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32

+ÆEò-32, ´É¹ÉÇ-3

¨ÉÉSÉÇ 2014

¨ÉÚ±ªÉ 20.00

näù´ÉºªÉ {ɶªÉ EòÉ´ªÉÆ xÉ ¨É¨ÉÉ®ú xÉ VÉÒªÉÇÊiÉ** <Ƕ´É®ú Eäò EòÉ´ªÉ EòÉä näùJÉÉä VÉÉä xÉ iÉÉä Eò¦ÉÒ xɹ]õ ½þÉäiÉÉ ½èþ +Éè®ú xÉ Eò¦ÉÒ {ÉÖ®úÉxÉÉ {Éc÷iÉÉ ½èþ* (+lÉ´ÉÇ´Éänù)


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भारतीय िचन्तन की मािसक वाध्याय-पितर्का

अंक-32

माचर् 2014

सादकीय: िशा म म, छलावा और अपराध

2

धम की साधना

ामी िववेकान

भारतीय संृित की देन

हजारी साद िवेदी

11

ा गु आवयक हैय़

जे. कृ मूित

16

कबीर की ि

अली सरदार जाफरी

19

ु धान (सााार) मानिवकी के े म उ िशा और अनसं

ो. हरीश िवेदी

23

वापदीयः भतृह िर का भाषा-दशन-32

अिनल िवालं कार

30

33

वैिदक ेरणाएँ-4

7

Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein

L. Wittgenstein

36

संृत पाठ-34

अिनल िवालं कार

41

-चचा

46

स पादक: अिनल िव ालंकार सहायक स पादकः राकेश नवीन स पादन सहयोग: महे न्दर् कुमार शमार्, सौ या शमार् रूपाकन: ं संजय कुमार

यह पितर्का िशिक्षत भारतीय बनने म आपकी सहायता कर सकती है। जे-56 साकेत, नई िद ी-110017, फोन: 011-41764317

ई-मे लः sandhaan@airtelmail.in, anilvid@bharatsandhaan.org,

पितर्का के िपछले अंक दे खने के िलए आप हमारी वेबसाईट www.bharatsandhaan.org पर लॉगइन कर सकते ह। ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆ ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉ ºÉÆvÉÉÉÉxÉ ÉÉxÉ, xÉ,, +ÆEò--32, ¨¨ÉÉSÉÇ ÉÉSÉ SÉÇÇ 20 2014

1


संपादकीय

िशक्षा म पितर्का के

म, छलावा और अपराध

ारंभ से ही हम

रूप से िशक्षा के बारे म गंभीर

त्यक्ष या अ त्यक्ष

ख. उन घटनाओं का वगीर्करण करना,

उठाते आ रहे ह। यह

ग. उन घटनाओं के वग म पर पर संबध ं समझना

िनि त है िक हम आज जीवन म जो कुछ भी ह उसम

और उनके िवषय म कोई िनयम िनकालना, और

हमारी िशक्षा का बहु त बड़ा हाथ है। जन्म के समय ब ा

घ. उन िनयम के आधार पर भावी घटनाओं के

अपना शरीर लेकर आता है पर साथ ही सीखने की

िवषय म अनु मान लगाना और उन अनु मान के सही या

अपार क्षमता भी। यह सीखने की क्षमता अनेक रूप म

गलत होने के आधार पर िनयम म संशोधन करना।

कट होती है। ब ा भाषा सीखता है, अपने आसपास के यि य के साथ िमलना-जुलना और

गैिलिलयो ने सोलहवीं-सतर्हवीं शता दी म जबसे

ितिकर्या करना

इस कार के िव ान की नींव डाली तबसे यही आधारभूत

सीखता है। िव ालय जाने पर औपचािरक पढ़ाई के

िकर्या चली आ रही है। िस ातं म पिरवतर्न हु ए।

ारा अपने पिरवेश, समाज की रचना और उसका

गैिलिलयो के बाद न्यूटन के िस ातं लंबे समय तक

इितहास, दू सरे दे श का भूगोल और उनका इितहास,

चले, िफर आइं टाइन का सापेक्षतावाद िस ातं आया

और कृित के िवषय म िविवध जानकारी ा करता है।

िजनसे उन ाकृितक घटनाओं की याख्या की जा सकी

इसके साथ ही वह अपने धमर् के बारे म िशक्षा ा करता

िजनकी याख्या न्यूटन के िस ातं से नहीं हो सकती

है। वह िबना िकसी धमर् के पैदा होता है पर बहु त ज दी

थी। जब सापेक्षतावाद भी कुछ घटनाओं की याख्या

ही उसके ऊपर एक धमर् आरोिपत कर िदया जाता है जो

करने म सफल नहीं हो सका तो नी स बोर, एिर्वन

जीवनभर के िलए उसके साथ िचपक जाता है।

िंडगर, वनर्र हाइज़ैनबगर् आिद ने

हमारी िशक्षा को मोटे तौर पर दो बड़े भाग म बाटा ँ जा सकता हैऱ जग िशक्षा। जग

िस ातं सामने रखा जो

करने म आंिशक रूप से अिधक सफल हु आ है। आज भी

की िशक्षा और जीवन की

की िशक्षा पाते हु ए हम अपने चार ओर की

कृित के बारे म जानकारी िवषय म िज ासा मनु य म

करते ह।

सापेक्षतावाद और

कृित के

ाटम ं िस ातं म बहस जारी है।

ाटम ं िस ातं का एक िकसी भी ऊजार्कण के

ारंभ से रही है, पर िपछले

चार सौ वष म वै ािनक ने

ाटम ं मैकेिनक्स का

ाकृितक घटनाओं की याख्या

मुख िबन्दु यह है िक

ेक्षण की

िकर्या म उस

ऊजार्कण म पिरवतर्न हो जाना अव यंभावी है, इसिलए

कृित को समझने और

उसके िवषय म खोज करने के बारे म एक नई दृि

उसके बारे म हम जो भी तय करते ह वह त्यक्ष दे खने

िवकिसत की है और अनेक ऐसे उपकरण का आिव कार

पर नहीं अिपतु अनु मान पर आधािरत है। साथ ही इसीसे

िकया है िजनसे उन्ह

ाकृितक जग

यह बात सामने आई िक मनु य िजन ाकृितक घटनाओं

को अिधकािधक

को दे ख रहा है और उनके बारे म खोज कर रहा है वह

बारीकी से समझने म सहायता िमली है। कृित के बारे म जानकारी

करने की एक

वयं उनका उत्पाद है और उनका अिवभाज्य अंग है।

िनि त िविध है िजसम शािमल हऱ क. िविभ

दृ य जग

घटनाओं को बारीकी से दे खना,

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

और दर् ा मनु य अिवभाज्य रूप से संबं

दर् ा से अलग दृ य जग 2

ह।

क्या है यह हम नहीं जान


िशक्षा म

म, छलावा और अपराध

के अंितम सत्य को जानने के िलए

िव ान म िकसी सीिमत क्षेतर् को समझने के िलए एक

मनु य को अपने आपको समझना पड़े गा। वह अपने मन

उपिवषय बनाकर उसका अध्ययन िकया जाता है उसी

सकते। इसिलए सृि के िव

ेषणात्मक दृि कोण के

को समझने का

ारा िजस कार संसार

कार मनु य के जीवन के भी िवभाजन िकए जा रहे ह।

यास कर रहा है, उससे वह अंितम

पहले राजनीित-िव ान ही एक िवषय था, अब उसम

सत्य तक नहीं पहु ँच सकता। यह बात एिर्वन

सामािजक िव ान (Sociology) अलग से िवषय बन

िंडगर की

पु तक My View of the World और डे िवड बॉम के

गया है। मन के बारे म चचार् पहले दशर्न के अंतगर्त होती

जे. कृ णमूिर्त के साथ संवाद की पु तक The Ending

थी, अब मनोिव ान न केवल

of Time म बहु त प रुप से उभरकर आती है। हमारे पाठक कुछ

िस

वतंतर् िवषय है उसके

अंदर भी उपिवभाग बनते जा रहे ह। आज िव ालय की अव था से ही िव ाथीर् के

वै ािनक के दाशर्िनक िवचार से

पिरिचत होते रहे ह।

अंदर मनु य के संबध ं म िवभािजत दृि

उत्प

की जा

िपछले दो सौ वष से मनु य और उसके समाज

रही है जो मनु य को समझने म न केवल कोई सहायता

को समझने के िलए भी वै ािनक िविध का सहारा िलया

नहीं करती अिपतु िनि त रूप से बाधक भी बनती है।

जाने लगा है। इस

योग कालर्

हम भूल जाते ह िक मनु य से संबिं धत जो कुछ भी

माक्सर् के सा यवाद का था। लगभग 8 दशक तक

िव ाथीर् को बताया जा रहा है उसका सीधा संबध ं वयं

सा यवाद का िस ातं दु िनया पर छाया रहा। उस

उसके जीवन से है। िव ान म िव ाथीर् जो कुछ पढ़ता है

कार का सबसे बड़ा

िस ातं को माननेवाले लोग को लगा िक मनु य-समाज

उससे उसे अपने चार ओर के संसार को समझने म

को समझने और उसे सुधारने का अंितम सूतर् उनके हाथ

सहायता िमलती है, पर मानिवकी से संबिं धत िवषय म

लग गया है िजसे चािरत करना और उसके आधार पर

ऐसा कोई उ े य सामने नहीं रखा जाता। िव ाथीर्

समाज म पिरवतर्न लाना उनका पिवतर् कतर् य है। इस

राजनीित-िव ान, समाजशा , मनोिव ान आिद को

उ े य की

ऐसे पढ़ते ह मानो पा

ाि

के िलए जो कुछ भी करना पड़े वह

िवषय का उनके अपने जीवन

से कोई संबध ं नहीं है। मानिवकी म वे अपने और अपने

वीकायर् और क्ष य मान िलया गया। फल वरूप रूस, चीन और अन्य दे श म सा यवाद की थापना के िलए

चार ओर के लोग के जीवन के बारे म पढ़ रहे ह,

करोड़ लोग की हत्या हु ई।

इसपर उनका ध्यान नहीं जाता। और हज़ार , लाख

िजस समय सा यवाद का जोश अपनी चरम सीमा

िव ािर्थय को पढ़ाने और उनकी एक साथ परीक्षा

पर था उसी समय जे. कृ णमूिर्त कह रहे थे िक मनु य

लेनेवाले तंतर् का ध्यान तो इधर जा ही कैसे सकता हैय़

को िकसी भी िवचारतंतर् के आधार पर नहीं समझा जा

इस

सकता। उनके श द थेऱ All ideologies are idiotic.

कार हम जीवन के बारे म वैसे ही िशक्षा दे

रहे ह जैसे बा

जग

के बारे म। और क्य िक िव

ेषण

कृ णमूिर्त के अनु सार आव यकता मनु य की मूल कृित

पर आधािरत वै ािनक िविध से हमने जग

को समझने और उसम पिरवतर्न लाने की है, और यह

म बड़ी सीमा तक सफलता हािसल कर ली है, इसिलए

यास

त्येक मनु य को अपने िलए

समाज म पिरवतर्न लाने के िलए यि

वयं करना है।

हम समझते ह िक हम जीवन को भी उसी

के रूप म मनु य

कार से

समझ लगे और उसम वा ंिछत पिरवतर्न ला सकगे। यह एक बहु त बड़ी

म पिरवतर्न लाना होगा। जब तक मनु य नहीं बदलेगा,

ािन्त है, और यिद हम इतनी

समाज म कोई साथर्क पिरवतर्न नहीं हो सकता। ऊपर

मोटी-सी बात नहीं समझते िक जग

से थोपे हु ए पिरवतर्न कभी कारगर नहीं ह गे। यह हम

सवर्था िभ

अपनी आँख के सामने दे ख रहे ह। रूस और चीन म

बड़ी कमी रह गई है।

और जीवन दो

क्षेतर् ह तो हमारी िशक्षा म िन य ही कोई

पहले तो हम यही समझना है िक दोन क्षेतर् की

पूँजीवाद िफर आ रहा है, और अपने दे श म भी सा यवािदय के िचन्तन म पिरवतर्न

को समझने

भाषाएँ अलग-अलग ह। जग

ारंभ हो गया है।

के िव ान की भाषा

गिणत है। गिणत के आधार पर िजस भी चीज़ का

... इस संपादकीय का केन्दर्िबन्दु िशक्षा है। िपछले

अध्ययन िकया जाता है उसकी एक िनि त पहचान और

लंबे समय से मनु य के सामािजक जीवन को वै ािनक

पिरभाषा होती है। उस पिरभाषा के आधार पर दो लोग

रूप से समझने का यास िकया जा रहा है। िजस कार

जान सकते ह िक वे िकस चीज़ के बारे म बात कर रहे

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

3


िशक्षा म

ह। सोिडयम

ोराइड और पोटािशयम

म, छलावा और अपराध

ोराइड म अंतर

मनु य के आंतिरक जीवन की रचना पेचीदी है

िकया जा सकता है और उनपर िनि त अनु सध ं ान संभव

और हर मनु य को उसे अपने आप अपने िलए समझना

है। दू सरी ओर आंतिरक जीवन म मन, हृ दय और आत्मा

है। आंतिरक जीवन म पिरवतर्न आव यक है पर यह

के बारे म बात करते हु ए कहना मुि कल है िक हम िकस

पिरवतर्न िकसी दू सरे के

ारा या दू सरे के मागर्दशर्न म

चीज़ के बारे म बात कर रहे ह। अभी िद ी िव िव ालय

नहीं लाया जा सकता है। िवशेषकर ऐसे लोग का

ने

मागर्दशर्न िजनकी रुिच कभी आंतिरक जीवन को जानने

ातक तर पर सभी िव ािर्थय के िलए Integrating

Mind, Body and Heart नाम से एक कोसर् चालू

म नहीं रही है, बहु त

िकया है। कोसर् अिनवायर् है पर उसम परीक्षा नहीं होगी।

पहले उपिनषद ने अंधेनैव नीयमाना यथाधाः ं (अंधे के

संपादक ने इस िवषय म कई उनम से िकसी को भी

ामक हो सकता है। हज़ार वषर्

ाध्यापक से बात की,

ारा मागर् िदखाए जा रहे अंध ) का उदाहरण दे कर

नहीं है िक कोसर् म क्या

सावधान िकया था। कबीर ने भी कहा थाऱ अंधा अंधिह

पढ़ाना-िसखाना है। िद.िव. की वैबसाइट से भी इस बारे

ठे िलया दोन कूप पड़ं त।

म कोई सहायता नहीं िमलती। क्य िक इस िवषय म

पर आजकल ऐसा ही हो रहा है। मागर् खोजते हु ए

परीक्षा नहीं होगी, इसिलए कोई भी इसे गंभीरता से नहीं

अंध का अनु पात भले ही उतना ही हो पर मागर्दशर्न

ले रहा।

करनेवाले अंध की संख्या बढ़ती जा रही है।

मन म, भावनाओं म और कमर् म समन्वय होना

पितर्का म िपछले चार महीने से हम मानिवकी के

चािहए, इसे सभी मानते ह, पर मन िकसे कहते ह यह

क्षेतर् म उ

िकसीको प

आ रहे ह। इस िवषय म आपने िद ी िव िव ालय के

नहीं है। और यह समन्वय कैसे लाया जा

िशक्षा और अनु सध ं ान के िवषय म चचार् करते

सकता है इस पर कोई िवचार भी कहीं नहीं हो रहा। पर

िहन्दी िवभाग के विर

क्य िक कुछ करना चािहए इसिलए कुछ िकया जा रहा

नेहरू िव िव ालय के पूवर्

है। और यह हमारे दे श म सबसे ऊंचे

दशर्न के िव ान

तर के माने

ोफ़ेसर अपूवार्नंद, जवाहरलाल ो-वाइस चासलर ं और

ो. किपल कपूर, और उसी

िव िव ालय म अंतरार् ीय राजनीित के पूवर्

जानेवाले िव िव ालय म हो रहा है।

ोफ़ेसर

यह आंतिरक जीवन की सामान्य सम या है

पु पेश पंत के िवचार पढ़े ह। पितर्का के इसी अंक म आप

िजसम धमर् भी शािमल है। आिदकाल से मनु य मानता

िद ी िव िव ालय के ही अंगर्ेज़ी िवभाग के पूवर् अध्यक्ष

आया है िक जो कुछ उसे िदखाई दे रहा है उसके ऊपर

ो. हरीश ितर्वेदी से एक साक्षात्कार की िरपोटर् पढ़गे।

कोई बड़ी शि उत्प

है। कभी उस शि

के

इन चार ख्याित ा

ित उसम भय

िशक्षा के बारे म गंभीर

हु आ है, कभी िव मय, कभी खीझ, कभी िज ासा

िव ान ने मानिवकी म उ उठाए ह और उस क्षेतर् म

िरसचर् के बारे म शंका कट की है। क्य िक यह आवाज़

तो कभी आदर और याचना का भाव। धमर् ने मनु य जाित की सहायता की है, और उसने बहु त संहार भी िकया है

उ तम तर पर उठाई जा रही है इसिलए इसकी उपेक्षा

और अब भी कर रहा है। यह इसिलए िक मनु य के

नहीं की जा सकती। शीघर् ही हम एक भूिमका के साथ

आंतिरक जीवन के क्षेतर् म श द के अथर् िनि त नहीं ह,

इन िव ान के िवचार का समन्वय यूजीसी के चेयरमैन

इस कारण सभी मनु य अपने-अपने पूवर���गर्ह और सीिमत

के स मुख

समझ के आधार पर उन्ह अपना-अपना अथर् दे ने के िलए

उ े य, िविध, उसम परीक्षा और उस क्षेतर् म अनु सध ं ान

वतंतर् ह। वैिदक काल से आयर् श द सुसं कृत,

के िवषय म बुिनयादी िचन्तन िकया जा सके। े

हमारा कहना है िक

मनु य के िलए योग होता आया है। कृण्वंतो िव मायर् (सारे िव

योग साठ लाख यहू िदय को

अंतर को ध्यान म रखकर िव ालय

मार डालने के िलए िकया क्य िक उसे अपने दे श को शु

ाकृितक जग

के अध्ययन

और जीवन के अध्ययन म मूलभूत अंतर है और उस

को आयर् बनाएँ) वेद का संदेश था। िहटलर

ने उसी आयर् श द का

तुत करगे तािक मानिवकी के िशक्षण के

िवषय की िशक्षा िभ

आय का दे श बनाना था। हमारे पड़ोसी दे श

तर से ही इन

कार से दी जानी चािहए।

संपादकीय का शीषर्क िशक्षा म

म, छलावा और

पािक तान म इ लाम के नाम पर रोज़ ही मुसलमान को

अपराध है। यह शीषर्क आकर्ामक लग सकता है, पर हम

ही मारा जा रहा है। कौन तय करे गा िक इ लाम का अथर्

जानबूझकर इस कार से बात करने का यास कर रहे

क्या हैय़

ह तािक इस गंभीर सम या पर ध्यान जाए।

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

4


िशक्षा म

म, छलावा और अपराध

मनु य को

नहीं है।

म वहा ँ होता है जहा ँ वह स ाई के

आज हमारी उ

साथ मागर् खोज रहा है पर िकसी गलत मागर् को सही मान बैठता है । धमर् म

िशक्षा म बड़े पैमाने पर

म फैला

म का होना आम बात है । जो

हु आ है िक िव ान का तरीका अपनाकर हम अपनी

लोग सचमुच मानते ह िक उनकी धमर्पु तक म सम त

सामािजक और मनोवै ािनक सम याओं को समझकर

ई रीय

ान िनिहत है वे अव य ही

सुलझा सकते ह। यह

म म ह। उनकी

म इतना यापक है िक लगता ही

िशक्षा के दौरान इतनी मोटी-सी बात उन्ह नहीं बताई

नहीं है िक जो कुछ इन क्षेतर् म िशक्षा के नाम पर हो

गई िक िकसी भी पु तक के श द के अथर् उसम नहीं

रहा है उससे िभ

िदए होते । िहन्दू लोग वेद को ई र द

सकता है।

मानते ह। पर

भाषा की

ई र की भाषा के श द का अथर् भी मनु य को अपनी

और अिधक साथर्क दृि कोण हो कृित, उसकी संभावनाओं और सीमा

समझ के अनु सार करना होता है । यही बात बाइबल

पर ध्यान दे ना होगा। पि म म इस िवषय म िब कुल

और कुरान के श द के बारे म है । यह हमारा

िवचार नहीं हु आ है। इस दृि

म है िक

हम ई र के िदए हु ए श द का वही अथर् समझते ह जो

से पि म म सही अथ म

बौि क परंपरा नहीं रही है। हर चीज़ पर अनु सध ं ान नहीं

ई र के िलए था। यिद ई र हमारे सामने आ जाए तो

हो सकता। जीवन के आंतिरक क्षेतर् म अपने अंदर जाने

वह भी उन श द के अथर् हम नहीं बता सकेगा जो

की ज़रूरत है निक उसे बाहर से दे खकर समझने का

उसके

ारा िदए गए कहे जाते ह। वह क्या करे गाय़

यास करने की। जीवन को बाहर से दे खकर नहीं

िकन्हीं श द को समझाने के िलए वह कुछ और श द

समझा जा सकता। अमे िरका म, िजसे हमने मनोिव ान

बोलेगा। िफर उन नए श द के अथर् की सम या आ

और अन्य क्षेतर् म अपना आदशर् बना िलया है, मानिसक

जाएगी। यिद श द और उनके अथर् के संबंध म हमारी

रोग उतने ही बढ़ रहे ह िजतने उनके िवषय म अधकचरी

िशक्षा के दौरान हम यह बताया गया होता िक श द

िशक्षा पाए लोग अनु सध ं ान कर रहे ह।

सबके िलए समान होते ह पर, गिणत को छोड़कर, अथर् सवर्था वैयि क ह, तो

म से ही छलावे का जन्म होता है।

म की यह ि थित पैदा नहीं

हु आ यि

होती।

म म पड़ा

सोचता है िक वह जो मान रहा है वह सच

है। पर जब यह जानते हु ए भी िक जो वह मानता है सच इसी

म के कारण मानिवकी म िशक्षा और

अनु सध ं ान की वतर्मान ि थित पैदा हु ई है।

नहीं है, वह अपनी मान्यताओं को दू सर पर आरोिपत

ो. ए.एन.

करने का

यास करता है तो वह छल करने लगता है।

ाइटहैड ने कहा है िक जब पि म के िव िव ालय म

धमर् म छलावा आम बात है। शायद ही कोई धािर्मक नेता

मानिवकी और सामािजक िव ान के िवषय का िशक्षण

होगा जो स ाई से वह सब मानता हो जो उसके धमर् म

ारंभ हु आ तो उनके सामने केवल िव ान का ही माडल

कहा गया है, पर वह और को अपनी धािर्मक मान्यताओं

था। पिरणामतः उसी तरह के कोसर्, िशक्षण और परीक्षा,

का उपदे श दे ता जाता है। यिद िकसी संगिठत धमर् म

और बाद म अनु सध ं ान की यव था चल िनकली। भारत

उसका धमर् उसका यवसाय बन गया है तब तो उस

छल के वातावरण म जीवन िबताने के अलावा और कोई

िव िव ालय

िचन्तनशैली का भी

की

थापना

के

साथ

पा ात्य

भाव बढ़ा। हम लोग पि म की

चारा भी नहीं है उसके पास।

आँख से िशक्षा, समाज और संसार को दे खने लगे।

अपराध तब होता है जब गलत मान्यताओं के

इसिलए जो पि म म हो रहा है हम उसकी भ डी नकल

आधार पर ऐसे काम िकए जाएँ िजनसे दू सर को हािन

कर रहे ह।

होती है। िशक्षा म अपराध का सबसे

मुख उदाहरण

मनु य के बारे म िजतना गहन िचन्तन भारत म

अध्यापक- िशक्षण का कायर्कर्म है। सब जानते ह िक

हु आ है पि म म उसका शताश ं भी नहीं है। पर यह

आज सं थाएँ पैसा दे कर अध्यापक- िशक्षण कायर्कर्म

िचन्तन तब संभव हु आ जब मनु य को अपने अंदर जाने

चलाने के िलए मान्यता ले सकती ह। उन सं थाओं म

के िलए अवकाश था। वह शातं भाव से अपने और अन्य

पैसा दे कर

वेश पाया जा सकता है। िबना िकसी कक्षा

मनु य के बारे म सोच सकता था। उसके ऊपर यह

म गए या िशक्षण-अ यास म भाग िलए िडगर्ी ली जा

बंधन नहीं था िक वह शोध की िडगर्ी के िलए िकसी ऐसी

सकती है।

सम या पर शोध करे िजस सम या को उसने समझा भी

पर उनम चािरितर्क िगरावट अव य आ जाती है।

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

5

िशक्षु भावी अध्यापक कुछ भी नहीं सीखते,


िशक्षा म

पीएच.डी. के शोध बंध पैसा दे कर िलखवाए जा

म, छलावा और अपराध

करने के बाद उनका बेटा कमा िकतना रहा है। िशक्षा म

सकते ह। क्य िक सबको पता है िक उन शोध बंध को

िव ा का नहीं, पैसे का वचर् व है। सर वती आज ल मी

कोई पढ़े गा नहीं, इसिलए कुछ भी िलख िदया जाए,

की सवारी बन गई है। िशकायत आती रही ह िक राज्य के मुख्यमंतर्ी,

चल जाएगा। िसफ़र् शोध के मागर्दशर्क और परीक्षक को खुश रखना है। इस

मंतर्ी, िशक्षा-क्षेतर् के उ

कार शोधाथीर् शोध के िवषय म

पदािधकारी

ाचार म िल ह।

अपना दृि कोण नहीं रखता। वा तव म उससे अपना

उनम से कइय को सज़ा हो चुकी है। नकल करके

दृि कोण िवकिसत करने की आशा भी नहीं की जाती।

परीक्षा पास करना और पैसे लेकर नकल करवाना आम

यिद वह अपने मागर्दशर्क के िवचार के िवरु

बात हो गई है।

कुछ

ाथिमक

कहता या िलखता है तो उसके िडगर्ी पाने की संभावना

तर से िव िव ालय

तर तक की

ही समा हो जाती है। मानिवकी और सामािजक िव ान

िशक्षा म वही सं था सफल मानी जाती है जो अिधक से

म शोध के कायर्कर्म के

अिधक िव ािर्थय को अिधक से अिधक पैसा कमाने म

ारा युवाओं के िदमाग को

समथर् बना सके। इसिलए िशक्षा-सं थाओं म िदखावा

िवकिसत करने के बजाय िवकृत िकया जा रहा है।

बढ़ता जा रहा है, गहराई कम होती जा रही है।

इस कार के शोध बंध पर करदाता का करोड़

पहले कहा जाता थाऱ िव ा ददाित िवनय

रुपया खचर् हो रहा है। यह अपराध नहीं तो क्या हैय़

इतना पैसा और समय का यय करके कुछ तो िनकलना

िव ा से िवनय आती है। आचायर् के बारे म कथन थाऱ

चािहए। कम से कम शोधािर्थय के

आचारं गर्ाहयते इित आचायर्ःऱ आचायर् वह है जो िव ाथीर्

ान म और उनकी ारा

का चिरतर् बनाता है। आज चिरतर् की बात करना मूखर्ता

पूरे समाज म िचन्तन का तर कुछ उठे । पर ऐसा कुछ

माना जाता है। िशक्षा का मतलब िडगर्ी से है, चिरतर् से

नहीं हो रहा।

उसका क्या लेना-दे ना हो सकता हैय़ और िडगर्ी भी वह

िचन्तन-क्षमता म ही वृि

हो और इस

िकर्या के

िशक्षा आज सामािजक आव यकताओं से कट गई

जो बड़े से बड़ा ‘पैकेज’ पाने म मदद करे । एक रा के तौर पर हम िशक्षा का महत्त्व समझना

है और पूरी तरह यवसाय बन गई है। आजीिवका के िलए काम कर रहे अिधकतर अध्यापक के िलए कोई

होगा। बाह

चारा भी नहीं है, भले ही वे िव ालय तर पर काम कर

िवषय म हम िशक्षा के उ े य, पा

रहे ह या िव िव ालय तर पर। वे वह पढ़ाने के िलए

और परीक्षा-िविध को सवर्था अलग दृि

और आंतिरक जीवन से संबिं धत व तु, िशक्षण-िविध से दे ���ना होगा।

िव ाथीर् अपने और अपने चार ओर के जीवन को

बाध्य ह जो उन्ह पढ़ाने के िलए कहा जाता है और उस कार से पढ़ाने के िलए बाध्य ह िजस

जग

अपनी दृि

कार से उनके

से दे ख इस पर बल िदया जाना आव यक

छातर् की परीक्षा ली जाएगी। यिद परीक्षा म कुंिजय से

है। वे दू सर के श द याद कर परीक्षा पास कर सकते ह

काम चल जाता है तो िव ािर्थय को कुंिजय की शैली

पर दू सर की दृि

से ही पढ़ाया जाएगा, अथार्

कृ णमूिर्त बार-बार इस बात पर बल दे ते रहे ह िक

उन्ह िवषय को समझने के

िलए ेिरत नहीं िकया जाएगा अिपतु उन

त्येक यि

के उ र

से अपने आपको समझ नहीं सकते।

को अपने आपको

वयं समझना है और

रट लेने के िलए कहा जाएगा िजनके परीक्षा म पूछे जाने

अपने जीवन के िलए वयं उ रदायी होना है। उपिनषद

की संभावना है।

और बु

िशक्षा के क्षेतर् म

का भी यही संदेश था। पर आज िव ाथीर् को

ारंभ से ही मानिसक रूप से गुलाम बना िदया जाता है।

ारंभ से अंत तक जहा ँ जो कुछ ारा पैसे के िलए िकया जा

अपराध क्या है इसके बारे म सावर्जिनक चचार्

रहा है। बहु त वषर् पहले की बात है, पढ़ा था िक एक

होनी चािहए। केवल शारीिरक और आिर्थक अपराध ही

हो रहा है वह मानो पैसे के

अच्छा पि क कूल खोलने के िलए तीस करोड़ रुपये

अपराध नहीं ह। िकसी को मानिसक रूप से गुलाम बनाना

का िनवेश करना पड़ता है। कोई भी जब इतना पैसा

भी अपराध है। जब हमने अपने िलए जनतंतर्ीय जीवन-

लगाएगा तो उससे कहीं अिधक कमाने का

णाली चुनी है तो हमारी िशक्षा भी इस कार की हो िक

यास भी

अव य करे गा। उस िव ालय के िव ािर्थय के माता-

उसम जन-जन की आवाज़ और भागीदारी हो।

िपता अव य ही उनकी िशक्षा पर जो खचर् करगे वह

िशक्षा के उ े य और उसकी यव था के िवषय म यापक चचार् की आव यकता है।

उनके िलए भी िनवेश होगा। वे दे खगे िक उतना खचर् ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

6


धमर् की साधना वामी िववेकानंद (अलामे डा, कैिलफ़ोिर्नया, म 18 अ ैल, 1900 ई. को िदए गए भाषण के अंश)

