Page 1


ॐ राम नाम सख ु दायी

भजन संग्रह

भजनकार स्वर्गीय शांित दे वर्ी वर्मार

संपादन आचायर संजीवर् वर्मार 'सिलिलि'

समन्वर्य प्रकाशन अभिभयान जबलिपुर भोपालि ग्वर्ािलियर रायपुर बंगलिुर िबलिासपुर लिखनऊ ***********


राम नाम सख ु दायी भजन संग्रह

तत ृ ीय अभंतरजालि संस्करण २०१०

भजनकार

स्वर्गीय शाि दन्त दे वर्ी वर्मार

संपादन

आचायर संजीवर् वर्मार 'सिलिलि' समन्वर्य प्रकाशन अभिभयान

जबलिपुर भोपालि ग्वर्ािलियर रायपुर बंगलिुर िबलिासपुर लिखनऊ ***********

वर्ंदन


िनराकार परब्रम्ह हे !, िचत्रगुप्त भगवर्ान.

िवर्िध हिर हर त्रय हो तम् ु हीं, कमर दे वर् गण ु वर्ान.. दैव िवर्क - भौतितक शि दक्तयाँ, रं ग रूप रस खान. तुम्हीं बसे चर - अभचर मे , रच संतित मितमान.. जो रहस्य यह जानते, वर्े ही है कायस्थ. कमरदेवर् को पज ू ते, िबना हुए सन्यस्त..

***********

नमन

िहिन्दी की आधुिनक मीरां महिीयसी महिादे वी वमार

िहन्दी की िबंदी! तवर्, चरणो मे शत वर्न्दन. भावर्ो की अभंजलिी अभिपरत, श्रद्धा का चंदन.. फँू के प्राण गीत मे , किवर्ता मे नवर् जीवर्न.

दीप िशखावर्त जलिीं, श्वर्ास हर िवर्हँ स अभकम्पन.. तीथरराज की लिुप्त सरस्वर्ती, सी तम ु पावर्न. हुई ित्रवर्ेणी पूणर, िमलिी नमरदा लिुभावर्न..


शाश्वर्त अभिवर्नाशी मल् ू यो का, कर िचर गायन. वर्ेदो सा सािहत्य रचा, शिु च 'सिलिलि' सनातन..

***********

प्राक्कथन अभपने परम पूज्य िपताश्री स्वर्. रायबहादरु माताप्रसाद िसन्हा 'रईस', ऑनरे री

मि दजस्ट्रे ट मैवनपुरी उत्तर प्रदे श को शैवशवर् से ही िनत्य िशवर् भि दक्त मे लिीन होते दे खकर मेरे बालि मन पर िनराकार के साकार िवर्ग्रह के प्रित आराध्य-भावर् उत्पन्न हो गया था.

महात्मा गाँधी के आव्हान पर िपताश्री ऑनरे री मि दजस्ट्रे ट पद से त्यागपत्र दे कर नेहरू जी के नेतत्ृ वर् मे कांग्रेस सत्याग्रही बन गये. िवर्दे शी वर्स्त्रो की होलिी जलिाई गयी, खान-पान के िवर्दे शी बतरन फेक िदए गये, मझ ु े एवर्ं छोटी बिहन को अभंग्रेजी पढानेवर्ालिी मेम हटाकर

भारतीय संगीत िसखाने के िलिए िशिकाक्षिका लिगाई गयी. िपताजी कांग्रेस सभाओं मे भाग लिेते, जो अभंग्रेज अभिधकारी पापा के साथ रोज पाटी करते थे वर्ही उन्हे िगरफ्तार करने लिगे. हम पिरवर्ारजन भगवर्ान का भजन कर खुदको िहम्मत बँधाते. पापा ित्रपुरी कांग्रेस मे भाग

