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सं करण लेखन रे खािच काशन मू य

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थम, नवंबर 2011 अ ण सह ‘ ाि त’ िवभु द ा िसनमन टील काशन, गोवा 250 /-

पू री पु तक ा करने के िलए संपक कर:

samkranti@gmail.com या लॉिगन कर:

www.krantikavya.in

ISBN : 978-93-81542-19-4 ©सवािधकार सुरि त, अ ण सह ‘ ांित’


vfXuxa/kk ds Qwy अ ण सह ‘ ाि त’


रचनाकार किव : अ ण सह ‘ ाि त’ K – 1 / 199 मोहन गाडन उ म नगर, नई- द ली 59 PH . 9 555 17 22 11

samkranti@gmail.com www.arunsingh.info रे खािच : िवभु द ा PH . 9999 84 07 43

vibhudutta.g@gmail.com

काशक व मु क

िसनमन टील काशन डॉगइयर ट मीिडया ा. िल. लॉट नंबर 16 हाउ सग बोड कॉलोनी, गोगोल माग , गोवा 403601 फोन (+91) 94226 85530, 832 275 1509

CINNAMON TEAL PUBLISHING D OGEARS P RINT MEDIA P VT . LTD . P LOT N O . 16 H OUSING B OARD C OLONY , G OGOL , MARGAO , G OA 403601 P H (+91) 94226 85530, 832 275 1509 WWW. CINNAMONTEAL . IN

किव प रचय अ ण सह ‘ ाि त’ मन से एक किव, शौक से एक लेख क, पेशे से प कार, पर परा से योितषी, अनुवांिशकता से गिणत के कोच और आ मा से एक ांितकारी ह| किव क ांितकारी का रचनाएँ पढ़ने के िलए लॉिगन कर: www.krantikavya.in


थम नमन

यह का -सं ह मेरी माँ ीमती सुशीला सह, मेरे िपता ी एच.एन. सह और गु

ी िनिखले रानंद जी के

ी-चरण म

सादर सम पत है, िजनके आशीवाद, मागदशन और वा स य क ऊजा से म, मेरी ाि त, मेरा ेम और मेरी अंतरा मा जीिवत ह, चैत य ह...


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किव क कलम से... आज मेरी किवता का पहला सं ह कािशत होने क इस आनंद-वेला म मुझे वह समय याद आता है जब ‘का ’ मेरे िलए एक डरावनी चीज़ आ करता था| यह कालखंड मेरे छठी से आठव क ा के म य का था| तब मेरे िलए ‘का ’ का अथ हदी क पा पु तक के ‘प ’ भाग के कु छ ‘चै टर’ आ करते थे, िजनके भाव और का -स दय को रटने म ब त क तीत होता था| फर भी, अब पास तो होना ही है, यह सोच अपनी रचना मकता का यथाशि योग कर अ ितम से लगने वाले उ र और ा या का सृजन करता रहता था| मेरी हदी क मैडम ब त खुश रहती थी| फर भी म उस समय इस ग -प क जुगलबंदी का ब त मजाक उड़ाता था| उदाहरणतया, िजन टीचस का बताया मुझे समझ आता था, उनको म ग - ेणी का, और िजनका पढ़ाया मेरे िसर के ऊपर से िनकल जाता था, उनको प - ेणी म रखता था| प - ेणी के िश क के बारे म मेरी सामा य राय थी क ‘जहाँ न प ँचे रिव, वहाँ प ँचे किव’ िनयम के अनुसार इन िश क क बात सीधी नह समझनी चािहए, बि क तीका मक, अलंकार-यु , गूढ़ और बात के पीछे के मम समझे जाएँ| ऐसे ‘चैत य समय’ म एक दन अचानक मातृ- ेरणा से एक किवता िलखने का याल मन म आ गया| न जाने वह कौन सा े मु त था जब मने अपने किव-जीवन क पहली पंि िलखी...