जीवन का उ े य क्या हैय़ क्या यह संसार ही

मुि

जीवन का ध्येय हैय़ इससे अिधक कुछ नहींय़ क्या हम

के िलए,

अपने को मु

ान

करने के िलए आए ह। हम

करने के िलए

ान ा करना चाहते ह।

केवल यही होना है जो हम ह, अिधक कुछ नहींय़ क्या

हमारा जीवन है मुि

मनु य को एक ऐसी मशीन बनना है, जो कहीं अटके

बीज से उगता है, धरती को चीरता है और अपने को

िबना सफ़ाई से चलती रहे य़ आज जो सारे सुख-दु ःख

आकाश म उठाता हैय़ तु हारा जीवन क्या हैय़ मुि

उसे िमलते ह, उतना ही उसे िमलना है, और क्या वह

िलए वही संघषर्।

उससे अिधक और कुछ नहीं चाहताय़

का

क्या इिन्दर्य सुखभोग ही जीवन का ध्येय हैय़ यिद

अिभ य

के िलए। क्या कारण है िक पौधा के

कृित चार ओर से हम दिमत करने

कर रही है और हमारी आत्मा अपने आपको करना चाहती है।

कृित के साथ संघषर् चल

ऐसा है, तो मनु य शरीर ा करने का क्या लाभय़ क्या

रहा है। मुि

कोई मनु य भोजन करने म उतना मज़ा ले सकता है

कुचल जाएँगी और टूट जाएँगी। यही तु हारा वा तिवक

िजतना कु ा या िब ीय़ िचिड़याघर म जाओ और वहा ँ

दु ःख है। यु क्षेतर् म बहु त-सी धूल और गदर् उठे गी।

मासाहारी ं पशुओं को एकागर् भाव से अपना भोजन करते

के िलए इस संघषर् म बहु त-सी व तुएँ

कृित कहती हैऱ म िवजयी होऊँगी। आत्मा कहती है,

दे खो। पीछे लौटो और पशु बन जाओ। िफर मनु य बनने

िवजयी मुझे होना है।

म फायदा क्या हैय़

चुप रखने के िलए थोड़ा सुखभोग दूँगी। आत्मा को थोड़ा

कृित कहती हैऱ ठहरो, म तु ह

मज़ा आता है, क्षण भर के िलए वह धोखे म पड़ जाती

इसिलए, यावहािरक धमर् के साधारण िस ातं पर ध्यान दो, वह हम कहा ँ ले जाता है। इस जीवन का

है, पर दू सरे ही क्षण वह िफर मुि

उ े य क्या हैय़ क्या इिन्दर्य का भोग ही जीवन का

उठती है।

अंितम ल य हो सकता हैय़ क्या कभी सुखभोग ही

क्या तुमने युग से

के िलए चीत्कार कर

त्येक हृ दय म उठते इस

इसका ल य हो सकता हैय़ यिद मनु य का भाग्य यही

अिवराम चीत्कार की ओर ध्यान िदया हैय़ हम दिरदर्ता

है िक वह सुख भोगते रहनेवाली एक पूणर् मशीन बने तो

से धोखा खाते ह। हम धनवान बनते ह और धन से धोखा

हमारा धमर् बस यह होगा िक हम वृक्ष, और पशु बनने के

खाते ह। हम अ ानी ह। हम पढ़ते और जानकारी

िलए पीछे लौट। क्या तुमने कभी गाय को झूठ बोलते

करते ह, और

सुना है, अथवा वृक्ष को चोरी करते दे खा हैय़ वे पूणर्

होता। यही दु ःख का कारण है, पर यही सब सुख का

मशीन ह। वे भूल नहीं करते। वे ऐसे संसार म रहते

कारण भी बन सकता है। यह एक िव सनीय संकेत है।

ह,जहा ँ सब कुछ पूणर् है।

तुम इस संसार से िकस कार संतु

यिद इस

ा नहीं

हो सकते होय़ यिद

कल यह संसार वगर् हो जाए तो हम कहगे, हम इससे

कार का धमर् यावहािरक धमर् नहीं हो

सकताऱ और यह िन य ही नहीं हो सकताऱ तो धमर् का

संतु

आदशर् क्या हैय़ हम यहा ँ िकसिलए आए हय़ हम यहा ँ ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

ान से धोखा खाते ह। कोई संतु

नहीं ह। हम कुछ और दो। अनंत मानवात्मा अनंत के अितिर

7

और िकसी


धमर् की साधना

व तु से कभी संतु केवल अनंत

यि

नहीं हो सकती। अनंत की इच्छा

ान से संतु

कहता है िक संसार म सब अशुभ है। िंकतु अलग

खड़ा होकर दे खनेवाला यि

हो सकती हैऱ उससे कम से

इस िद य लीला को

नहीं। संसार आएँगे और चले जाएँगे। उससे क्याय़ आत्मा

तट थ भाव से दे खता रहता है। कुछ रोते ह और दू सरे

रहती है और सदा िव तार को ा होती है। संसार को

हँसते ह। अपनी बारी आने पर ये हँसगे, दू सरे रोएंगे। ाणी िजतना िन

आत्मा म, समुदर् म बूद ँ की भाित ँ िवलीन हो जाना होगा। अभी तक कोई मनु य संसार से संतु

ेणी का होता है उसका

इिन्दर्य-सुख उतना ही अिधक होता है। िन तम ािणय

नहीं हु आ है।

असंख्य पैग बर ने हमसे कहा हैऱ अपने भाग्य से संतु

की पशर् की शि

रहो। हमने भी अपने से शातं और संतु

है। जब तुम मनु य तक पहु ँचते हो तो तुम पाते हो िक

कहा है, िफर भी हम संतु

रहने के िलए

स यता िजतनी नीची होती है, इिन्दर्य की शि

नहीं ह। यह अनािद अनंत

की योजना है िक इस संसार म, ऊपर

पर िवचार करो। वहा ँ सब कुछ पशर्

वगर् म, नीचे

उतनी

अिधक होती है। मनु य िजतना ऊपर उठता है, इिन्दर्य-

पाताल म ऐसा कुछ नहीं है िजससे मे री आत्मा को

सुख का आकषर्ण उतना ही कम होता जाता है। कु ा

संतोष हो। मे री आत्मा की भूख के सामने ये तारे और

मगन होकर भोजन खा सकता है, पर तत्त्वदशर्न पर

यह संसार, ऊपर और नीचे के, सम त

िवचार करने के अ ुत आनंद को नहीं समझ सकता।

तुच्छ ह।

ाड, ं सवर्था

त्येक आत्मा एक ही व तु के िलए चीत्कार

तुम बुि

कर रही है, और वह है उसकी पूणर् मुि ।

उससे वंिचत रहता है। इिन्दर्य-सुख बड़ी व तु है। पर

तब, यावहािरक धमर् क्या हैय़ यावहािरक धमर् वह है जो हम मुि उस ल य की

ाि

सहायता

है

तो

दे ता

यह पहले से उपि थत बंधन की हज़ार तह के ऊपर एक नई तह चढ़ाने लगता है, तो यह बन

जाता

है।

संपि , िव ा, सौन्दयर्, इनके अितिर

भी और

से

होता

है। जब तुम पेिरस म पचास यंजन का बिढ़या खाना

क्या तुमने युगों से प्र येक हृदय में उठते इस अिवराम ची कार की ओर यान िदया हैय़ हम दिरद्रता से धोखा खाते हैं। हम धनवान बनते हैं और धन से धोखा खाते हैं। हम अज्ञानी हैं। हम पढ़ते और जानकारी प्राप्त करते हैं, और ज्ञान से धोखा खाते हैं। कोई संतुष्ट नहीं होता। यही दुःख का कारण है, पर यही सब सुखों का कारण भी बन सकता है। यह एक िवश्वसनीय संकेत है। तुम इस संसार से िकस प्रकार संतुष्ट हो सकते होय़ यिद कल यह संसार वगर् हो जाए तो हम कहें गे, हम इससे संतुष्ट नहीं हैं। हमें कुछ और दो।

ठीक है; यिद नहींऱ यिद

बाधा

उससे भी बड़ी व तु वह सुख है जो बुि

तक पहु ँचने म मदद करे । और यह

संसार, यिद यह हम

ारा िजस अनूठे आनंद को ा करते हो वह

खाते हो तो उसम िन य ही मज़ा आता है। पर वेधशाला म नक्षतर् को दे खना, सौर जग अध्ययन

करना,

का ज़रा

सोचो तो, यह उससे भी बड़ा चािहए,

आनंद

होना

क्य िक

जानता हू ँ िक तब तुम भोजन को िब कुल भूल जाते हो। इस आनंद को

सभी कुछऱ ���ब तक हम इस ल य की ओर बढ़ने म

उस सुख से बड़ा होना चािहए िजसे तुम सासािरक ं

सहायता दे ते ह तब तक उनका मू य है। पर जब वे हम

व तुओं से

मुि

करने म सहायता दे ना बंद

िवषय म सबकुछ भूल जाते हो; तुम इिन्दर्य- तर के

कर दे ते ह तो िनि त रूप से वे बाधा बन जाते ह। इस

िवषय म सब भूल जाते हो। यह बौि क आनंद है। यह

के इस ल य को

ा करते हो। तुम प ी, ब े, पित, सभी के

लोक और परलोक की, सब व तुओं को केवल एक

सामान्य समझ की बात है िक इसे इिन्दर्य के सुख से

ल यऱ मुि

ऊँचा होना चािहए। तुम सदा ऊँचे आनंद के िलए िन

की

ाि के िलए

योग करो।

हमारे पास ऊजार् सीिमत है। यिद तुम उसे एक थान पर यय करते हो तो दू सरे

सुख को त्याग दे ते हो। यह है यावहािरक धमर्ऱ मुि ाि ।

थान पर उसका

जहा ँ ई र है, वहा ँ दू सरा नहीं है। जहा ँ संसार है,

अभाव होगा। स पूणर् योग सदा वही रहता है। जब तरंग एक थान पर उठती है, तो दू सरे जाता है। यिद एक रा

की

वहा ँ ई र नहीं है। ये दोन कभी एक नहीं हो सकते,

थान पर गतर् पड़

धनवान बनता है तो दू सरे िनधर्न

काश और अंधकार की भाित। ँ मने ईसाई धमर् और

हो जाते ह। जो मनु य इस क्षण तरंग के िशखर पर है,

उसके उपदे ा के जीवन से यही समझा है। क्या यही

वह सोचता है िक सब भला है; और गतर् के तले म ि थत

बु

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8

मत नहीं हैय़ क्या यही िहन्दू मत नहीं हैय़ क्या यही


धमर् की साधना

इ लाम मत नहीं हैय़ क्या यह सब महान संत और

अनंत आत्मा। यही

गुरुओं की िशक्षा नहीं हैय़ यह संसार क्या है, िजसे हम

अ यावहािरक है।

यावहािरक धमर् है। शेष सब

अिधक ऊँचा क्या हैऱ उन व तुओं के पीछे दौड़ना

छोड़ना हैय़ म उसे अपने साथ िलए िफर रहा हू ँ। वयं मे रा शरीरय़ म केवल इस शरीर के कारण ही जान-

जो नाशवान ह अथवा उसको पाने का

बूझकर अपने साथी मनु य पर हाथ डालता हू ँ, केवल

िजसम कभी पिरवतर्न नहीं होताय़ क्या अिधक

इसे अच्छा रखने के िलए, तिनक सुख दे ने के िलए।

यावहािरक हैऱ उन व तुओं को ा करने म जीवन की

यास करना

केवल इस शरीर के कारण ही म दू सर को हािन

सारी शि य का यय करना िजनको

करने से

पहु ँचाता हू ँ और गलितया ँ करता हू ँ।

पहले ही मृत्यु आ जाती है, और तु ह उन सबको छोड़

महान पुरुष की मृत्यु हु ई है। दु बर्ल की मृत्यु हु ई

दे ना होता है, या िफर अपनी अमर आत्मा को पहचाननाय़

है। मृत्युऱ सब ओर मृत्यु। यह संसार अनंत अतीत का

मनु य कहता है, म जीता हू ँ। वह यह नहीं जानता िक

क़ि

तान है, िफर भी हम इस शरीर से िचपटे रहते ह।

मृत्यु के भय के कारण ही वह जीवन से दासव

िचपका

हम िनि त रूप से जानते ह िक शरीर को मरना होगा

रहता है। वह कहता है, म भोग करता हू ँ। उसे व

और िफर भी इससे िचपटे हु ए ह। पर उसम भी एक अथर्

भी यह िवचार नहीं आता िक इस भोग की लालसा म ही

है, क्य िक एक अथर् म हम नहीं मरते। गलती यह है िक

कृित ने उसे अपना दास बना रखा है।

हम शरीर से िचपटते ह, जबिक शरीर के अंदर जो

कृित हम सबको पीसती है। अंततः तु हारे

आत्मा है वह वा तव म अमर है। यावहािरक धमर् यह है िक म अपने को अपनी

ारा अपना कायर् संप

कृित ने

िकया, और जब तुम मर

जाओगे तो तु हारा शरीर दू सरे पौध को उगाने म

आत्मा के रूप म पहचानूँ।

सहायता करे गा। िफर भी हम सदा यही सोचते ह िक

आत्मा के िवषय म यह सत्य पहले सुना जाता है।

सुख वयं हम िमल रहा है। इस

यिद तुमने इसे सुन िलया है, तो इस पर िवचार करो।

कार यह चकर् चलता

रहता है। इसिलए, आत्मा की अनु भिू त आत्मा के रूप म

एक बार वह कर िलया है, तो इस पर ध्यान करो। हमारी आत्मा अपने को आत्मा के रूप म दे खे। अभी आत्मा

करना यावहािरक धमर् है। अन्य सब बात वहीं तक ठीक

अपने को शरीर के रूप म दे ख रही है। इसका अंत होना

ह जहा ँतक वे इस महान ल य की ओर ले जाती ह। इस

चािहए। िजस क्षण तुम अपने आपको आत्मा के रूप म

(अनु भिू त) की ाि की जाती है त्याग से, ध्यान सेऱ सब

अनु भव करने लगोगे, तुम मु

हो जाओगे।

इिन्दर्य-सुख

तुमको ई र का दशर्न करना चािहए, आत्मा की

के त्याग से, और उन गर्ंिथय

और

शृंखलाओं को काटकर जो हम भौितकता से बाधती ँ ह।

अनु भिू त करनी चािहए। और यही यावहािरक धमर् है

हम

कृित के इशार पर नाचते ह। यिद बाहर

िजसका उपदे श ईसा ने िदया था। उन्ह ने कहा िक वगर्

आवाज़ होती है तो मुझे वह सुननी पड़ती है। यिद कुछ

का राज्य िनधर्न का है। क्या यह मज़ाक थाय़ तुम िकस

हो रहा है तो मुझे वह दे खना पड़ता है। बंदर की भाित। ँ

यावहािरक धमर् की बात सोच रहे होय़ जो हृ दय से पिवतर् ह, वे धन्य ह, क्य िक उन्ह ई र का दशर्न

हमम से

थान म पुज ं ीभूत। बंदर बहु त िज ासाि य होते ह। तो,

होगा। दिरदर्, दु ःखी, दु बर्ल की सेवा उनम ि थत वयं भगवा की पूजा के रूप म करो। ऐसा िकए जाने के बाद फल का महत्त्व िवशेष नहीं है। ऐसा काम, िबना िकसी ाि की इच्छा से िकया हु आ, आत्मा को लाभ पहु ँचाता है। वगर् का राज्य हमारे भीतर है। ई र वहा ँ है। वह सब आत्माओं की आत्मा है। उसे अपनी आत्मा म दे खो। यह यावहािरक धमर् है। हम अपने को कहा ँ तक आत्मा समझते हय़ आत्मा की

ाि

का मागर् मुि

यह स ी उपासना है। आत्मानु भिू त ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

का मागर् है। करो। तुम होऱ

त्येक के अंदर कई-कई बंदर ह, एक ही

हम अपने ऊपर वश नहीं रख सकते। और हम संसार

सता िजतनी नीची होती है, इिय की शि उतनी ु िजतना ऊपर उठता है, इिय-सख ु का अिधक होती है। मन  उतना ही कम होता जाता है। कुा मगन होकर आकषण भोजन खा सकता है, पर तदशन पर िवचार करन े के अत ु ु बिु  ारा िजस अनूठे आनंद को नह समझ सकता। तम आनंद को ा करते हो वह उससे वंिचत रहता है। इियु बड़ी व ु है। पर उससे भी बड़ी व ु वह सख ु है जो बिु  सख से ा होता है। 9


धमर् की साधना

िलए जो मने अतीत म वहा ँ की ह। इन तरंग को ध्यान

का मज़ा ले रहे ह! हम मज़ा लेने के िलए िववश ह। कृित चाहती है िक हम यह कर।

की शि

कृित कहती है,

से रोकना है।

दु ःख के गतर् म जाओ। म एक क्षण म दु खी हो जाता हू ँ।

हम धीरे -धीरे , कर्म से, अपने को

एक मनु य मुझे बड़ा िव ान समझता है, दू सरा सोचता

है। इसे गंभीरता से लो, यह खेल नहीं है। यह

िशिक्षत करना एक

है म मूखर् हू ँ, और म जो कुछ सुनता हू ँ उसके अनु सार

िदन का, या वष का, और हो सकता है िक जन्म का

सुखी या दु खी होने लगता हू ँ। इस अंधेरे कमरे म हम

हो। िंचता मत करो। इच्छापूवर्क, जान-बूझकर, अ यास

एक दू सरे से अपने सर टकरा रहे ह।

जारी रखना चािहए। इंच-इंच करके हम आगे बढ़गे। हम अपनी उस वा तिवक आत्मा का अनु भव करने लगगे जो

ध्यान क्या हैय़ ध्यान वह बल है जो हम इस सब का सामना करने की सामथ्यर् दे ता है। कृित हमसे कह सकती हैऱ दे खो, वहा ँ एक

हमसे कभी दू र नहीं हो सकती। वह संपि

ई र

िजसे कोई मनु य नहीं छीन सकता,

हमारे अंदर पहले से

सुन्दर व तु है। म नहीं दे खता। अब

िजसे कोई न

है। पर मन बहु त चंचल है, वह

वह कहती है, यह गंध आकषर्क है,

सदा इं्िदर्य के पीछे दौड़ता रहता है।

इसे सूँघो। म अपनी नाक से

तुम इं्िदर्य को रोकते हो और िफर भी बार-

छू सकता।

कहता हू ँ, इसे मत सूँघ। और बार िमत होते हो। अभी, इस क्षण म सोचता हू ँ नाक नहीं सूँघती।

नहीं कर सकता। वह

आनंद, िजसे अब कोई दु ःख नहीं मनु य अपने सुख के िलए

कृित एक िक म ठीक हू ँ और ई र म ध्यान लगाऊँगा, और दू सरे मनु य या दू सरी व तुओं

भयंकर बात करती हैऱ मे रे एक तब एक िमनट म मे रा मन लंदन पहु ँच जाता है। पर िनभर्र रहता है! सभी िवयोग दु ःखद होते ह, यह

वाभािवक

ब े को मार डालती है, और

और म उसे वहा से ँ खींच लाता हू ँ तो वह न्यूयाकर्

कहती है, अब, बैठ और रो! गतर्

चला जाता है, उन बात के बारे म सोचने के

है। सुख के िलए धन पर िनभर्र

म िगर! म कहता हू ँ, मुझे न रोना

िलए जो मने अतीत म वहा की ँ ह। इन

होना दु ःख को बुलावा दे ना है। धन

है, न िगरना है। म बस अपना कतर् य करता हू ँ। मुझे मु

भाव से कमर् करना है।

इसे करके दे खो। तुम इस

रोकना है।

इसे कैसे ह। त्येक यि

रहता

है।

केवल

अपिर���तर्नीय आत्मा के अितिर

िकसी

अव य आएगा।

आ जाती है तो

नहीं होगीय़ यह ध्यान की शि

घटता-बढ़ता

से

अन्य व तु पर िनभर्र होने से आज या कल दु ःख

कृित को बदल

सकते हो। अब, यिद तुमम यह शि क्या वह मुि

तरं ग को ध्यान की शि

असीम आत्मा के अितिर

है।

शेष सब कुछ

ा िकया जाएय़ इसकी अनेक िविधया ँ

पिरवतर्नशील है। पिरवतर्न का चकर् घूम रहा है।

का अपना मागर् है। पर सामान्य िस ा्तं

आत्मा के अितिर

अनंत और अिवचल आनंद। ध्यान के

यह हैऱ मन को पकड़ो। मन एक झील के समान है, और

वयं

थाियत्व और कहीं नहीं है। वहीं है ार से हम उस

उसम िगरनेवाला हर पत्थर तरंग उठाता है। ये तरंग हम

तक पहु ँचते ह।

दे खने नहीं दे तीं िक हम क्या ह। झील के पानी म पूणर्

रूप ध्यान के बाल-िव ालय मातर् ह। तुम

चंदर्मा का ितिब ब है, पर उसकी सतह इतनी आंदोिलत

हो, तुम कुछ अिर्पत करते हो, कुछ िवशेष श द , पु प ,

ाथर्नाएँ, अनु ान और पूजा के अन्य ाथर्ना करते

ितिब ब हम िदखाई नहीं दे ता। उसे शातं

ितमाओं, मंिदर , बि य को जलाने के समान अनु ान

होने दो। कृित को तरंग मत उठाने दो। शातं रहो, और

से अपने मन को शािन्त की ि थित म लाते हो। पर वह

तब कुछ समय बाद वह तु ह छोड़ दे गी। तब हम जान

शािन्त तो तो सदा तु हारी आत्मा म है, कहीं बाहर नहीं।

सकगे िक हम क्या ह।

उसे पाने के िलए तु ह केवल अपने अंदर जाना है।

है िक वह

दीधर्काल म ध्यान की यह शि

ई र हमारे अंदर पहले से है। पर मन बहु त चंचल

हम अपने शरीर

है, वह सदा इं्िदर्य के पीछे दौड़ता रहता है। तुम इं्िदर्य

से अलग कर दे ती है और अपनी आत्मा को, अपने

को रोकते हो और िफर भी बार-बार

िमत होते हो।

असली अजन्मा, अमर और अनािद वरूप को पहचानने

अभी, इस क्षण म सोचता हू ँ िक म ठीक हू ँ और ई र म

म सहायता करती है। अब दु ःख नहीं रहता, आत्मा जान

ध्यान लगाऊँगा, और तब एक िमनट म मे रा मन लंदन

लेती है िक वह सदा ही पूणर् और मु

पहु ँच जाता है। और म उसे वहा ँ से खींच लाता हू ँ तो वह

िववेकानंद सािहत्य से साभार संकिलत।)

न्यूयाकर् चला जाता है, उन बात के बारे म सोचने के ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

रही है।

(अ ै त आ म, मायावती, अ मोड़ा, ारा संपािदत 10


भारतीय सं कृित की दे न हजारी साद ि वेदी

(आचायर् हजारी साद ि वेदी उन मनीिषय म से ह िजन्ह ने भारतीय िचन्तन का न केवल अध्ययन िकया है अिपतु उसे सही अथ म आत्मसा

भी िकया है। जीवन के बारे म भारतीय दृि

की यह गहरी

समझ न केवल उनके िवचारात्मक लेखन म अिपतु उनके लिलत िनबंध और कथा सािहत्य म भी पिरलिक्षत होती है। यहा ँ

तुत है िबहार ान्तीय सं कृित-स मे लन, भागलपुर म िदए

गए उनके भाषण का संिक्ष ीकृत रूप।)

सं कृित पर िवचार करते हु ए यह ध्यान रखना

रुिच और सं कार के अनु सार इसका अथर् समझ लेता

आव यक है िक सं कृित िकसी दे श-िवशेष या जाित-

है। िफर इसको एकदम अ प

भी नहीं कह सकते,

िवशेष की अपनी मौिलकता नहीं है। मे रे िवचार से सारे

क्य िक

संसार के मनु य की एक सामान्य मानव-सं कृित हो

साधनाएँ ही सं कृित है। इसकी अ प ता का कारण

त्येक मनु य जानता है िक मनु य की

सकती है। यह दू सरी बात है िक वह यापक सं कृित

यही है िक अब भी मनु य इसके संपूणर् और यापक रूप

अब तक सारे संसार म अनु भत ू और अंगीकृत नहीं हो

को दे ख नहीं सका है। संसार के सभी महान तत्त्व इसी कार मानव-िच

सकी है। नाना ऐितहािसक परंपराओं के भीतर से

म अ प

रूप से आभािसत होते ह।

गुजरकर और भौगोिलक पिरि थितय म रहकर संसार

उनका आभािसत होना ही उनकी स ा का

के िभ -िभ

मनु य की

िभ -िभ

समुदाय ने एक महान मानवी सं कृित के

की धािर्मक साधनाओं, कलात्मक य

माण है।

े तर मान्यताएँ केवल अनु भत ू होकर ही

अपनी मिहमा सूिचत करती ह। उनको

पहलुओं का साक्षात्कार िकया है। नाना कार

और

सु यवि थत पिरभाषा म बाधना ँ सब समय संभव नहीं

और सेवा, भि

तथा योगमूलक अनु भिू तय के भीतर से मनु य उस

होता। केवल नेित-नेित कहकर ही मनु य ने उस अनु भिू त

महान सत्य के यापक और पिरपूणर् रूप को कर्मशः ा

को

करता जा रहा है िजसे हम सं कृित श द

कािशत िकया है। अपनी चरम सत्यानु भिू त को

कट करते समय कबीरदास ने इसी कार की िववशता

ारा य ह।

का अनु भव करते हु ए कहा थाऱ ‘ऐसा लो निह तैसा लो,

यह सं कृित श द बहु त अिधक चिलत है तथािप

म केिह िविध कही अनूठा लो’। मनु य की सामान्य

करते यह अ प

सं कृित भी बहु त-कुछ ऐसी ही अनूठी व तु है। मनु य ने

रूप म ही समझा जाता है। इसकी सवर्स मत

कोई पिरभाषा नहीं बन सकी है। ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

त्येक यि

अपनी

उसे अभी तक संपूणर् पाया नहीं है; पर उसे पाने के िलए 11


भारतीय सं कृित की दे न

यगर् भाव से उ ोग कर रहा है। यह मार-काट, न चखसोट और झगड़ा-टं टा भी उसी

है। जहा ँ भी िवरोध िदखे, वहा ँ सोचने की ज़रूरत होगी।

के अंग ह।

हो सकता है िक दो िभ -िभ

जनसमुदाय मोहवश दो

आपको यह बात बहु त िवरोधाभास-सी लगेगी, पर है

असत्य बात को ही बड़ा सत्य मान बैठे ह । हो सकता

सत्य। रा ता खोजते समय भटक जाना, थक जाना या

है िक दोन म एक सही हो और दू सरा गलत। साथ ही

झुझ ँ ला पड़ना इस बात के सबूत नहीं ह िक रा ता

यह भी हो सकता है िक दोन सही रा ते पर ह , पर

खोजने की इच्छा ही नहीं है। किववर रवीन्दर्नाथ ने

उनके दृि कोण गलत ह । यिद हम अपनी गलती मालूम

अपनी किवजनोिचत भाषा म इस बात को इस

हो तो उसे िनमर्म भाव से छोड़ दे ना होगा। महाभारत ने

कार

कहा है िक यह जो लुहार की दु कान की खटाखट और

बहु त पहले घोषणा की थी िक जो धमर् दू सरे धमर् को

धूल-ध ड़ है, इनसे घबराने की ज़रूरत नहीं है। वहा ँ

बािधत करता है, वह धमर् नहीं है, कुधमर् है। स ा धमर्

वीणा के तार तैयार हो रहे ह! जब ये तार बन जाएँगे तो

अिवरोधी होता हैः

एक िदन इनकी मधुर-संगीत-ध्विन से िन य ही मन

धम यो बाधते धम न स धम कुधमर् त ।

और

अिवरोधी तु यो धमर्ः स धमर्ो मुिनस म।।

ाण तृ

हो जाएँगे। मनु य िदन-िदन अपने महान

म जब भारतीय िवशेषण जोड़कर सं कृित श द

ल य के नजदीक पहु ँचता जाएगा। मानव-सं कृित ऐसा ही दु लभ र् ल य है। मे रा िव ास है िक

त्येक दे श और

का

जाित ने अपनी ऐितहािसक परंपराओं और भौगोिलक

योग करता हू ँ तो म भारतवषर्

ारा अिधगत और

साक्षात्कृत अिवरोधी धमर् की ही बात करता हू ँ। अपनी

पिरि थितय के अनु सार उस महान ल य के िकसी-न-

िवशेष भौगोिलक पिरि थित म और िवशेष ऐितहािसक

िकसी पहलू का अव य साक्षात्कार िकया है। ज्य -ज्य

परंपरा के भीतर से मनु य के सव

वै ािनक साधन के पिरणाम वरूप िभ -िभ

करने के िलए इस दे श के लोग ने भी कुछ

दे श और

िभ -िभ जाितया ँएक-दू सरे के नजदीक आती जाएँगी, त्य -त्य इन आंिशक सत्य की साथर्कता

ह। िजतने अंश म वह

कट होती

म को

कािशत य

िकए

संसार के अन्य मनु य के

का अिवरोधी है, उतने अंश म वह उनका पूरक

जाएगी और हम सामान्य यापक सत्य को पाते जाएँगे।

भी है। िभ -िभ

आज की मारामारी इसम बस थोड़ी रुकावट डाल

अनु भत ू और साक्षात्कृत अन्य अिवरोधी धम की भाित ँ

सकती है।

वह मनु य की जययातर्ा म सहायक है। वह मनु य के

जो आदमी ऐसा िव ास करता है, उससे सं कृित

सव

दे श

और िभ -िभ

म को िजतने अंश म

जाितय

के

कािशत और अगर्सर कर

के साथ भारतीय िवशेषण जोड़ने का अथर् पूछना िनतातं

सका है, उतने ही अंश म वह साथर्क और महान है। वही

संगत है। क्या भारतीय से मतलब भारतवषर् के सम त

भारतीय सं कृित है, उसको

अच्छे -बुरे

याख्या करना या उसके

और सं कार हय़ नहीं, सम त भारतीय

सं कार अच्छे ही ह या मनु य की सव

यह

म साधना की

कट करना, उसकी

ित िज ासा-भाव उिचत है।

यास अपनी बड़ाई का

माणपतर् संगर्ह करने के

ओर अगर्सर करनेवाले ही ह, ऐसा म नहीं मानता। ऐसा

िलए नहीं है, बि क मनु य की जययातर्ा म सहायता

दे खा गया है िक एक जाित ने िजस बात को अपना

पहु ँचाने के उ े य से

अत्यंत महत्त्वपूणर् सं कार माना है, वह दू सरी जाित की

िलए उसका अध्ययन, मनन और काशन होना चािहए।

ेिरत है। इसी महान उ े य के

म साधना के साथ मे ल नहीं खाता। ऐसा भी हो

मनु य की जययातर्ा! क्या मनु य ने िकसी अ ात

सकता है िक एक जाित के सं कार दू सरी जाित के

शतर्ु को परा त करने के िलए अपना दु धर र् रथ जोता हैय़

सं कार से एकदम उलटे पड़ते ह । हो सकता है िक एक

मनु य की जययातर्ा! क्या जानबूझकर लोकिचत को

सव

जाित मंिदर

और मूिर्तय

यामोिहत करने के िलए यह वाक्य बनाया गया हैय़

के िनमार्ण म ही अपनी

कृताथर्ता मानती हो और दू सरी जाित उनको तोड़

मनु य की जययातर्ा का क्या अथर् हो सकता हैय़ परन्तु

डालने को ही अपनी चरम साथर्कता मानती हो। ये दोन

मुझे यह वाक्य सचमुच बड़ा बल दे ता है। न जाने िकस

पर पर िवरु

अनािद काल के एक अ ात मुहूतर् म यह पृथ्वी नामक

ह। ऐसे

थल पर िवचार करने की

ल य पर पर िवरोधी नहीं होता।

गर्हिंपड सूयर्मंडल से टूटकर उसके चार ओर च र

संत र बदास ने कहा थाऱ सब साचँ िमलै सो

काटने लगा था। मुझे उस समय का िचतर् क पना के

साचँ है, न िमलै सो झूठ। स पूणर् सत्य अिवरोधी होता

नेतर् से दे खने म बड़ा आनन्द होता आया है। उस

आव यकता होगी। िस

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12


भारतीय सं कृित की दे न

स ः

फुिटत धिरतर्ी-िंपड म ज्वलंत गैस भरी हु ई थीं।

कहा ँ से एक रा ता िनकाला। जो जैसा है, वैसा ही मान

कोई नहीं जानता िक इन असंख्य अिग्नगभर्कण म से

लेने की िववशता को उसने नहीं माना। जैसा होना

िकसम या िकनम जीवतत्त्व का अंकुर वतर्मान था।

चािहए, उसके िलए वही बड़ी बात है।

शायद वह सवर्तर् पिर या

इस जगह से सृि

था। इसके बाद लाख वषर्

का दू सरा अध्याय शुरू हु आ।

तक धरती ठं डी होती रही, लाख वषर् तक उस पर तरल

एक बार क पना कीिजए, तरल-त

समुदर् की, िनरंतर झरनेवाले अिग्न-गभर्-मे घ की; िवपुल

धातुओं की वषार् होती रही, लाख वषर् तक उसके

भीतर और बाहर

धातुओं के

चण्ड

जड़-संघात की, और िफर क पना कीिजए क्षुदर्ाकार

लयकाडं मचा रहा, पृथ्वी अन्यान्य

गर्ह के साथ सूयर् के चार ओर उसी कार नाचती रही।

मनु य की! िवराट

जीवतत्त्व ि थर-अिवक्षु ध भाव से उिचत अवसर की

का अिग्नमय आव र्-नृत्य, अनंत शून्य म िनरंतर

तीक्षा म बैठा रहा। अवसर आने पर उसने अपनी

उ य ू मान और िवनाशमान नीहािरका पुँज िव मयकारी

सम त शि

से जड़

कृित के िवरु

ाड-िनकाय, ं कोिट-कोिट नक्षतर्

िसर उठायाऱ

ह, पर उनसे अिधक िव मयकारी है मनु य, जो नगण्य

नगण्य तृणाक ं ु र के रूप म! तब से आज तक संपूणर्

थान-काल म रहकर इनकी नाप-जोख करने िनकल

जड़शि

पड़ा है!