लिेने जबलिपुर आये. यहाँ उनकी मलि ु ाक़ात स्थानीय सत्याग्रही श्री ज्वर्ालिाप्रसाद वर्मार से हुई जो शहर कोतवर्ालिी के पास सुन्दरलिालि तहसीलिदार के बाड़े मे रहते थे, सेठ गोिवर्न्द दास, द्वर्ारका प्रसाद िमश्रा, ब्योहार राजेद िसंह, भवर्ानी प्रसाद ितवर्ारी आिद के नेतत्ृ वर् मे सिय क्रिय थे तथा बड़े फुहारे पर बजाजी (कपड़े) की दक ू ान करते थे. पापा बाड़े मे बने िशवर् मि दन्दर

दे खकर बहुत प्रभािवर्त हुए. बाद मे ज्वर्ालिाप्रसाद जी के छोटे भाई श्री राज बहादरु वर्मार जो तब अभिसस्टे ट जेलिर थे, के साथ मेरा िवर्वर्ाह हुआ. िवर्वर्ाह के बाद ससरु ालि मे िशवर्-भि दक्त का वर्ातावर्रण िमलिा. मेरे दिदया ससरु

स्वर्. सन् ु दरलिालि तहसीलिदार एवर्ं उनके छोटे भाई खैवरातीलिालि जी (स्वर्. महादे वर्ी वर्मार के नाना) द्वर्ारा बनवर्ाये गये िशवर् मंिदरो तथा पितदे वर् श्री राजबहादरु वर्मार जेलि अभधीक्षिक की साि दत्वर्क आचार-िवर्चार ने भगवर्ान के प्रित भि दक्त-भावर् को पष्ु ट िय कया. कायस्थ पिरवर्ार मे

सभी दे वर्ी-दे वर्ताओं मे परात्पर परमब्रम्ह कमरदेवर् श्री िचत्रगप्ु त का प्रादभ ु ारवर् मानकर श्रद्धा सिहत पज ू ने की परम्परा हैव . मेरे मन के भावर् अभपने आप भजनो का रूप लिेते गये. श्रीमती

कृष्णा श्रीवर्ास्तवर् (महिषिर महे श योगी की भाभी), श्रीमती साहू एवर्ं ब्योहारबाग रामायण


मण्डलिी की अभन्य सदस्यो ने इन्हे सराहा-गाया और छपाने के िलिए लिगातार आग्रह िय कया िय कं तु इन्हे भक्तजनो के सामने लिाने मे मझ ु े संकोच था. संभवर्तः ये कालि-क्रिम मे नष्ट

भी हो गये होते िय कं तु दैव वर्ी प्रेरणा से मेरी िप्रय बहुओं साधना-पन ू म, बेिटयो आशा, पष्ु पा, िय करण, सषि ु मा तथा बेटो संजीवर्-राजीवर् के आग्रह और प्रयास से यह भजन संग्रह छपकर आपके हाथो मे हैव .

भगवर्ान का मिहमा-गायन भक्त का अभहोभाग्य हैव . ‘तेरा तुझको अभपरण क्या

लिागे मेरा’ की िवर्नम भावर्ना सिहत यह भावर्ांजिलि समिपरत कर मन को शाि दन्त िमलि रही

हैव . बेटे संजीवर् को इन्हे संपािदत-प्रकािशत करने के िलिए माँ का आशीषि. अभपने प्रपौतत्रो-

प्रपौतित्रयो अभन्शम ु ान, आशत ु ोषि, अभिभषिेक, िनहािरका, िनिशता, मन्वर्ंतर, तुिहना, अभिचरत, अभिपरता, मयंक वर् िप्रयंक को इस आशा के साथ ये भजन सौंपती हूँ िय क उनके मनो मे साि दत्वर्कता, सरलिता वर् शिु चता की ज्योित सदा जलिती रहे गी, भि दक्त-भावर्ना हमेशा पलिती रहे गी.

प्रभु चरणो की अभनुरागी शाि दन्त दे वर्ी

***********

सम्पादकीय

* भगवर्ान का गण ु गान भक्त के जीवर्न का अभरमान ही नहीं, उसकी पहचान भी होता हैव .


