपित करना। ऊँ नमो नारदाय अमुकसयाकेन सहिवदेषणम् कुर-कुर सवाहा।


इस मंत का एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है और जब कोई तंत पयोग करना हो तो पहले मंत का एक सौ आठ बार जप करके िसिद पापत कर लेनी चािहए। मंत मे अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना हो उसके नाम का उचचारण करे।

२२२२२२ : १. शेर और हाथी के दातो को गाय के मकखन के साथ पीसकर िजनके नामो से आग मे हवन िकया जाएगा, वे िवदेषण के पभाव मे आ जाएंगे। २. कुते के बाल तथा िबलली का नाखून िमलाकर जहा जलाया जाएगा वहा के लोगो मे िवदेषण उतपन हो जाएगा। ३. साही का काटा िजसके मकान के मुखय दार पर गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे हर समय कलह बनी रहेगी। ४. जब कभी भी दो वयिकतयो के बीच देष उतपन करना हो, तो उनके पैरो की िमटी को सान एवं गूध ं कर उससे एक पुतली बनाएं और शमशान मे ले जाकर उसे भूिम मे गाड़ दे। इस िकया को करने से उनके बीच देष उतपन हो जाएगा। ५. कोई भाषण या समारोह चल रहा हो, तो भैसे और घोड़े के बालो को परसपर िमलाकर जलाएं। इससे सभा या समारोह मे भगदड़ मच जाएगी। ६. एक हाथ मे कववे का पंख और दस ू रे हाथ मे उललू का पंख लेकर िवदेषण के मंत से अिभमंितत करे और उन दोनो पंखो को िफर काले सूत से बाधकर िजस घर मे गाड़ िदया जाएगा, उस घर मे रहने वालो का आपस मे झगड़ा हो जाएगा।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : वशीकरण का अथर वश मे करना है। वह कमर िजसके दारा पयोगकता अभीष पाणी को अपने वश मे कर लेता है ÷वशीकरण कहलाता है। वसतुतः यह आकषरण और मोहनकमर का चरम िवकिसत और अतयिधक पभावी रप है। १. ऊँ नमो नारायणाय सवर लोकानृ मम वंश कुर-कुर सवाहा। इस मंत का एक लाख जप करके इसे िसद करे और पयोग के समय एक सौ आठ बार जप करने से पयोग मे सफलता िमलती है। अथवा इस मंत को भी िसद कर सकते है। २. ऊँ नमो भगवते उऽ््् ऽमामरे ्् ो शराय धय

मोधय िमली िमली ठः ठः सवाहा।

शुभ मुहत ू र मे उतर की ओर मुंह करके सूयोदय के समय मूंगे की माला से मंत का जप आरंभ करे। तीस हजार जप करने से यह मंत िसद हो जाता है, िफर िकसी पर भी पयोग करने से पूवर उकत


वसतु को सात बार अिभमंितत करे तो िनशय ही सफलता िमलेगी। साधक दोनो मंत मे से िकसी को भी िसद कर सकता है। दोनो मंत समान पभावशाली है।

२२२२२२ : ३. बहदंडी, वच, और कूठ के चूणर को िकसी भी रिववार के िदन पान मे डालकर िखलाने से वह पयोगकता के वश मे हो जाएगा। ४. वट+ वृक की मूल को पानी मे िघसकर उसमे िचता की भसम िमलाये और मसतक पर उसका ितलक लगाकर िजसके सामने जाएंगे वह वश मे हो जायेगा। ५. पुषय नकत के िदन पुननरवा की जड़ को लाकर उसे उपरोकत मंत से केवल सात बार अिभमंितत करे और दाएं हाथ की कलाई मे बाध ले। अब जो भी उसे देखेगा, वशीभूत हो जाएगा। ६. किपला गाय के दध ू मे अपामागर की जड़ को पीसकर ितलक लगाने वाला साधक तीनो लोको को भी वश मे कर सकता है। ७. सहदेही की छाया मे सुखाकर चूणर बना ले। ततपशात उसे पान मे डालकर िजसे भी िखलाएंगे वह वशीभूत हो जाएगा। ८. गोरोचन और सहदेवी को िमलाकर उसका ितलक करने वाला वयिकत सभी को वशीभूत कर लेता है। ९. उदं ुबर की जड़ को िघसकर उसका ितलक करने वाला वयिकत िकसी को भी वश मे कर सकता है। १०. गूलर की जड़ का चूणर पान मे डालकर िजसे भी िखलाया जाएगा वह वशीभूत हो जाएगा। ११. सरसो और देवदाली के चूणर को गोली बनाकर और उस गोली को मूंह मे रखकर िजससे भी बातचीत की जाएगी वह उसी के हक मे बोलने लगेगा। १२. हरताल, मैनिसल, केसर, कूठ और सौठ का चूणर करके उसमे अपनी अनािमका उंगली का रकत िमलाकर ितलक लगाने से सब लोगो का वशीकरण हो जाता है। १३. गोरोचन, कमल का पत, कागनी और लाल चंदन- इनका ललाट पर ितलक करने से सब लोग वश मे हो जाते है। १४. िवलव पत और िवजौरा नीबू को बकरी के दध ू मे पीसकर ितलक करने से भी लोग वशीभूत हो जाते है।


