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, २०१२

Sarath Menon Photography


सज ृ न प्रस्तुतत

सारं ग

सितम्बर, २०१२

बदलाव की बयार

सम्पादकीय आना तो था ही, क्या हुआ जो थोड़ी दे र हो गयी|

सारं ग का ये अंक आने में काफी दे र हुयी| काफी परे शाननयााँ थीं|मसलन लेखों-कहाननयों की कमी, नए लोगों का आभाव, पुराने लोगों की थकावट| कुछ समय के ललए तो ननराश ही हो गया था, लगता था कक सारं ग अब हम सारं ग मंडली की यादों का ही हहस्सा हो जायेगी| लेककन शायद अभी यादों को बनाने का वक़्त है ;

नए लोग लमले, सारं ग मंडली

में उत्साह आया और प्रस्तुत है सारं ग-ससतम्बर, २०१२|

ऐश्वयाा, अनुमेहा ने सारं ग को भरपरू लाड-प्यार हदया है | उधर नौकरी भी अलमताभ और संदीप से सारं ग के ललए आत्मीयता कम नहीं कर पायी| इतनी भाग-दौड़ वाली जजंदगी से उन्होंने कुछ पल सारं ग के ललए चुरा ललये| इस अंक से सारं ग मंडली थोड़ी बड़ी हो गयी है | दो नए लमत्र

बने है : रजत और रूपल| स्वागत है उनका और आशा है उनके आने से सारं ग की ववववधधता बढ़े गी| सारं ग हम सबकी सोच का समावेश है और जजतना लोग सारं ग से जड़ ु ेंगे, सारं ग उतनी ही बड़ी सोच वाली होगी|

इन शब्दों के साथ मैं सारं ग का यह अंक आपको समवपात करता हूाँ| -हर्षवर्षन

िारं ग मंडली अलमताभ लमश्र

संदीप लसंह हर्ावधान अनुमेहा

परम शाह

अननमेर् श्रीवास्तव रूपल जोशी रजत लमश्र

ऐश्वयाा नतवारी


अन्दर के पन्नों में पाएं

1. नाम गुम जाएगा - अतमताभ तमश्र 2. दुसनयादारी - हर्ष वर्ष न 3. अशआर 4. "कलावती सनवाि, 1974" -ऐश्वयाष ततवारी 5. लोटपोट लतीफे 6. बिंती हवा -केदारनाथ अग्रवाल 7. एहिाि - रजत तमश्र 8. परछाई ं - अनुमेहा

सारं ग

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नाम गम ु जाएगा कल वाताालाप में एक साथी से जब उसके शहर के बारे में पूछा तो उसने लसफा राज्य का नाम बता कर छोड़

हदया | मुझे ज्यादा रूधच इस बात को जानने में थी की आखखर वो कौन सा

शहर है जो की अपने ही वालसयों के

ललए गुमनाम हो गया है | काफी कुरे दने पर उसने कहा -

" लोग हाँसते हैं की तुम नक्सल प्रभववत जजले से आती हो और मेरा माखौल बनाया जाता

है"|जान कर दं ग रह गया की भारत के पढ़े ललखे वगा में ऐसी सोच व्याप्त है और उससे भी आश्चयाजनक कक लोग इस डर से अपने शहर को गुमनाम बना रहे हैं| हमारे घर में सांप आ जाये तो क्या हम लोगों को अपने घर के बारे में ना बताएं?

कुछ महीने पहले 'दरभंगा' जहााँ मैंने अपने ज़िन्दगी के १७ साल बबताये और हमेशा अपनी

पहचान को इस शहर की संस्कृनत के साथ दे खा, को मीडडया ने 'आतंक की नयी नसारी' तक

कह डाला और आम लोगों में एक अवधारणा बन गयी कक दे श में हो रहे सारे आतंकी घटनाओं के तार यहााँ से जड़ ु े हैं| दख ु ी हूाँ, इस शहर के ललए नहीं बजकक इस शहर के बदहाली पर|आज भी लोगों से लमलने पर भववष्य में शायद वो मझ ु े याद ना रखे लेककन अगली मल ु ाक़ात में मेरी पहचान से पहले दरभंगा ही उनके हदमाग में आएगा| मद्द ु ा लसफा शहर का रहता तो एक समय