* साँस की रािधका, आस की बाँसुरी िलिये मन को भगवर्द्भक्ति दक्त के महारास मे लिीन कर दे , यही भक्त का साध्य और अभभीष्ट हैव .

* परम पूज्य माँ के भावर्ः भि दक्तमय ह्रदय से गत ४ - ५ दशको मे िवर्िवर्ध अभवर्सरो पर

िनःसत ृ उद्गारो को प्रभु-चरणो मे अभिपरत करने के पुनीत कायर मे मुझ अभिय कं चन को कुछ भूिमका िनभाने का अभवर्सर दे कर परम प्रभु तथा माँ ने मुझे आशीिषित कर धन्य िय कया हैव .

* बेटा माँ से सदा लिेता ही हैव , दे कुछ नहीं सकता. माँ की सौतगात दे खी-अभदे खी संतानो तक पहुँचाने का माध्यम बन पाना पवर् ू र जन्म के पन् ु य कमो का फलि हैव .

* चकाचौंध भरी क्षिणजीवर्ी दरू दशरनी आधुिनक संस्कृित के प्रसार-कालि मे परम्परागत

सरलिता, सहजता, औदायर, आत्मीयता और साि दत्वर्त्कता के पञ्च अभमत ृ दैव नंिदन जीवर्न से लिुप्त होते जा रहे है और उनका स्थान द्वर्ेषि, ईष्यार, स्पधार, कटुता तथा स्वर्ाथरपरता के पञ्च िवर्षि लिेते जा रहे है.

* इस संक्रिमण कालि मे भौतितक सख ु -समिृ द्ध, एवर्ं िवर्लिािसताओं के करालि व्यालि जालि से

बचते हुए सत-िशवर्-सद ंु र की उपासना करते हुए सत-िचत-आनंद की अभनभ ु िू त करने-कराने मे ये भजन सहायक हो सके, आप इन भजनो का गायन कर पलि मात्र भी प्रभु की प्रेम प्रसादी पा सके तो यह बालिकोिचत प्रयास साथरक होगा.

तात-मात

चरणकमलिानुरागी संजीवर् 'सिलिलि'


***********

अनुक्रम क्रिमांक

मख ु ड़ा

१.

वर्ंदन

२.

नमन

४.

अभनुक्रिम

६.

अभवर्ध मे जन्मे है श्रीराम

३. ५.

संपादकीय श्री भगवर्ान

७.

बाजे अभवर्ध बधैवया

८.

सन ु ो री गइ ु याँ

९. १०. ११.

िसया फुलि बिगया आयी है

चलिी िसया िगिरजा पज ू न को िमिथलिा मे सजी बरात

१२.

राम द्वर्ारे आये

१४.

ठांड़े जनक सँकुचाये

१६.

द्वर्ारे बहुिरया आयी आयी िसया ससुरालि

१३.

१५. १७. १८. १९.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार

चलिीं जानकी प्यारी

होलिी खेलिे िसया की सिखयाँ होलिी खेलिे चारो भाई

पष्ृ ठांक


२०. २१. २२.

वर्न को चलिे रघुवर्ीर ितलिक करे रघवर् ु ीर

िमलिा राम नाम गलिे का हरवर्ा

२३.

राम जी आये हमरे द्वर्ार

२५.

चलि मन सीता राम की शरण

२७.

तुम्हारे संग वर्न को

२९.

िगिरजा कर सोलिह िसंगार

३१.

भोलिे घर बाजे बधाई

३३.

मनभावर्न मरु लिी

२४. २६. २८. ३०. ३२. ३४.

बहे राम रस गंगा

रघवर् ु र की कृपा हो जाती हैव

िशवर्जी की आयी बारात मोहक छटा पावर्रती िशवर् की धम ू धाम भोलिे के गाँवर् हिर को बनना बनावर्े

३५.

चरणो मे अभपने

३७.