र म रतन था, मेरा ये वतन था था सोने क िचिड़या, था हीरे क गुिड़या... पर फरं गी थे अिड़या, थे आफत क पुिड़या... पहले तो ापारी, बन कर वो आये लालच को अपने, वे ना रोक पाए... उनक नीित थी कू ट, और हमम थी फू ट... इसके बाद आठव क ा म ही एक ‘दोहा-एकादश’ बना डाला| इन दोनो को ही घर से व िश क से ब त ो साहन िमला और बस, म मन क भावना को श द देता ही चला गया|


वैसे, म सै ांितक किव नह |ँ पर तु का के मा यम से कसी ब त बड़ी बात को कु छ श द-योजना बना कर थोड़े म ही कह देने का चम कार बरबस ही मुझे बार-बार का -सृजन करवाता है| यह मन ब त चंचल है| एक साथ ब त कु छ सोचता है| यह सामूिहक िवचार क अिभ या से उ प अकु लाहट कसी न कसी प म अपना कटन चाहती है| इतना कु छ एक साथ लेखब नह कया जा सकता| अत: यह मन वत: ही उस अिभ या के फल व प थोड़े म ही ब त बड़ी बात कह जाने वाले श द क योजनाएं बनाता रहता है, और म चुपचाप अंदर से िनकलने वाले उन पद को िलिपब करता रहता ँ| क तु सच यही है, क यह िवधा मेरे मन म एक मातृ- ेरणा से ही ज मी थी|

वह मातृ ेरणा माँ ने बचपन से ही िसखाया: “लीक-लीक कायर चल, लीक पे चल

कपूत... लीक छोड़ तीन चल : शायर, सह, सपूत ”...और ये पंि मेरे मनमि त क म मानो रच-बस गई| म कई बार सोचता था क चलो, ‘ सह’ तो मेरे नाम के साथ ही लगा आ है और माँ क सेवा और आ ा पालन भी यथाशि कर ‘सपूत’ बनने क ओर अ सर-सा भी दखता ँ; अब कमी िसफ ‘शायर’ बनने क रह गई है| बस यह सोच कर एक बार शायरी भी क , और सबसे पहले माँ को सुनाई| उस समय क माँ क स ता और गव भरी िनगाह आज भी याद ह| बस, फर तो नवीन रचनाएँ िलख-िलख कर माँ को सुनाना एक िन य म सा बन गया| माँ भी मेरी ‘छंद-पद हीन’ शायरी को धीरता से सुनती रही, यथोिचत सुधार करती रही तथा उपयु सुझाव भी देती रह | इस कार िलखते-िलखते न जाने कब म का क गहराइय म उतरता चला गया, और पाया क इसम तो असीम आनंद है| वैसे तो कई वष से म आ मसंतुि के िलए ही का िलखता रहा ,ँ पर तु माँ को लगता है क मेरी कु छ रचनाएँ कसी न कसी को, कह न कह , कु छ न कु छ ेरणा अव य दे सकती ह, और उनके जीवन क चुनौितय म, भोग और मो के म य ककत िवमूढ़ मानिसकता म, अिधकार और कत के म य संशय- ृंखला म और मन, शरीर, मि त क व चेतना के पर पर अंतसघष के ण म भावना मक सहायता अव य प ंचा सकती ह|


का

अत: अब उ ह क आ ा से नव-वष के उपहार- व प वह शायरी और लेकर आप सभी सुधी पाठक के सम उपि थत ँ|

अि गंधा ही य ? यह मेरा एक सामा य अनुभव रहा है क जब-जब मेरे मन म अ धकार छाया, तब-तब मने अपने मन क ही भावना और ऊजा क अि से उस अ धकार को िमटाने का सफल यास कया है| इस त य को तीका मक भाषा म कु छ यूँ कहा जा सकता है क जब भी मन म कोई सामियक या आकि मक अँधेरा ा होता है, िजसम सभी माग दखने बंद हो जाते ह और बा -जगत का कोई भी पदाथ वहाँ रोशनी नह कर पाता, तो म वयं का ही मन जलाता ,ँ िजससे एक अि गंधा का वृ पनपता है, िजसके काश और सुगंध िलए फू ल भिव य के िलए मेरे ल य क ओर जाने वाले माग को काशयु और सुगि धत बनाते ह और िजसक लकड़ी दीघ-काल तक माग को कािशत बनाए रखने हेतु जलाने के काम भी आती है| जब यह पु प और लकड़ी समा या कम होने लगती है, तो म कसी मा यम से फर से मन को जलाता ँ, और फर से यही सब या अपने को दोहराती है| उ मीद है क मेरे मन क अि से पनपी अि गंधा के ये फू ल आपक भावना को भी सुवािसत और कािशत करगे| अब लीक तो छोड़ के चल पड़ा ँ| ल य भी दख रहा है| और कहा भी जाता है क लय और िनमाण, दोन एक किव क लेखनी म ही िछपे रहते ह| ले कन अब देखना तो यह है क इन किवता से कु छ नया िनमाण कर पाता ,ँ या नह ... अथवा कोई नया माग बना पाता, दखा पाता, या उसपर वयं ही चल पाता ,ँ या नह ... शुभाकां ी अ ण सह ‘ ाि त’ नवंबर 21, 2011 नई- द ली