के ललए कुछ कारण ननकल पाता, लेककन लोग तो अपनी प्रांतीय पहचान तक को भी लमटा दे ते हैं| याद है मझ ु े एक वाक्या, आज से करीब ४-५ साल पहले का, जब मेरे लमत्र ने खद ु को

हदकली का बता हदया लसफा इसीललए क्यकूं क उस ़िमाने में उसके प्रान्त को घखृ णत ऩिरों से

दे खा जाता था| मैं समय और संवेदनाओ को इसका दोर् नहीं दे ता, अगर ऐसा कश्मीरी सोचते तो कफर इस नगीने को हमने शायद भुला ही हदया होता| अगर आप कभी एक कश्मीरी से या

उत्तर-पूवा से आये एक भारतीय से लमलें तो मल ु ाक़ात के बाद एक यादों के गुलदस्ते से धनी हो जायेंगे जजसमें होंगी कुछ अच्छी बातें , प्रकृनत की, संस्कृनत की और अगर अच्छे से दे खेंगे तो शायद कुछ कांटे लमल जाएाँ जो ददा बयां करते हैं बदलते पररवेश का, बदलती सोच का|

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सारं ग


कुछ लोग नाम नहीं लें गे क्यूंकक उन्हें लगता है कक नाम सुनके लोग हाँसेंगे, कुछ सोचें गे कक

नाम सुन कर लोगों का ऩिररया बदल जायेगा| अजीब है ना, कक हम अपने माटी को ही दगा दे दे ते हैं और लसफा उसकी पहचान रह जाती है 'परमानें ट एड्रेस' यानन 'स्थायी पता' में | बाकी क्या सोचते हैं, इस डर से लोग अपनी पहचान भुला दे ते हैं| छत्तीसगढ़ के दं तेवाडा या

ओडडशा के मलकानधगरी जैसे दे श के करीब ८० जजले में नक्सली समस्या अपने चरम पर है, वहााँ दे श की तमाम संस्थाएं हदन रात एक कर प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतगात सड़क ननमााण या मुलभुत ढााँचे के ववकास पर काम कर रही हैं, जान की बा़िी लगा कर आई.ऐ.एस, पलु लस काम में जट ु ी है

और अपने ही लोग इसको गम ु नाम कर रहे हैं| इनके

दभ ु ााग्य ने इनके नाम को ़िरूर बदनाम ककया है लेककन इनके खबू बयों को नहीं| यहााँ बांस

कला, हस्त लशकप आहद कई ची़िें है जो इनको एक नयी पहचान दे ती हैं लेककन लाल साए ने इनको हालशये पर ला हदया है | ़िरूरत है इसके बारे में बात करने की, नाम लेने की ताकक बाहरी दनु नया को ऐसे जगहों की लमठास एवं प्रगनत के ललए हो रहे प्रयासों के बारे में पता चले|

लोग जो चाहते हैं कक उन जगहों को नक़्शे से लमटा दें , क्या हमें उनका हाथ बंटाना चाहहए ? हालात तभी सुधरें गी जब जनता बात करे गी और सच्चाई पेश करे गी| अब चुनना आपको है|

—————————————————————————————————————————————————————————————— -अतमताभ तमश्र

(बेंगलूरू)