अपने आकषर्ण का समूचा वेग लगाकर भी

उसे नीचे की ओर नहीं खींच सकी। सृि

क्या मनु य इस सृि

के इितहास म

की अंितम पिरणित हैय़ क्या

वह एकदम अघिटत घटना थी। तब तक गुरुत्वाकषर्ण

िवधाता ने इस कृित की रचना करके हाथ झाड़ िलया

की िवराट शि

हैय़ कौन कह सकता हैय़ परन्तु क्या यह मनु य की

का मुकाबला करने म कोई समथर् नहीं

हो सका था। जीवतत्त्व वृि

थम बार अपनी ऊध्वर्गािमनी

अमोघ जययातर्ा नहीं हैय़ क्या यह इस बात का

की ताकत के बल पर इस महाकषर् का सामना कर

नहीं है िक सम त गलितय के बावजूद मनु य मनु यता

सका। तब से वह िनरंतर अगर्सर होता गया। मनु य

की उ तर अिभ यि य की ओर ही बढ़ रहा हैय़

उसीकी अंितम पिरणित है। वह एक कोश से अनेक कोश के जिटल संघटन म कमिन्दर्य से और

ानेिन्दर्य से मन और बुि

होता हु आ मानवात्मा के रूप म

यह जो थूल से सू म की ओर अगर्सर होना है, जो कुछ जैसा है उसको वैसा ही न मानकर जैसा होना

ानेिन्दर्य की

चािहए, उसकी ओर जाने का

की तरफ िवकिसत

है, यही मनु य की

मनु यता है! अनेक बात म मनु य और पशु म कोई भेद

कट हु आ।

पंिडत ने दे खा है िक मनु य तक आते-आते कृित ने अपने कारखाने म असंख्य

माण

नहीं है। मनु य पशु की अव था से ही अगर्सर होकर इस अव था म आया है। इसिलए वह थूल को छोड़कर रह

योग िकए ह।

पुराने जंतुओं की िवशाल ठठिरया ँ आज भी यतर्-ततर्

नहीं सकता। यही कारण है िक मनु य को दो

िमल जाती ह और उन असंख्य

कतर् य िनबाहने पड़ते हऱ एक थूल की क्षुधा को िनवृ

योग की गवाही दे

कार के

जाती ह। कृित अपने योग म कृपण कभी नहीं रही है।

करना और दू सरा सू म से सू मतर तत्त्व की ओर

उसने बरबादी की कभी

बढ़ानेवाली अपनी ऊध्वर्गािमनी वृि

वाह नहीं की। दस वृक्ष के

को संतु

करना।

िलए दस लाख बीज बनाने म वह कभी कोताही नहीं

आहार-िनदर्ा आिद के साधन भी मनु य को जुटाने पड़ते

करती। यह सब क्या यथर् की अंधता है, सु प

ह। य िप मनु य-बुि

योजना

ने इनम भी कमाल का उत्कषर्

का अभाव है या िहसाब न जानने का दु पिरणाम हैय़

िदखाया है, पर

कौन बताए िक िकस महान उ े य की

अतीत है, जहा ँ मनु य की आनंिदनी वृि

ाि

के िलए

योजन ही है। जो

होती है, वहा ँ मनु य की ऊध्वर्गािमनी वृि

कृित ने इतनी बरबादी सही हैय़ हम केवल इतना ही जानते ह िक जब जीवतत्त्व, सम त िवघ्न-बाधाओं का अितकर्मण करके मनु य-रूप म अिभ य

योजन

योजन से ही चिरताथर् को संतोष

होता है। ज्य -ज्य मनु य संघब

हु आ, तब

होकर रहने का अ य त

इितहास ही बदल गया। जो कुछ जैसा होना है, वह

होता गया, त्य -त्य उसे सामािजक संघटन के िलए

होकर ही रहे गाऱ यही

नाना

कृित का अचल िवधान है।

कार के िनयम-कानून बनाने पड़े । इस संघटन

कायर्-कारण परंपरा म इच्छा का कोई थान नहीं था।

को दोषहीन और गितशील बनाने के िलए उसने दं ड-

इसी समय मनु य आया। उसने इस साधारण िनयम को

पुर कार की यव था की। इन बात को एक श द म

अ वीकार िकया। उसने अपनी इच्छा के िलए न जाने

स यता कहते ह।

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

13


भारतीय सं कृित की दे न

आिर्थक

यव था, राजनैितक संघटन, नैितक

िपता को अब भी संतोष नहीं हु आ। िफर एक बार किठन

परंपरा और सौन्दयर्-बोध को ती तर करने की योजनाऱ ये स यता के चार तंभ है। इन सबके सि मिलत से सं कृित बनती है। स यता मनु य के बा

तप के बाद पुतर् ने समझाऱ आनंद ही

भाव

यही चरम सत्य था। इस पदाथर्),

योजन

जो

हमारे

बा करणऱ

मत बन जाते हऱ तकार्ि त मत और िव ास समिर्पत मत। संदेह पर बल दे नेवाला तकार्ि त मत िफ़लासफ़ी

और भी सू म है। मन

म हम हज़ार गज की लंबाई को भी एकाएक धारण नहीं कर सकते। पर बुि

दाशर्िनक

मत बने ह। साधारणतः इनके आ य से दो-दो कार के

कमिन्दर्या ँ और

ानेिन्दर्या ँ हऱ हमारे अत्यन्त थूल योजन के िनवतर्क ह। मन इनसे सू म है, और बुि

ान के पाचँ तर ह। ये उ रो र सू म ह।

इन्हीं पाचँ के आ य से संसार के िभ -िभ

योजनातीत आंतर की अिभ यि । यह

(भौितक

ाण, मन, िव ान (बुि ), आनंद (अध्यात्म

तत्त्व)ऱ ये

को सहजल य करने का िवधान है और सं कृित

है।

कार अ

का

ारा ज्योितषी कोिट-कोिट काश-

ितपा

मत बन गया है, और िव ास पर आि त

ा पर बल दे नेवाला धमर्- ान का।

वष म फैले हु ए गर्ह-नक्षतर् की नाप-जोख िकया करते

भारतवषर् का इितहास अन्य दे श से कुछ िविचतर्

से भी

रहा है। स यता के उषाकाल से लेकर आधुिनक काल के

बढ़कर कोई व तु है। वही अंतरतम है। गीता म कहा हैःऱ

आरंभ तक हमारे इस दे श म नाना मानव-समूह की धारा

ह। परन्तु बुि

भी सबसे बड़ी चीज़ नहीं है। बुि

बराबर आती रही है। इसम स य, अधर्-स य और बबर्र

इिन्दर्यािण पराण्याहु ः इिन्दर्ये यः परं मनः।

ेिणय के मनु य रहे ह। भारतीय मनीषी शुरू से ही

मनस तु परा बुि ः यो बु े ः परत तु सः।। जो व तु केवल इंिदर्य को संतु

बहु त महत्त्वपूणर् नहीं है। जो व तु मन को संतु सके, अथार्

मनु य के बहु िवध िव ास और मत को जानने का

कर सके वह कर

अवसर पा सके ह। इसीिलए यहा ँ धमर्- ान और तत्त्व-

हमारे भावावेग को संतोष दे सके, वह

िज ासा कभी पर परिवरोधी मत नहीं माने गए। भारतीय

पहली से सू म होने पर भी बहु त बड़ी नहीं है। जो बात

ऋिषय ने दोन का उिचत सामंज य िकया है। शायद

बुि

को संतोष दे सके, वह ज़रूर बड़ी है, पर वह भी

इस िवषय म भारतवषर् सारे संसार को कुछ दे सकता है।

बा

है। बुि

से भी परे कुछ है। वही वा तव है, उसका

भारतवषर् के दाशर्िनक सािहत्य के पा ात्य आलोचक को

संतोष ही का य है। परन्तु वह क्या हैय़ म भारतीय

��� यर् हु आ है िक इस दे श म उस चीज़ का कभी िवकास

मनीषा के इस मतं य तक आपको ले आकर यह आशा

ही नहीं हो पाया िजसे ‘िफ़लॉसफ़ी’ कहते ह; भारतवषर् के

नहीं कर रहा हू ँ िक आप शा -वाक्य पर िव ास कर

दशर्न धमर् पर आधािरत बताए गए ह। दशर्न श द का अथर्

ल। म इसके िनकट आपको ले आकर छोड़ दे ता हू ँ;

ही दे खना है। इसका अंतिर्निहत अथर् यह है िक दशर्न

क्य िक म जानता हू ँ िक यहा ँ तक आकर आप इसकी

कुछ िस

करगे। जब तक इसकी गहराई

ितपादन करते ह। जैसािक हमने अभी ल य िकया है,

नहीं िकया जाता तब तक मनु य के

यह दे खना तब वा तिवक होगा जब वह केवल इंिदर्य

गहराई म पैठने का य म पैठने का बड़े -बड़े

महात्माओं के दे खे हु ए (साक्षात्कृत) सत्य का

का रह य समझ म नहीं आएगा।

तैि रीय उपिनष

ारा,

की भृगुव ी म वरुण के पुतर्

दृ

ाण

ारा, मन

ारा यहा ँ तक िक बुि

ारा भी

थूल तथ्य को पीछे छोड़कर उस व तु के

ारा

भृगु की मनोरंजक कथा दी हु ई है। भृगु ने जाकर वरुण

दे खा गया हो जो आनंदरूप है, जो सबके परे और सबसे

से कहा था िक भगव , म

सू म है। यही वयंवे

को जानना चाहता हू ँ।

िपता ने तप करने की आ ा दी। किठन तप या के बाद पुतर् ने समझाऱ अ

ही ब

त्येक यि

जो अनु भव करता है, वह सत्य ही है। सत्य को जानने

है। िपता ने िफर तप करने

के िलए शरीर और मन की शुि

को कहाऱ इस बार पुतर् कुछ और गहराई म गया। उसने ाण को ही

ान है।

परन्तु यह नहीं समझना चािहए िक

आव यक है। जब तक

समझा। िपता को संतोष नहीं हु आ।

मनु य का बाहर और भीतर शु , िनमर्ल और पिवतर् नहीं

उन्ह ने पुतर् को पुनः तप करने के िलए उत्सािहत िकया।

होता, तब तक वह गलत व तु को सत्य समझ सकता

पुतर् ने िफर तप िकया और समझा िक मन ही

है। चंचल मन से िकसी मामूली सम या का भी ठीक-

िपता िफर भी असंतु

है।

ठीक समाधान नहीं होता। यह जो बा

ही रहे । िफर तप करने के बाद

पुतर् ने अनु भव िकयाऱ िव ान (बुि ) ही ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

की शुि

है। पर 14

और अंतःकरण

है, यही भारतीय दशर्न की िवशेषता है। जैसे-


भारतीय सं कृित की दे न

भारतवषर् ने एिशया और यूरोप के दे श को अपनी

तैसे रहकर, जैसा-तैसा सोचकर बड़े सत्य को अनु भव नहीं िकया जा सकता। चंचल िच

धमर्-साधना की उ म व तुएँ दान दी ह। उसने अिंहसा

केवल िवकृत िंचता

म ही लगा रहता है। भारतीय मनीिषय ने इस चंचल

और मैतर्ी का संदेश िदया है, क्षुदर् दु िनयावी वाथ की

िच

उपेक्षा करके िवशाल आध्याित्मक अनु भिू तय का उपदे श

को वश म करने के उपाय बताए ह। इसी उपाय

का नाम योग है। भगवान

िदया है और उसने िजन बात को गर्हण िकया है वे भी

ीकृ ण ने गीता म कहा है िक

य िप मन बड़ा चंचल है और उसे वश म करना किठन

उसी

है, तथािप अ यास और वैराग्य से उसे वश म िकया जा

के आदान- दान के ठोस िच

सकता है। अ यास और वैराग्य के िलए भारतीय सािहत्य

से िनकलते रहते ह और िवदे श म िमल जाया करते ह।

म शतािधक गर्ंथ वतर्मान ह। संभवतः सारे संसार म

हमारा धमर्, िव ान, हमारा मूिर्त और मंिदर-िश प,

बुि जीवी इस िवषय म यहा ँ से कुछ सीख सकते ह। केवल बौि क िव

ेषण

िचिकत्सा और ज्योितष संसार म गए ह, स मािनत और से थोड़ा-बहु त

ाण और िफर

सका जहा ँ भारतीय आचायर् पवर्त और रे िग तान को

िकसी एक को संयत करने का अ यास िकया जाए तो

लाधकर ँ अिंहसा और मैतर्ी का संदेश दे ते ह, जहा ँ हमारे

बाकी संयत हो जाते ह। भारतवषर् के नाना आध्याित्मक

िश पी गाधार ं और यवन कलाकार के साथ िमलकर

पंथ इन तीन को संयत करने के ऊपर ज़ोर दे ने के

पत्थर म जान डाल रहे ह, जहा ँ अरब और ईरान के

कारण अलग-अलग हो गए ह। गहराई म जानेवाल के

मनीिषय के साथ िमलकर वे िचिकत्सा और ज्योितष का

ािन्त का

चार कर रहे ह, जहा ँ मलय और यव ीप म वहा ँ के

अवकाश रहता है।, इसीिलए भारतीय मनीिषय ने केवल

िनवािसय से िमलकर िश प और कला म नया

अ यास को ही एकमातर् साधन नहीं माना। अ यास के

न ले जाकर शा ीय नीरस िवचार म उलझाए रहा;

आिद

परंतु इसके िलए मुझे क्षमा मागने ं की ज़रूरत नहीं है,

सब तत्त्व से अपने को पृथक् समझ लेता है। इस कार अ यास और वैराग्य से िच

क्य िक मे रा िव ास है िक भारतीय मनीिषय ने अपने

ि थर होता है और बुि

दे शवािसय म जीवन के आव यक कतर् य और वैराग्य

िनमर्ल होती हैऱ केवल उसी समय परम सत्य का

की मिहमा और थूल की अपेक्षा सू म की ओर झुकने

साक्षात्कार होता है। मे रा अनु मान है िक िवचार का यह

कृ

का ेम पैदा िकया, उसका ही पिरणाम है िक भारतवषर्

पंथ है ,

दीधर्काल तक पशु-सुलभ क्षुदर् वाथ का गुलाम नहीं बन

परन्तु यह मे रा दावा नहीं िक म इस बात को ठीक-ठीक

सका। आज हम सा ं कृितक दृि

समझ सका हू ँ। व तुतः यह साधना का िवषय है , परंतु

आदश को भूल गए ह। मे रा िव ास है िक इन आदश

कार के बौि क वैराग्य की

को नई पिरि थितय के अनु कूल बनाकर गर्हण करने से

आव यकता है । संसार की सम त जिटल सम याएँ

हम तो ऊपर उठगे ही, सारे संसार को भी उसम कुछ-

िनत्य ित और भी जिटलतर इसिलए होती जाती ह िक इनपर िवचार करने वाल

न-कुछ ऐसा अव य िमलेगा िजससे उसे वतर्मान

म मानिसक संयम और

लयंकर अव था से उबरने का मौका िमले।

बौि क वैराग्य का अभाव है । लोग अपने -अपने िवशे ष

भारतवषर् ने सामान्य मानवीय सं कृित को पूणर्

वाथ और िवचार प ितय के भीतर से दू सर को दे खने का

और यापक बनाने की जो महती साधना की है, उसके

यास करते ह, और तब सम याएँ और

त्येक पहलू का अध्ययन और

जिटल हो जाती ह। बौि क वैराग्य ही मनु य को

महत्त्वपूणर् कतर् य होना चािहए।

सुसं कृत बनाता है । ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

से जो बहु त नीचे िगर

गए ह, उसका धान कारण यही है िक हम अपने महान

यह समझना किठन नहीं िक िकसी बात की सचाई तक पहु ँचने के िलए एक

ाण-

संचार कर रहे ह। म उस परम मोहक लोक म आपको

साथ वैराग्य होना चािहए। असली वैराग्य तब होता है जब अंतरात्मा सम त इंिदर्य से और मन-बुि

भािवत भी हु ए ह।

म अभी आपको उस िद य लोक की सैर नहीं करा

मन। भारतीय मनीिषय ने अनु भव िकया है िक इनम से

िलए ये िवरोध नगण्य ह। परन्तु यहा ँ भी

िंचतनशील जाितय

वीकृत हु ए ह और संसार के उ

हमने अभी िजन पाचँ तत्त्व को ल य िकया, थूल है यह शरीर, िफर

अब भी इस भूिम के नीचे

हमारा दशर्न-शा , हमारे का य और नाटक, हमारी

ारा सत्य तक नहीं पहु ँचा जा

सकता। सवर्तर् अ यास और वैराग्य आव यक है। उनम सबसे

कार महान और दीघर् थायी रही ह। उ तर क्षेतर्

15

काशन हमारा अत्यन्त


क्या गुरु आव यक हैय़ जे. कृ णमूिर्त

आप कहते ह िक गुरु

अनु भव यापक है और हमारा बहु त

अनाव यक है, लेिकन िबना िववेकपूणर्

कम है। वह अपने अिधक अनु भव के

सहायता एवं िनदशन के, जो केवल

ारा हमारी सहायता करे गा, आिद-

गुरु ही दान कर सकता है, सत्य की

आिद।

उपलि ध कैसे संभव हैय़ कृ णमूिर्तऱ

अतः मूल बात यह है िक आप है

िक गुरु

िकसी गुरु के िनकट जाते ही इसिलए

आव यक है या नहीं। क्या सत्य दू सरे

ह क्य िक आप

के

अपने आप म प

ारा

िकया जा सकता हैय़

कुछ कहते ह िक िकया जा सकता है

ातं होते ह। अगर आप होते तो आप िकसी

गुरु के पास न जाते। इसम कोई संदेह

और कुछ कहते ह िक नहीं िकया जा

नहीं िक यिद आप सभी तरह से खुश

सकता। हम इसकी स ाई को जानना

होते, यिद सम याएँ न होतीं, यिद

चाहते ह, यह नहीं िक िकसी दू सरे की

आपने जीवन को पूणत र् या समझ िलया होता, तो आप िकसी गुरु के पास न

तुलना म मे रा मत क्या है।

जाते। मुझे उ मीद है िक आप इसके तात्पयर् को दे ख पा

इस िवषय म मे रा कोई मत नहीं है। या तो गुरु आव यक है, या िफर नहीं है। अतः आपके िलए गुरु

रहे ह। चूिँ क आप

वीकार करना आव यक है या नहीं, यह आपकी या मे री राय का

ातं ह, इसिलए आप गुरु की खोज

म है। आप उसके पास जाते ह, इस उ मीद के साथ िक वह आपको जीने की राह बताएगा, आपकी उलझन को

नहीं है। िकसी भी बात की स ाई

िकसी की राय पर िनभर्र नहीं करती, चाहे वह राय

दू र कर दे गा और आपको सत्य की पहचान कराएगा।

िकतनी भी गंभीर, िव

आप िकसी का चयन करते ह क्य िक आप

ापूण,र् लोकि य और सावर्भौिमक

ातं ह, और

क्य न हो। स ाई को तो वा तव म खोज िनकालना

आस लगाते ह िक आप जो चाहते ह, वह गुरु आपको

होता है।

दे गा।

सबसे पहली बात तो यह है िक हम गुरु चाहते ही

आप ऐसे गुरु को

वीकार करते ह जो आपकी

क्य हय़ हम कहते ह िक हम एक गुरु की आव यकता

मागँ को पूरा करे । गुरु से िमलनेवाली संतुि

है, क्य िक हम

पर ही आप गुरु को चुनते ह, और आपका यह चुनाव

ािन्त म ह और गुरु हमारा सहायक

के आधार

होता है। वह बताएगा िक सत्य क्या है, वह समझने म

अव य ही आपकी संतुि

हमारी सहायता करे गा, वह जीवन के बारे म हमसे कहीं

ऐसे गुरु को नहीं

अिधक जानता है। वह एक िपता की तरह, एक अध्यापक

“आत्मिनभर्र बन”। अपने पूवर्गर्ह के अनु सार ही आप

की तरह जीवन म हमारा मागर्दशर्न करे गा। उसका

उसे चुनते ह। चूिँ क आप गुरु का चयन उस पिरपुि

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆ ¦ÉÉ®úi iÉÉ-ºÉÆvÉÉÉxÉ, ÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 201 2014 2 4

16

पर ही आधािरत होता है। आप वीकार करते जो कहता है, के


क्या गुरु आव यक है य़

आधार पर करते ह जो वह आपको दान करता है, तो

अपनी वतर्मान दशा के साथ अपने संबध ं म ही हम

आप सत्य की खोज नहीं कर रहे ह, बि क अपनी

वयं को समझ सकते ह, और यह संबध ं ही गुरु है न

दु िवधा से बाहर िनकलने का उपाय ढूँढ़ रहे ह, और

िक बाहर का कोई यि । यिद हम इस संबध ं को नहीं

दु िवधा से बाहर िनकलने के उस उपाय को ही गलती से

समझते तो गुरु चाहे जो भी कहता रहे , यथर् है। क्य िक

सत्य कह िदया जाता है।

यिद म इस संबध ं को नहीं समझ पाता हू ँऱ संपि

सबसे पहले हम इस िवचार की परीक्षा कर िक

के

साथ अपने संबध ं को, यि य और िवचार के साथ

क्या कोई गुरु हमारी अ त- य तता को, भीतरी गड़बड़ी

अपने संबध ं कोऱ तो मे रे भीतर के

को समा कर सकता है, क्या कोई दू सरा यि

कौन सुलझा सकता हैय़ इस ं

हमारी

को दू सरा और

को, इस अ प ता को

दु िवधा को दू र कर सकता हैय़ दु िवधा, जो िक हमारी

दू र करने के िलए आव यक है िक म वयं इसे जानूँ,

िकर्याओं- ितिकर्याओं का फल है, हमीं ने उसे रचा है।

समझू,ं िजसका अथर् है िक संबध ं म

वयं के

ित

अंदर और बाहर, अि तत्व के सभी तर पर होनेवाले

जागरूक रहू ँ और इस जागरूकता के िलए िकसी गुरु

इस

की आव यकता नहीं है। यिद म वयं को नहीं जानता

े श को, इस संघषर् को, आप क्या समझते ह िक

इसे िकसी और ने उत्प

िकया हैय़ यह हमारे ही अपने

तो गुरु िकस काम का! िजस तरह राजनैितक नेता का

आपको न जानने का नतीजा है। हम अपने को गहराई

चुनाव उन लोग के

से नहीं समझतेऱ अपने

और इसीिलए उनका चुनाव भी

ं , अपनी

ितिकर्याएँ, अपनी

ारा िकया जाता है जो

ातं ह,

ािन्तपूणर् होता है, उसी

पीड़ाएँ, इन सबको नहीं समझ पातेऱ और इसिलए हम

तरह म गुरु चुन िलया करता हू ँ। म केवल अपने िव म

िकसी गुरु के पास जाते ह, यह सोचकर िक वह इस

के तहत उसका चयन करता हू ँ, अतः राजनैितक नेता

दु िवधा से, इस अ त- य तता से बाहर िनकलने म

की तरह गुरु भी

ातं होता है।

महत्त्व इस बात का नहीं िक सही कौन हैऱ म

हमारी सहायता करे गा।

ठीक हू ँ या वे यि

अतः मूल बात यह है िक आप िकसी

महत्त्वपूणर् यह पता लगाना है िक आपको गुरु की

गुरु के िनकट जाते ही इसिलए ह क्य िक आप

ातं होते ह। अगर आप अपने आप म

होते तो आप िकसी गुरु के पास न

जो कहते ह िक गुरु आव यक है;

आव यकता ही क्य पड़ती है। तमाम तरह के शोषण के िलए गुरु हु आ करते ह, लेिकन यहा ँवह मु ा अ ासंिगक है। यिद आपको कोई बताए िक आप उ ित कर रहे ह तो आपको बड़ा संतोष होता है। परंतु असली बात यह

जाते । इसम कोई सं दे ह नहीं िक यिद आप

पता लगाना कहै िक आपको गुरु की आव यकता ही

सभी तरह से खु श होते , यिद सम याएँ न

क्य होती हैै।

होतीं, यिद आपने जीवन को पू णर्तया समझ

कोई आपको िदशा-संकेत दे सकता है, पर काम

िलया होता, तो आप िकसी गुरु के पास न

तो सारा आपको खुद ही करना होता है, भले ही आपका

जाते । मुझे उ मीद है िक आप इसके तात्पयर्

गुरु कोई भी हो। पर आप यह सब नहीं करना चाहते,

को दे ख पा रहे ह। चूँ िक आप

आप इसकी िज़ मे दारी गुरु पर छोड़ दे ते ह। जब व का

ातं ह,

अंशमातर् भी बोध होने लगे तब गुरु का उपयोग नहीं रह

इसिलए आप गुरु की खोज म है । आप

जाता। कोई गुरु, कोई पु तक अथवा शा

उसके पास जाते ह, इस उ मीद के साथ िक वह आपको जीने की राह बताएगा, आपकी

संबध ं के बीच वयं के ित सजग होते ह। होने का अथर् ही है संबिं धत होना। संबध ं को न समझना े श है, कलह

उलझन को दू र कर दे गा और आपको सत्य

है। अपनी संपि

की पहचान कराएगा। आप िकसी का चयन करते ह क्य िक आप

के साथ अपने संबध ं के

ित जागरूक

न होना िव म के, दु िवधा के अनेक कारण म से एक है।

ातं ह, और आस

यिद आप संपि

लगाते ह िक आप जो चाहते ह, वह गुरु

जानते, तो ं

आपको दे गा। ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

आपको

आत्मबोध नहीं दे सकता। यह तभी आता है जब आप

के साथ अपने सही संबध ं को नहीं अिनवायर् है, जोिक समाज के ं

को भी

बढ़ाएगा। यिद आप अपने और अपनी प ी के बीच, 17


क्या गुरु आव यक है य़

जब आप ई र के बारे म सोचते ह, आपका ई र

अपने और अपने पुतर् के बीच संबध ं को नहीं समझते, तो उस संबध ं से पैदा होने वाले

आपके िवचार का क्षेपण होता है, सामािजक भाव का

का िनराकरण कोई

पिरणाम होता है। आप केवल

दू सरा कैसे कर सकता हैय़ यही बात िवचार , िव ास

ात के िवषय म ही सोच

के

सकते ह, अ ात के िवषय म नहीं। आप सत्य पर

साथ, िवचार के साथ अपने संबध ं के बारे म प ता न

एकागर्ता नहीं साध सकते। जैसे ही आप अ ात के बारे

होने के कारण आप गुरु खोजते ह। यिद वह व तुतः गुरु

म सोचते ह, वह केवल आत्म- िक्ष

आिद पर लागू होती है। यि य के साथ, संपि

है, तो वह आपको

ात ही होता है।

वयं को समझने के िलए कहे गा।

ई र या सत्य के बारे म सोचा नहीं जा सकता।

सारी गलतफहमी तथा उलझन की वजह आप ही ह,

यिद आप उसके बारे म सोच लेते ह तो वह सत्य नहीं है।

और इस ं

सत्य को खोजा नहीं जा सकता; वह आप तक आता है।

का समाधान तभी कर पाएँगे जब वयं को

पार पिरक संबध ं के बीच समझ ल।

आप केवल उसीके पीछे दौड़ सकते ह जो

आप िकसी दू सरे के माध्यम से सत्य को नहीं पा

मन

ात है। जब

ात के पिरणाम से उत्पीिड़त नहीं होता, केवल

सकते। ऐसा आप कैसे कर सकते हय़ सत्य कोई थैितक

तभी सत्य वयं को

तत्त्व, जड़ चीज़ नहीं है, उसका कोई िनि त

प े म, हर आँसू म है; उसे क्षण-क्षण म जाना जाता है।

नहीं

है,

वह

कोई

साध्य, कोई ल य नहीं

है,

बि क वह तो सजीव, गितशील, जीवंत

है।

थान

आप िकसी दू सरे के माध्यम से सत्य को नहीं पा सकते । ऐसा आप कैसे कर सकते हय़ सत्य कोई िनि

