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आलोिना-प्रसिंग संकलक-श्री प्रफुल्ल कुमार दास

श्रीश्रीठाकुरभक्तत मनष्ट्ु य को कभी दर् म नह ं र्नाती, र्क्ल्क वह मनष्ट्ु य को चचर पराक्रमशील, ऊजी, अ ु ल नु रागसम्पन्न र्ना दे ती है । भतत कभी इष्ट्ट का र्ोझा नह ं होता, र्क्ल्क वह होताहै उनका र्ल , भरोसा, सम्पदा, आशा और उद्द पना का माणणक । हनम ु ान को ह दे खो ना, रामचंद्र ननराश हो जाते हैं, पर वह ननराश नह ं होते हैं । वह जानकी का उद्धार ककये बर्ना रहनह ं पाते हैं । सारे दानयत्वों को सर पर लेकर क्जस प्रकार मााँ जानकी का उद्धार करना चाहहए उसी प्रकार वह करते हैं । इस कमम में वह पाप-पण् ु य, इहकाल-परकाल, स्वगम-मोक्ष, भगवान आहद ककसी चीज़ की परवाह नह ं करते । रामचंद्र को आनन्द पहुाँचना, उनके चेहरे पर प्रसन्नता णखला दे ना, उनकी इच्छा की पनू तम करना- इसके ससवाय उन्हें और दस ू र चाहनह ं थी । अपने को भल ु ाकर इष्ट्ट की तक्ृ तत के सलए, उनकीप्रीनत के सलए इस प्रकार र्ेपरवाह हो कमम में पागल हो ना ह धमम है । उसी पथ पर आत्मननयंत्रण भगवान लाभ, सख ु - शांनत, आनन्द, जय, ऐश्वयम, साफल्य, साथमकता, सर्कुछ आसानी से पकड़ में आ जाते हैं । ककं तु इनमें ककसी के सलए चचंता करनी नह ं पड़ती है । प्रथम खण्ड, पष्ट्ृ ठ संख्या. 25-26

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Bliss march 2018  

The March issue of Bliss is live! This issue will focus upon the certain basic and yet very important aspects of our lives. Are we happy eno...

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