अि पथ का राही... किवता...महज़ कु छ श द ही नह है, बि क यह तो भावना

का एक

ऐसा समंदर है, िजसक गहराई म िजतना उतरो, वह गहराई उतनी ही बढ़ती चली जाती है, और यह मन है क भाव के इस समंदर क अतल-गहराइय तक उतर ही जाना चाहता है। भावना

का एक ऐसा ही समंदर एक पु तक के अंदर

है, और वह पु तक है अ ण सह ‘ ांित’ का का -सं ह ‘अि गंधा के फू ल’। आज इस का -सं ह क भूिमका िलखते ए बेहद खुशी और गव का अहसास हो रहा है। अ ण का एक वा य म प रचय दया जाए तो यह कहना उिचत होगा क वे एक किव, लेखक, प कार, योितषी, गिणत के कोच और एक ांितकारी ह। कतने ही वष से जाने-अनजाने शोध-काय म लगे अ ण अब अपने ाि त- काश को अपनी किवता और लेख के मा यम से च ँओर फै ला रहे ह। समाचार-प और पि का म उनक रचनाएँ कािशत हो रही ह, िज ह ख़ासा सराहा भी जा रहा है। सामािजक कु रीितय और बुराइय को लेकर किव का मन ब त िथत है। अपनी इस कताब म भी उ ह ने सामािजक बुराइय पर कटा कया है। उनक कताब का शीषक ‘अि गंधा के फू ल’ भी इसे सािबत करने के िलए काफ़ है। अि , जो पावन भी है और िव वंसकारी भी। जब यह हवन-कुं ड म दहकती है तो पावन कहलाती है, ले कन जब भयंकर सृि को राख म बदल सकती है। किव के

प धारण करती है तो

दय म दहक रही अि , हवन-कुं ड क

पावन अि है| इस अि म जो ऊ मा-यु सुगंध उठ रही है, वह वा तव म किव के साक य पी मन व सिमधा पी भावना के जलने उठने वाली सुगंध है, और इसी सुगंध से यह पूरा का -सं ह सुरिभत और आ लािवत है| तभी तो इसे अि गंधा कहा गया है। यह अि मन के िनराशा का काश फै लाती है।

पी अँधेरे को दूर कर, आशा


बक़ौल किव-

का नह ये मन क झंझावात से उड़ती धूल है -भावना नह , ये लौह मनस के चुभते ि शूल ह... किव म स ाई के रा ते पर िनरं तर आगे बढ़ते रहने का साहस है। अपनी जननी और अपनी मातृभूिम के ित किव क िन ा और कत बोध को सलाम करने को जी चाहता है। रा भाव पर रिचत किव क रचनाएँ मन म देश ेम का संचार करती ह।

स व भारत का चतु दक पूण मिहमा पा रहा है... िचर तीि त ांित फल अब रा त पर ��� रहा है... माँ के किव के असीम

ित कृ त ता कट करते ए रिचत किवता जहाँ जननी के ेह को दशाती है, वह मातृशि

ित

क महानता भी कट करती है

क कस तरह एक माँ पीड़ा सहकर एक नई ़जदगी को इस दुिनया म लाती है। उसे क सहकर भी सुख का अनुभव होता है, यही तो माँ क महानता है, जो उसे देवता

से भी ऊंचा थान देती है।

वह माँ, िजसके तन म नौ माह के क -घन म सव-पीड़ा म भी िजसके मन म सुख का फु रण आ जीवन का शुभ-सृजन आ... समाज म मिहला