थै ितक तत्त्व, जड़ चीज़ नहीं है , उसका कोई

थान नहीं है , वह कोई साध्य, कोई ल य नहीं है , बि क वह तो

सजीव, गितशील, जीवं त है । वह कोई साध्य कैसे हो सकता है य़ यिद सत्य कोई िनि

त िबन्दु है , तो वह सत्य नहीं है , तब वह मातर् एक िवचार या मत

है । सत्य अ ात है ; और सत्य को खोजने वाला मन उसे कभी पा नहीं सकेगा, क्य िक मन

ात से बना है , वह अतीत का, समय का पिरणाम है ।

इसका आप वयं िनरीक्षण कर सकते ह।

वह कोई साध्य कैसे हो सकता हैय़ यिद सत्य कोई

भी जाए तो वह यातर्ा केवल ात से िर

ात से

बना है, वह अतीत का, समय का पिरणाम है। इसका

कोई

ले

नहीं

जा

सकता, और

यिद

कोई

ात की ओर ही होगी।

मन

ात

ात सिकर्य नहीं है।

ात का भंडार है , वह

ात का अवशे ष है ।

उस अव था म होने के िलए, िजसम अ ात अि तत्व

ात का उपकरण है, अतः वह अ ात को

नहीं कर सकता, उसकी गित केवल

आपको

है। सत्य उस अव था म आता है जब

अनु पि थत है,

आप वयं िनरीक्षण कर सकते ह। ा

तक

सत्य का आगमन केवल उसी मन म होता है जो

िवचार या मत है। सत्य अ ात है; और सत्य को खोजने वाला मन उसे कभी पा नहीं सकेगा, क्य िक मन

सत्य

आपको ले

िनि त िबन्दु है, तो वह सत्य नहीं है, तब वह मातर् एक

मन

कट कर सकता है। सत्य तो हर

ात से

म आता है , मन को अपने

ात

ित, अपने चे तन तथा

अचे तन अतीत के अनु भव के

ित, अपने

त्यु र ,

की ओर है। जब मन सत्य को खोजता है, वह सत्य,

अपनी ितिकर्याओं एवं संरचना के ित जागरूक होना

िजसके िवषय म उसने पु तक म पढ़ा है, तो वह सत्य

होगा।

वयं को पू री तरह से जान लेने पर

आत्म- िक्ष

होता है, क्य िक तब मन िकसी

ात का,

अंत हो जाता है , मन

पहले

अपेक्षा

ात

है । केवल तभी, अनामंितर्त ही, सत्य आप तक आ

की

अिधक

संतोषजनक

का

अनु सरणमातर् करता है।

हो जाता

सकता है ।

जब मन सत्य खोजता है, तो वह अपना ही क्षेपण

सत्य न तो आपका है, न मे रा। आप इसकी

खोज रहा होता है, सत्य नहीं। अंततः हमारा आदशर् हमारा ही

ात से पू णर्तया िर

ात का

उपासना नहीं कर सकते। जो सत्य अयथाथर् ही होता है। कोई

क्षेपण होता है, वह का पिनक, अयथाथर्

ात होता है, वह

तीक यथाथर् नहीं है, छिव

होता है। जो है वही यथाथर् है, उसका िवपरीत नहीं।

या ितमा यथाथर् नहीं है। िकन्तु जब व की समझ होती

परंतु वह मन जो अपनी दृि

से यथाथर् को खोज रहा है,

है, व का अंत होता है, तब शा त का आिवभार्व होता

ई र को खोज रहा है, वह

ात को ही खोज रहा है।

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

है। 18


कबीर की दृि -1 अली सरदार जाफ़री

अली सरदार जाफ़री (1913-2000) का जन्म उ र दे श के ग डा िज़ले म हु आ। ारंिभक िशक्षा गावं म ही मुि लम िव िव ालय

कर

ातक

तर की िशक्षा के िलए उन्ह ने अलीगढ़

वेश िलया, gh 1936 म राजनैितक कारण से िव िव ालय छोड़

िदया। वहीं उनकी मुलाकात मजाज़ लखनवी, जॉिनसार अ तर,

वाजा अहमद अ बास

आिद से हु ई। वे जोश मलीहाबादी, िजगर मुरादाबादी, और िफराक गोरखपुरी से भी भािवत थे। उनकी ग़ज़ल का पहला संगर्ह परवाज़ 1943 म

कािशत हु आ। अन्य

कृितयाऱँ नई दु िनया को सलाम (1946), खून की लकीर (1949), अ

का िसतार

(1950), एिशया जाग उठा (1951) पत्थर की दीवार (1953), एक ख्वाब और (1964), पैरहन-ए-शायर (1965) और लहू पुकारता है (1978) म जाफ़री ने कबीर, मीर, ग़ािलब और मीराबाई की रचनाओं के भी िव ज़ाफरी जी को 1969 म भारत सरकार

ारा प

कािशत हु ईं। अली सरदार

ापूणर् संकलन तैयार िकए ह।

ी से स मािनत िकया गया। इसके अितिर

अकादमी पुर कार, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पुर कार, मध्य दे श सरकार का इकबाल स मान, महारा ाने र पुर कार

उन्ह उ र दे श सरकार

ारा संत

दान िकए गए।

अली सरदार जाफ़री गितशील सािहत्यकार आंदोलन म सिकर्य रहे पर साथ ही वेदातं और सूफी िवचारधारा की ओर उनका बहु त गहरा रुझान था। भारत की सामािसक सं कृित के वे एक जीते-जागते उदाहरण थे। यहा ँ िदया जा रहा अंश उनकी पु तक कबीर बानी की भूिमका से संक्षेप के साथ संकिलत है।

महान किवता की यह अनोखी िवशेषता है िक बहु धा वह अपने रचियता से असंब

के कारनामे इितहास की िकताब म बंद ह और किवय

हो जाती है। िफर

के कारनामे िदल के अंदर पीड़ा और उ ास की लहर

उसके अि तत्व से किव का अि तत्व पहचाना जाता है

बनकर उतर गए ह। ल मी और सर वती की ित ं ि ता

क्य िक उसके जीवन के हालात बीते हु ए समय के

म जीत सर वती की हु ई । यह बात शायद पुराने इितहासकार

धुध ँ लके म खो जाते ह और घटनाएँ कहािनय का रूप धारण कर लेती ह।

को नहीं

मालूम थी िक इितहास केवल घटनाओं का वणर्न नहीं

इितहास िलखने की पुरानी कला चूिँ क बादशाह ,

बि क सामािजक और आिर्थक संबध ं के पिरवतर्न की

पुरोिहत और सूरमाओं के िगदर् घूमती थी और उन्हीं की

कहानी भी है, और िवचार और चेतना की गित की भी।

गाथाओं को अपनी पूँजी समझती थी, इसिलए उसने

इस वातावरण म आते-जाते पातर् परछाइय की तरह

हमे शा िवदर्ोिहय , किवय और कलाकार की उपेक्षा की

घूमते रहते ह और अगर परछाइय का नाम लोग भूल

और िसफ़र् दं ड और पुर कार के िक से बाक़ी रहे ।

भी जाएँ तो कोई फ़कर् नहीं पड़ता। िवचार और चेतना

लेिकन समय का

की गित जारी रहती है। यही कारण है िक पिरि थितय

ितशोध बड़ा कर्ूर होता है। बादशाह

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

19


कबीर की दृि

और घटनाओं का कबीर, स

-1

और तारीख का कबीर,

अंत म जेठ की पूिर्णमा को सोमवार के िदन िनकलती है।

िज़न्दा नहीं है, लेिकन िवचार और चेतना का कबीर,

इस आधार पर 1398 ई. उनके जन्म का वषर् माना गया

भावनाओं और अनु भिू तय का कबीर, किवता और गीत

है। उनकी मृत्यु का वषर् 1518 ई. भी कबीरपंिथय के

का कबीर िज़न्दा है। हर दोहा उसका अि तत्व है, हर

एक

िस

दोहे के आधार पर मान िलया गया है।

अपनी जात के बारे म कबीर ने यादातर ‘जुलाहा’

पद उसका यि त्व, हर िवचार उसकी ज़बान है। और जब हम उसके बोले हु ए श द को दोहराते ह तो कबीर

श द का

का साज़ बजने लगता है। शाही फ़रमान और डं को की

कमीना भी कहा है। उ री भारत म अब भी िहन्दू बुनकर

आवाज़ गूग ँ ी हो जाती ह और कबीर के िदल से िनकलने

कोरी कहलाते ह और नीच समझे जाने की वजह से

वाले अनाहत नाद से आत्मा म त हो जाती है। पंिडत का

उन्ह कमीन या कमीने की सं ा दी जाती है। (मुि लम

मंतर् और मु ा की अज़ान आसमान के स ाटे म गुम हो

जुलाह ने अपने िलए मोिमन का श द चुन िलया है

जाती है और कबीर की

िजसका कबीर के युग म पता नहीं चलता।) इससे ऐसा

ेम-वाणी धरती के सीने म

धड़कती रहती है।

लगता है िक कबीर के जीवनकाल के आसपास ही कोिरय के एक बहु त बड़े वगर् ने इ लाम धमर् अंगीकार

महत्त्व इस बात का नहीं है िक कबीरदास जुलाहे के बेटे थे या िकसी

योग िकया है और कभी-कभी कोरी और

ा णी के पेट से पैदा हु ए थे और

िकया था।

जुलाहे के घर म उनका लालन-पालन हु आ था। महत्त्व

कोिरय और जुलाह की बि तया ँ पंजाब से बंगाल

इस बात का है िक रामानु ज (बारहवीं शता दी) की

तक के इलाके म फैली हु ई ह। पूरे-पूरे क बे उनसे

िवचारधारा और रामानंद (चौदहवीं और पंदर्हवीं

आबाद ह। उ री भारत म िबहार और बंगाल तक तुक

शता दी) के िवचार से, जो उसी कर्म की एक बड़ी

का शासन बारहवीं शता दी के अंत म पृथ्वीराज की हार

कड़ी थे, कबीर के िवचार का क्या संबध ं हैऱ भि

(स

के

अंत ार्न का तस वुफ़ के िवजुदान [खोज]— से क्या

1192 ई.) के साथ पहु ँचा। 1199 ई. म क़ुतु बु ीन

ऐबक़ ने बनारस पर िवजय

की और उसके फ़ौरन

संबध ं है। ईरान के सूफ़ी शायर अ ार, रूमी और

ही बाद मुह मद बि तयार ने िबहार को अपने अधीन

हािफ़ज़ के िवचार ने िहन्दु तान की िवचारधारा को

िकया और नालंदा के िव िवख्यात िव िव ालय को

िकस हद तक भािवत िकया है, उनके मू य म िकतनी

तहस-नहस कर िदया, बौ

समानता है और इन

वाह की बहती हु ई गंगा-जमुना

िभक्षुओं को कत्ल कर िदया

और िकताब को आग लगा दी। इस तरह बौ

धमर्,

ास बहु त पहले से आरंभ हो गया था और

का कबीर की किवता म िकतना सुन्दर संगम होता है।

िजसका

केवल इसी तरह भेदभाव और घृणा की वे दीवार िगराई

आठवीं शता दी तक िजसका

जा सकती ह िजन्ह कबीर ने ढा िदया था लेिकन उनके

बारहवीं शता दी के अंत मे लगभग िब कुल िमट गया

बाद की पीिढ़य ने उन्ह िफर ऊँचा उठा िदया। इस बात

और नालंदा के बचे-खुचे िभक्षु नेपाल और ित बत की

पर लड़ने-मरने वाले िक कबीर लुग ं ी पहनते थे या धोती

ओर चले गए। (बौ

बाधते ँ थे, यह भूल जाते ह िक वा तिवकता व

बौ

ास पूरा हो चुका था,

धमर् वहा ँ पहले पहु ँच चुका था।)

धमर् के इस शोचनीय पराभव के बाद भारत के

नहीं, नग्नता म है। िजसने अथर् के शरीर से श द के पद

नीची जात के अछूत के िलए इ लाम की ही शरण रह

हटा िदये ह , और राम और रहीम को एक कर िदखाया

गई थी। इसिलए इस युग म पूवीर् बंगाल के गाव-क ँ े -गावँ

हो उसको सूत और कपास के व

अपना बौ

और उस व

पहनाने की कोिशश

की िभ ता पर मतभेद और घृणा फैलाना

धमर् छोड़ कर मुसलमान हो गए। लेिकन तुकर्

शासक ने, जो मुसलमान से बढ़ कर िवजेता और

िकतना हा या पद मालूम होता है!

शासक थे, और अपने वगर्-िहत को धमर् की तुलना म

कबीरदास के जन्म और मृत्यु की ितिथय के बारे

धानता दे ते थे, इ लाम पर ईमान ले आनेवाले शािसत

म िव ास के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। बस इतनी

को बराबरी का दजार् नहीं िदया। वे कोरी से जुलाहे हो

बात िनि त है िक पन्दर्हवीं शता दी कबीर की शता दी

जाने के बाद भी कमीने ही समझे जाते थे। इसिलए

है। उनके एक चेले धमर्दास का एक दोहा बताया जाता

उनके आिख़री आ य भि

है िजसके अनु सार कबीर की जन्मितिथ संव

बन गईं, और इन दोन ई रपरायण और मानव- ेमी

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1455 के 20

और तस वुफ़ की ेमनगिरया ँ


कबीर की दृि

-1

आंदोलन का बहु त ही सुद ं र समन्वय कबीरदास और

संपि

उनकी किवता के रूप म

इन महापुरुष

कट हु आ।

िनधर्नता तो कबीर का जन्मिस मगर भ

अिधकार था,

के बंधन इस ेम म कमी कर सकते थे । इसिलए

और सूिफ़य ने उसे माया-त्याग का दाशर्िनक

रूप दे कर कर्ािन्तकारी बना िदया। बा

ने माया-त्याग को अपनी िशक्षा का

आधारभूत तत्त्व बनाया। कबीर ने अपनी इस वगर्-ि थित को कभी नहीं

धमर् शासक के

भुलाया। इसिलए जब माया सोलह िंसगार करके और

पक्ष म था जो सारी संपदा के वामी थे, और मािर्मक धमर्

अपनी म त आँख के साथ किव के सामने आती है और

अथार्

और सूफ़ी मत ने जनता का साथ िदया जो

उसे अपना भतार्र (पित) कहकर संबोिधत करती है तो

मजीवी थी। यह बात िदलच प है िक

वे उससे कहते हऱ “हमारी जात जुलाहे की है और नाम

भि

िनधर्न और

यादातर सूफ़ी संत और भ

कबीर है। हम तो कभी िकसी ने पूछा नहीं। तुम वहा ँ

और उनके अनु यायी

द तकार के वगर् से संबध ं रखते थे। धमर् के बा

रूप के

जाओ जहा ँ त त िबछे हु ए ह, बाग सजे हु ए ह, अनाज

मु ा, क़ाज़ी, पंिडत, पुरोिहत आिद बहु त महँगे थे जो

के बोरे भरे हु ए ह, रे शम की भरमार है, अगर और चंदन

धािर्मक कमर्काडं के जाननेवाले थे और शासक की

िघसा जा रहा है। हमारे पास आकर क्या करोगी। हम तो

स ा पर ख़ुदा और भगवान की वीकृित की मुहर लगाते

कमीन की जात से संबध ं रखते है।”

थे। (ऊँच-नीच ई र की दे न है। राजा पृथ्वी पर ई र

. . . जाित जुलाहा नाम कबीरा, अजहु ँ पतीजौ नाहीं।

का रूप है, आिद।) लेिकन धमर् के आंतिरक रूप के नेता

तहा ँ जाहु जहा ँ पाट-पटं बर अगर चंदन घिस लीना।

या गुरु फ़कीर और िभक्षु थे। उनके शरीर पर गेरुवा व

आइ हमारे कहा करौगी, हम तो जाित कमीना। . . .

होता था या शायद वह भी नहीं होता था। हाथ म भीख

एक और पद म उन्ह ने माया को, जो स ाधारी

के याले, िदल म पीड़ा की ज्योित और होठ पर ेम के

वग की लोलुपता का

श द। वे िव ान नहीं थे, ममर्

िजसके होठ पर मीठे बोल ह और हाथ म फासी ँ का

थे। बुि वाले नहीं थे,

ेमवाले थे। उनके पास न मंिदर थे, न मि जद, न बड़ी-

फंदा।

बड़ी जायदाद। उनके पास िकताब भी नहीं थी। िसफ़र्

माया महा ठगनी हम जानी।

िदल था। वे हर मनु य को िसफर् यही उपदे श दे ते रहते

ितरगुन फािस ँ िलए कर डोले, बोले मधुरी बानी।। यहा ँ कबीर की माया की क पना को समझने के

थे िक ई र ेम है और ेम ई र है। मनु य का ेम ई र का ेम है। और यह िशक्षा और उपदे श वे मु त दे ते थे।

िलए ज़रूरी है िक शंकराचायर् (8वीं शता दी) के अ ै तवाद और उनके टीकाकार रामानु ज (1175 ई. से

महान किवता की यह अनोखी िवशे षता है िक बहु धा वह अपने रचियता से असं ब

1250 ई. तक) के िविश ा ै तवाद के सू म अंतर को

हो

ध्यान म रख िलया जाए।

जाती है । िफर उसके अि तत्व से किव का

दोन आचायर् उपिनष

अि तत्व पहचाना जाता है क्य िक उसके जीवन

िक सबकुछ

के हालात बीते हु ए समय के धुँ धलके म खो

की

कर ले ती ह।

)। लेिकन इस दू सरे सूतर्

याख्या करते समय दोन अलग-अलग िदशाएँ

चमकदार तलवार महान यापक िंचतन की तेज़ी का

और सूिफ़य

पता दे ती है, और दू सरे के यहा ँिदल की धड़कन अनािद

ने इस वगर्- े ष के

और अनंत सत्य म मानव आत्मा की उ णता पैदा करती

मुकाबले पर इन्सानी िबरादरी और मुह बत का ल य सामने रखा। शासक के िलए सासािरक ं समृि ित ा की कसौटी थी। भ

के िलए मनु य के उ

है।

ही

शंकराचायर् का कहना यह है िक चूिँ क

और सूिफ़य

थान का मापदं ड भि ,

और इ क़े-हक़ीक़ी (पारलौिकक मज़ाज़ी (लौिकक

) और आत्मा और

अपनाते ह। एक के यहा ँ नीरस दाशर्िनक िवचार की

वगर्- े ष के िबना शासक शासन नहीं कर सकते

सामािजक

की इस िशक्षा को मानते ह

है (सवर् खि वदं

एक ह (अयं आत्मा

जाते ह और घटनाएँ कहािनय का रूप धारण

थे , लेिकन भ

तीक है, ‘महा ठगनी’ कहा है

सत्य है इसिलए माया (भौितक जग ) का अपना कोई

ेम

अि तत्व नहीं है। वह केवल िमथ्या है। इसको उन्ह ने

ेम), और इ क़े-

अ ै त कहा है (अथार्

ेम) था। धनदौलत का मोह, और

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

ही

21

एक होने का वह भाव िजसम दो


कबीर की दृि

-1

के िलए कोई थान नहीं है)। लेिकन रामानु ज का कहना

जाए और अपनी मुि

यह है िक

, आत्मा और माया (संसार) अलग-अलग

िववािहत थे और उनके संतान भी थी। करघे पर ख़ुद

पहचाने अव य जाते ह लेिकन वा तव म अलग-अलग

कपड़ा बुनते थे और फेरी लगाकर उसे बेचते थे और

नहीं ह क्य िक आत्मा और माया दोनो ह। अथार्

के िवशेषण

के िलए समािध लगा ले। वे वयं

उसकी आमदनी से अपना और अपने बाल-ब

शंकराचायर् इन गुण को वीकार नहीं करते

का पेट

पालते थे। उनका भौितक और शारीिरक

म उनके

और रामानु ज सगुण को ही मानते ह। इस दशा म

आत्मा-संबध ं ी गीत की रचना म बाधक नहीं होता था

का एकत्व बाकी रहता है लेिकन साथ ही साथ आत्मा

बि क शायद उसम योग दे ता था। उनका आगर्ह था िक

(जीव) की वा तिवकता और यथाथर्ता भी बाकी रहती

भगवान इसी संसार म िमलता है। मुि

है। इसको िविश ा ै त कहा गया है।

होकर गुज़रता है, और माया, जो महा ठगनी है और कर्ूर िशकारी है, भ

शंकराचायर् के यहा ँ एकत्व म अनेकत्व के सवाल

की दासी बन सकती है।

माया तजी नहीं जाती, तजी जा नहीं सकती

को याख्याओं की आव यकता पड़ती है और रामानु ज के यहा ँ वह किवता और गीत के

का मागर् यहीं से

क्य िक वह िकसी-न-िकसी रूप म बाकी रहती है।

ार खोल दे ता है और

र् के िनगुण र् के आगे सगुण नाचने लगता है। गुण िनगुण

असल म माया पर िवजय

की जाती है। िजस तरह

ोतक बन जाते ह और अनलहक़ का साज़ बजने

पूजा-पाठ, नमाज़-रोज़ा, कमर्काडं से केवल अहं कार

लगता है (बाजै सोहं तूरा)। शंकराचायर् के यहा ँ ई र

बढ़ता है लेिकन भगवान नहीं िमलता, वैसे ही कपड़े

अवैयि क है और रामानु ज के यहा ँ वैयि क। इसिलए

उतार दे ने से या अपनी पाचँ इंिदर्य का दमन कर दे ने

एक की भि

नीरस और शु क है और दू सरे की रसमय

से भगवान नहीं िमलता। माया वहा ँ भी पीछा नहीं

और रंगीन। वहा ँ शून्य की िन त धता है और यहा ँ माया

छोड़ती। हिर उस पर रीझते ह िजसके हृ दय म दया है,

की हलचल जो संत और भ

जो सदाचारी है, जो संसार म रहकर संसार से उदासीन

किवय के यहा ँ याकुलता,

यगर्ता और मादकता का संगीत बन जाती है और उन्ह

रहता है और हर

ाणी को अपनी तरह जानता है,

उसको वह अिवनाशी िमलता है।

जलालु ीन रूमी और हािफ़ज़ शीराज़ी के िनकट ले आती है। शंकराचायर् के यहा ँ गैर-िहन्दू िवचार का

साईं से इस तरह की लगन लगाना बहु त किठन

िम ण किठन है और रामानु ज की िवचारधारा म बहु त-

है। इसके िलए वभाव म िवन ता और संतोष आव यक

सी धाराएँ िमल सकती ह। इसिलए कबीर के यहा ँ यह

है। और सारी बात को कबीर ने अंत म यह कहकर

िम ण

समा

िदखाई दे ता है (लेिकन कबीर को सौ

से कोई फ़ायदा नहीं है। सौ बात की एक बात यह है

फ़ीसदी रामानु ज का चेला समझना सही नहीं है।) जीव और माया को

िक इस शरीर के िबना श द, कलमा, नाम, अनाहत

से अलग पहचानने के

नाद कुछ भी संभव नहीं है। मनु य और सृि

बाद जीव को तुच्छ और माया को यथर् नहीं माना जा सकता। इस यि

कार जीव के महत्त्व को वीकार करना

है और गोिवन्द की शि

की महानता को वीकार करना है और वह यि

िजसम हमने

का यह महत्त्व सामंती समाज के संबध ं पर

अपना और शि

भाव डालता है िजसम

कतर् य से उऋण होना मुि

को माना जाता था, और एक नए मानव- ेम

किव इस चेतना और अनु भिू त म कबीर के िनकट नहीं

की

पहु ँचता।

जाती है, उसे बरता जाता है और कबीर के श द म वह हिर-भ

सरगुन की सेवा करो, िनरगुन का करो

की चेरी (दासी) बन जाती है।

ान।

िनरगुन सरगुन के परे , तहीं हमारा ध्यान।।

कबीर के यहा ँ माया-त्याग है, लेिकन उसका अथर्

(अगले अंक म समा य)

यह नहीं है िक मनु य केवल अपने-आप म खोकर रह ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

के िलए ज़रूरी है, कबीर

के यहा ँ पूरा आभास िमलता है। शायद कोई दू सरा भ

का संबध ं थािपत करता है। अब माया को तज दे ने का ा

ान-ध्यान का दीपक जला रखा है।

इस िम ी की दु िनया का, िजसके दाियत्व और

े ता का मापदं ड धन

सवाल पैदा नहीं होता बि क उस पर िवजय

सब िम ी

(माया) उसको बनाती-

िबगाड़ती रहती है। हमारा शरीर एक िम ी का मंिदर है

शूदर् भी हो सकता है और ा ण भी और मुसलमान भी। यि

कर िदया िक दे खो पाडें , बेकार के वाद-िववाद

22


मानिवकी के क्षे तर् म उ

िशक्षा और अनु संधान

( ो. हरीश ितर्वेदी से साक्षात्कार) ो. हरीश ितर्वेदी िद ी िव िव ालय के अंगर्ेज़ी िवभाग म ोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाश गर्हण करने के बाद उसी िव िव ालय के आजीवन िशक्षा सं थान म परामशर्दाता के रूप म कायर्रत ह। ो. ितर्वेदी अंगर्ेज़ी सािहत्य के िव ान होने के साथ सं कृत और िहन्दी सािहत्य म और भारतीय दशर्न म भी गहरी रुिच रखते ह। वे िशकागो और लंदन िवि िव ालय म िविज़िंटग ोफ़ेसर के रूप म कायर् कर चुके ह। अनु वाद की कला के िवषय म उनका िवशेष अध्ययन और योगदान है। उनकी उ ेखनीय पु तक म Colonial Transactions: English Literature and In-

dia, The Nation across the World: Postcolonial Literary Represen-

tations (सह संपादक), Literature and Nation: Britain and India 18001990, Post-colonial Translation: Theory and Practice, Theory, Text and Context सि मिलत ह।

Interrogating Post-colonialism:

ो. ितर्वेदी उन िगने-चुने िव ान म से है जो दे श की वतर्मान बौि क िगरावट से िचिन्तत ह। उनके अनु सार इस िगरावट का सबसे बड़ा कारण अपने दे श म अंगर्ेज़ी का बल वचर् व और भारतीय भाषाओं की उपेक्षा है। उनके श द म "हम यह बहु त बड़ी गलतफहमी है िक हम अंगर्ेज़ी आती है। अंगर्ेज़ी म हम उथले तर का ही काम कर सकते ह, उसम गहन िचन्तन नहीं कर सकते। भारत म शायद ही कोई िव ान हो जो सवर्था शु

अंगर्ेज़ी िलखता

हो।" अंतरार् ीय ख्याित के अंगर्ेज़ी के ोफ़ेसर के ये श द यिद हम िचन्तन के िलए बाध्य नहीं करते तो इसका अथर् है िक हम सवर्था िचन्तनहीन दे श बनते जा रहे ह। ो. ितर्वेदी दे श की वतर्मान िशक्षा- णाली के बारे म भी िचिन्तत है। उनके अनु सार इस

णाली म आमूलचूल

पिरवतर्न की आव यकता है। उनके हृ दय की पीड़ा पितर्का के संपादक के साथ हु ए इस साक्षात्कार म बहु त उभरकर सामने आई है। संपादकऱ (बाद म सं.) आपकी दृि

म िशक्षा का उ े य

सतत तर उसके पास हो। और आव यक है िक िशक्षाथीर्

क्या हैय़

की िशक्षा उसके साथ रहे । आजकल ऐसा नहीं होता।

ो. हरीश ितर्वेदीऱ (बाद म ह.ितर्.) िशिक्षत यि

को

सं.ऱ इसका कारण क्या हैय़

स य होना चािहए। उसे लगे िक उसे और के साथ इस

ह.ितर्.ऱ इसका मुख्य कारण है िक आज का िव ाथीर्

तरह रहना है िक समाज म सामंज य रहे । साथ ही,

िशक्षा

िशिक्षत वह है िजसके

तर हो।

के िलए पढ़ता है। उसका सारा ध्यान पु तक और

उसने जो भी िवषय पढ़ा है उसका िवशेष रूप से तथा

कुंिजय पर रहता है। परीक्षा पास करते ही वह भूल जाता

ान का एक सतत

सामान्य रूप से अन्य िवषय के ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

करने के िलए नहीं अिपतु परीक्षा पास करने

है िक उसने क्या पढ़ा था। सं कृत म एक उि

ान का एक थायी व 23

हैऱ


मानिवकी के क्षेतर् म उ

िशक्षा और अनुसं धान

पु तक था तु या िव ा परह तगतं धन ।

बन सकताय़ क्य िक हमारे युवाओं को कोई भिव य

कायर्काले समुत्प े न सा िव ा न त न ।।

िदखाई नहीं दे ता, इसिलए वे िबना िकसी योजना या

(जो िव ा पु तक म ही रहती है और जो अपना

उ े य के िडिगर्या ँ हािसल िकए चले जाते ह।

धन दू सर के हाथ म होता है, आव यकता पड़ने पर न

सं.ऱ मानिवकी के अध्यापन के क्षेतर् म वतर्मान ि थित को

तो वह िव ा काम आती है और न ही वह धन।)

सुधारने के िलए क्या िकया जा सकता हैय़

तो िशक्षा इस

कार की होनी चािहए िक सीखी

ह.ितर्.ऱ मानिवकी का मूल

योजन मनु य-जीवन को

हु ई बात िव ाथीर् के साथ रहे । इसका अथर् हु आ िक

समझना और मनु य को पास-पास लाना है। सािहत्य

उसने केवल पढ़ाई ही न की हो, पढ़ी हु ई व तु को गुना

श द की अनेक कार से याख्या की गई है। कुछ िव ान

भी हो, आत्मसा

इसे ‘िहत’ से बना हु आ मानते ह। मे रे िवचार से सािहत्य

िकया हो।

सं.ऱ मानिवकी म उ

िशक्षा का क्या अिभ ाय हैय़

म मूल श द ‘सह’ है। सािहत्य के

ारा हम एक दू सरे के

ह.ितर्.ऱ मानिवकी म िशक्षा का िव तार तो समझ म आता

िनकट आते ह। एक दू सरे की भावनाओं को समझते ह।

है। यिद कोई िहन्दी के सािहत्य से पिरिचत ह और वह

सािहत्य का अध्ययन करते हु ए हमारी भावनाओं का

सं कृत, अंगर्ेज़ी,

साधारणीकरण होता है।

च, तिमल आिद के भी सािहत्य से

पिरिचत हो तो उसके सािहित्यक

ान का िव तार

सािहत्य का अध्ययन आव यक है तािक हम

होगा। यिद कोई एक दे श का इितहास जानता है और

जीवन के बारे म जान सक, जीवन के बारे म कुछ सीख

िफर दू सरे दे श के इितहास का उसके

करता है तो

सक। दू सरे िजस दु ःख-सुख का अनु भव कर रहे ह

ान म िव तार तो होगी पर उ ता कहा ँ से

ान

सािहत्य हम उसका अनु भव कराता है। सािहत्य के पढ़ने

आएगीय़ िव ान म अव य ही उ ता होती है। गैिलिलय

से हमारी सीिमत दृि

के

ान से न्यूटन का और न्यूटन के

का िव तार होता है। यह जानकर

ान से आइन् टाइन

िक और पर भी दु ःख आता है हमारा दु ःख कम हो जाता

है, पर मानिवकी म उ ता

है। हमारा दु ःख मानो बँट जाता है। सहानु भिू तऱ जो सह-

का अथर् क्या होगाय़ एक दाशर्िनक िचन्तन को दू सरे

अनु भिू त हैऱ वही सािहत्य की आत्मा है। अंगर्ेज़ी सािहत्य

का

ान िनि त रूप से उ

दाशर्िनक िचन्तन से कैसे उ उ

िस

करगेय़

का िव ाथीर् रहा हू ँ तो डा. जॉनसन की उि

तो हमने अंगर्ेज़ी के ‘हाई’ से बना िलया है।

बहु धा याद

आती हैऱ “सािहत्य के अध्ययन से जीवन का सुख बढ़

िव ालय की िशक्षा के बाद की जो कक्षाएँ होती ह

जाता है, दु ःख सहनीय हो जाता है।”