श्याम सुंदर नन्दलिालि

३८.

सत्याग्रह करने

३९.

बापज ू ी आये नगिरया

३६.

हे करणा िसन्धु भगवर्न!

***********

श्री भगवान


िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

जब मेरे प्रभु जग मे आवर्े , नभ से दे वर् सुमन बरसावर्े . कलिम-दवर्ात सश ु ोिभत कर मे , दे ते अभक्षिर ज्ञान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

िचत्रगप्ु त प्रभु शब्द-शि दक्त है, माँ सरस्वर्ती नाद शि दक्त है. ध्वर्िन अभक्षिर का मेलि ऋचाएँ, मंत्र-श्लिोक िवर्ज्ञान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

मातु नंिदनी आिदशि दक्त है. माँ इरावर्ती मोह-मि दु क्त है. इडा-िपंगलिा ऋिद्ध-िसिद्धवर्त, करतीं जग-उत्थान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

कण-कण मे जो िचत्र गप्ु त हैव , कमर-लिेख वर्ह िचत्रगप्ु त हैव . कायस्थ हैव काया मे ि दस्थत, आत्मा मिहमावर्ान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

िवर्िध-हिर-हर रच-पालि-िमटाये, अभनहद सुन योगी तर जाये. रमा-शारदा-शि दक्त करे िनत, जड़-चेतन कल्याण

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

श्यामलि मुख-छिवर्, रूप सह ु ाना, जैवसा बोना वर्ैवसा पाना. कमर न कोई िछपे ईश से, 'सिलिलि' रहे अभनजान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...


लिोभ-मोह-िवर्द्वर्ेषि-काम तज, करणासागर प्रभु का नाम भज. कर सत्कमर 'शाि दन्त' पा लिे, दष्ु कमर अभशांित िवर्धान

िमटाने भक्तो का दःु ख-ददर , जगत मे आते श्री भगवर्ान ्...

***********

अवध मे जन्मे हिै श्री राम अभवर्ध मे जन्मे है श्री राम, दरश को आए शंकरजी... कौतन गा रहे ?, कौतन नाचते?, कौतन बजाएँ करतालि? दरश को आए शंकरजी...

ऋिषि-मिु न गाते, दे वर् नाचते, भक्त बजाएँ करतालि. दरश को आए शंकरजी...

अभँगना मोितयन चौतक हैव , द्वर्ारे हीरक बंदनवर्ार. दरश को आए शंकरजी...

मािलिन-ग्वर्ािलिन सोहर गाये, नाचे दे -दे तालि. दरश को आए शंकरजी...

मैवया लिाई थालि भर मोहरे , लिो दे दो आशीषि. दरश को आए शंकरजी...

नाग ित्रशलि ू भभत ू भूत लिख, डरे न मेरो लिालि दरश को आए शंकरजी...

िबन दशरन हम कहूं न जैवहे, बैवठे धुनी रमाय. दरश को आए शंकरजी...


अभलिख जगाये द्वर्ार पर भोलिा, डमरू रहे बजाय. दरश को आए शंकरजी... रघुवर्र गोदी िलिए कौतशल्या, माथ िडठौतना लिगाय. दरश को आए शंकरजी...

जग-जग ि दजए लिालि माँ तेरो, शंभु करे जयकार. दरश को आए शंकरजी...

***********

बाजे अवध बधैया

बाजे अभवर्ध बधैवया, हाँ-हाँ बाजे अभवर्ध बधैवया...

मोद मगन नर-नारी नाचे , नाचे तीनो मैवया. हाँ-हाँ नाचे तीनो मैवया, बाजे अभवर्ध बधैवया..

मातु कौतशल्या जने रामजी, दानवर् मार भगैवया हाँ-हाँ दानवर् मार भगैवया, बाजे अभवर्ध बधैवया...

मातु कैवकेई जाए भरत जी, भारत भार हरैव या हाँ-हाँ भारत भार हरैव या, बाजे अभवर्ध बधैवया...