के उ पीड़न से किव का मन रो उठता है। वह कहते ह-

िथत, अशांत, असा य मेरा दल तब-तब है फट जाता


जब-जब कोई मातृशि को, वा तुमा कह जाता... और

सहनशीलता-महाका म संत -पव पढ़ता .ं .. म भगवान, औरत गढ़ता .ं .. किव ने बडे़ भावना मक

प म अपने गु के ित अन य-

क है।

करता योछावर आ म-पु प धीरज क धूप दखाता ं अपने गीत क गंध चढ़ा ा का दीप जलाता ं... कहते ह, रचनाकार जो समाज से पाता है, उसी को अपनी रचना लौटा भी देता है। किव ने भी ऐसा ही कया है। वह कहते ह-

एक चुभन िमलती है मुझको म इक किवता देता ँ हर चुभने वाले काँटे से अजब-सा बदला लेता .ँ .. और

म आज़ाद हद का सुत फर अ र-अ उठाता ँ देश-दुदशा देख के अपने दुख को फर दुहराता .ँ ..

के ज़ रए


बेशक, यह कताब श द के इं धनुषी रं ग से सराबोर किवता

का

एक ऐसा सं ह है, िजसे कोई भी बार-बार पढ़ना चाहेगा। अि पथ के राही अ ण को असीम शुभकामनाएं। दुआ

के साथ...

-ि़फरदौस ख़ान व र प कार, कविय ी व लेिखका नई- द ली नवंबर 21, 2011

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म माँ

19

सर वती नवपदी वंदना

22

गु व दना

25

मातृभूिम ि यतम

29

रा -त जीवंत कर

33

एक शहीद का ेमप

36

शहीद क राख

39

िबकते ह शहीद

43

लोकतं का शोक

47

स ा-मद

50

एक तरफा ेम कथा

54

म जिलयावाला बाग .ँ ..

57

ांितदू त

60

कािलख गुलाब म

64

इंसान रह इंसान

67

अ लाह क पनाह म...

71

ल का रंग लाल

74


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देश पूछेगा

78

िध ार है, िध ार है

82

इस व

83

रंग क बात न कर

सच का सूय

86

आओ रच जहाँ ऐसा

89

राि का अंितम हर

93

भारत का स व

95

मातृशि

97

वीरांगना

103

रावण, रण और रामायण

111

मेरा व

115

मेरी आ मा

119

मेरी देवी

121

सोनपरी

125

आज मन करता है

129

इस वैलटाइन पर

131

दु लभ क पना

135 16


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अंितम शफा माँगता ँ

137

सुराही जब छलकती है

139

अमृत ज़हर बन गया

143

ऋतुराज वसंत

147

ऋतु

149

म म ँ कु सुमाकर

वसंत का आगमन

153

होली का

155

बेमौसम बा रश

157

मेरे मन म या है भगवन?

159

खामोश आहट

161

ज म-किव ँ

167

माँ मेरा संहार करो

169

मेरा मृ युप

171

अि गंधा फू ल

173

मेरा

175

ा ड उनसे जुड़ा है

17


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माँ कृ त

ँ अपनी 'माँ' का,

िजसके गभ म पोिषत होकर िजसके र से िन मत होकर इक िनज व-सी जड़-काया म चेतना का चलन आ जीवन का शुभ-सृजन आ वह माँ, िजसके तन म 'नौ माह' के क -घन म सव-पीड़ा म भी िजसके मन म सुख का फु रण आ जीवन का शुभ-सृजन आ कृ त ँ अपनी माँ का, िजसक गोद म खेल-खेल सं कार का संचरण आ जीवन का शुभ-सृजन आ मेरी माँ तो 'गंगा' ह, िजनक चरण-धूिल म ान कर हर संिचत-पाप का शमन आ जीवन का शुभ-सृजन आ मेरी माँ 'गायि ' ह, िजनके श द का जाप कर अिभशाप का दमन आ, जीवन का शुभ-सृजन आ

19


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मेरी माँ 'भगव ीता', िजनके ि

ान से

व का ऊ व-गमन आ,

जीवन का शुभ-सृजन आ मेरी माँ 'भगवती काली', िजनसे मेरी कमगित और कालगित का िनयमन आ, जीवन का शुभ-सृजन आ मेरी माँ 'दुगा' ह िजनके दुगमसा य उपाय से, हर दुगित का दलन आ, जीवन का शुभ-सृजन आ मेरी माँ तो 'गाय' ह, िजनके दु ध का पान कर द ता का भरण आ, जीवन का शुभ-सृजन आ वो 'सुशीला' परम-गु ह िजनक दी ा से परम-स य का मनन आ, जीवन का शुभ-सृजन आ माँ सा ात 'पृ वी' ह, जो हर रचना से भारी ह, पूत-कपूत भले हो पर, 20


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माँ क ममता उपकारी है माँ क तो हर भाव-भंिगमा म वा स य अवतरण आ, जीवन का शुभ-सृजन आ जीवन का शुभ-सृजन आ.