१५. आंवले के रस मे मैनिसल और असगंध िमलाकर माथे पर लेप करने से भी हर िकसी को वश मे िकया जा सकता है। १६. ऊँ नमः कामाखयादेवयै अमुकी मे वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप करने से यह िसद हो जाता है। पयोग के समय एक माला का जप करे। अमुकी के सथान पर अभीष सती का नाम ले।

२२२२२२ : १७. काक जंघा, लगर, केशर और मैनिसल का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डालेगे, वो वश मे हो जाएगी। १८. िचता की राख, वच कूढ, तगर और केशर का चूणर बनाकर िजस सती के िसर पर डाल िदया जाएगा, वो वश मे हो जाएगी। १९. पान के रस मे लालमखना और मैनिसल पीसकर मंगलवार के िदन ितलक करने से िसतयो को वशीभूत िकया जा सकता है। २०. ऊँ नमो महायिकणयै मम पित को वशं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जप कर इसे िसद करे तथा पयोग के समय एक माला जप करे। पित को वश मे करने के िलए िनमिलिखत तंतो का पयोग िकया जाता है। २१. िवषणुकात, भागरा, गोखर और गोरोचन को पीसकर गोली बना ले। िफर पूवोकत मंत से अिभमंितत करने के बाद गोली को िघसकर ितलक करने से पित वश मे हो जाता है।

२. २२२२२२ २२२२२ २२२२२२ : आकषरण तंत मे सबसे पहले (कली) बीज मंत को िसद कर लेना आवशयक है इसके िसद होने के बाद ही आकरषण तंतो का पयोग करना चािहए। कली बीज मंत की कामबीज यािन कामकला बीज कहते है। ितकोण की ऊवरमुख तथा अधोमुख सथापना से जो आकृित बनती है वह योिन मुदा कहलाती है। इसके बीच मे कली की जाकर की सथापना करके धयान करना चािहए इसका जप करते समय िनमिलिखत बातो का धयान रखना चािहए। १. सवरपथम भृकिट के मधय मे योिनमुदा की कलपनाकरके उसके बीच मे कली की अकर की सथापना कर, उसका धयान करना चािहए। २. पातः काल मे दो घंटे तक इसका धयान अवशय करना चािहए। ३. सवसथ मन से शात िचत होकर ही धयान व जप िकया जाना चािहए।


४. दाएं हाथ की किनिषका उंगली पर माला फेरनी चािहए। ५. दंडासन का उपयोग व दिकण िदशा मे मुंह रखना चािहए एवं मूंगा की माला पर जप करना चािहए। ६. छह महीने मे यह बीज मंत िसद हो जाता है। उसके बाद आकषरण मंत और तंत का पयोग करना चािहए। ऊँ नमः आिदपुरषाय अमुकसयाकषरणं कुर-कुर सवाहा। एक लाख जपकर िसद करे तथा पयोग के समय 1 माला जप करे। अमुक के सथान पर िजस पर पयोग करना है उनका नाम लेना चािहए।

२२२२२२ : १. भोजपत पर अनािमका उंगली के रकत से उपरोकत मंत िलखे और मधय मे अभीष सती या पुरष का नाम िलखकर शहद मे डाल दे। इस िकया से उसका आकषरण हो जाएगा, िजसका नाम िलखा होगा। २. रिव पुषय के िदन बहदंडी को लाकर पीस ले। तदनंतर िजस कािमनी के मसतक पर यह चूणर डाल िदया जाएगा वह सती वशीभूत हो जाएगी। ३. पंचमी के िदन सूवावतर वृक की मूल लाकर एवं उसे पीसकर चूणर बना ले िफर पूवोकत मंत से एक सौ आठ बार अिभमंितत कर, िजस सती या पुरष को पान के साथ िखलाएंगे, वो आकिषरत होकर िखंचा चला आएगा। नोट : अंत मे सभी पयोग समाज के िहताथर मे या अचछे कायर हेतु िकये जाये तो अचछा होगा। िकसी भी बुरे उदेशय हेतु िकया गया पयोग लाभ की अपेका हािन भी कर सकता है।

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