जाए सिु मत्रा लिखन-शत्रघ ु न, राम-भारत की छैव यां हाँ-हाँ राम-भारत की छैव यां, बाजे अभवर्ध बधैवया...


नप ृ दशरथ ने गाय दान दी, सोना सींग मढ़ईया हाँ-हाँ सोना सींग मढ़ईया, बाजे अभवर्ध बधैवया...

रानी कौतशल्या मोहर लिुटाती, कैवकेई हार-मद ुं िरया हाँ-हाँ कैवकेई हार-मद ुं िरया, बाजे अभवर्ध बधैवया...

रानी सुिमत्रा वर्स्त्र लिट ु ाएँ, साड़ी कोट रजैवया

हाँ-हाँ साड़ी कोट रजैवया, बाजे अभवर्ध बधैवया...

िवर्िध-हर-हिर दशरन को आए, दान िमलिे कुछ मैवया हाँ-हाँ दान िमलिे कुछ मैवया, बाजे अभवर्ध बधैवया...

'शाि दन्त'-सखी िमलि सोहर गावर्े , प्रभु की लिे य बलिैयाँ हाँ-हाँ प्रभु की लिेय बलिैयाँ, बाजे अभवर्ध बधैवया...

***********

सुनो री गुइयाँ

सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ, राजकँु वर्र दो आए. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...


कौतन के कँु वर्र?, कहाँ से आए?, कौतन काज से आए? कहो री गइ ु याँ, कहो री गइ ु याँ...

दशरथ- कुँवर्र, अभवर्ध से आए, स्वर्यंवर्र दे खन आए. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

का पहने है?, का धारे है?, कैवसे कहो सह ु ाए? कहो री गइ ु याँ, कहो री गइ ु याँ...

पट पीताम्बर, कांध जनेऊ, श्याम-गौतर मन भाये. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

शौतयर-पराक्रिम भी हैव कछु, या कोरी बात बनाये? कहो री गइ ु याँ, कहो री गइ ु याँ...

राघवर्-लिाघवर्, लिखन शौतयर से, मार ताड़का आए. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

चार कँु वर्िर है जनकपरु ी मे , कौतन को जे मन भाए? कहो री गइ ु याँ, कहो री गइ ु याँ...

अभवर्धपुरी मे चार कुँवर्र, जे िसया-उिमरलिा भाए. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...


िवर्िध सहाय हो, किठन पिरच्छा रजा जनक लिगाये. कहो री गइ ु याँ, कहो री गइ ु याँ...

तोड़ सके रघुवर्र िपनाक को, िसया िगिरजा से मनाएं. सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

***********

िसया फुलबिगया आई हिै

िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

कमर करधनी, पाँवर् पैवजिनया, चालि सह ु ाई हैव .

िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

कुसम ु चुनरी की शोभा लिख, रित लिजाई हैव .

िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

चंदन रोलिी हल्दी अभक्षित मालि चढाई हैव . िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...


दत्तिचत्त हो जगजननी की आरती गाई हैव . िगिरजा पज ू न सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

फलि मेवर्ा िमष्ठान्न भोग को नािरयलि लिाई हैव . िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

लिताकंु ज से प्रगट भए लिछमन रघरु ाई है.

िगिरजा पज ू न सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

मोहनी मरू त दे ख 'शाि दन्त' सध ु -बध ु िबसराई हैव .

िगिरजा पूजन सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

िवर्धना की न्यारी लिीलिा लिख मित चकराई हैव . िगिरजा पज ू न सिखयो संग िसया फुलिबिगया आई है...

***********

चलीं िसया िगिरजा पूजन को

चलिीं िसया िगिरजा पूजन को, दे वर्ी-दे वर् मनात.

तोरी शरण मे आयी मैवया, रिखयो हमरी बात...