उनकी िशक्षा उ

सं.ऱ मानिवकी के िशक्षण म, उदाहरण के तौर पर

मान ली जाती है। इस कार िव ालय

से आगे बी.ए. की और उसके आगे एम. ए. की पढ़ाई

सािहत्य के िशक्षण म, िकस

हय़

है। पर मानिवकी म यह आव यक नहीं िक जो बाद

कार के सुधार वाछनीय ं

म पढ़ा जा रहा है वह पहले पढ़े हु ए से तुलनात्मक दृि

ह.ितर्.ऱ इसके िलए आव यक है िक हमारे िव ाथीर्

से उ

अिधक से अिधक पढ़। हमारे यहा ँ पढ़ने को

ही हो।

सं.ऱ पर क्या आप नहीं सोचते िक उ

िशक्षा के नाम पर

ोत्साहन

नहीं िदया जाता। उदाहरण के िलए यिद ‘गोदान’ कोसर्

जो हो रहा है उसके बारे म कुछ िकया जाना चािहएय़

म है तो छातर् केवल उसे ही पढ़गे, उनसे ‘रंगभूिम’ के

आजकल ऐसा लगता है िक महािव ालय

और

बारे म पूछा जाए तो वे कुछ नहीं बता पाएँगे। बहु त बार

िव िव ालय म हमारे ब े वा तव म िशिक्षत नहीं हो

वे कोसर् की पु तक भी नहीं पढ़ते, कुंिजय से ही काम

रहे ।

चला लेते ह, और खेद की बात है िक उन्ह परीक्षा म

ह.ितर्.ऱ हमने बी.ए. और एम.ए. का मज़ाक बना िदया

अच्छे अंक भी िमल जाते ह।

है। हम बी.ए., एम.ए. थोक भाव पर िनकाल रहे ह।

क्य िक िव ाथीर् अपने

ानवधर्न के िलए अपनी

िशक्षा को लेकर पहले तो हम यह समझना है िक

ओर से कुछ नहीं पढ़ते इसिलए उनम आत्मिव ास नहीं

िशक्षा सबके िलए नहीं है। यहा ँ िकसी भी नौकरी के

पैदा होता। हम एक दे श के रूप म आत्मिव ास खोते

िलए बी.ए. चािहए। िकसी को

कर् बनना है तो भी उसे

जा रहे ह। हम अपने पर भरोसा नहीं है, अपनी बुि

पर

बी.ए. होना चािहए। पर क्य य़ उ तर माध्यिमक

भरोसा नहीं है। मे रे पास कई वषर् तक अमे िरका से कुछ

िव ालय तक की िशक्षा

छातर् पढ़ने के िलए आते थे। उनके अध्ययन का िवषय

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कर कोई

कर् क्य नहीं 24


मानिवकी के क्षेतर् म उ

िशक्षा और अनुसं धान

सारा जीवन लगा सकता है। पर मानिवकी म सभी िवषय

उपिनषद से लेकर आधुिनक सािहत्य तक था। म उन्ह

पर पर संब

पढ़ने के िलए कुछ सामगर्ी बताता था और िफर उन्ह कक्षा म उसके बारे म बोलने के िलए कहता था। वहा ँ

इितहास हम मानव जीवन के बारे म परोक्ष दृि

कक्षा म होड़ मचती थी अपनी बात कहने के िलए। जो म पढ़ने के िलए कहता था वे उसके अितिर

सं.ऱ इसी

भी लाइ ेरी से खोजकर पढ़ते थे और पढ़ी हु ई चीज़ पर

से पिरिचत होना आव यक नहीं हैय़

ह. ितर्.ऱ कई लोग को भारतीय दशर्न नाम से ही िचढ़

मने िशकागो िव िव ालय म दो बार पढ़ाया है।

हो जाती है, बि क कुछ को तो ‘भारतीय’ नाम से ही

अमे िरका की बहु त-सी बात गलत ह पर जो वहा ँ अच्छा

िचढ़ हो जाती है। वे मानते ह िक हमारे ���हा ँ सभी कुछ

है उसे हम वीकार करना चािहए। वहा ँ के िव ािर्थय म

पि म से आया है। ऐसे बहु त-से लोग हमारे आसपास

को

िवचरण कर रहे ह। तो उनसे कह िक तुम पि म को ही

टर्ेिंनग ही नहीं िमलती िक िनधार्िरत पाठ िबना पढ़े कक्षा

अच्छी तरह पढ़ो और उसीके अनु रूप कुछ िचन्तन करो,

म आना पाप है।

पर कुछ तो करो।

हमारे यहा ं बड़े -बड़े लोग भी अपनी ओर से सोच

सं.ऱ क्या आपको लगता है िक हमारी कुछ िशक्षा

नहीं सकते। िकसी भी िवषय पर बात कीिजए, वे तुरंत

मौिखक होनी चािहएय़ उदाहरण के िलए, स ाह म एक

िकताब दे खने लगगे। उन्ह ने कभी अपने आप सोचा ही

िदन कक्षा म केवल मौिखक चचार् हो, िशक्षक और

नहीं है। िशक्षा का सबसे बड़ा योजन यह है िक वह हम

िव ािर्थय म िकसी के पास कोई पु तक न होय़

िसखाए िक हम वयं कैसे सोच। हमारे मौिलक िचन्तन

ह.ितर्.ऱ

का अभाव िव ान के क्षेतर् म भी िदखाई दे ता है। हमारी

होना तो ऐसा अव य चािहए। आपकी बात

िब कुल सही है। कई

िशक्षा की सं थाएँऱ आईआईटी, आईआईएम, हमारे

ाध्यापक अपने पुराने नोट्स का

िडक्टे शन दे कर पढ़ाते रहते ह। मौिखक अध्यापन सोचने

मे िडकल कॉलेज, एक भी बड़ा नया अिव कार नहीं कर

के िलए िववश करे गा।

पाए। हमारी साइंस की बड़ी सं थाओं का भी संसार म

सं.ऱ आज की िशक्षा म िव ाथीर् को अपनी ओर से सोचने

कोई स मान नहीं है।

की छूट नहीं है। सािहित्यक रचना की याख्या िव ाथीर्

सं.ऱ मानिवकी के िशक्षण के संबध ं म कुछ कहगेय़

अपनी ओर से नहीं कर सकता और न इितहास की

ह.ितर्.ऱ पढ़ाने का तात्पयर् केवल छातर् तक जानकारी

घटनाओं की। उसे हर चीज़ को अध्यापक की दृि

पहु ँचाना नहीं है जैसािक आजकल हो रहा है। आप याद

के

अनु सार समझना है और उसके अनु सार परीक्षा म

कर िक हमने अपने िशक्षक से क्या सीखा। जो उन्ह ने

िलखना है।

हम पढ़ाया उसका एक खाका रह गया है मन म। मने ातक

संग म, क्या मानिवकी के अध्ययन के िलए

भारतीय दृि

अपनी ओर से सोचते थे और बोलते थे।

दे ता है,

उसे पढ़। मनोिव ान पढ़, दशर्न पढ़।

पु तक

पढ़ने की रुिच पैदा की जाती है। हमारे यहा ँ ब

ह। जैसे ेमचन्द को पढ़ते हु ए उस समय

का इितहास पढ़, तुलसी के समय का इितहास पढ़।

ह.ितर्.ऱ ि थित ऐसी ही है। िव ाथीर् मानता है िक जो

तर पर इलाहाबाद िव िव ालय म वेद व

पढ़ाया गया है परीक्षा म वही िलखना है। पहले मरे

उपिनषद के अंश भी पढ़े थे। उनका मुख्य भाव ही रह

िव ाथीर् काल म अपनी ओर से भी कुछ सोचने व िलखने

गया है मन म। पर सबसे बढ़कर जो मुझे याद आता है

की गुज ं ाइश थी। पर आज अपनी तरह से सोचना और

वह यह िक कौन-सा अध्यापक िकतना द िचत होकर पढ़ाता था, कौन िकतना अनु शािसत था। उन्ह ने अध्ययन

अपने िवचार य

के जो मू य िदए वे अभी भी याद ह। बाकी तो केवल

ही लोग ऐसा कर पाते ह। पर िचन्तन तो मौिलक ही

सूचना है जो कहीं से भी ा की जा सकती है। जो मू य

होना चािहए। दू सर की बात तो कोई मंदबुि

उन्ह ने िदए, जो उदाहरण सामने रखे, वह याद आता

सकता है।

है। बाकी तो सूचना है।

सं.ऱ क्या भाषाओं के क्षेतर् म दू सरी भाषाएँ सीखने और

सं.ऱ मानिवकी के अध्ययन के क्षेतर् म यापकता और

उनके सािहत्य के अध्ययन से िव ािर्थय के

गहराई िकस

कार लाई जा सकती हैय़

करना बड़े जोिखम का काम है। कुछ भी दोहरा

ानवधर्न म

सहायता िमलेगीय़

ह.ितर्.ऱ मानिवकी के अध्ययन के िलए यापक दृि

ह.ितर्.ऱ अव य। भाषाएँ अलग होकर नहीं रहतीं। यिद

आव यक है। िव ान म कोई िकसी एक सीिमत क्षेतर् म

मुझे अंगर्ेज़ी के साथ लैिटन भी आती हो तो िकतना

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25


मानिवकी के क्षेतर् म उ

अच्छा है। िहन्दी सािहत्य के अध्ययन म सं कृत की

वह

ान है। िशक्षा के

ारा

िशक्षा और अनुसं धान

ान, समझ का, िवकास

परंपरा की जानकारी से अव य सहायता िमलती है।

करना

भाषाएँ पूरी तरह

नहीं होतीं। ऐसा नहीं है िक

सं.ऱ हमारे िव िव ालय म तो हज़ार िव ािर्थय की

िहन्दी आसमान से िगरी है और सबसे अलग है। और

एक साथ परीक्षा ली जाती है। ऐसी परीक्षा म जीवन के

वाय

ित गंभीर िवचार को समझने और परीक्षा-भवन म उन्ह

भाषा िसफर् भाषा ही नहीं होती, भाषा इितहास है, भाषा सं कृित है, भाषा परंपरा है। सं.ऱ हमारी िशक्षा के

अिभ य

ारा वा तव म

करने के िलए अवकाश कहा ँ हैय़

क्य नहीं

ह.ितर्.ऱ िशक्षा और परीक्षा दोन को कुछ अलग करके

के िलए पहले िज ासा का होना

सावर्जिनक परीक्षा नहीं ली जा सकती। आजकल की

ानवृि

दे खना होगा। यह सच है िक जीवन के गहन पक्ष की

होतीय़ ह.ितर्.ऱ

मुख उ े य है, जानकारी गौण है।

ान ाि

आव यक है। जब िज ासा ही नहीं होगी तो ब े पढ़गे

परीक्षा की दृि

क्य , सीखगे क्याय़ और िज ासा का तात्पयर् केवल

पूरा िकया जा सकता है। परीक्षा म क्या पूछा जाना है

जानकारी हािसल करते जाना नहीं है। जो सुन और पढ़

वह िव ाथीर् को पहले से पता है। अगर िव ाथीर् कुंजी

उसके बारे म शंका करने का भी अवसर होना चािहए।

पढ़कर ऊँचे अंक लाता है तो अध्यापक को िध ार है,

शंका होगी तभी उसका समाधान भी खोजा जाएगा।

उस छातर् को भी िध ार है, और परीक्षा- यव था तो

सं.ऱ इसके िलए आपकी दृि

धन्य है ही!

से िशक्षक और िव ाथीर् म

कैसा संबध ं होना चािहएय़

से तो िसलेबस को कुछ ही पीिरयड म

सं.ऱ पर आजकल हो तो ऐसा ही रहा है। इस ि थित को

ह.ितर्.ऱ अव य ही यह संबध ं इस

बदलने के िलए क्या िकया जा सकता हैय़

कार का हो िक

िव ाथीर् को लगे िक उसके िशक्षक उसके जीवन के

ह.ितर्.ऱ दे िखए, यह ि थित तभी बदल सकती है जब

िवकास म सहायता कर रहे ह, केवल जानकारी नहीं दे

बी.ए. एम.ए. करने वाले छातर् की संख्या म कमी हो।

रहे । िव ाथीर् िशक्षक के

कई लोग की रुिच नहीं है उ

ित आदरभाव रखे पर उससे

आतंिकत नहीं हो। सं कृत म

िशक्षा म, पर क्य िक

करने की लंबी परंपरा

उनके िलए कोई अवसर नहीं है इसिलए वे लाचारी म

है। बड़ के कथन को भी तकर् की कसौटी पर कसने के

अगली-अगली कक्षाओं म पढ़ाई करते जाते ह। हमारे

िलए ोत्सािहत िकया जाता रहा है। भतृर्हिर ‘वाक्यपदीय’

यहा ँ िद ी िव िव ालय म पाचँ लाख िव ाथीर् ह, 10

के एक

हज़ार िशक्षक ह। यह िव िव ालय है या फैक्टरीय़

ोक म कहते ह िक हम अपनी आँख से जो

दे खते ह उसे भी वैसा नहीं मान लेना चािहए। व तु को भी तकर् की कसौटी पर परखकर करना चािहए।

त्यक्ष

एम.ए. वे ही कर जो सचमुच एम.ए. करना चाहते ह,

वीकार

पीएच.डी वे ही कर जो सचमुच शोध करना चाहते ह

और तकर् करने की परंपरा आज लु

और िजनम शोध कर सकने की क्षमता है। और को

होती जा रही है। इसिलए िशक्षक और िशक्षाथीर् का

करने की क्या ज़रूरत हैय़ उनके िलए रुिच के अनु सार यावसाियक िशक्षा का

पार पिरक संबध ं आज लगभग समा हो गया है। सं.ऱ क्या

सं.ऱ कक्षा म अच्छा िशक्षण करने के िलए अध्यापक क्या

ान और सूचना म अंतर हैय़ िशक्षा के दौरान

इस अंतर को कैसे प ह.ितर्.ऱ

कर सकते हय़

िकया जा सकता हैय़

ान और सूचना म बहु त अंतर है।

ावधान हो।

ह.ितर्.ऱ पहले तो अध्यापक को वयं अपने अध्ययन को

ान अलग

है, सूचना अलग है। आज तो िशक्षा म अिधकतर िसफर्

बढ़ाना होगा। उसे वा तव म िव ा म रुिच लेनी होगी।

जानकारी ही दी जा रही है, और वह भी आधी अधूरी।

िफर आव यक होगा िक अध्यापक अपनी िव

जब से गूगल का चार हो गया है िव ािर्थय ने पु तक

अपनी छिव कायम करे तािक छातर् उसे सुनने के िलए

ा से

पढ़कर वयं जानकारी खोजना बंद कर िदया है। गूगल

तैयार ह । आज िव ाथीर् को यह लगता है िक अध्यापक

ही गुरु हो गया है। सबकी जानकारी िवकीिपिडया से हो

अपनी

रही है। अभी मुझे एक दोहा सुनने को िमलाऱ गुरु गूगल

बीच म जीवंत संबध ं कायम नहीं होता।

ूटी पूरी कर रहे ह। अध्यापक और िव ाथीर् के

दोन खड़े काके लागूँ पाय। ँ बिलहारी गुरु आपकी गूगल

सं.ऱ इसीके साथ मानिवकी म अनु सध ं ान का

िदओ बताय। जानकारी पाने के बाद मनु य जब उसपर

हु आ है। जैसे बी.ए. के बाद एम.ए. करना अिनवायर्-सा

िवचार कर उसे अपनी दृि

हो गया है, उसी

से आत्मसा

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करता है तभी 26

जुड़ा

कार उनके िलए जो कालेज और


मानिवकी के क्षेतर् म उ

िशक्षा और अनुसं धान

िव िव ालय म िशक्षण करना चाहते ह पीएच.डी.

ह.ितर्.ऱ आजकल की जानेवाली िरसचर् को दे खकर तो

करना अिनवायर् हो गया है। और क्य िक एम.ए. करने के

यही लगता है। अनु सध ं ान आज उपहास का िवषय बन

बाद बड़ा क्षेतर् िशक्षण का ही है इसिलए बहु त बड़ी संख्या

गया है।

म युवा लोग पीएच.डी. कर रहे ह। इस समय अकेले

सं.ऱ आपकी दृि

िहन्दी म दस-पंदर्ह हज़ार युवा लोग पीएच.डी. के िलए

िकस

काम कर रहे ह।

ह.ितर्.ऱ सबसे पहले तो हम साइंस का िप ू बनना बंद

ह.ितर्.ऱ िरसचर् का हमने मज़ाक बना िदया है। जब म

करना होगा। हम साइंस की दु म से ही न बँधे रह।

से मानिवकी म अनु सध ं ान के क्षेतर् म

कार का मूल पिरवतर्न आव यक हैय़

1970 के दशक म पीएच. डी. करने इं ड गया तो उस

िव ान और मानिवकी दोन के क्षेतर् अलग-अलग ह।

िवभाग म आधे से अिधक लोग पीएच.डी. नहीं थे। मे रे

साइंस म अलग तरह से शोध होता है, मानिवकी म

अपने सुपरवाइजर ने 17 साल म पीएच.डी. की थी।

अलग तरह से। यिद इतनी मोटी-सी बात हमारी समझ

अच्छा शोध-कायर् करने के िलए यापक अध्ययन की

म नहीं आती तो हमारे शोध म साथर्कता नहीं आ सकती।

आव यकता होती है। शोधकतार् पहले यह तो जाने िक

मानिवकी म शोध करने के िलए दू सरे

कार की

िकतना काम और लोग पहले से ही कर चुके ह।

िज ासा चािहए जो िव ान की िज ासा से िभ

सं. ऱ अध्ययन की यापकता के बारे म कुछ बताइए।

हमारे यहा ँ िज ासा ही नहीं है तो शोध म वा तिवक

ह.ितर्.ऱ यापकता के बारे म यह हो सकता है िक शोध-

रुिच कैसे जगेगीय़ शोध के िलए पहले गहरी िज ासा

है।

छातर् से कहा जाए िक इतना तो तुमको पढ़ना ही पढ़ना

होनी चािहए, पीएच.डी के िलए कोई वा तिवक सम या

है और िफर पढ़े हु ए को सोचकर ऐसा कुछ िलखना है

होनी चािहए िजसके समाधान म शोधकतार् की यापक

जो और से अलग हो। अमे िरका म आठ-दस साल म

रुिच हो। शोध ऐसा होना चािहए िजससे कोई नई दृि

होती है पीएच.डी। केवल िडगर्ी पाने के िलए दबाव के

िमले।

अंदर पीएच.डी. की

था हम बंद करनी होगी। इससे

सं.ऱ कालेज और िव िव ालय म िशक्षक बनने के

यह होगा िक ऐसी भतीर् के जो लोग आते ह वे छँ ट

िलए पीएच.डी. की िडगर्ी अिनवायर् हो गई है। इसे कैसे बदला जा सकता हैय़

जाएंगे। पर हमारे यहा ँ सब काम थोक भाव से होता है। ेमचन्द पर यिद छह सौ पीएच.डी. के िलए

ह.ितर्.ऱ इसके िलए िशक्षा के बारे म हमारे िचन्तन म

शोध- बंध िलखे जा चुके ह तो उस क्षेतर् को िफलहाल

आमूलचूल पिरवतर्न की आव यकता है। पर यह पिरवतर्न

बंद कर द। लेिकन रीितकाल के किव बोधा पर िकतना

कौन करे गाय़ कैसे होगा पिरवतर्नय़

शोध-कायर् हु आ है। अगर आप दे खते ह िक बोधा के बारे

सं.ऱ इस िवषय म म यूजीसी के चेयरमैन ो. वेद काशजी

म कुछ नया है तो उस िवषय पर काम िकया जाना

से िमला था। उन्ह ने कहा िक यिद हम इस िवषय म एक

चािहए और उसके िलए जो भी सुिवधा आव यक हो वह

आधार-पतर् तैयार कर सक तो उसपर िवचार करने के

शोधकतार् को िमलनी चािहए। पर यह थोक भाव से

िलए वे एक रा ीय तर की गो ी बुला सकते ह।

िरसचर् करने की

ह.ितर्.ऱ ऐसा है तो आप आधार-पतर् अव य तैयार कर

था बंद होनी चािहए।

लीिजए। और वेद काशजी अपनी तरफ से गो ी बुला

तरीय शोध के िलए आव यक है िक शोधकतार् यापक हो। उसके शोध

भी लगे। इससे कुछ सुधार तो हो सकता है लेिकन

से उसके िवषय के संबध ं म कोई नई दृि िमले। अध्ययन

आमूलचूल पिरवतर्न नहीं हो सकता। उसके िलए तो

का अध्ययन और उसकी दृि यापक हो तभी गहरी दृि

िमलेगी।

हमारे स ाधारी नेता भी सहमत ह , यह आव यक

सं.ऱ पर मानिवकी के क्षेतर् म, उदाहरण के िलए सािहत्य

होगा।

म, कोई नई दृि

सं.ऱ क्या मानिवकी और सामािजक िव ान म भारतीय

िवकिसत करने के िलए समय तो

चािहए। िडगर्ी लेने के िलए दबाव म कुछ िकताब पढ़कर

और पा ात्य िचन्तन को िनकट लाया जा सकता हैय़

कुछ िलख दे ने से तो नई दृि

ह.ितर्.ऱ जीवन के संबध ं म भारतीय दृि

नहीं िमलती। इसिलए

आजकल पीएच.डी. के िलए की जानेवाले शोध से

ान

दृि

और पि म की

म मूलभूत अंतर है। जो उधर से अिर टोटल, काटं

म कोई योगदान नहीं हो रहा, जैसेिक िव ान म होता

और हैगेल पढ़ कर आ रहे ह, और हमारे यहा ँ जो वेद,

है।

उपिनषद, पुराण पढ़कर आ रहे ह उनम सहमित नहीं

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

27


मानिवकी के क्षेतर् म उ

हो सकती, संगम हो ही नहीं सकता क्य िक दोन

िशक्षा और अनुसं धान

‘जब म अंगर्ेज़ी बोलता हू ँ तो बंगाली म बोलता हू ँ’, यही

दृि य म मूलभूत अंतर है। अव य ही कुछ सामान्य

वाभािवक है। म खुद नहीं मानता िक म सवर्था शु

तत्त्व िनकल सकते ह िजनपर िवचार िकया जाना

अंगर्ेज़ी िलखता हू ँ। ऐसा हो ही नहीं सकता। मे रे पढ़ाए

चािहए।

िव ाथीर् कहा ँ नहीं ह! कम से कम बीस तो अमे िरका म

सं.ऱ पि म की जो दृि

सबसे अिधक फैली है वह

ही ोफ़ेसर ह गे। यहा ँ भी बहु त ह। पर हमारा अंगर्ेज़ी म

वामपंथ है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता िक िजसे

मौिलक योगदान नगण्य है।

वामपंथ कहते ह उसके कुछ अंश भारतीय दशर्न म

सं.ऱ मे रे एक िमतर् अंगर्ेज़ी के िवशेष

ह। उनका कहना

समािहत हो सकते हय़ म वयं भी अपने आपको िकसी

है िक उनके पास अंगर्ेज़ी से संब

सीमा तक वामपंथी मानता हू ँ। क्या भारतीय आध्याित्मकता

के जो शोध- बंध आते ह उनम अंगर्ेज़ी याकरण की

म वामपंथ समािहत नहीं हो सकताय़ गाधीजी ं अपने

गलितय की भरमार होती है।

आपको अिंहसक वामपंथी कहते थे। दलाई लामा भी

ह.ितर्.ऱ इसम कोई आ यर् की बात नहीं है। मने तो बीस

कुछ ऐसा ही कहते ह।

साल से पीएच.डी. की थीिसस जाचना ँ इसीिलए लगभग

िवषय म पीएच.डी.

ह.ितर्.ऱ दे िखए, आपके अपने आपको वामपंथी मानने से

बंद कर िदया है िक अपनी अंतरात्मा को कहा ँ तक क

कुछ नहीं होगा। सवाल यह है िक वामपंथी आपको

दूँ।

वामपंथी मानते ह िक नहीं। आज अनेक वामपंिथय से

सं.ऱ पर अपने यहा ँ तो बौि क यि

माना ही उसे

साथर्क बात भी नहीं की जा सकती। वे एक िनणर्य पर

जाता है जो अंगर्ेज़ी म बोलता-िलखता हो।

पहु ँच गए ह, उन्ह अपनी ओर से सभी सम याओं का

ह.ितर्.ऱ यह हमारी मानिसक गुलामी का नतीजा है।

समाधान िमल गया है। उन्ह अंितम सत्य ा हो गया है।

मानिसक रूप से हम अब भी अंगर्ेज़ के गुलाम ह।

िव ा बहु धा वदं ित वाली बात उनकी समझ म

जापान म अंगर्ेज़ी सािहत्य जापानी म पढ़ाया जाता है।

एकं स

नहीं आती। उनम कुछ लोग अव य ऐसे ह िजनका

रूस म रूसी म तथा

ासं म

च म। हमीं कौन-से

िदमाग थोड़ा खुला है। बस उनके साथ कुछ चचार् संभव

तीसमारखा ँ ह! हम अंगर्ेज़ी भले न आए पर हम मानते यह ह िक िबना अंगर्ेज़ी जाने हम उ ित नहीं कर सकते।

है। आज हमारे िव िव ालय म िकसी भी िवषय पर

गुलामी की भी हद होती है। आज हमारे छोटे -छोटे ब े

चचार् हो, तुरंत वामपंथ और दिक्षणपंथ को लेकर

तथाकिथत अंगर्ेज़ी माध्यमवाले िव ालय म पढ़ रहे ह

नारे बाज़ी होने लगती है। वा तव म हमारे यहा ँ अब न

जबिक स ाई यह है िक उन िव ालय के अध्यापक

वामपंथ है, न दिक्षणपंथ। एक ही पंथ है, वह है

को भी अंगर्ेज़ी नहीं आती। G-20 म जो दु िनया के सबसे

आलसपंथ। हम कोई बदलाव नहीं चाहते। अध्यापक भी

िवकिसत दे श ह उन सबका िवकास अपनी-अपनी

कहते ह, छातर् भी कहते हऱ हम बदलाव नहीं चािहए।

मातृभाषा के माध्यम से ही हु आ है।

जो हो रहा है वही चलते रहना चािहए। हम लीक से

सं.ऱ आपकी दृि

हटना ही नहीं है, आप कुछ भी कर ल।

है।

सं.ऱ हमारे दे श की बहु त लंबी बौि क परंपरा रही है।

ह.ितर्.ऱ म क्या कहू ं , कुछ कहने से अपनी ही िववशता

पर आजकल लगता है िक दे श म बौि क बौनापन छा

का बोध होता है। पर सवर्था िनराश भी नहीं हू ँ। ि थित

से ि थित बहु त िनराशाजनक लगती

गया है। कहीं भी नए िवचार की चमक नहीं िदखाई दे ती

बदलेगी। समय लगेगा। कुछ पिरवतर्न तो हो रहा है।

िजनसे कुछ आशा बँधे।

बहु त तर ी हु ई है। िकसने सोचा था िक भारत जीडीपी

ह.ितर्.ऱ मे री समझ म इसका सबसे बड़ा कारण अपने

म िव

दे श म अंगर्ेज़ी का अनाव यक वचर् व है। हम यह बहु त

उसीम कुछ नया आएगा, ���च्छा आएगा। काम करने की

बड़ी गलतफहमी है िक हम अंगर्ेज़ी आती है। अंगर्ेज़ी म

सं कृित बदलेगी। जो अच्छा हो रहा है उसे भी तो हम

हम उथले तर का ही काम कर सकते ह, उसम गहन

दे ख। आज िकतने नए िव िव ालय खुले ह, उन्ह दे ख।

म चौथा दे श होगाय़ यह जो कुछ हो रहा है

िचन्तन नहीं कर सकते। भारत म शायद ही कोई िव ान

आज भौितक रूप से हम िकतने आगे आए हंै यह भी तो

हो जो सवर्था शु

अंगर्ेज़ी िलखता हो। आशीष नंदी

दे ख। लोग पहले साइिकल से आते-जाते थे। आज

अगर्ेज़ी लेखक म जानेमाने नाम ह। वे खुद कहते ह िक

मध्यवगर् के िलए कार आम हो गई है। ऐसे ही बौि क

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28


मानिवकी के क्षेतर् म उ

िशक्षा और अनुसं धान

रूप से भी िव तार हो रहा है। गहराई भी धीरे -धीरे

धीरे -धीरे समझ म आता है । एक आदमी बहु त परे शान

आएगी।

है , उसे अच्छा संगीत सुनाइए, िफर दे िखए। कुछ तो

सं.ऱ

होगा उसके मन म। पर यह िदखता नहीं है , इसका

िकन्तु दे श की वा तिवक सम याओं पर कहीं

िवचार होता िदखाई नहीं दे रहा।

कोई दाम नहीं दे सकता। हम मनु य इसिलए ह िक

आज हमारी सबसे बड़ी सम या यह है िक

हमारे ऊपर कला का कुछ असर होता है । जीवन से

रा ीय तर पर िचन्तन करने के िलए हमारे पास कोई

संगीत को, सािहत्य को और अन्य कलाओं को िनकाल

भाषा नहीं है। एक बड़ा वगर् ऐसा पैदा हु आ है िजसे न

दीिजए तो जीवन म क्या बचेगाय़ हमारे जीवन म कला

अंगर्ेज़ी आती है, न िहन्दी, या िफर िजसे िहन्दी आती है

है , इसीिलए हम मशीन नहीं ह। मशीन पर कला का

उसे अंगर्ेज़ी नहीं आती और िजसे अंगर्ेज़ी आती है उसे

असर नहीं होता।

ह.ितर्.ऱ

िहन्दी नहीं। कुछ ऐसे लोग है जो भाषा के नाम पर िसफर्

िशक्षा हम क्य हािसल कर, इसका उ र केवल

अंगर्ेज़ी जानते ह। माना जाता है िक जो अंगर्ेज़ी नहीं

इस बात से नहीं िदया जा सकता िक पैसा कमाने म

जानता वह बुि जीवी क्या हु आ। यह हमारा समसामियक

कौन-सी चीज़ हमारी सहायता करे गी। आज जब आईटी

यथाथर् है। भारतीय भाषाएँ हारती जा रही ह । पर कोई

क्षेतर् का बोलबाला है, जहा ँ तकनीकी के िवशेष

भी दे श अपनी मातृभाषा के बल पर ही बढ़ा है। हमीं को

ही जा रहे ह, तो उसम जो एचआर (मानवीय संबध ं ) का

लगता है िक अंगर्ेज़ी के िबना हम बढ़ नहीं सकते।

गर्ुप है वहा ँ तो मानिवकीवाल को होना चािहए। पर

अंगर्ेज़ के ज़माने से अंगर्ेज़ी का क जा बना हु आ है।

उसम भी तकनीकी वाले ही लोग घुस गए ह।

हमारी िवचार-क्षमता न दे श म िव बड़ा

कारण

मान बौि अपने

मुझे याद है जब म सट टीफ़स कालेज म पढ़ाता

होती जा रही है।

था, स र व अ सी के दशक म, तो बड़े काप रे ट ओहद

क बौनेपन का सबसे दे श

अंगर्ेज़ी

पर इितहासवाले लोग, मानिवकीवाले लोग ही जाते थे।

का

और कंपिनया ँफायदे म चलती थीं। बंधन नाम की कोई

अनाव यक वचर् व है । हम यह बहु त बड़ी

ऐसी चीज़ थी ही नहीं। यह तो हमारे दे खते-दे खते बनी

गलतफहमी है िक हम अंगर्ेज़ी आती है । अंगर्ेज़ी म हम उथले

है।

तर का ही काम कर

रा.न.ऱ कोई रा ता इस ि थित को बदलने के िलएय़

सकते ह, उसम गहन िचन्तन नहीं कर सकते ।

ह.ितर्.ऱ क्या बताऊँ, बड़ी छटपटाहट है। इतना िदल

भारत म शायद ही कोई िव ान हो जो सवर् था शु

लोग

कचोटता है यह सब दे खकर। यह िशक्षा की ही सम या

अंगर्ेज़ी िलखता हो।

नहीं, पूरे समाज की सम या है। हमारे समाज म इतनी

राकेश नवीन (सह स पादक)ऱ बदलते पिरवेश म

िवसंगितया ँ ह। एम.ए. पास आदमी िरक्शा चला रहा है।

मानिवकी म रोज़गार की क्या संभावनाएँ हो सकती हय़

हमारे िव िव ालय म एक चौकीदार है पीएच.डी। उसे

ह.ितर्.ऱ िबलकुल सही

मने एक बार अपनी

है, ज्वलंत

है। आज

ास म बुलाया था। उसने अध्यात्म

मानिवकी म जो संभावनाएँ ह वे मुख्य रूप से मानिवकी

रामायण और तुलसी रामायण का तुलनात्मक अध्ययन

म लगे रहने की ह। अगर आप िहन्दी पढ़ रहे ह तो आगे

िकया है।

भी िहन्दी म ही लगे रहगे, जोिक बहु त गलत बात है।

पूरे समाज की यही ि थित है। हमको जो करना

समाज म मानिवकी को लेकर जो हो रहा है वह बहु त

चािहए था वह यह िक कूल के बाद वोकेशनल टर्ेिंनग

गलत हो रहा है। समाज म उस चीज़ का कोई मू य नहीं

होनी चािहए थी तािक िजन्ह उ

िजससे तुरंत कुछ लाभ न हो। उसकी कोई कीमत नहीं।

िकसी और रोज़गार म जा सक।

िशक्षा म नहीं जाना वे

सब जगह ही ऐसा समाज बनता जा रहा है। हमारे यहा ँ

सं.ऱ िशक्षा और आजीिवका को अलग करके दे खने की

ही नहीं, बाहर पि म म भी। बि क यह बाहर से शुरू

आव यकता है।

हु आ है। बाहर यादा संघषर् है।

ह.ितर्.ऱ हा,ँ िशक्षा का आजीिवका से संबध ं अव य है, पर

हमारे यहा ँ मूल संकट है िक सािहत्य व कला

िशक्षा को पूरी तरह आजीिवका से ही नहीं जोड़ िदया

के िलए पैसा नहीं है । लोग कहगे संगीत से क्या होता

जाना चािहए, जैसािक आजकल हो रहा है। िशक्षा

है , िचतर्कला से क्या होता है य़ पर कला का महत्त्व

आजीिवका-अजर्न से कहीं अिधक यापक है।

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वाक्यपदीय: भतृर्हिर का भाषा-दशर्न-32 अिनल िव ालंकार वाक्यपदीय म भतृर्हिर श द और अथर् के संबध ं की चचार् को आगे बढ़ा रहे ह।