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सर वती नवपदी वंदना1 हे शारदे! स बुि बल दो रा भि बल दो | शील दो वहार म और स यिन ा अचल दो || दो सह ईसा से पहले

2

छोड़ गयी य भारत को? "नदीतमा" बन वापस आओ िन य शु शुभ

ान दो ||

नीलतारा! ी हम दो शि शंभु के समान दो | ान दो, िव ान दो चा र य का उ थान दो || प दो मातंिगनी और पाप को अवसान दो | हे फ टका! भारत को पुन: गु ता का अनुपम दान दो || अब द ता दो देश को भारत को नूतन ाण दो | व- दय म थान दो माँ! यही अिभमान दो ||

1

इस किवता म सर वती के नौ व प क व दना है: शारदा, नदीतमा (सर वती नदी), नील तारा,

मातंिगनी, फ टका, वीणावा दनी, हंसवािहनी, मंजुलहािसनी और 2

सर वती नदी, िजनके बारे म कहा जाता है क लगभग दो सह 22

ाणी | ईसा-पूव वे लु हो गई थी|


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हे वीणावा दनी! सरगम क लय से मन को िव ाम दो | हे हंसवािहनी! परमहंस बन जाएँ हम, यमाण दो || ान ंथ के जलिध को खर-अभे -उफान दो | लु ई िव ा को अनुभूत अनुसंधान दो || मंजुलहािसनी! हष दो मन को उमंिगत गान दो | हे ाणी! इि य को वश कर सकूँ यही वरदान दो || पुन: िव गु ग रमा पाए रा , उ सोपान दो | पुन: ‘ वण-िचिड़या’ कहलाए रा , गव का भान दो || अंत काल म मातृभूिम िहत म ं यही स मान दो | िसफ यही स मान दो माँ! बस इतना स मान दो ||



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गु व दना मन कलुिषत, कातर, लांत आ भय, भीतरघात से ांत आ दुःख दावानल दुदात आ ेरणा का ाणांत आ म याग चुका यह जड़-जीवन अब गु ! शरण रख लो मेरे दल के देवालय म हे गु ! चरण रख दो म साधक नह , महाबाधक मुझम अनिगनत महापातक पर अहेत-ु कृ पा का ँ याचक हे स गु ! हे संकटमोचक! मेरे ल के कण-कण का, आओ सव ण कर लो मेरे दल के देवालय म हे गु ! चरण रख दो म आ म-ल य को भूल चुका िहय आ मिव मृित-शूल चुभा उ छृ ंखल ँ, नह म वत दो मुझे कोई ‘चेतना-मं ’ य भूल गए अपना ही अंश? अब इसे मरण कर लो मेरे दल के देवालय म हे गु ! चरण रख दो ँ षड रपु और षडऋतु

का भोग-

त…

म रोग-

त…

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ये कम-फल के अ -श आ मा सकु शल, दि डत है व मत करो भले इनसे िवमु , अ ान हरण कर लो मेरे दल के देवालय म हे गु ! चरण रख दो करता योछावर आ म-पु प धीरज क धूप दखाता ँ अपने गीत क गंध चढ़ा ा का दीप जलाता ँ अब अ य अ ु का लेकर मन-मा य वरण कर लो इस शरणागत क सेवा का नैवे हण कर लो मेरे दल के देवालय म हे गु ! चरण रख दो