सारं ग

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दुसनयादारी कहने को तो हमारे पांच पड़ोसी थे; पर हमारा आना जाना लसफा दो घरों में था. बाकक तीन घरों से हमें दरू रहने की हहदायत लमलती थी, क्यूंकक हमारे घर वाले उन्हें अपने बराबरी का नहींमा नते थे| पर हम बच्चें कहााँ ऊाँचनीच दे खने वाले थे| हम बच्चों के बराबरी वाले लोग तो उन्हीं ३ घरो में थे|हमारी किकेट टीम तो उन्हीं तीन घरों से बनती थी| अब ये बात घर वा लों को कौन समझाए| उन्हें तो राजू में उसके चाय बेचने वाले पापा ऩिर आते थे और अजन ुा में उसके चपरासी दादा| घर का आलम ये था कक ़िबान से एक रोड-छाप शब्द नछटका, और इधर मााँ के ताने शरू ु , "अब राजू-अजन ुा के साथ हदन भर रहोगे तो यही सीखोगे ना"| खैर धीरे -धीरे समय बीतता गया| दसवी तक तो हम तीनों पढ़े , कफर मैं आगे की पढ़ाई करने हदकली आ गया| दो साल बाद छुहटयों में

वापस लौटा तो कभी-कभी आस-

पड़ोस के बच्चों को पढ़ा हदया करता था| राजू अपने पापा के चाय के ठे ले पर काम करने लगा था| एक हदन जब मैं कहीं से अपनी बाइक पर अपने लम्बे बालों को हवा में लहरातें हुए, मन ही मन खुद को जॉन अब्राहम समझता हुआ, घर वापस लौट रहा था तो सामने लाल साइककल पर कोई जाता हदखा| साइककल जानी पहचानी लग रही थी| साइककल चलाने वाले को दे खकर मुझे साइककल और मेरा ररश्ता याद आ गया| बारहवे जन्महदन पर मेरी दादी ने मुझे एक साइककल भें ट की थी| मैंने तब नयी नयी साइककल सीखी थी| शाम का बेसब्री से इंत़िार था, साइककल जो सभी को हदखानी थी| राजूअजुन ा दोनों ने बहुत तारीफ की| २ हदनों बाद राजू ने भी नयी साइककल खरीदी| लाल रं ग की चमचमाती साइककल|

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सारं ग


मेरे घर वालों को राजू का साइककल खरीदना तननक भी नहीं सुहाया| उन्हें चाय वाले के परर वार पर कटाक्ष करने का एक नया मौका लमल गया| मुहाँ पर न सही पीछे ही पापा बोले, "चाय वाले का बेटा मेरे बेटे से मक ु ाबला करे गा|" आज लाल साइककल पर वही राजू था| अपने उम्र से १५ साल ज्यादा हदख रहा था| एकबारगी तो मन ककया कक गाड़ी रोककर हाल चाल पूछ लूं| लेककन कफर चाह कर भी ब्रेक नहीं लगा पाया| मन की खझझक ने पैर की शजक्त ही सोख ली, ब्रेक लगाने की ताकत ही नहीं बची| रास्ते भर ववचारों से मन भारी था| अगले हदन चीनी खरीदने रोड पर ननकला तो सामने की दवा की दक ु ान से राजू चाय के खाली धगलास बटोरता ननकला| कुछ पलों के ललए ऩिरें भी लमली, कफर उसने ऩिरें झक ु ा ली| वो भयावह शन्ु य था उसकी आाँखों में | लगा जैसे उन आाँखों ने उम्मीद भी छोड़ दी है और उमंग भी; उन आाँखों में न तो उमंग थी ना ही ननराशा; ना इच्छा थी और ना ही दुःु ख; था तो लशर्फा शन्ु य| मैंने भी उसे उस हदन नहीं रोका| राजू का चेहरा ���ेरी आखों से नहीं जा रहा था| मैं बार-बार अपना ध्यान हटाना चाहता था;पर मेरी सुई तो वही अटकी थी| क्या वो शमा है जो उसे मुझसे लमलने से रोक रही है? क्या लसफा इसललए क्योंकक वो एक चायवाला है? क्या मैं एक चाय वाले को दोस्त कह कर छोटा हो जाऊंगा? अगर हााँ तो चाय वाला छोटा क्यूाँ है? समाज ने चोरीडकैती को गलत काम बोल रखा है, राजू वैसे कोई काम तो नहीं करता कफर भी वो छोटा क्याँू है? अचानक मैंने सोचा, खेत में काम करने वालों को भी तो मैं हे यदृष्टी से दे खता हूाँ|

सारं ग

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क्यों?