91. िवच्छे दगर्हणे ऽथार्ना ं ितभाऽन्यैव जायते । वाक्याथर् इित तामाहु ः पदाथः उपपािदता ।। (2-143) िकसी वाक्य के श द का अथर् अलग-अलग दे खने पर एक दू सरे ही कार की अंतदृर्ि िमलती है। श द के अथर् के िव

( ितभा)

ेषण से उत्प उस दृि को वाक्य का अथर् कहा जाता है।

(अथार्ना ंिवच्छे द-गर्हणे ऱ श द के अथर् को अलग-अलग दे खने पर, अन्या एव ितभा जायते ऱ एक दू सरी ही अंतदृर्ि

िमलती है। ता वाक्याथर्

पदाथः उपपािदता

इित आहु ःऱ उस अंतदृर्ि

ऱ पदो के अथर् (के

ान से) उत्प

( ितभा) को वाक्य का अथर् कहा जाता है, जोिक,

होती है।)

92. इदं तिदित सान्येषा अनाख्येया कथंचन। त्यात्मवृि िस ा सा कतर्ार्ऽिप न िनरू यते ।। (2-144) वह अंतदृर्ि िकसी भी रूप म, ‘यह वैसी है’, इस कार, दू सर को नहीं कही जा सकती। वह व ा की अपनी चेतना म अंदर जाने से िस होती है, वह अंतदृर्ि कथन के कतार् (व ा) ारा भी सही-सही िनरूिपत नहीं दे खी जा सकती। (साऱ वह (अंतदृर्ि ), कथंचनऱ िकसी भी रूप म, इदं त इितऱ ‘यह वैसी है’, इस कार, अन्येेषा अनाख्येयाऱ दू सर को नहीं कही जा सकती। क्य िक, त्यात्म-वृि -िस ाऱ वह दृि

व ा की अपनी चेतना म अंदर जाने से िस

होती है, साऱ वह (अंतदृर्ि )ऱ कतर्ार् अिपऱ (कथन के) कतार् (व ा)

ारा भी, न िनरू यते ऱ सही-सही िनरूिपत नहीं

की जा सकती।) मनु य की भाषा अचेतन रूप से उसके मुख से

भाषा म श द कैसे पैदा हो रहे है। वाक्य म कतार्, कमर्,

िनकलती रहती है। जब कोई बोल रहा होता है उस

िकर्या आिद अपनी जगह पर सही ह या नहीं", ऐसी

समय उसका ध्यान अपनी भाषा पर नहीं होता। आम

बात पर व ा ध्यान नहीं दे ता। यिद वह अपनी भाषा

तौर से उसका ध्यान अपने कथ्य पर, और अिधकतर

पर इस

उसके कहने का

भाव सुननेवाले पर क्या पड़ रहा है,

पाएगा। करोड़ लोग की भाषा इसी कार उनके मुख से

इसपर होता है। "म िकस भाषा म बोल रहा हू ँ, मे री

िन सृत होती रहती है। ायः भाषा पर ध्यान तब जाता है

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कार ध्यान दे ने लगे तो वह कुछ बोल ही नहीं


वाक्यपदीय-भतृर् हिर का भाषा-दशर् न-32

जब हम या तो कोई नई भाषा सीख रहे होते ह या िफर

घटना एक ही है, पर तीन वाक्य म कतार् कर्मशः

बोलते हु ए हमसे कोई गलती हो जाती है या हम उपयु

उसने, पड़ोसी, और मौत ह। अथर् म कुछ अंतर है, पर

श द न िमल रहे ह ।

इन वाक्य से क्या हम जान सकते ह िक उस घटना का वा तव म कतार् कौन हैय़ यिद मारनेवाले आदमी

पर चेतना के िवकास के साथ मनु य अपनी भाषा पर ध्यान दे ने लगता है। मोटे तौर पर हम कह सकते ह

को कर्ोध न आया होता तो क्या वह गोली चलाताय़ क्या

िक जो यि

कर्ोध को कतार् माना जा सकता हैय़ कानून म तो ऐसा

अपनी भाषा की िकर्या पर िजतना ध्यान

नहीं माना जाएगा, पर उस हत्या म कर्ोध का

दे रहा है उसकी चेतना उतनी ही िवकिसत है। इसम

मुख

थान अव य है।

केवल वाक्य म सं ा, िवशेषण, कतार्, िकर्या आिद पर

भाषा की

ध्यान दे ना शािमल नही��� है। ये बात भाषा के बहु त ऊपरी

िकर्या पर इस

कार िवचार करने पर

हम केवल भाषा के बारे म ही नहीं, अिपतु मनु य के मन

तर की ह। भाषा की समूची िकर्या पर गहरा ध्यान तब जाता है जब हम, उदाहरण के िलए, सोचने लगते ह

और उसकी अनुभिू तय के बारे म भी दृि

िक वाक्य म िजसे हम कतार् मान रहे ह वह क्या वा तव

दृि

म कतार् है। उदाहरण के िलए िन िलिखत वाक्य दे खऱ

कई बार देखा है, िकसी श द का अथर् कोई दूसरा श द

ऱ उसने िप तौल की गोली से पड़ोसी की हत्या

िमलती है। यह

ही वा तव म उस वाक्य का अथर् है। जैसेिक हमने

नहीं होता। श द का अथर् वह अनुभिू त है जो उस श द को सुनकर हमारे अंदर उठती है। पर जैसेिक यहा भतृ ँ ह र् िर

कर दी। ऱ उसकी िप तौल की गोली से पड़़ोसी मर गया।

कह रहे ह, वयं व ा भी भाषा के इस पक्ष के बारे म

ऱ पड़ोसी की मौत उसकी िप तौल की गोली से

चेतन नहीं होता। मनु य वयं अपनी भाषा को भी अपने

हु ई।

अंदर की शातं गहराई म जाकर ही समझ सकता है।

93. सदु लर्भं क यिच कैि

लोवार्वयवदशर्न ।

त्ववयवैः दृ ैः अथर्ः कृत् ोऽनु मीयते ।। (2-156)

इस संसार म िकसी के ारा िकसी चीज़ के सभी अंश को दे खना दु लर्भ है (ऐसा होता नहीं है)। (होता यह है िक) दे खे हु ए कुछ अंश के ारा पू रे अथर् का (दृ य व तु का) अनु मान कर िलया जाता है। (लोकेऱ इस संसार म, क यिच दु लर्भ

ऱ िकसी के भी ारा, िकसी चीज़ के, सवार्वयदशर्न ऱ सभी अंश को दे खना,

ऱ दु लभ र् है, (ऐसा नहीं होता), (होता यह है िक), कैि

अवयवैः दृ ैःऱ दे खे हु ए कुछ अंश के

ारा, कृत् ः

अथर्ः अनु मीयते ऱ पूरे अथर् का (दृ य व तु का) अनु मान कर िलया जाता है।)

94. यथा जात्युत्पलादीना गं ं धेन सहचािरणा । िनत्यसंबंिधना दृ ं ं गुणाना अवधारण ।। (2-157) चमे ली या कमल आिद की गंध से उनके साथ िनत्य संबंध के रूप म सदा साथ रहने वाले गुण का गर्हण िकया जाता है। (यथाऱ जैसे, जाित-उत्पलादीना ं गंधेनऱ चमे ली या कमल आिद की गंध से, सहचािरणा रहनेवाले , िनत्यसंबंिधना

ऱ उनसे िनत्य संबध ं रखनेवाले, गुणाना अवधारणं दृ

जाता है।)

95. संख्या- माण-सं थान-िनरपे क्षः वतर्ते। िबन्दौ च समुदाये च वाचकः सिललािदषु।। (2-158) ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

31

ऱ उनके साथ

ऱ गुण का गर्हण करना दे खा


वाक्यपदीय-भतृर् हिर का भाषा-दशर् न-32

पानी (सिलल) आिद म उनका वाचक श द संख्या, पिरमाण और थान आिद से िनरपे क्ष ( वतंतर्) रहकर एक बूँद म भी और जलसमूह म भी पानी को बताने का अपना काम करता है। (सिललािदषुऱ पानी (सिलल) आिद श द म, वाचकः श दःऱ उनका वाचक श द, संख्या- माण-सं थानिनरपे क्षःऱ संख्या, पिरमाण और थान आिद से िनरपेक्ष ( वतंतर्) रहकर, िबन्दौ च समुदाये चऱ एक बूद ँ म और जलरािश म,

वतर्तेऱ (पानी को बताने का अपना काम) करता है।)

भतृर्हिर भाषा को एक िनरपेक्ष

िकर्या की दृि

नहीं दे ख रहे िजसके अनु सार मनु य भाषा का कतार् है। इस दृि

से भाषा की

जहा ँ इस बात पर िवचार हु आ िक िविभ

से

वतंतर्

उ ारण म इतना अंतर होते हु ए भी हम िकस

िकर्या को कभी भी

िजस पिरणाम पर पहु ँचे वह यह था िक हम वा तव

योग नहीं करता। भाषा उसके अंदर

म िकसी के उ ारण को पूरी तरह से नहीं सुनते।

से फूटती है। इसिलए भाषा को मनु य के अन्य कायर्-

उसके मुख से आती हु ई कुछ ध्विनय के आधार पर

यापार के साथ रखकर ही समझा जा सकता है।

हम अनु मान लगा लेते ह िक कोई क्या कह रहा है।

इस संसार म मनु य के िलए सबसे पहला काम

िविभ

त्यक्षीकरण है। जब हम लगता है िक हम कुछ दे ख रहे

अलग-अलग उदाहरण के बीच उत्प

पूरा दे ख रहे ह। पर यिद ध्यान द तो हम पाएँगे िक हम

क्षेतर् तक ही सीिमत नहीं रखते। उनके अनु सार मनु य

मकान या पेड़, हम सदा उनके िकसी अंश को ही दे ख

िकसी भी इंिदर्य से जब भी कुछ जान रहा होता है,

सकते ह। उस अंश को दे खकर ही हम उस पूरी व तु

उसम फोट की

का अनु मान कर लेते ह और हम लगता है िक हमने उसे

ही फोट की

मनु य के बारे म भी ऐसा ही है। हम कभी भी

फोट पर आधािरत है। हम िकसी यि

समूचा नहीं दे ख सकते। ऐसा कर सकना असंभव है।

ह। वा तव म िकसी यि

फूल की गंध से हम उस फूल के पास म होने का

का समूचा रूप क्या है, यह

जानना संभव है ही नहीं क्य िक हर मनु य के जीवन के

अनु मान लगा लेते ह। गुलाब की गंध के साथ ही उसकी

इतने पक्ष ह, और हर मनु य म िनरंतर इतने पिरवतर्न

सुद ं रता और कोमलता का भाव हमारे मन म जग जाता

होते रहते ह िक हम चाह भी तो उसके बारे म कुछ भी

है। कहीं पानी है यह जानने के िलए हम पानी की सारी

िनि त रूप से नहीं कह सकते। पर हमारे अंदर असंख्य

रािश को नहीं दे खना पड़ता। पानी की एक बूद ँ भी पानी

चीज , यि य , धम और राजनैितक वाद के बारे म

के अि तत्व को बताने के िलए काफी है।

धारणाएँ ह। हम उन धारणाओं के बारे म बहस करते

ान को अंश के

ह, िबना इस बात पर ध्यान िदए िक िजस चीज़ के बारे

ान माना गया है। अंशी वह है जो अंश

म हम बात कर रहे ह वह कोई बाहर िव मान व तुगत

से बना है। हम पेड़ के कभी-कभी कुछ अंश दे खते ह

सत्य नहीं है अिपतु उसके संबध ं म हमारे मन म िव मान

और उनसे अंशी पेड़ का अनु मान कर लेते ह।

धारणा ही है। इसिलए राजनैितक मतवाद और धम को

िकर्या मनु य

लेकर लगातार बहस होती रहती ह क्य िक सभी लोग

िकर्या को

उनके बारे म अपने-अपने

फोट कहा जाता है।

और बोलते ह।

फोट की अवधारणा सबसे पहले याकरण म आई ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

को कभी भी

उसके समूचे रूप म नहीं जानते, और न ही जान सकते

भतृर्हिर उदाहरण दे कर इसे समझाते ह। िकसी

की चेतना म िनरंतर चलती रहती है। इस

िकर्या के आधार पर चल रहा है। केवल

हमारा इंिदर्य- ान ही नहीं, हमारा सारा िचन्तन भी

वयं अपने आपको भी,

अंश से अंशी के अनु मान की यह

िकर्या काम कर रही होती है।

यिद हम दे ख तो पाएँगे िक हमारा सारा जीवन

पूरा दे खा है।

ारा अंशी का

तीित को

भतृर्हिर फोट की इस िकर्या को केवल भाषा के

दे ख सकते। चाहे हम कोई मे ज़ दे ख रहे ह या कोई

कार के

इस

फोट कहते ह।

कभी भी िकसी भी चीज़ को उसके समूचे रूप म नहीं

भारतीय दशर्न म इस

यि य के मुख से शोक, सोक, सोग श द

को सुनकर एक ही भाव हमारे मन म जगता है। अनेक

ह तब हमारी तीित यही होती है िक हम दृ य व तु को

िकसी को भी, यहा ँ तक िक

कार

मान लेते ह िक वे एक ही श द बोल रहे ह। वैयाकरण

समझा नहीं जा सकता। कोई भी मनु य अपनी भाषा का चेतन रूप से

मनु य के

32

फोट के अनु सार सोचते


वै िदक े रणाएँ-4 अिनल िव ालंकार

9. मृत्योः पदं योपयन्तो यदै त दर्ाघीय आयुः तरं दधानाः। आ यायमाना जया धने न शुध्दाः पूता भवत यि यासः॥ (ऋ. 10-18-2) हे य शील जनो, आप सब मृत्यु के पैर को दू र करते हु ए, िव तृत और लंबी आयु को ा कर, और संतान और धनधान्य से भरे पूरे होकर शु और पिवतर् बन। (यि यासःऱ हे य शील जनो, आप सब, मृत्योः पदं योपयन्तःऱ मृत्यु के पैर को दू र करते हु ए, अायुः दधानाःऱ िव तृत और लंबी आयु को

धनधान्य से भरे पूरे होकर, शु ाः पू ताः भवतऱ शु

करते हुु ए, एतऱ आएँ,

तरं दर्ाघीय

जया, धने न आ यायमानाःऱ संतान और

और पिवतर् बन।) समृि

मृत्यु से डरना मनु य के िलए बहु त वाभािवक है।

आने पर अपिवतर् जीवन िबताने लगता है। यह

िजसका जन्म हु आ है उसकी मृत्यु भी अव य होगी। पर

मंतर् हम धनधान्य और संतान से पिरपूणर् जीवन िबताने

जन्म से मृत्यु के बीच के अंतराल म जीवन िकस

की

कार

िबताया जाता है यह महत्त्वपूणर् है। वैिदक काल से एक

ेरणा दे ता है। वेद के एक मंतर् म

आदशर् हमारे सामने रहा है िक मनु य को दीघार्यु होना है,

रायेऱ हे अिग्न

व थ और दीनतारिहत रहना है, और जीवन को

समृि

ेरणा के साथ पिवतर्ता के साथ जीवन िबताने की ाथर्ना हैऱ अग्ने नय सुपथा

भु, तू हम सन्मागर् से ऐ यर् की ओर ले

चल। हम गलत मागर् से ऐ यर् न पाएँ और ऐ यर् पाकर

और पिवतर्ता के साथ िबताना है। अदीनाः याम

शरदः शत ऱ हम सौ वषर् तक िबना दीन बने िजएँ यह

गलत मागर् पर न चल, वेद इसकी बार-बार

वैिदक

ह।

ाथर्ना है। िकसी

नहीं अिपतु समृि ,

कार सौ साल तक जी लेना

वा थ्य और पिवतर्ता ���े साथ

इस मंतर् म मनु य के िलए यि यासः (य शील)

जीना।

िवशेषण का इस

कार का जीवन जीने के िलए मनु य मृत्यु

को िजतनी दू र ले जा सके उसके िलए

ेरणा दे ते

मूल ाि

यास करना

योग हु आ है। य

तीक है। य

भारतीय सं कृित का

का तात्पयर् िकसी महान उ े य की

के िलए अपने क्षुदर्

वाथर् को समिर्पत करना है।

चािहए। उसी के कारण साित्त्वक जीवन जीने की शैली

जैसे य

का िवकास हु आ।

होकर अिग्न के साथ एकाकार हो जाते ह, उसी

वैिदक जीवन एक भरापूरा और समृि स ता से भरा हु आ जीवन था। समृि

और

कार

मनु य अपने सीिमत अहं कार से ऊपर उठकर िवशाल

ायः मनु य जीवन म

दृि

लाने के िलए गलत मागर् अपना लेता है या िफर

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

म सिमधा, सामगर्ी और घी अिग्न म सपिर्पत

अपनाते हु ए साित्त्वक जीवन िबताएँ। इस

उनके जीवन म समृि 33

और पिवतर्ता दोन आएँगी।

कार


वै िदक े रणाएँ-4

10 . एिह अ मान आ ित

अ मा भवतु ते तनूः।

कृण्वन्तु िव े दे वा आयु े शरदः शत ॥ अथवर्वेद (2-13-4) आओ और इस िशला पर चढ़ो, तु हारा शरीर पत्थर की भाित ँ दृढ़ हो। सारे दे वता तु हारी आयु को सौ वषर् की कर। (एिहऱआओ, अ मान आ ित ऱ इस िशला पर चढ़ो, ते तनूः अ मा भवतुऱ तु हारा शरीर पत्थर की भाित ँ दृढ़ हो, िव दे वाःऱ सारे दे वता, ते आयुःऱ तु हारी आयु को, शतं शरदः कृण्वंतुऱ सौ वषर् की कर।) मनु य का जीवन किठनाइय से भरा है। पहले

अव य ही जीवनरूपी पथरीली नदी को पार करने

हमने ऋग्वेद का एक मंतर् पढ़ा हैऱ

के िलए मनु य को भी शारीिरक और मानिसक रूप से अपने आपको दृढ़ बनाना होगा। उसके संक प दृढ़ ह

अ मन्वती रीयते संरभध्य उि

और उसके शरीर म उन संक प को िकर्यािन्वत करने

तरता सखायः।

के िलए आव यक क्षमता हो। िजस मनु य का मन और

अतर्ा जहाम ये अस अशे वाः

तन दोन

िशवा वय उ रे मािभ वाजा ।।

िवजय

(हे िमतर्ो, यह जीवनरूपी पथरीली नदी बह रही

ा कर सकता है।

जीवन की किठनाइओं पर िवजय पाने के िलए

है। तैयार होकर उठो और नदी के पार जाने के िलए तैरना

व थ ह वही अपने जीवन म किठनानाओं पर

दे वताओं का भी सहयोग आव यक है। दे वता वे ाकृितक

ारंभ करो। हमारे िलए जो-जो दु खदायी बात ह

शि या ँ हंै जो हमारे जीवन को आधार दान करती ह।

उन्ह हम यहीं इस िकनारे पर छोड़ द, और तैरकर हम

इस

अपने िलए क याणकारी ऐ य तक पहु ँच।)

कार पृथ्वी, सूयर्, अिग्न, वायु, जल आिद सभी

दे वता ह। इनके िबना हमारा जीवन नहीं चल सकता।

जीवन की किठनाइओं से हम डरना या घबराना

इन दे वताओं के साथ सामंज य रखते हु ए ही हम व थ

नहीं चािहए। किठनाइया ँ ही जीवन को साथर्क बनाती

और सामंज यपूणर् जीवन जी सकते ह।

ह।

11. मा िबभेनर् मिर यिस जरदिं कृणोिम त्वा। िनरवोचमहं य म

अ े यो अ ज्वरं तव॥ (अथवर्वेद 5.30.8)

हे मनु य, तू डर मत, तू मरे गा नहीं। म (िचिकत्सक) तुझे दीघार्यु बनाता हू ँ। मने ते रे शरीर से क्षय रोग और सभी अंग म या ज्वर को िनकालकर ही यह आ ासन तुझे िदया है। (हे मनु य, तू, मा िबभेःऱ डर मत, न मिर यिस, तू मरे गा नहीं, म (िचिकत्सक) त्वाऱ तुझे, जरदिं

कृणोिमऱ

दीघार्यु बनाता हू ँ। मने, तव अंगे यःऱ तेरे शरीर से, य मं, अंगज्वरं ऱ क्षय रोग और सभी अंग म या ज्वर को, िनःऱ िनकालकर ही, अवोच

ऱ यह बात कही है।)

12. ऐतु ाण ऐतु मन एतु चक्षु ः अथो बल । शरीररम य सं िवदा ं त पद् या ं ित ित तु॥ (अथवर्वेद 5-30.4) इस (रोगी मनु य म) ाण आए, दृि आए, और बल आए। वह बल, इसके शरीर म संतुलन लाकर, इसे पैर पर खडा़ कर दे । ((इस मनु य म), ाणः एतुऱ ाण आए, चक्षु ः एतुऱ दृि

आए, अथऱ और, बल (एतु) बल आए। त ऱ वह बल,

अ य शरीर य संिवदाऱं इसके शरीर के संतुलन और सामंज य को, पद् या ं ितित तुऱ इसके पैर पर खडा़ कर दे ।) ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

34


वै िदक े रणाएँ-4

मनु य समाज म अकेला नहीं जी सकता। अनेक कार से उसका जीवन और पर िनभर्र करता है। इनम उसका

दोन से संतुिलत है वह वा तव म

व थ है। इसिलए

मंतर् कह रहा है िक रोगी यि

ाण म, मन और

चक्षुओं म शि

वा थ्य भी सि मिलत है। बहु त बार अ व थ

के

आए और वह अपने पैर पर खड़ा होकर

होने पर मनु य को दू सर की सहायता की आव यकता

वतंतर् रूप से जीवन िबता सके। तभी वह वा तव म

पड़ती है। यह सहायता केवल िचिकत्सा के रूप म ही

व थ है। इसके िलए ऐसा समाज बनाना आव यक है जहा ँ

नहीं अिपतु मानिसक रूप से भी बहु त आव यक है। हमारे शरीर की बहु त-सी बीमािरय का कारण मानिसक होता है, यह आजकल

कोई भी अपने आपको अकेला, असहाय अनु भव न करे ।

वीकार िकया जा रहा है। इसिलए

जीवन म जो भी िनबर्ल और दु खी ह उन्ह सदा यह

िचिकत्सक का दाियत्व है िक वह रोगी को केवल औषिध

लगे िक उनकी सहायता के िलए कई हाथ उपि थत

ही न दे अिपतु उसे मानिसक रूप से भी

ह।

सं कृत का

ोत्साहन दे ।

व थ श द बहु त साथर्क है।

व थ

यि

का अथर् केवल नीरोग रहना नहीं है। व थ वह है जो व+ थ (अपने अंदर ि थत है)। जो यि

वाथर् पर आधािरत अाज के वातावरण म रह रहे को इस

कार के मानिसक

ोत्साहन की बहु त

आव यकता है।

तन और मन

13. इमे जीवा िव मृतैराववृतर् अभू भदर्ा दे वहू ितन अ । ा ो अगाम नृतये हसाय दर्ाघीय आयुः तरं दधानाः। (ऋग्वेद 10.18.3) ये मनु य मृत्यु से अलग हो रहे ह। दे वताओं से की गई ाथर्ना आज हमारे िलए क याणकारी हु ई है। हमारा जीवन लंबा और सफल हो, और हम नृत्य और हास का जीवन जीने के िलए आगे बढ़। (इमे जीवाःऱ ये मनु य, मृतैः िव आववृतर् ऱ मृत से अथार्

मृत्यु से अलग हो रहे ह, अ ऱ आज, नः दे वहू ितःऱ

दे वताओं से की गई ाथर्ना, भदर्ा अभू ऱ हमारे िलए क याणकारी हु ई है। हम, तरं दर्ाघीय आयुःऱ लंबी और सफल आयु को धारण करते हु ए, नृतये हसायऱ नृत्य और हास के िलए, वेद म सौ वषर् और उससे भी अिधक जीने के िलए

(दर्ाघीय) ही न हो अिपतु सफल और

ाथर्ना की गई है। पर जीवन का उ े य केवल

जीते रहना नहीं है। वैिदक जीवन

हो। अपनी दृि

स ता, उ ास

आएगी और उनके जीवन म सामंज य,

मनु य अपना जीवन दु खमय बना लेता है। इसिलए मृत्यु

स ता और

उ ास आ सकगे।

के भाव से अपने आपको अलग रखना मनु य के िलए

वैिदक दृि

आव यक है।

म जीवन को एक उत्सव के रूप म

दे खा गया है। भारत म इतने उत्सव का मनाया जाना

मनु य की आत्मा अमर है और उसका शरीर

आकि मक नहीं है। इसके मूल म दृि

नाशवान है, यह भारतीय िचन्तन की मूल मान्यता है।

है िक जीवन

मुख्यतया आनंदमय है। मनु य के जीवन म जन्म, िववाह

),

आिद के अवसर ही उत्सव के अवसर नहीं ह, यहा ँ हर

और इसिलए आत्मा मूल रूप से आनंदमय है। केवल

ऋतु का अपना उत्सव है। संसार म और कहीं इतने

बहु त

उत्सव नहीं मनाए जाते। उत्सव से हम अपने संकुिचत

सीिमत हो जाती है िजससे उसके जीवन म दु ःख आते

जीवन की परे शािनय से ऊपर उठकर सामूिहक उ ास

ह।

म सहभागी होने का अवसर िमलता है। इससे हमारे

मंतर् म कहा गया है िक हमारा जीवन केवल लंबा ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

कार की दृि

अपनाएँ तो उन सबके संकुिचत अंहकार म कुछ कमी

तो अव यंभावी है पर उसके बारे म ही सोचते रहने से

शरीर पर ही ध्यान दे ते रहने से मनु य की दृि

( तर) भी

को िवशाल बनाकर कृित के दे वताओं

दे ख सकता है। यिद सभी मनु य इस

का भाव वेद म अनेक बार आया है। मनु य की मृत्यु

के साथ एकरूप है (अयमात्मा

कृ

के साथ जुड़ने से मनु य अपने आपको बड़े पिर े य म

और आमोद- मोद का जीवन है। मृत्यु से परे रहने

मनु य की आत्मा

ा ः अगामऱ आगे बढ़।)

सामािजक जीवन म सामंज य और सौहादर् आता है। 35


Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein (Our readers have heard of Wittgenstein on several occasions. He is the first philosopher of the West who drew attention to the limitations of language. He observed, “Philosophy is a battle against the bewitchment of our intelligence by means of language.” We may see here some similarity between Bhartrihari and Wittgenstein, both trying to unravel the mystery of language, with Wittgenstein suffering from the obvious limitations of the Western philosophy. We thought it was time to know him at first hand, though in a very limited way. Ed.) (Ludwig Wittgenstein (1889–1951), regarded as the most influential modern western philosopher, was born in Vienna into one of Europe’s richest families. He inherited a large fortune from his father in 1913, but it all gave away to his brothers and sisters and led a life of voluntary simplicity, even poverty. As a young college student he went to Manchester to study aeronautical engineering. But at heart he wanted to learn philosophy, and met Bertrand Russell who took him under his wings. In the World War I Wittgenstein served as an officer in the Austrian army on the frontline and was decorated a number of times for his courage. While fighting in the war, he wrote his small book on philosophy, the 75-page Tractatus LogicoPhilosophicus (The book of logical philosophy), which, after being translated from German into English, made him the most famous philosopher in the West. But he hated his popularity, and did not visit England till 1929. Instead, he worked as a gardener for some moths in a church where he slept in the tool room. Though much sought after from philosophers in England and Europe, he taught fort two years in a primary school in a remote mountainous region in Austria, and while teaching there compiled a children’s German dictionary. In the year 1939, at the insistence of his English friends, including the world-famous economist, John Maynard Keynes, he came again to England and was appointed professor of philosophy at the Cambridge University. His small book Tractatus Logico Philosophicus was taken as his Ph.D. dissertation after much hesitation, and recommendation by Russell. Another well-known English philosopher of the time, C.D. Broad, said, “To refuse the chair to Wittgenstein would be like refusing Einstein a chair of physics.” By then he was regarded ‘as the foremost philosophical genius of his time.’ He did not at all like the superficial academic atmosphere at the university (reminds us of our own universities?) and resigned from his professorship in 1947. Thereafter he lived for some time in isolation in a cottage that he built for himself in Norway, and visited America in 1949 at the invitation of one of his ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein

former student and professor of philosophy, Norman Malcolm. He returned from America after a few months, and died in England in 1951 of cancer. In his later life, Wittgenstein went away from some of the thoughts presented in the Tractatus, and continued to develop his new ideas that were posthumously published in the Philosophical Investigations. Yet the Tractatus remains by far his most popular book. Though Wittgenstein severely criticized Bertrand Russell for many of his views, the latter was magnanimous enough to describe his former pupil as, “the most perfect example I have ever known of genius as traditionally conceived; passionate, profound, intense, and dominating”. It is interesting to speculate what would have been the outcome of discussions between Bhartrihari and Wittgenstein if they lived at the same time. Just to give a glimpse of Wittgenstein’s way of thinking, we are giving here a small selection from his sayings in the Tractatus. It is written in what would be known in India as the sutra style. The mathematical part of the book has been omitted, and some statements have been abridged. We shall see in future some of the later ideas of Wittgenstien.) 1.1

The world is the totality of facts, not of things. 1.13 The facts in logical space are the world. 2. What is the case, the fact, is the existence of atomic facts 2.0201 Every statement about complexes can be analysed into a statement about their constituent parts, and into those propositions which completely describe the complexes. 2.0251 Space, time and colour (colouredness) are forms of objects. 2.04 The totality of existent atomic facts is the world. 2.1 We make to ourselves pictures of facts. 2.12 The picture is a model of reality. 2.225 There is no picture which is a priori* true. 3 The logical picture of the facts is the thought. 3.01 The totality of true thoughts is a picture of the world. 4.0 The thought is the significant proposition**. 4.01 The proposition is a picture of reality. 4.011 At the first glance the proposition – say

4.022

4.023

4.11

4.111

4.112

as it stands printed on paper – does not seem to be a picture of the reality of which it treats. But nor does the musical score appear at first sight to be a picture of a musical piece; nor does our phonetic spelling (letters) seem to be a picture of our spoken language. The proposition shows its sense. The proposition shows how things stand, if it is true. And it says, that they do so stand. . . . The proposition constructs a world with the help of a logical scaffolding, and therefore one can actually see in the proposition all the logical features possessed by reality if it is true. The totality of true propositions is the total natural science (or the totality of the natural sciences). Philosophy is not one of the natural sciences. (The word ‘philosophy’ must mean something which stands above or below, but not beside the natural sciences.) The object of philosophy is the logical clarification of thoughts.