फुलिबिगया के कँु वर्र साँवर्रे , मोरो िचत्त चुरात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

कुँवर्र सुकोमलि, प्रण कठोर अभित, मन मोरो घबरात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

बीच स्वर्यम्वर्र अभवर्ध कँु वर्र ज,ू धनषि ु भंग कर पात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

िमलिे वर्ही जो मैवया मोरे मन को भात-सह ु ात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

िसय उर-श्रद्धा परख उमा माँ, कर मे पष्ु प िगरात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

पा माँ का आशीषि, सश ु ीलिा िसय मन मे मुस्कात. मैवया, रिखयो हमरी बात...

सखी-सहे लिी समझ न पायीं, काय िसया हषिारत. मैवया, रिखयो हमरी बात...

'शाि दन्त' जग ु लि-जोड़ी अभित संद ु र, जो दे खे तर जात. मैवया, रिखयो हमरी बात...


***********

िमिथला मे सजी बरात

िमिथलिा मे सजी बरात, सखी! दे खन चिलिए...

शंख मंजीरा तुरही बाजे, सजे गलिी घर द्वर्ार. सखी! दे खन चिलिए...

हाथी सज गए, घोड़ा सज गए, सज गए रथ अभसवर्ार. सखी! दे खन चिलिए...

िशवर्-िबरं िच-नारद जी नभ से, दे ख करे जयकार. सखी! दे खन चिलिए...

रामजी की घोडी झूम-नाचती, दे ख मुग्ध नर-नार. सखी! दे खन चिलिए...

भरत-लिखन की शोभा न्यारी, जनगण हैव बिलिहार. सखी! दे खन चिलिए...


लिालि शत्रुघन लिगे मनोहर, दशरथ रहे दलि ु ार. सखी! दे खन चिलिए...

'शाि दन्त' प्रफुि दल्लित है सुमत ं जी, नाच रहे सरदार. सखी! दे खन चिलिए...

***********

राम द्वारे आए

धन धन भाग हमारे , राम द्वर्ारे आए...

हरे -हरे गोबर से अभँगना िलिपायो, मोितयन चौतक पुराए. राम द्वर्ारे आए...

केसर से शभ ु -लिाभ िलिखे है, जलि गलि ु ाब िछड़काये. राम द्वर्ारे आए...

नािर सह ु ागन कलिश धरे है, सतमुख िदया जलिाये. राम द्वर्ारे आए...

स्वर्ागत करतीं मातु सन ु यना, आरती िदव्य जलिाए. राम द्वर्ारे आए...


उमा रमा ब्रम्हाणी शारदा, मंगलि गान गुंजाये. राम द्वर्ारे आए...

शभ ु ाशीषि प्रभु िचत्रगुप्त का, ब्रम्हा-हिर-हर लिाये. राम द्वर्ारे आए...

परी अभप्सरा छम-छम नाचे , दे वर् वर्धट ू ी गाये. राम द्वर्ारे आए...

जगत िपता को जगजननी, जयमालि सँकुच पहनाएं. राम द्वर्ारे आए...

नभ मे हिषिरत चाँद-िसतारे , सय ू र न लिख पछताए. राम द्वर्ारे आए...

हनुमत वर्ाल्मीिय क तुलिसी संग, 'शाि दन्त' िवर्हँ स जस गाये. राम द्वर्ारे आए...

नेह नमरदा बहा रहे प्रभ,ु नहा परमपद पाए. राम द्वर्ारे आए...

***********


जनक अँगना मे हिोती ज्योनार

जनक अभँगना मे होती ज्योनार,

जीमे बराती लिे-लिे चटखार...

चाँदी की थालिी मे भोजन परोसा,

गरम-गरम लिाये व्यंजन हजार. जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

आसन सजाया, पंखा झलित है, गुलिाब जलि िछडके चाकर हजार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

पड़ ू ी कचौतड़ी पापड़ िबजौतरा,

बँद ू ी-रायता मे जीरा बघार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

आलिू भटा गोभी सेम टमाटर,

गरम मसालिा, राई की झार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

पालिक मेथी सरसो कटहलि छोलिे,

कंु दरू करोदा परोसे बार-बार. जनक अभँगना मे होती ज्योनार...