क्यूंकक मैंने उनसे ज्यादा पढाई की है, क्या लसफा चंद ककताबें हमें दस ू रों से ऊपर कर दे ती हैं? पर ऐसा तो आहद काल से चला आ रहा है| ब्राह्मणों को भी सवोच्च स्थान इसीललए लमला क्यंकू क वो चारो वणों में सबसे ज्यादा पढ़े ललखे थे| मेरे मन में द्वंद्व चल रहा था| थोड़ी दे र बाद मुझे मेरे और राजू के बीच की दरु ी का एहसास हुआ| आज अगर राजू को पयााप्त संसाधन और प्रेरणा लमलती तो शायद वो भी मेरी जगह होता| अब आपके पड़ोस का लड़का इतना महान तो है नहीं की खुद से ही सब कुछ पढ़ ले, वनाा आज फैराडे इतना ववलशस्ट नहीं होता| मुझे बचपन की याद आ गयी| हमारे किकेट ग्राउं ड के एक और नाली थी| हमारा ननयम ये था कक जो भी गें द उस नाली में मरे गा वही वो गें द ननकलेगा| बच्चे भगवन का रूप क्यूाँ होते हैं? क्यंकू क उस समय मैंने ये नहीं कहा कक तू चाय वाले का बेटा है, तेरा काम है वो गें द ननकालना| मेरे पापा बड़े अफसर हैं, मैं क्यूाँ अपने हाथ गंदे करूाँ? जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनको लसखाया जाता हैं कक ये तुम्हारा हैं और ये पड़ोसी का| ये सही है, वो गलत हैं| यहीं तो दनु नयादारी हैं| कुछ लोग कहते हैं कक राजू छोटा हैं| बड़े लोगों के बीच उसको उठने-बैठने की तमी़ि नहीं| बातचीत की नजाकत नहीं| खाने वपने की नफासत नहीं| क्या हम ये नजाकतनफासत मााँ के पेट से सीख के आते हैं? जजस घर में दो जूनखाने के लाले हो; वो नफासत सीख कर क्या करे गा| लेककन इसका कतई ये मतलब नहीं कक हम राजू की एक मनष्ु य केरूप में इज़्ित न करे | जजसने जजंदगी भर भोजपरु ी कफकम दे खी हो, वो अल वपनको की क्या बात करे गा| पहली बात तो उसे मौका दे ना चाहहए; और अगर मौका ना दे पाए तो कम से कम इज़्ित वाली

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सारं ग


ऩिर ही सही| राजू जैसे लोगों की सहायता के ललए बैठाये गए अफसर सरकारी योजनाओ से ५% पैसे खाएं और कफर भी शान से पूरे शहर में गाड़ी से घूमें|वहीीँ अगर राजू अपनी चाय के ललए ४ के बजाये ५ रुपये मांगले तो हम "लट ू ता है " कह कर उसे दत्ु कार दे ते हैं| शायद यही दनु नयादारी हैं| बुकर टी वालशंगटन ने एक बार कहा,"कोई जानत तब तक संपन्न नहीं हो सकती जब तक वह ये ना समझे की खेत जोतने में उतना ही सम्मान है जजतना कववता ललखने में "| राजू को अपना सर नीचा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जब तक वह ईमानदारी से अपना काम करे | कुछ सालों बाद जब मैं छुहियों में घर आया तो राजू अपने ओसरे में छोटे बच्चे के साथ खेल रहा था| मुझसे रहा नही गया| जा पहुाँचा उसके ओसरे और खुली पड़ी चारपाई पर बैठ गया| "कहो राजू,क्या हाल है?" "सब आप दे ख ही रहे है.ये मेरा बेटा है,प्यार से छुटकू बोलते है"| "ये क्या आप आप लगा रखा है| शादी कर ली, बच्चे भी हो गये,मेरी लमठाई कहा है?" "आप.......तू बैठ!अभी लाता हूाँ|"

-हर्ावधान

सारं ग

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अशआर ऐ खुदा रे ट के सेहरा को समंदर कर दे