*A priori is knowledge or judgement existing in our consciousness indepedndent of any experience.) **In logic and philosophy, proposition generally refers to the “content” or “meaning” of a declarative sentence which may be expressed in words or symbols.) ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

37


Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein

4.113 4.114

4.115 4.116

4.121

4.211

5.124 5.133 5.134 5.136 5.136 5.142 5.6

Philosophy is not a theory but an activity. A philosophical work consists essentially of elucidations. The result of philosophy is not a number of ‘philosophical propositions’, but to make propositions clear. Philosophy should make clear and delimit sharply the thoughts which otherwise are, as it were, opaque and blurred. Philosophy limits the disputable sphere of natural science. It should limit the thinkable and therby the unthinkable. It should limit the unthinkable from within through the thinkable. It will mean the unspeakable by clearly displaying the speakable. Everything that can be thought at all can be thought clearly. Everything that can be said can be said clearly. . . . That which mirrors itself in language, language cannot represent. That which expresses itself in language, we cannot express by language. It is a sign of an elementary proposition, that no elementary proposition can contradict it. A proposition asserts every proposition which follows from it. All inference takes place a priori. From an elementary proposition no other can be inferred. There is no causal nexus which justifies such an inferred. There is no causal nexus which justifies such an inference. A tautology* follows from all propositions: it says nothing. The limits of my language mean the limits of my world.

5.61

5.621 5.63 5.64

5.641

6.1 6.11

6.13

6.2

6.21 6.32 6.361

6.362

Logic fills the world: the limits of the world are also its limits. . . What we cannot think, that we cannot think: we cannot say, but it shows itself. The world and life are one. I am my world. (The microcosm.) Here we see that **solipsism strictly carried out coincides with pure realism. The I in solipsism shrinks to an extensionless point and there remains the reality coordinated with it. There is therefore really a sense in which in philosophy we can talk of a non-psychological I. The I occurs in philosophy through the fact that the ‘world is my world’. The philosophical I is not the man, not the human body or the human soul of which psychology treats, but the metaphysical subject, the limit – not a part of the world. The propositions of logic are tautologies. The propositions of logic therefore say nothing. (They are the analytical propositions). Logic is not a theory but a reflection of the world. Logic is transcendental. Mathematics is a logical method. The propositions of mathematics are equations, and therefore pseudopropostions. Mathematical propositions express no thoughts. The law of causality is not a law but the form of a law. In the terminology of Hertz we might say: only uniform connections are thinkable. What can be described can happen too, and what is excluded by the law of cau-

*Tautology: Needless repetition of ideas that nobody want to refute. **Solipsism: The philosophical position that nothing exists beyond oneself and one’s immediate consciousness). ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein

same time have two velocities, i.e. that at the same time it cannot be in two places, i.e. that particles in different places at the same time cannot be identical. 6.4 All propositions are of equal value. 6.41 The sense of the world must lie outside the world. In the world everything is as it is and happens as it does happen. In it there is no value – and if there were, it would be of no value. If there is a value which is of value, it must lie outside all happening and being-so. For all happening and beingso is accidental. What makes it non-accidental cannot lie in the world, for otherwise this would again be accidental. It must lie outside the world. 6.42 Hence also there can be no ethical propositions. 6.421 It is clear that ethics cannot be expressed. Ethics is transcendental. (Ethics and aesthetics are one.) 6.43 If good or bad willing changes the world, it can only change the limits of the world, not the facts; not the things that can be expressed in language. The world of the happy is quite another than that of the unhappy. 6.431 As in death, too, the world does not change, but ceases. 6.4311 Death is not an event of life. Death is not lived through. If by eternity is understood not endless temporal duration but timelessness, then he lives eternally who lives in the present. Our life is endless in the way that our visual field is without limit. 6.4312 The temporal immortality of the human soul, that is to say, its eternal survival after death, is not only in no way guaranteed, but this assumption in the first place will not do for us what we always

sality cannot be described. 6.363 The process of induction is the process of assuming the simplest law that can be made to harmonize with our experience. 63631 This process, however, has no logical foundation but only a psychological one. It is clear that there are no grounds for believing that the simplest course of events will really happen. 6.36311 That the sun will rise tomorrow, is an hypothesis; and that means that we do not know whether it will rise. 6.37 A necessity for one thing to happen because another has happened does not exist. There is only logical necessity. 6.371 At the basis of the whole modern view of the world lies the illusion that the socalled laws of nature are the explanations of natural phenomena. 6.372 So people stop short at natural laws as at something unassailable, as did the ancients at God and Fate. And they both are right and wrong. But the ancients were clearer, in so far as they recognized one clear terminus, whereas the modern system makes it appear as though everything were explained. 6.373 The world is independent of my will. 6.374 Even if everything we wished were to happen, this would only be, so to speak, a favour of fate, for there is no logical connection between will and world, which would guarantee this, and the assumed physical connection itself we could not again will. 6.375 As there is only a logical necessity, so there is only a logical impossibility. 6.3751 For two colours, i.g. to be at one place in the visual field, is impossible, logically impossible, for it is excluded by the logical structure of colour. Let us consider how this contradiction presents itself in physics. Somewhat as follows: That a particle cannot at the ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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Some Thoughts from Ludwig Wittgenstein

seen in the vanishing of the problem. (Is it not the reason why men to whom after long doubting the sense of life became clear, could not then say wherein this sense consisted?) 6.522 There is indeed the inexpressible. This shows itself; it is the mystical. 6.53 The right method of philosophy would be this. To say nothing except what can be said, i.e. the propositions of natural science, i.e. something that has nothing to do with philosophy: and then always, when someone else wished to say something metaphysical, to demonstrate to him that he has given no meaning to certain signs in his propositions. This method would be unsatisfying to the other – he would not have the feeling that we were teaching him philosophy – but it would be the only strictly correct method. 7. Whereof one cannot speak, thereof one must be silent.

tried to make it do. Is a riddle solved by the fact that I survive for ever? Is this eternal life not as enigmatic as our present one? The solution of the riddle of life in space and time lies outside space and time. (It is not problems of natural science which have to be solved.) 6.432 How the world is, is completely indifferent for what is higher. God does not reveal himself in the world. 6.44 Not how the world is, is the mystical, but that it is. 6.45 . . . The feeling of the world as a limited whole is the mystical feeling. 6.5 For an answer which cannot be expressed the question too cannot be expressed. The riddle does not exist If a question can be put at all, then it can also be answered. 6.52 We feel that even if all possible scientific questions be answered, then problems of life have still not been touched at all. . . Of course there is then no question left, and just this is the answer. 6.251 The solution of the problem of life is

(Adopted with thanks from The Wittgenstein Reader, edited by Anthony Kenny, published byBasil Blackwell Ltd.)

So Said Wittgenstein Don’t get involved in partial problems, but always take flight to where there is a free view over the whole single great problem, even if this view is still not a clear one. Philosophy is a battle against the bewitchment of our intelligence by means of language. What is your aim in Philosophy?” “To show the fly the way out of the fly-bottle” To believe in a God means to understand the question about the meaning of life. To believe in a God means to see that the facts of the world are not the end of the matter. To believe in God means to see that life has a meaning. ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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सं कृत पाठ-34 गीता के कुछ मरणीय

ोक-1

सं कृत सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है िक आप गीता को उसके मूल रूप म पढ़ सकते ह। कोई भी भारतीय केवल एक घंटा समय देकर छह महीने म मूल सं कृत म गीता पढ़ने की योग्यता ा कर सकता है। पितर्का म

तुत

सं कृत पाठ का िनमार्ण हमने इसी दृि से िकया है। हम िव ास है िक यिद आप पितर्का के सं कृत पाठ का अध्ययन करते रहे ह तो अब आप गीता के

क को अपने आप समझ सकगे।

यहा हम ँ गीता के कुछ ऐसे चुने हु ए आप इन

ोक दे रहे ह िजनका भाव भारतीय जीवन को भािवत करता रहा है। यिद

ोक को याद कर ल तो उससे आपके िचन्तन म िवशालता और गहराई अव य आएगी और आप अपना

जीवन अिधक साथर्क रूप से जी सकगे।

1.

नै नं िछन्दिन्त श ािण नै नं दहित पावक:। न चैनं े दयन्त्यापो न शोषयित मारुत:॥ (गीता 2.3) इस आत्मा को) श

नहीं काटते । आग इसे नहीं जलाती, पानी इसे गीला नहीं करता और हवा इसे नहीं सुखाती।

इनम से कोई भी आत्मा को भािवत नहीं कर सकता। ( नै नं (न+एनं ) इसको नहीं, पावक:ऱ आग, े दयिन्तऱ गीला करते ह, ि

का ेरणाथर्क रूप, आप:ऱ पानी,

सदै व बहु वचन म, शोषयितऱ सुखाती है, शु का ेरणाथर्क रूप, मारुत:ऱ हवा, ���ायु।)

2.

वासा िस ं जीणार्िन यथा िवहाय नवािन गृ ाित नरोऽपरािण। तथा शरीरािण िवहाय जीणार्ऱ न्यन्यािन संयाित नवािन दे ही॥ (2.22) जैसे कोई मनु य अपने फटे पुराने कपड़े उतार कर नए ा कर लेता है, उसी कार आत्मा पुराने शरीर को त्याग

कर नए शरीर को गर्हण कर लेता है। (वासा िसऱ ं कपड़े , वास

का 2ऱ 3, जीणार्िनऱ पुराने, िवहायऱ छोड़कर (िव+हा+य), अपरऱ दू सरा, संयाितऱ

चला जाता है।)

3.

असंशयं महाबाहो मनो दु िर्नगर्हं चल । अ यासेन तु कौन्ते य वैराग्येण च गृ ते ॥ (6.35)

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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सं कृत पाठ-34

हे अजुर्न, मनु य का मन िन य ही बहु त चंचल है, इसे िनयंितर्त करना बहु त किठन है परन्तु िनरं ्तर अ यास और वैराग्य से इसे िनयंितर्त या अनु शािसत िकया जा सकता है। (महाबाहोऱ महाबाहु का संबोधन कारक का रूप है, िजसकी भुजाएँ लंबी और बलशाली ह (अजुर्न), िनगर्ह:ऱ

िनयंतर्ण; अ यास:ऱ बार-बार

सासािरक ं िवषय से िवरि )

4.

यास करना, मन को अन्तमुर्खी करना; कौन्ते यऱ कुन्ती का पुतर्, अजुर्न; वैराग्य ऱ

िवहाय कामा य: सवार् पुमा चरित िन: पृह:। िनमर्मो िनरह ार: स शािन्त अिधगच्छित॥ (2.71) (अन्वय:ऱ य: पुमा सवार् कामा िवहाय, िन: पृह:, िनमर्म:, िनरहं कार: (च) चरित, स शािन्त अिधगच्छित।) िजस यि

ने सब इच्छाओं का पिरत्याग कर िदया है और जो संसार म आकाक्षारिहत ं होकर िवचरण कर रहा है,

और िजसके मन म अिभमान की भावना नहीं है, ऐसे यि

को शािन्त ा होती है।

(पुमा ऱ मनु य, िन: पृहऱ इच्छारिहत, िनमर्म:ऱ ममत्व की भावना से रिहत, िनरहंकार:ऱ अिभमान रिहत)

5.

आपू यम र् ाण अचल ित ं समुदर्माप: िवशिन्त य त

कामा यं िवशिन्त सव स शािन्तमा ोित न कामकामी॥ (2.70)

(अन्वय:ऱय शािन्त

आपूयर्माण

अचल ित ं समुदर्

आप:

िवशिन्त, त

यं सव कामा:

िवशिन्त स

आ ोित, न (तु) कामकामी।)

पू रे भरे हु ए और अचल ि थित वाले समुदर् म िजस कार निदय के जल आकर िमलते ह, उसी कार िजस मनु य म इच्छाएँ िव होती ह उसे ही शािन्त िमलती है, इच्छाओं के पीछे भागने वाले यि (आपू यम र् ाण

ि थितवाले, आप:ऱ जल (बहु व.), य

6.

को नहीं।

ऱ आ+पू र् का कमर्वाच्य, वतर्मानकािलक कृदन्त रूप, भरे जाते हु ए, अचल ित ंऱ ि थर ऱ त

ऱ जैसे . . .वैसे, कामकामीऱ इच्छाओं के पीछे भागने वाला यि )

सुखदु :खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युध्दाय युज्य व नै वं पापमवा यिस॥ (2.38) तू सुख और दु :ख, हािन और लाभ, जय और पराजय को समान रूप म गर्हण कर और यु

के िलए तैयार हो जा।

इस कार का आचरण करते हु ए तुझे पाप नहीं लगे गा। (सुखदु :खे (सुख+दु ःख) , लाभालाभौ (लाभ+अलाम), जयाजयौ (जय+अजय) इनम

न्

समास है,

युज्य वऱ तैयार हो जा)

7.

न हृ ये ि यं ा य नोि जे ि थरबुि : अस मूढो (अन्वयःऱ ि यं

ाय न

हृ ये , च अि यं

ा य चाि य ।

िव

िण ि थत:॥ (5.20)

ा य न उि जे । ि थरबुि : अस मूढ:,

(भवे )।) ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

42

िव

िण ि थत:


सं कृत पाठ-34

मनु य को िकसी ि य व तु को ा करके स नहीं होना चािहए। इस कार ािन्त से रिहत ि थर बुि

नहीं होना चािहए और िकसी अि य व तु को पाकर उि ग्न भी की अव था म रहने वाला यि

को जानकर

म ि थत

रहता है। ( +हृ

होना; उ +िव

ऱ उि ग्न होना; अ+स +मूढ:ऱ अिवक्षु ध अ िमत;

िव

को

जाननेवाला; -िव =जाननेवाला।)

8.

िनयतं कुरु कमर् त्वं कमर् ज्यायो

कमर्ण:।

शरीरयातर्ािप च ते न िसद्ध्येदकमर्ण:॥ (3.8) (अन्वय:ऱ त्वं िनयतं कमर् कुरु। अकमर्ण: िह कमर् ज्याय:। ते शरीरयातर्ा अिप च अकमर्ण: न

िसद्ध्ये ।)

तू अपने िलए िनयत कमर् अव य कर क्य िक कमर् न करने से कमर् करना अिधक अच्छा है। और यिद तू कमर् नहीं करे गा तो ते रे शारीिरक कायर् भी नहीं चल सकगे । (ज्याय:ऱ -से होना, यहा ँ

9.

है, शरीरयातर्ाऱ शरीर की यातर्ा, जीवन के िदन

ित िदन के कायर्;

+ िस ऱ िस

उपसगर् का कोई िवशेष अथर् नहीं है।)

कमर्ण्येवािधकार ते मा फलेषु कदाचन। मा कमर्फलहे तुभर्ू: मा ते स ोऽ त्वकमर्िण॥ (2.47) (अन्वय:ऱ ते अिधकार: कमर्िण एव, कदाचन फलेषु मा, (त्वं) कमर्फलहे तु: मा भू:, ते संग: अकमर्िण मा अ तु।) तुझे कमर् करने का अिधकार है, उनके फल पर ते रा कोई अिधकार नहीं। तुझे अपने ारा िकए हु ए कम के फल के

हे तु कारण नहीं बनना चािहए। (साथ ही) तुझे कमर् से िवमुख भी नहीं होना है। (मा कदाचनऱ कभी नहीं, हे तु:ऱ कारण, कमर्फलहे तु:ऱ अपने

ारा िकए हु ए कम के फल का कारण, बहु ीिह

समास, मा भू:ऱ मत बन, भू लुङ् iiऱ i, अभू: के अ का लोप)

10.

जहाित यदा कामा सवार् पाथर् मनोगता । आत्मन्येवात्मना तु : ि थत

तदोच्यते ॥

(अन्वय:ऱअजुर्न, यदा मनु य: मनोगता सवार् कामा तदा ि थत

(2.55)

जहाित, (यदा च) आत्मिन आत्मना एव तु : (भवित)

: उच्यते।)

(मनोगत:ऱ मनिसगत:ऱ मन म िवचार करते हु ए; आत्मन्येवात्मन:= आत्मिन+ एव + आत्मन:; ि थता य य, ि थत

:ऱ ऐसा यि

िजसकी बुि

हे अजुर्न, जब मनु य मन म िव मान सारी इच्छाओं को छोड़ दे ता है और जो अपने ही संतु

रहता है तब उसे ि थत

ि थर हो) ारा अपने आप से

(ि थर बुि वाला) कहते ह।

11. दु :खे वनु ि ग्नमना: सुखेषु िवगत पृह:। वीतरागभयकर्ोध: ि थतधीमुर्िनरुच्यते ॥

(2.56)

(अन्वय:ऱ(यदा मनु य:) दु :खेषु अनु ि ग्नमना: (भवित), सुखेषु िवगत पृह: (भवित), वीतरागभयकर्ोध: (च ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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सं कृत पाठ-34

भवित, तदा स:) ि थतधी: मुिन: उच्यते।) जो यि रिहत यि

न तो दु ःख या क आने पर परे शान होता है और न सुख के पीछे भागता है, ऐसे राग, भय और कर्ोध से

को ि थर बुि वाला मुिन कहते ह।

(अनु ि ग्नमना:ऱ िजसका मन उि ग्न, नहीं है; िवगत पृह:ऱ िजसकी इच्छाएँ समा कर्ोध:ऱ

हो गई ह; वीतरागभयऱ

जो राग, भय, कर्ोध से ऊपर उठ गया है। अनु ि ग्नमना:, िवगत पृह:, वीतरागभयकर्ोध: और ि थतधी: म

बहु ीिह समास है)

12. यो न हृ यित न े ि न शोचित न का ित। शु भाशु भपिरत्यागी भि मा य: स मे ि य:॥ (12.17) जो कभी हषर्, े ष या शोक नहीं करता और कभी िकसी चीज़ की आकाक्षा ं नहीं करता, जो शु भ और अशु भ दोन को छोड़ दे ता है, ऐसा भि मान यि (भि मा ऱ भि

मुझे ि य है।

की भावना से यु , इसम -म

त्यय का अथर् है उससे यु ।)

13. तु यिनन्दा तुितम नी सन्तु ो येन केनिच । अिनकेत: ि थरमित: भि मा मे ि यो नर:॥ (12.19) (अन्वय:ऱ(य:) तु यिनन्दा तुित:, मौनी, येन केनिच

सन्तु :, अिनकेत:, ि थरमित:, भि मा

(अि त), स

मे ि य:।) िनं दा और शंसा िजसके िलए दोन समान हंै, जो मौन रहना पसंद करता है, और जो हर व तु से संतु रहता है, िजसकी िकसी थान म आसि

नहीं है, और िजसकी बुि

ि थर है और भि भाव से यु

(अ + िनकेत:ऱ िजसका कोई घर नहीं है या िजसकी िकसी थान म आसि

है, ऐसा यि

मुझे ि य है।

नहीं है।)

14. योग थ: कुरु कमार्िण स ं त्यक्त्वा धन य। िसद्ध्यिसद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ (2.48) (अन्वय:ऱ धन य, स ं त्यक्त्वा, िसद्ध्यिसद्ध्यो: समो भूत्वा, योग थ: कमार्िण कुरु। समत्वं योग उच्यते।) हे अजुर्न! तू योग म ि थत हो और िकसी कायर् की िसि रखते हु ए आसि

और अिसि

यानी सफलता और असफलता म समान भाव

रिहत होकर कमर् कर। समत्व की भावना को ही योग कहते ह।

(योग थ:ऱ योग म ि थत होकर; धनं जयऱ धन को जीतने वाला, अजुर्न की उपािध; िसि िसद्ध्यिसद्ध्यो:ऱ सफलता या असफलता म, इस श द म संिध और

15. न िह

न्

+ अिसद्ध्यो: =

समास दोन ह।)

ाने न सदृशं पिवतर्िमह िव ते ।

तत् वयं योगसंिस : कालेनात्मिन िवन्दित॥ (4.38) इस संसार म

ान के समान पिवतर् और कुछ नहीं है। योग म िस

होकर यि

समय आने पर उस

ान को अपने

अंदर ा कर लेता है। (अन्वय:ऱ इह िह

ानेन सदृशं पिवतर्ं न िव ते, योगसंिस ः त

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

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कालेन वय

आत्मिन िवन्दित।)


सं कृत पाठ-34

16. या िनशा सवर्भूताना त ं या जागिर् ं त संयमी। य या जागर्ित भूतािन सा िनशा प यतो मुने:॥ (2.69) (अन्वय:ऱ या सवर् भूताना ं िनशा त या ं संयमी जागिर्त सा प यतो मुने: िनशा।) सामान्यत: ािणय के िलए जो रात होती है योगी उसम जागता रहता है, और िजसम सामान्य जन जागते ह वह मुिनय और संयमी यि य के िलए रात होती है। (जागर्ितऱ वतर्मान काल म जागृ के अन्यपुरुष के बहु वचन का रूप (जागिर्त, जागर्त:, जागर्ित)। कुछ िकर्याओं के वतर्मान काल के अन्यपुरुष के बहु वचन म

नही��� होता। प यत:ऱ दृ

धातु के वतर्मान कािलक कृदन्त रूप प य

का 6ऱ 1)।

17. चतुिर्वधा भजन्ते मा जना: ं सुकृितनोऽजुर्न। आत िज ासुरथार्थीर्

ानी च भरतषर्भ॥ (7ऱ 16)

(अन्वय:ऱ भरतषर्भऱ चतुिर्वध: सुकृितन: जना: मा ं भजन्ते, आतर्:, िज ासुऱ अथार्थीर् च भरतवंिशय म

ानी।)

हे अजुर्न, चार कार के सत्कमीर् लोग मे री उपासना करते ह। इनम कुछ दु :खी होते ह, कुछ

िज ासु (जानने की इच्छा रखने वाले) होते ह, कुछ वाथीर्, और कुछ

ानी होते ह।

(सुकृित ऱ अच्छे कम वाला, 1ऱ 3,; अथर् + अथीर्=अथार्थी, अथर्:ऱ धन, पैसा, अथीर्ऱ चाहने वाला, (िव ाथीर्ऱ िव ा चाहने वाला, छातर्); भरतषर्भ:ऱ भरतवंश के लोग म

े , अजुर्न का िवशेषण है)।

18. सवर्त: पािणपादं त सवर्तोऽिक्षिशरोमुख । सवर्त:

ुितम ोके सवर्मावृत्य ित ित॥ (13.13)

(अन्वय:ऱ त

सवर्त: पािणपादं सवर्त: अिक्ष िशरो मुखं, सवर्त:

ुितमत लोके सवर्

आवृत्य ित ित।)

उस परमात्मा) के हाथ और पैर सभी जगह ह, उसी कार उसकी ऑंख, िसर तथा मुख भी सवर्तर् ह। उसके कान भी सभी िदशाओं म ह। ऐसा ई र सारे िव

म या है और उसे चार ओर से आवृत िकए हु ए है।

(सवर्त:ऱ चार ओर, अिक्ष और िशर िशरसी, िशरािस; ं

ुितऱ कान,

वणशि ;

दोन नपुस ं किंलग की सं ाएँ हऱ अिक्ष, अिक्षणी, अक्षीिण; िशर:, ुितम

+ लोके =

ुितम ोके, यिद

के बाद

हो तो,

बदल जाता है।)

19. समं सवषु भूतेषु ित न्तं परमे

र ।

िवन यत्सु अिवन यन्तं य: प यित स: प यित॥ (13.27) अन्वय:ऱसवषु भूतेषु समं ित न्तं, िवन यत्सु अिवन यन्तं परमे (ित न्त , ित 3। िवन य

िव+न

रं य: प यित स: प यित।

का 2ऱ 1, था (ठहरना, रहना) का वतर्मान कािलक कृदन्त, िवन यत्सु, िवन य (न

का 7ऱ

होना) का वतर्मान कािलक कृदन्त है।)

संसार के सभी ाणी नाशवान ह, उन सभी म अिवनाशीऱ परमात्मा समान रूप से िव मान है। जो मनु य इस बात को समझता है या दे खता है, वही वा तव म दे खता है। ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

45

(जारी)


-चचार् ऱ िपछले कुछ समय से आप मानिवकी म िशक्षा के

वै ािनक ढं ग से अध्ययन करते ह। वैसे मनोिव ान के

िवषय म चचार् करते रहे ह। मानिवकी का मूल आशय

िव ान भी अपने िवषय को िव ान का िवषय मानते ह।

क्या है और उसम िकस

वै ािनक होना आजकल फैशन है।

कार के िवषय शािमल हय़

िट पणीऱ हमारे िलए मानिवकी (humanities) नया

ऱ और धमर्य़

श द है और वतर्मान िव िव ालयी िशक्षा के साथ आया

िट पणीऱ धमर् मानिवकी का बहु त बड़ा भाग है, पर

है, वैसे ही जैसे अकादिमक क्षेतर् म वतर्मान अिधकतर

हमारी वतर्मान िशक्षा- यव था म धमर् पर अकादिमक

िवषय पि म के अनु करण पर हमारे सामने आए ह।

वातावरण म चचार् करना किठन है। धमर् को िनजी आ था

हमारे दे श की वैचािरक परंपरा म पहले इस

का िवषय मान िलया गया हैै, इसिलए उसे िशक्षा-

कार का

िवभाजन नहीं था। मानव जीवन के सभी क्षेतर् दशर्न और

सं थाओं के पा

धमर् के अंतगर्त आते थे। अव य ही धमर् से आशय वह

य िप धािर्मक सं थाओं

नहीं था जो आजकल िलया जाता है। िरिलजन से

म धमर् को िशक्षा म थान िदया जाता है।

ारा चलाए जा रहे िव ालय

ऱ क्या मानिवकी के िवषय के अध्ययन से मनु य को

उसका कोई संबध नहीं था। सभी िवषय िजनका संबध ं बाहर की दु िनया से न होकर

कर्म म शािमल नहीं िकया जाता,

समझने म सहायता िमलती हैय़

वयं मनु य से है वे सभी मानिवकी के क्षेतर् म

िट पणीऱ यह इस पर िनभर्र करता है िक िकसी िवषय

आते ह या कम से कम आने चाहए। उदाहरण के िलए,

का अध्ययन कैसे िकया जा रहा है। आजकल की िशक्षायव था म तो मानिवकी के िवषय भी उसी

सािहत्य, दशर्न, इितहास, राजनीितशा , समाजशा ,

कार पढ़े

और पढ़ाए जाते ह िजस कार िव ान के िवषय। उनसे

मनोिव ान, और इनके जैसे सभी िवषय मानिवकी म सि मिलत ह।

मनु य को समझने म शायद ही कभी कोई मदद िमलती

ऱ और सामािजक िव ानय़

हो। उदाहरण के िलए, यह कतई आव यक नहीं िक

िट पणीऱ सामािजक िव ान के िवषय भी मानिवकी के

मनोिव ान पढ़ने के बाद कोई मनु य के मन को अिधक

ही अंग ह।

अच्छी तरह समझ सके।

ऊपर िगनाए

राजनीितशा , समाजशा

गए

िवषय

इितहास,

ऱ ऐसा क्य य़

आिद सभी मानिवकी म

िट पणीऱ मनु य के मन का उसी कार से अध्ययन नहीं

सि मिलत ह।

िकया जा सकता िजस कार, उदाहरण के िलए, िकसी

ऱ पर सामािजक िव ान के िवषय को ायः मानिवकी

िशलाखंड का।

से अलग माना जाता है। िट पणीऱ यह शु

अकादिमक िवभाजन है और सवर्था

ऱ पर क्य य़ िट पणीऱ कारण प

कृितर्म है। सामािजक िव ान के िवषय के िव ान को

है। मनु य के मन की कोई पहचान

लगता है िक मानिवकी के िवषयऱ दशर्न, सािहत्य,

नहीं है। जब दो वै ािनक िकसी िशलाखंड के बारे म

मनोिव ान आिद वायवीय िवषय हंै, जबिक सामािजक

बात कर रहे होते ह तो वह िशलाखंड उन दोन के

िवषय के िव ान समाज और उसकी सम याओं का

बाहर होता है। वे दोन उस िशलाखंड के आकार,

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

46


-चचार्

वज़न, रासायिनक संरचना आिद के बारे म सहमत हो

पीछे होता जा रहा है।

सकते ह। उसके बाद वे पता करने की कोिशश कर

दशर्न और मनोिव ान के क्षेतर् म भी मान्यताएँ

सकते ह िक वह िशलाखंड कहा ँ से आया होगा।, िकस

िनरंतर बदल रही ह। ि तीय महायु

काल का होगा, आिद। वे जानने का

यास करगे िक

के क्षेतर् म ही िकतनी मान्यताएँ आईं और चली गईं। आज

कार की संरचनावाली च ान कहा ँ ह। यिद वे

अि तत्ववाद के बारे म कहीं चचार् नहीं होती। पहले आप

उस

समुदर् की गहराई म ह तो वहा ँ भी वे खोजने का

यास

के बाद सािहत्य

िबना अि तत्ववाद को बीच म लाए सािहत्य के बारे म कोई चचार् ही नहीं कर सकते थे

करगे। यहा ँ तक िक यिद उस तरह की च ान चंदर्मा या मंगल पर ह तो उनकी िज ासा उन्ह उधर भी ध्यान दे ने