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मातृभूिम ि यतम हे सकल चराचर संचालक, हे शैलसुते, हे सुखदायक हे िचर- ण य, हे पु य-परक हे 'सुरा य- वरा य' क सं थापक हे आ म दीप क उ ीपक स पूण िव क संर क तव नमन, हे ान-सुधा उ म व दे! हे मातृभूिम ि यतम... हे षड-ऋतु धा रणी, ऋतंभरा हे ह रत, सु-औषध तृ धरा हे अ पूण, मधु-दु ध दा हे कृ िष-तीथ, वन-वसुंधरा शुिच 3 - सचन कर वृहद् स रता है जग-पोिषणी तेरी ममता तव नमन हे धा य व धन संगम व दे! हे मातृभूिम ि यतम... तव मुकुट बने उ ुंग िशखर उ त पठार मृ मय 4 -सु दर दे पा

3

पिव ता

4

िम ी से बना आ

5

पैर धोने हेतु जल

6

सागर

7

दय

5

उदिध 6, िहय 7 फू ल-फली

29


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दे गंग-जमुन क सम थली हे वण े , हे खिनज-खान झर-िनझर करते यशोगान तव नमन हे सुरसुंदरी अनुपम व दे! हे मातृभूिम ि यतम... हे पूण-पुरातन, स य-सनातन िव -शि , शतको ट-मुखी "वसुधैव कु टुंब" दया चतन हे िव -नाियका, िव -सखी "एका म-भाव" दशन-दा ी " य े न भुंजीथा" 8 "सव सुिखनः" क "अयमा मा

त-धा ी येय-पिथक

" वा य वै दक

तव नमन 'आ द-सं कृ ित थम' व दे! हे मातृभूिम ि यतम... "ईशावा यिमदं सव" सुिध "योग थः कु कमिण" िविध दी च र -िश ा जग को हे माँ तूने दी धमरा य िनिध "सव भूतेषु आ म"

या

फर "इदं न मम" का सार दया और "चरै वेित" 9 आधार दया हे माँ, जग पर उपकार कया

8 9

याग के साथ भोग एक वेदवचन, िजसका अथ है चलते रहना, सदा गितशील रहना| 30


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तव नमन हे वैि क गु परम व दे! हे मातृभूिम ि यतम... हे तपोभूिम, तव रज च दन इसके ितलक से हो दुःख-भंजन और मानव-धम का ही वंदन करता तेरा हर सुत-स न हे िशिव, दधीिच ऋिष जायी हे ि यंवदा, वर शुभ-दायी तव पर-उपकारी पर परा से रत जग म स ाव भरा देती संसार को दृढ संयम व दे! हे मातृभूिम, ि यतम...

गिणत हे, शू य-अन त सृजा योितष, खगोल तुझसे उपजा संसार को दे आरो य-दान वह आयुवद तेरी ही शान भौितक , धाि वक , रस-िव ान से भरे ह तेरे ुित-पुरान और सबसे पहला ोमयान तूने दया था माता-महान हो पुनः आर भ वही उप म व दे! हे मातृभूिम, ि यतम...

माँ, खेल-खेल तेरी ही गोद जागा ताप, जागा मोद तेरे स��� कार से आ मबोध है सुलभ अलौ कक शि -शोध 31


vfXuxa/kk ds Qwy

ा ड शु कर तेरे य तेरी दी ा से िव ह तेरे दूधमुह ँ े िशशु हम कर तेरा वणन, नह स म रह जाए ु ट तो मा करना और सदा यार ही माँ! करना, तव नमन हे ेम क िस ा म व दे! हे मातृभूिम, ि यतम...

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अ ण सह ‘ ांित’ क अब (2011) तक कािशत कृ ितयाँ 1. SAMKRANTI The title stands for ‘Samyak Kranti’ or ‘The Revolution in the right direction’. It is a vision of the young minds that are living to dedicate themselves to Bharat – ‘The Divine Power’. This book contains the visionary thoughts for awakening the Bharatians for Bharat. SAMKRANTI wishes our motherland to be great, noble, pure, prosper and worthy of her big mission in the world and to Protect the Humanism in this planet. The vision shown by this book is set up to awaken Bharatian psyche which is transformed to blindly imitate the west and which condemns its own Bharatian culture and to inculcate in youth a pride for the nation. This self pride is enough to galvanize the youth into serving the nation.

Rs. 250/-

2. आहत माँ... आं दोिलत मन यह पु तक ांितकारी ट पिणय व लेख का सं ह है| Rs. 200/-

पु तक य करने हेतु संपक कर: samkranti@gmail.com

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Agnigandha Ke Phool