या छलकती आाँखों को भी पत्थर कर दे | तुझको दे खा नहीं महसस ू ककया है मैंने

आ ककसी हदन मेरे एहसास का पैकर कर दे और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेककन मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे |

-शहीद मीर

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सारं ग


"कलावती

तनवास, 1974"

लसनेमा घर की जर-जर सीहढयों से उतरते हुए, एक परु ाना घर हदखता है| कफकम में दे खी कोलकाता कक गललयााँ अभी भी मन में हैं| कई बार ऐसा होता है कक मैं लसनेमा खत्म होने के बाद भी कुछ पल उन्ही गललयों में घम ू ती हूाँ, जहााँ नायक-नानयका रहते थे, कुछ ये परु ानी आदत है और कुछ कहाननयों का शौक|

तो ये जो घर हदख रहा है, कलावती ननवास, क्या खास है इसमें ? सच पूछें तो कुछ भी नहीं|

पुराना है, दीवारें कम़िोर लगती हैं, पें ट उखड रहा है, दरवाजें ऐसे हैं कक दे ख कर ही कहा जा सकता है खुलने पर ककतनी आवा़ि करें गे| कुछ अगर ककपना का घोडा दौड़ाया जाए तो पता चलेगा जब बनाया गया होगा, बड़े सारे रं गों से रं ग होगा, घर के सामने के बड़ा सा पेड़

हदखता है, जो टूटी हुई सी बालकनी से घर के अन्दर झााँक रहा है | आम का पेड़ है शायद| कभी ककसी ने बड़े करीने से इसे यहााँ लगाया होगा, एक पौधा होगा जब ये, ये पे ड़ जो आज छायादार है| नाम पर गौर करें , कलावती ननवास, आप मुस्कुराएंगे| कलावती?! घर की मालककन का नाम होगा, या माललक की मााँ का| १९७४ से यहााँ खड़ा है, अब पुराना है, बेरंग है, अजीब सी

शाजन्त है यहााँ| गोवा के घरों की एक खालसयत है, नीची छतें , बालकनी, सुन्दर बागीचे, रं ग और रं ग!

और गोवा के घर हमेशा मुझे एक मुस्कान के साथ छोड़ जाते हैं|

आज मुझे एक ऐसा ही घर चाहहए, कोई बनावटी सजावट नहीं, कोई हदखावा नहीं, पुराना, अनुभवी, यादों से भरा, खुलशयों और परे शाननयों का साथी, सहारा, मााँ के जैसा! जैसे अभी बोल पड़ेगा, 'धचंता मत करो, हम हैं"! हर समस्या का हल!

सारं ग

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वो जो कहते हैं ना अक्सर, 'एक महल हो सपनों का'..महल नहीं चाहहए, एक ऐसा ही घर, रं गीन, सुन्दर, अपना सा| जहााँ नायक और नानयका का पररवार रहते, कोलकाता जैसे भीड़-भाड़ वाले

शहर की अनजान खोयी हुई गललयों में | पेड़ है तो जुगनू होंगे, जुगनू होंगे, शाम होगी, चााँद होगा और गोवा जैसा मौसम हुआ तो, तो बरसात तो होगी ही! कुछ और भी चाहहए क्या जीवन में ? कफकम ने अभी भी साथ नहीं छोड़ा है , वो गाना याद है? "खझललमल लसतारों का आाँगन होगा, ररमखझम बरसता सावन होगा!"|

-ऐश्वयाष ततवारी

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सारं ग


ट ो प ट ो ल कबत ू र उड़े बा़िार में , पनवारी पान लगाये,

चचा चले 'साइककल' पर, औ' 'हाथी' कुचला जाए|

सारं ग

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चची का गुस्सा, चचा के तेवर, हदन भर झगडा होए ,

एक म्यान में दो तलवारें , कैसे संभली जाएाँ |

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सारं ग


बिंती हवा हवा हूाँ हवा मैं बसंती हवा हूाँ

सन ु ो बात मेरी अनोखी हवा हूाँ बड़ी बावली हूाँ बड़ी मस्तमौला। नहीं कुछ कर्फकर है बड़ी ही ननडर हूाँ जजधर चाहती हूाँ