मनु य के आंतिरक जीवन के बारे म कोई भी

के िलए ेिरत करे गी।

मान्यता लंबे समय तक िटक नहीं सकती क्य िक मनु य

पर मन के बारे म बात करते हु ए दो मनोवै ािनक

का अध्ययन वै ािनक ढं ग से नहीं िकया जा सकता।

यह तो कह सकते ह िक वे मन के बारे म बात कर रहे

वैसा कर सकना सवर्था असंभव है, तािर्कक रूप से भी

ह, पर मन से आशय क्या है, इसपर उनके िलए सहमत

और यावहािरक रूप से भी। ऱ पर मनु य के बारे म िज ासा तो बहु त वाभािवक

होना असंभव है। ऱ पर मनोिव ान की पु तक म तो यही िलखा होता

है। मनु य यिद अपने आप को नहीं जानेगा तो उसके

है िक मनोिव ान मन से संबिं धत अध्ययन है।

िलए दु िनयाभर को जान लेने का क्या फायदाय़

िट पणीऱ मनु य श द से अपने को बहु त धोखा दे सकता

िट पणीऱ यह आपने बहु त महत्त्व की बात कही है।

है। केवल इसिलए िक कहा जा रहा है िक मनोिव ान म

मनु य के िलए सबसे महत्त्वपूणर् है अपने आपको जानना,

मन का अध्ययन िकया जाता है, यह सािबत तो नहीं हो

और इसके िलए उसे कहीं नहीं जाना। उसे बस

जाता िक िजसका अध्ययन िकया जा रहा है वह वा तव

अपने आपको समझना है, और वह भी अपने

म मन ही है। उसी

वयं

यास से।

ऱ पर इसके िलए कुछ तो पढ़ना पढ़े गा।

कार जैसेिक जब धमर् म ई र के

बारे म बात की जाती है तो हो सकता है िक उसका

िट पणीऱ चाह तो अव य पिढ़ए, पर यह ध्यान म रख

ई र से कोई भी संबध ं न हो। श द अपने आपको और

िक मनु य के आंतिरक जीवन से संबिं धत श द का अथर्

दू सर को धोखा दे ने के बहु त बड़े माध्यम ह।

िनि त नहीं होता। उन श द का जो अथर् लेखक के िलए है, हो सकता है वह आपके िलए न हो, और आपके

ऱ तो िफर मनोिव ान म और मानिवकी के अन्य िवषय म अध्ययन करने का अच्छा उपाय क्या होगाय़

िलए जो अथर् है वह आपके िमतर् के िलए न हो। और यह

िट पणीऱ पहले तो यह समझना होगा िक मानिवकी के

भी संभव है िक िकसी श द का जो अथर् आज आपके

सभी अध्ययन का िवषय मनु य

िलए है वह कल न रहे । अपने दे श म माक्सर्वाद और

वयं है। इसका अथर्

हु आ िक आप उन सभी िवषय के माध्यम से वयं अपने

समाजवाद के इितहास के अध्ययन से यह बात प

आपका अध्ययन कर रहे ह। यिद आप अपने आपको

जाएगी।

नहीं समझते तो दशर्न, इितहास, मनोिव ान आिद म से

यह आव यक है िक हम सभी

िकसी म कुछ नहीं समझ सकगे।

कार के मतवाद

से अलग हटकर मनु य और उसके समाज के बारे म

ऱ पर इितहास म, िवशेषकर माक्सर्वादी दशर्��� म,

िचन्तन कर।

यह दावा िकया जाता है िक उसम मनु य के जीवन को

ऱ पर िविभ

समझने की वै ािनक प ित िवकिसत कर ली गई है। िट पणीऱ जब कोई बात वै ािनक रूप से िस

हो

वाद के अनु यायी पर पर िमल-बैठकर

संवाद नहीं करते। वे सदा अपने मतवाद को ही सही

हो जाती

िस

करने का

यास करते रहते ह। उन लोग म

है तब उसपर तब तक सहमित बनी रहती है जब तक

िवचार-िविनमय होता िदखाई नहीं दे ता।

उसका खंडन करने के िलए कोई नया िस ातं सामने न

िट पणीऱ इससे प

आए। माक्सर्वाद का िस ातं िबना िकसी नए िस ातं के

िलए इच्छु क नहीं ह। वेद म आदशर् रखा गया थाऱ आ

है िक वे वा तव म सत्य जानने के

सामने आए खंिडत होता जा रहा है। ऐसा नहीं है िक

नो भदर्ाः कर्तवो यंतु िव तःऱ हमारे पास अच्छे िवचार

पूँजीवाद सही सािबत हो गया है इसिलये माक्सर्वाद

चार ओर से आएँ। हम हर गंभीर िचन्तक के िवचार का

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

47


-चचार्

वागत करना चािहए भले ही उसके िवचार हमारे

िट पणीऱ इसम आपको पु तक से सहायता िमलने की

िवचार से मे ल नहीं खाते ह ।

संभावना बहु त कम है।

ऱ पर ऐसा होता क्य नहीं हैय़

ऱ तो मुझे क्या करना हैय़

िट पणीऱ क्य िक हमारे िव ान अपने सीिमत िचन्तन से

िट पणीऱ पतंजिल कहते ह िक मनु य जब अपने मन की

बाहर नहीं िनकलना चाहते। उनम बहु त बड़ी मातर्ा म

सारी हलचल शातं कर लेता है केवल तभी वह जानता

बौि क आल य िव मान है। गंभीरता की कमी है।

है िक वह कौन है। मन को शातं कीिजए, आप अपने

यिद िकसी डाक्टर की मा ँगंभीर रूप से बीमार ह

आपको जान जाएँगे।

और उसके अपने इलाज से फायदा नहीं हो रहा हो तो वह अपने अहं कार के कारण दू सरे डाक्टर से सलाह

ऱ तो इसका मतलब हु आ िक म कुछ पढ़ूँ नहीं। िट पणीऱ नहीं, ऐसा नहीं है। आप पिढ़ए, पर जो पढ

लेने से मना नहीं करे गा। यिद हम अपने समाज और दे श

उसकी याख्या अपनी ओर से कीिजए। िकसी के श द

को सचमुच यार करते ह तो हम अपने मतवाद पर

से अपने आपको बािधए ँ नहीं।

आगर्ह छोड़कर दे श की सम याओं को सुलझाने के िलए सि मिलत

जब आप श द से अपने आपको मु

यास पर सहमत होने के िलए तैयार ह गे।

कर लगे तो

अपने आपको, और इसिलए मानिवकी के सभी िवषय

ऱ पर वाद या िवचारधाराओं से मनु य और उसके

को, समझने का सूतर् आपके हाथ लग जाएगा। ऱ पर आप जो कह रहे ह वह क्या यावहािरक है।

समाज को समझने म कुछ तो सहायता िमलती है। िट पणीऱ यिद सहायता िमलती होती तो मनु य-समाज

िट पणीऱ यिद हम लगता है िक मनु य जाित के इितहास

बहु त

गित कर चुका होता। अपने समाज को सुधारने

म जो भी मागर् अपनाएँ गए ह उनम से िकसी को

का यास करने से पहले मनु य को वयं अपने आपको

अपनाकर हम आगे बढ़ सकते ह तो हम अव य वैसा

समझना होगा। और अपने आपको समझने म दू सर के

करना चािहए। पर यिद हम लगता है िक उन माग म

िवचार सहायता नहीं करते,

बुिनयादी कमी यह थी उन्ह मनु य की मूल

ािन्त ही पैदा करते ह।

कृित को

ऱ पर यिद हम कहीं से कुछ भी न पढ़ तो अपने बारे

समझे िबना िवकिसत िकया गया था तो जो कुछ मनु य

म िवचार कैसे करगेय़ िबना रा ते तो हम कहीं भी नहीं

जाित ने अब तक िकया है हम उस सभी पर पुनिर्वचार

पहँुच सकगे। कोई रा ता तो होना चािहए हमारे सामने।

करना चािहए। आव यकता इस बात की है िक हम मनु य-

िट पणीऱ आंतिरक जीवन कहीं पहु ँचने के िलए नहीं है। ए डस हक् ले ने कहा है िक हमारे सभी

यास का

समाज को समझने से पहले मनु य को समझ। आज

उ े य वहा ँ पहु ँचना है जहा ँ हम िब कुल

ारंभ से ह।

हमने िवकास का अथर् केवल भौितक िवकास से ले

हमारी मानिसक-बौि क यातर्ा का ल य हम अपने आप

िलया है । िकसी सीमा तक भौितक िवकास आव यक है

तक ले जाना है।

और आज के िव ान और टै क्ननालाजी ने इसके िलए

ऱ पर हमारे िव िव ालय म मनु य के जीवन से

अने क उपाय हम िदए ह िजनका हम फायदा उठाना

संबिं धत इतने िवषय की िशक्षा दी जाती है। उनम नए-

चािहए। पर यिद केवल भौितक िवकास से ही मनु य के

नए अनु सध ं ान हो रहे ह, नई-नई पु तक आ रही ह।

जीवन की सम याएँ सुलझ जातीं तो िवकिसत दे श के

िट पणीऱ यिद आपकी रुिच है तो उन्ह अव य पिढ़ए।

लोग सबसे सुखी जीवन िबता रहे होते । पर ऐसा होता

ऱ आपके कहने से लगता है िक उन्ह पढ़ने से कुछ

िदखाई नहीं दे रहा।

िमलेगा नहीं।

भौितक जीवन सुिवधा दे सकता है, जीवन म अथर्

िट पणीऱ पढ़कर दे िखए। कबीरदास कह गए हऱ पोथी

नही दे सकता। जीवन का अथर् मनु य को तभी समझ

पिढ़-पिढ़ जग मुआ पंिडत भया न कोय। उनके बहु त

आएगा जब वह अपनी दृि

पहले उपिनष

के ऋिष ने कहा थाऱ अिव ातं

करना आज की िशक्षा म संभव नहीं है। इसिलए िशिक्षत

ऱ जो कहते ह िक हम जानते ह वे नहीं

लोग को समाज की भलाई के िलए जो करना चािहए वे

िवजानता

वह नहीं कर पा रहे ह।

जानते। ऱ पर म अपने आपको जानना चाहता हू ँ। ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, +ÆEò-32, ¨ÉÉSÉÇ 2014

अंदर की और मोड़े गा। ऐसा

न उनके पास इच्छा ही है, न दृि 48

ही।


ªÉ½þ {ÉÊjÉEòÉ ÊVɺÉä +É{É nùäJÉ ®ú½þä ½þé, EòÉä<Ç ºÉɨÉÉxªÉ {ÉÊjÉEòÉ xɽþÓ ½þè* ªÉ½þ ÊEòºÉÒ ®úÉVÉxÉèÊiÉEò ªÉÉ vÉÉʨÉÇEò ºÉÆMÉ`öxÉ Eäò |É¸ÉªÉ ºÉä SɱÉÉ<Ç VÉÉxÉä´ÉɱÉÒ {ÉÊjÉEòÉ xɽþÓ ½þè* <ºÉ¨Éå ÊEòºÉÒ ¦ÉÒ ´ÉÉnù EòÉä ±ÉäEò®ú ÊEòºÉÒ ¦ÉÒ iÉ®ú½þ EòÒ, |ÉiªÉIÉ ªÉÉ +|ÉiªÉIÉ xÉÉ®úä¤ÉÉWÉÒ xɽþÓ ½þÉäMÉÒ* ´ÉɺiÉ´É ¨Éå ½þ¨ÉÉ®úÉ |ɪÉÉºÉ ½þÉäMÉÉ ÊEò ½þ¨É +{ÉxÉä {ÉÉ`öEòÉå EòÉä ºÉ¦ÉÒ |ÉEòÉ®ú Eäò ´ÉÉnùÉå ºÉä >ð{É®ú =`öÉEò®ú =ºÉ ºÉiªÉ iÉEò {ɽþÖÄSÉxÉä ¨Éå ºÉ½þɪÉiÉÉ Eò®úå VÉÉä ºÉ¦ÉÒ ´ÉÉnùÉå, ªÉ½þÉÄ iÉEò ÊEò ºÉ¦ÉÒ ¶É¤nùÉå Eäò {É®úä ½þè* ¦ÉÉ®úiÉ ¨Éå ºÉÉvÉxÉÉ Eäò uùÉ®úÉ <ºÉ ºÉiªÉ EòÉä JÉÉäVÉxÉä EòÒ {É®úÆ{É®úÉ ®ú½þÒ ½þè +Éè®ú ½þ¨É =ºÉ {É®úÆ{É®úÉ EòÉä BEò ¤ÉÉ®ú Ê¡ò®ú, {ɽþ±Éä ºÉä ʴɶÉÉ±É +Éè®ú ´ªÉɴɽþÉÊ®úEò {ÉÊ®ú|ÉäIªÉ ¨Éå, +É{ÉEäò ºÉ¨¨ÉÖJÉ |ɺiÉÖiÉ Eò®úxÉÉ SÉɽþiÉä ½þé* ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ Eäò´É±É ºÉèrùÉÆÊiÉEò {ÉÊjÉEòÉ xɽþÓ ½þè* ªÉÊnù ¶É¤n,ù BEò +Éä®ú +xÉÖ¦ÉÚÊiÉ +Éè®ú nùںɮúÒ +Éä®ú Eò¨ÉÇ EòÉä |ɦÉÉÊ´ÉiÉ xɽþÓ Eò®úiÉä iÉÉä =xÉEòÉ EòÉä<Ç ¨ÉÚ±ªÉ xɽþÓ ½þè* ½þ¨É +{ÉxÉä ºÉ¦ÉÒ Ê´ÉSÉÉ®úÉå EòÉä <ºÉ oÊù¹] ºÉä |ɺiÉÖiÉ Eò®úåMÉä ÊEò ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ ÊSÉxiÉxÉ ÊEòºÉ |ÉEòÉ®ú ½þ¨ÉÉ®úÒ ´ÉèªÉÊHòEò, ºÉɨÉÉÊVÉEò, ¶ÉèÊIÉEò, vÉÉʨÉÇEò, +Éè®ú +ÆiÉ®úÇɹ]õÅõÒªÉ ºÉ¨ÉºªÉÉ+ÉäÆ EòÉä ºÉÖ±ÉZÉÉxÉä ¨Éå ½þ¨ÉÉ®úÒ ºÉ½þɪÉiÉÉ Eò®ú ºÉEòiÉÉ ½þè, +Éèè®ú <ºÉ ºÉƤÉÆvÉ ¨Éå ´ªÉɴɽþÉÊ®úEò ºÉÖZÉÉ´É nùäxÉä EòÉ |ɪÉÉºÉ Eò®úåMÉä* <ºÉ |ɪÉÉºÉ ¨Éå +É{ÉEäò ºÉ½þªÉÉäMÉ EòÒ |ÉÉlÉÇxÉÉ ½þè*

¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ EòÒ ¨ÉÖÊpùiÉ |ÉÊiÉ EòÉ OÉɽþEò ¤ÉxÉxÉä Eäò ʱÉB BEòò |ÉÊiÉ 20 ¯û. ´ÉÉʹÉÇEò (ºÉÉvÉÉ®úhÉ b÷ÉEò ºÉä) 240 ¯û. {ÉÖºiÉE ɱɪÉÉå Eäò ʱÉB ´ÉÉʹÉÇEò 350 ¯û. Ê´ÉtÉÊlÉǪÉÉå Eäò ʱÉB ´ÉÉʹÉÇEò 100 ¯û. EÚòÊ®úªÉ®ú ºÉä ´ÉÉʹÉÇEò (BxÉ.ºÉÒ.+É®ú. ºÉʽþiÉ =kÉ®úÒ ¦ÉÉ®úiÉ) 400 ¯û. EÚòÊ®úªÉ®ú ºÉä ´ÉÉʹÉÇEò ¦ÉÉ®úiÉ ¨Éå +xªÉjÉ 500 ¯û. Ê´Énùä¶É ¨Éå ´ÉÉʹÉÇE, (½þ´ÉÉ<Ç b÷ÉEò ºÉä) 40 +¨ÉäÊ®úEòÒ b÷ɱɮú +Éìxì ɱÉÉ<ÇxÉ ºÉnùºªÉiÉÉ ¶ÉÖ±Eò VɨÉÉ Eò®úxÉä Eäò ʱÉB: Bharat Sandhaan, Current Account No.: 604520110000565, Bank of India, Saket Branch, New Delhi, IFSC: BKID0006045

®úÉ榃 ¨ÉxÉÒ+Éb÷Ç®ú, ¤ÉéEò b÷ÅÉ}]õ ªÉÉ SÉèEò ºÉä ‘¦ÉÉ®úiÉ ºÉÆvÉÉxÉ’ Eäò xÉÉ¨É ºÉä ¦ÉäVÉå* Ênù±±ÉÒ Eäò ¤Éɽþ®ú Eäò SÉèEò Eäò ʱÉB 50 ¯û. +ÊiÉÊ®úHò VÉÉäcäÆ ºÉÉlÉ ¨Éå ÊxɨxÉʱÉÊJÉiÉ VÉÉxÉEòÉ®úÒ nùäxÉä EòÒ EÞò{ÉÉ Eò®úå: xÉɨÉ, {ÉiÉÉ, Ê{ÉxÉEòÉäb÷, ¡òÉäxÉ xÉ. ´É <Ç-¨Éä±É* ¦ÉÉ®úiÉ-ºÉÆvÉÉxÉ, VÉä-56 ºÉÉEäòiÉ, xÉ<Ç Ênù±±ÉÒ-110017. ¡òÉäxÉ 011-41764317


DL (S)-17/3432/2013-15, Regd. No. DELBIL/2013/48298 Date of Dispatch: 7 & 8, P.O.: Lodhi Road, New Delhi

ºÉÞʹ]õ EòÉ +ÆÊiÉ¨É ºÉiªÉ +Éè®ú ½þ¨ÉÉ®úÉ VÉÒ´ÉxÉ • ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ +ÉvªÉÉÊi¨ÉEò JÉÉäVÉ Eäò +xÉÖºÉÉ®ú {ÉÚ®äú Ê´É·É ¨Éå +ÆÊiÉ¨É ºÉiªÉ Eäò °ü{É ¨Éå BEò ½þÒ SÉèiÉxªÉ ½þ*è =ºÉ ºÉiªÉ EòÉä <Ç·É®ú, {É®ú¨ÉÉi¨ÉÉ, {ÉÖ¯û¹É, ¥ÉÀ, Ê¶É´É +ÉÊnù +xÉäEò xÉÉ¨É ÊnùB MÉB ½þ*é {É®ú ´ÉɺiÉ´É ¨Éå =ºÉ ºÉiªÉ EòÉ EòÉä<Ç xÉÉ¨É xɽþÓ ½þè CªÉÉåÊEò ´É½þ ºÉ¤É xÉɨÉÉå Eäò {É®úä ½þ*è ªÉ½þ ºÉiªÉ º´ÉªÉÆ +°ü{É ½þÉiä Éä ½þBÖ ¦ÉÒ +{ÉxÉä +É{ÉEòÉä +xÉäEò °ü{ÉÉå ¨Éå +ʦɴªÉHò Eò®ú ®ú½þÉ ½þ*è • =ºÉ ºÉiªÉ EòÒ +xÉäEò |ÉEòÉ®ú ºÉä ´ªÉÉJªÉÉ EòÒ MÉ<Ç ½þ*è ´ÉänùÉå +Éè®ú ={ÉÊxɹÉnùÉå ¨Éå ½þ¨Éå =ºÉ ºÉiªÉ EòÒ ZɱÉEò ʨɱÉiÉÒ ½þ*è BEò ´Éänù¨ÉÆjÉ ¨Éå Eò½þÉ MɪÉÉ ½þ-é -ú BEòÆ ºÉnù ʴÉ|ÉÉ ¤É½þvÖ ÉÉ ´ÉnùÊxiÉ-- ºÉiªÉ BEò ½þ,è Ê´ÉuùÉxÉ ±ÉÉäMÉ =ºÉEòÉ ´ÉhÉÇxÉ +xÉäEò |ÉEòÉ®ú ºÉä Eò®úiÉä ½þ*é • ºÉiªÉ Eäò ¤ÉÉ®úä ¨Éå ¤É½þºÉ Eò®úxÉä ºÉä ºÉiªÉ EòÉä xɽþÓ VÉÉxÉÉ VÉÉ ºÉEòiÉÉ* =ºÉä VÉÉxÉxÉä Eäò ʱÉB ¨ÉxÉÖ¹ªÉ EòÉä +{ÉxÉä ¨ÉxÉ EòÉä ¶ÉÉÆiÉ Eò®ú +{ÉxÉä +Ænù®ú =ºÉ ºÉiªÉ EòÉ ºÉÉIÉÉiÉ Eò®úxÉÉ ½þÉMä ÉÉ* • <ºÉ oùʹ] EòÉä ±ÉäEò®ú ¦ÉÉ®úiÉ ¨Éå ºÉÉvÉxÉÉ-{ÉrùÊiÉ EòÉ Ê´ÉEòÉºÉ ½þ+ Ö É ÊVɺɨÉå ªÉÉäMÉ |ɨÉÖJÉ ½þ*è ªÉÉäMÉ EòÉ ºÉƤÉÆvÉ ¨ÉÖJªÉiɪÉÉ ¨ÉxÉÖ¹ªÉ Eäò ¨ÉxÉ ºÉä ½þ*è ªÉÉäMÉ Eäò ºÉ¤ÉºÉä |ɨÉÖJÉ Ê¶ÉIÉEò {ÉiÉÆVÉ汃 xÉä ªÉÉäMÉ EòÒ {ÉÊ®ú¦ÉɹÉÉ Eò®úiÉä ½þBÖ Eò½þÉ ½þ-è -ú ªÉÉäMÉ: ÊSÉkÉ´ÉÞÊkÉ ÊxÉ®úÉvä É: -- ¨ÉxÉ EòÒ ½þ±ÉSÉ±É EòÉ {ÉÚ®Òú iÉ®ú½þ ¶É¨ÉxÉ Eò®úxÉÉ ªÉÉäMÉ ½þ*è ¨ÉxÉ EòÉä {ÉÚ®Òú iÉ®ú½þ ¶ÉÉÆiÉ Eò®úxÉÉ ½þÒ ªÉÉäMÉ EòÉ ´ÉɺiÉÊ´ÉEò ±ÉIªÉ ½þ*è • ½þ¨ÉÉ®úä VÉÒ´ÉxÉ EòÉ =qù¶ä ªÉ ºÉÞʹ]õ Eäò =ºÉ +ÆÊiÉ¨É ºÉiªÉ EòÉä VÉÉxÉxÉÉ +Éè®ú =ºÉEäò +xÉÖºÉÉ®ú +{ÉxÉÉ VÉÒ´ÉxÉ Ê¤ÉiÉÉxÉÉ ½þÉxä ÉÉ SÉÉʽþB* • VÉ¤É ¨ÉxÉÖ¹ªÉ EòÉ ¨ÉxÉ Ê´ÉSÉÉ®úÉå Eäò ºiÉ®ú ºÉä >ð{É®ú =`öEò®ú {ÉÚ®Òú iÉ®ú½þ ¶ÉÉÆiÉ ½þÉ�� VÉÉiÉÉ ½þè iÉ¤É ´É½þ {ÉÉiÉÉ ½þè ÊEò ´É½þ iÉÉä <Ç·É®ú EòÉ ½þÒ +Æ¶É ½þ*è ½þ¨É Eò½þ ºÉEòiÉä ½þé ½þ¨ÉÉ®úä +Ænù®ú ºÉÉäSÉxÉä´ÉɱÉÉ +Æ¶É ¨ÉxÉÖ¹ªÉ ½þ,è +Éè®ú =ºÉEäò {ÉÒUôä Ê´ÉSÉÉ®úÉå Eäò >ð{É®ú SÉäiÉxÉÉ EòÒ ¶ÉÉÆiÉ +´ÉºlÉÉ <Ç·É®ú ½þ*è <ºÉ |ÉEòÉ®ú ʴɶ´É EòÒ +ÆÊiÉ¨É ºÉkÉÉ ½þ¨ÉÉ®úÒ ¦ÉɹÉÉ +Éè®ú Ê´ÉSÉÉ®úÉå ¨Éå |ÉEò] ½þÉä ®ú½þÒ ½þ*è • ½þ¨ÉÉ®úä ¤Éɽþ®ú |ÉiÉÒiÉ ½þÉxä Éä´ÉɱÉÉ ºÉƺÉÉ®ú Eäò´É±É =xÉ ¶É¤nùÉå +Éè®ú Ê´ÉSÉÉ®úÉå EòÉ JÉä±É ½þè VÉÉä ½þ¨ÉÉ®úä ¨ÉxÉ ¨Éå Ê´ÉʦÉzÉ {ÉnùÉlÉÉæ +Éè®Ç ú |ÉÉÊhɪÉÉå Eäò ºÉƤÉÆvÉ ¨Éå =`öiÉä ½þ*é +ÆÊiÉ¨É ºÉiªÉ <ºÉ xÉɨɰü{É Eäò VÉMÉiÉ Eäò {ÉÒUôä BEò +°ü{É +ÉvÉÉ®ú Eäò °ü{É ¨Éå Ê´Ét¨ÉÉxÉ ½þ*è • ºÉ¦ÉÒ ¨ÉxÉÖ¹ªÉ +{ÉxÉä VÉÒ´ÉxÉ ¨Éå ¶ÉÉÊxiÉ +Éè®ú ºÉÖJÉ {ÉÉxÉÉ SÉɽþiÉä ½þ*é <Ç·É®ú EòÉä {ÉÉEò®ú ¨ÉxÉÖ¹ªÉ EòÉä BäºÉÉ ºÉÖJÉ Ê¨É±É VÉÉiÉÉ ½þè ÊVɺÉä {ÉÉxÉä Eäò ¤ÉÉnù EÖòUô +Éè®ú {ÉÉxÉä EòÉä ¶Éä¹É xɽþÓ ®ú½þiÉÉ* ªÉ½þ ¨ÉxÉÖ¹ªÉ Eäò VÉÒ´ÉxÉ EòÉ SÉ®ú¨É ±ÉIªÉ ½þ*è • <ºÉ VÉÒ´ÉxÉ ¨Éå <Ç·É®ú EòÉä {ÉÉxÉÉ Eäò´É±É ºÉèrùÉÊxiÉEò ¤ÉÉiÉ xɽþÓ ½þ*è ´ÉänùÉå +Éè®ú ={ÉÊxɹÉnùÉå ¨Éå BäºÉä +Æ¶É ½þé ÊVÉx½þå {ÉgEò®ú ºÉÉ¡ò ±ÉMÉiÉÉ ½þè ÊEò BäºÉä EòlÉxÉ Eò®úxÉä´ÉɱÉä @ñÊ¹É +{ÉxÉÒ |ÉiªÉIÉ +xÉÖ¦ÉÚÊiÉ Eäò +ÉvÉÉ®ú {É®ú ¤ÉÉä±É ®ú½þä ½þ*é +¦ÉÒ Ê{ÉUô±Éä nùÉä ºÉÉè ´É¹ÉÉæ ¨Éå ½þÓ ®úɨÉEÞò¹hÉ {É®ú¨É½þºÆ É +Éè®ú ®ú¨ÉhÉ ¨É½þʹÉÇ EòÉ =nùɽþ®hú É ½þ¨ÉÉ®úä ºÉɨÉxÉä ½þ*è ªÉÖ´ÉÉ Ê´É´ÉäEòÉxÉxnù xÉä BEò ¤ÉÉ®ú +{ÉxÉä MÉÖ¯û ®úɨÉEÞò¹hÉ ºÉä |ɶxÉ ÊEòªÉÉ lÉÉú-- CªÉÉ +É{ÉxÉä <Ç·É®ú EòÉä nùJä ÉÉ ½þ?è ®úɨÉEÞò¹hÉ EòÉ ºÉÒvÉÉ =kÉ®ú lÉÉú-- ""¨Éé <Ç·É®ú EòÉä BäºÉä ½þÒ |ÉiªÉIÉ nùJä ÉiÉÉ ½þÄÚ VÉèºÉä ¨Éé iÉÖ¨½þå nùJä É ®ú½þÉ ½þ*ÄÚ '' • ½þ¨É ºÉ¦ÉÒ <Ç·É®ú EòÉä {ÉÉ ºÉEòiÉä ½þ*é ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ {É®ú{Æ É®úÉ <ºÉEòÉ +É·ÉɺÉxÉ nùiä ÉÒ ½þè +Éè®ú ¨ÉÉMÉÇ ¦ÉÒ ÊnùJÉÉiÉÒ ½þ*è ¨ÉÉMÉÇ ºÉÒvÉÉ ½þ-è - +{ÉxÉä ¨ÉxÉ EòÉä <iÉxÉÉ ¶ÉÉÆiÉ Eò®úxÉÉ ÊEò =ºÉ¨Éå EòÉä<Ç Ê´ÉSÉÉ®ú xÉ =`ö*ä ¦ÉɹÉÉiÉÒiÉ SÉäiÉxÉÉ ½þÒ <Ç·É®ú ½þ*è <ºÉä <Ç·É®ú EòÒ {ÉÊ®ú¦ÉɹÉÉ Eò½þÉ VÉÉ ºÉEòiÉÉ ½þ*è • <Ç·É®ú Eäò ºÉƤÉÆvÉ ¨Éå, +Éè®ú <ºÉʱÉB ºÉÞʹ]õ Eäò +ÆÊiÉ¨É ºÉiªÉ Eäò Ê´É¹ÉªÉ ¨Éå, ªÉ½þ ¦ÉÉ®úiÉ EòÒ ºÉ¤ÉºÉä ¤ÉcÒ JÉÉäVÉ ½þ*è +Éè®ú ªÉ½þ JÉÉäVÉ ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ ÊSÉÆiÉxÉ EòÉä ºÉƺÉÉ®ú Eäò +xªÉ ºÉ¦ÉÒ ÊSÉÆiÉxÉ ºÉä +±ÉMÉ Eò®úiÉÒ ½þ*è ºÉ¨{ÉÉnE, º´ÉɨÉÒ, |ÉEòɶÉEò B´ÉÆ ¨ÉÖpùE : +ÊxÉ±É Ê´ÉtɱÉÆEòÉ®ú uÉ®É +¯ûhÉ Bhb÷ ®úÉVÉÒ´É |ÉÉ.ʱÉ., 10 b÷ÒBºÉ+É<ÇbÒ÷ ºÉÒ, ºEòÒ¨É-II +ÉäJɱÉÉ <ÆbÎ÷ º]ÅõªÉ±É BÊ®úªÉÉ ¡äòWÉ-II, xÉ<Ç Ênù±±ÉÒ-110020 ¨Éå ¨ÉÙÊpiÉ* B´ÉÆ VÉä-56 ºÉÉEä iÉ, xÉ<Ç Ên±±ÉÒ 110017 ºÉä |ÉEòÉʶÉiÉ*


32nd issue