कैवथा पोदीना धिनया की चटनी, आम नीबू िमची सूरन अभचार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

दही-बड़ा, काजू, िय कशिमश िचरौंजी,

केसर गुलिाब जलि, मँह ु मे आए लिार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

लिड्डू इमरती पेड़ा बालिश ू ाही,

बफी रसगल् ु लिा, थालि का िसंगार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

संतरा अभंगूर आम लिीची लिुकात,

जामुन जाम नाशपाती फलि है अभपार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

श्री खंड खीर स्वर्ािदष्ट खाएँ कैवसे? पेट भरा, 'और लिे' होती मनह ु ार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

भुखमरे आए पेटू बाराती,

ठूँसे पसेिरयो, गारी गाये नार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...


'समधी ितहारी भागी लिग ु ाई,

लिे गओ भगा के बाको बाँको यार.'

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

कोिय कलि कंठी गारी गाये,

सुन के बाराती िदलि बैवठे हार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

लिोग इलिायची सौंफ सप ु ारी,

पान बनारसी रचे मजेदार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

'शाि दन्त' दे वर्गण भेषि बदलिकर,

पंगत मे जीमे , करते जुहार.

जनक अभँगना मे होती ज्योनार...

***********

ठांड़े जनक सँकुचाये

ठांड़े जनक सँकुचाये, राम जी को का दे ऊँ ?...

हीरा पन्ना नीलिम मोती, मँग ू ा मािणक लिालि. राम जी को का दे ऊँ ?


रे शम कोसा मखमलि मलिमलि खादी के थान हजार. राम जी को का दे ऊँ ?

कंु डलि बाजूबंद कमरबंद, मुकुट अभँगूठी नौतलिख हार. राम जी को का दे ऊँ ?

स्वर्णर-िसंहासन चाँदी का हौतदा, हाथीदाँत की चौतकी. राम जी को का दे ऊँ ?

गोटा िय कनारी, चादर परदे , धोती अभंगरखा शालि. राम जी को का दे ऊँ ?

काबलि ु ी घोड़े हाथी गौतएँ शक ु सािरका रसालि. राम जी को का दे ऊँ ?

चंदन पलिंग, आबनूस पीढा, शीशम मेज िसंगार. राम जी को का दे ऊँ ?

अभवर्धपित कर जोड़ मनाएँ, चाहे कन्या चार. राम जी को का दे ऊँ ?

'दल् ु हन ही सच्चा दहे ज हैव , मत दे धन सामान.' राम जी को का दे ऊँ ?


राम लिक्ष्मण भरत शत्रुघन, दे बहु िवर्ध सम्मान. राम जी को का दे ऊँ ?

शभ ु ाशीषि दे जनक-सन ु यना, 'शाि दन्त' होय बिलिहार. राम जी को का दे ऊँ ?

***********

चलीं जानकी प्यारी

चलिीं जानकी प्यारी, सन ू ा भया जनकपुर आज...

रोएँ अभंक भर मातु सुनयना, िपता जनक बेहालि. सूना भया जनकपुर आज...

सखी-सहे लिी िय फ़िर-िय फ़िर भे टे, रखना हमको याद. सूना भया जनकपुर आज...

शुक-सािरका न खाते-पीते, लिे चलिो हमको साथ. सूना भया जनकपुर आज...


चारो सत ु ाओं से कहे जनक, रखना दोउ कुलि की लिाज. सन ू ा भया जनकपरु आज...

कहे सन ु यना भये आज से, ससुर-सास िपतु-मात. सूना भया जनकपुर आज...

गर ु बोलिे : सबका मन जीतो, यही एक हैव पाठ. स

Raam Naam Sukhdayee  

Bhajan sangrah ....

Read more
Read more
Similar to
Popular now
Just for you