उधर घूमती हूाँ मुसाकफर अजब हूाँ। न घर बार मेरा न उद्देश्य मेरा न इच्छा ककसी की न आशा ककसी की न प्रेमी न दश्ु मन हवा हूाँ हवा मैं बसंती हवा हूाँ।

सारं ग

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जहााँ से चली मैं जहााँ को गई मैं शहर गााँव बस्ती नदी खेत पोखर झुलाती चली मैं हवा हूाँ हवा मैं

बसंती हवा हूाँ।

चढ़ी पेड़ महुआ थपाथप मचाया धगरी धम्म से कफर चढ़ी आम ऊपर उसे भी झकोरा ककया कान में ''कू'' उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुाँची वहााँ गेहुाँओं में

लहर खूब मारी। हाँसी ़िोर से मैं हाँसी सब हदशाएाँ हाँसे लहलहाते हरे खेत सारे हाँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी बसंती हवा में

हाँसी सजृ ष्ट सारी। हवा हूाँ हवा मैं

बसंती हवा हूाँ।

-केदारनाथ अग्रवाल

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सारं ग


एहिाि एक एहसास है| शब्दों से परे , दनु नया से दरू | माध्यम है| अवपतु ककसका , व्यक्त करना कहठन है| कभी होठों और मुस्कराहट का सुखद लमलन, तो कभी नैनों और आसुओं की जुदाई| कभी एक अंगड़ाई, तो कभी वो लफ्ज़ि, जो ना मन बना सकता है, ना जजन्हें सींचने की औकात हदल की होती है | एक कवव के ललए तो वो एक शब्द है,

मूखा उसपर घंटों बोल सकते हैं| शायर की तो वो

'उदा 'ू है, और उस पागल र्फरहाद की ज़िन्दगी| लोग तो कहते हैं की वो सत्य है; हााँ शायद, सही कहते होंगे, या झठ ू , कहना मजु श्कल है| मौत है वो तो| ज़िन्दगी भी है| प्रकृनत में है वो तो| खोजूंगा, शायद लमले या न लमले| ऩिररया चाहहए| बच्चों की ककलकाररयों में , मााँ के आाँचल में , बहनों की डांट में और वपताजी की छड़ी में | धचडड़यों की चहचहाहट में , कललयों में , फूलों में , खेतों में , झरनों से, मेरे दे स की माटी में , पहाडों में , ब्रम्हांड में , र्���ैला हुआ, एक शन्ू य है |

सारं ग

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मन की गहराईयों में है| पववत्र है, पाक है | मीरा का कृष्ण और सबरी का राम है| कोई रं ग नहीं है, ना कोई रूप| वो आता है , बबन बताये, और छूकर ननकल जाता है| कफ़िा में घल ु ती खश ु बओ ु ं की तरह, सबके जीवन में घल ु ता है| उगते सरू ज सा बढता है और पखू णामा के चााँद की चांदनी सा, पूरे शबाब तक जाता है| एक एहसास है| प्यार|

-रजत तमश्र

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सारं ग


परछाई ं अभी कुछ लमनट पहले ही ऑकफस के फोन कक घंटी बजी थी पर अब तक अपराजजता अपने घर के वपछले मोड़ तक दौड़ चुकी थी| उसकी मााँ लगातार उसे आवा़ि लगा रही थी| बड़े ही लाढ़-प्यार से पली थी अपराजजता| मााँ अपनी फटी साड़ी को रफ्जफू कर काम चला लेती पर हर साल अपनी बेटी के जन्महदन पर उसे तोहफे ़िरूर दे ती| एक समय था जब वह कई साल पहले सड़क पर अकेली अपने पररवार वालों के ललए बबलक-बबलक कर रोई थी| पााँच साल की उम्र में

उसे ये तक पता न था की उसका इस दनु नया में कोई है भी या नहीं| उस समय जब

मााँ ने हााँथ थामा था, ये वादा ककया था कक वो अपनी रानी बबहटया को कभी अकेले न छोड़ेगी और मााँ अपने वाडे हमेशा पूरे करती| जब भी वो मााँ से अपने या उनके अतीत के बारे में पूछती, मााँ हसकर हमेशा एक ही सीख दे ती-"अगर बीता वक़्त तुम्हे याद न हो तो उसे भूले रहने में ही भलाई है| इसललए ़िरूरी ये है कक अपने आज में खुशी-खुशी कई हसीन पल जीयें क्योंकक तब वो हमें हमेशा याद रहें गे| राह चलता इंसान अगर पीछे मुद जाए तो वो अपनी मंज़िल से ऩिरें फेर चुका होता है| मंज़िल तक पहुाँचने के ललए इंसान को आगे बढ़ते ही रहना होता है | ठीक वैसे ही, ज़िन्दगी ठहर नहीं सकती, उसे चलते ही रहना होता है |"

सारं ग

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"अपराजजता! अपराजजता!" मााँ की आवा़ि अब भी उसके कानों में साफ-साफ गाँज ू रही थी| स्कूल से घर लौटते समय उसने एक बार अपने नाम का मतलब पूछा था| मााँ ने कहा--"अपराजजता वो है जजसे कोई पराजजत ना कर सके| ककतनी भी मजु श्कलें हों, तू हार नहीं मानेगी| मेरी ताकत जो है तुझमें | ककस्मत चाहे कैसे भी खेल खेले, अंत में जीत कर रहे गी तू|" जब भी चोट लगने पर वो रोती, मााँ उसे चुप कराके कहती, "चोट लगने से ही तो इंसान बहादरु बनता है!"

नौकरी की खबर जब मााँ को दी, तो मााँ ने कहा-"तू जहााँ भी हो, मैं रहूाँ ना रहूाँ,

मेरा आशीवााद

हमेशा तेरे साथ है |" कुछ महीने पहले हीं तो अपनी पगार से ये नया घर ललया है| घर दरअसल एक गुप्ता पररवार का है | वो ऊपर रहते हैं और मााँ-बेटी नीचे| सबकी आपस में बहुत पटती है| उनकी छह साल की बेटी है जूही|

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सारं ग


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जब भी अपराजजता काम पर जाती है, मााँ का मन जूही से ही बेहेलता है| बड़ी चंचल है जूही और बातें करने में सबसे माहहर| ह़िारों तरह की बातें करती| रो़ि रात को मााँ से कहानी सन ु ने आती है और मााँ के हााँथ की जलेबबयााँ, अपराजजता की तरह, उसे भी खासा पसंद हैं| अपराजजता के ललए ये घर एक हाँसता-खेलता आलशयाना है| अपराजजता के कदम रुक गये | वो घर पहुाँच चुकी थी पर वो आलशयाना ऩिर ना आया | ना हीं उसमें रहने वाले लोग हदखे | थी तो लसफा खामोशी | बचपन की वो रात इतने सालों बाद उसे कफर याद आई | उसने खद ु को कफरसे बीच सड़क लाचार और बेबस पाया | वो टूटना नहीं चाहती थी पर वो हौंसला जट ु ा भी ना पा रही थी | अचानक उसे लससकने की आवा़ि आई | ढूाँढने पर एक कोने में जूही हदखी | उसकी हालत दे खकर अपराजजता हहल सी गयी | शरू ु में वो पहचान ही ना सकी | कुछ समय तक वह स्तब्ध खड़ी रही | उसे कफर मााँ की आवा़ि सन ु ाई पड़ी --"अपराजजता वो है जो कभी हार ना माने |" उसने जह ू ी को गोद में ललया और चल पड़ी |

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एक बार कफर वो ते़िी से चलती जा रही थी पर इस बार मंज़िल घर नही उससे काफी दरू थी | वो चलती गयी, बबना एक भी बार मुड़े | चलते-चलते आखखर में उसे मााँ ऩिर आई, मगर इस बार अपनी ही परछाईं में |

-अनुमेहा

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सारं ग


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सज ृ न प्रस्तुतत

सारं ग


सारंग - सितम्बर २०१२ अंक